अभिनन्दन एवं विश्वास - Akhandjyoti May 1985

पूज्य गुरुदेव का 75 वां वर्ष प्रज्ञा परिजनों द्वारा सन् 1985 में हीरक जयन्ती के रूप में मनाया जा रहा है। इस अवसर पर परिवार के सभी छोटे-बड़े परिजनों को अभिनन्दन।

दैवी अनुग्रह की भाँति जिन स्वजनों का स्नेह सहयोग हम लोगों को मिलता रहा है, भविष्य में उसकी अधिक अभिवृद्धि का आशा भरा विश्वास।

घनिष्ठ आत्मीयता एवं कृतज्ञता की भाव भरी अभिव्यक्ति। भविष्य में अधिक सेवा- सहायता का हम दोनों की ओर से वचन- आश्वासन।

-भगवती देवी शर्मा




सत्य का अवलम्बन - Akhandjyoti May 1985

ऐ अँधियारे के दीप, जो छोड़ना चाहे साथ छोड़ दे। बिना साथियों के भी लोगों ने जिन्दगी जीकर दिखाई है। किसी का प्यार, सहयोग और सहानुभूति न मिले तो भी काम चल जायेगा, क्योंकि ऐसे लोग भी दुनिया में बहुत हैं जिन्हें इनमें से एक भी चीज न मिली और उनके बिना भी किसी प्रकार जिन्दगी पार कर लेने में समर्थ हुए।

सम्पदा के बिना कितनों का ही काम चल जाता है। तब ढकने और पेट भरने में जिन्हें कमी पड़ती रही, ऐसे लोग भी इस दुनिया में कम नहीं हैं।

मेरी चाह है कि हाथ से सत्य न जाने पाये। जिस सत्य को तलाशने में पाने के लिए मैंने कंकरीले, रेतीले मार्ग पर चलना स्वीकार किया है वह आत्म स्वीकृति किसी भी मूल्य पर, किसी भी संकट के समय डगमगाने न पाये।

सत्य का अवलम्बन बना रहे क्योंकि उसकी शक्ति असीम है, मैं उसी के सहारे अपनी हिम्मत सँजोये रहूँगा।




जीवन और उसकी सार्थकता - Akhandjyoti May 1985

हम में से प्रत्येक के अन्दर एक शक्ति है। काम करने की ही नहीं सोचने की भी भाव तरंगों में आन्दोलित होने की भी। यह चेतना हमारी अपनी नहीं है वरन् किसी अदृश्य से अवतरित होकर जीव सत्ता में प्रवेश हुई है। शरीर संरचना में जन्मदाताओं का पोषक पदार्थों का योगदान हो सकता है पर स्वतन्त्र चेतन इकाई का निर्माण कर सकना इनमें से किसी का भी काम नहीं है।

यह चेतना, अणु परमाणुओं की तरह अनगढ़ रीति से जहाँ-तहाँ बिखरी नहीं पड़ी है वरन् परम चेतना की एक छोटी किन्तु सुनियोजित इकाई है। परब्रह्म का एक महत्वपूर्ण अंश पंचतत्वों के काय-कलेवर में आबद्ध होने के लिए क्यों तैयार हुआ? उसे किस कारण इसके लिए बाधित किया गया? ये महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, जिन्हें समझा और समझाया जाना चाहिए।

जीवन खेल-खिलवाड़ नहीं है। वह न तो अकारण अनायास मिला है और न ज्यों-त्यों करके गँवा देने के लिए यह बहुमूल्य सम्पदा सौंपी गई है। निरुद्देश्य यहाँ कुछ भी नहीं है। अस्त-व्यस्त भी नहीं। फिर आत्म-सत्ता का संयोग मानव जीवन के साथ होना तो किसी भी प्रकार निष्प्रयोजन नहीं हो सकता। यह दूसरी बात है कि उसे हम खोजें नहीं। जानकर भी अनजान बने रहें।

आत्मा की उत्कृष्टता असंदिग्ध है। वह अपने सृजेता की तरह पवित्र, प्रखर और विभूतिवान है। निश्चय ही उसका लक्ष्य और कर्तृत्व भी महान है। महानता की गरिमा उसके कण-कण में समाविष्ट है। जो उसे अनुभव करते हैं, वे यह भी समझ लेते हैं कि जीवन के उच्चस्तरीय प्रयोजनों के साथ नियोजित करने में ही उसकी सार्थकता है।

निकृष्टता जीवन की स्वाभाविक स्थिति नहीं है। वह अशुभ के द्वारा थोपी अथवा भ्रमवश बटोरी भर गई है। मनुष्य निकृष्ट नहीं हो सकता। ऐसी उसकी प्रकृति भी नहीं है। हृदय की धड़कन की तरह जो आत्मा की पुलकन का भी अनुभव कर सकते हैं उन्हें यह विदित होता रहा है कि उपलब्धियों का सदुपयोग ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने में है। इससे कम में चैन पाने और प्रसन्न रहने का अवसर मिलता नहीं। अन्धेरे में भटकने वाले नहीं, प्रकाश का अवलम्बन करने वाले रास्ता पाते ओर लक्ष्य तक पहुँचते हैं।

अध्यात्म तत्वज्ञान में ‘हम’ शब्द सीमित व्यक्तिवाद के निमित्त नहीं होता। उसका तात्पर्य होता है- हम सब। यह इसलिए कि आत्मसत्ता की उत्पत्ति, प्रगति और पूर्णता समस्त परिकर के साथ संयुक्त रहकर ही सम्भव हो सकती है। जीवन समग्र ही नहीं संयुक्त भी है। यह विराट ही परमात्मा है। परमात्मा अर्थात् आत्माओं का समूह समुच्चय। समुद्र छोटी बूंदों का समन्वय है। परमाणुओं की समवेत व्यवस्था ही सृष्टिगत हलचलों के रूप में दिखाई देती है। परमात्म सत्ता में आत्माओं के घटक अविच्छिन्न रूप से समाविष्ट हो रहे हैं। अतएव वे सजातीय ही नहीं संयुक्त भी है। संयुक्त ही नहीं अविच्छिन्न और एकात्म भी। व्यक्ति और समष्टि का तारतम्य ही जीवन सत्ता और विश्व व्यवस्था है। अस्तु अहं सीमित नहीं हो सकता। स्व को छोटी परिधि में आबद्ध नहीं किया जा सकता। हम है, यदि यह अनुभूति सच्चे रूप में हो सके तो फिर साथ ही यह विश्वास भी जगेगा कि हम सब एक हैं। एक परिवार के सदस्य बनकर रह रहे हैं।

शरीर के अवयवों का पृथक-पृथक नाम रूप तो है पर तथ्यतः वे सभी एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। कटकर अलग से उनमें से कोई घटक अपनी अहंता या सत्ता का परिचय देना चाहेगा तो भूल करेगा। इस उपक्रम से वह अपनी सत्ता ही गँवा बैठेगा। यदि अलग से कुछ रहा भी तो उसमें निकृष्टता और निरर्थकता के अतिरिक्त बचा नहीं रहेगा। एकता की अनुभूति और विशालता की उपलब्धि- इसी में जीवन की सार्थकता है।




अपना स्वरूप और दायित्व समझें - Akhandjyoti May 1985

गीताकार ने एक ऐसा रहस्योद्घाटन किया है जिस पर गम्भीरतापूर्वक ध्यान देने से मनुष्य सारी विपत्तियों से छुटकारा पा सकता है और सारी सम्पत्तियों से अपना अंचल भर सकता है। सभी जानते हैं कि शत्रुओं के द्वारा मुसीबतें धकेली जाती हैं और सन्मित्र अपनी सहायता देकर सुखों का संवर्धन करते हैं। इसलिए शत्रुओं से पीछा छुड़ाने और मित्रों का सहयोग बढ़ाने के लिए हर बुद्धिमानी को प्रयत्नरत रहना चाहिए।

यह मित्र और शत्रु कौन हैं जो निरन्तर साथ रहते हैं और बिना विश्राम लिए अपना काम करते रहते हैं। निश्चित रूप से यह बाहर वाले नहीं हो सकते। बाहर वालों के अपने भी तो कुछ निजी काम रहते हैं उन्हें छोड़कर सदा सर्वदा साथ कैसे रहें? फिर उनका निवास भी तो हमारे घर में नहीं होता। कहीं दूर रहते होंगे। ऐसी दिशा में इतनी दूरियाँ रहते हुये अपना समय बर्बाद करते हुये हमारे साथ-साथ कैसे रहें? फिर हमें लाभ हानि पहुँचाने में उन लोगों को कुछ कमीशन भी तो नहीं मिलता। ऐसी दशा में उनका निरन्तर साथ रहना और हमारे लिए ही मरते खपते रहना एक प्रकार से असम्भव ही है। ऐसी दशा में वे मित्र शत्रु कौन हैं? जो निरन्तर साथ रहते हुए हमारे वर्तमान और भविष्य को बनाने बिगाड़ने में निरन्तर लगे रहें।

गीताकार का कथन है कि “आत्मैवह्नात्मनो मित्र आत्मैव रिपुरात्मन” अर्थात्- अपना आपा ही अपना मित्र और वही शत्रु है। जिसने अपने आपन को कुसंस्कारी बना लिया वह पहले सिरे का शत्रु है और जिसने उसे सुसंस्कारी बनाया यह सच्चा सुहृदय है। अपने ही दोष दुर्गुण कषाय-कल्मष हमें कुमार्ग के गर्त में धकेलते हैं और नाना प्रकार के त्रास सहने के लिए विवश करते हैं। साथ ही यह भी निश्चित है कि अपना आपा यदि सुसंस्कारी है, सद्गुणों से अभ्यस्त है तो उसी के बलबूते उस मार्ग पर चला जायेगा जिसमें पग-पग पर सुख शांति के शोभायमान सुगन्धित फूल खिले हुये हैं।

मनुष्य क्या है? काया की दृष्टि से हाड़-मास का पुतला ही आत्मा की दृष्टि से चेतना का पुँज। यह चेतना ही काया को जिधर-तिधर घसीटी फिरती है। उसकी मान्यता, भावना, आकाँक्षा और विचारणा जैसी भी होती है शरीर को उसके अनुरूप अपनी गतिविधियों का निर्माण करना पड़ता है। चोर और सन्त की काया में कोई विशेष अन्तर नहीं होता, दोनों के मिलने से एक समग्र व्यक्तित्व बनता है। गुण, कर्म, स्वभाव दिखते तो शरीर पर आच्छादित हैं पर वस्तुतः वे मन के अनुरूप अपनी प्रेरणाऐं फेंकते हैं और उसी स्तर की जीवनचर्या का उपक्रम बना लेते हैं। कहना न होगा कि जिस स्तर का चिन्तन और चरित्र होता है उसी के अनुरूप परिस्थितियाँ घिर आती हैं। वैसे ही लोगों से संपर्क सधता है वैसी ही मण्डली बनती है। वैसे ही साधन जुटते हैं। वैसे ही काम बन पड़ते हैं। यही है मनुष्य का समग्र स्वरूप जो अनुरूप प्रतिफल खींच बुलाता है। मनःस्थिति से परिस्थितियाँ बनती हैं और फिर उनका प्रतिफल प्रकृति की सुनिश्चित व्यवस्था के अनुरूप मिलना आरम्भ हो जाता है। कर्म और फल का गुँथा हुआ चक्र है। कुकृत्यों के करने लगने पर जीवन का स्वरूप हेय बन जाता है। हर ओर से घृणा भर्त्सना बरसती है। परिचित जनों का सहयोग हटता और घटता जाता है। प्रतिकूलतायें बनती हैं और समस्याओं का जंजाल एवं विपत्तियों को घटाटोप घिरना आरम्भ हो जाता है। इसके लिए किसी दूसरे को दोष देना व्यर्थ है। दूसरे अपने ही कामों में व्यस्त हैं उन्हें इतनी फुर्सत कहाँ है जो अपना काम हर्ज करके दूसरों के मामलों में टाँग अड़ाने चलें।

अपने ही कृत्य हैं जो अपने स्तर का प्रतिफल स्वयं ही विनिर्मित करते रहते हैं। गृह दशा, देवी देवता, भाग्य विधाता, सभी निर्दोष हैं। वे किसी से राग, किसी से द्वेष क्यों करेंगे? किसी को दुःख देने, किसी पर सुख उड़ेलने के व्यर्थ कार्य का बोझा कोई क्यों ढोयेगा और अकारण क्यों किसी से निन्दा किसी से प्रशंसा सुनता फिरेगा। सम्बद्ध जनों के सम्बन्ध में भी यही बात है। वे किसी के अनुकूल किसी के प्रतिकूल होते हैं तो उसका भी कुछ कारण होता है। वातावरण दौड़कर हमारे पास नहीं आता वरन् अपनी रुचि के अनुरूप हमीं उसे तलाश करते और उसके साथ गुँथते हैं। उद्यानों में भौंरे भी रहते हैं और गुबरीले भी। भौंरे फूलों पर बैठते और मकरंद पान करते हैं। इसके विपरीत उसी क्षेत्र में पड़ी हुई गन्दगी तलाश करने गुबरीले निकलते हैं तो उन्हें सड़े गोबर के ढेर भी जहाँ-तहाँ मिल जाते हैं। एक अपने सौभाग्य को सराहता है दूसरा सिर धुनता और दुर्भाग्य को कोसता है। इसमें निमित्त कारण यह स्वयं ही है कोई और नहीं।

एक जैसी परिस्थिति में जन्मे, पले और बढ़े लोगों में से एक महापुरुषों का श्रेय सम्मान पाता है। दूसरा गयी गुजरी स्थिति में दिन गुजारता है या ऐसा बन जाता है जिसकी हर कोई निन्दा करे। विरोध करे और त्रास दे। इस अन्तर की वास्तविकता तलाश की जाय तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि उन दोनों ने भिन्न-भिन्न दिशायें चुनीं और तद्नुरूप अवगति और प्रगति के भाजन बने।

चाहने को हर व्यक्ति अच्छी परिस्थितियाँ चाहता है और प्रगतिशील बनना चाहता है। पर उस कार्य में सफल सहयोग किससे मिल सकता है। यह भूल जाता है। गीताकार ने इस संदर्भ में कहा है- ‘उद्धरेत् आत्मनात्मानं नात्मानं अवसादयेत्’ -अर्थात् अपना उद्धार आप करें। अपने आप को गिरायें नहीं। दिशा का चयन और निर्धारण स्वयं करना पड़ता है। उस राह पर अपने पैरों आप चलना पड़ता है। इसके उपरान्त तद्नुरूप साथी सहयोगी मिलते चले जाते हैं। इस संसार में किसी बात की कमी नहीं। हम जिधर भी चलेंगे उधर ही सहयोगी मिलते चले जायेंगे। चोर-उचक्कों को वैसे ही मित्र और अवसर मिलते जाते हैं जो कमी रह जाती है वह जेलखाने पहुँचने पर अनेकानेक प्रवीण पारंगतों द्वारा पूर्ति हो जाती है। यदि सन्त सज्जन, कलाकार विद्वान बनना है तो उसकी राह बताने वाले और खोजने पर सहायता देने वाले अपने उसी क्षेत्र में मिल जाते हैं। संसार का इतिहास इन्हीं उदाहरणों से भरा पड़ा है।

अपनी आंखें सही हैं तो संसार के सभी दृश्य दीखेंगे। यदि वे न रहें तो अन्धे के लिए सूर्य और चन्द्रमा तक बुझ जाते हैं और सारी दुनिया सदा सर्वदा के लिए काली चादर से ढक जाती है। अपने कान यही हैं तो एक से एक मधुर और ज्ञानवर्धक शब्द सुने जा सकते हैं पर यदि वे खराब हो जांय तो सारी दुनिया मौन हो जायगी। केवल साँय-साँय की ध्वनि ही कान की झिल्ली में टकराती रहेगी। अपना दिमाग सही हो तो दुनिया में समझदारी की कमी नहीं पर यदि दिमाग खराब हो जाय तो यह सारा संसार पागलों से भरा दिखाई पड़ेगा और जो भी गतिविधियाँ हो रही होंगी वे अस्त-व्यस्त एवं खीज उत्पन्न करने वाली प्रतीत होंगी। घर की खिड़कियां बन्द कर ली जांय तो बारह उगा हुआ सूरज प्रकाश की एक किरण भी न भेज सकेगा। चलता हुआ पवन बाहर ही घूमता रहेगा। घर की सीलन तक न सुखा सकेगा। सूर्य उन्हीं के लिए है जिनकी आंखें हैं। गीत उन्हीं के लिए हैं जिनके कान हैं। समझदारी उन्हीं के लिए है जिनकी अपनी समझ सही है।

प्रकृति के संकेतों पर चलने वाले सृष्टि के सभी जीव जन्तु निरोग रहते हैं। समयानुसार जन्मते मरते तरे हैं पर बीमार नहीं पड़ते। संसार में एक ही मूर्ख जानवर है जो बीमारियों को न्योंत-न्योंत कर बुलाता है- वह है मनुष्य। इन्द्रिय असंयम में अति बरतने के कारण उसका पेट खराब हो जाता है। और अपच अनेकानेक बीमारियों का सिलसिला चल पड़ता है। ब्रह्मचर्य की मर्यादाओं का उल्लंघन करने पर खोखला हुआ दिमाग पग-पग पर आशक्ति का, मनोबल के अभाव का अनुभव करता है। इससे भिन्न प्रकृति के दूसरे लोग हैं जो संयम बरतते हैं और जीवन के हर क्षेत्र में सफल सुखी एवं परिपुष्ट रहते हैं यह सब कुछ अपने ही चयन निर्धारण पर निर्भर है।

बुद्धिमानों का कथन है कि अपने को- अपनी क्षमता एवं गरिमा को जानो और उसका सदुपयोग करो। उपनिषद् का बीज मन्त्र है- “आत्मा वारे ज्ञातव्य” अपने आपको जानो और उसे संभालो। जिनने यह जान लिया समझना चाहिए कि इस संसार में जो कुछ जानने योग था, सब कुछ जान लिया। योग का स्वरूप है- अंतर्मुखी होना, अपने स्वरूप और बल को समझना। समझकर वह मार्ग अपनाना जिससे आत्म-कल्याण का मार्ग खुलता हो और आमन्त्रित विपत्तियों की धमा चौकड़ी वाला द्वार बन्द होता हो।

बुद्ध राजमहल छोड़कर आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए सघन वन में तप करने गये। अन्तर्मुखी होकर अपने भीतर छिपी हुई महान सत्ता और महत्ता के दर्शन किये। इतना होते ही वे राजकुमार से बदलकर भगवान हो गये। जिस वट वृक्ष के नीचे उन्हें बोध हुआ था। उसका नाम बोधि वृक्ष पड़ा। उसकी टहनियाँ काट-काटकर संसार भर के बुद्ध भक्त ले गये और उन टहनियों द्वारा अपने-अपने देशों में बोधि वृक्ष लगाये जिनका सम्मान बुद्ध के प्रतिनिधि जैसा हुआ।

अपना सही स्वरूप न समझ पाने के कारण ही लोग हेय जीते, और निकृष्ट दुष्प्रवृत्तियों में लिपटे हुये नरक भोगते रहते हैं। अपने को ईश्वर का युवराज समझने की मान्यता यदि जग पड़े तो फिर यह निश्चित है कि पिता के सौंपे हुये उत्तरदायित्वों का निर्वाह करने में मनुष्य प्रमाद न करेगा। अपना व्यक्तित्व देवोपम गढेगा और पशु पक्षियों की तरह पेट प्रजनन तक सीमित न रहकर विश्व उद्यान को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने में संलग्न होगा। जिसके भी कदम इस मार्ग पर उठे, उसका निश्चित रूप से काया कल्प हुआ। तुच्छ से महान, लघु से विभु और नर से नारायण बना। नर पशुओं की वासना, तृष्णा और अहंता की मदिरा पीकर उन्मुक्त जैसी स्थिति में उद्धत कर्म करते देखा जाता है। आत्म विस्मृति की स्थिति में उन्हें लज्जा, भय, संकोच भी नहीं होता और कुकर्मों में निरन्तर रहने लगते हैं। यह स्थिति आत्म बोध के अभाव में ही बनती है। जैसे हेय स्तर का जन समाज इन दिनों है उसी को देखते-देखते उसी में घुल जाता है और वैसे ही आचरण करने लगता है।

मनुष्य का यह सर्वोपरि सौभाग्य है कि वह अपने स्वरूप को समझे। सोहम् की ध्वनि उच्चारे और अपने गौरव के अनुरूप जीवन का स्वरूप बदल डाले। कहना न होगा कि यह स्वरूप महामानवों, देवात्माओं, ऋषियों और मार्गदर्शकों जैसा ही हो सकता है उसमें अपने गुण, कर्म, स्वभाव को अनुकरणीय, अभिनन्दनीय, बनने की ऐसी उमंग उठ रही होगी जो चरितार्थ हुये बिना चैन ही न लेने दे। भगवान ने मनुष्य को छः इंच का पेट और छः फुट के हाथ दिये हैं। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह वह दो घण्टे नित्य के परिश्रम से भी कर सकता है। परिवार का दायित्व ऊपर हो तो उन सदस्यों को स्वावलम्बी स्वाभिमानी बनाकर इस योग्य बनाया जा सकता है कि वे किसी के गले का भार न रहे और परिवार संस्था को सींचते पोसते हुये उसी खेत की शोभा भी बढ़ाते रह सकते हैं और घास से अपना निर्वाह भी करते रह सकते हैं। लालच, तृष्णा, ममता का उन्माद आदि लाद लिया जाय तो दुर्व्यसनी जीवन के लिए तो जो भी कमाया जाय कम पड़ेगा। किन्तु ‘औसत भारतीय’ शब्द यदि याद रहे तो बहुत सरलतापूर्वक कम समय में गुजारे की व्यवस्था चलती रहती है।

इसके बाद जो समय बचता है उसे समय की महती समस्याओं के समाधान में लगाया जाना चाहिए। पतन और पराभव से जूझने में एक वाणधारी योद्धा की तरह जुट जाना चाहिए। कोटि-कोटि मानवों की विपन्नता को दूर करने के लिए यदि अपने आप को बीज की तरह गला देने की उमंगें उठें तो उस महाकाल की पुकार को पूरा करने में छोटी से छोटी स्थिति का आदमी महती भूमिका सम्पन्न कर सकता है। लोक-मानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन के दो कार्यों की इतनी शाखा प्रशाखाएं हैं जिन्हें सम्पन्न करने के लिए अपनी क्षमता परिस्थितियों के अनुरूप कार्यक्रम चुनने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है। जिसने अपने को जीता, उसने सारा संसार जीत लिया। संसार का सुधार अपने सुधार से ही आरम्भ होगा। हम बदलें तो सम्बद्ध वातावरण का आश्चर्यजनक ढंग से बदल जाना सुनिश्चित है। समय की यह चुनौतियाँ प्रत्येक विचारवान को झकझोरती हैं कि वह अपने स्वरूप एवं उत्तरदायित्व को समझें और उसके अनुरूप गतिविधियों को बदलने में देर न करें।




अनुशासन का वरदान - Akhandjyoti May 1985

सूझ-बूझ तब काम करती है जब मनुष्य का सन्तुलन बना रहे। जब सूझ-बूझ काम करती है तो कठिनाइयों का हल भी निकल आता है। सूझ-बूझ का तात्पर्य है अनुशासन और मिलजुल कर काम करने का उत्साह। यदि उसमें कमी पड़ती है तो दुर्भाग्य आ धमकता है और जिस उपाय से दूसरों को लाभ हो जाता है उसे भी वे उठा नहीं पाते।

दुर्भिक्ष से पीड़ित एक परिवार गाँव छोड़ कर किसी सुभिक्ष वाले स्थान में जाने के लिए निकल पड़ा। बहुत दूर निकल जाने पर वे थक गये। एक पेड़ के नीचे सुस्ताने लगे और भूख बुझाने का उपाय सोचने लगे।

परिवार में तीन लड़के थे। पिता ने एक को आज्ञा दी आग लाओ, दूसरे से कहा लकड़ी बीनो, तीसरे से कहा पानी लाओ। तीनों आज्ञा पाते ही चल पड़े और बताई चीजें कही से ढूंढ़ कर ले आये। बाप ने चूल्हा बनाया। चूल्हा जलने लगा।

पेड़ पर एक हंस बैठा यह सब देख रहा था। उसने पूछा- चूल्हा, तो जल गया पर भला तुम लोग पकाओगे क्या? सचमुच पकाने के लिए उनके पास कुछ भी नहीं था।

बाप बोला- तुझे ही पकड़कर पकायेंगे।

हंस डर गया। उसने कहा मुझे मत पकड़ो पकाओ। तुम्हें बहुत साधन दूँगा जिससे सुखपूर्वक जी सको। परिवार तैयार हो गया। हंस के पीछे-पीछे वे लोग गये। पक्षी ने एक स्थान बताया और कहा यहाँ खोदो बहुत धन है। खोदा तो भारी स्वर्ण भण्डार निकला। उसे लेकर वह परिवार अपने गाँव लौट गया और सुखपूर्वक रहने लगा।

इतना धन अकस्मात कैसे मिला, कहाँ से मिला- प्रश्न पड़ोस वासियों के मन में उठा। घटना क्रम जाना तो एक पड़ौसी ठीक वैसा ही करने लिए अपने परिवार को लेकर निकल पड़ा और चलते-चलते उसी पेड़ के नीचे डेरा लगाया- जहाँ पहले वाले लोग आये थे और धन लेकर गये थे।

घटनाक्रम उसी प्रकार दुहराया जाना था सो बाप ने लड़कों से कहा- जाओ लकड़ी, आग, पानी लाओ। पर उनमें से कोई भी न गया। एक दूसरे से लड़ने लगे और कहने लगे हम क्यों जायें, तू ही तीनों चीजें क्यों नहीं ले आता। झंझट में घण्टों बीत गये। तो लड़कों की माँ ने कहा- लो, मैं जाती हूँ और तीनों चीजें लाती हूँ। इस पर बाप आग बबूला हो गया। उसने कहा- ‘‘खबरदार पैर बढ़ाये तो डण्डे से तोड़ दूंगा। जब जवान लड़के ही नहीं जाते तो तुझे जाने की क्या गरज पड़ी है।”

सारा परिवार आवेश में भरा बैठा था, एक-दूसरे पर बेतरह बरस रहा था, पर कुछ करने को कोई तैयार न था। बाप की आज्ञा को किसी ने भी नहीं स्वीकारा।

पेड़ पर बैठा हंस यह सब देख रहा था। उसने कहा- “तुम लोग बड़े बेढब हो। भूखे प्यासे हैरान बैठे हो- खाओगे क्या?”

सबने मिलकर कहा- तुझे पकड़ेंगे और तुझे ही खायेंगे।

हंस ठठाका मार कर हँस पड़ा और बोला- तुम लोग आपस में ही एक-दूसरे को नहीं पकड़ सकते तो मुझे क्या पकड़ोगे?

हंस उड़कर दूर चला गया। उन लोगों को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा। जो लोग परस्पर मिल जुलकर नहीं रह सकते उन्हें महत्वपूर्ण सफलताओं की आशा नहीं रखनी चाहिए।




कुशल मांझी भवसागर को सहज पार करते हैं। - Akhandjyoti May 1985

संसार को भव सागर कहा गया है। इसका तरना मुश्किल है। जो तर नहीं पाते उन्हें विषय विकार रूपी मगरमच्छ नोंच खाते हैं और अस्थिर पिंजड़ा इतनी गहराई में डुबा देते हैं जिसका खोजने पर कहीं अता-पता भी न लगे।

वासना, तृष्णा और अहंता ही गाह्य है वे धूप अथवा चांदनी में मोहक खिलौने जैसे लगते हैं। प्रतीत होता है कि खेलने-खिलाने के लिए मित्र जैसा कुछ करने समीप आते हैं। मनुष्य बचता भागता नहीं वरन् उनके प्रत्यक्ष आकर्षण पर विमोहित होकर उनकी समीपता के लिए दौड़कर पहुँचता है। पर उनका प्रतिफल नितान्त भयंकर ही होता है। सारी शक्तियाँ इन्हीं के निमित्त बलि हो जाती हैं। भोगों को स्वयं नहीं भोगता वरन् भोगों द्वारा स्वयं की भोग लिया जाता है। लालच में बहुत कमाने का जो प्रयत्न किया जाता है वह दुर्व्यसन बढ़ाता है और दूसरों के काम आकर मुफ्तखोरी का अभिशाप लादा जाता है। यह है तृष्णा की परिणति। वासना का मौज मजा लूटने के लिए मनुष्य उस कुत्ते का उदाहरण बनता है जिससे सूखी हड्डी चबाते-चबाते अपना जबड़ा छील लिया था और उस रक्त को सूखी हड्डी से टपकता अनुभव करता था। जबड़ा पूरी तरह छिल जाने पर सूजे हुए मुँह की व्यथा को देखकर यह अनुमान लगाता था कि भूल हुई। अपनी असाधारण क्षति को कहीं बहार से मिलने वाला स्वाद समझता रहा। विषय भोगों की यही परिणति है। जिव्हा, जननेन्द्रिय, नेत्र आदि से जो सरसता अनुभव की जाती है। वह वस्तुतः अपनी जीवनी शक्ति को फुलझड़ी की तरह जलाने की बाल क्रीड़ा भर होती है।

अहंता का प्रदर्शन वेश विन्यास में, ठाट-बाट में, निर्बलों के उत्पीड़न में आमतौर से किया जाता है। विज्ञजनों की दृष्टि से यह खर्चीली उच्छृंखलता है। इससे मान बढ़ता नहीं, उलटे बचकानेपन का- मनचलेपन का दोष लगता है।

प्रिय लगते हुए भी परिणाम में अत्यन्त कष्टदायक वासना, तृष्णा और अहन्ता का यह त्रिगुण मनुष्य की बोटी-बोटी नोंच लेता है। परिणति में रोग शोक, आत्म प्रताड़ना और लोभ भर्त्सना के विषफल अनिच्छापूर्वक खाने पड़ते हैं। कुमार्गगामी को ईश्वर की अप्रसन्नता सहनी पड़ती है और दैवी अनुग्रह अनुदान से वंचित रहना पड़ता है।

सुर दुर्लभ मनुष्य जीवन बिता देने के उपरांत चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के लिए बाधित होना पड़ता है। औसत एक वर्ष में एक योनि में रहने का लगाया जाए तो 84 लाख वर्ष लम्बे होते हैं कि उस अवधि को मानवी अस्थि पंजर रसातल को चला जाने जितना कहा जाय तो उसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

मनुष्य जीवन अपूर्णता को पूर्णता तक पहुँचा देने और विश्व उद्यान को सुरम्य सुविकसित बनाने के लिए मिला है। उसे व्यर्थ की खिलवाड़ों में गंवा देने से बढ़कर दूसरी मूर्खता और नहीं हो सकती। आमतौर से लोग इस दुर्भाग्य एवं अभिशाप की वैतरणी में तैरने उबरने में जीवन सम्पदा गवाँ बैठते हैं।

जिन्हें पार होना है उन्हें दूसरा रास्ता अपनाना पड़ता है। इन्हें शरीर को नौका और मन को माँझी बनाना पड़ता है। जैसे शरीर सत्कर्मों में संलग्न है। जो असंयम के छिद्रों को मजबूती से बन्द किये रहता है उसकी नौका डूबती नहीं। डूबती तो तब है जब भार अत्यधिक लदा हो, भार का संतुलन सही न हो। पेंदे में छिद्र होने पर पानी भरने लगे। इन सभी बातों से जो अपने प्रत्यक्ष जीवन को- शारीरिक कर्म विधान को सम्भाले रहता है। जीवनक्रम संयम और सदाचार के साथ बिताता है उसकी नाव धोखा नहीं देती। इसके उपरान्त तो मांझी की कुशलता का प्रश्न रह जाता है। हवा के रुख के अनुरूप पतवार बांधता, दिशा और गति सही रखना एवं चम्पू बल्लियां इस प्रकार चलाते रहना जिससे दिशा और गति का संतुलन पतवार के अनुकूल बना रहे। ऐसे नाविक मझधार में अधिक तेज प्रवाह होने पर भी घबराते नहीं, मात्र अपनी सतर्कता बढ़ा देते हैं। बीच-बीच में भँवर पड़ते हैं और कहीं-कहीं ऊँचे चट्टान पड़ते रहते हैं। वे कहाँ हो सकते हैं माँझी अपनी लम्बी दृष्टि फेंककर पहले से ही अनुमान लगा लेता है और संकट के क्षेत्र से नाव को बचा कर इस प्रकार पार ले जाता है कि किसी संकट में न फँसना पड़े।

संसार सागर की सैर करने हमें भगवान ने भेजा है। रास्ते की सभी आवश्यकताओं से भरी-पूरी मजबूत नौका हमें प्रदान की है। हमारा शरीर ऐसा है जो संयमपूर्वक सँजोकर रखा जाय तो इसमें टूट-फूट होने का कोई कारण नहीं है। मन रूपी माँझी इतना सुयोग्य है कि वह यदि अपने लक्ष्य से ध्यान हटाकर चित्र-विचित्र दृश्यों के कौतुक-कौतूहल में न भरमाये तो इस सुदृढ़ नौका को सहज ही निर्धारित अवधि में लक्ष्य तक पहुँचा सकने में सफल हो सके।

माँझी का स्वयं पार होना और नाव को यथा-स्थान ले पहुँचना तो सरल है ही। इसके अतिरिक्त वह अनेकों को इस पार से उस पार पहुँचाता रहता है। अनेक जो कार्य स्वयं नहीं कर सकते उन्हें सहारा देकर स्वयं परिचय करा देता है। इसमें उसे कृतज्ञता प्रशंसा का लाभ तो मिलता ही है कई ऐसा उपहार भी दे जाते हैं जिससे उसका निर्वाह भी होता रहे और परिवार का भरण-पोषण भी चलता रहे।

यह समुद्र किसी के लिए खारी खारी और गरजते ज्वार भाटों से भरा-पूरा जहा है। जहा चट्टानों वाला ऐसा भी है कि नाव को डुबा दे और नाविक को जोखिम में धकेल दे। किसी के लिए ऐसा भी है कि लहरों के- सूर्योदय के फेनिल लहरों जैसे दृश्य दिखाये और प्रबल जैसी मूल्यवान वस्तु भरकर साथ लाये। जिन नाविकों को गोता खोरी भी आती है और मोती निकालने के क्षेत्र का ज्ञान है वे किसी साथी को नाव साधकर स्वयं नीचे गहराई में उतर जाते हैं और वहाँ से बहुमूल्य मोतियों से झोला भर कर वापस लौटते हैं। ऐसे साथी सहयोगी और मार्गदर्शक को ‘सद्गुरु’ कहते हैं। वह शिष्य के थकने या भटकने पर नाव को स्वयं खेने लगता है। जिसका मार्ग देखा हुआ है वह लाभदायक बिना जोखिम के क्षेत्रों में होकर नाव ले चलता है। उसके साथ रहते नौसिखिये माँझी को सब प्रकार की निश्चिन्तता रहती है।

जीवन रूपी समुद्र-यात्रा जोखिम भरी भी है और आनन्ददायक भी। अनाड़ी लोग इसके रहते हुए भी जोखिम उठाते और पश्चात्ताप करते हैं। नाव किनारे पर बाँधकर ऐसे ही पानी में भीतर घुस पड़ा जाय तो मगरमच्छों का ग्रास बनने में संदेह नहीं। किंतु जो नाव को सम्भाले रहते हैं उन्हें उसमें पहले से ही रखी हुई सुविधाओं का लाभ उठाते हैं। मनोरम दृश्य देखते हैं और जिस लाभ को प्राप्त करने के लिए यह सरंजाम जुटाया गया है। उसे अनाड़ी तो हर बहुमूल्य वस्तु या अवसर को अपनी अदूरदर्शिता के कारण अस्त-व्यस्त नष्ट भ्रष्टकर सकते हैं।

संसार अनाड़ियों के लिए दुसह भवसागर है और बुद्धिमानों के लिए बहुमूल्य रत्न-राशि से भरा-पूरा लक्ष्मी का कोष भण्डार भी। अनाड़ी मगरमच्छों के ग्राह बनते और नाव को जर्जर बनाकर इतनी गहरी डुबा देते हैं कि फिर उसका कभी पता भी न चले। इसके विपरीत दूरदर्शी इस नाम द्वारा उसे सर्वसाधन सम्पन्न स्वर्ग जैसे द्वीप में जा पहुँचाते हैं जहाँ केवल आनन्द ही आनन्द है।




Quotation - Akhandjyoti May 1985

“आपकी सफलता का रहस्य क्या है? अमेरिका के प्रसिद्ध उद्योगपति कारनेगी से किसी ने पूछा। उत्तर था- “सही समय पर सही निर्णय।”

“और सही निर्णय कैसे कर सकते हैं।” “अनुभवों के आधार पर।” अनुभव कैसे प्राप्त किये।” “गलत निर्णयों के आधार पर”

गलतियों को दुहरायें नहीं- यही गलती को सुधारने का उपाय है।




दूरदर्शिता एक बहुत बड़ा सौभाग्य - Akhandjyoti May 1985

दृष्टि स्वच्छ न हो, उसमें विकृतियाँ घुस पड़ें तो लगभग अन्धेपन जैसी दुर्दशा होने लगती है। सर्वथा अन्धे वे हैं जिनके नेत्र गोलक तो यथास्थान होते हैं पर उनसे देख नहीं सकते। चारों ओर अंधेरा छाया रहना। गन्तव्य के सम्बन्ध में लड़की की खटखट, चहल-पहल या पूछताछ के सहारे अनुमान लगाते हैं और उसी के सहारे चलने की दिशा पकड़ते हैं। अनुमान लगाते रहते हैं। वह कभी ठीक होता है कभी गलत। गलत होने पर छोटे-बड़े जोखिमों का सामना करना पड़ता है। ठोकर लगने से काँटा चुभने तक, कुत्ते पर पैर पड़ जाने से लेकर गड्ढे में गिरने तक के संकटों का सामना करना पड़ता है। पूरी अन्धता न होने पर भी कई तरह की कठिनाइयाँ सामने रहती हैं। रतौंधी आने लगे तो रात्रि में कुछ भी नहीं दीखेगा। चौंधियाने पर तेज प्रकाश ऐसी ही मुसीबत पैदा करते हैं। कभी एक की जगह दो दीखते कभी अति निकट का दिखता है, दूर का नहीं। ऐसे लोगों को पढ़ना पड़े तो कागज आँखों से लगाकर ही कुछ पढ़ पाते हैं या मोटे आतिशी शीशे के सहारे कुछ पढ़ने में सफल होते हैं।

यहाँ चर्चा नेत्र गोलकों चर्मचक्षुओं की हो रही है। सर्वथा अंधों को दया का पात्र समझा जाता है और उनकी यथा संभव सहायता करके लोग पुण्य अर्जित करते हैं। विकृत दृष्टि वालों की और भी अधिक दुर्दशा होती है। प्रत्यक्षतः वह भले-चंगे लगते हैं पर अपनी कठिनाई आप ही समझते हैं। न वे अंधों की तरह दया के पात्र होते हैं और न नेत्र रहते हुए भी उनसे यथोचित काम ले पाते हैं।

प्रत्यक्ष नेत्रों की तरह दूसरे परोक्ष नेत्र हैं। उनकी आवश्यकता भी कम नहीं होती। उनके विकार भी कम दुःखदायी नहीं होते। समय के आगे की सोच सकना- कामों के भावी परिणामों का अनुमान लगा पाना इन परोक्ष नेत्रों का ही काम है। वे यदि विकार ग्रस्त हों तो चर्म चक्षुओं से राह देखने जितना ही काम हो पाता है। बाकी जो कुछ रह गया जो उसके सम्बन्ध में भटकाव ही भटकाव रहता है। इसका दुष्परिणाम भी कम नहीं पड़ता।

अभी जो कर रहे हैं उसका निकट भविष्य में या दूर भविष्य में क्या परिणाम होने वाला है। जो यह अनुमान नहीं लगा पाते वे भी आये दिन ठोकरें खाते हैं। थाली में भोजन रखा है। जायकेदार है। जीभ की लोलुपता कहती है कि खाते ही चला जाय। पेट भर गया है तो भी रुका न जाय। ऐसा करने वाले कम नहीं होते। दावतों में आमतौर से यही होता है। पकवानों का लोभ छोड़ते नहीं बनता। अधिक खा जाने पर पेट दर्द करने लगता है। दुखते पेट की तकलीफ मिटाने के लिए दवा-दारु की तलाश में भाग-दौड़ करनी पड़ती है। पैसा भी लगता है। जल्दी काम छोड़कर भी चारपाई पर लोट-पोट करनी पड़ती है। नींद नहीं आती। रात ऊंघते हुए बितानी पड़ती है। कोई पूछता है कि क्या हुआ? तो पकवानों को खराब घी का बना होने जैसे बहाने ढूंढ़ने पड़ते हैं।

यह एक दिन की बात हुई। चटोरपन की आदत पड़ जाय तो दावत न सही-पकवान न सही-घर की बनी चीजों में ही शकर या मिर्च मसाले की मात्रा अधिक डालकर उन्हें भी अधिक मात्रा में खाने लगने की आदत पड़ जाती है। एक दो दिन की बात हो चूरन चटनी से भी काम चले। रोज-रोज वही होना है तो धीरे-धीरे पेट ही खराब हो जाता है। अधिक खाया पचाने के लिए दो पेट तो लगाये नहीं जा सकते। उदर रोग पीछे पड़ जाता है और सड़न की जहरीली गैसें कई तरह की स्थायी बीमारियों को जन्म देती हैं। दूर का न दिखने पर जिस तरह ठोकर लगती है। पैर फिसल जाने से मोच आती है। यह मुसीबत उससे कम कष्टकारक नहीं है।

उठती आयु में घर वालों का आग्रह मन लगाकर पढ़ने का होता है। फीस देते हैं किताबें खरीदते हैं। और जो पैसा चाहिए वह पास में न होने पर भी जहाँ-तहाँ से इन्तजाम करते हैं। पर उन दिनों आवारागर्दी का भूत चढ़ बैठता है। पढ़ने को मिला हुआ पैसा सिनेमा में, मटर गश्ती में उड़ा दिया जाता है। गैर हाजिरी के उलटे-सीधे बहाने बना दिये जाते हैं। न पढ़ने पर फेल होना निश्चित है। झेंप संकोच के कारण अगले वर्ष पड़ने को जी नहीं करता। एकाध वर्ष ऐसे ही गँवाने के बाद पढ़ाई समाप्त ही हो जाती है। घर के काम-काज की कड़ी मेहनत होती नहीं। नौकरी पर कम पढ़े को कोई रखे कहाँ? जहाँ-तहाँ ठोकरें खाते हैं। गलत मार्ग पर भटकते हैं। सारी जिन्दगी पछताते हैं। दूसरे साथी ऊँची पढ़ाई करके जब अफसर बन जाते हैं तब भाग्य को कोसते-कोसते दिन काटते हैं।

छोटी उम्र में विवाह कर लेने और संयम की नियम मर्यादाओं को छोड़ बैठने पर शरीर को उठती उम्र में ही खोखला बना लेते हैं। शरीर काम नहीं देता। बीमारियाँ जड़ जमाने लगती हैं। कई बच्चों के बाप बन जाते हैं। पत्नी भी कमजोरी बीमारी की शिकार बनी, कलपती रहती है। मित्र मण्डली जब खेलों में इनाम जीतकर लाती है तब अपनी कमर दर्द करती है और आये दिन जुकाम बना रहता है। इन लोगों को क्या कहा जाय? अदूरदर्शिता अपनाकर अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारते हैं। इनकी आंखें देखने से सही होने पर भी परखने पर अदूरदर्शिता की बीमारी से घिरा हुआ पाया जायेगा।

उद्योग धंधों में दिलचस्पी लेकर लोग व्यवसाय बुद्धि पैनी करते हैं। कमाने के, बचाने के तौर-तरीके सीखते हैं। जैसे लोगों में उठना-बैठना होता है, उसके तौर-तरीके समझ में आते हैं। फलतः पूँजी न होने पर भी, व्यवहारिक कुशलता के सहारे लोग व्यवसाय बुद्धि जगा लेते हैं। पैसे कमाते हैं और साथियों को भी सहारा देकर कहीं से कहीं आगे बढ़ा ले जाते हैं।

संगीतकार, कलाकार, साहित्यकार आदि विशेषताएँ कोई जन्मजात रूप से सीखकर नहीं आता। इसके लिए किसी को स्कूल कालेज में भी भर्ती नहीं होना पड़ता। अपनी पैनी अभिरुचि साधन और अवसर तलाशती रहती है। दस जगह ढूंढ़ खोज करने पर एक जगह सहयोग भी मिलने लगता है और अवसर भी। दूसरे लोग जब चमत्कारी प्रतिभा देखते हैं तो आश्चर्य से चकित रह जाते हैं। पूछते हैं यह सौभाग्य कैसे मिला? कोई ग्रह दशा को अनुकूलता भी बता सकते हैं। भाग्योदय, पूर्व जन्मों का पुण्य फल आदि कुछ भी कहा जा सकता है। पर बात वास्तव में इतनी भर होती है कि किसी काम की ओर सच्चे मन में लगन लगी। हर समय अवसर ढूंढ़ने का ध्यान रहा। निराशा हाथ लगने पर भी प्रयास छोड़ा नहीं। उतावली नहीं बरती, हिम्मत नहीं छोड़ी, खोजने वाले को देर सवेर में रास्ता मिल गया और वह उत्कर्ष हाथ लग गया जिसके लिए दूसरे लोग तरसते रहते हैं।

जीवन सम्पदा सबको प्रायः समान स्तर ही प्राप्त हुई है। जो इसका मूल्य समझते हैं वे इसके अध्ययन का श्रेष्ठतम उपाय सोचते हैं। जो सोचते हैं उसे खोजते हैं और जो खोजा उसे अपनाते हैं। ऐसे ही लोग महामानवों में गिने जाते हैं। ऐसी कार्य पद्धति अपनाते हैं जिसका अनुकरण करके असंख्यों व्यक्ति धन्य बनते हैं। यह वही लोग हैं जिनने दूर का देखा है। भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाला खेत बोया है। जिसने बोया है उसने काटा है और कोठे भरकर मालामाल बना है।

दूसरे अदूरदर्शी हैं जो जीवन को कूड़े करकट की तरह समझते हैं। हीरा हाथ लगने पर भी उसे काँच समझते हैं और कौड़ी मोल बेच देते हैं। इन्हें अदूरदर्शी कहा जायेगा। जो भविष्य के लिए सुन्दर सपने नहीं देखता। भावी जीवन को शानदार बनाने के लिए जो कीमत चुकानी चाहिए उसे नहीं चुकाते। जिन्हें सिर्फ आज दिखता है और उससे हल्का फुल्का बिता देने की इच्छा रखते हैं। वे आते हैं, रोटी खाते हैं, दिन गुजारते हैं और ज्यों-त्यों करके सांसें पूरी कर लेते हैं।

अन्धा होना दुर्भाग्य है। अन्धे दया के पात्र समझे जाते हैं पर उन्हें क्या कहा जाय जिनके नेत्र गोलक तो वहीं हैं पर दूरदर्शी आंखें एक प्रकार से गड़बड़ा गई हैं। असल में नाक के पास वाली आँखों का उतना महत्व नहीं है ये तो पशु पक्षियों के भी होता है। मनुष्य की विशेष आंखें वे हैं जिनके सहारे वह दूरदर्शी कहलाता है और बुरी सम्भावना से बचकर उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करता है। ये आँखें जिसकी सही हैं समझना चाहिए वही सौभाग्यवान है।




स्वाद विजय की प्रथम साधना - Akhandjyoti May 1985

प्रत्यक्ष से परोक्ष की ओर चलने की पद्धति सही भी है और सरल भी। आहार सबसे अधिक प्रत्यक्ष है। बच्चा जब जन्म लेता है तब सर्वप्रथम उसकी जीभ ही रोने और चूसने का काम करती है। आँखें तक बाद में खुलती हैं। साधना की दृष्टि से सर्वप्रथम आहार ही ध्यान देने योग्य है। व्रत उपवास गृहस्थों तक के लिए सरल पड़ते हैं। हिन्दू धर्म में उन्हीं का महत्व और माहात्म्य अधिक माना गया है। संख्या की दृष्टि से उन्हीं का बाहुल्य है। कोई महीना ऐसा नहीं जिसमें कई-कई व्रत पर्व न पड़ते हों और उनमें उपवास का विधान न हो। एकादशियां, अमावस्या, पूर्णमासियां, सप्ताह में कोई वार विशेष, पर्व, त्यौहार, देवताओं की जयन्तियां आदि मिलाकर अनेकों पड़ती हैं कार्तिक, मार्गशीर्ष, माघ, बैसाख, श्रावण मासों के अपने-अपने माहात्म्य बताने वाले एक-एक मास के व्रत हैं। अवतारों के जन्मदिन, कृष्ण जन्माष्टमी, राम नवमी, हनुमान जयन्ती, गंगा दशहरा आदि जन्म तिथियों का बाहुल्य है। पंचांग पढ़ने से प्रतीत होता है कि महीने में दस दिन अवश्य ही व्रत उपवासों का माहात्म्य बताने वाले हैं। यह न तो निरर्थक है न अन्धविश्वास है। इनके पीछे कथानक जो भी हो आत्म-कल्याण के लिए नितान्त आवश्यक इन्द्रिय निग्रह का तथ्य तो जुड़ा हुआ है ही। प्रत्यक्ष लाभ की दृष्टि से अपच निवारण की बात तो प्रत्यक्ष ही है। दफ्तर, कारखानों, स्कूलों में साप्ताहिक छुट्टियाँ इसीलिए होती हैं कि एक दिन का विराम मिल जाने से शारीरिक और मानसिक थकान दूर होती है और फिर शेष छः दिन समुचित उत्साहपूर्वक काम करने का नया सुयोग मिल जाता है। यह सोचना ठीक नहीं कि एक दिन की छुट्टी में काम हर्ज होगा और घाटा बढ़ेगा। रात्रि को सोया न जाय तो भी यह सोचा जा सकता है कि चौबीस घण्टे काम करने से अधिक लाभ होगा फिर सोने के लिए छुट्टी क्यों की जाय? काम की थकान विश्राम से दूर होती है और उस आधार पर उपलब्ध हुई स्फूर्ति से अधिक तत्परता और तन्मयतापूर्वक काम करने का अवसर मिलता है। पेट के बारे में भी यही बात है। उसे भी बीच-बीच में विश्राम का अवसर मिलना चाहिए। इससे पाचन तन्त्र नये सिरे से, नये उत्साह से काम करने का अवसर प्राप्त करता है। शक्ति घटने, कमजोरी आने जैसे सन्देह करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उपवास करते हरने वालों का पाचन तन्त्र, ठीक रहता है और न खाने से रक्त कम बनने जैसी कल्पना मिथ्या सिद्ध होती है। इस आश्रय के अवलम्बन से पाचन ठीक रहता है और पेट की थकान दूर होने से अपेक्षाकृत अधिक काम करने की, अधिक सामर्थ्य उत्पन्न होने की सुविधा मिलती रहती है।

उपवास का वास्तविक अर्थ है- निराहार रहना। किन्तु पानी अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में पीना जिससे सफाई का काम अधिक अच्छी तरह हो सके। नाली में अधिक पानी छोड़ देने से कचरा बह जाता है और अच्छी सफाई हो जाती है। जो लोग मात्र जलपर उपवास न कर सकें वे पेय पदार्थ इतनी स्वल्प मात्रा में ले सकते हैं जिससे भूख की जलन मात्र की कठिनाई से बचा जा सके। इस निमित्त दूध, छाछ लेना उत्तम है। फलों का रस या शाकों का रसा लेना भी ठीक रहता है। इन वस्तुओं से पेट पर दबाव भी कम पड़ता है और सर्वथा निराहार रहने की कठिनाई भी अनुभव नहीं होती। दो समय भोजन करने वाले एक समय खाकर काम चला लें तो भी ठीक है। मात्रा कम ही रखी जानी चाहिए। यदि पेय पदार्थों से काम न चले तो उबले हुए अन्न का अमृताशन सीमित मात्रा में लिया जा सकता है। खिचड़ी, दलिया जैसी उबली हुई वस्तुएं- उबले शाक भी उपवास की आंशिक पूर्ति कर देते हैं।

उपवास का आध्यात्मिक प्रयोजन तब सधता है जब उसमें जो फलाहार लिया जाय वह शकर और नमक मसालों से रहित हो। यह वस्तुएं मात्र स्वाद के लिए खाई जाती हैं। खारी नमक को खाद्य पदार्थों में ऊपर से मिलाया जाता है। अनावश्यक ही नहीं हानिकर भी है। पचने योग्य तथा स्वाभाविक नमक फल, शाक, अन्न आदि में स्वभावतः विद्यमान रहता है। वही पचता है और वह घुलकर शरीर का अंग बनता है। जिस नमक को हम खाद्य पदार्थों में मिलाकर जायकेदार बनाते हैं वह सोडियम क्लोराइड नमक मन्द विष है। उसकी परिणति बीमारियाँ उत्पन्न होने के रूप में सामने आई हैं। रक्तचाप, हृदय रोग, सूजन आदि रोगों में तो चिकित्सक नमक सर्वथा बन्द कर देने की सलाह देते हैं। यदि जीभ न माने तो नमक की मात्रा जितनी कम रखी जा सके उतनी घटा तो देनी ही चाहिए। यही बात शकर के बारे में भी है। आवश्यक और उपर्युक्त मात्रा हमारे साधारण खाद्य पदार्थों में विद्यमान रहती है। वही पचती भी ठीक से है। ऊपर से मिलाई हुई शक्कर भी नमक की तरह है। गुर्दे खराब करती और पेशाब आदि के रास्ते बाहर निकल जाती है। शकर को हजम करने के लिए कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है। जो हड्डियों में से खिंचता है। उससे दाँत खराब होते हैं। पेट में कीड़े उत्पन्न होने की शिकायत भी शकर खाने से उत्पन्न होती है। पकवानों और मिष्ठान्नों में काम आने वाली चिकनाई भी दुष्पाच्य होती है। तिल, मूँगफली, सोयाबीन, दूध, दही आदि में रहने वाली चिकनाई उनके स्वाभाविक रूप से खाई जाय तो ही ठीक पड़ती है। घी और तेल में तलने भुनने से हर पदार्थ दुष्पाच्य हो जाता है और पेट खराब करता है। उपरोक्त हानिकार पदार्थों से कम से कम उपवास काल में तो बचा ही जाना चाहिए। स्वाद के लिए जो अनुपयुक्त वस्तुऐं आहार में मिलाई जाती हैं। उनका बचाव तो इस अवसर पर किया ही जाना चाहिए। फलों की जिन्हें सुविधा हो वे फलों की मिठास पर सन्तोष करें। भुने आलू में नमक बढ़ जाता है उससे स्वाद की ललक एक सीमा तक बुझाई जा सकती है।

गाँधी जी ने अपनी “सप्त महाव्रत” पुस्तक में सात महाव्रतों का उल्लेख किया है। उनमें प्रथम व्रत ‘अस्वाद’ को गिनाया है। स्वाद जप के साथ अध्यात्म साधना की वर्णमाला आरम्भ की जानी चाहिए। आत्मनिग्रह का शुभारम्भ इन्द्रिय दमन से आरम्भ होता है। इन्द्रियों में स्वादेंद्रिय प्रथम एवं प्रमुख है। उसके निग्रह में भूख से कम खाने का स्वल्पाहार का विधान तो है ही। सुपाच्य और मिलावटी स्वादों से रहित भी उसे होना चाहिए।

संसार के प्रमुख चिकित्सकों का मत है कि जितने आदमी भूख या कुपोषण से मरते हैं उससे कई गुने अधिक खाने तथा स्वादों की भरमार करने से मरते हैं। नमक, मसाले, शकर एवं चिकनाई यह शरीर के लिए किसी भी दृष्टि से आवश्यक नहीं। यह स्वास्थ्य पर सीधा आक्रमण करते हैं। इतना ही नहीं मनःक्षेत्र में राजसिक तामसिक वृत्तियाँ उभारते हैं। इन्द्रियों की श्रृंखला परस्पर एक दूसरे से जुड़ी हुई है। जीभ के चटोरे व्यक्ति कामुकता के वशीभूत हुए बिना रह नहीं सकते। उनके मन में ब्रह्मचर्य विरोधी विचार निश्चित रूप से उठेंगे। यौनाचार का प्रत्यक्ष अवसर कम मिले तो भी मस्तिष्क में वे कल्पना चित्र छाये रहेंगे और स्वप्न दोष आदि होते रहेंगे। इसके बाद नेत्रों से अनुपयुक्त देखने, कानों से उत्तेजना सुनने आदि की प्रवृत्तियां उत्तेजित होकर उस प्रकार की गतिविधियाँ अपनाने की प्रेरणा देती हैं जो सतोगुण घटाती और तमोगुण बढ़ाती हैं। आध्यात्मिक प्रगति में उनके कारण निश्चित रूप से क्षति पहुँचती है।

कई साधु भिक्षाटन में जो भोजन प्राप्त करते हैं उन्हें आपस में मिलाकर एक जगह कर लेते हैं ताकि उनके अलग-अलग स्वाद न रहें। अस्वाद व्रत का एक तरीका यह भी है कि किसी प्रिय स्वाद का अस्तित्व न रहे और सबके मिल जाने पर किसी स्वाद की पृथक पहचान ही न रहे और इन्द्रिय लिप्सा का अभ्यस्त स्वाद प्रयोजन पूरा न हो। अच्छा तो यही है कि बिना स्वाद का प्राकृतिक भोजन ही किया जाय। कई फल और शाक ऐसे हैं जो कच्चे ही खाये जा सकते हैं। फल आजकल महंगे हैं। शाक कच्चे खाने की पेट को आदत न हो तो उन्हें उबाला जा सकता है। अन्न लेना आवश्यक हो तो खिचड़ी दलिया के रूप में लेना हलका रहता है। दाल रोटी, शाक भाजी, लेनी हो तो वह भी इसी रूप में लेनी चाहिए कि उसमें प्राकृतिक स्वाद के अतिरिक्त कोई बाहरी स्वाद मिला हुआ न हो।

यह निर्धारण स्वास्थ्य की दृष्टि से निश्चित रूप से उपयोगी है। घी के स्थान पर दूध दही, तेल के स्थान पर तिल, मूँगफली आदि पीस कर लिये जा सकते हैं। शकर की जो बहुत जरूरत समझे, खजूर, मुनक्का, गन्ना आदि ले सकते हैं।

मानसिक अस्वाद में एक बात विशेषज्ञ रूप से ध्यान रखने योग्य है कि स्वादों के सेवन या विरोध में से एक भी बात मन में न जमने दी जाय। उसे साधारण और महत्वहीन समझा जाय। किसी वस्तु का विरोध भी एक प्रकार का आग्रह है और उससे भी मन घूमघामकर वहाँ पहुँचता है। ब्रह्मचर्य पर अत्यधिक जोर देने वाले और ब्रह्मचर्य भंग की हानियों को बहुत गम्भीरतापूर्वक पढ़ने या मनन चिन्तन करने से भी मनःक्षेत्र की प्रतिक्रिया यही होती है कि काम कौतुक के चित्र समर्थन की तरह ही खण्डन रूप भी छाये रहते हैं और मन उसी प्रवंचना में उलझा रहता है। इसलिए उस सम्बन्ध में इतना करना ही उपयुक्त है कि उसकी उपेक्षा की जाय और व्यर्थ का सिर दर्द माना जाय। यही बात अस्वाद के सम्बन्ध में भी है। स्वाद अपनाने की तरह ही अस्वाद का पालन करेंगे यदि यह प्रसंग गम्भीरतापूर्वक मन में भरने का प्रयत्न किया जाय तो वह पालन करते हुए भी खण्डन जैसा हो जायेगा। अर्थात् स्वाद उलट-पलट कर मस्तिष्क में छाये रहेंगे और इन्द्रिय जय का प्रयोजन पुरा न होने देंगे।

मनोनिग्रह की सीढ़ियां हैं। उनमें इन्द्रिय संयम प्रथम है। इन्द्रियों में स्वादेन्द्रिय की प्रबलता मानी जाती है। इन्द्रिय जय का प्रथम अभ्यास पूरा होने लगे तो वासना के उपरान्त अगली दो मंजिलों को भी पार करना चाहिए। वे हैं तृष्णा और अहन्ता। वैभव और ठाट-बाट का प्रदर्शन। साधक को जीतने यह भी पड़ते हैं।




Quotation - Akhandjyoti May 1985

स नायम फलो धर्मः ना धर्मोऽफलवानपि। दृश्यन्तेऽपि विद्यानां फलन्ति तपसां तथा॥ (वन पर्व 31। 31 )

“धर्म निष्फल नहीं होता। अधर्म भी अपना फल दिये बिना नहीं रहता। विद्या और तपस्या के भी फल देखे जाते हैं।




Quotation - Akhandjyoti May 1985

खलील जिब्रान की एक अभिव्यक्ति है- “जब मैं चलने लगता हूँ तब मेरा घर मुझे रोककर कहता है- मुझे छोड़ मत जाओ। मुझ में तुम्हारा अतीत अन्तर्हित है, तुम्हारे शैशव की असंख्यों क्रीड़ाऐं मेरे कण-कण में अंकित हैं, तुम्हारे पूर्वजों की मधुर स्मृतियाँ मुझ में भरी पड़ी हैं।”

“किन्तु जब में रुक जाता हूँ तो मार्ग पुकारता है, “पथिक आओ मेरा अनुसरण करो मैं तुम्हारा भविष्य हूँ। मेरा अनुसरण करने से तुम्हें नये-नये अनुभव और नये-नये ज्ञान प्राप्त होंगे। मैं तुम्हें बड़े से बड़े पद पर ऊँचे से ऊँचे स्थान पर पहुँचा दूँगा।”

बहुत समय से यह असमंजस चला आ रहा है। न मैं चल पा रहा हूँ और न रुक पा रहा हूँ। इस असमंजस के बीच कभी-कभी सोच उठता हूँ न मेरा कोई अतीत है और न कोई भविष्य। मैं रुककर भी गति मात्र नहीं हो सकता और गतिशील होकर स्थिर?”




सफलता के लिए समग्रता की आवश्यकता - Akhandjyoti May 1985

काम को हाथ में लेने की शान तब है जब उसे सफलतापूर्वक ठीक समय और ठीक रीति से पूरा कर दिखाया जाय। यह कुछ कठिन नहीं है। थोड़ी सतर्कता भर बरतने से यह सब पूरा हो सकता है और साथियों के सामने शिर ऊँचा रह सकता है।

काम हाथ में लेने से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि उसके लिए उपयुक्त साधन हैं अथवा हो सकते हैं या नहीं। साधनों के अभाव में बड़ी -बड़ी बातें बनाने भर से कोई काम पूरा नहीं हो सकता। जो करना है उसका ज्ञान और अनुभव होना चाहिए। जिस काम की साँगोपाँग जानकारी न हो, उतार चढ़ावों के, नीच-ऊँच के संबंध में समुचित ज्ञान न हो, उसमें ढेरों भूले रहती हैं। साधन पर्याप्त न हो तो उन्हें उपलब्ध कराने तक काम रोकना चाहिए। इसी प्रकार यदि अनुभव नहीं है तो उसे संग्रह करने में विलम्ब लगता हो तो लगने देना चाहिए। पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरना ही ठीक रहता है।

साधनों से बढ़कर ज्ञान है और ज्ञान से बढ़कर है आत्मविश्वास। सफलता के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए इन सभी बातों की आवश्यकता है। उदासी, लापरवाही और गैर जिम्मेदारी से किये गये काम आधे-अधूरे रह जाते हैं।

हाथ में लिये हुये काम को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर चलना चाहिए। उसमें पूरी एकाग्रता और तन्मयता नियोजित करनी चाहिए। जिस काम को पूरी तत्परता पूर्वक नहीं किया गया है उसमें भूल पर भूल होती रहेंगी और वे सब मिलकर काम को असफल बना देंगी।

एक समय में अनेक काम करने या अनेक दिशाओं में ध्यान दें सकने की आदत हर किसी में नहीं होती। ऐसी प्रतिभा किन्हीं विरलों में ही होती है और बहुत दिन के अभ्यास के बाद आती है। सामान्य स्थिति में यही उचित है कि एक समय में एक काम को हाथ में लिया जाय और उस पर सारा ध्यान एकत्रित करके जुटाया जाय। इस प्रकार की आदत जिनमें होती है वे ही अपनी गलती को समझ पाते हैं और समय रहते उसे ठीक भी कर लेते हैं। बिखरे स्वभाव के लोग आधे अधूरे मन से काम करने से भूल पर भूल करते जाते हैं। वे भूलें इकट्ठी होकर जब असफलता की स्थिति बना देती है तो गलतियों के लिए दूसरों को दोषी ठहराकर अपन पीछा छुड़ाते हैं। यह तरीका बुरा है। हर असफलता आदमी का मूल्य गिराती और वजन घटाती है। फिर काम देने वाले लोग यह अनुमान लगाते हैं कि यह व्यक्ति ऐसी योग्यता का नहीं है जो वजनदार काम पूरा कर सके। जिनका काम हर्ज होता है उनका नाराज होना उचित ही है। काम का सरंजाम जुटाने के ढेरों साधन लगाने पड़ते हैं। असफलता मिलने पर वे लगाये हुये साधन बर्बाद हो जाते हैं। साथ ही जिस समय जो होना था वह न होने पर वह व्यक्ति घाटा लगने के कारण खिन्न भी होता है। इस खिन्नता की चर्चा जो लोग सुनते हैं उन सबके मन में इज्जत घटती है। अयोग्यता की छाप पड़ती है।

मनुष्य का मूल्य इस बात पर निर्भर है कि वह अपने जिम्मे लिए हुये कामों को कितनी जिम्मेदारी और तत्परता के साथ पूरा करता है। इसके लिए अन्य बातों की अपेक्षा आत्मविश्वास की सबसे अधिक आवश्यकता है। चित्त को बिखेरने न देना, सौंपे गये काम में पूरी रुचि लेना, कहीं कोई भूल तो नहीं हो रही है जैसी सतर्कता अत्यधिक आवश्यक है।

असफलता का दोष परिस्थितियों पर अथवा दूसरे व्यक्तियों पर डालने से कोई दोष मुक्त नहीं हो सकता। साधन कम थे या घटिया थे तो उन्हें पहले ही देखना चाहिए था। उन्हें पूरा करने के बाद ही कदम उठाना चाहिए था। यही बात योग्य साथियों के संबंध में भी है हर काम में सतर्कता और तत्परता अपनाने पर ही सफलता मिलती है और उसी आधार पर व्यक्तित्व प्रामाणिक एवं प्रशंसनीय बनता है।




कस्मै देवाय हविषा विधेम् - Akhandjyoti May 1985

किस देवता के लिए हम भजन करें? किसे हविष्य प्रदान करें? यह आत्मा के सम्मुख एक जटिल प्रश्न है। देव कर्मों में भी अनेक हैं। जिनसे प्राणियों का हित साधन होता है वे सभी दिव्य कर्म हैं। ऐसे कर्मों में प्राणियों की शारीरिक आवश्यकता की पूर्ति तथा सुविधा संवर्धन भी आता है। यह कृत्य ऐसे हैं जिनमें साधारण स्तर के स्वार्थ परमार्थ का समन्वय है। किसान कृषि करता है। अन्न उगाता है। वह उत्पादन दूसरों के भी आता है। उत्पादित चारे से कई पशुओं का पेट भरता है इस तरह उसे स्वार्थ परमार्थ का समन्वय भी कह सकते हैं। लुहार, बढ़ई, कारीगर शिल्पी, इस दृष्टि से सभी उपयोगी काम करके आजीविका कमाने वाले परमार्थी कहे जा सकते हैं। साथ ही स्वार्थ भी साधते हैं। इस प्रक्रिया को मनुष्यों का अधिकाँश समुदाय अपनाता है। अपराधी प्रवृत्तियाँ अपनाकर दूसरों को हानि पहुँचाने वाले और अपना पतन करने वाले तो कम ही लोग होते हैं।

इतनी जानकारी तो सामान्य बुद्धि के उदर पोषण में लगे हुए लोगों की भी होती है। फिर वह कोई विशेष प्रयोजन होना चाहिए जिसके लिए आत्मा ने परमात्मा से पूछा है कि ‘किसके लिए भजन करें?” किस निमित्त अपने श्रम, समय और चिन्तन को नियोजित करें? यह जिज्ञासा उठना ही श्रेय मार्ग का अवलम्बन है। अन्यथा ढर्रे का जीवन सभी जीते हैं। पेट और प्रजनन की आकाँक्षाऐं ऐसी हैं कि काम करने की प्रेरणा देती हैं। इन्द्रियों के साथ जुड़ी हुई लिप्साएं अपने विनोद के लिए काया को जहाँ-तहाँ घसीटे घसीटे फिरती हैं। मन को वैसा ही ताना-बाना बुनने के लिए बाधित करती हैं। निद्रा के कुछ घण्टों को छोड़कर ऐसे ही प्रपंच में कार्यरत रहता है। और कोई चाहे तो अपनी तर्क बुद्धि को स्वार्थ के साथ परमार्थ जुड़ा होने की बात भी सिद्ध करने के लिए कुतर्कों के ढेर लगा सकता है। व्यभिचारी यह कहे कि वह वेश्या के उदर पोषण की व्यवस्था करता है तो उसका मुँह कैसे बन्द किया जा सकता है।

प्रश्न यह नहीं कि काम किसके लिए करें। इसका सीधा-सा उत्तर है जिससे सरलतापूर्वक अधिक उत्पादन किया जा सके और मन भी प्रसन्न रहे, ऐसे काम करना चाहिए। पर बात इतनी सरल और सीधी नहीं है। कुछ महत्वपूर्ण कारण जुड़ा होने से ही जिज्ञासा उभरी ‘कस्मै देवाय हविषा विधेम्” हवि को किस देवता के निमित्त अर्पण करें!

कठिन प्रश्न का उत्तर गीता के एक श्लोक में भगवान ने प्रकट कर दिया है।

“ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविब्रह्माग्नों ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव व तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥”

अर्थात्- अपनी छवि को ब्रह्म के निमित्त अर्पण करें। यही यजन करने योग्य हविष्य है। जो ब्रह्म के मार्ग पर चलता है। वह अपने ब्रह्म कर्मों द्वारा ब्रह्म में ही समाधिस्थ हो जाता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि हम ब्रह्म के निमित्त अपने श्रेष्ठ कर्मों को नियोजित करें।

यह ब्रह्म क्या है- उत्तर में कहा गया है - सर्वव्यापी महेश्वर। उसे किस प्रकार के कर्मों की आवश्यकता है- उत्तर में कहा गया है- मोक्तारं यज्ञः तपसा’। अर्थात्- वह यज्ञ और तप का भोग करता है।

तप का अर्थ है- आत्म संयम, सत्प्रयोजनों के लिए कष्ट सहन, अपने कुसंस्कारों का दमन। यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ ज्ञान यज्ञ को कहा गया है। सद्ज्ञान का विवेक का संवर्धन। महाप्रज्ञा का परिपोषण। सदाशयता का अभिवर्धन।

इतने में प्रश्न का उत्तर पूर्ण हो जाता है। हम अपने आपको श्रेष्ठ, शालीन, सज्जन उदात्त बनाने के लिए अन्तः संघर्ष करें और दुष्प्रवृत्तियों की जो कुसंस्कारिता भीतर बाहर चिपटी पड़ी हो उसे दूर करने के लिए अपने आप से संघर्ष करे। पिछले अभ्यासों के कारण वासना, तृष्णा अहंता के परिपोषण का जो क्रम चलता है उसे उलटकर सीधा करने से परम पुरुषार्थ का परिचय दें। अपूर्णता को निरस्त करके पूर्णता की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नरत रहें।

यह एक पक्ष हुआ। अब सोचना यह है कि इस प्रकार तप साधना द्वारा उपलब्ध ब्रह्म परायणता के द्वारा क्या प्रयोजन सिद्ध करे। उस उपलब्धि को किस निमित्त लगायें? इसका उत्तर है- ‘ब्रह्म यज्ञ’ ब्रह्मयज्ञ अर्थात्- ज्ञानयज्ञ।

संसार में समस्त विपत्तियाँ अज्ञानजन्य हैं। उसी अन्धकार में भटककर मनुष्य पग-पग पर ठोकरें खाता है। और इस सृष्टा के विश्व उद्यान में भयंकर स्तर के घटना क्रम घटित करता एवं कराता है। यह सब अन्तःप्रकाश के अभाव में ही बन पड़ता है। अन्यथा रस्सी को साँप और झाड़ी को भूत समझकर क्यों भयभीत होना पड़े। गलत मार्ग पर चल पड़ने का विभ्रम अन्धकार की सघनता में ही बन पड़ता है। निशाचरों की घात अन्धेरे में ही लगती है।

कर्मफल में विलंब होते देखकर मनुष्य कुकर्मों के प्रति दुस्साहसी होते और सत्कर्मों के प्रति निराशा व्यक्त करते देखा क्या है। यदि दूरदर्शी विवेकशीलता साथ दे तो यह समझने में देर न लगे कि सृष्टी की इस सुव्यवस्थित संरचना में देर है अन्धेर नहीं। यही सद्ज्ञान है। यह मिले तो बड़भागी बनने में देर न लगे और उसका अभाव बना रहे तो मनुष्य कुकर्म करने और दूसरों को अनाचार के निमित्त प्रोत्साहित करने की भूल न करे। अतएव सबसे बड़ा पुण्य परमार्थ ज्ञान चेतना से मानव अंतस् को ज्ञानवान बनाना ही सबसे बड़ा सत्कर्म है। उसी के निमित्त अपनी शक्तियों को नियोजित करनी चाहिए।

यजन करने के लिए हमारे पास बहुत कुछ बचता है। मनुष्य की निर्वाह आवश्यकताऐं बहुत स्वल्प हैं। पशुओं को ढेरों आहार चाहिए। जबकि मनुष्य का पेट दो मुट्ठी अन्न से भर जाता है। दस गज कपड़े की और चार हाथ की चारपाई से निर्वाह हो जाता है। इतना उपार्जन करने के लिए उसके बीस उँगलियों वाले हाथ एवं कल्पनाशील मस्तिष्क हर प्रकार समर्थ है। कुछ घण्टे के परिश्रम से ही उसकी शारीरिक आवश्यकता पूरी हो जाती है और जीवनक्रम का ढर्रा आसानी से लुढ़कने लगता है।

इसके उपरान्त उसकी जो प्रतिभा क्षमता शेष रह जाती है वह इतनी महत्वपूर्ण और इतनी अधिक है कि उसके सहारे अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न किये जा सकते हैं। गुण,कर्म, स्वभाव, की श्रेष्ठता अर्जित कर इसी काया में देवत्व का उद्भव किया जा सकता है। अपने को पुण्यात्मा, देवात्मा, महात्मा बनाने की इसी जीवन अवधि में पूरी-पूरी गुँजाइश है। प्रसुप्त क्षमताओं को विकसित करके पुरुष पुरुषोत्तम बन सकता है और उसके पास दिव्य क्षमताओं का भण्डार सिद्ध पुरुषों जितना जमा हो सकता है। इस संचय का कहाँ किस निमित्त उपयोग किया जाय यही समझने योग्य प्रश्न है।

लोभ मोह की श्रृंखलाओं में बँधे हुए मायाग्रस्त लोग इसे वासना, तृष्णा, और अहंता की पूर्ति में खर्च करते रहते हैं। परिवार के कुछेक लोगों को ही ‘अपना’ मानकर उन्हीं के निमित्त उपार्जन को निछावर करते रहते हैं, या उत्तराधिकार में छोड़ मरते हैं। सम्पदा के उपयोग का प्रतिफल जैसा भी कुछ होता है उसी के अनुपात से उपार्जन कर्ता एवं हस्तान्तरण कर्ता को मिलता है। मुफ्त में मिला हुआ धन वैभव किसी को पचता नहीं, यह अजीर्ण पैदा करता है और दुर्गुणों के परिपोषण में व्यय होता है। कुपात्रों के हाथ में गया हुआ अनुदान दुष्प्रवृत्तियों को ही बढ़ाता है। और उसका प्रतिफल उस दानी को भी भोगना पड़ता है जिसने अनुपयुक्त व्यक्तियों के हाथों अपने बचत वैभव को हस्तान्तरित किया।

इसलिए प्रश्न कमाने का ही नहीं खर्चने का भी है। बढ़ाई हुई स्वास्थ्य सम्पदा, बुद्धि और प्रतिभा का नियोजन कहाँ किया जाय? इस प्रश्न के उचित समाधान पर भी मनुष्य की बुद्धिमत्ता निर्भर है। यहाँ उसी का समाधान है कि ब्रह्म कर्म में हविष्य बनाकर अपने उपार्जन एवं संचय का यजन करना चाहिए।




महानता की कसौटी - Akhandjyoti May 1985

हर वस्तु का व्यक्ति का मूल्याँकन उसके गुणों से किया जाता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं, जिसके आधार पर उसे घटिया या बढ़िया माना जा सके। आँखों से छवि देखकर किसी का महत्व समझा नहीं जा सकता। खिलौने भी असली जैसे ही बनने लगे हैं या बनाये जा सके हैं। देवताओं और महापुरुषों की प्रतिमाएं दुकानों पर बिकती हैं और मुट्ठी भर पैसों के बदले खरीदी जा सकती हैं। पर उनसे सिवाय मन बहलाने के और कुछ काम बनता नहीं। अच्छी दुधारू गाय दो हजार से कम में नहीं मिलती। पर खिलौने वाले उसे आभूषण, झूल पहनाकर- बछड़े समेत एक रुपये में ही बेच देते हैं। दो हजार वाली को घास, पानी, निवास की भी व्यवस्था करनी पड़ती है। पर एक रुपये वाली को ऐसा कुछ भी नहीं चाहिए। जिस आले में रख दी उसी में चुपचाप रखी रहती है। इतना सब कुछ होते हुए भी कमी एक ही रहती है कि वह दूध एक बूँद भी नहीं देती। यदि दूध देती और घास पानी की माँग न करती तो एक रुपया तो क्या कोई उसे एक लाख की भी खरीद सकता था। पर बात वहाँ अड़ती है जहाँ उसके द्वारा कितना दूध दिये जाने का प्रश्न सामने आता है। इसका पता जाँच करने दुहने से ही चलता है। आजकल किसी के कहने का विश्वास करने का भी जमाना नहीं रहा। इसलिए परीक्षा ही हर जगह काम में आती है। इसके बिना गाड़ी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ती।

परीक्षा हर किसी को बुरी लगती है। फेल होने का डर हर शिक्षार्थी पर छाया रहता है। दिन-रात पढ़ाने ट्यूशन लगाने से लेकर मनौती मनाने तक के जो भी उपाय बन पड़ते हैं वह इसलिए किये जाते हैं कि फेल होने पर जो हानि तथा बदनामी होती है उससे पाला न पड़े। परीक्षा से सभी डरते हैं, पर उससे बचने का कोई उपाय है नहीं, बिना योग्यता सिद्ध किये। पात्रता कैसे प्रमाणित हो और उसके अभाव में कोई श्रेय सम्मान किसे, कैसे, कहाँ मिले?

मिट्टी की हाँडी खरीदते समय भी उसे ठोक बजाते हैं फिर जिसे कीमती समझा जाता है उसे कौन स्वीकारेगा। बाजार में नकली आभूषणों की भरमार है। काँच के टुकड़ों में रत्न जैसी पालिश करने और पीतल को सोने जैसा चमका देने की कला अब हर किसी को आती है यदि कसौटी या अँगीठी के पास उनको न ले जाया जाय तो कैसे पता चले कि वह आभूषण दो रुपये का है या दो हजार का?

मनुष्यों के स्तर के सम्बन्ध में भी यही बात है। उसे जिस का काम के लिए प्रयुक्त किया जाता है उसके लिए उपयुक्त शिक्षा व्यवस्था की जाती है, पर काम इतने से भी नहीं चलता। पढ़ना या पढ़ाना- सीखना या सिखाना ठीक तरह हुआ कि नहीं इसकी जाँच-पड़ताल आवश्यक है। इसके बिना किसी निश्चय पर पहुँचना कठिन है और उस असमंजस की स्थिति में किसी को श्रेय मिलने या देने की बात बनती ही नहीं, इसलिए परीक्षा कितनी ही डरावनी क्यों न हो, उसके बिना काम चलता ही नहीं। उसे टाला नहीं जा सकता।

संसार के प्रत्येक प्रयोजन में परीक्षा को एक अनिवार्य आवश्यकता माना गया है। मनुष्य की योग्यताऐं तो विभिन्न परीक्षा माध्यमों से परखी ही जाती है। उससे भी बड़ी बात है प्रमाणिकता की। आदर्शवादिता ही वह कसौटी है जिसके आधार पर मनुष्य का वास्तविक मूल्याँकन होता है। इस प्रयोजन की पूर्ति चतुरता से नहीं होती। चतुर जनों की कहीं कोई कमी नहीं। वे हर जगह पर्याप्त मात्रा में भरे पड़े हैं। यों होते तो मूर्ख भी हैं। पर वे भी अपनी समझ के अनुसार चतुरता बरते बिना मानते नहीं। भले ही बात हाथों-हाथ खुल जाय।

चतुरता अर्थात्- चालाकी। इसे व्यवसाय से लेकर व्यवहार तक में हर जगह काम में लाया जाता है। इस प्रयास को नंगे शब्दों में कहा जाय तो बेईमानी या बदमाशी भी कहा जा सकता है। इस कला में प्रवीण पारंगतों की हर जगह भरमार है। किन्तु साथ ही यह बात भी है कि अपना बस चलने तक उससे बचने की ही लोग चेष्टा करते हैं। समझ काम न करे तो ही जाल में फँसते हैं।

आवश्यकता तो योग्यता की भी पड़ती है और व्यवसाय प्रयोजनों में प्रायः उसी को प्रधानता दी जाती है किन्तु जहाँ तक महत्वपूर्ण एवं जिम्मेदारी के कार्यों का सवाल है, वहाँ मात्र योग्यता ही नहीं मनुष्य की आदर्शवादिता भी परखी जाती है। व्यभिचारी भी अपनी पत्नी को दूसरे व्यभिचारी के साथ नहीं घूमने देता। शराबी भी अपनी बेटी को शराबी के हाथों नहीं ब्याहता। चोरी का कारोबार करने वाला भी घर के नौकरों का चोर होना बर्दाश्त नहीं करता। कारण ताकि अप्रमाणिक व्यक्ति जहाँ भी दाव लगाता है वहीं अपनी बात चलाते हैं। इस खतरे को जान बूझकर कौन बर्दाश्त करेगा? इसलिए महत्वपूर्ण कार्यों में योग्यता से भी अधिक प्रमाणिकता को महत्व दिया जाता है।

स्थिर प्रमाणिकता की परीक्षा मामूली व्यवहार देखकर नहीं जानी जा सकती। चतुर लोग थोड़े पैसे का या छोटे काम का प्रसंग हो, वहाँ ईमानदारी का परिचय देने की चतुरता बरतते हैं। ताकि विश्वास पैदा करने के उपरान्त कोई बड़ी घात चलाई जा सके। इसलिए जहाँ तक व्यक्ति की वास्तविक प्रामाणिकता परखने का सवाल है वहाँ एक ही पहचान है कि व्यक्ति ने जीवन में कितनी बार किस स्तर का कष्ट आदर्शों की रक्षा के लिए उठाया।

कसौटी या अँगीठी से दूर रहने वाले सोने का असली होने पर कैसे विश्वास किया जाय? जिसके जीवन में आदर्शों में खरा उतरने के लिए कष्ट उठाने का अवसर नहीं आया, जिसने अनुचित प्रलोभन या दबाव के सामने झुकने में इनकार नहीं किया, उसकी वास्तविकता के सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता। ऐसे अवसरों का इतिहास ही किसी के खरेपन का चिन्ह है।

किसी के पैसे सम्बन्धी ईमानदारी की मोटी पहचान यह है कि उसका खर्च बढ़ा चढ़ा तो नहीं है। फैशन के नाम पर, बड़प्पन के नाम पर, आवारागर्दी या शौक-मौज में जो आंखें मूँदकर पैसा खर्च करता है उसके लिए ईमानदारी की सीमित कमाई निश्चय ही कम पड़ेगी और वह जहाँ भी छेद पायेगा वहाँ उँगली डालने की कोशिश करेगा। ऐसे व्यक्ति अनुचित कमाई पर आश्रित रहते हैं। उनकी यह फिजूल खर्ची देखकर हर समझदार आदमी उनके साथ अर्थ व्यवहार करने में संकोच करेगा

एक कम्पनी में एकाउंटेण्ट की जरूरत थी। वेतन 500) था। कई व्यक्ति अर्जी लेकर इण्टरव्यू के लिए आये। मैनेजर ने योग्यता के आधार पर जिसे पसन्द किया उसे लेकर स्वीकृत के लिए मालिक के पास ले गया। मालिक ने सिर से पैर तक उस पर एक नजर डाली और नियुक्ति से इनकार कर दिया। बात टल गई।

बाद में मैनेजर ने कारण पूछा तो मालिक ने कहा- “इसके सूट की सिलाई ही 500 लगी होगी। इतने ठाट-बाट वाला हमारे यहाँ सीमित वेतन पर ईमानदार कैसे रह सकेगा। “आते ही अतिरिक्त आमदनी का कोई उपाय खोजेगा”। मैनेजर का समाधान हो गया। बाद में सादगी को, रहन-सहन को भी एक योग्यता में सम्मिलित किया गया और दूसरी नियुक्ति इसी आधार पर की गई। यद्यपि उस दूसरे आदमी की योग्यता कम थी।

बहुत ठाट-बाट से रहने वाली आम महिलाओं के चाल चलन पर सन्देह किया जाता है। उनकी मनचली मनोवृत्ति को घटिया चरित्र का परिचायक माना जाता है। इसी प्रकार मर्दों के लड़कों के सम्बन्ध में भी सोचा जाता है। शृंगारिकता आदमी के बड़प्पन की नहीं बचकानेपन की निशानी है। जो अपने पैसे को इस प्रकार उड़ाता है उसका दाव लगेगा तो दूसरे के पैसे को क्यों बख्शेगा?

महापुरुषों को अनेक बार संघर्ष करने पड़े हैं और आघात खाने पड़े हैं। अनीति से समझौता उनने नहीं किया, सिद्धान्त पर डटे रहे। प्रतिपक्षियों ने उन्हें सताने में कमी नहीं रहने दी। कई सुनहरे मौके हाथ से छोड़ने पड़े। इस कठिनाई को देखकर कोई यह भी कह सकता है कि सिद्धान्तवाद से क्या लाभ? उसे जो अपनायेगा उसे कष्ट हो कष्ट झेलने पड़ेंगे। बात किसी हद तक सही भी है। आमतौर से ऐसा ही घटित होता रहता है।

जिनने शराब, सिगरेट, पान, सिनेमा, आदि के अनावश्यक खर्च बढ़ा रखे हैं। वे अपने स्वास्थ्य और परिवार के साथ अत्याचार करने वाले ही माने जा सकते हैं। आदत सो आदत। जो अपने पैसे की-अपने परिवार की परवा नहीं करता। वह दूसरे किसी और की भी करेगा। अथवा उचित अनुचित का अन्तर करने के झंझट में पड़ेगा। इस सम्बन्ध में कैसे विश्वास किया जा सकता। सज्जनों में से हर एक को मितव्ययी बनना पड़ा है और सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धान्त को कड़ाई के साथ अपने तथा अपनों के साथ कार्यान्वित करना पड़ा है। इसमें उन्हें किसी मण्डली के सामने उपहासास्पद बनना पड़ा हो, तो उसे सहन करते हुए यह मानना चाहिए। कि अपने व्यक्तित्व के खरेपन की परीक्षा में होकर गुजरना पड़ा है।

इन दिनों लोक प्रचलन जैसा है उसे नीति और सदाचार की दृष्टि से बहुत ही गया गुजरा मानना चाहिए। बहुमत ऐसा ही है। लोगों का चिन्तन, रहन-सहन क्रिया-कलाप ऐसा है जिनमें अनीति उपार्जन, दुर्व्यसनों में अपव्यय तथा कुरीतियों का अन्धानुकरण स्वाभाविक है। जो सबके साथ चलेगा उसे अनिवार्यतः यही रीति-नीति अपनानी पड़ेगी। जिसे यह सहायता नहीं, आदर्शों का ध्यान है उसे अपनी गतिविधियां अलग से बनानी होंगी और वे सभी ऐसी होंगी जिनके कारण, पग-पग पर व्यंग, उपहास, तिरस्कार, विरोध सहना पड़ेगा और यदि अपनी गम्भीरता तथा सहिष्णुता उच्च कोटि की न हुई तो झगड़ा झंझट भी हो सकता है।

आदर्शवादी के सम्बन्ध में साधारण लोगों को एक भय रहता है कि समय आने पर यह हमारी पोल खोलेगा, निन्दा चुगली करेगा और झंझट खड़ा करेगा। अपने मन में चाहे वैसी बात न हो। भले ही उपेक्षा की नीति अपनाली हो, पर किसी को विश्वास दिलाना कठिन है। चोर की दाढ़ी में तिनका रहता है। सज्जनों और दुर्जनों में जो विरोध संघर्ष चिरकाल से बना रहा है उसका कारण एक ही है कि दुष्टता को यह भय रहता है कि सज्जन हमारे लिए कोई आफत पैदा न करें, इसलिए उन्हें रास्ते का रोड़ा-कंटक-समझकर- हटाने का ही प्रयत्न करते रहे हैं। स्पष्ट है कि आक्रमण में पहल करने वाला तात्कालिक नफे में रहता है। पीछे भले ही उसे अपनी करनी का फल पूरी तरह भुगतना क्यों न पड़े?

परोपकार के सेवा कार्यों ने लगने वाले को अपना समय, श्रम और पैसा किसी न किसी मात्रा में लगाना पड़ता है। इसका प्रतिफल तंगी से रहना और तथाकथित स्वजनों का विरोध और मित्रों का उपहार भी सहना पड़ता है। अनीति के साथ झगड़ने में आततायियों की असुरता अपनी शक्ति के अनुसार त्रास भी पहुँचाती ही रहती है। उसे धैर्य और साहसपूर्वक सहते हुए अपने निर्णय पर चट्टान की तरह अड़े रहना साधारण काम नहीं है। उस विपन्नता से जूझते रहना शूर और साहसियों का ही काम है।

यही हैं, वे परीक्षाएँ जिनमें होकर हर आदर्शवादी को एक नहीं तो दूसरी तरह गुजरना पड़ता है। जो देर तक गर्मी न सह सका और कच्ची मिट्टी के बने बर्तन की तरह पकने से पूर्व ही फूट गया उसकी बात अलग है तथा उलटी चलने वाली दुनिया से यदि अपने साथ ही उलटा व्यवहार हुआ है तो उसे साधारण स्वाभाविक ही मानना चाहिए। अपने मनोबल को तनिक भी शिथिल न होने देना चाहिए।

यही हैं वे कसौटियाँ जो व्यक्ति की आदर्शवादी प्रामाणिकता को खरा सिद्ध करती हैं और ऐसे खरे व्यक्ति ही स्वयं धन्य अपने संपर्क क्षेत्र को धन्य बनाते हैं।




Quotation - Akhandjyoti May 1985

षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्याभूतिमिच्छिता। निद्रा तंद्रा भयं लज्जा ह्यालस्यं दीर्घसूत्रता॥

अर्थात्- इस संसार में ऐश्वर्य की इच्छा करने वाले पुरुष को निद्रा, तंद्रा, भय, लज्जा, आलस्य और दीर्घसूत्रता (थोड़े समय में होने वाले कार्य को बहुत समय में करना) ये छः दोषों का त्याग कर देना चाहिए।




धनवान और बलवान से बड़ा आत्मवान् - Akhandjyoti May 1985

जीवन की प्रगति और अवगति पर विचार करते हुए उसे तीन भागों में विभक्त करना होगा। एक बहिरंग जिसे वैभव और ठाट-बाट कहते हैं। अहंकारी अपना ध्यान इसी पर केन्द्रीभूत किये रहते हैं और सफलता असफलता का मूल्याँकन इसी आधार पर करते हैं।

जीवन का दूसरा पक्ष है शरीर, जिससे स्वास्थ्य संबंधित है। शारीरिक भी और मानसिक भी। आये दिन अस्वस्थता के शिकार रहने वाले- खीझते और झल्लाते रहने वाले व्यक्ति सम्पन्न हैं या निर्धन। इसकी सही स्थिति भुक्त भोगी में ही पूछ कर जानी जा सकती है। जिनका पेट ठीक तरह काम नहीं करता- जिन्हें अपच का धीमा-धीमा दर्द होता रहता है। जुकाम बना रहता है। शिर भिन्नता है। नींद पूरी नहीं आती ऐसे व्यक्तियों की धनवानों से तुलना करने पर बाहरी व्यक्ति यही कह सकते हैं कि मालदार को क्या कमी है। बड़ा भाग्यवान है। लक्ष्मी आगे-पीछे फिरती है। दस आदमी रौब मानते हैं। बाहर की आंखें इतना ही देख पाती हैं सो उनका कहना भी ठीक है। पेट की बात, शिर की बात, उन्हें क्या मालूम? उसे समझने के लिए कुछ गहराई तक देखने वाली आंखें चाहिए। साथ ही समीक्षा करने के लिए ऐसी यथार्थवादी बुद्धि चाहिए जो यह निर्णय कर सके कि दोनों में से एक छिन जाय तो किसके बिना काम चल जायेगा। निरोग, बलिष्ठ, गहरी नींद होने वाला, अलमस्त व्यक्ति यदि सम्पत्तिवान न हो तो भी काम चलता रहेगा। बाहर के आदमी कुछ भी कहते रहें पर अपने आप में प्रसन्न रहेगा। किसी से परिचर्या न करनी पड़ेगी। वैद्य डॉक्टरों के दरवाजे चक्कर न लगाना पड़ेगा। बीमार रहने से कमाई में जो हर्ज होता है वह भी न पड़ेगा।

सम्पत्ति की कमी या अधिकता बाहर वालों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करती है। उससे वे भी प्रभावित होते हैं। संपत्तिशाली भाग्यवान गिनना और रौब मानना उन्हीं का काम है। जहाँ तक निजी जीवन का सम्बन्ध है वह स्वास्थ्य पर निर्भर रहता है। उसे अपनी आंखें देखती हैं, अपनी बुद्धि परखती है। अपनी अनुभूति अनुभव करती है।

इन पंक्तियों में जिन जीवनों का विवेचन हुआ, एक वह जो दूसरों की आँखों में दीखती है और जिससे अहंकार भर की पूर्ति होती है। दूसरा निजी जीवन- शारीरिक जीवन जिसके साथ आरोग्य, दीर्घ जीवन, प्रसन्नता, बलिष्ठता, सुन्दरता आदि विशेषताएँ जुड़ी हुई हैं। दोनों में से किसे महत्व दिया जाय। इसका उत्तर यही हो सकता है कि बाहर वालों की आँखों से देखना हो तो दौलत प्रधान और अपने अनुभव से पूछना हो तो आरोग्य का महत्व है। निरोग रहकर गरीबी स्वीकार की जा सकती है। दौलत से आरोग्य नहीं खरीदा जा सकता पर स्वस्थ आदमी मेहनत मजूरी करके भी सम्पन्नों की बिरादरी में बैठ सकता है।

जीवन का तीसरा पक्ष एक और है- आन्तरिक। आत्मिक। जिसे न दूसरों की आंखें देखती हैं और न अपनी। इसे केवल आत्मा अनुभव करती है। गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता से हर समय अन्तःकरण प्रसन्न रहता है। दूसरे इज्जत करते हैं। विश्वास करते हैं। प्रामाणिक मानते हैं। प्रेरणा ग्रहण करते हैं और सज्जनों में वरिष्ठों में गिनते हैं। ऐसों की मुक्त कण्ठ से सराहना करता है। समय आने पर सहयोग देने में भी पीछे नहीं रहते हैं। यह व्यक्तित्व वाला तीसरा जीवन है। इसके सही होने पर अपना अन्तःकरण सन्तुष्ट, प्रसन्न एवं पुलकित रहता है। आत्म गौरव की अनुभूति होती है। जो परिचित हैं वे भरपूर सम्मान और विश्वास करते हैं। इस स्थिति को अपनी और दूसरों की अनुभूति अनुभव करती है। अब तीनों जीवनों को अलग-अलग करके उनका मूल्याँकन किया जाय। तो प्रतीत होगा, दौलत दूसरों की आँखों को चौंधियाती है। दूसरा जीवन निरोगता युक्त हो सो सन्तोष होता है और चेहरा प्रसन्न रहता है। तीसरा सद्गुणों से- उच्च आदर्शों से ओत-प्रोत जीवन अपनी आत्मा की दृष्टि से वजनदार सिद्ध होता है। इसके बाद जो जितना परिचित एवं घनिष्ठ होता जाता है वह उसका मूल्याँकन करता है। जी खोलकर प्रशंसा करता है और समय आने पर उसके ऊपर अपने को निछावर भी कर देता है।

किसका जीवन सफल या असफल रहेगा। इसका सीधा उत्तर नहीं दिया जा सकता। दूसरों को चकाचौंध में डालने वाली और अपने अहंकार को बढ़ाने वाली दौलत है। यह जादू है जिससे दर्शकों को चकित किया जा सकता है। स्वास्थ्य सच्चा स्वार्थ है। जिसने स्वास्थ्य सिद्धि का सच्चा अर्थ समझा है उसे आरोग्य का महत्व समझना होगा और उसका मूल्य आहार बिहार के संयम तथा उचित परिश्रम के रूप में चुकाना होगा। यह शारीरिक स्वार्थ है। जब तक शरीर है तभी तक आरोग्य का मूल्य है। प्रकृति के नियमानुसार बचपन, जवानी, वृद्धावस्था और मरण का चक्र घूमता है। स्वास्थ्य शाश्वत नहीं है संयमी भी समयानुसार जराजीर्ण होते और मृत्यु के मुख में जाते हैं इसीलिए दूसरे शरीर जीवन को एक सीमा तक स्वास्थ्य सिद्धि तो कह सकते हैं, पर है वह भी अस्थिर। हैजा, हार्ड फेल, ज्वर जैसी बीमारियाँ पहलवानों पर भी चल दौड़ती हैं और देखते-देखते उनका भी कचूमर निकाल देती हैं।

जितनी गहराई में उतरते हैं उतनी ही बहुमूल्य वस्तुऐं पाते हैं। मोती पाने के लिए डुबकी लगानी पड़ती है और हीरा पाने के लिए खान खोदनी पड़ती है। तीसरा आध्यात्मिक जीवन गहराई का अन्तिम चरण है। वह ऐसा है जिसे पाने के उपरान्त उथली परतों वाले दो भी हस्तगत हो जाते हैं। ईमानदारी, जिम्मेदारी, समझदारी और बहादुरी का जीवन जीने वाले को अपेक्षाकृत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस दुनिया में धूर्तता बहुत है। लोग चालाकी बदमाशी के अभ्यस्त हैं। औरों को भी यही करते देखते हैं इसलिए आदर्शवादी पर सहसा विश्वास नहीं करते और उसे आधा मूर्ख समझते हैं या धूर्त। महानता वास्तविक है इस पर विश्वास करने के लिए बीसियों बार परीक्षा ली जाती है और यह कठिनाइयाँ ही परीक्षा होती है कि कोई आदर्शवाद को ईमानदारी से अपना रहा है। इस अवधि में व्यंग उपहास सहने पड़ते हैं। पर जब पूरी अवधि तक मनुष्य अविचल बना रहता है और तपाने तथा कसने के बाद भी खरा निकलता है तो उस सही सोने की इज्जत भी होती है और पूरी कीमत भी मिलती है।

अनैतिक जीवन आत्म प्रवंचना के कारण पग-पग पर आत्म प्रताड़ना सहन करता रहता है और खानपान रहन-सहन सही होने पर भी रुग्णता का शिकार बनता है। मूल कारण बना रहने पर दवा दारु भी काम नहीं करती। इसके विपरीत नीतिवान जीवन जीने वाला रूखा-सूखा खाकर भी निरोग रहता है। परोपकारी सेवाभावी लोग पुण्य प्रयोजनों से असाधारण श्रम करते रहते हैं, पर भावना की शुद्धता के कारण उन पर दुर्बलता हमला नहीं करती। आन्तरिक प्रसन्नता के कारण शरीर की जो क्षति होती है वह सहज ही पूरी होती रहती है। उनका शरीर बल ही नहीं मनोबल भी बढ़ता है। आदर्शवादिता मनुष्य की संकल्प शक्ति बढ़ाती है। उत्कृष्टता में अभिवृद्धि करती है। यह ऐसा बढ़िया टॉनिक है जिससे शारीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य भी बढ़ता रहता है। शरीर बल और मनोबल में- मनोबल की प्रधानता है। मनोबल सम्पन्न परमार्थ जन स्वास्थ्य को गँवाते नहीं वरन् पौष्टिक आहार का- आराम विश्राम का सुयोग जुटाते रहने वालों की अपेक्षा कहीं अधिक निरोग और दीर्घजीवी रहते हैं। जिन्हें केवल स्वास्थ्य बुद्धि की स्वार्थ सिद्धि की चिन्ता है वे उसी सीमा तक सीमित रह जाते हैं।

दौलत की सम्पदा वाला हर घड़ी अहंकार में डूबा रहता है और बड़प्पन जताने के लिए पाखण्ड रचता रहता है। ढोंग बनाने, ठाट-बाट रचने, प्रदर्शन के ढोंग खड़े करने में प्रवंचना का सरंजाम जुटाना पड़ता है। इसमें ढेरों पैसा फिजूल खर्ची में नष्ट होता है। यह न करे तो अमीरी का विज्ञापन कैसे हो? ईमानदारी से आवश्यक खर्च के लिए पैसा जुटाना ही कठिन पड़ता है। जिन्हें नीतिपूर्वक जीवन जीना है उसे औसत भारतीय स्तर का निर्वाह व्यय चलाना होता है। इतना ही परिश्रमपूर्वक कमाया भी जा सकता है। जिसे बहुत धन चाहिए उसे अनुचित मार्गों का अवलम्बन करके इतना जमा करना पड़ेगा जिससे खर्च भी चलता रहे और अमीरी के प्रदर्शन में लगने वाली फिजूल खर्ची की पूर्ति भी होती रहे। ऐसे प्रशंसक किराये के होते हैं उन्हें चमचागिरी की फीस चुकानी पड़ती है। अन्यथा उन्हें बुराई करते बेईमान ठहराते भी क्या देर लगती है। सर्वसाधारण ही तुलना में जो अधिक संग्रह या खर्च करते हैं उनके सम्बन्ध में बेईमानी का आरोप लगाना कठिन नहीं है। भले ही उनने परिश्रम या ईमानदारी से कमाया हो।

अधिक कमाया हो तो उसे पड़ौसियों को ऊँचा उठाने में- समाज की सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने में- असमर्थों को सहारा देने के लिए उपभोग होना चाहिए। जिनमें इतनी उदारता होगी व संग्रह न कर सकेंगे। फिर फिजूल खर्ची में अमीरी के आडम्बर में तो वे खर्च कर ही न सकेंगे। इतने पर भी जिन्हें अपनी प्रशंसा सुननी है, बढ़ाई करानी है उन्हें चमचागिरी की फीस रिश्वती चुकानी ही पड़ेगी। अन्यथा एक भी आदमी बड़ाई करने वाला न मिलेगा।

संसार में बड़े गिने जाने वालों में धनवान, सामर्थ्यवान् और आत्मवान् तीन की ही गणना है। तीनों का महत्व एक से एक का अधिक है। लोगों की उलटी बुद्धि उलटा देखती है और सबसे बड़ा धनवान् उससे छोटा सामर्थ्यवान् सबसे छोटा आत्मवान् को गिनती है। इसीलिए लोग कहते हैं कि ईश्वर भक्ति या आदर्शपालन से क्या फायदा। जिनकी दूरदर्शी विवेक बुद्धि सावधान है वे ऐसा नहीं कह सकते है। वे आत्मवान् को सबसे बड़ा गिनते हैं फलतः यह मानते हैं कि उत्कृष्टता के परिपालन का प्रतिफल सबसे अधिक और सबसे महत्वपूर्ण है। संसार के महामानवों में आत्मवानों की ही गणना है। जो आत्मवान् है वह सबसे बड़ा है और वही सबसे अधिक लाभ में है।

बुद्ध, गाँधी, नेहरू, पटेल, शिवाजी, प्रताप, सुभाष, आदि आत्मवान् रहे हैं। नानक, कबीर, दादू, नामदेव, ज्ञानेश्वर आदि की गणना आत्मवानों में है। उनने जो भी काम हाथ में लिए उसमें सम्पत्ति की आवश्यकता पड़ी तो अधूरी नहीं रही। सहयोग अपेक्षित हुआ तो वह भी आसमान से बरसा। असीम श्रद्धा उन्हें प्राप्त हुई फलतः आरम्भ किये कामों के लिए सम्पदा और सामर्थ्य की कमी नहीं रही। यह उनके पास निज की उपार्जित नहीं थी तो क्यों? इनके विपुल भण्डार उनके पास खिंचते चले आये और जमा हो गये। स्वयं उपार्जन कर दें तो इनके लिए उन्हें कृत्य-कुकृत्य करने पड़ते। अहंकार और दुर्व्यसन पीछे पड़ते फलस्वरूप लोक श्रद्धा का अर्जन न सका होगा। सारा जीवन उन वैभवों के उपार्जन में ही चला जाता फिर वे उन महान कार्यों को करने के लिए क्षमता कहाँ से आती? जिन्हें करने के उपरान्त वे स्वयं धन्य बने और अपनी नाव में बिठा कर असंख्यों को पार गये।

धन बड़ा है पर बड़प्पन से बढ़कर नहीं। गाँधी और बुद्ध को पाकर देश कृत-कृत्य हो गया। ऐसी विभूतियों को कोई खरीदना चाहे तो वे लाख करोड़ में भी नहीं खरीदी जा सकतीं। धन से अपनी सुविधा बढ़ाई जा सकती है। सामर्थ्य से सुखी रहा जा सकता है और छोटे-मोटों पर रौब जमाया जा सकता है। किंतु इनके सहारे कोई महापुरुष नहीं बन सकता। देश, समय और वातावरण को उठाने बदलने में समर्थ नहीं हो सकता। जो जितना बड़ा काम है उसके लिए उतनी ही बड़ी शक्ति चाहिए। आत्म शक्ति सबसे बड़ी है। उसके पीछे-पीछे धन की, सामर्थ्य की, यश की, पुण्य की विभूतियाँ फिरती हैं। गाँधी जी को कोई निर्धन नहीं कहता। वजन से 96 पौण्ड थे तो भी उनकी शक्ति के सामने अंग्रेज सरकार काँप गई थी। बुद्ध ने जो धर्म चक्र प्रवर्तन अभियान चलाया था उसके लिए एक लाख सुयोग्य परिव्राजक उनके इशारों पर चलने और सब कुछ निछावर करने को तैयार हो गये थे। नालन्दा, तक्षशिला, श्रावस्ती, गया जैसे अनेक संस्थानों को चलाने के लिए निरन्तर प्रचुर परिमाण में धन की आवश्यकता पड़ती थी उसे पूरा करने के लिए अशोक जैसे एक नहीं अनेकों सहायक दौड़ पड़े थे। ऐसे उदाहरण बताते हैं कि आत्मवान् होने की सामर्थ्य कितनी बड़ी है। इसके लिए हमें अपनी पारखी बुद्धि जगाने की आवश्यकता है।




श्रद्धा-ध्यान से रोग निवारण - Akhandjyoti May 1985

चिकित्सा पद्धतियाँ अनेकों प्रचलित हैं पर जैसा चमत्कार अध्यात्म चिकित्सा का देखा गया है उतना और किसी का नहीं।

स्विट्जरलैण्ड के डाक्टर वाल्टर हैस को नोबेल पुरस्कार उनकी अवचेतन मानसिक क्षमता सम्बन्धी खोजों के उपलब्ध में मिला था। अचेतन मन द्वारा शरीर की क्रिया-प्रक्रियाओं के संचालन सम्बन्धी जानकारी तो पहले से भी उपलब्ध थी। पर उन्होंने संकल्प बल द्वारा अवचेतन की क्षमता को उत्तेजित करके रोग निवारण के सम्बन्ध में प्रयोग करने की एक नई शैली का विकास किया है- नाम दिया है उसका श्रद्धा चिकित्सा (फेथ हीलिंग)।

इस प्रयोग में रोगी को अपने ध्यान और विश्वास का एकीकरण करना पड़ता है और रुग्ण अवयव पर शरीर की अन्तरंग शक्तियों का प्रहार एवं समाधान किये जाने पर मानसिक क्षमता को एकाग्र करने के लिए कहा जाता है। रक्त के श्वेत कण सशस्त्र घुड़सवारों की तरह रोग कीटाणुओं पर हमला करते हैं और उन्हें कुचल-मसलकर रख देते हैं। दूसरी कल्पना यह करनी पड़ती है कि शरीरगत विद्युत शक्ति-जीवनी शक्ति के रूप में प्रखर होती है और पीड़ित अवयव में क्षति हो चुकी है उसे संजीवनी बूटी की तरह पूर्ण करती है। इन पद्धति को किसी भी रोग में कोई भी पीड़ित प्रयोग कर सकता है। लाभ का अनुपात उस क्रम से चल पड़ेगा जितनी, संकल्प शक्ति निश्चयात्मक होगी और ध्यान में एकाग्रता एवं विश्वास भावना सम्मिलित रहेगी। इस प्रयोग से उनने कितने ही रोगियों को लाभान्वित किया है।

मनःचिकित्सक पेट्रिया नोरेस ने इस सिद्धान्त के आधार पर अपना एक अस्पताल ही विनिर्मित किया है। उसमें वे परामर्श देते हैं और इस विधि का अपने सामने अभ्यास कराते हैं। स्वयं उस कल्पना चित्र की रूपरेखा बताते जाते हैं और रोगी से कहते हैं कि वे पूरे विश्वास के साथ इस अनुभूति को कार्यान्वित करें। इस प्रक्रिया से श्रद्धालु स्तर के रोगी कठिन से कठिन रोगों से मुक्ति पा लेते हैं। कठिनाई उन्हें होती है जो श्रद्धा का महत्व नहीं समझते और मानसिक क्षमता का उपहास उड़ाते हैं।

इस सम्बन्ध में संसार में अन्यान्य मनःचिकित्सक अपने प्रयोगों में अधिकाधिक सफलता प्राप्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह पुरातन मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म पद्धति का ही विकसित स्वरूप है। उस प्रक्रिया में चिकित्सक को अपने हस्त संचालक एवं नेत्रों को वेधक दृष्टि का चमत्कारी माहात्म्य समझाना पड़ता था। उन रोगियों के उदाहरण प्रस्तुत करने पड़ते थे जो इस पद्धति के आधार पर अच्छे हो चुके हैं। इस आधार पर वे रोगी में विश्वास उत्पन्न करते थे और विकसित विश्वास चिकित्सक के उपचार के सहयोग में एक समर्थ क्षमता उत्पन्न करता था। उसी आधार पर रोगी कष्ट मुक्त होते थे।

इससे पूर्व ‘क्रिश्चियन हीलिंग’ के नाम पर पादरी लोग महाप्रभु यीशु से प्रार्थना करने के लिए कहते थे और अभिमन्त्रित जल पिलाते थे। इस आधार पर रोगी बिना औषधि के भी अच्छे हो जाते थे। ईसाई धर्म के विस्तार में यह आधार एक अच्छी पद्धति सिद्ध हुआ था।

रोग के अस्पतालों में डाक्टरी चिकित्सा के साथ-साथ इस श्रद्धा चिकित्सा का उपयोग किया जाता है। डॉक्टर जब अपने उपचार कार्य को पूरा कर चूकते हैं तब उसके उपरान्त पादरी का आगमन होता है। उनका कहना होता है कि महाप्रभु यीशु ने अपने जीवन काल में अनेक असाध्य रोगियों को अच्छा किया था। उनका शरीर न रहने पर भी प्रार्थना करने वालों के पास उनकी आत्मा पहुँचती है और कष्ट मुक्ति में सहायता करती है।

देखा गया है कि जो रोगी इस पद्धति को भी अपनाते हैं, वे अपने साथियों की तुलना में जल्दी अच्छे होते हैं। प्रार्थना उनकी आशा को जगाती है कि उस उत्साह में उनकी जीवनी शक्ति अपेक्षाकृत अधिक काम करने लगती है। फलतः उन्हें दुहरा लाभ होता है।

शारीरिक क्षेत्र में अचेतन मन की कार्य पद्धति क्या है? इसका आरम्भिक विवरण समझ लेने पर यह अगली बात सहज समझ में आ जाती है कि ओटो नामस नर्ब्स सिस्टम (स्वायत्त तन्त्रिका निकायकी सिंपथेटिक ब्राँच)। अनुकम्पी शाखा। किस प्रकार शरीर की स्वसंचालित प्रणाली का संचालन करती है। उदर तन्त्र को कन्ट्रोल करने वाली नेरिपाइन फ्राइन एक प्रेरक रसायन छोड़ती है। वह न्यूरोनों तक मस्तिष्कीय संदेश ले जाता है। इसी प्रकार तंत्रिका कोशिका तक उत्तेजना पहुँचती है और हारमोनों का प्रभाव अभीष्ट हलचलें उत्पन्न करता है।

इसके साथ ही हाइपोथैल्मस अपना काम करना आरम्भ कर देता है और अभीष्ट क्षेत्रों में आवश्यक हलचलें उत्पन्न करता है। इस कार्य में बायोफील्ड वैक (जैव प्रति संभरण) की एक विशेष भूमिका होती है। इसी अनैच्छिक क्रिया-पद्धति में जब रोग निवारण के लिए संलग्न करने हेतु इच्छ शक्ति का प्रयोग किया जाता है तो उसकी प्रतिक्रिया वैसी ही होती है जैसी उत्तेजन रसायनों के इन्जेक्शन लगाकर उत्पन्न की जाती है।

कल्पना सृष्टि के चमत्कार असाधारण हैं। ध्यान योग की समूची प्रक्रिया इसी आधार पर चलती है। कई योगी हृदय की धड़कन में, रक्त प्रवाह में असाधारण हेर-फेर कर लेते हैं। समाधि स्थिति में लगभग मरणासन्न स्थिति तक पहुँच जाते हैं। प्राणायामों में कई ऐसे हैं जो श्वास-प्रश्वास क्रिया एवं रक्तगत उत्तेजना को असाधारण रूप में बढ़ा लेते हैं। इस आँधी-तूफान में रोगों का विजातीय द्रव्य उड़कर कहीं से कहीं चला जाता है। इस प्रवाह में बहते हुए कष्टकारण-वायरेस-बहकर कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं और उनका समुदाय छिन्न-भिन्न होकर क्रिया-हीन होने लगता है। रोग निवारण के लिए यह स्थिति असाधारण रूप से उपयोगी मानी गई है।

यह सम्भावना कितनी वास्तविक है। इसे तत् सम्बन्धी उपकरण से भली प्रकार जाना और जाँचा जा सकता है। इस इमेजिंग पद्धति का प्रयोग वाशिंगटन विश्व विद्यालय के चिकित्सा विभाग द्वारा किया गया है। और कैन्सर सरीखे ढीठ रोगों में भी लाभदायक पाया गया है।

योगी ताँत्रिक अपने प्रयोगों में देवी देवताओं को माध्यम बनाते हैं और रोगी को विश्वास दिलाते हैं कि उन्हें किसी दिव्य शक्ति का अनुग्रह उपलब्ध हो रहा है। रोगी का विश्वास जितना गहरा और घनीभूत होता है उसी आधार पर उन्हें लाभ भी आश्चर्यजनक रीति से होने लगता है। भूत प्रेतों के आक्रमण से लेकर उसके निवारण तक की कार्य पद्धति में इसी विश्वास प्रक्रिया की महती भूमिका होती है। झाड़-फूँक और मारण मोहन, उच्चाटन का भारत में चिरकाल से प्रयोग होता रहा है। उस क्षेत्र में अभी भी इसे जादू चमत्कार या देवी देवता का आवेश अनुग्रह समझा जाता है। किंतु वास्तविकता यह है कि मस्तिष्कीय प्रवाहों की साधारण प्रक्रिया का उपयोग जब संकल्प शक्ति और एकाग्रता के आधार पर प्रयोग होता है यों वह विश्वास ही फलदायक बन जाता है। इसी तथ्य को अब वैज्ञानिक आधार पर प्रामाणित किया जा रहा है। यह अटकल न होकर यथार्थता है इसका प्रमाण उन रोगियों से मिलता है जो असाध्य या कष्टसाध्य समझे गये थे किंतु उपरोक्त ध्यान धारण के आधार पर अपने खोये हुए स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करके सौभाग्यशाली बने।

श्रद्धा कभी पूजा उपासना में या धार्मिक कर्मकाण्डों में प्रयुक्त होती थी और वह जितनी गहरी होती थी उतने ही चमत्कारी फलितार्थ प्रस्तुत करती थी। अब नवीन ध्यान प्रक्रिया में श्वेत रक्त कणों को देवता मानकर ध्यान द्वारा रोग निवारण के लिए जुटाया जाता है तो भी वैसा ही लाभ मिलता है। इस वैज्ञानिक आत्मोपचार को आश्चर्य नहीं स्वाभाविक माना जाना चाहिए।




संगीत उपचार की संभावनाएं - Akhandjyoti May 1985

वेद चार हैं। ऋग्वेद ज्ञान परक। यजुर्वेद कर्मकाण्ड परक। अथर्ववेद विज्ञान परक। सामवेद संगीत परक। वैसे वेदत्रयी भी कही जाती है। अर्थात् ऋगु, यजु, अथर्व, सामवेद में इन्हीं तीनों के मंत्र हैं और वे हैं संगीत परक। एक-एक मंत्र को अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक प्रकार से गाया जाता है। इनका गायन मनोरंजन के निमित्त नहीं है वरन् उनका उद्देश्य विशेष है। पुरातन काल में सामवेद की ऋचाओं को अनेक प्रकार गाया जाता था। वे ध्वनियां अब लुप्तप्राय हो गईं। उपलब्ध सामवेद में एक ही प्रकार का गायन क्रम है।

संगीत मात्र पद्य रचना नहीं है। उसमें अनेकानेक ध्वनियों का समावेश है। यह ध्वनियाँ कानों को मिठास देने मात्र के लिए नहीं वरन् उनके द्वारा विस्तृत होने वाली तरंगों के प्रभावों को देखते हुए बनाई गई हैं। इनके आध्यात्मिक भावना परक उद्देश्य भी हैं। साथ ही उनमें शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के गुण भी हैं। उन्हें चिकित्सा प्रयोजन के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है। यज्ञ क्रम के कार्यकर्ताओं में एक उद्गाता की नियुक्ति भी होती थी वह उस ध्वनि में मंत्रों का गायन करता था जिसके निमित्त कि वह यज्ञ कृत्य किया जा रहा है।

इस विद्या के जानकार अब बहुत कम बचे हैं। वह लुप्तप्राय हो चली है। उसका वैज्ञानिक परिशोधन नये सिरे से हो रहा है और देखा जा रहा है कि किस ध्वनि लहरी का मनुष्य पर, पशुओं पर, वनस्पति पर और वातावरण पर क्या प्रभाव पड़ता है। पिछली शताब्दी में बुझे हुए दीपक को जला देने वाला दीपक राग, उठते हुए बादलों को बरसने के लिए बाधित करने वाला मेघ मल्हार, हिरन आदि पशुओं को मंत्र मुग्ध कर देने वाला मृग राग, सर्पों को बिल में से बाहर निकाल कर नर्तन के लिए बाध्य करने में सर्प राग बहु प्रचलित थे। उनसे अब साँपों को नचाने वाला सर्प राग ही सपेरों के पास बचा है।

वैज्ञानिकों ने ऐसे ध्वनि प्रवाह निकाले हैं जिनसे तरंगित होकर दुधारू पशु अपेक्षाकृत अधिक दूध देते हैं। फसलें जल्दी बढ़ती और अधिक फलती फूलती हैं। युद्ध के नगाड़े पहले भी एक खास तरह के होते थे। अभी भी सैनिकों में युद्धोन्माद उत्पन्न करने वाले बैण्ड विशेष ध्वनियों पर बजते हैं।

भक्ति भावना को उमंगाने के लिए देवालयों में विशेष ध्वनियों पर गीत गान गाये जाते हैं। कामुकता भड़काने वाले गीत वाद्यों के आयोजन राजा रईसों के यहाँ होते रहते थे। होटलों में अभी भी ऐसे नृत्य गीतों का प्रचलन है।

अब चिकित्सा प्रयोजन के लिए संगीत का नया उपयोग आरम्भ हुआ है। इन प्रयोगों में जापान सबसे आगे है। अमेरिका में भी उसका अनुकरण किया है। मानसिक रोगों में कुछ ध्वनि तरंगें विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध हुई हैं। मानसिक रोगों तथा रक्तचाप के असन्तुलन को ठीक करने में भी उसका विशेष प्रतिफल देखा गया है।

कुछ डाक्टरों ने मनोवैज्ञानिकों ने तथा संगीत शास्त्रियों ने मिलजुल कर ऐसे पर्यवेक्षण किये हैं कि किस रोग में किस प्रकार का ध्वनि प्रवाह लाभदायक सिद्ध होता है। इस आधार पर संगीत चिकित्सा एक स्वतन्त्र विज्ञान ही बनता जा रहा है।

पाश्चात्य देशों के कई अस्पतालों में औषधियों के साथ संगीत का प्रयोग किया जा रहा है। कई डाक्टर विशुद्ध संगीत के सहारे ही इलाज करते हैं और कहते हैं कि यह प्रणाली इतनी सशक्त है कि वह अकेली ही आश्चर्यजनक प्रतिफल प्रस्तुत कर सकती है। इसके साथ औषधि का समावेश करके उनका श्रेय बढ़ाने की आवश्यकता नहीं है।

म्युनिख के डा. लुडविन न मानसिक रोगियों के लिए विशेषतया किशोर बच्चों के लिए एक संगीत अस्पताल बनाया है जिसमें न केवल रोगों की चिकित्सा होती है वरन् ध्वनि विशेष के आधार पर उनकी कुटेवों को भी दूर किया जाता है।

मनोरोग चिकित्सा पीटर न्यूमेन और माइकेल सेन्डर्ड ने संयुक्त रूप से ऐसे ही अस्पताल का शुभारम्भ किया है जिसमें मनोरोगों के चिकित्सा उपचार में एक संगीतवादन भी सम्मिलित किया गया है। इससे पहले की अपेक्षा अब अधिक सफलता मिलने लगी है।

रूसी वैज्ञानिक प्रो. एस॰ वी. कोदाफ अभी इस परीक्षण में ही लगे हैं। पर अब तक के अनुभव से उन्हें विश्वास हो चला है कि स्नायविक रोगों के लिए संगीत चिकित्सा विशेष रूप से लाभदायक है।

शिकागो के मानसिक चिकित्सालय में डा. बेंकर के संगीत प्रयोग बहुत सफल रहे हैं। डा. वर्डमैन और ब्रुकलिंग ने आपरेशनों के समय संगीत उपचार का अच्छा प्रभाव देखा है।

अमेरिका, फ्राँस, पश्चिमी जर्मनी और जापान में संगीत चिकित्सा एक सामान्य हो गई है। उसे न केवल चिकित्सा के लिए वरन् शारीरिक और मानसिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्तियों के लिए शक्ति संचार की तरह संगीत का प्रयोग किया जा रहा है। अभी यह शोध प्रारम्भिक स्तर पर है, पर आशा की जाती है वह एक स्वतन्त्र विज्ञान की तरह विकसित होगी और न केवल रोगियों का वरन् कृषि की अभिवृद्धि और दुधारू पशुओं के लिए भी विशेष रूप से लाभदायक सिद्ध होगी।

सामान्यजनों के लिए मनोरंजन तथा तनाव, रक्त चाप दूर करने की दृष्टि से संगीत उपचार से बड़ी-बड़ी आशाएँ की जा रही हैं।

चिकित्सा और अभिवर्धन दो अलग-अलग प्रसंग होते हुए भी दोनों में परस्पर सघन सम्बन्ध है। संगीत को व्यायाम की श्रेणी में गिना जा रहा है और उसके ऐसे तौर तरीके निकाले जा रहे हैं जो स्वस्थता को ही नहीं प्रसन्नता को भी बढ़ायें। प्रसन्नता एक मानसोपचार है जिससे कल्पना शक्ति, बुद्धिमत्ता और प्रतिभा के तीनों ही पक्ष विकसित होते हैं। इस धारणा को अनेक कसौटियों पर सही पाने के उपरान्त जापान में व्यायाम की तरह संगीत को भी शिक्षा का आवश्यक अंग घोषित किया गया है। पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी में राजनैतिक मतभेद होते हुए भी इस विषय में दोनों एक मत हैं कि संगीत विलासिता एवं मनोरंजन नहीं है वरन् वह मानसिक स्वास्थ्य बढ़ाने एवं प्रतिभा निखारने का अच्छा तरीका है।

कहने में संगीत एक विषय प्रतीत होता है, पर उसके अनेकों भेद उपभेद हैं। उनके प्रभाव भी पृथक-पृथक हैं। जिस प्रकार रोगों के निदान के अनुरूप चिकित्सा का निर्धारण किया जाता है वैसे ही शारीरिक एवं मानसिक आवश्यकताओं को देखते हुए अलग-अलग ध्वनियों का व्यक्ति विशेष के लिए निर्धारण किया जाता है। इस प्रसंग को अधिक बल इसलिए मिला है कि आधुनिक खोजों के मानसिक कारणों से शारीरिक रोगों का उत्पन्न होना माना है और मात्र दवा दारु पर निर्भर रहने के विचार परिशोधन को हर रोग के लिए आवश्यक माना है। इस हेतु प्रशिक्षण परामर्श की अपेक्षा संगीत को अधिक प्रभावी माना गया है। दूसरी बात यह है कि इन दिनों मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। उसमें संगीत से उत्पन्न विद्युत प्रवाह मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों पर विभिन्न स्तर के उपयोगी प्रभाव डालते देखा गया है। यह सस्ता भी है और बिना जोखिम का भी। इसीलिए शरीर शास्त्रियों और मनोविज्ञान वेत्ताओं का ध्यान इस ओर विशेष रूप से गया है कि मनःक्षेत्र को प्रभावित करने वाली अनेक प्रकार की संगीत तरंगों का अन्वेषण एवं प्रयोग किया जाय। अगले दिनों संगीत विज्ञान का भविष्य अतीव उज्ज्वल दृष्टिगोचर हो रहा है।




Quotation - Akhandjyoti May 1985

कर्म में रहकर ही हम कर्म से महान हो सकते हैं। परित्याग करके या पलायन करके किसी प्रकार भी यह सम्भव नहीं है।

- टैगोर




ध्यान साधना की वैज्ञानिक विवेचना - Akhandjyoti May 1985

ध्यानयोग की महत्ता अध्यात्म क्षेत्र में अति महत्वपूर्ण मानी गई है। मनोयोगपूर्वक उत्सुकता के साथ जिसका भी चिन्तन किया जाता है, उसे ध्यान कहते हैं। ध्यान की विशेषता यह है कि मनोवृत्तियां उसी ढांचे में ढल जाती है। उसे प्राप्त करने के लिए भावनाएं काम करती है और प्राप्ति के लिए प्रयास चल पड़ते हैं।

भगवान के ध्यान का भी यही उद्देश्य है कि उनमें मन लगा रहे तो उत्कण्ठा, उत्सुकता उस दिशा में बढ़े और लगे। जो जिस प्रयोजन में तत्पर एवं तन्मय होता है, उसका अन्तराल उसी ढांचे में ढलने लगता है। जो जैसा सोचेगा वह वैसा करेगा और जो जैसा करेगा वह उसी ढाँचे में ढलेगा। भगवान के ध्यान में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। ध्यान मानवी प्रयास है जो अपनी अन्तःप्रवृत्तियों को भगवान् के तद्रूप बना देता है।

बरसात के दिनों में हरियाली पर बैठने वाले टिड्डे हरे रंग के होते हैं। पर ग्रीष्म ऋतु में जब घास सूखकर पीली पड़ जाती है तब उस पर बैठने वाले वही टिड्डे हरियाली जैसे रंग के न रहकर काया को पीलेपन में बदल लेते हैं।

मृग के बारे में भी कहा जाता है कि वह झींगुर को पकड़ ले जाता है। वह उसी का गुँजन सुनता और उसी का रूप देखता है फलस्वरूप थोड़े दिनों में उसकी आकृति और प्रकृति तद्रूप बन जाती है। वह कहानी प्रसिद्ध है जिसमें एक सिंह का बच्चा भेड़ों में पलने लगा। उसे सब भेड़ें ही दीखती थी इसलिए वह अपने आप को भी उसी बिरादरी का समझने लगा और उसी प्रकार के रहन-सहन में ढल गया। जब एक सिंह ने उसे उसकी परछाई पानी में दिखाई और अपने समतुल्य होने की बात समझाई तो उसका मन बदल गया और भेड़ों के झुण्ड से हटकर शेरों के समुदाय में जा मिला।

बच्चे सभी एक जैसे होते हैं पर उन्हें जिस वातावरण में पलने का अवसर मिलता वे उसी प्रकार की भाषा बोलने लगते हैं और वैसी ही आदतों के अभ्यस्त हो जाते हैं। कसाइयों के बच्चे आरम्भ से ही काट-फाँस करने लगते हैं और पण्डित विद्वानों के बालक छोटेपन से ही पूजा-पाठ के उपचारों के खेल खेलने लगते हैं। स्वाध्याय और सत्संग की महत्ता इसीलिए बताई गई है कि उस आधार पर व्यक्ति के मस्तिष्क में कल्पना चित्र बनने लगते हैं और प्रवृत्तियों का प्रवाह उसी दिशाधारा में बहने लगता है। ध्यान एक प्रकार का स्वनिर्मित सत्संग है। जिस प्रकृति के लोगों के साथ रहते हुए मनोभूमि बनती है। उसी प्रकार जिस स्तर का इष्ट निर्धारित किया जाय और उसके साथ अपनी अभिरुचि एवं सम्भावना का तानाबाना बुना जाय तो प्रायः उसी स्तर का चिन्तन और चरित्र बनने लगता है। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को ध्यान में रखते हुए पूजा उपासना में ध्यान को अत्यधिक महत्व दिया गया है। मात्र कर्मकाण्डों की उपेक्षापूर्वक करते रहा जाय तो उसे निरर्थक चिह्न पूजा माना जाता है।

गीता में श्रद्धा की महत्ता का वर्णन करते हुए कहा है-

सत्वानिरुपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारतः। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छद्धः स एव सः॥

-गीता 17।2

अर्थात्- मान्यता के अनुरूप लोगों की श्रद्धा ढलती है और जिसकी जैसी श्रद्धा है वह वैसा ही बन जाता है। और भी-

यं यः चापि स्मरन् भावं त्यज्ञत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्त्येय सदा तद्भाव भावितः॥ -गीता 8।6

अर्थात्- मनुष्य जिस-जिस भावना का स्मरण करते हुए शरीर त्यागता है वह उसी भाव के अनुरूप गति पाता है।

डाक्टर हेनरी लिंडन हर ने अपनी पुस्तक ‘प्रैक्टिस आफ नेचुरल थेरो प्यूटिक्स’ में मनुष्य के विचारों का उसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। वे कहते हैं कि महान् व्यक्ति अथवा महान गुणों के साथ एकात्मता स्थापित करने से मनुष्य की अनेकों शारीरिक एवं मानसिक व्यथाऐं दूर हो जाती हैं। शरीर पर मन का असाधारण प्रभाव है।

मनोविज्ञान वेत्ता डा. उपटन सिंकलेयर ने अपने ग्रन्थ ‘मेन्टल रेडियो’ में लिखा है। यदि मनुष्य के मस्तिष्क में उच्चकोटि के विचार विद्यमान रहें तो वह उनका प्रसारण करता रह सकता है और अनेकों के मस्तिष्क को अपने जैसा बना सकता है। साथ ही एक बात और भी है कि संसार में जो श्रेष्ठ विचार कहीं भी किसी के पास भी विद्यमान हैं उन्हें वह अपने लिए आकर्षित करके भण्डार कर सकता है।

डाक्टर मुकर्जी की पुस्तक ‘सिकनेस आफ सिवेलेजेशन’ में लिखा है- सभ्यता पर जो संकट आया हुआ है। उसी को हम चारित्रिक पतन के रूप में देखते हैं। वह सब विचारों के स्तर में गिरावट आ जाने के कारण है। सुख-शान्ति का जमाना हो तो भी उसका श्रेय आदर्शवादी विचारों के बाहुल्य को जायेगा और यदि संसार में संकट एवं विग्रहों की भरमार होती है तो भी उनका कारण जन-मानस के विचारों का स्तर पतनोन्मुख होने के कारण और कुछ नहीं हो सकता।

डाक्टर चार्ल्स जुंग ने फ्रायड के विचारों को काटते हुए कहा है- मनुष्य में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता बाहर से थोपी हुई नहीं है। यह उसका मौलिक गुण है। जब तक वह अपने इस गुण को सावधानी से अपनाये रहता है तब तक स्वयं भी सुखी रहता है और अपने समाज को भी सुखी बनाता है। यह उसके अपने हाथ की बात है कि अपने को गिराये या उठाये। साथ ही अपने समय को शान्तिपूर्ण रखे अथवा विग्रह से भर दे।

आधुनिक मनोविज्ञान के जन्मदाता फ्रायड ने मनुष्य के पास सबसे बड़ी सम्पदा एवं शक्ति विचारणा को कहा है और साथ ही अनेक ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया कि इसी सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए लोग सफलता सम्पन्न एवं अपने साथियों की तुलना में कही अधिक सामर्थ्य सम्पन्न बने हैं। जिसके विचारों में बल है वह बड़ी कठिनाइयों का सामना कर सकता है और प्रतिकूलता की अनुकूलता में बदल सकता है।

डा. यूथेस ने अपनी पुस्तक “साइकोलॉजी आफ रिलीजन” में ऐसे अनेकों उदाहरण दिये हैं जिनसे प्रकट होता है कि मनुष्य की विचारणा जिस भी प्रयोजन में तादात्म्य हो जाती है। उसके मानसिक संस्थान तथा अवयव तद्नुरूप कार्य करने लगते हैं।

ध्यान आध्यात्मिक हो या लौकिक उनमें जिस प्रकार का प्रवाह होगा वे व्यक्तित्व को तद्नुरूप ढालेंगे। यह नहीं हो सकता कि हेय विचारों को मन में ठूंसे रहें और समुन्नत स्तर का बन सके। विचारों का अपना स्वतन्त्र चुंबकत्व है वह सहायक और साधनों को अपने अनुरूप वातावरण में से घसीट लाता है। इस विश्व ब्रह्माण्ड में सब कुछ विद्यमान है। चुनाव करना मनुष्य का काम है कि वह किधर चलना और किस ढाँचे में ढलना चाहता है। इस चुम्बकत्व को जिस भी प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जायेगा उसी में सफलता मिलेगी।

वैज्ञानिक, साहित्यकार, कलाकार, अपनी आकाँक्षा और तादात्म्यता के अनुरूप अविज्ञात और आश्चर्यजनक वस्तुओं को ढूँढ़ निकालते हैं। इसमें उन्हें कोई अलौकिकता कहीं से हस्तगत नहीं हुई होती। मात्र अभीष्ट के प्रति तन्मयता और उपलब्धि की उत्कृष्ट आकांक्षा ही काम कर रही होती है। इसी सहारे सामान्य मनुष्यों ने सामान्य परिस्थितियों और सामान्य साधनों में ऐसा कुछ ढूंढ़ निकाला है जिसे लोग जादू चमत्कार से बढ़कर मानते हैं।

किस स्तर के विचारों में मनुष्य अपने को तन्मय करे और ध्यान लगावे यह उसकी इच्छा पर निर्भर है। अपना मन न हो तो दूसरों का सिखावन या दबाव कुछ अधिक कारगर सिद्ध नहीं होता।

जो अपने लिए इष्ट हो उसका ढाँचा या स्वरूप खड़ा करना चाहिए और अवकाश के समय में उन्हीं को कार्यान्वित करने की योजना बनाने में संलग्न करना चाहिए।

भगवान का ध्यान भी इसी सिद्धान्त के आधार पर अपना सत्परिणाम प्रस्तुत करता है। भगवान को इतना अवकाश नहीं कि वे किसी की पूजा उपासना या ध्यान धारणा का लेखा जोखा रखे। यह मनुष्य का अपना इच्छित विषय है कि वे भगवान को किन्हीं गुणों का समुच्चय माने और किसी ऐसे रूप की कल्पना करे जिनमें अभीष्ट महानताऐं विद्यमान हो।

भगवान निराकार है। आस्तिकजनों ने अपनी मान्यता के अनुरूप उनकी आकृतियाँ गढ़ी है। उनमें से कोई भी चुनी जा सकती है या और नई गढ़ी जा सकती है। यह प्रयोजन किसी महामानव को अपनी श्रद्धा और तन्मयता के आधार पर भी पूरा हो सकता है।

किन्तु यदि भगवान को ऐसा गुणों वाला माना गया है जो अनुचित या अनैतिक माने जाते हैं तो उनकी भक्ति से लाभ नहीं हानि ही उपलब्ध होगी। कामुक, विलासी स्त्रैण यदि भगवान की कल्पना की गई है तो उस ध्यान से अपने मन में भी वैसी ही हेय प्रवृत्तियां उठेंगी। किसी दो ऐसे देवता को आराध्य बनाया गया है जो जीवों का रक्त माँस खाता-पीता है तो वे दुर्गुण उपास्य के स्वभाव तथा चरित्र में भी प्रवेश करेंगे। इसलिए अच्छा यह है कि भगवान को सद्गुणों का समुच्चय माना जाय और उसके साथ ऐसा इतिहास न जोड़ा जाये जिसमें अवांछनीयता की गन्ध आती हो। इस दृष्टि से प्रकाश पुँज का उदीयमान सूर्य को सदाशयता के प्रतीक रूप में ध्यान करना श्रेष्ठ है। पवित्र नदी बादल जैसे निर्दोष एवं उपकारी तत्वों का भी ध्यान किया जा सकता है। ध्यान के लिए इस प्रकार के प्रतीकों का निर्धारण करना चाहिए और उसके साथ सत्प्रवृत्तियों का आरोपण करना चाहिए। ऐसी देवी देवताओं को आराध्य नहीं बनाना चाहिए जिनकी जीवन गाथा के साथ ऐसे हेय कृत्य जुड़े हुए हों जिन्हें मानव समाज में हेय या अनुचित माना जाता है। ऐसे ध्यान से वे दुर्गुण भी उपासक में बढ़ते हैं जिन्हें इष्ट देव की जीवनचर्या में सम्मिलित माना जाता है। इसकी अपेक्षा तो आदर्शवादी महान मानवों का ध्यान करना अच्छा है जिनने अपने कृत्यों से जन-साधारण के लिए अनुकरणीय मार्गदर्शन किया हो। बुद्ध, गाँधी, ईसा, हनुमान, दधीचि, भागीरथ, हरिश्चन्द्र जैसों को उपास्य बनाया जाय और उनका ध्यान किया जाय तो उसका लाभ भी सन्देहास्पद भगवानों को प्रतीक बनाने की अपेक्षा कहीं अच्छा है।




आरुणी वशिष्ठ मेधावी था (kahani) - Akhandjyoti May 1985

छात्रों में आरुणी वशिष्ठ मेधावी था और आज्ञाकारी भी। वह तत्त्वज्ञानी बनना चाहता था। कुलगुरु उद्यालक भी उसके उत्सुक थे। उचित मूल्य पर उचित उपलब्धि का सिद्धान्त अपनाया गया। सस्ते में बहुमूल्य पाने का कोई प्रचलन इस संसार में है भी तो नहीं।

आरुणी को सौ दुर्बल गौएं दी गयीं, और कहा वह एक हजार तक बढ़ाये और तगड़ी करके दिखाये। उसके उपरान्त ही दीक्षा मिलेगी।

आरुणी झुण्ड को लेकर चल पड़ा। घास-पानी की उपयुक्त जानकारी प्राप्त करना। झुण्ड को एक जगह से दूसरी जगह ले जाना सुरक्षा का प्रबन्ध करता और आये दिन की समस्याओं से जूझता। यही क्रम चलता रहा और दस वर्ष में गौएं सौ से बढ़कर हजार हो गईं। झुण्ड को लेकर वह गुरुकुल को वापस लौट आया।

आरुणी के चेहरे पर ज्योतिर्मान ब्रह्मतेजस् उभरा हुआ देखकर आचार्य ने हर्ष भी व्यक्त किया और उसके पुरुषार्थ प्रयास को मुक्त कण्ठ से सराहा भी। कुछ ही दिन गुरु सान्निध्य में रहकर वह अद्वितीय ब्रह्म ज्ञानी घोषित किया गया।

लम्बे समय से ग्रन्थ परायण छात्रों ने कुछ भी समय में आरुणी को निष्णात घोषित किये जाने का कारण पूछा तो कुलपति ने इतना ही कहा- ‘ज्ञान की पूर्णता अनुभव, अभ्यास और आदर्श को जीवन में घुला लेने पर ही उपलब्ध होती है। मात्र पठन-पाठन उसके लिए पर्याप्त नहीं माना जाता।’




न मनुष्य बन्दर की औलाद है न बन्दर मनुष्य की - Akhandjyoti May 1985

दर्शन, सुनने समझने में साधारण तथा अटपटा-सा लगाता है, पर उसका दूरगामी प्रभाव जीवन की दिशा-धारा विनिर्मित करने में महती भूमिका निभाता है। इसलिए दर्शन को बुद्धिवादियों का विद्युविलास न मानकर सर्वसाधारण को दिशा निर्धारक मानना चाहिए। मैं क्या हूँ? कहाँ से आया? कर्तव्य धर्म क्या है? किस नीति मर्यादा का पालन करना चाहिए और अन्ततः किस परिणति की आशा करनी चाहिए। ऐसे ढेरों प्रश्न दर्शन के साथ जुड़ते हैं। इसलिए जब समाज को उठाना या गिराना हो तो उसके दर्शन को सुधारने बिगाड़ने से काम चल जाता है। स्थायी युद्ध से उस देश की, युग की, संस्कृति को भ्रष्ट करना होता है।

इन पंक्तियों में उस विकासवाद की चर्चा की जा रही है जो आजकल मान्यता प्राप्त कर चुका है और जिसे पढ़कर बच्चे विश्वासपूर्वक स्कूल से बाहर निकलते हैं। चौदह वर्ष जो लगातार पढ़ा और पढ़ाया गया है उसे भुला देने या अविश्वास करने का कोई कारण नहीं।

हमें पढ़ाया गया है कि मनुष्य बन्दर की औलाद है। पूर्वजों का अपने स्वरूप और स्वाभिमान पर सभी को अभिमान होता है। जब तक हम प्रत्येक धर्मकृत्य में यह संकल्प उच्चारण करते थे कि हम अमुक देव अथवा ऋषि के वंशज हैं तब तक पूर्वजों की मान मर्यादा का भी ध्यान रहता था। चक्रव्यूह में चारों ओर से घिर जाने पर विपक्षियों से यह कहता था कि मैं डरने वाला नहीं हूँ। उस ओर तलवार छोड़े तो मुझे अर्जुन पुत्र न समझना। रामचन्द्र जी एक अवसर पर कहते हैं- “रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाय पर वचन न जाई।” इसमें कुल की पूर्व परम्परा का उल्लेख है जो मनुष्य का सहज स्वाभिमान बढ़ाती है और उनकी महान परम्परा के अनुकरण की प्रेरणा देती है। जब कुल और परम्परा निकृष्ट कोटि की स्वीकार कर ली जाय तो फिर ओछे कदम उठाने में भी लज्जा नहीं आती।

आधुनिक विकासवाद के जनक डार्विन ने बड़े दमखम के साथ यह प्रतिपादित किया है कि मनुष्य बन्दर की औलाद है। उसके लिए जहाँ-तहाँ उपलब्ध पाषाण अंगों को एकत्रित किया है जिनके सहारे वे वंश परम्परा का निर्धारण करते और मनुष्य को विकसित होकर इस रूप में पहुँचा बताते हैं।

इस संदर्भ में प्रतिपादन कर्ता वे अकेले नहीं हैं। उनके साथी सहयोगी को मान्यता देने में अपनी बुद्धि दौड़ाते हैं (जार्ज वाण्ड जो नृतत्व विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। इस मान्यता के समर्थक हैं। स्वीडन के नील हर्बर्ट नेल्सन, हरबर्ट युनीवर्सिटी के कीट विज्ञानी एडवर्ड विक्स, चर्च लेमसन, स्टीवेन्स एस. स्टेलली, आस्ट्रेलिया के जीवविज्ञानी ऐलन होल्ट ने भी इन्हीं विचारों का समर्थन किया है। इन समर्थन कर्ताओं के मस्तिष्क में दो विचार जड़ जमाकर बैठ गये हैं कि सृष्टि के आरम्भ में बहुत छोटी स्थिति में जीव बना पीछे उसने धीरे-धीरे विकास करते हुए वर्तमान स्थिति प्राप्त की। दूसरी उनकी मान्यता यह है कि जिस प्राणी की शक्ल पूर्ववर्ती जिस प्राणी से मिलती हो उसे उसका पूर्वज मान लेना चाहिए। इस प्रमाण की पुष्टि ने उसे प्राणियों के पाषाणी भूत अवयव भी मिले हैं। उन्हें देखकर जैसा चाहें वैसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है। वे इस स्थिति में नहीं हैं कि उस आधार पर कोई एक ही स्पष्ट निष्कर्ष निकल सके। उन पत्थर के टुकड़ों से तीसरी या चौथी बात भी सिद्ध की जा सकती है।

उपरोक्त प्रतिपादन कर्ताओं के समकालीन तथा इतने ही विद्वान दूसरे भी हैं जो डार्विन के विकासवाद का हाथों हाथ खण्डन करते चले हैं। वर्कले युनिवर्सिटी के रिचर्ड गोल्ड स्मिथ ने अपने प्रख्यात ग्रन्थ “मैटेरियल वेसिस आफ इवूलेशन” में ऐसी अनेकों त्रुटियाँ निकाली है जो बन्दर से मनुष्य बनने की बात को गलत सिद्ध करती है। इसी प्रकार जीव विज्ञानी ओजोडिड बुल्फ ने उन तथ्यों को गिनाया है जिसके आधार पर मनुष्य वर्ग को बन्दर वर्ग का साबित नहीं किया जा सकता।

पिछड़े दिनों इस बात की खोज होती रही है कि जिन जीवधारियों में परस्पर संगति है वे परस्पर मिल-जुलकर नई संतति पैदा कर सकते हैं। इसमें घोड़े और गधे का उदाहरण स्पष्ट है। उनका संयोग आसानी से हो जाता है। ऐसे सजातीय वर्ग कुछ जलचरों और कीट-पतंगों में भी पाये गये हैं, पर उनकी संख्या उँगलियों पर गिनने की तरह है। इस संदर्भ में मक्खी पर सबसे अधिक प्रयोग हुए हैं। उनकी संगति नये प्रजनन के लिए मिलाने के निमित्त लम्बे और जटिल प्रयोग हुए हैं, पर कोई सफलता नहीं मिली। पेड़ पौधों में जैसे कलम लगाई जा सकती है, उस प्रकार आधुनिक मनुष्य चिंपेंजी, गौरेला, वन-मानुष, बन्दर, लंगूर आदि की मिश्रित सन्तति पैदा करने की कोशिश की गई। पर उसमें तनिक भी सहायता नहीं मिली। होने को क्रोमोसोम-क्रोमोजोन इतने भिन्न हैं कि वे आपस में एकता स्थापित करने के लिए कतई तैयार न हुए। पक्षियों में भी किसी जाति का शंकरत्व न हो सका। इसलिए उन्हें स्वतन्त्र जाति मानना पड़ा।

पत्थर के जमे अंग फासल्स एक ऐसी कड़ी नहीं जोड़ते जिससे बन्दर और आदमी को समीपी सिद्ध कर सके। मनुष्य के कितने ही अवयवों की विधि रचना हैं इनमें आंखें और मस्तिष्क का गठन मनुष्य अद्भुत है। अन्य प्राणी इस दृष्टि से बहुत पीछे हैं। बन्दरों का मस्तिष्कीय विकास जन्मकाल जितना ही रहता है, किंतु मनुष्य के बच्चे का दो वर्ष तक लगातार बढ़ता रहता है और वजन के हिसाब से नहीं स्तर के हिसाब से दस गुना हो जाता है।

सोसियो बायोलोजी एण्ड सिन्थेरसि के विद्वान लेखक ने कहा है- “बन्दर एनाटोमी फिजयालौजी के हिसाब से किसी कदर मनुष्य से मिलता है। किन्तु उसकी मान्यता और सामाजिकता दोनों के बीच तनिक भी नहीं मिलती। इसी प्रकार एक-दूसरे ग्रन्थों “आफ्टर मैंन ए जूलौजी आफ्टर फ्यूचर” में लिखा है यदि बन्दर मनुष्य बन गया तो मनुष्य को अगले दिनों क्या बनना चाहिए। एक तीसरे ग्रन्थ “न्यू इवैल्युशनरी टाइम टेबल” में व्यंग किया गया है कि मनुष्य को बढ़ते बढ़ते पाँच फुट का चमगादड़ बनना होगा, तभी उसकी परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठेगा। उनका कथन है कि समुद्री जीवों में ह्वेल एक लम्बी चोंच उगा लेगी और समुद्र पर एक छत्र राज्य करेगी।

डार्विन स्वयं इस बात पर शर्मिन्दा था कि वे बन्दर और मनुष्य की एक हजार वर्ष की खोई कड़ी को वे किसी प्रकार मिला नहीं पा रहे हैं और इसके बिना प्रतिपादन की प्रमाणिकता खण्डित होती है। जिसके प्रस्तोतातक को अपने प्रतिपादन पर सन्देह हो, उसको धड़ल्ले के साथ मान्यता मिले और स्कूलों से हर बच्चा उसी विचार धारा को साथ लेकर निकले यह बड़े आश्चर्य की बात है।

विकास क्रम में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूर्वजों के स्वभाव संस्कार अगली पीढ़ियों में चलते रहते हैं। बन्दर की कोई नैतिकता नहीं है। वह किसी की भी खाद्य सामग्री चुराकर भाग सकता है। प्रजनन अवसर पर कोई रिश्ता उसके मार्ग में बाधक नहीं होता। यदि मनुष्य सचमुच बन्दर से विकसित हुआ है तो धन सम्बन्धी नैतिकता और यौन सदाचार की कोई आशा उससे नहीं करनी चाहिए। अपने माने हुए मुहल्ले में दूसरे मुहल्ले के बन्दर घुस आवें तो देखते-देखते मल्लयुद्ध खड़ा कर लेते हैं। यदि मनुष्य बन्दर की औलाद है तो यह गुण स्वभाव उसके पैतृक अनुदान माने जाने चाहिए और कहा जाना चाहिए कि नैतिक अनुबन्ध कृत्रिम हैं थोपे या लादे गये हैं। यदि वह उन्हें तोड़ता है इसमें भूल प्रकृति के विपरीत कुछ भी नहीं है।

शरीर संरचना वंशजों में सर्वथा नहीं बदल सकती। उच्चारण तन्त्र उसमें गायन वादन निकल सके, बन्दर को कितना ही सिखाने पर भी विकसित नहीं हो सकता। पूँछ कैसे गायब हुई। रीढ़ की हड्डी कैसे सीधी हुई और दो पैरों से चलना सीखकर हाथों को स्वतन्त्र रूप से काम करने के लिए कैसे बचा लिया गया। यदि यह आवश्यकता के अनुरूप था तो भी अभी भी बहुत ही अंग ऐसे हैं जो घटाये जाने चाहिए। कानों की जैसी टेड़ी-मेढ़ी आकृति है उसकी तो कोई जरूरत ही मालूम नहीं पड़ती। एक छेद से भी काम चल सकता है। पैरों की उँगलियों की संख्या और साइज में भी बहुत सुधार की जरूरत है। नारियों की प्रसव पीड़ा की क्या आवश्यकता है। वे रास्ता चलते प्रसव करने की सुविधा क्यों न प्राप्त करेंगी।

वस्तुतः समुद्र से सब प्राणियों का अद्भुत होना बड़ी किलिस्ट कल्पना है। साँप के अण्डे में से चिड़िया जन्मी। बच्चे को रोज डेढ़ टन दूध पिलाने वाली ह्वेल पहले जमीन पर रहती थी और वह पशु वर्ग की भी, फिर सुविधा और आदत के अनुसार समुद्र में जा घुसी और वही रम गई। यह ऐसे प्रतिपादन हैं जिसे मूर्धन्य चाहे जिस प्रकार सिद्ध करना चाहें। सामान्य बुद्धि के गले उतरने वाली नहीं है।

सच तो यह है कि प्रत्येक प्राणी अपने आप में पूर्ण उत्पन्न हुआ है और जैसा भी था उसी रूप में अपनी वंश वृद्धि कर रहा है। अमीबा एक कोशीय जीवाणु है। वह एक से दो- दो से चार का क्रम चलाता है, पर उसकी मूल इकाई एक कोशीय अभी भी है। इसी प्रकार हर प्राणी सृष्टि के आरम्भ से लेकर जिस रूप में बना था उसी में रहता हुआ अपनी वंश वृद्धि करता आ रहा है। मनुष्य की उत्पत्ति हमें स्वयंम्भु मुनि एवं शतरूपा रानी से आरम्भ करनी चाहिए। ब्रह्माजी द्वारा उसका अन्य जीव धारियों की तरह ही अपने ढंग का अनोखा उद्भव मानना चाहिए। जो अद्यावधि अपने नर-नारायण स्वरूप को बनाये हुए हैं। बीच-बीच में उस पर कषाय−कल्मषों के मैल चढ़ते रहे हैं, नित्य स्नान की तरह उसकी सफाई होती रहे तो उसके दैवी गुण निखर कर फिर साफ हो जाते हैं। सोने को तपाकर साफ कर लिया जाता है तो उसकी अशुद्धियाँ साफ होतीं और अपने मूल स्वरूप में प्रकट होती रहती हैं। यही मान्यता सही है कि बन्दर से मनुष्य बनने की।

हर प्राणी समुद्र में से हुआ यह मान्यता भी अशुद्ध है। जलचर जल में, थलचर थल में उत्पन्न होते हैं और नभचर नभ में भी। आकाश का अदृश्य अन्तरिक्ष है जिसमें वायुभूत सूक्ष्म जीवाणु उत्पन्न होते हैं। मरणोत्तर जीवन में प्राणियों का निवास विश्राम और परिभ्रमण आकाश में ही होता है। इसके अतिरिक्त ऐसे प्रमाण की कम नहीं हैं कि बादलों में भी प्राणी उत्पन्न होते और टिके रहते हैं। उस क्षेत्र में थोड़ा-सा आश्रय पाकर टिके रहते हैं। ऐसे अवसर भी आते हैं जल चर आकाश से बड़े परिमाण में बरसते पाये गये हैं। 12 फरवरी 1979 की बात है। इण्डेण्ड के साउथ पालन उपनगर में रहने वाले रोनाल्ड मूडी ने एक बरसात के दिन छत पर बड़ी संख्या में सरसों के बीज बिखरे हुए पाये। उन्हें आश्चर्य हुआ कि कल ही जिस छत को भली प्रकार बुहारा गया था। उस पर इतनी बड़ी संख्या में गीली सरसों कहाँ से आ गई। वे पड़ौसियों के यहाँ भी इस सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने गये तो पाया कि उस पूरे उपनगर की छतों पर एक ही जाति की मोटी सरसों की परत बिछी हुई है। बहुत सिर फोड़ी करने के बाद भी ये इसके सिवाय और कोई नतीजा न निकाल सके कि यह बरसात की बूँदों के साथ आकाश से बरसी है।

13 मार्च 1977 की घटना है व्रिस्टल के अल्फर्ड विलसन अपनी पत्नी समेत कार से जाने की तैयारी कर रहे थे कोट के बटन टूट पड़ने जैसी आवाजें हुई चारों ओर निगाह फैला कर देखा तो मालूम हुआ कि बटन साइज के पिंगल के बीच ओलों की तरह आकाश से बरस रहे हैं। बीजों की परत दूर-दूर तक जमीन पर जमा हो गई। थोड़े से समेट कर उनने रूमाल में बाँधे और कितनों को ही दिखाये। वे सचमुच पिंगल के बीज थे। आश्चर्य यह है कि मार्च का महीना उन बीजों का था भी नहीं।

दुबलिन के सीमन्स मंथली मेट्रोलाजिकल मैगजीन में इस बीज वर्षा का समाचार विस्तार से छपा है और कहा है कि रास्ता निकलने वालों के कपड़े और टोप उनसे बुरी तरह लाद लाये थे।

वर्किघम की एक महिला श्रीमती भीडे अपने बच्चों समेत रायल नेवी पार्क की एक प्रदर्शनी देखने जा रही थी अचानक उनने देखा कि पौन इंच साइज के खाकी रंग की छोटे मेंढकों की आसमान से वर्षा हो रही है। मेंढक इतने अधिक थे कि उनने पार्क की जमीन को पूरी तरह ढक लिया था और वे इधर-उधर चलने की कोशिश कर रहे थे। दर्शकों के झुण्ड लग गये, उनमें से एक अमेरिका चार्ल्स फोर्ट ने कहा सन् 1874 में उनके घर तथा पास-पड़ौस में ऐसे ही मेंढक वर्षे थे। तब उनने उसकी चर्चा किसी से नहीं कि इस बात पर विश्वास कौन करेगा?

जनरल आफ ऐशियाविक सोसाइटी आफ बंगाल के एक बार वैज्ञानिक सर्वे की रिपोर्ट छपी थी जिसमें मुजफ्फरपुर जिले के टोन्स कोर्ट के समीप मछली वर्षा की वास्तविकता का वर्णन छपा था। वे सफेद रंग की एक-एक इंच की मछलियाँ थी। उनने उस सारे घेरे को ढक लिया था।

सुप्रसिद्ध विज्ञान वेत्ता क्लार्क ने अपनी पुस्तक ‘मिस्टीरियस वर्ड’ में आकाश से समय-समय पर बरसने वाले जीव जन्तुओं की घटनाओं का संकलन किया है।

इस पुस्तक में घटित घटनाओं का कारण उनने अनेक वैज्ञानिकों से पूछकर यह सम्भावना व्यक्त की है कि आकाश में भी बैक्टीरिया मौजूद है। कुछ तारे भी ऐसे हैं। उनकी जीवाणु पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने पर यहाँ की स्थिति के अनुरूप शरीर धारण कर लेते हैं।

ऋषियों का अभिमत था कि सृष्टि में आदि में मनुष्य पूर्णावस्था में अन्तरिक्ष से उतरे थे और वे देवपुत्र जैसे थे। बाद में यहाँ की परिस्थिति के अनुसार विभिन्न प्रकार के हो गये। कहाँ मनुष्य का इतना गौरवपूर्ण इतिहास कहाँ उसे बन्दर की औलाद कहा जाता है। पाठक स्वयं विचार करें कि इनमें से कौन-सा कथन मानने योग्य है।




सेनापति नोबुनागर (kahani) - Akhandjyoti May 1985

जापान का प्रसिद्ध सेनापति नोबुनागर कम सैनिकों और थोड़े साधनों से ही अपने समर्थ विरोधियों के छक्के छुड़ा देने के लिए प्रख्यात था। वह अपने साथियों का मनोबल बढ़ाए रखने की कला में बहुत कुशल था।

एक बार युद्ध में विपत्ति के समय थोड़े सैनिकों के होते हुए भी उनका मनोबल बढ़ाने के लिए उसने एक तरकीब निकाली। देवता के मन्दिर में उन्हें लेकर गया और सिक्के उछाल-उछाल कर देवता की इच्छा सिद्ध करने लगा सिक्के चित्त पड़े तो जीत, पट्ट पड़े तो हार समझी जानी थी।

सिक्के तीन बार उछाले गए। तीनों ही बार चित्त पड़े। सभी हर्ष से नाचने लगे। तालियाँ बजाते हुए चिल्लाने लगे- जीत-जीत-जीत।

लड़ाई लड़ी गई। चार गुनी अधिक संख्या वाले विपक्ष को उन बहादुरों ने तोड़-मरोड़ कर रख दिया और विजय का डंका बजाते हुए वापस लौटे।

अभिनन्दन समारोह में नोबुनागा ने उसे सैनिकों का नहीं उनके मनोबल की विजय बताया और रहस्य खोलते हुए वे सिक्के दिखाए जो उछाले गए थे। वे इस चतुरता के साथ ढाले गए थे कि दोनों ओर वही मार्क था जो चित्त कहा जाता था। आत्मविश्वास क्या नहीं करा सकता?




धर्म का तत्व दर्शन हर दृष्टि से श्रेयस्कर - Akhandjyoti May 1985

पिछले दिनों धर्म सम्प्रदायों द्वारा जो भूल होती रही है और सामयिक सुधारों के प्रति अनिच्छा है, उसने विचारशील समुदाय को धर्म विरोधी बना दिया है। उस मान्यता के पक्षधर थोड़े रह गये हैं और जो हैं उनकी संख्या भी निरन्तर घटती जा रही है। औचित्य और विवेक की कसौटी ऐसी है जिस पर खोटे सिद्ध होने वाले प्रचलन इस बुद्धिवादी युग में देर तक टिक न सकेंगे। यह बात धर्म संप्रदायों पर भी लागू होती है।

यदि सांप्रदायिक प्रचलनों में सुधार कर लिया जाय उन्हें समय की आवश्यकता के अनुरूप ढाल लिया जाय तो इन दिनों बढ़ती हुई अवज्ञा और अवमानना देर तक न टिकेंगी और धर्म मानव जीवन का प्राण एवं समाज सुव्यवस्था का मेरुदण्ड माना जाने लगेगा। तथ्य सिर पर चढ़कर बोलते हैं और यथार्थता अपना स्थान स्वयं बना लेती है।

धर्म अर्थात् कर्त्तव्य पालन के लिए की गई मानव चिन्तन की घेराबन्दी। शालीनता अपनाने के लिए विवशता उत्पन्न करने वाली आस्था। मानवी गरिमा का पक्षधर दर्शन ही धर्म है। उसे हटा दें तो फिर मनुष्य के पास ऐसा कोई मजबूत आधार नहीं रह जाता जिससे अचिन्त्य चिन्तन और आकृत्य करने से मजबूत रोकथाम की जा सके।

विशुद्ध धर्म को आध्यात्मिक तत्वज्ञान कहना चाहिए। उसके अंतर्गत कई उपयोगी मान्यताओं का समावेश है। ईश्वर का अस्तित्व इसी के अंतर्गत आता है। सर्वव्यापी और न्यायकारी परमेश्वर को अपने इर्द-गिर्द अनुभव करने वाला यह सोचता है कि छिपकर भी कुकर्म नहीं किये जा सकते। उसकी कर्मफल व्यवस्था के अंतर्गत हर हालत में अनीति का कष्टकारक प्रतिफल भोगना पड़ता है। ईश्वर की प्रसन्नता और अनुकम्पा का एक का ही उपाय है चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता-पुण्य और परमार्थ में संलग्नता। इस आधार पर किये गये सत्कर्मों का वह प्रतिफल प्राप्त होता है जिससे लोक और परलोक दोनों ही सुख-शान्तिमय बन सकें।

धर्म की अवहेलना और ईश्वर को न मानना एक ही बात है। इस मनोभूमि में कर्त्तव्यों का पालन आस्थापूर्वक नहीं बन पड़ता। कोई नियामक ही नहीं है तो कर्त्तव्य पालन इच्छा का विषय रह जाता है। इसकी कोई अनिवार्यता नहीं रहतीं। बहुत जनों का बहुत सुख, समाज कल्याण-वैयक्तिक प्रतिष्ठा यह तीनों ही बातों ऐसी हैं जिनमें असत्य भाषण और अनीति आचरण की पूरी गुंजाइश है। राजनीति के क्षेत्र में कूटनीति बरतते हैं। उसमें देश भक्ति के नाम पर छल छद्म बरतने की पूरी गुंजाइश रहती है। गुप्तचर अपने को निरन्तर छिपाते रहते हैं और दूसरे के भेद लेने के लिए वार्त्तालाप में पर्याप्त लोग लपेट बरतते हैं। सेना के किसी प्रामाणिक सदस्य से अगला कार्यक्रम पूछना चाहें तो वह सदा कुछ का कुछ बताएगा। लोक व्यवहार-व्यापार-आदि में भी असत्य का आश्रय लोग धड़ल्ले से लेते हैं। सरकारी दण्ड विधान से बच निकलने के लिए लोगों ने कानूनी और गैर कानूनी हजार तरकीबें ढूंढ़ निकाली हैं इतनी बहाने बाजियों के रहते, मात्र नागरिक कर्त्तव्य के नाम पर मनुष्य को नीति परायण बनाये रहना अति कठिन है। ईश्वर विश्वास और धर्म के प्रति प्रगाढ़ आस्था ही वह अवलम्बन है जिसे अपनाने के बाद बहानेबाजी के सारे रास्ते बन्द हो जाते हैं और मनुष्य घाटे पर घाटा उठाते हुए भी सत्य निष्ठा पर डटा रह सकता है। यदि आधार को उखाड़ दिया जाय तो बहानेबाजी में प्रवीण व्यक्ति अनुचित को उचित सिद्ध करने और अकर्म को कर गुजरने में हिचकिचायेगा नहीं। यह बाँध टूटा तो पानी किसी भी रास्ते कितना ही बिगाड़ करते हुए कहीं भी बह सकता है।

स्वर्ग नरक-पुनर्जन्म-देर सवेर में कर्मफल की अनिवार्यता और सुनिश्चितता की भावना अन्तःकरण में जमाते हैं और उन रस्सियों से बँधने के उपरान्त मनुष्य औचित्य से डगमगाता नहीं। अन्यथा अनास्था अपना लेने के उपरान्त न स्वर्ग का प्रलोभन सामने रहता है और न नरक का भय। किये हुए दुष्कर्मों का प्रतिफल यदि हाथों-हाथ नहीं मिला तो यह सोचा जा सकता है कि कभी भी नहीं मिलेगा। इस आधार पर अपराधी दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने की हिम्मत दिन-दिन बलिष्ठ होती जाती है। तुरन्त दण्ड न भोगना पड़ा इसका अर्थ यही हो सकता है कि कभी भी नहीं भोगना पड़ेगा। समाज को बहकाया जा सकता है। उसे कुछ का कुछ सिद्ध करके विरोधी से प्रशंसक बनाया जा सकता है। सरकार के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या? सौ अपराधियों पीछे कुछ ही पकड़े जाते हैं और एक दो प्रतिशत ही राज-दण्ड पा लेते हैं। जो पा लेते हैं उनकी शर्म उतर जाती है और पूरे ढीठ हो जाते हैं। जेल जाने पर तो अपराधों की कला में प्रवीण पारंगत लोगों की संगति और शिक्षा के अंतर्गत जो कमी कच्चाई थी उसे भी पूरी कर लेते हैं। इन सब तथ्यों को देखते हुए मनुष्य को हर हालत में नीति निष्ठ बनाये रहने के लिए आस्तिकता अपनाने का एक ही मार्ग रह जाता है। आस्तिकता और धार्मिकता प्रकारान्तर से एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं। धर्म और ईश्वर विश्वास पर टिका है और ईश्वर की सच्ची मान्यता हृदयंगम करने के उपरान्त ही धर्म परायण रहने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं बचता।

यह भ्रम जंजाल साम्प्रदायिक लोगों का बुना हुआ है कि अमुक कर्मकाण्ड कर लेने के उपरान्त पाप कर्मों का दण्ड नहीं भुगतना पड़ता। हमारे सम्प्रदाय वाला ईश्वर अपनी बिरादरी वाले सभी को क्षमा कर देता है और मुफ्त में ही उस स्वर्ग में पहुँचा देता है जिसमें आदि से अन्त तक भोग-विलास एवं ऐशो-आराम ही भरा पड़ा है। सच्चे धर्म का सच्चा ईश्वर कर्मफल की अनिवार्यता समझाता है। उसमें कहीं छूट की गुंजाइश है तो उसका प्रायश्चित के अतिरिक्त और कोई रास्ता नहीं है। समाज को पहुँचाई गई क्षति की पूर्ति करना न्यायानुकूल है। खोदी हुई खाई को जो पाट देता है उसकी ईमानदारी कठिन मार्ग को सरल बना सकती है। पुण्य अथवा पाप का परिणाम तुरन्त न मिले तो परलोक में अथवा अगले जन्म में मिलने का विश्वास मनुष्य को कुमार्गगामी होने से बहुत कुछ रोकता है।

धर्म धारणा को वैयक्तिक चरित्र निष्ठा और सामाजिक सुव्यवस्था का राजमार्ग समझा जाना चाहिए। इसमें अन्ध-विश्वास जैसी कोई बात नहीं है। फिर हर बात की अच्छाई-बुराई उसके प्रतिफल को देखकर ही आँकी जाती है। जिस कसौटी पर विकृतियों से भरी हुई वर्तमान साम्प्रदायिकता हेय ठहरती है और उसकी अवज्ञा अवमानना का औचित्य स्वीकार किया है। उसी कसौटी पर ईश्वर, कर्मफल, स्वर्ग-नरक, पुनर्जन्म जैसी मान्यताओं वाला धर्म अपनी उपयोगी प्रतिक्रियाओं के कारण श्रेयस्कर माना जायेगा।

एक क्षण के लिए यदि ईश्वरवादी धर्म को प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर शत-प्रतिशत सही सिद्ध न किया जा सके तो भी उसकी उपयोगी प्रतिक्रियाओं के कारण उसे प्रत्यक्ष सत्य ही माना जायेगा और धर्म की उपयोगिता से किसी भी प्रकार इनकार न किया जायेगा। धर्मवादी नीतिवान आदर्शों पर अवलम्बित है तो उसे हर दृष्टि से प्रशंसनीय और अपनाने योग्य ही कहा जायेगा।




विवेकानन्द गुजर रहे थे (kahani) - Akhandjyoti May 1985

काशी की जिस गली में होकर विवेकानन्द गुजर रहे थे, उसमें बन्दरों का झुण्ड बैठा मिला। स्वामी जी डरकर लौटने लगे तो झुण्ड उनके ऊपर चढ़ दौड़ा और कई जगह काटा और कपड़े फाड़ डाले।

घर में से निकलकर एक व्यक्ति आया। बोला- ‘‘भागो मत। घूँसा तानकर उनकी ओर बढ़ो।” स्वामीजी ने वैसा ही किया। फलतः बन्दर पीछे हटे, भागे और विवेकानन्द गली पार गये।

इस घटना को स्वामीजी बड़े चाव से सुनाते और कहा करते- प्रतिकूलताओं को देखकर भागों मत-घूँसा तानकर आगे बढ़ो।




ब्राह्मी चेतना का विस्तार कार्य व्यवहार - Akhandjyoti May 1985

अपने सूर्य जैसे लगभग 500 करोड़ ताराओं, सौर मण्डल तथा अकल्पनीय विस्तार वाले धूल तथा गैस वर्तुलों के मेघों के मिलने पर एक आकाश गंगा बनती है। ऐसी 10 करोड़ से अधिक आकाश गंगाओं तथा उनके मध्य के अकल्पनीय आकाश को एक ब्रह्मांड कहा जाता है। यह ब्रह्मांड कितने हैं? इस प्रश्न के उत्तर में प्रश्न कर्ता से ही उल्टा प्रश्न पूछना पड़ेगा। आपके नगर में रेत के कण कितने हैं? मनुष्य की बुद्धि एवं कल्पना इस स्थान पर थक जाती है। इसलिए दर्शन वे उसे ‘नेति’‘नेति’ एवं विज्ञान ने उसे ‘अनन्त’ कहा है। अध्यात्मवाद ने इस समस्त रचना को ही नहीं उसके स्वामी, नियन्ता, रक्षक को भी ‘अनन्त’ नाम से सम्बोधित किया है।

खगोल विज्ञानियों के अनुसार अपनी पृथ्वी को एक गैस बादल से समुद्र का, विष गोलक का, रूप धारण प्रायः 11 अरब वर्ष हुए हैं। सौर मण्डल के अन्य सदस्यों का जन्म भी प्रायः एक साथ हुआ इससे उनकी आया भी वही मानी जायेगी इसके अपवाद भिन्न-भिन्न ग्रहों में भिन्न-भिन्न संख्या में देखे गये। चन्द्रमा हो सकते हैं जो बाद में बनते रहे हैं। पृथ्वी के चन्द्रमा के सम्बन्ध में कहा जाता है कि समुद्र वाले गड्ढे से टूट कर अन्तरिक्ष में विचरण करने वाला पदार्थ भर है। जो गिर तो पड़ा पर पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण परिधि को लांघ न सकने के कारण उसी के इर्द-गिर्द परिभ्रमण करने लगा। यही बात अन्य ग्रहों के चन्द्रमाओं के सम्बन्ध में भी लागू होती है।

पृथ्वी की परिधि भूमध्य रेखा पर 4076 कि.मी. और ध्रुवों पर 40000 कि.मी. है। उसका व्यास भूमध्य रेखा पर 12753 कि.मी. है। धरातल क्षेत्रफल 51 करोड़ 2 लाख वर्ग कि.मी. है। सूर्य की परिक्रमा करते हुए उसकी गति 100191 कि.मी. प्रति घण्टा है। इतनी विशाल हमारी पृथ्वी सौर मण्डल के मध्य में नहीं है वरन एक कोने में पड़ी है। ठीक इसी प्रकार अपना सौर मण्डल भी मन्दाकिनी आकाश गंगा के ठीक मध्य में अवस्थित न होकर एक कोने में पड़ा है। सूर्य प्रति सेकेंड 220 किलोमीटर की गति से अपने सौर मण्डल सहित आकाश गंगा केन्द्र की परिक्रमा करता है। इस संदर्भ में समझा जा सकता है कि जब से धरती पर मनुष्य का जन्म हुआ है तक से लेकर अब तक उस केन्द्र की एक परिक्रमा भी पूरी नहीं हो पाई है। अपनी आकाश गंगा केन्द्र से यह सौर मण्डल 30 हजार प्रकाश वर्ष हटकर है।

अपनी आकाश गंगा ध्रुव द्वीप की 19 आकाश गंगाओं में से एक है। पर ऐसे ध्रुव द्वीप भी विराट् में असंख्य बिखरे पड़े हैं। माउण्ट पैलोमर पर लगी हुई 200 इंच व्यास के लैंस वाली संसार की सबसे बड़ी हाले दुर्बीन से पता लगाया गया है कि विराट् में कम से कम एक अरब आकाशगंगाऐं हैं।

विशालता की माप का पैमाना लगा लिया जाय, यह मानवी बुद्धि की समझ में सहज ही नहीं आता। 13000 किलोमीटर व्यास वाली हमारी पृथ्वी के मुखिया सूर्य का स्वयं का व्यास 13,90,000 किलोमीटर है। एवं उसकी कुल परिधि 2700000 मील है। अनुमानित भार 19 करोड़ 98 लाख महाशंख टन। वह अपनी धुरी पर 25 दिन 7 घण्टे 48 मिनट में एक चक्कर लगाता है। उसकी सतह पर 600 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान है और मध्य गर्भ में 1500000 डिग्री सेंटीग्रेड। वह दो सौ मील प्रति सेकेंड की उड़ान उड़ता हुआ महा ध्रुव की परिक्रमा में निरत है। यह परिक्रमा 25 करोड़ वर्ष में पूरी होती है। इस परिक्रमा में उसके साथी और भी कई सूर्य होते हैं जिनके अपने-अपने सौर मण्डल भी हैं।

पृथ्वी से सूर्य 109 गुना बड़ा है। दोनों के बीच की दूरी 93000000 मील है। यदि हम 600 मील प्रति घण्टे की गति से उड़ने वाले अपने तीव्रतम वायुयानों में बैठकर लगातार उड़ें तो उस दूरी को पार करने में 18 वर्ष लगेंगे।

एक और उदाहरण बृहस्पति का लें। बृहस्पति का व्यास 88 हजार मील है। उस पर हजारों मील गैस के बादलों की परत छाई हुई है। सूर्य से 48 करोड़ 30 लाख मील दूर होने के कारण वहाँ गर्मी पहुँचाने वाली किरणें बहुत स्वल्प मात्रा में पहुँचती हैं इसलिए वह अत्यधिक ठण्डा है। अन्य ग्रह सूर्य के समीप हैं। हमारी पृथ्वी मात्र सवा नौ करोड़ मील दूर है। मंगल 14॥। करोड़ मील, शुक्र 6॥। करोड़ मील और बुध 3॥। करोड़ मील है। अत्यधिक दूरी होने कारण सूर्य साम्राज्य में रहते हुए भी बृहस्पति बहुत बातों में आत्म निर्भर है। उसे पूरा औपनिवेशिक स्वराज्य मिला हुआ है कॉमनवेल्थ का वह सम्मानित सदस्य होते हुए भी अपने बलबूते पर ही अपना क्रिया-कलाप चलाता है।

हमारे सौर परिवार में 9 ग्रह, 61 उपग्रहों के अतिरिक्त 1500 छोटे-छोटे ग्रह पिण्ड और भी हैं जिन्हें मध्य ग्रह अथवा एरटेराइड्स कहते हैं। पुच्छल तारे, उल्काएँ एवं अन्तरिक्षकीय इन्हीं के अंतर्गत आते हैं। इस समूचे सौर-मण्डल का व्यास 1 शंख, 18 अरब किलोमीटर है। ये सभी मन्दाकिनी आकाश गंगा से प्रकाश पाते हैं।

जिसे आकाश कहा गया है, जिसमें ब्रह्माण्ड समाया हुआ है, उसे समझने-समझाने की दृष्टि से चार मूल विभाजनों में बाँटा जा सकता है।

प्रथम क्षेत्र में तो हमारी धरती, उसका वायुमण्डल, चुम्बकीय क्षेत्र आता है। ऊपरी वायुमण्डल का अधिक भाग आवेशित परमाणुओं, अणुओं और इलेक्ट्रोनों से बना हुआ है। आकाश के इस क्षेत्र में पदार्थ के अस्तित्व का पता आसानी से चल जाता है।

दूसरा क्षेत्र है- सौर-मण्डल के ग्रहों के बीच में फैला हुआ भाग। यह क्षेत्र सूर्य के बाहरी परि-मण्डल (कोरोना) से निरन्तर खिसकने वाली पतली और फैलने वाली गैस से भरा हुआ है। इसे ‘प्लाज्मा’ या सौर वायु कहते हैं। इसी हवा के कारण पुच्छल-तारों की पूंछें सदा सूर्य से विपरीत दिशा में रहती हैं। यही हवा पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को भी पूँछ की शक्ल का पुच्छलतारा बना देती है।

तीसरा क्षेत्र है- पृथ्वी और सूर्य के बीच की, दूरी से प्रायः 50 गुना- सौर मण्डल से आगे हमारी आकाश-गंगा में जुड़े तारों के बीच का भाग, यहां भी तारों के बीच के भाग में पदार्थ के उदासीन और आवेशित कणों से बनी हुई पतली गैस है।

चौथा क्षेत्र वह आकाश है- जिसमें हमारी आकाश गंगा जैसी अन्य अगणित आकाश-गंगाऐं और उनसे सम्बद्ध असंख्यों चित्र-विचित्र ग्रह-नक्षरेत्रभ पड़े हैं। तारे व नक्षत्र दोनों भिन्न-भिन्न हैं। जहां तारे अपनी रोशनी से चमकते हैं, वहाँ नक्षत्रों में अपनी रोशनी नहीं होती। वहाँ तारकों की धूप के प्रकाश में आते हैं, तभी प्रकाशवान होते हैं एवं हमें वैसे टिमटिम करते दिखाई पड़ते हैं।

उस आकाश जिसमें हम ब्रह्माण्ड को संव्याप्त मानते हैं, अर्से से भिन्न-भिन्न मान्यताओं के कारण भिन्न रूपों में देखा जाता रहा है। आज यदि उन्हें हम सुनें तो हँसी आ जायेगी। आकाश के बारे में अतीतकाल के यूनानी लोगों की मान्यता थी कि बादलों में निवास करने वाले देवताओं का सारे आकाश पर राज्य है। वह लोहे की तरह कड़ा है और धरती के केन्द्रों पर टिका है।

मैक्सिकोवाली 22 आकाश मानते थे धरती से ऊपर 13 आकाश स्वर्ग है जिनमें से सिर्फ पहला ही आँखों से दिखता है। धरती के नीचे 9 आकाश हैं जो नरक हैं।

दक्षिण अमेरिका के रैड इण्डियन सात आकाश मानते हैं जिनमें से पाँच पृथ्वी के ऊपर दो नीचे हैं। वे इनके रंग भी भिन्न बताते हैं क्रमशः नीला, हरा, पीला, लाल, सुनहरा, बैगनी और सफेद। इन सबके अधिपति अलग-अलग आकृति-प्रकृति के देवता लोग हैं।

इसी प्रकार धरती व उसका अन्यान्य ग्रहों से क्या सम्बन्ध है, यह भी विवाद का विषय रहा है। प्रतिपादन के विरोध में भांति-भांति के आन्दोलन हुए हैं, प्रतिपादन वार्ताओं को यातनाएँ भी करनी पड़ी थी। कोपर्निकस अन्यान्यों की अपेक्षा प्रत्युत्पन्न मति होने के कारण बच गए परन्तु मरणोपरान्त उन पर अनेकों अभियोग लगाए गये। पहली बार पृथ्वी के भ्रमणशील होने का प्रतिपादन पोलैंड निवासी कोपर्निकस ने किया और इसके प्रमाण तर्क का प्रतिपादन उसने अपने ग्रन्थ ‘आकाश मण्डल में भ्रमण पथ पर’ नामक ग्रन्थ में किया। उसे अनुमान था कि इस प्रतिपादन से पुरातन पंथी ईसाई समाज उसका घोर विरोध करेगा इसलिए उसने चतुरता से काम लिया, उस रोम के पोपपाल तृतीय को समर्पित किया और ऊपर से ऐसी लीप-पोती की, प्राचीन प्रतिपादन का खण्डन होते हुए भी कटुता उत्पन्न नहीं हुई। पोप की आड़ में कुछ दिन तो वह चाल सफल रही पर पीछे जैसे ही उसे लोगों ने बारीकी से पढ़ा वैसे ही ईसाई धर्म के दोनों ही वर्ग प्रोटेस्टेंट और रोमन कैथोलिक उसके विरोध में हाथ धोकर पीछे पड़ गये। अन्ततः पोप के आदेश से उस पुस्तक को जब्त कर लिया गया। प्रतिपादन कर्ता पर वे अपराध लगाये गये जिनका फल उसे मृत्यु दण्ड ही भुगतना पड़ सकता था। अच्छा इतना ही हुआ अपराध लगाये जाने से 73 वर्ष पूर्व ही कोपर्निकस मर चुका था। अन्यथा उसे भी धरती को भ्रमणशील बताने वाले एक अन्य खगोलज्ञ बूनी की तरह जीवित जला दिया जा सकता था। ऐसे ही प्रतिपादनों पर गैलीलियो को भारी उत्पीड़न सहने पड़े थे। ऐसे अनेकों वैज्ञानिकों ने सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी तक ज्योतिर्विज्ञान सम्बन्धी अपनी मान्यताओं पर प्रतिवाद के थपेड़े सहे हैं, पर अन्ततः इस विकास क्रम में ब्रह्मांड भौतिकी का ढाँचा भली प्रकार उभरकर आ सका। इसका श्रेय पूरी तरह मानवी अन्वेषण बुद्धि को जाता है जो विराट् के दर्शन अनुसन्धान में सतत् लगी रही।

ब्रह्माण्ड का 99 प्रतिशत भाग शून्य है। एक प्रतिशत भाग को ही ग्रह-नक्षत्र घेरे हुए हैं। अनुमान है कि आकाश में सूर्य जैसे अरबों तारकों का अस्तित्व है। वह तारे आकाश गंगाओं से जुड़े हैं। वे उसी से निकले हैं और उसी से बंधे हैं। मुर्गी अण्डे देती है उन्हें सेती है और जब तक बच्चे समर्थ नहीं हो जाते उन्हें अपने साथ ही लिए फिरती है। आकाश गंगाऐं ऐसी ही मुर्गियां हैं जिनके बच्चों की गणना करना पूरा सिर दर्द है। हमारी आकाश गंगा एक लाख प्रकाश वर्ष लम्बी और 20 हजार प्रकाश वर्ष मोटी है। सूर्य इसी मुर्गी का एक छोटा चूजा है, जो अपनी माता से 33000 प्रकाश वर्ष दूर रहकर उसकी प्रदक्षिणा 170 मील प्रति सेकेंड की गति से करता है। आकाश गंगाऐं भी आकाश में करोड़ों हैं। वे आपस में टकरा न जायें या उनके अण्डे-बच्चे एक-दूसरे से उलझ न पड़े इसलिए उनने अपने सैर-सपाटे के लिए काफी-काफी बड़ा क्षेत्र हथिया लिया है। प्रायः ये आकाश गंगाऐं एक-दूसरे से 20 लाख प्रकाश वर्ष दूर रहती हैं।

अनन्त आकाश में गतिशील आकाश गंगाओं में एक अपनी-अपने सौर मण्डल की भी है, जिसकी चाल 24,300 मील प्रति सेकेण्ड नापी गयी है। इस तरह ब्रह्माण्ड चेतन तो है ही, निरन्तर फैल भी रहा है, इसकी हर इकाई गतिशील है। निष्क्रियता कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होती।

इसी कारण वैज्ञानिक कहते हैं कि अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों की तरह ही अपने इस सौर-मण्डल का भी सृजन हुआ है। वाष्पीय महामेघ न केवल अपने केन्द्र में फटा वरन् उसके टुकड़े भी उसी क्रम से फटते चले गये। अपने-अपने उद्गम केन्द्र के इर्द-गिर्द उसकी आकर्षण शक्ति के कारण परिभ्रमण करने की स्थिति में फँसते चले गये। विस्फोट के जिस क्रम से वितरण फैलना है उसी अनुपात से आकर्षण भी उत्पन्न होता है। वह अपने परिकर को एक सीमा तक ही बिखरने देता है। इसके बाद सभी को एक सूत्र में समेट लेता है और परिवार क्रम के अनुरूप निर्वाह करने लगता है। ब्रह्माण्ड में विद्यमान अनेकानेक सौर-मण्डलों के सम्बन्ध में यह घटना क्रम घटित हुआ है।

इसका स्पष्टीकरण देते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि परमाणु के इलेक्ट्रान जिस प्रकार चक्कर लगाते-लगाते स्थान बदलते रहते हैं, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड में भी जो गतिशीलता के साथ-साथ परिवर्तन क्रम दृष्टिगोचर होता है, वह “ला आफकाजेशन” से परे होता है। अर्थात् विद्युत जहाँ एकवद्ध तत्व है, वहाँ उसकी अपनी इच्छा और चेतनता भी है, भले ही वह विद्युत तत्व से कोई सूक्ष्मतर स्थिति हो और अभी उसका अध्ययन एवं जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं हो पाई हो। इस मौलिक स्वाधीनता को “ला आफ इन डिटरमिनेसी” के नाम से पुकारा जाता है और उसी के आधार पर अब वैज्ञानिक भी कहने लगे हैं कि विश्व की सभी वस्तुयें एक-दूसरे में सम्बद्ध परस्पर अवलम्बित और एक ही संगठन में पिरोई हुई हैं। सारा संसार अर्थात् पृथ्वी से लाखों दूर के नक्षत्र तक गणित के सिद्धाँतों से बंधे हुए हैं, वैज्ञानिक तब यह मानने को विवश हुए कि सम्पूर्ण जगत एक ही रेशनल सिस्टम के द्वारा संचालित है। प्रकृति में पूर्ण व्यवस्था और नियमबद्धता है और वह सब किसी विश्वव्यापी, स्वयं-भू, शक्ति मानव सत्ता के ही अधीन है।




पुरातन भारत ज्ञान और विज्ञान का घनी था - Akhandjyoti May 1985

यह मान्यता सही नहीं है कि विज्ञान का अनुसन्धान पिछले कुछ ही शताब्दियों में हुआ है। इससे पूर्व मनुष्य भी अन्य वन जन्तुओं की तरह फिरता रहता था और जैसे-तैसे पेट भरने और तन ढकने के साधन जुटा पाता था। भाषा और शिक्षा का विकास भी कुछ ही समय पूर्व हुआ था। इस प्रतिपादन से आधुनिक शताब्दियाँ ही अपनी बुद्धिमत्ता पर गर्व कर सकती हैं और इससे पिछले लोगों को अधिक से अधिक इतना श्रेय देती हैं कि वे कृषि करना और पशु पालना, आग जलाना तथा कुछ धातुओं के उपकरण बनाना भर जानते थे।

किंतु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। मनुष्य का भूतकाल इतना दरिद्र नहीं है और न हमारा वर्तमान ही इतना बुद्धिमान और साधन संपन्न है, जिस पर उसे असाधारण गर्व करने का श्रेय दिया जा सके।

हिमयुग आने, समुद्र उफनने जैसे घटनाक्रम कई बार घटित हुए हैं जिनके कारण धरातल की स्थिति बदल गई। महाद्वीपों का स्वरूप कुछ से कुछ हो गया और बुद्धिमान-जनों का अनुपात घट गया। विपन्न प्राकृतिक परिस्थितियाँ जब जब आती रही हैं। उन्हीं में से किसी की विपन्नता को सृष्टि का आरम्भ मान लिया जाना यथार्थता नहीं है।

उदाहरणों में कुछ शताब्दियों और सहस्राब्दियों पूर्व के उदाहरण अभी भी ऐसे विद्यमान हैं जो आधुनिक वैज्ञानिकों को चुनौती देते हैं कि वे अधिक नहीं तो इन निर्माणों का आधार और सिद्धान्त ही बतायें कि यह किस प्रकार सम्भव हो सका।

हमारे देश की ऐतिहासिक कुतुबमीनार के बारे में पता लगाया गया है कि यह पुरातन काल में वेधशाला हेतु बनाई गई थी। यहाँ के एक पुरातत्व वेत्ता के अनुसार यह ग्रह, तारों के अवलोकनार्थ और भूमि सर्वेक्षण में अधिवेशन बिन्दु के कार्य हेतु बनाई गई थी।

भारत के पुरातत्वीय विभाग के श्री जे. बी. श्रीवास्तव जो कि कुतुब के परिरक्षक भी हैं ने जानकारी देते हुए बताया कि गोलाकार मीनार के विभिन्न तलों पर बहुत से रेखा छिद्र हैं जो वास्तव में प्रकाश छिद्र हैं जिनका उपयोग विभिन्न प्रकार की खपिण्डों से प्रकाश ग्रहण करने के लिए होता है।

कुतुब मीनार में (5) पाँच तल हैं जिनमें से प्रत्येक तलों में बहुत से छेद बने हुए हैं उदाहरणार्थ प्रथम तल में (36) छत्तीस, द्वितीय तल में (48) अड़तालीस, इनका उपयोग खपिंडों के विभिन्न प्रकार के प्रचलनों के अध्ययन तथा अवलोकनार्थ किया जाता था, जैसे उनके गति या चाल और कोण का वितरण करेगा।

जब प्रकाश किरणें किसी तारे या गृह से अभिलंब किसी छिद्र पर गिरती हैं तभी विपरीत दीवार पर रेखा छिद्र का सटीक चित्र देखा जा सकता है यह इसी सिद्धान्त का कार्य करता है। उदाहरण के लिए सूर्य के बिन्दु पथ का अध्ययन किया जा सकता है जो इस प्रकार है- पृथ्वी तल पर चार छेद, पांचवें तल पर चार छेद और मुख्य रेखा छिद्र मीनार के शीर्ष पर करते हुए।

कुतुब भूमि सर्वेक्षण में किस प्रकार से सहायक हो सकता है इसे समझाते हुए उन्होंने कहा कि कुतुब सरलतापूर्वक अपनी अवस्थिति के कारण स्थिति हो सकता है क्योंकि यह चुम्बकीय योम्योत्तर के समानान्तर है जो कि 28 डिग्री विषुवत् रेखा के उत्तर में है और इसकी अपेक्षा इसकी अनन्य सम्पत्ति यह है कि प्रतिवर्ष (बाइस जून) को अपनी छाया का निक्षेपण नहीं करता। सर्वेक्षण में एक अधिदेशन बिंदु जैसे अनुमार्गणीय प्रसंग जुड़ा हुआ है। कुतुब का उपयोग “स्थित प्रकाशीय भवन” या मीनार, अभिलंब बिन्दुओं के पता लगाने में और भूमि सर्वेक्षण में “क्रास स्टाफ” के रूप में किया जा सकता है।

ऐसा लोहा जैसा कुतुब मीनार में लगा है अभी तक किसी भी धातु संस्थान में नहीं बना है। ग्रह-नक्षत्रों की गतिविधियों की ऐसी सही माप कर सकना, कुतुब मीनार जैसे साधनों से किस प्रकार सम्भव है। ऐसा निर्माण करने वाले मात्र गड़रिये रहे होंगे यह कहना कहाँ तक उचित है?

मिश्र के पिरामिडों के सम्बन्ध में भी ऐसे ही रहस्य हैं। उस क्षेत्र से दूर-दूर एक वैसे पत्थरों की कोई पहाड़ी नहीं है। फिर उस निर्माण सामग्री को कहा से लाया गया और इतने भारी पत्थरों को किस प्रकार इतनी ऊँचाई तक उठाया गया। इसका अनुमान करने तक में मानवी बुद्धि असमर्थ है।

बिना ऊर्जा व मशीन के भी प्राचीन काल से जनशक्ति के सहारे ही इन स्मारकों का निर्माण हुआ है। गिजा का विशाल पिरामिड ईसा के 2500 वर्ष पूर्व बना था, जिस समय इजिप्ट लोगों को चक्का अथवा घिरनी आदि की तरह जानकारी नहीं थी। यह पिरामिड लगभग 13 एकड़ 5.3 हेक्टेयर) क्षेत्र में बना है तथा इसमें चूना पत्थर व ग्रेनाइट के 23 लाख विशाल खण्ड लगे हैं। जिनका वजन 5000 पौंड (2000 किलो ग्राम से भी अधिक) होता है। इनको ढूंढ़ने, ढोने तथा निर्मित करने को प्रक्रिया के विषय में अब तक विस्मय ही बना हुआ है। मूलतः उनमें कार्यों व जन-शक्ति को सुसंगठित करने की अद्भुत क्षमता का अनुमान लगाया गया है।

ग्रीक व रोमन लोगों ने भी कई स्मारकों का निर्माण किया है, जिससे कुशल संगठन की झलक मिलती है।

ईसा पूर्व 2650 में ग्रीक का एक राजा खूफू था। उसके हाथ में अकथित शक्ति व धन विद्यमान था। इजिप्ट का समस्त जमीन इस राजा द्वारा ही शासित था।

खूफू ने अपने शासन काल में अपने लिए एक मकबरा निर्मित करवाया था। इस निर्माण में लगभग 1 लाख व्यक्ति 20 वर्ष तक संलग्न थे। इस मकबरे में किसी भी अन्य व्यक्ति का प्रवेश वर्जित था। यह सदा के लिए राजा के मतलब का बना रहा।

पिरामिड का निर्माण लगभग 13 एकड़ जमीन में हुआ है तथा एक तरफ की नींव 755 फीट का रखा गया है। पिरामिड की ऊँचाई 400 फीट है, जो आधुनिक 48 मंजिल ऊँची गगनचुम्बी भवन के सदृश दृष्टिगोचर होता है। अनुमानतः 23 लाख चुना-पत्थर इस निर्माण में लगाये गये जिसका औसत वजन ढाई टन है।

अहमदाबाद और घीसा की हिलती दीवारों और इमारतों के पीछे क्या रहस्य हो सकता है। इसका भी अभी कारण नहीं ढूंढ़ा जा सका।

लोक-लोकान्तरों तक आने-जाने के उपाय क्या हो सकते हैं इस सम्बन्ध में अभी किसी ने सही कल्पना भी नहीं की है। जबकि पुरातन काल के लोग ब्रह्माण्डीय ब्लैक होलों से भली प्रकार परिचित थे और यह जानते थे कि उनमें से कौन-सा छिद्र कब पृथ्वी के निकट किन दिनों आयेगा और कब वापस लौटेगा। गन्तव्य स्थान तक पहुँचने के लिए किन ब्लैक होने का परिवर्तन करना पड़ेगा। यह गणित उन्हें मालूम था और यह भी पता था कि अधिक विकसित छिद्र इस ब्रह्माण्ड में कहां-कहां रहते हैं?

गत कुछ वर्षों में ज्योतिर्विदों ने कई संकेत एकत्रित किये हैं, जिनसे यह पता चलता है कि विस्तृत आकाश में एक नहीं, कई ब्लैक होल हैं। अब यह आभास होने लगा है कि यह तारकीय अनोखापन अपनी आकाश गंगा के क्षेत्र में भी स्थिर हो सकता है।

आकाश गंगा, पृथ्वी से प्रायः 30,000 प्रकाश वर्ष दूर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सेटेलाइट इत्यादि की सहायता से यह पता चला है कि उस स्थल से कई प्रकार के विकिरण निकलते रहते हैं। वैज्ञानिकों के विचार से वहाँ कोई ऐसी वस्तु है जो आकाश गंगा के अन्तरतम क्षेत्र से गैस और धूल खींचती है, जिससे पदार्थ का एक गरम भँवर बन जाता है जो विकिरण छोड़ता है।

‘ब्लैक होलों’ में गुरुत्वाकर्षण इतना तीव्र होता है कि प्रकाश भी उससे बच नहीं सकता है, अतः इस तरह की वस्तु का सीधे निरीक्षण नहीं किया जा सकता। ब्लैक होल गोला भी नहीं होता। ब्लैक होल में हमारे सूर्य की अपेक्षा पाँच गुना द्रव्यमान होता है, जिसका व्यास केवल 20 किलोमीटर होता है।

अमेरिका स्थित वैज्ञानिकों ने खोज की है कि गिरते हुए तारे का भार उसके अणु भागों को तोड़ने के लिये सूर्य की अपेक्षा 1.2 गुना होना चाहिये। जब कोई तारा जिसका भार सौर भार की अपेक्षा तीन गुना होता है, यदि वह उसी के भार के कारण क्षीण होता है तो वह “ब्लैक होल” बन जाता है। अंतर्ग्रही ही यातायात के लिए इन्हीं ब्लैक होलों की सही स्थिति जानने पर उनसे सड़क का काम बिना किसी वाहन के लिया जा सकता है।

अमेरिका के निकट वारमूडा क्षेत्र में मात्र किसी ब्रह्माण्डीय चुम्बकधारा की जानकारी मिली है। किन्तु ब्लैक होलों की शक्ति उससे अनेक गुनी बड़ी है और वह किसी छोटे-मोटे ग्रह के अति निकट कुछ क्षण के लिए भी आ जाय तो वहाँ बहुत कुछ खींच ले जा सकती है या वहां बहुत कुछ उगल सकती हैं। ऐसी दशा में जो लोग इन सड़कों के माध्यम से अन्तर्ग्रही यात्राएँ करते रहे होंगे वे कितने बुद्धिमान रहे होंगे इसका अनुमान लगाया जाय।

उड़न-तश्तरियां का पृथ्वी पर आना और यहाँ को स्थिति जानने तथा संपर्क साधने की बात कपोल कल्पना नहीं है। उनके प्रमाण आये दिन मिलते रहते हैं। प्राचीन काल में ऐसा अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान विज्ञान क्षेत्र में भी चलता रहा हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

एक नहीं ऐसे अगणित प्रमाण हैं जिनसे प्रतीत होता है कि प्राचीन भारत में ज्ञान और विज्ञान की बहुत ऊँची स्थिति थी वे पशुपालक मात्र नहीं थे।




राजकुमार सुकर्णव (kahani) - Akhandjyoti May 1985

अनंग देश के राजकुमार सुकर्णव वन प्रदेश में भ्रमण करते समय एक व्याध वनवासी के बाण का शिकार हो गया। साथ चल रहे अंगरक्षकों ने तत्काल व्याध का सिर काट दिया।

राजकुमार का मृत शरीर राजधानी पहुँचा तो सर्वत्र हाहाकार मच गया। राजा-रानी इतने शोकातुर हो गये कि उनने अन्न, जल त्याग दिया। निद्रा गंवा बैठे और कुछ ही दिनों में सूखकर काँटा हो गये। सभासदों ने समझाने बुझाने का बहुत प्रयत्न किया किंतु शोक किसी प्रकार घट नहीं रहा था। परम प्रिय राजकुमार के शोक में राजा का कलेजा डूबता रहता था।

राजा की स्थिति चिन्ताजनक होने से व्यवस्था लड़खड़ाने लगी और सुरक्षा का प्रश्न सामने आया।

राजा को उद्बोधन करने का उत्तरदायित्व ब्रह्मज्ञानी श्वेतार्द ने उठाया। उन्होंने राजा को स्वप्न से इस घटना से सम्बन्धित लोगों को बुलाकर कारण जानने और नये सिरे से दण्ड व्यवस्था करने का प्रस्ताव राजा के सामने रखा वे इसके लिए सहमत हो गये।

दिव्य प्रयत्नों से मृत व्याध की आत्मा बुलाई गई। उसने कहा- “मैं निर्दोष हूँ। हिरन समझकर मैंने तीर चलाया। राजकुमार की मौत ही घसीट कर मेरे तीर के मार्ग में ले आई। दोषी तो मौत है।

मृत्यु की आत्मा बुलाई गयी उसने कहा मेरा कोई दोष नहीं। कर्मफल के अनुसार सभी को मरना जीना और सुख-दुःख भुगतना पड़ता है।

कर्म देवता बुलाये गये। वे बोले शरीर से कर्म तो होता है पर वह तो जड़ है। जो होता है आत्मा की प्रेरणा से ही होता है। दोष आत्मा का है।

राजकुमार की आत्मा बुलाई गयी उसने कहा- “पूर्व जन्म में माँस भक्षण की इच्छा से एक मृग का वध हुआ। मृग को प्रतिशोध लेना था सो वह व्याध बनकर सामने आया और बदला चुकाया। दोष अन्तःकरण में उठने वाले संकल्प के ऊपर लदा। सच्चे अर्थों में इसी को दोषी पाया गया।

इस कथा को सुनकर राजा का विवेक जगा। उनने अनुभव किया, कि हर कोई अपने ही संकल्पों के फलितार्थों से जुड़ा है। सो इसी का समझा जाय, व्यर्थ का शोक-सन्ताप क्यों किया जाय।




भय-जन्य संकट प्रायः काल्पनिक होते हैं। - Akhandjyoti May 1985

बन्दर का शिकार करने के लिए चीते को कोई बहुत प्रयास नहीं करना पड़ता। जब वह थका मांदा होता है या शिकार पकड़ने की स्थिति में नहीं होता तो चुपचाप उस पेड़ के नीचे जा बैठता है जिस पर बन्दर बैठे हैं।

जो बन्दर नीचे बैठे चीते को देखते हैं वे नजर मिलते ही भयभीत होकर कांपने लगते हैं। फलतः हाथ से टहनी छूट जाती है और धड़ाम से नीचे आ गिरते हैं। गिरने पर भी वे भागने का प्रयत्न नहीं करते हैं। भय उन्हें किंकर्तव्य विमूढ़ बना देता है। स्थिति को चीता भली-भांति समझता है और उस निरीह प्राणी का निश्चिन्तता पूर्वक धीरे-धीरे भोजन करता रहता है। वे जीवित रहते और कष्ट सहते हुए भी चिल्ला तक नहीं पाते। भय के मारे जो बुरा हाल उनका हो रहा होता है उसकी तुलना में मांस नुचाने और प्राण निकलने मात्र से भी कम पड़ता है।

श्रुत कथा है कि यमराज ने मौत को एक हजार आदमी मार लाने के लिए भेजा। वह अपना काम पूरा करके लौटी थी तो मरे हुए चार हजार गिने गये। इस पर यमराज ने क्रुद्ध होकर पूछा तो मौत का उत्तर था कि उसने तो नियत संख्या में ही मारे हैं। शेष तो डर के मारे बेमौत मरकर उसके पीछे लग लिये हैं।

डर अपने आप में एक संकट है। वह पक्षाघात की तरह आक्रमण करता है और अच्छे-खासे आदमी को देखते-देखते अपंग असमर्थ बनाकर रख देता है। शीत की अधिकता से उँगलियाँ सुन्न हो जाती हैं और वे अपना काम करने में सक्षम नहीं रहती। भय भी एक प्रकार का शीत है जिसमें नसों का खून और चिन्तन का प्रवाह जम जाता है।

झाड़ी का भूत बन जाने की किम्वदंतियां कितनों ने ही सुनी हैं। अंधेरे में एकाकी चलने वाले से पीपल के पत्ते खड़खड़ाने पर भूत का उपद्रव दीखता है और झाड़ी का हिलते-डुलते चुड़ैल की हलचलें प्रतीत होती हैं। यह भीतर की आशंका की कल्पना परक परिणति है। ऐसे डर पेट में घुस पड़ने पर मनुष्य की मृत्यु तक कर सकते हैं। कितने ही लोग काल्पनिक भय से संत्रस्त होकर ऐसा अनुभव करते हैं मानो विपत्ति का पहाड़ उन पर टूटा और वे उसके दबाव से पिसकर चूर हुए। वस्तुतः ऐसा कुछ न होने पर भी लोग भयभीत होकर ऐसी परिस्थिति गढ़ लेते हैं जिसे आत्मघाती कहा जा सके। रस्सी को साँप समझकर उसकी चपेट से घबरा जाने वालों का ‘हार्ट फेल’ होते देखा गया है।

ग्रह नक्षत्रों का अनिष्ट ऊपर चढ़ बैठा। किसी ने जादू मन्त्र करके बीमारी या विपत्ति भेजी है। भूतों, देवी-देवताओं का प्रकोप वास दे रहा है। भाग्य चक्र उलटा चल रहा है। किन्हीं ने कुचक्र रचकर बर्बाद करने की योजना हाथ में ली है। मरण निकट आ गया। घाटा होने वाला है। ऐसी-ऐसी कुकल्पनाएँ करते-करते लोग अपनी मनःस्थिति अत्यधिक दीन-दुर्बल बना लेते हैं और फिर छोटी-मोटी सामान्य घटनाओं को ही बज्रपात जैसी विनाशकारी मानकर संतुलन खो बैठते हैं। यह ऐसी विपत्ति है जिससे रक्षा का काई उपाय नहीं है। बहम की दवा लुकमान के पास भी नहीं थी। भयभीत की शंका शंकित के सामने विपत्तियों के जो घटाटोप घुमड़ते रहते हैं उन्हें हटा सकना अपने अतिरिक्त और किसी के बस की बात नहीं है।

भय के पीछे वास्तविकता कम और कुकल्पना अधिक होती है। शंका डायन मनसा भूतों की उक्ति बहुत हद तक सच है। मन की दुर्बलता ही डराती और अनिष्ट की आशंका का भयानक बवंडर खड़ा करती है। इनके पीछे तथ्य प्रायः कम ही होते हैं। दूसरों द्वारा प्रस्तुत की गई गलत सूचनाएँ अक्सर तिल का ताल बना देती हैं। अपनी डरपोक मनोवृत्ति जान-बूझकर भी अनजाने में दी गई गलत सूचनाओं को न केवल सही मान बैठती है वरन् नमक मिर्च मिलाकर उसे राई से पहाड़ बना देती हैं।

डर अक्सर समय की कसौटी पर बेसिर-पैर के निकलते हैं। जो सच में वे भी ऐसे नहीं थे कि साहसपूर्वक मुकाबला करने पर उनसे निपटा नहीं जा सकता था। भय स्वयं उत्पन्न की गई ऐसी विपत्ति है जिसे सरलता पूर्वक निपटा का सकता है या कम से कम हलका तो किया ही जा सकता है।




सूक्ष्म शरीर का प्रतीक तेजोवलय - Akhandjyoti May 1985

शरीर में तापमान भी होता है और हलचल भी। इन्हीं के आधार पर जीवनचर्या चलती है। इन दोनों प्रयोजनों को साधने वाली शक्ति का नाम है (वष्यो इलैक्ट्रिसिटी) जैव विद्युत। इसका भण्डार जिसमें जितना अधिक है वह उतना ही ओजस्वी, तेजस्वी माना जाता है।

इस क्षमता को प्राण भी कहा जाता है। जब तक प्राण की मात्रा विद्यमान है तभी तक जीवधारी को प्राणी कहा जाता है। जब वह तिरोहित हो जाती है तो शरीर-लाश मात्र रहा जाता है और विकृत होकर दुर्गन्ध फैलाता है। इस दुर्गति से बचने के लिए मित्र-कुटुम्बी उसका दाह संस्कार करते या दफना देते हैं। ऐसा न किया जाय तो भीतर से ही कृमि उत्पन्न हो जाते हैं और उसे चाटकर साफ कर देते हैं। बाहर के श्वान, श्रृंगाल, चील, गिद्ध, कौए आदि भी उस पर टूट पड़ते हैं और अस्ति पिंजर मात्र शेष रह जाता है। यह दुर्गति इसीलिए होती है कि प्राण निकल जाता है। यदि वह बना रहता तो शरीर के अस्तित्व को मिटाया न जाता।

प्राण विश्वव्यापी है। उसी का एक अंश जब जीवधारी को मिल जाता है तो वह प्राणियों की तरह अपनी क्षमता का परिचय देने लगता है। यह प्राण प्रत्यक्ष शरीर में तो होता ही है उसे यन्त्र उपकरणों से जैव विद्युत के रूप में आँका और मापा जा सकता है। इसकी घट-बढ़ भी विदित होती रहती है। घटने पर दुर्बलता आ दबोचती है। इन्द्रियों में तथा उत्साह में शिथिलता प्रतीत होती है। इसकी पर्याप्त मात्रा रहने पर मन और बुद्धि अपना काम करती है। उत्साह और साहस- पराक्रम और पुरुषार्थ- अपनी प्रदीप्त गतिविधियों का परिचय देने लगता है।

मरने के बाद यह प्राण शरीर छोड़कर अन्तरिक्ष में भ्रमण विश्राम करने लगता है- स्वर्ग-नरक भोगता है और संस्कार के अनुरूप नया जन्म धारण करने की तैयारी करता है। इस अवधि में उसका अस्तित्व सूक्ष्म शरीर के रूप में बना रहता है। उसकी उद्विग्नता कभी कभी भूत-प्रेत के रूप में भी प्रकट होती रहती है।

स्थूल और सूक्ष्म शरीर आपस में गुँथे रहते हैं स्थूल शरीर एक कारखाना और सूक्ष्म शरीर उसके मोटरें घुमाने वाली बिजली। शरीर के भीतर वह कितनी है किस स्थिति में है इसे शरीर विज्ञानी सरलतापूर्वक जाँच कर सकते हैं पर क्या वह शरीर से बाहर भी पाया जाता है? इसका उत्तर हाँ में दिया जा सकता है। भाप या कुहरे के रूप में उसे विद्यमान पाया जाता है वह चमकदार भी होता है। चमकीली भाप की तरह शरीर के चारों और उसे छाया हुआ देखने के लिए अब तद्विषयक यन्त्र उपकरण भी बनने लगे हैं। इसे सूक्ष्म शरीर कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। प्राण निकल जाने पर यह चमकीला कुहरा भी समाप्त हो जाता है। सम्भवतः यही घनीभूत होकर सूक्ष्म शरीर की अनेकानेक भूमिकाएँ निभाता है।

जीवित व्यक्ति के चारों ओर इसे छाया हुआ देख सकना अब सम्भव हो गया है। यह चेहरे के इर्द-गिर्द अधिक स्पष्ट और घनीभूत होता है।

देवी देवताओं के चित्रों में उनके चेहरों के इर्द-गिर्द यह तेजस् आभा मण्डल के रूप में देखा जा सकता है। महामानवों- ऋषियों के चेहरे पर एक विशेष ज्योति छाई रहती है। इसका प्रभाव क्षेत्र दूर-दूर तक होता है। वे उसके द्वारा दूसरों को प्रभावित कर लेते हैं, आकर्षित एवं सहमत भी। विरोधियों को सहयोगी बना लेना इनके बाँये हाथ का खेल होता है। आक्रमणकारी उनके निकट पहुँचते-पहुँचते हक्का-बक्का हो जाते हैं।

रवीन्द्रनाथ टैगोर को मारने के लिए उनके विरोधियों ने एक किराये का हत्यारा भेजा वह छुरे से आक्रमण करने आया। टैगोर अपने कमरे में अकेले थे। कविता लिखने में व्यस्त थे। आंखें उठाकर देखा तो उस आक्रमणकारी का प्रयोजन समझ गये। कड़क कर कहा- “देखते नहीं मैं कितना जरूरी काम कर रहा हूँ। उस कोने में बैठ जाओ। जब मेरा काम पूरा हो जाय जब अपना काम करना। आक्रमण कारी उनके रौब में आ गया और एक कोने में बैठ गया। वे कविता लिखने में तन्मय हो गये। अब निवृत्त हुए तो सिर उठाकर उस व्यक्ति को अपना काम करने के लिए पुकारा। पर वह तो भयभीत होकर पहले ही गायब हो चुका था।

इस तेजस् को अध्यात्मवादी साधक अपनी खुली आँखों से भी देख सकते हैं और उसका स्तर देखकर किसी के व्यक्तित्व एवं मनोभावों का पता लगा लेते हैं। अब नई वैज्ञानिक खोजों के आधार पर इस तेजोवलय के आधार पर मनुष्य की शारीरिक और मानसिक रुग्णता का पता लगाने और तद्नुरूप उपचार करने लगे हैं। अध्यात्मवादी इसी तेजोवलय को देखकर उसके चिन्तन, चरित्र एवं स्तर का पता लगा लेते हैं।

चेहरे के इर्द-गिर्द विशेष रूप से और समस्त शरीर के आसपास सामान्य रूप से फैले रहने वाले इसे तेजोवलय या आभा-मण्डल को वैज्ञानिक भाषा में ‘औरा’ कहते हैं। यह चेहरे की तरह उँगलियों के पौरों में भी अतिरिक्त मात्रा में पाया गया है। हाथ का स्पर्श करके योगीजन दूसरों को कष्ट मुक्त करते हैं। इस प्रक्रिया के साथ अन्य प्रकार के आशीर्वाद भी देते हैं।

शरीर शास्त्री अब इस ‘औरा’ के सम्बन्ध में तरह-तरह की खोजें कर रहे हैं और ऐसे उपकरण बना रहे हैं जिनसे उसे देख सकना सम्भव हो सके। इस संदर्भ में हार्वर्ट एडल मैन की खोजें प्रख्यात हैं और वे प्रामाणिक भी मानी जाती हैं। उनने अपनी खोजों को एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है।

वाल्टर जान किलनर लन्दन के सेंट थामस अस्पतालों में सर्जन थे। उन्होंने अस्पताल के काम से छुट्टी लेकर इलैक्ट्रोथेपी पर काफी खोजबीन की और इसी संदर्भ में “औरा” परीक्षण को एक सशक्त माध्यम पाया।

जर्मन के वैज्ञानिक कार्लवान राइखन वाल ने तथा अमेरिका के डाक्टर एडविन वाविट ने भी इस खोज में बहुत समय लगाया और श्रम किया। उनके प्रयास से न केवल ‘औरा’ का देख सकना सम्भव हुआ वरन् मनुष्य को व्यक्तित्व सम्बन्धी अनेकों जानकारियों का प्रकटीकरण सम्भव बनाया।

डा. किलनर ने ये विधियाँ आविष्कृत की, जिनके आधार पर ‘औरा’ को अधिक अच्छी तरह सरलतापूर्वक देख सकना सम्भव हो सके। इस सम्बन्ध में अपनी खोजों का निष्कर्ष उन्होंने ‘दि ह्यूमन एटमासफियर’ पुस्तक के रूप में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।

थियोसोफिकल सोसाइटी के मान्य ग्रन्थ “सीक्रेट डॉक्टरिन’ में इस तेजोवलय को “ एथरिक डबल” के रूप में प्रतिपादित किया है। उसमें इसे मनुष्य के सूक्ष्म शरीर का आभास बताया गया है।

हार्वर्ड एडल मेन तो शारीरिक मानसिक रोगियों की जाँच-पड़ताल इस तेजोवलय का निरीक्षण परीक्षण करके किया करते थे। तद्नुसार चिकित्सा करते जो बहुत सफल रही। उनके अतिरिक्त अब अन्य विज्ञानवादी भी औरा की वास्तविकता और उपयोगिता पर सुविस्तृत शोध प्रयास करने में संलग्न हैं।

भौतिक विज्ञान में तेजोवलय की भिन्नता उसमें मिले पाये जाने वाले रंगों के आधार पर करते हैं। जिस प्रकार हर व्यक्ति के चेहरे की बनावट में भिन्नता होती है। उँगलियों के पौरों की लकीरें भी किसी की किसी से नहीं मिलती। उसी प्रकार आभा-मंडल के रंगों की गहराई हलकापन, मिश्रण आदि की भिन्नता रहती है और उस आधार पर व्यक्ति का वर्गीकरण विश्लेषण किया जाता है।

अध्यात्मवाद की एक धारा में मनुष्य के पसीने की गन्ध सूँघ करके भी उसकी शारीरिक और मानसिक स्थिति की जाँच पड़ताल की जाती है। पहने हुए कपड़े में भी यह गंध रहती है। जब तक उसे धोया न गया हो तब तक उसे परीक्षण का माध्यम बनाकर कई योगाभ्यासियों को उपचार करते देखा गया है। यह भी तेजोवलय के साथ जुड़ा होता है। कृत्रिम गंध शरीर पर लगी होने या साबुन आदि से उसे धो डालने के उपरान्त वह प्रभाव समाप्त हो जाता है तब परीक्षण सम्भव नहीं रहता।




मृतात्माओं का जीवित मनुष्य से सम्पर्क - Akhandjyoti May 1985

समझा जाता है कि मृतात्माएँ दुष्ट ही होती हैं और वे दूसरों को कष्ट ही पहुँचाती हैं। जिनसे उनका संपर्क होता है उन्हें त्रास सहना एवं भय के बीच गुजरना पड़ता है। पर यह बात आंशिक रूप से ही रही है। जिनका जीवन दुष्ट प्रयोजनों में बीता है तथा जिन्हें सदा उद्वेग-ग्रस्त ही रहना पड़ा है। वे ही अपनी खीज उतारने या बदला चुकाने के लिए भयावह रूप से प्रकट होते हैं। निकृष्ट स्तर के लोग ही मरणोपरान्त प्रेत पिशाच की योनि में जाते और कारणवश अथवा बिना कारण ही परिचितों या अपरिचितों को सताते देखे गये हैं।

किन्तु यह बात सभी मृतात्माओं के सम्बन्ध में नहीं कही जा सकती। उनमें से कितनी ही ऐसी होती हैं जिनका जीवन सन्मार्ग पर चलते हुए सत्कार्य करते हुए बीता है। वे अपनों या परायों की यथा सम्भव सहायता ही करते रहते हैं। समय-समय पर ऐसी जानकारियाँ देते रहते हैं जिससे उसका हित साधन हो। उन्हें दूसरों की सेवा सहायता करते हुए आंतरिक प्रसन्नता होती है। इसलिए वे बिना परिचय या आमन्त्रण के ही इस प्रकार के अवसर ढूंढ़ते रहते हैं उन्हें प्रसन्नता हो एवं लाभ पहुँचे।

डा. लेण्ड ने अपनी एक पुस्तक “उन्नीसवीं शताब्दी” में एक माकरी सियाँस अर्थात् प्रेतात्माओं की विचार गोष्ठी का उल्लेख किया है। उसका विवरण कुछ आत्मविद्या विशारदों से मिला, इनसे ऐतिहासिक घटनाओं के पीछे मृतात्माओं के योगदान का उल्लेख था। तथा उनके ऐसे सामयिक निर्णयों का भी विवरण था जिसमें उनने अपने-अपने जिम्मे पीड़ित एवं पिछड़े क्षेत्र बाँट लिये थे वहाँ जाकर उपयोगी सहायताऐं की थीं।

इस संदर्भ में अमेरिका से एक पत्रिका प्रकाशित हुई “साइन्स एण्ड इन्वेन्शन” उसमें ऐसी घटनाओं का विवरण छपता था जिसमें मृतकों के साथ संपर्क साधने पर जीवित लोगों को जो हानि लाभ हुआ उसका विवरण रहता था। पत्रिका ने सच्ची एवं सप्रमाण घटनाओं का विवरण भेजने वालों को 31 हजार डालर तक के पुरस्कार इस शर्त पर दिये थे कि उनकी बताई बातें प्रत्यक्ष जाँच-पड़ताल में सही सिद्ध होती हैं।

इस निमित्त एक जाँच समिति भी बनाई गई जिसके अध्यक्ष प्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं दार्शनिक जोसेफ किमिंजर थे।

किमिंजर ने प्रेतात्मा विद्या के जानकारों का एक सम्मेलन बुलाया। उन लोगों के आह्वान पर मनुष्यों से संपर्क में दिलचस्पी रखने वाली सेल्समेशन नामक एक आत्मा आई। उसने उपस्थित लोगों में से कितनों को ही चकित करने वाले परामर्श दिये। एक महिला से उनने कहा- तुम्हारी बीमारी अब बढ़ती ही जायेगी, उसका जल्दी आपरेशन करा लेना चाहिए। एक दूसरी महिला से उनने कहा- अपनी चाँदी अभी मत बेचो कुछ दिन ठहरने में तुम्हें ज्यादा पैसा मिलेगा। इसके अतिरिक्त भी उनने कितने ही उपस्थित लोगों को ऐसी बातें बताई जिनके सम्बन्ध में और किसी को कोई जानकारी न थी।

ब्रिटेन के ख्यातिनामा डाक्टर एस्टीली रॉबर्टसन की मृतात्मा से उस गोष्ठी ने संपर्क साधने में सफलता पाई। वह मध्याह्न काल एक मीडियम के माध्यम में आती थी और बिना पूछे भी आगन्तुक रोगियों के रोगों की बात बताते हुए उपचार भी सुझाती थी। इन उपचारों के आधार पर अनेकों लोगों ने अपनी कष्टसाध्य व्यथाओं से छुटकारा पाया।

थामस विलसन नामक एक मृतात्मा की कई पुस्तकें अधूरी रह गई थीं। उन्हें पूरा कराने के लिए उन्होंने टी.पी. जेन्म नामक एक साधारण शिक्षित व्यक्ति से अनुरोध किया। इसके बाद अधूरी पुस्तकों का लेखन कार्य मृतात्मा के आवेश में लिखा जाना आरम्भ हुआ। पुस्तकें पूरी हो गईं तो उनके तारतम्य और स्तर में राई-रत्ती भी अन्तर नहीं पाया गया। उन पुस्तकों की अच्छी समीक्षाऐं हुईं।

ठीक इसी प्रकार एक प्रख्यात विद्वान कुरेन ने एक अति स्वल्प शिक्षित महिला के माध्यम से ऐसी कविताऐं तथा दार्शनिक रचनाऐं लिखवाईं जिन्हें पढ़कर लोग आश्चर्यचकित रह गये।

एक अत्यन्त हैरान व्यक्ति के पूर्वजों की वसीयत एवं सम्पत्ति की जानकारी एक मृतात्मा ने दी जो उन पूर्वजों के संपर्क में थी। हैरान व्यक्ति को वह सम्पत्ति मिल गई और उसके बुरे दिल टल गये।

प्रसिद्ध लेखक जार्ज वर्नार्डशा का मरने से कुछ दिन पूर्व पैट्रेशिया नामक कनाडियन युवती से प्रेम हो गया। उनसे उसे एक बच्चा भी हुआ। किन्तु विवाह कानूनी लिखा पढ़ी में नहीं आ पाया। वह महिला जार्ज के दिये हुए आभूषणों को उनकी निशानी बताती थी। पुत्र की शक्ल जार्ज से बिल्कुल मिलती थी।

पेट्रेशिया ने अपने मकान में एक कमरा जार्ज वर्नार्डशा की आत्मा के लिए सुरक्षित रखा था। जब आत्मा आयी तो उनकी धुंधली शक्ल और धीमी आवाज कितने ही लोगों ने सुनी। जार्ज ने पेट्रेशिया की कलम से ऐसी साहित्य रचनाएँ कराईं जो उन्हीं के प्रख्यात साहित्य की टक्कर की थीं।

कैलीफोर्निया के एक इंजीनियर राबर्ट जैसी ने एक प्रेतात्मा के संपर्क में अनेकों मशीनों के नये डिजाइन बनाये साथ ही उनके आर्चीटेक्ट का काम शुरू कर दिया वे ऐसे नक्शे बनाते थे जिसे देखकर उस विषय के प्रवीण लोग भी आश्चर्यचकित रह जाते।

फ्राँस की एक महिला ऐनी को एक मृतात्मा ने संगीत और नृत्य का ऐसा अभ्यास कराया कि वह इन कलाओं में अपने समय की अतिशय प्रवीण कलाकार मानी जाती थी। इससे पहले वह कपड़े सीने का धन्धा करती थी। गायन वादन में उसकी पूर्व रुचि तनिक भी नहीं थी। पर एक रात स्वप्न में उस आत्मा ने वह कलाएँ सिखाने का वचन दिया। नियत समय पर उसे आवेश आता और वह बिना किसी अध्यापक की सहायता के अपना अभ्यास आरम्भ कर देती। उसके पास बताने वाला या गलती सुधारने वाला कोई भी न होता। जो कुछ उसने सीखा अपने बन्द कमरे में ही सीखा। नये बाजे वह उस आत्मा के ही कहने पर खरीदती। नई ध्वनियाँ उसी के मार्गदर्शन में निकालती। कुछ समय में वह अपने कार्य में अद्वितीय समझी जाने लगी। वह जिन मंचों पर जाती वहाँ से उसे अच्छी आमदनी होती। कुछ ही वर्षों के अंदर वह दर्जी न रहकर प्रख्यात कलाकार बन गई।

एक आस्ट्रिया निवासी दुकानदार पर किसी हिब्रू भाषा के प्रवीण पादरी की आत्मा का आवेश आता था। वह साधारण फ्रेंच बोल-चाल सकती थी। धार्मिक विषयों में उसे कुछ भी ज्ञान न था। पर जब हिब्रू भाषा के विद्वानों की गोष्ठी में जाता तो इस प्रकार प्रवचन कर्ता मानों ईसाई धर्म के प्राचीन ग्रन्थ उसे कण्ठाग्र हों।

मृतात्माओं से सहयोग साधने का भी एक विज्ञान है। जो उसके अभ्यस्त हो जाते हैं। साधना कर लेते हैं वे मृतात्माओं से उपयोगी वार्त्तालाप कर सकते हैं और ऐसे परामर्श एवं सहयोग प्राप्त कर सकते हैं जो आकस्मिक होते हैं और चमत्कारी कहे जाते हैं। कभी-कभी ऐसे सुयोग बिना साधना किये भी किन्हीं कृपालु आत्माओं के सहयोग से मिल जाते हैं।




सम्राट सिकन्दर (kahani) - Akhandjyoti May 1985

एक बार सम्राट सिकन्दर और उनके गुरु अरस्तू दोनों किसी घने जंगल में जा रहे थे। रास्ते में एक उफनता हुआ नाला मिला। दोनों में से उसे पहले कौन पार करे- इस प्रश्न पर विवाद उठ खड़ा हुआ। सिकंदर ने हठ किया और वही पहले पार हुआ। पीछे अरस्तू उतरे।

पार जाने पर अरस्तू ने कहा बड़ा होने के नाते उतरने की पहल मुझे करनी थी, तुमने उसमें विरोध क्यों किया?

सिकंदर ने कहा- “नाला भयानक था। उसे पार करने में पहले जाने वाले को अधिक और पीछे वाले को कम खतरा था। अरस्तू रहेंगे तो सैकड़ों सिकंदर बन सकते हैं, पर सिकन्दर तो एक भी अरस्तू पैदा नहीं कर सकता।”




शरीर से बाहर भी आत्माएँ - Akhandjyoti May 1985

देखने में प्रतीत होता है कि जीवात्मा एक शरीर के दायरे में आबद्ध है किंतु ऐसा भी देखा गया है कि वह इस दायरे को छलाँग कर दूसरे शरीर में प्रवेश कर सकता है। मृतक आत्माओं द्वारा प्रस्तुत किये गये भूतोन्माद की घटनाएँ तो अनेकबार देखने में आती हैं। समाधान कर सकने पर उनसे पीछा भी छुड़ाया जा सकता है। किंतु कभी-कभी जीवित अवस्था में भी ऐसी परकाया प्रवेश की घटनाएँ घटित होती देखी गई हैं। आवश्यक नहीं कि इस प्रकार के प्रत्यावर्तनों का परिचय सर्वसाधारण को मिले ही। जब इस प्रकार के आवेशग्रस्त व्यक्ति अपने साधारण योग्यता से भिन्न तरह के काम करने लगते हैं तब प्रतीत होता है कि इस पर कोई अतिरिक्त आवेश है और उसके प्रभाव से प्रभावित होकर वह काम कर रहा है जो सामान्य स्थिति में नहीं कर पाता।

स्वामी विवेकानन्द जब सर्व धर्म सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि बनकर अमेरिका गये, तब उन्हें अपना विषय इतने विज्ञजनों के सम्मुख प्रस्तुत करने में बड़ी झिझक लग रही थी, पर उनने अनुभव किया कि स्वामी रामकृष्ण परमहंस की आत्मा उनके ऊपर इस प्रकार उतरी जैसे शिव की जटाओं में गंगा उतरी थी। मेरे ध्यान में से एक क्षण के लिए भी परमहंस जी का ध्यान नहीं हटा। फलतः न केवल धर्म सम्मेलन में वरन् अन्यत्र भी ऐसे भाषण देने में समर्थ हुआ जिससे उस देश की सुशिक्षित जनता आश्चर्यचकित रह गई।

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के मरणोपरान्त उनकी धर्म पत्नी शारदामणि उनके स्थान पर प्रवचन करती थी। माताजी की जीवनी लिखने वाले स्वामी गम्भीरानन्द ने लिखा है कि माताजी के रूप में दर्शकों को साक्षात् परमहंस जी का दर्शन होता था। साधारण समय में वे पूर्ववत् सामान्य स्थिति में रहती थी पर प्रवचन, सत्संग या शंका समाधान में उनका कथन एवं भाव मुद्रा साक्षात् परमहंस जी जैसी हो जाती थी।

आद्य शंकराचार्य का शास्त्रार्थ मंडन मिश्र से हुआ। इसमें मंडन मिश्र पराजित हुए तो उनकी पत्नी भारती ने कहा अभी आधा शरीर बाकी है। आपको मुझसे भी शास्त्रार्थ करना होगा। भारती ने कामशास्त्र सम्बन्धी प्रश्न पूछे जिन्हें शंकराचार्य जानते न थे उनके उत्तर देने के लिए छः महीने का समय मांगा। वे एक राजा के मृतक शरीर में प्रवेश कर गये। राजा जी उठा। उन्होंने उस शरीर में काम कथा की जानकारी प्राप्त की और अपने सुरक्षित रखे गये शरीर में लौट आये। तब उन्होंने भारती के प्रश्नों का समाधान कर दिया। यह प्रयोग परकाया प्रवेश के नाम से जाना गया।

सन् 1967 के अरब इजराइल युद्ध में एक इजराइली सैनिक घायल अवस्था में अस्पताल में पड़ा था। वह अचेतन अवस्था में कुछ बड़बड़ाता रहता था। तलाश किया गया तो मालूम हुआ कि वह चीनी भाषा बोलता है जो उसने कभी भी नहीं पड़ी थी। अच्छे होने पर पता चला कि उसी लड़ाई में मरे विक्टर शैरान की आत्मा ने उसके शरीर में प्रवेश कर लिया था। शैरान चीनी भाषा जानता था। पीछे भी वह आत्मा उसी घायल शरीर में बनी रही। दोनों आत्माएँ मिल-बाँटकर एक ही शरीर से काम चला लेती थीं।

रूस के मनोविज्ञानी लियोनिद वासिल मेच में अपने प्रयोग में आई एक ऐसी महिला का उल्लेख किया है जो अजरवेजान की निवासी तथा बिलकुल अशिक्षित थीं। उस पर शाम को 7 से 9 बजे तक ऐसा आवेश आता था कि दो घण्टे लैटिन भाषा में ऐसे प्रवचन करती थी जैसे कोई उच्च शिक्षित ही कर सकता है।

भारत के पिछड़े समाज में अक्सर भूतोन्माद आते हैं। तब उन्हें ढोंग समझा जाता है, किन्तु अमेरिका फिल्म उद्योग में संलग्न कलाकारों को कोई ऐसा ढोंगी नहीं कह सकता। उनमें से कइयों को मृतात्मा का पाला पड़ा है और वे अपने अनुभव में आई प्रत्यक्ष घटनाओं की सचाई पर पूरा विश्वास करते हैं। सि अल्ले ड्राइव में मकान नं0 10050 में एक महिला शैरोटेड की हत्या हुई थी। उसकी सिसकियों की आवाज अभी भी पड़ौसियों को सुनाई देती है। उसके साथ और भी कई व्यक्ति मारे गये थे। उनकी आत्माएँ भी उसी घर में रहती हैं। किसी और आदमी को उस घर में आने और रहने नहीं देती। उस मकान की उपरोक्त दुर्घटना के बहुत दिन बाद अभिनेत्री हार्ली तथा उसके पति पालवर्च ने मकान किराये पर लिया, एक सप्ताह के भीतर ही वे पति पत्नी उस मकान में मरे पाये गये।

ऐसी ही घटनाएँ होलीवुड क्षेत्र में और भी कई घटित हुई है। आक्सफोर्ड के मकान नं0 921 में रीटा हैर्वर्थ को अपने परिवार के साथ रहने का अवसर मिला। उसने उस घर में प्रेत नाचते देखे और तुरन्त घर खाली कर दिया।

वेलेटिनों ने अपने लिए सन् 1925 में एक शानदार मकान खरीदा। नाम रखा उसका- फालकान लेसर। इस मकान में उसे विचित्र अनुभव होते रहे कभी स्वप्न में कभी जागृत में। हर बार उस मकान को खाली करके चले जाने के लिए कहा जाता रहा है पर उससे इतना सुन्दर मकान छोड़ते न बना। अन्ततः एक साल के भीतर ही उसकी मृत्यु हो गई।

एक दूसरे फिल्म कलाकार का भी यही हाल हुआ। उसे उसकी पत्नी ने छोड़ दिया था। इस दुःख से बचने के लिए उसने एक छोटा किंतु प्राकृतिक दृश्यों से भरा-पूरा सुहावना मकान लिया। सोचा वह उसमें रहकर शाँति पा सकेगा। किंतु हुआ ठीक उल्टा। उस घर में पहले जिन लोगों की मृत्यु हो चुकी थी वे प्रेत बनकर वहाँ अड्डा जमाये हुए थे। वे नहीं चाहते थे कि कोई वहाँ रहे और उनकी स्वच्छन्दता में खलल डाले। रुडोल्फ उसे छोड़ना नहीं चाहता था। पहले उन्हें उसमें होते रहने वाले उपद्रवों को अपने मन का बहम समझा। पीछे प्रेत विद्या समझने वालों को बुलाया पर उस मकान में डरावने कृत्य होते ही रहे। एक रात वह अच्छा भला सोया था। दूसरे दिन बिस्तर पर मरा हुआ पड़ा मिला।

जेने मैंस फील्ड जिस मकान में रहने गया, उसमें वीप्लो द्वारा गाये बजाये जाने वाले संगीत सुनाई पड़ता रहा। पहले उसने समझा, पास-पड़ौस में कोई गाता बजाता होगा। पर उस सम्बन्ध में बहुत खोज करने पर भी कुछ पता न चला। प्रतीत हुआ कि वह आवाज उसी मकान की छत में से आती है। जब छत को किसी लकड़ी से ठकठका दिया जाता तो आवाजें बन्द हो जातीं किंतु इसके बाद वे फिर पहले की तरह ही चालू हो जातीं। अपना भ्रम और भय उनने दूसरे मित्रों से कहा। वे भी उसमें एक-एक दो-दो दिन ठहरे और उनने भी बात को सही पाया। अन्ततः उन्हें वह मकान खाली करना पड़ा। इससे पहले भी और कोई रहने वाले इसी प्रकार डर कर उस मकान को खाली कर चुके थे।

फिल्म क्षेत्र में काम करने वाले हंघरडिक को भी ऐसे ही एक मकान से पाला पड़ा। उसमें रात को जो अदृश्य किन्तु डरावनी घटनाएँ घटित होती थीं, उनसे उनका पूरा परिवार भयभीत हो गया और जल्दी ही दूसरा मकान तलाश करके उसमें चला गया।

इडा लूपिनो के टेलीफोन की घण्टी रात्रि में कई-कई बार बजती और कोई कहता, यह मकान तुम्हें खाली करना पड़ेगा। अच्छा हो तो बिना नुकसान उठाये यहाँ से चले जाओ। पहले उसने समझा कि उनका कोई शत्रु इस प्रकार हैरान कर रहा है। उसने पुलिस की सहायता ली और टेलीफोन विभाग वालों से जाँच कराई कि यह कौन है जो रात भर ऐसी धमकियाँ देता है। पर इस खोजबीन से कोई निष्कर्ष न निकला। जब नींद हराम हो गई और घण्टी बजना बन्द न हुआ तो उसने वह मकान खाली कर दिया।

यह घटनाएँ उन होलीबुड वालों सम्बन्धित है जो शानदार मकानों में नौकर-चाकरों के साथ रहते हैं। उन्हें अन्धविश्वासी, शक्की या डरपोक स्वभाव का भी नहीं कहा जा सकता। उनने अपने अनुभव जिन्हें भी सुनाये, उनने यही प्रकट किया कि उनके साथ जो बीती उसमें कोई बहम नहीं वरन् प्रेतात्माओं की ही करतूत थी।

यह घटनाएँ बताती हैं कि आत्मा शरीर छूट जाने के बाद भी बनी रहती है एवं जीवित स्थिति में भी दूसरे शरीरों पर अधिकार जमाती रहती है।




स्वप्नों के पीछे सन्निहित तथ्य - Akhandjyoti May 1985

सपनों में अनेकानेक ऐसी घटनायें फिल्म रूप में उपस्थित रहती हैं जो कि स्वप्नदर्शी के लिए आगम भविष्य के लिए संकेत या संदेश के रूप में होती हैं। अपने इन स्वप्नों की फिल्म का वह स्वयं ही दर्शक और अभिनेता दोनों एक साथ होता है। वह अपनी स्मृतियों से प्रभावित रहता है, वह ऐसी घटनायें देखता है जो कि भूत, वर्तमान में अभी तक कभी भी घटित नहीं हुई हैं, उसमें वह काल्पनिक स्थान भी देखता है। कल्पना पर आधारित होने पर भी सपने स्पष्ट भावनामय तथा नियन्त्रण से परे होते हैं। वे प्रतिदिन के जीवन की तरह वास्तविक न होते हुए भी कभी-कभी विचित्र रूप से वास्तविक तथा सच सिद्ध होते हैं। इस प्रकार सपनों की इस रहस्यात्मक प्रकृति के कारण प्रत्येक व्यक्ति के मन में इस प्रकार के अनेकानेक प्रश्नों का आना-जाना स्वाभाविक है कि- ये संदेश कहाँ से प्राप्त होते हैं? अपने मस्तिष्क से? किसी दैवी शक्ति से? अदृश्य जगत से? आदि-आदि।

बहुधा अपने रचनात्मक होते हैं। इसके प्रमाण आधुनिक युग में भी मिलते हैं। कितने ही कवियों ने काव्य पंक्तियां सपनों में देखीं। लेखकों को कथानक मिले। संगीतकारों को संगीत की लय सुनाई दी। वैज्ञानिकों को अपनी समस्याओं की सच्चाइयाँ उजागर होती दिखीं। शायद यह विचारों के विश्लेषण तथा अचेतन रूप से दिवा स्वप्न का परिणाम हो। ये परिणाम कभी-कभी अनोखी रचनात्मकता दिखाते ही हैं।

अंग्रेजी साहित्य के प्रख्यात महान कवि सैमुअल टेलर कॉलरिज ने उप-शामक के रूप में तीसरे पहर अफीम खाली। सोने के पूर्व उसने ये अंतिम शब्द कहे थे- “यहाँ कुबला खान ने एक महल बनवाने का आदेश दिया था।” जब वह तीन घण्टे की नींद के बाद जागा, उसके मस्तिष्क में कविता की तीन सौ पंक्तियाँ अंकित थीं। कविता की सारी कल्पना उसे स्वप्न में दिखाई दी थी। उसे न तो उनके लिए कोई प्रयास करना पड़ा और न उसमें कोई उत्तेजना थी। जागते ही उसने “कुबला खान” शीर्षक अपनी यह प्रसिद्ध कविता लिखनी शुरू की। उसने 54 पंक्तियाँ ही लिखी थीं कि इसी बीच एक आगन्तुक उससे मिलने आ गया। एक घण्टे बाद ही वह पुनः लिखने बैठ गया। पर तब तक उसकी स्वप्नकालीन मौलिक कल्पना लुप्त हो चुकी थी। अतः लाख बार याद करने पर भी सपनों की शेष पंक्तियाँ वह न लिख सका।

18 वीं सदी में इटली में संगीतकार तारतिनी ने भी सपने की रचनात्मकता का अनुभव किया था। उसने लिखा था कि “कुबला खान’ कविता लिखने का श्रेय कॉलरिज का नहीं सपने को देना चाहिए। स्वयं उनने भी एक सपना देखा था। सपने में उनने अपनी वायलिन शैतान को दे दी थी। उस शैतान ने उससे अनोखी धुन निकाली थी। वे उससे अत्यन्त प्रभावित हुए थे। जागने पर उनने धुन के शब्दों को वायलिन से निकालने का प्रयास किया। उस ध्वनि का नाम उन्होंने ‘दि डेविल्स सोनाटा’ रखा था। उसे उनने अपना श्रेष्ठ कृति माना था।

प्रसिद्ध लेखक राबर्ट लूई स्टीवेन्सन को अनेक रचनाओं की उत्कृष्टता का श्रेय दिया जाता है। उनने अपनी अधिकाँश श्रेष्ठतम कवितायें सपने के बाद जागकर लिखी थीं। उनने दावा किया था कि वे रचनाओं के सपने क्रम से देख सकते हैं। कल की रात जहाँ से सपना छोड़ा था, आज की रात वह कहानी वहीं से जुड़ जायेगी। यही नहीं, वे आवश्यकता के अनुसार भी सपने देखने का दावा करते थे। जैसे कि, उन्हें किसी समस्या विशेष या विचार विशेष को लेकर कहानी लिखनी है, तो उसके सपने उस माँग को भी पूरी करते थे। उनकी महान रोमाँचक रचना ‘दि स्ट्रेन्जर केस ऑफ डाक्टर जैंकिल एण्ड हाइड” ऐसे ही सपने की उपज थी। उनने एक जगह स्वयं लिखा था कि वे अरसे से मानव के दोहरे रूप के सम्बन्ध में विचार कर रहे थे।

इसी प्रकार दार्शनिक विलियम जेम्स एक बार रात में एक समस्या पर विचार कर रहे थे। प्रातः एक सपना देखकर अचानक वे उछल पड़े। उन्हें लगा, कविता की एक पंक्ति में उनने संसार की समस्या का हल जान लिया हो। पंक्ति का अभिप्राय था, “नारियाँ एक पुरुष से शादी करती हैं, पुरुष बहु विवाही होते हैं।”

क्या इस प्रकार के संदेश संकेत स्वप्न दृष्टा के द्वारा स्वयं भेजे गए होते हैं? क्या अचेतन मस्तिष्क ही ऐसे संदेशा भेजता है। अब तक सभी मनोवैज्ञानिकों एवं मनः वैश्लेषिकों ने यह तथ्य समवेत स्वर से स्वीकार कर लिया है कि मनुष्य का अचेतन मस्तिष्क ही ऐसे प्रश्नों के उत्तर प्रत्यक्ष या संकेत रूप में देता है किंतु पुनः एक प्रश्न उभरकर सामने आ खड़ा होता कि कथा कहानियों के कथानक तथा वैज्ञानिक समस्याओं के हल कैसे सपनों में मिल जाते हैं? ये सभी तो मस्तिष्क की परिधि के बाहर होते हैं।

सपनों को समझने की समस्या भविष्य सूचक सपनों से अधिक संयुक्त है। यदि ऐसे सपनों की सच्चाई पर विश्वास करें तो यह भी स्वीकार किया ही जाना चाहिये कि मस्तिष्क पर कोई बाहरी शक्ति प्रभाव डालती है। अनेकानेक प्रकार के भविष्य सूचक सपने देखने का दावा करने वाले अति शिक्षित व्यक्ति कुशल ब्रिटिश यान चालक तथा इंजीनियर जे. डब्ल्यू. डुने थे। वे बोकार युद्ध के समय दक्षिण अफ्रीका में नियुक्त थे। उस समय उनने एक नाटकीय सपना देखा था। उसका उनने दूसरे से उल्लेख ही नहीं, अपितु अपनी एक पुस्तक में भी जिक्र किया है। सपने में उनने देखा था कि वे एक पहाड़ी के ऊपर खड़े हैं। वे आतंक से एक ऐसे ज्वालामुखी को देख रहे हैं जो भभकने ही वाला है धरती से भाप की तरंगें उनके चारों ओर उठ रही हैं। फिर उनने अपने को पास के एक द्वीप पर देखा। वहाँ वे निराशाजनक स्थित में करुणा एवं दयार्द्र हो मुसीबत में फंसे लोगों को बचाने के लिए फ्राँसीसी अफसरों से सहायता हेतु जहाज भेजने का अनुरोध कर रहे थे। ऐसे संकटग्रस्त लोगों की संख्या 4 हजार दिख रही थी। वे अनुरोध ही कर रहे थे कि इसी बीच उनकी आँख खुल गयी।

जब जहाज से उनके पास तक अखबार आया तो उसमें चौंका देने वाले विपत्ति के समाचार थे। वे खबरें उनके सपनों से मिल रही थी “डेली टेलीग्राम” नामक समाचार पत्र ने मार्तिनीक द्वीप में ज्वालामुखी के विस्फोट की खबर सुर्खियों में छापी थी। समाचार पत्र के अनुसार वहाँ 40000 मौतें फ्राँस अधिकृत क्षेत्र में ही हुई थीं। जबकि डुने ने अपने सपने में मृतकों की संख्या 4000 देखी थी। वास्तविक जगत में अंकों के आगे एक शून्य और जुड़ गया था। जो बचे उन्हें जहाज से ही अन्यत्र पहुँचाया गया था।

डुने ने ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख अपनी पुस्तक में किया है। एक बार उसने देखा कि वह खारतूस के पास ही खारतूस सूडान में है। वहाँ उनने देखा-तीन भद्दे कपड़े पहने अँग्रेज उसके पास आकर बोले कि वे सभी अफ्रीका के छोर से आये हैं। अगले दूसरे ही दिन उसने- अखबार में पढ़ा कि कुछ अँग्रेज खारतूस में विशेष खोज के लिए भेजे गए हैं। इसके पूर्व वे इस खोज या अभियान के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। एक और अन्य दूसरे स्वप्न में देखा कि स्काटलैण्ड में चौथे पुल से एक ट्रेन नीचे गिर गयी है। कुछ महीनों के बाद यह घटना भी सच हुई निकली। “फ्लाइंग स्काट्समैंन” नामक प्रसिद्ध ट्रेन चौथे पुल से 15 मील की दूरी पर एक बाँध से नीचे गिर गयी थी।

स्वप्न टेलीपैथी के रूप में संवाद वाहक का भी काम करते हैं। ड्युने को कभी-कभी यह आशंका होती कि संभवतया ‘डेली टेलीग्राम’ के संवाददाता ने अनजाने में टेलीपैथी के रूप में वह संवाद उनके मस्तिष्क में प्रसारित कर दिया हो। उनका कहना है कि सपने भविष्य सूचक होते हैं। प्रत्येक मनुष्य को अपने सपने स्मरण रखने चाहिये तथा कहीं लिख लेना चाहिये।

कभी-कभी कुछ सपने मनुष्य को अपनी भविष्यवाणी से घबरा भी देते हैं। प्रायः मौत सम्बन्धी सपने ऐसे ही होते हैं। ऐसे सपने स्मृति में लम्बे समय तक बने रहते हैं। 17 वीं सदी में फ्राँस का अभिनेता चैंपमेस्ले था। वह एक सपना देखकर घबरा गया। उस सपने में उनने देखा था कि उनकी मृत माँ उनको संकेत से बुला रही है। इस सपने को उनने अपनी मृत्यु की पूर्व सूचना समझा। इसका उल्लेख उनने अपने निकट सम्बन्धी इष्ट मित्रों, नातेदारों से भी किया। उनने अपना मृतक अन्त्येष्टि संस्कार का आयोजन किया। उसका पैसा भरपाई पहले ही चुका दिया। जैसे ही वह संस्कार समारोह पूर्ण हुआ, वे चर्च से बाहर आये और तत्काल गिरकर मर गये।

मातायें अपने बीमार या मरते बच्चों के स्वप्न प्रायः देखती हैं उत्तरी वेल्स के बंगोर नामक स्थान की श्रीमती मोरिस ग्रिफिथ ने 1884 में एक इसी प्रकार का सपना देखा। उसमें उनने दक्षिणी अफ्रीका स्थित अपने बेटे को बहुत बीमार पाया। उनने कई बार उसे पुकारते सुना। वे दूसरे दिन बहुत परेशान हो गई। परन्तु उन्होंने अपने पति से यह बात न कही। वे बीमार थे तथा यह कहना उनका और अधिक परेशान करना था उनको भी दिन-भर कुछ वैसी ही परेशानी रही। दोनों खाना भी न खा सकें थे। मुख में ग्रास दिया ही न जाता था। अन्त में पति ने ही मन की बात कही। बोले- ‘‘मैं किसी भी मूल्य पर उसे ले आऊँगा।”

अगले ही दिन उनको पुत्र का पत्र मिला। उसमें लिखा था- बुखार से काफी अस्वस्थ होने के बाद अब वह कुछ स्वास्थ्य लाभ कर रहा है। ठीक उसके भी दो माह बाद उनको एक पत्र मिला। उसमें लिखा था कि “उसकी उसी रात मौत हो गई थी, जिस रात उसने माँ को पुकारा था।”

कभी-कभी सन्देश देने वाले सपनों ने युद्धों का रुख आश्चर्यजनक रीति से मोड़ दिया है। हैनीवाल ने एक सैनिक विजय का पूर्वाभास एक स्वप्न में ही जाना था। इंग्लैण्ड के राजा रिचार्ड तृतीय ने बोसवर्थ के युद्ध में हार और मृत्यु की सूचना भयंकर आकृतियों के द्वारा स्वप्न में पायी थी। वाटर लू के युद्ध के ठीक पहले नेपोलियन ने एक सपना देखा था कि एक काली बिल्ली उसकी सेना के प्रमाण के पूर्व एक-एक कर सभी दस्तों के बीच घुस रही है।

सपने दैवी संदेश के रूप में भी देखे जाते रहे हैं। एक प्राचीन मित्र की सपनों पर लिखी गई पुस्तक ईसा से 1350 पूर्व की है। उसमें सपनों को दैवीय सन्देश कहा गया है। उसके अनुसार- लकड़ी कटने का घोतक प्रतीक अर्थ शत्रु की मौत है। यदि किसी के दाँत सपने में गिरते नजर आयें तो उस पुस्तक के मतानुसार- उसके सम्बन्धी उसकी हत्या का षड़यन्त्र कर रहे हैं। आश्चर्य तो यह है कि ड्यूटी की हत्या उसके शिक्षक द्वारा स्वप्न देखने के एक घण्टे के भीतर ही हुई थी।

दूसरी सदी में एक विख्यात भविष्य वक्ता आर्टेमिडोरस था। इस यूनानी भविष्य दृष्टा ने सपनों पर कई पुस्तकें लिखी हैं। उनने लिखा है कि मैं रात-दिन बस सपने ही देखता और उनका विश्लेषण करता रहा। वह सचमुच कुशल भविष्य वक्ता था। उनके अनुसार अधिकाँश स्वप्न व्यक्तिगत होते हैं। हमारी आत्मा सृजन में कुशल है इसलिए अनेक तरह के सपने दिखते हैं। किसी स्वप्न की व्याख्या देने के पूर्व वे देखने वाले की (स्वप्नदर्शी) दशा, व्यवसाय और पृष्ठभूमि अवश्य पूछ लेते थे।

आर्टेमिडोरस ने सपनों को दो वर्गों में बाँटा है। प्रथम वर्ग के सपने वे हैं जो रोजमर्रा की जिन्दगी और कामों की उपज हैं। दूसरी तरह के सपने भविष्य या दैवीय संदेशों से सम्बन्ध रखने वाले होते हैं। जैसे मुण्डित सिर दिखाई देना भविष्य का कुमार्ग का संकेत है। बीमार के लिए अत्यन्त अमांगलिक व अपशकुन नाविक देखे तो इसका अर्थ है जहाज नष्ट होगा।

मलेशिया के पहाड़ी जंगलों में सेनाय लोग चारों ओर से लड़ाकू जातियों से घिरे हैं। कोई भी शत्रु उन शान्ति प्रिय लोगों से इसलिए नहीं बोलता है क्योंकि वे समझते हैं कि ये लोग जादू से अपनी रक्षा कर सकते हैं किन्तु वास्तविकता तो यह है सेनाय लोग अपने सपनों और उनकी व्याख्या पर अपना जीवन बिताते हैं। उनके मत से, उस जाति के जीवन की हर महत्वपूर्ण घटना का समय तक सपने में नजर आ जाता है। वहाँ बच्चे तक अपनी रिपोर्ट बताते हैं। वहाँ सपना देखने वाले के लिए पहला सिद्धान्त है भय कम करना। अगर कोई बच्चा कहता है कि वह सपने में चीता देखकर भागा था, तो उसे फिर वह उसी सपने को देखने के लिए विवश किया जाता है। इस बार वह भागे नहीं, अपनी जगह जमा रहें और चीते पर उल्टे हमला करे। कठिनाई लगे तो अपने कुछ मित्रों को अपने पास बुला रखे। इस प्रकार वह सपना उसके लिए हौवा नहीं, बल्कि आत्म रक्षा का प्रशिक्षण बन जायेगा। ये सेनाय व्यक्ति वासना की उन्मुक्तता को वे आवश्यक समझते थे। इसलिए स्वप्न के किस भी दृश्य को अनैतिक नहीं मानते हैं। एक सिद्धान्त उन्हें और बल देता है। यदि कोई सेनाय युवक स्वप्न में देखे कि वह घायल हो गया है, तो वे लोग इसकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं कि उसने अपने शत्रु की भी तो शक्ति क्षीण की होगी।

इन सिद्धान्तों से प्रेरित होकर कैलीफोर्निया के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एरिक ग्रीन लीफ ने वहाँ “स्वप्न प्रयोगशाला” खोली है। उसमें सेनाय के निवासियों की तरकीबें काम में ली जाती हैं। बुरे सपने देखने पर, देखने वाले से प्रश्न पूछे जाते हैं। उसे भय पर काबू पाने के लिए कहा जाता है।

फ्रायड का विरोध उसके ही शिष्य कार्ल जुंग ने किया था। परन्तु दोनों ही इस तथ्य को पूर्ण रूप से न उड़ा सके कि कुछ सपने ऐसे अवश्य होते हैं, जो अदृश्य सूक्ष्म सत्ता से जुड़े होते हैं।

सोवियत डा. वेसिली निकोलायेविच कसतकिन का कहना है, सपने रोग से सावधान करते हैं। इस प्रकार की भारतीय धारणा भी रही है। डा. वेसिली ने कई मरीजों पर इसे आजमाया है। एक छात्र देखता था कि उसे एक अजगर ने पंगु बना दिया है। एक वर्ष बाद उसे स्पाइनल ट्यूमर हुआ। एक औरत देखती थी कि वह इतनी दब गई कि कठिनाई से साँस ले पा रही है- उसे क्षय हो गया। उपर्युक्त सोवियत डा. के मत से मस्तिष्क बीमारी का अनुमान कर लेता है। अतः वह स्वप्न में उसका पहले से ही संकेत कर देता है। मस्तिष्क की ऊपरी सतह पर कुछ ऐसे “सैल” होते हैं, जो अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। वे सूक्ष्म से सूक्ष्म परिवर्तन को भी ग्रहण करते हैं। उनकी पुस्तक ‘स्वप्न के सिद्धान्त’ रूस में मेडिकल कालेजों में अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ायी जाती है। सन् 1960 से वह पाठ्यक्रम में है। उनको संसार में इसके पहले बहुत कम लोग जाते थे। सन् 1975 में ग्रिस तथा डिक दो पत्रकारों ने जाकर उनसे इण्टरव्यू लिये और उन पर कई लेख लिखे।

उन्होंने लिखा है, अगर कोई नारी अपनी पसलियाँ कुचली जाते देखे, तो उसे कैंसर क्षय आदि फेफड़े का रोग हो सकता है। घाव भीतरी खराबी का संकेत करते हैं। अगर कुशल डाक्टर है, तो सपना सुनकर वह मरीज के रोग को समय रहते सरलता से ठीक कर सकता है। डॉक्टर उलमान तो वर्तमान समय में आजकल टैलीपैथी से प्रभावित करने के प्रयोग कर भी रहे हैं। जुंग ने टैलीपैथी (दूरबोध) का तत्व पहले से ही माना था। अतः टैलीपैथी पर सन् 1882 से ही काम होने लगा था। ब्रिटिश सोसाइटी ने इस पर अनेक प्रमाण भी जुटाये थे। ब्रिटिश सोसाइटी संगठन ने 5000 लोगों पर परीक्षा भी की थी। जब गहन परीक्षण, पर्यवेक्षण के पश्चात उन्होंने यह स्वीकार करना ही पड़ा कि इस विषय में कोई अदृश्य सूक्ष्म शक्ति काम करती है।

राबर्ट नेलसन ने सन् 1968 से सपनों की विशेषकर भविष्यवाणी वाले सपनों की रजिस्ट्री प्रारम्भ की हैं। समाचार पत्रों और टेलीविजन से इसका विज्ञापन किया जाता है। 8000 सपने अब तक पंजीकृत हो चुके हैं। उनको सपनों की भविष्यवाणी पर पूरा विश्वास है।

पूर्वार्त्त दर्शन में वर्णित मान्यताओं के अनुरूप अब स्वप्नों की प्रमाणिकता पाश्चात्य जगत में भी स्वीकारी जाने लगी है। मनोवैज्ञानिकों का दृष्टिकोण इस सम्बन्ध में अब विधेयात्मक बनता जा रहा है। अमेरिका में तो कई विश्व विद्यालयों में स्वप्न विज्ञान को बाकायदा करी कुलम में शामिल कर उन पर शोध कार्य भी किया जा रहा है। यह निश्चित ही एक शुभ चिन्ह है।




Quotation - Akhandjyoti May 1985

कृपा की याचना केवल परमेश्वर से करो। मनुष्यों में से जिसने जितनी कृपा कर दी, उसे ही पर्याप्त समझो और उसके लिए कृतज्ञ रहो।




मृत्यु कष्ट में भी स्वर्ग सुख की कल्पना - Akhandjyoti May 1985

मध्यकाल में सामन्तों की क्रूरता का जनता प्रतिरोध नहीं कर सकती थी पर कम से कम पीठ पीछे निन्दा तो करती ही थी। इन समाचारों से खिन्नता होने का उपचार उनने ऐसे दरबारियों से किया जो उनकी प्रशंसा ही किया करें। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए एक विशेष वर्ग ही बन गया वे चारण कहे जाते थे और अपने आश्रय दाता की प्रशंसा में कविताऐं बनाया करते थे। उन्हें दरबार में सुनाया जाता था और पुरस्कार मिलता था।

उन्हीं दिनों एक सच्चे कवि गंग भी थे। वे कविता तो करते थे किन्तु मिथ्या प्रशंसा से उन्हें चिढ़ थी।

एकबार बादशाह अकबर ने कवियों का सम्मेलन बुलाया और समस्या पूर्ति रखी ‘अकबर’ की। इस पर अन्य कवियों ने अकबर की प्रशंसा के पुल बाँधने वाली कविताऐं बनाईं और पुरस्कार पाया। कवि गंग निमन्त्रण की अवज्ञा न करके उस सम्मेलन में गये तो पर मिथ्या प्रशंसा करने को तैयार न हुए।

बादशाह ने गंग से कहा- “आपको भी समस्या पूर्ति करनी पड़ेगी। उनने कहा मुझसे मिथ्या प्रशंसा की आशा न करें। जो यथार्थता है वही कहूँगा। भले ही आप रुष्ट हो जांय।”

कवि गंग ने कविता बनाई और सुनाई उसमें अकबर तथा उसके पूर्वजों द्वारा किये गये अत्याचारों का वर्णन था। ऐसी हिम्मत और किसी की नहीं पड़ी थी। भरे दरबार में अपनी निन्दा इस प्रकार सुनकर अकबर आग बबूला हो गया।

उन्हें हाथी के पैर के नीचे कुचलवा देने का प्राण दण्ड दिया गया।

कवि गंग को ऐसी ही सम्भावना का भान भी था। इस मृत्यु दण्ड को कार्यान्वित होते हुए देखने के लिए अनेक लोग एकत्रित हुए। बादशाह स्वयं भी यह देखने आये कि कवि बड़ा निर्भीक बनता था। देखें मृत्यु के समय वह निर्भीकता रहती है या नहीं।

कवि गंग ने मृत्यु से पूर्व एक कविता बनाई और सभी उपस्थित जनों को सुनाई। प्रशिक्षित हाथी अपना काम करने के लिए तैयार खड़ा था।

इस कविता में एक बड़ी सुन्दर कल्पना थी, कहा गया था कि- “स्वर्ग लोक में देवताओं ने एक कवि सम्मेलन बुलाया। सब उपस्थित हुए और अपनी बनाई कविता सुनाते गये, पर कवि गंग उनके दरबार में बिना बुलाये न गये। उन्हें अपने स्वाभिमान का बोध था।”

तब देवताओं ने सोचा स्वाभिमानी गंग को बुलाने और अपनी पीठ पर बिठा कर स्वर्ग लोक लाने के लिए किसी बुद्धिमान देवता को भेजना चाहिए। इसके लिए उपयुक्त गणेश जी ही जो सकते हैं। उन्हें कवि को बुलाने और अपनी पीठ पर बिठाकर लाने के लिए हाथी रूपी गणेश को भेजा। वे ही मेरे सामने सुरपुर ले जाने के लिए खड़े हैं। कविता की अन्तिम पंक्ति थी- “कवि गंग को लेन गणेश पठायो।”

कवि को हाथी ने पैर से कुचल दिया। पर वे मरते समय तक अपनी कल्पना में मस्त थे। मृत्यु को उनने स्वर्ग का निमन्त्रण और उनके स्वाभिमान की रक्षा करने वाला आह्वान ही माना।

बादशाह समेत दर्शक आश्चर्यचकित रह गये कि मृत्यु जैसे दारुण कष्ट को भी भावनाशील मनुष्य किस प्रकार सुख स्वप्न में परिणित कर सकते हैं।




Quotation - Akhandjyoti May 1985

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान रिपुः। नास्तुद्यम समो बन्धुः कुर्बाणो नावसीदति॥

मनुष्य के शरीर में रहने वाला आलस्य ही एक महान शत्रु है। उद्यम के समान मनुष्य का कोई हितकारी मित्र या बन्धु नहीं है। उद्यमशील व्यक्ति कभी दुःखित नहीं रहता।




सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री- गायत्री - Akhandjyoti May 1985

गायत्री महामन्त्र का सार संक्षेप समझना हो तो उसके तृतीय चरण पर ध्यान देना होगा। जिसमें सविता देव से प्रार्थना की गई कि वे हम सब की बुद्धियों को शुद्ध करें। अथवा सही दिशाधारा अपनाने की प्रेरणा भरें। यह न केवल प्रार्थना है वरन् उसमें क्षमता भी है जिससे उपासक का मनोबल, आत्मबल और बुद्धिबल बढ़ता है। जिसे इस विभूति से लाभान्वित होने का अवसर मिले। समझना चाहिए कि उसके भविष्य का हर दृष्टि से उज्ज्वल होने का सुयोग बन गया।

बुद्धि भ्रष्ट होने पर मनुष्य का सब कुछ नष्ट हो जाता है। दुर्मति ही दुर्गति का प्रधान कारण है। दूरदर्शी विवेकवान व्यक्ति इस प्रकार सोचता है। जिसमें उत्कृष्टता का समन्वय है। जिसका चिन्तन सही है उसका चरित्र भी आदर्शवादी होगा। व्यवहार सज्जनोचित का पड़ेगा। मनःस्थिति के सज्जनोचित होने पर परिस्थितियाँ भी ऐसी बनती हैं जिनमें सुख-शांति की कमी नहीं रहती। गायत्री मंत्र में यही विशेषता भरी पड़ी है।

गायत्री की महिमा बताते हुए महाभारत में कहा गया है-

य एषां वेद गायत्री पुण्यां सर्वगुणान्विताम्। तत्वेन भरत श्रेष्ठ स लोके न प्रणाश्यति॥ महा. भीष्म 4।15

अर्थात्- सर्वगुणों से भरी हुई वेदमाता गायत्री को जो जानता है उसका इस संसार में कभी कोई अनिष्ट नहीं होता।

चाणक्य को लोगों ने सूचना दी कि आपके समर्थकों में से अधिकाँश विपक्ष में जा मिले हैं और आपका अनिष्ट करना चाहते हैं। इस पर चाणक्य ने हँसते हुए कहा- “मा गातु बुद्धिर्भम” अर्थात् और सब कुछ चला जाय। एक मेरी सद्बुद्धि न जाय।

गीतों में भगवान ने अपना स्वरूप गायत्री अर्थात् सद्बुद्धि को बताया है।

“बुद्धिर्बुद्धिमाता ह्यस्मि।” अर्थात् बुद्धिमानों में बुद्धि मैं हूँ। “गायत्री छन्दसामहम्” अर्थात् श्रुतियों में गायत्री मैं हूँ।

सद्बुद्धि मनुष्य की पग-पग पर सहायता करती है। उसके सहारे वह कुछ से कुछ बन जाता है।

एक वृद्धा कुमारी ने तप किया। देवता प्रसन्न होकर प्रकट हुए और बोले वर माँग।

उसने एक ही वर माँगा- ‘‘मैं अपने पुत्र को सोने के पालने में झूलता और दूध भात खाते देखना चाहती हूँ।” वर तो एक ही था पर उसमें स्वयं का युवती बन जाना, विवाह हो जाना। पुत्र होना और इतनी लक्ष्मी मिलने की याचना है कि पुत्र को सोने के पालने में झूलता हुआ देखे अर्थात् साथ में प्रचुर लक्ष्मी भी उसे मिल जाय।

इसी प्रकार एक जन्मान्ध निर्धन वृद्ध की कथा है। उसने भी तप किया। देवता ने एक वर माँगने के लिए कहा- उसने माँगा- मैं अपने क्षेत्र के राज्य सिंहासन पर अपने पौत्र को बैठते हुए देखना चाहता हूँ। इस एक ही वरदान से उसकी आँखें खुल जाना, युवा हो जाना, पुत्र पौत्र हो जाना और राज्याधिकारी बन जाना। इतने सारे लाभ मिलने की बात है।

गायत्री को बुद्धि की देवी कहा गया है। शास्त्र कहता है कि जिसमें बुद्धि है उसी में बल है। बुद्धिहीन में बल कहाँ से आया?

नीति वचन हैं कि काल ने दण्ड लेकर किसी को नहीं मारा, उसकी विवेक बुद्धि और विवेक शक्ति का अपहरण कर लिया है। इतने से ही उसका सर्वनाश हो जाता है। “विनाश काले विपरीत बुद्धि” -अर्थात् जब मनुष्य का विनाश काल आता है तब बुद्धि विपरीत हो जाती है।

हमें गायत्री मन्त्र की उपासना भी करनी चाहिए और साथ ही अपनी विवेक बुद्धि को अधिकाधिक पवित्र एवं प्रखर बनाने में संलग्न रहना चाहिए। यह दोनों अवलम्बन अपनाने पर मनुष्य का सब प्रकार कल्याण ही कल्याण है।




शब्द ब्रह्म और नाद ब्रह्म - Akhandjyoti May 1985

मन्त्र विद्या का असीम विस्तार है। उसके अनेकानेक शब्द गुच्छक हैं। अनेक शब्दों में मन्त्रों का विस्तार हुआ है। उनके जप तथा सिद्धि प्रक्रिया के अनेक योगाभ्यास कर्मकाण्ड भी हैं, पर उनके मूल में एक ही ध्वनि आती है किन्तु यह स्मरण रखना चाहिए कि उन सब का मूल ‘ॐकार’ ही है। किसी मन्त्र का उच्चारण या जप करना हो तो उनके आदि में ॐकार अवश्य लगाना चाहिए। इस प्रकार वह भी नाद ब्रह्म की साधना के अंतर्गत आ जाता है।

इस विराट् ब्रह्माण्ड में ॐकार की ध्वनि गुँजित है। सृष्टि के आदि में घड़ियाल में मोंगरी की चोट मारने पर उत्पन्न होने वाली झनझनाहट की तरह ॐकार नाद हुआ था। उसी के कारण ताप, प्रकाश और ध्वनि का आविर्भाव हुआ। तदुपरान्त अनेक सूक्ष्म शक्तियाँ गतिशील हुईं और उनकी हलचलों से विभिन्न शब्द होने लगे।

प्रकृति के रहस्यों, हलचलों एवं सम्भावनाओं को जानने के लिए नादयोग का अभ्यास किया जाता है। कर्ण कुहर बिन्द कर लेने पर कई प्रकार कर ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं। झींगुर बोलने, बादल गरजने, शंख बजने, वंशी निनाद होने जैसे कितने ही शब्द आरम्भ में सुनाई पड़ते हैं और नादयोग का अभ्यासी उन ध्वनियों के सहारे यह जानने की चेष्टा करता है कि अलग जगत में क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है। भूत, वर्तमान और भविष्य की कितनी रहस्यमयी जानकारियाँ नादब्रह्म की साधना की अवगत होती हैं।

नाद ब्रह्म की अन्तिम सीमा ॐकार ध्वनि की सुनाई पड़ती है। उसे उपनिषदकारों ने ‘उद्गीथ विद्या’ कहा है। मध्यकालीन सन्त सम्प्रदाय के लोग उसे सुरत योग कहते रहे हैं। गोरख सम्प्रदायों में इसी की प्रमुखता है। कबीर पंथ में भी साधना का लक्ष्य इसी को माना है और कहा है जब ॐकार ध्वनि स्पष्ट हो जाती है तो मन उसी में लय हो जाता है और समाधि जैसी स्थिति बन जाती है। यह सब नाद ब्रह्म के भेद हैं। शब्द योग की परिधि में स्वाध्याय और समस्त गद्य-पद्य रूप में होने वाली प्रक्रियाऐं सम्मिलित होती हैं।

शब्द ब्रह्म और नादब्रह्म यह दोनों ही सर्वव्यापी हैं। मनुष्य के कण-कण में समाये हुए हैं। इन्हें उजागर करना भगवत् प्राप्ति के लिए आवश्यक है।

शब्दयोग अर्थात्- ज्ञानयोग, वाणी का सदुपयोग। मार्ग पर चलने की शिक्षा देना। अपने आप में शब्दयोग का अभिवर्धन सद्ज्ञान की अधिकाधिक अभिवृद्धि तर्क, विवेक और अनुभव के द्वारा, स्वाध्याय सत्संग एवं चिन्तन मनन द्वारा सम्भव होती है। लोग कर्मकाण्ड मात्र से अध्यात्म लक्ष्य की प्राप्ति करना चाहते हैं। यह एकाँगी प्रयास सफल नहीं होता। उपासना क्रिया-कृत्यों का रहस्य ज्ञानपूर्वक समझना चाहिए और उन्हें करते समय तद्विषयक भावनाओं को प्रदीप्त करना चाहिए। अन्यथा कर्मण्ड का मात्र शरीर श्रम एवं वस्तुओं की उलट पुलट मात्र बन रह जायेगा और उनका वह प्रतिफल न मिलेगा जो शास्त्रकारों द्वारा बताया गया है। शब्दब्रह्म का तात्पर्य मन्त्र विद्या का ज्ञानपूर्वक सम्पन्न करने उनके साथ विचारणा एवं भावना का समावेश करने से है।

नादयोग का मोटा अर्थ गायन वादन- संगीत कीर्तन है। प्रवचन परामर्श के साथ इसका भी संयोग रहता है। यह सामान्य परिवारी है। कथा-कीर्तन इसी आधार पर सम्भव होते हैं और वे ज्ञानयोग की नादब्रह्म की आवश्यकता पूरी करते हैं।

अपनी कहना और दूसरे की सुनना, इसी प्रक्रिया से वार्तालाप का आदान-प्रदान होता है। शब्द ब्रह्म अपनी अपनी श्रद्धानुभूति को दूसरों के अन्तःकरण में प्रवेश कराया जाता है। यह एक पक्ष हुआ दान का। पर इसके लिए अपने पास सम्पदा का संचय भी होना चाहिए। यह प्रयोजन नादयोग के अभ्यास से पूरा होता है। उसके द्वारा हम परब्रह्म का संदेश सुनते हैं। इस अवधारणा के उपरान्त ही ज्ञानीजन अन्यान्यों को ब्रह्मज्ञान की शिक्षा देने में समर्थ होते हैं।




हमारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष गतिविधियाँ - Akhandjyoti May 1985

आत्मा अमर है उसे पुराने कपड़े की तरह बार-बार नये शरीर बदलने पड़ते हैं। इस परिवर्तन काल में भी एक मध्यावधि होती है। जिसमें सामान्य जनों की और असामान्यजनों की विधि व्यवस्था भिन्न-भिन्न होती है।

सूक्ष्म शरीर जीवित और मृतक स्थिति में यथावत् बना रहता है। सामान्यजनों का सूक्ष्म शरीर भी प्रेरणाऐं ग्रहण करता और प्रभाव छोड़ता है। असामान्य लोगों के सूक्ष्म शरीर में यह ग्रहण और विसर्जन की क्षमता विशेष रूप से बढ़ी-चढ़ी होती है।

मरणोपरान्त नया जन्म मिलने से पूर्व वाले मध्यान्तर में अपने कर्मानुसार स्वर्ग-नरक भोगते हैं और प्रेत पितर के रूप में अपने पूर्व संपर्क वालों को हानि-लाभ पहुँचाते रहते हैं। असामान्य आत्माओं का सूक्ष्म शरीर अपेक्षाकृत अधिक सशक्त होता है। वह जीवित रहते ऐसे पुण्य परमार्थ में लगे रहते हैं। जो सर्वसाधारण को विदित भी नहीं हो पाता। मरने के उपरान्त वे अन्यान्य संस्कारवान प्रतिभाओं के साथ हो लेते हैं और उनके माध्यम से अति महत्वपूर्ण काम कराते रहते हैं। एक ही शरीर में दो आत्माओं की भूमिका चल पड़े तो एक और एक ग्यारह होने की उक्ति चरितार्थ होती है और इतना काम बन पड़ता है जिसे चमत्कारी ही कह सकते हैं।

स्थूल जगत में- स्थूल शरीर से जो कार्य बन पड़ते हैं वे दृश्यमान होते हैं और घटनाक्रम कहलाते हैं। इन्हें सभी देखते और समझते हैं, किन्तु सूक्ष्म शरीर द्वारा दूसरों के अन्तराल में प्रेरणाऐं भरी जाती हैं। आकाँक्षा जगाई जाती है। उमँगें उठाई जाती हैं। दिशा बताई जाती है और आदर्शों को क्रियान्वित करके छोड़ा जाता है।

उच्च आत्माऐं ऐसे अदृश्य कार्य अपने जीवन काल में भी सूक्ष्म शरीर द्वारा करती रहती हैं और मरणोत्तर जीवन में- नये जन्म से पूर्व तो उन्हें इसके लिए और भी अधिक अवसर मिल जाता है। कारण कि उन्हें कर्मबन्धन न रहने से न तो स्वर्ग-नरक में जाना पड़ता है न प्रेत पितर बनकर किसी को नैतिक हानि लाभ पहुँचाने में रुचि होती हैं। उनके अन्तराल में आदर्शवादी उत्कृष्टता ही जमीं रहती है और सामयिक आवश्यकता को देखते हुए अपने कार्यक्रम बदलते रहते हैं। परिष्कृत आत्माओं की अदृश्य और दृश्य जीवन की क्रिया-कलाप की यही रीति-नीति होती है।

जीवात्माओं को कर्मबन्धन से अथवा ईश्वरीय प्रेरणा से कार्यरत रहना पड़ता है। भव-बन्धनों से मुक्त आत्माऐं भी दैवी प्रयोजन की पूर्ति के लिए सृष्टि का संतुलन बनाये रखने के लिए काम करती रहती हैं। गंदगी फैलाने वाले अनेकों होते हैं पर उसे समेटने स्वच्छ करने का काम बिरले ही सम्भालते हैं। भगवान उच्च आत्माओं के माध्यम से अपना ही प्रयोजन पूरा कराते रहते हैं। निराकार भगवान सर्वव्यापी होने के कारण शरीर धरने की स्थिति में नहीं होते। अपना कार्य देवात्माओं के माध्यम से कराते हैं और उनके लिए अदृश्य सहयोग एवं दृश्य साधन जुटाते रहते हैं।

पिछले जन्मों को मनुष्य भूल जाता है। न भूले तो उसका झुकाव वर्तमान जीवन से न जुड़ पायें और भूत कालीन स्मृतियों के सहारे अन्य ऊहापोहों में मुड़ पड़े। पुरातन जन्मों को आमतौर से सभी भूल जाते हैं। किन्तु परिष्कृत आत्माए पिछले महान कार्यों की स्मृति में उठे संकेतों से अपनी स्थिति के स्तर का मूल्याँकन कर लेते हैं और फिर उसी मार्ग पर चलते हैं। जिस पर पहले चल चुके हैं।

हमारे जीवन की महान घटना यह है कि मार्गदर्शक देवात्मा ने पिछले 600 वर्षों में हुए तीन जन्म दिखाये और उसी मार्ग पर सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप कार्य में जुटा दिया। भूतकाल में भी हमें कार्यम बदलते रहने पड़े हैं पर लक्ष्य एक ही रहा है- स्वयं पार होना और अनेकों को कन्धे पर बिठा कर पार करना।




अपनों से अपनी बात- ‘हीरक जयंती’ शानदार स्तर की मनाई जाय - Akhandjyoti May 1985

महत्वपूर्ण प्रयासों के 25 वें वर्ष में रजत जयन्ती, पचासवें वर्ष में स्वर्ण जयन्ती, पचहत्तर वर्ष में हीरक जयन्ती और सौ वर्ष में शताब्दी मनाये जाने की परम्परा है। लोकाचार में विवाह के साठ वर्ष पूरे होने पर हीरक जयंती मनाते हैं पर गुरुदेव का गठबन्धन अपने गुरुदेव से हुए साठ वर्ष पूरे होने के कारण इस वर्ष को ही हीरक जयन्ती वर्ष माना जा रहा है। अन्यत्र यह आयोजन हर्षोत्सवों के रूप में मनाये जाते हैं, पर अपनी दिशा धारा ऐसी है जिसमें उत्साह उत्पादन करने वाले उन कार्यक्रमों की आवश्यकता है, जिससे लोकरंजन होता है और जन साधारण को तद्विषयक जानकारी मिलती है। उथले स्तर पर यह भी कुछ न कुछ उपयोगी ही पड़ता है पर जिस लक्ष्य की ओर अपनी यात्रा चल रही है उसमें व्यक्तिगत साहस, पौरुष और पराक्रम की आवश्यकता रहेगी। यदि हीरक जयन्ती वस्तुतः मनानी हो तो हम सबको आत्म-निरीक्षण और आत्म-निर्माण के प्रयत्न करने होंगे साथ ही लक्ष्य की दिशा में तीर की तरह सनसनाते हुए बढ़ना होगा। यह कार्य अनख आलस्य अपनाने और बेगार भुगतने की चिन्ह पूजा करने से बन पड़ता सम्भव नहीं।

गुरुदेव के स्थूल शरीर की शताब्दी नहीं मन सकती। यह हीरक जयन्ती उनके संदर्भ में अन्तिम उत्सव है। उनने स्वयं को बड़ी समस्या सुलझाने के लिए नियोजित कर दिया है। वायु प्रदूषण, वातावरण और सर्वभक्षी महायुद्ध की विभीषिकाऐं सामने हैं। व्यक्ति का चिन्तन और चरित्र अधोगामी हो रहा है। इस सबके फलस्वरूप भविष्य के भयंकर और अन्धकारमय हो जाने में कोई सन्देह नहीं रह जाता। ऐसे प्रवाह को उलटना-उलटकर उलटे को सीधा करना- असामान्य संकल्प है। 500 करोड़ मनुष्यों की नियति को तमिस्रा से आलोक की ओर घसीट ले जाना सामान्य कार्य नहीं है। असामान्य प्रयास असामान्य व्यक्तियों से ही बन पड़ते हैं। इस हेतु किसी अर्जुन का गाण्डीव संधान ही काम दे सकता है। व्यापक अन्धकार से निपटने की प्रतिज्ञा कोई सविता का अंशधर ही कर सकता है। ऐसी प्रतिज्ञा जिसे पूरी करने के लिए अपना अपने महान आधार का आस्तित्व बाजी पर लगा दिया गया है।

विनाश की सम्भावनाओं को हर धर्म के शास्त्रों और आप्त पुरुषों ने व्यक्त किया है। भविष्यदर्शी- सूक्ष्मचेता भी एक स्वर से यही कहते सुने जा रहे हैं। परिस्थितियोँ की प्रतिक्रिया का मूल्याँकन करने वाले महा-मनीषियों ने भी अगले दिनों विषम सम्भावनाओं की अभिव्यक्ति की है। यह सब निराधार नहीं है। इनके पीछे तथ्य है और वे तथ्य ऐसे हैं जिनने समस्त संसार को आशंकित और आतंकित कर रखा है। कोई भी इन्हें निरर्थक कल्पना नहीं मानता वरन् उन्हें प्रत्यक्ष देखता है।

इन सम्भावनाओं को उद्यत देने की बात कहना सहज हो सकती है पर उसे कर दिखाना ऐसा कठिन कार्य है जिसकी तुलना में गोवर्धन उठाने, समुद्र लाँघने जैसी उपासनाऐं भी छोटी पड़ती हैं। यह रोकना एकाँगी बात हुई। दूसरा कार्य इसका पूरक “नव सृजन” रह जाता है। मात्र अशुभ का निराकरण हो और शुभ का संस्थापन न हो सके तो तो बात सर्वथा अधूरी रह जाती है। आसुरी उपद्रवों के निराकरण के साथ ही रामराज्य की स्थापना मिला देने से ही एक पूरी बात बनी थी। अपने लक्ष्य के भी यह दानों की पहलू हैं। सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि जो इस प्रक्रिया को पूरा करने का मात्र साहस ही नहीं दिखाता वरन् उसे पूरा कर दिखाने का संकल्प पूर्वक आश्वासन भी देता है। उसे कितनी दूर दृष्टि अपनानी होगी और प्रतिज्ञा पूर्ति के लिए कितनी कठोर तपस्या करनी होगी। इसकी झाँकी भागीरथ और दधीचि जैसों के प्रयासों का स्वरूप दृष्टि के सामने रखकर ही अनुमान लगा सकना सम्भव हो सकता है।

इस हीरक जयन्ती वर्ष में सन् 1985 में गुरुदेव कितनी अधिक तत्परता और निष्ठा के साथ अपने आपको तपा रहे हैं, इसकी झाँकी उन्हें ही मिलती है जो उनके अत्यधिक संपर्क में हैं। गुरुदेव का 75 वाँ वर्ष उनकी अग्नि परीक्षा का वर्ष है। हर्षोत्सव में सम्मिलित होने या स्वागत सत्कार कराने का नहीं।

इन दिनों भी उनने प्रज्ञा परिजनों की उपेक्षा नहीं की है। न उनकी ओर से मुंह मोड़ा है, न उपेक्षा दिखाई है। उनकी ओर भी उनका उतना ही ध्यान है, जितना आकाश में उड़ती चिड़िया का अपने घोंसले के अण्डे बच्चों के प्रति होता है। क्योंकि वे उन्हें अपने अंग अवयवों का समुदाय मानते हैं। शरीर किसी गेंद का नाम नहीं है वरन् उसमें ज्ञानेन्द्रियों कर्मेंद्रियों का समुदाय ही नहीं, मस्तिष्क, पेट आदि अदृश्य अवयवों का भी एक बड़ा समूह होता है। जीवकोषों और ऊतकों, तन्तुओं के समुदाय से वह विनिर्मित होता है। इन सब घटकों की गणना की जाय तो वह लाखों करोड़ों में जा पहुँचती है। उन सबके बीच सघन सहयोग और अनुशासन होता है। यदि वह न रहे तो शरीर का सीरा जा बिखरने में देर न लगे। काया अपने घटकों का पोषण करती है और घटक मिल जुलकर काया का। यदि वे यह तब न करें तो जीवन का अन्त हुआ ही समझा जा सकता है। अस्तु यह भी तथ्य है कि गुरुदेव जिस समर्थता के आधार पर बलि के तीन लोकों का राज्य मापने जैसे वामन के कदम उठा रहे हैं उसका सुदृढ़ बनाये रहना भी आवश्यक है। इस आवश्यकता को यथावत् जुटाये रहने से उनका ध्यान रत्ती भर भी विरत नहीं होता है।

यह ठीक है कि उनकी मौन एकान्त साधना के कारण हर किसी का मिलना-जुलना-भेंट परामर्श करना सम्भव नहीं रहा। पर इससे मनोविनोद में-नेत्र रंजन में-समय क्षेप में कमी आने के अतिरिक्त और कोई कमी नहीं हुई। इससे किसी की कुछ हानि नहीं हुई, न आगे होनी है। निकटवर्ती-साथी संगी लाभदायक होते हों दूर रहने वाले व्यर्थ सिद्ध होते हों, ऐसी भी कोई बात नहीं है। जुएं, खटमल, वस्त्र और बिस्तरों में चिपके रहते हैं। चूहे, दीमक, मच्छर, मक्खी, घर में ही घुसे रहते हैं। सर्प, बिच्छू, छिपकली भी घर आकर ही दर्शन देते रहते हैं पर उनसे किसी का कुछ बनता नहीं। सूर्य, चंद्र दूर हैं, पवन अदृश्य है, तो भी उनकी उपयोगिता कम नहीं। गुरुदेव के प्रत्यक्ष सान्निध्य संपर्क में कटौती हो जाने से किसी को भी न उपेक्षा का अनुभव करना चाहिए न घाटे का। माता अपने पेट में रहने वाले बच्चे को जब अपना रक्त माँस देकर पोषण करती रह सकती है तो अपने-अपने स्थानों पर रहते हुए भी परिजनों को ऐसा अनुभव नहीं होना चाहिए कि विलगाव का व्यवधान उपस्थित हो गया। सच तो यह है कि सूक्ष्म क्षमता ही अदृश्य होते हुए भी दृश्य पदार्थों की तुलना में कहीं अधिक समर्थ और सहयोगी हो सकती है। इन दिनों उन्हें अपना घनिष्ठ माने वालों में से प्रत्येक को यह अनुभूति होनी चाहिए कि वे हमारे बहिरंग से दूर दिखते हुए भी अन्तरंग के साथ अत्यधिक घनिष्ठता के साथ लिपट गये हैं। न केवल लिपट गये हैं वरन् कुछ कहते भी हैं। यह कथन झकझोरने और कचोटने जैसे स्तर का भी हो सकता है।

हिमालय अवस्थित मार्गदर्शक सत्ता गुरुदेव के साथ सूक्ष्म शरीर से ही अपने अनुग्रह, आलोक, साहस और साधनों की कमी न पड़ने देने का पूरा-पूरा ध्यान रखती रही है। समीपता और नेत्र रंजन का अभाव दिखने पर भी उन्हें इस कारण किसी प्रकार का घाटा नहीं रहता। इसके विपरीत कितने ही कर्मचारियों और तथाकथित मित्र भक्तों से उन्हें समय-समय पर भारी आघात लगते रहे हैं। इस सब पर दृष्टिपात करने के किसी को यह अनुभव नहीं करना चाहिए कि उनकी उपेक्षा हुई या कथनोपकथन से प्राप्त हो सकने वाले लाभों में कटौती हो गई। वस्तुस्थिति ठीक उलटी है। घर रहने वाला आलसी जितना उपयोगी हो सकता है उसकी तुलना में दूर देश जाकर कुछ उपार्जन करने वाला और परिवार पोषण के लिए भेजते रहने वाला अधिक उपयोगी एवं सम्मानास्पद सिद्ध होता है। अभी भी उन्होंने संपर्क निर्देश हेतु जो माध्यम अपनाया है, वह समय की आवश्यकता के कारण ही हो सकता है, अगले दिनों उसकी भी आवश्यकता न रहे। गुरुदेव की वर्तमान साधना के सम्बन्ध में प्रत्येक विचारशील परिजन को दृष्टि से सोचना चाहिए। दर्शन करने या कराने में अनुग्रह होने की बात सोचना बाल विनोद के अतिरिक्त वस्तुतः और कुछ है नहीं। उनको देखने के स्थान पर उनकी कही पर चलना कहीं अधिक महत्वपूर्ण एवं चमत्कारी है, इसे परिजन इन दिनों अनुभव करते रह सकते हैं।

इस हीरक जयन्ती वर्ष में- गुरुदेव की तत्परता, तन्मयता, व्यवस्था एवं तपश्चर्या का स्तर बहुत अधिक बढ़ गया है इसलिए हर परिजन से उनकी घनिष्ठता और भी अधिक सघन हो गयी है। दर्शन नहीं हो रहे हैं इसका तात्पर्य यह नहीं हैं “कि वे अपने को कटा हुआ समझें या अपने कर्त्तव्य उत्तरदायित्वों की इसलिए उपेक्षा करें कि उनकी प्रत्यक्ष मनुहार नहीं की गई। उनके कान में अलग से कुछ नहीं कहा गया, उन्हें कुछ अतिरिक्त काम नहीं सौंपा गया। निवेदन एवं निर्देशन को अब अन्तर में टटोल कर खोजना चाहिए और उसे आत्मा की पुकार में घुला हुआ अनुभव करना चाहिए।

स्मरण रहे कि जैसे पौधों को जड़ों का रस ही नहीं ऊपर में हवा और धूप भी चाहिए। उनके द्वारा हमें कुछ मिले, इस इच्छा में कुछ अनौचित्य नहीं है। पर फल फूल प्राप्त करने के लिए पौधे में खाद-पानी की व्यवस्था भी तो करनी होगी। एक हाथ से ताली नहीं बजती, एक पहिये की गाड़ी नहीं चलती। आदान-प्रदान के सिद्धान्त को हमें कसकर गाँठ बाँध लेना चाहिए। गुरुदेव और उनका परिवार मिलकर एक इकाई बनते हैं। इस संयोग सुयोग से ही उनकी समग्र क्षमता बनती है। अन्यथा वे एकाकी रह जाते हैं और जिस प्रकार साथी बैल के बैठ जाने पर पूरी गाड़ी का वजन एक बैल को ही खींचना पड़ता है वैसा ही उनके सम्बन्ध में घटित होता है।

हिमालय क्षेत्र की बरसने वाली अनुकम्पा उस कल्प-वृक्ष के लिए ऊपर से बरसने वाली पवन और धूप के सदृश है। पर जिस पात्रता के आधार पर वे यह अनुग्रह प्राप्त करते हैं वह उनकी नन्हीं-नन्हीं और सुदूर क्षेत्र तक जमीन के भीतर फैली हुई जड़ों से ही उत्पन्न होती है। यदि जड़े जमीन रहने और विज्ञापित ने होने के कारण अपने कार्य को महत्वहीन समझें तो अनर्थ हो जायेगा। पेड़ का तना सूखेगा और पत्ते झड़ जायेंगे। इस स्थिति में एक हाथ से चप्पू थामकर नाव खींचने वाले मल्लाह पर जितना दबाव पड़ता है उतना ही गुरुदेव पर भी पड़ेगा। काम तो एक हाथ का-एक पैर का आदमी भी किसी प्रकार करता है, पर उसका कार्य कितना कठिन और कितना धीमा होता है इसे सभी जानते हैं। हम सब गुरुदेव की उठाई जिम्मेदारी में ग्वाल-बालों की तरह-रीछ-वानरों की तरह साझीदार रहें तो ही शान और शोभा है। हाथ सिकोड़ लेने पर भी नाव तो किनारे लगेगी पर उसे श्रेय से वंचित रहना पड़ेगा जो अर्जुन और हनुमान को सहज ही उपलब्ध हो गया होगा।

लाभ और हानि का गणित हमें नये आध्यात्मिक सिद्धान्तों के आधार पर सीखना होगा। भौतिक जगत में किसी भी प्रकार उपलब्धियां हस्तगत कर लेने का चातुर्य भी सफल होता है, पर अध्यात्म जगत में बोने और काटने के अतिरिक्त और कोई विद्या काम नहीं करती। इस क्षेत्र में गहरे तालाब ही बादलों की अनुकम्पा का लाभ लेते हैं। तालाब यदि अपनी मिट्टी बाहर फेंकने की उदारता न अपनायें तो उन्हें भी समतल भूमि की तरह प्रचण्ड वर्षा होने पर भी नाम मात्र को नमी हाथ लगेगी। गुरुदेव के 75 वर्ष को 75 पन्ने की पुस्तक समझा जा सकता है। इसे यदि ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय तो उनकी विभूतियों को ‘‘बोया-काटा” के आधार पर खरीदा गया ही समझा जा सकता है। हम सभी खरीदने का सिद्धांत अपनायें। खजाना खोदने, लाटरी भुनाने या याचना से दौलत बटोरने की बात न सोंचे। वह भ्रम मात्र है।

सच्चा स्वार्थ परमार्थ ही है। इस तथ्य को गुरुदेव के जीवन संदर्भ में प्रस्तुत 75 पृष्ठो में से कुरेद कर भली-भाँति समझा जा सकता है। उन्हें इतनी महानता की उपलब्धि परमार्थ प्रयोजनों में अपने को खपा देने के कारण ही हस्तगत हुई हैं। उनके घर कुटुम्ब के लोग- और सहपाठी गण उसी स्थान पर रहे जिसमें उनके पूर्वज किसी प्रकार निर्वाह करते चले आ रहे थे। पर गुरुदेव जमीन से उछलकर आसमान तक छा गये और अंतर्ग्रही यानों की तरह रहस्य भरे अन्तरिक्ष में द्रुतगति से परिभ्रमण करने लगे। यही उनकी विरासत है। यही वसीयत जो भी उनके आत्मीय होने का अनुभव करते हैं उन्हें अनुकरण की बात सोचनी चाहिए। वन्दन स्तवन से कुछ बनता नहीं है। विनिर्मित राजमार्ग पर चलने का साहस चले का साहस जुटाया जाना चाहिए। धीमे या द्रुतगति से चलना उसी मार्ग पर चाहिए जो उन्होंने कथनी से नहीं करनी के सहारे सीधी, सरल और सुनिश्चित स्तर का विनिर्मित किया है।

रजत जयन्ती, स्वर्ण जयन्ती गुरुदेव की नहीं मनाई गई। शताब्दी मनाये जाने की कोई सम्भावना नहीं। क्योंकि उनके लिए अन्यत्र दूसरे भी बड़े काम प्रतीक्षा कर रहे हैं। ट्रान्सफर होने पर भी “रिलीव” होने में कुछ समय लग जाता है। इतना ही कार्यकाल उनके स्थूल शरीर का शेष है। इसके उपरान्त वे अपने पाँच साथियों समेत इस विश्व ब्रह्माण्ड की अधिक उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने में अपनी क्रियाशीलता नियोजित करेंगे। वे कब तक हमारे बीच हैं इस सम्बन्ध में कुछ भी निश्चित रूप से कहना कठिन है। उनकी उपस्थिति में मात्र हीरक जयन्ती ही मन रही है। इस अदृश्य समारोह में किसने कितना उत्साह प्रकट किया, कितनी आत्मीयता और भाव श्रद्धा का परिचय दिया। इसका अवसर इसी बार है। नितान्त इन्हीं दिनों दिशा मिलने और चिन्तन करने में बहुत समय चला गया। इसी धुरी पर घूमते रहने से रहा बचा समय भी चला जायेगा। अब कुछ करने की बात है। यही इस अवसर पर प्रस्तुत श्रद्धाँजलि का स्वरूप हो सकता है। गुरुदेव ने अपने मार्गदर्शक के निर्देशन पर न अनावश्यक सोच-विचार किया है न अपनी इच्छा से योजनाऐं बनाई हैं। अनुशासन का निर्वाह भर किया है। यह प्रक्रिया अपनाकर उनने जो खोया है उससे हजार गुना पाया है। अध्यात्म तत्वज्ञान का यही गणित है। इसे अपनाया जाना चाहिए और उसी आधार पर कदम उठाने का साहस जुटा जाना चाहिए। हीरक जयंती पर किसकी श्रद्धांजलि अभिव्यक्ति, कितनी बड़ी एवं मूल्यवान रही इसका मूल्याँकन इस आधार पर किया जायेगा कि किसने अपने कदम निवेदन एवं निर्देशन को सुनने, समझने एवं क्रियान्वित करने के लिए उठाये। उनके लिए कितना साहस एकत्रित किया और कितना आदर्श उपस्थित किया, जिसका दूसरे अनुकरण कर सकें। जिससे अपने को आत्मिक तृप्ति, तुष्टि एवं शान्ति का लाभ मिल सके, कहने लायक सफलताऐं विभूतियाँ बिना बुलाये ही चरण चूम सकें।

हीरक जयन्ती धूमधाम से मनाये जाने का उत्साह सर्वत्र है। पर उसे ओछे एवं खर्चीले प्रदर्शन के रूप में नहीं, हर परिजन को अपने व्यक्तित्व एवं कर्तव्य में उत्कृष्टता का अधिकाधिक समावेश करते हुए प्रस्तुत करना चाहिए।




धर्म प्रचार के लिए जा रहे थे (kahani) - Akhandjyoti May 1985

ईसा अपने शिष्यों के साथ धर्म प्रचार के लिए जा रहे थे। रास्ते में रेगिस्तान पड़ा। दूर तक कोई गाँव दिखाई न देता था। भोजन की समस्या उत्पन्न हुई तो ईसा ने कहा- “जो कुछ तुम्हारे पास है उसे इकट्ठा कर लो और मिल-बाँटकर खाओ।”

शिष्यों के पास कुल मिलाकर पाँच रोटी और दो टुकड़े तरकारी निकली। गुरु ने उसे इकट्ठा किया और मन्त्र बल से अन्नपूर्णा बना दिया। शिष्यों ने भरपेट खाया और जो भूखे भिखारी उधर से निकले वे भी उसी से तृप्त हो गये। सोलोमन नामक शिष्य ने पूछा- गुरुवर, इतनी कम सामग्री में इतने लोगों की तृप्ति का रहस्य क्या है?

ईसा ने कहा- हे शिष्यों! धर्मात्मा वह है जो खुद की नहीं सबकी बात सोचता है। अपनी बचत सबके काम आये इस विचार से ही तुम्हारी पाँच रोटी अक्षय अन्नपूर्णा बन गईं। जो जोड़ते हैं वे ही भूखे रहेंगे। जिनने देना सीखा है उनके लिए तृप्त के साधन आप ही आ जुटते हैं।




इस सुयोग का नियोजन इस प्रकार करें - Akhandjyoti May 1985

उस बीज की सार्थकता है जो उगे और वृक्ष बनकर फूलों, फलों से लदे। उसका गलना निरर्थक नहीं जाता। वरन् अपने जैसे हजारों बीज हर साल उत्पन्न करता है। इसी को वंश-वृद्धि कहते हैं। महामानव भी बीज की तरह गलते हैं और अपने छोटे से आकार को इतना विशाल बना देते हैं जिसकी शीतल छाया में अनेकों को विश्राम मिले और पक्षी घोंसले बनाकर आनन्दपूर्वक अपने परिवार समेत निर्वाह करें।

पू. गुरुदेव एक समर्थ बीज हैं। उनके गलने की सार्थकता इन्हीं दिनों परखी जा रही है। वे एक से अनेक हुए या नहीं, उनका वंश डूबा या चन्दन उद्यान की तरह अपने पौध से समूचे मलयागिरी को सुवासित करने में सफल हुआ या नहीं। राम के लव-कुश ने पिता की कीर्ति ध्वजा फहराई थी। कुंती के पांच पुत्र अपनी तथा साथ ही अपनी माता की भी यशोगाथा अजर-अमर बनाकर छोड़ गए। अपनी आकांक्षा भी ऐसी ही है। हम दोनों की अभिलाषा इन दिनों भी इसी स्तर की है। वह घटी नहीं वरन् बढ़ ही गई है।

पू. गुरुदेव अपने कर्त्तव्यों और संकल्पों के प्रति पूर्ण तथा जागरूक और प्रयत्नशील हैं। स्वयं प्रयत्न करने से लेकर अन्यान्य देवात्माओं के अनुदान हस्तगत करने में वे सफल होते रहे हैं। इन दिनों उनकी तत्परता और भी बढ़ गई है। उनका कोई संकल्प आज तक विफल नहीं हुआ, फिर अन्तिम संकल्प दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन का संकल्प अधूरा रहेगा, ऐसी आशंका किसी को भी नहीं करनी चाहिए। उनकी पीठ पर जो हाथ हैं, वे बड़े सबल हैं। इसी ढाल, तलवार के सहारे वे जो भी कदम उठाते हैं, उन्हें पूरा कर दिखाते हैं। दैवी सत्ता उन कार्यों की पूर्ति स्वयं करती और श्रेयाधिकारी अपने अनुचर को बनाती है।

यह पंक्तियां उनके संबंध में नहीं, वरन् परिजनों के संदर्भ में लिखी जा रहीं हैं। जिनमें जीवट है उन्हें उनका वंशधर बनना चाहिए और पिता की तुलना में पुत्र के अधिक समर्थ होने की उक्ति चरितार्थ करनी चाहिए। दशरथ की तुलना में उनकी संतान हर दृष्टि से वजनदार सिद्ध हुई।

हीरक जयंती के अवसर पर प्रत्येक जीवन्त प्रज्ञा पुत्र को अपने इसी अधिकार का दवा करना चाहिए और उसके लिए अपनी पात्रता सिद्ध करने की आत्मप्रेरणा से अनुप्राणित होना चाहिए। लक्ष्य स्पष्ट है। मार्ग प्रत्यक्ष हैं। पू. गुरुदेव को निर्देशन प्राप्त करना पड़ा, पर परिजनों को वैसी आवश्यकता नहीं है। वे बने हुए राजमार्ग पर चल सकते हैं, जिससे श्रेयाधिकारी बनने का, विभूतियां हस्तगत करने का सुयोग मिल सके। अपने वंशधरों की सर्वतोमुखी प्रगति की आशा करते हुए हम लोग यह उपेक्षा भी करते हैं कि वे अधिकार पाने के लिए कर्तव्य निबाहने का प्रयत्न भी करेंगे।

पू. गुरुदेव का जीवन उपासना, साधना और आराधना के त्रिविध अवलम्बनों के साथ आगे बढ़ा और ऊंचा उठा है। उसने इसी मूल्य पर परोक्ष दैवी अनुकम्पा और प्रत्यक्ष सम्पदा प्राप्त की है। अनुयायियों के लिए भी यही राजमार्ग है। वे आंधी, तिरछी मनुहार के सहारे विभूतिवान बनने की आशा न करें। आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के लिए इस राजमार्ग को छोड़कर कोई ‘‘शॉट कट’’ नहीं है। सीढ़ियों की उपेक्षा करके छत पर उछल कर नहीं चढ़ा जा सकता।

पू. गुरुदेव की उपासना जो भी चली हो, हमें उसकी नकल करने की अपेक्षा निर्देशन को पर्याप्त मानना चाहिए। यह आपत्तिकाल है। इसकी तीन माला गायत्री का जप, प्रातः कालीन सूर्य का ध्यान करते हुए नियमपूर्वक करते रहने से काम चल जायेगा, आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के अन्तरंग और बहिरंग को सुव्यवस्थित करने के लिए इतना बहुत है। दो नवरात्रियों में अनुष्ठान भर कर लिए जांय।

दस लाख परिजनों में से आठ लाख भी यदि तीन-तीन माला जप करें तो संकल्पित प्रज्ञा पुरश्चरण की पूर्ति होती रह सकती है, और उसके भागीदारों में से प्रत्येक को इस युग साधना का भागीदार बनने का गौरव मिल सकता है।

दूसरा चरण है- साधना। अर्थात् आत्मशोधन। इसके लिए लोभ, मोह और अहंकार के भव बंधनों को शिथिल करना होगा। यही तीन हैं जो महिषासुर भस्मासुर, और वृत्तासुर की तरह मनुष्य को ईश्वर की प्रदत्त दिव्य सम्पदाओं को निगलते रहते हैं। इन्हीं की खुमारी में मनुष्य लालची, संग्रही बनता है। दरिद्रता, व्यस्तता और उद्विग्नता से घिरा रहता है। यदि इन्हें सीमित, अनुबन्धित किया जा सके, “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना का रसास्वादन किया जा सके, सादगी, सज्जनता और विनम्रता को अपनाया जा सके तो फिर कोई ऐसा न रहेगा जो अपनी परिस्थिति के अनुरूप परमार्थ न कर सके। जहाँ प्रेम-परमार्थ होगा वहाँ स्वार्थ और पाप के पैर टिकना कठिन है।

हाजी हसन, सन्त राबिया को उपदेश दे रहे थे कि शैतान से घृणा करना चाहिए। सन्त राबिया ने कहा- “मेरे रोम-रोम में अल्लाह की मुहब्बत भर गई है। नफरत करने के लिए मेरे पास कुछ बचा ही नहीं।”

परमार्थ में हमारी जितनी तत्परता होगी उतनी ही पवित्रता और प्रखरता बढ़ती जायेगी। पू. गुरुदेव को आत्म संयम के लिए पाप, दोष निवारण के लिए अलग से कुछ भी निग्रह साधन नहीं करना पड़ा, वे अपनी उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को इतनी मजबूती से पकड़े रहे कि स्वार्थ और पाप की उन तक पहुँच ही न हो सकी, जिसे वे मारते, रोकते या भगाते। परिजनों को भी यही करना होगा। दोष-दुर्गुणों को हटाने की चेष्टा करने से वे और भी जोर देकर चढ़ेंगे। हमें उन्हें भूला देने के लिए उत्कृष्टता अपनाने का लक्ष्य इतनी तन्मयता और भावना पूर्वक अपनाना चाहिए कि दिमाग खाली रहने ही न पायें और उसमें शैतान का प्रवेश होने के लिए कोई अवसर ही न रहे। प्रकाश होने पर अन्धकार दूर होता है। लाठी लेकर उसे मारने से तमिस्रा से छुटकारा पाना कठिन है। पवित्र जीवन जीना हो, दोष-दुर्गुणों से पीछा छुड़ाना हो तो सत्प्रयोजनों में सच्चे मन और सुनिश्चित संकल्प के साथ जुट पड़ना चाहिए। आत्मशोधन की समस्या इस प्रकार सहज ही हल हो जायेगी। आराधना की दिशा में जितना अग्रसर हुआ जायेगा, आत्म शोधन की साधना उसी अनुपात से सहज ही सधती जाएगी।

आराधना- लोक सेवा इन दिनों क्या होनी चाहिए, इसकी जानकारी दूरदर्शी विवेकवानों को समय-समय पर कराई जाती रही है और कहा जाता रहा है कि दुर्मति ही दुर्गति का कारण है। चिन्तन का भटकाव ही असंख्य समस्याओं का मूल है। सड़े कीचड़ में से दुर्गन्धित कृमि कीट उपजते हैं और रक्त के विषाक्त होने पर अनेकानेक चर्म रोगों का उद्भव होता है। प्रज्ञा युग के अवतरण के लिए हमें घर-घर युग चेतना का अलख जगाना और जन-जन के मन-मन में युग संदेश का आलोक पहुँचाना है। युग समस्याओं को प्राथमिकता देते हुए हम कुछ समय के लिए धर्मशाला, मन्दिर, कूप, तालाब, औषधालय, प्याऊ, सदावर्त आदि ख्याति प्रदान करने वाले निर्माणों से हाथ खींच सकते हैं, और सर्वप्रथम सर्वोत्तम एवं सामयिक प्रज्ञा प्रसार को अग्रगामी बनाने के लिए प्रयत्नरत हो सकते हैं। इसके लिए जैसे-जैसे लोभ, मोह के बन्धन शिथिल होते जाँय, समय एवं साधन दान को आज की परम आवश्यकता मानते हुए हर परिजन को युग धर्म के निर्वाह में जुट जाना चाहिए।

पतन निवारण की इस सेवा के निमित्त दो ही उपाय हैं- (1) स्वाध्याय (2) सत्संग। इन्हीं दो के सहारे सद्ज्ञान का विस्तार हो सकता है और युग तमिस्रा से छुटकारा मिल सकता है।

सर्वविदित है कि प्रज्ञा परिवार की संरचना, संगठन और सत्प्रवृत्तियों की युग चेतना “अखण्ड-ज्योति” के माध्यम से बन पड़ी है। यह पू. गुरुदेव की परावाणी है। उसमें लेख नहीं छपते, वरन युग पुरुष का चिन्तन और चरित्र का सार संक्षेप लिपिबद्ध होकर कागज के पन्नों पर चिपका होता है। इस तथ्य पर हमें विश्वास करना चाहिए कि प्रज्ञा परिवार के विस्तार और उसके प्रयासों की जो विश्व भर में चर्चा है उसका श्रेय यदि किसी एक को देने का मन हो तो निःसंकोच उसे ‘‘अखण्ड-ज्योति’’ को दिया जा सकता है। हरिद्वार और मथुरा के संस्थान 2400 प्रज्ञा पीठें, 12 हजार प्रज्ञा संस्थान एवं दस लाख प्रज्ञा परिजन उसी के बेटे, पोते, परपोते हैं। अब इस कल्पवृक्ष की सिंचाई की अनिवार्य आवश्यकता पड़ रही है, अन्यथा जितना कुछ पिछले दिनों बन पड़ा उसी में विराम लग जायेगा।

सिंचाई से तात्पर्य है उसकी ग्राहक संख्या की अभिवृद्धि। हीरक जयन्ती वर्ष में प्रत्येक भावनाशील परिजन से आशा की गई है कि वह उसके न्यूनतम एक दो ग्राहक तो इन दिनों बना ही दें। अपने मित्र स्वजनों, परिचितों को इसका महत्व समझाकर और दबाव देकर इतना कार्य कोई भी कर सकता है। इस कार्य प्रयास को हीरक जयन्ती की प्रथम भावाभिव्यक्ति के रूप में गिना जाएगा।

इसके अतिरिक्त झोला पुस्तकालयों और ज्ञानरथों का चलाना है। जो एकाकी हैं वे झोला पुस्तकालय चलायें। नव लिखित फोल्डरों को निकटवर्ती दस व्यक्तियों को पढ़ाते रहने का संकल्प लें और निबाहें। नये फोल्डर और पुस्तकें मँगाते रहने के लिए कुछ मासिक बजट की व्यवस्था बनानी होगी। अन्यथा एक बार पढ़ा देने के बाद गाड़ी ठप्प हो जाएगी।

जहाँ छोटा, बड़ा संगठन है। प्रज्ञा परिवार की स्थापना प्रज्ञा संस्थान की योजना एवं प्रज्ञा पीठों की इमारत है, उन सबको यह समझना चाहिए कि जन-संपर्क साधने से ही जन समर्थन और जन सहयोग प्राप्त हो सकता है। इसलिए ज्ञानरथ से बढ़कर और सशक्त तरीका नहीं हो सकता। खादी प्रचार के लिए गाँधी जी देश के मूर्धन्य नेताओं को खादी की धकेल चलाने का निर्देश दिया था। उनके व्यक्तित्व के दबाव से खादी व्यापक और लोकप्रिय हो सकी। प्रज्ञा साहित्य का ज्ञानरथ चलाने के लिए प्रतिभाशाली लोगों को स्वयं चलाना चाहिए। यह कार्य नौकरों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। जहाँ पर आवश्यकता हो वहाँ उन्हें रखा तो जा सकता है पर यह नहीं हो सकता कि नौकर ही सारे काम कर दें और नेता लोग घर बैठे अपना काम दूसरों पर टालते रहें। ज्ञानरथ के लिए धकेल गाड़ी और पढ़ाने या बेचने के लिए प्रज्ञा साहित्य दोनों का ही समान रूप से प्रयत्न करना चाहिए। पूँजी का भी इन दोनों कार्यों में समान नियोजन होता है। बाजार और गली मुहल्लों में घूमती धकेल गाड़ी को देखकर दर्शकों की उत्सुकता एवं जिज्ञासा उस संदर्भ में बढ़ती है और चलाने वालों को अपना लक्ष्य पूरा करने का अवसर मिलता है। सुलतानपुर उ.प्र. के सीनियर एडवोकेट बाबू लखनलाल ने वर्षों ज्ञानरथ स्वयं चलाकर यह सिद्ध किया है कि यदि कोई झिझक संकोच छोड़कर सच्चे मन और पूरे उत्साह के साथ काम किया जाय तो एक जिला स्तर के नगर को मात्र एक व्यक्ति नव चेतना से अनुप्राणित कर सकता है।

अखण्ड-ज्योति के नये सदस्य बनाना और झोला पुस्तकालय एवं ज्ञानरथ चलाना इतने भर कार्य से स्वाध्याय आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। एक से दस का विस्तार होने लगे तो वर्तमान दस लाख परिजन इसी हीरक जयन्ती वर्ष में एक करोड़ में युग चेतना फूँकने का लक्ष्य पूरा कर सकते हैं।

सत्संग के लिए सबसे सरल, नाम मात्र के खर्च का और परिवार निर्माण का प्रयोजन पूरा करने का तरीका है विचारशीलों के जन्म दिन मनाना। इसका विधि विधान कठिन नहीं है। इसमें कोई भी शिक्षित व्यक्ति दो चार दिन के अभ्यास से प्रवीण हो सकता है। युग शिल्पी शिक्षण सत्रों में से एक-एक महीने की ट्रेनिंग लेकर लौटे हुए कितने ही प्रचारक हर क्षेत्र में पहुँच चुके हैं। जिस उत्साह से इन सत्रों में प्रचारक प्रकृति के लोग आ रहे हैं उससे प्रतीत होता है कि जन्म दिवसोत्सव मनाने के लिए गायकों, वादकों एवं वक्ताओं की कमी न रहेगी। यह आयोजन अपने छोटे क्षेत्र में एक नई उमंग भर सकते हैं और जिसका जन्म दिन है। उसे ‘हीरो’ बनाकर कुछ नई सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए बाधित कर सकते हैं। नव निर्माण का यह छोटा किन्तु बहुत ही सशक्त आधार है।

प्रज्ञा आयोजन भी इसी सत्संग प्रक्रिया को बड़े रूप में सम्पन्न करते हैं। शान्तिकुँज से जीप गाड़ियों में पाँच प्रचारकों की मण्डली वाद्य यन्त्रों, प्रवचन पंडाल, छोटी यज्ञशाला एवं लाउडस्पीकर समेत पहुँचती हैं। यह आयोजन प्रत्येक अच्छी संख्या वाले कस्बों में हो सकें इसके लिए सदैव प्रयत्न किए जाने चाहिए। जहाँ यह आयोजन सम्पन्न होते हैं वहाँ नई जागृति की लहर उत्पन्न होती है और नए सहयोगी उत्पन्न होते हैं। इन मण्डलियों को मात्र मार्ग व्यय देना पड़ता है जो आसानी से कही भी जुट सकता है।

हीरक जयन्ती वर्ष अभी दिसम्बर 85 तक चलेगा। सोचा जा रहा है कि इस अवधि में सभी प्रमुख प्रज्ञा परिजन हरिद्वार आने का प्रयत्न करें। इस अवधि में पाँच-पाँच दिन के “हीरक जयन्ती” सत्र चलेंगे। हर महीने तारीख 1 से 5, 6 से 10, 11 से 15, 16 से 20, 21 से 25 और 26 से 30 तक ये सत्र चलेंगे। हर महीने छः सत्र। आरम्भ होने से एक दिन पूर्व सायं काल तक शांतिकुंज पहुँच जाना चाहिए। पांचवें दिन दोपहर को भोजन के पश्चात सबको छुट्टी मिल जाएगी। बैटरी चार्ज करने के लिए जिस प्रकार पू. गुरुदेव को समय-समय पर हिमालय बुलाया जाता रहा है, ठीक इसी प्रकार इन पाँच दिवसीय सत्रों को उच्चस्तरीय आमन्त्रण माना जाना चाहिए। इनमें गुरुदेव से प्रत्यक्ष मिलना तो न हो सकेगा, पर उनके वीडियो फिल्म तैयार कर लिए गए हैं, जिनमें उनकी आज की स्थिति में झाँकी करने और वाणी सुनने का अवसर नित्य ही मिलता रहेगा।

इन पाँच दिवसीय सत्रों में दो दिन पूरे शांतिकुँज में रहना होगा। दो दिन दोपहर भोजन के बाद शाम तक ऋषिकेश, लक्ष्मण झूला, हरिद्वार, कनखल इन समीपवर्ती चार तीर्थों के दर्शन का अवसर मिल जाएगा। पांचवें दिन छुट्टी। इन सत्रों में उन्हें प्रवेश न मिलेगा जो मिशन की पूर्व भूमिका से परिचित नहीं हैं। इसलिए आगन्तुक अपना विस्तृत परिचय लिखकर अलग-अलग कागजों पर भेजें और स्वीकृति मिलने पर ही आने की तैयारी करें। स्थान सीमित होने से अपनी तारीखों का निश्चय पत्र व्यवहार द्वारा पहले ही कर लेना चाहिए, चाहे जब जा पहुँचने और प्रवेश पाने का आग्रह करने की बात किसी भी प्रकार न बनेगी। स्थान की कमी के कारण तारीखों का पूर्व निश्चय एक प्रकार से अनिवार्य ही माना गया है।

सन 85 में एक-एक महीने के युग शिल्पी सत्र तारीख 1 से 30 तक हर महीने चलते रहेंगे। उनमें सुगम संगीत, प्रवचन, प्रज्ञा पुराण कथा, जड़ी-बूटी चिकित्सा, फर्स्ट एण्ड शिक्षण आदि विषय पूर्ववत चलते रहेंगे। दस दिवसीय सत्र बन्द रहेंगे। उनके स्थान पर पाँच-पाँच दिन के संपर्क सत्र चलेंगे। इनमें सम्मिलित होने का अवसर किसी भी वरिष्ठ प्रज्ञा परिजन को चूकना नहीं चाहिए।

पू. गुरुदेव के स्थूल शरीर की झाँकी न होने पर भी सन् 2000 तक उनकी आत्मा गायत्री तीर्थ (शांतिकुंज) में छायी रहेगी। इसलिए जन्म दिवसोत्सव, विवाह दिवसोत्सव, बच्चों के मुण्डन, यज्ञोपवीत आदि संस्कार और बिना दहेज प्रदर्शन के अपने लड़के लड़कियों के विवाह कराने एवं दिवंगत पितरों के श्राद्ध तर्पण कराने के लिए जो शांतिकुंज आना चाहें, उनका स्वागत ही होगा। हीरक जयन्ती जो आगामी बसन्त तक जारी रहेगी, का उपयोग शांतिकुंज से संपर्क साधने और युग चेतना को व्यापक बनाने के निमित्त ही किया जाना चाहिए।




Quotation - Akhandjyoti May 1985

धैर्य यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गेहिनी सत्यं सूनुस्यं दया च भगिनी भ्राता मनः संयमः। शय्या भूमितलं दिशोऽपि वसनं ज्ञानमृतं भोजन मेते यस्य कुटुम्बिनो वद सखे कस्माद्भयं जायते॥ -बाण भट्ट

जिसका पिता धैर्य हो, क्षमा जिसकी माता हो, शान्ति जिसकी गृहिणी हो, सत्य जिसका पुत्र हो, दया बहन हो, संयम भाई हो, भूमितल शय्या हो, दिशाऐं वस्त्र हों, अमृतमय ज्ञान ही भोजन हो- इस प्रकार के परिवार से युक्त व्यक्ति के लिए हे मित्र! इस संसार में किससे भय होता है? अर्थात् किसी से नहीं।

*समाप्त*