याचना नहीं, प्रार्थना - Akhandjyoti March 1985

भगवान से प्रार्थना कीजिए, याचना नहीं। आपकी स्थिति ऐसी नहीं कि कमियों और कमजोरियों के कारण किसी का मुँह ताकना पड़े और याचना के लिए हाथ फैलाना पड़े।

प्रार्थना कीजिए कि आपका प्रसुप्त आत्म−बल जागृत हो चले। प्रकाश का दीपक जो विद्यमान है वह टिमटिमाये नहीं वरन रास्ता दिखाने की स्थिति में बना रहे। मेरा आत्म−बल मुझे धोखा न दे। समग्रता में न्यूनता का भ्रम न होने दे।

जब परीक्षा लेने और शक्ति निखरने संकटों का झुंड आये तब मेरी हिम्मत बनी रहे और जूझने का उत्साह। लगता रहे कि यह बुरे दिन अच्छे दिनों की पूर्व सूचना देने आये हैं।

प्रार्थना कीजिए कि हताश न हों, लड़ने की सामर्थ्य को पत्थर पर घिसकर धार रखते रहें। योद्धा बनने की प्रार्थना करनी है, भिक्षुक बनने की याचना नहीं। जब मेरा भिक्षुक गिड़गिड़ाये तो उसे दुत्कार देने की प्रार्थना भी भगवान से करते रहें।




अन्तः में प्रतिष्ठित आनन्द की गंगोत्री - Akhandjyoti March 1985

भगवान बुद्ध से एक बार श्रेष्ठि सुमन्तक न पूछा− ‘‘भन्ते, अक्षय आनन्द की प्रगति का क्या उपाय हैं?” इस पर तथागत ने उत्तर दिया− ‘इच्छाओं का त्याग करना।’ प्रसंग को अधिक स्पष्ट कराने के लिए जिज्ञासु ने पूछा− ‘बिना इच्छा के कोई कर्म तक नहीं हो सकता फिर इच्छा न रहने से तो निष्क्रियता छा जायगी और निर्वाह तक कठिन हो जायेगा।

भगवान ने विस्तार से बताया कि इच्छा त्याग से तात्पर्य बुद्धि कर्म का परित्याग नहीं, वरन व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं को छोड़कर आदर्शों के लिए काम करना है। शरीर रक्षा, परिवार पोषण एवं सामाजिक सुख-शान्ति का ऊँचा उद्देश्य रखकर जो काम किये जायेंगे उनमें स्वार्थान्धता नहीं रहेगी न उनके लिए दुष्कर्म करने पड़ेंगे। सामर्थ्य भर प्रयत्न करने पर जितनी सफलता मिलेगी उसमें सन्तोष रखते हुए आगे का प्रयास जारी रखा जायेगा। यही है इच्छाओं का त्याग। जिनमें किन्हीं आदर्शों का समावेश नहीं होता− लोभ और मोह की पूर्ति ही जिनका आधार होता है वे ही हेय और त्याज्य मानी गई हैं।

ईमानदारी के साथ सदुद्देश्य लेकर मनोयोगपूर्वक श्रम किया जाय यह कर्त्तव्य है। कर्त्तव्य कर्म करने के उपरान्त जो प्रतिफल सामने आये उससे प्रसन्न रहने का नाम सन्तोष है। सन्तोष का वह अर्थ नहीं है कि जो है उसी को पर्याप्त मान लिया जाय, अधिक प्रगति एवं सफलता के लिए प्रयत्न ही न किया जाय। ऐसा सन्तोष तो अकर्मण्यता का पर्यायवाचक हो जायेगा। इससे तो व्यक्ति दरिद्र रहेगा और समाज की समृद्धि बढ़ती है।

दार्शनिक गेरॉल्ड की परिभाषा के अनुसार सन्तोष, निर्धनों का निजी बैंक है, जिसमें पर्याप्त धन भरा रहता है। जार्ज इलियट का मत भी इसी से मिलता−जुलता है, वे कहते थे ‘असन्तोषी कभी अमीर नहीं हो सकता और सन्तोषी के पास दरिद्रता फटक नहीं सकती।’ उदार और दूरदर्शी मस्तिष्कों में सन्तोष का वैभव प्रचुर मात्रा में भरा रहता है। आनन्द की तलाश करने वाले को उसकी उपलब्धि संतोष के अतिरिक्त और किसी वस्तु या परिस्थिति में हो ही नहीं सकती। सुकरात ने एक बार अपने शिष्य से कहा था− ‘सन्तोष ईश्वर प्रदत्त सम्पदा है और तृष्णा अज्ञान के असुर द्वारा थोपी गई निर्धनता।’

परिणाम को आनन्द का केन्द्र न मानकर यदि काम का उत्कृष्टता की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाय और उसका स्तर ऊँचा रखने में प्रयत्न किया जाय तो सदा उत्साह बना रहेगा और साथ ही आनन्द भी। कलाकार ब्राडनिंग कहते थे− ‘हम किसी काम को छोटा न मानें वरन जो भी काम हाथ में है उसे इतने मनोयोग के साथ पूरा करें कि उसमें कर्ता का व्यक्तित्व बोलने लगे। ऐसे कार्य अपने कर्ता के लिए श्रेय और सम्मान का कारण बनते हैं भले ही वे अधिक महत्वपूर्ण न हों।’ मनस्वी रस्किन की उक्ति है− ‘काम के साथ अपने को तब तक रगड़ा जाय जब तक कि वह सन्तोष की सुगन्ध न बखेरने लगे।’ वल्टियर ने लिखा है किसी काम का मूल्याँकन उसकी बाजारू कीमत के साथ नहीं, वरन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि उसके पीछे कर्ता का क्या दृष्टिकोण और कितना मनोयोग जुड़ा रहा है। अब्राहम लिंकन का यह कथन कितना तथ्यपूर्ण है जिसमें उन्होंने कहा था− हम जिस काम में जितना रस लेते हैं और मनोयोग लगाते हैं वह उतना ही अधिक आनन्ददायक बन जाता है।

आनन्द के लिए किन्हीं वस्तुओं या परिस्थितियों को प्राप्त करना आवश्यक नहीं और न उसके लिए किन्हीं व्यक्तियों के अनुग्रह की आवश्यकता है। वह अपनी भीतरी उपज है। परिणाम में सन्तोष और कार्य में उत्कृष्टता का समावेश करके उसे कभी भी, कहीं भी और कितने ही बड़े परिमाण में उसे पाया जा सकता है।




सत्य को विवेक की कसौटी पर कसा जाय। - Akhandjyoti March 1985

भगवान का सर्वश्रेष्ठ और सार्थक नाम हैं− ‘सत्य नारायण’ इसका अर्थ होता हैं− सत्य ही नारायण है। इस सम्बन्ध में यह भ्रान्ति चली आती है कि नारायण ही सत्य है। पहले गान्धी जी भी ईश्वर ही सत्य है। ऐसा कहते रहे हैं। बाद में गम्भीर विचारणा के उपरान्त उन्होंने ‘सत्य की ईश्वर है।’ यह कहना आरम्भ किया था। सत्य के पीछे मात्र श्रद्धा नहीं यथार्थता भी है और उसे उलट−पुलट कर जाँचा जा सकता है। प्रामाणिकता इसी आधार पर बनती है। जो प्रामाणिक हैं उसी को श्रद्धास्पद मानने की अन्तर से मान्यता उभरती है।

नारायण के अनेक नाम रूप हैं। इतना ही नहीं उनके स्वभाव, प्रयास और निर्देशन में भी असाधारण अन्तर हैं। अनेक धर्म सम्प्रदायों ने ईश्वर की जो व्याख्या विवेचना की है, उनके निर्देशों की जो व्याख्या की है वह ऐसी है जो एक−दूसरे के कथन से बहुत अंशों में संगति नहीं खाती। एक धर्म का ईश्वर पूर्ण अहिंसावादी है यहाँ तक कि पानी में रहने वाले− साँस के साथ वायु में उड़ने वाले और धूलि कणों में रहने वाले अदृश्य जीव−जन्तुओं तक पर दया करने और उनकी हिंसा न होने देने का निर्देश करता है। दूसरे सम्प्रदाय का ईश्वर इससे भिन्न प्रकृति का है, उसे प्रसन्न करने के लिए पशुबलि आवश्यक है किन्तु ईश्वर अपने−अपने पर्वों पर इसी बलि के निमित्त निरीह प्राणियों की रक्त धार बहाने में प्रसन्न होते माने जाते हैं। एक सम्प्रदाय का ईश्वर सभी प्राणियों में अपनी आत्मा देखने का निर्देशन करता है। दूसरे सम्प्रदाय वाला इसमें निर्धारित मान्यताओं से इन्कार करने पर काफिर नास्तिक कहलाता है और प्राणदण्ड तक का अधिकारी बन जाता है। दोनों में से कौन सच्चा रहा कौन झूठा। इनमें से किसी की बात मानी जाय? किसकी न मानी जाय? यह बड़ा असमंजस है। वनवासी कबीले ईश्वर को अपना पक्ष घर बनाने के लिए प्रति पक्षी कबीले वालों को जितनी अधिक संख्या में−जितनी निर्दयता से बलि कर सकते हैं उतनी ही अपनी भक्ति भावना को सार्थक हुई मानते हैं। कई सम्प्रदायों का ईश्वर ध्यान, धारणा के सहारे वशवर्ती होता है। कई ईश्वरों के लिए महंगे धार्मिक कर्मकाण्डों का विधान है। अश्वमेध जैसे कृत्य सुसम्पन्न राज−दरबारी ही कर सकते हैं। अन्य पन्थ वाले राम नाम लेने भर से भक्ति का समग्र उद्देश्य पूरा हुआ मान लेते हैं। किसी−किसी के अनुसार ध्रुव, भागीरथ या पार्वती जैसी काय कष्ट वाली साधनाएँ लम्बे समय तक करनी पड़ती हैं। यह सभी बातें ऐसी हैं जिन्हें एक−दूसरे को सामने रखकर समीक्षा की जाय तो भारी भ्रम उत्पन्न होता है कि इन ईश्वरों में से किसका कथन निर्देशन सही माना जाय किसका गलत। जब सभी धर्म एक ईश्वर की मान्यता करते हैं तो उनके इलहामों, मंतव्यों और स्वरूप में इतना अन्तर क्यों होना चाहिए। इस विभिन्नता और विचित्रता के रहते किसे मान्य ठहराया जाय किसे अमान्य। किसे अपनाया जाय और किसे गलत कहा जाय। सूर्य एक है तो उसकी आकृति और प्रकृति भी संसार भर में एक जैसी मान्यता प्राप्त किये हुए है। फिर ईश्वर के सम्बन्ध में वैसी एक मान्यता हजारों लाखों भक्ति भाव चलते रहने पर भी क्यों न बन सकी।

सत्य के महत्व, माहात्म्य के सम्बन्ध में उसकी महिमा असीम बताई गई है। “साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप” वाली उक्ति में सत्य को सर्वोपरि महत्व का पुण्य बताया गया है। यह बात इसलिए गले उतरती है कि उसके आधार पर हम यथार्थता के अधिकतम समीप पहुँचते हैं। सत्य में मतभेदों की गुंजाइश नहीं है। विज्ञान इसी आधार पर सर्वमान्य बना है कि उसकी क्रिया और परिणति में कहीं कोई अन्तर नहीं पाया जाता और उसे बिना किसी अड़चन के सभी लोग मान्य करते और प्रयोग में लाते हैं।

गान्धी जी ने अपनी आत्मकथा को ‘सत्य नुं प्रयोग’ नाम दिया है। वे आजीवन सत्य का प्रयोग परीक्षण करते रहे हैं। और उन्हीं अनुभूतियों को जीवन गाथा के रूप में लिखा है। सत्य ही नारायण है इस मान्यता के अनुरूप सत्य नारायण व्रत या माहात्म्य का प्रचलन हुआ है।

अब यहाँ भी प्रश्न उठता है कि एक समय के सत्य का दूसरे समय के सत्य में अन्तर पड़ जाता है। परिस्थिति भेद से भी उसमें उलट−पुलट होती रहती है। ऐसी दशा में कैसे जाना जाय कि सत्य का यथार्थ स्वरूप क्या है? किसी समय पृथ्वी को ब्रह्माण्ड का मध्यवर्ती ध्रुव माना जाता था और कहा जाता था कि सूर्य आदि सब ग्रह उसकी परिक्रमा करते हैं पृथ्वी स्थिर है। यह मान्यता अधिक समय स्थिर न रही। विज्ञान की अगली खोजों ने पुरानी मान्यता को झुठला दिया और कहा सूर्य के इर्द−गिर्द सौर-मण्डल के ग्रह−उपग्रह चक्कर काटते हैं। इतना ही नहीं, यह भी कहा गया है कि अपनी निहारिका में ऐसे करोड़ों सूर्य और उनके सौर मण्डल हैं। अपना सूर्य किसी बड़े महासूर्य की परिक्रमा में अपने परिकर समेत घूमता है। पुराने समय का वही सत्य था और आज का यही सत्य है। सम्भव है अगले दिनों इन मान्यताओं में और कोई परिवर्तन करना पड़े। ऐसी दशा में ईश्वर की भाँति सत्य की स्थिति भी अनिश्चित हो जाती है। तब हम भ्रम मुक्त सत्य तक कैसे पहुँचे?

यहाँ एक कसौटी की आवश्यकता पड़ती है। वह है विवेक। इसके सहारे हम क्रमशः एक−एक सीढ़ी पार करते हुए सत्य के अधिकतम निकट पहुँचने का प्रयास जारी रख सकते हैं। बुद्धि और विवेक का यहाँ अन्तर समझने की आवश्यकता है। बुद्धि अपनी मान्यता या रुचि का समर्थन करने के लिए उलझन में ही फँसे रह जाते हैं। दोनों पक्ष के वकील अपने−अपने यजमान को सफल बनाने के लिए तर्कों का ढेर लगा देते हैं। कानून की धाराओं का ऐसा अर्थ करते हैं। जिससे प्रतीत होता कि उनका कथन ही सच है। परस्पर विरोधी दावों के दोनों पक्ष सही हों यह हो नहीं हो सकता फिर भी वकील उसके लिए एड़ी-चोटी का बल लगाते हैं और झूठ को सच साबित करने की कोशिश करते हैं। न्यायाधीश को विवेक कह सकते हैं। वह पक्ष और विपक्ष दोनों की बात तो सुनता है पर बुद्धि द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों से प्रभावित नहीं होता। अपनी स्वतन्त्र चेतना से न्याय एवं औचित्य के सहारे वस्तुस्थिति को समझने का प्रयत्न करता है और तद्नुसार ही निर्णय कर रहा है। सत्य में इतना दम खम होना चाहिए कि वह तर्कों को मान्य−अमान्य कर सके।

विभिन्न धर्म सम्प्रदाय अपनी−अपनी मान्यताओं को सही सिद्ध करने के लिए तर्कों के ढेर लगा देते हैं। सभी पक्षों के तर्क आकर्षक लगते हैं। इतने पर भी एक-दूसरे के विरोधी होते हैं। ऐसी दशा में तार्किक और बुद्धिवादी मान्य नहीं हो सकते। औचित्य एवं न्याय का पक्षधर विवेक ही तत्कालीन सत्य ठहरता है। किन्तु इसमें भी गुंजाइश रहती है कि पूर्ण निर्णय में खामी रही है और उसका सुधार परिमार्जन किया जाय। छोटे कोर्ट के फैसलों को हाई कोर्ट के सामने−हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट के सामने इसीलिए प्रस्तुत किया जाता है और खामी रही हो तो उसे ठीक कराया जाता है।

ईश्वर की तरह सत्य सम्बन्धी मान्यताओं को भी परिवर्तनशील माना जाता है और इसीलिए विवेक की सार्वजनिक हित की−औचित्य की कसौटी पर कसा जाता है। गान्धी जी ने अपनी जीवनचर्या सत्य के प्रयोग में नियोजित रखी और जब उन्हें प्रतीत हुआ कि पहले की अपेक्षा अधिक सही मार्ग पा रहे हैं तो उन्होंने पूर्वाग्रह को तिलाञ्जलि देकर अन्तरात्मा की आवाज को स्वीकारा। भले ही इसके लिए अस्थिर मति होने का दोष सहना पड़ा हो।

सत्य की मोटी परिभाषा जो बात जैसी सुनी या समझी हो उसे उसी रूप में कह देना मानी जाती है पर यह आवश्यक नहीं कि जानकारी को यथावत् ही कह दिया जाय। दार्शनिक हेगल के अनुसार कथन में यथावत् प्रयुक्त होने वाला एक प्रतिशत ही औचित्य की कसौटी पर खरा उतरता है। ढेरों प्रसंग ऐसे होते हैं जिनमें जानकार होते हुए भी अनजान बनना सत्य के अधिक निकट होता है? चोर के पूछने पर कोई अपनी सम्पदा का विवरण क्यों बताये? युद्ध संचालक सेनापति अपनी गठी योजना क्यों प्रकट करे? गुप्तचर जिस काम के लिए नियुक्त हैं उसका ब्यौरा क्यों प्रकट करे? किसी के चरित्र पर लाँछन लगाने और उसका भविष्य बिगाड़ने को भला सत्य वचन बोलते फिरने की क्या और आवश्यकता समझी जाय?

सत्य का यथा अवसर बोलने में भी प्रयोग किया जाय तो हर्ज नहीं, पर इससे पूर्व विवेक की कसौटी पर यह परखा जाना चाहिए कि इस कथन का भावी परिणाम क्या होगा? जिसमें सुधार होने की गुंजाइश है, जिससे लोक हित सधता है, उसे प्राथमिकता देनी चाहिए और सत्य वचन उतना ही बोलना चाहिए जिसमें किसी अनर्थ की आशंका न हो।

समग्र सत्य बहुत बड़ा है। मनुष्य की समझ सीमित है। सीढ़ी पर एक−एक पैर रखते हुए चढ़ा जाता है। यथार्थता की खोज के लिए हमें अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए। प्राचीन काल में कोई प्रथा प्रचलन ऐसे रहे होंगे जो उस समय सही माने गये होंगे, किन्तु आज का विवेक उसे स्वीकार नहीं करता तो पूर्व पुरुषों के कथन अथवा कृत्य को ध्यान में रखते हुए उसी परिपाटी को अपनाने की आवश्यकता नहीं है। मध्यकाल में कितनी ही प्रथाएँ उस समय के चिन्तन के अनुसार सही समझी जाती रही हैं, पर आज उनकी कोई उपयोगिता नहीं समझी जाती तो पुस्तकों के उल्लेख, किसी बड़े आदमी के अनुकरण या विद्वान के कथन को प्रमाण मानकर उन पुरातन व्यवहारों का अनुसरण करने की आवश्यकता नहीं समझी जानी चाहिए। विवेक, औचित्य न्याय को इस कसौटी पर कसा जाना चाहिए कि मान्यता या निर्णय की प्रतिक्रिया स्वयं उनके ऊपर बीतने पर क्या होगी? यह विवेक और औचित्य का सारथी रखकर ही निर्णय किया जा सकता है।




सोलन की बहुत ख्याति (kahani) - Akhandjyoti March 1985

उन दिनों दार्शनिक सोलन की बहुत ख्याति थी। उसके द्वारा कहे गये वचन सर्वत्र प्रामाणिक माने जाते थे। यूनान के बादशाह के मन में आया कि वह सोलन को राजमहल में बुलाकर अपना वैभव दिखायें, उपहार दे और उसके मुँह प्रशंसा कराये। इस प्रकार सभी उसे बुद्धिमान, शूरवीर और धर्मात्मा मानने लगेंगे।

एक दिन सोलन को उसने किसी बहाने राजमहल में बुला ही लिया और सारा वैभव भी दिखा डाला। उपहारों की पिटारियां सामने रखीं। पर दार्शनिक चुप ही रहे। बार−बार पूछने उकसाने पर भी उनने कुछ न कहा। जब विवश किया गया तो इतना ही कहा− ‘‘मेरा चुप रहना ही भला है। प्रशंसा करने योग्य मैंने कुछ देखा ही नहीं और निन्दा आपको सहन न होगी।”

बादशाह खीज गया उसने खम्भे में बाँधकर सोलन को गोली से उड़वा दिया।

बात पुरानी हो गई। उस बादशाह पर दूसरे राजा ने चढ़ाई की और जीत लिया। हारने पर खम्भे से बाँधकर गोली मारने का उन दिनों रिवाज था। सो वही उसके साथ भी हुआ, दिन ठीक वही था जिस दिन दस वर्ष पूर्व सोलन को मारा गया था।

मरते समय राजा ने कहा− ‘‘सोलन तुम्हीं ठीक थे। दौलत की जागीरें जिस तिस प्रकार जमा करके मैंने वस्तुतः वैसा कुछ नहीं किया था जिस पर कि तुम जैसे विचारशील के मुँह से प्रशंसा सुन सकता।”




भगवान की समीपता और अनुकम्पा - Akhandjyoti March 1985

सारे शहर में जो बिजली काम करती है वह उत्पादक जनरेटर में उत्पन्न होती है। फिर जगह−जगह हलके भारी व ट्रांसफारमर अपने−अपने क्षेत्र के लायक पावर उसमें से खींचते हैं। मुहल्लों और घरों के लिए कितनी शक्ति चाहिए उस अनुपात से हलके भारी तार लगाने पड़ते हैं। भगवान को एक असीम शक्ति स्रोत समझा जा सकता है। उसी की सामर्थ्य से बल्ब, पंखे, हीटर, कूलर आदि जलते हैं और विविध प्रयोजनों की पूर्ति होती है। दृष्टिगोचर बिजली अनेक स्थानों पर पड़ती है पर उसका उद्गम केन्द्र उत्पादक स्थान पर एक ही जगह होता है।

मनुष्य समेत सब प्राणियों को भगवान ने अपना अंश उतनी मात्रा में समान रूप से दिया है जिससे दैनिक जीवनचर्या के आवश्यक काम−धाम सरलतापूर्वक निपटते रहें। किन्तु यदि किन्हीं की आत्मिक महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए अधिक सामर्थ्य चाहिए तो ट्रान्सफारमर, मीटर, स्टार्टर, तार आदि उपकरण उसी हिसाब से बढ़ाने पड़ते हैं। इतना करने पर अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति होने लगती है। इसी प्रक्रिया को ईश्वर के साथ घनिष्ठता स्थापना कह सकते हैं। पानी की टंकी में ढेरों पानी भरा होता है पर अपने नल का छेद जितना मोटा होता है उसी अनुपात से पानी निकलता है। ज्यादा मोटी धार चाहिए तो पाइप बदलना पड़ता है। छोटे स्थान वाले के स्थान पर बड़ा लगाना पड़ता है। छोटे चूल्हे में, छोटे बर्तन में जरा−सा खाना पकाने के लिए धीमी आग जलती रहे तो भी काम चल जाता है पर यदि बड़े बर्तन में ज्यादा सामान पकाना हो तो चूल्हा बड़ा बनाना पड़ेगा और ईधन अधिक जलाना पड़ेगा। इन तथ्यों से पता चलता है कि बिजलीघर, पानी की टंकी या अग्नि देवता से किसी का व्यक्तिगत राग−द्वेष नहीं है। न वे किसी पर कृपा करते हैं और न रुष्ट होते हैं। एक सिद्धान्त निर्धारित है उसे जो अपनाते हैं वे अधिक लाभ उठाने की प्रक्रिया पूरी करते हैं। इसी को कहते हैं ईश्वर के साथ घनिष्ठता की स्थापना। इसके लिए खुशामद या चापलूसी का रास्ता अपनाना बेकार है। वे घटिया लोगों द्वारा घटिया स्तर वालों के साथ अपनाये जाने वाले ओछे हथकण्डे हैं। राज दरबारों में कभी चारण लोग नियुक्त रहते थे। मालिक सामन्त की प्रशंसा में कविताएँ लिखा करते थे, जिस अधिक गर्व फुलाने वाली कविता बन पड़ती थी उस दिन अच्छा इनाम मिलता था। बच्चों को कम कीमत का खिलौना दिया जाय तो वे कम प्रसन्नता व्यक्त करते हैं पर यदि कोई अधिक कीमत वाला चाबीदार खिलौना ला दिया जाय तो अधिक प्रसन्न होते और उछलने लगते हैं। प्रसन्नता व्यक्त करते और गोदी में दौड़कर चढ़ते हैं। ईश्वर के बारे में अनेक लोगों की मान्यता यही है कि उसकी प्रशंसा के गीत गाये जाँय, नाम रटा जाय तो चारणों की तरह अधिक लाभ उठाया जा सकता है। पूजा−अर्चा की सस्ती या महंगी सामग्री देकर भी लाभान्वित हुआ जा सकता है। यह रिश्वत वाला तरीका हुआ जो ओछे लोगों द्वारा उथले अफसरों के साथ बरता और योग्यता न होते हुए भी ऐसी ही उलटी−तिरछी तिकड़में चलाकर मतलब निकाला जा सकता है। ईश्वर के साथ यह हथकण्डे बरतना व्यर्थ है। उसकी हैसियत और हस्ती बड़ी है। वे सिद्धान्त के अनुरूप ही किसी पर अनुग्रह करते और बेरुखी दिखाते हैं।

बैंक से लोन लेना हो या चैक भुनाना हो तो उसके लिए पात्रता सिद्ध करनी पड़ती है। बैंक मैनेजर को चन्दन पुष्प चढ़ाकर उससे मन मानी रकम का चैक नहीं भुनाया जा सकता। अफसर के चुनाव में पब्लिक सर्विस, कमीशन, उम्मीदवारों की कई प्रकार की कड़ी परीक्षा लेता है। यहाँ तक कि मेडिकल कालेज के दाखिले में पी॰ एम॰ टी॰ का इम्तहान देना पड़ता है। छात्रवृत्ति हर किसी को नहीं मिलती। इसके लिए अच्छी श्रेणी से उत्तीर्ण होना आवश्यक है। यदि इन झंझटों से बचकर कोई शॉटकट अपनाना चाहे और प्रशंसा करने, उपहार देने की नीति अपनाना चाहे तो अभीष्ट सफलता सम्भव न हो सकेगी।

ईश्वर के साथ घुलने या उसे अपने साथ घुलाने के लिए आवश्यक है कि दोनों पक्षों का स्तर समान हो। दूध में पानी या शकर मिलाई जा सकती है क्योंकि उनके कण एक जैसे वजन के होते हैं। यदि बालू मिला दी जाय तो घुलेगी नहीं वजनदार होने के कारण नीचे बैठ जायेगी। विवाह निश्चित करते समय लड़की लड़के की योग्यता, आयु आदि का विधि वर्ग मिलाना पड़ता है। वर पच्चीस साल का, वधू पाँच साल की वाला प्रस्ताव रखने वाले का उपहास ही होगा। लोक-सभा विधान-सभा की सीट पर कोई भी आदमी इधर−उधर की बातें बनाकर बैठ नहीं सकता। इसके लिए उसे निर्धारित क्षेत्र के मतदाताओं के विश्वास वोट प्राप्त करने होते हैं।

जिन्हें ईश्वर की महत्ता का बोध और विश्वास हो और जो उसका अतिरिक्त अनुग्रह चाहते हैं उन्हें याचक का दृष्टिकोण मन से बिलकुल ही हटा देना चाहिए। खुशामद या रिश्वत का हथकण्डा भी भूल जाना चाहिए। इसमें समय की बर्बादी भर है, और फलतः निराशा, थकान और खीज ही हाथ लगती है। व्यक्तियों के साथ लोकाचार भी काम दे जाते हैं पर भगवान व्यक्ति नहीं, शक्ति है उनकी सारी व्यवस्था सुनिश्चित सिद्धान्तों पर चल रही है। उनसे न व्यक्तिगत अनुग्रह की आशा करनी चाहिए और न निष्ठुरता की। बिजली से लाभ उठाना है तो उसकी पद्धति जाननी चाहिए और तारों का सही उपयोग करना चाहिए। आग से लाभ उठाना है तो उसका सही उपयोग समझना चाहिए। इसमें भूल करने पर वे अपने घर में रहते हुए भी− सज-धज, के साथ रखने पर भी संकट खड़ा करेगी। बिजली के खुले तार छूते ही प्राण संकट सामने होगा। आग को इधर−उधर बखेरने पर न केवल घर जलेगा वरन फैली हुई आग से मुहल्ले भर का सफाया हो जायेगा। बिजली या आग की मनुहार करने भर से इच्छित लाभ उठाया जाना सम्भव नहीं है।

आत्मा को परमात्मा के निकट बैठने योग्य और आदान−प्रदान का क्रम चलाने योग्य बनाने के लिए समस्त ध्यान अपनी पात्रता विकसित करने पर केन्द्रीभूत करना चाहिए। अतिरिक्त क्षमताएँ उपलब्ध होने का द्वार खुल जायेगा। इसमें उपेक्षा बरतने और भक्त वत्सल नाम की व्याख्या विवेचना करते रहने पर कोई काम बनने वाला नहीं है। भगवान निष्ठुर भी है। उसकी निष्ठुरता श्मशान घाटों में जलती हुई जवानियां, अस्पतालों में कराहते हुए, बन्दी गृह में प्रताड़ना सहते हुए, लोगों को देखकर समझी जा सकती है। वे अपने आप में न निष्ठुर हैं न दयालु। जो जैसा है उसके लिए वैसी ही प्रतिक्रिया बन कर सामने आ खड़ी होती है।

इस संदर्भ में पूजा उपासना का भी महत्व है ताकि उस आधार पर हमें हमारे कर्त्तव्य और लक्ष्य का बोध निरन्तर बना रहे। उपासना उपक्रम में उन्हीं तथ्यों का सार संक्षेप एवं संकेत है जिनके सहारे व्यक्ति को अपने कषाय−कल्मषों का परिमार्जन करने का प्रयास संकल्प पूर्वक करते रहने की प्रेरणा मिलती रहे। शरीर में दुष्प्रवृत्तियों का अभ्यास रहता है और मन में अनेकों दुर्भावनाएँ जन्म−जन्मान्तरों से लिपटी चली आती हैं। इनका परिशोधन आवश्यक है। कपड़ा रँगने से पहले उसे अच्छी तरह धोया जाता है। मैले−कुचैले तेल, तारकोल में सने कपड़े पर कोई भी रंग चढ़ाया जाय, चढ़ेगा ही नहीं। खेत में बुवाई करने से पूर्व उसकी जुताई करनी पड़ती है। अन्यथा खर−पतवार, कंकड़, कचरा, भरे हुए खेत में कितना ही बढ़िया बीज डालने पर भी कुछ उगने वाला नहीं है। भक्ति, भावना, पूजा−पाठ, जप-तप, मन्त्र−जप, साधन विधान का प्रतिफल होता तो है पर इससे पूर्व व्यक्तित्व में पवित्रता और प्रखरता का अधिकाधिक समावेश होना चाहिए। इसके अतिरिक्त अपनी परिशोधित क्षमताओं को लोक मंगल के खेत में बोया जाना चाहिए ताकि वे बीज की तरह गलें और विशाल वृक्ष बनकर फूलें फलें।

सघन वृक्षों में आकर्षण शक्ति होती है और वह आसमान में उड़ते हुए बादलों को नीचे खींचती तथा बरसने के लिए मजबूर करती हैं। जिस क्षेत्र में पेड़ कट जाते हैं उस क्षेत्र के ऊपर होकर बादल उड़ते हुए निकल जाते हैं बरसते नहीं। पेड़ कटने की वजह से वर्षा बन्द हो जाती है और वह भूमि रेगिस्तान बन जाती है। ठीक यह बात भक्त और भगवान के सम्बन्ध में है। भक्त का पहला काम आत्म−शोध करना होता है। व्यक्तित्व को पवित्र एवं प्रखर बनाना पड़ता है। इसके बाद खिले हुए फूल पर भौंरे−तितलियाँ, मधु−मक्खियाँ, दैवी शक्तियाँ बैठना−अनुग्रह बरसाना आरम्भ करती हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि गन्दा, गलीज, दूषित, निकृष्ट, पतित जीवन जिया जाता रहे और साथ ही दूसरी ओर उल्टा-पुल्टा नाम जप करके सिद्धियों का, स्वर्ग मुक्ति का लाभ भी उठाया जाता रहे। पतित व्यक्तियों का भी उद्धार तो हुआ है पर उन्हें भगवान का आश्रय लेने से पूर्व अपनी अभ्यस्त कुटिलताओं को तिलाञ्जलि देनी पड़ी है।

बाल्मीकि डाकू से ऋषि बने पर यह भी स्पष्ट है कि जिस दिन से राम नाम लिया उस दिन से चोरी डाके आदि का नाम नहीं लिया। गणिका का उद्धार तो हुआ पर जिस दिन से शरणागत हुई उस दिन से उसका मन दुराचार से सैकड़ों योजन पीछे हट गया। अंगुलिमाल का काम नित्य हत्याएँ करना था पर 108 अंगुलियाँ काट कर देवी को चढ़ाता था पर जिस दिन से बुद्ध की शरण में आया उस दिन से एक भी ऐसा पर कुकृत्य नहीं किया। अजामिल जब कसाई था तब था पर भक्त समुदाय में सम्मिलित होने पर करुणा का पुँज बन गया और छुरा नदी में बहा दिया। सदन कसाई की कथा भी ऐसी है। तुलसीदास, बिल्व मंगल का पिछला जीवन कामुक रहा होगा पर भक्ति रस का पान करते ही वह घिनोनापन शरीर और मन से पूरी तरह निकाल दिया।

ऐसा नहीं हो सकता कि घिनौना जीवन जिया जाता रहे। चिन्तन और चरित्र दुष्प्रवृत्तियों से घिरा रहे और जीभ से राम नाम के अक्षरों को उच्चारण करने भर से यह आशा की जाने लगे कि भक्तों जैसी सिद्धि और सद्गति पीछे−पीछे फिरेगी। राम का नाम और राम का काम दोनों परस्पर गुँथे होने चाहिए। किसने कितनी बार किन अक्षरों का उच्चारण किया इस आधार पर भक्ति का लक्ष पूरा नहीं होता। पहली शर्त अन्तःकरण की पवित्रता श्रद्धा, सद्भावना और सेवा परायणता है। इसके उपरान्त पूजा उपासना का कर्मकाण्ड है। उसे शोभा-सज्जा की श्रेणी में गिना गया है। चरित्र स्वास्थ्य है और उपचार उस पर चढ़ाया हुआ श्रृंगार। दोनों साथ−साथ चलें तो शोभा होती है पर यदि स्वास्थ्य गल गया हो। मृत्यु सिर पर मंडराई हो तो रेशमी वस्त्र और स्वर्ण अलंकार और तेल फुलेल लगा देने पर भी स्थिति उपहासास्पद बनी रहेगी।

बिजली की धारा धातु में होकर गुजरती है। आग में सूखा ईधन जलता है। परिश्रमी छात्र उत्तीर्ण होता है। ईश्वर की निकटता के लाभों को समझने और पाने के इच्छुकों का पूजा से भी पहला कर्त्तव्य यह बनता है कि अपने चरित्र एवं चिन्तन को उत्कृष्ट स्तर का बनाये। व्यक्तित्व में पवित्रता और प्रखरता का अधिकाधिक समावेश करें। जो साधन अपने पास हैं उन्हें लोक मंगल के लिए खेत में बोयें। हरी−भरी फसल की आशा इसी आधार पर की जा सकती है।




धर्मात्मा उधर से निकले (kahani) - Akhandjyoti March 1985

एक अन्धा था। गली किनारे बैठकर याचना करता रहता। जो सिक्का मिलता उसे टटोलता और उतने ही ऊँचे स्वर में दुआएं देता।

कोई धर्मात्मा उधर से निकले। ठण्डक में अन्धे को सिकुड़ते देखकर कपड़ों के लिए पचास रुपये का नोट उसके हाथ पर रखकर चले गये।

अन्धे ने कई बार टटोला। पर वह कागज मात्र था। किसी ने ठिठोली की है यह सोचकर उसने नोट को तिरस्कार पूर्वक फेंक दिया।

एक विचारवान् यह देख रहे थे। उनने नोट उठाकर अन्धे को दिया और समझाया− इसके बदले इतने ही सिक्के मिले सकते हैं जिनमें कम्बल खरीदा जा सके।




ईश्वर का अनुग्रह तपस्वी के लिए - Akhandjyoti March 1985

श्रीमद्भागवत के द्वितीय स्कंध नवमें अध्याय में भगवान ने अपने निज रूप का परिचय देते हुए कहा है−

“तपो में हृदयं−साक्षादात्माहि तपसो हि वै।”

अर्थात्− तप मेरा प्रत्यक्ष हृदय है और मैं भी तप का हृदय हूँ। दोनों एक−दूसरे पर आश्रित हैं।

आगे इस तथ्य का और भी अधिक स्पष्टीकरण करते हुए वे कहते हैं−

सृजामि तपसैर्वेदं ग्रसामि तपसा पुनः॥ विमर्मि तपसा विश्वं वीर्य वे दुश्चरं तपः॥

अर्थात्− मैं इस समस्त विश्व को तप के सहारे उत्पन्न करता हूँ। तप के द्वारा ही अन्त में इसे आत्म रूप में विलीन कर लेता हूँ। विश्व का परिपोषण मैं तपोबल से ही करता हूँ। मेरी अद्भुत सामर्थ्य तप में ही केन्द्रीभूत है।

श्रीमद्भागवत् के आगे विवरण में अग्नि, ब्रह्मा, वासु आदि देवताओं का उल्लेख है जिनके अपने लिए कर्तव्य और साधन सम्बन्धी प्रश्न पूछने पर परब्रह्म ने एक ही उत्तर दिया हैं कि ‘तपं तपस्य’ अर्थात् तप की तपस्या करो। इसी से शक्ति उत्पन्न होगी। शक्ति के बलबूते ही व्यक्तित्व प्रखर होता है क्षमताओं का स्रोत खुलता है और उसी के सहारे सहृदयता से कठिन काम सम्पन्न होते हैं। जो अशक्त है वह कल्पना जल्पना कुछ भी करता रहे पर पुरुषार्थ की क्षमता के अभाव में कुछ बन नहीं पड़ता। जिसका पुरुषार्थ शिथिल है उसकी क्षमता भी क्या दृष्टिगोचर होगी और सफलता का सुयोग भी कैसे बनेगा।

सृष्टा ने मनुष्य के भीतर विद्यमान देवता को अपना अंशधर होने के कारण समस्त क्षमताओं से सम्पन्न किया है, पर वे बीज रूप में प्रसुप्त स्तर में बनकर रहती हैं उनके प्रकटीकरण के लिए ऊर्जा की अनिवार्य आवश्यकता है। जलयान, थलयान, वायुयान कितने ही सुनियोजित बने हों, पर उन्हें गतिशील करने के लिए ऐसा ईंधन चाहिए, जो तद्नुरूप ऊर्जा उत्पन्न कर सके। यह सुयोग जैसे ही बनता है वैसे ही वे चलना आरम्भ कर देते हैं। कुशल संचालक उन्हें नियत दिशा में नियत गति से चलाते हुए यथा समय लक्ष्य तक पहुंचाते हैं। यदि ऊर्जा का प्रबन्ध न बन पड़े तो कुशल संचालक एवं त्रुटि विहीन वाहन का जगह खड़े रहेंगे और वह न कर सकेंगे जो वे कर सकते हैं।

तप का तात्पर्य है− तपाना गरम करना। वह प्रक्रिया रगड़ से उत्पन्न होती है। रगड़ ही अथक और अनवरत श्रम को कहते हैं। समुद्र में अनादिकाल से विपुल सम्पदा भरी पड़ी थी। उससे लाभ लेना तो दूर कोई उससे परिचित तक न था। पर जब देव और दानवों ने मिलकर मंथन का प्रबल पुरुषार्थ किया तो एक से एक अद्भुत चौदह रत्न निकले। जिनके प्रकटीकरण से संसार का कायाकल्प ही हो गया।

इसलिए पुरुषार्थ को ही तप कहा गया है। यह मात्र श्रम भर से सम्पन्न नहीं होता उसके पीछे उच्च उद्देश्य और अटूट साहस एवं विश्वास भी जुड़ा रहना चाहिए। इस त्रिविधि संयोग से ही ‘तप’ बनता है। अन्यथा निरुद्देश्य और उपेक्षापूर्वक श्रम करते रहने पर भी वैसा परिणाम नहीं निकलता जैसा कि तप का सम्भव होता है।

तप अर्थात् तपाना। व्यक्तित्व को तपाने के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है वह प्रतिरोध से उत्पन्न होती है। सरलता और सुविधा सभी को प्रिय है। इस प्रकार का सुविधा सम्पन्न जीवन जीने से व्यक्ति ठण्डा पड़ता जाता है। उसे निष्क्रिय पड़े लौह खण्ड की तरह जंग खाने लगती है और उपयोगिता चली जाती है। शस्त्रों की धार तेज करने के लिए उन्हें पत्थर पर रगड़ते रहने की निरन्तर आवश्यकता पड़ती है। अन्यथा धार न रहने पर वे देखने दिखाने भर के उपयुक्त रह जाते हैं, प्रहार का चमत्कार नहीं दिखा पाते। मनुष्य को सुविधा सम्पन्न जीवनचर्या से विरत होकर ऐसी रीति-नीति अपनानी पड़ती है जिसमें कठिनाइयों से जूझना पड़े। तेजस् उत्पन्न करने का यही तरीका है।

विलासिता शरीर और मन दोनों को क्षीण करती है। असंयमी अपनी शक्ति के भण्डार को चुकाता जाता है और घुन लगी लकड़ी की तरह क्षीण हो जाता है। मन की इस लोलुपता से जो जूझता है और संयमशील जीवन में जिस निग्रह का परिचय देना पड़ता है उसे अपनाता है उसे अपना तेजस् मनोबल निखरता प्रतीत होता है। यही है वह पूँजी जिसके बलबूते कष्टसाध्य लगने वाले−कठिन दीखने वाले कार्यों का नियोजन सम्भव होता है। इसलिए व्यक्तिगत जीवन में इन्द्रियजन्य लिप्सा, लोलुपता से जूझने के लिए समर्थ बनने वालों को समुचित साहस करना पड़ता है। इतना ही नहीं ऐसे कामों में भी हाथ डालना पड़ता है जो न केवल कष्ट साध्य होते हैं वरन् जोखिम भरे भी होते हैं।

संचित कुसंस्कारों की परतें चट्टान जैसी कठोर होती हैं। उन्हें तोड़े बिना पथरीली जमीन में कुंआ खोदना और शीतल जल प्राप्त कर सकना सम्भव नहीं होता। भूमि से प्राप्त करते समय सभी धातुएँ कच्ची मिश्रित एवं अनगढ़ होती हैं उन्हें शुद्ध करने के लिए तीव्र तापमान वाली भट्टी में तपाना पड़ता है। इसके उपरान्त यदि उससे उपकरण या आभूषण बनाने हों तो दूसरी बार तपाने और उपयुक्त साँचे में ढालने की आवश्यकता होती है। यही बात मनुष्य के सम्बन्ध में भी है। उसे अनुपयुक्तता के विरुद्ध संघर्ष करना होता है। अपने अनगढ़ स्वभाव के विरुद्ध तनकर खड़ा होना होता है। शिथिलता बरतने वाले लिप्साओं से छूट नहीं पाते और उस तेजस्विता को अर्जित नहीं कर सकते जो उच्चस्तरीय आदर्शवादी प्रयोजन पूरे करने के लिए प्रचुर परिमाण में आवश्यक होती है।

ईश्वर के अनुग्रह से सकल कामनाओं की पूर्ति की बात कहीं जाती है। वह ईश्वर तप ही है जो मनुष्य को उठाया, सशक्त बनाता, योग्यता प्रदान करता और कठिन कामों को सरल बनाते हुए, असम्भव लगने वाले प्रयोजनों तक सम्भव बनाते हुए कृत कार्य बनाता है।

संसार के इतिहास में महान कार्य करने वाले प्रत्येक यशस्वी व्यक्ति की जीवनचर्या आत्म-निग्रह और प्रचण्ड पुरुषार्थ की स्याही से लिखी गई है। उच्च पद पर आसीन होने वाले को कठोर परीक्षा और कड़ी−प्रतिस्पर्धा से होकर गुजरना पड़ता है। यही ईश्वर का अनुग्रह है कि मनुष्य अपने को लोलुपता से विरत रखे और प्रबल पुरुषार्थ की कसौटी पर अपने को खरा सिद्ध करे। परिश्रम से डरे नहीं और महत्वपूर्ण कामों के करने वालों को जिन कठिनाइयों में होकर गुजरना पड़ता है उनका सामना करने के लिए रो झींककर नहीं वरन् प्रसन्नतापूर्वक अपने आप को उद्यत रखे।

प्रयोजन चाहे साँसारिक हो या आध्यात्मिक दोनों ही मार्गों के पथिकों को अपनी साधना एवं कष्ट सहिष्णुता का परिचय देना पड़ता है। सफलता अपनी मूल्य माँगती है। जो कठिनाइयों से जूझने और अभीष्ट प्रयोजन के लिए अनवरत श्रम करते हैं वे ही अपने क्षेत्र के तपस्वी हैं। तपस्वी की भगवान सहायता करते हैं और उसे सफलता का श्रेय प्रदान करते हैं।




शल्य विज्ञान के क्षेत्र में (kahani) - Akhandjyoti March 1985

शल्य विज्ञान के क्षेत्र में अनेकानेक अनुसन्धान आविष्कार करने वाले जान हन्टर से किसी ने पूछा− आपकी इतनी सफलताओं का कारण क्या हैं?

उनने कहा− ‘‘मैं पूरी गहराई से यह विचार करता हूँ कि कल्पना और क्षमता की दृष्टि से यह काम सम्भव और सही है क्या? जो आज की परिस्थितियों में शक्य है उसी में हाथ डालने की आदत ने मुझे अनेकों सफलताएँ दिलाई हैं। कल्पनाओं की व्यावहारिकता को कसौटी पर कसने में मैंने कभी उपेक्षा नहीं बरती।”




धर्म और तत्व-दर्शन की पृष्ठभूमि - Akhandjyoti March 1985

अध्यात्म दर्शन पढ़ने, समझने या समझाने की दृष्टि से कथा प्रवचन या वाचन सत्संग जैसे स्वरूप में प्रतिपादित होता रहता है। पर वह सड़क की ओर अंगुलि निर्देशन जैसा है। इतने भर से काम नहीं बनता। रास्ता तो चलने से पार होता है। चलने और पार होने का तात्पर्य है अपनी अन्तःभूमिका में उन मान्यताओं का गहरा प्रवेश जो मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने के लिए गढ़ी गई है।

इसी को धर्म कहते हैं और यह अध्यात्म है कि मनुष्य अपने सम्बन्ध में उच्चस्तरीय मान्यता रखे और अपने हर क्रिया-कलाप में कर्मयोग का समावेश रखे। यह सामान्य मनुष्यों की तुलना में सर्वथा भिन्न होता है। अतएव अपने और लोगों के बीच एक ऐसी खाई रहने लगती है जिसमें एक दूसरे को मतिभ्रम से ग्रस्त मानने लगते हैं।

लोगों के सोचने का ढंग यह है कि अधिक कमाया, अधिक खाया और शरीर को बड़प्पन के साज-सामान से लदा हुआ रखा जाय। वे इसी में जीवन की सफलता मानते हैं किन्तु अध्यात्मवादी का दृष्टिकोण होता है कि वह ईश्वर का उत्कृष्टता सम्पन्न अंश है। उसे वह सोचना और करना चाहिए जो उसके गौरव को बढ़ाये और सृष्टा की कृति को यशस्वी बनाये। उसे सज्जा या प्रशंसा की नहीं, चिन्ता इस बात की होती है कि व्यक्तित्व आदर्श एवं अनुकरणीय बन पड़ा या नहीं। इस मान्यताओं के बीच मतभेद तो रहेगा ही उपहास, बहिष्कार, व्यंग और तिरस्कार भी सम्भव है। यह मतभेद जितना स्पष्ट और सशक्त हो, समझना चाहिए कि अपनी आध्यात्मिकता उतनी ही सशक्त है। जहाँ दुनियादारों के साथ साझेदारी करते हुए इच्छा अपनी और क्रिया उनकी चल रही हो। समझना चाहिए कि विडम्बना ही प्रमुख है। कथन और श्रवण वाला पोला खोखला अध्यात्म ही हाथ लगा है। यथार्थता में दृढ़ता जुड़ी होती है।

गीताकार ने सच ही कहा है कि “दुनिया जब सोती है तब ज्ञानी जागता है और जब ज्ञानी सोता है तब दुनिया जागती है। इस कथन का तात्पर्य यह है कि अध्यात्मवेत्ता की मान्यता एवं गतिविधियाँ इस प्रकार की होती हैं जो लोगों को नहीं सुहाती। दोनों के बीच सैद्धान्तिक तालमेल नहीं बैठता, मात्र शिष्टाचार भर का निर्वाह होता है।

ह्यूम फासेट ने “दि फ्लेम एण्ड दि लाइट” पुस्तक में बुद्ध धर्म और हिन्दू के सिद्धान्तों की विवेचना करते हुए लिखा है कि तथ्यतः दोनों एक हैं। बुद्ध धर्मानुयायियों को आदर्श निर्वाह में कट्टर होना होता है और सच्चे हिन्दू धर्मानुयायियों को भी अपने आचरण में उन्हीं सिद्धान्तों का समावेश करना होता है। “पवित्र बुद्धि” दोनों का समान लक्ष्य है। पवित्र बुद्धि अर्थात् ऐसी आदर्शवादी प्रेरणा जो व्यवहार में उतरे बिना चैन न ले। बुद्धि की पवित्रता से ही गौतम भगवान कहलाये और उसी को अपनाने वाले “स्थिति प्रज्ञ” आत्मवादी योगी कहलाते हैं।

थियोसोफिकल सोसाइटी ने इसी को ब्रह्मविद्या या ब्रह्मदर्शन कहा है।

एन॰ श्रीराम ने अपने ग्रन्थ ‘लाइफ व डीपर’ आस्पेक्ट में बताया है कि गीता का ब्रह्म ज्ञान जब कथन श्रवण तक सीमित न रहकर चिंतन और चरित्र बनकर प्रकट होने लगे। साथ ही अपनी मान्यता पर अटूट आस्था भी रहे तो समझना चाहिए कि गीता की प्रेरणाऐं जीवन में सम्मिलित हो गईं और ब्रह्म-विद्या के क्षेत्र में गहरा प्रवेश हो गया।

तत्वज्ञान का अर्थ है− भगवान के सम्बन्ध में अपनी मान्यता का स्पष्ट होना और प्राणी मात्र में उसकी ज्योति का दर्शन होना। तब भौतिक उपलब्धियों पर प्रसन्नता या अप्रसन्नता निर्भर नहीं रहती। सीमित साधनों से भी काम चल जाता है और जो न्याय तथा परिश्रम का कमाया है उतने में ही परिपूर्ण सन्तोष रहा है। उच्च जीवन के लिए सादा जीवन अपनाना पड़ता है, जब यह सिद्धान्त कार्यान्वित होने लगे तो समझना चाहिए कि अध्यात्म तत्वज्ञान जीवनचर्या के साथ एकीभूत हो गया।

भौतिक विज्ञानी एडविन सोडिगर ने अपनी पुस्तक “ह्वाट इज लाइफ” में लिखा है− धर्म धारणा का अर्थ है ईश्वर की व्यापकता, न्याय परायणता को अंगीकार करना, साथ ही अपने चिन्तन और चरित्र को क्रमशः अधिकाधिक निखारते जाना। सब की सत्ता को अपने में और अपने व्यक्तित्व को सब में संव्याप्त देखना। इस मनोभूमि को अपनाने वाला संकीर्ण स्वार्थपरता में सीमाबद्ध नहीं रह सकता। उसे व्यापक विश्व में अपनी आत्मीयता को विकसित करना होता है।

सर राधाकृष्णन ने अपने एक लेख “फिलॉसफी आफ उपनिषद्” में तत्व दर्शन की दिशाधारा को और भी अधिक स्पष्ट किया है। वे लिखते हैं− बौद्धिक तर्क क्षमता ऐसी है जिसके सहारे हम अनैतिक और अवास्तविक बातों को भी प्रामाणिक जैसे ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं। तर्कों के आधार पर असत्य को भी सत्य सिद्ध किया जा सकता है। जिस प्रकार मोटा पहलवान साधारण स्वास्थ्य वाले को दबोच लेता है उसी प्रकार मस्तिष्कीय बलिष्ठता के सहारे अनुपयुक्त को भी उपयुक्त सिद्ध किया जा सकता है। इसलिए बुद्धि को तत्वज्ञान में मान्यता नहीं दी गई है। इस क्षेत्र में अनुभूति और संवेदना ही प्रामाणिक मानी जाती है और यह दोनों उस अन्तःकरण में उत्पन्न होती हैं जिसे संयम और साधना द्वारा परिष्कृत किया गया हो, आत्मा की वाणी इसी को कहते हैं। यह देश और धर्म की सीमाओं को उल्लंघन करके सर्वत्र एक जैसी ही उद्भासित होती है। इसमें बुद्धि की अवज्ञा नहीं की जा रही है वरन् यह कहा जा रहा है कि उसे श्रद्धा और सदाशयता का पुट लगा−लगाकर पवित्रता बनाया जाय।

अंतर्दृष्टि या विवेकशील प्रज्ञा ही हमें हमारे वास्तविक स्वरूप को बताती है और उन कर्त्तव्यों का बोध कराती है जिनमें कोई सम्प्रदाय या दर्शन अवरोध उत्पन्न नहीं करता। आत्मा एक है। वही सर्वत्र बिखरा पड़ा है। उसमें सर्वत्र एक जैसी भाव सम्वेदना है। आत्मीयता और करुणा के आधार पर ही वह कोई निर्णय करती है तो उसमें पक्षपात या अनुपयुक्तता जैसी कहीं कोई गुंजाइश नहीं रहती है। सत्य और धर्म दोनों एक ही हैं इसलिए उनमें मतभेद की कहीं कोई गुंजाइश नहीं है।

“लाइफस् डीपर आस्पेक्टस्” के लेखक ने गीता को किसी सम्प्रदाय विशेष का ग्रन्थ नहीं माना और कहा है कि तत्त्वदर्शन का जैसा स्पष्ट विवेचन इस पुस्तक में है वैसा अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलता। स्थिति प्रज्ञ को इसीलिए योगी माना गया है कि उसकी प्रज्ञा समस्त पक्षपातों, रुझानों और प्रचलनों से ऊँची उठी हुई होती है जो सत्य है जो सबके लिए हितकर और श्रेयस्कर है, उसी को वह स्वीकार करती है। इसे स्वीकार करने में कर्म भी सम्मिलित है। प्रज्ञा किसी तथ्य को स्वीकार करने के उपरान्त चुप नहीं बैठती वरन् अन्तःकरण की वाणी को कार्यान्वित किये बिना चैन से नहीं बैठने देती।

“मैं और तू” का भेद मिटते जाना ही ईश्वर दर्शन की प्रत्यक्ष अनुभूति है। वह भक्त और भगवान के बीच कोई अन्तर नहीं पहुँचने देती। इतना ही नहीं उसके कारण मनुष्य और मनुष्य के बीच भी ऐसी कोई खाई नहीं रहती जिसकी आड़ में विद्वेष जमा रह सके और सेवा भावना से हाथ सिकोड़ना पड़े।

“आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के रिलीजियस एक्सपीरियन्स रिसर्च यूनिट लम्बे समय तक सार्वभौम, धर्म एवं दर्शन की सम्भावनाओं पर लम्बे समय तक विभिन्न दृष्टिकोणों से विचार किया है। उस विचार मंथन का यह निष्कर्ष निकला है कि धर्म आदि में एक था, अन्त में उसके साथ जो भ्रम जंजाल जुड़ गया है वह साफ होते ही एकता का माहौल बनेगा। यूनिट द्वारा प्रकाशित ग्रन्थ “दि स्प्रिचुअल नेचर आफ मैन” में उपलब्ध अगणित तथ्य ऐसे प्रस्तुत किये हैं जिनसे विदित होता है मनुष्य आरम्भ में भी सभ्य स्वभाव का था। उसने क्रमशः प्रगति की है और उसकी सभ्यता धीरे−धीरे निखरती ही आई है। वह निखार ऐसा है जिससे धार्मिक मतभेद घटते हैं, बढ़ते नहीं।

तत्त्वज्ञानी का हृदय बालकों जैसा निश्छल होना चाहिए। धार्मिक की उदारता ऐसी मधुर होनी चाहिए जो दूसरों का हृदय जीत सके। ज्ञानी की तपश्चर्या इसमें है कि स्वयं कष्ट उठाकर भी सच्चाई का ही पक्ष ले। अनीति से लड़ने में लगने वाली चोटों की परवाह न करे और चिकित्सक की तरह विकृतियों से जूझते हुए सर्वतोमुखी स्थापना के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे।




आत्मिक ऊर्जा उत्पादन के लिए अनवरत संघर्ष - Akhandjyoti March 1985

जीवन का चिन्ह है ऊष्मा। शरीर जीवित है या मृतक इसकी मोटी किन्तु सुनिश्चित पहचान है शरीर का गरम रहना। यदि वह पूरी तरह ठण्डा हो जाय तो समझना कि मृत्यु की सुनिश्चित स्थिति आ गई। इतना बढ़ा शरीर तन्त्र एक अच्छा−खासा इंजन है। जब तक वह गरम है तब तक उसमें गति की सम्भावना है पर जब ठण्डा हो जाय तो लोह एक टीला−कबाड़ा मात्र है। वह किसी दूसरे भार या डिब्बे को लेकर तो पीछे चलेगा, पहले अपनी स्थिरता तो बनाये रहे। जंग लगेगी, पुर्जे एक दूसरे के साथ चिपक जायेंगे और बहुत दिनों तक ठण्डा पड़ा रहने के उपरान्त तो एक प्रकार उसका फिर से संशोधन करना पड़ेगा। शरीर के बारे में तो सो बात भी नहीं है। वह एक बार ठण्डा हुआ तो सदा के लिए उसका अन्त समझना चाहिए। गर्मी से ही उसके छोटे−बड़े कल−पुर्जे चलते हैं। यह गर्मी ही जीवन है। इसी को प्राण कहते हैं। देखना यह कि यह गर्मी आखिर आती कहाँ से है। काया में ही नहीं संसार भर में उसका मूल उद्गम गति है। दूसरे शब्दों में इसे संघर्ष भी कहते हैं। गति से जो हलचल उत्पन्न होती है उसी की परिणति ऊष्मा है। सूर्य यदि स्थिर रहता तो कब का ठण्डा हो गया होता। समुद्र मन्थन से चौदह रत्न निकले थे। नर और नारी के प्रजनन अंग ऐसी ही घर्षण क्रिया में निरत होते हैं और एक आत्मा भ्रूण बनकर गर्भाशय में जा विराजती है। वहाँ वह कलल इतना तीव्र और इतना अधिक संघर्ष करता है जिसकी तुलना नहीं। मनुष्य जन्म का भौतिक इतिहास यही हैं।

जीवित रहने और प्रगति पथ पर अग्रसर होने−पुरुषार्थ क्षमता अर्जित करने के लिए प्रकृति प्रदत्त प्राण ऊर्जा से ही काम नहीं चल जाता, उसे स्थिर रखने और बढ़ाने के लिए मनुष्य को निजी प्रयत्न भी करने पड़ते हैं। जीवन संघर्ष इसी का नाम है। संघर्षशील समर्थ रहते हैं और जिनने उसमें आलस-अनख माना वे स्वयमेव गल जाते हैं। मृतक शरीर को खाने के लिए गिद्ध−कौए−कुत्ते, श्रृंगाल आदि तो फिरते ही रहते हैं। वे न आये तो माँस स्वयं सड़ने लगता है और उससे उत्पन्न हुए कीड़े स्वयं ही उसे खा−पीकर बराबर कर देते हैं।

जीवन में ऊर्जा कैसे बनी रहे। सामान्यतया तो निर्वाह साधन एकत्रित करने के लिए किया जाने वाला श्रम ही बहुत कुछ काम दे जाता है पर आन्तरिक प्राण ऊर्जा उत्पादित करने के लिए अवाँछनीयता के प्रति संघर्ष भी करना होता है। साधना का दूसरा नाम ‘समर’ है। भगवान के जितने भी अवतार हुए हैं। सभी ने अधर्म के विरुद्ध संघर्ष किया और कराया है। योगी, तपस्वियों महामानवों की जीवनचर्या में भी संघर्ष अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। इसे वे धर्मयुद्ध कहते हैं। तप साधना भी यही है। उच्चस्तरीय शक्ति का उत्पादन और अभिवर्धन इसी आधार पर सम्भव होता है। यह आध्यात्मिक पराक्रम एवं पुरुषार्थ प्रत्येक आत्मवान् के लिए अनिवार्य है। गीताकार का एक ही लक्ष्य है− महाभारत के निमित्त संग्राम। राम ने विश्वामित्र यज्ञ रक्षा से लेकर खर−दूषण वध और लंका दमन तक की प्रक्रिया में अपनी अधिकाँश सामर्थ्य नियोजित रखी। अन्य अवतार और महामानव प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से यही करते रहे हैं। यही करना होता है।

यह इतिहास गाथा का वर्णन नहीं है प्रत्येक जीवन्त व्यक्ति के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक प्रक्रिया है जिसे अपनाये बिना कोई चारा नहीं। अर्जुन की भाँति इस धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र में प्रत्येक आत्मवान् भगवद् भक्त को लड़ना पड़ता है। जिसे वे प्राणप्रिय मानते हैं उसे हनुमान की तरह इसी प्रयोजन में धकेल देते हैं।

सदा किससे लड़ा जाय? लड़ाई के अवसर तो यदा−कदा आते हैं पर जीवन संग्राम के सम्बन्ध में यह बात नहीं है, उसमें अहिर्निश लड़ना पड़ता है। यही तप है यही योग है। यही साधना है यही परमार्थ एवं पुरुषार्थ है।

भगवान ने साधक को इसके लिए समुचित अवसर प्रदान किया है। उसकी व्यायामशाला अपने बालकों के लिए खुली ही रहती है। शिक्षक अपनों को अपनों से ही लड़ाते हैं। मल्लयुद्ध के लिए रोज बाहर के−रोज नये आदमी कहाँ से आये। तैरना घर के तालाब में ही पड़ता है। विभिन्न प्रतिद्वन्द्वतायें−विभिन्न दाँव पेच आपस में ही सीखने पड़ते हैं।

साधक के लिए तीन मोर्चे संग्राम के लिए हैं। सेना थल, जल और नभ के आयुधों से सुसज्जित होती है और तीनों मोर्चों पर लड़ने का अभ्यास करती है। प्रवीणता प्राप्त करने वाले सेनापति का सम्मानास्पद प्राप्त करते हैं।

आध्यात्मिक धर्मयुद्ध के तीन मोर्चे हैं− वासना, तृष्णा और अहन्ता। इन्हीं को लोभ, मोह और औचित्य कहते हैं। वह लड़ने के लिए सदा चुनौती देते रहते हैं। छद्म रूप से इनका आक्रमण निरन्तर होता रहता है। सुरसा, ताड़का और सूर्पणखा की तरह इनका मायावी कुचक्र निरन्तर चलता रहता है। वस्तुस्थिति को देख और समझ पाना दूरदर्शियों का ही काम है। अदूरदर्शी इन्हीं की भूल-भुलैयों में भटकते और प्राण गँवाते रहते हैं।

आत्म−निरीक्षण की दिव्य दृष्टि आवश्यक है इनका मायाचार देखने और समझने के लिए। क्योंकि इनका सम्मोहन नागपाश ऐसा है जिसमें बँधने वाले को उलटा दिखता है। जल में थल और थल में जल प्रतीत होता है। हानि में लाभ और लाभ में हानि का भ्रम होता है। मृग−तृष्णा और माया मरीचिका में विभ्रमग्रस्त हिरनों को थकान−खीज और निराशा के अतिरिक्त ओर कुछ हाथ नहीं लगता। पर वे आरम्भ में समझते हैं। विपुल लाभ का आनन्द अति निकट है।

वासना का सार संक्षेप है जिह्वा और जननेन्द्रियजन्य सब कुछ मानकर उन्हीं के लिए निरन्तर मरते खपते रहना। उन्हीं के स्वादों का चिन्तन करना। जब भी अवसर मिले चासनी पर टूट पड़ने वाली मक्खी की तरह अपने पैर और पंख फँसाने में आनन्द ही आनन्द का अनुमान लगाते रहना। चटोरापन पेट को बिगाड़ना और दुर्बलता, रुग्णता एवं अकाल मृत्यु को न्योंत बुलाता है।

जननेन्द्रिय का स्वाद ऐसा ही है जैसे पेड़ में गड्ढे करके उसमें से गोंद निकालते रहना और उसे खोखला बनाकर स्वत्व विहीन कर देना। काम सेवन की अति अर्थात् मस्तिष्क के सार तत्व को असमय में ही समाप्त करना। निरन्तर ऐसे स्वप्न देखते रहना जिनकी पूर्ति का व्यावहारिक रूप कोई बनता ही नहीं। कामुकताजन्य कल्पनाएँ ऐसी हैं जिन्हें शेखचिल्ली से अधिक उपहासास्पद दिवा स्वप्न देखना। मस्तिष्क पर छाये हुए इस उन्माद में मानवी मर्यादाओं का भी ध्यान नहीं रहता। माता, बहिन पुत्री के रिश्ते ही समाप्त हो जाते हैं संसार की समस्त नारियाँ मात्र वेश्याएँ ही दीख पड़ती हैं।

वासना का विस्तार यों पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के साथ जुड़ी हुई कुत्सा से है पर संक्षेप में उसे जिह्वा और कामुकता भी समझा जाय तो इनके स्वाद ऐसे हैं जिन्हें विषपान के समतुल्य ही समझा जा सकता है। कुत्ता सूखी हड्डी चबाता है और अपने ही जबड़ों में निकलने वाले रक्त को चाटता हुआ अनुभव करता है कि सूखी हड्डी में षट्-रस व्यंजन भरे हुए हैं और वह किसी दूसरे का रक्तपान कर रहा है।

दूसरा आध्यात्मिक क्षेत्र का काम भी शत्रु−काँचन मृग मारीच है−तृष्णा का प्रलोभन। आवश्यकताएँ मुट्ठी भर और पाने की चाहना पहाड़ बराबर। कुबेर के समान सम्पत्ति बनाने−रावण जितना परिवार बढ़ाने की ललक निरन्तर लगी रहती है। हिरण्यकश्यप और हिरणाक्ष की तरह इस संसार का सार−स्वर्ण−वैभव ही दिखता है। उसे जैसे भी, जहाँ से भी जितना भी मिले एकत्रित किया जाय और उसे बुरे से बुरे दुर्व्यसनों में फुलझड़ी जलाने की तरह बर्बाद करते रहा जाय। यही है धन और परिवार की तृष्णा जो कितने ही साधन जुटा लेने पर भी तृप्त नहीं होती। सिकन्दर असीम सम्पदा का स्वामी था पर अपने को अतृप्त ही अनुभव करता रहा। इस प्रलोभन के लिए न जाने कितनों ने कितने प्रकार के−कितनी मात्रा में कुकर्म किये पर आग में ईंधन डालने की तरह हविस बढ़ती गई। जब तक यह उन्माद छाया रहता है व्यक्ति औचित्य और मर्यादा को पूरी तरह भूल जाता है।

हँसी की बात यह है कि मनुष्य की आवश्यकता मुट्ठी भर है। उसकी स्वाभाविक और आवश्यक पूर्ति दो घण्टे के दैनिक श्रम से भली प्रकार पूरी हो सकती है। औसत भारतीय जितना निर्वाह परिश्रमपूर्वक कमाने की बात सोचने वाले को न कभी दरिद्र सताता है न आकाँक्षा की आग चिता की तरह जलाती है। परिवार छोटा रखा जाय और हर सदस्य को स्वावलम्बी सुसंस्कारी बनाया जाय तो पैसे जैसी कमी किसी को भी न प्रतीत हो जिसमें मानसिक शान्ति और नीति मर्यादा सभी कुछ गंवाना पड़े और पाप का भारी पोटला सिर पर लादकर चौरासी के चक्र में घूमना पड़े।

तीसरी जादूगरनी है− अहन्ता। मल−मूत्र का गड्ढा, चमड़ी की चमकीली पन्नी चिपकी होने के कारण अपने रूप, बल और पद पर न जाने कितना इतराती है। सज्जा श्रृंगार में इतना पैसा और समय बर्बाद करता है कि उतने में विद्या का, परमार्थ का, ईश्वर सान्निध्य का सन्तोषजनक उपार्जन हो सकता है। कीमती वस्त्र, आभूषण, प्रसाधन, लपेट पोतकर न जाने किसकी आँखों में धूल झोंकने−किस पर रौब गांठने का− किसे आकर्षित करने का प्रयत्न किया जाता है। जब कि सच बात यह है कि हर व्यक्ति अपनी ही समस्याओं में इतना उलझा है कि किसी अन्य को आँख खोलकर देखने भर की फुरसत नहीं है। सज−धज वाली बरात और सजा हुआ दूल्हा प्रदर्शन करके यह प्रयत्न किया जाता है कि नगर के सारे निवासी और सड़क पर चलने वाले दर्शक मात्र इसी मण्डली को देखते रहेंगे। मंत्र−मुग्ध होकर अपना भाग्य सराहेंगे। समझेंगे यही लोग संसार के सबसे बड़े अमीर हैं जो पैसे को कूड़े−कचरे की तरह उड़ाते रह सकते हैं। ईश्वर ही जाने यह कैसी विडम्बना है।

कभी अमीरी का ठाट−बाट दिखाकर जन−साधारण पर अपने अमीर होने की छाप छोड़ी जाती रही होगी। उन्हें पुण्यात्मा समझा जाता रहा होगा पर अब तो समय बिलकुल उलट गया। इन दिनों साम्यवाद की हवा बह रही है। जो अपनी अमीरी का जितना उद्धत प्रदर्शन करता है उसे उतना ही बड़ा चोर, ब्लैक मारकेटियर, जाल−साज माना जाता है। कहा जाता है कि जिसने जितना धन जमा किया है वह उतना ही बड़ा समाज द्रोही है। किसी ने उचित ढंग से पैसा कमाया है तो उसके इस पिछड़े समाज को ऊँचा उठाने में लगाने के हजार उपाय हैं। प्रदर्शन में उसे क्या बर्बाद किया जाय? श्रृंगार सज्जा विवेकवानों की दृष्टि में कामुकता ओछेपन एवं मनचले स्वभाव की पर्यायवाची बन गई है। कोई जमाना रहा होगा जब सज−धज और प्रदर्शन को देखकर लोग आकर्षित होते और सराहना करते थे। आज तो ठीक उलटी स्थिति है यह बातें जहाँ जितनी मात्रा में चरितार्थ होती है, वहाँ उतनी ही घृणा बरसती और ईर्ष्या पनपती है।

उपरोक्त तीन अवांछनीयताओं के बदले समाज से, संसार से हमें क्या मिला? इसका निष्कर्ष निकालने पर अन्तःपतन और दुष्प्रवृत्ति का संवर्धन ही प्रतिफल दृष्टिगोचर होता है। इस पतन और पराभव को जो लोग न्योंत बुलाते हैं उनके लिए और कुछ कहा जाय या नहीं। नासमझ और अदूरदर्शी तो निश्चित रूप से कहना पड़ेगा।

संघर्ष इन तीन से ही करने का है। यह बाहरी नहीं हैं तो भीतरी पर अदृश्य और मायामय होने के कारण इनसे लड़ना अति कठिन है। यह अवसर देख−देखकर हमला करते हैं। जब भी मनुष्य को तनिक−सी असावधान पाते हैं। तभी अपने अस्त्र−शस्त्र चला देते हैं। अतएव हर घड़ी सावधान रहना पड़ता है। साँसारिक युद्धों के कुछ कायदे, नियम और कारण हैं पर यह दुष्ट तो ऐसे हैं जो जब मन आता है बिजली की तरह टूट पड़ते हैं और किया−धरा सब कुछ चौपट करके रख जाते हैं।

अध्यात्म जीवन जीने वाले को प्रचण्ड शक्ति और अजस्र ऊर्जा की आवश्यकता होती है। जिसके पास यह सम्पदा जितनी अधिक है वह उतना ही विभूतिवान है। इस उपलब्धि का एक ही मूल्य है। अन्तरंग को कलुषित करने वाली कुत्साओं का उन्मूलन।




खाली हूजिए, आप लबालब भर जायेंगे। - Akhandjyoti March 1985

पाने के लिए छोड़ना आवश्यक है। जो सिर्फ पाना ही चाहता है। छोड़ने की बात सामने आते ही नानी मरती है। वे उपहासास्पद बनते हैं और खाली हाथ निराश लौटते हैं।

किसान जानता है कि फसल काटने की योजना बनाते समय उसे घर में जमा किया हुआ बीज खर्च डालने की तैयारी करनी चाहिए। जो बीज बोने का खर्च और श्रम सहन न करे किन्तु कोठे भर देने जितनी फसल पाने के मनसूबे बाँधता रहे, इसकी इच्छा पूरी होना सम्भव नहीं।

विद्यार्थी पढ़कर अफसर बन जाते हैं, पर इसके लिए उन्हें चौदह वर्ष अनवरत श्रम करके स्नातकोत्तर परीक्षा पास करनी पड़ती है। फीस और किताब, कापी का खर्च सहन करना पड़ता है। गणेशजी का वरदान पाकर बिना कुछ किये विद्वान और पदाधिकारी बनने के स्वप्न इस जमाने में पूरे हो सकेंगे ऐसी आशा किसी को भी नहीं करनी चाहिए।

मल त्यागने के उपरान्त पेट खाली होने पर ही भूख लगती है और स्वादिष्ट व्यंजन खाने का अवसर मिलता है। जो मल त्याग नहीं करना चाहता उसे नया भोजन प्राप्त करने की भी आशा नहीं करनी चाहिए। साँस छोड़ने के बाद ही नई प्राण वायु मिलती है। जो सांस बन्द किये बैठा है उसके श्वाँस−प्रश्वास कैसे चलेंगे और जीवित रहना कैसे सम्भव होगा?

बाजार में हर चीज का मूल्य माँगा जाता है। उसे चुकाने पर कुछ भी मनचाही वस्तु खरीदी जा सकती है। जिसकी जेब खाली है या कुछ भी खर्च करने का मन नहीं है उसे मेले ठेले का तमाशा भर देख आने के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है।

परिजनों का−मित्र सम्बन्धियों का−स्नेह सहयोग प्राप्त करने, की इच्छा रखना उचित है, पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि दूसरों के मन में वैसा करने का उत्साह उत्पन्न करने के लिए बहुत पहले से ही अपना रवैया बदलना पड़ता है। हम किसी के काम न आयें− किसी की किसी अवसर पर कोई सेवा सहायता न करें तो फिर दूसरे भी वस्तुस्थिति का लेखा−जोखा निकालते हैं और अपने पिछले व्यवहार को स्मरण करते हैं। बहाने बनाना सब को आता है यदि हम यही नीति अपनाते रहे हैं तो यह आशा करना व्यर्थ है कि आड़े समय पर कोई हमारे काम आयेगा।

यह संसार दर्पण की तरह है इसमें अपना ही चेहरा हर किसी के चेहरे में झाँकता हुआ देख सकते हैं। जैसे भी हम भले−बुरे कुछ हैं वैसी ही मुखाकृति दूसरों की भी दिखा देगी। यहाँ क्रिया की प्रतिक्रिया होती रहती है। कुएँ या गुम्बज की तरह प्रति ध्वनि सुनने को मिलती रहती है। जैसा भी कुछ हम अपने मुँह से बोलते हैं, उलट कर वैसी ही आवाज सुनते हैं। हमारा चिन्तन एवं व्यवहार यदि यह है कि हमें किसी के लिए त्याग न करना पड़े, दूसरे ही सदा हमारी सेवा सहायता के लिए दौड़े आयें। सदा सद्भावना व्यक्त करते रहें और हम अपनी उपेक्षा वृत्ति पर ही कायम रहें तो समझना चाहिए कि यह मनोरथ कभी पूरा न हो सकेगा।

रबड़ की गेंद जिस दिशा में जितने जोर से मारी जाती है वहाँ से वह ठीक उलटी दिशा में उतने ही जोर से वापस आती है। देखना यह है कि हम दूसरों के साथ कैसा रवैया अपनाते और कैसा व्यवहार करते हैं। उसकी प्रतिक्रिया ठीक वैसी ही होगी। अपना स्वभाव, दृष्टिकोण और व्यवहार जब दूसरों के साथ टकराता है तो ठीक वैसी ही प्रतिध्वनि प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।

देना घाटे का सौदा नहीं है। सत्पात्रों के हाथ हमारी सेवा, सद्भावना एवं सहायता पहुँचती है तो निश्चित रूप से वह अनेक गुनी होकर वापस लौटती है। हमारी उदारता भी ऐसी ही है यदि हम अपने को खाली करते रहेंगे तो बदले में ईश्वरीय व्यवस्था हमें उसी अनुपात से भर देगी। खाली तालाब चाहे उथला हो या गहरा वर्षा आते ही लबालब भर जाता है।




दर्शन को भ्रष्ट न किया जाय। - Akhandjyoti March 1985

मनुष्य ने पिछले एक लाख वर्ष में असाधारण उन्नति की है। यदि वह बन्दर की औलाद है तो भी अपने पूर्वजों की तुलना में कहीं आगे है। सुविधा साधनों की दृष्टि से भी और नीति आचरण की दृष्टि से भी। यदि किन्हीं गुत्थियों का समाधान करना है या प्रगति का अग्रिम पथ खोजना है तो भी संचित सभ्यता द्वारा उपलब्ध हुए निष्कर्षों का सहारा लेना पड़ेगा। सुविकसित मेधा और प्रज्ञा इस सम्बन्ध में आवश्यक सहायता कर सकती है। संचित तत्व दर्शन इतना निरर्थक नहीं है कि उसे कूड़े−करकट के ढेर में फेंक कर कीड़े−मकोड़ों के आचरण को प्रकृति प्रेरणा मानकर उसके अनुकरण की बात सोचनी पड़े। कुत्ता दूसरे कुत्ते के मुँह का ग्रास छीनने की कोशिश करता है। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है तो हमें भी अपने पुरातन तत्व दर्शन को ठुकराकर इन्हीं हेय कृत्यों को प्रकृति का निर्देश मानने और उनका अनुकरण करने के लिए तत्पर होना चाहिए यह आवश्यक नहीं।

उदाहरण लिया जाय तो वह भी एकाँगी यह कहाँ का तर्क है? करोड़ों अरबों जीवधारियों में मात्र मछली ही बदनाम करने को क्यों रह गई। ढूँढ़ने हों तो ऐसे ही और भी उदाहरण मिल सकते हैं। भूखी सर्पिणी अण्डे बच्चों को खा जाती है। मकड़ी रति कर्म के उपरान्त थकान मिटाने के लिए मकड़े को ही दबोचकर उदरस्थ कर लेती है। यह उदाहरण मनुष्य जीवन की नीति निर्धारण करने वाला दर्शन विनिर्मित करते समय क्यों कर आदर्श बन सकते हैं? बौद्धिक और भावनात्मक दृष्टि से जो विकसित है उनके उदाहरण प्रस्तुत करते हुए मनुष्य जीवन को अपेक्षाकृत अधिक विकसित करने के लिए नवीनतम दर्शन शास्त्र की उसके आधार पर संस्कृति प्रथा परम्परा की आधारशिला रखी जा सकती है। मछली का काना−कुबड़ा उदाहरण क्यों इसके लिए ढूँढ़ा जाय। विकसित जाति की मछलियाँ समुद्र के उन क्षेत्रों में प्रसव करने जाती हैं जहाँ मीठे पानी में अंडे बच्चे ठीक तरह पल सकें। ऐसे स्थान हजारों मील दूर होते हैं। इतनी लम्बी यात्रा वे अकेली नहीं करती। जिन नरों के साथ भी गर्भ धारण प्रयोजन के लिए क्रीड़ा−कल्लोल करती हैं, वह सरस प्रेमी समुदाय साथ होता है। गर्भिणी पर दुहरा तिहरा भार न पड़ें इसलिए प्रेमी समुदाय उनके लिए भोजन भी जुटाता रहता है और जब वे थकने लगती हैं तो यात्रा में सहारा भी देता है। उदाहरण देते समय ऐसे प्रसंगों को भुला देना उस एक उदाहरण को भी लँगड़ा−लूला कर देना है जो मनुष्य के मार्गदर्शन के लिए किसी प्रकार एक ढूँढ़ा गया है। बड़ा पेट छोटे की खुराक खा जाता है यह उदाहरण देने वालों को झड़ियों की रीति−नीति का भी उल्लेख करना चाहिए जो अपनी गाँठों में से नये−नये कोपल फोड़ती रहती हैं और एक के स्थान पर झाड़ियों का भरा−पूरा झुरमुट बना लेती हैं। यह खुराक खाना हुआ या अपने अंग अवयवों में से नई शाखा प्रशाखाएँ फोड़ते चलने और एक सुविस्तृत समुदाय बना लेने की सर्वथा विपरीत बात हुई?

स्वार्थपरता, आपाधापी, दुर्बलों का शोषण जैसे दुष्ट प्रयोजनों को अपने युग में मान्यता देनी है तो हिंस्र पशु−पक्षियों के उदाहरण अनेकों मिल सकते हैं। मनुष्यों में भी इस मार्ग पर चलने वाले, चोर, डाकू, हत्यारे क्रूर, नृशंसों, असुरों के नाम गिनाये जा सकते हैं। इसके लिए प्रकृति परम्परा की साक्षी देने की क्या आवश्यकता है? यदि इसी साक्षी समुदाय को तलाश किया जायेगा तो दो के स्थान पर दो हजार ऐसे मिल जायेंगे जो नीति, मर्यादा, सहानुभूति सहकार एवं सेवा का समर्थन कर रहे होंगे।

चींटी, दीमक और मधुमक्खी की भी बिरादरियाँ ऐसी हैं जिनका सारा क्रिया−कलाप सेवा और सहकार के आधार पर चलता है। मधु−मक्खियाँ निरन्तर श्रम करती हैं जो उपार्जन करती हैं वह सामूहिक सम्पत्ति की तरह जमा रखती हैं। चींटियाँ अण्डे बच्चों को जब इधर से उधर ले जाती हैं। उनके लिए खाद्य जुटाती हैं तो अपने पराये का भेदभाव भूल जाती हैं और सबके लिए सब काम करती हैं। दीमकों की प्रकृति भी ऐसी है। आपत्ति और आक्रमण के समय सब मिल−जुलकर सामना करती हैं। एक पर हुए हमले को सब अपने ऊपर हुआ आक्रमण मानती हैं और उस समूह युद्ध में इस बात की परवा नहीं करती कि किन्हें जान गँवानी पड़ी और उस सुरक्षा प्रयास में किनकी जान बची। इसे पूरी साम्यवादी व्यवस्था कहा जा सकता है।

चींटी की बुद्धिमत्ता असाधारण है वह गृह निर्माण शिल्प, शिशु पालन और अर्थ व्यवस्था में मनुष्य से किसी प्रकार पीछे नहीं है। वैज्ञानिक चकित हैं और यह खोज रहे हैं कि मनुष्य और चींटी के मस्तिष्कीय परमाणु कहीं एक ही जाति के तो नहीं हैं।

शाकाहारी पशुओं को कई बार हिंसकों का सामना करना पड़ता है। तब वे झुण्ड बनाकर सामना करते हैं। या दिशा विशेष में भागने के लिए एक नेतृत्व का अनुगमन करते हैं। पक्षियों के सम्बन्ध में भी यही बात है। जब मोर्चा जम जाता है तब आक्रान्ताओं को उस समय भाग खड़ा होने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहता। तब के लिए घात लगाते हैं जब कोई झुण्ड में बिछुड़ गया हो। बाज जैसे आक्रान्ताओं को देखकर चिड़ियाँ इकट्ठी हो जाती हैं और शोर का कुहराम ही नहीं करती वरन् खदेड़ने के लिए मिलिटरी जैसी मोर्चाबन्दी करती हैं। इस सामूहिक मोर्चेबन्दी में किसे क्षति पहुँची कौन बच गया, इसका ख्याल तक उस समुदाय में से किसी को नहीं रहता। यही नीति है जिसे अपनाने के कारण वे आक्रान्ताओं के बीच निरन्तर घिरी रहने पर भी हौसले बुलन्द रखती हैं और निर्भय का मस्त जीवन बिताती हैं।

जल पक्षियों में से कोई मादा मर जाय तो उसकी सहेलियाँ उन बच्चों को भी अपने ही बच्चे मान लेती हैं और इस तरह पालती हैं जिससे उन्हें माँ का अभाव न खटके। घोंसले में नये बच्चों के लिए जगह कम पड़ जाती है तो मिल−जुलकर इतनी जल्दी बना देती हैं कि अनाथ बच्चों को आश्रय रहित न रहना पड़े।

सिंह और सुअर की लड़ाई जिनने देखी है वे जानते हैं कि जंगली सुअर सिंह का सामना डट जाने पर पूरा गिरोह इकट्ठा होकर सामने अड़ जाता है और दाँतों की ऐसी करारी चोट करता है कि गरदन या पेट को चीरकर ही रख देता है। सुअर का शिकार बाघ और हाथी से भी महंगा पड़ता है। सूंड के ऊपर भाग से लटक कर सूंड चीर दे तो बात अलग है अन्यथा हाथी भी सूंड से ऐसी करारी चोट करते हैं कि शेर की कमर टूटे बिना नहीं रहतीं। यह एक दूसरे का सहकार है जिसके कारण वन्य पशुओं की बिरादरी घटने नहीं पाती। हिंस्र पशु दवा-घात लगाकर जब तक असंगठित, डरपोक और कमजोर हिरन आदि के सहारे पेट भरते हैं। कभी जंगली भैंसों का सामना पड़े तो शेर दुम दबाकर मूंछें नीची करके उस समय मोर्चा छोड़ने में ही अपनी खैर समझते हैं।

यह कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं जिसमें नवयुग का नवीन दर्शन गढ़ने वालों को अपनी भूल का पता चले कि केवल बड़ी मछली छोटी को निगल जाती है। इसी एक यदा−कदा घटित होने वाले सिद्धान्त को मनुष्य के लिए मार्गदर्शक नहीं बनाया जा सकता। वस्तुतः मछली माँस से अधिक शाक पर निर्भर करती है। जलाशयों में पाई जाने वाली हरियाली उसकी प्रधान खुराक है।

प्रकृति को मछली की साक्षी देकर मनुष्य के लिए यह मान्यता अपनाना उचित नहीं कि वह अपने से दुर्बलों का शोषण करे। जिसकी लाठी उसकी भैंस को न्यायानुमोदित सिद्ध करे। जंगल का कानून अपनाते हुए प्रगतिशीलता की दुहाई दे और यह कहे कि मनुष्य को समुन्नत और संसार को सुन्दर बनाने का यह तरीका है कि कमजोरों को जैसे बने वैसे सफाया करने की नीति अपनाई जाय। इसके लिए जीवन संघर्ष के आकर्षक सिद्धान्त की दुहाई देने की आवश्यकता नहीं है और न यह साबित करने की गुंजाइश ही रहेगी। आज बूढ़े बैल को कसाई खाने भेजने का अर्थशास्त्रीय औचित्य बताया जाता है तो कल बूढ़े बाप के सम्बन्धों में उसी नीति को अपनाने में क्या संकोच न रहेगा।

अनौचित्य और उसके दण्ड की परम्परा मिटाकर आज नया दर्शन गढ़ा जा रहा है। जीव के लिए संघर्ष और योग्यतम के चुनाव का नारा बुलन्द करते हुए यह मान्यता अभी भी समाज और व्यक्ति को भ्रष्ट कर रही है, अगले दिनों इसके और भी अनर्थकारी परिणाम सामने होंगे।




आध्यात्मिकता बनाम यथार्थता - Akhandjyoti March 1985

धर्म एवं अध्यात्म के सम्बन्ध में तत्त्वदर्शियों का यह अभिमत आरम्भ से ही रहा है कि इन अवलम्बनों को अपनाकर मनुष्य विचारशील, दूरदर्शी, सहृदय एवं परमार्थ परायण बन सकता है। यह उपलब्धियाँ ऐसी हैं जो किसी व्यक्तित्व को प्रामाणिक एवं प्रभावशाली बनाती हैं। जिनमें यह विशेषताएँ होंगी वे अपने कामों में सफल होंगे, प्रसन्न रहेंगे और दूसरों का भी मार्गदर्शन कर सकेंगे।

धर्म शास्त्रों में तत्व दर्शन का आधार यही बताया है और श्रेष्ठ व्यक्तित्व की लौकिक और पारलौकिक अनेकों सफलताएँ उपलब्ध होने का उल्लेख किया है।

किन्तु एक समय ऐसा भी आया जिसमें जादू चमत्कारों को धर्म के साथ जोड़ा गया और कहा गया कि उपासना करने वालों के आगे−पीछे देवी−देवता रहते हैं और वे अपने भक्तों की ही नहीं उनके संकेतों के अनुरूप शाप वरदान भी देते हैं। धार्मिकता की कसौटी किसी जमाने में चमत्कार दिखाने को माना जाने लगा। फलतः तन्त्र-मन्त्र जानने वाले और जादूगरी करामातें दिखाने वालों की बन आई। वे अपने को सच्चा और प्रभावशाली सिद्ध करने लगे।

कई गिरोहों ने ऐसे षड़यन्त्र बनाये, जिनमें वे किम्वदंतियां गढ़ते और उनकी अफवाहें फैलाकर भोले−भावुक धर्मभीरु लोगों को अपने सम्प्रदाय में सम्मिलित होने के लिए आकर्षित करते। यह कुचक्र पिछड़े हुए उन लोगों में अधिक सफल होता जो अनगढ़ मनोभूमि के लिये फिरते थे। देवी−देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मन्त्र तन्त्रों की रहस्यवादी रीति−नीति अपनाने के अभ्यस्त थे। अफ्रीका की जन−जातियाँ धर्म का सीधा अर्थ चमत्कार दिखाना और देवी−देवताओं को वशवर्ती रखने की क्षमता में सम्पन्न होना माना जाता था। अभी भी वह स्थिति समाप्त नहीं हुई। शिक्षा और विचारशीलता बढ़ाने के साथ−साथ घटी भर हैं।

पुरातन काल के लब्ध प्रतिष्ठ अध्यात्मवादियों ने धार्मिकता की परिभाषा चरित्र निष्ठा के रूप में की है। और उसे चिन्तन की उत्कृष्ट एवं चरित्र की आदर्शवादिता के साथ सम्बद्ध किया है।

चीन में प्रचलित धर्म कन्फ्यूसियस की मान्यताओं के अनुसार व्यक्ति के शुद्धाचरण से बढ़कर कोई रहस्य नहीं हो सकता। धर्म वही है जिसमें व्यक्ति को अपनी कर्त्तव्य परायणता का बोध होने लगे। ताओ ने जीवन पर्यन्त भावना क्षेत्र को अधिक रहस्यमय समझा और उन्हीं के अनुरूप लोगों को सदाचरण करने की बात को हृदयंगम कराते रहे। भारतीय साँख्य दर्शन की भाँति ताओ ने भी आत्मा की अमरता के सिद्धान्त को पूरी तरह अंगीकार किया है। ‘दी सीक्रेट आफ दी गोल्डन फ्लोवर’ में ताओ ने मिन और ऐंग यानी शिव शक्ति के सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया है। आगे चलकर इसी को सी॰ जी॰ जुंग ने सविस्तार से विवेचन किया है। सादगी और समता उनके शिक्षण का केन्द्र बिन्दु रहा है। पहली शताब्दी में जब बुद्ध धर्म चीन में फैला तो ताओ धर्म के अनुयाइयों ने उसकी वास्तविकता समझी और तद्नुरूप एकीकृत होकर काम करने लगे।

यहूदी धर्म ने ईश्वरीय सत्ता को हिन्दुओं की भाँति स्वीकार किया है। कैबीलिस्ट और हैजीडिस्ट इसी के अंतर्गत आते हैं। बालरोमतोव इन्हीं धर्मों के अनुयायी थे जिन्होंने हिन्दू धर्म को समझा और उसी के अनुरूप लोगों को आचरण करने के लिए बाधित किया। आदर्श और सिद्धान्तों को ईश्वर पूजा से कम महत्व का नहीं समझा।

रविया सूफी धर्म में ऐसी सन्त महिला जन्मी जिसने धरती पर स्वर्ग के अवतरण की कल्पना को साकार रूप देने में अपना जीवन समर्पित कर दिया। आबू याजिद ने भले ही कोई किताब न लिखी हो पर लोगों के हृदय में आज भी उनकी प्रतिभा विराजमान है। ईश्वर जैसी ख्याति उन्हें मिली।

आदिवासियों और जन−जातियों में प्रचलित रहस्यवाद से उनके पुरोहित कितने लाभान्वित होते हैं और उनके शिष्य किस तरह उनका अनुगमन करते हैं। यह प्रलोभन दूसरे धर्मानुयायियों से न देखा गया, उनके अपने संस्थापकों की जादुई विशेषज्ञों की झड़ी लगा दी। जिनके यहाँ चमत्कारों का ज्यादा वर्णन होता था उनके पीछे भीड़ भी बहुत लगती थी और दान−दक्षिणा, पुजापा, भेंट, बलि का लाभ भी बहुत होता था। इस प्रतिद्वन्द्विता के फेर में आदर्शवादी धर्मों के अनुयायियों ने अपने अलग मत−मतान्तर जादुई ऋद्धि-सिद्धियां दिखाने और किसी को लाभ किसी को हानि पहुँचाने का दावा करके धाक जमाना आरम्भ कर दिया।

देखा जाता है कि बुद्ध काल में जो तंत्रवाद निरस्त हुआ था वह फिर दूसरे रूप में उबल पड़ा और धर्मों के साथ न्यूनाधिक मात्रा में रहस्यवाद जुड़ गया। इस विकृति के मिल जाने से धर्म धारणा जितना लाभ पहुँचा था उससे अधिक रहस्यवादी अन्ध−विश्वास अपने अनुयायियों को सिर पर चपेक देती थी।

आज हमारे सामने धर्म के साथ रहस्यवाद जुड़े होने से विकृति रूप का ही बोल−बाला है। किन्तु प्रसन्नता की बात है कि उनके अनुयायी और दूसरे समीक्षक यथार्थता को अपनाने और किम्वदंतियों को अविश्वस्त कहने का उत्साह प्रकट कर रहे हैं। धर्म का शुद्ध रूप जब प्रकट होगा तब उसे पुरातन काल जैसा श्रेय और सम्मान मिलेगा।




पीपल के पेड़ पर (kahani) - Akhandjyoti March 1985

पीपल के पेड़ पर एक बेताल रहता था। लालच देकर लोगों को अपने पास बुलाता और अनाचार के मार्ग पर लगाता और अन्ततः उन्हें मार डालता, यही उसकी नीति थी। अब कितने ही मर गये तो उसका नाम सात स्वर्ण मुद्रा वाला बेताल नाम पड़ गया। जिन्हें पता था, वे सावधान रहते और उस रास्ते न जाते।

एक अनजान नाई उस रास्ते निकला। बेताल ने पेड़ पर बैठे पूछा− सात घड़े सोना लोगे।’ नाई का पहले तो आने का मन नहीं हुआ, फिर सोचा मुफ्त में इतना धन मिल रहा है तो क्यों छोड़ा जाय? उसने कह दिया। आप कृपा पूर्वक दे ही रहे हैं तो ले लूँगा।

बेताल ने कहा− ‘घर चले जाइए। आँगन में स्वर्ण मुद्राओं से भरे सात घड़े मिल जायेंगे। नाई तेजी से चला और रास्ता जल्दी ही पार करके घर जा पहुँचा। आँगन में सात घड़े रखे मिले। छः भरे और सातवाँ आधा खाली।

नाई ने दरवाजा बन्द करके घर के लोगों को सारा वृतान्त सुनाया। सभी बहुत प्रसन्न थे। फूले नहीं समाये।

विचार हुआ कि इस सोने का क्या किया जाय? तर्क−वितर्क क बाद सभी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आधे घड़े को भरने के लिए अधिक प्रयत्न कर लिया जाय। सातों पूरे हो जाने पर आगे की बात सोचेंगे।

परिवार के सभी लोग दुर्बल, चिन्तित, व्यग्र और कुकर्मरत रहने लगे। चेहरे कुरूप हो गये और शरीर जर्जर। लगता था एक−एक करके मृत्यु के मुँह में चले जायेंगे। सातवाँ घड़ा भरने की फिक्र में सभी सूखकर काँटा हुए जा रहे थे।

जिस राजा के यहाँ नाई नौकरी करता था उसके कान तक सूचना पहुंची। उसने नाई परिवार−को बुलाकर कहा। मूर्खों! उन सात घड़ों को ले जाकर चुपचाप उस श्मशान में रख आओ। अन्यथा उन घड़ों के रहते तुममें से एक भी जीवित न बचेगा। इस कुचक्र में कितने ही अपनी जान गँवा बैठे हैं। नाई परिवार ने सीख मानी। घड़े पीपल के पेड़ के नीचे रखकर लौट आये। फिर पहले की तरह नीतिपूर्वक की गई कमाई पर निश्चिन्तता से गुजारा करने लगे और उस प्राणघातक कुचक्र से छूटकर शान्ति से दिन बिताने लगे।




धर्म की उपेक्षा, अवमानना क्यों? - Akhandjyoti March 1985

धर्म किसी जमाने में लोक और परलोक की सुख−शान्ति का सुनिश्चित अवलम्बन था। तब कहा जाता था कि जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। जो धर्म को व्याघात पहुँचाता है वह जड़ मूल से नष्ट कर देता है। तब धर्म संसार की सबसे बड़ी शक्ति थी। धर्म को अपनाने वाले ‘धर्मात्मा’ देवात्मा समझे और पूजनीय तथा सराहनीय माने जाते थे।

पर अब कुछ विलक्षण परिवर्तन हुआ है। धर्म को ‘अफीम की गोली’ कहा जाता है और उस मान्यता को अपनाने वाले कट्टर पंथी−दुराग्रही−और पाखण्डी झगड़ालू माने जाते हैं। उसकी उपेक्षा भी होती है और अवज्ञा भी। नई फैशन के बाबू लोग ही विचारशील विज्ञजन भी प्रायः मिलते−जुलते विचार रखने लगे हैं।

विचारणीय है कि ऐसा परिवर्तन कैसे हुआ। जिसे इतना ऊँचा पद प्राप्त था वह इतनी नीची स्थिति में क्यों आ गया। अपनी चिर संचित गौरव गरिमा किस कारण गँवा बैठा?

धर्म का तात्विक स्वरूप है− कर्त्तव्य पालन। धर्म और कर्म दोनों एक ही स्तर के−समानार्थ बोधक हैं। कर्म का अर्थ यहाँ श्रम नहीं वरन कर्त्तव्य है। कर्त्तव्य अर्थात् नीति और व्यवस्था का परिपालन। नीति अन्तरंग और व्यवस्था बहिरंग रीति−नीति को सुनियोजित रखती है। धर्म के दस लक्षण गिनाये गये हैं। वे दोनों मानवी गरिमा को उच्चस्तरीय बनाये रहने के अनुबन्ध अनुशासन हैं। उन्हें पालन करने वाले चरित्रवान आदर्शवादी बनकर रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने लिए श्रेय सम्पादित करता है और दूसरों के लिए सुख−शान्ति का, प्रगति और समृद्धि का पथ-प्रशस्त करता है। शास्त्रकार का यही कथन है कि धर्म का अनुगमन करने से आत्मिक निश्रेयस और लौकिक अभ्युदय की उपलब्धि होती है। धारण करने की प्रक्रिया को धर्म कहा गया है। व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का अवधारण और गतिविधियों में सेवाभावी धर्म धारणा का समावेश। धर्म की जिस कारण प्रशंसा होती रही है और पालन करने वालों को जिस कारण सराहा जाता रहा है वह यही अनुबन्ध है। जो मनुष्य को मर्यादा पालन के लिए बाधित करते हैं पुण्य परमार्थ की दिशा में धकेलते उत्साहित करते हैं। उद्देश्य और स्वरूप को देखते हुए अनादि काल से धर्म मान्यता को सराहा जाता रहा है वह अकारण नहीं है। उसके पीछे कारण और तथ्यों का समावेश है। जिस अवलम्बन से मनुष्य चरित्रवान और परमार्थी बनता हो। जिसके प्रचलन से समाज व्यवस्था सुनियोजित बनती हो, उसकी उपयोगिता को देखते हुए सराहना होनी ही चाहिए और जो उसका परिपालन करते हैं वे अभिनन्दनीय अनुकरणीय माने ही जाने चाहिए।

फिर उस सनातन प्रवाह में ऐसा व्यतिरेक कैसे हुआ कि उसे मूढ़ता, कट्टरता और विग्रह का निमित्त कारण माना जाय और उसे क्षेत्र की अवज्ञा होने लगे? हुआ यह कि सम्प्रदायों ने अपने नाम के साथ धर्म शब्द जोड़ना शुरू किया और लोगों की यह मान्यता बनी कि सम्प्रदाय ही धर्म है। उनकी खामियों को देखते हुए विचारशील लोगों ने उपेक्षा एवं अवमानना करना आरम्भ कर दिया तो इसे अनुचित नहीं कहा जाता। निन्दा, प्रशंसा गुण दोषों के साथ ही जुड़ी रहती हैं।

धर्म एक है। वह सार्वभौम और सर्वजनीन है। नीति और सदाचार के नियम सर्वत्र एक ही है। किन्तु सम्प्रदायों के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। प्रथा प्रचलन क्षेत्रीय और सामयिक परिस्थितियों पर अवलम्बित रहते हैं और वे समय पर बदलते रहते हैं। असामयिक हो जाने पर दूरदर्शी स्वयं ही आगे बढ़कर उनमें सुधार परिवर्तन कर देते हैं। वे ढील या देर करते हैं तो जनमत उनके विरुद्ध हो जाता है। तब विवश होकर उसे बदलना पड़ता है। नदी प्रवाह की तरह साम्प्रदायिक अनुबन्धों का समय के अनुरूप परिवर्तन आवश्यक है। पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो उन्हें पत्थर की लकीर मान बैठते है और समय बदल जाने पर भी−प्रचलनों में विकृतियाँ में घुस पड़ने पर भी उन्हें बदलना नहीं चाहते। कट्टरता यहीं से उत्पन्न होती है और वही विग्रह का कारण बनती है। तब बात और भी बिगड़ती है जब लोग अपनी मान्यता को दूसरों पर लादते हैं और जो सहमत नहीं होते उन्हें अधर्मी ठहराकर पीड़ित प्रताड़ित करते हैं। इस उत्साह में वे नृशंसता की सीमा पार कर जाते हैं। इन घटनाओं पर दृष्टिपात करके लोग अनुमान लगाते हैं कि यह सब धर्म के कारण होता है। जबकि वास्तविकता यह है धर्म केवल प्रेम और सहयोग और सौजन्य सिखाता है। घृणा, द्वेष और दबाव तो साम्प्रदायिक कट्टरता का प्रतिफल है। वही जब उग्र हो उठती हैं तो न केवल सम्बन्धित सम्प्रदायों का वरन् जिसकी छाया में वह पलती उस धर्मधारणा को भी बदनाम करती है।

बहुपति प्रथा−बहुपत्नी प्रथा आपत्ति धर्म है। किन्हीं क्षेत्रों में किसी समय कोई प्रचलन अपनाया होगा। पर उसे सामयिक सूझ−बूझ कहा जा सकता है। पर वह अपवाद सर्वकालीन नहीं बन सकते। पति−पत्नी का युग्म ही शाश्वत और सुविधाजनक है, विवेक की कसौटी पर वही खरा उतरता है। जब आपत्ति कालीन परिस्थितियाँ बदल जांय तो उन निर्धारणों को भी बदल देना चाहिए। उन प्रवचनों को पत्थर की लकीर मानकर नहीं बैठ जाना चाहिए।

हिन्दू धर्म में बाल−विवाह, सती प्रथा, छुआछूत, देवताओं के आगे पशुबलि, मृतक−भोज, भिक्षाव्यवसाय आदि अनेकों कुरीतियाँ प्रचलित हैं। यह साम्प्रदायिक दोष है। कभी किन्हीं कारणों से इनका औचित्य रहा होगा। अन्यथा बिना औचित्य के भी बड़ों के प्रभाव या दबाव से वैसी प्रथाएँ चल पड़ी होंगी। वह समय चला जाने पर विज्ञजनों का−अथवा लोकमत का कर्त्तव्य है जो अनुचित अवाँछनीय लगे उसे बदल दें। उन कुरीतियों के लिए धर्म पर लांछन न लगायें। क्योंकि धर्म की सीमा तो सदाचार सहयोग तक−उत्कृष्टता आदर्शवादिता तक सीमित है। प्रथाएँ यों सम्प्रदायों की छाया में पलती और बदलती रहती हैं। कठिनाई यह अड़ गई कि लोग धर्म और सम्प्रदायों का अन्तर करना भूल गये, और सामयिक सांप्रदायिक प्रचलनों के लिए धर्म को दोषी ठहराने लगे। धर्म शाश्वत है। जबकि सांप्रदायिक प्रचलनों में समय के अनुरूप सुधार परिवर्तन होते रहना आवश्यक है।

अपने सम्प्रदाय में दीक्षित होने के लिए विचार स्वातन्त्र्य के अनुसार तर्क और कारण उपस्थित किये जा सकते हैं। पर सहमत न होने वालों को म्लेच्छ या काफिर कहकर अपमानित नहीं किया जा सकता और न प्रलोभन देने, प्रताड़ित करने की सीमा तक बढ़कर असहिष्णुता का परिचय दिया जा सकता है।

मध्यकाल में मध्य पूर्व और यूरोप के देशों में इस प्रकार का रक्तपात बहुत हुआ है जिसमें सम्प्रदाय बदलने के लिए विवश किया गया और दबाव न मानने वालों का सिर कलम कर दिया गया। उस असहिष्णुता का आक्रामक नृशंस स्वरूप भारतवासियों को भी उन दिनों बहुत देखना पड़ा जिन दिनों मध्य पूर्व के लुटेरे बार−बार आक्रमण करने और हुकूमत जमाने लगे थे। धर्म के नाम पर कत्लेआम की नृशंसता ने लोक−मानस ऐसा बनाया जिसमें यह माना गया कि धर्म कट्टरता, असहिष्णुता और नृशंसता का प्रतिनिधित्व करते हैं। वह अनीति जिन लोगों ने जिन सम्प्रदायों ने जिस सीमा तक अपनाई थी आक्रोश उसी सीमा तक उतने ही समय तक रहना चाहिए था। किन्तु हुआ यह कि सम्प्रदाय और धर्म का अन्तर भुला देने के अतिरिक्त अपने धर्म पंथ में दीक्षित करने के लिए जो दबाव डाले गये उसके लिए धर्म को दोषी ठहरा दिया गया। जबकि धर्म और सम्प्रदाय में जमीन आसमान जितना भेद है। लोग भ्रमवश ही दोनों को एक मान बैठते हैं और एक का दोष दूसरे पर मढ़ते हैं।

इस सम्बन्ध में डा॰ सनयातसेन एवं चाँगा काईशेक के जमाने का चीन विवेकपूर्ण प्रचलन का उदाहरण बन गया था। उन दिनों वहाँ बौद्ध, ईसाई, इस्लाम और ताओ धर्म सम्प्रदायों का प्रचलन था। इनमें से जिसे जो पसन्द आता था अपना लेता था। स्त्री ईसाई, पति मुसलमान, बेटा बौद्ध, बेटी ताओ मान्यताओं को अपना सकते थे और अपने−अपने विश्वासों या तर्कों के आधार पर जो अच्छा लगता था उसे पालते थे। कोई किसी पर अनावश्यक दबाव नहीं डालता था। किसी को कोई मान्यता बदलनी होती थी तो वह वैसा भी स्वेच्छापूर्वक कर लेता था। इस प्रकार वहाँ धर्म एक प्रकार से दार्शनिक आवश्यकता पूरी करते थे। कोई पंथ या वर्ग खड़ा नहीं करते थे। वह पद्धति उपयोगी थी। अब तो उस देश में कम्यूनिज्म का बोलबाला है। तो भी कोई व्यक्ति किसी सम्प्रदाय की मान्यताएँ, विचारणाएँ अपनायें तो उस पर कोई रोक नहीं है।

भारत में देव मान्यता के नाम पर कभी शैव, शाक्त, वैष्णव आदि सम्प्रदाय थे। पर अब उस संदर्भ में वैसी कट्टरता नहीं रही। परिवार के लोग अलग−अलग देवी−देवता पूज सकते हैं। इसमें कोई किसी से बुरा नहीं मानता। अग्रवाल वैश्यों में जैन भी होते हैं और वैष्णव भी दोनों के बीच ब्याह शादियाँ होती हैं। कोई किसी की मान्यता में हस्तक्षेप नहीं करता। सम्प्रदायों सम्बन्धी मान्यताओं का भी यही दार्शनिक स्वरूप उपयुक्त है। पर जब भिन्न मत वालों को म्लेच्छ काफिर कहा जाने लगा और अपने समूह में सम्मिलित करने के लिए रक्तपात तक किया जाने लगा। तो लोगों ने अनुमान लगाया कि ऐसे कृत्य करने वाले−कराने वाले−धर्म नहीं हो सकते। उनके रहने से संसार में अशान्ति ही बढ़ेगी। कभी इस चपेट में योरोप, मध्य पूर्व और भारत के अतिरिक्त एशिया के कितने ही क्षेत्र बुरी तरह चपेट में आ गये और बुरी तरह नृशंसता के शिकार हुए। धर्मों के प्रति घृणा भाव उसी समय में लोगों के मनों में जमा हुआ है और पुराने इतिहास का स्मरण करके लोग अभी भी सोचते हैं कि धर्म अविवेकियों की कट्टरता भर है। इसलिए उसकी उपेक्षा या अवमानना ही होनी उचित है। वह भूल अभी भी बराबर बनी हुई है जिसमें सम्प्रदायों और धर्म दोनों को एक मान लिया जाता है। इस भूल ने ही सारा गुड़ गोबर किया है। मिला देने से न गुड़ खाने योग्य रहा और न गोबर लीपने योग्य।

धर्म सम्प्रदायों के विरुद्ध तीन आक्षेप लगते हैं− 1. उन्होंने एक मनुष्य जाति को अनेक खण्डों में बुरी तरह विभाजित कर दिया। 2. दूसरे धर्म वालों को अपने में सम्मिलित करने के लिए प्रलोभनों और नृशंसता भरे दबाव डाले। 3. जो प्रचलन किसी समय विशेष के लिए किन्हीं विशेष कारणों से उचित समझे गये थे अब वैसी परिस्थिति न रहने पर भी सुधार परिवर्तन में आना−कानी की जाती है और कट्टरता हठधर्मी बरती जाती है। यह तीनों ही आक्षेप सही हैं। इनके रहते यदि जन−मानस में इस संदर्भ में उपेक्षा और अवमानना उभरी है तो उसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि सम्प्रदायों से जो भूल होती रही है उसका परिमार्जन किया जाय। यह हो सका जो धर्म की प्रतिगामिता का प्रतीक मानना भी रुक जायेगा और लोक उसकी पूर्वकाल जैसी आवश्यकता अनुभव करेंगे तथा वैसी ही प्रतिष्ठा प्रदान करेंगे।




वास्तव में कुछ बनना है (kahani) - Akhandjyoti March 1985

अन्दर से अच्छा बनना ही वास्तव में कुछ बनना है। अन्दर को घटाकर जीवन को बाहर से बनाना, सजाना ठीक उसी प्रकार की क्रिया है जैसे कोई विद्यार्थी किसी प्रश्न के मूल अन्तर को छोड़कर उसकी भूमिका के बल पर ही परीक्षा पास करना चाहता है।

मनुष्य जीवन की बाह्य बनावट उसे कब तक साथ देगी। जो कपड़े अथवा जो प्रसाधन यौवन में सुन्दर लगते हैं, यौवन ढलने पर वे ही उपहासास्पद दीखने लगते हैं। मनुष्य को जीवन का श्रृंगार ऐसे उपादानों से करना चाहिये जो आदि से अन्त तक सुन्दर बने रहें और मनुष्य को आकर्षक बनाये रहें।

मनुष्य जीवन का वह अक्षय श्रृंगार है− आन्तरिक विकास। हृदय की पवित्रता एक ऐसा प्रसाधन है जो मनुष्य को बाहर-भीतर से एक ऐसी सुन्दरता से ओत−प्रोत कर देता है जिसका आकर्षण न केवल जीवन पर्यन्त अपितु जन्म−जन्मान्तरों तक सर्वदा एक−सा बना रहता है। −अश्विनीकुमार दत्त




आत्मबोध का अभाव ही खिन्नता - Akhandjyoti March 1985

स्वाभाविक प्रसन्नता खोकर अस्वाभाविक खेद, दुःख, किस बात का? रंज किस निमित्त? विचार करने पर प्रतीत होगा कि खिन्नता सिर पर लादने के वैसे कारण हैं नहीं जैसे कि समझ गये हैं।

घाटा कितनी दौलत का पड़ा। यह हिसाब लगाने से पूर्व देखना यह होगा कि जब आये थे तब क्या−क्या वस्तुऐं साथ थीं और जब विदाई का दिन सामने होगा तब क्या−क्या साथ जाने वाला है। जब दोनों परिस्थितियों में खाली हाथ ही रहना है तो थोड़े समय के लिए जो वस्तुएँ किसी प्रकार हाथ लगीं उनके चले जाने पर इतना रंज किस निमित्त किया जाय, जिससे प्रसन्नता भरे जीवन का आनन्द ही हाथ में चला जाय?

जिन वस्तुओं के चले जाने का रंज है वे कुछ समय पहले दूसरों के हाथ में थीं। जब हाथ आई तब इस बात की किसी ने कोई गारण्टी नहीं दी थी कि यह सदा सर्वदा के लिए अपने पास रहेगी। आज अपने हाथ, कल दूसरे के हाथ−वस्तुओं का यही क्रम है। कुछ समय के लिए हाथ आना और देखते−देखते दूसरे के हाथ चले जाना, विश्व व्यवस्था के इस क्रम में स्थायित्व की कल्पना करना यह भ्रम मात्र है। धन की हानि होते देखकर रुदन करना, अपने अनजानपन के अतिरिक्त और है क्या? जो अपने हाथ आया था वह दूसरे के हाथ खाली कराकर वह खिलौना दूसरों के हाथ खेलने के लिए थमा दिया गया तो इसमें क्या अनहोनी बात हो गई?

स्वजन सम्बन्धियों में से कुछ मृत्यु के मुख में चले गये अथवा अब जाने वाले हैं। इसमें अनहोनी क्या हुई? अपना शरीर जा रहा है या जाने वाला है इसमें भी प्रवाह क्रम ही समझा क्यों न जाय? जब जन्म लिया था तब कितने ही स्वजन सम्बन्धियों से नाता तोड़कर इस देह में आ गया था। अब उसी प्रकार इस देह से सम्बन्ध तोड़कर अन्य देह में प्रवेश करने का अवसर आ गया तो रुदन की क्या बात? नये शरीर बदलते रहना कपड़े बदलने के समान है। जो स्वाभाविक है। उसमें अनहोनी क्या हुई?

सम्बन्धी कुछ समय पूर्व ही तो मिले थे। इससे पूर्व वे भी किसी के कुटुम्बी सम्बन्धी थे। अब यदि उनमें से कोई बिछुड़ता है और किसी नये परिवार का सदस्य बनता है तो ऐसा क्या हुआ जो इससे पूर्व किसी के साथ घटित नहीं हुआ, या भविष्य में किसी के साथ घटित न होगा। मिलन की प्रसन्नता के साथ विछोह की खिन्नता का अटल नियम चला आ रहा है। उस भवितव्यता से हम बचे रहें, ऐसी आशा करना व्यर्थ है। जो व्यर्थ की चिन्तन करता है उसे अकारण खिन्नता ओढ़नी पड़ती है।

परिवर्तन इस संसार का नियम है। जो वस्तु कल एक की थी वह आज अपने हाथ आ गई। परसों उसे दूसरे के हाथ जाना है। यह भ्रमणशील विश्व व्यवस्था अपने नियम बदल दे और तुम्हारे लिए नियम बदल दे और तुम्हारे लिए स्थिर बन कर रहे। ऐसी आशा करना खिन्नता मोल लेना है जिसका कोई उपचार नहीं।

यदि परिवर्तन से− विछोह और वियोग के दुःख से बचना है तो उसका एक ही उपाय है− आत्मज्ञान। हम सदा से हैं सदा तक रहेंगे। वस्तुएँ न अपनी थीं न अपनी रहेंगी। प्राणियों से सम्बन्ध बनते और बिछुड़ते रहते हैं। यह आत्मज्ञान है। आत्मा के अनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का गठन−यही है। स्थायी प्रसन्नता का वह आधार जिससे परिवर्तनशील परिस्थितियाँ न खिन्नता उत्पन्न करती हैं और न किसी कारण प्रसन्नता में व्यवधान आता है। आत्मबोध के अभाव में ही हम रोते−कलपते हैं। इसे प्राप्त किया जा सके तो फिर सदा सर्वदा आनन्द ही आनन्द है।




जीवन दर्शन की विविध धाराएँ - Akhandjyoti March 1985

मनुष्य की वरिष्ठता का मापदण्ड भौतिक वादियों ने यह स्थापित किया है कि जो भौतिक साधनों का जितना उपार्जन एकत्रीकरण कर सकेगा, वह सफल या बड़ा माना जायेगा। साधन सामग्री के आधार पर ही मनुष्य शारीरिक, मानसिक सुख साधन एवं परिस्थितियाँ उपलब्ध कर सकता है। जिसके पास उपभोग की जितनी सामग्री है उसे वह उतनी ही प्रसन्नता से मिलेगा। इस सम्पदा और उसके आधार पर अर्जित की गई प्रसन्नता के आधार पर ही यह जाना जा सकता है कि किसे कितना बड़ा या सफल समझा जाय। वास्तव में देखा जाय तो इस मान्यता ने नैतिक मूल्यों का अपहरण कर लिया है।

प्रस्तुत भौतिकवादी मान्यता ने जो चिन्तन लोगों को दिया है उससे वह अधिकाधिक स्वार्थी, विलासी और अपव्ययी होता चला गया है। उसके क्रिया−कलापों में ऐसे कृत्य भी सम्मिलित हो गये हैं, जिनमें अपने लाभ के लिए दूसरों को कष्ट देने में कोई हर्ज नहीं माना जाता। यह दर्शन पशु-पक्षियों के माँस और चमड़े का वैसा प्रयोग करने की छूट देता है जिससे अपने स्वाद और सौंदर्य की इच्छा पूर्ति होती है। औषधियों में इस प्रयोग का भरपूर प्रचलन है।

जब एक दर्शन स्वीकृत हो गया तो उसे पशु−पक्षियों तक ही सीमित क्यों रखा जाय? मनुष्य को क्यों बख्शा जाय। प्रश्न केवल दुर्बल और सबल का है। दुर्बल पशु−पक्षियों की तरह पिछड़े हुए, बदला लेने में असमर्थ लोगों के साथ ऐसा कुछ भी किया जा सकता है, जिससे अपनी प्रसन्नता और सम्पदा बढ़ती हो। “जिसकी लाठी−उसकी भैंस’’ का जंगल कानून प्रयुक्त तो पहले भी होता था पर लुक−छिपकर और उन कृत्यों पर कोई आदर्शवादी आवरण उढ़ाकर अनुचित को उचित सिद्ध करने का झंझट उठाना पड़ता था। पर प्रस्तुत भौतिकवादी दर्शन ने उस झंझट को मिटा दिया है। न्याय नीति का ध्यान रखना उसी सीमा तक पर्याप्त माना गया है जिस सीमा तक मनुष्य कानून की पकड़ में न आता हो और परिस्थितियाँ वैसा न करने के लिए विवश करती हों।

बड़प्पन की इस भौतिकवादी व्याख्या को राजनैतिक दर्शन ने एक कदम और भी बढ़ाया है। अतिमानव की उपलब्धि में अधिनायकवाद ने अपना दार्शनिक रंग भी चढ़ाया है। नीत्से ने इस संदर्भ में बहुत कुछ लिखा है। जर्मनी ने इसे लिया भी गम्भीरता से। हिटलर को इसी अति मानव दर्शन ने प्रभावित किया और वह जर्मन जाति को सुपर मैन की नस्ल कहकर उसे समस्त संसार पर शासन करने के लिए उद्यत एवं प्रशिक्षित करने लगा।

आधुनिक दार्शनिकों में विकासवादी फ्रायड का कथन वजनदार माना जाता है। उसने अपनी कृति “बियोन्ड दि प्लेजर प्रिन्सीपल” में लिखा है, ‘‘जीवन निरर्थक है। उसका अन्तिम चरण मृत्यु है। या तो वह अपनी करतूतों से आप मरता है अथवा दूसरे उसे निरर्थक होने पर मार देते है।”

ब्राउन ने अपनी कृति “लाइफ अगेन्स्ट डैथ” में अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए मानवता से प्रेम करने की बात भी कही है।

नॉरमन ने लिखा है− ‘‘मनुष्य की प्रतिभा का अर्थ है− असन्तोष। उसी के आधार पर वह कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर पाता है। पशुओं में असन्तोष नहीं होता इसलिए उनका कोई इतिहास भी नहीं होता।”

प्रभावशाली और वजनदार बात नीत्से की है। उसने मनुष्य को सशक्त ही नहीं उद्धत और विजयी होने की बात भी कही है। नीत्से ने फ्रायड के “नॉरमल मैन” की खिल्ली उड़ाई है और कहा है- रोटी खाकर दिन गुजारना और दबकर रहना− यह भी कोई जीवन है।

नीत्से का “सुपर मैन” मानवता को प्रेम करना हास्यास्पद बताता था। नीत्से के अनुसार प्रेम और त्याग का सिद्धान्त व्यक्ति को कमजोर व डरपोक बनाता है। फिर अच्छा क्या है?−इसके उत्तर में उन्होंने कहा था−कि जो व्यक्ति में शक्ति की इच्छा व भावों को विकसित करे। सन्तोष नहीं बल्कि असीम शक्ति, शान्ति नहीं बल्कि युद्ध, नैतिकता नहीं बल्कि योग्यता। उनके अनुसार सुपर मैन में शक्ति की श्रेष्ठ इच्छा उसे गलत चिन्तन से मुक्त कर देती है। मनुष्य स्वभावतः क्रूर, आक्रामक व शक्ति का भूखा होता है।

“सुपरमैन” कहने लायक कुछ काम तो करता है जबकि ‘नॉरमल मैन’ सनक में ‘कुछ का कुछ’ कर बैठता है। इस प्रतिपादन के अनुसार मार्क्स, बुद्ध व ईसा, जिन्होंने मानव जाति को अपना प्यार न्यौछावर कर दिया, स्नायु−रोग से ग्रस्त बताये गये। इसलिए उन्होंने जीवन की चुनौती को अस्वीकार किया। फ्रायड ने अपने सिद्धान्त का यही निष्कर्ष दिया है।

अल्बर्ट कैमस ने अपनी पुस्तक ‘दि मिश्र ऑफ सीसीफस’ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है कि जब जीवन निरर्थक हो जाता है तो भी क्या जीवित रहने का कोई कारण है? उनके अनुसार जब व्यक्ति अपने जीवन की निरर्थकता को समझ लेता है तब या तो आत्महत्या कर लेता अथवा वागी बन जाता हैं।

इन्हीं विचारों से प्रेरित और प्रभावित होकर हिटलर, मुसोलिनी जैसे तानाशाह विश्व विजय का स्वप्न देखते रहे। कमजोरों को धरती का भार कहकर उन्हें मिटा देने की वकालत करते रहे। उनकी मान्यता बन गई थी कि शासन का कठिन कार्य कुछ बलिष्ठ लोग भी कर सकते हैं। शेष को उनके अनुशासन भर में चलना चाहिए।

प्रजातंत्र की मान्यता है कि जो जैसा है, उसे वैसा रहने दिया जाय। सज्जनों का काम है कि उठने वालों को सहारा दें और गिरने वालों को सम्भालने की जिम्मेदारी एक सीमा तक निभायें। प्रजा अपनी मर्जी की मालिक तो रहे ऐसा न करे जिससे समूह गत व्यवस्था के बने रहने में अड़चन उत्पन्न हो।

फ्रायड का ‘नॉरमल मैन’, नीत्से का ‘सुपर मैन’, रूसो का ‘मिडिल मैन’ अरविन्द की समझ में नहीं आये। वे व्यक्ति के अन्तराल में विद्यमान “अतिमानस” को विकसित करने की बात कहते हैं ताकि उस मार्ग को अपनाने वाला “अतिमानव” बन सके और अपने ओजस् से समस्त संसार को वरिष्ठ बना सके।

महर्षि अरविन्द ने कहा है कि− ‘‘अद्वितीय विश्वात्मक सत्ता के साथ निर्विशेष एकता की रहस्यानुभूति करने वाला महापुरुष जगत के प्रति अत्यन्त उदार वृत्ति अपना लेता है। उसका व्यक्तित्व महान से महानतम विस्तृत रूप धारण करता चला जाता है और उसे ऐसा बोध होने लग जाता है कि जो श्रेयस्कर बात अपने लिए सम्भव है वह दूसरों के लिए भी सम्भव हो सकती है। यही कारण है कि उनकी प्रत्येक चेष्टा हर क्रिया−कलाप समस्त प्राणियों के हित में−‘सर्वभूत हितरेतः’ होने लग जाती हैं और इसी में उन्हें अनिर्वचनीय आनन्द का अनुभव होता है। विश्व की आध्यात्मिक सत्ता आत्म−प्रकाशन की स्वाभाविक प्रवृत्ति का परिणाम स्वरूप बनकर अपने आप किसी सुप्राएथिकल अतिनैतिक प्रेरणा के द्वारा अस्तित्व में आ जाया करता है। “योगीराज के अनुसार ऐसे आध्यात्मवादी आदर्श के आलोक में सम्पूर्ण मानव समाज तथा समस्त विश्व का कल्याण हो जाना सम्भव है। अध्यात्मवाद के आदर्श, उसके उद्देश्य तथा उनके द्वारा अनुप्राणित विचारधारा का सार्वभौम बन जाना अवश्यम्भावी एवं स्वयंसिद्ध समझा जा सकता है।”

स्वामी विवेकानन्द ने अमेरिका में दिये एक भाषण में कहा था− ‘‘व्यक्ति और समाज की भलाई इसमें है कि हर आत्मा में ईश्वर के अंश का दर्शन किया जाय और हर किसी के साथ ऐसा व्यवहार किया जाय जैसा कि ईश्वर के एक अंश को दूसरे के साथ करना चाहिए।”

स्वामी अभेदानन्द का मत था कि हम दूसरों की पीड़ा को अपनी समझें और दूसरों को सुखी बनाने के लिए ऐसे प्रयत्न करें कि अपने लिए सामान्यतया किये जाते हैं। यही है मनुष्य के लिए समर्थ उत्कृष्टता से भरा−पूरा राज मार्ग। इसे अपनाया जा सके तो हर परिस्थिति में हर कोई एक दूसरे को सुखी बनाने और प्रसन्न रखने के लिए कुछ न कुछ कर सकता है। आज की तुलना में कल अधिक अच्छी दुनिया बन सके इस भावना को अपनाकर हम प्रगति की दिशा को चल सकते हैं साथ हो असंख्यों को इसी श्रेय पथ पर चला सकते हैं।

अनेकों उलझन भरे विचारों के बीच वेदान्त दर्शन का प्रतिपादन जो स्वामी अभेदानन्द एवं विवेकानन्द के शब्दों के माध्यम से व्यक्त हुआ है, अधिक सुविधाजनक और श्रेयस्कर है।




व्यापारिक कार्यों में लगा रहता (kahani) - Akhandjyoti March 1985

एक धनी व्यक्ति अपने व्यापारिक कार्यों में लगा रहता था। उसे अपने स्त्री और बच्चों से बात करने तक की फुर्सत नहीं मिलती थी। पड़ौस में ही एक मजदूर रहता था जो एक रुपया कमाकर लाता और उसी से चैन की वंशी बजाता। रात को वह तथा उसके स्त्री−बच्चे खूब प्रेम पूर्वक हँसते बोलते। सेठ को स्त्री यह देखकर मन−ही−मन बहुत दुःखी होती कि हमसे तो यह मजदूर ही अच्छा है, जो अपना गृहस्थ जीवन आनन्द के साथ तो बिताता है। उसने अपना महादुःख एक दिन सेट जी से कहा कि इतनी धन−दौलत से क्या फायदा जिसमें फँसे रहकर जीवन के और सब आनन्द छूट जाँय।

सेठ जी ने कहा− तुम कहती तो ठीक हो, पर लोभ का फन्दा ऐसा ही है कि इसके फेर में जो फँस जाता है उसे दिन−रात पैसे की हाय लगती रहती है। यह लोभ का फन्दा जिसके गले में एक बार पड़ा वह मुश्किल से ही निकल पाता है। यह मजदूर भी यदि पैसे के फेर में पड़ जाय तो इसकी जिन्दगी भी मेरी जैसी नीरस हो जावेगी।

सेठानी ने कहा− इसकी परीक्षा करनी चाहिए। सेठ ने कहा, अच्छा−उनने एक पोटली में निन्यानवे रुपये बाँधकर मजदूर के घर में रात के समय फेंक दिये। सबेरे मजदूर उठा और पोटली आँगन में देखी तो खोला, देखा तो रुपये। बहुत प्रसन्न हुआ। स्त्री को बुलाया, रुपये गिने। निन्यानवे निकले, अब उनने विचार किया कि एक रुपया और मिलाकर इन्हें पूरे सौ कर लेना चाहिए। मजदूर जो एक रुपया कमाता था उसमें से आठ आने खाये गये, आठ आने जमा किये। दूसरे दिन फिर आठ आने बचाये गये। अब उन रुपयों को और अधिक बढ़ाने का चस्का लगा। वे कम खाते और रात को भी अधिक काम करते ताकि जल्दी−जल्दी अधिक पैसे बचें और वह रकम बढ़ती चली जाय।

सेठानी अपनी छत पर से उन नीची छत वाले मजदूर का सब हाल देखा करती। थोड़े दिनों में वह परिवार जो पहले कुछ भी न होने पर भी बहुत आनन्द का जीवन बिताता था अब धन जोड़ने के चक्कर में−निन्यानवे के फेर में− पड़कर अपनी सारी प्रसन्नता खो बैठा और दिन−रात हाय−हाय में बिताने लगा। तब सेठानी ने समझा कि जोड़ने और जमा करने की आकाँक्षा ही ऐसी पिशाचिनी है जो मजदूर से लेकर सेठ तक की जिन्दगी को व्यर्थ और भार रूप बना देती है। धन भले ही बढ़ जाय पर साथ ही परेशानी और चिन्ता भी अनेक गुनी बढ़ जाती है।

धन जोड़ने के लालच में बहुधा लोग जीवन के सुख एवं लक्ष्य को भी भुला बैठते हैं। इसी लोभ को निन्यानवे का फेर कह कर निन्दा की गयी।




मानव के परिष्कार एवं उत्कर्ष की भावी सम्भावनाएँ - Akhandjyoti March 1985

मनुष्य मूलतः क्या है? और उसकी मूलभूत−जन्मजात प्रवृत्तियाँ क्या हैं? इस संदर्भ में उसके उद्गम स्रोत पर ध्यान देना चाहिए। वह ईश्वर का ज्येष्ठ पुत्र युवराज है और उसकी विश्व वाटिका को समुन्नत सुविकसित करने के लिए एक कुशल माली की भूमिका निभाने आया है। उसका जन्मजात स्वभाव भी इस भूमिका का निर्वाह कर सकने के सर्वथा उपयुक्त है। शरीर, मानस तन्त्र और भावनाओं का त्रिविधि संस्थान ऐसी दिव्य क्षमताओं और विभूतियों से भरा−पूरा मिला है जिससे जीवन सम्पदा को सार्थक बनाने वाली उच्चस्तरीय भूमिका निभा सके।

आधुनिक वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में भ्रान्त धारणाएँ ही दी हैं और उसके अस्तित्व को हेय स्तर का ठहराया है। कहा है कि जन्मजात रूप से उसे पशु−प्रवृत्तियाँ ही मिली हैं। उनकी पूर्ति से ही से चैन पड़ता है। वही उसे करना चाहिए। इन तथाकथित अन्वेषण कर्ताओं का कहना है कि समुद्र में जैसे एक कोशीय प्राणियों के रूप में जीवन उत्पन्न हुआ, उसी से विभिन्न प्रकार के प्राणी विकसित हुए उसी विकास श्रृंखला में से बन्दर की औलाद के रूप में मानव जीवन प्रकाश में आया। पशु−प्रवृत्तियों के इन विश्लेषण कर्ताओं ने यह कहा है कि सभी जानवर स्वार्थ प्रधान हैं। जहाँ अवसर मिलता है वहाँ आक्रमण करने में नहीं चूकते। यौन स्वेच्छाचार उनकी स्वाभाविक मान्यता है। खतरे की स्थिति में वे लड़ने या भाग खड़े होने की दोनों ही नीतियाँ अपनाते हैं। चूँकि मनुष्य भी एक तरह का पशु है इसलिए उसमें भी यही प्रवृत्तियाँ काम करती हैं, जो अन्यान्यों में हैं। इस प्रतिपादन के हिसाब से नीतिवादी−आदर्शवादी उत्कृष्टता की जड़ कट जाती है और वह नर पशुओं की श्रेणी में ही जा खड़ा होता है। उस प्रतिपादन के अनुसार यदि मनुष्य चोर−उचक्का, व्यभिचारी आक्रमणकारी बनता है तो यह उसकी स्वाभाविकता ही मानी जायेगी।

हमें इन पाश्चात्य प्रतिपादकों की मान्यताओं पर तनिक भी ध्यान नहीं देना चाहिए और पूछना चाहिए कि यदि जानवर विकसित हो रहे हैं तो मनुष्य शरीर का विकास कब से हुआ और भविष्य में क्या अन्तर पड़ेगा? लाखों वर्षों से मनुष्य इसी स्तर के शरीरों में रह रहा है और उसकी प्रवृत्तियों एवं आदतों में भी कोई अन्तर नहीं पड़ा है। वह सदा से शाकाहारी रहा है। साथ ही उसे नीति, सदाचार, मर्यादा एवं परमार्थ की दृष्टि से भी अपनी गरिमा प्रकट करनी पड़ी है।

मनुष्य देवताओं की सन्तान है। आधुनिक अन्तरिक्ष विज्ञानी भी यह मानने लगे हैं कि मानवी सत्ता किन्हीं उच्च लोकों के समुन्नत प्राणियों की वंशज है। पृथ्वी पर देवलोकवासी असाधारण क्षमता एवं भावना से भरेपूरे लोग समय−समय पर यहाँ आते रहे हैं और धरती को मनुष्य को अधिक सुविकसित स्थिति में पहुँचाने के लिए भावभरा योगदान देते रहे हैं। इन दिनों भी उड़नतश्तरियों के रूप में उस प्रयास के चलते रहने का परिचय मिलता है। पृथ्वी के कितने ही भागों में इस प्रकार के प्रमाण अवशेष भी उपलब्ध हैं।

इन पंक्तियों में उस श्रुति का प्रतिपादन किया जा रहा है जिसमें कहा गया है कि “मनुष्य पूर्ण से उत्पन्न हुआ। पूर्णता युक्त है और अन्त में पूर्ण ही होकर रहेगा।” कभी−कभी कुप्रचलनों का दौर आ जाता है जैसे कि सूर्य चन्द्रमा के उदीयमान होते हुए भी ग्रहण के−बादलों के या कुहरा अन्धड़ के कारण उनका प्रकाश धुँधला पड़ जाता है। जरा-जीर्ण स्थिति में भी भवनों की−प्राणियों की दुर्दशा हो जाती है। ऐसा ही कुछ अवरोध मानवी गरिमा के सम्बन्ध में भी समझा जा सकता है। यह अस्थायी है और आशा की जानी चाहिए कि इसमें जल्दी ही उत्साहवर्द्धक परिवर्तन होने जा रहा है।

इन दिनों शरीर शास्त्री, मनोविज्ञानी, नृतत्ववेत्ता अपने-अपने ढंग से मनुष्य की भावी प्रगति की अपने-अपने ढंग से योजनाएँ बनाने में निरत हैं। भविष्य में मनुष्य अधिक बलिष्ठ, अधिक दीर्घजीवी, अधिक बुद्धिमान और अधिक सुयोग्य बन सके। इसमें सबसे कारगर और सूक्ष्म प्रभाव गुण−सूत्रों का− जीन्स का−जीव रसायनों की हेरा−फेरी का है। साइन्स ने एक सीमा तक इसमें प्रगति कर ली है। तो भी हारमोन्स को उभारने दबाने का प्रयोग हाथ नहीं आया है। विकसित अध्यात्म विज्ञान इस कमी को पूरा कर देगा। और आज की विकसित मनुष्य की कल्पनाओं−आकाँक्षाओं को चरितार्थ होने का अवसर मिलेगा। आहार-विहार में, जो इन दिनों व्यक्तिक्रम चल रहा है वह उतने ही दिन चलेगा जितने समय तक मनुष्य को आरोग्य, दीर्घजीवन और बलिष्ठता का महत्व हृदयंगम नहीं होता। मनुष्य जल्दी ही वस्तुस्थिति को समझ जायेगा और जिह्वा तथा जननेन्द्रिय के असंयम पर अंकुश लगा लेगा।

अतिशय महत्वपूर्ण मनुष्य का मनःसंस्थान है। जीवन पर प्रमुख रूप से वही छाया रहता है। कल्पना−मन, विवेचन−बुद्धि, चित्त−अचेतन और अहं−मान्यता, यही चार क्षेत्र मिल−जुलकर मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को ऊँचा−उठाते या नीचे गिराते हैं। यही है मनःक्षेत्र की धुलाई और रंगाई, जिसे विज्ञान की भाषा में ब्रेन वाशिंग अथवा व्यक्तित्व परिष्कार कहते हैं। यह भी अब बहुत अधिक कठिन नहीं रहा है। विज्ञान ने विभिन्न प्रवृत्तियों के केन्द्र संस्थान खोज निकाले हैं और उनके साथ इलेक्ट्रोडों द्वारा विद्युत प्रवाह जारी करके प्रवृत्तियाँ बदलने में बहुत हद तक सफलता प्राप्त कर ली गई हैं। इन प्रयोगों से प्रभावित शेर, बकरी की तरह सौम्य और बकरा शेर की तरह निर्भय आक्रामक होते देखा गया है। बुढ़ापे में बचपन की कोमलता लाई जा सकती है और बच्चे को बूढ़ों जैसा विचारशील बनाया जा सकता है। यह मानसिक नियन्त्रण यदि स्थायी हो सके और आकाँक्षाओं, भावनाओं, मान्यताओं और विचारणाओं को बदल सकें तो समझना चाहिए कि मानवी काया कल्प का क्षुद्र को महान बनाने वाला वह सूत्र हाथ आ गया।

नीत्से के दर्शन ने हिटलर को जन्म दिया और समूचे जर्मनी को ऐसे आवेश में भर दिया कि वे लोग अपने समुदाय को अति श्रेष्ठ मानने और समस्त विश्व पर शासन स्थापित करने की तैयारी करने लगे। अरविन्द अपने पाण्डीचेरी प्रयोग में सुपरमैन “उत्कृष्ट मानव” की कल्पना भी वे अपने पूर्ण योग के माध्यम से मनुष्य में देवत्व के उदय के रूप में कर रहे थे। यों उनके जीवन काल में वह प्रयास पूरा नहीं हो पाया, पर यह नहीं समझा जाना चाहिए कि वह काम अधूरा ही छूट गया। उसे आगे बढ़ाने के लिए पूर्ण योग का स्थान “प्रज्ञायोग’’ ले रहा है और लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्राणप्रण से जुटा है।

भावी देवमानव की विशेषता होगी उसके अन्दर देवत्व का उदय। यदि वह बन पड़ा तो इसकी परिणति निश्चित रूप से धरती पर स्वर्ग के अवतरण के रूप में होगी। देवता धरती पर जन्म लेने की प्रतीक्षा करते रहते हैं और भगवान इसी धरती पर अवतार लेने के लिए दौड़ते आते हैं।

मानवी परिष्कार और विकास का ठीक और सही समय यही है। अपनी-अपनी काम बिरादरियों को वरिष्ठ सिद्ध करने के लिए अनेक देश अनेक बार अपने−अपने ढंग से प्रयत्न एवं उद्घोष करते रहे हैं। किसी समय शक और हूणों की तूती बोलती थी। अंग्रेज भी कभी सारी दुनिया पर छाये रहे। इन दिनों रूस, अमेरिका कम से कम अस्त्रों, अन्वेषणों और अन्तरिक्ष पर आधिपत्य की दृष्टि से तो मूर्धन्य हैं ही। जापान की औद्योगिक क्षमता बढ़ती जा रही है। अन्यान्य देश की सम्पदा और सामर्थ्य की दृष्टि से प्रगति पथ पर बढ़ चलने के लिए अग्रसर हो रहे हैं।

इन सब में महती भूमिका भारत की होने जा रही है। ऋषि परम्परा का अब फिर अभिनव पुनरुत्थान हुआ है। उच्चस्तरीय व्यक्ति संख्या की दृष्टि से कम हों तो भी कोई चिन्ता की बात नहीं। बुद्ध, गाँधी, अरविन्द जैसे आत्मशक्ति के धनी पिछली शताब्दियों में उँगलियों पर गिनने−जितने ही हुए हैं, पर उन्होंने आँधी तूफान की तरह समय को उलट दिया। अब उस प्रक्रिया में फिर उफान आ रहा है। आवश्यक नहीं कि वे व्यक्ति ख्याति प्राप्त ही हों। ऋषि युग में छः पुरुष और एक महिला यह सात ही मूर्धन्य सात ऋषि मूर्धन्य सप्त ऋषियों में गिने गए। पर यह नहीं समझा जाना चाहिए कि उनके अतिरिक्त और उच्चस्तरीय आत्माएँ नहीं थी। इन दिनों सप्त ऋषियों के अवतरण का पुण्य प्रभातकाल है। उनका प्रयास एक ही होगा कि मानवी गरिमा को निकृष्टता के दल दल में से उबार कर परिशोधन किया जाय और आत्मिक दृष्टि से उसे उच्च शिखर तक पहुँचा दिया जाय।

समय की कठिनाइयों में एक ही सबसे बड़ी आवश्यकता है कि मानवी व्यक्तित्व को ओछेपन से विरत करके उसे आदर्शवादी उत्कृष्टता अपनाने के लिए सहमत ही नहीं बाधित भी किया जाय। मनुष्य नीतिवान बने। वासना, तृष्णा और अहन्ता के भव−बन्धन से उबरे और लोभ-मोह की हथकड़ी, बेड़ियों को तोड़ फेंके। इतना भर मोड़−मरोड़ बन पड़ा तो मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य कहला सकेगा। उस पर नर−पशु या नर-पिशाच कहलाने का लाँछन न लगेगा। पवित्रता और प्रखरता का पुष्प−परमार्थ में नियोजन हो सके तो हर किसी को महामानवों की श्रेणी में बैठने का अवसर मिलेगा। तब नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम, क्षुद्र को महान कहा जा सकेगा। लिप्सा, लालसा की कुत्साएं जैसे ही सद्भावनाओं की ओर, सत्प्रवृत्तियों की ओर मुड़ी कि सारा वातावरण ही बदल जायेगा। जो गतिविधियाँ चल रही हैं उनमें आश्चर्यजनक परिवर्तन दृष्टिगोचर होगा।

लोग हिल-मिलकर कर रहें−मिल−बाँटकर खाएँ और हलकी-फुलकी, हँसती-हँसती जिन्दगी जिएँ तो किसी को किसी वस्तु का अभाव न रहे। इस धरती का उत्पादन और उत्खनन इतना वैभवशाली है कि उसके रहते किसी को किसी वस्तु की कमी अनुभव न हो। अभाव सर्वथा कृत्रिम है। वे लालसाओं के अत्यधिक बढ़ जाने पर दीखते भर हैं। आलसी और प्रमादी ही दरिद्रता की शिकायत करते हैं। क्षुद्र और संकीर्ण मन वाले कुकर्मी ही विग्रह के बीज बोते और अशान्ति उत्पन्न करते हैं। मनुष्य यदि आत्म−सुधार के निमित्त तत्पर हो सके, गुण−कर्म−स्वभाव को अपनी गरिमा के अनुरूप ढाल सके तो पारस्परिक स्नेह, सद्भाव और सहयोग की कहीं कमी न रहे। यही देवत्व है। इन विशेषताओं और विभूतियाँ का भाण्डागार मानवी अन्तराल में भरा पड़ा है। उसे निखारने और उभारने भर की आवश्यकता है। यह परिवर्तन सरल भी है और सुखद भी।

अगले दिनों मनःस्थिति बदलते ही परिस्थितियाँ बदलने की सम्भावना सुनिश्चित है। अज्ञान, अशक्ति और अभाव से ही प्रायः विपन्नता छायी रहती है। दुर्गति ही दुर्गति की जन्मदात्री है। इन्हें झाडू लेकर बुहार डाला जाय तो कूड़ा−कर्कट जमने में जो दुर्गन्ध और कुरुपता छाई रहती है उसका कहीं अता−पता भी न चलेगा। व्यक्ति के बदलने से युग के बदलने का तथ्य शत−प्रतिशत सत्य है। इस सत्य का प्रत्यक्ष दर्शन निकट भविष्य में निश्चित रूप से किया जा सकेगा, इसमें सन्देह की कहीं गुञ्जाइश नहीं है।




कलकत्ता में प्लेग (kahani) - Akhandjyoti March 1985

उन दिनों कलकत्ता में प्लेग फैला था। लोग धड़ाधड़ मर रहे थे। स्वामी विवेकानन्द अपना सारा धार्मिक क्रिया-कृत्य छोड़कर साथियों समेत रोगियों के सेवा कार्य में जुट गये।

शिष्यों ने पूछा− आप तो वीतराग योगी हैं। दुनिया के सुख-दुःख से आपको क्या मतलब होना चाहिए? आप तो भजन−ध्यान की बात सोचें।

स्वामीजी ने कहा− योगी को दूसरों का दुःख और सुख अपना बन जाता है। प्लेग पीड़ितों की व्यथा मुझे अपनी व्यथा से कम नहीं लगती। पीड़ा से पहले छूटना पड़ता है और भजन बाद में होता है।




“तंत्र विज्ञान” अलौकिक क्षमताओं से भरी पूरी विद्या - Akhandjyoti March 1985

तन्त्र विद्या के क्षेत्र में लन्दन के रोमानी प्रिंस “पैटूलिंगको ली” का नाम आज विश्व जन समुदाय की जुबान पर है। ऐसा कहा जाता है कि उनके मुख से निकली वाणी कभी खाली नहीं जाती। एक बार नौटिंघम में एक विशाल कार्यक्रम होने को था। प्रबन्धकों को वर्षा की आशंका थी। अतः उससे बचाव हेतु उनने पैटूलिंगको ने उन्हें वर्षा न होने देने का विश्वास दिलाया। सचमुच ऐसा ही हुआ। उस दिन वर्षा नाम मात्र को भी न हुई, जबकि लन्दन में किसी दिन छुटपुट वर्षा हो जाना स्वाभाविक बात है।

पैटूलिंगको भी ने एक बार ब्रिटेन के ‘यूरोपियन काम मार्केट” में शामिल होने की भविष्यवाणी की थी। साथ में उनने यह भी कहा था कि एक वर्ष बाद ब्रिटेन को अपने उठाये कदम के लिए पश्चात्ताप भी होगा एवं कई वर्षों तक वह आर्थिक संकट से उबर नहीं पायेगा। यह दोनों ही बातें सत्य सिद्ध हुईं।

एक बार पैटूलिंगको ली के ऊपर झूठा कानूनी आरोप लगाया गया था। सजा के रूप में उन्हें 6 वर्ष की कैद सुनाई गयी थी। घोषणा सुनकर ली ने बस इतना कहा था- ‘‘जज साहब! मेरे पास सफाई का कोई स्रोत नहीं है। परन्तु याद रखें मेरी सजा की अवधि समाप्त होते ही आपका प्राणान्त होगा। उस समय आपके पास बचाने वाला कोई न होगा।” कुछ दिनों बाद एक दुर्घटना में जज महोदय का सचमुच देहान्त हो गया। इस प्रकार ली का शाप फलीभूत हुआ।

कुछ दिनों पूर्व की एक और घटना है। ली को एक मकान आबंटित कराना था। परन्तु काउंसिल के सदस्यगण उसे परेशान कर रहे थे। अन्ततः ली ने यह घोषणा की थी कि “यदि 15 दिन के अन्दर मुझे मकान नहीं मिलता तो मैं काउंसिल के सदस्यों को शाप देने के लिए बाध्य हो जाऊँगा।” इस चेतावनी से भरी घोषणा को सुनकर काउंसिल के सभी सदस्य घबरा गये। उनने ली को पुनः बुलवाया तथा समस्या का यथोचित समाधान ढूँढ़ निकाला। तब ली ने उन्हें शाप न देने का आश्वासन दिया ऐसी अपवाद रूप घटना को छोड़ ली ने कभी अपनी दिव्य क्षमता का दुरुपयोग नहीं किया।

इस प्रकार की कई घटनाएं ली के जीवन में घटित हुई हैं। उनने अपनी तान्त्रिक क्षमता एवं अलौकिक सामर्थ्य के लिए अपनी मृत दादी की आत्मा को माध्यम बतलाया है। उनका यह भी कहना है कि हम जिप्सियों के लिए तन्त्र एक अचूक हथियार है। इसको अपनाकर हम अपनी तो सुरक्षा करते ही हैं, जहाँ कहीं किसी का अहित होता दिखता है, इसका प्रयोग करते हैं।

विलियम सामरसेट मॉम की भारतीय तन्त्र विधाओं में गहन अभिरुचि थी। वे अपने पास माँ भैरवी का तन्त्र प्रतीक हमेशा रखा करते थे। उनके निवास स्थान की हरेक चीज पर माँ भैरवी की तन्त्र मुद्रा अंकित होती थी। उनके अनुसार यह प्रतीक दुष्ट ग्रहों और पैशाचिक शक्तियों को पास फटकने न देता था।

मॉम का जीवन बड़ी परेशानी भरा रहा। नींद में उन्हें प्रायः दुःस्वप्न आया करते थे। सपने में उन्हें ऐसा महसूस होता था कि कोई उनका गला दबोच रहा है। उस समय उनकी साँसें फूलने लगती तथा दमा जैसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता था। ऐसी घटनाएँ प्रायः मंगलवार के दिन ही हुआ करती थीं। घटना के बाद कई दिनों तक उन्हें गले में खंराश तथा उस स्थान पर सूजन का अनुभव होता था। इस स्वप्न रूपी काल चक्र से अपनी सुरक्षा हेतु मॉम ने पूर्वार्त्त दर्शन के अध्ययन के आधार पर तन्त्र प्रतीक को अपना जीवन साथी बना लिया था। स्पष्ट है कि वह प्रतीक ही उनकी मृत्यु पाश से रक्षा का कारण बनता रहा।

ऐसी ही एक और घटना है। तब भारत आजाद नहीं हुआ था। सीतापुर क्षेत्र में हृदय नारायण नामक एक सेठ रहते थे। विशाल बंगला था तथा उसमें पत्नी व नौकर-चाकर समेत वे रहते थे।

एक दिन सेठ जी के बंगले पर एक तान्त्रिक का पदार्पण हुआ। उसने सेठ जी से वाँछित मादक पेय की तन्त्र प्रयोग हेतु माँग की। सेठ जी ने जब इसको प्रस्तुत करने से इन्कार कर दिया तब उस तान्त्रिक ने उन्हें सबक सिखलाने की घोषणा की।

कुछ दिनों बाद ही घर में बिल्लियों का उपद्रव आरम्भ हुआ। घर आँगन में हर तरफ बिल्लियों का शोर तथा चहल-कदमी सुनने देखने को मिलने लगी बिल्लियों को पकड़कर कोसों दूर फेंक आया जाता, तब भी न जाने कहाँ से नई बिल्लियाँ आ जातीं तथा उपद्रव पूर्ववत् जारी रहता। उपचार रूप में झाड़−फूँक, पूजा−पाठ का कृत्य भी सम्पन्न किया गया, पर वह भी नाकामयाब रहा।

इसी बीच उस क्षेत्र में एक तलवार धारी साधु की ख्याति काफी फैली। उसने एक बार रेलगाड़ी को चलाने से रोक दिया था। तभी से लोग उसे अपने यहाँ कष्ट निवारणार्थ लिए वहां जाते। सेठ जी ने भी यही किया। साधु ने उन्हें निर्दोष मानते हुए उनके घर आना स्वीकार कर लिया। वहाँ उन्होंने अपनी तलवार माँजना शुरू किया तथा वह कहते रहे कि “देखता हूँ कौन अब बिल्लियों को भेजता है, कौन यहाँ तबाही मचाता है।” इसके बाद से वहाँ फिर कोई हलचल नहीं हुई। आज भी सेठ जी के परिवार के अन्य लोग इस घटना के साक्षी हैं।

ये घटनाएँ इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि तन्त्र विज्ञान एक अलौकिक सामर्थ्यों का समुच्चय है। तान्त्रिक के पास शाप−वरदान एवं अशुभ को टालने, अहित को मिटाने, साथ ही किसी का अहित करने की भी क्षमता होती है। बहुधा ऐसा कम ही होता है कि अहित करने वाले तन्त्रवेत्ता को बदले में पुरस्कार मिला हो अथवा उसे कुछ लाभ हुआ हो। नियामक सत्ता की विधि−व्यवस्था के अंतर्गत उन्हें भी चलना होता है एवं कर्म का फल भोगना ही होता है। जो इस विद्या का सदुपयोग करते हैं, वे अध्यात्म ऊर्जा सम्पन्न होते हैं एवं दूसरों के अनिष्ट का निवारण ही करते हैं। तन्त्र विज्ञान के इस पक्ष को जो उज्ज्वल है, प्रकाश में लाया जाना चाहिए ताकि इस विषय में संव्याप्त भ्रान्तियों का निवारण हो सके।




अमेरिकन कम्पनी ने अपने एजेंट भेजे (kahani) - Akhandjyoti March 1985

सौ वर्ष पहले की बात है अफ्रीका में जूतों की खपत की सम्भावना को खोजने के लिए एक जापानी और एक अमेरिकन कम्पनी ने अपने एजेंट भेजे। ताकि उस क्षेत्र में व्यवसाय चलाने की बात पर विचार किया जा सके।

अमेरिकन एजेंट ने एक सप्ताह दौरे के बाद रिपोर्ट भेजी− ‘‘यहाँ कोई जूता पहनना तक जानता नहीं। व्यापार की कोई सम्भावना नहीं।” वह वापस लौट गया।

जापानी एजेंट रुका रहा। उसने मालिकों को रिपोर्ट भेजी− ‘‘यहाँ जूते किसी के पास नहीं। उनको उपयोगिता समझाने में कुछ समय साधन लगाने भर की देर है कि खपत का ठिकाना न रहेगा। हम लोग बिना प्रतिस्पर्धा के इस देश में व्यवसाय चलाकर आसानी से मालामाल बन सकते हैं।”

जापानी दृष्टिकोण सही निकला और वे सचमुच मालामाल बन गये। नया रास्ता भी तो उन्हीं ने खोजा, नया उपाय भी तो उन्होंने सोचा।




नियामक सत्ता के सुनियोजित क्रियाकलाप - Akhandjyoti March 1985

रात्रि की नीरवता में जुगनुओं से बिछी टिमटिमाती एक चादर हमारे ऊपर छायी दिखायी पड़ती है। निखिल ब्रह्माण्ड के एक सौर मण्डल की यह एक संक्षिप्त सी झाँकी भर है। इस विराट् को देखकर मानवी बुद्धि का हतप्रभ होना स्वाभाविक है। पर यह मात्र उतना ही नहीं है, यह भी एक सत्य है कि इतनी दूर अवस्थित ये ग्रह पिण्डनिहारिकाएं−पृथ्वी स्थित जीवधारियों को प्रकारान्तर से अपनी लाभकारी एवं हानिकारक दोनों ही प्रकार की किरणों से प्रभावित भी करती हैं। ब्रह्माण्ड भौतिकी के विद्वानों के अनुसार “क्लीनिकल−इकॉजाली” नामक एक सम्पूर्ण विद्या ही अब विकसित हो रही है, जिसमें वैज्ञानिक ब्रह्माण्डीय प्रभावों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि कैसे इनके माध्यम से अंतर्ग्रही ही प्रभावों की विभीषिका मिटा सकना सम्भव हो सकता है।

एक सामान्य बुद्धि एवं समझ वाले व्यक्ति को तो यही प्रतीत होता है कि ब्रह्माण्ड के ग्रह नक्षत्र अपना-अपना अलग अस्तित्व बनाये हुए अपनी कक्षाओं पर भ्रमण करते हुये अपना निर्धारित क्रिया-कलाप चला रहे हैं। किसी का किसी से कोई परस्पर सम्बन्ध नहीं है। यह बात मोटी समझ से ही सही हो सकती है। वास्तविकता कुछ और ही है। वस्तुतः यह सारे ग्रह-नक्षत्र एक ही सत्ता सूत्र में−धागों में मनकों की तरह पिरोये हुए हैं और यह ग्रह−नक्षत्र की माला एक ही दिशा में−एक ही नियन्त्रण में गतिशील हो रही है, इतना ही नहीं उनका परस्पर भी अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। सूर्य और चन्द्रमा के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव को हम प्रत्यक्ष देखते हैं। अमावस्या और पूर्णमासी को आने वाले ज्वार−भाटे कृष्ण पक्ष में वनस्पतियों का कम और शुक्ल पक्ष में अधिक बढ़ना−चन्द्रमा के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव का ही परिणाम है। सूर्य के उदय होने पर गर्मी, रोशनी ही नहीं, सक्रियता भी बढ़ती है। हवा की चाल तेज हो जाती है। वनस्पतियों में हलचल शुरू हो जाती है और रात्रि की जो निद्रा सबको सताती थी वह अनायास ही समाप्त हो जाती है। शरीरों की रात्रि वाली शिथिलता प्रातःकाल होते ही क्रियाशीलता में बदल जाती है। ऐसे−ऐसे अनेक परिवर्तन सूर्य के निकलने से लेकर अस्त होने के बीच होते रहते हैं। परोक्ष परिवर्तनों का तो कहना ही क्या? उनकी श्रृंखला को देखते हुये वैज्ञानिक चकराने लगते हैं और सोचते हैं कि जो कुछ इस धरती पर हो रहा है वस्तुतः सूर्य की ही प्रतिक्रिया मात्र है। समुद्र के समीप रहने वाले व अन्यान्य लोग अच्छी तरह जानते हैं कि चन्द्रमा और पृथ्वी एक−दूसरे के समीप हैं इसलिए चन्द्रमा जब अपनी सोलहों कलाओं के साथ उदित होता है तो पृथ्वी के समुद्र का पानी उफनता है, परन्तु अब यह भी पता लगाया जा चुका है कि न केवल समुद्र ही वरन् मनुष्य भी प्रभावित होता है।

अमेरिका के पागल खानों में किये गये सर्वेक्षण के अनुसार मानसिक रोगी पूर्णिमा के दिन अधिक विक्षिप्त हो जाते हैं। साधारण और कमजोर मनोभूमि के व्यक्तियों को भी इस दिन पागलपन के दौरे पड़ने लगते हैं और अमावस के दिन धरती पर लोग सबसे कम पागल होते हैं। न केवल पूर्णिमा और अमावस के दिन वरन् चाँद के बढ़ने−घटने के साथ−साथ सामान्य स्वस्थ व्यक्तियों की चित्र दशा पर भी इन उतार−चढ़ावों का प्रभाव पड़ता है। सम्भवतया इसी कारण भारतीय तत्त्वदर्शियों ने प्रत्येक पूर्णिमा पर धर्म कर्म में व्यस्त रहने का निर्देश दिया है।

विभिन्न धर्मों में चन्द्रमा के सम्बन्ध में भिन्न−भिन्न मान्यता है। मुस्लिम धर्म में तो यह विशेष महत्व रखता है। मुसलमान ईद का चाँद देखकर अपना व्रत उपवास पूर्ण करते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार चन्द्रमा पूर्ण ग्रह है। उसे शास्त्राधार का मध्य बिन्दु मानकर गणित आगे चलता है, यात्रा मुहूर्तों में चन्द्रमा की दिशा स्थिति को ध्यान में रखा जाता है। मनुष्यों पर जब चन्द्र दशा आती है अथवा जब अन्तर-प्रत्यन्तर आते हैं तब शुभ लाभ का फलित बताया जाता है। सप्ताह का एक दिन चन्द्रमा के नाम पर ही निर्धारित है उस दिन को मंगलमय माना गया है। बच्चे उसे चन्दा मामा मानते रहे और मातायें उस चन्द्र खिलौने को ला देने का आश्वासन न जाने कब से अपने नन्हें शिशुओं को देती रहीं हैं। ईसाई धर्म ग्रन्थों में भी चन्द्रमा व अन्यान्य ग्रहों की स्थिति व उनके सम्भावित प्रभावों पर मत व्यक्त किये गए हैं।

न केवल सौर-मण्डल के सदस्यों में जिनमें पृथ्वी भी शामिल है। परस्पर दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले तारे नक्षत्रादि भी पृथ्वी के जीवन पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। विभिन्न विषयों में किये प्रयोगों से अनायास ही जो निष्कर्ष सामने आये हैं उनसे वैज्ञानिकों का ध्यान सहज ही ब्रह्माण्ड−रसायन विद्या की ओर आकृष्ट हुआ है। इस दिशा में जैसे−जैसे आगे बढ़ा जा रहा है, यह स्पष्ट होता चला जा रहा है कि व्यष्टि व समष्टि चेतना में परस्पर गहन सम्बन्ध हैं। मात्र सूर्य और चन्द्रमा के द्वारा पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव की ही बात नहीं है। आगे चलकर इसी प्रक्रिया को समस्त ग्रह-नक्षत्रों के बीच परस्पर पड़ने वाले प्रभावों के आदान−प्रदान के रूप में देखा एवं समझा जा सकता है। सूर्य की चमक चन्द्रमा पर घटने−बढ़ने से वह कितना अतिशय ठण्डा और कितना अतिशय गरम हो जाता है, उसकी नवीनतम जानकारियां चन्द्रशोधों से स्पष्ट कर दी हैं। पृथ्वी पर चाँदनी भेज सकना चन्द्रमा के लिए सूर्य के अनुदान से ही सम्भव होता है। अन्य ग्रह भी परस्पर ऐसे ही आदान−प्रदान की व्यवस्था बनाये हुए हैं। एक−दूसरे पर अनेक स्तरों के आकर्षण−विकर्षण फेंकते और ग्रहण करते हैं। इसी आधार पर उनका वर्तमान स्तर और स्वरूप बना हुआ है। यदि इस प्रक्रिया में अन्तर उत्पन्न हो जाय तो ग्रहों की वर्तमान स्थिति में भारी अन्तर या जायेगा और उनका कलेवर मार्ग स्वरूप आदि में अप्रत्याशित परिवर्तन उत्पन्न हो जायेगा। यह थोड़ा-सा भी अन्तर अपने सौर-मण्डल की स्थिति को बदल सकता है और फिर उस हलचल से अन्य सौरमंडल भी प्रभावित हो सकते हैं और उसका अन्त इतनी बड़ी प्रतिक्रिया के रूप में हो सकता है। जिससे सारा विश्व−ब्रह्माण्ड ही हिल जाय।

अपने सौरमण्डल के ग्रहों और उपग्रहों का परस्पर क्या सम्बन्ध है और एक−दूसरे को कितना प्रभावित करते हैं इसकी थोड़ी बहुत जानकारी खगोलवेत्ताओं को उपलब्ध हो चली है। वे इस अनन्त ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए असंख्यों सौरमण्डलों के परस्पर एक−दूसरे पर पड़ने वाले प्रभावों को भी स्वीकार करते हैं। लगता है कि एक ही परिवार के सदस्य जैसे मिल-जुलकर कुटुम्ब का एक ढाँचा बनाये रहते हैं, उसी प्रकार समस्त ग्रह-नक्षत्र एक दूसरे के पूरक बने हुए हैं और परस्पर बहुत कुछ लेने-देने का क्रम चलाते हुए ब्रह्माण्ड की वर्तमान स्थिति बनाये हुए हैं। यह सब एक विश्वव्यापाी प्रेरक और नियामक सत्ता द्वारा ही सम्भव हो रहा है।

वस्तुतः इस संसार में ‘अकेला’ नाम कोई पदार्थ नहीं। यहाँ सब कुछ संगठित और सुसम्बद्ध है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु भी अपने गर्भ में कितने ही घटक संजोये हुए एक छोटे सौर-मण्डल परिवार की तरह प्रगतिशील रह रहा है। इलेक्ट्रान आदि घटकों की भी परतें खुलती जा रही हैं और पता लग रहा है कि उनके गर्भ में भी और कितने ही समूह वर्ग विराजमान हैं। शरीर एक इकाई, पर उसके भीतर जीवाणुओं की इतनी संख्या है जितनी इस समस्त संसार में जीवधारियों की भी मिली−जुली संख्या भी नहीं होगी। हर मनुष्य का व्यक्तित्व असंख्य अन्यों के सहयोग एवं प्रभाव को लेकर विकसित हुआ है। उसमें अपना कम और दूसरों का अंश-सहयोग अधिक है।

सृष्टि चक्र में सर्वत्र ‘अन्योन्याश्रय’ का सिद्धान्त काम कर रहा है। जड़-चेतन से विनिर्मित यह समूचा विश्व ब्रह्माण्ड एकता के सुदृढ़ बन्धनों में बँधा हुआ है। एक से दूसरे का पोषण होता है और हर किसी को दूसरों का सहयोगी होकर रहना पड़ रहा है। यह पारस्परिक बन्धन ही सृष्टि के शोभा सौंदर्य का, उसकी विभिन्न हलचलों का, उत्पादन विकास एवं परिवर्तन का उद्गम केन्द्र है।

वैज्ञानिक लुइस डे ब्रोगली के अनुसार ब्रह्माण्ड का कण-कण तरंगमय प्रकृति चेतना से अभिपूरित है। उन्होंने इसे चारों ओर संव्याप्त क्वाण्टा का ही एक अंग पदार्थ तरंग माना बताया है कि सभी ग्रह−पिण्ड परस्पर एक−दूसरे को इन्हीं तरंगों के माध्यम से प्रभावित करते हैं। पृथ्वी की तरंगों का कान्तिमान 3.6×10 घात 31 सेण्टीमीटर होता है। पृथ्वीवासियों को इसका अनुभव नहीं हो पाता परन्तु सतत् इसके गर्भ में कम्पन 8.25×10 घात 66 नम्बर प्रति सेकेंड की गति से होते रहते हैं। 60 किलोग्राम के एक व्यक्ति में भी 1×10 घात 66 नम्बर प्रति सेकेण्ड का कम्पन सतत् होता रहता है, पर यह अनुभूति स्तर तक नहीं आ पाता। उनके अनुसार नवीनतम प्रतिपादन यह है कि यहीं तरंग समुच्चय ग्रहपिण्डों से आने वाली किरणों के प्रभावों का मूल स्रोत है। पृथ्वी इसी ऊर्जा पुंज के रूप में अनुदान अन्यान्य ग्रहों से ग्रहण करती है।

विश्व−ब्रह्माण्ड के कण-कण में संव्याप्त इस पारस्परिक निर्भरता और सहकारिता के सिद्धान्त को समझने का प्रयत्न किया जाय तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि यहाँ अकेला कोई नहीं। ‘मैं का कोई अस्तित्व नहीं जो कुछ है वह सामूहिक है। हम सब की भाषा से ही सोचा जाय और उसी प्रकार का क्रिया−कलाप अपनाया जाय तो समझना चाहिये कि सृष्टि के उस रहस्य और निर्देश से अवगत हुए, जिसके आधार पर सुव्यवस्था बनी रह सकती है और प्रगति का चक्र अग्रगामी हो सकता है।




महात्मा टालस्टाय (kahani) - Akhandjyoti March 1985

एक नवयुवक महात्मा टालस्टाय के पास आया और बोला− महोदय मेरे पास एक पैसे की भी सम्पत्ति नहीं है। मैं जीवन में बहुत दुःखी तथा निराश हूँ।

महात्मा टालस्टाय ने उससे सहानुभूति दिखाते हुए कहा− ‘‘मेरा एक व्यापारी मित्र है वह आदमी के शरीर के अवयव खरीदता है, तुम चाहो तो मैं तुम्हें उससे मिला सकता हूँ। वह तुम्हें तुम्हारी आँखों के लिए बीस हजार, हाथों के लिए पन्द्रह हजार और पैरों के लिए दस हजार की रकम दे सकता है। यदि चाहो तो यह अंग बेचकर आज ही तुम पैंतालीस पचास हजार के स्वामी बन सकते हो। और यदि तुम उसके हाथ अपने शक्ति एवं यौवन से भरे−पूरे शरीर को बेच सको तो वह तुम्हें खुशी से लाख रुपये दे सकता है। यदि धनवान बनना चाहो तो मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें आज ही उससे मिला देता हूँ।

युवक भौंचक्का-सा टालस्टाय की ओर देखता हुआ बोला− ‘आप यह क्या कहते हैं। एक लाख क्या मैं इसे एक करोड़ में भी बेचने को तैयार नहीं हो सकता।

महात्मा टालस्टाय हँसे और बोले− ‘‘जब तुम्हारे पास इतना मूल्यवान शरीर है तब तुम अपने को गरीब किस तरह कहते हो। युवक! मनुष्य का यह शक्तिशाली शरीर साक्षात कल्पवृक्ष है। इसको ठीक−ठीक उपयोग में लगाओ, श्रम करो और देखोगे कि तुम शीघ्र ही सुख-समृद्धि के स्थायी स्वामी बन जाते हो।




समष्टि एवं व्यष्टि में संव्याप्त एकरूपता - Akhandjyoti March 1985

पृथ्वी यों मोटे तौर से एकाकी लगती है। उसकी सम्पदा एवं हलचल अपनी ही परिधि में अपने ही लिए काम करती दिखाई पड़ती है, पर वस्तुतः वह अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान पर जीवित है। सूर्य की ऊर्जा का शोषण पृथ्वी का वातावरण करता है और उस ईंधन से जड़ परमाणुओं और चेतन जीवाणुओं की विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ चल सकने की सामर्थ्य मिलती है। पृथ्वी अपनी विशिष्टताओं को बनाये रहने में बहुत कुछ सूर्य पर निर्भर है। दूर रहते हुए भी वह पृथ्वी को इतना उदार दुलार देता है कि उसे देखते हुए पति-पत्नी अथवा प्रेमी-प्रेमिका जैसा रिश्ता मानने को जी करता है। पृथ्वी भी तो उसी का मुँह निहारते और परिक्रमा करते रहने में अपने जीवन की सार्थकता मानती है।

चन्द्रमा का पृथ्वी पर कितना प्रभाव पड़ता है यह समुद्र तट पर जाकर प्रतिदिन के सामान्य और पूर्णिमा अमावस्या के ज्वार-भाटे देखकर सहज ही जाना जा सकता है। चन्द्रमा को रसराज कहा गया है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में वनस्पतियों तथा प्राणियों में सरसता की जो घट−बढ़ होती रहती है उससे पता चलता है कि न केवल समुद्र को वरन् पृथ्वी की समग्र सरसता को वह व्यापक रूप से प्रभावित करता है। यह तो ग्रहों के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव का एक उदाहरण मात्र है। वास्तविकता यही है कि ब्राह्मी चेतना का यह सारा व्यापार आपसी आदान-प्रदान की एक सुनियोजित विधि-व्यवस्था के अंतर्गत चल रहा है।

सौर मण्डल के अन्यान्य ग्रह-उपग्रह अपने-अपने स्तर के रंग−बिरंगे−छोटे−बड़े उपहार पृथ्वी को अनवरत रूप से भेजते हैं। पृथ्वी भी चुप नहीं बैठी रहती। वह भी आदान−प्रदान का शिष्टाचार और समूह कर्त्तव्य समझती है। तद्नुसार अपने अनुदान अन्य ग्रहों को भेजती है। इन सम्प्रेषणों का लाभ वे ग्रह भी उसी प्रकार उठाते हैं। जिस प्रकार कि पृथ्वी उनसे। इस आदान−प्रदान का महत्वपूर्ण केन्द्र ध्रुवीय क्षेत्र है। अन्तर्ग्रही आदान−प्रदान इन्हीं छिद्रों से होता है। उत्तरी ध्रुव से ग्रहण की और दक्षिणी ध्रुव से विसर्जन की प्रक्रिया सम्पन्न होती रहती है। उत्तर में आदान का, दक्षिण में प्रदान का संयन्त्र नियति ने फिट करके रखा है। उत्तर को मुख और दक्षिण को मलद्वार कह सकते हैं। जितना उपयोगी है उतना पचाकर पृथ्वी का शरीर अपने में धारण कर लेता है और जो अनावश्यक है, उसे मलरूप में विसर्जित कर देता है। प्राणी शरीर की तरह धरती भी एक शरीर है जिससे अपनी जीवनचर्या की सामग्री अंतर्ग्रही शक्ति भण्डार से उपलब्ध करनी पड़ती है। शरीर को हवा, पानी और अन्न भी तो बाहर से ही उपलब्ध करना पड़ता है। अन्तर्ग्रही हाट से आवश्यक वस्तुएँ खरीदे बिना धरती की गुजर नहीं हो सकती। ठीक इसी प्रकार प्राणी को भी अपनी सूक्ष्म चेतनात्मक उपलब्धियों के लिए अन्तर्ग्रही−ब्रह्माण्डीय चेतना पर निर्भर रहना पड़ता है।

मस्तिष्क मुख है। ग्रहण शक्ति उसी में है। जननेन्द्रिय विसर्जन संस्थान है। दोनों को प्राणि सत्ता के ध्रुव केन्द्र कहा जा सकता है। ऊर्ध्व केन्द्र को शिव और अधः संस्थान को शक्ति संस्थान माना गया है। इन्हें ब्रह्मवर्चस और कुंडलिनी केन्द्र भी कहते हैं। इनके बीच पारस्परिक सम्बन्ध सन्तुलन ठीक बना रहे तो सब कुछ ठीक बना रहेगा और अभीष्ट प्रगति का लक्ष्य पूरा होता रहेगा। इनके बीच असन्तुलन या अवरोध उत्पन्न होने से अपच और तज्जनित अनेकों रोग−विकार उत्पन्न होने लगते हैं। भू-वैज्ञानिकों के अनुसार दक्षिणी ध्रुव समुद्र तल से 19000 फुट उभरा हुआ है। इसे विश्व शरीर की जननेन्द्रिय का उभार कह सकते हैं। पुराणों में इसे शिवलिंग कहा गया है। नारी की जननेंद्रिय में भी यह उभार छोटे रूप में “मॉन्स प्यूबीस” नाम से जाना जाता है। समष्टि और व्यष्टि में कितनी एकरूपता है, इसकी झाँकी ध्रुवों की संरचना में दृष्टिगोचर होती है।

सोवियत रूस के वैज्ञानिक डॉ॰ ओ॰ ए॰ उशाकोव ने अपने ध्रुव शोध के विवरणों में एक और नया तथ्य प्रतिपादित किया है। वे कहते हैं कि जीवन का आधार मानी जाने वाली ऑक्सीजन वायु पृथ्वी की अपनी उपज अथवा सम्पत्ति नहीं है। वह सूर्य से प्राण रूप में प्रवाहित होती हुई चली आती है और धरती के वातावरण में यहाँ की तात्विक प्रक्रिया के साथ सम्मिश्रित होकर प्रस्तुत ‘ऑक्सीजन’ बन जाती है। यदि सूर्य अपने उस प्राण प्रवाह में कटौती कर दे अथवा पृथ्वी ही किसी कारण उसे ठीक तरह ग्रहण न कर सके तो ऑक्सीजन की न्यूनता के कारण धरती का जीवन संकट में पड़ जायेगा। पृथ्वी से 62 मील ऊँचाई पर यह प्राण का ऑक्सीजन रूप में परिवर्तन आरम्भ होता है। यह ऑक्सीजन बादलों की तरह चाहे जहाँ नहीं बरसता रहता वरन् वह भी सीधा उत्तरी ध्रुव पर आता है और फिर वहाँ से समस्त विश्व में वितरित होता है। ध्रुव प्रभा में रंग−बिरंगी झिलमिल का दीखना विद्युत मण्डल के साथ ऑक्सीजन की उपस्थिति का प्रमाण है।

कभी-कभी सूर्य मण्डल में विशेष उत्क्रान्ति उत्पन्न होने से उस प्रवाह की एक लहर पृथ्वी पर भी चली आती है और ध्रुव प्रदेश में चुम्बकीय आँधी तूफानों का सिलसिला चल पड़ता है। इनकी प्रतिक्रिया उसे ध्रुव क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रखती वरन् समस्त विश्व को प्रभावित करती है। कई बार यह चुम्बकीय तूफान बड़े उपयोगी और सुखद परिणाम उत्पन्न करते हैं और कई बार इनमें कुछ ऐसे तत्व घुले हुए चले आते हैं जिनका प्रभाव समस्त विश्व को कई प्रकार के संकटों में धकेल देने की सामर्थ्य रखता है।

अंतर्ग्रहीय ऊर्जायें पृथ्वी पर उत्तरी ध्रुव क्षेत्र में होकर छनी हुई उपयुक्त एवं आवश्यक मात्रा में ही प्रवेश करती हैं और पृथ्वी को अभीष्ट परिपोषण देने के उपरान्त दक्षिणी ध्रुव में होती हुई बहिर्गमन कर जाती हैं। एक सिरे से प्रवेश करके चूहा जिस प्रकार बिल के दूसरे सिरे से निकल भागता है उसी प्रकार अन्तर्ग्रहीय विकिरण धरती के एक सिरे से प्रवेश करता और दूसरे से बाहर निकलता रहता है। उत्तरी ध्रुव क्षेत्र में एक ऐसी चुम्बकीय छलनी है जो केवल उसी प्रवाह को भीतर प्रवेश करने देती है जो उपयोगी है। छलनी में बारीक आटा ही छनता है और भूसी ऊपर रह जाती है। ठीक इसी प्रकार ध्रुवीय छलनी में भी पृथ्वी के लिए उपयोगी विकिरण आते हैं और शेष को पीछे धकेल दिया जाता है।

उत्तरी ध्रुव पर यह छानने की क्रिया टकराव के रूप में देखी जा सकती है। इस टकराव से एक विलक्षण प्रकार के ऊर्जा कम्पन उत्पन्न होते हैं जिनकी प्रत्यक्ष चमक उस क्षेत्र में प्रायः देखने को मिलती रहती है उसे ध्रुव प्रभा या मेरु प्रकाश कहते हैं। इसका दृश्यमान प्रत्यक्ष रूप जितना अद्भुत है उससे अधिक रहस्यमय उसका अदृश्य रूप है। इस मेरुप्रभा का प्रभाव स्थानीय ही नहीं होता वरन् समस्त भूतल को यह प्रभावित करता है। भूगर्भ में, समुद्र तल में, वायुमण्डल में, ईथर के महासागर में जो विभिन्न प्रकार की हलचलें होती रहती हैं चढ़ाव−उतार आते हैं उनका बहुत कुछ सम्बन्ध इन ध्रुव प्रभा एवं मेरु प्रकाश से होता है। इतना ही नहीं उसकी हलचलें प्राणधारियों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती हैं। मनुष्यों पर तो उसके प्रभाव विशिष्ट रूप से होता है। सुविज्ञ लोग उस प्रवाह में से अपने लिए उपयोगी तत्व खींच लेने, धारण कर लेने में भी सफल होते हैं और उससे असाधारण लाभ प्राप्त करते हैं।

सूर्य एक सेकेंड में 200 ट्रिलियन अर्थात् 100 मिलियन (1000,00000 किलोवाट) किलोवाट ऊर्जा पृथ्वी पर फेंकता है। वह ऊर्जा इतनी अधिक होती है कि उससे हाइडल पावर उत्पन्न करने वाले मानव निर्मित बिजली घरों के समान अनेकों करोड़ बिजली घर स्थापित हो सकते हैं। सारी पृथ्वी की चार अरब आबादी तथा चींटी, मक्खी, कौवे, गिद्ध, भेड़, बकरी, गाय, हाथी, शेर, पेड़−पौधे, बादल, समुद्र सभी इस शक्ति से ही गतिशील हैं। जिसमें यह शक्ति (प्राणतत्व) जितनी अधिक है, वह उतना ही शक्तिशाली और वैभव का स्वामी है। कीड़े−मकोड़े उसके एक कण से ही जीवित हैं तो वृक्ष−वनस्पतियाँ उसका सबसे अधिक भाग उपयोग में लाती है। मनुष्य इन सबसे भाग्यशाली है क्योंकि वह इस शक्ति के सुरक्षित और संचित कोश को भी प्राणायाम और योग साधनाओं द्वारा मनचाही मात्रा में प्राप्त करने की सामर्थ्य रखता है। इस प्रचण्ड प्राण ऊर्जा के सुनियोजन की चमत्कारी फलश्रुतियाँ हैं। प्रश्न मात्र क्रमबद्ध सदुपयोग का है।

उपरोक्त वर्णन से ऐसा लगता है कि सूर्य असीम शक्ति का भण्डार है, पर वस्तुतः वह भी विराट् ब्रह्माण्ड के महासंचालक ब्रह्मसूर्य का एक नगण्य−सा घटक ही है। सूर्य अपनी शक्ति उसी प्रकार अपने सूत्र संचालक महासूर्य से प्राप्त करता है जैसे कि अपनी पृथ्वी सौर मण्डल के अधिष्ठाता अपने सूर्य से। जीव और ईश्वर की दूरी ही उसकी शक्ति को दुर्बल बनाती है। यदि यह दूरी घटती जाय तो निश्चित रूप से सामर्थ्य बढ़ेगी और स्थिति वह न रहेगी, जो आज कृमि−कीटकों जैसी दिखाई पड़ रही है।

ब्राह्मी चेतना के महासागर में तैर रही हमारी पृथ्वी में एक दूसरे किस्म का वायुमण्डल भी है जिसे आकर्षण चुम्बकत्व अथवा ग्रेविटी के नाम से पुकारते हैं। यह चुम्बकत्व अथवा ग्रेविटी के नाम से पुकारते हैं। यह चुम्बकत्व ‘प्लाज्मा’ को प्रभावित करता है और उसकी प्रतिक्रिया लौटकर फिर पृथ्वी पर आती है। इस प्रकार का आदान−प्रदान और भी विस्तृत क्षेत्र पर अधिकार जमाता है। इस चुम्बकीय प्रत्यावर्तन को सम्पन्न करने वाला वायु मण्डल की तरह का ही एक भू−चुम्बकीय मण्डल भी है। यह भी पृथ्वी का ही विस्तार है, इसे उसी का आधार साधन अथवा अधिकार क्षेत्र कह सकते हैं। इस प्लाज्मा प्रवाह के कारण ही सूर्य की शक्ति का धरती तक नियन्त्रित रूप से आना सम्भव होता है और अन्य ग्रहों से उसका संपर्क बनता है। इसलिए धरती की परिधि नापनी हो तो उसकी गणना वायु मण्डल को आधार मानकर नहीं वरन् चुम्बक मण्डल की परिधि के आधार पर करनी चाहिए।

इस प्लाज्मा को ही प्रकारान्तर से सूक्ष्म जगत का प्राण तत्व माना जा सकता है। पृथ्वी सौभाग्यशाली है कि उसे जीवन मिला, उससे भी बड़े सौभाग्यशाली वे हैं जो इस पर निवास करते हैं। संव्याप्त प्राण सत्ता से जिस प्रकार पृथ्वी के दोनों ध्रुव आदान−प्रदान की प्रक्रिया सम्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मानवी चेतन सत्ता के दोनों ध्रुव जो मेरुदण्ड के दो छोरों पर सहस्रार एवं मूलाधार चक्र चलाते रहते हैं। उपयोगी को ग्रहण कर यदि उस ऊर्जा से अपनी चेतना का स्तर ऊँचा उठाया जा सके तो मानव जीवन को और भी सार्थक क्रियाशील एवं लोकोपयोगी बनाया जा सकता है।




हृदय का श्रम (kahani) - Akhandjyoti March 1985

शरीर यात्रा चलाने में हृदय का श्रम और महत्व देखकर शरीर के अन्य अवयव कहने लगे- आप हैं तो बड़े, पर काम हमारे सहारे ही चलाते हैं।

फेफड़ों ने कहा− हम वायु न दे तो? नाड़ियों ने कहा रक्त न पहुंचायें तो? पेट ने कहा हम पचाकर रक्त न बनायें तो? हाथों ने कहा हम कमाकर न लायें तो?

बात सबकी सच तो थी। हृदय सभी के लिए कृतज्ञता व्यक्त कर रहा था और कह रहा था आकार में तो आप सभी लोग बड़े हैं। मैं तो नन्हें से बच्चे जैसा हूँ। एक पालने में बैठा आप लोगों द्वारा झुलाये जाने पर झूलता रहता हूं।

हृदय में नम्रता और अवयवों की अहंकारिता देखकर आत्मा से न रहा गया। वह बोली मूर्खों अगर शरीर छोड़कर मैं चल दूँ तो?

सभी का गर्व गल गया और नम्रता पूर्वक अपने सेवा सौभाग्य को सराहते हुए नियत क्रिया−कलाप में लग गये।




मनुष्य हर परिस्थिति मैं ढल सकता है। - Akhandjyoti March 1985

मनुष्य के बराबर न कोई कोमल है, न कठोर। अभ्यास से वह कष्ट साध्य जीवन जी सकता है और उन्हीं परिस्थितियों में प्रसन्न भी रह सकता है। भगवान ने मानवी शरीर की संरचना इस प्रकार की है कि उसे जिस भी ढाँचे में ढाला जाय उसी में ढल जाता है। विलासी को अनेकानेक प्रकार की सुविधाएँ चाहिए। उनमें कमी पड़ने पर तिलमिलाते देखे गये हैं, पर ऐसे लोगों की कमी नहीं जो कठिनाइयों में रहने का अभ्यास कर लेने पर उसी में प्रसन्नता पूर्वक जीवन बिता देते हैं।

शून्य से नीचे रहने वाली ठंडक के क्षेत्र में ऐस्किमो जाति के लोगों की पीढ़ियाँ बीत गईं। उनने अपने आप को उन्हीं परिस्थितियों में ऐसा ‘फिट’ कर लिया है कि छोड़ने का आग्रह भी स्वीकार नहीं करते। अपने को औरों से कम सुखी भी नहीं मानते।

एस्किमो संसार के असामान्य आदिवासी जीवन जीने वाले साँस्कृतिक, भाषाई एवं जातीय एकता के लिए प्रख्यात हैं। एस्किमो का अर्थ होता है− कच्चा माँस खाने वाला। एस्किमो अपने को सारी धरती का ‘प्रमुख एवं वास्तविक’ मनुष्य मानते हैं। इनकी विभिन्न जातियाँ साइबेरिया, नोम, अलास्का, कनाडा, ग्रीनलैण्ड तथा आर्कटिक एरिया के अधिकाँश भाग में बेरिंग स्ट्रेट से ग्रीन लैण्ड−समुद्र से लगे टुण्ड्रा प्रान्त तक फैली हुई हैं। घने जंगलों में बसे एस्किमो मानवी सभ्यता में जीवन संघर्ष में सबसे अग्रणी माने जाते हैं। संघर्ष ही इनकी जीवन गाथा है। इनूपिक और यूपिक इनकी दो भाषायें हैं।

आर्कटिक क्षेत्र में जहाँ बर्फ का साम्राज्य है शून्य से भी कम तापमान रहता है ऐसे विषम वातावरण में भी एस्किमो हँसते−खेलते जीवन व्यतीत कर लेते हैं। मानवी काया के अनुकूल का यह सबसे अनोखा उदाहरण है। ऊँचे आर्कटिक क्षेत्रों में जहाँ ग्रीष्म ऋतु नाम मात्र की होती है वर्ष का अधिकाँश भाग हिमानी तूफानों से भरा होता है। भारी भरकम फर के कोट पहने एस्किमो बर्फ के मकानों में रहते और बर्फ में धँसी सील, वालरस और ध्रुवीय भालुओं का शिकार करके अपना जीवन यापन करते हैं। प्रशांत महासागर तथा बेटिंग के किनारे बसे एस्किमो सील, साल्मन के अतिरिक्त ह्वेल का भी शिकार करते हैं। विशिष्ट आकार के हारपून−मत्स्य भाला तथा स्प्रिंग बेंत की सहायता से एस्किमो अपने शिकार को मारते हैं। बसन्त या ग्रीष्म ऋतु में यात्रा के समय रेनडियर-कुत्तों की सहायता से झुण्ड वाले जानवरों− कैरिबो का शिकार करते हैं। इन जानवरों के चमड़े कपड़े का और माँस भोजन का काम देते हैं। कैरिबो उन जानवरों का समूह होता है जो बसन्त ऋतु में नदियों झीलों को पार कर उत्तर की ओर माइग्रेट करते हैं।

एस्किमो अपने निवास के लिए बर्फ की चट्टानों को काटकर गुफानुमा मकान बनाते हैं। बर्फ काटने का काम 3 फीट लम्बे, 2 फीट ऊँचे ओर 8 इंच मोटे हाथी दाँत से बने तलवार की आकार के ‘बर्फ चाकू’ से करते हैं। स्थायी निवास के लिए 15 फीट चौड़े और 12 फीट ऊँचे ‘स्नो हाउस’ का निर्माण करते हैं। अस्थायी यात्रा पर रहने वाले लोग 7 फीट व्यास वाले तथा 5 फीट ऊँचे स्नो हाउस बनाकर कड़ाके की ठण्ड से अपनी जीवन रक्षा करते हैं।

गर्मियों में यात्रा के लिए एस्किमो कायाक एवं डमिआक नामक नावों का प्रयोग करते हैं। कायाक में केवल एक ही व्यक्ति बैठकर शिकार को जाता है। डमिआक नाव पर पूरा परिवार बैठकर एक स्थान से दूसरे स्थान को यात्रा करता एवं शिकार करता है। ठंड के दिनों में जमी हुई बर्फ पर यात्रा करने का मुख्य साधन स्लेज गाड़ियाँ होती हैं जिन्हें कुत्ते खींचते हैं।

एस्किमो परिवार में घर का बड़ा−बूढ़ा व्यक्ति ही उस परिवार का मुखिया होता है। उसका निर्णय सबको मान्य होता है। आवश्यकता पड़ने पर मुखिया दैनिक जीवन की समस्याओं पर परिवार के अन्य सदस्यों, महिलाओं और बड़े बच्चों से सलाह मशविरा भी करता है। पुरुष एवं बच्चे शिकार को जाते और महिलायें घर−गृहस्थी का कार्य सम्भालती हैं। वृद्ध महिलाओं को बच्चों की रखवाली का काम सौंपा जाता है। शादी विवाह खून के रिश्ते में ही किये जाते हैं। पारिवारिकता की स्नेह−सौजन्यता−उदारता उस समय देखने को मिलती है जब खाद्य संकट अथवा अकाल का सामना करना पड़ता है। खाद्य संकट की विषम परिस्थितियों में सभी शिकारी अपने मारे हुए शिकार को आपस में मिल बाँट कर खाते हैं। उस समय किसी की उपेक्षा नहीं की जाती।

एस्किमो दंपत्ति अपने बच्चों के प्रति सदैव जागरुक रहते हैं। यदाकदा ही बच्चों को दण्ड देते हैं। आठ वर्ष की उम्र तक बच्चे यह भली प्रकार जान जाते हैं कि उनका जीवन कितना संघर्ष मय है और तद्नुरूप अपने से बड़ों का अनुसरण करने लगते तथा उनके कामों में हाथ बँटाने लगते हैं। ये लोग यौवन आरम्भ होते ही लड़कियों की शादी कर देते हैं परन्तु बीस वर्ष की आयु के पहले लड़कों का विवाह नहीं करते।

एस्किमो लोगों की मृत्यु दुर्घटनाओं के कारण अधिक होती है। ये मृत्यु को दार्शनिक रूप से भी स्वीकार करते हैं। कुछ क्षेत्रों में बीमार या वृद्ध व्यक्तियों को बिना किसी पश्चाताप के मार दिया जाता है। मृतक व्यक्ति को घर से बाहर निकाल कर ऐसे स्थान पर रख दिया जाता है जिससे मृतात्मा रास्ता भटक जाय और फिर से मकान के अन्दर प्रवेश करके किसी को नुकसान न पहुँचा सके। किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर एस्किमो संक्षिप्त शोक ही मनाते हैं, व्यर्थ का कुहराम नहीं मचाते।

एस्किमो आत्मा की अमरता और पुनर्जीवन पर विश्वास करते हैं। उनकी मान्यता है कि पशु अथवा मनुष्य की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा शान्त हो जाती है और कुछ समय बाद फिर से उसी जाति में नया जन्म धारण करती है। प्रत्येक जाति की एक “गार्जियन स्प्रिट” होती है। ईश्वर, देवता, दैत्य, दानव पर भी एस्किमो विश्वास करते हैं। उनका विश्वास है कि देवता आधे मनुष्य तथा आधे जानवर तत्व से बने होते हैं। अपनी आध्यात्मिक रक्षा करने के लिए एस्किमो तन्त्र−मन्त्र, ताबीज आदि का उपयोग करते तथा किसी अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न शैमन का आश्रय लेते हैं। शैमन बीमारियाँ दूर करने तथा भविष्य बताने का कार्य करते हैं।

सर्वथा विपरीत परिस्थितियों में रहकर भी कैसे प्रफुल्लता, उल्लास से भरा जीवन जिया जा सकता है, एस्किमो प्रजाति उसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। बहुसंख्य व्यक्ति अपना सारा जीवन इसी दारोमदार में लगा देते हैं। किन्तु इनके बिना भी प्रतिकूलताओं के बीच भी शारीरिक अनुकूलन एवं मानसिक समस्वरता बनाए रखकर जीना सम्भव है। सम्भव है आर्य जब मध्य एशिया से भारतवर्ष में आये तब ऐसे ही प्रतिकूल वातावरण में रहे हों। हिमालय की वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी ही हैं जिनमें योगीजन निवास करते हैं। वास्तविकता यही है कि मनुष्य हर हालात में स्वयं को ढाल सकता है, बशर्ते वह मनो बल का धनी हो।




Quotation - Akhandjyoti March 1985

यथा सुवर्णं पुटपाक शोधितं त्यक्त्वा मलं स्वात्मगुणं समृच्छति। तथा मनः सत्वरजस्तमोमलं ध्यानेन सन्त्यज्य समेति तत्वम्॥ −विवेक॰ -362

जिस प्रकार अग्नि में पुटपाक विधि से शुद्ध किया हुआ सुवर्ण सम्पूर्ण मलीनता को त्याग कर अपने स्वाभाविक स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, उसी प्रकार मन ध्यान के द्वारा मलीनता (सत-रज-तम रूपी) को त्यागकर ‘आत्म−तत्व’ को प्राप्त कर लेता है।




विलक्षण विभूतियों से सम्पन्न यह जीव−जगत - Akhandjyoti March 1985

प्रकृति ने सारी विशेषतायें मनुष्य को ही नहीं सौंप दी हैं। अन्य प्राणियों को प्रकृति के अन्यान्य घटकों को भी उसने जीवन यापन की सामान्य कुशलताओं के अतिरिक्त ऐसी विभूतियाँ भी प्रदान ही हैं जिनके सहारे वे विपत्ति के समय आत्म−रक्षा कर सकें।

पशु−पक्षियों को प्रायः दुर्गतिगत प्रतिकूलताओं में ही जूझना पड़ता है। उन्हीं से बचाव सम्भव हो सके तो समझना चाहिए कि आधी विपत्ति टल गई। आहार-विहार के साधन मनुष्य की अपेक्षा उन्हें पहले से ही अधिक मिले हुए हैं। गाय, घोड़ा आदि की त्वचा में सटा हुआ जो बालों का कलेवर होता है वह उन्हें सर्दी−गर्मी से बचाता रहता है। मनुष्य का जो प्रयोजन कपड़ों से सधता है उसे वे इन बालों के सहारे ही चला लेते हैं। पक्षियों का सारा शरीर छोटे−छोटे परों से आच्छादित रहता है। उड़ने वाले पंखों से वे उड़ने चलने का काम लेते हैं पर छोटे पर जो सारे शरीर पर सटे होते हैं उन्हें सर्दी-गर्मी का कष्ट नहीं सहने देते। जिनके शरीर पर बाल कम होते हैं उनकी त्वचा मोटी होती है। इसके नीचे भी एक चर्बी की परत रहती है। ऊँट रेगिस्तानी जानवर है उसकी अंग संरचना ऐसी है कि एक बार भरपेट पानी पी लेने तो उसी से लम्बी अवधि बिना पानी के काट लेता है। पानी न मिलने पर भी ऊँटनी अपने बच्चे को दूध पिलाती रहती है। पशु−पक्षियों के लिए प्रकृति ने उनका आहार उनके कार्य−क्षेत्र में ही विपुल मात्रा में फैला रखा है। छाया के लिए गुफाएँ, झाड़ियाँ पेड़ों के कोतर उन्हें उपलब्ध हैं।

भूकम्प जैसी प्रकृतिगत उथल−पुथल होती है तो उनकी अतीन्द्रिय क्षमता साथ देती है और पूर्वाभास मिल जाने से वे संकट की घड़ी में असुरक्षित स्थान छोड़कर ऐसी जगह चले जाते हैं जहाँ उन्हें संकट का सामना न करना पड़े। उनकी इन गतिविधियों को देखकर मनुष्य भी अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध कर लेते हैं।

गणितीय गणना के आधार पर प्राकृतिक हलचलों की भविष्यवाणी का विज्ञान अभी अत्यन्त अविकसित है। इस दृष्टि से पशु−पक्षी मनुष्य से आगे हैं। जीव वैज्ञानिकों का कहना है कि पशु−पक्षियों की छठी ज्ञानेन्द्रिय काफी विकसित होती है जिससे पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र में हुए परिवर्तनों को वे तत्काल जान लेते हैं। किसी समय मनुष्य में भी यह छठी इन्द्रिय काफी विकसित स्थिति में थी किन्तु अन्य ज्ञानेन्द्रियों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण यह क्रमशः क्षीण होती गई और अब तो सर्वथा निष्क्रिय हो चली है। फिर भी कभी−कभी किन्हीं मनुष्यों में इस छठी ज्ञानेन्द्रिय की सक्रियता के उदाहरण आज भी यत्र−तत्र मिलते रहते हैं। मैनचेस्टर विश्व−विद्यालय के जीव वैज्ञानिकों ने इस छठी ज्ञानेन्द्रिय को ‘चुम्बकीय ज्ञानेन्द्रिय’ बताया है। प्रयोगों के आधार पर पता चला है कि मनुष्य भी अन्य जीवधारियों की भाँति पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र से दिशा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य इस चुम्बकीय शक्ति का उपयोग अपने दैनिक जीवन में करता रहता है। यदि वह उसे विकसित करे तो उसके उच्चस्तरीय लाभों से भी लाभान्वित हो सकता है।

इस चुम्बकीय शक्ति की उपस्थिति का पता लगाने के लिए कुछ छात्रों को आँखों पर पट्टी बाँधकर घुमावदार रास्तों से बावन कि॰ मी॰ दूर ले जाया गया। छात्र आँखों पर पट्टी बाँधे ही सही मार्ग बताते हुए विश्व विद्यालय तक लौट आये। दुबारा 80 कि॰ मी॰ दूर ले जाये जाने पर भी उनने वापसी के मार्ग में कोई भूल नहीं की। लेकिन जब उनके सिर पर चुम्बक रख दिये गये तो उनका ज्ञान लुप्त हो गया। पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र को मापना उनके लिए सम्भव नहीं रहा। वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर में चुम्बकीय शक्ति की उपस्थिति का अर्थ है कि इसमें कहीं न कहीं चुम्बकीय ज्ञानेन्द्रिय (कम्पास) भी अवश्य ही होनी चाहिए। भले ही उसकी जानकारी आज नहीं, कल मिले। यह क्षमता मनुष्य में होती है, इसकी जानकारी भी वैज्ञानिकों को जीवन जगत से ही मिली है।

जहाजों पर काम करने वालों के लिए चूहे बहुत मददगार होते हैं। जहाज से चूहों को बाहर जाते देखकर वे लोग जहाज खड़ा कर देते हैं और सवारियों को सुरक्षित स्थान पर पहुँचा देते हैं। चूहों के जहाज छोड़ने का अर्थ है कि निकट भविष्य में किसी तूफान या दुर्घटना की सम्भावना है। ऐसे में वे बचाव का पूर्व संकेत दे देते हैं।

गृह स्वामी अथवा घर के किसी सदस्य के रुग्ण हो जाने पर पालतू कुत्ते दुःखी हो जाते हैं। कुत्ते को यह आभास भी हो जाता है कि वह बीमार व्यक्ति जीवित बचेगा अथवा नहीं। यदि उस व्यक्ति के जिंदा बचने की सम्भावना नहीं होती है तो कुत्ता उसके कमरे के बाहर बैठकर रोने लगता है और आस−पास चक्कर काटता रहता है। अक्सर देखा गया है कि ऐसे प्रायः उसी रात स्वर्ग सिधार जाते हैं।

वर्षा आने के पूर्व छोटी काली चींटी अपने अण्डे लेकर ऊँचे स्थानों पर चली जाती हैं, मेंढक की टर्राहट सुनकर ग्रामीण कृषक शीघ्र ही वर्षा होने का पूर्व अनुमान लगा लेते हैं। घरेलू चिड़िया जब पानी में नहाने लगती है तो समझा जाता है कि दो−चार दिनों में वर्षा होने वाली है। लोमड़ी अपना बिल सूखे और स्वच्छ स्थान पर बनाती है। वर्षा को सूचना उसे दो−दिन पूर्व ही मिल जाती है। इस प्रकार समय रहते वह अपने बच्चों को दूसरे सुरक्षित बिलों में पहुँचाकर निश्चिन्त हो जाती है। कुछ लोग चील को आकाश में मँडराते देखकर भी वर्षा की पूर्व जानकारी ले लेते हैं। मधुमक्खी को वर्षा होने की पूर्व सूचना कुछ घण्टों पूर्व की प्राप्त हो जाती है और वे छत्ते से निकलकर उसके चारों ओर मंडराने लगती हैं। धीरे-धीरे उनके चक्कर लगाने का क्षेत्र विस्तृत होता जाता है और अन्ततः वे आँखों से ओझल हो जाती हैं। वर्षा समाप्त होने पर वे पुनः छत्ते में लौट आती हैं। ग्रामवासियों के लिए आने वाली वर्षा का यही संकेत पर्याप्त होता है।

पहाड़ी हिरनों को भी बर्फीले तूफान आने के काफी पहले ही उसका पूर्वाभास हो जाता है। इसी प्रकार जंगली चिड़ियाँ तूफान आने की पूर्व सूचना जोरों से चहचहाकर शोर मचाकर देती हैं।

चूहों का बिलों से निकलकर इधर−उधर भागने लगना भूकम्प की पूर्व सूचना का ठोस संकेत है। इसी तरह समुद्री मछलियाँ भी भूकम्प आने से पहले विशेष हरकतें करने लगती हैं। ऐसा पहले कई बार हो चुका है कि इन जीवों की हलचलों से सावधान हो असंख्यों ने अपनी जान बचायी है।

ऐसा कहा जाता है कि महामारी फैलने के समय यदि गौरैया घर या गाँव छोड़कर भाग जाय तो मृत्यु की सम्भावनाएँ सुनिश्चित हैं। इसी प्रकार चेचक आदि फैलने पर जब तक गौरैया आँगन में आकर चहचहाती हैं और चारा देने पर चुगती रहती हैं लोग आश्वस्त रहते हैं कि संक्रमण का किसी प्रकार कोई खतरा नहीं। जो भी व्याधि है, वह शीघ्र ही टल जायेगी।

भारतीय प्राणि विज्ञान सर्वेक्षण, कलकत्ता के पक्षी विभाग के विशेषज्ञ डा॰ सुधीन सेन गुप्त ने मैना (एक्रीडोयरेस ट्रिस्टीस) पक्षी पर अपने दस वर्षीय शोध कार्य के दौरान एक विलक्षण बात का पता लगाया है। उनके अनुसार मैना को मौसम का पूर्वज्ञान होता है और इसकी सूचना वह 12 से 36 घण्टे पूर्व दे सकती है। यदि वर्षा अथवा तूफान आने की सम्भावना होती है तो इस कालावधि में वह जोर−जोर से चहकने लगती है और मौसम की खराबी का संकेत करती है।

अध्ययन में पाया गया कि अप्रैल एवं मई के महीनों में भी दिन के समय में मैना थोड़े−थोड़े समयांतराल पर उसी प्रकार की अप्रत्याशित एवं उदात्त चहक लगाती है। सितम्बर में भी अपेक्षाकृत तेज आवाज लगाते पाई गईं, किन्तु दोनों आवाजों में काफी भिन्नता होती है।

अप्रैल−मई के दौरान वह किक−किकू, किक−किकू की आवाज लगाते पायी गई जबकि सितम्बर में पिकू−पिकू। अध्ययन में पहली प्रकार की आवाज प्रजनन से सम्बद्ध पायी गई जबकि दूसरी मौसम सूचक।

इस प्रकार की आवाजें मैना कुछ मिनटों के अन्तराल के बाद एक मिनट तक लगातार करती रहती है। किन्तु वर्षा या आँधी आने के बाद इस प्रकार की आवाज करना वह बन्दर कर देती है।

प्रयोग के दौरान डा॰ सेनगुप्त ने कुछ मैनों को पृथक−पृथक कमरों में बन्द कर उनकी आवाजों का अध्ययन किया तो उन्होंने पाया कि बन्दी अवस्था में भी वे उसी प्रकार की आवाजें करती हैं जैसा उन्मुक्त अवस्था में अर्थात् इससे उसके मौसम सम्बन्धी पूर्वानुमान पर कोई अन्तर आता नहीं देखा गया।

मात्र पशु−पक्षी ही नहीं, जीव जगत के अंग वनस्पति समुदाय में भी यह विशेषता पायी जाती है। वर्षा होने न होने सम्बन्धी भविष्य वाणियाँ अब तक जिन आधारों पर की जाती रही हैं वे बहुधा तीर−तुक्का सिद्ध होती रही हैं। किन्तु प्रकृति के प्राँगण में उगने वाले कई वृक्ष−वनस्पति ऐसे पाये गये हैं जिनकी भविष्यवाणियाँ हमेशा अचूक सिद्ध होती हैं। रालामण्डल के आस−पास बहुतायत से पाई जाने वाली सुनहरी लिली (ग्लोरिओसा सुपरबा’’−ग्लोरी लिली) में अत्यन्त मनोहर लाल−पीले फूल खिलते हैं। वर्षा न होने वाली हो तो पौधे में केवल पत्तियाँ ही दृष्टिगोचर होती हैं किन्तु वर्षा होने की खुशखबरी देने के लिए ये कलियों का रंगीन लबादा ओढ़ लेती हैं। कुछ ऐसे ही गुण−धर्म सुगन्धित पत्तियों वाले मधुमालती नामक वृक्ष में पाए जाते हैं। इसकी शाखाएँ कलियों के गुच्छों से हमेशा लदी हुई रहती हैं। बादलों के घिर आने पर इसकी बन्द कलियों का खिल जाना वर्षा के शुभागमन की सूचना देता है किन्तु बादलों की नीयत यदि कहीं अन्यत्र जाकर बरसने की है तो ये उनका मनोभाव झट ताड़ जाती हैं और उनके स्वागत में अपनी प्रसन्नता नहीं प्रकट करतीं। यदि गठालू (डायोस्कोरिया) नामक बेल के ऊपरी कन्दों की वृद्धि बन्द हो जाय तो समझा जाता है कि आगे वर्षों नहीं होगी। जिस साल वर्षा बिलकुल नहीं होने से सूखा पड़ने की सम्भावना हो उस वर्ष तो इसके कन्द पहले से ही भूमि पर टपक−टपककर शोक सन्तप्तों की तरह दम तोड़ने लगते हैं।

चेतना का आलोक सर्वत्र संव्याप्त है। प्राण स्पन्दन सृष्टि के कण−कण में है। मनुष्य सर्व सामर्थ्य सम्पन्न माना जाता है तो क्या हुआ? उससे भी विलक्षण सामर्थ्य जीव जगत के उसके सहचरों−सहजीवियों में विद्यमान है। इस प्रसुप्त सामर्थ्य को साधना द्वारा मानव भी जगा एवं विकसित कर सकता है। यह चमत्कार या कोई सिद्धि नहीं, एक सहज प्राप्त हो सकने वाली विभूति है जो पुरुषार्थ द्वारा निश्चित ही सुलभ हो सकती है, ऐसा मत ऋषियों का ही नहीं, आधुनिक वैज्ञानिकों का भी है।




तृतीय नेत्र की दिव्य क्षमता - Akhandjyoti March 1985

योग संदर्भ में तीसरे नेत्र की चर्चा प्रायः होती रहती है। शिव ने इसी को खोलकर कामदेव जलाया था और कृष्ण ने अर्जुन को इसी दिव्य नेत्र का उन्मीलन करके विराट ब्रह्म के दर्शन कराये थे। अतीन्द्रिय क्षमताओं का इसे उद्गम माना जाता है। त्राटक साधना द्वारा इसे जागृत करने का प्रयत्न साधना विज्ञान के विद्यार्थी प्रायः करते रहते हैं। यह तृतीय नेत्र अन्य जीवन जन्तुओं में भी काम करते देखा जाता है।

मेरुदण्डधारी प्राणियों को जिनमें सोचने−विचारने की शक्ति होती है, तीन−तीन आँखों का प्राकृतिक अनुदान मिला है जो कि जीवित रहने के लिए अपरिहार्य है। आमतौर से हम तीसरी आँख से अनजान होते हैं किन्तु यह प्राणियों के दिमाग में सक्रिय रूप में पाई जाती हैं एवं इसका प्रयोग भी वे बड़ी कुशलतापूर्वक करते देखे जाते हैं।

वैज्ञानिकों ने इस तृतीय नेत्र को पीनियल ग्लेंड (ग्रन्थि) कहा है जबकि यह तीसरी आँख का ही रूपांतरित स्वरूप है। पीनियल ग्लेंड जीवधारियों में पूर्व में आँख के ही आकार का था। इसमें रोएंदार एक लैंस का प्रति रूप होता है और एक पार दर्शक द्रव भी अन्दर रहता है इसके अतिरिक्त प्रकाश संवेदी कोशिकायें एवं अल्प विकसित रेटिना भी पाई जाती है। मानव प्राणी में इसका वजन दो मिलीग्राम होता है।

यह मेंढक की खोपड़ी में तथा छिपकलियों में चमड़ी के नीचे पाया जाता है। इन जीव−जन्तुओं में यह तीसरा नेत्र रंग की पहचान कर सकता है। वैज्ञानिकों की राय है कि यदि मेंढक प्रकृति की व्यवस्था के अनुसार पानी के अलावा धरती पर अधिक रह सका होता तब यह बहुत उपयोगी रहा होता। जब मेंढक पानी में रहता है तब उसका तीसरा नेत्र पानी के बाहर के आस−पास के वातावरण का पता लगाकर संकेत देता है तब वह धरती पर आता है। इस नेत्र के माध्यम से यह रंगों को भी पहचानता है तथा यौन संपर्क स्थापित करता है।

छिपकलियों में तीसरे नेत्र से कोई फायदा नहीं क्योंकि वह चमड़ी के नीचे ढका रहता है। ह्वेल मछली के पैर उपयोगिता न होने के कारण लुप्त हो गये। तीसरे नेत्र के विषय में भी वैज्ञानिक यही उत्तर ढूँढ़ रहे हैं, कि इसके वेस्टीजियल अंग माना जाने का कारण यही हो सकता है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि जिन प्राणियों का खून ठण्डा होता है उनमें यह तीसरा नेत्र थर्मोस्टेट का कार्य करता है। क्योंकि उनका तापक्रम एक−सा नहीं रहता है। जैसे वातावरण होता है बदल जाता है। इस प्रकार से प्राणी यह पता लगा लेता है कि ठण्डे या गर्म स्थान किसमें जाना है।

मेंढक के पूँछ वाले बच्चे जिन्हें टेड पोल कहते हैं यदि अन्धेरे में रख दिये जाँय तो उनका रंग हलका हो जाता है यह तीसरे नेत्र से निकलने वाले हारमोन्स मेलाटोनिन का ही परिणाम है।

आदमियों में यह ग्रन्थि के रूप में परिवर्तित हो गई है इसमें तन्त्रिका कोशिकायें पाई जाती हैं। ग्रन्थि की गतिविधि गड़बड़ होने से मनुष्य जल्दी यौन विकास की दृष्टि से जल्दी परिपक्वता को प्राप्त हो जाता है। उसके जननाँग तेजी से बढ़ने लगते हैं। यदि इस ग्रन्थि में हारमोन की मात्रा बढ़ जाती है तो मनुष्य में बचपना ही बना रहता है और जननाँग अविकसित रहते हैं।

जर्मन वैज्ञानिकों का ऐसा मत है कि इस तीसरे नेत्र के द्वारा दिशा ज्ञान भी होता है। इसमें पाया जाने वाला हारमोन मेलाटोनिन मनुष्य की मानसिक उदासी से सम्बन्धित है। अनेकानेक मनोविकारों एवं मानसिक गुणों का सम्बन्ध यहाँ स्रवित हारमोन स्रावों से है।

दो प्रत्यक्ष नेत्रों का महत्व हम सभी जानते हैं। यदि तीसरे नेत्र का उपयोग भी समझ सके तो हमारी दिव्य क्षमता का आश्चर्यजनक विकास हो सकता है।




अभिशप्त यान, वाहन एवं भवन - Akhandjyoti March 1985

अनेक व्यक्तियों की और विशेषकर मल्लाहों की ऐसी मान्यता है कि कुछ वस्तुएँ जिनमें जहाज भी सम्मिलित हैं किन्हीं घटनाक्रमों के कारण प्रारम्भ से ही अभिशप्त हो जाते हैं। ऐसे ही एक जहाज का जलावतरण अक्टूबर 1936 में किया गया था जिसे कि “नाझी जर्मनी के गौरव” की संज्ञा दी गई थी। स्कार्नहॉर्स्ट नामक यह युद्धपोत 26 हजार टन का था जिसके विषय में एक सफल भविष्य की कामना संजोई गई थी, किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत। इसके निर्माण के समय से ही अनेक बाधाएँ आती रहीं जिससे लगता था कि कुछ अनपेक्षित सा घट रहा है। इस जहाज का निर्माण अभी तक आधा नहीं हो पाया था कि यह एक ओर लुढ़क गया, जिससे 60 कर्मचारी कुचलकर मर गये और सौ से अधिक घायल हो गये। इसे फिर से अपनी पूर्व स्थिति में खड़ा करने में तीन माह का समय लगा। उसके निर्माण−कार्य को पुनः आरम्भ करने के लिए कारीगरों की भर्ती करने में कठिनाइयाँ आईं, क्योंकि तब तक सब ओर यह अफवाह फैल चुकी थी कि यह निर्माणाधीन जहाज अभिशप्त हो चुका है जिसकी बाद की घटनाओं से पुष्टि हुई।

जब उसके जलावतरण का वह महत्वपूर्ण पर्व आया, उस अवसर पर प्रमुख नाझी जिनमें हिटलर, गोरिंग, हिमलर आदि मुख्य रूप से उपस्थित होने वाले थे, उस पर्व की पूर्व रात्रि को ही वह जहाज स्वयं ही अपने आप अपने स्थान से चल पड़ा और उसने दो नौकाओं को किनारे पर उछालते हुए जलमार्ग को भी क्षति पहुंचाई।

स्कार्नहॉर्स्ट में लगी हुई विशिष्ट रूप से शक्तिशाली दूर तक प्रहार करने वाली तापों का सर्वप्रथम प्रयोग 1939 में डांझिव पर आक्रमण के अवसर पर किया गया, जिसके परिणाम बड़े विपरीत व दुर्भाग्यशाली निकले। आक्रमण के समय ही एक तोप में विस्फोट होने से नौ सैनिकों की मृत्यु हो गई और आन्तरिक भाग में शुद्ध वायु का मार्ग अवरुद्ध हो जाने से 12 तोपचियों का दम घुटने से प्राणाँत हो गया। एक वर्ष पश्चात् ओसलो पर आक्रमण के समय यह जहाज सबसे अधिक क्षतिग्रस्त हुआ। इस पर 30 विभिन्न स्थानों पर आग लग गईं जिससे इसे शीघ्र ही बन्दरगाह से दूर भेज दिया गया ताकि यह बड़वानल दूसरे जहाजों को क्षति न पहुँचा सके। इसे फिर दुश्मन के हवाई हमलों से बचाकर किसी प्रकार एल्ब नदी तक पहुँचा दिया गया जो कि एक सुरक्षित क्षेत्र था और इसकी मरम्मत के लिये उचित स्थान थी था, किन्तु दुर्भाग्य ने वहाँ भी उसे नहीं छोड़ा। एस॰ एस॰ ब्रेग्रेन नामक एक अन्य जहाज वहाँ पहिले से ही लंगर डाले पड़ा जिसे स्कार्नहॉर्स्ट से नहीं देखा जा सका और कुछ ही सेकेंड में उससे जा टकराया परिणामतः ब्रेमेन वहीं कीचड़ में धँस गया जिसे ब्रिटिश हवाई जहाजों ने बम गिराकर पूर्णतः नष्ट कर दिया।

स्कार्नहॉर्स्ट की मरम्मत हो जाने के पश्चात सन् 1943 में इसे नार्वे के समुद्र तट पर सोवियत रूस को जाने वाली रक्षा सामग्री के मार्ग को अवरुद्ध करने के लिये भेजा गया। उसी समय एक ब्रिटिश गश्ती नौका ने इसे देख लिया और तुरन्त ही इस जहाज की उपस्थिति की सूचना वायरलैस के द्वारा अपने युद्धपोतों को दी जो शीघ्र ही वहाँ पहुँच गये। उस युद्धपोत को उन्होंने देख भी लिया किन्तु नाजी जर्मनी के गौरव, इस जहाज की गति ब्रिटिश पोतों से अधिक तेज थी। फिर भी ब्रिटिश कमांडर ने 16 हजार गज की दूरी से ही स्कार्नहॉर्स्ट पर एक बार फायर करने का निश्चित किया अन्यथा वह उनकी तोपों की मार से दूर चला जाता। ब्रिटिश तोपची का निशाना एकदम सही बैठा और उस जहाज पर चारों ओर से ज्वालाऐं निकलने लगी और कुछ ही क्षणों में अनेक विस्फोट हुए और वह अभिशप्त, नाझियों का गौरव समुद्र के बर्फीले धरातल में समा गया। इस पर नियुक्त कुल 1900 सैनिकों में से केवल 36 सैनिक ही जीवित बचे। इस प्रकार मल्लाहों की धारणा के अनुसार इस अभिशप्त जहाज ने कभी भी सफलता का मुँह नहीं देखा, अनेकों को अकाल मृत्यु की गोद में सुला दिया।

लाकहीड कान्सटेलेशन ए॰ एम॰ ई॰ एम॰−4 नामक एक वायुयान के भी अभिशप्त होने सम्बन्धी लोगों की मान्यता है। आरम्भ से ही जुलाई 1945 में एक मेकेनिक इसके एक प्रोपेलर में गिरकर मर गया। इसके ठीक एक वर्ष के अन्तराल में ही 9 जुलाई 1946 को जब यह जहाज अटलांटिक महासागर पर उड़ रहा था कैप्टन आर्थर लेविस अपने नियन्त्रण कक्ष में ही अचानक चल बसा इस घटना के ठीक एक वर्ष पश्चात 9 जुलाई 1947 को जैसे ही इस वायुयान ने उड़ान भरी ही थी कि इसके एक नये स्थापित इंजन में अचानक आग लग गई। राबर्ट नार्मन नामक इसके कैप्टन ने उस पर फायर एस्टिंग विशर के द्वारा नियन्त्रण पाने में सफलता प्राप्त की ही थी कि अचानक उसने देखा कि उसके मार्ग में एक गमन चुम्बी भवन है और उसके वायुयान की ऊपर उठने की मशीन जवाब दे रही है। नारमन ने इस कठिनाई को भी किसी प्रकार पार करने में सफलता पाई। किन्तु जहाज तो फिर भी ऊपर उठे ही जा रहा था। जहाज सामान्य रूप से उड़ भी नहीं पा रहा था क्योंकि ऊपर उठने वाला नियन्त्रक फिर अपनी स्वाभाविक सामान्य स्थिति पर लौट नहीं रहा था। नारमन और उसके सहयोगी पायलट ने अपने समुचित बल का उपयोग करके उसे सामान्य स्थिति में लाने में सफलता अर्जित की। इस प्रकार इस यात्रा में किसी प्रकार की अनहोनी के बगैर ही वे उतरने में सफल हो गये। जुलाई 1948 में कोई विशेष घटना नहीं घटी किन्तु 10 जुलाई 1949 को यह वायुयान शिकागो के पास ध्वस्त हो गया और कैप्टन नारमन सहित समस्त यात्री मारे गये इस प्रकार इस ए॰ एम॰ ई॰ एम॰−4 नामक अभिशप्त वायुयान का अन्त हुआ।

केवल जलयान और वायुयान ही अभिशप्त नहीं होते, देखे गये हैं, जिन्होंने अपने स्वामियों को घोर विपत्तियों में डाल दिया। ऐसी ही एक कार का उदाहरण ग्रन्थों में मिलता है। जिसका प्रथम स्वामित्व आर्चड्यूक फ्रांझ फरडिनेंड को प्राप्त हुआ जो कि आस्ट्रिया हंगरी के दुहरे राजतन्त्र के एकमात्र उत्तराधिकारी थे जिनकी अपनी पत्नी के साथ जुलाई 1914 में साराजेबो में इसी कार में हत्या कर दी गई थी। कहा जाता है कि इसी हत्या ने प्रथम विश्व युद्ध को जन्म दिया था। इस घटना के पश्चात आस्ट्रिया की सेना के जनरल, पोटिओरेक इस कार के स्वामी बने। कुछ सप्ताहों में ही उन्हें सरबिअन्स के हाथों एक भयंकर पराजय का मुँह वालजेवो में देखना पड़ा और उन्हें अपमानित होकर वियना भेज दिया गया। वह इस अपमान को सहन नहीं कर सके और विक्षिप्त होकर काल-कवलित हो गये।

इस कार के अगले स्वामी एक आस्ट्रियन कैप्टन बने जो कि पोटिओरेक द्वारा नियन्त्रित सेना में ही कार्यरत थे। इस कार के स्वामी बनने के नवें दिन ही उन्होंने दो कृषकों को इस कार की टक्कर से मार डाला और आगे एक वृक्ष को टक्कर मारी जिसमें उनकी गर्दन पिस गई और उनका प्राणांत हो गया।

विश्व युद्ध के अन्त में इस कार के स्वामी युगोस्लेविया के गवर्नर बने। उनकी चार महीनों ने चार दुर्घटनाएँ हुईं, जिसमें उनकी एक भुजा जाती रही। उन्हें इस कार से अब पूर्णतः विरक्ति हो चुकी थी अतः उन्होंने इसे एक डाक्टर को विक्रय कर दिया। छः माह पश्चात उस कार को चारों कोने चित्त एक गड्ढे में देखा गया जिसमें वह डाक्टर पिस कर मर चुका था। यह कार फिर एक धनाढ्य जौहरी द्वारा क्रय की गई जिसने उस वर्षान्त में ही आत्महत्या कर ली। इसके पश्चात वह एक डाक्टर के पास पहुँची, किन्तु उसने शीघ्र ही इससे अपना पिंड छुड़ा लिया और इसे एक स्विस कार धावक को विक्रय कर दिया, जो कि एक कार दौड़ में इटली के आल्पस पर्वत पर से जाते समय किनारे की दीवार से टकरा कर मर गया। इस कार का अगला स्वामी एक सर्वियन कृषक था जिसने एक दिन उसे गति देने के लिये एक मोटर गाड़ी के पीछे बाँधा। यह कार अचानक चल पड़ी और वह कृषक उसे नियन्त्रित नहीं कर सका और अन्ततः उसका दसवाँ बलि बना। इस कार का अन्तिम स्वामी एक गेरेज का मालिक टिबॉर हिर्शफेल्ड था। एक दिन जब वह अपने छः मित्रों के साथ एक विवाहोत्सव से लौट रहा था, तब मार्ग में एक तीव्र गति से जाने वाली कार से आगे निकलने के प्रयास में वह कार टकरा गई जिसमें चार अन्य मित्रों के साथ उसकी भी मृत्यु हो गई। अब इस कार के अभिशप्त होने में किसी को भी कोई सन्देह नहीं रह गया था, अतः इसे वियना के अजायब घर में ले जाकर रख दिया गया और तब से वह वहीं पर शान्ति से विश्राम कर रही है।

परिलोक सा कल्पित अत्यन्त सुन्दर और रमणीय राजमहल भी क्या अभिशप्त हो सकता है तो हमें इसका उत्तर ‘न’ में ही मिलेगा, किन्तु जब ट्रिस्टे नदी के तट पर स्थित मिरामर नामक अति रमणीय महल और उसमें निवास करने वाले व्यक्तियों से सम्बन्धित कहानियों को सुनेंगे जिन्हें घोर विपत्तियों का सामना करना पड़ा, तब आप भौंचक्के ही रह जायेंगे। मिरामर का अत्यन्त ही सुन्दर व रमणीय राजमहल 19 वीं शताब्दी के मध्य में आस्ट्रिया−हंगरी के सम्राट फ्रांज जोसेफ के अनुज आर्चड्यूक मेक्समिलियन के द्वारा निर्मित कराया गया था। एकबार एक छोटी नौका में मेक्समिलियन घूम रहा था तूफान से उसकी नौका उलट गई और वह बहता हुआ इस स्थान पर पहुँचा जहाँ कि कुछ मछुआरों ने उसे बचा लिया। मेक्समिलियन के मन को उस स्थान के सौंदर्य ने मोह लिया और उसने वहाँ अपने निवास के लिये एक सुन्दर महल बनवाने का निश्चय किया। कुछ वर्षों के पश्चात ही वहाँ उसने एक श्वेत महल का निर्माण करवाया जिसमें बहुमूल्य सामग्री का उपयोग किया जाय। इसकी वास्तुकला, इसके उद्यान, वृक्ष और मनोहर पुष्पों का दृश्य देखते ही बनता है। इसके बुर्ज बड़े उत्कृष्ट लगते हैं, इसके छज्जों में ग्रेनाइट लगा है, इसके सोपान में संगमरमर का उपयोग किया गया है, नीचे उतरते समय सीढ़ियों को आसपास सिंह के मुँहों द्वारा सजाया गया है। जो भी आगन्तुक इसे देखता है वह विस्मय से देखता ही रह जाता है और इसे पृथ्वी के अभूतपूर्व सौंदर्यवान महल की संज्ञा दिये बिना नहीं रहता। मिरामर प्रासाद का प्रथम स्वामी जैसे ही उसमें निवास करने आया उसके दुर्भाग्य भी उसके साथ वहाँ पहुँच गये। इस महल में उसे कभी शांति नहीं मिली। इसी बीच उसे मेक्सिको की राजगद्दी पर बैठने का अवसर मिला जहाँ पर तीन वर्ष में ही मेक्सिकन सैनिकों द्वारा उसकी हत्या कर दी गई। उसकी पत्नी जिसकी आयु 26 वर्ष की थी इस सदमे को सहन नहीं कर सकी और पागल हो गई।

फ्रांस जोसेफ की धर्म पत्नी महारानी एलिजाबेथ इस महल में निवास करने अपने पुत्र रुडोल्फ के साथ आई। रुडोल्फ ने अपनी प्रेमिका के साथ सन् 1889 में आत्महत्या कर ली। महारानी एलिजाबेथ की एक अराजकतावादी इटेलियन ने 1898 में इसलिये हत्या कर दी क्योंकि उसके विचार में आस्ट्रिया से इटली को मुक्त करवाने का यही मार्ग था। इसके पश्चात इस महल में रुडोल्फ का चचेरा भाई आर्चड्यूक फर्डिनेंड निवास करने आय जो कि राजसिंहासन का उत्तराधिकारी भी था। उसकी अपनी पत्नी के साथ एक कार में हत्या कर दी गई। प्रथम विश्वयुद्ध के पश्चात जब ट्रिस्टे इटली को सौंपा गया, तब इटली नरेश के चचेरे भाई ड्यूक ऑफ ओस्टा इस महल में निवास करने आये जिनकी केन्या के एक युद्धबन्दी शिर में द्वितीय विश्व युद्ध की अवधि में मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् दो ब्रिटिश मेजर जनरल इस महल में निवास करने आये और उन दिनों की भी मृत्यु हृदय गति के रुक जाने से हो गई। तब से यह वीरान पड़ा हुआ है।

ये उदाहरण बताते हैं कि मनुष्य की इच्छा शक्ति किसी धातु या काष्ठ से बने पदार्थ के साथ भी इतनी घनीभूत हो सकती है कि वह उसके संकल्पों का अनुसरण करने लगे और ऐसा प्रतीत हो कि इस निर्जीव में कोई सजीवता काम कर रही है।




Quotation - Akhandjyoti March 1985

चित्रादि सर्वभावेषु ब्रह्मत्वेनैव भावनात्। निरोधः सर्ववृत्तीनां प्राणायामः स उच्यते॥ -अपरोक्षानुभूमि−118

‘चित्त−मन−आदि के समस्त भावों में ब्रह्म रूप से ही भावना करने से सम्पूर्ण चित्तवृत्तियों का निरोध हो जाता है। वही प्राणायाम कहा जाता है।




भीतर वाले को सही करें। - Akhandjyoti March 1985

कपड़ों से लिपटा हुआ कलेवर बाहर दिखता है, पर असल में व्यक्ति जो कुछ है भीतर रहता है। बल, बुद्धि, विद्या, प्रतिभा इनमें से बाहर एक भी नहीं दीखती। मलमूत्र की गठरी भर बाहर है। यदि प्राण निकल जाय तो मृत शरीर की कीमत छदाम भी न उठे।

पेड़ का कलेवर कितना विस्तृत दिखता है पर उसके पल्लव, फूल समेत सारा वैभव जड़ों के ऊपर निर्भर रहता है। जड़ें जितनी मोटी और गहरी होती हैं उतनी ही खुराक पेड़ को मिलती है और वह उतना ही अधिक फलता−फूलता है। जड़ें यदि सूखने लगें। उनमें दीमक लगकर खोखली कर दें तो हवा का एक झोंका उस ठूँठ को जमीन पर गिरा देगा।

मिट्टी का ढेला निरर्थक होता है उसका बाजारू मूल्य कुछ भी नहीं। किंतु परमाणुओं के भीतर जो शक्ति भरी रहती है वह असीम होती है। एक कण का मध्यवर्ती नाभिक किसी प्रकार फट पड़े तो इस पूरे क्षेत्र को तहस−नहस कर सकता है।

सूर्य आग का एक गोला भर है। पर पृथ्वी पर उसकी किरणें आती है और उन्हीं से इस लोक की गर्मी रोशनी का सारा काम चलता है। फिर भी सौर−मण्डल को सम्भालने की पूरी जिम्मेदारी सूर्य के मध्य−केन्द्र पर ही है।

शरीर की शोभा चेहरे पर निर्भर है। उसकी गति−विधियाँ हाथ−पैरों के सहारे चलती हैं किन्तु जीवन संचार का रक्त−प्रवाह शरीर के मध्य में विराजमान हृदय के ऊपर निर्भर है, जो दृष्टिगोचर नहीं होता। जो दिखता है, वह तो एक माँस की गठरी भर है। उसकी संचालन क्रिया हृदय पर निर्भर रहती है।

हिरन कस्तूरी की गन्ध बाहर तलाशता है, पर वस्तुतः वह उसकी नाभि में छिपी रहती है बाहर तो उसका खोखला भर दृष्टिगोचर होता है।

किसी फल का जीवन सत्व उसके मध्य भाग में होता है। बीज इसी को कहते हैं। नया वंश उगाने की क्षमता इस बीज में ही होती है। पर वह दिखता नहीं। छिलका दिखता है। गूदा भीतर होता है। गूदे के भीतर वह सत्व रहता है जिसे बीज कहते हैं। छोटा होने पर भी प्राण उसी में होता है।

चलते पहिए हैं। बाहर में दीखते भी वे ही हैं। पर सन्तुलन बनाये रखने की क्षमता उस धुरी में होती है जो बाहर से दृष्टि गोचर नहीं होती।

मनुष्य जो कुछ भी है, भीतर है। जो सोचता है, निर्णय करता है और पराक्रम में जुटता है वह भीतर है बाहर नहीं। इस भीतर वाले को ही देखना परखना चाहिए और उसी को सम्भालना, संजोना, सुधारना और समर्थ बनाना चाहिए। यह सही रहे तो समझना चाहिए कि मनुष्य का व्यक्तित्व और भविष्य सही है। अनदेखे के भीतर ही वह समाया हुआ है, जो देखता है और दिखता नहीं है।

आंखें कितनी बड़ी होती हैं पलक, भवें, पुतली मिलाकर काफी कलेवर उनमें भरा होता है, पर असल में दृष्टा वह है जिसे ‘तिल’ कहते हैं। उसमें अन्तर पड़े तो समूची आंखें बड़ी−बड़ी होने पर भी देखना और दिखना न हो सकेगा। व्यक्ति तिल जैसा है वह भीतर रहता है। उसे सम्भाल लिया जाय तो बाहर का कलेवर सुन्दर हो या कुरूप, छोटा हो या बड़ा उससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। हम भीतर से सही हैं, तो फिर समझना चाहिए कि बाहर वाला भी सब कुछ सही है।




Quotation - Akhandjyoti March 1985

प्रतिष्ठा उन कामों में नहीं, जिनसे हम प्रख्यात होते हैं। वरन् उनमें है जो हमारे स्वभाव की नम्रता में हैं।




अन्तरिक्षीय आवागमन की सम्भावनाएँ - Akhandjyoti March 1985

इस ब्रह्माण्ड के अगणित ग्रह−पिण्डों में से कितनों में ही जीवन होने की सचाई अब अंतरिक्ष विज्ञानियों के गले अधिक गहराई तक उतरने लगी है। अपनी इस पृथ्वी पर विकसित सभ्यता वाले अंतरिक्षवासी कितनी ही बार आते रहे हैं।

अब इस मान्यता की पुष्टि करने वाले अनेकों प्रमाण मिल रहे हैं कि चिर अतीत में पृथ्वी पर अब से भी अधिक विकसित सभ्यता थी और जीवन विज्ञान एवं भौतिक विज्ञान की जानकारी अब की अपेक्षा तब कहीं अधिक थी। उन्हीं की देन इस धरतीवासी मनुष्यों को मिली है और कड़ी में कड़ी जुड़ती चली आई है।

डार्विन की उस मान्यता का खण्डन हो चला है जिसमें कहा गया था कि जीवन समुद्र में पैदा हुआ और मनुष्य बन्दर की औलाद है। वह आरम्भ से ही उन्हीं विशेषताओं से युक्त था जो उसमें अब देखी जाती हैं। उसकी आरम्भिक उत्पत्ति विकसित सभ्यता वाले अन्तरिक्ष वासी ‘देवजनों’ की सन्तान हैं। उसे देवपुत्र मानना सर्वथा सार्थक है।

पृथ्वी पर अन्तरिक्ष वासियों के आगमन के ऐसे प्रमाण क्रमशः अधिकाधिक संख्या में मिलते जा रहे हैं जिनके बारे में समझा जाता है कि वे छोड़े हुए परिचय चिन्ह हैं।

सीरिया के सासनिक नामक क्षेत्र में एक उत्खनन में पत्थरों के बड़े−बड़े भारी-भरकम औजार पाये गये हैं। इनकी लम्बाई साढ़े बारह इंच, चौड़ाई साढ़े आठ इंच एवं वजन साढ़े आठ से साढ़े नौ पौण्ड पाया गया। इनके आधार पर इन्हें चलाने वाले प्राणियों के शारीरिक गठन का अनुमान लगाया जाय, तो निश्चय ही वे कोई दैत्याकार प्राणी साबित होंगे, जिनकी शारीरिक लम्बाई किसी भी प्रकार 12 फुट से कम नहीं होंगी। प्रागैतिहासिक काल से सम्बद्ध फ्राँसीसी शोधकर्ता डॉ. लोविस बुरखाल्टर भी इसका समर्थन करते हैं।

‘ओल्ड टेस्टामेंट’ भी इसी तथ्य का समर्थन करता है। पैगम्बर मॉजेस की उक्ति थी कि जब देवमानवों का पृथ्वी पर अवतरण हुआ, तो पृथ्वी वासियों से सहवास कर भीमकाय मानवों को उन्होंने जन्म दिया।

मूर्धन्य पुरातत्व वेत्ता एवं ‘सन्स ऑफ दि सन’ के प्रख्यात लेखक प्रो. मारसल होमेट को उत्तरा आमेजेन्स (ब्राजील) के रियो ब्रैको क्षेत्र में एक विशालकाय अण्डा मिला है। यह पत्थर का बना है। इसकी लम्बाई 328 फुट तथा ऊँचाई 98 फुट पायी गई। इसमें कुछ लिखा हुआ है, तथा यत्र−तत्र सूर्य के नमूने खुदे हुए हैं। खुदे हुए भाग का आयाम 700 वर्ग गज है।

मध्य अमरीका के कोस्टारिका राज्य में भी जहाँ−तहाँ ढेरों पाषाण−गेंदें पाई गई हैं। इनका व्यास कुछ इंच से लेकर आठ फुट तक है। खुदाई में सबसे वजनी पाषाण पिण्ड आठ टन का प्राप्त हुआ है। इन्हें देखने से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि ये किन्हीं प्राकृतिक घटनाओं के परिणाम है। स्वतः इतनी सही, पूर्णतः गोल एवं पालिश की हुई गेंदें नहीं बन सकतीं। निश्चय ही इनके निर्माण के पीछे मानवी श्रम नियोजित हुआ है।

कोस्टारिका में प्राप्त गेंदों में से कोई भी ऐसी नहीं जिसका व्यास दिये गये व्यास से कमीवेशी हो। एक गेंद का व्यास चारों और से एक-सा है। इससे यह स्पष्ट है कि इनके निर्माताओं को रेखागणित का अच्छा ज्ञान था। साथ ही उनके पास अच्छे धात्विक औजार भी थे, क्योंकि पालिश किए हुए ऐसे गोले पाषाण औजारों से विनिर्मित कर पाना सम्भव नहीं।

पेरू के लीमा क्षेत्र में एक सीधी रेखा में 209 खंदकें मिली हैं। इनका व्यास 23 इंच तथा गहराई 5 फुट 7 इंच हैं। ये क्या थे? किस उद्देश्य से खोदे गये? इसका ठीक−ठीक पता नहीं।

जापान के होण्डो टापू में एक उत्खनन के मध्य तीन काँसे की मूर्तियां मिली हैं। ये मूर्तियां रूस के एक म्यूजियम में आज भी सुरक्षित हैं। मूर्तियां स्पेश−सूट पहनी दिखाई गई हैं। सूट अन्तरिक्ष यात्रियों की भाँति ही शरीर में बिल्कुल कसी हुई है। सीट से आबद्ध करने वाला कमर का बेल्ट भी स्पष्ट दिखता है। आक्सीजन−पात्र भी स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। मूर्ति की आँखों में चश्मा चढ़ा हुआ है।

नाजका की एक पहाड़ी में एक विशालकाय मनुष्य का रेखाचित्र मिला है। चित्र की सीमा−रेखा बालू में पत्थर गाड़कर बनायी गयी है। सिर में बारह सीधी व समान लम्बाई की एण्टिना लगी हुई हैं। नितम्ब एवं जंघाओं में त्रिकोण फिन दिखाये गये हैं, जैसा कि सुपर सोनिक लड़ाकू जहाजों में होता है।

चिली के एल−एनलैड्रिलैडों प्लेटो के मध्य में तीन प्रस्तर खण्ड खड़े हैं। इनका व्यास 6 फुट से लेकर 4 फुट तक है। जब इनकी स्थिति के बारे में अध्ययन किया गया, तो पाया गया कि दो चट्टानें उत्तर−दक्षिण की दिक्-सूचक रेखा पर बिल्कुल सही−सही स्थित हैं। सम्भवतः ये सभी निर्माण वेध कार्य हेतु देवमानवों द्वारा किए गए थे।

पेरू की एक पहाड़ी में प्रागैतिहासिक काल से एक भीमकाय पत्थर पड़ा हुआ है। चट्टान 8 फुट ऊँची है। इसकी परिधि 33 फुट है। इसमें मन्दिर और घरों के कलात्मक चित्र खुदे हैं। गन्दे पानी के निकास के लिए नालियों की भी व्यवस्था दिखाई गई है। इसके अतिरिक्त उसमें किसी गूढ़ भाषा में कुछ लिखा है, जिसे अब तक पढ़ा नहीं जा सका।

इसके आस−पास के क्षेत्रों में ऐसे एक−दो और प्रस्तर खण्ड पाये गये हैं। इनमें भी विकसित सभ्यता के परिचायक चित्र बने हुए हैं।

पेरिस की सॉरबोन लाइब्रेरी में एक अति प्राचीन पुस्तक−काब्बाला है। इसके सात खण्ड हैं। पुस्तक में अत्यन्त गूढ़ चित्र बने हुए हैं। सम्बद्ध लोगों का कहना है, कि पुस्तक भगवान के निर्देश पर लिखी गई। इसमें रहस्यमय चित्र, संकेत, चिन्ह एवं गणितीय सूत्र लिखे हुए हैं। इसी पुस्तक में सात प्रकार के संसारों का उल्लेख है। प्रत्येक की विस्तृत व्याख्या−विवेचना भी की गई है। इनकी संगति आर्ष ग्रन्थों में वर्णित सप्त लोकों से भली भाँति बैठती है।

एक अन्य पुस्तक ‘जोहार’ में पृथ्वीवासी एवं एक ग्रहवासी के बीच का सम्भाषण है। अजनबी स्वयं को ‘आरका’ संसार का बताता है। इस पर पृथ्वीवासी साश्चर्य पूछता है कि क्या वह संसार भी आबाद है? अजनबी सकारात्मक उत्तर देकर कहता है, कि जब मैंने यहाँ जीवों को विचरते देखा, तो इस ग्रह का अध्ययन करने एवं इसके निवासी जीवन जन्तुओं के बारे में जानकारी लेने की जिज्ञासा हुई। उसने यहाँ तक बताया कि हमारे यहाँ की परिस्थितियाँ इस संसार से भिन्न है। मौसम व ऋतु, सभी अलग तरह के हैं।

प्राचीन समय में अन्य ग्रहवासियों का पृथ्वी पर समय−समय पर अवतरण होता रहा है− यह कोई कपोल-कल्पना नहीं, विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकारते हैं। सापेक्षवाद का प्रसिद्ध सिद्धान्त प्रतिपादित करने वाले जर्मन वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन भी इस बात से सहमत हैं कि प्रागैतिहासिक काल में किन्हीं अति विकसित अंतरिक्षीय सभ्यताओं का समय−समय पर पृथ्वी पर आगमन हुआ है।

वर्तमान समय के विद्वान रूसी एस्ट्रोभौतिकविद् एवं प्रख्यात रेडियो खगोलविद् प्रो. जोसेफ सैम्यूइलोविच शक्लोवस्की की भी यही अवधारणा है। उनका कहना है, कि अनेक बार नहीं तो कम से कम एक बार तो अवश्य ही पृथ्वी वर्षों तक अन्तरिक्षीय देवमानवों का पर्यटन ग्रह रह चुकी है। अमेरिका के प्रख्यात स्पेस जीवविज्ञानी का सैगन एवं ‘रॉकेट के जनक’ प्रो. हरमन ऑबर्थ भी उपरोक्त अभिमत का समर्थन करते हैं।

अब विज्ञान जगत में एक प्रश्न उठ रहा है कि क्या देव मानवों की भाँति पृथ्वीवासी मनुष्य भी उन विकसित सभ्यता वालों के साथ संपर्क साधने और आदान−प्रदान का द्वार खोलने वाली यात्रायें कर सकते हैं। कुछ समय पूर्व सुदूर स्थित ग्रह पिण्डों की दूरी, मनुष्य की अल्प आयु तथा इस प्रयोजन के लिए अनुपयुक्त वाहनों को देखते हुए ऐसी यात्रा असम्भव मानी जाती थी पर अब वैसी बात नहीं रही और वे उपाय सोचे जा रहे हैं जिनके आधार पर अन्तर्ग्रही यात्रा सम्भव हो सके।

अन्तरिक्ष विज्ञानी कहते हैं, कि यदि अन्तरिक्ष यात्री को निश्चित दूरी तक के लिए फ्रीज कर दिया जाय और वाँछित दूरी तय करने के बाद पिघला दिया जाय, तो उसके शरीर की फिजियोलॉजी फिर पूर्ववत् हो सकती है तथा अभीष्ट ग्रह पर पहुँचकर वह अपना प्रयोग−परीक्षण भली प्रकार सम्पन्न करता रह सकता है।

उनका कहना है, कि जब प्रतिकूल परिस्थितियाँ आती हैं तो मेंढक कीचड़ में धँसते और भालू बर्फ में जम जाते हैं, किन्तु जब परिस्थितियाँ सामान्य बनती हैं, तो फिर से वे अपना सामान्य जीवनक्रम आरम्भ करते और सक्रिय होते देखे जाते हैं।

अन्तरिक्ष यात्रियों के मामले में भी ऐसी स्थिति उत्पन्न कर उन्हें वाँछित समय तक निष्क्रिय बनाये रखा जा सकता है और फिर लक्ष्य तक पहुँचने के बाद पूर्ववत् स्थिति में लाया जा सकता है।

कुछ वैज्ञानिक इससे भी आगे की बात सोचते हैं। उनका कहना है, कि आगामी वर्षों का अन्तरिक्ष यात्री हाड़−माँस का मनुष्य नहीं, वरन् एक विलक्षण अर्ध जीवित अर्ध मृत प्राणी होगा। इसके काय−कलेवर तो यान्त्रिक ही होंगे, पर उसका संचालन मानवी मस्तिष्क करेगा। वैज्ञानिकों ने इस विशेष जीव का नाम ‘साइबरनेटिक ऑरगैनिज्म’ रखा है। यह एक प्रकार का यन्त्र मानव ही होगा, किन्तु सिलिकन मस्तिष्क के स्थान पर इसमें जीवित मानवी मस्तिष्क प्रत्यारोपित होगा।

अपनी पुस्तक “दि प्लैनेट ऑफ इमपोसिबल पोसिबिलिटी” में फ्राँसीसी लेखक द्वय लूईस पावेल्स एवं जेक्स वर्जियर ने प्रख्यात रूसी वैज्ञानिक के. पी. स्टैनियूकोविच की अद्भुत अंतर्ग्रही योजना का उल्लेख किया है। उनके अनुसार इसका वेग असीम होगा। इस उड़न−लैम्प में बैठे यात्रियों को कुछ भी असामान्य अनुभव नहीं होगा। यान के अन्दर गुरुत्व, पृथ्वी के बराबर ही होगा। समय भी उन्हें सामान्य गति से बीतता महसूस होगा। जबकि वस्तुतः ऐसा होता नहीं। इस प्रकार थोड़े ही समय में वे विशालतम दूरी तय कर सकेंगे। इस प्रकार उनका 21 वर्ष पृथ्वी के 75 हजार प्रकाश वर्ष के बराबर होगा। इतने समय में यान पृथ्वी से आकाश गंगा के हृद-केन्द्र तक में पहुँच चुका होगा। 28 वर्षों में वे पृथ्वी की पड़ोसी मन्दाकिनी एण्ड्रोमैडा में पहुँच जायेंगे, जो पृथ्वी से 22 लाख 50 हजार प्रकाश वर्ष दूर है।

स्टैनियूकोविच की एक गणना के अनुसार ‘उड़न−लैम्प’ के यात्रियों के जब 65 वर्ष पूरे होंगे, उतने समय में पृथ्वी पर साढ़े चालीस लाख वर्ष गुजर चुके होंगे। यह यूरोपिया जैसा लगे तो भी पौराणिक आख्यानों से संगति खाता है एवं हमारी तकनीकी उपलब्धियों के कारण लगता भी यही है कि सम्भवतः किसी सीमा तक यह सम्भव हो सकेगा।

भगवान करे, वह दिन जल्दी आये जिसमें धरती में मनुष्यों और देवलोक वासियों के बीच आवागमन का प्रत्यक्ष द्वारा खुले। आध्यात्मवादी दिव्य शक्तियों के आधार पर सूक्ष्म शरीर द्वारा इस सम्भावना को पहले से भी स्वीकारते रहे हैं।




Quotation - Akhandjyoti March 1985

दार्शनिक च्वांगत्से को रात्रि के समय कब्रिस्तान में होकर गुजरते समय पैर में ठोकर लगी। टटोल कर देखा तो किसी मुर्दे की खोपड़ी थी। उठाकर उनने उसे झोले में रख दिया और सदा साथ रखने लगे। शिष्यों ने इस पर उनसे पूछा− यह कितना गन्दा और कुरूप है। इसे आप साथ क्यों रखते हैं?

च्वांगत्से ने उत्तर दिया− यह मेरे दिमाग का तनाव दूर करने की अच्छी दवा है। जब अहंकार का आवेश चढ़ता है, लालच सताता है तो इस खोपड़ी को गौर से देखता हूँ। कल-परसों अपनी भी ऐसी ही दुर्गति होनी है तो अहंकार और लालच किसका किया जाय।

वे मृत्यु को स्मरण रखना, अनुचित आवेशों के समय का उपयुक्त उपचार बताया करते थे और इसके लिए मुर्दे की खोपड़ी का ध्यान करने की सलाह दिया करते थे। खुद तो उसे साथ रखते ही थे।




नाद योग की साधना और सिद्धि - Akhandjyoti March 1985

शब्द विज्ञान में दो प्रकार की ध्वनियों की चर्चा विवेचना होती है। एक आहत। दूसरे अनाहत। आहत शब्द वे हैं जो किन्हीं वस्तुओं के टकराने से उत्पन्न होते हैं। घण्टा घड़ियाल का उदाहरण स्पष्ट है। कोई वस्तु हाथ से गिरे और तो जमीन से टकराने पर उसकी आवाज होगी। बाजे बजने−बन्दूक चलने−कपड़े धोने आदि की ध्वनियाँ, आहत ध्वनियाँ हैं।

वार्त्तालाप को भी इसी श्रेणी में गिना जाता है। क्योंकि उनका स्वस्थ कण्ठ, तालु, होंठ, जिह्वा, दाँत आदि के परस्पर एक विधि विशेष में टकराने पर विभिन्न शब्दों का उच्चारण बन पड़ता है। मनुष्य की भाँति पशु−पक्षियों की वाणी। समुद्र की लहरें, बादलों की गड़गड़ाहट आदि के द्वारा भी आहत ध्वनियों का ही रूप बनता है। विभिन्न प्रकार की जानकारियों का आदान−प्रदान करने में भी शब्द विज्ञान का यही स्तर काम आता है।

अनाहत शब्द वे हैं जो योगाभ्यास में नाद योग के द्वारा सुने और जाने आते हैं। श्वांस-प्रश्वांस के समय सो एवं अहम् की ध्वनियाँ होती रहती हैं। यह स्पष्ट रूप से कानों के द्वारा तो नहीं सुनी जाती पर, ध्यान एकाग्र करने पर उस ध्वनि का आभास होता है। अभ्यास करने से वह कल्पना प्रत्यक्ष अनुभव के रूप में समझ पड़ती है। इसके बाद कानों के छेद बन्द करके ध्यान की एकाग्रता के रहते, घण्टा, घड़ियाल, शंख, वंशी, झींगुर, मेंढक, बादल गरजन जैसे कई प्रकार के शब्द सुनाई देने लगते हैं। आरम्भ में यह बहुत धीमे और कल्पना स्तर के ही होते हैं किन्तु पीछे एकाग्रता के अधिक घनीभूत होने से वे शब्द अधिक स्पष्ट सुनाई पड़ते हैं। इसे एकाग्रता की चरम परिणति भी कह सकते हैं और अंतरिक्ष में अनेकानेक घटनाओं की सूचना देने वाले सूक्ष्म संकेत भी। गोरख पद्धति में ॐकार की ध्वनि पर ध्यान एकाग्र किया जाता है और उसे ईश्वर की स्व उच्चारित वाणी भी कहा जाता है। गोरख सम्प्रदाय के अतिरिक्त और भी कितने ही उसके भेद-उपभेद हैं जो नादयोग को प्रधानता देते और उसी आधार पर अपनी उपासनाएँ करते हैं। कबीर पन्थ, राधा स्वामी पन्थ आदि में नाद योग की साधना ही प्रधान है।

प्राण विद्युत शरीर के विभिन्न क्रिया-कलापों का संचार करती है। बिजली में एक प्रकार के सूक्ष्म कम्पन होते हैं और वे विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न मन्त्रों द्वारा प्रयुक्त किये जाने पर उन झंकृतियों में थोड़ा बहुत अन्तर पड़ता रहता है। नादयोग में विभिन्न प्रकार की ध्वनियों का अनुभव इसी आधार पर होता है।

आकाश में अदृश्य घटनाक्रमों के कम्पन चलते रहते हैं। जो हो चुका है या होने वाला है, उसका घटनाक्रम ध्वनि तरंगों के रूप में आकाश में गूँजता रहता है। नाद योग की एकाग्रता का सही अभ्यास होने पर आकाश में गूँजने वाली विभिन्न ध्वनियों के आधार पर भूतकाल में जो घटित हो चुका है या भविष्य में जो घटित होने वाला है उसका आभास भी प्राप्त किया जा सका है। यह एक असामान्य सिद्धि है।

किसी ध्वनि को एक बार प्रत्यक्ष रूप में करने उसकी ध्यान धारणा बाद में करते रहने पर इस अभ्यास में सरलता पड़ती है। मन्दिरों में गुम्बज इसीलिए बनाये जाते हैं कि उनमें टँगे घण्टे की प्रतिध्वनि देर तक सुनी जा सके। ॐकार की प्रतिध्वनि भी गुम्बजदार मन्दिरों में देर तक गूँजती रहती है। इस आधार पर विभिन्न ध्वनियों को सुनने का अभ्यास किया जा सकता है। इस प्रकार आहत और अनाहत नादयोग का अभ्यास करने से व्यक्ति अविज्ञात को ज्ञात स्तर तक खींच लाने में समर्थ हो सकता है।




बीसवीं सदी के समाज की एक विडम्बना भरी कहानी - Akhandjyoti March 1985

मानवी प्रगति का इस शताब्दी का इतिहास बताता है दो विश्व युद्धों ने मानवी मानसिकता को बहुत कुछ प्रभावित किया है। दोनों ही युद्धों के वाद अमेरिका, यूरोप, एशिया महाद्वीप के राष्ट्रों में इस मान्यता को खूब बल मिला कि यदि सुख−शान्ति भरा, सम्पन्नता−सफलता युक्त जीवन बिताना है तो आधुनिकता की दौड़ और तेज की जाय। 1930 की आर्थिक मन्दी ने सारे विश्व को प्रभावित किया। उपनिवेश स्वतन्त्र होते चले गये एवं लगभग सभी राष्ट्रों को आमूल−चूल विकसित होना चाहिए था, वहाँ पूँजी का केन्द्रीकरण सीमित परिधि वाले कुछ शहरों में ही होने का क्रम आरम्भ हुआ। जनसंख्या बढ़ते रहने का क्रम चालू रहा एवं शहर फैलते चले गये।

इस तीव्र औद्योगिक एवं तकनीकी प्रगति में सामाजिक और नैतिक मूल्यों की बलि चढ़ती चली गयी। अपराध तेजी से बढ़े। एक तरफ गरीबी, भुखमरी एवं दूसरी ओर अपराधों का बाहुल्य, अराजकतावादी मनोवृत्ति का बढ़ना, यह सभी एक साथ हुआ। मनोरोगों, मनोविकारों का बाहुल्य इसी शताब्दी के अन्तिम तीन दशकों की देन है। छल−कपट, शोषण, व्यभिचार, काला-बाजारी, मुनाफाखोरी, जुआ, लाटरी आदि की कीमत पर तथा कथित प्रगति के लक्ष्य वैभव, विलासिता एक सीमित समुदाय को प्राप्त भी होने लगे। किन्तु इस प्रगति के साथ मानव समुदाय शान्ति, प्रफुल्लता, मानसिक आरोग्य वे वंचित होता चला गया।

सिगमण्ड फ्रायड जैसे मनोवैज्ञानिक इसी सदी में विकसित हुए जिन्होंने मानसिक उलझन व तनावों का मूल कारण यौन दमन को बताया। इस प्रतिपादन ने औद्योगीकरण जन्य बुराइयों के साथ यौन स्वेच्छाचार को भी जन्म दिया। इस प्रतिपादन से शेष बची वर्जनाएँ सामाजिक, नैतिक मूल्य भी ताश के महल की तरह ढह गए। कामूवाद−हिप्पीवाद इसी शताब्दी की उपज हैं। फ्रायड व उनके समकालीन वैज्ञानिकों की विचारधारा ने पश्चिम जगत के युवक−युवतियों की जीवन शैली में एक क्रान्ति ला दी। फलतः युवा समुदाय ने तमाम यौन और सामाजिक बंधनों के विरुद्ध बगावत कर दी और बिल्कुल स्वच्छन्द स्वतन्त्र जीवन जीना शुरू कर दिया। यही स्वच्छंद जीवन शैली बाद में सन् 1930 के लगभग “हिप्पीवाद” के रूप में विकसित हुई। अस्त−व्यस्त क्रियाकलाप, वेशभूषा, रहन−सहन अपनाना इन युवकों−युवतियों का फैशन बन गया। ये युवक ऐसी जीवन शैली अपनाने वालों को ही सच्चा, पुरुषार्थी, निर्भीक तथा−परम्परागत जीवनशैली अपनाने वालों को कायर, नपुंसक आदि नाम देकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करते रहे।

तत्कालीन अमेरिका सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगाने का कदम भी उठाया किन्तु उसे इसमें असफलता ही हाथ लगी। उल्टे इससे मद्यपान और नशे में झूमने वाले इन युवकों ने हत्या तथा खुलेआम अश्लील हरकतें करना और शुरू कर दिया। 1920 से 1959 के मध्य समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और चलचित्रों पर भी फ्रायड विचार-धारा का पूरा प्रभाव पड़ा और इस अवधि के ये सारे माध्यम रोमांस, प्रेम कथा प्रसंगों यौन अपराधों आदि की खबरों, दृश्यों से भरे रहे। परिणाम स्वरूप स्वच्छन्द सम्भोग, रोमांस की लहर बड़ी तेजी से सारे पश्चिमी युवा समुदाय में फैलने लगी।

शीघ्र ही इस यौन स्वच्छन्दता के वीभत्स दुष्परिणाम आने शुरू हो गए। सन् 1930 में अमेरिका की एक मेट्रॉपालिटन लाइफ इन्श्योरेन्स कम्पनी ने वहाँ की एक प्रसिद्ध पत्रिका में अपनी ओर से पूरे पेज का एक विज्ञापन छपवाया। जिसमें बड़े−बड़े शब्दों में यह चेतावनी छपी थी−‘‘सावधान! मानवता की सबसे बड़ी शत्रु− ‘सिफीलिस’। एक भयावह यौन रोग है। अमेरिका तथा कनाडा में प्रत्येक दस में से एक व्यक्ति इससे ग्रसित पाया गया है। सिफीलिस एक भयानक छुआछूत का रोग होता है जिसके दुष्प्रभाव यौन अंगों के अलावा चमड़ी के रोगों, हृदय, आँख, फेफड़े तथा स्नायुविक रोगों के रूप में भी प्रकट होते व अन्ततः अकाल मृत्यु की ओर ले जाते हैं। तब प्रकाशित एक मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका के कई अस्पतालों में भर्ती कुल मरीजों में 30 प्रतिशत से भी अधिक रोगी किसी न किसी रूप में सिफीलिस रोग से ग्रसित पाये गये थे। लेकिन इतने भयानक परिणाम भी आने वाले अन्य अनेकों दुष्परिणामों की पूर्व भूमिका मात्र थे। यौन क्रांति के विस्फोट की यह एक झाँकी भर थी।

इसके कुछ ही दिनों बाद सन् 1941 में एक विवादास्पद शिक्षा शास्त्री जॉन डिवे ने एक नया मत प्रतिपादित किया कि नैतिकता नाम की कोई चीज नहीं है। आधुनिक मनुष्य अपने जीवन का लक्ष्य वैज्ञानिक प्रयोगों तथा स्वयं के मानवीय अनुभवों के आधार पर प्राप्त कर सकता है, नीतिगत मान्यताओं, मर्यादाओं से हमें बँधने की कोई जरूरत नहीं है। जॉन डिवे की इस विचारधारा से पश्चिम के तत्कालीन अधिकांश शिक्षा शास्त्री, स्कूल व कालेज अधिकारी अधिष्ठाता बहुत प्रभावित हुए और उक्त मान्यता को उन्होंने अपने−अपने क्षेत्र में व्यावहारिक रूप देना शुरू कर दिया। इस कदम ने स्वच्छन्द होते तत्कालीन पश्चिमी युवक समाज को एक नयी गति दे दी। लगभग इसी समय चल रहे द्वितीय विश्वयुद्ध में पश्चिम के पुरुष बड़ी संख्या में व्यस्त हो गये तथा अपने परिवारों से दूर हो गए। तब पहली बार घर की व्यवस्था को सम्भालने के लिए महिलाओं ने घर के बाहर काम करने के लिए कदम रखा। काम के लिए महिलाओं के बाहर निकलने से बड़ी संख्या में छोटे बच्चे माँ के प्यार देखभाल से वंचित होकर अनुशासन हीन स्थिति में पलने लगे। प्रकारान्तर से महिलाओं के इस कदम ने भी खुले यौन सम्बन्ध, दाम्पत्यच्युति तथा बड़े होते युवकों में सामाजिक बगावत, अनुत्तरदायित्व, परिवार विग्रह जैसे दुष्परिणाम उत्पन्न करने में परोक्ष सहायता की। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद स्वच्छन्द यौनाचार के विस्फोटक रूप को तत्कालीन गुप्त रोगों के आंकड़े के रूप में देखा जा सकता है।

इस सबके मिश्रित दुष्परिणाम 1950 में लगभग बड़ी संख्या में किशोर अपराध, पारिवारिक विघटन, पलायनवाद, अवैध यौनाचार, यौन रोग, उत्तरदायित्व की उपेक्षा, बड़ों की अवमानना, तिरस्कार आदि के रूप में सामने आने लगे। सन् 1963 में अमेरिका की एक प्रसिद्ध तथा बड़ी संख्या में बिकने वाली पत्रिका ‘लुक’ ने अमेरिका में नैतिकता पर गहन खोज के बाद उसके परिणाम कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किये− ‘इस समय अमेरिका में मुश्किल से एक-दो व्यक्ति ही ऐसे होंगे जिन्हें कौन-सा कृत्य नैतिक है और कोन-सा अनैतिक यह मालूम हो। बड़े आश्चर्य का विषय है कि इस समय सारे पश्चिमी जगत में नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाला एक भी संगठन या संस्था नहीं है।’ अन्त में पत्रिका के सम्पादक ने अपना एक संक्षिप्त नोट छापा कि− ‘पूरा अमेरिका व यूरोप सही और गलत के अज्ञात के कुहासे से ढका हुआ है और नैतिकता का ह्रास देश की एक प्रमुख तथा भयावह दुष्परिणाम उत्पन्न कने वाली समस्या है।’

बढ़ती हुई सम्पन्नता से जहाँ माता-पिता क्लब, पार्टी आदि के रूप में उपभोग में लग गए, वहीं युवाओं को भी साधनों तथा पैसों से खेलने की इतनी खुली छूट मिली, जितनी कि पहले कभी नहीं मिली थी। इस सबके परिणाम लगभग सभी पश्चिमी विश्व के देशों में बड़ी तेजी से मनमुटाव, यौन अपराध, बलात्कार, तलाक एवं हिप्पीकाय आदि के रूप में सामने आए।

स्वीडन की 1960 में प्रकाशित एक सामाजिक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार स्वीडन की दो तिहाई महिलाएँ विवाह से पूर्व ही गर्भवती हो चुकी होती हैं, अधिकाँश विवाह के दिन भी गर्भवती ही रहती हैं। चूँकि पुरुष भी समान रूप से इसके लिए उत्तरदायी है, अतः उन्हें यह सब अटपटा भी नहीं लगता। वे इसे सहज रूप में ले रहे हैं।

स्वच्छन्द यौनाचार को मिली−खुली सामाजिक छूट ये यौन विकृति की एक और घृणित दिशा समलेंगिक यौन सम्बन्ध (होमोसेक्सुएलिटी) में कदम रखा। सन् 1960 के अन्तिम वर्षों में अधिकांश पश्चिमी देशों में होमोसेक्युएलिटी’ का बड़ी तेजी से जोर पकड़ना शुरू हुआ। अब तो कई देशों में इस अनोखी जीवन शैली को कानूनी मान्यता भी मिल चुकी है। तथा कई बड़े−बड़े शहरों में ऐसे लोगों की अलग से बड़ी−बड़ी कालोनियां हैं। अभी भी यह एक फैशन के रूप में भी पश्चिम देशों के उच्च विकसित समाज, अरब राष्ट्रों आदि में प्रचलित है। यदि बात यहीं तक रहती तो इसे नैतिक आन्दोलनों द्वारा मिटाया अथवा अन्यान्य देशों व समाजों में फैलने से रोका जा सकता था। किन्तु प्रकृति कभी अपनी अनुशासन व्यवस्था में उल्लंघन स्वीकार नहीं करती। समलेंगिकता की एक परिणति एक ऐसे असाध्य रोग के रूप में 1980 के दशक के रूप में उभर कर आयी है जो कैंसर से भी अधिक घातक व शीघ्र प्राण लेने वाला रोग है। ए. आई. डी. एस. (एक्वायर्ड इम्यूनोडेफिशिएन्सी सिन्ड्रोम) नामक इस रोग में जीवनी शक्ति 3 से 5 माह के अन्दर छूँछ हो जाती है, शरीर गल जाता है व कष्ट साध्य मृत्यु हो जाती है। यह रोग एक देश विशेष तक ही सीमित होकर नहीं रह गया है द्रुतगामी जेट विमानों ने अब सभी राष्ट्रों को समीप ला दिया है− अतः अप्राकृतिक यौनाचार के अतिरिक्त रोगियों के ब्लड ट्राँस फ्यूजन उन्हें लगाए गये इन्जेक्शन की सुई व एरोसोल्स (हवा के कणों) द्वारा भी यह अब अविकसित एवं विकासशील देशों में तेजी से फैल चुका है।

इन सबमें आग में घी की तरह काम किया है− रेडियो, टी. वी., फिल्मों, वीडियो द्वारा अश्लील विज्ञापनों एवं ब्लू फिल्मों के जहर ने। यह जहर अब बढ़ता ही जा रहा है। फलतः स्कूल में प्रवेश करने वाले भावी समाज के कर्णधार भी इसकी लपेट में आ रहे हैं।

जेनाइटल हर्पीस तथा ‘एन्टीवायोटिक रेसिस्टेण्ट गोनोरिया’ जैसे दो दर्जन से अधिक अन्य संक्रामक असाध्य यौन रोग बड़ी तेजी से फैल रहे हैं। जिन्हें अब नियन्त्रण के बाहर माना जाने लगा है।

अमेरिका की एक स्वास्थ्य संस्था के अनुसार होमोसेक्सुअल कम्यूनिटी के लोगों में 75 प्रतिशत से अधिक लोग इन बीमारियों से ग्रसित पाए गए। यह रोग उन महिलाओं व बच्चों में भी संव्याप्त पाये जाते हैं जो ऐसे रोगी से किसी रूप में सम्बन्धित हैं। वस्तुतः यौन रोगों का यह संक्रामक ज्वार अपनी चपेट में दो तिहाई से अधिक युवा पीढ़ी को ले चुका है। आधुनिकता की यह एक बहुत बड़ी कीमत समाज को चुकानी पड़ी है।

यही नहीं सन् 1360 व 1380 के मध्य हिप्पी मूवमेन्ट बहुत तेजी से विकसित हुआ है। फ्रायड के नये प्रतिपादनों से प्रेरणा लेकर प्राकृतिक जीवन की और लौटने के नाम पर यह अभियान आरम्भ किया गया था इसे वीटल्स व रजनीशवाद ने और भी भड़काया व विकृत रूप दे डाला है। इस अभियान के अंतर्गत हजारों युवक युवतियाँ प्राकृतिक भोजन, प्राकृतिक प्रजनन, प्राकृतिक शिशु पालन पोषण (माँ के दूध के आधार पर) के स्थान पर फ्री सेक्स (स्वच्छन्द यौन सम्बन्ध) नशीली दवाओं का उपयोग तथा सामूहिक निवास आदि की नई जीवन शैली अपनाने लगे हैं तथा इसे ही प्राकृतिक जीवन की ओर लौटने का एक कदम समझने लगे हैं। बाद में इस अभियान ने ‘यूनीसेक्स’ के नाम से एक और विकृत रूप धारण किया। ‘यूनीसेक्स’ एक फैशन के रूप में प्रसिद्ध हो गया। इसके अंतर्गत युवकों ने महिलाओं जैसे बाल रखना तथा युवतियों ने युवकों जैसे कपड़ा पहनना शुरू कर दिया। कुल मिलाकर युवक युवती जैसे और युवतियाँ युवकों जैसे स्वयं को दिखाने के नए फैशन को बड़ी तेजी से अपनाने लगे। इसमें यौन वर्जनाओं का स्पष्ट उल्लंघन था।

इसके बाद के उतार-चढ़ाव और भी अधिक विडंबना भरे हैं स्वच्छन्द जीवन जीने की ओर बढ़ते इस प्रकार के अनेक कदमों को मिली मौत सामाजिक स्वीकृति 1970 और 1980 के दशक में ‘वाइफ स्वैपिंग’ अभियान के रूप में परिणति हो गयी। इन दो दशकों में वैवाहिक जीवन की जितनी उपेक्षा और अवमानना हुई वह पहले कभी नहीं हुई थी। इस दौरान हजारों की तादाद में पारिवारिक विग्रह हुए तथा जो नए परिवार बसे वे विवाह की मर्यादाओं के आधार पर नहीं, बल्कि बिना विवाह के ‘‘जब तक मन मिले, तब तक साथ रहने’’ के थोथे सिद्धांत पर बसने शुरू हुए। कुछ समाजशास्त्रियों ने भी इस सामयिक समझौते के रहन−सहन को पारिवारिक वैवाहिक बन्धन से श्रेष्ठ बताकर सारे समाज की ओर से एक मोहर लगा दी।

नारी स्वातंत्र्य आँदोलन ‘वूमेन्स लिबरेशन मूवमेंट’ जिसने पश्चिम देशों के लाखों परिवारों को, बरबाद कर दिया, लाखों बच्चों को तबाह कर दिया, वस्तुतः स्वच्छन्द जीवन शैली की ओर महिलाओं के बढ़ते हुए आकर्षण का ही एक दुष्परिणाम है। पारिवारिक जीवन में इसका गहरा दुष्प्रभाव लाखों परिवारों करोड़ों लोगों द्वारा अनुभव किया गया और किया जा रहा है। इसका अन्दाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस अभियान के जो प्रारम्भिक प्रबल समर्थक और अग्रदूत थे वे ही इससे इतना संत्रस्त हो गए हैं कि अब पुनः संयुक्त परिवार की माँग करने लगे हैं।

इसी अमर्यादित यौन स्वच्छन्दता के दुष्परिणाम कई करोड़ों अजन्मे शिशुओं की हत्या करने वाले गर्भपात के रूप में सामने आए हैं और आते जा रहे हैं। जैसे−जैसे नये शिशु पैदा हो रहे हैं, वैसे−वैसे उनमें अवैध शिशुओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। पश्चिमी देशों के कुछ बड़े शहरों में इस प्रकार के अवैध शिशुओं अर्थात् विवाह से पूर्व ही बच्चों के जन्म की संख्या कुल शिशु जन्म संख्या की आधे से भी अधिक पायी गयी है।

1980 का दशक एक और बुरे व्यसन, मद्यपान तथा अन्य घातक नशों के आदी लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि के लिए भी याद किया जाता रहेगा। एक रिपोर्ट के अनुसार इस दशक में प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक लोग शराब के बुरी तरह आदी (व्यसनी) हुए और इसी की मदहोशी में लगभग इसी संख्या में लोग अनेक बीमारियों अपराधों तथा अकाल मृत्यु के शिकार हुए।

‘यूनाइटेड स्टेट्स फैकल्टी आफ ड्रग एव्यूज’ के डायरेक्टर विलियम पोलिन के अनुसार ‘‘मात्र अमेरिका में पिछले 20 वर्षों की अवधि में नशीली दवाओं की खपत में अत्यन्त तेजी से वृद्धि हुई है जो मात्र 100-200 प्रतिशत नहीं बल्कि पूरे 3000 प्रतिशत की वृद्धि है।’’

इस प्रकार प्रथम विश्वयुद्ध के बाद पिछले पैंसठ वर्षों में सर्वतोमुखी विकास, प्रगति व सुख−सम्पन्नता से भरा जीवन प्रदान करने के दावे के साथ जो औद्योगिक और वैज्ञानिक क्रान्ति शुरू की गई थी तथा सिगमंड फ्रायड के क्रान्तिकारी प्रतिपादन के आधार पर मानवी मस्तिष्क को स्वस्थ तथा तनावमुक्त रखकर खुशहाल सामाजिक जीवन जीने की जो कल्पना की गई थी उसमें लगातार निराशा ही हाथ लगी है। उल्टे जिन मान्यताओं को प्रगति व शान्ति का आधार माना गया था उन पर चलने से सुख शान्ति और सामाजिक जीवन का पूरा ढाँचा लगभग पूरी तरह धराशायी अवश्य हो गया है। प्रगति के नाम पर नैतिक और सामाजिक मूल्यों की दृष्टि से समाज इतना नीचे गिर चुका है जिसकी तुलना में प्रगति जन्य उपलब्धियाँ बहुत नगण्य प्रतीत होती हैं।

यदि कहा जाय कि प्रगति की तथाकथित सीढ़ियों ने मानव जाति को पतन के गर्त में धकेलने में ढलान का काम किया है तो अतिशयोक्ति न होगी। समय का तकाजा है कि मनुष्य अभी भी संभले व समाज के ढाँचे को बदले। इसे किसी सीमित समुदाय में नहीं वरन् सारी संस्कृतियों के परिप्रेक्ष्य में बदलना होगा। नैतिकता की कीमत पर आदर्शों की बलि देकर आधुनिकता किसी भी कीमत पर स्वीकारी नहीं जा सकती। जो मन−मस्तिष्क स्वच्छन्दवाद के नाम पर उच्छृंखलता में लिप्त हो गए, उन्हीं को वापस नयी दिशा दी जा सकती है, विचार परिवर्तन कर नव सृजन में जुटाया जा सकता है। आन्दोलन के प्रवाह को नयी दिशा व नया चिंतन भर देना है। जैसे परिवर्तन इस शताब्दी में पूर्व में देखने को मिले हैं, उन्हें दृष्टिगत रख उत्साहपूर्वक यह कहा जा सकता है कि यह असम्भव नहीं।




Quotation - Akhandjyoti March 1985

मनः प्रभादार्द्बधन्ते दुःखानि गिरे कुटवत्। तद्वशा देव नश्यन्ति सूर्यस्याग्रे हिमं यथा॥

अपने मन के प्रमाद से ही संसार में समस्त दुःख पर्वत की चोटी के समान बढ़ जाया करते हैं। अपने मन की विवेकशीलता होने पर वे सारे दुःख ही ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य की धूप से बर्फ गल कर नष्ट हो जाया करती है।




क्या तीसरा विश्व युद्ध सन् 1985 में होगा? - Akhandjyoti March 1985

कुछ समय पूर्व ब्रिटिश जनरल वी. ए. शैट की एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी ‘नैक्स्टवार’। उसमें सन 1914 के प्रथम और 1916 में द्वितीय विश्व युद्ध की चर्चा करते हुए लिखा है कि तीसरा विश्व युद्ध सन् 1985-86 होने की सम्भावना है।

उसका कारण उन्होंने अमेरिका और रूस की युद्ध तैयारियों की चरम सीमा तक पहुँच जाने को बताया है। उनके अनुसार तब तक शीतयुद्ध की शतरंज इस स्थिति में पहुँच जायेंगी जिसमें से किसी को भी पीछे हटना सम्भव न होगा।

अब तक कई अवसर ऐसे आये जिन पर विश्वयुद्ध छिड़ सकता था। किन्तु परिपूर्ण तैयारी के अभाव में दोनों ही पक्ष कन्नी काटते रहे और उस समय की प्रतीक्षा करते रहे जब उन्हें परिपूर्ण तैयारी के अभाव में मात न खानी पड़े। किन्तु अब वह समय निकट आ गया दिखता है। दोनों पक्षों द्वारा लड़ाकू स्वर अपनाए जा रहे हैं।

गत वर्ष 13 मार्च को एक टेलीविजन प्रसारण में अमेरिकी प्रेसीडेन्ट रीगन ने वैज्ञानिकों ने नाम एक प्रसारण किया था। जिसमें आह्वान किया गया था कि किसी भी प्रक्षेपणास्त्र को उसके स्थापना स्थान पर ही निरस्त करने का उपाय ढूंढ़ निकालें। इनका इशारा लेसर किरणों से सम्बन्धित किसी आक्रामक शक्ति को हस्तगत करने का था। तब से लेकर अब तक इस सम्बन्ध में अनेकों प्रयोग परीक्षण हो चुके हैं और यह अनुमान लगाया जा रहा है कि आकाश युद्ध के द्वारा शत्रु पक्ष को परास्त करके विश्व विजेता बना जा सकता है या नहीं?

उस घोषणा से सभी के कान खड़े हुए हैं और अपने अपने बचाव तथा उस तृतीय युद्ध से मिलने वाले लाभों का अनुमान लगा रहे हैं। रूस भी इस प्रतिद्वन्द्विता में पीछे नहीं है उसने उत्तेजक घोषणाएँ तो नहीं की पर परिस्थितियों को समझा और अधिक तत्परता से तैयारी की गति बढ़ा दी है। होड़ मूलतः इन दो महाशक्तियों में ही है।

सोवियत संघ के प्रधानमंत्री ने उस वक्तव्य के संदर्भ में इतना ही कहा कि रीगन रूस को असुरक्षित कभी नहीं पायेंगे और ऐसा समय कभी नहीं आयेगा जब वे सोवियत संघ को परास्त कर सकें।

तब से लेकर अब तक दोनों पक्षों की तैयारियाँ कहीं अधिक बढ़ गई हैं और शीतयुद्ध के इतने मोर्चे खुल गये हैं। जिनमें से किसी पर भी तीसरा युद्ध छिड़ सकता है।

पुस्तक के नये संस्करण में उन तैयारियों की भी चर्चा की है जिनसे युद्ध की सम्भावना अधिक ही बढ़ी है। लेखक का कथन है कि युद्ध क्षेत्र आकाश न होकर अटलाण्टिक महासागर होगा। क्योंकि उससे आक्रमणकारी को पराजित कर क्षेत्र और वैभव अधिक मात्रा में हाथ लगने की सम्भावना है।

अब तीसरी संभावना रासायनिक युद्ध की सामने आई है उससे शत्रु पक्ष अपंग तो होता है, पर धन संपत्ति ज्यों की त्यों हाथ लग सकती है। ऐसे रासायनिक युद्ध का परीक्षण रूस और अमेरिका की ओर से वियतनाम क्षेत्र में कुछ समय पहले हो चुका है। जर्मनी अपने समय में इसका प्रयोग पहले ही कर चुका था। इसका स्वरूप क्या हो सकता है, इसकी एक हल्की-सी झाँकी भारतवासियों ने भी भोपाल गैस काण्ड के समय कर ली है।

विश्व में विभिन्न राष्ट्रों में बढ़ते आपसी तनाव ने शीतयुद्ध का रूप ले लिया है। इन युद्धों में लेसर किरणों अणु परमाणु और न्यूट्रान बमों के अतिरिक्त ध्वनि और रासायनिक अस्त्रों का इस्तेमाल खुलेआम होने लगा है। रूस, अमेरिका, फ्रांस जैसे देशों ने रासायनिक अस्त्रों के इतने ढेर जखीरे जमा कर लिए हैं जिससे भूमण्डल को सैकड़ों बार जीवन हीन बनाया जा सकता है। रासायनिक युद्ध का ताजा उदाहरण 13 फरवरी 1982 में वियतनाम द्वारा कम्पूचिया पर किये गये आक्रमण से ज्ञात हुआ है। अमेरिका के सुप्रसिद्ध अनुवांशिक विद् मैथ्यू मेसेल्सन ने युद्ध से प्रभावित लोगों के रक्त परीक्षण विश्लेषण करने पर पाया कि इन लोगों के रक्त में फंगल पाइजन टी-2 और उससे व्युत्पन्न एच टी-2 जैसे घातक विष अधिक मात्रा में रुधिर में विद्यमान हैं। मैथ्यू मेसेल्सन हार्वर्ड विश्वविद्यालय में आर्म्स कण्ट्रोल एजेन्सी और यू. एस. डिपार्टमेन्ट आफ डिफैन्स, आन मैटर्स आफ केमिकल एण्ड बायलाजिकल वारफेयर’ के सलाहकार हैं। उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा है कि आक्रमण के 18 दिन बाद तक रक्त में इस तरह के विष टी-2 का बना रहना आश्चर्य का विषय है। क्योंकि विष टी-2 12 से 24 घंटे के अन्दर अपने अन्य घटकों में टूट जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि जिन रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया गया, वे अत्यधिक विषैले, शक्तिशाली तथा आत्यन्तिक मात्रा में थे।

अमेरिका द्वारा वियतनाम में प्रयोग किये गये रासायनिक अस्त्रों के कारण कई अपंग बच्चे पैदा हो गये हैं। वियतनाम में पर्यावरण पर भी दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। अमेरिकी पत्रिका ‘साइंस’ में छपी एक रिपोर्ट में ये रहस्योद्घाटन किये गये हैं।

अमेरिका ने दक्षिणी वियतनाम में रासायनिक अस्त्रों का ज्यादा इस्तेमाल किया था। इसलिए इस क्षेत्र में अधिक अपंग बच्चे पैदा हो रहे हैं। अधिसंख्य बच्चों के हाथ−पैर और कान−नाक ठीक नहीं पाये गये।

जिन पुरुषों ने युद्ध में भाग लिया था, उनकी पत्नियों को गर्भपात की शिकायत होने लगी। यदि गर्भ बच गया तो बच्चे असामान्य हुए।

रिपोर्ट में कहा गया कि अमेरिकी रासायनिक युद्ध के कारण पर्यावरण इतना बुरी तरह प्रभावित हुआ कि उसके सामान्य होने में पीढ़ियां लग जायेंगी। पेड़ों की शक्लें बदल गयीं। फलों का जायका बदल गया। अमेरिका ने राष्ट्रवादी छापामारों की तलाश में जंगलों को नष्ट कर दिया था। इससे जानवरों की संख्या कम हो गयी। मत्स्य उद्योग भी नष्ट हो गया।

अमेरिका ने 1961 और 1971 के बीच सुनियोजित ढंग से 720 लाख लीटर रसायन दक्षिण वियतनाम पर छोड़ थे। इसके बाद यही प्रयोग मध्य पूर्व एशिया एवं अफगानिस्तान में भी हुए हैं।

इन घटनाक्रमों को देखते हुए रासायनिक युद्ध प्रथम आक्रमण करने वाले के लिए सस्ता और लाभदायक प्रतीत होता है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि भावी युद्ध भी इसी रूप में होगा? क्योंकि तैयारियाँ दोनों ही ओर से ऐसी हो रही हैं जिन्हें देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि भावी युद्ध का रूप धरती पर, समुद्र में या आकाश में कहाँ होगा? क्योंकि तैयारियाँ तीनों ही प्रकार की हो रही हैं और उन पर अपार धन खर्च किया जा रहा है।

आज प्रति व्यक्ति 110 डालर हथियारों के लिए खर्च हो रहा है। कुल व्यय का 1/15 भाग ही विकासशील देशों के लिए निकाला जाता है। यू. एन. ओ. की 1981 की रिपोर्ट के अनुसार हथियारों से 25 अरब शुद्ध लाभ अर्जित किए गए, जिसका 55 प्रतिशत व 40 प्रतिशत अंक क्रमशः नाटो तथा वारसा सन्धि वालों के मध्य वितरित हुए। इसी अवधि में सैनिक अनुसंधान विकास पर 35 अरब डालर व्यय हुए जिसका 1/6 भाग ही ऊर्जा, स्वास्थ्य तथा कृषि पर व्यय किया जाता है। धन ही नहीं विश्व उत्पादन का एक बड़ा भाग यही विभाग सोख लेता है। जैसे सम्पूर्ण ताँबे का 11 प्रतिशत, शीशा 8 प्रतिशत, एल्युमीनियम, निकल, सिल्वर, जिंक तथा तेल सभी 6 प्रतिशत।

‘नैक्स्टवार’ के प्रणेता ने सन् 1985 में तीसरे महायुद्ध की सम्भावना सन् 1985 के अन्त में व्यक्त की है। इसके पीछे उनकी समस्त जीवन में राजनैतिक उतार चढ़ावों को देखने और किसी निष्कर्ष पर पहुँचने जैसी बात है। इसे किसी भविष्यवक्ता की भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता है, न उसे सुनिश्चित ही कहा जा सकता है।




Quotation - Akhandjyoti March 1985

तमेव विद्वान न विभाय मृत्योः। −ऋग्वेद

उस आत्मा को जान लेने वाला मनुष्य मृत्यु को जीत लेता है।




भगवद् भक्ति में दुराग्रह कैसा? - Akhandjyoti March 1985

कल जन्माष्टमी का उत्सव था। आज राधा गोविन्द जी के मन्दिर में नन्दोत्सव है। दक्षिणेश्वर के काली मन्दिरों की सजावट आज देखते ही बनती है। भक्तजनों के झुण्ड के झुण्ड गोविंद जी के दर्शनों के लिये आ रहे हैं। कीर्तन अपनी चरम सीमा पर है। भक्ति रस की धारा प्रवाहित हो रही है।

दोपहर के भोग के पश्चात् गोविन्द जी के विग्रह को शयन के लिये भीतरी प्रकोष्ठ में ले जाते समय पूजक क्षेत्रनाथ का पाँव फिसल जाने से रंग में भंग हो गया। वह मूर्ति सहित फर्श पर जा गिरे, जिससे मूर्ति का एक पाँव टूट गया। भक्ति रस की धारा मन्द पड़ गयी उसके स्थान पर भय और आशंका के मेघ मंडराने लगे। मन्दिर में बड़ा कोलाहल मच उठा। अपने−अपने मन से सभी भावी अमंगल की सूचना दे रहे थे। सबके चेहरों पर भय की रेखायें खिंच गयीं। निश्चय ही कोई सेवा अपराध हुआ है। उसका दण्ड अमंगल के रूप में सबको भोगना होगा।

रानी रासमणी ने सुना तो वह एक दम सिहर उठी। अब क्या होगा। किन्तु जो कुछ हो चुका था, उसे टाल सकने की सामर्थ्य किस में थी। अब क्या किया जाय, इसके लिये पण्डितों की सभा बुलायी गयी। पण्डित लोगों ने ग्रन्थ देखे सोच−विचार किया और यह विधान दिया भग्न विग्रह को गंगा में विसर्जित करके उसके स्थान पर नयी मूर्ति की स्थापना की जाय।

रानी रासमणी को पंडितों का यह निष्ठुर विधा रुचा नहीं किन्तु उसके हाथ की बात भी क्या थी। ब्राह्मणों की संपत्ति को टालना उसके बस में कहाँ था। निदान नयी मूर्ति बनवाने का आदेश दे दिया गया। रानी उदास हो गयी। भला इतनी श्रद्धा और प्रेम से जिन गोविंद जी को इतने दिन पूजा जाता रहा, उन्हें थोड़ी-सी बात पर जल में विसर्जित कर देने का कारण उसकी समझ में नहीं आया।

जमाता मधुरबाबू रानी की इस उदासी का ताड़ गये। उन्होंने सम्मति दी− ‘रानी माँ क्यों न इस विषय में छोटे भट्टाचार्य (स्वामी रामकृष्ण परमहंस) की राय जान ली जाय?

रानी स्वामी रामकृष्ण पर विशेष श्रद्धा रखती थीं। उनकी अनूठी निष्ठा व भक्ति के कारण वे उनके द्वारा दिये जाने वाले निर्णय को स्वीकार करने की स्थिति में भी थीं। रानी ने अपने मन की व्यथा रामकृष्ण से कह सुनायी। सुनकर उन्होंने रानी से प्रश्न किया−यदि आपके जमाताओं में से किसी एक का पाँव टूट जाता तो वह उनकी चिकित्सा करवातीं या उनके स्थान पर दूसरे को ले आतीं?

‘मैं अपने जमाता की चिकित्सा कराती, उन्हें त्याग कर दूसरे नहीं ले आती।

‘बस उसी प्रकार विग्रह के टूटे पैर को जोड़कर उसकी सेवा-पूजा यथावत् होती रहे तो उसमें दोष ही क्या है।’

श्री रामकृष्ण परमहंस के इस सहज विधान को सुन कर रानी हर्षित हो उठीं। यद्यपि उनकी यह व्यवस्था ब्राह्मणों के मनोनुकूल नहीं थी। उन्होंने उसका विरोध भी किया पर अब रानी का धर्म संकट समाप्त हो चुका था। उसे स्वामी जी की बात ही पसन्द थी। उसने ब्राह्मणों के विरोध की चिन्ता नहीं की। स्वामी जी ने टूटे विग्रह के पाँव को ऐसा जोड़ दिया कि कुछ पता ही नहीं चलता। पूजा−सेवा उसी प्रकार चलती रही।

एक दिन किन्हीं जमींदार महाशय ने उनसे पूछा− मैंने सुना है आपके गोविन्द जी टूटे हैं। इस पर वे हँसकर बोले− ‘आप भी कैसी भोली बातें करते हैं, जो अखण्ड−मंडलाकार हैं, वे कहीं टूटे हो सकते हैं।




विधेयात्मक चिन्तन और स्वास्थ्य सुधार - Akhandjyoti March 1985

प्रत्यक्षतः मन का कार्य विचार करना, चिन्तन करना है। इन विचारों की अनवरत यात्रा अपने स्वरूप भेद के अनुसार समस्त मानव शरीर को प्रभावित करती हैं। आमतौर से चिन्तन का स्वरूप विधेयात्मक भी हो सकता है और निषेधात्मक भी। विधेयात्मक अर्थात् उच्चस्तरीय व प्रगतिशील चिन्तन। तद्नुरूप वह मन को प्रफुल्लित तथा शरीर को दीर्घकाल तक स्वस्थ समर्थ बनाये रखता है। दूसरे तरफ निषेधात्मक चिन्तन अर्थात् अधोगामी, अस्त−व्यस्त व निकृष्ट विचारधारा। अतः उसका प्रभाव भी मानसिक विक्षिप्तता, तनाव तथा शारीरिक रोगों के रूप में देखा जा सकता है।

दुनिया भर के चिकित्सकों ने अब इस बात को भी स्वीकारा है कि मानसिक तनाव का कैंसर से सीधा सम्बन्ध है। खोज से यह प्रमाणित हुआ है कि अवसादग्रस्त मनःस्थिति के कारण शरीर में ऐसे हारमोन्स स्रवित होते हैं, जो शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता को क्षीण बना देते हैं।

नवीनतम खोजों के आधार पर मानसिक असन्तुलन तथा तनावग्रस्तता का प्रभाव दुःस्वप्नों के रूप में प्रकट होते भी देखा जा रहा है। ऐसे स्वप्नों में प्रायः व्यक्ति अपने को भीषण विपत्ति में फँसने, कुचल जाने, सिर के दो भाग हो जाने, अंग−भंग होने, विभिन्न अंगों के कट−कट कर गिरने, दम घुटने या कभी−कभी स्वयं की मृत्यु होने की घटना का अनुभव करता है।

भारतीय तत्त्वदर्शियों ने भी मानव की समस्त आधि−व्याधियों का मूल कारण मानसिक विकृतियों को बतलाया था। वैसे तो साँख्य दर्शन में आदि−व्याधियों के तीन प्रकार−आध्यात्मिक, आधि−भौतिक और आधि−दैविक बतलाये गये हैं। इसके अनुसार आध्यात्मिक विकृतियाँ हमारे व्यक्तिगत चिन्तन से, आधि भौतिक पारिवारिक व सामाजिक परिस्थितियों से तथा आधिदैविक प्राकृतिक प्रकोपों से सम्बन्धित हैं। परन्तु वस्तुतः इन तीनों का सम्बन्ध मनःस्थिति से है। मन में उत्कृष्ट चिन्तन का प्रवाह निरन्तर चलता रहे तो किसी भी परिस्थिति में व्यक्ति अपना तालमेल बिठा सकता है तथा प्रगतिशील जीवन जी सकता है।

अरस्तू ने अपनी पुस्तक ‘साइकोड्रामा’ में प्राचीनकाल की मनो आध्यात्मिक चिकित्सा प्रणाली का उल्लेख किया है। उनके अनुसार मस्तिष्क एक पदार्थ रहित शक्ति है। उसको पवित्र बनाकर ही दुःखद स्थिति से मुक्ति पायी जा सकती है। उनके द्वारा बतायी विधि के अनुसार रोगी को उचित−अनुचित की दशा बताकर मनःचिकित्सकों ने काफी सफलता पायी तथा इसका प्रचलन काफी दिनों तक पूरे विश्व में चलता रहा।

ईसा से 500 वर्ष पूर्व ‘एपीडोरस के मन्दिर’ में मनो आध्यात्मिक चिकित्सा का प्रचलन आरम्भ हुआ था। उसके माध्यम से उनने अन्धा, बहरा, अपाहिज, अनिद्रा तथा अन्याय रोगों का सफल उपचार प्रस्तुत किया था तथा प्रसिद्धि प्राप्त की थी।

अन्य पद्धतियों की निरन्तर असफलता के बाद आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने भी मनःचिकित्सा प्रणाली की ओर कदम बढ़ाया है। इससे महत्वपूर्ण सफलता भी प्राप्त की जा रही है। बायोफीड बैक पद्धति इस प्रयास का अनुपम उदाहरण है। इसमें रोगी अपने रोगों के निवारणार्थ ध्यान, एकाग्रता व विधेयात्मक चिन्तन का सहारा लेता है। प्रकारान्तर से यही आत्मविश्लेषण की, आत्मावलोकन की चिन्तन−मनन की ज्ञानयोग प्रक्रिया है। जो आध्यात्मिक अनुशासनों में सम्पन्न कराई जाती है। मनोविकारों एवं शरीरगत रोगों से दूर रहना हो तो यही एकमात्र अवलम्बन है।




चमत्कारों से युक्त यह जीवनक्रम एवं उसका मर्म - Akhandjyoti March 1985

विगत साठ वर्षों की हमारी जीवनचर्या अलौकिक घटना प्रसंगों एवं दैवी सत्ता के मार्गदर्शन में संचालित ऐसी कथा गाथा है, जिसके कई पहलू ऐसे हैं जो अभी भी जन-साधारण के समक्ष उजागर नहीं किए जाना चाहिए। किन्तु पहली बार हमने अपने मार्गदर्शन के निर्देश पर अपनी जीवन यात्रा के उन गुह्य पक्षों का प्रकटीकरण करने का निश्चय किया है, जिससे सर्वसाधारण को सही दिशा मिले। ऐसे कुछ प्रसंगों को पाठक पिछले अंक में पढ़ चुके हैं। क्रमशः धारावाहिक रूप में इसे प्रस्तुत करने के स्थान पर बुद्धि ने यह औचित्यपूर्ण निर्णय लिया कि प्रकट किए जाने योग्य जानकारी एक ही अंक में दे दी जाय। लंबी प्रतीक्षा पाठकों को न करनी पड़े, इसलिए आगामी अप्रैल अंक में हमने घटना प्रसंगों के साथ बचपन से अभी तक के वृतांत को एक आत्म-कथा के रूप मे लिखकर रख दिया है।

ऋद्धि-सिद्धियों के संबंध में सर्वसाधारण को अधिक जिज्ञासा रहती है। हमारे विषय में एक सिद्ध पुरुष की मान्यता जन मानस में बनती रही है। बहुत खण्डन करने एवं अध्यात्म दर्शन का सत्व सामने रखने पर भी यह मान्यता संव्याप्त है ही कि हम एक चमत्कारी सिद्ध पुरुष हैं। अब हमें इस बसंत पर निर्देश मिला है कि अपनी जीवन गाथा को एक खुली पुस्तक के रूप में सबके समक्ष रख दिया जाय, ताकि वे चमत्कारों एवं उन्हें जन्म देने वाली साधना शक्ति की सामर्थ्य से परिचित हो सकें।

ऋद्धियां एवं सिद्धियां क्या हैं, इस संबंध में हमारा दृष्टिकोण बड़ा स्पष्ट रहा है। वह शास्त्र सम्मत भी है एवं तर्क की कसौटी पर खरा उतरने वाला भी। हमारे प्रतिपादन के अनुसार योगाभ्यास एवं तपश्चर्या के दो विभागों में अध्यात्म साधनाओं को विभाजित किया जा सकता है। इनमें तपश्चर्या प्रत्यक्ष है और योगाभ्यास परोक्ष। तप शरीर प्रधान है और योग मन से संबंधित। इनके प्रतिफल दो हैं। एक सिद्धि, दूसरा ऋद्धि। शरीर से वे काम कर दिखाना जो आमतौर से उसकी क्षमता से बाहर समझे जाते हैं, सिद्धि के अंतर्गत आते थे। पुरातन काल में वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होती थी, नदी-नाले चार महीने तेजी से बहते रहते थे। पुल नहीं थे। नावों पर निर्भर रहना पड़ता था। उनके भी वेगवती हो जाने और भंवर पड़ने लगने पर नावों का आवागमन भी बंद हो जाता था। आवश्यक काम आ जाने पर तपस्वी लोग जल पर चलकर पार हो जाते थे वे वायु में भी उड़ सकते थे। शरीर को अंगद के पैर के समान इतना भारी बना लेना कि रावण सभा के सभी सभासद मिलकर भी उसे उठा न सके, इसी प्रकार की सिद्धि है। सुरसा का मुंह फाड़कर हनुमान को निगलने का प्रयत्न करना, हनुमान का उससे दूना रूप दिखाते जाना और अंत में मच्छर जितने लघु बनकर उस जंजाल से छूट भागना, यह सिद्धि वर्ग है। उससे शरीर को असामान्य क्षमताओं से सम्पन्न बनाया जाता है।

ऋद्धि आंतरिक है। आत्मिक है। साधारण मनुष्य मन को जिस सीमा तक ग्रहीत कर सकते हैं उसकी तुलना में अत्याधिक मनोबल का, इच्छा शक्ति का, भाव प्रभाव का का होना यह ऋद्धि है। शाप वरदान की क्षमता ऋद्धियों में आती है, और अतिशीतल क्षेत्रों में रह सकना, बिना अन्न जल के निर्वाह करना, आयुष्य को साधारण जनों की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ा लेना यह सिद्धि है। मनोबल जिसका जितना बढ़ा हुआ होगा वह दूसरों को अपनी प्रतिभा से उतना ही प्रभावित कर सकेगा। तपस्वी अपनी शारीरिक क्षमताओं में से स्थानान्तरण कर सकता है। परकाया प्रवेश और शक्तिपात यह सिद्धि स्तर की क्षमता है। ऋद्धि के अनुदान किसी के व्यक्तित्व, चरित्र एवं स्तर को ऊंचा उठा सकते हैं। जिसके पास जिसका बाहुल्य है उसकी के लिए यह संभव है कि अपनी विशेषता स्थिर रखते हुए भी दूसरों को अपने अनुदानों से लाभान्वित कर सके। पदार्थों का स्वरूप बदल देना, उसकी मात्रा का घटा बढ़ा देना यह सिद्ध पुरुषों का काम है। साधना पराक्रम से यह सब असम्भव भी नहीं है।

ऋद्धि−सिद्धियां कितने प्रकार की होती हैं? उन्हें किस प्रकार प्राप्त किया जाता है और फिर उनका प्रयोग उपयोग किस प्रकार किया जाता है? इसका विवरण योग ग्रन्थों, तन्त्रों तथा विज्ञजनों से हमने जाना एवं अनुभव भी किया है किन्तु इनका प्रयोग कभी प्रत्यक्ष रूप से नहीं किया। वस्तुतः इसकी आवश्यकता हमें कभी नहीं पड़ी। अपनी समस्त इच्छाएँ उसी दिन समाप्त हो गई, जिस दिन महान् मार्गदर्शन का साक्षात्कार हुआ। उस दिन के उपरान्त एक ही आशंका शेष है कि मार्ग दर्शक सत्ता का संकेत कब किस निमित्त मिले और उसे पूरा करने में तत्परता तन्मयता का कोई कण शेष न रहे।

आदेश जब भी मिलते हैं तब उन्हें पूरा करने के लिए जिस प्रकार के सहयोगियों की, साधनों की, सूझ−बूझ की आवश्यकता पड़ती है। वह हाथों−हाथ हमें उपलब्ध होती चली गयी। ऋद्धि−सिद्धियों की आवश्यकता इसी निमित्त पड़ सकती थी। वे शिर पर लदती तो व्यर्थ का अहंकार चिपकता और वह व्यक्तित्व को पतनोन्मुख बनाता। इसलिए अच्छा ही हुआ कि ऋद्धि−सिद्धियों की उपलब्धि के लिए उनके विधान एवं प्रयोग जानने के बावजूद प्रयोग की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जो अतिशय दुष्कर काम थे वे होते चले और उसे भगवान का आदेश या अनुग्रह कहकर अपनी ओर से मेहनत करने की−बयान करने की−अहन्ता लादने की आवश्यकता नहीं पड़ी। यह अच्छा ही हुआ। भविष्य के लिए अपनी कोई निजी योजना नहीं जिसके लिए सिद्धियों का संग्रह किया जाय। दिव्य आदेश आते हैं तो उनकी पूर्ति के लिए जो जितना अभीष्ट है वह उतनी मात्रा में−उसी समय मिल ही जाता है फिर व्यर्थ ही सिद्धि साधना के झंझट में क्यों पड़ें।

ऋद्धियां विशुद्ध आत्मिक होती हैं। उनका दूसरों को परिचय देने की आवश्यकता नहीं पड़ती। कोई उन्हें देख, समझ या जाँच भी नहीं पाता। हमें वे मिली हैं और गूँगे के गुड़ की तरह निरन्तर अनुभव करते हुए आनन्द मग्न रहने का अवसर मिल जाता है।

सिद्ध पुरुषों को स्वर्ग और मुक्ति का दैवी अनुदान मिलता है। स्वर्ग कोई स्थान या लोक विशेष है यह हमने कभी नहीं माना। स्वर्ग उत्कृष्ट दृष्टिकोण को कहते हैं। जो भी कृत्य अपने से बनता है उनमें उत्कृष्टता और आदर्शवादिता घोल लेते हैं। वे होते भी इसी स्तर के हैं। सर्वत्र ईश्वर की संव्याप्त की दृष्टिगोचर होती है। इसी आनन्द को स्वर्ग कहते हैं। वह हमें निरंतर उपलब्ध है। दुश्चिन्तन दुष्कर्म से स्पर्श ही नहीं होता, फिर नरक कहाँ से आये?

मुक्ति, भव−बन्धनों से होती है। वासना, तृष्णा और अहन्ता को भव सागर कहा गया है। लोभ को हथकड़ी, मोह को बेड़ी और गर्व को गले का तौक कहते हैं। जीव इन्हीं से बँधा रहता है। अपने शिर या गुरुदेव का निर्देशन और कार्यान्वयन ही इस प्रकार चढ़ा रहता है कि इन मानसिक शत्रुओं को बुलाने और उनके निमित्त कुछ करने की गुँजाइश ही नहीं रहती। मुक्ति के लिए दूसरों को मरने तक की प्रतीक्षा करनी होती होगी पर हमारे लिए जीवन और मरण एक जैसे हैं। जिन कारणों से जीवन प्रिय और अप्रिय लगता है वे भेदभाव जीवन साधना के साथ ही तिरोहित हो गये हैं।

ऋद्धि आन्तरिक होती है और स्वानुभूति तक ही उसकी सीमा है। आत्म−सन्तोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह यह तीन दिव्य अनुभव कहे जाते हैं। सो अपने को हर घड़ी होते रहते हैं। अभावों से असन्तोष होता है। कुकर्म भी आत्म-प्रताड़ना उत्पन्न करते हैं। दोनों में से एक का भी निमित्त कारण नहीं फिर असन्तोष कैसे उभरे। कर्तव्य और उसका परिपालन−महान के प्रति समग्र समर्पण इतना कर चुकने के बाद किसी को भी असन्तोष जन्य उद्वेग नहीं सहना पड़ता। हमें भी नहीं करना पड़ा है। अब तो शरीर की वृद्धावस्था के साथ-साथ कामनाओं का समाधान विवेक ही कर देता है। इसलिए न अभाव लगता है न असन्तोष।

लोक सम्मान दूसरी ऋद्धि है। इसके लिए हमें अलग से कुछ करना नहीं पड़ा। सच्चे मन से हमने हर किसी का सम्मान और सहयोग किया है। स्नेह और सद्भाव लुटाया है। जो भी संपर्क में आया उसे आत्मीयता के बन्धनों में बाँधा है। उसकी प्रतिक्रिया दर्पण की प्रतिछाया की तरह होनी चाहिए। प्रतिध्वनि की तरह भी। रबड़ की गेंद जितने जोरों से जिस ऐंगिल से मारी जाती है। उतने ही जोर से उसी ऐंगिल में वह लौट आती है। हमारा स्नेह और सम्मान दूसरों के मन से टकराकर ज्यों का त्यों वापस लौटता रहा है। हमने किसी को शत्रु नहीं माना। किसी के मन में अपने लिए दुर्भाव नहीं सोचा तो अन्य कोई किसी भी मनःस्थिति में क्यों न हो। हमें उसकी अनुभूति सद्भावनाओं से भरी−पूरी ही लगती है। जीवन बीतने को आया। कोई हमारे विरोधियों, शत्रुओं, अहित करने वालों के नाम पूछे तो हम एक भी नहीं बता सकेंगे। जिनने नासमझी में हानि पहुँचाई भी है उन्हें भूला−भटका−बाल−बुद्धि माना है। हर किसी का सम्मान हमने किया है और लौटकर लोक−सम्मान ही हमें मिला ही। किसी ने न भी दिया हो तो भी हमें उसे समीक्षा और हित कामना ही मानते रहे हैं।

तीसरी ऋद्धि है दैवी अनुग्रह। यह उच्चस्तरीय क्रिया−कलापों और उनकी सफलताओं से भी लगता है। इसके अतिरिक्त आकाश के तारे, पौधों पर लगे हुए फूल, बादलों से बरसते हुए जल−बिन्दु, हवा से हिलते पते, नदियों की लहरें, चिड़ियों का कलरव हमें अपने ऊपर दुलार लुटाते, फूल बरसाते दृष्टिगोचर होते हैं। देवता फूल तोड़ते, उनका वजन लादने और बरसाने का झंझट उछालने के जंजाल में क्यों पड़ेंगे। प्रकृति की हलचलों में, प्राणियों की चहल−पहल में, वनस्पतियों में जो सौंदर्य भरा−पूरा दिखता है वह हमारे संसार को फूलों से भर देता है।

हमें भीतर और बाहर से उल्लास और उत्साह ही उमँगता दिखता है। जीवन को उलट-पुलटकर देखने पर उसमें चन्दन जैसी सुगन्ध ही आती दीखती है। भूतकाल की ओर गरदन मोड़कर देखते हैं तो शानदार दिखती है। वर्तमान का निरीक्षण करते हैं तो उसमें भी उमँगें छलकती दीखती हैं। भविष्य की दूर−दृष्टि डालते हैं, प्रतीत होता है कि भगवान के दरबार में अपराधी बनकर नहीं जाना पड़ेगा। परीक्षा में अच्छे नम्बर लाने वाले विद्यार्थी और प्रतिस्पर्धा जीवन वाले खिलाड़ी की तरह उपहार ही मिलेगा।

हमारी आत्मा ने हमें कभी बुरा नहीं कहा। तो दूसरे भी क्यों कह सकेंगे। जो कहेंगे तो अपनी व्याख्या अपने मुँह कर रहे होंगे। हमें अपनी प्रशंसा करने और प्रतिष्ठा देने को ही मन करता है। ऐसी दशा में इस लोक और परलोक में हमें अच्छाई से ही सम्मानित किया जायेगा। इससे बढ़कर मनुष्य जीवन की सार्थकता और हो भी क्या सकती है।

आत्म−साधना करने वाले ऋद्धि−सिद्धियों के अनुपात से अपनी सफलता असफलता आँकते रहे हैं। हमें इसके लिए अतिरिक्त प्रयत्न नहीं करना पड़ा पर जो बाहर जाता है वह भरपूर मात्रा में मिल गया।

ईश्वर दर्शन हमने विराट् ब्रह्म के रूप में किया है। विश्व मानव के रूप में हमने उसे एक क्षण क लिए भी छोड़ा नहीं और न उसने ही ऐसी निष्ठुरता दिखाई कि हमें साथ लिये बिना अकेला ही फिरता। कभी वार्तालाप हुआ है तो उसमें एक झगड़े की ही स्थिति उत्पन्न होती रही है। राम और भरत राज्य तिलक को गेंद बनाकर झगड़ते रहे थे कि इसे मैं नहीं लूँगा तुम्हें दूँगा। हमारा भी भगवान के साथ ऐसा ही विग्रह चला है कि तुझे क्या चाहिए जो मैं दूँ। गुम्बज की आवाज की तरह हमारा उत्तर यही रहा है कि तुझे क्या चाहिए। अपना मनोरथ बता ताकि उसे पूरा करके धन्य बनूँ?

भगवान बॉडी गार्ड की तरह पीछे−पीछे चला है और संरक्षण करता रहा है। आगे−आगे पायलट की तरह चला है। रास्ता साफ करता हुआ और बताता हुआ। हमारी भी अकिंचन काया गिलहरी की तरह उसके लिए सर्वतोभावेन समर्पित रही है।




Quotation - Akhandjyoti March 1985

गलती ज्ञान की शिक्षा है। जब तुम गलती करो तो उसे बहुत देर तक मत देखो। उसके कारण को ले लो और आगे की ओर देखो। भूत बदला नहीं जा सकता, भविष्य अब भी तुम्हारे हाथ में है। -अज्ञात




विभीषिकाओं की काली घटाएं बरसने न पाएंगी। - Akhandjyoti March 1985

प्रकृति में विकृतियों की भरमार होती है तो मानवी मस्तिष्क गड़बड़ाने लगता है और ऐसे कर्म करने पर उतारू होता है जो प्रस्तुत विपत्तियों को और भी बढ़ा दें।

यह कथन भी गलत नहीं है कि जब मनुष्य का चिंतन गड़बड़ाता है तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाता है और वायुमंडल, वनस्पति जगत, छोटे-बड़े जीवधारी, उलटी दिशा में चलने लगते हैं और उस प्रवाह का असर मनुष्य की प्रकृति पर पड़ता है।

दोनों ही प्रतिपादन अपनी-अपनी जगह पर सही हैं। पर यह कहना कठिन है कि बीज किस कहा जाय और परिणति किसे।

प्रायः आधी शताब्दी से विकृतियों का ऐसा ही दौर चल रहा है। द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व के महान नेताओं ने मिलजुलकर स्थायी शांति स्थापना के लिए बड़ी योजनाएं बनाई थीं और बड़े निश्चय किये थे। किन्तु उन दस्तावेज की स्याही भी सूखने न पाई थी कि परस्पर संदेह, अविश्वास और विद्वेष के विष बीज अंकुरित होने शुरू हो गये। इस अवधि में राजनैतिक कुटिलताएं सभी पक्षों से अपने दांव-पेंच चलाने में चूकी नहीं हैं। विज्ञान के आविष्कार आश्चर्यजनक हुए हैं, पर वे ऐसे हुए हैं जो विनाश के काम आयें। पूंजी का विनियोग ऐसे कामों में हुआ है जिससे पतन और पराभव का ही उत्पादन हो सके। बुद्धिमानों-कलाकारों ने जो कुछ उगाया है उसे मानव भविष्य के लिए संकट उत्पन्न करने वाला ही कह सकते हैं।

विगत पचास वर्षों में अंतरिक्षीय वातावरण भी ऐसा बना है जो पृथ्वी के लिए, पृथ्वी निवासियों के लिए संकट ही उत्पन्न कर सकता था। इन्हीं दुर्दिनों के बीच पिछले पचास वर्ष गुजरे हैं उनमें हैरानियां किस कदर बढ़ी है। इसका लेखा-जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि सर्वनाश जैसा कुछ हुआ तो नहीं, पर उसकी पृष्ठभूमि निश्चित रूप से बनी है और इस संभावना का पथ-प्रशस्त हुआ कि निकट भविष्य में मनुष्य की गतिविधियां और प्रकृतिगत हलचलें दोनों ही अशुभ की दिशा में चल रही हैं और उसके प्रमाण परिचय अनेकानेक दुर्घटनाओं के रूप में जहां-तहां से फूटते रहे हैं। मनुष्य के उद्वेग अपने ढंग से भड़के हैं और प्रकृतिगत उत्पातों ने छोटे-बड़े कितनी ही विभीषिकाओं के रूप में अपना परिचय दिया है। कोई वर्ष चैन से नहीं बीता।

हमारे हिमालय जाने के वर्षों में स्थिति स्पष्ट होती गई कि दोनों ही ओर से आमने-सामने से घटाएं आकर आपस में टकरा रही हैं। दोनों ही पक्ष समान रूप से दोषी हैं। प्रकृति मनुष्यों को उत्तेजित कर रही है और मनुष्य प्रकृतिक्रम को उद्धत बना रहे हैं।

अभी क्रम धीमा चला है और घटनाएं बीच-बीच में अवकाश एवं दूरी देकर घटित होती रही हैं। इसलिए दूरवर्ती मनुष्य के लिए सभी को एक साथ मिलाकर देख सकना संभव नहीं हो रहा है। पर यदि कोई इन सबको श्रृंखलाबद्ध देखे तो मालूम पड़ेगा कि प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध में मिलाकर जितनी धन जन की हानि हुई थी। उससे कम नहीं कहीं अधिक क्षति शीतयुद्ध की इस अवधि में उठाई जा सकी। वृक्ष वनस्पति कटने से लेकर, अंतर्ग्रही यात्राओं और रोमांचकारी आविष्कारों ने ऐसी भूमिका बनाई है जिससे अणु युद्ध न होने पर भी मनुष्य अपनी वरिष्ठता गंवा बैठेगा और इस धरती का वातावरण प्राणियों के रहने योग्य न रह जायेगा।

इन विभीषिकाओं को अधिक अच्छी तरह हिमालय की ऊंचाई पर चढ़कर देख सकना हमारे लिए संभव हो सका। मार्गदर्शक ने अपने दिव्य चक्षु देकर उस धुंधले को और भी स्पष्ट कर दिया।

प्रकृति की विशालता और मनुष्य की सशक्तता मिलकर जब मल्लयुद्ध करेंगी और दो सांडों की तरह समूचे क्षेत्र को विस्मार कर देने की ठाने ठानेंगी तो भवितव्यता कितनी जटिल होंगी यह समझने में−हस्तामलववत् देखने में देर न लगी।

हमारी नगण्य-सी साधना और सूक्ष्म शरीरधारी ऋषियों की उस क्षेत्र में उपस्थित क्या मिल-जुलकर दोनों पक्षों को अपनी हठवादिता छोड़ने के लिए विवश नहीं कर सकते? उत्तर अन्तरिक्ष में से उभरा कि ‘कर सकते हैं’ −और उन्हें करना चाहिए।

हिमालय हमें मार्गदर्शक सत्ता के पास चार बार जाना पड़ा। एक ही प्रश्न मनःक्षेत्र पर छाया रहा कि प्रस्तुत विभीषिकाओं को हर कीमत पर निरस्त किया जाना चाहिए। एक घटना स्मरण आई। दो दुर्दान्त साँड एकबार आपस में पूरे आवेश में लड़ रहे थे। लगता था कि वे एक-दूसरे का पेट फाड़ कर रहेंगे। जस खेत में लड़ रहे थे। उसका सर्वनाश करके रहेंगे। इतने में स्वामी दयानन्द उधर से निकले। उनने दोनों को ललकारा। न हटे तो दोनों के सींग पकड़ कर मरोड़े और पूरा बल लगाकर दोनों को दोनों दिशा में फेंक दिया। वे उल्टे गिरे और भयभीत होकर जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए। इस घटना की पुनरावृत्ति आज के जमाने में भी सम्भव है। मनुष्य की दुर्बुद्धि और प्रकृति की विकृति यह दोनों ही ऐसे साँड हैं जिन्हें सींग पकड़कर उमेटा और विपरीत दिशा में धकेल दिया जाना चाहिए।

इन दिनों वही प्रयास चल रहा है। सन् 2000 तक दोनों ही काबू में आजायेंगे इस बीज वे घायल तो जहाँ तहाँ हो चुके होंगे। पर सर्वनाश की जो सम्भावना दृष्टिगोचर हो रही है वह रुक जायेगी।

विश्व राजनीति में रूस और अमेरिका का विग्रह अणु युद्ध की प्रलय उपस्थित करते दीख रहा है। पर दैवी प्रयास दोनों को ही समझ देंगे और बढ़े हुए कदम पीछे हट जायेंगे। भारत में साम्प्रदायिक और प्रांतीयतावाद अपना विकराल रूप प्रस्तुत कर रहे हैं। इनकी जलती आग भी ठंडी हो जायेगी। प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने के जो उद्धत प्रयत्न चल रहे हैं, वे समझदारी अपनाकर वह करेंगे जिससे संकट टल सके। लंका−दमन के साथ−साथ रामराज्य स्थापन के सतयुगी प्रयास भी चल पड़े थे। विनाश के प्रस्तुत अनेकानेक उपक्रमों पर पानी बरसाने वाले फायर ब्रिगेड चालू कर दिये गये हैं और दुर्भिक्ष की सम्भावना वाली वे घटाएँ बरसाई जा रही हैं, जो कुछ ही दिन में मनुष्यों, पशुओं का पेट भरने वाली हरीतिमा उगाकर ग्रीष्म की दुर्भिक्ष विभीषिका का पूरी तरह समापन कर दें।

हमें पूरा विश्वास है कि मनुष्य की समझ लौटेगी। परमसत्ता का सहयोग मिलेगा, प्रकृति अनुग्रह करेगी। बुरे समय की सम्भावना अब समाप्त ही होने जा रही है, यह हमारी आने वाले कल के संबंध में भविष्यवाणी है।

इस परम पुरुषार्थ के निमित्त ही इन दिनों हम अपने पाँच प्रतिनिधि विनिर्मित करने में लगे हुए हैं। मौन और एकान्त साधना के उपक्रम के साथ−साथ प्रजनन जैसी अतीव कठोर तपश्चर्या चल रही है। यह प्रतिनिधि अथवा वंशज हमसे किसी प्रकार दुर्बल न होंगे। वरन् सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण संसार में फैले हुए प्रतिभावानों को झकझोर कर नवसृजन योजना में उसी प्रकार बलपूर्वक संलग्न करेंगे जैसा कि हमारे मार्गदर्शक ने हमें किया है।

बुद्धिजीवी (2) शासक (3) कलाकार (4) सम्पन्न तथा (5) भावनाशील वर्ग के लोग कम नहीं हैं। इनमें से कितने ही निकट भविष्य में अपनी क्षमताओं को स्वार्थ से हटाकर परमार्थ में नियोजित करेंगे और वातावरण आश्चर्यजनक रूप से बदला हुआ प्रतीत होगा।

सन् 2000 तक हमारा अस्तित्व बना रहेगा और हम अपनी भूमिका अब से भी अधिक अच्छी तरह निभाते रहेंगे। यह हो सकता है इस बीच हम वर्तमान शरीर को त्याग दें। हिमालय के ऋषि में रहकर उनके साथ मिल−जुलकर सूक्ष्म शरीर से काम करें। जो भी करना होगा उसमें हमारा मार्गदर्शक साथ रहेगा। उसके मार्गदर्शन में हमने और हमारे संपर्क क्षेत्र में कल्याण मार्ग का ही नियोजन हुआ है। आगे जो होने वाला है उस भविष्य को विगत भूतकाल की तुलना में अधिक श्रेष्ठ और शानदार ही माना जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में किसी को किसी प्रकार का कोई सन्देह न रहेगा, जब पाठक गण हमारी जीवनचर्या एवं भावी भूमिका को अगले अंक में पढ़ेंगे।




‘‘मनु-पुत्रों से’’ - Akhandjyoti March 1985

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मनु-पुत्रों से (kavita) - Akhandjyoti March 1985

भीषण विभीषिकाएं मंडराने लगीं उधर। क्यों फिर भी चुप्पी साधे हैं मनु-पुत्र इधर॥

फिर राम, कृष्ण को जन्म न दे दे कोई मां। फिर कहीं न शिवि, दधीचि पैदा हो जायें यहां॥ फिर चन्द्रगुप्त, चाणक्य न हों तत्पर कोई। फिर शिवा, समर्थ न हों अनीति के विद्रोही॥ फिर कहीं न महावीर, गौतम, गांधी आये। पाखण्ड-खण्डनी केतु दयानन्द फहरायें॥ गोविन्दसिंह संस्कृति के लिए न उठ बैठें। आजाद, जफर, बिस्मिल, सुभाष, तात्याटोपे॥

बस यही मनौती मना रही क्रूर-नजर। क्यों फिर भी चुप्पी साधे हैं मनु-पुत्र इधर॥

फिर तुलसी, सूर न इस धरती पर पैदा हों। नानक, कबीर, रैदास न सत् पर शैदा हों॥ मीरा, नवाज, रसखान न भू पर आ जायें। जो शुष्क मनुज में रस की धारा छलकायें॥ फिर बैजू, तानसेन, हरिदास न हों मुखरित। हों सृजित न शिल्प, चित्र कृतियां जन मंगल हित॥ जीवित न रह सकें मानवीय-मर्यादाऐं। षड़यंत्र यही रच रहीं बहुमुखी बाधाएं॥

उसने को फन फैलाये हों भीषण-विषधर। क्यों फिर भी चुप्पी साधे हैं मनु-पुत्र इधर॥

फिर से ‘यजीद’ कत्ले--‘हुसैन’ पर आमादा। देखो! सलीब ने फिर से ईसा को बांधा॥ फिर जहर बदनियत है, ‘सुकरात’ मिटाने को। ‘मंसूर’ चुना है उसने, जहर पिलाने को॥ गुमराहों को फिर ‘लूथर किंग’ खटकता है। फन भेदभाव का विषधर पुनः पटकता है॥ युद्धोंन्माद को ‘आइंस्टीन’ नहीं भाता। शोषण देखो! है ‘कालामार्क्स’ पर गुर्राता॥

क्या मानवता को पीना होगा पुनः जहर। क्यों फिर भी चुप्पी साधे हैं मनु-पुत्र इधर॥

संस्कृति की सीता लो! आवाज लगाती है। फातिमा और मरियम की पीर बुलाती है॥ युग-राम, वानरो! फिर से तुम्हें बुलाते हैं। ग्वालो! गिरिधारी गोवर्धन उठवाते हैं॥ गौतम ने, महावीर ने श्रमण, भिक्षुओं को। आवाज दिया है मानव धर्म रक्षकों को॥ ईसा, हुसैन देखो! टकटकी लगाते हैं। इस बार मनुजता देखें कौन बचाते हैं॥

मिटने को हो मानवता का इतिहास अमर। क्यों फिर भी चुप्पी साधे हैं मनु-पुत्र इधर॥

*समाप्त*