एक सच्चे मित्र की तरह जीवन का हर प्रभात तुम्हारे लिए अभिनव उपहार लेकर आता है। वह चाहता है कि आप उसके उपहारों को उत्साह पूर्वक ग्रहण करें। उससे उज्ज्वल भविष्य का श्रृंगार करें। उसकी प्रतीक्षा रहती है कि कब नया दिन आये और कब इससे भी अच्छा उपहार भेंट करें। साथ ही जो दिया गया है उसका महत्व समझें और आदरपूर्वक ग्रहण करें।
किन्तु जो दिया गया है उसका मूल्य नहीं समझा जाता और कूड़े-करकट की तरह फेंक दिया जाता है तो निराश होकर लौट जाता है। बार-बार अवज्ञा होने पर वह पुनः अपरिचित राही की तरह आता है और निराश होकर लौट जाता है।
ईश्वर ने मनुष्य को अपार सम्पदाओं से भरा-पूरा जीवन दिया है पर वह पोटली बाँधकर नहीं, एक-एक खण्ड के रूप में गिन-गिनकर। नया खण्ड देने से पहले पुराने का ब्यौरा पूछता है कि उसका क्या हुआ? जो उत्साह भरा ब्यौरा बताते हैं वे नये मूल्यवान खण्ड पाते हैं। दानी मित्र तब बहुत निराश होता है जब देखता है कि उसके पिछले अनुदान धूल में फेंक दिये गये।
मरण शैया पर पड़े हुए पिता ने अपने पुत्र की ओर कातर दृष्टि से देखा। बैजू ने कहा- ‘तात! मैं आपकी जीते जी तो कोई विशेष सेवा नहीं कर पाया बताइए अब क्या आदेश है?”
‘बेटा! मुझे इस समय अपनी एक ही इच्छा कचोट रही है। अपने संगीत दर्प से तानसेन ने मुझे बड़ा अपमानित किया था और मैं उसका बदला नहीं ले सका।’ यह कहकर बैजू के पिता ने दम तोड़ दिया।
बदला मैं लूँगा- निश्चय कर उसने अपने पिता की मृतदेह की अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न करा दी। श्मशान में भी अपने पिता की राख को हाथ में लेकर उसने कसम खाई कि मैं बदला लेकर रहूँगा।
रात का घना अन्धकार था। तानसेन के महल की चार दीवारी फाँद कर बैजू अन्दर घुस गया। हाथ में परशु की तेजधार, अन्धेरे में भी चमक रही थी। वह तानसेन के शयन कक्ष की ओर बढ़ा। दरवाजे की झिर-झिरी से झाँक कर देखा सब लोग निद्रा मग्न थे तानसेन देवी सरस्वती की प्रतिमा के आगे बैठा कुछ पढ़ रहा था।
सरस्वती की शान्त और वरद्हस्त उठाए प्रतिमा को देखकर बैजू के हृदय में विचार मन्थन होने लगा। अन्तःकरण में स्फुरणाएं उठने लगीं- ‘प्रतिशोध ऐसा प्रतिशोध, किस काम का जिसमें अपना और भी पतन हो। माना कि तानसेन तो संगीत दर्प में पिताजी को अपमानित कर बैठा तो क्या मैं भी अपने बल और छल-छद्म के दर्प में उसे मारकर उसका बदला लूँ। क्या प्रतिशोध का दूसरा मार्ग नहीं है? हो सकता है? ऐसा हीन प्रतिशोध मुझे नहीं लेना। देवी माँ मुझे सद्बुद्धि दे।’ और वह बिना प्रतिशोध लिए ही घर लौट आया। वस्तुतः ऐसे प्रतिशोध से क्या लाभ जो मनुष्य को दानवी-प्रवृत्तियों में लगा दे।
बैजू ने घर आते-आते रास्ते में संगीत साधना का निश्चय किया और अपनी साधना तथा सिद्धि की प्रखरता के आधार पर तानसेन को परास्त कर प्रतिशोध लेने का विचार किया। वीणा और वाद्य यन्त्र लेकर देवी सरस्वती के सम्मुख बैठा बैजू अहर्निश संगीत साधना में लगा रहने लगा।
संगीत के स्वरों में झंकृत वीणा के साथ-साथ उसकी हृदय तन्त्री भी बजने लगी और बैजू के गीतों का आराध्य सर्वनियामक परमात्मा हो गया। अपनी साधन तन्मयता में वह खाने-पीने की सुध तक भूल जाता। लोगों ने उसे बावरा कह कर सम्बोधित करना शुरू कर दिया। उसके गीतों और स्वरों को जो भी सुनता, ईश्वर भक्ति की तरंगें मन में उठने लगतीं।
बैजू बावरा की ख्याति फैलने लगी। होते-होते सम्राट अकबर तक उसकी प्रशंसा पहुँची। अकबर की दृष्टि में तो तानसेन के समान और कोई गायक ही नहीं था परन्तु जब सुना कि बैजू बावरा भी बहुत अच्छा गाता है तो स्वाभाविक ही उसका जी भी गायन सुनने के लिए मचल उठा।
अकबर ने दूत को भेजा बैजू बावरा को दरबार में उपस्थित होने के लिए। परन्तु दूत अकेला ही लौट आया और बोला- महाराज! आपको गीत सुनना है तो उसकी झोंपड़ी पर जायें।
दरबारियों समेत राजा बैजू बावरा की झोंपड़ी पर पहुँचे और बैजू ने अपनी स्वर लहरी छेड़ी। सब मन्त्र मुग्ध हो उठे। तानसेन ने अपनी पराजय को अब प्रत्यक्षतः स्वीकार कर लिया- जहाँपनाह! मैं आपको खुश करने के लिए गाता हूँ और बैजू ईश्वर को खुश करने के लिए। ईश्वर की तुलना में आपकी सत्ता की संगति कहाँ बैठेगी। जो अन्तर ईश्वर और आप में है वही अन्तर बैजू और मुझ में है।
ईश्वर भक्ति के प्रसाद स्वरूप बैजू के मन से प्रतिशोध या विकार की भावना नष्ट हो चुकी थी। उसे ध्यान भी नहीं था कि “मुझे तानसेन को पराजित करना था” फिर भी उसका प्रतिशोध-सही अर्थों में पूरा हो चुका था क्योंकि उसके परम सखा तानसेन का संगीत दर्प टूट चुका था।
भगवत् उपासना में जो कुछ करना होता है अपने लिए ही करना होता है। भगवान को न किसी वस्तु की आवश्यकता है और न उन्हें प्रसन्न करने के लिए कुछ देने का उपक्रम बन सकता है। तो भी नियत समय पर नियत उपासना का उपक्रम करते रहने की आवश्यकता होती है। ताकि मन को उसका अभ्यास बन पड़े और धीरे-धीरे वह परिपक्व होता चले, साँचे में ढलता चले।
उपासना का प्रथम चरण है- निकटवर्ती वातावरण में भगवान की उपस्थिति विशेष रूप से अनुभव करना, भगवान सर्वव्यापी हैं। रंच मात्र भी स्थान उनकी उपस्थिति से खाली नहीं। पर यह व्यापक भावना असीम वातावरण में अभ्यास में नहीं उतरती। जहाँ उपासना के लिए बैठा गया है उनमें बस उपस्थिति को विशेष रूप से अनुभव करने के लिए मन को अभ्यास डालना पड़ता है। इसका तरीका यह है कि जैसे किसी सम्मानित अतिथि के आगमन पर स्थान को स्वच्छ करते हैं। अतिथि सत्कार हेतु जो उपचार किये जाते हैं वे पूरी तरह तो नहीं हो सकते तो भी उनकी चिन्ह पूजा कर लेनी चाहिए। देवताओं के अतिथि सत्कार के लिए षोडशोपचार या पंचोपचार की परम्परा है। यह तभी हो सकती है जब इष्टदेव की कोई साकार छवि, चित्र अथवा प्रतिमा के रूप में स्थापित की जाय। यह एक मानसिक घेरा बन्दी है जिसमें भगवान की उपस्थिति विशेष रूप से मानी जाती है। यही उपस्थिति दर्शन मात्र से ठीक प्रकार नहीं बन पाती। इसलिए अतिथि सत्कार के षोडशोपचार या पंचोपचारों के माध्यम से समर्पण करना पड़ता है। धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प, अर्घ्य, पादम आचमन आदि का समर्पण इन उपचारों की परिधि में आ जाता है। स्थापित चित्र प्रतिमा का स्वागत सत्कार करने का प्रयोजन इतना ही है कि मन की मान्यता इस सीमित क्षेत्र में विशेष उपस्थिति का भाव अंगीकार कर ले।
उपासना में भक्ति का समावेश आवश्यक है। भगवान हमारे समीप हैं या हम भगवान के समीप हैं, यह कोरी कल्पना मात्र रहने से काम नहीं चलता। उसके साथ घनिष्ठ आत्मीयता का रिश्ता जोड़ना होता है, जिसके प्रति प्रेम भावना और श्रद्धा की अभिव्यक्ति की जा सके। यह रिश्ता अपने से बड़े का होना चाहिए। माता-पिता, स्वामी, सखा आदि। छोटा रिश्ता मानने से श्रद्धा की अभिव्यक्ति कठिन पड़ती है। सन्तान, सेवक, पत्नी आदि के रिश्ते स्थापित करने से काम नहीं चलता। वैसे भगवान निराकार होने से उसके साथ मानवी रिश्तेदारी ठीक तरह निभती नहीं। वह एकाँगी रहती है। तो भी उपस्थिति अनुभव करने और सदा ही घनिष्ठता भरी प्रेम की अनुभूति करने के लिए मानवी स्वभाव के अनुरूप ऐसी स्थापना किये बिना प्रेम की सघनता बनती भी नहीं और निभती भी नहीं।
इतना कर लेने पर स्थापना वाला चरण पूरा होता है। यह साकार उपासना के लिए तो आवश्यक है ही, निराकार मान्यता वाले भी इतना कर लें तो कुछ हर्जा नहीं। सीमित के साथ घनिष्ठता की स्थापना सुविधाजनक रहती है।
इसके आगे के चरण में भगवान की साकार और निराकार मान्यता के- उपासना के दो अध्याय आरम्भ होते हैं। दोनों में से जो भी रुचि कर हो, उसे चुन लेना चाहिए। ध्यान का केन्द्रीकरण करने की दृष्टि से साकार उपासना का चयन उत्तम रहता है। इष्टदेव को जिस भी रूप में जिस भी रिश्ते में चुना हो उसके साथ सघन निकटता की अनुभूति करनी चाहिए। भक्ति योग इसके बिना चरितार्थ नहीं होगा। प्रेम व्यवहार में जितनी अधिकतम निकटता होगी, उतनी ही घनिष्ठता का रसास्वादन बन पड़ेगा और उपासना में आनन्द आने लगेगा।
यह निकटता इस स्तर की होनी चाहिए कि इष्टदेव की विशेषताएं अपने में प्रवेश करने लगे। भगवान मन को अपनी विशेषताओं से भरे दे रहे हैं, यह निकटता का स्वरूप है। आग ईंधन को अपने जैसा बना लेती है। नाला नदी में घुलकर नदी जैसा हो जाता है। दीपक और पतंगा आपस में लिपटते हैं तो दोनों एक रूप हो जाते हैं। पेड़ से लिपट कर बेल उतनी ही ऊँची चढ़ जाती है, जितना पेड़ होता है। पारस छूकर लोहा, लोहा नहीं वरन् सोना हो जाता है। भगवान से लिपट कर भक्त को भगवान जैसा महान होना चाहिए। उसकी स्थिति असाधारण हो जा जानी चाहिए, देव मानव जैसी। प्रेमाभिव्यक्ति की इस परिणित की भी पूरी-पूरी अनुभूति होनी चाहिए।
भगवान को निकटतम अनुभव करना, यही उपासना है। अध्यापक सबसे पास वाले लड़के को पढ़ाने का नम्बर लगाता है। पंक्ति में पहले स्थान पर बैठे हुए को भोजन पहले परोसा जाता है। भगवान के निकटस्थ होने से दिव्य विशेषताएं मिल भी रही हैं, साथ ही चौकीदारी भी हो रही है कि कोई दोष-दुर्गुण चिपका न रह जाय। पुलिस सामने हो तो जेबकतरा अपनी उस्तादी बन्द कर देता है। इसी प्रकार जब भगवान की निकटता बन गई तो समदर्शी, सर्वव्यापी भगवान की उपस्थिति में हेय चिन्तन, हेय चरित्र, हेय व्यवहार करने की सूझ भी नहीं सूझेगी। दण्ड देने वाला सामने जो खड़ा है। सिखाने वाला सटकर जो खड़ा है। इस प्रकार की भावनाएं उठे तो समझना चाहिए कि साकार उपासना ठीक चल रही है, अन्यथा भिखारी का, जेबकट का बाना पहन कर भगवान के पास जाया गया तो उसे निकृष्टता के कारण दुत्कार सहनी पड़ेगी। माता गोद में बच्चे को तब उठाती है, जब उसे अच्छी तरह धो लेती है। मलमूत्र से सना होने पर एवं उसे प्यारा होने पर भी गोदी में नहीं उठाया जाता। साकार उपासना के जितने भी फलितार्थ हैं, वे देवमानव बनाने वाले हैं। गन्दगी चिपटाये रहने पर तरह-तरह की मनोकामनाओं का ताना-बाना बुनना, पुरुषार्थ किये बिना लोभ लूटकर खजाने भर लेना यह तो उपासना के सिद्धान्त के विपरीत ही हो जाता है।
इसके उपरान्त तीसरा चरण निराकार साधना है। साकार प्रतिमाएं सभी कल्पित होती हैं। राम रहीम के जैसे चित्र बनाये गये, जैसी प्रतिमाएं गढ़ी गई हैं वे मनुष्य की अपनी कल्पना भर हैं। तथ्य से अवगत होने पर मन उस अवास्तविक के प्रति जमता नहीं और वास्तविकता खोजना ही वास्तविक उपासना है। सर्वव्यापी निराकार के अतिरिक्त वह किसी और के प्रति हो ही नहीं सकती। निराकार का भी कोई ध्यान तो चाहिए अन्यथा मन के जमने का कोई आधार ही न रहेगा। प्रकाश ज्योति को इस चरण में प्रयुक्त किया जाता है। प्रातःकाल का उदीयमान स्वर्णिम सूर्य ध्यान के लिए उपयुक्त बैठता है। दोपहर का सूर्य अत्यन्त प्रखर होने के कारण नेत्रों की पकड़ में नहीं आता। प्रकाश की तीव्रता से आँखों को नुकसान भी पहुँचता है इसलिए गायत्री महामन्त्र का ध्यान सविता के रूप में किया जाता है। सविता प्रातःकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य को कहते हैं। इस ध्यान का अभ्यास आसानी से किया जा सकता है। उगते सूर्य के सम्मुख बैठकर क्षण भर नेत्र खोलना और फिर बन्द करके उस ध्यान को यथास्थान जमाते रहने की क्रिया से दो चार दिन में ही मन सविता का ध्यान करने का अभ्यस्त हो जाता है फिर सूर्य के सम्मुख बैठने या आँखों से देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
उदीयमान सूर्य की दिव्य किरणें अपने शरीर में भीतर तक घुसती चली जाती हैं और अपनी रोशनी तथा गर्मी से अंग-प्रत्यंगों को प्रभावित करती हैं। यह ध्यान निराकार साधना के लिए निर्धारित है। सूर्य किरणें स्थूल शरीर में प्रवेश करके उसमें ओजस भर देती हैं। आरोग्य बलिष्ठता तथा दीर्घजीवन का लाभ बरसाती हैं। इन्द्रियों में जो विषय विकार हैं, उन्हें जला देती हैं। दुष्कर्म करने में, दुर्व्यसनों में लिप्त होने की जो बुरी आदतें थीं वे इस सविता के प्रकाश से जलभुन कर नष्ट हो जाती हैं।
यह स्थूल शरीर का ध्यान हुआ। अब सूक्ष्म शरीर की बारी आती है। सविता का तेजस् सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करता है और दूरदर्शी विवेकशीलता मेधा को मस्तिष्क में भर देता हैं। मस्तिष्क ही सूक्ष्म शरीर है। मानसिक दोष-दुर्गुणों में अगणित नाम आते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह षट् रिपु मनःक्षेत्र में ही अपना घोंसला बनाये छिपे रहते हैं। कुकल्पनाएँ यहीं से उठती हैं। जब प्रातःकाल सविता की किरणों का प्रकाश सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करता है तो एक और मेधा, बुद्धि का बाहुल्य बरसता है दूसरी ओर मानसिक दुर्गुणों को भी जलाकर नष्ट करता है। जिस प्रकार अन्धकार दूर होते ही निशाचर भाग खड़े होते हैं उसी प्रकार मनोविकारों का इस प्रक्रिया से अन्त होता है।
तीसरा शरीर कारण शरीर है। कारण शरीर अर्थात् अन्तःकरण, भावनाएं, मान्यताएं, विचारणाएं, इच्छाएं यह चारों अन्तःकरण में बसती हैं। व्यक्तित्व इन्हीं के आधार पर विनिर्मित होता है। इस क्षेत्र में सविता की किरणें जब प्रवेश करती हैं तो अपनी ऊष्मा तथा आभा से इन चारों क्षमताओं को उत्तेजित एवं परिष्कृत करती हैं। साथ ही इन विशेषताओं के प्रतिकूल जो दुर्भावनाएं हैं, उन्हें जलाकर समाप्त करती हैं। प्रज्ञा का उदय होना जीवन में अभिनव चेतना का उदय होना है। व्यक्ति जब कुछ नये स्तर की दिशाधारा में रुचि लेता है, उन्हें अपनाता है और इस प्रकार का नवनिर्माण करता है मानों सविता पुत्र का ही जन्म हुआ है और उसी की विशेषताओं का समावेश अपने में किया है।
तीन शरीरों में सविता की तीन ऊर्जाओं को प्रवेश का अभ्यास एक-एक करके करने में सुविधा रहती है। जब स्थूल शरीर का अभ्यास पूरा हो जाय, तब तक अगले अभ्यास के लिए रुकना चाहिए। इसके बाद सूक्ष्म शरीर का अभ्यास अपनाये रहा जाय और कारण शरीर की साधना के लिए चरण बढ़ाया जाय तो जब जब सूक्ष्म शरीर परिपक्व हो जाय। इनमें एक-एक महीना भी लगाया जा सकता है। इसके बाद फिर इनकी पुनरावृत्ति आरम्भ कर देनी है। निराकार साधना का क्रम जिनने अपनाया है उन्हें वह आजीवन चलाना है। इसी प्रकार बनता है कि उलट-पुलट कर एक महीना तीनों शरीरों में ऊर्जा प्रकाश की, सविता की स्थापना का क्रम चलाते रहा जाय।
रुचि परिवर्तन की दृष्टि से यह भी अच्छा है कि कुछ समय साकार और कुछ समय निराकार का प्रयोग करके देखा जाय। दोनों में से जो जिसे जितना रुचिकर लगे उसे उतने समय प्रयोग में लेते रहा जाय, बाद में बदल दिया जाय।
भगवान साकार भी हैं और निराकार भी। सर्वव्यापी होने के कारण वे निराकार हैं और समस्त प्राणियों में- समस्त दृश्यमान पदार्थों में अपना आकार प्रकट करने के कारण वे साकार भी हैं। शरीर में काया साकार है और उसके भीतर प्राण चेतना निराकार है। दोनों के समन्वय से ही यह ब्रह्मांड चल रहा है। इसलिए इसमें मतभेद या विवाद का कोई कारण नहीं है। उपासना करते समय भी इन दोनों का उपयोग हो सकता है। फिर भी सुविधा की दृष्टि से पहले साकार का और पीछे निराकार का अभ्यास किया जाय तो सरलता रहेगी। यह तथ्य सभी धर्म सम्प्रदायों पर समान रूप से लागू होता है।
सम्राट अशोक कलिंग विजय करके लम्बी अवधि बाद घर लौटे। इस बार राज्यारोहन का उत्सव बड़े शानदार ढंग से मनाया जा रहा था।
अशोक अपनी माता का बहुत सम्मान करते थे। इस अवसर पर उनका विशेष आशीर्वाद पाने के लिए वे उनके कक्ष में पहुँचे। और संक्षेप का अपना प्रयोजन तथा कलिंग देश के ढाई लाख शत्रुओं का वध करने का विवरण कह सुनाया।
राजमाता फफक-फफक कर रोने लगीं। बोली उन मारे ढाई लाखों में एक तू भी रहा होता तो मेरे ऊपर और तेरे परिवार पर कैसी बीतती?
माता के रुदन से अशोक का दृष्टिकोण उलट गया। उन्होंने उत्सव आयोजन को रद्द कर दिया। अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए वह भगवान बुद्ध का उपदेश लेने पहुँचा। और जो कमाया था तथागत को सौंप दिया।
माता की करुणा का था यह चमत्कार।
पुरन्ध्र एक सद्-गृहस्थ था। परिवार के सभी सदस्य नीति धर्म और कर्त्तव्य का पालन करते। घर में न कोई कमी थी न शोक-सन्ताप। सज्जनों के बीच उसकी अच्छी प्रतिष्ठा थी।
पाप से यह न देखा गया। वह उस परिवार के इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहा किसी के मन में दुर्भावना पनपाये ओर किसी के आचरण में दुष्प्रवृत्ति बढ़ाये। पर सफलता न मिली। बहुत दिन उसे ऐसे ही बीत गये।
प्रयत्नों की निष्फलता पर पाप देव खिन्न बैठे थे। दुःख का करण उनकी पत्नी दरिद्रता ने पूछा, तो व्यथा कह सुनाई। पत्नी ने पति की प्रसन्नता के लिए एक कुचक्र रचा और उनके कान में कह दिया। पाप की बाछें खिल गईं, वे दूसरे दिन स्वयं ब्राह्मण और पत्नी को युवा कन्या का वेष बनाकर पुरन्ध्र गृह की ओर चल पड़े।
ब्राह्मण ने पुरन्ध्र से कहा- मुझे तुरन्त लम्बी यात्रा पर जाना है। मार्ग भयंकर है। रातों रात चलना पड़ेगा। आप कन्या को अपने पास रख लें। लौटने पर इसे ले जाऊँगा।
पुरन्ध्र ने अतिथि धर्म निभाया और सहज स्वभाव उस अनुरोध को स्वीकार कर लिया। कन्या परिवार के सदस्यों की तरह रहने लगी।
कन्या ने पुरन्ध्र से संपर्क बढ़ाना आरम्भ किया। वार्तालाप से लेकर समीप बैठने और कामों में हाथ बटाने का सिलसिला चल पड़ा ब्राह्मण लौटा नहीं।
काना-फूसी चली, सन्देह पनपे, आक्षेप लगे। परिवार का स्नेह सौजन्य घटा और अश्रद्धा बढ़ गई। फलतः कुटुम्ब में फूट पड़ी, सहयोग सद्भाव की कमी से व्यवस्था लड़खड़ाने लगी, पास-पड़ौस में प्रशंसा के स्थान पर निन्दा होने लगी।
पुरन्ध्र ने स्वप्न देखा कि सौभाग्य लक्ष्मी रूठकर जा रही है। अनुनय विनय उनने सुनी ही नहीं।
कुछ समय बाद दूसरा स्वप्न आया- यश लक्ष्मी के विदा होने का। रोका तो, पर रुकी ही नहीं। तीसरी बार के स्वप्न में कुल लक्ष्मी ने भी बिस्तर बाँधा और वह भी विदा हो गई। जाने वाला रुकता भी कहाँ है?
परिवार हर दृष्टि से जर्जर होता जा रहा था। पुरन्ध्र चिन्तित रहने लगे पर करते भी क्या? ब्राह्मण की धरोहर को कहाँ फेंक दें। उनके मन में कोई पाप नहीं था। बालक हँसता हुआ पास आये तो उसे झड़का कैसे जाय? लोकापवाद एक ओर- कर्तव्य दूसरी ओर। उनने सभी घाटे सहकर भी कर्तव्य धर्म के निर्वाह को उचित समझा और ब्राह्मण के न लौटने तक कन्या को घर में आश्रय देने दिये रहने का ही निश्चय रखा।
एक रात को स्वप्न में धर्म को देखा और वे भी चलने की तैयारी में थे। अब पुरन्ध्र से न रहा गया, वे कड़क कर बोले। सौभाग्य लक्ष्मी, यश लक्ष्मी, कुल लक्ष्मी को मैंने इसलिए नहीं रोका कि धर्म मेरे साथ है तो अकेले रहने पर भी मैं बहुत हूँ। वे भ्रम-वश गईं पर आप तो घट-घट के ज्ञाता हो, मैं कर्तव्य पर दृढ़ हूँ तो आप मुझे किस कारण छोड़ते हैं।
धर्म के पैर रुक गये। उनने जाने का विचार छोड़ दिया- “ठीक है, तुमने मुझे नहीं छोड़ा तो मैं ही तुम्हें क्यों छोड़ूँगा।” वे ठहर गये तो कुल लक्ष्मी, भाग्य लक्ष्मी और यश लक्ष्मी भी लौट आईं।
पाप परास्त हो गया। वह ब्राह्मण रूप में आया और कन्या बनी हुई पत्नी को साथ लेकर खिन्न मन से परास्त हो वापस लौट गया। स्थिति फिर पूर्ववत् हो गईं। अंततः नीतिमत्ता की- ब्राह्मण की निष्ठा की विजय हुई।
विषमावस्थिते दैवे पौरुषेंऽफलतां गते। विषादयन्ति नात्मानं सन्त्वापाश्रयिणों नराः॥
दुर्दैव आ पड़ने पर और विफल-प्रयत्न होने पर भी धीर पुरुष उत्साह हीन होकर दुःखी नहीं होते।
बुद्धिमानी की कमी नहीं। उसका उपार्जन भी सरल है। स्कूलों के रूप में विभिन्न व्यवसाइयों के साथ रहकर अनुभव अर्जित करने के रूप में उसे आसानी से खरीदा जा सकता है। साँसारिक जानकारियों के बदले पैसा अधिक कमाया जा सकता है, लोक धाक मानते हैं और प्रशंसा भी करते हैं। वकील, इंजीनियर, प्रोफेसर, दलाल, कलाकार आदि बुद्धिजीवी कहलाते हैं। उसकी आजीविका बुद्धिगत परिश्रम पर ही निर्भर रहती है। सेल्समैनों की चतुरता मालिकों को भी निहालकर देती है और अपने को कमीशन के अनुसार मालोमाल बना देती है। विभिन्न विषयों के जानकार बुद्धिजीवी या बुद्धिमान कहलाते हैं। पढ़ाई की फीस और निजी मेहनत खर्च करके कोई भी बुद्धिमान बन सकता है।
प्रज्ञावान का रास्ता दूसरा है उसे पढ़ा लिखा तो होना चाहिए। अनुभवी भी। और साथ ही दूरदर्शी विवेकशीलता भी उसकी अन्तरात्मा में श्रद्धा बन कर जमी होनी चाहिए। उचित और अनुचित का अन्तर करना आना चाहिए और तात्कालिक लाभ की दूरगामी परिणामों का अनुमान लगा सकने की प्रवीणता भी होनी चाहिए। प्रज्ञावान को मात्र उचित कार्यों में न्याय नीति के अनुसार खरे कामों में ही हाथ डालना होता है। समर्थन भी उन्हीं का करना होता है और किसी को परामर्श देना हो तो भी इसी कसौटी पर कसने के बाद जो खरा और सही प्रतीत हो वही करना पड़ता है। मात्र दूसरों के लिए ही नहीं प्रज्ञा का अनुशासन सर्वप्रथम अपने ऊपर लागू होता है। कष्ट सहकर भी घाटा उठाकर भी, मूर्ख कहा कर भी मात्र उसी मार्ग पर चलना होता है जो मानवी गरिमा के उपयुक्त है। जिन्हें करने के लिए अन्तरात्मा की सहमति प्राप्त है।
बुद्धिमानी के लिए से कोई बन्धन स्वीकार आवश्यक नहीं। तात्कालिक लाभ ही उसके लिए सब कुछ है। इस प्रयोजन के लिए वह भला-बुरा कुछ भी कर सकती है। अन्तरात्मा का दबाव मानने की इसे कुछ भी आवश्यकता नहीं होती। यदि वह वकील है जो सर्वथा झूठे मुकदमें को ही सफल बनाने के लिए जी जान एक कर सकता है। यदि वह अफसर है तो खुद का और अपने दोस्त का फायदा कराने के लिए कुछ भी तरकीब बता सकता है। यदि वह डॉक्टर है तो सम्पन्न मरीजों को अपने घर आने का और सौदा करने का इशारा कर सकता है। इंजीनियर के लिए निर्माण कार्य में सीमेण्ट की जगह रेत भर देने में चतुरता मानी जायेगी। बुद्धिमान के सामने एक ही कसौटी है- सफलता- फिर चाहे किन्हीं भी नैतिक मूल्यों का हनन होता हो।
आज सर्वत्र बुद्धिमानी की ही प्रशंसा है, उन्हीं की आवश्यकता भी। उन्हीं की माँग सर्वत्र है। बुद्धिमत्ता पहले भी थी पर अब वही सबसे बढ़कर हो गई है। उन्हीं का शासन में प्रवेश है। वे ही मिल कारखाने चलाते हैं। पहले दिन कारखाना खड़ा करना, दूसरे दिन दिवाला निकाल देना और तीसरे दिन नये नाम से नयी फर्म खड़ी कर देना उनके बाँये हाथ का खेल है। वे हजार की कमाई पीछे एक रुपया निकाल कर संगमरमर का मन्दिर बनाते हैं और गली मुहल्लों में अपने धर्मात्मा होने का ढोल पिटवाते हैं। जय-जय कार इन्हीं की होती है। किसी सभा सोसाइटी में जाते हैं तो उद्घाटन कर्ता चेयरमैन वे ही होते हैं और मालाओं से लद जाते हैं।
बुद्धिमान के लिए दसों दिशा खुली हुई हैं। उन पर कोई रोक-टोक नहीं। नियन्त्रण वे किसी का नहीं मानते। कोई नीति मर्यादा उन्हें बाधित नहीं करती। जिस पर कोई नियन्त्रण लागू होता हो वह बुद्धिमान कैसा। वही जीवन युक्त होता है, बुद्धिमता देवी की उपासना से उसे यह अभय दान मिला हुआ है। दूसरों को धर्मोपदेश देने में वह प्रवीण पारंगत है। इतने भर से यह आवश्यकता पूरी हो जाती है कि उन शिक्षाओं को अपने पास तक न फटकने दे।
प्रज्ञावान् बहुत करके घाटे के काम करते हैं। गान्धी, बुद्ध, विवेकानन्द, सुभाष की तरह अपनी योग्यता के बल पर नहीं के बराबर कमा पाते हैं। पर उनकी उच्चस्तरीय सफलता अन्ततः उन्हें कृत-कृत्य बना देती है। शंकराचार्य और चाणक्य यदि अपनी विद्या के बल पर कहीं नौकरी प्राप्त करना चाहते तो कहीं अच्छा कमा लेते। अरविन्द को अच्छा वेतन मिल जाता पर वे भटकते ही रहे। किन्तु उनकी भटकन भी इतनी मूल्यवान रही जिस पर अशर्फियाँ निछावर की जा सकती हैं।
प्रज्ञा की आँखें न सफलता पर रुकती हैं न सम्पन्नता पर। लाभ के अवसर चुकाते रहने पर वे मूर्ख भी कहलाते थे। पर वह मूर्खता भी होती इतनी शानदार है उसकी तुलना में बुद्धिमता तराजू के पासंग जितनी भी नहीं रहती। ईश्वर चन्द विद्या सागर ने अपनी अपेक्षा तरक्की के अवसर दूसरों को दिला दिये। जो कमाते थे उसमें से चौथाई में परिवार का गुजारा चलाते थे। शेष जरूरत मन्द विद्यार्थियों की शिक्षा रुकने न देने के लिए खर्च कर देते थे। ऐसे होते हैं प्रज्ञावान्।
यह विश्व वसुधा प्रज्ञावानों से कृत-कृत्य हुई हैं। उन्हीं ने संकटग्रस्त मनुष्यता को दलदल में से खींच कर किनारे पर लगाया है। समय की उलझनों को सुलझा सकने का श्रेय प्राप्त किया है। आत्म सन्तोष निरन्तर अनुभव करते रहे हैं। लोक सम्मान और सहयोग उन पर लदा रहा है और दैवी अनुग्रह की आकाश पुष्प वर्षा होती रही है। इतना पाकर बुद्धिमानी की तुलना कम समद्धशाली रहना उन्हें अखरा नहीं है।
बुद्धिमानों की बस्ती ढूँढ़नी हो तो वे हर नगर में जेलखानों को जाकर देख सकते हैं। उसमें एक से एक बढ़कर चतुर लोग बन्द पाये जायेंगे। ठगी, लूट, हत्या जैसे अपराध कर सकना हर किसी का काम नहीं है। साधारण व्यक्ति तो अपने निज की वस्तुओं की रखवाली नहीं कर सकता। फिर दूसरों पर सफाई के साथ हाथ साफ कर सकना साधारण काम कैसे माना जा सकता है। डाकू और हत्यारे बुद्धिमानी की कसौटी पर ऊँचे नम्बर ही पा सकते। पकड़े तो उनमें से सौ पीछे कोई एक जाता है अन्यथा खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों से लेकर नकली दवाओं पर असली का लेबल लगाकर बेचने वाले बुद्धिमानों की संख्या कम नहीं है। टैक्स चुराने वाले और काला धन, पाखानों के झरोखों में बन्द करके रख देने वालों की चतुरता इतनी अधिक है जितने आकाश में तारे।
बुद्धिमत्ता और प्रज्ञा का अन्तर सभी जानते हैं। उनमें एक आरम्भ में फलती हैं दूसरी अन्त में। एक को हथेली पर जमने वाली जादूगरों की सरसों कहा जा सकता है और दूसरी को मीठे आमों की बगीची लगाने के लिए धैर्य, साहस और दूरदर्शिता भी चाहिए। उसकी आमदनी पीढ़ियों तक मीठे फलों का रसास्वादन कराती और गुजारे लायक आमदनी देती रहती है। किन्तु बाजीगर द्वारा हथेली पर जमाई गई सरसों का तेल कितनों ने शरीर पर मला और बालों में लगाया है यह ठीक से नहीं कहा जा सकता।
कोई समय था जब इस देश में प्रज्ञावान देव मानव रहते थे और अपनी गतिविधियों से न केवल इस भारत भूमि को वरन् समूचे संसार को धन्य बनाते थे। तब प्रताप और शिवाजी जैसे बलिदानी व्रतशीलों की कमी नहीं थी। भामाशाह, हर्षवर्धन, अशोक जैसे सत्प्रयोजनों के लिए अपनी जेबें पूरी तरह खाली कर देने वालों की कमी नहीं रही, पर आज तो वह समय चला गया। आज तो हर जगह बुद्धिमानी का बोलबाला है। वह अपने पास न हो तो कहीं से भी पैसा देकर खरीदी जा सकती है। हायरी बुद्धिमत्ता और हायरी प्रज्ञाशीलता, तुम्हारा समय कितना बदल गया?
तमस्युपरते स्वान्ते तेजः पुंजं ददर्श सः।
ध्यान के अभ्यास से अज्ञानान्धकार के विनष्ट हो जाने से हृदय में तेज पुंज (आत्मा) का अनुभव होने लगता है।
मानव जीवन की संरचना इस प्रकार हुई है कि उसे निरन्तर कार्यरत रहना पड़ता है। रात्रि को शरीर की उथली परत ही विश्राम करती है। भीतर के सभी तन्त्र अनवरत रूप से काम में जुटे रहते हैं। श्वास-प्रश्वास, रक्ताभिसरण, आकुंचन-प्रकुंचन, निमेष-उन्मेष आदि क्रम क्षण भर के लिए भी चैन नहीं लेता। मस्तिष्क की ऊपरी परत ही निद्रा का लाभ ले पाती है। अचेतन और सुपरचेतन दोनों ही परतें बिना विराम का नाम लिए जन्म से लेकर मरण पर्यन्त अपना काम करती रहती हैं। धड़कन एक क्षण के लिए रुक जाय तो जीवन लीला की समाप्ति ही समझनी चाहिए।
आहार, पाचन क्षमता का उत्पादन यह एक पूरा चक्र है। इसकी एक कड़ी कभी टूट जाय तो समझना चाहिए कि गाड़ी दल-दल में फँस गयी अथवा खाई में गिरकर उलट गयी। आहार से रक्त बनता है इसमें पेट आंतें आदि का परिश्रम तो मुख्य है ही, पर इसके अतिरिक्त अन्यान्य सभी अवयवों को श्रम करना पड़ता है। न किया जाय तो पाचन लड़खड़ा जायेगा और क्रिया शक्ति कुण्ठित होगी। जो हिस्सा निकम्मा पड़ा रहेगा वह जंग खाये पुर्जे की तरह क्षीण होता चला जायेगा। इसलिए जीवन व्यवस्था में कर्म को नितान्त आवश्यक माना गया है। खाली दिमाग तो शैतान की दुकान होता है। ठाली शरीर भी निस्तेज, दुर्बल और रुग्ण रहने लगता है।
मनुष्य समेत सभी जीव जन्तुओं को कार्यरत रहना अनिवार्य हो जाय, इसलिए प्रकृति ने उन्हें आहार जुटाने और वंश चलाने के दो कार्य ऐसे सौंपे हैं जिनके बहाने शरीर और मन को कुछ न कुछ ताना-बाना बुनना पड़ता है। भाग-दौड़ में निरत रहना पड़ता है। यह शरीर की निर्वाह श्रृंखला के साथ जुड़ी हुई कर्म व्यवस्था हुई। अन्य प्राणियों का काम इस दौड़ धूप से भी चलता रहता है पर मनुष्य इस स्तर से बहुत आगे है। उसकी अन्यान्य आवश्यकतायें तथा जिम्मेदारी भी है। और वे सभी ऐसी हैं जो बढ़ा-चढ़ा कार्य कौशल चाहती हैं। इसके लिए उसे अपने प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त करने पड़ते हैं और अतिरिक्त कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं। शरीर का काम क्षुधा निवारण भर से नहीं चल पाता। वर्तमान संसार की उलझी हुई परिस्थितियों में सही तरीके से पार जाने के लिए विद्या, प्रतिभा, कुशलता, दूरदर्शिता आदि का संग्रह करना पड़ता है।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसका पूरा जीवन परिवार तथा समाज के साथ गुँथा हुआ है। इसमें पग-पग पर नीतिमत्ता, उदारता एवं जिम्मेदारी का प्रयोग करना पड़ता है। अनीति का प्रचलन भी कम नहीं है उसके दाँव पेंचों से अपने को बचाने एवं आक्रमणों से पीछा छुड़ाने के लिए अनेक प्रकार के दाँव पेंच समझने होते हैं। पेट प्रजनन तक सीमित न रहना हो, उन्नतिशील जीवन जीना हो, सन्तोष, उत्साह और उल्लास अर्जित करना हो तो वे कार्यक्रम भी अपनाने पड़ते हैं जिन्हें उत्कृष्ट एवं आदर्शमय कहते हैं।
मनुष्य यों सर्वत्र स्वतन्त्र मालूम पड़ता है। वह भले बुरे जैसे भी चाहे काम कर सकता है। इतने पर भी वह कृत्यों के परिणाम भुगतने के लिए प्रकृति व्यवस्था के अनुरूप बाधित है। अनेकानेक जिम्मेदारियों से बँधा हुआ है। कर्तव्यों के परिपालन से बाधित है। पशु-पक्षी प्रकृति प्रेरणा का अनुसरण करने मात्र से अपनी जीवनचर्या एक क्रमबद्ध ढाँचे के अनुसार पूरी कर लेते हैं। पर मनुष्य का काम इतने भर से नहीं चलता। उसे आत्मा की पुकार सुननी पड़ती है। सामाजिक अनुबन्धों का निर्वाह और वर्जनाओं का प्रतिपादन करना होता है। प्रशंसा और प्रतिष्ठा का ध्यान रखना होता है। निन्दा, भर्त्सना, उपहास से बचना होता है। मात्र शरीर ही नहीं परिवार का भरण-पोषण चरित्र स्तर एवं भविष्य बनाना होता है। यह सब कार्य अनायास ही नहीं हो जाते इनके लिए समुचित जागरूकता बरतनी पड़ती है और कठोर श्रम करना होता है। यह सारा परिकर मिलकर कर्त्तव्य बनता है। कर्त्तव्य पालन से ही उत्तरदायित्वों का निर्वाह होता है और जीवन सन्तोष व्यक्त कर सकने योग्य बनता है इसकी उपेक्षा करने वाले दुत्कारे जाते और जहाँ-तहाँ धिक्कार सहते हैं।
कर्त्तव्य को शास्त्रकारों की भाषा में धर्म कहा गया है। जो दायित्वों का ठीक तरह निर्वाह करता है वह धर्मात्मा है और जो उनकी अवज्ञा करता है वह अधर्मी है। धर्मात्मा पुण्य फल प्राप्त करके प्रत्यक्ष से सुखी रहते हैं और परोक्ष में स्वर्ग सन्तोष का लाभ लेते हैं। अधर्मियों के लिए प्रत्यक्षतः दुःख दुष्परिणाम सामने रहते हैं और परोक्ष में आत्म-प्रताड़ना का- विरोध विग्रह का नरक भुगतना पड़ता है।
आर्षजनों का अभिमत है कि कर्म ही ईश्वर पूजा है। यहाँ कर्म का अर्थ मात्र श्रम नहीं वरन् सत्कर्मों का अवलम्बन है। हर विवेकशील व्यक्ति के लिए उचित है कि वह आजीविका कमाते समय ईमानदारी का ध्यान रखे उसका व्यतिरेक न होने दे। खर्च करते समय समझदारी का उपयोग करे। ऐसा न हो कि अपव्यय अपनाया जाय और उसकी पूर्ति के लिए कुकृत्यों का आश्रय लिया जाय।
निजी जीवन शरीर और परिवार तक सीमित है। इसमें आजीविका उपार्जन और उसके उपयोग में औचित्य का समावेश तो प्रमुख है ही। साथ ही यह तथ्य भी जुड़ता है कि शरीर और सम्बद्ध परिकर में से कोई कुमार्गगामी न बनने पाये। इसके अतिरिक्त धर्म की दूसरी मंजिल आती है जिसे पुण्य या परमार्थ कहते हैं। यह सामाजिक प्रचलनों में औचित्य का अधिकाधिक समावेश करने- सत्प्रवृत्तियों को सींचने और कुप्रथाओं का उन्मूलन करने वाले कदमों को उठाने का प्रयास है। यह उतना ही आवश्यक है जितना शरीर और परिवार का निर्वाह। मनुष्य की प्रगति और अवनति बहुत करके समाज की सुव्यवस्था पर निर्भर है। वातावरण में गन्दगी भरती जा रही हो तो एक व्यक्ति की सज्जनता भी उस माहौल में जीवित न रह सकेगी। श्रेष्ठ वातावरण में सामान्य व्यक्ति की सज्जनता भी उस माहौल में जीवित न रह सकेगी। श्रेष्ठ वातावरण में सामान्य व्यक्ति भी सुधरने और उठने लगते हैं। मनुष्य समाज का ऋणी है। अधिकाँश सुविधायें उसे दूसरों के सहयोग से ही मिली हैं। यहाँ तक कि बोलना पढ़ना जैसी आरम्भिक योग्यतायें भी दूसरों के अनुग्रह से ही मिली हैं। ऐसी दशा में उसे अपने को समाज का ऋणी मानना चाहिए और उसे श्रेष्ठ समुचित बनाने का प्रयत्न करना अपना परम पवित्र कर्त्तव्य मानना चाहिए। यही पुण्य परमार्थ है। यही विराट ब्रह्म की यथार्थवादी सेवा पूजा है। इस प्रयोजन के लिए भी हमारी क्षमता का एक बड़ा अंश नियोजित रहना चाहिए।
नित्य कर्म में ईश्वर उपासना के लिए एक निर्धारित समय रहना चाहिए। आत्मा की श्रेष्ठताओं का समुच्चय परमात्मा है। हम उसके निकटतम पहुँचते जांय- घनिष्ठ तक बनते जांय, यही भजन भाव एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम माना जाना चाहिए। अन्तःकरण की पवित्रता अक्षुण्ण बनाये रहने के लिए यह आवश्यक है। जैसे मलीनता के शोधन हेतु शरीर को नहलाने, कपड़ों को धोना, कमरे को बुहारना, बर्तनों का माँजना आवश्यक है। इसी प्रकार ईश्वर की पवित्रता और प्रखरता का प्रभाव आत्मा पर अधिकाधिक आच्छादित करने के लिए हमारे नित्य कर्म में उपासना सम्मिलित रहनी चाहिए।
उपरोक्त सभी कर्त्तव्य कर्म एक से एक अधिक आवश्यक हैं। इनमें से एक की भी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए और न ऐसा सोचना चाहिए कि किसी एक का पालन करने से काम चल जायेगा। मनुष्य जीवन का एक क्षण भी बेकार या बर्बाद नहीं होना चाहिए। खाली दिमाग शैतान की दुकान होती है और खाली समय मनुष्य के ऊपर पतन और पराभव थोपता है। इसलिए कर्त्तव्य कर्म में हमें निरन्तर संलग्न रहना चाहिए। व्यस्तता ही जीवन में श्रेय का समावेश करती है। जो भी काम हाथ के नीचे है उसे पूरी दिलचस्पी के साथ किया जाना चाहिए। उसे सही तरीके से पूरा करना, अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न मानना चाहिए। बेगार भुगतने की तरह आधे अधूरे मन या श्रम से किया हुआ काम हर दृष्टि से काना-कुबड़ा और फूहड़ होता है। उसका बाजारू मूल्य तो कम होता ही है साथ ही जिसने किया है उसे अनगढ़ माना जाता है। बया पक्षी कैसा सुन्दर घोंसला बनाता है। यह उसके मनोयोग का फल है उसमें रहकर सुखी तो वह पक्षी ही रहता है पर राह चलते दर्शक उसकी प्रशंसा करते जाते हैं। बेगार भुगतने के लिए कबूतर छितरे हुए तिनकों का फूहड़ घोंसला बनाता है। जरा-सी हवा चलते ही वह अण्डे बच्चों समेत जमीन पर आ गिरता है। बेचारे को दुबारा मेहनत करनी पड़ती है। साथ ही हँसी होने और गालियाँ पड़ने की बेइज्जती मुफ्त में ही होती रहती है। मनुष्य को अपने हर काम में कबूतर जैसे फूहड़पन न दिखाकर, बया जैसी मुस्तैदी दिलचस्पी का परिचय देना चाहिए। जिम्मेदारी के काम करने वालों पर वे अपने विषय में प्रवीण पारगत कहलाने लगते हैं।
गीताकार ने काम को कर्मयोग कहा है और इसे मनोयोग पूर्वक करने से योग सिद्धि की बात कही है। उस कथन में एक बड़ी मार्मिक बात यह है कि लाभ-हानि की चिन्ता न करके कर्म को परिपूर्ण श्रद्धा के साथ करना चाहिए। काम को आगा-पीछा सोचकर तो कना चाहिए पर करते समय खिलाड़ी की मनोवृत्ति रहनी चाहिए। खिलाड़ी बीसियों बार हारते जीतते रहते हैं पर मन भारी नहीं होने देते। दोनों ही स्थितियों में मुस्कराते रहते हैं। काम की सफलता अपने हाथ में नहीं। कई बार परिस्थितियां ऐसी बन पड़ती हैं कि समझदारी से काम करने पर भी असफलता सामने आ खड़ी होती है। यदि कर्ता की तबियत छोटी है तो वह हिम्मत हार बैठेगा और भविष्य में उससे कुछ करते-धरते न बन पड़ेगा। इसी तरह किसी प्रकार बन्दर के हाथ अदरक लग गया और स्वल्प प्रयास में बड़ी सफलता मिल गयी तो अहंकार का ठिकाना न रहेगा। और उस असन्तुलित मनःस्थिति के आगे ठोकर खायेगा। इसलिए गीताकार ने कर्मयोगी के लिए परामर्श दिया है कि वह सच्चाई के साथ किये गये कर्म को ही प्रसन्नता का परिपूर्ण माध्यम समझें। ऐसी मनःस्थिति होने पर सफलता के अहंकार और असफलता के पश्चात्ताप से बचाव हो जाता है। ऐसी सन्तुलित मनःस्थिति एक प्रकार की योग विभूति है। जब कर्म करने में ही अपनी पूर्ण प्रसन्नता मान ली गयी तो सफलता की राह नहीं जोतनी पड़ती और सच्चाई के साथ किया हुआ प्रत्येक कार्य अपने आप में सफलता देने वाली प्रसन्नता जैसा अनुभव होता है। ऐसी निरन्तर हालत में प्रसन्न रहने की विद्या जिसे हाथ लग गयी समझना चाहिए कि वह मन का विजेता हो गया और उन हाथों से जो भी काम होगा वह शानदार होगा इसका निश्चय हो गया।
यदि हमारे सभी कार्य लोक मंगल की दृष्टि से- कर्तव्य भावना की पूर्ति का लक्ष्य रखकर किये गये हैं तो उच्च भावना के अनुरूप पुण्य फलदायक ही होंगे। इन भावनाओं के रहते उनमें दुष्टता का समावेश नहीं हो सकता। कोई व्यावहारिक ज्ञान की कमी से त्रुटि रह भी जायगी तो उस कृत्य को दूषित नहीं कहा जायेगा। स्वार्थ बुद्धि से किया गया परमार्थ भी व्यवसाय बन जाता है। यह तथ्य जिसकी समझ में आ गया, उसका कर्त्तव्य परायण जीवन एक प्रकार से योगियों जैसा हो जाता है।
योग के कितने की प्रयोग उपचार हैं। उनमें से एक अति सरल और अति व्यावहारिक कर्मयोग है। उसमें स्वार्थ और परमार्थ दोनों सधते हैं। संसार की सेवा और आत्म-कल्याण दोनों का समान रूप से समावेश हो जाता है। निठल्ले बैठे रहना तो ऐसे भी किसी के लिए सम्भव नहीं प्रकृति किसी को ठाली बैठने नहीं देती और शरीर और मन की संरचना ही ऐसी ही है जिसमें कुछ न कुछ किये बिना काम ही न चले, चैन ही न पड़े। ऐसी दशा में समय काटने वाले निरुद्देश्य काम ज्यों-त्यों करके की अपेक्षा यही अच्छा है कि अपने हर काम में उच्च उद्देश्य का समावेश किया जाय तो उसे पूरी तन्मयता तथा तत्परता के साथ सम्पन्न किया जाय। कोई यह न समझे कि अधिक काम करने में व्यस्त रहने से शरीर या मन को क्षति उठानी पड़ेगी। कर्मयोगी की सन्तुष्टि एवं प्रसन्नता उसे हर क्षेत्र में प्रगतिशील एवं सम्पन्न बनाती है। इसलिए कर्म को धर्म समझकर उसे परिपूर्ण श्रद्धा के साथ करना ही श्रेयस्कर है।
ज्यां पाल सार्त्र (फ्राँस) संसार के माने हुए दार्शनिक थे। उनने सारा जीवन परमार्थ प्रयोजनों में लगाया। साथ ही जीवन को आनन्द से भरा-पूरा बनाने के लिए उनने अपने अनुभवों का सार संक्षेप भी अनेक लेखों से लिखा है। उनके सामने कठिनाइयाँ भी कम नहीं रहीं। पर एक दिन के लिए भी कभी किसी ने उन्हें खिन्न, उद्विग्न या उदास नहीं देखा। वे परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाते थे और दूसरों को भी वैसी ही शिक्षा देते थे। उनकी शिक्षाओं ने अनेकों के मुरझाये जीवनों में उल्लास भरी किरणें उत्पन्न करने में सफलता पाई।
सार्त्र की एक आँख आरम्भ से ही खराब थी। दूसरी पर अत्यधिक दबाव न डालने के लिए डाक्टरों ने सलाह दी तो भी वे शिक्षा से वंचित नहीं रहे। पढ़कर सुना देने हेतु उनने अपने घर के लोगों को सहमत कर लिया। इसके उपलक्ष्य में कृतज्ञता व्यक्त करने और दूसरों के सामने प्रशंसा करने में कभी उनने कोताही न की। कर्कश और रूखा स्वभाव होने पर जो लाभ उठाना उनके लिए कठिन पड़ता वह उन्हें सरलतापूर्वक उपलब्ध होता रहा और उनने अपनी स्मरण शक्ति पर पूरा जोर देकर स्नातकोत्तर परीक्षा अच्छे डिवीजन में पास कर ली एवं अपने काम में जुट गये। लेखन कार्य में भी वे दूसरों की सहायता लेते रहे। आँखों के अभाव में जो कठिनाई किसी को हो सकती है वे सभी उनके सामने थीं। पर इसके कारण न तो कभी उनने चेहरे पर उदासी आने दी, न निराशा व्यक्त की और न अपना काम रोका। बुढ़ापे में दूसरी आँख ने भी जवाब दे दिया था पर वे इस पर भी सदा यही कहते रहे कि संसार में करोड़ों आंखें मेरी हैं। सहायता करने को इच्छुक और उत्सुक लोगों की कमी नहीं। मात्र हम अपनी कर्कशता के कारण ही उस सहयोग का लाभ नहीं उठा पाते।
सार्त्र सदैव मित्रों से घिरे रहते थे। उपयोगी ज्ञान का आदान-प्रदान क्रम वे सदा ही चलाते रहते। उनके मित्रों में वृद्ध कम थे और युवक अधिक। इस कारण वे बताते, मैं युवक जो हूँ। फिर अपने साथियों की संख्या अपनी आयु वालों के साथ ही क्यों न बढ़ाऊं। उन्हें बूढ़ों (मानसिक दृष्टि से) के प्रति चिढ़ थी। कारण कि वे सदा अपने अच्छे भूतकाल का वरदान करते रहते हैं और भविष्य को आशंकाओं से भरा अनुभव करते रहते हैं। जबकि बुढ़ापे में मनुष्य का आयुष्य और अनुभव परिपक्व होने के कारण वह अधिक उपयोगी होना चाहिए एवं जो उपयोगी है उसका मस्तिष्क उज्ज्वल होना चाहिए। सार्त्र ने परामर्श के लिए कई घण्टों का समय निर्धारित रखा था। उसमें वे उन्हीं प्रसंगों को छेड़ते थे जिसमें कठिनाइयों के बीच प्रसन्नता से रह सकना और सफलता के मार्ग पर चल सकना सम्भव हुआ हो। ऐसे घटनाक्रमों के लिए उनकी स्मृति एक विश्व कोष मानी जाती थी। जो भी परामर्श वे देते थे वे उनके पीछे सिद्धान्त की विवेचना थोड़ी और घटनाक्रमों की लड़ी बहुत लम्बी होती थी। उदाहरणों के माध्यम से वे यह गले उतरते थे कि साधन सम्पन्न व्यक्ति किस प्रकार अपनी क्षमताओं को सत्प्रयोजनों में लगाकर अपने क्षेत्र में प्रशंसा के पात्र बने। साथ ही उन्हें ऐसी घटनाओं की स्मृति भी कम नहीं थी जिनमें कठिनाइयों से घिरे हुए लोगों ने अपने धैर्य, साहस और अनवरत प्रयत्न के आधार पर इतना कुछ कर दिखाया जितना कि साधन सम्पन्न लोगों के लिए भी सम्भव नहीं थे। मनुष्य का पराक्रम कितना सामर्थ्यवान है और किसी को भी किस प्रकार आगे बढ़ाने ऊँचा उठाने में कारगर हो सकता है, इसके रहस्य में इतने अच्छे ढंग से समझाते थे कि किसी को उस परामर्श प्रतिपादन में सन्देह न रह जाता था। उनकी मित्र मण्डली में से एक भी ऐसा नहीं था जो अपने को अनेकों के लिए अनुकरणीय न बना सका हो। एक मित्र दूसरे अनेक मित्रों को साथ लेकर आता था। इस प्रकार उनकी नियत समय पर चलने वाली वार्ता एक प्रकार से जीवन दर्शन की पाठशाला बन गई थी। सुकरात भी ऐसी ही शिक्षा विधि के लिए प्रख्यात थे। सार्त्र को सुकरात का बीसवीं सदी संस्करण माना जा सकता है।
इस सृष्टि का सृष्टा एक ही है। वही उत्पादन, अभिवर्धन तथा परिवर्तन की सारी प्रक्रियाएं अपनी योजनानुसार सम्पन्न करता है। न उसका कोई साझीदार और न सहायक। मकड़ी जब चाहती है अपने मुँह के पानी से ही जाला बना देती है और जब उसका मन आता है जाले को समेटकर गोली की तरह निगल लेती है। शास्त्रकारों ने बताया है कि अनादिकाल में वह- परब्रह्म- अकेला था। अकेलापन उसे खला। इच्छा हुई कि एक से बहुत हो जाऊँ। इस इच्छा ने ही सृष्टि का रूप धारण कर लिया। इस प्रकार एक से बहुत बनने की इच्छा पूरी हो गई इस सृजन के कण-कण में वह समा गया। लहरों पर चमकने वाले सूर्य की तरह वह अनेकाधा दृष्टिगोचर होने लगा। प्राणियों को माया ने भरमाया और वे अहन्ताग्रस्त होकर अपनी-अपनी पृथक स्वार्थपरता से ग्रस्त होकर निजी इच्छा आवश्यकताओं के अनुरूप क्रिया-कृत्य करने लगे। यह भूल गये कि हम एक ही उद्गम से प्रादुर्भूत हुए हैं और परस्पर सहोदर भाई के सदृश्य हैं। सबका स्वार्थ संयुक्त है। एक ही सत्ता भिन्न-भिन्न प्रकार की हो गई और समझा जाने लगा कि जो जिस देवी-देवता की पूजा-पत्री करेगा वह उसी को अपना समझेगा और उसी की हिमायत करेगा। इतना ही नहीं जो अपने यजमान का उपेक्षा पात्र या विरोधी होगा उसे त्रास देने से भी न चूकेगा। यह मान्यता है आज के बहुदैववाद की। इस प्रकार सृष्टा का ही खण्ड विभाजन नहीं हुआ वरन् अपने-अपने कुल वंश ग्राम नगर के भी पृथक-पृथक देवी-देवता बन गये। प्रगति सामूहिक है। इसलिए हिल-मिलकर रहना चाहिए और मिल-बाँटकर खाना चाहिए सुखों को बाँट देना और दुःखों को बँटा लेना ही श्रेयष्कर है। उनमें आदमी स्वार्थान्ध हो जाता है और अपनी सुविधा के लिए दूसरों की असुविधा पर ध्यान नहीं देता।
विभाजन और संकीर्णता इतने तक ही सीमित नहीं रही। परमेश्वर का भी बँटवारा कर लिया गया। अनेकों देवी देवता बनकर खड़े हो गये। उनकी आकृति ही नहीं प्रकृति भी अपने को न पूजने- दूसरे को पूजने पर वे देवता रुष्ट होने और त्रास देने पर उतारू होने लगे। बहुदैववाद के आरम्भिक दिनों में तीन ही प्रमुख थे ब्रह्मा, विष्णु, महेश और उनकी पत्नियाँ सरस्वती, लक्ष्मी, काली। इसके बाद तो नित नये देवता उपजने लगे। देवताओं की संख्या अगणित हो गई और देवियों की भी। उनकी चित्र-विचित्र फरमाइशें भी गढ़ी गई। इनमें से कुछ शाकाहारी थे कुछ माँसाहारी। कुछ क्रोधी, कुछ शान्त मिज़ाज। कुछ तो प्रेत पितर ही देवी-देवता बन बैठे। इनकी संख्या हजारों लाखों तक जा पहुँची। इस संदर्भ में पिछड़ी जातियों ने देव रचना का काम बहुत उत्साह से बढ़ाया। शारीरिक मानसिक बीमारियों को उन्हीं के रुष्ट होने का कारण माना जाने लगा। उपचार यही था कि किसी मध्यवर्ती ओझा की मारफत समाधान करने के लिए उनकी रिश्वत का पता लगाना। इस समाधान में अक्सर खाने-पीने की वस्तुओं की याचना होती थी। विशेष कर पशु-पक्षियों के बलिदान की। इनका कोई स्थान विशेष बना हो तो वहाँ पहुँचकर धोक देने की (प्रणाम करना)। घर में नई बहू आने या नया बच्चा पैदा होने पर कुल देवता की दर्शन झाँकी करने जाना भी आवश्यक समझा जाने लगा। इस प्रकार देवता का ‘मूड’ ठीक रखना ही हर परिवार के लिए आवश्यक जैसा बन गया। यह छोटी समझी जाने वाली बिरादरियों की बात हुई। बड़ी बिरादरियों के देवता अपेक्षाकृत अधिक शानदार, ठाट-बाट वाले, बड़े देवी-देवताओं के भक्त बनने में अपनी प्रतिष्ठा समझने लगे। उनकी पूजा पंडित पुरोहित द्वारा दुर्गा सप्तशती पाठ, शिव महिमा रुद्री आदि का पाठ, हवन, पूजन जैसे उपचार और उनमें से अपने लिए जिन्हें चुना गया हो उनके दर्शन झाँकी करने का सिलसिला चलता। बहुदैववाद के पीछे अनेकानेक कथा कहानियाँ जोड़ी गई और उनकी प्रसन्नता से मिलने वाले लाभों का- उनकी नाराजी से मिलने वाले त्रासों की माहात्म्य गाथाएं गढ़ ली गईं। कितने ही देवताओं का किन्हीं पर्व त्यौहारों के साथ सम्बन्ध जोड़ दिया गया। कईयों के स्थान विशेष पर जाना आवश्यक माना गया। इनमें से कुछ पुराने बने रहे और कितने ही नये बन कर खड़े हो गये। कई उपेक्षित होते चले गये और कई एकदम नये विनिर्मित होकर प्रख्यात हो गये।
यह बहुदैववाद हिन्दुओं के छोटे बड़े वर्गों में तो है ही। अन्य देशों और धर्मों के पिछड़े वर्गों में भी उसी भाँति प्रचलित है। अफ्रीका के दक्षिण पूर्व एशिया के, दक्षिण अमेरिका के पिछड़े वर्गों में यह प्रचलन बहुत अधिक है समझदार समुदाय तो क्रमशः अब इस जंजाल से अपना पीछा छुड़ाते जा रहे हैं।
इस्लाम और ईसाई सम्प्रदायों में एकेश्वरवाद है। तो भी उनमें पीर, औलिया, पैगम्बर पूजते हैं और उनकी जियारत के लिए जाते हैं। जैन और बौद्ध धर्मों में तीर्थंकरों की लगभग वैसी ही कट्टर मान्यता है। हिन्दुओं के भाँति उनके भी तीर्थ हैं और स्थापित प्रतिमाओं के अनेकानेक नाम हैं। उनकी विशेषताएं अपनी-अपनी कही गई हैं। मनौती इन सभी की मानी जाती है। हमारा अमुक काम बन जाय तो दर्शन करने आने या भेंट चढ़ाने का पूर्व संकल्प किया जाता है यही मनौती है। इसे पेशगी रिश्वत की शर्तबन्दी भी कहा जा सकता है। एक ही सफलता सुनकर दूसरा लालायित होता है और महात्म्य तथा मनौती का प्रचलन निरन्तर बढ़ता जाता है।
इस संदर्भ में पुनर्विचार करने की आवश्यकता है अन्यथा यह भ्रम जंजाल बढ़ता ही जायेगा और अकारण लोगों में भय तथा लालच का भाव बढ़ता जायेगा आस्था बढ़ेगी सो अलग। उन देवताओं के ऐजेन्टों तथा पुजारियों के पौ बारह होते रहेंगे और बेचारे भावुक लोग अन्ध श्रद्धा के कारण अपनी जेब कटाते रहेंगे।
समझा जाना चाहिए कि ईश्वर एक है। उसकी व्यवस्था में अनेक साझीदार नहीं हो सकते। धर्म सम्प्रदायों की मान्यता के कारण उसके आकार-प्रकार भी अनेक प्रकार के नहीं हो सके। सम्प्रदायों में ईश्वर का आकृति और प्रकृति अनेक प्रकार की मानी गई है। यदि यह सच मानी जाय तो इनमें से किसी एक को सच्चा और बाकी सबको झूठा कहना पड़ेगा। किस को सही और कितनों को गलत माना जाय। यह बड़ा टेढ़ा प्रश्न है। फिर इसकी कोई कसौटी भी नहीं है। मान्यताएं श्रद्धा पर अवलम्बित हैं। वह श्रद्धा पैगंबरों और ऋषियों के कथनों पर आधारित है। उनके प्रति पूज्य भाव रखते हुए भी वह निर्णय करना कठिन है कि परस्पर विरोधी इन प्रतिपादनों में कौन सही और कौन गलत है। ऐसी दशा में किसी सत्यान्वेषी के लिए भारी कठिनाई उपस्थिति होती है कि इस विरोध विडम्बनाओं में से किसे ग्राह्य और किसे अग्राह्य करें।
तत्व-दर्शन और विवेक बुद्धि के आधार पर यह मानना पड़ता है कि परमेश्वर एक है। सम्प्रदायों की मान्यताओं के अनुसार उसके स्वरूप और विधान सही नहीं हो सकते। यह उनकी अपनी-अपनी ऐसी मान्यताएं हैं जो मानने वालों की निजी मान्यता पर अवलम्बित हैं।
व्यापक शक्ति को निराकार होना चाहिए। जिसका आकार होगा वह एक देशीय और सीमित रहेगा। कहा भी गया है- ‘न तस्य प्रतिमा अस्ति’ अर्थात् ‘उसकी कोई प्रतिमा नहीं है।’ न स्वरूप न छवि। आप्त वचनों का एक और भी कथन ऐसा ही अभेद्य है। उसमें कहा गया है- ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति’ अर्थात् एक ही परमेश्वर को विद्वानों ने बहुत प्रकार से कहा है। यहाँ अन्धों द्वारा हाथी का एक-एक अंग पकड़कर उसे उसी आकृति का बताये जाने वाली कहानी याद आ जाती है।
ईश्वर की प्रसन्नता अप्रसन्नता का आधार नैतिक नियमों का पालन करना ही हो सकता है। नाराज उससे होगा जो चारित्रिक मर्यादाओं का उल्लंघन करेगा। दूसरा आधार पुण्य परमार्थ है। पिछड़ों को आगे बढ़ाना और गिरों को ऊँचा उठाना- समाज में सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन करना यहीं पुण्य परमार्थ की परिभाषा है। यह मान्यता हर सम्प्रदायों और हर दर्शन द्वारा परस्पर से सर्वमान्य की गई है। विवाद पुण्य-परमार्थ की परिभाषाओं से आरम्भ होता है जिसे दूरदर्शी विवेकशीलता की कसौटी पर कसने के अलावा यथार्थता का अनुमान लगाने का और कोई आधार नहीं है।
ईश्वर की पूजा से उनकी प्रसन्नता और न करने से अप्रसन्नता मानी जाने की बात के पीछे भी एक ही रहस्य प्रतीत होता है कि निर्धारित कर्मकाण्डों के सहारे मनुष्य आत्म-परिष्कार और लोक-कल्याण की सत्प्रवृत्तियों के प्रति अधिकाधिक निष्ठावान बने। आमतौर से लोग न्यायशील सर्वव्यापी परमात्मा को भूल जाते हैं और निर्भय होकर कुकर्म करने लगते हैं। कर्मफल की सुनिश्चितता को संदिग्ध मानते हैं। इस भ्रम के निराकरण में ईश्वर स्मरण का, उसके पूजा विधान का अन्तःकरण पर उपयोगी प्रभाव पड़ सकता है और मनुष्य अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समावेश कर सकता है। प्रार्थना मन्त्रों में न्यूनाधिक मात्रा में ऐसे संकेत भी हैं।
चन्दन, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपहारों को ईश्वर के सम्मुख उपस्थित करने की पूजा प्रक्रिया का यही रहस्य है। इन वस्तुओं में जो श्रेष्ठताएं हैं उन्हें अपने जीवन में धारण करने का प्रयत्न किया जाय और यह माना जाय कि जल रूपी सरसता, पुष्प जैसी कोमलता, नैवेद्य जैसी मिठास, दीपक जैसी स्वयं जलकर प्रकाश करने की प्रक्रिया, चन्दन की भाँति वातावरण महकाने जैसी सत्प्रवृत्तियाँ अपने में उत्पन्न करनी चाहिए और श्रेष्ठ व्यक्तित्व को भगवान के चरणों में अर्पित करने की भावना सुविकसित करनी चाहिए। अन्य उपहार भी भेंट किये जाते रहे हों तो उन्हें एक प्रकार का आत्म-प्रशिक्षण समझा जाना चाहिए। भगवान को किसी के स्तवन या उपहार की कोई आवश्यकता नहीं है। पूजा उपासना की समूची प्रक्रिया संकेत रूप में अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं प्रखर बनाने के लिए प्रशिक्षण प्रक्रिया है। जो इतना कर सकेंगे वे सृष्टा का अनुग्रह प्राप्त कर सकेंगे और महामानव, ऋषि, देवता बनने की दिशा में अग्रसर होंगे उन्हें आत्मसन्तोष और जन सम्मान एवं सहयोग की कमी न रहेगी।
अन्य देशों में प्रचलित भगवानों या देवताओं की आकृति-प्रकृति का निर्धारण किस आधार पर हुआ है इसका कारण तो विदित नहीं है पर भारत के देवताओं को सत्प्रवृत्तियों का प्रतीक मानकर उनकी आकृतियों का गठन किया गया है। जैसे शिव की आकृति में शिर से गंगा का निकलना अर्थात् ज्ञान की धारा प्रवाहित होना। मस्तक पर चन्द्रमा अर्थात् सौम्य शीतलता का होना। गले में मुण्डों की माला अर्थात् मौत को स्मरण रखना। गले में सर्प अर्थात् दुष्टजनों को भी गले से लगाकर उनकी प्रकृति बदलना। नन्दी वाहन अर्थात् परिश्रमी और सौम्य प्रकृति के प्रति अनुराग होना कमर में सिंह चर्म अर्थात् अनाचारियों का दमन करना। हाथ में त्रिशूल अर्थात् अभाव, अज्ञान और अनाचार का उच्छेदन करना। हाथ में डमरू अर्थात् संगीत उल्लास को पसन्द करना। आदि आदि।
ब्रह्माजी के चार मुख- वेद में निहित ज्ञान की चार धाराओं का प्रसारण, चार प्रसंग, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। कमल पुष्प पर विराजमान अर्थात् सर्वोपम पुष्पित आधार की पसन्दगी, इन प्रतीकों के परिचायक हैं।
विष्णु की चार भुजाओं में चार आयुध हैं। शंख अर्थात् जागरण का उद्घोष। चक्र अर्थात् गतिशीलता प्रगति। गदा- पराक्रम, संघर्ष के उपयुक्त शौर्य पराक्रम। पद्म अर्थात् खिले कमल जैसी सुगन्ध और शोभा की अवधारणा। गले में बैजन्ती माला अर्थात् धर्म धारणा। सिर पर मुकुट अर्थात् शासन की स्थिति सुव्यवस्थित रहना आदि।
देवियों में सरस्वती, लक्ष्मी और काली की प्रमुखता है। इनके वाहनों तथा आयुधों में भी ऐसे ही संकेत सन्देश सन्निहित हैं जिनसे यह प्रेरणा ली जा सकती है कि मनुष्य को अन्य किन विशेषताओं विभूतियों को अपने व्यक्तित्व में विकसित समाविष्ट करनी चाहिए।
यथा- ‘सरस्वती’ वाहन हंस, नीर क्षीर विवेक। हाथ में वीणा पुस्तक। संगीत और साहित्य की कलाकारिता। ‘लक्ष्मी’- हाथियों द्वारा पूजन। धनवान बनने के लिए हाथियों जैसी बुद्धिमत्ता, बलिष्ठता और ऊँचाई। ‘काली’- का वाहन सिंह, पराक्रम, साहस, आयुध, तलवार त्रिशूल आदि। असुरों को निरस्त करने के लिए आवश्यक उपकरणों का धारण।
इसी प्रकार सभी देवी-देवताओं की आकृति-प्रकृति, वाहन, आयुध आदि के पीछे ऐसे संकेत और सन्देश हैं जिनका विकसित व्यक्तित्व में समावेश होना चाहिए। यह सब आत्म शिक्षण है। जिस प्रकार बाल कक्षाओं में, अ-अमरूद। आ-आम। इ-इमली। ई-ईख। उ-उल्लू। ऊ-ऊँट। के चित्र बनाकर स्वर और व्यंजन की वर्णमाला याद कराई जाती है, ठीक उसी प्रकार देवी-देवताओं की चित्र-विचित्र आकृतियों आयुधों, वाहनों, उपकरणों द्वारा आस्तिकजनों को यह प्रशिक्षण मिलता है कि आस्तिकता का अर्थ श्रेष्ठ सद्गुणों का महत्व समझना और अपने में धारण करना है। यह प्रतीक मात्र है। अनेक मुख, अनेक हाथ वाले देवी-देवताओं का होना विवेकशीलता द्वारा स्वीकार्य नहीं हो सकता। भारत कवियों, कलाकारों का देश रहा है। यहाँ के तत्त्वदर्शियों ने सर्वसाधारण की सामान्य बुद्धि को चित्रकारिता के माध्यम से मानवी गरिमा और उत्कृष्टता के लिए आवश्यक धारणाओं और प्रयासों के सम्बन्ध में रहस्यमय चित्रों में चित्रित किया है। उनका यह अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए कि निराकार, सर्वव्यापी और न्यायकारी परमेश्वर की सृष्टि व्यवस्था में कोई साझीदार भी है और वे मात्र मनुहार, उपहार, उपचार के आधार पर प्रसन्न अप्रसन्न होते रहते हैं। पात्रता कुपात्रता का विचार किये बिना शाप वरदान देते रहते हैं। रुष्ट और प्रसन्न होते रहते हैं। ऐसी मान्यताएं- अन्धविश्वास में गिनी जायेंगी और उन्हें अपनाने वालों को भ्रमित करेगी। वास्तविकता को कोसों दूर ले जा पटकेंगी। हममें से प्रत्येक को यथार्थवादी और तत्त्वदर्शी होना चाहिए। ईश्वर सम्बन्धी विविध विधि कथाओं, लीलाओं और पूजा उपचारों का प्रचलन इसीलिए है कि हर व्यक्ति विश्व के नियामक और उसके सुनिश्चित विधि-विधान को समझकर चरित्रवान बने और पुण्य-परमार्थ में निरत रहे।
यदि इन मान्यताओं से विरत रहा जाय तो नास्तिकता उपजेगी और मनुष्य स्वेच्छाचारी उद्दण्ड और अनाचारी बनने लगेगा। कुकर्म करने और कुमार्ग अपनाने वाले, समाज दण्ड और राजदण्ड से बच सकते हैं, इन दोनों को ही चकमा दे सकते हैं, पर जिनने आस्तिकता की मान्यता स्वीकार की है उन्हें यह विश्वास बना रहेगा कि घट-घट वासी और सर्वत्र विद्यमान परमेश्वर की दृष्टि से हमारी कृतियाँ छिपी नहीं रह सकती और साथ ही तद्नुरूप दंड पुरस्कार की परिणति भी फलित हुए बिना नहीं रह सकती। इसलिए नास्तिकता का समूचा ढाँचा खड़ा किया गया है ताकि मनुष्य मानवी गरिमा के प्रति निष्ठावान रहे और वह करे जो उसके लिए करने योग्य है। उस मार्ग पर कदम न बढ़ाये जिससे सृष्टा को सृष्टि को, अन्तरात्मा को खिन्न होना पड़े।
परमेश्वर की अनेक शक्तियों व्यवस्थाओं और गतिविधियों को यदि चित्र-विचित्र देवी-देवता माना जाय तो इस अलंकारिक मान्यता में कोई हर्ज नहीं है, पर सृष्टि व्यवस्था में साझीदारी करने वाले स्वतन्त्र अस्तित्व के देवी-देवताओं की मान्यता से मुँह मोड़ लेना ही सत्य और तथ्य को अपनाने की विवेकशीलता है।
लक्ष्मी जी देवताओं के आलस्य प्रमाद से दुःखी होकर दानवों के यहाँ चली गई, दानव सम्पन्न हो गये और देवता दरिद्रों की तरह दुःखी रहने लगे।
विष्णु भगवान ने इस अनर्थ को देखा, और लक्ष्मी जी को बुला कर स्थान परिवर्तन का कारण पूछा।
लक्ष्मी जी ने कहा- देव, भूल गये आपने जब मेरा वरण किया था तब मेरा पूरा नाम उद्योग लक्ष्मी था। उद्योग ही मुझे प्रिय है। आप जब तक उद्योगी हैं तभी तक मैं आपके पास हूँ। प्रमाद बरतेंगे तो आप को छोड़कर अपने पितृ गृह समुद्र में वापस लौट जाऊँगी। फिर देवताओं की तो बात ही क्या?
अपना चेहरा अपनी आँखों से देख सकना सम्भव नहीं, पर वह दर्पण में प्रतिबिंब रूप से सहज ही देखा जा सकता है। मन सूक्ष्म है। उसकी स्थिति और प्रकृति की जाँच-पड़ताल करने के लिए वासना तृष्णा और अहंता के स्तर को परखते हुए यह जाना जा सकता है कि व्यक्ति का मानसिक स्तर क्या है?
आत्मा का शासन क्षेत्र मन है। आत्मा की पवित्रता और प्रखरता किस स्तर तक ऊँची उठ सकी, इस प्रगति का लेखा-जोखा इस आधार पर मिलता है कि मन को निग्रहित और सुनियोजित करने में कितनी सफलता प्राप्त हुई। मन का स्तर किस हद तक परिमार्जित हुआ इसे जाँचने के लिए तृष्णा और अहंता के सूक्ष्म क्षेत्र पर कसौटी लगाने से पहले वासना की प्रत्यक्षता की स्थिति समझना सरल है।
शरीर पर मन का आधिपत्य है और आत्मा का मन पर। मन कहाँ, क्या, कौतुक रच रहा है इसके लिए इन्द्रियाँ ही परीक्षा क्षेत्र हैं। इन्हें नियन्त्रित करना ही मोटे तौर से मनोनिग्रह की सच्ची कसौटी है। इन्द्रियों के साथ लौकिक मन गुँथा हुआ है। व्यक्तिगत चरित्र और चिन्तन का स्वरूप समझने के लिए यह देखना होता है कि इन्द्रियों की वासना वृत्ति को उच्छृंखलता बरतने छूट तो नहीं मिल गई है। इन्द्रियों का गणना क्रम स्वादेन्द्रिय से होता है, इसके बाद ही कामेन्द्रियाँ आती हैं। पाण्डवों में थे तो पाँच। पर पराक्रम की दृष्टि से अर्जुन और भीम मूर्धन्य माने गए हैं। इसी प्रकार मनोनिग्रह के प्रसंग में इन्द्रिय दमन की साधना करने वालों को दो मोर्चे फतह करने की प्रमुखता देनी होती है। जीभ का चटोरापन काबू में आ गया तो समझना चाहिए कि प्रथम चरण सही रूप से उठ गया। इसके साथ ही संयम युग्म में दूसरा चरण कामेन्द्रिय पर अनुशासन स्थापित करने का है। दोनों ने यदि शालीनता अपना ली हो तो समझना चाहिए कि मनोनिग्रह का प्रत्यक्ष, आरम्भिक और कठिन भाग पूरा हो गया। अब तृष्णा और अहन्ता पर अंकुश लगाना ही कठिन न रहेगा।
रसना का नियन्त्रण स्वाद जीतने से होता है। खाद्य पदार्थों में शकर, नमक, मसाले और चिकनाई मिलाने से आहार के अनेकों ललचाने वाले आकार-प्रकार बनते हैं। मिष्ठान्न पकवान और चाट-नमकीन जैसा आकर्षण उपरोक्त मिश्रणों में ही होता है, जो स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयोगी होना तो दूर नितान्त हानिकर ही है। इनकी आदत नशेबाजी जैसी पीछे पड़ जाती है और फिर छुड़ाये नहीं छूटती। इनके साथ कड़ाई बरतनी पड़ती है। संकल्प की कड़ाई। जैसे व्रत उपवासों के दिनों बरतनी पड़ती है कि नियम भंग करने से पाप पड़ेगा। बदनामी होगी। व्रत टूटेगा। देवता अप्रसन्न होंगे। पुण्यफल से वंचित रहना पड़ेगा। आदि-आदि। अस्वाद व्रत का पालन लम्बे समय तक किया जाय तो फिर वह भी अभ्यास में आ जाता है। सादी रोटी चबा-चबाकर खाई जाय तो वह बिना दाल शाक के भी बड़ी स्वादिष्ट लगने लगती है। इसी प्रकार शाक, दाल आदि के सम्बन्ध में भी है वे भी कुछ दिन के अभ्यास से अपने स्वाद विशेष से मनभावन लगने लगते हैं। जब अफीम, तमाखू, शराब जैसे कड़ुए पदार्थ कुछ दिन की आदत से स्वभाव के अंग बन जाते हैं और उनके बिना काम नहीं चलता तो कोई कारण नहीं कि अभ्यास से अस्वाद आहार प्रिय न लगने लगे। स्वभाव का अंग न बन जाय। यह मात्र निग्रहित मन के अभ्यास पर निर्भर है।
दूसरा प्रसंग कामेन्द्रिय का है उसमें स्त्री की छवि में उत्तेजक आकर्षण देखने और रतिक्रिया की स्मृति को मस्तिष्क में घुमाने से उच्छृंखलता उत्पन्न होती है और वैसा अवसर बार-बार प्राप्त करने के लिए मन करता है। रति कर्म का योग तो जब-तब ही बैठता है। अनेक उत्तेजक मुद्राएं जो मस्तिष्क में घूमती हैं, उनकी निकटता तक सम्भव नहीं हो पाती। शरीर स्पर्श तक कठिन है। वे छवियाँ और उनके साथ अठखेलियाँ मात्र कल्पना चित्रों के रूप में ही मनःक्षेत्र में निरन्तर छाई रहती हैं। यह मानसिक व्यभिचार ही मस्तिष्क को अधिक उद्वेलित करता है। किसी उपयोगी काम में चिन्तन को केन्द्रीभूत नहीं करने देता। इसलिए कहा गया है कि यौनाचार का प्रत्यक्ष व्यवहार तो कुछ मिनटों में ही समाप्त हो जाता है पर शृंगारिक अश्लील चिन्तन ढेरों समय उन्माद की तरह छाया रहता है। ऐसी स्थिति में वह मनोविकार बन जाता है और उससे शरीर की अपेक्षा मन को अधिक क्षति पहुँचती है।
कई अविवाहित, विधुर अथवा तथाकथित ब्रह्मचारी प्रत्यक्ष काम सेवन से बचे रहने पर भी ब्रह्मचर्य के लाभ से कोसों दूर रहते हैं। उनकी आकृति प्रकृति मनोदशा और तन्दुरुस्ती गये बीते स्तर की देखी जाती है। इसका कारण एक ही है मन पर उन्माद की तरह कामुकता का बुखार चढ़ा रहना और चिन्ता, क्रोध, भय आदि मनोविकारों की तरह शारीरिक और मानसिक ढाँचे को लड़खड़ा देना। इसीलिए अविवाहितों की शारीरिक एवं मानसिक तन्दुरुस्ती विवाहितों की तुलना में और भी अधिक गई बीती देखी जाती है। इसका कारण कामुक चिन्तन का उन्माद मनोभूमि पर छाया रहता है।
इस प्रेत पिशाच से कैसे पीछा छूटे? उसका उत्तर भी मन को समझाने में सहमत करने पर निर्भर है। युवा शरीरों की शृंगारिक सज्जा, देखने या स्मरण करने में उद्वेग उत्पन्न होता है। पर इस समुदाय को संसार में- आँखों से सर्वथा पृथक नहीं किया जा सकता। जहाँ तक हो सके ऐसी छवियों की निकटता के अवसर चुकाने चाहिए। घरों में ऐसे चित्र नहीं टाँगने चाहिए। इन दिनों ऐसे कलैंडर खूब छपते हैं और मनचले लोग घरों में उत्साह पूर्वक उन्हें टाँगते हैं। अश्लील चित्रों और कामुक विवरणों वाला साहित्य भी खूब बिकता है। जो कमजोर मनोभूमि पर बड़ा घातक प्रभाव डालता है। सिनेमाओं में ऐसे कृत्य गायनों, हाव-भावों की भरमार रहती है। इसके अतिरिक्त यौनाचार के चित्र एवं ब्लू फिल्मों के रूप में जहर गैर कानूनी होते हुए भी लुक-छिपकर खूब बिकता है। ऐसे उपकरणों की विषाक्त परिणति को समझते हुए साँप बिच्छू की तरह दूर रहने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए पर यह सामयिक एवं अधूरे प्रयत्न मात्र हैं।
होना यह चाहिए कि अपने परिवार की माता, बहिन या पुत्री की स्वस्थ और वयस्क छवियाँ मस्तिष्क में बिठानी चाहिए। यदि अन्य किसी महिला का कल्पना चित्र मस्तिष्क में आये तो उन्हीं पारिवारिक सम्बन्धों वाली महिलाओं का चित्र उस अन्य कल्पना चित्र के स्थान पर अड़ा देना चाहिए। हममें से प्रत्येक का निजी एवं सगे सम्बन्धों का परिवार होता है। उनमें बहिनें और पुत्रियाँ कुछ न कुछ ऐसी होती हैं जिनकी छवि उत्तेजक हो। इतने पर भी अपने मन में उनके प्रति कोई अश्लील विचार नहीं उठते। बहिनें राखी बाँधती हैं उनमें से प्रायः युवा ही होती हैं। बेटियों का कन्यादान देते उन्हें पढ़ाते, लिखाते एवं बुलाते चलाते हैं। इस संपर्क में कोई मोहित विचार पास भी नहीं फटकने पाता। यहाँ तक कि इन सगी बहिन, बेटियों की ओर कोई पास-पड़ौस वाला लड़का कुदृष्टि से देखता है तो उसका सिर तोड़ने के लिए प्रतिशोध से भभक उठते हैं। ठीक ऐसी ही कल्पना हमें उन सभी छवियों के साथ जोड़नी चाहिए जो अश्लील वेष-भूषा या भाव भंगिमा के साथ हमारे मनःक्षेत्र में प्रवेश करती है।
यों आवश्यक तो यह भी है कि युवा लड़कियों को उत्तेजक वेष-भूषा बनाने से रोका जाय। उन्हें सादा जीवन उच्च विचार की महत्ता बताई जाय। प्राचीनकाल के उन प्रचलनों का स्मरण दिलाया जाय जिनमें युवतियाँ लज्जा को अपनी कुलीनता का चिन्ह मानती थीं- नीची आंखें करके चलती थीं और सीना, पेट, पैर आदि को इस प्रकार कपड़ों से ढ़ककर रखती थीं, जिससे किसी की कुदृष्टि न पड़े। इस सम्बन्ध में उच्छृंखल प्रचलन जैसे-जैसे हुआ है वैसे-वैसे बलात्कार, अपहरण, छेड़छाड़, व्यभिचार की घटनाएं अनेक गुनी बढ़ गई हैं। अच्छा हो हम अपनी बहिन बेटियों को और प्रभाव क्षेत्र की लड़कियों को इस कुप्रचलन को अपनाने से बचायें, जो प्रकारान्तर से रास्ता चलने वालों की आँखों में अकारण ही विषाक्तता उभारता और अनुचित आक्रामक कदम उठाने के लिए आमन्त्रित करता है।
मुख्य बात असत्य नियन्त्रण की है। हर युवती को वैश्या समझने और उसके साथ अश्लील सम्बन्ध बनाने की कल्पना करना भी जननेंद्रियों का दुराचार है। हमें इस कल्पना से मन को बचाना चाहिए। साथ ही यौनाचार के घृणित पक्ष को मन से सदा बाहर करते रहना चाहिए। मल, मूत्र के अतिरिक्त अन्य छिद्रों से कफ भी निकलता है। आँख से कीचड़, नाक और गले से कफ भी कई बार बाहर आता है। वह देखने में कितना घृणित और चित्त को खराब करने वाला होता है। मल मूत्र के स्थान शरीर भर में सब में कुरूप होते हैं। उन्हें दृष्टि से ओझल रखने के लिए प्रकृति ने घने बालों से ढक रखा है। यह संरचना सोद्देश्य है। मूत्र प्रवाहित करते रहने के कारण वे दुर्गन्धित भी होते हैं। इसके अतिरिक्त मासिक धर्म में कई-कई दिन तक रक्त प्रवाहित होता है। आजकल कामोपचार की मर्यादा भंग करने या दूसरे मानसिक कारणों से अधिकाँश युवतियों को श्वेत प्रदर की शिकायत भी रहती है और वह प्रवास तीसों दिन चलता ही रहता है। इन घिनौने स्रावों की, प्रकृति द्वारा बनाई भौंड़ी बनावट की यदि घृणा उत्पादक दृष्टि से यथार्थवादी कल्पना की जाय तो सहज ही उस ओर आकर्षण उत्पन्न होने के स्थान पर विरक्ति होती है और मन अकारण उन प्रसंगों की ओर दौड़ लगाना बन्द कर देता है।
ब्रह्मचर्य की महत्ता समझने के लिए हनुमान, भीष्म पितामह, शंकराचार्य, दयानन्द, विवेकानन्द आदि की छवियाँ मस्तिष्क में घुमानी चाहिए। व्यभिचारी किस प्रकार हर दृष्टि से खोखले हो जाते हैं। इसकी भी कल्पना करनी चाहिए। साथ ही दोनों के मध्य बनने वाली आकाश-पाताल जैसी खाई को अपनी मान्यता में स्थान देना चाहिए। पत्नी को सगा भाई मानकर उसकी उपयोगिता एक दूसरे को अधिक समुन्नत, सुसंस्कारी, संयमी शालीन बनाने की दृष्टि से समझना चाहिए। धर्मपत्नी को भी रमणी, कामिनी की दृष्टि से देखा जाता रहेगा तो वह भी नागिन, बाघिन की तरह तप तेज को नष्ट करेगी। फिर बाहर की अन्यान्य महिलाओं के बारे में कुकल्पना करने के दुष्परिणामों का तो कहना ही क्या? यहाँ जो बात पुरुषों को नारी के सम्बन्ध में कही गई है। ठीक वही नारी को नर के सम्बन्ध में समझनी चाहिए।
कन्हैयालाल माणिकलाल मुँशी जिन दिनों बीजापुर जेल में थे, बड़ी यातनापूर्ण मानसिक स्थिति से गुजर रहे थे। उन्हें 5 वर्ष की सजा मिली थी, एवं उसमें छूट की कोई सम्भावना नहीं थी उन्होंने एक लेख में लिखा कि एक मृतात्मा ने, जिसे स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने के कारण उसी जेल में 1857 के दिनों फाँसी लगी थी- उन्हें साकार रूप में आकर कई बार कहा- “तुम शीघ्र ही जेल से मुक्त हो जाओगे पर घर की हालत ठीक होने पर व तुम्हारा मानसिक संतुलन बनने पर फिर 1 वर्ष के लिए जेल जाओगे।” चार-पाँच दिन ऐसा चला व फिर वैसा ही हुआ जैसा उसने कहा था। नमक सत्याग्रह में वे फिर गिरफ्तार हुए एवं एक वर्ष बाद छूटकर फिर आन्दोलन में शामिल हो गए। इस घटना से उनका सूक्ष्म जगत व उसके अस्तित्व पर दृढ़ विश्वास बैठ गया। उनका कथन था कि लोकमान्य तिलक की आत्मा अक्सर उन्हें प्रेरणा देने आती थी व कहती थी कि मातृभूमि के लिए संघर्ष करने वालों को अदृश्य जगत में विद्यमान आत्माएं सतत् सहयोग देती रहेंगी।
ऐसी प्रकृति किन्हीं विरलों की ही रही जो हँसते रहे और दूसरों को हँसाते रहे। हलकी मुसकान वाला चेहरा देखकर दर्शकों की बाछें खिल उठती हैं। जो ठठाका मारकर हँसना तो कभी-कभी अपमान, उपहास या व्यंग का कारण भी समझा जाता है पर मन्द मुसकान में न मनुष्य की शालीनता घटती है और न किसी को अन्यथा अभिप्राय निकालने का अवसर मिलता है। ऐसे मनुष्य कम ही होते हैं पर जो होते हैं वे अपनी इस प्रसन्नता अभिव्यक्ति से समूचे संपर्क क्षेत्र को उल्लेखित बनाये रहते हैं। जिनने इस आदत का महत्व न समझा हो उन्हें समझना चाहिए और धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाते हुए इस प्रवृत्ति को विकसित करना चाहिए। ऐसा व्यक्ति सर्वप्रिय बनता है। उसके समीप रहने के लिए सबका मन चलता है। आँखों के आगे से हट जाने पर सूना-सूना लगता है।
प्रसन्न मुख मुद्रा की पूर्णता तभी है जब उसके साथ प्रशंसा और सहानुभूति की अभिव्यक्ति या भी निकलती रहें। संसार में कोई व्यक्ति ऐसा नहीं जिसमें अच्छाइयों का सर्वथा अभाव हो। ढूँढ़ने पर हर किसी में कुछ न कुछ विशेषता मिल जाती है। चर्चा का प्रसंग आने पर उन्हीं को व्यक्त करना चाहिए। दोष-दुर्गुणों को एकान्त में अथवा अच्छी मुख-मुद्रा देखकर ही करना चाहिए। ताकि व स्वस्थ मनःस्थिति में उस पर विचार करने तथा सुधरने के लिए प्रयत्न कर सके,
कई व्यक्तियों का स्वभाव गम्भीर रहने का होता है वे उदास या निराश प्रतीत होते हैं अथवा चिन्ता मग्न लगते हैं। इस प्रकृति के लोगों को कोई दार्शनिक विद्वान या कार्यों में व्यस्त भले ही मान ले पर उसके साथ सहज सम्बन्ध बनाने का मन नहीं होता। डर रहता है कि कुछ कहने पर वे न जाने उसका क्या अर्थ लगा बैठे और झिड़क न दें या निरुत्तर रहकर अपनी गम्भीरता और भी अधिक रहस्यमय न बना ले।
तुनक मिज़ाज लोगों की संख्या भी कम नहीं होती। यह जल्दबाज और छिद्रान्वेषी होते हैं। हर काम में हर व्यक्ति में, हर परामर्श में वे दुर्भाव छिपा ढूँढ़ते हैं और अन्तरंग भी अहंकार की मात्रा बढ़ी-चढ़ी होने के कारण उबल पड़ते हैं या व्यंग करते हैं। उनकी भवें हर समय चढ़ी रहती हैं। ऐसे नर-नारियों से निपटना टेड़ी खीर है। फिर भी बच्चों को फुसलाने की तरह आरम्भ में उनका रुझान टटोलकर उनके अनुरूप ‘ठकुर सुहाती’ कहनी चाहिए और फिर जैसे-जैसे पारा नीचे उतरता जाय वह बात कहनी चाहिए जो उनके, अपने और सबके हित की है। ऐसे लोग फुसलाने पर प्रसन्न और उदार भी हो जाते हैं और अच्छी मुद्रा में होने पर बात मान भी लेते हैं।
मनुष्य का संपर्क सभी तरह के लोगों से पड़ता है। घर में भी कई प्रकृति के लोग होते हैं उनके साथ विचार विनिमय करने में सबसे बड़ी समस्या उनके मूड- स्वभाव ही होती है। कइयों के बड़े विचित्र स्वभाव होते हैं। कुछ इच्छा के विपरीत कह देने पर या कल्पना से स्थिति को कुछ से कुछ समझकर तुनक जाते हैं और कठिनाई से पटरी पर आते हैं। ऐसे लोगों से जो कहना हो उनका पारा नीचे आने पर ही कहना चाहिए अन्यथा वे सही परामर्श को भी अवज्ञा समझकर उबल भी पड़ते हैं। हर स्थिति में अपना निर्वाह करने के लिए अच्छा तरीका यह है कि अपना मन हलका रखा जाय और मन्द मुसकान चेहरे पर बनाये रखने का अभ्यास करना चाहिए।
प्रसन्न मुख मुद्रा मनुष्य सर्वोत्तम गुण है। इसके लिए किन्हीं लाभदायक या अनुकूल उपलब्धियों की आवश्यकता नहीं। मात्र कुछ दिन के अभ्यास में यह विभूति हाथ लग जाती है। ऐसा मनुष्य कैसे ही वातावरण में- कैसे ही लोगों के बीच क्यों न रहे वह अनेकों आक्रोशों से बचता रहता है। दूसरों को अनुकूल बनाने, उन्हें प्रतिकूल से अनुकूल बनाने में भी ऐसे ही लोग सफल होते हैं।
उपासना की समग्रता में जप, ध्यान और भाव इन तीनों के समन्वय की आवश्यकता होती है। पूजा अर्चा को प्रतीक परिचर्या माना जाता है। प्रतिमा की दर्शन झाँकी एवं नमन वन्दन के अतिरिक्त धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, जल आदि के समर्पण को स्मरण प्रक्रिया के अंतर्गत लिया जाता है। लोग भगवान को भूले रहते हैं। यह स्मरण नहीं रखते कि सर्वव्यापी और न्यायकारी भगवान सर्वत्र समाया हुआ है वह हमारे चरित्र और चिन्तन को बारीकी से देखता है और इसी आधार पर आक्रोश एवं उपहार जन्य प्रतिक्रिया व्यक्त करता रहता है। भगवान है। इतना मान लेना पर्याप्त नहीं। उसकी प्रतिमा का दर्शन करने या नाम जपने भर से उद्धार हो जाता है यह मान्यता भी अपूर्ण है। आस्तिकता तभी सार्थक होती है जब भगवान को अपनी जीवनचर्या में स्थान दिया जाय। अपने गुण, कर्म, स्वभाव में उसकी प्रेरणा के अनुरूप गतिविधियों का समन्वय किया जाय। यह कार्य नाम लेने या प्रतिभा की झाँकी करने भर से पूरा नहीं होता। चिन्तन और मनन में यह तथ्य भी समाविष्ट रहना चाहिए कि व्यक्तित्व का निर्धारण एवं विकास इस प्रकार किया जाय, जिससे उसका अनुशासन निभे और प्रसन्नता भरा अनुग्रह हस्तगत हो। देवालयों, तीर्थ स्थानों की दर्शन झाँकी इस तथ्य की स्मृति पटल पर गहराई के साथ जमाये रहने के लिए की जाती है। यह सामान्य क्रम है जिसे उसे जितनी अधिक बार चरितार्थ कर सकना सम्भव हो उतना करना चाहिए।
इससे अगला कदम उपासना का है। उसमें नाम जप, ध्यान और भाव का समन्वय होना चाहिए। इसके निमित्त विभिन्न धर्म समुदायों में भिन्न-भिन्न प्रकार के उपाय उपचार बताये गये हैं, पर एक साधना ऐसी है जिसे मत-मतान्तरों से ऊपर सार्वभौम अथवा सर्वजनीन कहा जा सकता है।
वही सोहम् साधना। इसे हंसयोग भी कहा गया है। यह अनायास ही सधता रहता है, किंतु लोग इसे भूले रहते हैं। इसे स्मृति पटल पर जागृत कर लिया जाय और अभ्यास में उतार लिया जाय तो बिना किसी अतिरिक्त कर्मकाण्ड के यह साधना स्वयमेव चल पड़ती है।
नासिका मार्ग से श्वास प्रश्वास क्रिया अनायास ही चलती रहती है। पर इसकी ओर किसी का ध्यान विशेष रूप से नहीं जाता है। जब उसे व्यवस्थित कर लिया जाता है तो वह भगवद् भक्ति की सर्वांगपूर्ण साधना बन जाती है। श्वास-प्रश्वास के साथ एक सूक्ष्म ध्वनि होती है, वह सहज ही सुनने में नहीं आती। ध्यान एकाग्र करने पर कुछ समय में तीन शब्द उभरने लगते हैं। साँस खींचते समय ‘सो’ और छोड़ते समय ‘हम्’ की ध्वनि होती है। थोड़े अभ्यास से ही कुछ दिनों में इन ध्वनियों की अनुभूति होने लगती है।
प्राणायाम के तीन पक्ष हैं (1) साँस खींचने को- पूरक (2) साँस रोकने को- कुम्भक और साँस छोड़ने को- रेचक कहते हैं। सोहम् साधना में यह तीनों ही क्रियाएं होती रहती हैं और ‘शब्दब्रह्म’ की साधना भी। साँस लेने समय ‘सो’। रोकते समय (अ-इ) अर्ध आधार और छोड़ते समय ‘हम्’ की ध्वनि होती है उसे कुछ समय के अभ्यास से अनुभव में प्रत्यक्ष उतरने लगते हैं।
बाँस की पोली नली में होकर हवा भीतर जाती है सो सीटी बजने जैसी ध्वनि होती है उसी को ‘सो’ समझना चाहिए और नाक के साँस छोड़ते समय सभी जीवधारियों की नासिका में ‘हम्’ शब्द स्पष्ट होता है। साँप की फुसकार में- यह शब्द अधिक स्पष्ट होता है। जिसे फुसकार कहते हैं। साँस खींचने और निकालने के बीच में एक स्वल्प अवधि का विराम होता है। उसे (अ)(ऽ) आधा अ कहा जा सकता है। छोड़ते समय की ध्वनि’ “हम” जैसी प्रतीत होती है। इस प्रकार तीनों क्रियाओं को मिलकर ‘सोऽहम्’ शब्द बन जाता है। सोहम् को उल्टा कर देने पर हंस बन जाते हैं इसलिए इसे हंसयोग भी कहते हैं।
‘सः’ का अर्थ है- वह। अहम् का अर्थ होता है- मैं। पूरे सोहम् शब्द का अर्थ होता है। “वह में हूँ” वेदान्त का सार इन्हीं शब्दों में सन्निहित है। सोऽहम् शिवोऽहम् सच्चिदानंदोऽहम्’ आदि शब्द इसी के पर्यायवाची हैं। तत्त्वमसि-अयमात्मा ब्रह्म-प्रज्ञा-‘ब्रह्म’ शब्दों में उद्बोधन कराया गया है कि तू ही ब्रह्म है। यह आत्मा ही ब्रह्म है। मैं शिव हूँ- मैं सच्चिदानन्द हूँ। यह शब्दकार मात्र है। सबका अर्थ एक ही है- “मैं वह (परब्रह्म) हूँ। इसमें आत्मा और परमात्मा ही एकता का भाव सन्निहित है। इसे अद्वैत भाव भी कह सकते हैं।
भक्त और भगवान को दो मानते हुए की जाने वाली प्रार्थना को द्वैत कहते हैं। पूजा प्रयोजन में प्रयुक्त होने वाले कर्मकाण्ड एवं वस्तु विनियोग को अलग मानने से त्रैत सिद्धान्त बन जाता है। अद्वैत भाव में अपने आपको भगवत् समर्पण करना होता है और जिस प्रकार आग ईंधन- नदी नाला मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार अद्वैत भाव की साधना में भक्त और भगवान दोनों मिलकर एकत्व का अनुभव करते हैं। जिस प्रकार नमक या शकर पानी में घुलकर एक रूप हो जाता है यह समर्पण भाव अद्वैत है।
भगवान के प्रति “त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव” की भावना रखकर आराध्य प्रभु के सम्मुख प्रार्थना करने की प्रक्रिया द्वैत है और धूप, दीप, नैवेद्य, चन्दन, पुष्प का समर्पण करते हुए आत्म निवेदन करने की प्रक्रिया त्रैत है। प्रकृति पदार्थों का पूजा में समावेश हो जाने से वह त्रैत भावना बन जाती है। उपासना के सही तीन उपचार हैं। भक्त अपनी-अपनी भावना के अनुरूप इसमें से किसी का भी चयन कर सकते हैं।
‘सोहम्’ उपासना को यों अद्वैत कहा जाता है। क्योंकि उसमें स- वह अहम् (मैं) होने के समन्वय का समर्पण का एकाकार होने के भाव हैं। किन्तु तत्व दर्शन के तीनों प्रयोजनों के अनुरूप भी इसका अर्थ हो सकता है। स- वह अहम्- मैं, मैं और वह दोनों की स्थिति अलग-अलग मान लेने पर यह द्वैत हो जाएगा और इस ध्वनि के साथ साँस का आवागमन प्रकृति पदार्थ है इसलिए यह त्रैत भी हो सकता है। भक्त को अपनी मान्यता और भावना के अनुरूप इनमें से किसी को भी अपनी लेने की गुँजाइश है।
जब साँस भीतर जा रही हो तब ‘सो’ का व्रत, भीतर रुक रही हो वह (अ) का और जब उसे बाहर निकाला हो जब ‘हम’ ध्वनि का ध्यान करना चाहिए। इन शब्दों को मुख से बोलने की आवश्यकता नहीं है। मात्र श्वास के आवागमन पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है और साथ ही यह भावना की जाती है कि इस आवागमन के साथ दोनों शब्दों की ध्वनि हो रही है।
साँस पूरी ली जाय। जितनी फेफड़ों में गुंजाइश है उतनी साँस भरी जाए। पूरी साँस भरने से पेट भी फूलने लगता है। साँस रोकने का समय-खींचने की तुलना में आधा होना चाहिए। इसके बाद साँस निकाली जाय तो समय उतना लगना चाहिए जितना कि खींचने में लगाया था। इस स्थिति में जहाँ फेफड़े- सीना सरकना है वहाँ पेट भी भीतर घुस जाता है। इसे पूरी साँस लेना कह सकते हैं। यह प्रक्रिया श्वासोच्छवास की दृष्टि से भी एक उपयोगी व्यायाम जैसी है। आमतौर से लोग अधूरी साँस लेते हैं इससे फेफड़े का थोड़ा ही अंश काम में आता है और शेष निष्क्रिय पड़ा रहता है। उसमें क्षय आदि के कीटाणु जमा हो जाते हैं कड़ी मेहनत करने पर दमफूल जाता है, साँस अधूरी जाने से उनके साथ शरीर को समग्र मात्रा में मिलने वाली ऑक्सीजन भी नहीं मिलती है। यह कई हानियाँ हैं जो गहरा साँस लेने से दूर होती हैं। शारीरिक दृष्टि से सोहम् साधना एक अच्छा श्वास व्यायाम है इसके अतिरिक्त वह उपासना तो है ही।
श्वास के आवागमन के साथ-साथ ध्वनि का ध्यान करना, एकाग्रता साधने का योगाभ्यास है। साँस के आवागमन पर और उसके साथ आने वाली ध्वनि पर मन को एकाग्र करने से ध्यान योग की साधना हो जाती है। ध्यान से मन का बिखराव दूर होता है और प्रकृति को एक केन्द्र पर केन्द्रित करने से उससे एक विशेष मानसिक शक्ति उत्पन्न होती है। उससे जिस भी प्रयोजन के लिए- जिस भी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाय उसी में जागृति-स्फुरणा उत्पन्न होती है। मस्तिष्कीय प्रसुप्त क्षमताओं को- षट्चक्रों को- तीन ग्रन्थियों को- जिस भी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाय वही सजग हो उठता है और उसके अंतर्गत जिन सिद्धियों का समावेश है उनमें तेजस्विता आती है।
सोहम् साधना के लिए किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। न समय का न स्थान का। स्नान जैसा भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। जब भी अवकाश हो, सुविधा हो, भाग दौड़ का काम न हो, मस्तिष्क चिन्ताओं से खाली हो। तभी इसे आरम्भ कर सकते हैं। यों हर उपासना के लिए स्वच्छता, नियत समय, स्थिर मन के नियम हैं। सुगन्धित वस्तुओं से वातावरण को प्रसन्नतादायक बनाने की विधि है। वे अगर सुविधापूर्वक बन सकें तो श्रेष्ठ। अन्यथा रात्रि को आँख खुलने पर बिस्तर पर पड़े-पड़े भी इसे किया जा सकता है। यों मेरुदण्ड को सीधा रखकर पद्मासन से बैठना हर साधना में उपयुक्त माना जाता है, पर इस हंसयोग में उन सबका अनिवार्य प्रतिबन्ध नहीं है।
एकाग्रता के लिए हर साँस पर ध्यान और उससे भी गहराई में उतर कर सूक्ष्म ध्वनि का श्रवण इन दो प्रयोजनों के अतिरिक्त तीसरा भाव पक्ष है जिसमें यह अनुभूति जुड़ी हुई है कि “मैं वह हूँ” अर्थात् आत्मा, परमात्मा के साथ एकीभूत हो रही है, इसके निमित्त वह सच्चे मन से आत्मसमर्पण कर रही है। यह समर्पण इतना गहरा है कि दोनों के मिलन से एक ही सत्ता मिट जाती है और दूसरे की ही रह जाती है। दीपक जलता है तो लौ के प्रज्ज्वलन में मात्र बत्ती ही दृष्टिगोचर होती है तेज तो नीचे पैंदे में पड़ा अपनी सत्ता बत्ती के माध्यम से प्रकाश के रूप में समाप्त ही करता चला जाता है।
सोऽहम् साधना को हंसयोग कहते हैं। इसमें शब्दों को उलटकर सोहम् का हंस तो बना ही है। साथ ही भगवान के 24 अवतारों में एक अवतार हंस भी है जिसका रहस्य ही नीर क्षीर विवेक। कहते हैं कि दूध और पानी मिलाकर सामने रखने पर हंस उसमें से पानी का अंश छोड़ देता है और मात्र दूध ही ग्रहण करता है। इस उदाहरण में साधक के लिए प्रेरणा है कि मात्र औचित्य को ही ग्रहण करें। संसार में भला-बुरा कुछ मिला-जुला है। विवेक के अभाव में लोग सब कुछ अपनाते रहते हैं। जिससे भी स्वार्थ सिद्ध होता है उसी को कर गुजरते हैं। छोड़ने और ग्रहण करने में औचित्य की कसौटी लगाना आवश्यक नहीं समझते। हंसयोग की साधना में साधक को हर कदम फूँक-फूँक कर धरना होता है और मात्र उचित ही अंगीकृत करना होता है। अनुचित चाहे कितना ही आकर्षक क्यों न हो, उससे कितना ही लाभ क्यों न दिख पड़ता हो, पर उसे विषवत् त्यागना होता है। ‘सोहम्’ साधना को अजपा जप या अजपा गायत्री कहा जाता है। इसे जीवात्मा अनायास ही अहिर्निशि जपता रहता है। श्वास-प्रश्वास द्वारा। किन्तु वह ध्यान एवं भाव के अभाव में प्रसुप्त स्तर की रहती है और उनका कोई प्रतिफल नहीं मिलता जिस भूमि पर भ्रमण कर रहे हैं उसके नीचे भले ही बहुमूल्य खजाना दबा पड़ा हो, पर जानकारी के अभाव में उसे न तो निकालने का प्रयत्न बन पड़ता है और न सदुपयोग की योजना के अभाव को कोई लाभ मिलता है।
गायत्री को आद्य शक्ति और मन्त्रों में शिरोमणि कहा गया है। उसका अपना विधि-विधान भी है और संस्कृत भाषा के आधार पर उसका अर्थ भी सद्बुद्धि प्रेरणा परक बनता है। तद्नुसार उसका महात्म्य एवं प्रतिफल भी है। इतने पर भी अब अन्य भाषा भाषी, अन्य धर्मावलम्बी उसे उतना मान नहीं देते जितना देना चाहिए। किन्तु सोहम् (अजपा गायत्री) के सम्बन्ध में यह बात नहीं है। साँस सभी लेते हैं और उसके साथ सम्मिलित रहने वाली ध्वनि का कोई भी आभास प्राप्त कर सकता है इसलिए वह सार्वभौम भी है और सर्वजनीन भी। इसमें किसी भाषा या सम्प्रदाय का झंझट नहीं है।
देवी भागवत के अनुसार हंसयोग में सभी देवताओं का समावेश है यथा-
हंसो गणेशो विधिरेव हंसो, हंसो हरिर्मयश्च शम्भु। हंसो हि जीवो गुरुदेव हंसो, हंसो ममात्मा परमात्म हंसः॥
ह कारेण वहिर्यांति, सकारेण विशेत् पुनः। हंसात्मिकां भगवती जीवो जपति सर्वदा॥
अर्थात् ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश मय हंसयोग हैं। हंस ही गुरु है, हंस ही जीव ब्रह्म अर्थात् आत्मा परमात्मा है।
जीव भगवती अजपा गायत्री का जप निरन्तर करता है। सकार के रूप में वह भीतर प्रवेश करती है और हकार के रूप से बाहर निकलती है।
‘शारदा तिलक’ में ऐसा ही शास्त्र वचन है-
हसः परं परेशनि प्रत्यहं जपते नरः। मोहान्धो योन जानाति, मोक्ष तस्य न विद्यते। अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्ष दायिनी॥
तस्या विज्ञान मात्रेण नरः पायै प्रमुच्यते। अनया सादृशी विद्या चानयो सादृशो जपः। अनया सदृशं पुण्यं न भूतं न भविष्यति॥
अर्थात्- प्रत्येक श्वास के साथ मनुष्य सोहम् जाप करता है। जो उसे नहीं जानता उस मोहान्ध को कभी मोक्ष नहीं मिलता।
आजपा गायत्री योगियों को मोक्ष प्रदान करने वाली है। उसका विज्ञान जानने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इसके समान और कोई विद्या नहीं। इसके समान और कोई जप नहीं। इसके बराबर और कोई पुण्य न भूत काल में हुआ है न भविष्य में होगा।
बहिर्जगत का पर्यवेक्षण एवं रसास्वादन करने के लिए प्रकृति ने ज्ञानेन्द्रियाँ प्रदान की हैं। इनके द्वारा संसार के दृश्य श्रव्य स्वरूप को हम अनुभव करते हैं और अनुभव में आने वाली पदार्थ सम्पदा का लाभ उठाते हैं। यह भगवान का महान् अनुग्रह है। यदि आँख, कान, त्वचा आदि इन्द्रियाँ न होतीं तो संसार में उपयोगी पदार्थ भरा होने पर भी हम उसका उपयोग न कर पाते।
यह बाह्य कलेवर है जिसका लाभ हम सभी उठाते हैं। पर इतना ही सब कुछ नहीं है। इसके अतिरिक्त बहुत कुछ अन्तरंग भी है जो इन्द्रियों की पकड़ में तो नहीं आता पर उसकी सत्ता और महत्ता बहिरंग की तुलना में किसी प्रकार कम नहीं है। अन्तरंग में आमाशय, आँखें, गुर्दे, मूत्राशय, यकृत, फुफ्फुस, मस्तिष्क आदि की गतिविधियाँ एवं उपयोगिताएं इतनी अधिक हैं कि उनमें से किन्हीं के गड़बड़ा जाने से शरीर तन्त्र लड़खड़ाने लगते हैं। रोगों की व्यथा सहता है और किसी काम का नहीं रहता। इन अवयवों का स्वरूप, क्रियाकलाप एवं सक्षम होना संग्रहित ज्ञान के आधार पर विदित होता है यदि वे गड़बड़ाते हैं तो उनकी चिकित्सा के लिए बुद्धि का उपयोग करना पड़ता है। इसका अर्थ हुआ कि बुद्धि की पहुँच अधिक गहरी है। और जिन समस्याओं को इन्द्रियाँ नहीं सुलझा सकतीं उन्हें बुद्धि सुलझाती है।
अन्तरंग में चमड़े के खोखले में दबे ढके अवयव हैं। पर इतने से अन्तरंग की समूची व्याख्या नहीं हो जाती। व्यक्तित्व के साथ जुड़े हुए गुण, कर्म, स्वभाव के एक विशाल क्षेत्र हैं। जानकारियों से सम्बन्धित सुविस्तृत परिकर भी है। यह बुद्धि से भी गहन स्तर के विवेक अनुशासन के अंतर्गत आते हैं। शरीर स्थूल है। उसकी स्थिति का परीक्षण इन्द्रियों के सहारे जाना जा सकता है। शरीर का जो भाग अदृश्य है उसे बुद्धि समझती और सन्तुलित बनाये रहने के प्रयास अभ्यास करती है।
किन्तु यह नहीं समझ लेना चाहिए कि दृश्य या अदृश्य शरीर तन्त्र ही सब कुछ है। वह मात्र साँसारिक उपलब्धियों को संजोने भर के काम आता है। व्यक्तित्व इससे आगे की-गहराई की वस्तु है। साथ ही वह अधिक मूल्यवान महत्वपूर्ण भी है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय मान्यता, आकाँक्षा, भावना और विचारणा से गठित है। साथ ही उसमें आदतें भी अभ्यास बनकर निवास करती हैं। संस्कार इन्हीं को कहते हैं। यह संस्कार ही प्रेरणाएं देते हैं। काम दिशाधारा निर्धारित करते हैं और जीवनचर्या में रीति-नीति का समावेश करने वाला ताना-बाना बुनते हैं। यही है हमारा गहन अन्तराल जिसके संकेतों पर व्यक्ति उत्कृष्टता एवं निकृष्टता अपनाता है। समूचा जीवन तन्त्र इसी आधार पर अपनी रुझान और प्रयास को गतिशील करता है। यह कार्य दूरदर्शी विवेकशीलता का है। यदि वह ठीक काम कर रही होगी तो मनुष्य भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाला मार्ग चुनेगा और उस मार्ग पर चलेगा जिसमें वह अपना ही भला न होता हो, वरन् संपर्क में आने वालों का, स्तर भी ऊँचा उठ सके।
पवित्रता और प्रखरता यह दो गुण ऐसे हैं जो विवेकशीलता के आधार पर ही उपलब्ध होते हैं। अदूरदर्शी तात्कालिक लाभ देखते हैं भले ही पीछे उनके कारण कितनी ही बड़ी हानि क्यों न उठानी पड़े। इसके विपरीत दूरदर्शी अपने चिन्तन और कर्तव्य को इस कसौटी पर कसते हैं कि भविष्य में इसकी परिणति होगी। यह विवेक ही किसी के वास्तविक उत्थान और पतन का कारण होता है।
जिनके मस्तिष्क अन्ध-विश्वासों से मुक्त हैं उन्हें मृत्यु भी भयभीत नहीं कर सकती।
विद्युतधारा बिजली के तारों में सतत् गतिशील रहती है। कोई उसे देखना चाहे तो देखा नहीं जा सकता किन्तु उसकी उपस्थिति का बोध देने वाले अनेकों ऐसे उपाय हैं जिनका सहारा लेकर यह प्रमाणित किया जा सकता है कि इन तारों में विद्युत प्रवाहित हो रही है। टेस्टर, टेस्ट लैंप, गैल्वेनोमीटर, ए-मीटर, मल्टीमीटर, वोल्टमीटर आदि से विद्युत के विद्यमान होने व उसके परिमाण की जानकारी प्राप्त कर अपनी मान्यता को पुष्टि भी दी जा सकती है। तारों को नंगे छूने पर बिजली का शॉक लगता है, यह सभी जानते हैं, तो भी कोई यह जानने के लिए ऐसा कोई प्रयास नहीं करता कि विद्युत इसमें है या नहीं? इसी प्रकार चुम्बकत्व एक शक्ति है जो कुतुबनुमा की सुई को उत्तर-दक्षिण दिशा में बने रहने को विवश करती है। उसे कहीं भी, किसी भी स्थान पर ले जाया जाय वह सदैव पृथ्वी के उत्तरी-दक्षिणी चुम्बकीय ध्रुवों की दिशा इंगित करती ही रहेगी। चुम्बकत्व को कोई आँखों से देखने का दुराग्रह करे तो इसे बाल-बुद्धि ही कहा जायेगा। परमात्मा की परम सत्ता इसी प्रकार एक अदृश्य सामर्थ्य है जो अन्तः की श्रद्धा एवं मन के विश्वास के एकीकृत रूप में व्यक्ति सत्ता के अन्दर सदैव विद्यमान रहती है, उसके कण-कण में ओत-प्रोत रहती है।
ऐसे अनेकों पौराणिक आख्यान धर्मग्रन्थों में मिलते हैं जो समय-समय पर सृष्टा के युवराज मनुष्य को दैवी सहायता मिलते रहने के रूप में प्रमाणित करते हैं कि आत्म-शक्ति के पूरक रूप में परमात्म शक्ति का अस्तित्व है। भले ही वह आँखों से दृष्टिगोचर न हो, उसकी अजस्र अनुकम्पा रूपी क्रिया-कलापों को ऐसे उदाहरणों में सहज ही देखा व उस सत्ता पर विश्वास किया जा सकता है।
द्रौपदी निस्सहाय अबला के रूप में कौरवों की राजसभा में खड़ी थी। दुराचारी कौरवों द्वारा चीर-हरण किए जाने पर किसी मानव ने नहीं, ईश्वरीय सत्ता ने उसकी लाज बचाई। दमयन्ती का बीहड़ वन में कोई सहायक नहीं था। सतीत्व पर आँच आने पर स्वयं भगवत् सत्ता उसकी नेत्रों से ज्वाला रूप में प्रकट हुई और उसने व्याध को जलाकर भस्म कर दिया। प्रहलाद को दुष्ट पिता से मुक्ति दिलाने एवं ग्राह के मुख में गज को छुड़ाने स्वयं भगवान आगे आए थे। निर्वासित पाण्डवों की रक्षा स्वयं भगवान ने की। अपने प्रिय सखा अर्जुन का रथ जोता, एवं गीता का उपदेश देकर धर्म-दर्शन का निचोड़ मार्गदर्शन हेतु प्रस्तुत किया, साथ ही महाभारत की भूमिका बनाकर सतयुग की स्थापना हेतु स्वयं भूमिका निभाई। नरसी भगत के सम्मान की रक्षा व मीरा को विष के प्याले से बचाने हेतु स्वयं भगवत् सत्ता ही आगे आई थी। भागीरथ के तप को सफल बनाने एवं पवन पुत्र हनुमान को उनकी शक्ति का बोध करा असम्भव पुरुषार्थ सम्भव कर दिखाने में परमात्म सत्ता ही मुख्य भूमिका निभा रही थी।
ये सभी उदाहरण प्राचीन पौराणिक गाथाएं कहकर झुठलाये जा सकते हैं और उनकी सत्यता से इनकार किया जा सकता है। हमारा देश सदियों से भाव प्रधान और आस्तिक-आध्यात्मिक विचारों की जन्मभूमि रहा है अतएव इन घटनाओं को किंवदंतियों की भी संज्ञा दी जा सकती है। किन्तु सनातन सत्ता को काल गति और ब्रह्मांड से सर्वथा परे है जिस तरह वह प्राचीन काल में थी, आज भी है और उसकी अदृश्य सहायताएं पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण तक आज भी श्रद्धालु जन प्राप्त करते रहते हैं। टंग्स्टन तार पर धन व ऋण विद्युत धाराओं के अभिव्यक्त होने की तरह यह ईश्वरीय अनुदान जिन धाराओं के सम्मिश्रण से किसी भी काल में प्रकट होते रहते हैं वह हैं श्रद्धा और विश्वास। यह सत्ताएं जहाँ कहीं जब कभी हार्दिक अभिव्यक्ति पाती हैं परमेश्वर की अदृश्य सहायता वहाँ उभरे बिना नहीं रह सकती। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण थियोसोफी के विद्वान सी. डब्ल्यू. लेडमीटर ने अपनी पुस्तक “इनविजिबल हेल्पर्स” नामक पुस्तक में दिये हैं जिनसे इस युग में भी अदृश्य दैवी सत्ता के अस्तित्व पर विश्वास हुए बिना नहीं रहता। लेडीरुथ मान्टगुमरी की पुस्तक ‘सत्य की खोज में’ 20वीं शताब्दी की सबसे आश्चर्यजनक घटना के रूप में सराक्यूज की रोती हुई प्रतिमा’ उल्लेख किया गया है। एक सरल हृदय अपंग किन्तु श्रद्धालु महिला की भाव-भरी प्रार्थना से विह्वल होकर उसकी प्लास्टर आफ पेरिस की प्रतिमा की आँखों से आँसू बह निकले। डच विद्वान फादर ए सोमर्स ने स्वयं मूर्ति और उसके आँसुओं का परीक्षण करने के बाद उसे विस्तार से समाचार पत्रों में छपवाया और एच. जोर्गन ने उसका अंग्रेजी रूपांतरण प्रकाशित कराया।
यह महिला थी एण्टोर्निएटा जिसका मार्च 1953 में विवाह हुआ था एवं उसकी आस्तिकता परक मनोवृत्ति होने के कारण उसकी एक भावुक मित्र ने उसे एक छोटी सी प्लास्टिक आफ पेरिस की ईसा की प्रतिमा भेंट स्वरूप दी थी। वह एक विडम्बना ही थी कि विवाह के बाद गर्भ ठहरने पर वह रोगी हो गयी एवं भ्रूण परिपक्व होने से पूर्व ही नष्ट हो गया। लड़की को भयंकर मिर्गी के दौरे पड़ने लगे और जब भी वह होश में रहती, व्याकुल मन से परमात्मा से यही गुहार करती कि “हे प्रभु! तू कितना निर्दयी है। क्या तुझे अपनी सन्तान की पीड़ा देखकर दुःख नहीं होता।” हर समय प्रार्थना के समय वह प्रतिमा को अपने से चिपटाए रखती। कुछ ही दिनों में देखा गया कि एण्टोर्निएटा के साथ-साथ प्रतिमा के आँखों से आँसू झरने लगे हैं। इसी प्रतिमा को “बीपिंग स्टेच्यू ऑफ सराक्यूज” नाम से प्रसिद्धि मिली एवं सात दिन यह घटनाक्रम चलता रहा, वैज्ञानिक परीक्षण चले एवं कोई भी इस पहेली को सुलझा न पाया कि इन आँसुओं का कारण क्या है?
परमात्मा सत्ता की ऐसी ही कृपा का परिचय 1874 में इंग्लैण्ड से न्यूजीलैण्ड जा रहे एक जहाज में घटी घटना से मिलता है। 214 यात्रियों को लेकर जा रहे इस जहाज को पेंदी में अचानक एक छेद हो गया। पानी तेजी से जहाज में भरने लगा। पम्पों से पानी निकाला जाने लगा पर पानी अन्दर आने की गति पम्पों की क्षमता से अधिक थी। अब तो लाइफ बोट से जितनी जान बचायी जा सकें, वे ही प्रयास किए जा रहे थे। तभी अचानक जहाज में पानी आना बन्द हो गया। सभी ने चैन की साँस ली। अगले बन्दरगाह पर जब मरम्मत के लिए जहाज रुका, तो पाया गया कि एक विशाल मछली की पूँछ जहाज की तली में हुए छेद में फँसी है एवं यह मृत मछली घिसटती हुई साथ चली आयी है। सारे यात्रियों ने इस मछली को परमात्मा का दूत माना। जिसकी वजह से उनकी जान बची।
महाभारत के युद्ध में घण्टे के नीचे दबे टिटहरी के बच्चे किस अदृश्य सत्ता के सहारे जीवित बने रहे, यह विज्ञान की भाषा में न समझा जा सकता है, न समझाया जा सकता है। कई बार ऐसे प्रसंग आए हैं जिनमें जलते हुए मकान में बच्चे सुरक्षित पाये एवं तपती ईंटों के लावें में पक्षी जीवित रह सकने में सफल हुए। इन्हें मात्र संयोग नहीं कहा जा सकता। परमात्म सत्ता के अदृश्य रूप को देखा नहीं जा सकता पर इन प्रमाणों को तो भली-भांति देखा व निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कोई परोक्ष नियामक सुव्यवस्थित सत्ता है अवश्य जो समग्र सूक्ष्म क्रिया-कलापों पर अपनी दृष्टि रखती है एवं अपनी अनुकम्पा का परिचय समय-समय पर देती, आस्तिकता की भावना को दृढ़ बनाती है।
स्थूल बुद्धि के व्यक्ति उस सूक्ष्म को कहाँ स्वीकारते हैं? स्वीकार लें तो न केवल आध्यात्मिक अपितु हमारा व्यावहारिक संसार भी सुख-शान्ति से ओत-प्रोत हो सकता है। उचित और आवश्यक तो यह है कि उस दिव्य सत्ता के प्रति श्रद्धा भाव विकसित किया जाय तथा अपनी आत्मिक शक्ति का अभिवर्धन किया जाय।
तुम हँसोगे तो दुनिया हँसेगी, तुम्हारा साथ देगी। किन्तु यदि रोने लगे तो देखोगे कि उस वजन को अकेले ही उठाना पड़ रहा है।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि जीव सत्ता के दो पक्ष हैं- एक चिन्तन-चेतना से सम्बन्धित अन्तरंग एवं दूसरा काय-कलेवर तथा उसका बहिरंग व्यवहार। समग्र व्यक्तित्व इन दो घटकों का समुच्चय भर है। इन दोनों ही पक्षों को कुमार्गगामी न बनने देने के निमित्त सतर्कता परिष्कार प्रखरता की आवश्यकता पड़ती है, साथ ही प्रगति पथ पर सुनियोजन हेतु भावभरी तत्परता की। प्रगतिशीलता का आधार मात्र इसी एक केन्द्र पर केन्द्रीभूत है कि व्यक्तित्व का स्तर कितना ऊँचा उठाया गया? भौतिक सफलता भी उसकी ही परिणति है। यदि वे कहीं से जाकर थोप दी जायें तो दुर्गुणों-दुर्व्यसनों के माध्यम से किनारा करने का मार्ग स्वतः ढूंढ़ निकालती हैं।
आमतौर से जब भी, कभी प्रगतिशीलता की चर्चा होती है, भौतिक सफलताओं की- पद वैभव की- संचय उपयोग की बात ही सामने होती है। चर्म चक्षु मात्र दृश्य पक्ष ही तो देख सकते हैं। सामान्य बुद्धि के लिए इसी दिशा में सोचना सम्भव हो पाता है। किन्तु थोड़ी सी गहराई में प्रवेश करने पर नये तथ्य सामने आते हैं। सफलताएं वस्तुतः सद्गुणों और सत्प्रयासों के समन्वय की ही चमत्कृतियाँ हैं। वे ही स्थायी भी होती हैं, सुखद भी सराहनीय एवं सन्तोषजनक भी। इससे इतर उपाय अपहरण का है। छल, दबाव, प्रलोभन, आक्रमण जैसी अपराधी प्रवृत्तियाँ मनुष्य को कुचक्री, आतंकवादी बनाती हैं इस आधार पर जो कमाया गया है, प्रकारान्तर से वह असीम कष्टकारक परिणतियाँ लेकर कुछ ही समय उपरान्त सामने आ खड़ा होता है।
आत्म-प्रताड़ना, अंतर्द्वंद, पश्चात्ताप जैसे तत्व ऐसे हैं जिनसे कोई कुमार्गगामी बन नहीं सकता। अपनी आँख में जो गिरता है वह समीपवर्तियों से लेकर दूरवर्तियों तक की आँखों में गिरता चला जाता है। उनका न कोई स्नेही रहता है, न घनिष्ठ, न मित्र, न साथी, न प्रशंसक, न समर्थक। यह विभूतियाँ अन्तःक्षेत्र को प्रभावित करने वाली ऐसी विभूतियाँ हैं, जिनके बिना कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में आज तक ऊँचा उठने में सफल नहीं हुआ। दुष्ट दुराचारियों की चाण्डाल चौकड़ी, सज्जन समुदाय की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी रहती है। एक दूसरे के साथी होने का भी दम भरते हैं पर यह सहयोग समर्थन कागज की नाव की तरह, पानी के बबूले की तरह सर्वथा दुर्बल एवं उथला होता है। स्वार्थ सिद्धि में कमी आते ही अथवा टकराव का तनिक-सा कारण उपस्थित होते ही चाण्डाल चौकड़ी का कोई भी सदस्य दूसरे के लिए आक्रामक हो सकता है। कल की दाँत-काटी रोटी आज जानी दुश्मन का रूप धारण करती देखी गई है। करण स्पष्ट है श्मशान में जमा होने वाले प्रेत-पिशाचों और लाश कुतरने में लगे चील, कौओं की तरह वे लोग एकत्रित भर दिखते हैं पर आत्मीयता की गहराई नाम मात्र को भी न होने के कारण उनके विगठन में भी देर नहीं लगती। इतना ही नहीं इन दोस्तों को दुश्मन बनाने में किसी प्रकार की ग्लानि अनुभव नहीं होती। अनैतिक आधार पर जुड़े हुए जम घटे सदा इसी स्तर के होते हैं और उनमें सम्मिलित रहने वालों में से प्रत्येक को निराशा सहनी पड़ती है।
मानवी अन्तराल की बनावट में कुछ मौलिक तत्व हैं। उन्हें हटा या मिटा सकना किसी के बस की बात नहीं है। शालीनता इसी प्रकार का तत्व है। नीतिमत्ता, उदारता, उत्कृष्टता, सज्जनता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ शालीनता का ही अंग है। उन्हें अपनाये रहने पर ही मनुष्य को अन्ततः सन्तोष मिलता है और शान्ति का अनुभव होता है। इस मार्ग से जो जितना च्युत होता जाता है वह अपने भीतर उतने ही जटिल अन्तर्द्वन्द्वों का अनुभव करता है और विभिन्न प्रकार के विक्षोभों से फिरता चला जाता है। यह विक्षोभ मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह चौपट कर रख देते हैं। कई प्रकार की सनकें व्यक्ति को अर्ध विक्षिप्त बना देती हैं।
अन्तःजीवन ही वास्तविक जीवन है। क्योंकि व्यक्तित्व चेतना मूलक है और चेतना का, उत्कृष्टता का कार्यक्षेत्र अन्तराल ही है। अनैतिक आदतों एवं गतिविधियों का प्रभाव अन्तःजीवन को अस्त-व्यस्त करने के रूप में निश्चित रूप से पड़ता है और व्यक्ति निरन्तर मानसिक तनावों से घिरा रहता है। मनोविकारों के कारण उत्पन्न होने वाली अगणित शारीरिक मानसिक आदि-व्याधियों से ग्रसित होकर व्यक्ति अपंग असमर्थों जैसे- तिरष्कृत बहिष्कृतों जैसा हेय जीवन जीता है। यह है वह परिणति जो भौतिक सफलता की आतुरता में अनीति का मार्ग अपनाने पर उत्पन्न होती है। शान्त चित्त से पर्यवेक्षण करने पर ही पता चलता है कि अवाँछनीय मार्ग से उपलब्ध की गई सफलताएं अन्ततः कितनी महंगी पड़ी।
सम्पदा या सफलता अर्जित करना एक बात है और उसका सदुपयोग करके अपने लिए तृप्ति, तुष्टि एवं शान्ति अर्जित करना तथा दूसरों के लिए प्रगति प्रसन्नता का वातावरण उत्पन्न करना दूसरी। मात्र वैभव उपार्जन नितान्त अपूर्ण है। सदुपयोग की दृष्टि विकसित हुए बिना सम्पदा उलटी विकृत्तियों का कारण बनती और वातावरण में विक्षोभ उत्पन्न करके अनेकानेक संकटों का सृजन करती है।
चर्चा यह हो रही थी कि प्रगति की आन्तरिक आकाँक्षा क्या सम्पदा संचय से, सफलताओं के घटाटोप एकत्रित करने से पूर्ण हो सकती है? गम्भीर चिन्तन से निष्कर्ष वह नहीं निकलता जो मोटी दृष्टि से समझा या सोचा जाता है। सफलता या सम्पदा के सत्परिणाम उसी स्थिति में उपलब्ध हो सकते हैं जब सदुपयोग की शालीनता समर्थक सदाशयता की दृष्टि भी प्रखर परिपुष्ट बन सके।
प्रगति में इस स्तर की महत्वाकांक्षाएं भी मनुष्य को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती और क्षमता बढ़ाने की उत्तेजना देती हैं। इस प्रक्रिया का औचित्य एवं सफलता का महत्व उसी सीमा तक स्वीकारा जा सकता है जिसमें कि वह व्यक्ति को प्रगति के लिए पुरुषार्थ करने की प्रेरणा प्रदान करे। किन्तु यदि धन को अनुचित रीति से कमाने और दुरुपयोग में खर्च करने की तरह यहाँ भी अवाँछनीयता अपनाई गई, दृष्टिकोण में निकृष्टता घुस पड़ी तो फिर उन्हें भी अनुचित रीति से उपार्जित किया जाने लगेगा। उपलब्ध होने पर अहंकार प्रदर्शन के लिए- दूसरों को आतंकित करने के लिए काम में लाया जाने लगेगा। ऐसा प्रायः देखा भी जाता है कि विशिष्टता उपलब्ध होते ही लोग उसका उपयोग विभिन्न प्रकार के अनुचित स्वार्थ साधने में करने लगते हैं और दुर्बलों को आतंकित करके अपनी शक्ति से अन्यान्य लोगों को प्रभावित चमत्कृत करने में जुट जाते हैं।
शरीर से बलिष्ठ लोगों को गुण्डागर्दी अपनाते- सौन्दर्यवानों को कामुकता का जाल बिछाते- नेताओं को अकारण हड़तालें कराते- पदवी धारियों को स्वागत कराते प्रशस्ति संचय करने के लिए आडम्बर खड़े करते कहीं भी देखा जा सकता है। मध्यकाल के सम्पन्नों ने जिस प्रकार के अनाचार आतंक फैलाये थे उनके रोमाँचकारी वर्णन कत्लेआमों-अपहरणों-उत्पीड़नों की अगणित घटनाओं के इतिहास के रक्त रंजित पृष्ठ पढ़कर भली प्रकार समझा जा सकता है। इसमें विलासिता की असीम सामग्री समेटने की हविश तो प्रधान थी ही पर अपनी समर्थता बलिष्ठता से सर्वसाधारण को आतंकित करने की महत्वाकांक्षा भी कम नहीं थी। उन्हें लगता होगा शूर सामन्त होना- सर्व सर्वश्रेष्ठ होने का यह तरीका सस्ता और सुलभ है। साधन रहित लोग- साधन सम्पन्न लोगों के सशस्त्र गिरोह का मुकाबला तो कर नहीं सकेंगे फलतः सफलता बात की बात में मिलती चलेगी। जिसकी भी बेटी, सम्पत्ति छीनने का मन होगा उसी में प्रतिरोध न रहने के कारण बेरोक-टोक दाल गलती चलेगी। मध्यकालीन सामन्त जो कार्य संगठित रूप से खुलेआम करते थे उसी को इन दिनों डाकुओं द्वारा लुक-छिपकर अपनाया जाता है। हत्यारों के लिए पैसा लेकर किसी का भी कत्ल कर देना एक व्यवसाय बन गया है।
कलाकारों गायकों, वादकों, अभिनेताओं का वर्ग भी इसी प्रकार का है जिनकी प्रतिभा का लाभ जन साधारण को मिला? पीढ़ियाँ इनकी विभूतियों से क्या कुछ ग्रहण कर सकीं, इसका लेखा-जोखा लेने पर निराशा होती और खीज उठती है। साहित्यिक प्रतिभा, चित्रकार, कवि इन दिनों समाज को क्या कुछ दे रहे हैं, उनके अनुदान समाज के उत्थान-पतन में क्या योगदान दे रहे हैं- इसका दूरगामी परिणाम सोचने वालों को लगता है, यदि प्रतिभाएं यदि जन्मी ही न होतीं तो मनुष्य जाति अधिक भाग्यवान रहती। ठीक है उन प्रतिभावानों ने स्वयं सम्पत्ति और वाहवाही कमाई- अपने पालन कर्ताओं को भी धन कुबेर बना दिया। इतने पर भी देखना यह होगा कि उन विशेषताओं ने उन विभूतिवानों का इतिहास क्यों बनाया? पीढ़ियों के लिए क्या आदर्श? छोड़ा और अपने आप में कितना आत्म-सन्तोष उपलब्ध हुआ। विलक्षणता सम्पन्न तो भूत-पलीत और प्रेत-पिशाच भी होते हैं। लोकप्रिय तो मदिरा भी है। वैश्याओं के चकले भी कितनों को ललचाते रहते हैं। इन सभी में कुशलता और विशिष्टता का चमत्कार झाँकता देखा जा सकता है। इतने पर भी वे सभी चमकीले यमदूतों की तरह मानवी चेतना को कलुषित करने और भविष्य को अन्धकार के गर्त्त में धकेलते देखे जाते हैं।
समझा जाना चाहिए कि प्रगति एवं सफलता एकपक्षीय नहीं है। भौतिक उपलब्धियाँ आँखों को कितनी ही लुभावनी क्यों न प्रतीत हों। उनसे विलास लूटने एवं आतंक जमाने में किसी को कितना ही अवसर क्यों न मिले? अन्ततः वह समूची विडम्बना विश्व मानव के लिए अभिशाप बनकर ही रहेगी।
सोचा इस प्रकार जाना चाहिए कि संपदाओं एवं सफलता के साथ-साथ यदि उपलब्ध कर्ता ने शालीनता की रीति-नीति अपनाई है तो वह उस पुरुषार्थी को आत्म-संतोष, चिरस्थायी यश और दूरगामी श्रेय प्रदान कर सकेगी। यदि उन उपार्जनों का उपयोग उत्कृष्टता के समर्थन, अभिवर्धन में हो सका तो ही उससे सुखद सम्भावनाओं का द्वार खुल सकेगा। प्रगति का यही स्वरूप सच्चा है और अपनाने योग्य है।
सन्त विनोबा भगवान् कृष्ण के बड़े भक्त थे। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान दर्शन देने उनके घर आये।
सन्त अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा में संलग्न थे। भगवान को घर आया देखकर वे पुलकित हो गये। पर विवेक नहीं खोया। भगवान के लिए उनने पास में पड़ी ईंट उठाकर बैठने के लिए रख दी और कहा- अपने कर्त्तव्य धर्म को पूरा कर लूँ तक आपकी पूजा-अर्चा करूंगा।
भगवान ईंट पर प्रतीक्षा में बैठे रहे। नियम उत्तरदायित्व से निवृत्त होने पर उनकी पूजा हुई। ईंट वाला विठोबा मन्दिर’ अभी भी प्रख्यात है।
इस संसार में सब कुछ ऐसा नहीं है जो अपने को प्रिय सुखद या अनुकूल ही लगे। बहुत सी परिस्थितियाँ तथा वस्तुएं ऐसी होती हैं जिन्हें प्रतिकूल या अप्रिय कहा जा सके। कितने ही व्यक्ति भी ऐसे होते हैं जिनका स्वभाव या आचरण गले नहीं उतरता। इस संसार की संरचना ही ऐसी है। यहाँ अन्धेरे और उजाले की आँख मिचौनी चलती है। भलों के साथ-साथ बुरों से भी पाला पड़ता है। जो घटित होता रहता है वह सब कुछ इच्छित या प्रिय ही नहीं होता। यहाँ अनिच्छित या अप्रिय का भी अस्तित्व है।
विश्व संरचना को देखते हुए उपयुक्त यही है कि हम अपनी प्रतिक्रिया को सन्तुलित करें और ऐसी नीति अपनायें, जिसके सहारे शान्तिपूर्वक निर्वाह होता रहे और सुखद को अर्जित करने के लिए अवसर एवं अवकाश बच सके। अप्रीतिकर की ही गणना करते रहे, उस पर खीजते रहें तो भी सीमित पुरुषार्थ से प्रतिकूलताओं को सर्वथा हटा सकना सम्भव नहीं। उन्मूलन प्रतिशोध और संघर्ष की बात सिद्धान्ततः सही हो सकती है पर उसका व्यावहारिक प्रयोग एक सीमा तक ही सम्भव है। कितनों से कब तक लड़ते रहा जायेगा। खीजा किस-किस से कब तक जायेगा। प्रतिशोधात्मक आक्रमण सदा सफल ही नहीं होते। उनसे कई बार बात और भी अधिक बढ़ जाती है। आक्रमण और प्रत्याक्रमण का कुचक्र ऐसा ही है जिसे किसी ओर से तो तोड़ा ही जाना चाहिए अन्यथा आय में ईधन पड़ते रहने से विपत्ति हटेगी नहीं वरन् बढ़ती ही रहेगी।
प्रतिकूलताएं अपने लिए जिस हद तक हानिकर हैं, या हो सकती हैं, उसकी सतर्कता रखना आवश्यक है। बचाव पक्ष पर समय रहते ध्यान दिया और प्रबन्ध किया जाना चाहिए। अनिष्टों की ओर से आंखें बन्द कर लेना उचित नहीं। प्रतिकार की सामर्थ्य भी संचित करनी चाहिए और समयानुसार उसका नपा-तुला उपयोग करना चाहिए। इसके लिए सन्तुलित बुद्धि की आवश्यकता है। अन्यथा थोड़ी-सी कठिनाई एवं छोटी-सी प्रतिकूलता भी मानसिक उद्वेग का कारण बन सकती है। विक्षोभ के कारण गड़बड़ाया हुआ मस्तिष्क एक प्रकार से विक्षिप्त हो जाता है। उसके लिए सही निर्णय कर सकना तक सम्भव नहीं रहता।
सतर्कता और संघर्षशीलता के सहारे प्रतिकूलताओं से जितना निपटा जा सकता है, उतना ही कारगर एक और तरीका भी है- “उपेक्षा का।” अपनाना इसे भी जाना चाहिए। जो व्यक्ति या सम्बन्धी अनुकूल नहीं पड़ते, उन्हें एक सीमा तक ही समझाया-बुझाया जा सकता है। क्रोध या विरोध प्रकट करना भी एक सीमा तक ही उचित है। हर कोई अपनी मर्जी का मालिक है। दबाव से किसी को कहाँ तक बदला जा सकता है। फिर ऐसा भी हो सकता है, कि अपनी मान्यता में ही भूल हो। जिन्हें प्रतिकूल समझा जा रहा है, हो सकता है, कि वे अपनी जगह पर ठीक हों या भीतरी-बाहरी मजबूरियों से बाधित होकर वैसे आचरण कर रहे हों।
मतभेदों और विपदाओं से भरी हुई इस दुनिया में तालमेल बिठाकर चलना ही व्यावहारिक और सुविधाजनक है। इस आधार पर उपेक्षा भी एक बड़ा उपचार है। जिससे जितना सहयोग मिले, काम सधे, उतने से ही काम चलाऊ मान लेने पर उन मतभेदों की उपेक्षा की जा सकती है जो प्रत्यक्षतः कोई बड़ा विग्रह या अनर्थ उत्पन्न नहीं करते। प्रतिकूलताओं का निरन्तर चिन्तन करने और उन पर विक्षुब्ध रहने पर भी उनका निराकरण कहाँ होता है? इसलिए उचित यही है कि विक्षोभों में भी मनः सन्तुलन बनायें और अपनी सामर्थ्य उपयोगी कार्यों के लिए सुरक्षित रखें।
‘दि फ्लेम एण्ड दि लाइट’ ग्रन्थ के प्रणेता ने गीता और धम्मपद का तुलनात्मक विवेचन करते हुए लिखा है कि दोनों में ही बुद्धि की पवित्रता का उद्देश्य एक है- चिन्तन में उच्चस्तरीय आदर्शों का समावेश। यों व्यक्तिगत जीवन में इस प्रयोग की चर्चा हुई है पर वह समाज पर भी समान रूप से लागू होती है। जो व्यक्तिगत जीवन में पवित्र है वह सामूहिक प्रयोजनों में दुष्टता या भ्रष्टता को नहीं अपना सकता। इसी ज्ञान के कारण कृष्ण, कृष्ण हुए और बुद्ध, बुद्ध। स्थित प्रज्ञता से दोनों का मतलब है ‘थियोसोफिकल फिलासाफी।”
“लाइफ्स डीपर आस्पेक्ट्स” ग्रन्थ के प्रणेता थियासाफिस्ट एन. श्रीराम ने कहा है “जड़ के भीतर चेतन की अनुभूति ही मानवी चिन्तन की उत्कृष्टता है प्रतीकों एवं प्रतिमाओं के प्रति श्रद्धा को केन्द्रित करना और उसे देवता के रूप में श्रद्धा प्रदान करना यह सामान्य तथ्य नहीं है। जड़ को चेतन के समतुल्य मान्यता देना यदि अन्धविश्वास नहीं है तो फिर उसे दर्शन की चरम सीमा ही कहा जायेगा।”
सृष्टि गतिशील है। यह गतिशीलता प्रकारान्तर से चेतना ही है। अन्यथा इच्छा शक्ति के अभाव में कोई जड़ पदार्थ गतिशील कैसे हो सकता है। यह इच्छा पदार्थ की न सही उसके साथ जुड़े हुए प्रेरक की ही सही, जब दोनों मिल जाते हैं तो ही वे चेतनवत् प्रतीत होते हैं। इस आधार पर जड़ और चेतन की एकता का सहज प्रतिपादन होता है वही अध्यात्म दर्शन को अभीष्ट भी है।
भौतिक विज्ञानी एडमंड मोरियर ने अपनी पुस्तक “ह्वाट इज लाइफ” में विस्तार पूर्वक लिखा है कि जिन्हें हम जड़ कहते हैं, वस्तुतः वे जड़ नहीं हैं। उनकी हलचलें स्पष्ट हैं। उनमें सम्वेदना भी हो सकती है। इस संवेदन को अनुभव करना दर्शन का काम है।
उपनिषद्कार ने बाइबिल के स्वर में स्वर मिलाते हुए ही कहा है कि- “ए मनुष्य! तू ही सृष्टि का निर्माता है।” सृष्टि में जो सौंदर्य है, श्रेयस्कर है और सद्भाव है वह मनुष्य का ही आरोपित किया हुआ है। अन्यथा ब्रह्मांड के अन्य ऊबड़-खाबड़ ग्रह-नक्षत्रों की तरह अपनी पृथ्वी भी रही होती। इसमें जो कुछ भी भाव संवेदन है उसे मनुष्य द्वारा आरोपित ही समझा जाना चाहिए। यदि मनुष्य स्वयं सम्वेदनशील न हो तो यह सम्भव नहीं था कि पदार्थों को देखने का प्रयोग में आने पर उन्हें भाव सम्वेदनाओं की अनुभूति होती। इस दृष्टि से यों भी कहा जा सकता है कि सृष्टि में चेतना का संचार करके जड़ को चेतन बनाने का श्रेय मनुष्य को ही है।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की “फिलॉसफी ऑफ उपनिषदाज” में कई स्थान पर कई तरह से यह सिद्ध किया गया है कि सृष्टि की सुन्दरता एवं कुरुपता- उपयोगिता एवं अनुपयोगिता का आरोपण मानवी बुद्धि की कलाकारिता है। इस कला को पृथक कर देने पर यह संसार पदार्थ का एक टीला भर रह जाता है। तब ऐसा कुछ नहीं रहता जिसके स्पर्श से उल्लास उमंगे।
यह संसार अपनी जगह बहुत शानदार है। प्रकृति की अगणित शक्ति यों का उसमें समावेश है। एक घटक दूसरे घटक को आगे धकेल कर सृष्टि का गति चक्र भी बनाता है। इतने पर भी उसमें ऐसा कहीं कुछ नहीं है जिसमें कला एवं संवेदन का दर्शन हो सके। यह मनुष्य की अपनी चेतना की विशेषता है जिसे आरोपित करके पदार्थ को सरस एवं सुन्दर बनाया गया है।
यह अंतर्दृष्टि सबमें एक जैसी नहीं होती। वह व्यक्ति विशेष के मानसिक धरातल के अनुसार उत्कृष्ट, मध्यम और निकृष्ट स्तर की हो सकती है। किसी पदार्थ या प्राणी को बहुत अधिक महत्व देना अथवा निरर्थक मान लेना, यह मनुष्य की अपनी समझ के ऊपर निर्भर है। यह समझ भी सबकी एक जैसी नहीं होती। उसकी परख प्रक्रिया अपनी निजी सम्वेदनाओं के विकास पर निर्भर है।
थियोसाफी की प्रख्यात दार्शनिक पुस्तक ‘लाइफस् डीपर आस्पेक्ट’ जिसका हवाला ऊपर दिया गया, में लिखा है मनुष्य अपनी चेतना को कितना परिमार्जित एवं सम्वेदनशील बनाता है, यह उसका अपना प्रयास है। इसे ईश्वरीय अनुदान तब कहा जायेगा जब मनुष्य साधनारत रहकर अपने दृष्टिकोण को मानवी गरिमा के अनुरूप विकसित कर ले।
यह संसार एक दर्पण है। इसमें हम अपनी ही छवि देखते हैं। प्रमुदित एवं खिन्न निराश होने की स्थिति दर्शक की अभिरुचि ही उत्पन्न करती है। दर्पण तो एक पदार्थ मात्र है। उसे स्वयं सौन्दर्य की परिभाषा का ज्ञान नहीं है और न देखने वाले से कोई लगाव। दर्शक का दृष्टिकोण ही “दर्शन” है। उसका स्तर ऊँचा हो तो यहाँ जो कुछ है सभी सुन्दर अति सुन्दर लगेगा।
आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी की एक शोध शाखा “रिलीजियस एक्सपेरिएन्स रिचर्स यूनिट” ने अपने लम्बे प्रयोगों से यह सिद्ध किया है कि मनुष्य की अपनी भावनाएं एवं मान्यताएं ही विभिन्न लोगों को एक ही वस्तु के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ कराती हैं। एक की दृष्टि में जो प्रिय हो सकता है यदि वही दूसरे को शत्रु प्रतीत हो तो इसमें आश्चर्य नहीं।
सर एलेस्टर हार्डी ने “द स्प्रिचुअर नेचर आफ मैन” में लिखा है कि पदार्थों या व्यक्तियों के गुण अवगुण स्वतः सिद्ध नहीं हैं। वे मनुष्य के द्वारा आरोपित हैं। जिसे जिससे अनुकूलता अनुभव होती है वह उसे प्रिय लगता है, किन्तु प्रतिकूलता प्रतीत होने पर वही प्रतिकूल या उपेक्षित प्रतीत होने लगता है। इसलिए किसी वस्तु या प्राणी के सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता कि वह कैसा है। यहाँ तक कि ईश्वर तक के बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि उसका स्वरूप संसार श्रद्धा करने योग्य है या अश्रद्धा करने योग्य।
परिस्थितियों और पदार्थों के सम्बन्ध में मनुष्य कैसा दृष्टिकोण अपनाये और मनुष्यों के आपसी सम्बन्ध कैसे हों, इसका कोई निश्चित मापदण्ड नहीं है। यह मनुष्य के अपने दृष्टिकोण पर निर्भर है कि किस के संपर्क में आकर वह किस प्रकार की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। इस दृष्टिकोण का परिमार्जन ही दर्शन शास्त्र का मूलभूत प्रयोजन है। गीता, धम्मपद, बाइबिल आदि धर्मग्रन्थों ने विभिन्न उदाहरण देते हुए एक ही बात सिखाई है कि अपने चिन्तन का स्तर कैसे परिमार्जित किया जाय, जिससे संसार को अच्छी दृष्टि से देखना सम्भव हो और सुखद अनुभूतियों से भरा-पूरा समझा जा सके।
सुना है भगवान अजस्र दानी हैं, पर आपके अजस्र अनुदानों में से एक मुझे चाहिए। “आत्म विश्वास”। लगता रहे, आप सदा मेरे साथ हैं यदि साथ हैं तो भटकने का दुर्दिन नहीं ही आने पायेगा। यदि साथ हैं तो हिम्मत क्यों टूटेगी। यदि साथ हैं तो संकट की घड़ियों में रोने कलपने और जिस-तिस को दोष देने का मन भी नहीं होगा।
अजस्र अनुदानों में से केवल एक चाहिए जो हर समय भरोसा दिलाता रहे कि मनुष्य संकटों की तुलना में अधिक मजबूत है। विपत्तियों से जूझ सकता है। अपनी नाव अपने डण्डों के सहारे लेकर खुद पार ले जा सकता है।
आप सहारा दें, तो इतना दें कि और किसी का सहारा न माँगना पड़े। यदि आपके सहारों में भी कई प्रकार होते हों तो वह चाहिए जिसमें आत्म-विश्वास ढीला न पड़ने पाये। पैर लड़खड़ाये न और चुनौतियों को स्वीकार करने में झिझकना न पड़े।
-कविवर रवीन्द्र
पदार्थ विज्ञान का जन्म और अभिवर्धन कुछ शताब्दियों का है जबकि सृष्टि का जीवन अरबों, खरबों वर्षों का है। हर्मनबेल के अनुसार “हम प्रकृति के रहस्यों का परिचय प्राप्त करने की दिशा में क्रमशः बड़ रहे हैं। इसमें अधीर नहीं हो रहे हैं, फिर चेतना के रहस्यों को जानने के लिए विज्ञान की वर्तमान अपरिपक्व स्थिति को ही क्यों प्रमाणभूत आधार मानें? हमें धैर्य रखना होगा और वैज्ञानिक प्रगति की उस स्थिति के लिए प्रतीक्षा करनी होगी, जहाँ पहुँचकर यह चेतना विज्ञान को भी अपने साथ सम्मिलित कर सके और अपने विकसित ज्ञान के आधार पर जीवन तन्त्र की व्याख्या कर सके।”
शरीर शास्त्री सर चार्ल्स शैरिंगटन ने अपनी पुस्तक “मैन आन हिज नेचर” में लिखा है- चेतना के स्तर की परीक्षा हम ऊर्जा नापने के उपकरणों से नहीं कर सकते। भावनाएं और विचार धाराएं किस स्तर की हैं और व्यक्ति के आदर्श एवं आचरण किस श्रेणी के हैं यह जानने के लिए किसी शरीर का रासायनिक विश्लेषण करने से क्या काम चलेगा? व्यक्तित्व अपने आप में एक रहस्य है उसकी गहराई में उतरने के लिए वे परीक्षण पद्धतियाँ असफल ही रहेंगी जो कोशिकाओं एवं ऊतकों की संरचना तक ही साथ लेकर समाप्त हो जाती है। मनुष्य का कलेवर ही पदार्थों से बना है इसीलिए इसी का विश्लेषण, वर्गीकरण तत्व परीक्षा द्वारा सम्भव हो सकता है। चेतना एवं उसके स्तर जिस संरचना से बने हैं उसका निरूपण एवं सुधार परिवर्तन करने के लिए भौतिकी के नियम, परीक्षण एवं उपकरण निरर्थक सिद्ध होंगे।
भौतिकी में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. ई.पी. बिगनर कहते हैं कि “आधुनिक भौतिकी के सिद्धान्तों से चेतना की संरचना-स्थिति एवं उतार-चढ़ावों की व्याख्या नहीं हो सकती। जिस कारणों से चेतना में उभार उतार, चढ़ाव, परिवर्तन आते हैं और उत्थान पतन के आधार खड़े होते हैं वे तत्व कुछ और ही हैं। वस्तुओं को जिस आधार पर प्रभावित, परिवर्तित किया जाता है वे सिद्धान्त चेतना को परखने और सुधारने के लिए किसी प्रकार काम नहीं आ सकते। मस्तिष्क विद्या शरीर के एक अवयव की हलचलों का विश्लेषण तो कर सकती है, पर उस आधार पर किसी के विचार बदलने या सम्वेदनाओं को प्रभावित करने जैसे प्रयोजन बहुत ही स्वल्प मात्रा में हो सकते हैं। भौतिकी के आधार पर चेतना की व्याख्या करने के लिए जो प्रयत्न किये जाते हैं उनमें विसंगतियाँ ही भरी रह जाती हैं।”
इन प्रतिपादनों के बावजूद चेतना जगत की- गुत्थियों का हल सुलझाने में ब्रह्मांड के कुछ क्रिया-कलाप हमारी कुछ मदद अवश्य करते हैं। ब्रह्मांड भौतिकी में ब्राह्मी चेतना की झाँकी ढूँढ़ने का प्रयास करने वाले दर्शन की ओर रुझान रखने वाले वैज्ञानिक कहते हैं कि “यह ब्रह्मांड निरन्तर बढ़ और फैल रहा है। विराट् की पोल में प्रत्यक्ष ग्रह-नक्षत्र किसी असीम अनन्त की दिशा में द्रुतगति से भागते चले जा रहे हैं। यों यह पिण्ड अपनी धुरी और कक्षा में भी घूमते हैं, पर हो यह रहा है कि वह कक्षा धुरी और मण्डली तीनों ही असीम की ओर दौड़ रहे हैं। सौर-मंडल एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। यह दौड़ प्रकाश की गति से भी कहीं अधिक है। जो तारे कुछ समय पूर्व दिखते थे वे अब अधिक दूरी पर चले जाने के कारण अदृश्य हो गये।” खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार इस प्रक्रिया को विस्तार भी कह सकते हैं- विघटन भी, और यह भी कह सकते हैं कि इसका अन्त एकता में होगा। गोलाई का सिद्धान्त अकाट्य है। प्रत्येक गतिशील वस्तु गोल हो जाती है। स्वयं ग्रह-नक्षत्र इसी सिद्धान्त के अनुसार चोकोर, तिकोने, आयताकार न होकर गोल हुए हैं। यह ब्रह्मांड भी गोल है। नक्षत्रों की कक्षाऐं भी गोल हैं। इस गोल वृत्त की लपेट में आगे यह दौड़ अन्त में किसी न किसी बिन्दु पर पहुँचकर मिल ही जायेगी और इस वियोग प्रक्रिया को संयोग में परिणत होना पड़ेगा।
ब्रह्मांड के निरन्तर विकास का अर्थ यह हुआ कि सृष्टि में जो कुछ भी है चाहे वह पदार्थ हो, ऊर्जा हो, चुम्बकत्व हो, प्रकाश हो अथवा विचार-सत्ता जो भी स्थूल या सूक्ष्म अस्तित्व में है वह सब एक ही केन्द्र बिन्दु पर समाहित है। इस संदर्भ में भारतीय दर्शन और वैज्ञानिक दोनों की धारणायें एक जैसी हैं। आरम्भ में एक महापिण्ड था, यह विज्ञान की मान्यता है एवं यह भी कि उस ब्रह्मांड में किसी समय एकाएक विस्फोट हुआ। विस्फोट से समस्त दिशाओं में आकाश-गंगा के रूप में ही पदार्थ बह निकला। अब तक की शोधों के अनुसार ब्रह्मांड में 19 अरब आकाश गंगायें हैं और हर आकाश-गंगा में 10 अरब तारे हैं।
सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी सवा नौ करोड़ मील है। वहाँ से यहाँ तक प्रकाश आने में सवा आठ मिनट लगते हैं। यदि किसी तारे का प्रकाश पृथ्वी तक 8 हजार वर्षों में आता है तो उसका अर्थ यह हुआ कि वह पृथ्वी से 47 पदम मील दूर है कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में ही अरबों वर्ष लग जायेंगे अर्थात् उस दूरी का तो अनुमान ही असम्भव है। इस तरह सृष्टि की अनन्त गहराई में अनन्त प्रकृति अनन्त रूपों में विद्यमान है।
भारतीय दर्शन की मान्यता चेतना को मूल मानकर ज्यों की त्यों है। आरम्भ में एक ही तत्व परमात्मा पिण्ड रूप में था। उसके नाभि देश से “एकोऽहं बहुस्यामि” (मैं एक हूँ, बहुत हो जाऊँ) इस तरह की स्फुरणा, भावना या विचार उठी। इससे वह फट पड़ा और महा प्रकृति की रचना हुई, उसमें सत्, रज, तम तीन गुणों का सम्मिलन था, इन्हीं से सृष्टि में जीवन का निर्माण हुआ और सृष्टि के विस्तार की तरह ही 84 लाख जीव योनियों का निरन्तर विस्तार होता चला गया। जिस तरह ब्रह्मांड विकसित हो रहा है। नाना प्रकार की जीवन सृष्टि का भी विकास हो रहा है, यह सब अत्यधिक करुणा मूलक स्नेहजनक मातृ संज्ञक रूप में चल रहा है। भौतिक आध्यात्मिक दोनों की दृष्टियों में आकाश-गंगायें इस विशाल माता का हृदय कही जा सकती हैं।
ब्रह्मांड के विस्तार की व्याख्या अपने जीवन के घटनाओं व दैनन्दिन जीवन की गतिविधियों से जोड़ते हुए भौतिक वैज्ञानिक डॉ. वैलेस टैकर ने की है। वे लिखते हैं- “विगत बसन्त जब हम और हमारी पत्नी अपने मकान के नजदीक गाँव की एक सड़क पर जा रहे थे तो फली फटने जैसी विचित्र आवाज से हम लोग चौंक गये। सुबह के धुँधलके में देखा तो पाया, सचमुच ही पास की जंगली घास की कलियाँ फट रही थीं। कलियाँ फट-फट कर अपने बीज आस-पास फैला रही थीं। फटने की यह आवाज मुश्किल से एक मिनट रही होगी। इस प्रकार जंगली वनस्पति की वह एक पीढ़ी समाप्त हो गई, कईयों में बंट गयी। इसी प्रकार आसपास ही वहीं अथवा किसी के बगीचे में अन्य फलियाँ भी फटकर बीज फैला रही होंगी।
वैलेस का कहना है- फलियों की तरह प्रकृति में भी ज्वालामुखियों एवं सुपर नोवा का विस्फोट होता रहता है। इन विस्फोटों के माध्यम से ही प्रकृति अपने अन्तराल में छिपी बीजों की सम्पदा पृथ्वी सतह तक पहुँचाती है। यदि यह विस्फोट न हो तो बीज अन्दर ही रह जाय। इस प्रकार जब कोई फली फूटती है तो उसके बीज आस-पड़ौस में फैल जाते हैं और समयांतर में उनसे फिर वैसी ही पौध उत्पन्न हो जाती है। किन्तु इन बीजों का एक गाँव से दूसरे गाँव तक इस विधि द्वारा पहुँचना काफी लम्बा समय ले सकता है, अथवा ऐसा भी हो सकता है कि दूसरे गाँव तक कभी पहुँचे ही नहीं।
ठीक इसी प्रकार भयंकर ज्वालामुखी अथवा विशालकाय उष्णोत्स के प्रस्फुटन के बिना जल भी, जो कि उच्चस्तरीय प्राणियों के विकास के लिए एक आवश्यक घटक माना जाता है, पृथ्वी के गर्भ में ही छिपा पड़ा रहता और किसी प्रकार पृथ्वी पर जीवन सम्भव न हो पाता। जल जैसे अनिवार्य तत्व की उत्पत्ति भी उस महा विस्फोट का परिणाम है।
यह सूर्य, यह पृथ्वी एवं इसके प्राणी सम्भवतः आज नहीं होते, यदि प्रकृति के विस्फोट न हुए होते। धूल और गैस के विशालकाय बादल, जिससे हमारा सौर परिवार बना, सम्भवतः अभी भी अव्यवस्थित बेडौल बादल ही बने रहते, यदि किसी अन्तर तारक कम्पन तरंग- सुपर नोवा ने बादलों को ठोस रूप में परिणत न कर दिया होता।
यह ज्ञातव्य है कि हर 50 साल में हमारी आकाश गंगा के किसी विशालकाय तारे में सुपर नोवा विस्फोट होता है। इस विस्फोट से अन्तरिक्ष में बड़े पैमाने पर विकिरण एवं पदार्थ किसी भावी खगोलीय पिण्ड के “‘बीज’ के रूप में आते हैं और पूरी आकाश गंगा में एक तीव्र कम्पन तरंग उत्पन्न करते हैं। यह कम्पन तरंग अन्तर तारक गैसों को गर्म करती है। बादलों के छोटे टुकड़ों को वाष्पीभूत करती है और बड़ों पर गहरा दबाव डालती है, जिससे वे बादल उसी स्थान पर अपने स्वयं के गुरुत्व बल के कारण दबकर ठोस रूप में परिणत हो जाते हैं और नये तारे का निर्माण करते हैं।
सुपर नोवा ऐसे विस्फोट हैं जो आकाश-गंगा के इंजन को विकास की दिशा में आगे की ओर बढ़ाते हैं। इस विस्फोट से अन्तर तारक गैसों में भारी-भारी तत्व आ जाते हैं। फिर इसे विस्फोट एवं अपनी विकिरण ऊर्जा द्वारा गर्म करते हैं। तत्पश्चात् अपनी भयंकर ऊर्जा एवं कम्पन से इसमें हलचल पैदा करते हैं और इस नये प्रकार नये तारक पिण्डों के निर्माण में अपना योगदान देते हैं। इस प्रकार बने तारों में से कुछ तो अत्यन्त विशालकाय होते हैं। अरबों वर्ष पहले पृथ्वी पर भी प्राकृतिक विक्षोभों की श्रृंखला द्वारा ही जीवन का उद्भव सम्भव हुआ। तारक पिण्डों का अपना एक जीवन चक्र होता है, जिसमें वे घूमते रहते हैं। तारों के निर्माण के कुछ काल पश्चात् उनमें विस्फोट होता है। इस विस्फोट से वे नये-नये भारी तत्वों को अन्तरतारक गैसों में समाविष्ट करते हैं। फिर इनसे दूर खगोलीय पिण्ड का निर्माण होता है जो कुछ काल पश्चात पुनः सुपर नोवा विस्फोट से फटते हैं। इस प्रकार खगोल ब्रह्मांड में सृजन विध्वंस का यह क्रम सदा चलता रहता है।
ब्रह्मांड भौतिकी के इस विवेचन एवं विस्फोट विस्तार के माध्यम से दृश्य ब्रह्मांड के स्वरूप की व्याख्या से उस परब्रह्म की कार्य पद्धति का एक आभास भर मिलता है। यह विराट जब स्थूल परिकर के रूप में उस प्रचण्ड रूप में क्रियाशील है तो उसकी चेतन सत्ता कितनी सुव्यवस्थित, सुनियोजित होगी इसकी कल्पना भर की जा सकती है। ऋग्वेद में ऋषि ने उसे उपमा दी है- “एको विश्वस्य भुवनस्य राजा” तथा आगे यह भी कहा है- “तस्मिन ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा” (उस परमात्मा में ही सम्पूर्ण लोक स्थित हैं।) सेंट आगस्टीन का यह कथन सच ही है कि ईश्वर एक वृत्त है, जिसका केन्द्र तो सर्वत्र है, किन्तु वृत्त रेखा कहीं नहीं।
डा. सेमुअल जानसन का अँग्रेजी शब्द कोश प्रख्यात है। उसे उन्होंने भारी परिश्रम से वर्षों में लिखा था। साहित्य जगत में उन्होंने उच्चस्तरीय प्रतिष्ठा प्राप्त की।
कोष में एक शब्द की परिभाषा एक महिला को खटकी। अधिक विचार करने पर उसने उसे वस्तुतः गलत पाया। अपनी बात जानसन तक पहुँचाने में विवाद खड़ा होने का भय था सो उसने उनसे मिलना ही उचित समझा। समय माँगकर वह उनसे मिलने जा भी पहुँची।
जानसन ने उसकी बात ध्यान पूर्वक सुनी और भूल बताने के लिए कृतज्ञता व्यक्त की। तत्काल सुधार देने का आश्वासन देते हुए उनने इतना ही कहा- निभ्रान्त तो केवल ईश्वर हैं। मनुष्य से जान-अनजान में जो गलतियाँ होती हैं, उन्हें बताया और सुधारा जाना ही उचित है।
बुद्धिमत्ता मनुष्य ने प्रयत्नपूर्वक प्राप्त की है। यह उसी की बपौती नहीं है। जहाँ कहीं भी अन्य पशु-पक्षियों को सीखने सिखाने का अवसर मिला है वहाँ उनने अपनी बुद्धि को अपेक्षाकृत कहीं अधिक बढ़ा लिया है।
उत्तरी कोरिया में बन्दरों को इस प्रकार सिखाया गाया कि वे अपने लुहार मालिकों का पंखा घुमाते रहते हैं और एक मजदूर का परिपूर्ण काम कर देते हैं।
दक्षिण अफ्रीका में एक कुतिया इस प्रकार प्रशिक्षित की गई थी कि वह अपने मालिक गड़रिये की भेड़ें सबेरे निर्धारित घास फार्म में चराने ले जाती थी और शाम को उन सभी को वापस ले आती थी। कोई भेड़ बिछुड़ जाती तो दुबारा जाकर उसे ढूँढ़ लाती।
अमेरिका के एक कन्सास नगर की एक फिल्म कम्पनी ने एक चिंपेंजी इस प्रकार सधाया था कि वह कई फिल्मों में बताये हुए पार्ट बड़ी खूबसूरती से करता रहा।
सिडनी में एक कबूतर पालन केन्द्र बनाकर उन्हें ऐसा प्रशिक्षित किया गया है, जिसमें सधाये हुए कबूतर नियत स्थान पर डाक पहुँचाते और जवाब लेकर भेजने वाले के पास वापस लौट आते हैं। जीव विज्ञान डेमण्ड मॉरिस ने बन्दरों को चित्र बनाने की कला में प्रशिक्षित किया था। एक बन्दर द्वारा बनाये 200 चित्र उसने प्रदर्शनी में रखे थे। जिन्हें सन्देह होता, उनके सामने बन्दर बताये हुए चित्र की दूसरी नकल हाथों-हाथ बनाकर तैयार कर देता था। डेमण्ड ने ‘अल्फा’ नामक चिंपेंजी तथा काँगो नामक शिबून बन्दर को घर में आने वाले अतिथियों का समुचित सत्कार करने के लिए भी प्रशिक्षित कर रखा था।
सिडनी में एक कुत्ता इस प्रकार प्रशिक्षित किया गया था कि अपने अन्धे मालिक की छड़ी पकड़कर वह उसे रोज दफ्तर ले जाता और लौटने का समय होने पर वह उसे उसी प्रकार वापस भी ले आता।
उज्जैन (भारत) में एक 19 वर्षीय युवक मुन्नालाल ने लगभग 100 साँप इस प्रकार सधाये थे जो उसकी आज्ञानुसार काम करते थे। इस प्रदर्शन को क्षीर सागर मैदान में हजारों व्यक्तियों ने देखा।
सरकस में हाथी, शेर, कुत्ते, घोड़े आदि को अद्भुत काम करते देखकर यह विश्वास कोई भी कर सकता है कि सिखाने वाले भयंकर पशुओं को भी सिखा लेते हैं। रीछ, बन्दरों को तो ग्रामीण मदारी भी इशारे पर काम करने के लिए प्रशिक्षित कर देते हैं।
मध्य युग की लड़ाईयों में घोड़े और हाथी इसी प्रकार युद्ध कौशल के लिए प्रशिक्षित किये जाते थे एवं वे शत्रु पक्ष को छकाने और हराने में अनोखी सूझ-बूझ का परिचय देते थे।
अतीन्द्रिय क्षमताओं की दृष्टि से कई प्राणियों की प्रतिभा असाधारण होती है वर्षा होने, भूकम्प आने, किसी मकान के गिरने आदि की सम्भावनाएं बिल्ली पहले ही जान जाती है। जब वह बच्चों समेत भागने लगे तो समझना चाहिए कोई विपत्ति आने वाली है।
चोरों और हत्यारों का पता लगाने में कुत्तों में अद्भुत क्षमता पाई गई है। वे पुलिस द्वारा अपराधियों को पकड़ने में सहायता करने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किए जाते हैं।
यह माना जा सकता है कि मनुष्य की मस्तिष्कीय संरचना एवं लम्बे समय से चले आ रहे पारस्परिक सहकार ने मनुष्य को अधिक बुद्धिमान बना दिया है। पर ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि अन्य प्राणी सर्वथा बुद्धिहीन हैं। उनके निमित्त यदि प्रशिक्षण की उपयुक्त व्यवस्था की जाय तो वे भी मनुष्य के अच्छे साथी सिद्ध हो सकते हैं।
तथागत उन दिनों श्रावस्ती विहार में थे। जैतवन की व्यवस्था अनाथ पिण्डक सम्भालते थे। दक्षिण क्षेत्र की प्रव्रज्या से लौटे दारुचीरिय वापस लौटे और बड़े विहार जैतवन में जा पहुँचे।
दारुचीरिय की भाव-भंगिमा और विधि-व्यवस्था वैसी नहीं रह गई थी, जैसी कि आते समय उन्हें अभ्यास कराया गया था। वे जहाँ भी गये बुद्ध की गरिमा और उनकी प्रतिभा का सम्मिश्रण चमत्कार दिखाता रहा सम्मान बरसा, धन बरसा, प्रशंसा हुई, आतिथ्य की कमी रह रही।
पा लेना सरल है, पचा लेना कठिन। प्रतिष्ठा सबसे अधिक दुष्पाच्य है। उसे गरिष्ठ भोजन और विपुल वैभव की तुलना में आत्मसात कर लेना और भी अधिक कठिन है। दारुचीरिय की स्थिति भी ऐसी ही हो रही थी। अपच उनकी मुखाकृति पर छाया हुआ था।
अनाथ पिण्डक ने पहले दिन तो आतिथ्य किया और दूसरे दिन हाथ में कुल्हाड़ी थमा दी- जंगल से ईंधन काट लाने के लिए। सभी आश्रम वासियों को दैनिक जीवन को कठोर श्रम से संजोना पड़ता था। अपवाद या छूट मात्र रोगी या असमर्थ ही हो सकते थे।
दारुचीरिय इतना सम्मान पाकर लौटे थे वे अपने को दूसरे अर्हन्त के रूप में प्रसिद्ध करते थे। कुल्हाड़ी उन्होंने एक कोने में रख दी। मुँह लटकाकर बैठ गये। श्रमिकों जैसा काम करना अब उन्हें भारी पड़ रहा था। यों आरम्भ के साधना काल में यह अनुशासन उन्हें कूट-कूट कर सिखाया गया था।
अनाथ पिण्डक उस दिन तो चुप रहे। दूसरे दिन कहा- अर्हन्त को तथागत के पास रहना चाहिए। यहाँ तो हम सभी श्रवण मात्र हैं।
दारुचीरिय चल पड़े और श्रावस्ती पहुँचे। विहार में तथागत उपस्थित न थे। वे भिक्षाटन के लिए स्वयं गये हुए थे। तीसरे प्रहर लौटने की बात सुनकर उनको अधीरता भी हुई और आश्चर्य भी। इतने बड़े संघ के अधिपति द्वार-द्वार भटकें और भिक्षाटन से मान घटायें। यह उचित कैसे समझा जाय?
बेचैनी ने उन्हें प्रतीक्षा न करने दी और वहाँ पहुँचे वहाँ तथागत भिक्षाटन कर रहे थे। साथ ही मार्ग में पड़े उपले भी दूसरी झोली में रख रहे थे ताकि आश्रम के चूल्हे में उनका उपयोग हो सके।
अभिवादन उपचार पूरा भी न हो पाया था कि मन की जानने वाले युद्ध ने दारुचीरिय से कहा- अर्हन्त ही बनना हो तो प्रथम अहन्ता गलानी और छोटे श्रम में भी गरिमा प्रधान करनी चाहिए। इसके बिना पाखण्ड बढ़ेगा और सत्य पाने का मध्यान्तर बढ़ेगा।
दारुचीरिय का समाधान हो गया। अहन्ता गली, और श्रवण व्रत फिर से निखर आया। तथागत ने इस प्रसंग को शाम के सत्संग में दुहराते हुए विहार में उपस्थित भिक्षुओं एवं अन्य भक्तों को बताया कि लोक सेवी की वरिष्ठता की कसौटी विनम्रता पर निर्भर है। आम्र वृक्ष जितना अधिक फलों से लदा होगा, उतना ही झुकेगा। विभूतियाँ पाकर साधक को भी झुकना, स्वयंसेवी स्तर विकसित करना सीखना चाहिए। इसके अभाव में तो प्राप्त सिद्धि भी दुष्पाच्य आहार के रूप में सड़े मल की भाँति निकलती एवं वातावरण दूषित करती, स्वास्थ्य बिगाड़ती है। समाज निर्माण मात्र विनम्र साधक ही कर सकते हैं। यदि लोकसेवी ही अहन्ता के मद में चूर बने रहे तो वे विधेयात्मक प्रगति तो दूर, अपने साथ सारे समुदाय को ले डूबेंगे। दारुचीरिय के साथ ही सबने इस तत्त्वदर्शन को समझा व लोक सेवा के मर्म को साधना के सही स्वरूप को- हृदयंगम किया।
वर्तमान ओलंपिक खेलों के बाद पर्यवेक्षकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि मानवी प्रगति का कोई अन्त नहीं। पिछले दिनों खेल-कूदों में बाजी मारने-प्रवीणता और पूर्णता के लिए एक सीमा निर्धारित की गई थी और कहा गया था कि मानवी अवयवों की संरचना तथा विकसित प्रयत्नशीलता के सहारे वह अमुक खेल में इतनी क्षमता तक का ही परिचय दे सकता है।
अब उन अनुमानों से बहुत आगे बढ़कर खिलाड़ियों ने कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इसी प्रकार शिक्षा शास्त्रियों का अनुमान था कि बच्चों का बौद्धिक विकास-क्रम को देखते हुए कोई प्रतिभाशाली बालक इतनी कक्षाएं उत्तीर्णकर सकता है। किन्तु वह अनुमान भी गलत साबित हुए और कितने ही बालकों ने निर्धारित मापदण्ड से कहीं अधिक प्रगति करके दिखाई है।
मध्यकाल में वीरता का मापदण्ड युद्ध-कौशल रहा है। कोई व्यक्ति शस्त्र चलाने में जितना कौशल दिखा सकता है और परिस्थितियों के प्रतिकूल होते हुए भी कितना साहस दिखा सकता है, इसकी भी एक सीमा निर्धारित की गई थी पर पिछली शताब्दी में आग्नेयास्त्रों का सामना करने और उनके बीच सनसनाते हुए आगे बढ़ते जाने तथा शत्रु के बारूद खाने पर कब्जा करने का नया कीर्तिमान स्थापित किया गया है।
विद्वानों की बिरादरी का कोई भी व्यक्ति कितने ही ग्रन्थों में पारंगत हो सकता है और उसकी स्मरण शक्ति कितनी तीव्र हो सकती है, इसका अनुमान भूतकाल के सर्वोत्तम समझे जाने वाले विद्वानों की सफलताओं को देखते हुए किया गया था। पर वर्तमान शताब्दी में वे पुरातन निर्धारण टूट गये और यह कहना पड़ा कि मानवी बुद्धि की कोई सीमा निर्धारित नहीं हो सकती।
विज्ञान, अन्वेषण, समीक्षा के क्षेत्रों में मानवी आयुष्य को देखते हुए कितनी सफलता सम्भव है, इस पुरातन आधार का अब व्यतिरेक कर दिया गया है और समझा गया है कि मनुष्य की प्रतिभा का कोई अन्त नहीं। इच्छा शक्ति की तीव्रता और निरन्तर अभ्यास के सहारे मनुष्य कितना आगे बढ़ सकता है, इसकी कोई सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। मनुष्य असीम है, उसकी प्रगति और सफलता के सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता कि भूतकाल में जो अधिक से अधिक हो सकता है भविष्य में उससे बढ़कर नहीं हो सकता।
किस क्षेत्र में मनुष्य किस सीमा तक आगे बढ़ सकता है और अपने कर्तृत्व को कहाँ तक अग्रगामी बना सकता है। इस सम्बन्ध में कुछ सीमा बन्धन नहीं बाँधा जा सकता। कोई रिकार्ड बुक नहीं बनाई जा सकती कि यही अन्तिम है। मनुष्य की क्षमता असीम है, पर वह विकसित तभी होती है जब मनुष्य अपने संकल्प और प्रयास को ऊँचा उठाता चले। उसके उत्साह और साहस में कमी न पड़े।
दूसरों के लिए आदर्शवादिता का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने में भूतकाल के त्यागी तपस्वी ही चरमोत्कर्ष का स्पर्श करते रहे हैं उससे आगे बढ़ने और अपने को महान सिद्ध करने की अब अधिक गुंजाइश नहीं रही यह सोचना व्यर्थ है। स्वयं को कठिनाई में डालकर दूसरों की सेवा साधना में निरत रहने वाले वर्तमान उदाहरण यही बताते हैं।
जहाँ साधनहीनों ने अपने सद्गुणों और श्रेष्ठता सिद्ध करने वाले प्रयासों के आधार पर उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचने में सफलता प्राप्त की है। वहाँ ऐसे लोभ भी कम नहीं हैं जिन्हें सब प्रकार की सुविधा, अनुकूलता होते हुए भी अपने आलस्य प्रमाद में पूर्वजों की सम्पदा और ख्याति को भी धूलि में मिला दिया और दूसरों की सलाह और सहायता मिलने पर भी पतन पराभव के गर्त्त में गिरते चले गये। इसीलिए कहा जाता है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। उसकी सम्भावनाएं महान हैं।
जड़ और चेतन के बीच भी कोई आन्तरिक सम्बन्धों की एक अविभाजित कड़ी का अस्तित्व हो सकता है, इस कथन की पुष्टि में दो उदाहरण विशेष रूप से प्रख्यात हैं इनसे हमें एक विचार करने को विवश होना पड़ता कि एक इस्पात और काष्ट से विनिर्मित जहाज जैसी जड़ वस्तु भी अपनी स्वयं की कोई इच्छा शक्ति से प्रेरित हो सकती है? ये घटनाएं एक जहाज और एक मछली पकड़ने की बड़ी नौका से सम्बन्धित है जिनने अपने स्वामियों की सेवा विशेष रूप से व अनोखे प्रकार से समर्पित भाव से की। इनमें प्रथम एस.एस. हमवोल्ट नामक जहाज था जिसके एक मात्र कैप्टन का नाम इलिजाह जी. बौफमेंन था। इस जहाज ने अपने जीवन में किसी अन्य कैप्टन को नहीं देखा और न ही इस कैप्टन ने किसी अन्य जहाज पर पैर रखे। हमवोल्ट ने अपनी जीवन वृत्ति एक यात्री और माल वाहक जहाज के रूप में सीटल और अलास्का के मध्य सन् 1898 में आरम्भ की। कैप्टन बौफमेंन के कथनानुसार अलास्का में स्वर्ण की बड़ी माँग होने पर इस जहाज के द्वारा दस करोड़ डालर मूल्य का स्वर्ण फिर से वापस लौटकर लाया गया था। उन मद भरे वर्षों की समाप्ति पर हमवोल्ट प्रशान्त महासागर के उत्तर-पश्चिमी बन्दरगाहों पर अपना कार्य सुचारु रूप से चलाता रहा। किन्तु जैसा कि प्रत्येक के जीवन में एक ऐसा समय भी आता है जबकि वह अपनी जीवन वृत्ति से मुक्ति पा लेता है, सन् 1934 में वह समय आ गया जबकि कैप्टन बौफमेंन और उसके प्यारे जहाज ने एक साथ ही निवृत्ति ले ली। बौफमेंन सीटल से सेनफ्रांसिसको चला गया और हमवोल्ट को वहाँ से सेन पेड्रो को, जो कि दक्षिण में पर्याप्त दूरी पर था, उसकी जर्जर स्थिति को देखते हुए विघटित करने के लिए भेज दिया गया।
दिनाँक 8 अगस्त 1935 को कैप्टन बौफमेंन ने इस संसार से अन्तिम विदा ली। ठीक उसी समय उसी रात्रि को उस केलीफोर्निया के समुद्र तट से 400 मील की दूरी पर स्थित सेन पेड्रो बन्दरगाह में लंगर डालकर खड़े हुए हमवोल्ट नामक उस पुराने जहाज ने अपने सारे बन्धन तोड़ फेंके और खुले समुद्र की ओर अपनी यात्रा आरम्भ कर दी। उस जहाज पर कोई भी व्यक्ति नहीं था और न ही उसके इंजन को चलाने के लिए किसी ने उसमें कोयला डाला था। इस जहाज को रात्रि में केवल उसकी लाल बत्ती के कारण ही पहिचाना जा सका कि वह वहाँ से भाग निकला और उसे जहाज के एक कैप्टन ने एक अन्य जहाज की सहायता से वापस लाने में सफलता प्राप्त की। क्या अपने बन्धनों को तोड़कर समुद्र में उत्तर की ओर अपने पुराने स्वामी के अन्तिम समय में मिलने के लिए तैर जाना और उसके प्रति अन्तिम सम्मान प्रकट करने की चेष्टा करना हमवोल्ट का उद्देश्य नहीं था? इसका उत्तर खोजने के प्रयास कईयों ने किये। अन्ततः वे इसी निष्कर्ष पर पहुँचे कि मालिक की आत्मा इस जहाज से अन्तिम समय तक अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रही।
इसी सीटल नामक बन्दरगाह की ही एक अन्य रहस्यमयी घटना है जिसमें मनुष्य और नौका के मध्य के गहन सम्बन्धों का बोध होता है। कैप्टन मार्टिन ओलसेन एक मछुआ था जो कि ‘सी लॉयन’ नामक अपनी नौका का अनेक वर्षों तक सैमन मछली को पकड़ने के लिए पुगेट साउण्ड की गहरी किन्तु सकरी खाड़ी में सदैव प्रयोग करता रहा। सी लॉयन जैसी नौकाओं का उपयोग आज भी वाशिंगटन और ब्रिटिश कोलम्बिया के तटों पर मछली पकड़ने के लिए किया जाता है। कैप्टन मार्टिन ओलसेन ने अपनी आजीविका से मुक्त होने पर अपनी इस प्रिय नौका को किनारे से दूर अपने मकान के पास सीटल में ही बालू में ही रख दिया। यह नौका इसी स्थान पर दस वर्षों तक खड़ी रही। इतने वर्षों तक एक ही स्थान पर रहने से वह बालू में और अधिक गहरी धँस गई थी।
दस वर्षों के पश्चात कैप्टन ओलसेन की मृत्यु हो गई। उस दिन समुद्र शान्त था, उस वक्त न तो कोई तूफान था और न ही कोई ज्वार आया था। कहा गया है कि बालू के उस गड्ढे में से निकलकर वह पुरानी नाव उस खाड़ी में तैरती रही। तीन दिनों के पश्चात बने ब्रिज आयरलैंड के तट तक तैरते हुए यह नौका वहाँ पहुँची जहाँ समीप ही कब्रिस्तान में कैप्टन ओलसेन को दफनाया जाने वाला था। ओलसेन को दफनाने के पश्चात यह ‘सी लॉयन’ वहाँ से स्वतः ही रवाना हो गई और तैरते हुए कुछ दिनों में ठीक उस स्थान पर जाकर खड़ी हो गई जहाँ कि वह पिछले दस वर्षों से खड़ी रही थी। नौका के इस प्रकार के व्यवहार को अपने स्वामी के प्रति अन्तिम सम्मान प्रकट करने की चेष्टा कहा तो जा सकता है पर वैज्ञानिक जड़ पदार्थों के साथ घटने वाले इन वैचित्र्यपूर्ण संयोगों के कारण को समझा पाने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं।
इस भूमण्डल पर महासमुद्रों व सागरों में अनेक घटनायें ऐसी होती हैं जिन्हें लोग प्रायः एक संयोग मात्र कह कर भुला देते हैं। वास्तविकता और रहस्य तो केवल सागर ही जानता है। किन्तु इन घटनाओं को केवल संयोग कहना उचित नहीं होगा।
एस.एस. सेक्सिलबी नामक एक जहाज नवम्बर 1933 में न्यू फाइण्डलैण्ड से दक्षिणी वेल्स के लिये अपनी यात्रा पर निकला। यह जलपोत उत्तरी अटलांटिक महासागर में कही लुप्त हो गया। इस पर कुल 29 व्यक्ति सवार थे इसे खोजने के समस्त प्रयास असफल ही सिद्ध हुए। सन् 1936 के प्रारम्भ में ही अबेराबोन के अंतर्गत वेल्श नामक ग्राम के निकट ही किनारे पर एक कोको का डिब्बा तैरता हुआ पाया गया। इस डिब्बे को खोलने पर उसमें एक सन्देश प्राप्त हुआ जिसमें लिखा था। आयरलैण्ड के तट से दूर कहीं एस.एस. सेक्सिल बीपोत डूब रहा है, मेरी बहिन को, भाइयों को और डिनाह को प्यार- जोओकेन। जोओकेन नामक यह व्यक्ति इस लुप्त जलपोत के कर्मी दल का एक सदस्य था, जो कि अबेराबोन का निवासी था। उसने अपने सम्बन्धियों जो अबेराबोन में निवास कर रहे थे, को सम्बोधित कर यह सन्देश भेजा था, जो कि उसके गाँव से केवल एक मील की दूरी पर बहते हुए पहुँचा था। इसे संयोग नहीं कहा जा सकता।
अपने घर वालों को सन्देश भेजने की अचेतन प्रेरणा व उसके पहुँच जाने का उदाहरण ग्रन्थों में मिलता है। न्यूजीलैण्ड के रॉस एलेक्झेण्डर ने सेना के एक जलपोत को समुद्र को सौंपा था उसका सैनिक जलपोत डर्बिन (आस्ट्रेलिया) के उत्तर में एक समुद्रीय चट्टान से टकरा गया था। रॉस ऐलेक्झेण्डर ने जहाज पर से ही एक शराब की खाली बोतल में अपने घर वालों को सम्बोधित कर एक सन्देश लिखकर डाल दिया। संयोग से उस दुर्घटना में रॉस एलेक्झेण्डर बच गया।
एक अन्य घटना के अनुसार सन् 1934 में डायले ब्राँसकम ने अपना स्वयं का एक चित्र एक बोतल में सुरक्षित रखकर उस बोतल को अर्कनसास नामक नदी में डाल दिया। चौबीस वर्ष बाद सन् 1958 में विल हेड स्ट्रीम नामक एक व्यक्ति को जो कि डायले ब्रांसकम का बचपन का एक मित्र था, यह बोतल अपने ग्राम लार्गो में मिली जो कि फ्लोरिडा के अंतर्गत आता है। विल हेड स्ट्रीम को अपने बचपन के इस मित्र के विषय में कोई जानकारी पिछले 24 वर्षों से नहीं थी। हेड स्ट्रीम ने अपने इस मित्र को उस चित्र में लिखे पते पर एक पत्र के साथ उसका यह चित्र भी भेजा था एवं उससे उन बीते हुए वर्षों के जीवन के उतार-चढ़ाव सम्बन्धी विविध घटनाक्रमों का ब्यौरा लिखने को कहा गया था।
समुद्र विशाल है, सृष्टि विराट् है। किन्तु इस जगती के घटनाक्रम बड़े निराले हैं। जड़ व चेतन के बीच लकीर खींचने वाले वैज्ञानिक भी यह कहते पाये जाते हैं कि दोनों में परस्पर गहन तारतम्य है। ऊपर वर्णित व ऐसे अनेकों घटनाक्रम इसकी पुष्टि करते हैं, साथ ही उस अद्भुत विधाता के कार्य व्यापार की, लीला जगत की एक झलक दिखाते हैं।
देखने में एक जैसे लगने वाले मनुष्यों में से कुछ की प्रतिभा तथा विलक्षणता ऐसी होती है, जो देखते ही बनती है। इसी प्रकार उसकी सामान्य गतिविधियों के पीछे कुछ ऐसे तथ्य छिपे होते हैं, जिन्हें देख-सुनकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
विलक्षण प्रतिभाओं के अनेकों उदाहरण सुनने को मिलते हैं। इनके पीछे जेनेटीक्स अथवा अचेतन की कौन-सी अविज्ञात शक्ति काम करती है, यह तो ज्ञात न हो सका, पर ये तथ्य ऐसे अविज्ञात का रहस्योद्घाटन करते हैं जिस पर समग्र शोध अभी जारी है। जीती जागती कम्प्यूटर मानी जाने वाली गणितज्ञ शकुन्तला की तरह कर्नाटक के विजग ग्राम के 6 वर्षीय अशोक नामक बालक ने भी ऐसा ही तहलका मचाया है। वह गणित के प्रश्नों को सेकेंडों में हल कर देता है। एक भाषा का ज्ञान ही मनुष्य को दो दशक लगा देता है, किन्तु म्यूनिख के प्राध्यापक फ्रेंच एक्सादर रिख्टर सारे विश्व की 77 भाषाओं में बातचीत करने एवं सभी में महारत तक रखने का दावा करते हैं।
प्रतिभा, जिम्मेदारी और ईमानदारी रूपी व्यक्ति के त्रिविधि गुणों की आवश्यकता पूरी करने वाला एकमात्र व्यक्ति अमेरिकी काँग्रेस के सदस्यों को श्वाइन्जर कालफैक्स की प्रतीत हुआ। उन दिनों महत्वपूर्ण पदों में से कोई भी व्यक्ति किसी एक को ही सम्भाल सकता था। पर सदस्यों ने सर्वसम्मति से दो सर्वोच्च पदों पर बने रहने के लिए न केवल आग्रह किया वरन् इसके लिए विशेष नियम भी पारित किए। श्री कालफैक्स यूनाइटेड स्टेट्स के सन् 1865 में उपराष्ट्रपति भी थे। उनकी प्रत्युत्पन्नमति एवं विलक्षण स्मरण शक्ति के कारण विशेष प्रस्ताव द्वारा उनसे हाउस ऑफ रिप्रेजेन्टेटिब्स के स्पीकर का पद सम्भालने को कहा गया। दोनों पद वर्षों उन्होंने बखूबी निभाये।
किसी एक व्यक्ति ने एक ही समय में तीन विभिन्न फैकल्टीज के अधिष्ठाता, व्याख्याता की भूमिका तीन अलग-अलग विश्वविद्यालयों में निभाई हो, इसके उदाहरण हैं- अमेरिका के डा. पाल. ए. चेडवॉर्न। अपने विषयों में निष्णात होने के कारण उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गयी। प्रोफेसरों की कमी नहीं थी, पर उनके ज्ञान की प्रगाढ़ता और पढ़ाने की शैली को देखते हुए हर विश्वविद्यालय उनसे अपने यहाँ काम करने का आग्रह करता था। अन्ततः उन्होंने विलियम्स कॉलेज, बाडोइन कॉलेज एवं मैंने मेडिकल कॉलेज में क्रमशः वनस्पति विज्ञान, इंजीनियरिंग एवं चिकित्सा विज्ञान की सर्वोच्च कक्षाएं पढ़ाते रहने की जिम्मेदारी हाथों ली एवं वर्षों बखूबी निभाई।
स्वामी विवेकानन्द पुस्तक पर हाथ रखकर मात्र पन्ने पलटकर उसे शब्दशः दुहरा देते थे। एक बार उन्हें एक विवाद में गवाह की भूमिका निभानी पड़ी। अपरिचित दक्षिणी भाषा में हुए एक वार्त्तालाप का साक्षी स्वामी जी को एक प्रतिवादी ने अपने समर्थन में बनाया। उस भाषा को न जानते हुए भी, वादी-प्रतिवादी में हुए आधे घण्टे के वार्त्तालाप को शब्दशः उसी भाषा में उन्होंने न्यायाधीश के समक्ष दुहरा दिया। इसी गवाही के बदौलत एक निर्दोष व्यक्ति की जान बच गयी।
वे तो मात्र कुछ प्रसंग हैं, उस अपरिमित मानवी सत्ता के, जिसके एक-एक घटक में प्रचुर सामर्थ्य छिपी पड़ी है। साठ साल तक की औसत आयु जीने वाला मनुष्य, जो लगभग 35 टन खाद्य सामग्री इस अवधि में उदरस्थ कर डालता है, यदि समय की महत्ता समझकर एक-एक पल का सदुपयोग कर सके तो वह भी इस सामर्थ्य को हस्तगत कर सकता है।
प्रकृति जगत अनेकों ऐसी विचित्रताओं से भरा पड़ा है जिनका समाधान सामान्य अन्वेषण बुद्धि नहीं लगा पाती। ऐसे ही अनेकों उदाहरणों में से कुछ इस प्रकार हैं।
बाई डाँगों अफ्रीका के गाँव मवाई तथा फाँस के ‘केन्ड्री’ स्थान में एक प्रकार का वृक्ष पाया जाता है जो वनस्पति विज्ञान के नियमों का उल्लंघन कर वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है। इस वृक्ष की जड़ें कील या चूलनुमा होती हैं। जब कभी तूफान इस पेड़ के पास पहुँचता है तो वृक्ष चूलनुमा जड़ के सहारे लट्टू जैसे चक्कर काटने लगता है जबकि अन्य जाति के हजारों पेड़-पौधे धराशायी हो जाते हैं। जितनी देर तूफान रहता है- वृक्ष नाचता रहता है, तूफान बन्द होने पर उसका नाचना बन्द और उसकी अगली विकास यात्रा प्रारम्भ हो जाती है।
गर्म प्रदेशों में पाया जाने वाला वृक्ष ‘समानी सनम’ वनस्पति जगत में अपने ढंग का अनोखा है। वह रात्रि में बादल की तरह बरसता है। उस क्षेत्र के निवासी उसी से अपनी जल आवश्यकता पूरी करते हैं। यह पेड़ दिन भर अपने डण्ठलों से हवा की नमी सोखता रहता है और अपना भण्डार भर लेता है। जैसे ही मौसम की गर्मी शान्त होती है वह उस भण्डार को खाली करके उस क्षेत्र के प्राणियों की प्यास बुझाता है। सभी रात्रि की प्रतीक्षा में उसके इर्द-गिर्द जमा रहते हैं।
हिन्द महासागर के रियूनियन द्वीप में कैक्टस जाति का एक विचित्र पौधा पाया जाता है। वह अपने जीवन के अन्तिम दिनों प्रायः पचास वर्ष बाद एक बार ही फूलता है। इसके बाद उसके जीवन का अन्त हो जाता है।
इसी प्रकार सेग्येरो कैक्टस की रबर की तरह व सकने वाली चमड़ी केवल एक बार की तूफानी वर्षा में दो सौ गैलन पानी सोख सकती है। इसकी छिछली जड़ों का अव्यवस्थित फैलाव सौ फुट तक के क्षेत्र में होता है।
महाराष्ट्र के जल गाँव-अजिष्ठा मार्ग पर पहुर नामक एक छोटा-सा गाँव है। वहाँ से शेंदुर्णी जाने वाली कच्ची सड़क पर 3 मील दूर पर सोय गाँव अवस्थित है। इस गाँव में वाणी सिद्धि का एक अद्भुत चमत्कार नीम का एक पेड़ है। जिसकी प्रत्येक डाल के पत्ते कड़ुवे हैं किन्तु सिर्फ एक डाल ऐसी है जिसके पत्तों का स्वाद अत्यन्त मीठा लगता है। कहते हैं कड़ोवा महाराज नाम के एक साधु ने ईश्वर के अस्तित्व और उसकी शक्ति का परिचय देने के लिए ऐसा किया था।
अभी-अभी पिछले दिनों विश्व के सबसे बड़े बरगद वृक्ष की जानकारी भारत वर्ष के आंध्रप्रदेश के अनंतपुर जिले में मिली है। कादिरी ताल्लुक में विद्यमान यह वृक्ष 5 एकड़ क्षेत्रों में फैला हुआ है। इसे एक पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित किये जाने की योजना है।
अमेरिका के कैलीफोर्निया प्रांत के घने वनों में रेड़वुड़ का वृक्ष है जिसने 4 हजार बसन्त देखे हैं। वह अब भी फल फूल रहा है। पुराने जमाने में इसकी डालों का प्रयोग तीर कमान बनाने में किया जाता था।
विश्व का सबसे वृक्ष देवदार भारत के टिहरी में है यह 700 साल से जिंदा है। इसी प्रकार तमिलनाडु में 500 वर्ष पुराने दो सागौन के पेड़ हैं। पश्चिमी बंगाल में मालदा में 36 मीटर ऊंचाई का एक आम का पेड़ तथा महाराष्ट्र के चांदा में 43 मीटर ऊंचा सागौन का पेड़ है जो सबसे अधिक किसी वृक्ष की ऊँचाई है।
प्रकृति के नियमों में अपवाद के रूप में पाए जाने वाले ये विचित्र विलक्षण वनस्पति जगत के उदाहरण बताते हैं कि सुनियोजित विधि-व्यवस्था में सृजेता अपना बराबर हस्तक्षेप रखता है। हँसी मजाक भी करता है वह इन विचित्रताओं के माध्यम से अपनी नियामक सत्ता का परिचय हर क्षण मनुष्य को दिलाता रहता है।
तत्त्वदर्शियों का यह मत है कि जड़ और चैतन्य में भेद हमें हमारी स्थूल दृष्टि के कारण दिखाई पड़ता है। वस्तुतः जड़ता कहीं भी नहीं है। ब्रह्मांड के कण-कण में चेतना संव्याप्त है। मानवी काया और विराट् ब्रह्मांड भी उसी चेतना के महासागर का एक अंग होने के नाते परस्पर एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं। इस तत्व-दर्शन को प्रतिपादित कर विश्व भर में फैलाने एक विज्ञान का स्वरूप देने का कार्य भारत से ही आरम्भ हुआ व इसे ज्योतिर्विज्ञान नाम दिया गया। इसका उद्देश्य यही था कि आकाश में ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति का मौसम विज्ञान और प्राणी समुदाय पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया जाय। विडम्बना यही है कि इस विद्या का फलित ज्योतिष के नाम पर दुष्प्रभावों की भय-विभीषिका फैलाने के रूप में दुरुपयोग अधिक हुआ है। फिर भी छुटपुट प्रयास ऐसे चले हैं जिन्हें यथार्थवादी एवं भ्रान्ति निवारक कहा जा सकता है।
भारतीय ज्योतिष की नींव बड़ी गहरी, वैदिक काल से पड़ी प्रतीत होती है। सृष्टि के निर्माण काल के बारे में विज्ञान तथा इस ज्योतिष से बड़ा तालमेल बैठता है। काल गणना करके मानव वर्ष तथा देव वर्ष बने हैं। 360 मानव वर्षों का एक देव वर्ष कहा जाता है। 12 हजार वर्षों का एक देवयुग और 1000 देवयुग को ब्रह्मा जी का एक दिन कहा जाता है। एक देवयुग में सतयुग, त्रेता द्वापर तथा कलियुग क्रमशः 48, 36, 24 और 10 हजार वर्ष के होते हैं। प्रत्येक युग के आरम्भ तथा अन्त में पड़ने वाली संध्या बेला को भी वर्गीकृत किया गया। आरम्भिक संध्या बेला को सन्ध्या और अन्तिम चरण को संध्याँश कहा गया। भारतीय ज्योतिर्विद् यह भी बताते हैं कि कलियुग, द्वापर, त्रेता और सतयुग में संध्याएं क्रमशः 100, 200, 300 और चार-चार सौ वर्ष की पड़ती हैं। एक युग की संध्या और संध्याँश का समग्र एक जैसा होता है। युगों के मुख्य भाग सतयुग में 4000, त्रेता में 3000, द्वापर में 2000 और कलियुग में 1000 वर्षों का कहे गए हैं।
ज्योतिष शास्त्र का आधार गणित को दिलाने का श्रेय आर्यभट्ट को जाता है। अनेक कठिन प्रश्नों को सूक्ष्मीकृत करके उन्होंने मात्र 30 श्लोकों में सीमित कर दिया। प्रसिद्ध ज्योतिष व सिद्धान्त के काल क्रिया पाद अध्याय में तिथि नक्षत्र की गणना की गई है। सूर्य सिद्धान्त में ब्रह्मांड की ही नहीं काल विभाजन की भी गवेषणा की गई है।
बाराह मिहिर की पंच सिद्धान्तिका में चन्द्रमा की कलाओं की विवेचना है। ग्रन्थ यंत्राध्याय के अनुसार काल के सूक्ष्म अवयवों का ज्ञान बिना यन्त्र के असम्भव है। राशि वलय, नाड़ी, वलय या शंकुधरी, चक्र चाप, सूर्य फलक और भित्ति यन्त्र जैसे यन्त्रों का विशद वर्णन भाष्कराचार्य ने किया है। तदुपरान्त ज्योतिष में कुछ शतकों तक पठार सा रहा क्योंकि उसमें कोई ठोस कार्य सम्पन्न नहीं दिखते।
1682 में सवाई जयसिंह का जन्म हुआ बड़े होकर पहले उन्होंने जन्तर-मन्तर दिल्ली में वेधशाला बनवाई और बाद में जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में वेधशालाएं स्थापित कराईं। यह दुर्भाग्य ही है कि अन्तिम तीन वेधशालाएं जब खण्डहर स्वरूप ही हैं। इतना ही नहीं महाराजा जयसिंह का विशाल ग्रन्थागार भी विनष्ट हो गया है। उन्होंने पं. जगन्नाथ से टॉलेमी के “सिनटैविसस” का अनुदान कराया। आधुनिक इक्वेटोरियल यन्त्र की भाँति ही उनका बनवाया हुआ चक्र यन्त्र प्रसिद्ध है।
आज की दिल्ली की कुतुबमीनार का निर्माण कभी सम्राट समुद्र गुप्त ने कराया था। परन्तु आमतौर पर लोग इसे कुतुबुद्दीन ऐबक का बनाया मानते हैं। यह इतिहास की एक बड़ी भूल है। इस मीनार का वास्तविक नाम “विष्णु ध्वज” था। इसे वेधशाला की केन्द्रिय मीनार के रूप में बनवाया गया था। प्रो. डी.त्रिवेदी द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार इस मीनार का निर्माता समुद्रगुप्त ही था। पास की विष्णुपद पहाड़ी में लोहे का स्तम्भ भी खड़ा किया गया था। जिस पर गुप्त कालीन लिपि में खुदे सूत्र हैं।
डा. त्रिवेदी की जानकारी से यह भी स्पष्ट होता है कि यह मीनार 5 डिग्री कोण पर झुकी हुई है और 22 जून को दोपहर में उसकी छाया नहीं पड़ती। सर्वविदित है कि यह दिन उत्तरी गोलार्ध का सबसे बड़ा दिन माना जाता है। कुतुबमीनार गणित के सिद्धान्तों के आधार पर बनायी गई थी। इसके प्रत्येक कोने के बीच की दूरी 30 डिग्री तथा 35 डिग्री है। त्रिकोण भित्ति की गणना से इसकी ऊँचाई आधुनिक इकाई में 87.03 मीटर है।
ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक भौतिक विज्ञानियों द्वारा प्रणीत ब्रह्मांडीय एकत्व का सिद्धान्त ऋषियों को बहुत पहले ही मालूम हो चुका था। इसकी झाँकी हम आर्ष ग्रन्थों में पाते हैं। भारतीय ऋषि सदा से इस बात को कहते आये हैं कि इस जगत को दो मार्गों से समझा जा सकता है अपरा विद्या और परा विद्या। उनके अनुसार अपरा विद्या निकृष्ट स्तर की है जो पदार्थ जगत के लिए ही लागू होती है। दूसरी तरफ परा विद्या को अतींद्रिय व सूक्ष्म योग शक्ति ग्राह्य माना गया है। यह वस्तुतः उच्चस्तरीय गणित है। जिससे वैदिक काल में विश्व की संरचना व काल गणना का अध्ययन किया जाता था।
चिर पुरातन वेदों का सम्बन्ध परा विद्या से है और ज्योतिष को वेदों का नेत्र कहा गया है। अतः ज्योतिष को भी परा विद्या से ही सम्बन्धित बताया गया है। चूँकि परा विद्या एक उच्चस्तरीय गणित है अतः ज्योतिष भी उसी स्तर की गणित विद्या है। इन महान ग्रन्थों के अनुसार इस महान विद्या ज्योतिर्विज्ञान का मूलभूत आधार वस्तुतः चन्द्रमा, सूर्य तथा सौर जगत के अन्यान्य ग्रहों का पृथ्वी तथा उसके निवासियों से अन्योन्याश्रित सम्बन्धों एवं सम्भावित प्रभावों का अध्ययन है।
ज्योतिष का तात्विक अर्थ शक्ति अथवा नक्षत्र है। सर एम.एम. विलियम ने अपनी संस्कृत से अंग्रेजी शब्दकोष में ज्योतिष की इस प्रकार व्याख्या की है। “सत्व गुण से व्याप्त मनःस्थिति अथवा प्रशान्त मनःस्थिति अथवा ब्रह्म-ज्योति अथवा सर्वोच्च सत्ता के रूप में बोधगम्य प्रकाश”। एक शब्द में ज्योतिष को चेतन सत्ता की पारस्परिक क्रिया का विज्ञान कह सकते हैं। अर्थात् तत्वों अथवा शरीर के अवयवों, मन एवं ब्रह्मांडीय शक्तियों के बीच पारस्परिक संयोग- क्रिया का परिणाम ही ज्योतिर्विज्ञान है।
ब्रह्मांड विद्या (ज्योतिष शास्त्र) में ग्रहों को एक राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था क्रम में रखा गया है। जिसमें सूर्य राजा का प्रतिनिधि है, चन्द्रमा रानी का तथा बुध राजकुमार का। इस सबके पीछे भी गणितीय सिद्धान्त काम करते हैं। प्राचीन आर्ष ज्योतिषियों ने ज्योतिर्विद्या को एक ब्रह्मांडीय अनुशासन के रूप में प्रस्तुत किया है। जिसमें ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम, निष्ठा व्यक्त की गई है। ज्योतिष का उनने पवित्र तन्त्र के रूप में ध्यानपूर्वक अध्ययन किया एवं ज्योतिष को ज्ञान का समुद्र कहा है। इस विद्या को परम पावन परा विद्या के रूप में प्रतिपादित किया गया जिसकी गहराइयां तथा सीमाएं अनन्त हैं। इसीलिए भारतीय ज्योतिष शास्त्रियों में उपरोक्त संकेत रूपक स्थापित किये हैं जिससे इस विद्या के रहस्यों को समझा जा सके।
ब्रह्मांड रसायन जैविकी के अनुसार राशि चक्र के बारह चिन्ह काल पुरुष के, महाकाल के शरीर के अंग हैं। पहला राशि चिन्ह मेष है जो काल पुरुष के मस्तिष्क नियन्त्रण केन्द्र का प्रतिपादन करता है। वृषभ चेहरे का प्रतीक है। मिथुन गर्दन तथा सीने के ऊपरी हिस्से का तथा कन्धों का चिन्ह है। कर्क हृदय, सिंह पेट, कन्या नाभि, तुला आंतों, वृश्चिक गुप्ताँगों, धनुष जंघाओं, मकर जोड़ों, कुम्भ घुटनों के नीचे वाले भागों तथा मीन शरीर के अन्तिम निचले हिस्से पैरों का प्रतीक है।
इस व्यवस्था के अंतर्गत ब्रह्मांडीय पुरुष के शरीर के विभिन्न अंगों के रूप में ग्रहों को चिन्हित किया गया है। चन्द्रमा मन है। मंगल शक्ति है। बुध वाक् है। गुरु काल पुरुष का ज्ञान, स्वास्थ्य, समृद्धि, सन्तति तथा सुख सम्बन्धी पक्ष है। शुक्र आकर्षण शक्ति, लैंगिक प्रेम तथा उपभोग का प्रतीक है। शनि तितीक्षा, व्यथा एवं अन्ततः भक्ति की वेदना का प्रतीक है। जिसमें मिलन की सम्भावनाएं निहित हैं।
ब्रह्मांडीय विद्या में सामाजिक राजनैतिक प्रतीक भी है। जैसे सूर्य- राजा, चन्द्रमा- रानी, गुरु- शुक्र, मन्त्री, मंगल-सेनापति, बुध-राजकुमार तथा शनि सेवक हैं। ये प्रतीक मात्र हैं जो उनके अधिकार क्षेत्र का बोध कराते हैं जिसकी परिधि में सृष्टि का घट-घट आ जाता है। काल पुरुष चार्ट, जो ग्रहों की जानकारी का मूल आधार है, की सहायता लेकर किसी भी व्यक्ति की जन्म कुण्डली बनाकर व्यक्ति के शारीरिक-मानसिक विकास की जानकारी मिल सकती है साथ ही भावी भावनाओं की जानकारी देकर दिशाधारा निर्धारित की जा सकती है। यदि किसी व्यक्ति का सूर्य ग्रह ठीक जगह स्थित तथा बलवान है तो व्यक्ति की सामाजिक स्थिति तथा नियन्त्रण शक्ति ठीक होने की जानकारी मिलती है। शक्तिशाली ग्रह अपने विशिष्ट प्रभाव की जानकारी देते हैं।
यह एक समग्र विज्ञान सम्मत विधा है, ऐसा इस वर्णन से स्पष्ट होता है। खगोल भौतिकी के सिद्धान्त भी कुछ ऐसा ही प्रतिपादित करते हैं। न केवल भारत अपितु विदेशों के विद्वान भी ज्योतिर्विज्ञान के स्वरूप की ऐसी व्याख्या करने में समर्थ हुए हैं, जिससे ब्रह्मांडीय शक्तियों के जीव चेतना पर प्रभाव की पुष्टि होती है।
ईसाई धर्म की पुस्तक बाइबिल की व्याख्या करते हुए तीन शताब्दी पूर्व विद्वान पैरासेल्सस ने लिखा था कि “मनुष्य शरीर को इच्छाओं का सजा हुआ वाद्य यन्त्र कहना चाहिए जिसमें कि आत्मा की झंकार सबसे मधुर रूप में सुनाई देती है। इच्छाएं आकाश में स्थित नक्षत्रों (देव शक्तियों) के बीच कोश ही हैं। यह बीज शरीर के कुछ महत्वपूर्ण स्थानों में रहते हैं। उनकी आणविक संरचना और ब्रह्मांड व्यापी नक्षत्रों की मूलभूत संरचना में विलक्षण साम्य होता है।
पैरासेल्सस लिखते हैं- “शरीर की रचना नक्षत्र गति के संरक्षण और निर्देशन में होती है। उत्पत्ति के तीसरे दिन चन्द्रमा ने बुद्धि और तुला ने व्यक्तित्व को प्रभावित किया। शरीर में तन्मात्राएं दूसरे दिन ही आ गईं थीं, जिनकी उत्पत्ति सूर्य शक्ति से हुई। हृदय पर लियो (चन्द्रमा) का अधिकार होता है और वह आत्मिक शान्ति और सभ्यता प्रदान करता है। शरीर के दूसरे सूक्ष्म अंगों को सेजीटेरियस इगो प्रभावित करते हैं। इस प्रकार मध्यकाल के ज्योतिर्विद् भी आर्षविज्ञान की इस विधा के उन पक्षों का समर्थन करते दीखते हैं जिन्हें देव संस्कृति में महत्वपूर्ण स्थान मिलता रहा है।
सभी वैज्ञानिक प्रमाण एवं उपलब्ध तथ्य यही बताते हैं कि यह समग्र ब्रह्मांड एक शरीर है और इसका कोई भी अंग अलग नहीं, वरन् एकात्म भाव से जुड़ा हुआ है। कोई भी ग्रह-नक्षत्र कितनी भी दूर क्यों न हो, वह जीव जगत को निश्चित रूप से प्रभावित करता है। साथ ही अपने ग्रह पर होने वाली विधाता को अमान्य गतिविधियाँ प्रकारान्तर से अंतर्ग्रही सन्तुलन को प्रभावित कर दैवी प्रकोपों को आमन्त्रित करती हैं, यह भी सत्य है। अन्तर्ग्रही प्रभावों से अब भली-भांति परिचित मनीषीगण यह कहने में हिचकते नहीं कि अणु में लघु एवं विभु में महान की, पिण्ड व ब्रह्मांड की एकता का सिद्धान्त सुनिश्चित एवं सत्य है। चिन्तन में परिवर्तन के इस महत्वपूर्ण मोड़ ने विज्ञान को नयी दिशाधारा दी है, नये सिरे से सोचने का अवसर दिया है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। एतानि यत्र वर्तन्ते तत्र देवः प्रसीदति॥
परिश्रमशीलता, साहस, धैर्य, सद्बुद्धि और श्रेष्ठ कार्यों में पराक्रम- ये गुण जिस व्यक्ति में होते हैं, उन पर देवताओं की प्रसन्नता बनी रहती है।
जापान की भूमि आये दिन भूकम्प आने के लिए कुख्यात है। इसलिए वहाँ लोग भारी मकान नहीं बनाते। लकड़ी और शेडों के माध्यम से ऐसे घर बनाते हैं, जिनके धराशायी होने पर जान-माल की कम से कम क्षति हो। कारखानों का भी मरम्मत से काम चल जाय। किन्तु जापान से लगे हुए चीनी क्षेत्र की स्थिति भयावह है। वहाँ जमीन के नीचे कई दिशाओं में छितराई हुई ऐसी पट्टियाँ जलती हैं जिनमें भीतर ही भीतर कई प्रकार हलचलें चलती रहती हैं और कभी-कभी तो भयंकर भूकम्पों की विनाश लीला उपस्थित करती हैं।
पिछली शताब्दी तक इन्हें दैवी प्रकोप माना जाता था और किसान अपने क्षेत्र सुरक्षित बने रहने के लिए मनौती मनाया करते थे। पीछे विज्ञान की प्रगति ने इसके कारणों को ढूँढ़ निकाला और यह अन्वेषण कर लिया कि उनका पूर्वाभास प्राप्त किया जा सके। काफी समय पूर्व जानकारी मिल जाने से वे लोग आपत्ति ग्रस्त क्षेत्र की सीमा छोड़कर खुले मैदानों में चले जाते। बाँस और बोरियों की सहायता से उनके नीचे गुजारा करते हुए उतना समय बिता लेते जितने दिनों में आपत्ति काल टल जाता।
चांग काई शेक के समय से लेकर माओत्से तुंग तक के काल में इस अनुसन्धान पर विशेष जोर दिया जाता रहा है कि विनाशकारी भूकम्प आने के क्षेत्र और समय की भविष्यवाणी कर सकता बन पड़े। साथ ही यह भी बताया जा सके कि उसकी शक्ति कितनी प्रचण्ड या हलकी होगी।
भविष्य कथन कभी गृह गणित पर निर्भर रहता था और उनसे बचने के लिए देवताओं की मनौती मनाने के अतिरिक्त और कोई उपाय न था। किन्तु अब वह पद्धति बिलकुल बदल गई है। जिन पट्टियों में भूकम्प की सम्भावना विदित हो चुकी है, उनमें भू-चुम्बकीय सिद्धान्त पर आधारित अनेकों वेधशालाएं बनाली गई हैं। वे जमीन के भीतर चल रही हलचलों की ऐसी सूक्ष्म सूचनाएं ऊपर परत पर भिजवाती हैं कि भूकम्प की लहर कितने क्षेत्र को प्रभावित करेगी, किस दिशा से किस दिशा को चलेगी, कितने समय ठहरेगी और उसकी विस्फोट क्षमता कितनी शक्तिशाली होगी।
यह सूचना मिलते ही बेतार के तार से उस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के साइरन बजने आरम्भ हो जाते हैं। इस प्रदेश के निवासों को सिखाया गया है कि किस प्रकार के भोंपू बजने का क्या तात्पर्य होता है। जहाँ विस्फोट की अधिक सम्भावना होती है वहाँ खतरे की लाल बत्तियाँ जलने लगती हैं और जहाँ संकट का अन्तिम दौर होता है वहाँ हरी बत्तियाँ जगमगाने लगती हैं ताकि लोग घर छोड़कर दिशा और अवकाश के समय की सही जानकारी प्राप्त कर सकें।
सरकारी सामान से ऐसे मोमजामे के मुसाफिर खाने बना दिये जाते हैं, जिनके नीचे लोग संरक्षण प्राप्त कर सकें। भोजन के लिए भुने हुए सत्तू जैसी वस्तु पहले से ही तैयार रखी जाती है। बाजार में भी बिकती है और लोग घरों में भी बनाकर तैयार रखते हैं। यह पचने में हलका होता है। बच्चे, बूढ़े और बीमार इसके सहारे सामयिक संकट की घड़ी निकाल सकते हैं।
पिछली शताब्दियों में भूकम्पों ने समूचे चीन व जापान क्षेत्र में कितनी क्षति पहुँचाई थी। इस शताब्दी में वेधशालाओं एवं अन्तरिक्षीय उपग्रहों के सहारे पूर्व ज्ञान प्राप्त करने और भविष्यवाणी करने की सुविधा ने हानि का अनुपात 95 प्रतिशत कम कर दिया है। साथ ही यह भी अनुमान लगने लगा है कि किसी क्षेत्र को संकट से मुक्ति मिल गई और किसमें नये सिरे से शुरुआत होने जा रही है। इस प्रकार चीन की तरह सर्वत्र भविष्य कथन उपयोगी हो सकता है। पर वह होना चाहिए वैज्ञानिक आधार पर। पंचांगों के सहारे ही जाने वाली फलित ज्योतिष जानकारी तो प्रायः तीर-तुक्का भर होती है।
मनुष्य के खाने सोने और चलने-फिरने वाले शरीर के सम्बन्ध में सर्व साधारण को काम चलाऊ जानकारी भर है। उसके भरण-पोषण, चिकित्सा उपचार, साज-सज्जा एवं प्रसन्नता मनोरंजन के लिए जो कुछ सम्भव होता है सो अपनी बुद्धि और क्षमता के अनुरूप सभी करते हैं।
इसके उपरान्त मनुष्य का व्यक्तित्व आता है, जो गुण, कर्म, स्वभाव, शिक्षा एवं संगति पर निर्भर है। व्यक्तित्ववान् प्रतिभाएं अपनी दूरदर्शिता के आधार पर बड़ी जिम्मेदारियाँ उठाती हैं और उन्हें सफल बनाकर दिखाती हैं। शरीर के स्वस्थ अथवा सुगढ़ सुन्दर होते हुए भी यदि आन्तरिक क्षमता दुर्बल हो तो दृश्यमान आकर्षण का प्रभाव ठहरता नहीं। जल्दी ही उसकी मूर्खता एवं अनगढ़ स्थिति प्रकाश में आती है और लोग उनका मजाक बनाने लगते हैं। न ही वह अपने कामों को सही ढंग से कर सकता है और न उससे वार्तालाप करते हुए कोई प्रभावित या प्रसन्न होता है इसलिए शरीर की तरह ही मनुष्य के अन्तरंग का- व्यक्तित्व का भी महत्व माना गया है।
अध्यात्म क्षेत्र में शरीर और मन के अतिरिक्त सूक्ष्म शरीरधारी आत्मा का भी अस्तित्व माना गया है। यह सूक्ष्म शरीर- काया के इर्द-गिर्द प्राण विद्युत की तरह विद्यमान रहता है और तेजोवलय के रूप में उसे विशेष यन्त्र उपकरणों से देखा परखा भी जा सकता है। इसी को सुविकसित एवं क्षमता सम्पन्न बनाने के लिए अनेक प्रकार की साधनाएं की जाती हैं।
आर्ष मान्यता है कि मरने के बाद भी सूक्ष्म शरीर विद्यमान रहता है। स्वर्ग नरक में उसी को जाना पड़ता है। नया जन्म न होने तक यह सत्ता अपना अस्तित्व बनाये रहती है। प्रिय अप्रिय जनों के साथ उसका भला-बुरा संपर्क भी बना रहता है। नया जन्म लेने से इस सूक्ष्म शरीर का स्तर ही प्रधान भूमिका निभाता है।
जीवित स्थिति में यह सूक्ष्म शरीर यदि उपयुक्त क्षमता अर्जित कर ले तो सिद्ध पुरुष जैसी स्थिति उपलब्ध होती है। वह एक साथी या सहायक की तरह प्रत्यक्ष शरीर से एवं अन्यान्य लोगों को अपनी विशिष्टता से लाभान्वित करता रहता है।
मध्य पूर्व के नव निर्मित धर्मों की मान्यता है कि आत्मा कब्र में बैठी रहती है और महाप्रलय के दिन उसे ईश्वर के सम्मुख बुलाया जाता है। भले बुरे कर्मों का ईश्वर के दरबार में ही न्याय किया जाता है। किन्तु पुरातन काल के सभी धर्मों में मरने के बाद आत्मा के अन्तरिक्ष में निवास करने तथा इच्छित क्रिया-कलापों में निरत रहने की बात कही गई है।
पुरातन दर्शन एवं विज्ञान अनुसन्धान संस्थान के संस्थापक प्लूटो ने ईसा से 428-348 वर्ष पूर्व ‘फैडौ’ नामक पुस्तक में अपने गुरु सुकरात के उन सन्देशों को उद्धृत किया है जो प्लूटो को दिये गये थे। जीवन के अन्तिम क्षणों में सुकरात ने कहा था कि “तुम्हें मेरी मृत्यु पर दुःख व्यक्त नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह नाशवान शरीर ही जलेगा, आत्मा नहीं।” एक और पुस्तक “रिपब्लिक” प्लूटो की बड़ी लोकप्रिय बन चुकी है जिसमें उनने आत्मा की अमरता को अंगीकार किया है। प्लूटो के इस ज्ञान का स्त्रोत मनीषीगण भारतीय दर्शन को ही मानते हैं।
यहूदी भाषा में आत्मा को ‘नैफेस’ की संज्ञा दी गयी है। जिसका अर्थ है- “सजीव शरीर के साथ जुड़ा हुआ सूक्ष्म”। अर्थात् आत्मा का शरीर से अलग रहकर कोई अस्तित्व नहीं रहा जाता। वह स्थूल अथवा सूक्ष्म शरीर को धारण किये ही रहती है। उक्त तथ्य की पुष्टि ईसाइयों के धर्मग्रंथ बाइबिल के जैनेसिस 27 में भी की गयी है। “न्यू टैस्टामैंट” में भी आत्मा के अजर-अमर होने के प्रमाण स्पष्ट रूप से पढ़ने को मिलते हैं। न्यू टैस्टामैंट में वर्णित ‘शुके’ शब्द भी यहूदी ‘नैफेस’ के समरूप समझा जाता है। ‘शुके’ शब्द का दो प्रकार से प्रयोग होता आया है। एक तो वह आत्मा जो निम्न कोटि के जीवधारियों तथा प्राणियों में कार्यरत रहती है और दूसरा स्वरूप वह जो ऊँच-नीच, भेद-भाव आदि के झंझटों से मुक्त रहता है। इनमें से एक को प्रेतात्मा अथवा प्राणी कहा जा सकता है और दूसरे को स्वर्गस्थ जीवन मुक्त।
संसार भर के अन्यान्य पुरातन ग्रन्थों और घटनाक्रमों को देखने सुनने से पता चलता है कि आत्मा का शरीर से पृथक होने की ही मान्यता नहीं रही है, वरन् यह भी माना जाता है कि मरणोत्तर जीवन भी लम्बे समय तक बना रहता है। नवीन जन्म कब मिलता है और किस कारण किस प्रकार का शरीर धारण करना पड़ता है, इस सम्बन्ध में मतभेद होते हुए भी यह मान्यता अधिकतर दार्शनिकों की है कि आत्मा का अस्तित्व सूक्ष्म शरीर के रूप में मरने के बाद भी बना रहता है और वह लौकिक गतिविधियों में अपना हस्तक्षेप तथा योगदान किसी न किसी रूप में करती ही रहती है। देवताओं और मनुष्यों के बीच सन्देश वाहक जैसी भूमिका उसकी रहती है।
भारतीय तत्त्वदर्शन तो इस संदर्भ में अनादि काल से ही मानता रहा है कि मृत्यु केवल शरीर की होती है और उसके उपरान्त भी सूक्ष्म शरीर समेत आत्मा की गतिविधियों का क्रिया-कलाप जारी रहता है। स्वर्ग या मुक्ति की दशा में ही संसार से सम्बन्ध विच्छेद करती है और परम शान्ति को प्राप्त करती है। जब तक वह स्थिति नहीं आती तब तक सूक्ष्म शरीर संसार में अदृश्य रूप से रहता है और स्वार्थ या परमार्थ के लिए कुछ न कुछ करता ही रहता है। स्वार्थी अपनी अतृप्त कामनाओं की पूर्ति के लिए उस प्रकार के घटनाक्रमों के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं और शरीर न होने पर भी वे इच्छित स्वभाव के अनुरूप जहाँ वातावरण दिखता है वहाँ जा पहुँचते हैं। जिनसे अपनी मित्रता या शत्रुता रही है उन्हें लाभ-हानि पहुँचाने का भी जो कुछ प्रयास बन पड़ता है उसे करते रहते हैं। इन्हें प्रेत स्तर का कहा जाता है। परमार्थ परायण आत्माएं कष्ट पीड़ितों की सहायता करने जा पहुँचती हैं और “अदृश्य सहायकों” की भूमिका निभाती हैं किन्हीं को प्रेरणा देकर उनके शरीरों से वह काम करा लेती है जिसे करने के लिए उनकी परमार्थ भावना उमड़ती है।
शरीर धारी मनुष्य लोकहित के अनेक कामों में योगदान देते रहते हैं। जिनकी वह प्रवृत्ति बनी रहती है, वे मरने के बाद भी ऐसे अवसर तलाशती रहती हैं और उस वातावरण में सम्मिलित होकर कुछ न कुछ ऐसा करती रहती हैं, जिससे सत्प्रयोजनों में सफलता मिले और दुष्टों के मनोरथ विफल होते रहें। उस प्रकार के घटनाक्रमों से जो सत्परिणाम उपस्थित होते हैं उनकी अनुभूति ही उन्हें सन्तोष देती है। अस्तु! अपनी निज की प्रसन्नता और दूसरों की सुविधा के लिए सूक्ष्म शरीरधारी भी कुछ न कुछ करते ही रहते हैं।
यह संसार कर्मक्षेत्र है। शरीर का गठन भी कुछ ऐसा हुआ कि वह बिना कर्म किये रह नहीं सकता। जीवित रहते हुए मनुष्य को जैसा कुछ करने का अभ्यास रहा होता है उसी के अनुरूप उसकी गतिविधियाँ मरणोत्तर काल में उस समय तक चलती रहती हैं जब तक कि उन्हें नया जन्म नहीं मिल जाता और सद्गति वाले शान्तिलोक में उन्हें विश्राम नहीं मिल जाता।
व्यास जी बोलते गये और गणेश जी लिखते गये। इस प्रकार जब महाभारत पूरा हो गया तो व्यास जी ने गणेश जी से कहा- मैनें चौबीस लाख शब्द बोले पर उस समय में सर्वथा मौन रहे। एक शब्द भी न कहा। गणेश जी ने कहा- वादरायण, सभी प्राणियों में सीमित प्राण शक्ति है। जो उसे संयमपूर्वक व्यय करते हैं वे ही उसका समुचित लाभ उठा पाते हैं। संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है और संयम की प्रथम सीढ़ी है- वाचोमुक्ति अर्थात् वाणी का संयम।
मस्तिष्क एक छोटा किन्तु अत्यन्त शक्तिशाली बिजलीघर है। उसमें से अगणित दिशाओं में प्रवाह चलता है। इनमें कुछ तो शरीर के भीतर हैं जो जीवनचर्या से सम्बन्धित अनिवार्य जैविक गतिविधियों को चलाते हैं। कुछ ऐसे हैं जो बाह्य जीवन से सम्बन्धित हैं। भावना, आकाँक्षा, विचारणा, क्रिया का निर्धारण बाहर की परिस्थिति से सम्बन्धित होता है। इसमें मस्तिष्क के सचेतन भाग की अधिकाँश क्षमता नियोजित रहती है।
श्वास-प्रश्वास, आकुँचन-प्रकुँचन जैसी आंतरिक क्रियाओं का नियन्त्रण तो कठिन है। यह सब स्वसंचालित अचेतन भाग (आटोनॉमिक नरबस सिस्टम) द्वारा गतिशील रहता है। उसमें खर्च होने वाली बिजली पर नियन्त्रण नहीं हो सकता। पर वाह्य जीवन की समस्याओं में जो शक्ति खर्च होती है, उसे ध्यान द्वारा रोका जा सकता है। इस निग्रह से जो शक्ति एकत्रित होती है उसे अभीष्ट प्रयोजनों में लगाकर असाधारण प्रतिफल प्राप्त किया जा सकता है।
पाया गया है कि ध्यान की दशा में व्यक्ति के मस्तिष्क और शरीर में कई तरह की जैव रासायनिक प्रक्रियाएं सक्रिय होती हैं। कई अवाँछनीय प्रक्रियाएं उस समय निष्क्रिय हो जाती हैं। इसलिए अन्तर्मुखी ध्यान की स्थिति को विचार के सूक्ष्म स्तर तक उस समय तक उतारते जाना चाहिए जब तक मन विचार के सूक्ष्मतम अमूर्त्त स्तर तक न पहुँच जाये और उनके मूल स्त्रोत की खोज न कर ले। इस प्रक्रिया से चेतन मन की शक्तियों का विस्तार होता है। फलतः मनुष्य का सम्बन्ध सृजनात्मक बौद्धिकता से जुड़ता और उसी परिणति को प्राप्त होने लगता है। इस प्रक्रिया को हम केवल श्रमहीन शारीरिक मानसिक क्रिया कह सकते हैं जो एक साधारण मानव भी करने में सक्षम हो सकता है। केवल घण्टे भर के दैनिक अभ्यास से मानव प्रसन्नचित्त और सृजनशील बना रह सकता है।
ध्यान किसी भौतिक प्रयोजन में भी लगाया जा सकता है और अध्यात्म उद्देश्य के लिए भी। वैज्ञानिक, कलाकार, शिल्पी, साहित्यकार अपना ध्यान इन कार्यों में संलग्न करके तद् विषयक सफलताएं पाते हैं और जिन्हें अन्तर्मुखी होकर आत्मशोधन करना है अथवा प्रसुप्त शक्ति यों को जागृत करना है वे उस दिशा में प्रगति करते हैं। प्रयोजन विशेष के अनुसार ध्यान को वैसा मोड़ दिया जा सकता है। इस प्रक्रिया की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर भी अब विशद अनुसन्धान किया जा चुका है।
ध्यान साधना से शरीर-क्रिया-विज्ञान पर पड़ने वाले सम्भावित प्रभावों की खोज का कार्य “न्यूरोफिजियॉलाजिस्ट” गणों ने किया है। अमेरिका, इंग्लैण्ड, पश्चिमी जर्मनी में ही नहीं अपितु भारत के विभिन्न संस्थानों में भी इस प्रकार व्यापक कार्य हो रहा है। त्रिवेन्द्रम, बैंगलौर, मद्रास व दिल्ली के चिकित्सा संस्थानों ने इस विद्या पर अनुसंधान हेतु विशेष केन्द्र खोले हैं। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान भी दिल्ली में डा. छिन्ना एवं डा. बलदेव सिंह ने आज से 9 वर्ष पूर्व यह कार्य प्रायोगिक स्तर पर किया था। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मननशील एकाग्र ध्यानस्थ मस्तिष्क में अनेकों विशेषताऐं विकसित होती हैं।
ध्यान से शरीर की चयापचय प्रक्रियाएं सामान्य से कम क्रियाशील हो जाती हैं। इलेक्ट्रो एन सेफेलोग्राफ (ई. ई. जी.) की सहायता से वैज्ञानिकों ने डीप डी.सी. ब्रेन पोटेन्शियल प्राप्त कर व्यक्ति के मस्तिष्क की स्वप्नावस्था, सुप्तावस्था, जागृत एवं ध्यान तथा समाधि की मुद्राओं में हो रहे परिवर्तनों का अध्ययन किया है। मानवी मस्तिष्क में करोड़ों न्यूरान्स हैं जो सूचना को एक सिरे से दूसरे तक पहुँचाते हैं। केन्द्रकों में इन सूचनाओं का विवेचन विश्लेषण होता है। तत्पश्चात् शरीर के सम्बन्धित अंगों को निर्देश जाता है। मस्तिष्कीय स्नायु तन्त्र में सूचना सम्प्रेषण वस्तुतः एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है। “एसिटाइल कोलीन” नामक स्नायु रसायनों के माध्यम से जो विद्युत आवेश धारण किये होते हैं, सन्देशों का आदान-प्रदान एक प्रसुप्त केन्द्रों को जगाने का काम चलता रहता है। इस तरह मस्तिष्क एक अत्यन्त उच्च क्षमता वाला जैव रासायनिक विद्युत संयन्त्र है। अन्तर्मुखी ध्यान की स्थिति में क्रियाशीलता आने पर जो भी परिवर्तन होते हैं उन्हें ई. ई. जी. में देखा जा सकता है। साथ ही रक्त के स्नायु रसायनों का उपकरणों के माध्यम से मापन कर जाना जा सकता है कि शरीर के अन्दर क्या प्रतिक्रिया हुई?
मस्तिष्क में विद्यमान विद्युत स्फुल्लिंग के प्रवाह द्वारा छोड़ी गयी तरंगें चार प्रकार की होती हैं। अल्फा, बीटा, थीटा एवं डेल्टा। अल्फा तरंगें 8 से 13 प्रति सेकेंड, थीटा तरंगें 5 से 7 प्रति सेकेंड, बीटा तरंगें 13 से 30 प्रति सेकेंड एवं डेल्टा तरंगें 0.5 से 4 चक्र प्रति सेकेंड पूरा करती हैं, इसी आधार पर इनका वर्गीकरण है। शरीर शिथिल हो तो भी अन्तर्मुखी ध्यान की स्थिति में मस्तिष्क पूर्णतः क्रियाशील पाया गया है एवं अल्फा तरंगें मस्तिष्क के अग्रभाग से उभरती देखी गयी हैं, जिसे प्रिफ्रन्टल लोब, फ्रण्टल कार्टेक्स कहते हैं।
इसी प्रकार जब बीटा तरंगों का अध्ययन अन्तर्मुखी ध्यान के दौरान किया गया तो यह देखा गया कि बीटा तरंगें भी मस्तिष्क के अग्रभाग की ओर से ही उभरती हैं बीटा तरंगों के दौरान योगी को गहरी नींद आने का भी अनुभव होता है अतः निष्कर्ष निकाला गया कि सम्भवतः इस अल्पकालीन नींद के परिणाम स्वरूप ही योगी ध्यान के अन्त में मानसिक रूप से और शारीरिक रूप से जागरूक स्वस्थ एवं हलका-फुलका महसूस करता है।
मस्तिष्क का शारीरिक क्रियाओं पर पूर्ण आधिपत्य होने से ध्यान की व्यवस्था में दिन की धड़कन, रक्तवाहिनियों में रक्त दबाव में कमी एवं श्वास की दर में कमी आ जाती है। इसके परिणाम स्वरूप ही शरीर में मेटावोलिक गतिविधि घट जाती है। इसकी परिणति होती है तनाव से पूर्ण मुक्ति और शरीर व मस्तिष्क को पूर्ण विश्रान्ति।
श्वास क्रिया शिथिल होने से शरीर की आक्सीजन की पूर्ति में कमी आ जाती है। परीक्षण के दौरान यह मात्रा 100 मिलिलीटर रक्त में 110.4 से घटकर 80 मिलिग्राम हो जाती है। इसके परिणाम स्वरूप माँसपेशियों में होने वाली क्रियाओं के फलस्वरूप रक्त में विद्यमान अम्ल रूपी विष “लैक्टेट” काफी मात्रा में कम हो जाता है। ये सारी रासायनिक प्रक्रियाएं ध्यानस्थ साधक के शरीर में होती देखी व उनकी फलश्रुतियाँ बहिरंग में प्रत्यक्षतः पायी जा सकती हैं। ध्यान की इस उच्चावस्था में हल्की योग निद्रा आने लगती है अर्थात् शरीर शिथिल होकर अपने हिस्से की विद्युत भी मनोनिग्रह के साथ किये गये ध्यान प्रयोजन में नियोजित कर देता है फलतः वह अधिक शक्तिशाली हो जाता है। इस स्थिति को “सविकल्प” या “निर्विकल्प” समाधि कहते हैं। इस स्थिति में मनोबल इतना सशक्त हो जाता है कि अभीष्ट प्रयोजनों को भली प्रकार पूरा कर सके, चाहे वह भौतिक हो या आध्यात्मिक। ध्यान की महिमा का यही आधार है।
देवता, चिरकाल से अनुरोध करते रहे कि लक्ष्मी जी असुरों के यहाँ न रहें। देवलोक में निवास करें। पर उनकी प्रार्थना अनसुनी होती रही। लक्ष्मी जी ने असुर परिकर छोड़ा नहीं। एक दिन अनायास ही लक्ष्मी जी देवलोक में आ गईं। देवता प्रसन्न भी थे और चकित भी। उन्होंने सत्कारपूर्वक बिठाया तो था, पर साथ ही यह असमंजस भी व्यक्त किया कि वे असुरों को छोड़कर चल क्यों पड़ीं। लक्ष्मी ने कहा- सुर और असुर होने का पुण्य-पाप भगवान देखते हैं। मेरा काम पराक्रम और संयम की जाँच-पड़ताल करना है। जब तक असुर पराक्रमी असुर तथा रहे तब तक उनके साथ रहीं, अब वे बदल गये हैं अब वे आलस्य और दुर्व्यसन अपनाने लगे हैं। ऐसे लोगों के साथ मेरा निर्वाह कैसे हो सकता था।
सौर-परिवार का ही एक सदस्य धूमकेतु भी है, जो प्रायः प्रति 76 साल के अन्तर पर उदय होता रहता है। इसकी बनावट ऐसी है जो पृथ्वी के वातावरण को विशेष रूप से प्रभावित करती है। इसकी चर्चा करना यहाँ प्रासंगिक इसलिये होगा कि इस सदी में दूसरी बार सन् 1910 के बाद अब अगले वर्ष 1986 में यह पुनः पृथ्वीवासियों को दिखाई देगा। इसके अंतर्ग्रही प्रभाव अभी से धरित्री को प्रभावित करने लगे हैं।
भारतीय शास्त्रों में 33 धूमकेतुओं का वर्णन है। वे सभी दैत्य राहू के पुत्र समझे जाते हैं। इनके प्रकट होने का अर्थ होता है- विनाश की सम्भावनाएं सन्निकट होना। एक यहूदी इतिहासकार जेसफी ने तो इसे “अभिशिप्त क्षेत्र के ऊपर ईश्वर की तलवार” का नाम दिया है। जब कभी भी धूमकेतु का उदय धरती पर हुआ तभी युद्ध, अकाल, भय, बीमारी तथा अन्यान्य प्रकार की विभीषिकाएं प्रकट हुई हैं।
धूमकेतु को दूसरे शब्दों में पुच्छल तारा नाम से भी जाना जाता है। इसके प्रकट होने की समयावधि 76 वर्ष बाद की है। जुलाई 1910 में वह निकला था। अब इसकी बारी जनवरी 1986 में निकलने की है। इसकी पूँछ की लम्बाई साढ़े आठ करोड़ किलोमीटर है। यह पूँछ कहीं दिन में तो कहीं रात में चमकती हुई दिखाई देगी।
अब प्रश्न उठता है कि यह पुच्छलतारा है क्या? आज से लगभग 70 करोड़ वर्ष पहले सूर्य असंख्य टुकड़ों में फैलता चला गया। गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त के अनुसार सूर्य से पृथक हुए ये टुकड़े वायुमण्डल में मंडराते हुये पुनः जब सूर्य के पास पहुँचे तो इनकी लम्बाई करोड़ों मील तक फैलती चली गयी। इन्हीं को ज्योतिर्विदों ने पुच्छल तारे के नाम से पुकारा है।
अबकी बार नवम्बर 1985 में परोक्ष रूप से एवं जनवरी 86 में दृश्य रूप से निकलने वाले धूमकेतु की पृथ्वी की ओर आने की गति 5800 किलोमीटर प्रति घण्टे की है। अमेरिका के एक ज्योतिर्विद् का कहना है कि इस पुच्छल तारे की पूँछ की लम्बाई पहले की अपेक्षा एक लाख गुना अधिक होगी। इसके दुष्परिणामों की ओर इंगित करते हुए उन्होंने यह भी बताया कि “पक्षी अपने घोंसलों से बाहर मुँह नहीं निकालेंगे। जंगलों में रह रहे जानवर अपनी भाषा में इसे देखकर बुरी तरह चीत्कार की ध्वनि में रो पड़ेंगे।” 27 दिन तक यह तारा विश्व के किसी न किसी स्थान पर अवश्य बना रहेगा। यदि रोमन ग्रन्थों का अध्ययन किया जाय तो पता चलेगा कि ये धूमकेतु अपनी धुरी पर सूरज के इर्द-गिर्द चक्कर काटते हैं। ठीक 76 वर्ष बाद ये धूमकेतु सूर्य की भीतरी सीमा से निकलकर बाहर आते हैं तो पृथ्वी से चमकते हुए दीखते हैं।
दुनिया का सबसे पहला धूमकेतु ईसा से 250 वर्ष पूर्व चमका। चीन के वैज्ञानिकों ने इसका रिकार्ड रखा है। उनके अनुसार यह धूमकेतु देवताओं द्वारा छोड़ी गयी दुर्गन्धि का प्रतीक था। जिससे युद्ध, महामारी, दुर्भिक्ष जैसी विनाश की सम्भावनायें स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगीं। वैस्पीसियान नाम के रोमन सम्राट की मृत्यु धूमकेतु के प्रकट होने के समय ही हुई। उसी समय महामारी का दौर फैला। सन् 1066 में धूमकेतु दिखाई देने का परिणाम विलियम कोन्करर के आक्रमण का था।
अमेरिका के वैज्ञानिकों के अनुसार धूमकेतु पृथ्वी के सन्निकट आते समय उसका मलवा सड़ने लगता है। जिसके फलस्वरूप विभिन्न प्रकार की विषैली गैसें उत्सर्जित होती हैं। यह गैस पृथ्वी पर बसे प्राणियों के लिए प्राणघातक सिद्ध हो सकती हैं।
बड़ी तेजी से पृथ्वी की ओर चल पड़े इस हैली धूमकेतु का विराट् रूप मार्च 1986 में पृथ्वी वासियों को दिखाई देगा। मात्र भारत ही नहीं विश्व के अनेक अन्य राष्ट्रों में पृथ्वी पर इसके प्रभावों के अध्ययन की जोर-शोर से तैयारी चल रही है। रूस ने तो इसके अध्ययन के लिए एक विशेष अन्तरिक्ष यान की योजना बनाकर इसे गत वर्ष अगस्त 1986 में हैली के पुच्छल तारे की ओर छोड़ा है, जो इसके प्रभावों का अध्ययन-परीक्षण अति निकट से कर सकेगा। अभी वह अपनी यात्रा पर है वह शीघ्र ही उसके निकट होगा। दूरगामी लेसर यन्त्रों से वह कई जानकारियाँ पृथ्वी पर भेज सकेगा।
कार्डिफ यूनीवर्सिटी के खगोलज्ञों ने ‘हरास-अराकी-एलकौक’ धूमकेतु की आन्तरिक स्थिति का गत वर्ष बड़ी गहनता के साथ अवलोकन किया तदुपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इसके द्वारा फेंका गया सूक्ष्म जीव रसायन पृथ्वी के वातावरण में पूरी तरह समा जाता है और आगे चलकर यही सूक्ष्म रसायन वायरस आदि को जन्म देकर महामारी जैसी व्याधियों का स्वरूप धारण करता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का अवलोकन करने से पता चला है जब कभी भी धूमकेतुओं का प्रकटीकरण हुआ तभी प्लेग, ब्लैक डैथ, चेचक जैसी बीमारियाँ फैली हैं। इसकी जानकारी ‘डिसीज फ्रौम स्पेस’ के लेखक प्रो. चन्द्र विक्रमा सिंधे की पुस्तक से मिलती हैं। उन्होंने लिखा है कि धूमकेतु की पूँछ में एक विशिष्ट प्रकार के रोगाणु पाये गये हैं, जो इन बीमारियों को फैलाने का मूल कारण बन जाते हैं।
13 मई, 1983 को खगोल-विज्ञानियों ने अपने तथ्यों को जनता के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए बताया था कि हैली धूमकेतु पृथ्वी के ऊपर 50 लाख किलोमीटर के क्षेत्र को घेरते हुये चमकेगा। जिससे उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध में फ्ल्यू एपेडेमिक आदि रोगों का प्रकोप पूरी तरह फैलता चला जायेगा। यही नहीं कई नए ऐसे वायरस जन्य रोग जन्म ले सकते हैं जिनका निदान एवं उपचार चिकित्सकों की सीमा के बाहर होगा।
विश्व के मूर्धन्य ज्योतिर्विदों के अनुसार हैली धूमकेतु जब सूर्य के नजदीक से गुजरेगा तो एक विशिष्ट प्रकार की विषैली गैस और धूलकण निकाल फेंकेगा। जिसके फलस्वरूप सौर विकिरण निरन्तर फैलता चला जायेगा। धूमकेतुओं की मुख्य विशेषता यह होती है कि वे 1 करोड़ किलोमीटर की लम्बाई वाले हाइड्रोजन युक्त बादलों से चारों ओर घिरे रहते हैं। इन्हीं बादलों से निकले अवशिष्ट कण पृथ्वी पर बरसते हैं। इस धूमकेतु को अभी से देखने के लिए 200 इंच वाली टेलिस्कोप का प्रयोग माउंट पैलोमर पर किया जा रहा है। जो कि दुनिया की सबसे ऊँची वेधशाला है।
जापान ने हैली धूमकेतु तक पहुँचने के लिए प्लेनेट ‘ए’ का निर्माण किया है जो अन्य की अपेक्षा जल्दी पहुँचेगा। इसे देखने के लिए दक्षिणी अक्षांश को अधिक उपयुक्त समझा गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके मलवे से पृथ्वी के पश्चिमी गोलार्ध को काफी जोखिम उठानी पड़ सकती है। वैज्ञानिक गणनानुसार नवम्बर 1984 में हैली का धूमकेतु पृथ्वी से 48 करोड़ 36 लाख 6 हजार मील दूर था। पृथ्वी से इसकी सबसे निकटतम दूरी अगले दिनों 3 करोड़ 90 लाख मील होगी।
इसके उपरान्त जुलाई 85 से लेकर सन् 86 तक उसकी दूरी एवं चमक ऐसी होगी जो पृथ्वी पर कहीं न कहीं से देखी जा सके। सबसे स्पष्ट दृश्य दीखने का समय जनवरी से मार्च सन् 1986 है। जहाँ उसका दृश्य जितनों तक अधिक स्पष्ट दिख पड़े समझना चाहिए कि उसका प्रभाव उतने दिनों विशेष काम करेगा और उसके बाद भी चलता रहेगा।
यात्रियों की एक मण्डली उस रास्ते से निकली तो एक विशाल वृक्ष को धराशायी पाया। वे तूफान की प्रचण्डता को उसका कारण बता रहे थे।
एक बूढ़े वनवासी ने सुना तो वह चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए बोला- इसकी जड़ें बहुत दिन से खोखली हो गई थीं। तूफान तो निमित्त मात्र था यदि उसकी प्रचण्डता इतनी ही रही होती जो जंगल के सारे पेड़ उखड़ गये होते।
यज्ञ प्रक्रिया में ज्ञान एवं विज्ञान के सभी स्त्रोत विद्यमान हैं। ज्ञानपक्ष के द्वारा यज्ञीय दर्शन एवं प्रेरणाओं को हृदयंगम करने एवं उदात्त-जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है। जबकि विज्ञानपक्ष द्वारा शक्ति सामर्थ्य अर्जित की जाती है। वातावरण संशोधन, रोगनिवारक, स्वास्थ्य संरक्षण एवं संवर्धन, पर्यावरण संतुलन इसी के अंतर्गत आते हैं। यज्ञों के उस वैज्ञानिक, उपयोगी प्रारूप को देने में मूलभूत शक्ति कौन-सी काम करती है, यह कम ही जानते हैं।
सर्वविदित है कि बिना शब्द शक्ति की ऊर्जा के यज्ञ का प्रयोजन अधूरा ही रहता है। मात्र वनौषधि यजन से यदि यह लक्ष्य पूरा होता तो इसे किसी याँत्रिक संयंत्र द्वारा पूरा कर लिया जाता। यज्ञ में सन्निहित शक्ति एवं परिणति का आधार है मंत्र एवं यज्ञ दोनों मिलकर यजन प्रक्रिया को सफल बनाते हैं। मंत्रों के सही गायन एवं सुपात्र याज्ञिक के अभाव में वह कृत्य मात्र कौतूहल भर बन कर रह जाता है।
मंत्रों में चार प्रकार की शक्तियां पाई गई हैं- (1) प्रामाण्य शक्ति (2) फलप्रदायक शक्ति (3) बहुलीकरण शक्ति (4) अध्यात्म शक्ति। इन चारों ही शक्तियों के समन्वय एवं योगदान से यज्ञायोजन का समग्र लाभ मिलता तथा चमत्कारी प्रभाव पड़ते देखा गया है।
महर्षि जैमिनी रचित पूर्ण मीमाँसा के अनुसार मंत्रों में जो अर्थ, शिक्षा, संबोधन एवं प्रेरणा सन्निहित है जिसके द्वारा मनुष्य को अपने कर्तव्यों का ज्ञान मिलता है तथा सद् मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है वह उसकी प्रामाण्य शक्ति है। परोक्ष में यही वह देव शक्ति है जो यजन कर्ता को सूक्ष्म रूप से सदाचरण एवं परमार्थ पथ पर चलने की प्रेरणा देती है। विज्ञान द्वारा सिद्ध है कि विचारों का कभी अन्त नहीं होता। आह्वान जिन भी विचारों का किया जाता है, वे ही चिन्तन के आधार बनते और उसके अनुरूप ही गतिविधियाँ चलती हैं। सत् चिन्तन एवं अनैतिक चिन्तन का यही आधार है। यज्ञीय वातावरण में मंत्र के माध्यम से श्रेष्ठ विचारों का स्फोट किया जाता है जो यज्ञ ऊर्जा के सान्निध्य में पहुँचकर और भी सूक्ष्म हो जाते हैं तथा अंतरिक्ष में फैल जाते हैं। अपने अनुरूप ही विचारों को अंतरिक्ष से संकलित करके पुनः यजन कर्ता के निकट पहुँचते हैं। अपने उद्गम स्त्रोत में पहुँचकर वे और भी अधिक सशक्त एवं समर्थ बन चुके होते हैं। यज्ञीय ऊर्जा में मंत्र शक्ति से निकले शक्तिशाली विचार यजन कर्ता के चारों ओर छाये रहते हैं। फलतः वह तो लाभान्वित होता ही है निकटवर्ती अन्य व्यक्ति भी प्रभावित होते हैं। यह अनुभूति सत्य है कि जहाँ कहीं भी यज्ञायोजन होते हैं, वहाँ का वातावरण दिव्य बना रहता है। देव तत्वों की वहाँ बहुलता होती है। जिसके कारण एक नास्तिक भी यदि वहाँ पहुँचे तो वह भी अपने अन्तःकरण में एक विचित्र आह्लाद एवं आनन्द का अनुभव करता है। वह अपनी संकीर्णता भूल जाता है। सहयोग, सेवा एवं उदारता की उमंगें उसके अन्तः में भी उभरने लगती हैं। यह मंत्र में सन्निहित प्रामाण्य शक्ति का ही प्रभाव है जिसके कारण इस प्रकार की वैचारिक दिव्य प्रेरणाऐं हर किसी के हृदय में उठने लगती हैं। यज्ञीय ऊर्जा में यह शक्ति और भी अधिक बढ़ जाती तथा चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करती है। वातावरण संशोधन, अनुकूलन, रोग निवारण, स्वास्थ्य संवर्धन का यह वह पक्ष है जो परोक्ष में मनुष्य आचार नियमों के पालन करने, संयम में आबद्ध होने की शक्ति देता है मंत्र शक्ति का यह सूक्ष्म और वैचारिक पक्ष है पर अन्य स्थूल पक्षों की तुलना में अधिक सशक्त और वैज्ञानिक है।
मंत्र की दूसरी शक्ति है फल प्रदान करने वाली। जिसके द्वारा हवन में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं को संस्कारित किया जाता है तथा प्राणवान बनाया जाता है। कुशा, हवि, चरु आज्य, कुण्ड, समिधा, यज्ञ पात्र आदि मंत्र की सूक्ष्म प्राण शक्ति से अभिमंत्रित होते हैं। वे किस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त हो रहे हैं, इस आधार पर ही मंत्रों द्वारा उन्हें अभिमंत्रित किया जाता है। उनमें अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के योग्य ही संस्कार दिए जाते हैं। लक्ष्य परिशोधन का भी है। वस्तुओं एवं पदार्थों पर भी अपने उद्गम स्त्रोत के संस्कार पड़े रहते हैं। उन्हें परिशोधित एवं पवित्र करने की आवश्यकता पड़ती है। विभिन्न प्रकार के मंत्रों का प्रयोग इसलिए किया जाता है कि स्थान आदि से जुड़ी अपवित्रता को दूर करना। अभीष्ट प्रयोजन के लिए मंत्रोच्चार द्वारा पवित्र एवं संस्कारित करके योग्य बनाना, तभी यज्ञ के निर्धारित प्रयोजन की आपूर्ति सम्भव हो पाती है।
मंत्र की तीसरी शक्ति बहुलीकरण शक्ति है। यह सूक्ष्मीकरण के सिद्धान्त पर आधारित है। देव पूजन में थोड़ी मात्रा में चन्दन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य आदि चढ़ाया जाता है। देवताओं का आकार एवं विस्तार अधिक है। ऐसी स्थिति में उनकी तुष्टि एवं तृप्ति इन थोड़ी वस्तुओं से किस प्रकार होती है, यह सन्देह अधिकाँश के मन में उठता है। स्पष्ट है कि देवता व्यक्ति नहीं शक्ति होते हैं। उनके स्वाप भी स्थूल न होकर सूक्ष्म होते हैं। उन्हें सूक्ष्म आहार ही अभीष्ट होता है। देवशक्तियाँ सूक्ष्म ब्रह्मांड में फैली हैं। उन्हें पोषण देने आकर्षित करने के लिए वस्तुओं की सूक्ष्म विशेषताओं के साथ मंत्रों की विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा स्फोट कराया जाता है। फलतः थोड़ी मात्रा में चढ़ायी हुई वस्तु भी सूक्ष्म होकर अधिक सामर्थ्यवान बन जाती है। देवत्व परिपोषित एवं परिपुष्ट होकर अपने अनुदानों की वर्षा करता है। यही बात हवन में प्रयुक्त होने वाली वनौषधियों के सम्बन्ध में लागू होती हैं। होमियोपैथी के ज्ञाता जानते हैं कि वस्तुएं सूक्ष्मीकृत होकर अधिक शक्तिशाली बन जाती हैं। अधिक पोटेन्सी वाली होमियोपैथिक औषधियाँ अधिक सूक्ष्मीकरण के सिद्धान्त द्वारा ही विनिर्मित होती हैं। प्रयोग कर्ता के ऊपर इनका शीघ्र तथा चमत्कारी प्रभाव पड़ता है। यज्ञ अग्नि में वनौषधियों सूक्ष्मीकृत होकर शीघ्र तथा अधिक प्रभावकारी सिद्ध होती हैं। इनकी प्रतिक्रिया भी व्यापक स्तर पर होती है। मंत्र की बहुलीकरण शक्ति द्वारा यज्ञ में प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं पर स्फोट किया जाता है। यह प्रक्रिया वैसी ही है जिस प्रकार पारमाण्विक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए परमाणु को तोड़ने की। इस प्रक्रिया द्वारा होमीकृत वस्तुओं की सामर्थ्य तो बढ़ती ही है, प्रभाव भी व्यापक क्षेत्र में पड़ता है। जीव, जन्तु, वृक्ष, वनस्पति सभी लाभान्वित होते हैं। वातावरण संशोधन एवं अनुकूलन का प्रयोजन पूरा होता है।
मंत्र की चौथी अयातयाम अथवा अध्यात्म शक्ति वह है जो किसी विशेष व्यक्ति द्वारा विशेष स्थान पर विशेष उपकरणों से पैदा होती है। विश्वामित्र ऋषि ने गायत्री तत्व की साधना को पूरी तन्मयता एवं विधि-विधान के साथ लम्बे समय तक किया फलस्वरूप गायत्री के मंत्र दृष्टा बने। विशिष्ट साधना निश्चित समय निश्चित स्थान एवं एक निर्धारित विधि द्वारा किए जाने पर चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करती है। साधना में प्रयोग किए जाने वाले पात्र एवं स्थान भी तप की ऊर्जा से असाधारण रूप से प्रभावित होते हैं। ऐसे ही स्थान तीर्थ, सिद्धपीठ, शक्ति पीठ बनते हैं। साधना में प्रयुक्त होने वाले पूजा पात्र माला आदि भी मंत्र शक्ति से अभिपूरित होते हैं तथा अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में सहायक सिद्ध होते हैं।
प्राचीन काल में इस आध्यात्मिक अयातयाम शक्ति का असाधारण महत्व था और इस बात का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता था कि विशिष्ट साधना में प्रयुक्त होने वाले पात्रों का उपयोग अन्य किसी कार्य के लिए न किया जाय। इससे उनकी पवित्रता एवं शक्ति बनी रहती है। यह विधान भी है कि उपासना, साधना अथवा यज्ञ में काम आने वाले विभिन्न पात्रों का प्रयोग मात्र उसी प्रयोजन तक सीमित रखा जाय। कल्प सूत्रों की मर्यादा है कि निर्धारित कर्मकाण्ड समाप्त हो जाने पर उसका बचा हुआ द्रव्य, यातयाम, निर्वीय हो जाता है। कारण यह है कि उन पदार्थों को जिस उद्देश्य से अभिमंत्रित किया गया था वे उस उद्देश्य से भिन्न प्रयोजन के उपयुक्त नहीं है। यही कारण है कि विभिन्न कर्मकाण्डों के उपरान्त बचे द्रव्य आदि को नदी आदि में प्रवाहित कर देने का विधान है।
वस्तुएं ही नहीं व्यक्ति भी मंत्र की अयातयामता शक्ति से अभिपूरित होते हैं। ताँत्रिक, अघोरी, अपनी क्रियाओं में दक्ष होते हैं पर वे अन्य कोई कर्मकाण्ड नहीं करा सकते इसी प्रकार यज्ञ आदि कराने वाले आचार्य भी पात्रता को उसके अनुरूप विकसित कर लेते हैं। तभी यज्ञायोजन का अभीष्ट लाभ पूरा हो पाता है। विभिन्न कर्मकाण्ड अथवा यज्ञायोजन के लिए अभीष्ट पात्रता का अभाव हो तो भी उसकी उतना लाभ नहीं मिल पाता यही कारण है कि शास्त्र निर्देश देते हैं कि सुपात्र, योग्य आचार्यों से ही यज्ञायोजन आदि का कृत्य कराना चाहिए। सर्वविदित है कि गुरु वशिष्ठ ब्रह्मज्ञानी थे। योग्यता भी कम नहीं थी। पर राजा दशरथ को पुत्रेष्टि यज्ञ कराना हुआ तो शृंगी ऋषि को बुलाना पड़ा। ऋषि वशिष्ठ पुत्रेष्टि यज्ञ को करा सकने में अक्षम थे। शृंगी ऋषि द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ कराये जाने पर ही अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति हुई।
मंत्रों में सन्निहित चारों शक्ति या मंत्र को समग्र एवं अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति के लिए समर्थ बनाती हैं। यज्ञायोजन की सफलता मंत्र शक्ति के ऊपर ही निर्भर करती है। किस शक्ति का किस प्रकार लाभ उठाया जाय, इसके लिए यज्ञ के विभिन्न मर्यादाओं का पालन करना होता है। विविध कर्मकाण्ड दिखते भर सामान्य हैं। उनमें प्रत्येक अपने में विशेषताओं को समेटे हुए है। प्रत्येक के वैज्ञानिक आधार एवं एक निश्चित लक्ष्य है। मर्यादाओं का भली-भाँति पालन किया जा सके मंत्र में सन्निहित चारों शक्तियों का बोध हो सके तो शब्दशक्ति के माध्यम से यज्ञ प्रक्रिया का ठीक प्रकार से लाभ उठाया जा सकता है। आवश्यकता यज्ञ प्रक्रिया में प्रयुक्त होने वाले एक-एक मंत्र की सूक्ष्म वैज्ञानिक विशेषताओं को समझने भली-भाँति हृदयंगम करने की है इस कार्य पर वैज्ञानिक शोध तो अनिवार्य है ही, श्रद्धा पूर्वक मंत्रों का सुनियोजन कर यदि यजन संभव हो सके तो वे सभी लाभ उठाए जा सकते हैं, जिनका शास्त्रों में वर्णन है।
उत्तराखण्ड के एक प्राचीन नगर में सुबोध नाम के राजा राज्य करते थे। महाराज का नियम था- राजकीय कार्य प्रारम्भ होने से पूर्व वे आये हुए याचकों को दान दिया करते थे। इस नियम में उन्होंने कभी भूल नहीं की।
एक दिन जब सब लोग दान पा चुके तो एक विचित्र स्थिति आ खड़ी हुई। एक व्यक्ति ऐसा आया जो दान के लिए हाथ तो फैलाये था पर मुँह से कुछ न कहता था। सब हैरान हुए इसे क्या दिया जाये? बुद्धिमान व्यक्ति यों की सलाह ली गई। किसी ने कहा वस्त्र देना चाहिए, किसी ने अन्न की सिफारिश की। कोई स्वर्ण देने को कहता कोई आभूषण। पर समस्या का यथार्थ हल न निकला। सुबोध की कन्या उपवर्गा भी वहाँ उपस्थित थी उसने कहा- राजन् जो व्यक्ति न बोल सकता है न व्यक्त कर सकता है उसके लिए द्रव्याभूषण सब व्यर्थ हैं। ऐसे लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ दान तो ज्ञान-दान ही है। ज्ञान से मनुष्य अपनी सम्पूर्ण इच्छायें, आकाँक्षायें आप पूर्ण कर सकता है और दूसरों को सहारा भी दे सकता है। इसलिए इन्हें ज्ञान-दान दीजिए।
उपवर्गा की बात सब ने पसन्द की। उस व्यक्ति के लिए शिक्षा की व्यवस्था की गई। राजा ने उस दिन अपने दान की सार्थकता समझी। यही व्यक्ति आगे चल कर उसी नगरी का विद्वान मन्त्री नियुक्त हुआ।
गायत्री एक वैदिक छन्द है। श्रुतियों में अनेक छन्द गायत्री वर्ग के मिलते हैं, पर प्रख्यात गुरु मन्त्र गायत्री एक ही है। इसकी तुलना वेदों में उपलब्ध अन्य गायत्री छन्दों से नहीं की जा सकती। इसकी अपनी अलौकिकता और विशेषताएं हैं।
मन्त्रों की वेदों में प्रायः पुनरावृत्ति नहीं होती किन्तु गायत्री का चारों वेदों में समावेश है। ऋग्वेद के 3।62।10 में यजुर्वेद के 3।35 में- 30।2 में। तथा 36।3।3 में इसका समावेश है। सामवेद के 13।3।3 में यह विद्यमान है।
गायत्री के 24 अक्षर होते हैं। गुरु मन्त्र गायत्री में 23 अक्षर माने जाँय तो वह निचद् गायत्री बन जाती है। यदि उच्चारण वरेण्यम् का वरेणियम् किया जाय तो 24 अक्षर बन जाते हैं। अक्षरों सम्बन्धी मतभेद के कारण वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता गायत्री की महत्ता एवं क्षमता में कोई अन्तर नहीं आता।
गायत्री मन्त्र में सविता देवता से सद्बुद्धि की प्रेरणा का आग्रह किया गया है। शंकराचार्य कृत गायत्री पुरश्चरण पद्धति में उसे त्रिकाल संख्या में प्रयुक्त करने के लिए ब्राह्मी, वैष्णवी और शाम्भवी कहा गया है और ध्यान के लिए उन्हीं का निर्देश है। प्रातःकाल उपासना के लिए सर्वोत्तम है। उस समय ब्रह्म तेज का आह्वान उपयुक्त पड़ता है। इसलिए हंसारूढ़ा भगवती का सर्व-प्रचलित स्थान ही उपयुक्त है। एक मुख और द्विभुजा वाली बात मनुष्यों और देवताओं के लिए समान रूप से सार्थक है।
कहीं-कहीं उसके पाँच मुख और दस भुजाओं का वर्णन है। यह अलंकारिक व्याख्या एवं दार्शनिक विवेचना है। पाँच कोश, पाँच प्राण, पाँच तत्व का गायत्री में समावेश होने से उसे पाँच मुखी के रूप में भी चित्रित किया गया है और दस इन्द्रियों को दस भुजा के रूप में चित्रण है। अन्यथा अनेक मुखों, अनेक भुजाओं, अनेक पैरों वाली बात बड़ी विचित्र लगती है। यह विचित्रता समझ के बाहर एवं उपहासास्पद भी प्रतीत होती है।
छान्दोग्य और वृहदारण्यक उपनिषदों में गायत्री का माहात्म्य और रहस्य अधिक विस्तार से बताया गया है। शतपथ ब्राह्मण में प्रमुखता के साथ और अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों में उसका सामान्य विवेचन है। निसक्त में “गायन्नं त्रायते” अर्थ करते हुए कहा गया है कि वह गायन करने वाले परित्राण करती है। स्मृतियों में से अधिकाँश में उसकी आवश्यकता एवं अनिवार्यता का वर्णन है। गायत्री का देवता ‘सविता’ है। प्रातःकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य को सविता कहते हैं। इस महामन्त्र के जप काल में सविता का ध्यान ब्रह्मतेजस् का अभिवर्धन माना गया है। गीता में भगवान ने समस्त वेद मन्त्रों में गायत्री को अपना स्वरूप कहा है- “गायत्री छन्दसामहम्।”
पुराणों में ऐसे अगणित प्रसंग हैं जिनमें गायत्री उपासना के फलस्वरूप, आत्मकल्याण और लोक संसिद्धि के उभयपक्षीय प्रयोजनों की पूर्ति का विवरण है। यह मात्र सद्बुद्धि की प्रार्थना ही नहीं है वरन् उसकी अभीष्ट प्रेरणा देने में भी समर्थ है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन का रथ ही संचालित नहीं किया था वरन् उसकी बुद्धि जब भटक रही थी तब दबाव भरी प्रेरणा देकर भी उसे उपयुक्त रास्ते पर चलाया था। गायत्री मन्त्र में ऐसे ही प्रेरणा देने और साधक को सन्मार्ग पर चलाने की परिपूर्ण क्षमता है।
अपने समय के क्रान्तिकारी सन्त कबीर का कार्यकाल से प्रायः साढ़े पाँच सौ वर्ष पूर्व का है। वे ई. सन् 1398 में जन्मे और सन् 1518 में 120 वर्ष की आयु में दिवंगत हो गए। उनके प्रत्यक्ष जीवन के सर्वविदित घटनाक्रम बहुत थोड़े हैं। अविज्ञात और अप्रकट प्रयास ही अधिक हैं।
एक विधवा समाज भय से अपने नवजात शिशु को काशी के अगरतला तालाब के किनारे पगडण्डी पर रख गयी थी ताकि उसे कोई दयालु राहगीर उठा कर पाल ले। बच्चे को एक मुसलमान जुलाहे ने उठाया और पाल लिया। यही उनके विज्ञात माता-पिता थे। माता का नाम नीमा एवं पिता नीरु जुलाहा। इसी परिवार में वे पले और बड़े हुए।
उन दिनों विधवाओं की दुर्दशा अब से कहीं अधिक थी। उन्हें या तो डरा-धमका कर पति की लाश के साथ जला दिया जाता था या छोटी-बड़ी भूल के कारण उन्हें विधर्मियों के सुपुर्द कर दिया जाता था। इस मूढ़ मान्यता के कारण हिन्दू सम्प्रदाय किस प्रकार क्षीण एवं उपहासास्पद बनता है, इस ओर समाज का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित करने के लिए ही सम्भवतः विधाता की मर्जी के अनुसार उनका जन्म ऐसी परिस्थितियों में हुआ। उनने इस बात को कभी छिपाया नहीं। वरन् हिन्दू समाज की संकीर्णता और मुसलमान जुलाहे की उदारता की ओर ध्यान आकर्षित करने का प्रयत्न किया। यह इस कारण कि समाज के कर्णधार विधवाओं की समस्याओं पर नये सिरे से विचार करें और सोचें कि अब विधुरों को दूसरे विवाह की पूर्ण स्वतन्त्रता है तो विधवाओं के लिए रोक क्यों हो? कबीर की यात्रा तत्कालीन धर्माचार्यों को रुची न होगी, किन्तु समझदारों को सदा झकझोरती, कचोटती रही और इस संदर्भ में कुछ कदम उठाने के लिए प्रेरित करती रही। कुछ करने लायक उस समय भले न हो पाया हो, पर वह सूक्ष्म प्रेरणा कुछ शताब्दी बाद अन्य महामानवों के द्वारा चलाए गये आन्दोलनों के रूप में उभरी।
कबीर कुछ समझदार हुए तो उन दिनों के प्रख्यात सन्त रामानन्द के सत्संग में जाने लगे। उनकी विचारधारा से वे प्रभावित हुए। गुरु तत्व की गरिमा अपने संस्कारों के कारण भली-भाँति जानते थे। उन्होंने उन्हीं को अपना गुरु बनाना चाहा। पर समाजगत प्रवचन के प्रतिकूल श्री रामानन्द एक जुलाहे को शिष्य बनाने के लिए सहमत न दिखे। कबीर ने तब एकलव्य का रास्ता अपनाया, जिसने द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिभा को गुरु बनाकर अपनी श्रद्धा बलबूते प्रवीणता प्राप्त कर ली थी।
एक दिन ब्रह्ममुहूर्त्त में रामानन्द जी गंगा स्नान को जा रहे थे। कबीर रास्ते में लेट गए। अंधेरे में स्वामी जी का पैर कबीर के सीने पर पड़ा। वे चौंके और राम-राम कहते हुए पीछे हट गए। कबीर की गुरु दीक्षा इतने में ही सम्पन्न हो गयी। इसमें गुरु का अनुग्रह नहीं, शिष्य का श्रद्धा विश्वास ही निमित्त कारण था, जो आगे चल कर फला-फूला। सत्संग के दिनों ही कबीर ने कुछ पढ़ना लिखना कविताएं बनाना और एकाकी बजाये जा सकते वाले वाद्य-यन्त्रों को बजाना सीख लिया था। वे साँय काल सत्संग में जाते। दिन भर पिता के साथ बुनने का काम करते।
पन्द्रह वर्ष की आयु में उनके अन्तराल में नयी प्रेरणा उठी- “तेरा जीवन महान प्रयोजनों के लिए है।” क्या करें, सोच विचारा और निश्चय किया कि भ्रान्त जनमानस को बदला जाय। वे प्रातःकाल जल्दी उठकर पिता का काम निपटाते और अपना पेट भरने जितना काम करके बाहर निकल पड़ते। घर-घर, गली-गली, गाँव-गाँव अलख जगाते। उनके विचारों को जिनने भी सुना हिल गये। थोड़े ही दिनों में हजारों प्रशंसक, समर्थक एवं सहायक बन गए। वे सन्त के रूप में प्रख्यात हो गए। किन्तु परिश्रम की रोटी से पेट भरने का काम न छोड़ा।
कबीर का धर्म प्रचार आचरण शुद्धि, लोक कल्याण, साम्प्रदायिक सद्भाव तथा दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन पर अवलम्बित था। निहित स्वार्थों ने अपने व्यवसाय को जब धक्का लगते देखा तो वे बौखलाने लगे। वेश और वंश के आधार पर जो मालोमाल हो रहे थे और पुज रहे थे, वे उनके प्राणों के ग्राहक हो गये। कई बार धर्मावलम्बियों के भयंकर आक्रमण हुए। उनसे लहूलुहान होते रहकर भी कबीर बिना डरे, बिना रुके अपना काम करते रहे। न उन्हें प्रशंसकों से राग था, न निन्दकों से द्वेष। उनकी पूरी दृष्टि अपने लक्ष्य पर टिकी थी और वे इस पर एकाकी चलते रहे।
जब उनका संपर्क क्षेत्र बढ़ गया तो आवश्यक समझा कि घर पर आने वालों की सुविधा की खातिर विवाह कर लिया जाय। ठीक उनके ही जैसे स्वभाव की युवती लोई मिल गयी। गृहस्थी बस गई। गृहस्थ रहते हुए अपने परिश्रम की कमाई खाते हुए सन्त का जीवनक्रम और भी अच्छी तरह सध सकता है, यही उन्हें प्रत्यक्ष कर दिखाना था। घर पर दूर-दूर से लोग आते। धर्म पत्नी उनके भोजन निवास का ही नहीं, सत्संग समाधान का भी प्रयोजन पूरा करती रही। अब कबीर सुदूर क्षेत्रों में धर्म प्रचार के लिए जाने लगे। यही उनकी तीर्थ यात्रा थी।
कट्टर मुसलमानों को भी यह बुरा लगा कि मुस्लिम जुलाहे का लड़का हिन्दू धर्म के अनुरूप प्रचार करे। उनकी सल्तनत होने के कारण यह उन्हें राजद्रोह जैसा कार्य लगा। जब रोकथाम अपने स्तर पर कारगर न हुई तो उन दिनों के बादशाह सिकन्दर लोदी के कान भरे। कबीर को मृत्यु दण्ड सुनाया गया। लोहे की हथकड़ी बेड़ी से कसकर गंगा के गहरे भाग में डुबो देने का आदेश हुआ। कबीर अपनी कार्य पद्धति बदलने को राजी न हुए और दण्ड सहर्ष स्वीकारते हुए डूबने को तैयार हो गए।
कबीर डूबे पर मरे नहीं। चमत्कार यह हुआ कि अन्दर जाते ही उनकी जंजीरें स्वतः टूट गयीं और वे बहते-बहते किनारे जा लगे। इस प्रकार जीवित निकलने के बाद कबीर ने एक पद गाया।
गंगा माता गहरी गम्भीर। पटके कबीर बांधि जंजीर॥ लहरनि तोड़ी सब जंजीर। बैठि किनारे, हँसे कबीर॥
बादशाह ने यह चमत्कार सुना तो वह चकित रह गया। क्षमा माँगी और अपना सर्व धर्म समभाव प्रचार करने की छूट दे दी।
अनुयायियों ने उनकी जीवनचर्या देखी। रात को कपड़ा बुनना, सबेरे से प्रचार सत्संग में जुट जाना। भजन वे कब करते होंगे? भजन किये बिना संत कैसे? कबीर कपड़ा बुनते-बुनते ही रामनाम रटते थे, पर लोगों पर उनने यथार्थतावादी व्यंग्य करसे हुए कहा-
कबीर मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर। पीछे लगे हरि फिरैं कहत कबीर-कबीर॥ कबीर माला न जपों, जिह्वा कहौ न राम। सुमिरन मेरा हरि करें मैं पाऊँ विश्राम॥
उनके कथन का तात्पर्य यही था कि राम के नाम से राम का काम करना अधिक महत्वपूर्ण है। नाम तो काम करते-करते भी मन ही मन लिया जा सकता है।
कबीर ने अपनी प्रचार यात्राओं में अनेकों विचारशील लोगों से संपर्क किया और जाति-पाँति के नाम पर जो ऊँच-नीच की भावना चरम सीमा तक पहुँची हुई थी, उसके उन्मूलन का प्रयत्न करने के लिए सहमत कर लिया। उस प्रकार वे अकेले ही नहीं रहे, उनने अनेकों सन्त सुधारक पैदा किए।
उन दिनों काशी वास के नाम पर भावुक भक्त जनों को बुरी तरह ठगा जा रहा था और कर्म की अपेक्षा स्थान विशेष को, औंधे-सीधे कर्मकाण्डों का महत्व दिया जा रहा था। उन्हीं दिनों यह भी मान्यता थी कि गोरखपुर बस्ती की सीमा पर मगहर नामक स्थान पर मरने से नरक जाना पड़ता है। अन्तिम दिनों में कबीर वहीं चले गए। उनका अभिप्राय स्थान की महत्ता सम्बन्धी अन्धविश्वास को दूर करना था। अन्तिम समय में भी राम के स्मरण में ही तत्पर रहे- “‘मुआ कबीर मरत श्री राम।”
मृत्यु की पूर्व सूचना थी। हजारों भक्त जन उपस्थित थे। उनमें हिन्दू भी थे और मुसलमान भी। हिन्दू वैष्णव कहकर जलाना व मुस्लिम जुलाहा बताकर दफन करना चाहते थे। कबीर की आत्मा ने देखा कि जिस साम्प्रदायिक एकता के लिए उनने जीवन भर काम किया, वह नष्ट हो रही है तो उनकी लाश ही अदृश्य हो गयी। झगड़ा करने वालों ने उस स्थान पर मात्र फूल पड़े पाए। सभी इस सिद्धि पर चकित थे। आधे फूलों को हिन्दुओं ने जलाया और उस स्थान पर समाधि बनाई जबकि आधे फूलों को मुसलमानों ने दफनाया और उस स्थान पर मकबरा बनाया।
अभी भी देशभर में उनके अनुयायी हैं। कबीर जाति-पाँति की ऊँच-नीच के विरुद्ध थे। वे मनुष्य मात्र को समान अधिकार और समान देखना चाहते थे, इस लिए उनके पंथ में सभी वर्ग के लोग सम्मिलित होते थे, पर पिछड़ी जातियों को उन्होंने विशेष रूप से उत्साहित किया कि आत्म सम्मान जगाये बिना उन्हें उचित न्याय न मिलेगा। इसी प्रकार उन्होंने वंश और वेश के नाम पर लूटमार करने वालों की पोल खोलने में कोई कमी न रखी। कबीर निर्भीक थे, आदर्शवादी, चरित्रवान और लोकसेवी। एकाकी चलने पर विश्वास करते थे। उनने अपने समय की कुरीतियों के उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों के प्रचलन में कोई कमी न रखी। इसके प्रमाण में अनेकों घटनाओं का उल्लेख किया जा सकता है, पर सबके पीछे उद्देश्य ही थे।
सूक्ष्म गतिविधियाँ-
सन्त कबीर का जन्म पिछड़े लोगों को ऊँचा उठाने और साम्प्रदायिक सद्भाव बढ़ाने, पाखण्डों का खण्डन करने के निमित्त हुआ था। यह कार्य वे जीवन काल में सूक्ष्म शरीर से भी करते रहे। अपने प्रचण्ड आत्मबल के दबाव में असंख्यों के विचार बदले। साथ ही जो बलिष्ठ आत्माएं संपर्क में आईं, उन्हें अपने वर्चस्व से अधिक ऊँचा उछालते रहे और अधिक सफलताएं उपलब्ध कराते रहे।
कबीर की समकालीन प्रतिभाओं में रैदास और नामदेव का नाम विशेष रूप से उल्लेखित है। रैदास एक चमार कुल में काशी में ही जन्मे। उनका कार्यकाल सन् 1350 से 1436 ईसवी का है। काशी क्षेत्र कबीर के लिए छोड़कर वे राजस्थान में अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में लगे रहे। मीरा उनकी शिष्य बनीं व राजदरबार के षड़यंत्रों से बचकर प्रभु भक्ति में लगने का सत्परामर्श उन्हीं से पाती रहीं। कितनी ही सिद्धियों और चमत्कारों के लिए वे प्रख्यात थे। गंगा का उनकी कठौती में प्रकट होना, उनके भेजे दो पैसे गंगा जी द्वारा हाथ निकाल कर ग्रहण करना, जलाशय में से निकाले सभी पत्थरों को पारस बना देना उनकी सिद्धियों में प्रसिद्ध हैं।
कबीर के दूसरे समकालीन थे- सन्त नामदेव, जो जाति के दर्जी थे। उन्होंने भी वही कार्य पद्धति अपनायी जो कबीर की थी। वे महाराष्ट्र में जन्मे थे। दक्षिण भारत में उनका प्रचार कार्य बड़ी सफलतापूर्वक चला। प्रसिद्ध है कि अलावली महाराष्ट्र मन्दिर में वे कीर्तन कर रहे थे, तो पण्डितों ने उन्हें शूद्र कहकर बाहर निकाल दिया, तब वे मन्दिर के पीछे बैठ कर कीर्तन करने लगे। कहते हैं कि मन्दिर का दरवाजा और प्रतिमा का मुख पीछे की तरफ उलट गया और लोगों ने सच्चे भक्त का सच्चा मार्ग पहचाना और उनका विरोध छोड़कर उनके साथ हो गए।
मरने के बाद कबीर की आत्मा चैतन्य महाप्रभु, जगद् बन्धु, एकनाथ, सन्त दादू जैसे लोगों के घनिष्ठ संपर्क में रही। इन लोगों ने भारत में फैले जातिगत ऊँच-नीच के कलंक को धोने के प्रयत्न किये। इनके अतिरिक्त उस मध्यान्तर काल में अनेकों समाज सुधारक, भक्त जन ऐसे जन्मे जिनने अन्धकार युग के अन्धविश्वास को दूर करने में असाधारण प्रयत्न किए और वातावरण बदला। इन कार्यों के पीछे कबीर की शाश्वत आत्मा की सूक्ष्म प्रेरणा का परोक्ष विशिष्ट सहयोग था।
साईं मेरा बानियाँ, सहज करे व्यापार। बिनु तखरी बिनु पालड़े, तोले सब संसार॥ जिन खोजा जिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ। हों बौरी ढूँढ़न गई रही किनारे बैठ॥
समर्थ गुरु रामदास का जन्म हैदराबाद प्रान्त के जाम्ब गाँव में रामनवमी के दिन सन् 1608 में हुआ। उनका कार्यकाल सन् 1682 तक रहा। उनके पिता का नाम सूर्याजी पन्त था। उनने लगातार 36 वर्ष सूर्य उपासना गायत्री मन्त्र के साथ की थी। पुत्र को भी उन्होंने यही साधना बताई। समर्थ नित्य दो हजार सूर्य नमस्कार और गायत्री का मानसिक जप करते थे। हनुमानजी के प्रति उनकी सहज श्रद्धा थी। वे हनुमान की तरह ही राम-काज करना चाहते थे। वही किया भी।
संस्कारवान माता-पिता ही अपनी गोदी में उच्च आत्माओं को खिलाने का सौभाग्य प्राप्त कर पाते हैं। स्वयंभू-मनु, शतरूपा-रानी, कृष्ण-रुक्मिणी, अर्जुन-सुभद्रा जैसे अनेकों उदाहरण ऐसे हैं जिसमें पिता-माता के तपस्वी जीवन ने उन्हें सुसन्तति प्राप्त कराई। शकुन्तला, सीता, मदालसा के उदाहरण भी ऐसे ही हैं।
समर्थ बाल बैरागी थे। उन्होंने परिवार के सम्मुख आरम्भ में ही जीवनोद्देश्य प्रकट कर दिया और विवाह नहीं किया। आत्म-बल को अधिक प्रखर बनाने के लिए उन्होंने गोदावरी नन्दिनी नदियों के संगम पर टीकली स्थान पर बारह वर्ष तक तपश्चर्या की।
इसके उपरान्त वे धर्म प्रचार की पदयात्रा पर निकल पड़े। इस अवधि में उन्होंने हिमालय के कई स्थानों पर निवास किया और देवात्माओं से संपर्क साधा।
समर्थ को देश से पराधीनता का कलंक मिटाने और स्वतन्त्रता आन्दोलन को गतिशील बनाने का काम ऋषि सत्ता द्वारा सौंपा गया। वे आजीवन उसी प्रयोजन हेतु विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम अपनाते हुए संलग्न रहे।
उनने शिवाजी को महाराष्ट्र में- प्रताप को राजस्थान में और छत्रसाल को बुन्देलखण्ड में महाप्रभु प्राणनाथ के माध्यम से इस प्रयोजन के लिए कटिबद्ध किया। उनका प्रत्यक्ष और परोक्ष मार्गदर्शन किया। इन तीनों की पात्रता परखने के लिए कई कसौटियाँ लगाई और वे सब पर खरे उतरे। उन तीनों के द्वारा स्वतन्त्रता संग्राम को अग्रगामी बनाने तथा व्यापक वातावरण बनाने के लिए जो कुछ किया, उसका घटनाक्रम इतिहास के पृष्ठों पर भली-भाँति पढ़ा जा सकता है।
समर्थ का अधिकाँश समय परिभ्रमण और जन संपर्क में बीता। उनने जन-जन में स्वाधीनता की आकाँक्षा जगाई और नव चेतना का अलख जगाया। तीनों प्रमुख शिष्यों को अभीष्ट जन सहयोग उपलब्ध कराने के लिए उनने दूरगामी योजनाएँ बनाई और उन्हें पूरा करने में जुट गये। उनने 700 प्रमुख स्थानों पर सस्ती लागत के महावीर मन्दिर बनवाये। उनके सबके साथ व्यायामशालाएँ जुड़ी हुई थीं और सत्संग की नियमित व्यवस्था जोड़ी गई। इसका प्रतिफल यह हुआ कि इन देवालयों के संपर्क में व्यायामशाला या सत्संग के माध्यम से प्रभावित होने वाले व्यक्ति स्वतन्त्रता आन्दोलन की आवश्यकता पूरी करने में लगे रहे। शस्त्र, सैनिक और अर्थ-व्यवस्था इन देवालय केन्द्रों द्वारा एकत्रित करके प्रमुख मोर्चे पर भेजी जाती थी।
समर्थ की माता अन्धी हो गई थी। यह समाचार उनने सुना तो घर गये और माताजी के कष्ट का उपचार पूरा होने तक घर ही रहे। परिवार के प्रति सद्भावना रखने से वे विमुख नहीं हुए।
प्रचार एवं संगठन के निमित्त वे हर वर्ष ‘चाफल’ गाँव में रामनवमी के दिन एक बड़ा समारोह करते थे। संपर्क का उत्साह ठण्डा न पड़ जाय, इसके लिए उन सबको एक जगह एकत्रित करके सामूहिकता का वातावरण बनाना भी उन्हें आवश्यक लगा। आरम्भिक दिनों में उसका सारा खर्च उनके प्रधान शिष्य छत्रपति शिवाजी उठाते थे। पीछे समर्थ ने इसे अनुपयुक्त समझा और घर-घर से अन्न एकत्रित करने की एक नई शैली अपनाई।
इस बहाने संपर्क भी सधता था और सम्मिलित होने के लिए आग्रहपूर्वक निमन्त्रण भी किया जाता। इस उपाय को अपनाते ही उपस्थिति हर वर्ष बढ़ने लगी और वह समारोह एक बड़े धार्मिक मेले के रूप में विकसित होने लगे। एक वर्ष का प्रचार कार्य जितना उद्देश्य पूरा करता था, उतना ही इस एक समारोह से पूरा होने लगा।
समर्थ ने इन सब कार्यों के बीच अपना साहित्य सृजन कार्य भी जारी रखा। उनकी रचनाओं में “दास-बोध” को सर्वोत्तम समझा जाता है। महाराष्ट्र में उसे उतना ही सम्मान प्राप्त है, जितना कि उत्तरप्रदेश में रामायण को। दासबोध के अतिरिक्त भी उनने आत्माराम-मनचिश्लोक- पंचभान, मान पंचक, पंजीकरण बोध, करुषाष्टक आदि पुस्तकों का सृजन किया।
समर्थ के समकालीन सन्त तुकाराम भी थे। उनकी भी उस समय बड़ी ख्याति और मान्यता थी। उनने अभंग रचे। पण्डितों द्वारा ऐसी रचना का निषेध करने पर उनने वे रचनाएँ नदी में फेंक दी पर ये प्रभु कृपा से कुछ ही समय में तैरती हुई तुकाराम के निवास तक जा पहुँची एवं उन्हें सबकी मान्यता मिली। वे गृहस्थ थे। पत्नी द्वारा गन्ने से पीटने और उनके हँसते रहने की कथा प्रख्यात है। सन्त तुकाराम ने भी धर्म प्रचार से स्वतन्त्रता की पृष्ठभूमि बनाने का ही काम किया। उनका समर्थ के कामों में पूरा योगदान था।
समर्थ गुरु रामदास के अनेकों सिद्धि चमत्कार प्रसिद्ध हैं। एक बार उन्होंने शिवा से सिंहनी का दूध मँगाया था वह सिंहनी उन्हीं की मानसिक सृष्टि थी। कइयों को उनने मृतक से जीवित किया था।
शिवाजी ने अपने राज्य सिंहासन पर भरत की तरह समर्थ की चरण पादुकाएँ स्थापित की थीं और राज्य का स्वामित्व उन्हीं का माना था। राणा प्रताप जी मेवाड़ के राज्य को एकलिंग का मानते थे। मुनीम रहकर काम करने की यह पद्धति त्याग और कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से एक उच्चकोटि की प्रक्रिया है।
सन् 1682 में उनका स्वर्गवासी हुआ। राम नाम का जयघोष करते हुए उनने प्राण त्यागे। मरण समय निकट आया जानकर वे एकान्त सेवन करने लगे थे और प्रातःकाल थोड़ा दूध ही सेवन करते थे।
उनका सारा जीवन देश की स्वतन्त्रता का ताना-बाना बुनने में ही गया। इस प्रयास के समय दिल्ली की बादशाहत जो महाराष्ट्र एवं दक्षिण भारत पर भी कब्जा करना चाहती थी पश्त हिम्मत होती और सीमित दायरे में सिकुड़ती चली गई।
सूक्ष्म शरीर से समर्थ के कार्य- जिस प्रकार कबीर ने अपने जीवन काल में तथा मरणोत्तर काल में निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए प्रयास जारी रखे, उसी प्रकार समर्थ ने भी सूक्ष्म शरीर के प्रयत्न कार्य सीमित ही कर सके, जिन्हें इतिहासकारों ने उनकी जीवन गाथा में लिपिबद्ध किया है। पर वे कार्य अगणित हैं जिन्हें वे जीवन काल में सूक्ष्म शरीर के द्वारा दूरदर्शी लोगों को भी अंतःप्रेरणा देकर करते रहे और मरने के उपरांत नया जन्म मिलने तक की मध्यावधि में और भी अच्छी तरह-और भी व्यापक क्षेत्र में सम्पन्न करते रहे।
उनकी सूक्ष्म प्रेरणा से बाजीराव पेशवा, तात्या टोपे, लक्ष्मीबाई रानी आदि कितने ही महाराष्ट्रियन स्वतन्त्रता संग्राम के लिए प्राणों की बाजी लगाकर लड़ते रहे।
सन्त समुदाय में उन्होंने दक्षिण भारत में सन्त त्यागराज खड़े किये। जिन्होंने उस क्षेत्र में धर्म प्रचार के साथ-साथ समर्थ का काम भी किया। इसके अतिरिक्त भी और भी कितने ही उनके अनुयायी प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से उनकी जलाई ज्वाला के ईंधन बनते रहे। उनके न रहने के उपरान्त स्वतंत्रता की लड़ाई अगणित ज्ञात और अविज्ञात आत्माओं द्वारा लड़ी जाती रही। और चेतना धीमी नहीं पड़ी वरन् दिन-दिन प्रदीप्त होती गई। उनका प्रयास काँग्रेस आन्दोलन में विकसित होता गया और लोकमान्य तिलक जैसी प्रतिभाएँ उन्हीं की जोती बोई भूमि में विशाल वृक्ष बनकर पल्लवित हुईं।
तुलसी सन्त सुअम्ब तक, फूल फलहिं परहेत। इतते ये पाहन हनें, उतते वे फल देत॥
गुरु गोविन्द दोनों खड़े, काके लागें पायँ। बलिहारी गुरु आपकी, गोविन्द दियो मिलाय॥
महामानवों का ऐसा प्रत्यक्ष घटनाक्रम स्वरूप होता है, जिसे आँखों से देखा और लेखनी से लिखा जा सके। उनकी प्रधान शक्ति प्रखर सूक्ष्म शरीर के रूप में होती है। उसी से वे ऐसे अदृश्य कार्य करते रहते हैं जो उनके दृश्य कार्यों की तुलना में असंख्यों गुने महत्वपूर्ण होते हैं।
एक ही आत्मा कबीर और समर्थ के शरीरों में गुजरती हुई बंगाल में रामकृष्ण परमहंस के रूप में प्रकट हुई। उनका कार्यकाल सन् 1836 से 1887 ईसवी तक है। वे कलकत्ता के पास हुगली जिले में कामारपुकुर गाँव में जन्मे। छोटी आयु में ही उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया। साधना उपासना के प्रति बचपन से ही बड़ी लगन थी। पर गाँव में आजीविका के स्त्रोत उपयुक्त नहीं थे। उनके बड़े भाई कलकत्ता रहते थे। उनने छोटे भाई को भी वहीं बुला लिया और कुछ बड़े होने पर दक्षिणेश्वर मन्दिर की पूजा-अर्चा का कार्य उन्हीं के जिम्मे आ गया।
रामकृष्ण का जन्म सर्वसाधारण को भक्ति भावना का वास्तविक स्वरूप समझाने के लिए हुआ। उनने ऐसा जीवन जिया जिसे देखकर अनुमान लगाया जा सके कि साधना में सिद्धि प्राप्त करने के लिए क्या करना पड़ता है और कैसा बनना पड़ता है।
उन दिनों भक्ति के नाम पर उपकरण धारण और पूजा पाठ की येन-केन-प्रकारेण चिन्ह पूजा ही चल रही थी। भक्त जन कहलाने वाले अपनी जीवनचर्या में आदर्शवाद का समावेश करने से कतराते थे। उसमें संयमी और तपस्वी की उदार उच्चस्तरीय जीवन जो जीना पड़ता है। यह न बन पड़ने पर थोथी पूजा-पत्री कुछ ठोस प्रतिफल उपस्थित नहीं कर पाती। फलतः या तो लोग निराश होकर नास्तिक बन जाते हैं या फिर झूठ-मूठ भगवान के दर्शन की सिद्धियाँ मिलने की विडम्बना रचकर भावुक लोगों से धन और सम्मान का अपहरण करते हैं। यही कारण था कि उन दिनों भी विचारशील वर्ग में भक्ति को भ्रम जंजाल या पाखण्ड माना जाने लगा था।
परमहंस ने भक्ति का वास्तविक स्वरूप जन-साधारण के सम्मुख रखा और बुद्धिवादियों की मान्यता का प्रवाह ही बदल दिया। इसी तथ्य को उन्हें व्यापक भी बनाना था और आस्तिकता की उपासना की यथार्थता का परिचय देकर फिर से भक्ति भावना की यथार्थता तथा परिणित सिद्ध करना था। यही उन्होंने जीवन भर किया भी।
वे रानी रासमणि के दक्षिणेश्वर मन्दिर में पूजा-अर्चा करते थे। साथ ही उस कार्य में गहन श्रद्धा विश्वास के साथ तल्लीन भी रहते थे। उन्होंने इसी आधार पर भक्त और भगवान के एक होने की उक्ति सही सिद्ध करके दिखा दी।
साधारणतया प्रतिमाओं में कोई चमत्कार नहीं होते पर जब तक रामकृष्ण पुजारी रहे तब तक उनकी प्रतिमा चमत्कारी ही सिद्ध होती रही। मीरा के गिरधर गोपाल भी इसी प्रकार जीवन्त बने थे। एकलव्य के मृतिका विनिर्मित द्रोणाचार्य भी शरीरधारी द्रोणाचार्य से अधिक सशक्त थे।
एक दिन मन्दिर की स्वामिनी रासमणि से किसी ने चुगली की कि पुजारी माता को लगाया जाने वाला भोग स्वयं वहीं बैठकर खा जाता है। रानी ने वस्तुस्थिति जानने के लिए मन्दिर के झरोखे से आँख लगाकर बैठ गई। उनने देखा कि परमहंस माता की प्रतिमा से कह रहे हैं कि माता- भोजन करो। जब उनने न किया तो परमहंस कहने लगे- अच्छा मैं समझा- पहले बेटा खा लेगा तब माता खायेगी। उनने थाली का आधा भोजन स्वयं कर लिया और कहा- आधा तुम खाओ। रानी ने देखा कि प्रतिमा के पत्थर के हाथ उठने लगे। पत्थर का मुँह खुलने लगा और उनने शेष भोजन खा लिया। थाली साफ हो गई। उसे लेकर परमहंस बाहर निकले, तो रानी उनके चरणों में गिर पड़ी और कहा- देव! आप ही काली हैं। अक्षम मनुष्य शरीर से प्रत्यक्ष देवता हैं।
रामकृष्ण परमहंस विवाहित थे। उनकी पत्नी शारदामणि उनके पास मन्दिर में आ गई थी। परमहंस जी ने उन्हें कहा कि आजीवन ब्रह्मचर्य रखकर हम लोग पति-पत्नि की तरह सहोदर भाई की तरह जीवन व्यतीत करें तो कैसा। पत्नी तुरन्त सहमत हो गई। दोनों ने आजीवन सन्त का जीवन परस्पर प्रेम और घनिष्ठता भरा जीवन जिया और एक आदर्श रखा स्त्री रमणी कामिनी ही नहीं साक्षात् देवी एवं वरदात्री भी होती है।
परमहंस उपासना के उपरान्त प्रवचन शंका समाधान, वार्त्तालाप के रूप में करते थे। उनसे दूर-दूर से भक्तजन आते। शारदामणि उन सबको अपने हाथ से भोजन बनाकर खिलाती। कभी-कभी इतनी भीड़ हो जाती कि उनका आधा दिन उसी में लग जाता और हाथ दुखने लगते पर कभी उनने उससे अनख न माना। उनका वात्सल्य इतना उभर आया था कि 19 वर्ष की आयु में ही लोग उन्हें माता कहने लगे थे।
वे परिव्राजक की तरह प्रचार में नहीं जा सकते थे। क्योंकि मन्दिर की व्यवस्था उनके कन्धे पर थी। पर अनेक जिज्ञासु और तत्त्वज्ञानी उनके अमृत वचन सुनने स्वयं ही परमहंस जी के पास पहुँचते थे। उनके सामने सरल हृदयग्राही और दृष्टान्त सहित शैली में असंख्यों को भक्ति का वास्तविक स्वरूप बताया और कहा उसके साथ आदर्श जीवन और लोक मंगल का पुरुषार्थ जुड़ा होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। मात्र नाम रटने से ही भगवान नहीं मिलते।
रामकृष्ण परमहंस सिद्ध पुरुष के रूप में भी प्रख्यात हो गये। उनके पास आये दिन दीन-दुःखी आते और उनका आशीर्वाद पाकर संकट से मुक्त हो जाते। इस दृष्टि से उनके पास आने वालों की संख्या भी कम न थी।
वे सदा इस टोह में रहते थे कि कोई संस्कारवान् आत्माएँ उनके संपर्क में आये तो उन्हें सच्चा भक्त बनाकर उसका तथा संसार का कल्याण करायें। उनकी दृष्टि एक नरेन्द्र नामक लड़के पर पड़ी। वे उसकी ओर विशेष ध्यान देने लगे। लड़का भी उनके प्रति आकर्षित हुआ और आने-जाने लगा। घनिष्ठता बढ़ी और गुरु ने शिष्य का हाथ पकड़ा।
नरेन्द्र के पिता का स्वर्गवास हो गया। वे नौकरी की तलाश में थे। आशीर्वाद माँगने परमहंस जी के पास आये। उनने उसे काली की प्रतिमा के पास अपनी कामना कहने के लिए भेजा। नरेन्द्र के विवेक चक्षु खुले उनने काली का विराट स्वरूप देखा। रोमाञ्च हो उठा। कहा- मैं-भक्ति, शक्ति और शान्ति माँगने आया। कामना पूर्ण कराने नहीं। काली मुस्कराई और तथास्तु कहा।
नरेन्द्र ने अपनी जीवन दिशा बदल दी और स्वामी विवेकानन्द हो गये। वे विदेशों में प्रचार करने गये। अमेरिका के धर्म सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करने भी। उन्हें भाषण का अभ्यास न था। पर जो उन्होंने कहा उससे अमेरिका के धार्मिक और विज्ञानी चकित रह गये। वे सदा कहते रहते थे कि मेरे मुख से परमहंस बोलते हैं। मैं तो उनके हाथ का खिलौना-अबोध बालक भर हूँ।
परमहंस ने स्थूल शरीर से कम और सूक्ष्म शरीर से अधिक काम किया। उनने बंगाल की अनेक प्रतिभाओं को चमकाया और उनसे बड़े महत्व के काम कराये। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के माध्यम से विधवा विवाह के प्रचलन तथा सती-प्रथा बन्द कराने का, विधवाओं को नव जीवन देने वाला कार्य कराया।
केशवचन्द्र सेन का ब्रह्म समाज भी उन्हीं के परोक्ष सहयोग से फला फूला उसके अंतर्गत आत्म-कल्याण और समाज सुधार की अनेक प्रक्रियाएँ सम्पन्न होती रहीं।
गुजरात वीरपुर के जलाराम वापा के उनका सूक्ष्म सम्बन्ध था। उन्हें भी उन्होंने उच्चकोटि का सन्त बनाया। पति पत्नी मिलकर वे भी वही कार्य करते जो परमहंस जी ने किया। वा की परीक्षा लेने भगवान स्वयं उनके घर आये थे और अक्षय अन्न भण्डार की झोली उन्हें उपहार में दे गये थे। जिस माध्यम से जलाराम के सामने से भी अधिक बढ़ा-चढ़ा अन्न क्षेत्र वीरपुर आश्रम में चलता रहता था।
परमहंस जी अपने अन्तरंग सहचरों को बताया करते थे कि इस समय सच्ची भक्ति भावना को फलती-फूलती देखने के लिए गुजरात की भूमि देश भर में सबसे अधिक उर्वर दृष्टिगोचर होती है। अब हमें उस क्षेत्र को नन्दन वन बनाने और देव मानव उगाने के लिए सर्वतोभावेन जुटना चाहिए। परमहंस अपने जीवन काल में तथा उपरान्त उस क्षेत्र पर अपना ध्यान एकाग्र किये रहे और उच्च आत्माओं को उस क्षेत्र में अवतरित करने का परिपूर्ण प्रयत्न करते रहे।
इस प्रकार उनके अपने जीवन काल में और मरणोपरान्त अनेकानेक ऐसे सन्त उत्पन्न किये जिनने भक्ति का वास्तविक स्वरूप अपनाया और प्रचार कार्य द्वारा आध्यात्म का वास्तविक स्वरूप लाखों को समझाया। बंगाल में तो उनसे उच्च आत्माओं का उन दिनों भण्डार भर दिया था। उसके अतिरिक्त उनका ध्यान गुजरात पर विशेष रूप से रहा और उस क्षेत्र में भी यथार्थवादी सन्तों की कमी न रहने दी।
परमहंस जी की मृत्यु गले के केन्सर से हुई। लोगों ने पूछा आपके आशीर्वाद से असंख्यों का कल्याण हुआ। फिर आपको यह रोग कैसे हुआ। उनने उत्तर दिया- मेरे पास पुण्य कम था और लोगों की सहायता में ज्यादा खर्च करता रहा। उसी कमी की पूर्ति में मुझे यह कष्ट भुगतना पड़ रहा है। इस सम्भावना को मैं पहले से भी जानता था। पर जन-कल्याण के लिए यह कष्ट उठाते हुए मुझे तनिक भी दुःख नहीं, वरन् प्रसन्नता है।
परमहंस जी का स्वर्गवास 1887 में 16 अगस्त को हुआ। मरते समय उन्होंने अपनी धर्मपत्नी जिन्हें वे माताजी कहते थे, यह कार्य सौंपा कि वे भक्तजनों की जिज्ञासा पूर्ति मेरी ही भाँति करती रहें और अपनी साधना के प्रतिफल दीन दुःखियों में वितरित करती रहें, उन्होंने आजीवन अपने पति का आदेश पालन किया। उन्हें वे औरों की तरह बाबा कहती थीं। सभी भक्तजन उन्हें साक्षात् देवी की प्रतिमा मानते थे। उनका व्यक्ति त्व भी ऐसा ही था।
बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर। बैठन को छाया नहीं, फल लागें अति दूर॥
तन को जोगी सब करें, मन को करै न कोय। सब सिधि सहजै पाइये, जो मन जोगी होय॥
या दुनियाँ में आय के, छोड़ देव तू ऐंठ। लेना है सो ले चलो, नहिं उठी जात है पैंठ॥
रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों के साथ टहलते हुए एक नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ मछुआरे जाल फेंककर मछलियाँ पकड़ रहे थे। एक मछुआरे के पास स्वामी जी खड़े हो गये और शिष्यों से कहा- “तुम लोग ध्यान पूर्वक इस जाल में फँसी मछलियों की गतिविधि देखो।”
शिष्यों ने देखा कि कुछ मछलियाँ तो ऐसी हैं जो जाल में निश्चल पड़ी हैं उन्होंने निकलने की कोई कोशिश नहीं की, कुछ मछलियाँ निकलने की कोशिश तो करती रहीं पर निकल नहीं पाईं और कुछ जाल से मुक्त होकर पुनः जल में क्रीड़ा करने लगीं।
परमहंस ने शिष्यों से कहा-
“जिस प्रकार मछलियाँ तीन प्रकार की होती हैं उसी प्रकार मनुष्य भी तीन प्रकार के होते हैं। एक श्रेणी उनकी है जिनकी आत्मा ने बन्धन स्वीकार कर लिया है और इस भव-जाल से निकलने की बातें सोचती ही नहीं,
दूसरी श्रेणी ऐसे व्यक्तियों की है जो वीरों की तरह प्रयत्न तो करते हैं पर मुक्ति से वंचित ही रहते हैं और
तीसरी श्रेणी उन मनुष्यों की है जो चरम प्रयत्न द्वारा आखिर मुक्ति प्राप्त कर ही लेते हैं।”
परमहंस की बात समाप्त हुई जान एक शिष्य बोला- “गुरुदेव! एक चौथी श्रेणी भी है जिसका सम्बन्ध में आपने कुछ बताया ही नहीं।”
‘हाँ चौथी प्रकार की मछलियों की तरह ऐसी महान आत्माएं भी होती हैं जो जाल के निकट ही नहीं आतीं फिर उनके फँसने का प्रश्न ही नहीं उठता।’
गत अप्रैल अंक में पृष्ठ 54 पर छपा “बोया-काटा” लेख आपके लिए विशेष रूप से पठनीय है। इसी प्रकार पृष्ठ 28 का “दो मनों के मल्लयुद्ध” वाला लेख भी पढ़ने योग्य है। हमारा अनुरोध है कि आप इन दिनों इन दोनों प्रयासों के लिए साहस भरे कदम उठायें और वह सत्परिणाम अर्जित करें, जिनका सुयोग हमें मिल सका।
आप सत्प्रवृत्तियों के बीज बोयें और जागरूकता पूर्वक उनकी रखवाली करें। खाद पानी हम जुटा देंगे। ऐसी दशा में वह फसल पकने का विश्वास है जो आपको और हमें कृतकृत्य बना दे।
गत अंक में इसी पृष्ठ पर छह सूत्री कार्यक्रम दिया है। उनमें से आप कितनों का अगले दिनों निर्वाह करने- संकल्पित व्रत लेने जा रहे हैं और उनकी पूर्ति के लिए क्या योजना बना रहे हैं, यह जानने की प्रतीक्षा करेंगे।
विशेष पाँच दिवसीय मिलन सत्र आगामी बसन्त पर्व तक चलेंगे। उनमें से किसी में आने का प्रयास करें और उपयोगी प्रेरणा प्राण-ऊर्जा एवं स्वयं के लिए जीवन की भावी दिशा-धारा लेकर वापस लौटें।
-श्रीराम शर्मा आचार्य
है उदास कुछ अंतरतम यह, रत्नों का उपहार किसे दूं? पात्र बहुत छोटे दिखते हैं, पावस की जलधार किसे दूं??
सागर के तल तक जाकर मुश्किल से ही ये आ पाये हैं। किन्तु मिला न पहनने वाला, सोच, हृदयतल-घन छाये हैं॥
विजयी कंठ न दिखता कोई, रत्नों का यह हार किसे दूं??
हर मन की धरती प्यासी है, किन्तु न कोई पोली करता। पर-हित के बीजों से कोई अपना जीवन-खेत न भरता॥
उमड़ रही अंतर में, किन्तु महावट की बौछार किस दूं??
पीर गैर की नहीं समझता कोई-मन हैं कागज कोरे। संवेदन की भाषा खोयी, टूटे सद्भावों के डोरे॥
कौन लिखेगा गीत प्यार के, अंतर के उद्गार किसे दूं??
भौतिकता के आकर्षण ने, मनुज मात्र को भरमाया है। भक्ति, साधना और संयम के नाम मात्र से घबराया है॥
तप कर जिसे भरा जीवन भर, वह अक्षय भण्डार किसे दूं??
ले, पर लेकर के वह थाली, जो जन दीन-हीन को बांटे। जहां दरार दिखे उसको, अपने यत्नों से जो जन पाटे॥
मिल न सकेगा क्या ऐसा जन? अपना गुरुतर भार किसे दूं?? है उदास कुछ अंतरतम यह..................................
-माया वर्मा
*समाप्त*