तप में प्रमाद न करें - Akhandjyoti June 1984

तप से प्रजापति ने इस सृष्टि को सृजा। सूर्य तपा और संसार को तपाने में समर्थ हुआ। तप के बल से शेष पृथ्वी का वजन उठाते हैं। शक्ति और वैभव का उदय तप से ही होता है।

तपाने पर धातुओं से उपकरण ढलते हैं। सोने के आभूषण बनते हैं। बहुमूल्य रस भस्में तपाये जाने पर ही अमृतोपम गुण दिखाती हैं।

तपस्वी बलवान बनता है, विद्वान और मेधावी बनता है। ओजस्, तेजस् और वर्चस् प्राप्त करने के लिए तपश्चर्या का अवलम्बन लेना पड़ता है।

विलासी, आलसी और कायर मरते हैं, प्रतिभा गँवा बैठते हैं, प्रामाणिकता न रहने पर उन्हें लक्ष्मी छोड़कर चली जाती है। वे पराधीन की भाँति जीते और दीन दुर्बल की तरह उपहासास्पद बनते हैं।

अस्तु, तपस्वी होना चाहिए। तप में प्रमाद नहीं करना चाहिए। तपस्वी को रोको मत। तपस्वी को डराओ मत।




जून के विशेषाँक के विक्रय में अधिक उत्साह दिखायें - Akhandjyoti June 1984

प्रस्तुत अंक गुरुदेव द्वारा स्वयं लिखित, उनका संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त मार्मिक सारगर्भित जीवन वृत्तांत है। उसमें औपन्यासिक घटना क्रम नहीं वरन् लम्बे जीवन की कर्मठतापूर्वक की गई इस साधना का निचोड़ है जिसकी एक-एक पंक्ति में अध्यात्म तत्वज्ञान के रहस्य कूट-कूट कर भरे हैं। समूचे अंक में यही एक सामग्री है। इसे आजीवन संग्रहणीय समझा जाना चाहिए। माननीय तथा जीवन में उभारने योग्य भी।

पिछले अंक में इसकी तीन प्रतियाँ अतिरिक्त मंगाकर अपने संपर्क क्षेत्र में सभी को पढ़ाने के लिए कहा गया था। प्रसन्नता की बात है कि अधिकांश पाठकों ने यह अनुरोध किया है।

मिशन के मूर्धन्यों का एक और भी आग्रह है कि इस अंक को बड़ी संख्या में बेचने के लिए प्रभावशाली लोग टोली बनाकर निकलें। जिनमें भी अध्यात्म के प्रति रुझान हो उन्हें बेचें। पसन्द न आने पर पैसा लौटा देने की शर्त रखें। इससे यह लाभ होगा कि जो खरीदेंगे वे भी और पाँच लोगों को पढ़ाने की शर्त पालन करने पर इस बहुमूल्य सामग्री को अधिक व्यापक बनाने में सहायक हो सकेंगे। जो पढ़कर लौटा देंगे वह स्वयं भर जान पायेंगे। अन्य किसी तक प्रकाश पहुँचाने में समर्थ नहीं हो सकेंगे। इसलिए इसे बेचे और खरीदे जाने का आन्दोलन इन दिनों चलना चाहिए।

इस बार की गुरुपूर्णिमा 12 जुलाई की है। जून अंक 8 जून (गायत्री जयन्ती) के लगभग पहुँच जायेगा। इस एक महीने की अवधि में जीवन वृत्तांत अंक को जितना अधिक बेचा जा सके उसमें हर पाठक उत्साह दिखाये। आवश्यकतानुसार अंक समय रहते मंगालें। पुस्तकाकार छपने पर इसकी लागत पाँच रुपये से कहीं अधिक ही होगी। समय रहते आर्डर मिल जाने पर उतने अतिरिक्त अंक छपने की व्यवस्था करने में सुविधा रहेगी। -व्यवस्थापक अखण्ड-ज्योति मथुरा




महत्वपूर्ण सूचना - Akhandjyoti June 1984

जून के इस अखण्ड-ज्योति अंक में गुरुदेव ने अपनी गायत्री उपासना, जीवन साधना एवं समष्टि आराधना सम्बन्धी संदर्भ अपनी लेखनी से लिखे हैं। उनका जीवन क्रम बहुमुखी रहा है, तो भी उसमें से जितना भी सम्भव था, सर्वसाधारण हेतु हृदयंगम करने योग्य गायत्री-महाप्रज्ञा विषयक प्रेरणा प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया।

यह अंक एक संग्रहणीय ग्रन्थ है। पत्रिका के हिसाब से इसका मूल्य एक रुपये पैंसठ पैसे के लगभग बैठता है। अखबारी कागज सस्ता होने व संस्थान की सर्वसाधारण तक अध्यात्म की जानकारी पहुँचाने की नीति के कारण इतने कम मूल्य में मिल सकना सम्भव भी हो सका है। विज्ञ परिजनों ने इस अंक की महत्ता समझते हुए इसकी अधिकाधिक प्रतियाँ बेचने का निश्चय भी किया है, ताकि वे खरीदें, दूसरों को पढ़ाते रहें। इस अंक में सारी सामग्री दे सकना सम्भव नहीं था। इसलिये शेष सामग्री सूक्ष्मीकरण का स्वरूप, उसके फलितार्थ एवं जनसाधारण को इससे मिलने वाले लाभों का वर्णन जुलाई व उसके आगे के अंकों में छापा जाता रहेगा। जुलाई अंक भी एक समग्र विशेषाँक होगा। प्रस्तुत जून अंक यदि पुस्तकाकार छापे तो इसकी कीमत अपने नीति-मर्यादा के बावजूद पाँच रुपये से कम किसी प्रकार न होगी। यही कारण है कि यही अंक नहीं आगे के अंकों में गुरुदेव के चिन्तन प्रवाह से स्वयं को जोड़ने के लिए अधिकाधिक ग्राहक बनाने- इस अंक के माध्यम से नयों को परिचित कराने की एक प्रतिस्पर्धा सी चल पड़ी है। कइयों ने पाँच-पाँच सौ अंक मंगाये हैं।

एक सुविधा और भी संस्थान द्वारा दी जा रही है कि नए व्यक्ति संपर्क में आएं उन्हें इस अंक के विक्रय के उपरान्त 6 माह के लिए 10 रुपये राशि अग्रिम भेजकर ग्राहक बनाया जा सकता है। पहले एक जनवरी से ही ग्राहक बनाये या नियमित किये जाते थे। चूंकि गुरुदेव का लेखन-प्रवाह सन् 2000 तक अनवरत चलता रहेगा। एवं नवयुग की पृष्ठभूमि बनाने वाला विचार प्रवाह परिजनों को सतत् मिलता रहेगा, अधिक से अधिक व्यक्तियों को संपर्क में लाने का प्रयास जारी रहेगा, ऐसी आशा प्रबल होने लगी है।




शरीर रहते निष्क्रियता अपनाने का क्या प्रयोजन? - Akhandjyoti June 1984

शरीर और आत्मा का चोली दामन जैसा साथ है। आत्मा को इसमें रहने का स्वेच्छा आकर्षण होता है। इसलिए गर्भकाल कष्ट, मृत्यु कष्ट जैसी अनेकों यातनाएँ सहते और आये दिन संघर्ष करने का कष्ट रहते हुए भी वह उसी में बार-बार निवास करने के लिए मचलती है। कहने को जन्म-मरण की व्यथा पर क्षोभ प्रकट करते हुए भी विज्ञजन इसी को धारण करने के लिए लौट पड़ते हैं। कितने ही जीवन मुक्त इसके लिए बाधित किये जाते हैं। भगवान के पार्षद सदा रिवर्स फोर्स में उनके समीप ही नहीं बैठे रहते वरन् समय की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए समय-समय पर मार्गदर्शकों की भूमिका निभाने के लिए लौटते हैं। आत्मा अमर है, अदृश्य है तो भी उसका परिचय इस शरीर से ही मिलता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण वही आत्मा को परम प्रिय है। उसे सजाने सुविधाओं के अम्बार लगाने में वह चूकता भी नहीं। यहाँ तक कि कुकर्मरत होकर भावी दुष्परिणामों को जानते हुए भी उसे सन्तोष देने, प्रसन्न करने के लिए वैसा ही कुछ करता है, जैसा कि स्नेह दुलार भरे अभिभावक अपने इकलौते बेटे की मनमर्जी-हठधर्मी पूरी करने के लिए करते रहते हैं। संक्षेप में यही है शरीर और आत्मा का मध्यवर्ती संपर्क सूत्र और सघन सहयोग का सार संक्षेप।

अपने को भी यह शरीर लेकर जन्मना पड़ा और जो कुछ भी भला-बुरा बन पड़ा है- सो इसी के माध्यम से सम्पन्न किया है। इसे निरोग और दीर्घजीवी रखने के लिए ईमानदारी और सतर्कता के साथ प्रयत्न किया है। सदा इसे सृष्टा की अमानत माना और उसमें सन्निहित क्षमताओं को उभारते हुए श्रेष्ठतम सदुपयोग का ध्यान रखा है। आत्म-उत्कर्ष और लोक-मंगल के विभिन्न जो प्रयास बन पढ़े हैं उसके पीछे प्रेरणा तो चेतना में से ही उभरी है पर श्रम तो शरीर को ही करना पड़ता है। इसलिए इस अनन्य सेवक और परम सहयोगी शरीर के प्रति हमारा घनिष्ठ मैत्री भाव है। इसके प्रति असीम स्नेह और सम्मान भी। इसे सार्थक और श्रेयाधिकारी बनाने के लिए कुछ उठा नहीं रखा है। जीवन को निरर्थक मानने, उसे भारभूत समझने की भूल कभी भी नहीं की। मल-मूत्र की गठरी इसे कोई भी क्यों न कहता रहे झंझटों से निपटने के लिए मरने की प्रतीक्षा अन्य कोई भले ही करता रहे, पर अपने मन में ऐसे विचार कभी भी नहीं उठे। न मरने की जल्दी पड़ी और न इसे भारभूत समझकर ऐसे ही खीजते-खिजाते दिन गुजारे। समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग करने की बात हर समय ध्यान में रही। सोचा जाता रहा कि सृष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति का अनुदान मिला है तो इसी जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग क्यों न कर लिया जाय। गिनी-चुनी साँसें मिलती हैं। इनका सदुपयोग करने में ही बुद्धिमानी है। जब बुद्धि मिल ही गई तो जीवन की हर इकाई का हर साँस का श्रेष्ठतम प्रयोग करने में क्यों चूका जाय? यही चिन्तन सिर पर सदा छाया रहा, फलतः समय कदाचित ही कभी निरर्थक गया हो। शरीर को नित्यकर्म और आवश्यक क्षणिक विश्राम के उपरान्त कदाचित् ही कभी खाली रहने दिया गया हो। इसका सन्तोष है।

यों जन्म कितने ही लिये हैं और अभी कितने ही और लेने पड़ेंगे पर जहाँ तक स्मरण आता है, इतने लम्बे समय तक- इतनी समझदारी के साथ अन्य शरीरों का इतना महत्वपूर्ण सदुपयोग नहीं बन पड़ा। ऐसी दशा में कृतज्ञता का तकाजा है कि मात्र रूखी रोटी खाकर उतना कठिन सेवा धर्म निबाहने वाले शरीर का भरा-पूरा अहसान माना जाय और उसे सदा सर्वदा साथ रखने और काम देने- काम लेने के बहाने मैत्री धर्म का लम्बे समय तक निर्वाह किया जाय।

इस स्थिर विचारधारा के रहते हुए हमें इन दिनों कुछ ऐसे कदम उठाने पड़ रहें हैं जो उपरोक्त प्रतिपादन से लगभग ठीक उल्टे पड़ते हैं। नये निर्धारणों के अनुसार अब इस शरीर का लोकोपयोगी प्रयोग घटते-घटते समाप्त हो जायेगा और वह नित्य कर्म जैसे कुछ सीमित कार्यों में ही प्रयुक्त होता दीख पड़ेगा। लोकोपयोगी सेवा कार्यों में निरंतर संलग्न रहने का अभ्यस्त शरीर भविष्य में निष्क्रिय जैसी स्थिति में समय गुजारे इसमें औरों को आश्चर्य और अपनों को असमंजस हो सकता है। इसमें समाज को उपयोगी सेवा कार्यों से वंचित होना पड़ेगा और जन-कल्याण की दृष्टि से अभी बहुत कुछ करने की जो स्थिति थी उसमें कमी पड़ सकती है। कम से कम प्रत्यक्षतः तो स्पष्ट ही ऐसा दीखता है। अब तक जो बन पड़ा है शरीर से ही बना है। अस्तु सहज ही यह आशा की जा सकती है कि भविष्य में भी जब तक यह काम देगा, पिछले दिनों जितने भी महत्वपूर्ण काम करेगा। परिपक्वता बढ़ जाने के कारण यों आशा तो और भी अधिक की जा सकती है। इतने उपयोगी शरीर तन्त्र को इतने आड़े समय में इस प्रकार स्वेच्छापूर्वक जाम कर दिया जाय, यह सामान्य रीति से समक्ष में आने वाली बात नहीं है।

ईश्वरेच्छा से तो कुछ भी हो सकता है। मरण सभी का निश्चित है। कभी कोई पक्षघात आदि से भी असमर्थ हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में सन्तोष कर लिया जाता और विधि का विधान समझकर किसी प्रकार मन समझा लिया जाता है। संसार चक्र ऐसा ही है जिनमें कभी किसी के बिना काम नहीं रुका। अवतार, ऋषि, देव मानव इस धरती पर आये और बड़े महत्वपूर्ण कार्य करते रहे पर जब चले गये तो कुछ समय ही उनका अभाव खटका। बाद में ढर्रा अपने ढंग से चलने लगा। किसी के रहने न रहने से इतनी बड़ी दुनिया का गतिचक्र रुकता नहीं है। पर यह होता विवशता पूर्वक। जाने वाले बुलाये गये हैं। अपने आप मैदान छोड़ भागने वालों को पलायनवादी कहा और धिक्कारा जाता है। मिलिटरी में तो ऐसे समर्थ सेवारतों के भाग खड़े होने पर कोर्टमार्शल तक होता है। यह बातें ध्यान में न रही हों सो बात नहीं। फिर क्या कारण हुआ कि गतिविधियाँ काम करने का निश्चय बन पड़ा।

इस नये निश्चय में कई वर्षों की कई प्रकार की हानियाँ दृष्टिगोचर हो सकती हैं। सर्वप्रथम अपने को- जिसने आजीवन एक से एक बढ़कर कठिन और महत्वपूर्ण काम करने की आदत डाली और प्रसन्नता अनुभव की हो उसको समर्थ रहते निष्क्रिय हो बैठना कितना कठिन पड़ेगा। कितना मन मारना पड़ेगा। इसे कोई मुक्त भोगी ही समझ सकता है। निष्क्रिय पड़े लोहे को जंग खा जाती है। प्रकृति के नियम सब पर एक समान लागू होते हैं। निठल्लापन चढ़ते ही हाथ-पैर जकड़ सकते हैं, ऊब चढ़ सकती है और भारभूत जिन्दगी जल्दी समाप्त हो सकती है।

द्वितीय वह वर्ष आता है जो हमें लोक सेवक की दृष्टि से देखता है। उसे आघात लगेगा- स्थूल दृष्टि से करनी और कथनी में अन्तर देखकर अपने द्वारा हर किसी को युग धर्म निभाने के समय निकालने के उपदेश दिये जाते रहे हैं। लाखों ने उन्हें अपनाया भी है। तथाकथित भजनानंदी लोगों को कुटिया छोड़कर प्रव्रज्या पर निकल पड़ने की प्रेरणा मिली है। जिनके पास जो समय बचता है, उसे उसने जन-कल्याण में लगाने का नया व्रत लिया है औरों को ऐसा उपदेश देने के उपरान्त स्वयं एकान्त सेवी बन जाना, हर किसी को अटपटा लगेगा। सामने न सही पीठ पीछे तो लोग इसमें करनी और कथनी का अन्तर देखेंगे ही और जो मन में है, उसे प्रकट भी करेंगे। इस प्रकार प्रशंसा निन्दा में बदलेगी। कहने वाले इसे समाज के साथ विश्वासघात भी कहेंगे। जिनके पास है और वे दें नहीं तो कृपण या निष्ठुर कहे जाते हैं, ऐसा लाँछन अपने ऊपर भी तो लग सकता है। संचित प्रशंसा और प्रतिष्ठा पर इस कारण हरताल फिर और कालिख पुत सकती है।

तीसरा वर्ग वह है कि जो कन्धे से कन्धा और कदम से कदम मिलाकर साथ देता और साथ चलता रहा है। इस वर्ग में से जो अधिक साहसी हैं, वे प्रथम पंक्ति में आकर जीवनदानी बने हैं। शान्ति-कुँज, ब्रह्मवर्चस् एवं गायत्री तपोभूमि में रह रहे हैं। सन्त और ब्राह्मण की जीवनचर्या जिनने अपनाई है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह और बारह घण्टे जमकर काम करने का जिसमें ऋषि-मुनियों जैसा जीवनक्रम अपनाया है। ऐसे परिवार 200 से भी अधिक हैं। फिर ऐसे परिवार दो हजार हैं जो मनुष्य हरिद्वार तो नहीं बुलाये गये पर अपने-अपने कार्यक्षेत्रों में रहकर काम करने के लिए नियुक्त कर दिये गये हैं। प्रज्ञा पीठों का संचालन प्रायः ऐसे ही लोग कर रहें है। वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों की परिव्राजक भूमिका निरन्तर निभा रहे हैं।

समाज सेवा से जिनका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं हैं, जो व्यक्तिगत जीवन तक ही सीमित हैं, जो पत्रिकाओं के- साहित्य के माध्यम से प्रकाश प्राप्त करते रहते हैं जो पत्र-व्यवहार द्वारा गुत्थियों को सुलझाने और सुखी समुन्नत बनने के लिए प्रकाश प्राप्त करते रहते हैं, उनकी संख्या भी कम नहीं है। जिनका सहज स्नेह है वे ऐसे ही जब मन में उमंग उठती है तब हरिद्वार अकारण भी दौड़ पड़ते हैं। तीर्थयात्रा पर्यटन के बहाने परिवार को लेकर हजारों लाखों हर वर्ष आते हैं। ठहरने की सुविधा शहर में होते हुए भी ढेरों मार्ग-व्यय और आने-जाने का झंझट उठाते हुए भी शान्ति-कुँज पहुँचते हैं, ठहरते हैं। इस समुदाय में हैरानियों से राहत पाने के इच्छुक ही नहीं, उत्साहवर्धक प्रगति पर प्राप्त करने के उत्सुक ही नहीं- ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जिनका सहज स्नेह है। यह स्नेह ही उन्हें ढेरों पैसा और समय खर्च करके दर्शन करने का नाम लेकर एक बार नहीं बार-बार आने को विवश करता रहता है। इनकी सहज और सघन आत्मीयता सहज ही जानी और छलकती झलकी देखी जा सकती है।

इस समुदाय को जब विदित होगा कि निष्क्रियता ही नहीं अपनाई गई, मिल-जुल कर और बोलना बात करना तक बन्द कर दिया गया तो निश्चय ही उन्हें चोट लगेगी। जो लोग हमें प्रेम, बटोरने और लुटाने वाला मानते रहे हैं, उन्हें नीरस, निष्ठुर कहते भी देर न लगेगी। इसमें उनका कसूर भी नहीं है। जो आंखों के सामने प्रत्यक्ष देखा जा रहा है उसे झुठलाया भी कैसे जाय?

हरिद्वार से शान्ति-कुँज जाने वाले ताँगे-रिक्शे वाले तक यह कहते सुने गये हैं कि गुरुजी अब समाधि ले रहे हैं तो हरिद्वार के इस सबसे अधिक चहल-पहल वाले आश्रम में भी सन्नाटा छा जायेगा। अब वे मिलेंगे-दिखेंगे ही नहीं तो दर्शनार्थियों- शिविरार्थियों की भीड़ क्यों आयेगी। हमारी भी रोजी-रोटी में कटौती होगी और आश्रम की शोभा महत्ता भी घट जायेगी। ईर्ष्यालुओं को भी अच्छा नहीं लग रहा है। वे तरह-तरह की नुक्ताचीनी करते रहने का एक बहाना तो बना जाते थे। अब बहाना भी न रहेगा तो चुहल-बाजों का एक प्रसंग भी हाथ से चला जायेगा। अब किसी और को भड़ास निकालने के लिए तलाशना पड़ेगा।

अनेकों ने अध्यात्म की सजीव प्रतिमा के रूप में हमें समझा है और उस तत्वज्ञान को अपनाये जाने का वास्तविक स्वरूप क्या हो सकता है, उसे समझने-समझाने के लिए एक जीवन्त उदाहरण सामने पाया है। “साधना से सिद्धि” के सिद्धान्त पर जिन्हें अनेकों सन्देह थे, जो फलश्रुतियों को प्रत्यक्ष की कसौटी पर खरा उतरते नहीं देखते थे, उन्हें ऋद्धि-सिद्धियों की बात कपोल-कल्पना भर लगती थी, ऐसे निराशा, उदास, दुःखी, असन्तुष्ट, अन्यमनस्क और अविश्वास की ओर चल पड़े लोगों में से अनेकों ने अपने विचार बदले हैं। प्रत्यक्ष परिणति देखकर उनके डगमगाते हुए पैर रुके हैं। अब जब कि वह प्रत्यक्ष प्रकाश भी बुझने जा रहा है तो अपना और किसी दूसरे का कब किस प्रकार वह विश्वास और साहस प्राप्त कर सकेगा जो पिछले दिनों करता रहा है।

ऐसे-ऐसे अनेकों आक्षेप, असमंजस इस नये निर्णय से उठते हैं। विगत बसन्त पर्व से यह नया निर्णय घोषित होने के उपरान्त फरवरी, मार्च, अप्रैल महीनों में जितने भी प्रज्ञा परिजन बसन्त सत्रों में अथवा सहानुभूतिवश शांति-कुँज आये हैं, उन सबके चेहरों पर इस असमंजस को उभरता देखा गया है। उचित समझा गया कि उकसा निराकरण समय रहते कर दिया जाय। विपन्न मनोदिशा में न स्वयं ही रहना चाहिए और न दूसरों को रहने देना चाहिए। यह उचित है। यह लेखमाला विशेष रूप से इसी निराकरण हेतु लिखी गई है।




गलत कदम नहीं उठा, उसके पीछे तथ्य और औचित्य हैं। - Akhandjyoti June 1984

निर्दोष और निभ्रान्त तो केवल परमेश्वर है, पर सौभाग्य से अभी इसी जीवन में ऐसे अवसर नहीं आये जिसमें प्रतिपादित आदर्शों के विपरीत आचरण करने पड़े हों। आमतौर से लोग लोभ और मोहवश ही कुमार्ग अपनाते और कुकृत्य करते हैं। इन दोनों में निरन्तर कुश्ती होती रहती है। ऐसा दुर्दिन अभी नहीं आया जिससे उसने हमें पछाड़ पाया हो। फिर जो एकान्तवास जैसे कदम उठे हैं। उनमें कष्ट ही कष्ट और कठिनाइयां ही कठिनाईयाँ हैं। बुढ़ापे की काया अब आराम चाहती और सहारा तकती है। इसके स्थान पर सपरिश्रम आजीवन कारावास जैसी कठोर यातनाएँ सहनी पड़ें और ऊपर से पलायनवादी निष्ठुर होने का लाँछन सहना हो तो उसे अंगीकार करने में कोई वज्र मूर्ख ही तैयार हो सकता है। हमारी विवेक बुद्धि और औचित्य दृष्टि से अभी राई रत्ती भी अन्तर नहीं आया है, इसलिए यह सोचना उचित न होगा कि अकारण कोई सनक उठ खड़ी हुई है और वह किया जा रहा है जिसे प्रियजन नहीं चाहते। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए उन कारणों को समझना पड़ेगा, जिससे प्रस्तुत कटु प्रयोग को अपनाने की मजबूरी लद गई।

सूक्ष्मीकरण का अपना नया कदम यों लोक-मंगल और उच्च उद्देश्य की पूर्ति के लिए अपेक्षाकृत और भी अधिक महत्वपूर्ण है फिर भी उसके सम्बन्ध में गहराई तक उतरकर सोच न पाने के कारण ऐसा प्रतीत हो सकता है कि निर्णय गलत हुआ। इससे हर किसी के लिए असुविधा उत्पन्न होगी और युग सन्धि की इस ऐतिहासिक बेला में जो होना चाहिए था वैसा बन नहीं पड़ेगा। उल्टे अवरोध उत्पन्न होगा। आवश्यक समझा गया कि इसका समय रहते निराकरण करने का प्रयत्न किया जाय।

समय की विपन्नता दिन-दिन बढ़ती जा रही है इसमें सन्देह नहीं। दृश्यमान और अदृश्य क्षेत्रों में सर्वनाशी विभीषिकाएँ जिस क्रम में गहरा रहीं हैं उसे देखते हुए कभी भी ऐसा अनिष्ट हो सकता है। जिसके कारण पृथ्वी को ऐसे ही चूरे में बदलना पड़ा जैसा कि मंगल और बृहस्पति के बीच निरंतर एक अंधड़ की तरह घूमता रहता है। अणु आयुधों की- रासायनिक अस्त्रों को घातक किरणों की संख्या एवं विचित्रता इतनी बढ़ गयी है कि उनके द्वारा बिना आमने-सामने का युद्ध छिड़े भी ऐसा हो सकता है कि रात को अच्छे-खासे सोये हुए आदमी मृतक या अर्ध-मृतक जैसी स्थिति में मिलें। समर्थ राष्ट्र विनाश की क्षमता बढ़ाने में इस कदर लगे हैं और उस स्तर के पराक्रम को इस प्रकार प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रहे हैं कि कदाचित पीछे कदम हटाने की हेटी कराने को कोई भी तैयार नहीं। मृत्यु के साधन जब चरम सीमा पर पहुंचेंगे तो कोई भी पगला इस बारूद के ढेर में एक तीली फेंक कर उस प्रलय को क्षण भर में प्रत्यक्ष कर सकता है जिसके आने में पौराणिक प्रतिपादनों के अनुसार अभी लाखों वर्ष की देर है। महायुद्ध न भी हो तो भी वायु प्रदूषण, विकिरण, जनसंख्या विस्फोट, खनिज सम्पदा का समापन, पृथ्वी की उर्वरता का घटना, वृक्ष काटना, पशुओं का मिटना जैसे अनेकों ऐसे कारण विद्यमान हैं जो शीतयुद्ध बनकर वही काम करें जो शहतीर में लगने वाला घुन धीरे-धीरे किन्तु निश्चित रूप से करता है। विषाणु कितने छोटे होते हैं किन्तु वह अच्छे-खासे पहलवान को क्षय, कैन्सर जैसे रोगों से ग्रसित करके देखते-देखते मौत के मुँह में धकेल देते हैं।

कुविचारों और कुकर्मों से चरम सीमा तक पहुँच जाने पर अब मर्यादा और वर्जनाएँ लगभग समाप्त होती जा रही हैं। उच्छृंखलता, उद्दण्डता, अपराध, अनाचार अति की सीमा लाँघ रहे हैं। छल-प्रपंच कौशल के रूप में मान्यता प्राप्त कर चला है। परिवार बुरी तरह टूट और बिखर रहें है। चरित्र कहने-सुनने भर की वस्तु रह गई है। आदर्शों का अस्तित्व इसलिए है कि वे कथन प्रवचन को लच्छेदार बनाने के काम आते हैं। लिखते समय भी उनका पुट जमाने की आवश्यकता पड़ती है। मूर्धन्यों ने इस विग्रह को अपने लिए तो अपनाया ही है।, छुटभइयों को भी अनुगमन की प्रेरणा देकर वैसा ही अभ्यस्त कर दिया है। प्रचलन और आन्दोलन उस दिशा में चल रहे हैं जिनका अन्त सर्वनाशी परिणतियों के अतिरिक्त और कहीं कुछ हो ही नहीं सकता। न व्यक्ति को चैन है, न समाज में शान्ति। पीढ़ियां अपने जन्मकाल से ही ऐसे दुर्गुण साथ लेकर जन्मती हैं कि अपना परिवार का और समाज का सर्वनाश करके ही रहें।

गरम युद्ध से मरना पड़े या शीतयुद्ध से, अन्तर कुछ नहीं पड़ता। “सरदार जी का झटका” ठीक कि “कसाई का हलाल”। अन्तर क्या पड़े। बकरे की परिणति तो एक ही हुई। अपने इस जन-समुदाय का- इस विश्व उद्यान का विनाश तो होना ही ठहरा। लू में झुलसने पर या पाला मारने पर फसल का बंटाढार ही होना है। अविश्वास आशंका, अनिश्चितता, असुरक्षा और आतंक के घुटन भरे वातावरण में मानवी गरिमा देर तक सुरक्षित नहीं रह सकती। भेड़िये और कुत्ते जब पागल होते हैं तो आपस में ही एक-दूसरे को नोंच खाते हैं। मनुष्य जब पागल होते हैं, तो मरघट भूत पिशाचों जैसा आचरण करते हैं। जलने और जलाने- डरने और डराने के अतिरिक्त और कुछ उन्हें सूझता ही नहीं। ऐसी दशा में व्यक्ति और समाज को पतन पराभव के किस गर्त में गिरना पड़ेगा इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। जो तथ्य सामने हैं वे किसी भी विचारशील का दिल दहलाने के लिए काफी है।

यह कल्पनाएँ नहीं, मान्यताएँ या आकाँक्षाएं नहीं, ऐसी परिस्थितियाँ हैं जो दर्पण की तरह सामने हैं। उन्हें ज्योतिषियों, भविष्य वक्ताओं की अटकलें भी नहीं कहा जा सकता। प्रस्तुत तथ्यों पर गम्भीरतापूर्वक विचार कर सकने में समर्थ राजनेता, अर्थशास्त्री, समाज विज्ञानी, विज्ञानवेत्ता, अपनी-अपनी कसौटी पर कसकर एक स्तर से यही कहते पाये जाते हैं कि मनुष्य सामूहिक आत्महत्या की राह पर बदहवास होकर सरपट दौड़ता चला जा रहा है। कुछ समय बाद ही स्थिति ऐसी उत्पन्न हो जायगी जिसमें पीछे लौट सकना भी सम्भव न रहेगा। वापसी की भी एक सीमा होती है। सुधार की गुंजाइश भी एक सीमा तक रहती है। वह निकल चले तो फिर पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ रहता नहीं।

हम निश्चित रूप से इन दिनों ऐसी ही विषम परिस्थितियों के बीच रह रहें हैं। पौराणिक विवेचन के अनुसार इसे असुरता के हाथों देवत्व का पराभव होना कहा जा सकता है। कभी हिरणाक्ष्य, हिरण्यकश्यपु, वृत्तासुर, भस्मासुर आदि ने आतंक उत्पन्न किये थे और देवताओं को खदेड़ दिया था। अलंकारिक रूप से किया गया वह वर्णन आज की परिस्थितियों के साथ पूरी तरह तालमेल खाता है। रावण और कंस कल की परिस्थितियों के साथ आज के वातावरण की तुलना करते हैं तो पुनरावृत्ति स्पष्ट परिलक्षित होती है। उन दिनों शासक वर्ग का ही आतंक था पर आज तो राजा-रंक, धनी-निर्धन, शिक्षित अशिक्षित, वक्ता-श्रोता, सभी एक राह पर चल रहे हैं। छद्म और अनाचार ही सबका इष्टदेव बन चला है। नीति और मर्यादा का पक्ष दिनों-दिन दुर्बल होता जाता है।

उपाय दो ही हैं। एक वह कि शुतुरमुर्ग की तरह आँखें बन्द करके भवितव्यता के सामने सिर झुका दिया जाय। जो होना है, उसे होने दिया जाय। दूसरा यह कि जो सामर्थ्य के अंतर्गत है, उसे करने में कुछ उठा न रखा जाय। टिटहरी समुद्र से लड़कर अण्डे वापस ले सकती है तो अपने से कुछ न बन पड़े, ऐसा नहीं होना चाहिए।

अनिष्ट का प्रतिकार करने के लिए हर कोई अपनी सूझ-बूझ और सामर्थ्य के अनुरूप काम करता है पर स्थिर समाधान के लिए ताला खोलने वाली ताली ही तलाश करनी पड़ती है। लोग प्रयत्नशील न हों सो बात नहीं है। सरकारें धन खर्चने, वैज्ञानिक दिन-रात प्रयोगशालाओं में तत्पर रहने, अर्थशास्त्री संपन्नता बढ़ाने और विज्ञान सोचने, खोजने में संलग्न हैं। संकट को निरस्त करने के लिए बरते जा रहे उपाय कुछ भी कारगर सिद्ध नहीं हो रहे हैं। रस्सी दो गज जुड़ पाती नहीं कि चार गज टूट जाती है। “अन्धी पीसे कुत्ता खाये” वाली उक्ति लागू हो रही है। राजनैतिक मोर्चे पर न धमकी काम दे रही है न काना-फूसी। विग्रह के बादल सघन ही होते चले जा रहे हैं। क्षेत्रीय समस्याओं में भाषावाद, सम्प्रदायवाद, उग्रवाद, यूनियनवाद, हड़ताल, तोड़-फोड़ के उपद्रव आये दिन खड़े रहते हैं। अस्पतालों और डाक्टरों की संख्या वृद्धि के साथ बीमारों और बीमारियों की संख्या और भी बड़े अनुपात के साथ बढ़ रही है। पुलिस बढ़ रही है पर अपराधों की वृद्धि पर तनिक भी अंकुश नहीं लग रहा है। महंगाई के साथ-साथ मिलावट, भ्रष्टाचार का भी पूरा जोर और दौर है। नशेबाजी जैसे दुर्व्यसन, दहेज जैसे कुप्रचलन, दिन-दूने रात चौगुने वेग से उभर रहे हैं। प्रचार प्रस्तावों का उन पर कोई असर नहीं। व्यक्ति खोखला हुआ जा रहा है और समाज जर्जर। विपत्तियों और समस्याओं का ओर-छोर नहीं।

कुछ कुचक्री और स्वेच्छाचारी दोनों हाथों से दौलत भी बटोर रहे हैं किन्तु वे भी ईर्ष्यालुओं अपराधियों और रिश्वत माँगने वालों से हैरान ही बने रहते हैं। खोटी कमाई इस हाथ आकर दुर्व्यसनों में उस हाथ फुलझड़ी की तरह जल जाती है।

यह अत्युक्तिवादी कल्पना चित्र नहीं है। आँख उठा कर इर्द-गिर्द देखने पर ही दृष्टिगोचर होने वाला वातावरण है। इसके प्रमाण परिचय कहीं भी कभी भी मिल सकते हैं। चिन्ता की बात अनर्थों का- संकटों का बढ़ना तो है ही, पर उससे भी अधिक हैरानी की बात यह है कि किसी क्षेत्र में कोई समाधान निकल नहीं रहें हैं। सुधारवादी प्रयास जलते तवे पर कुछ बूँदें पानी पड़ने की तरह अपने अस्तित्व का परिचय देकर समाप्त हो जाते हैं। सर्वोदय जैसे उत्साहवर्धक आन्दोलन दम तोड़ गये। कुरीति निवारण में आर्य समाज को कितनी सफलता मिली? नशा निवारण और भ्रष्टाचार उन्मूलन के काम करने वाले संगठन कितने सफल हो रहे हैं, यह उन्हीं से उन्हीं के मुँह से कच्चा चिट्ठा पूछकर भली भाँति जाना जा सकता है। धर्मोपदेशक और कथा-कीर्तन कारों के बूते भी एक प्रकार का विनोद मनोरंजन ही बन पड़ता है। अनाथालयों, नारी ग्रहों, भिक्षुक ग्रहों, अपंग आश्रमों, गौशाला में कितनों की, कितनों को, किनको, कितनी राहत मिली, इसका पर्यवेक्षण बताता है कि सारा अवाँ ही बिगड़ गया। पूरे कुएँ में भाँग पड़ गई। जो सुधार का जिम्मा उठाते हैं, वे अधिकारी भी दूध के धुलें कहाँ हैं? पक्षपात और भ्रष्टाचार को कहाँ प्रश्रय नहीं मिल रहा है? ऐसी दशा में हर विचारशील को आँखों के आगे अन्धेरा छाता है और लगता है बुरे दिन तेजी से बढ़ते आ रहे हैं। रोकथाम करने वाले प्रयत्न दूसरों को उत्साह दिलाते हैं पर स्वयं निराशा से ही ग्रसित रहते हैं।

इस अन्धकार भरी निविड़ निशा प्रभात की आशा किरण यदि जीवित है तो एक ही है कि अदृश्य जगत से कोई सृजन प्रवाह उमंग और वर्षा के बादलों की तरह तपते धरातल को शीतल और हरीतिमा से भर दें। ऐसे अवसरों पर दैवी चमत्कार ही काम आते हैं। हेमन्त में जब शीताधिक्य से जंगलों के जंगल पत्ते रहित होकर ठूँठ बन जाते हैं। पाले के दबाव से पौधे मुस्कांत और मृतक जैसे दीखते हैं तब बसन्त का मौसम ही उत्साह वर्धक परिवर्तन का माहौल बनाता है। यह कार्य कोई व्यक्ति या संगठन करना चाहे तो कठिन है। पतझड़ ग्रस्त पेड़-पौधों के पुष्प पल्लवों से लादने में मानवी प्रयत्नों की पहुँच कहाँ तक हो सकती है? सूखी जमीन को हरा भरा बनाने में सिंचाई प्रयत्न कितने क्षेत्र में सफल हो सकते हैं, इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है। वर्षा और वसन्त ही हैं, जो हरीतिमा उगाने और उसे फलने फूलने की स्थिति तक पहुँचाने की जिम्मेदारी उठा सकते हैं।

मानवी पुरुषार्थ को यहाँ न तो नगण्य ठहराया जा रहा है और न उसका उपहास उड़ाया जा रहा है। कहा इतना ही जा रहा है कि बड़ी समस्याओं का समाधान, बड़े संकटों का निराकरण और बड़े अभावों की पूर्ति के लिए प्रायः दैवी अनुकूलता ही काम देती है। पहाड़ों पर बर्फ जमाना और उसे पिघलाकर नदियों को जलधारा से भरी-पूरी रखना मानवी पुरुषार्थ के बाहर की बात है। इसके द्वारा समुद्र के जल को बादल के रूप में परिणत करना और दूर तक बरसने के लिए खदेड़ देना भी सम्भव नहीं। सूर्य जैसा ताप और चन्द्रमा जैसा शीत बरसाने में मनुष्य कहीं सफल हो सकेगा? उपग्रहों का निर्माण करने पर भी अभी नया ग्रह बना देना या पुरानों को हटा देना किसके लिए कब तक सम्भव हो सकेगा कुछ कहा नहीं जा सकता।

इतिहास साक्षी है कि मनुष्य वातावरण को बिगाड़ने में तो अनेकों बार सफल हुआ है, पर जब-जब परिस्थितियाँ बेकाबू हुई हैं, तब-तब नियन्ता ने ही उलटे को उलटकर सीधा किया है। पर यह दैवी अनुग्रह भी अनायास ही उपलब्ध नहीं होता उसके पीछे भी ऋषि-कल्प देवताओं का दबाव काम करता है।

जल के लिए सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची थी। आर्यावर्त ब्रह्मवर्त, से लेकर मगध बंगाल तक का इलाका प्यास से मर रहा था। उपयोगी उपाय गंगावतरण समझा गया। इसके लिए तपस्वी की प्रार्थना ही सुनी जा सकती थी। यह कार्य भागीरथ ने अपने जिम्मे लिया। उद्देश्य की पवित्रता को देखकर शिवजी सहायक बने और जाह्नवी स्वर्गलोक से धरती पर उतरी। अभाव दूर हो गया।

ऐसे-ऐसे असंख्यों उदाहरणों का इतिहास पुराणों में वर्णन है। दैवी अनुकम्पा अन्धविश्वास नहीं है। दैवी प्रकोपों का कुचक्र जब मानवी प्रगति प्रयत्नों को मटियामेट कर सकता है तो दैवी अनुग्रह से अनुकूलता क्यों उत्पन्न न होगी? बाढ़, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी, अतिवृष्टि, इति-भीति आदि विनाशकारी घटनाक्रम दैवी प्रकोप से ही उत्पन्न होते हैं। उसी क्षेत्र की, अनुकम्पा से समृद्धि प्रगति और शान्ति के अप्रत्याशित द्वार भी खुल सकते हैं।

दैवी प्रकोप या अनुग्रह अकारण नहीं बरसते। सृष्टि की सुव्यवस्था में व्यतिरेक उत्पन्न करने पर सुयोग संजोने में मनुष्य की बहुत बड़ी भूमिका होती है। कुकृत्य ही अदृश्य वातावरण को दूषित करते और प्रकृति प्रकोपों को टूट पड़ने के लिए आमन्त्रित करते हैं। इसके साथ ही यह भी एक सुनिश्चित तथ्य है कि ऋषि स्तर के व्यक्ति जब उच्च प्रयोजनों के निमित्त तपश्चर्या करते और वातावरण में उपयोगी ऊर्जा उत्पन्न करते हैं तो दैवी अनुकम्पा का भी सुयोग बनता है। देवता न किसी पर कुपित होते हैं व दयालु। स्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए वे तद्नुरूप दण्ड पुरस्कार का तालमेल बिठाते रहते हैं। जिस प्रकार दुरात्माओं का बाहुल्य संसार में विपत्ति बरसने का सरंजाम जुटाता है उसी प्रकार देव मानवों की तपश्चर्या प्रत्यक्ष और परोक्ष क्षेत्र के सुयोग जुटाती है। सन्त अपनी सेवा साधना से जहाँ धर्मधारणा और पुण्य प्रक्रिया को प्रोत्साहित करते हैं वहाँ उनकी विशिष्ट साधनाओं से अदृश्य जगत का परिशोधन भी होता चलता है। यही कारण है कि अध्यात्म-वेत्ता लोक-साधना और अध्यात्म साधना को समान महत्व देते हैं। दोनों के लिए समान प्रयत्न करते हैं।

इन दिनों अदृश्य वातावरण की विषाक्तता ही अनेकानेक संकटों को जन्म दे रही है। विज्ञान-वेत्ताओं के अनुसार बढ़ते प्रदूषण और तापमान ने ध्रुव पिघलने, समुद्र उफनने और हिमयुग लौट आने जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं। अदृश्य-वेत्ताओं के अनुसार दुर्भावनाओं, उद्दण्डताओं और कुकर्मों ने देव जगत को रुष्ट कर दिया है और वे सामूहिक दण्ड व्यवस्था करके मनुष्य समुदाय को कडुआ पाठ पढ़ाने- करारे चपत लगाने के लिए आमादा हो गये हैं। प्रस्तुत समस्याओं का कारण चाहे वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय चाहे अध्यात्म दृष्टि से उसमें अदृश्य जगत में संव्याप्त वातावरण की विषाक्तता प्रमुख कारण है। इसका समाधान भी उतने ही वजनदार पुरुषार्थ चाहता है जिससे खोदी हुई खाई पट सके और लगी हुई कलंक कालिमा धुल सके।

समस्या भावनात्मक है। मनुष्य ने दुर्गति अपनाई और दुर्गति न्योत बुलाई है। इसके लिए परिमार्जन प्रयत्न ऐसे चाहिए जो प्रत्यक्ष रूप से लोक-मानस का परिष्कार कर सकने वाले सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन प्रयासों को अग्रगामी बना सकें। साथ ही अदृश्य जगत से देवत्व की शक्तियों की अनुकंपाएं भी अर्जित कर सकें। द्रौपदी की पुकार पर भगवान दौड़े आये थे। प्रह्लाद कारुदन भगवान तक पहुँचा था। सशक्त आत्माओं का दबाव भगवान को भी बाधित कर सकता है। शबरी को दर्शन देने और यश बढ़ाने वे स्वयं ही पहुंचे थे। उदाहरणों में भक्त की पात्रता ही सब कुछ थी। उसी में दैव अनुकम्पा उत्पन्न करने की क्षमता होती है। प्रस्तुत एकान्तवास के नाम से समझा गया कदम वस्तुतः ऐसी विशिष्ट तपश्चर्या का एक स्वरूप है, जो ऋद्धि सिद्धियों की प्राप्ति के लिए उलटे प्रवाह को उलटकर सीधा करने के लिए उठाया गया है।




तपश्चर्या से आत्म-शक्ति का उद्भव - Akhandjyoti June 1984

अरविन्द ने विलायत से लौटते ही अंग्रेजों को भगाने के लिए जो उपाय सम्भव थे, वे सभी किये। पर बात बनती न दिखाई पड़ी। राजाओं को संगठित करके, विद्यार्थियों की सेवा बनाकर, बनपार्टी गठित करके उनने देख लिया कि इतनी सशक्त सरकार के सामने यह छुटपुट प्रयत्न सफल न हो सकेंगे। इसके लिए समान स्तर की सामर्थ्य टक्कर लेने के लिए चाहिए। गान्धीजी के सत्याग्रह जैसा समय उन दिनों सम्भव नहीं था। ऐसी दशा में उनने आत्म-शक्ति उत्पन्न करने और उसके द्वारा वातावरण गरम करने का काम हाथ में लिया। अंग्रेजों की पकड़ से अलग हटकर वे पांडिचेरी चले गये और एकान्तवास- मौन साधना सहित विशिष्ट तप करने लगे।

लोगों की दृष्टि में वह पलायनवाद भी हो सकता था पर वस्तुतः वैसा था नहीं। सूक्ष्म दर्शियों के अनुसार उसके द्वारा अदृश्य स्तर की प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न हुई। वातावरण गरम हुआ और एक ही समय में देश के अन्दर इतने महापुरुष उत्पन्न हुए, जिसकी इतिहास में अन्यत्र कहीं भी तुलना नहीं मिलती। राजनैतिक नेता कहीं भी उत्पन्न हो सकते हैं और कोई भी हो सकते हैं किन्तु महापुरुष हर दृष्टि से उच्चस्तरीय होते हैं। उनका व्यक्तित्व कहीं अधिक ऊँचा होता है इसलिए जन-मानस को उल्लसित आन्दोलित करने की क्षमता भी उन्हीं में होती है। दो हजार वर्ष की गुलामी में बहुत कुछ गँवा बैठने वाले देश को ऐसे ही कर्णधारों की आवश्यकता थी। वे एक नहीं अनेकों एक ही समय में उत्पन्न हुए। प्रचण्ड ग्रीष्म में उठते चक्रवातों की तरह। फलतः अरविन्द का वह संकल्प कालान्तर में ठीक प्रकार सम्पन्न हुआ जिसे वे अन्य उपायों से पूरा कर सकने में समर्थ न हो पा रहे थे।

यहाँ आत्मबल की महिमा स्पष्ट है और साथ ही यह भी प्रकट है कि उत्पादन कथा वार्ता कहने सुनने या जंत्र, मन्त्रों की हथफेरी करने में भी नहीं होता। देवता सस्ती वाहवाही सुनकर या छोटी-मोटी भेंट पूजा पाकर वशवर्ती हो जाते हैं और तथाकथित भक्तजनों की मनोकामना बिना उचित अनुचित का विचार किये तत्काल पूरी करने लगते हैं, यह मान्यता आदि से अन्त तक गलत है। देव शक्तियाँ व्यक्तित्व की पवित्रता एवं प्रखरता परख कर सदय होती हैं और कुछ देने से पूर्व पूरी तरह इस बात की जाँच पड़ताल करती हैं कि आकांक्षा का उद्देश्य क्या है? यदि वह उच्चस्तरीय पारमार्थिक हुआ तो ही तालमेल बैठता है अन्यथा भौतिक कामनाएँ मुफ्त में पूरी कराने के षड़यंत्रों को वे तिरस्कारपूर्वक निरस्त कर देती हैं। इसलिए आत्म-शक्ति के उपार्जन के तत्वज्ञान और विधि-विधान रहस्य समझने वाले समझते हैं कि उसके लिए जीवन को तपाकर खरे सोने जैसा बनाने वाली तपश्चर्या ही एकमात्र उपाय है। उससे बच निकलने का कोई शार्टकट नहीं।

पूजा पत्री की विधि-व्यवस्था आरम्भिक छात्रों का अभ्यास आरम्भ कराने वाले उपचार हैं। बड़े कामों के लिए बड़े अस्त्र-शस्त्र, उपाय-पराक्रम अपनाने पड़ते हैं। तपश्चर्या को इसके लिए आवश्यक माना गया है। यदि बात ऐसी न होती तो उस कष्ट साध्य काम में कोई हाथ न डालता। सभी पूजा पत्री की छुटपुट खेल खिलवाड़ करके देवताओं को बरगलाने, फुसलाने और उनकी जेब काट लेने में सहज ही समर्थ हो गये होते। तब मन्दिरों के पुजारी, कर्मकाण्डी पण्डित और भजन-पूजन में निरत बाबा लोग सचमुच ही सिद्ध पुरुष होते। पर देखा यह गया है कि उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जिससे सस्ते उपचारों से बहुमूल्य उपलब्धियाँ प्राप्त होने जैसा कोई प्रमाण परिचय उपलब्ध हो सके।

अध्यात्म विज्ञान के इतिहास में उच्चस्तरीय उपलब्धियों के लिए तप साधना ही एकमात्र विधान उपचार है। वह सुविधा भरी- विलासी रीति-नीति अपनाकर सम्पादित नहीं की जा सकती। एकाग्रता और एकात्मता संपादित करने के लिए बहुमुखी डडडडब्राहाचरों में प्रचार प्रयोजनों में भी निरत नहीं रहा जा सकता। उससे शक्तियाँ बिखरती हैं। फलतः केन्द्रीकरण का वह प्रयोजन पूरा नहीं होता जो सूर्य किरणों की आतिशी शीशे पर केन्द्रित करने की तरह अग्नि उत्पादन जैसी प्रचण्डता उत्पन्न कर सके। अठारह पुराण लिखते समय व्यास उत्तराखण्ड की गुफाओं में वसोधरा शिखर के पास चले गये। साथ में लेखन कार्य की सहायता करने के लिए गणेश जी इस शर्त पर रहे कि एक शब्द भी बोले बिना सर्वथा मौन रहेंगे। इतना महत्वपूर्ण कार्य इससे कम में सम्भव भी नहीं हो सकता था।

भारतीय स्वाधीनता संग्राम के दिनों महर्षि रमण का मौन तप चलता रहा। इसके अतिरिक्त भी हिमालय में अनेकों उच्चस्तरीय आत्माओं की विशिष्ट तपश्चर्याएँ इसी निमित्त चली। राजनेताओं द्वारा संचालित आंदोलनों को सफल बनाने में इस अदृश्य सूत्र संचालन का कितना बड़ा योगदान रहा इसका स्थूल दृष्टि से अनुमान न लग सकेगा किन्तु सूक्ष्मदर्शी तथ्यान्वेषी उन रहस्यों पर पूरी तरह विश्वास करते हैं।

जितना बड़ा कार्य उतना बड़ा उपाय उपचार के सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए इस बार की विशिष्ट तपश्चर्या वातावरण के प्रवाह को बदलने सुधारने के लिए की गई है। इसलिए उसका स्तर और स्वरूप कठिन है। आरम्भिक दिनों में जो काम कन्धे पर आया था वह भी लोक-मानस को परिष्कृत करने, जागृत आत्माओं को एक संगठन सूत्र में पिरोने और रचनात्मक गतिविधियों का उत्साह उभारने का था। इसके लिए वक्ता, संगठन, गायक एवं प्रचार साधन जुटाने से काम चलने वाला न था। इतने भर से काम चल जाया करे तो इसकी व्यवस्था सम्पन्न लोग अपनी जेब से अथवा दूसरों से माँग-जाँचकर आसानी से पूर्ण कर लिया करते और अब तक स्थिति को बदलकर कुछ से कुछ बना लिया गया होता। कइयों ने पूरे जोर-शोर से ये प्रयत्न किये भी हैं। प्रचारात्मक साधनों के अम्बार भी जुटाये हैं पर उनके बलबूते कुछ ऐसा न बन पड़ा जिसका कारगर प्रभाव हो सके। वस्तुस्थिति को समझने वाले निर्देशक ने सर्वप्रथम एक ही काम सौंपा। चौबीस साल की गायत्री महापुरश्चरण साधना शृंखला का। पिछले तीस वर्षा में जो कुछ बन पड़ा उसमें उसका श्रेय है। कमाई की वह हुण्डी ही अब तक काम देवी रही। अपना, व्यक्ति विशेष का, समाज का, संस्कृति का यदि कुछ भला अपने द्वारा बन बड़ा तो इसमें इस चौबीस वर्ष के संचित भण्डार को खर्च किये जाने की बात ही समझी जा सकती है। उस समय भी मात्र जप संख्या ही पूरी नहीं की गई थी वरन् साथ ही कितने ही अनुबन्ध-अनुशासन एवं व्रत पालन भी जुड़े हुए थे।

जप संख्या तो ज्यों-त्यों करके कोई भी खाली समय वाला पूरी कर सकता है पर विलासी एवं अस्त-व्यस्त जीवनचर्या अपनाने वाला कोई व्यक्ति उतनी भर चिन्ह पूजा से कोई बड़ा काम नहीं कर सकता। साथ में तपश्चर्या के कठोर विधान भी जुड़े रहने चाहिए जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों ही शरीरों को तपाते और हर दृष्टि से समर्थ बनाते हैं। संचित कषाय-कल्मष भी आत्मिक प्रगति के मार्ग में बहुत बड़े व्यवधान होते हैं। उनका निवारण एवं निराकरण भी इसी भट्टी में प्रवेश करने से बन पड़ता है। जमीन में से निकालते समय लोहा मिट्टी मिला कच्चा होता है। अन्य धातुएँ भी ऐसी ही अनगढ़ स्थिति में होती हैं। उन्हें भट्टी में डालकर तपाया और प्रयोग के उपयुक्त शुद्ध बनाया जाता है। रस शास्त्री बहुमूल्य रस भस्में बनाने के लिए कई-कई अग्नि संस्कार करते हैं। कुम्हार के पास बर्तन पकाने के लिए उन्हें आँवे में तपाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। मनुष्यों पर भी यही नियम लागू होते हैं। ऋषि मुनियों की सेवा साधना, धर्म धारणा तो प्रकट है ही, साथ ही वे अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए आवश्यक शक्ति अर्जित करने के लिए तपश्चर्या भी समय-समय पर अपनाते रहते थे। यह प्रक्रिया अपने-अपने ढंग से हर महत्वपूर्ण व्यक्ति को सम्पन्न करनी पड़ी है, करनी पड़ेगी। क्योंकि ईश्वरप्रदत्त शक्तियों का उन्नयन, परिपोषण इसके बिना हो नहीं सकता। व्यक्तित्व में पवित्रता, प्रखरता और परिपक्वता न हो तो कहने योग्य- सराहने योग्य सफलताएँ प्राप्त कर सकने का सुयोग ही नहीं बनता। कुचक्र छद्म और आतंक के बलबूते उपार्जित की गई सफलताएँ जादू के तमाशे में हथेली पर सरसों जमाने जैसे चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं। बिना जड़ का नकली पेड़ कब तक टिकेगा और किस प्रकार फूलेगा-फलेगा।

तपश्चर्या के मौलिक सिद्धान्त हैं- संयम और सदुपयोग। इन्द्रिय संयम से, पेट ठीक रहने से स्वास्थ्य नहीं बिगड़ता। ब्रह्मचर्य पालन से मनोबल का भण्डार चुकने नहीं पाता। अर्थ संयम से, नीति की कमाई से औसत भारती स्तर का निर्वाह करना पड़ता है, फलतः न दरिद्रता फटकती है और न बेईमानी की आवश्यकता पड़ती है। समय संयम से व्यस्त दिनचर्या बनाकर चलना पड़ता है और श्रम तथा मनोयोग को निर्धारित सत्प्रयोजनों में लगाये रहना पड़ता है। फलतः कुकर्मों के लिए समय ही नहीं बचता। जो बन पड़ता है, श्रेष्ठ और सार्थक ही होता है। विचार संयम से एकात्मता सधती है। आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता का दृष्टिकोण विकसित होता है। भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग की साधना सहज सधती रहती है। संयम का अर्थ है- बचत। चारों प्रकार का संयम बरतने पर मनुष्य के पास इतनी अधिक सामर्थ्य बच रहती है, जिसे निर्वाह परिवार के अतिरिक्त महान प्रयोजनों में प्रचुर मात्रा में भली प्रकार लगाया जाता रहे। संयमशीलों को वासना, तृष्णा और अहंता की खाई पाटने में मरना खपना नहीं पड़ता इसलिए सदुद्देश्यों की दिशा में कदम बढ़ाने की आवश्यकता पड़ने पर व्यस्तता, अभावग्रस्तता, चिन्ता, समस्या आदि के बहाने नहीं गढ़ने पड़ते। स्वार्थ-परमार्थ साथ-साथ सधते रहते हैं और हँसती-हँसाती हलकी-फुलकी जिन्दगी जीने का सहज अवसर मिल जाता है। इसी मार्ग पर अब से 60 वर्ष पूर्व मार्गदर्शक ने चलना सिखाया था। वह क्रम अनवरत रूप से चलता रहा। जब भी कोष चुकता और पैर लड़खड़ाता दीखा तभी हिमालय के वातावरण में बैटरी चार्ज करने के लिए बुलाया जाता रहा। विगत तीस वर्षों में एक-एक वर्ष के लिए एकान्तवास ओर विशेष साधना उपक्रम के लिए जाना पड़ा है। इसका उद्देश्य एक ही था। तपश्चर्या के उत्साह और पुरुषार्थ में- श्रद्धा और विश्वास में कहीं कोई कमी न पड़ने पाये। जहाँ कमी पड़ रही हो उसकी भरपाई होती रहे। भगीरथ शिला- गंगोत्री में की गई साधना से धरती पर ज्ञान गंगा की- प्रज्ञा अभियान की- अवतरण की क्षमता एवं दिशा मिली। एक बार उत्तर काशी के परशुराम आश्रम में वह कुल्हाड़ा उपलब्ध हुआ जिसके सहारे व्यापक अवाँछनीयता के प्रति लोक-मानस में विक्षोभ एवं आक्रोश उत्पन्न किया जा सके। पौराणिक परशुराम ने धरती पर से अनेक आततायियों के अनेकों बार सिर काटे थे। अपना सिर काटना- “ब्रेन वाशिंग” है। विचार क्रान्ति एवं प्रज्ञा अभियान में सृजनात्मक ही नहीं सुधारात्मक प्रयोजन भी सम्मिलित हैं। यह दोनों ही उद्देश्य जिस प्रकार, जितने व्यापक क्षेत्र में जितनी सफलता के साथ सम्पन्न होते रहे हैं, उसमें न शक्ति कौशल है, न साधनों का चमत्कार, परिस्थितियों का संयोग यह मात्र तपश्चर्या की सामर्थ्य से ही सम्पन्न हो सका।

यह जीवनचर्या के अद्यावधि भूतकाल का विवरण हुआ। वर्तमान में इसी दिशा में एक बड़ी छलाँग लगाने के लिए उस शक्ति ने निर्देश किया है, जिस सूत्रधार के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचते हुए समूचा जीवन गुजर गया। अब हमें तपश्चर्या की एक नवीन उच्चस्तरीय कक्षा में प्रवेश करना पड़ेगा। इसी की हलचल ऊहापोह एवं प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में चल रही चर्चाओं का इन पंक्तियों में समाधान किया जा रहा है। सर्वसाधारण को इतना ही पता है कि हमें एकान्तवास करेंगे। किसी से मिलेंगे-जुलेंगें नहीं। यह जानकारी सर्वथा अधूरी है। क्योंकि जिस व्यक्ति के रोम-रोम में कर्मठता, पुरुषार्थ-परायणता नियमितता, व्यवस्था भरी पड़ी हो वह इस प्रकार का निरर्थक और निष्क्रिय जीवन जी ही नहीं सकता, जैसा कि समझा जा रहा है। एकान्तवास में हमें पहले की अपेक्षा अधिक श्रम करना पड़ेगा। अधिक व्यस्त रहना पड़ेगा तथा लोगों से न मिलने की विद्या अपनाने पर भी इतनों से, ऐसों से संपर्क सूत्र जोड़ना पड़ेगा जिनके साथ बैठने में ढेरों का ढेरों समय चला जाता है पर मन नहीं भरता। फिर एकान्त कहाँ हुआ? न मिलने की बात कहाँ बन पड़ी? मात्र कार्य शैली में ही राई रत्ती परिवर्तन हुआ। मिलने-जुलने वालों का वर्ग एवं विषय भर बदला। ऐसी दशा में अकर्मण्य और पलायनवाद का दोष ऊपर कहाँ लदा? तपस्वी सदा ऐसी ही रीति-नीति अपनाते हैं। वे निष्क्रिय दीखते भर हैं, वस्तुतः अत्यधिक व्यस्त रहते हैं। लट्टू जब पूरे वेग से घूमता है तब स्थिर खड़ा भर दीखता है। उसके घूमने का पता तो तब चलता है, जब चाल धीमी पड़ती है और बैलेन्स लड़खड़ाने पर ओधा गिरने लगता है।

आइन्स्टीन जिन दिनों अत्यधिक महत्वपूर्ण अणु अनुसन्धान में लगे थे उन दिनों उनकी जीवनचर्या में विशेष प्रकार का परिवर्तन किया गया था। वे भव्य भवन में एकाकी रहते थे। सभी साधन सुविधाएँ उसमें उपलब्ध थीं। साहित्य, प्रयोग उपकरण एवं सेवक सहायक भी। वे सभी दूर रखे जाते थे ताकि एकान्त में एकाग्रतापूर्वक बन पड़ने वाले चिन्तन में कोई व्यवधान उत्पन्न न हो। वे जब तक चाहते नितान्त एकान्त में सर्वथा एकाकी रहते। कोई उनके कार्य में तनिक भी विक्षेप नहीं कर सकता था। जब वे चाहते घण्टी बजाकर नौकर बुलाते और सभी वस्तु या व्यक्ति प्राप्त कर लेते। मिलने वाले मात्र कार्ड जमा करा जाते और जब कभी उन्हें बुलाया जाता तब की महीनों प्रतीक्षा करते। घनिष्ठता बताकर कोई भी उनके कार्य में विक्षेप नहीं कर सकता था। इतना प्रबन्ध बन पड़ने पर ही उनके लिए यह सम्भव हुआ कि संसार को आश्चर्यचकित कर देने वाली मनुष्य जाति को महान अनुदान देने वाली उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर सके। यदि यारबासो से घिरे रहते, उथले कार्यों में रस लेकर समय गुजारते तो अन्यान्यों की तरह वे भी बहुमूल्य जीवन का कोई कहने लायक लाभ न उठा पाते।

प्राचीन काल के ऋषि तपस्वियों की जीवनचर्या ठीक इसी प्रकार की थी। उनके सामने आत्म विज्ञान से सम्बन्धित अगणित अनुसन्धान कार्य थे। उनमें तन्मयतापूर्वक अपना कार्य कर सकने के लिए वे कोलाहल रहित स्थान निर्धारित करते थे और पूरी तन्मयता के साथ निर्धारित प्रयोजनों में लगे रहते थे।

अपने सामने भी प्रायः इसी स्तर के नये कार्य करने के लिए रख दिये गये। ये बहुत वजनदार है, साथ ही बहुत महत्वपूर्ण भी। इनमें से एक है- विश्वव्यापी सर्वनाशी विभीषिकाओं को निरस्त कर सकने योग्य आत्मशक्ति उत्पन्न करना। दूसरा है- सृजन शिल्पियों को जिस प्रेरणा और क्षमता के बिना कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ रहा हैं उसकी पूर्ति करना। तीसरा है- नवयुग के लिए जिन सत्प्रवृत्तियों का सूत्र संचालन होना है, उनका ताना-बाना बुनना और ढाँचा खड़ा करना। यह तीनों ही कार्य ऐसे हैं जो अकेले स्थूल शरीर से नहीं बन सकते। उसकी सीमा और सामर्थ्य अति न्यून है। इन्द्रिय सामर्थ्य थोड़े दायरे में काम कर सकती है और सीमित वजन उठा सकती है। हाड़-माँस के पिण्ड में बोलने, सोचने, चलने, करने कमाने, पचाने की बहुत थोड़ी सामर्थ्य है। उतने भर से सीमित काम हो सकता है। सीमित कार्य से शरीर यात्रा चल सकती है और समीपवर्ती सम्बद्ध लोगों का यत्किंचित् भला हो सकता है। अधिक व्यापक और अधिक बड़े कामों के लिए सूक्ष्म और कारण शरीरों के विकसित किये जाने की आवश्यकता पड़ती है। तीनों जब समान रूप में सामर्थ्यवान और गतिशील होते हैं। तब कहीं इतने बड़े काम बन सकते हैं। जिनके करने की इन दिनों आवश्यकता पड़ गई है।

रामकृष्ण परमहंस के सामने यही स्थिति आई थी। उन्हें व्यापक काम करने के लिए बुलाया गया। योजना के अनुसार उनने अपनी क्षमता विवेकानन्द को सौंप दी तथा उनके कार्यक्षेत्र की सरल और सफल बनाने के लिए आवश्यक ताना-बाना बुन देने का कार्य सम्भाला। इतना बड़ा काम वे मात्र स्थूल शीरी के सहारे कर नहीं पा रहे थे। सो उनने उसे निःसंकोच छोड़ भी दिया। बैलेन्स से अधिक वरदान देते रहने के कारण उन पर ऋण भी चढ़ गया था। उसकी पूर्ति के बिना गाड़ी रुकती। इसलिए स्वेच्छापूर्वक कैंसर का रोग भी ओढ़ लिया। इस प्रकार ऋण मुक्त होकर विवेकानन्द के माध्यम से उस कार्य में जुट गये जिसे करने के लिये उनकी निर्देशक सत्ता ने उन्हें संकेत किया था। प्रत्यक्षतः रामकृष्ण तिरोहित हो गये। उनका अभाव खटका, शोक भी बना। पर हुआ वह जो श्रेयस्कर था। दिवंगत होने के उपरान्त उनकी सामर्थ्य हजार गुनी अधिक बढ़ गई। इसके सहारे उनने देश एवं विश्व में अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन किया। जीवन काल से वे भक्तजनों को थोड़ा बहुत आशीर्वाद देते रहे और एक विवेकानन्द को अपना संग्रह सौंपने में समर्थ हुए। पर जब उन्हें सूक्ष्म और कारण शरीर से काम करने का अवसर मिल गया तो उनसे उत्तरी क्षेत्रों में इतना अधिक काम किया जा सका जिसका लेखा-जोखा ले सकना सामान्य स्तर की जाँच पड़ताल से समझ सकना सम्भव नहीं।

ईसा की जीवनचर्या भी ऐसी है। वे जीवन भर में बहुत दौड़ धूप के उपरान्त मात्र 13 शिष्य बना सके। देखा कि स्थूल शरीर की क्षमता से उतना बड़ा काम न हो सकेगा जितना वे चाहते हैं, ऐसी दशा में यही उपयुक्त समझा कि सूक्ष्म शरीर का अवलम्बन कर संसार भर में ईसाई मिशन फैला दिया जाय। ऐसे परिवर्तनों के समय महापुरुष पिछला हिसाब-किताब साफ करने के लिए कष्टसाध्य मृत्यु का वरण करते हैं। ईसा का क्रूस पर चढ़ना, सुकरात का विष पीना, कृष्ण के तीर लगना, पाण्डवों का हिमालय में गलना, गाँधी का गोली खाना, आद्य शंकराचार्य को भगन्दर होना यह बताता है कि अगले महान प्रयोजनों के लिए जिन्हें स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करना होता है, वे उपलब्ध शरीर का इस प्रकार अन्त करते हैं, जिसे बलिदान स्तर का- प्रेरणा प्रदान करने वाला और अपने चलते समय का पवित्रता, प्रखरता प्रदान करने वाला कहा जा सके।




Quotation - Akhandjyoti June 1984

अपनी अच्छी बातों की कुछ प्रशंसा सुन चुकने के बाद अरुचिकर बातों को सुनना सरल होता है। अतः दूसरों को खिझाए या रुठाए बिना बदलने का बढ़िया तरीका यह है कि प्रशंसा और निष्कपट गुण ग्राहकता के साथ आरम्भ कीजिए।




अप्रत्यक्ष घाटे के पीछे परोक्ष लाभ ही लाभ है। - Akhandjyoti June 1984

आद्य शंकराचार्य, सन्त ज्ञानेश्वर, विवेकानंद, रामतीर्थ चारों स्वस्थ, मनोबल-सम्पन्न और तपस्वी होते हुए भी तीस वर्ष से कुछ ही अधिक समय जिये और शरीर त्याग गये। यह सामान्य घटनाऐं नहीं हैं। इनके पीछे कुछ विशेष रहस्य और कारण हैं। उनने देखा कि समय की माँग जितना करने की है, उतना स्थूल शरीर की परिधि में बाँधे रहने पर ठीक तरह बन नहीं पड़ रहा है। इसलिए सूक्ष्म शरीर को सक्रिय बनाया जाय। इस आधार पर कहीं अधिक व्यापक क्षेत्र में- कही अधिक काम हो सकता है। हाथ, पैर, आँख, जीभ वाला शरीर दिन भर में एक छोटी नियत मात्रा में ही काम कर सकता है। उसके भोजन, विश्राम, स्वच्छता, नित्यकर्म परिजन-परिकर जैसे सम्बद्ध प्रयोजन में ही ढेरों श्रम, समय खर्च हो जाता है। जो बचता है, वह अन्यान्यों की तुलना में भले ही अधिक हो पर आत्मा की शक्ति तथा समय की आवश्यकता को देखते हुए प्रायः कम ही पड़ता है। इस असन्तोष-असमंजस को दूर करने के लिए उन्होंने उच्चस्तरीय शरीरों को वरीयता देने के लिए स्थूल शरीर का परित्याग करना ही उचित समझा। यह आपत्तिकालीन निर्णय थे। सामान्य तथा स्थूल शरीर के डडडडड डडडडड मात्रा में सूक्ष्म और कारण शरीर को भी जागृत और सक्रिय रखा जा सकता है। कौन क्या करे? उसका निर्णय उसके स्वयं के विवेक और परिस्थितियों के तकाजे पर निर्भर है।

स्वामी रामतीर्थ ने दिवाली के दिन गंगा में जल समाधि ली। इससे एक दिन पूर्व उनने “मौत के नाम खत” नामक एक लम्बा लेख लिखा है। उसे ध्यानपूर्वक पढ़ने से उस मनःस्थिति और परिस्थिति का पता चलता है- जिसमें उन्हें ऐसा कदम उठाया पड़ा। वे लिखते हैं- ”ऐ मौत तू जल्दी आ ताकि इस बन्धन रूपी काया से निकल कर स्वच्छंद पवन में हाथ लहरा सकूँ, समुद्र की तरह लहरा सकूँ। दूरी और क्षेत्र का बन्धन न रहे। दृश्य शरीर को जो मानापमान सहना पड़ता है और दूसरी आवश्यकता जुटाने में जो समय खर्च करना पड़ता है, वह न करना पड़े। मैं बहुत कुछ करना चाहता हूँ। बड़ा और व्यापक बनना चाहता हूँ। पर यह शरीर बाधा पहुँचाता और सीमित रहने के लिए ही विवश करता है सो ए मौत! तू जल्दी आ। झंझट से छुड़ा और असीम के अंशधर जैसा पुरुषार्थ करने में समर्थ बना।

लगभग इन्हीं से मिलते-जुलते विचार उपरोक्त अन्यान्यों के रहे होंगे। योगाग्नि से शरीर का अन्त करने वालों की कितनी ही गाथाएँ हैं। उन्हें आत्महत्या नहीं कहा जा सकता। फिर आज जो असह्य वेदना होने की स्थिति में आत्महत्या को भी मनुष्य के मौलिक अधिकारों में सम्मिलित करने की माँग उठ रही है। गाँधी जी ने आश्रम के बछड़े की मृत्यु वेदना देखकर उसे शान्ति से मरने के लिए जहर की सुई लगवा दी थी। जापान में भी वैसा प्रचलन कुछ समय पूर्व तक रहा है। जो हो, यहाँ उपरोक्त महामानवों की उस स्थिति पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें उनने सूक्ष्म शरीर को प्रमुखता दी और जल्दी उसके उपलब्ध न होते देख कर काया को तिलाँजलि तक दे दी।

यहाँ उपरोक्त कदम का समर्थन नहीं किया जा रहा है, वरन् सूक्ष्म शरीर सत्ता और महत्ता की तुलना में स्थूल शरीर को नगण्य ठहराने जाने की चर्चा है। सभी जानते हैं कि मन वायु वेग से चलता है, वह क्षण भर में कहीं से कहीं पहुंचता है। प्राण ऊर्जा के भण्डार से भरा होने के कारण वह इतना काम कर सकता है, जो शरीर धारियों के लिए अति कठिन है। योगाभ्यास के अधिकाँश विधि-विधान सूक्ष्म और कारण शरीर को समुन्नत बनाने और ऋद्धि-सिद्धियों के अधिष्ठाता बनने के लिए ही विनिर्मित हुए हैं।

पंचकोश, षट्चक्र, उपत्यिकाएँ, ग्रन्थियाँ, इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना जैसी सूक्ष्म नाड़ियां, कुण्डलिनी, सहस्रार, ब्रह्मरंध्र आदि दिव्य केन्द्रों को देवताओं का निवास ओर प्रसुप्त विभूतियों का भण्डार माना गया है। जिस अतीन्द्रिय क्षमताओं के आश्चर्यजनक क्रिया-कलापों का कहा डडडडडडडडडडड अब जोरों से हो रहा है और परामनोविज्ञान के- “मैटाफिजिक्स” के अंतर्गत जिनका सारगर्भित अनुसंधान चल रहा है, उन सबका धरातल सूक्ष्म शरीर में है। भूत-प्रेतों से लेकर देवी देवताओं तक वायुभूत काया में निवास करते ओर अपने-अपने ढंग से वे कार्य करते हैं जो शरीरधारी मनुष्य के लिए सम्भव नहीं। अष्ट-सिद्धियों में अणिमा, महिमा, लघिमा आदि का वर्णन है। हल्का, भारी, अदृश्य आदि हो जाना, परकाया प्रवेश द्वारा अपनी सामर्थ्य से अन्य शरीर धारी को प्रभावित करना जैसे अनेकों कार्य इसी क्षेत्र में आते हैं। अदृश्य सहायकों की चर्चा अनेक प्रामाणिक संदर्भों में होती रहती है। यह सूक्ष्म शरीर धारी आत्माएँ ही हैं। उच्चस्तरीय होने पर वे ही देवता जैसी भूमिकाएँ सम्पन्न करती हैं।

विक्रमादित्य के पास पाँच वीर थे। शंकरजी के साथ रहने पर वे वीरभद्र कहलाये। अलादीन के चिराग से जिन जिन फरिश्तों का सम्बन्ध जोड़ा गया है, वे भी कुछ रहे होंगे। सुकरात के साथ एक आत्मा रहती थी जिसे वे ‘डैमन’ कहते थे और हर महत्वपूर्ण कार्य वे उसकी सलाह से ही करते थे। सुषुप्ति और तुरीयावस्था में सूक्ष्म शरीर अधिक सक्रिय रहता है और ऐसे पूर्वाभासों का- दूर दृश्यों का पता लगाकर लाता है जो सामान्य बुद्धि और शक्ति में सर्वथा बाहर होती है। नारद का सूक्ष्म शरीर हो लोक-लोकान्तर में भ्रमण करता था। बात की बात में विष्णुलोक- शिवलोक- स्वर्ग और नरक कहीं भी जा पहुंचता था। छाया पुरुष सिद्धि में अपनी ही सूक्ष्म शरीर को साधना बल से जागृत करके एक नया समर्थ सहयोगी सृजा जाता है। भैरव आदि की सिद्धि किन्हीं समर्थ आत्माओं के साथ सहयोग भरी घनिष्ठता प्राप्त कर लेना ही है। यह अदृश्य सहायकों का क्षेत्र है। ऐसी आत्माएँ आवश्यकतानुसार व्यक्ति विशेष की भी उद्देश्य पूर्ण सहायता करती हैं। विशेषतया उनमें से जो उच्चस्तरीय हैं, वे वातावरण की प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने, दिव्य प्रेरणाएँ देने, सत्प्रयोजनों की सफलता में हाथ बँटाने जैसे कार्यों में लगी रहती हैं। दिव्य आत्माएं ही जन संपर्क में आने वाले देवता हैं। अन्य तान्त्रिक दृष्टि से अग्नि, सूर्य, इन्द्र, वरुण अन्तरिक्ष आदि को ही देवता कहा गया है। कहीं-कहीं, भगवान को भी अग्नि इन्द्र आदि के नाम से संबोधित किया गया है।

चर्चा सूक्ष्मीकरण प्रसंग की, की जा रही थी। अपने कदम इसी दिशा में बढ़ने हैं। इसके लिए आवश्यक है कि स्थूल काया को शिथिल किया जाए। आद्य शंकराचार्य ने जब शास्त्रार्थ में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए राजा के शरीर में परकाया प्रवेश किया था तब उन्होंने अपने पुराने शरीर को उतने समय के लिए सुरक्षित रखने की व्यवस्था कर दी थी। दोनों शरीरों में समान सक्रियता सम्भव नहीं। जागृति बढ़ेगी तो सुषुप्ति न रहेगी। सुषुप्ति बढ़ेगी तो जागृति को शिथिल होना पड़ेगा।

सूक्ष्म शरीर यों मानो तो एक ही गयाडडडडड है, पर उसके भेद-उपभेद कितने ही हैं। पाँच कोश, इसी वर्ग विभाजन में आते हैं। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, यह पाँच सूक्ष्म शरीर एक ही कार्य में अवस्थिति पाँच देवता माने गये हैं। और वे पाँचों, एक ही समय में पाँच अलग-अलग स्थानों से पाँच प्रकार काम कर सकते हैं। अर्थात् एक स्थूल शरीर धारी विशेष स्थिति में पाँच सूक्ष्म शरीरों द्वारा पाँच गुने काम हाथ में ले सकता है। साथ ही उनका स्तर भी कहीं अधिक ऊँचा रख सकता है।

हमें सूक्ष्म शरीर को अभीष्ट स्तर तक जगा सकने में सफलता मिली तो अनेकानेक विशिष्ट व्यक्तियों की सहायता सम्भव हो सकती है। साथ ही एक ही समय में अनेकों सत्प्रयोजनों को उभारने और सफल बनाने के लिए उपयुक्त वातावरण बनाना भी सम्भव हो सकता है। स्थूल शरीर का एक नियत कलेवर होता है और नियम स्थान। किन्तु सूक्ष्म शरीर पर इस प्रकार के बन्धन नहीं हैं। प्रेतात्माएं सूक्ष्म शरीर धारी होती हैं। दृश्य-अदृश्य रूप में कहीं भी रह सकती हैं। हमें भी जितनी सूक्ष्मीकरण में सफलता मिलेगी, हिमालय, शान्तिकुश अथवा अन्यत्र कहीं भी रहने न रहने की क्षमता हस्तगत हो जायेगी।

यदि ऐसा बन पड़ता है तो जो स्नेही, सहयोगी हमारे द्वारा लोकहित का अधिक कार्य सम्पन्न होते देखना चाहते हैं उन्हें निराश नहीं, अधिक उपलब्धि पर अधिक प्रसन्नता ही होगी। जो लोग व्यक्ति सान्निध्य की भावनात्मक अपेक्षा करते हैं, उनको भी तब कोई कठिनाई न होगी। हमारे हिमालय वासी गुरुदेव सूक्ष्म शरीर से हमारा निरन्तर मार्ग-दर्शन करते हैं। उनका प्रत्यक्ष साक्षात्कार तो जीवन भर में तीन बार ही हुआ है, पर परोक्ष सान्निध्य का अभाव कभी नहीं खटका। यदि वैसी विशेषता न हो तो घर-पड़ौस में रहने वाले भी निरर्थक और भारभूत सिद्ध हो सकते हैं। गान्धी और बुद्ध की आत्माओं ने लाखों करोड़ों को झकझोर कर कहीं से कहीं उछाल दिया था जबकि असमर्थ मनोबल वाले अपने बीबी बच्चों तक को कुमार्ग से रोकने में सफल नहीं हो पाते। पास या सामने रहना तनिक भी महत्व की बात नहीं। सिर में रहने वाले जुएँ, खाट के खटमल, घर में चूहे क्या कुछ काम आते हैं। मक्खी-मच्छर साथ ही रहते हैं, पर उनसे सिवाय हैरानी के और किसी को क्या मिलता है। चोर, लफंगे मुहल्ले पड़ौस में बसते और दिन में कई बार आंखों के सामने गुजरते हैं तो भी कुछ प्रसन्नता नहीं होती। उलटे चिन्ता ही बनी रहती है। इसके विपरीत दूरवर्ती चंदन वृक्ष अपने घर तक शीतल, सुगन्धित पवन पहुँचाते हैं। परदेश में नौकरी करने वाले, शरीर से दूर रहने पर भी परिवार को प्यार करते और पैसा भेजते हैं। इस दूरी में भी निकटता देखी जा सकती है। भगवान अदृश्य है तो भी हम सब का पूरा-पूरा ध्यान रखता है हवा दीखती नहीं तो भी नाक मार्ग से शरीर के कण-कण में पहुंचती और जीवन सम्पदा प्रदान करती है दूरवर्ती सूर्य-चन्द्र अपने-अपने ढंग के अनुदान घर बैठे ही पहुँचाते रहते हैं।

यह सब उनसे कहा जा रहा है, जो हमारे आँख से ओझल होने पर स्नेह-सहयोग न मिल सकने की बात सोचते हैं। उन्हें सूक्ष्म का- परोक्ष का भी महत्व समझना चाहिए। शरीर प्रत्यक्ष और प्राण परोक्ष है। तो भी हम प्राण का सान्निध्य अनुभव करते और उसी के सहारे जीवित तक रहते हैं। एकांतवासी होने या वार्ता न करने पर भी सम्बन्ध टूटते कहाँ हैं। हम जब जिस सुदृढ़ शृंखला में मजबूती के साथ बँधे या बाँधे गये हैं, वह ऐसी नहीं है कि बच्चे धागे की तरह जरा सा आघात लगते ही बिखर जाय। ऐसी तो स्वार्थियों की मित्रता होती है जो मतलब निकलने तक ही टिकती है। प्रज्ञा परिजनों की आत्मीयता किसी भी ओर से इतनी कमजोर नहीं है, जो दीखने पर जिये और ओझल होते ही सिमट कर कहीं से कहीं चली जाय। ऐसा तोताचश्मी तो दलाल और बटमार ही दिखाते हैं।

अपना और परिजनों का मध्यवर्ती रिश्ता आदर्शों और उद्देश्यों पर अवलम्बित है। वे जब तक यथास्थान बने रहेंगे तब तक किसी को भी निकटती या दूरी के कारण किसी प्रकार की गड़बड़ी होने की आशंका नहीं करनी चाहिए। वरन् स्तर उठने ओर क्षमता बढ़ने की हालत में पहले की अपेक्षा आदान-प्रदान में और भी अधिक भाव सम्वेदनाओं का समावेश होगा। न समाज को हानि पहुँचेगी, न निकटस्थ, व्यक्तियों में से किसी को, वरन् सबको सब प्रकार का लाभ ही होगा। हमें असुविधाओं कस सामना करना पड़ेगा, अब की अपेक्षा अधिक कष्ट साध्य जीवन जीना पड़ेगा। तो भी बदले में जो मिलना है, उसे देखते हुए इतनी कीमत चुकाने में आनाकानी की नहीं जा सकती।

प्रज्ञा अभियान के कार्यकर्ताओं और कार्यक्रमों का निश्चय ही उसके उपरान्त बल मिलेगा। सुस्ती और लापरवाही का माहौल इसलिए भी रहता है कि बड़ों के रहते उन पर निर्भरता रहती है। पर जब के सामने नहीं होते तो समझदारी में जिम्मेदारी बढ़ती है। नासमझों की बात दूसरी है। उनके सामने रहकर लाठी दिखाकर भी कोई कुछ नहीं करा लेता फिर पीछे तो करने वाले ही क्या हैं? किन्तु जहाँ सदाशयता जीवित है, वहाँ ऐसी कोई बात नहीं है। मथुरा में हरिद्वार चले आने के उपरान्त वहाँ का कार्य घट नहीं वरन् बढ़ ही गया है। जब-जब हम हिमालय गये हैं, तब तब लौटकर आने पर कुछ बिगाड़ नहीं हुआ वरन् बनाव ही पाय। मिशन के पीछे दैवी शक्तियाँ काम करती हैं और परिजनों में श्रद्धा-सद्भावना ये दोनों जब तक जीवित हैं जब तक किसी को भी यह भ्रम तथा अहंकार नहीं करना चाहिए कि अमुक अमुक के न रहने पर काम को क्षति पहुँचेगी। वृक्षों के फल टूटते रहते हैं। उनकी स्थान पूर्ति के लिए दूसरे फिर न जाने कहाँ से आकर उस गई शोभा सम्पदा को फिर से बना देते हैं। मरने की तरह जन्मने का भी क्रम इस संसार में विद्यमान है। फिर हम तो अभी मर भी नहीं रहे हैं। स्थूल या सूक्ष्म शरीर में युग सन्धि की अवधि में सन् 2000 तक हम अपनी स्थिति बनाये रहेंगे ताकि नव सृजन पर विश्वास रखने वाला हर व्यक्ति यह अनुभव करता रहे कि वह अकेला नहीं है। उसके पीछे-पीछे कोई बलिष्ठ सत्ता चल रही है। प्रेरणा प्रकार ही नहीं आवश्यक आच्छादन भी प्रस्तुत कर रही है। हमें कभी शिकायत नहीं हुई कि इतनी जिम्मेदारियों को हम अकेले वहन कर रहे हैं। आत्मविश्वास और आत्म सन्तोष से लोक समर्थन और जन सहयोग खींच बुलाया है। इसके साथ ही दैवी अनुग्रह की अनायास ही अजस्र वर्षा होती रही है। उसके लिए पल्ला पसारने-नाक रगड़ने की तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़ी। पात्रता का अनुग्रह अयाचित ही बरसता रहा है। जिनकी भावनाएँ उच्चस्तरीय होंगी, उनमें से प्रत्येक को वह सब कुछ मिलेगा, जिसके सहारे सफलता के उच्च स्तर तक पहुँच सके।

यह पंक्तियां समर्थ सहचरों के लिए लिखी गई हैं और उकसाया गया है कि उचित मूल्य पर विभूतियाँ खरीदने की बात सोचें। हीरा और सोने के आभूषण मुफ्त नहीं बंटते। पंचामृत तुलसी पत्र ही प्रसाद में मिलता है। माला घुमाने और अगरबत्ती जलाने की कीमत पर किसी की मनोकामनाएँ पूरी करने वाले देवी देवता अभी जन्मे नहीं हैं। अभी महंगाई का समय है। सम्भव है कभी सस्ता जमाना आये और रामनाम जपने भर से पराया माल अपना हो चले ऐसा कुछ जुगाड़ बैठे। बैंक कर्ज देते समय हैसियत पूछती और यह जाँचती है कि पैसा किस लिये माँगा जा रहा है। किस काम में खर्च होगा देवताओं के यहाँ ऐसा बैंक नहीं है, जिसमें पत्र पुष्पों की कीमत पर दर्शन झाँकी करने भर से कोई निहाल हो सके। संसार क्षेत्र की भाँति ही अध्यात्म क्षेत्र में भी खरीद फरोख्त का सिलसिला चलता है इस यथार्थवादिता को जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही अच्छा है। अब तक जिनने भी देवताओं या सिद्ध पुरुषों से कुछ कहने लायक पाया है उसे आत्म परिशोधन की तपश्चर्या और लोकमंगल के लिए भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करने की योग साधन द्वारा ही उपलब्ध किया है। हमें भी इसी राह पर चलते हुए कुछ मिला। अन्य सभी के लिए यही खुला राजमार्ग है। “शार्टकट” खोजने की जल्दी किसी को भी नहीं करनी चाहिए। सिर पर हाथ रख कर कुण्डलिनी जगाने वाले आंखें बन्द करके भगवान का दर्शन, कराने वाले, मन्त्र-तन्त्र के बदले ऋषि-सिद्धियाँ प्राप्त कराने वाले, रिश्वत खुशामद से देवताओं को बरगलाने फुसलाने की तिकड़में जितनी जल्दी समाप्त हो सके, उतना ही उत्तम है। इनमें जालसाजी के अतिरिक्त वास्तविकता का नामोनिशान भी नहीं है। हाथ बँटाने और पारितोषिक पाने की नीति ही सही है।




Quotation - Akhandjyoti June 1984

यदि आपको किसी दुष्ट व्यक्ति के साथ व्यवहार करना पड़े, तो उसे माता करने की केवल एक ही विधि है, वह यह कि उसके साथ ऐसे व्यवहार कीजिए, मानो वह कोई माननीय सज्जन है। यह जताइये कि आप उसे अपने ही समान निष्कपट अनुभव कर रहे हैं।

इस समर्थ समुदाय के अतिरिक्त एक वर्ग छोटे बालकों और असमर्थों का है। इन्हें सहज करुणा से प्रेरित हो उनकी सहायता करनी पड़ती है। बच्चे गोदी में चढ़ते, मिठाई पान, खिलौने लेने के लिए मचलते हैं। बदले में वे कुछ दे सकने की स्थिति में नहीं होते। बड़े इस बाल वर्ग का भी ध्यान रखते हैं और कुछ प्रकार कुछ दे दिला कर हँसाते चुपाते हैं। अपंग असमर्थों के सम्बन्ध में भी यही बात है। इच्छा होते हुए वे कुछ अनुदान पाक प्रतिदान दे सकने की स्थिति में नहीं होते। इन वर्गों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। मुँह मोड़ लेने में निष्ठुरता का पातक चढ़ता है। हमारी जीवनचर्या में इन वर्गों को भी समुचित प्रश्रय मिलता रहा है। करुणा का परित्याग करके हम जीवित नहीं रह सकते। मात्र वेचना ही नहीं डडडडडबाँअना भी हमारा कार्य रहा है। प्रयत्न यह किया है कि अपनी प्याऊ पर से कोई प्यास न जाने पाये। भोजन के समय आ पहुँचे अतिथि को जो रूखा सूखा है, उसमें भागीदार बनाया जाये। घायलों की पट्टी बाँधे बिना अस्पताल से कैसे वापस लौटाया जाय। निराश को आशा बँधाते और रोता आने वाले को हँसाते लौटाने की अपनी आदत रही। लम्बा जीवन इन कृत्यों में रस लेते बीत गया। इसमें किसका कितना भला हुआ यह ईश्वर जाने, पर हमने ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाई और करुणा मिलाई है। बदले में जो आत्म सन्तोष मिलता रहा है उसकी पुण्य पूँजी भी धीरे-धीरे करके जमा होती और पर्वत जितनी ऊँची उठती रही है।

एकान्तवास में न मिलने के कार्यक्रम से इस वर्ग को अपनी व्यथाऐं हलकी करने से वंचित रहना पड़े ऐसा न होगा। शरीर कही किसी भी स्थिति में क्यों न हो, हमारी आत्मा अब की अपेक्षा ओर भी अधिक सूक्ष्म और सक्रिय रहेगी। सुनने वाले कान और देखने वाले नेत्र अधिक सूक्ष्म ओर अधिक व्यापक होते जा रहे हैं। तब कोई बिना हरिद्वार आये, बिना भेंट दर्शन किये, बिना पत्र लिखे, भी अपना हृदय खोलकर रखने और समुचित उत्तर पाने में घर बैठे भी सफल होगा। सूक्ष्म शरीरों के जागरण की शृंखला में एक को विशेष रूप से इसी के लिए सुरक्षित रखा और नियुक्त किया गया कि आँसू पोंछता, सिर दबाता, मरहम लगाता और दुलार-पुचकार सहित गोदी में बिठाता रहे। देने को भी कुछ तो पास रहेगा। सर्वथा कंगाल कभी भी रहना नहीं पड़ा है। अतिथि सत्कार का लाँछन अभी तक नहीं लगा है। फिर होश-हवास दुरुस्त रहते भविष्य में भी उस पर पटाक्षेप हो, ऐसा नहीं होगा। जो कमाने का अवसर मिलेगा, उसका एक भाग पिछड़ों को बढ़ाने और गिरतों को उठाने में भी निश्चित रूप से लगता रहेगा।




प्रिय शिष्य नचिकेता था (kahani) - Akhandjyoti June 1984

यमाचार्य का परम प्रिय शिष्य नचिकेता था। वे उसके गुणों पर मुग्ध थे। चाहते थे कि इस वरिष्ठ शिष्य की प्रतिभा अधिक उभरे और उसकी गरिमा अमर-अमर बन कर रहे। सो उन्होंने नचिकेता की उन सुविधाओं में कटौती करनी आरम्भ कर दी, जो गुरुकुल के अन्य छात्रों को सहज उपलब्ध होती रहती थी। एक वर्ष तक नचिकेता को मात्र जो के सत्तू पर निर्वाह करने के लिए कहा गया जब कि विद्यालय के अन्य छात्रों को सामान्य गृहस्थों जैसा भोजन मिलता था।

गुरु पत्नी भी इस वरिष्ठ छात्र से अधिक स्नेह करती थी सो उन्होंने अपनी पति को यह अतिरिक्त कष्ट देने से रोका भी और कारण भी पूछा।

यम ने कहा- भद्रे! सोना तपाने पर ही निखरता है रसायनें अग्नि संस्कार से ही बनती है बर्तन आवे में ही पकते हैं। बादल सूर्य ताप के कारण ही आकाश तक पहुंचते और परिभ्रमण करते हैं मनुष्य तप की अग्नि से प्रखरता अर्जित करते हैं सो तुम मोहवश नचिकेता की काया की सुविधा प्रदान करने की बात न सोचो। उसकी आत्मा को तेजस्वी बनाने वाले तप का समर्थन करो।

गुरु पत्नी का समाधान हो गया। दूसरे वर्ष अन्य इन्द्रियों का- तीसरा वर्ष मन का- चौथे वर्ष बुद्धि का और पाँचवें वर्ष अहंता अन्तरात्मा का संयम कराया गया। एक के बाद दूसरा अग्नि संस्कार होते चलने से वे क्रमशः अधिक ओजस्वी, मनस्वी, तेजस्वी, यशस्वी और तपस्वी होते चले गये। उनका वर्चस् उच्च शिखर पर जा पहुँचा। पाँचों अग्नियों का अनुग्रह उन पर बरसा और वैसे ही सिद्ध पुरुष बन गये जैसा कि उनका मनोरथ और गुरु का अनुग्रह था।

नचिकेता ने ऋषि संगम से अपनी सफलता का रहस्य बताते हुये कहा- “आत्म प्राप्ति का मार्ग छुरे की धार पर चलने के समान है। जो उनका साहस सँजोते हैं वे ही सफल होते और लक्ष्य तक पहुँचते हैं।

जैमिनीय ब्राह्मण का एक कथानक है- असुरों से देवताओं के परास्त होने डडडडड डडडडड पराजित देवता भागे और अपने प्राण बचाने के लिए जहाँ-तहाँ छिपते फिरे।

उन में से अधिकाँश ने पर्वत कन्दराओं की शरण ली। इतने से भी काम चला नहीं। असुरों के मृत्यु दूतों ने पता पा लिया और वे नये अस्त्र-शास्त्रों से सज्जित होकर उस क्षेत्र पर भी आक्रमण की तैयारी करने लगे।

देवता असमंजस में थे। कहाँ जायं? कहाँ छिपें? सुरक्षित स्थान ढूंढ़ने के लिए प्रजापति से परामर्श लेने पहुँचे।

बहुत देर सोचने के उपरान्त प्रजापति ने कहा “तुम स्वर बनकर शब्दों में समा जाओ। जिसे वाणी का सदुपयोग करना आता हो, उसे अपना अनुचर मानना और परस्पर सहयोग करते हुए सहयोगपूर्वक रहना।”

वह आश्रय देवताओं के बहुत पसन्द आया असुरों का आतंक दूर हो जाने पर ही वे उस सुरम्य क्षेत्र को छोड़ने के लिए अभी तक सहमत नहीं हुए हैं।




हमारी भविष्यवाणी सतयुग की वापसी - Akhandjyoti June 1984

पुरातन काल में एक अपराजित हेय दुर्दान्त दैत्य कृतवीर्य के आतंक से दसों दिशा में हाहाकार मच गया था। वह महा प्रतापी और वरदानी था। देवता और मनुष्यों में से कोई उससे लोहा ले सकने की स्थिति में नहीं था। सभी असहाय बने जहाँ-तहाँ अपनी जान बचाते फिरते थे। उपाय ब्रह्माजी ने सोचा। भगवान शंकर को एक प्रतापी पुत्र उत्पन्न करने के लिए सहमत किया। वही इस प्रलय दूत से लड़ सकता था। कार्तिकेय जन्मे। अग्नि ने उन्हें गर्भ में रखा। कृतिकाओं ने पाला और इस योग्य बनाया कि वह अकेला ही चुनौती देकर कृतवीर्य को परास्त कर सके। ऐसा ही हुआ भी और संकट टलने का सुयोग आया था।

इस पौराणिक उपाख्यान में कितना सत्य और कितना अलंकार है यह कहना कठिन है पर प्रस्तुत विभीषिकाएं सचमुच ही ऐसी हैं, जिन्हें, कृतवीर्य के आतंक तुल्य ठहराया जा सके। जो सामने है उसकी परिणति महाप्रलय होने जैसी मान्यता हर विचारशील की बनती जा रही है।

अणुयुद्ध की विभीषिका किसी भी दिन साकार हो सकती है और इस धरती पर विषाक्तता के अतिरिक्त और कुछ बचने के आसार नहीं हैं। बढ़ती जनसंख्या के लिए निर्वाह साधन अगले दिनों भी मिलते रहें, इसकी कोई सम्भावना नहीं है। अन्न, जल, खनिज ही नहीं, शुद्ध वायु तक मिलना सम्भव न रहेगा और लोग भूख प्यास, घुटन से संत्रस्त होकर दम तोड़ेंगे। मर्यादाओं को तोड़-मरोड़ डालने निरत व्यक्ति का स्वास्थ्य, सन्तोष, सुरक्षा सम्पदा सभी से वंचित होना पड़ेगा। अनाचार की मान्यता देने वाले समाज में स्नेह, सहकार और न्याय के लिए क्या स्थान रहने वाला है। विश्रृंखलित और विग्रही समाज का कोई भी सदस्य चैन से न रह सकेगा। इन परिस्थितियों का विवेचन हर क्षेत्र के मूर्धन्य विचारशील कर रहे हैं और एक स्वर में इस निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि समय रहते न चेता गया तो मनुष्य जाति को सामूहिक आत्महत्या के लिए बाधित होना पड़ेगा। इस प्रसंग में शास्त्रकार, दिव्यदर्शी, ज्योतिषी, भविष्य वक्ता भी अपने-अपने तक प्रमाण प्रस्तुत करते हुए यह घोषित करते हैं कि दुर्दिनों की विपत्ति बेला अब कुछ ही दिनों में आ धमकने वाली है। बढ़ते तापमान से ध्रुव पिघलने, समुद्र उफनने और हिमयुग वापस लौटने जैसी चर्चाएँ आये दिन सुनने को मिलती रहती हैं। कोई चाहे तो इन परिस्थितियों की कृतवीर्य महादैत्य के समय से तुलना कर सकता है, जो किसी के भी झुकाये न झुक पा रहा है।

ऐसे समय में अध्यात्म शक्ति ही कारगर होती रही है। विश्वामित्र का यज्ञ जिसकी रक्षा करने राम लक्ष्मण गये थे, सामयिक आतंक को टालने की पृष्ठभूमि बनाने के लिए ही किया गया था। दधीचि के अस्थिदान के पीछे भी यही उद्देश्य था। कार्तिकेय जैसी अध्यात्म क्षमता उत्पादित करने के प्रयत्नों के साथ किसी प्रकार संगति बिठानी हो तो प्रज्ञा परिजनों के द्वारा संचालित प्रज्ञा पुरश्चरण से बैठ सकती है जिसमें चौबीस लाख व्यक्ति एक समय पर एक विधान से वातावरण संशोधन की साधना करते हैं। इसी की एक कड़ी इस अनुभव प्रयास के साथ जुड़ती है, जिसमें एकांतवास के साथ उग्र तपश्चर्या करने का निर्धारण है। इसकी सुखद परिणति पर हमें उतना ही विश्वास है जितना अपनी आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व पर।

दृश्य और प्रत्यक्ष परिस्थितियों का विश्लेषण करने वालों और निष्कर्ष निकालने वालों की तुलना में हमारे आभास इन दिनों सर्वथा भिन्न हैं। लगता है, एक-एक करके सभी संकट टल जायेंगे। अणुयुद्ध नहीं होगा और यह पृथ्वी भी वैसी बनी रहेगी, जैसी अब है। प्रदूषण को मनुष्य न संभाग सकेगा। तो अन्तरिक्षीय प्रवाह उसका परिशोधन करेंगे। जनसंख्या जिस तेजी से अभी बढ़ रही है, एक दशाब्दी में वह दौड़ आधी घट जायेगी। रेगिस्तानों और ऊसरों को उपजाऊ बनाया जायेगा और नदियों को समुद्र तक पहुँचने से पूर्व इस प्रकार बाँध लिया जायेगा कि सिंचाई तथा अन्य प्रयोजनों के लिए पानी की कमी न पड़े।

प्रजातन्त्र के नाम पर चलने वाली धाँधली में कटौती होगी। बोट उपयुक्त व्यक्ति ही दे सकेंगे। अफसरों के स्थान पर पंचायतें शासन सम्भालेंगी और जन सहयोग से ऐसे प्रयास चल पड़ेंगे जिनकी कि इन दिनों सरकार पर ही निर्भरता रहती है। नया नेतृत्व उभरेगा। इन दिनों धर्म क्षेत्र के और राजनीति के लोग ही समाज का नेतृत्व करते हैं। अगले दिनों मनीषियों की एक नई बिरादरी का उदय होगा जो देश, जति, वर्ग आदि के नाम पर विभाजित वर्तमान समुदाय को विश्व नागरिक स्तर की मान्यता अपनाने विश्व परिवार बनाकर रहने के लिए सहमत करेंगे। तब विग्रह नहीं, हर किसी पर सृजन और सहकार सवार होगा।

विश्व परिवार की भावना दिन-दिन जोर पकड़ेगी और एक दिन वह समय आवेगा जब विश्व राष्ट्र, आबद्ध विश्व नागरिक बिना आपस में टकराये प्रेम पूर्वक रहेंगे। मिल-जुलकर आगे बढ़ेंगे और वह परिस्थितियाँ उत्पन्न करेंगे जिसे पुरातन सतयुग के समतुल्य कहा जा सके।

इसके लिए नव सृजन का उत्साह उभरेगा। नये लोग नये परिवेश में आगे आयेंगे। ऐसे लोग जिनकी पिछले दिनों कोई चर्चा तक न थी, वे इस तत्परता से बागडोर संभालेंगे मानो वे इसी प्रयोजन के लिए कहीं ऊपर आसमान से उतरे हों या धरती फोड़ कर निकले हों।

यह हमारे स्वप्नों का संसार है। इनके पीछे कल्पनाएँ अटकलें काम नहीं कर रही हैं वरन् अदृश्य जगत में चल रही हलचलों का देखकर इस प्रकार का आभास मिलता है जिसे हम सत्य के अधिकतम निकट देख रहे हैं।

मरणोन्मुख प्रवाह में इस प्रकार आमूल-चूल परिवर्तन होने के पीछे उन देवी शक्तियों का हाथ है जो दृश्यमान न होते हुए भी वातावरण बदल रही हैं और लोक चिन्तन में अध्यात्म तत्वों का समावेश कर रही हैं। महान कार्यों के लिए किसी जादुई कलेवर वाले लोग नहीं होते। अपने जैसे ही हाड़माँस के लोग जब दृष्टिकोण रुझान एवं पराक्रम की दिशा बदलते हैं तो वे कुछ से कुछ बन जाते हैं।

रीछ वानरों में न कोई विशेष योग्यता थी, न क्षमता। दैवी प्रवाह के साथ-साथ चल पड़ने के कारण वे सब कुछ से कुछ हो गये थे। हनुमान, अंगद और नल-नील जैसों ने जो पुरुषार्थ किया उन पर सहज विश्वास ही नहीं होता। पर जो आत्मशक्ति की दिव्यचेतना की क्षमता को जानते हैं, उन्हें यह विश्वास करने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती कि टिटहरी का सत्संकल्प समुद्र को सुखाने में अगस्त का सहयोग आमन्त्रित कर सकता है और असम्भव लगने वाला, अण्डे लौटने जैसा कार्य सम्भव हो सकता है।

दूसरों को विनाश दीखता है, सो ठीक है, परिस्थितियों का जायजा लेकर निष्कर्ष निकालने वाली बुद्धि को भी झुठलाया नहीं जा सकता। विनाश की भविष्यवाणियों में सत्य भी है और तथ्य भी। पर हम आभास और विश्वास को क्या कहें। जो कहता है कि समय बदलेगा। घटाटोप की तरह घुमड़ने वाले काले मेघ किसी प्रचण्ड तूफान की चपेट से आकर उड़ते हुए कहीं से कहीं चले जायेंगे।

सघन तमिस्रा का अन्त होगा। ऊषाकाल के साथ उभारता हुआ अरुणोदय अपनी प्रखरता का परिचय देगा। जिन्हें तमिस्रा चिरस्थायी लगती हो, वे अपने ढंग से सोचें, पर हमारा दिव्य दर्शन, उज्ज्वल भविष्य की झाँकी करता है। लगता है इस पुण्य प्रयास में सृजन की पक्षधर देवशक्तियाँ प्राण-पण से जुट गयी हैं। इसी सृजन प्रयास के एक अकिंचन घटक के रूप में हमें भी कुछ कारगर अनुदान प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है। इस सुयोग्य सौभाग्य पर हमें अतीव सन्तोष है और असाधारण आनन्द।




इस जीवन चर्या के गम्भीरता पूर्वक पर्यवेक्षण की आवश्यकता - Akhandjyoti June 1984

जिन्हें भले या बुरे क्षेत्रों में विशिष्ट व्यक्ति समझा जाता है उनकी जीवनचर्या के साथ जुड़े हुए घटनाक्रमों को भी जानने की इच्छा होती है। कौतूहल के अतिरिक्त इसमें एक भाव ऐसा भी होता है, जिसके सहारे कोई अपने काम आने वाली बात मिल सके। जो हो कथा-साहित्य से जीवनचर्याओं का सघन सम्बन्ध है। वे रोचक भी लगती हैं और अनुभव प्रदान करने की दृष्टि से उपयोगी भी होती हैं।

हमारे सम्बन्ध में प्रायः आये दिन लोग ऐसी पूछताछ करते रहे हैं, पर उसे आमतौर से टालते ही रहा गया है क्योंकि उसमें जादू चमत्कार जैसी किंवदंतियों का घटाटोप जुड़ नहीं सकता था और सीधी-सीधी-सी कार्य पद्धति में ऐसा कुछ आकर्षण था नहीं, जिसमें सुनने वाले या सुनाने वाले का उत्साह बढ़े।

पर अब उस वृत्तांत का प्रकटीकरण आवश्यक हो गया है। उसमें कौतूहल व अतिवाद न होते हुए भी वैसा सारगर्भित बहुत कुछ है, जिससे अध्यात्म विज्ञान के वास्तविक स्वरूप और उसके सुनिश्चित प्रतिफल को समझने में सहायता मिलती है। उसका सही रूप विदित न होने के कारण इतनी भ्रान्तियों में फँसते हैं कि भटकाव्य जन्य निराशा से वे श्रद्धा ही खो बैठते हैं और इसे पाखंड मानने लगते हैं। इन दिनों ऐसे प्रच्छन्न नास्तिकों की संख्या अत्यधिक है जिनने कभी उत्साहपूर्वक पूजा पत्री की थी- अब ज्यों-त्यों करके चिन्ह पूजा करते हैं। तो भी अब लकीर पीटने की तरह अभ्यास के वशीभूत हो करते हैं। आनन्द और उत्साह सब कुछ गुम गया। ऐसा असफलता के हाथ लगने के कारण हुआ। उपासना की परिणतियाँ फलश्रुति पढ़ी-सुनी गई थी। उसमें से कोई कसौटी पर खरी नहीं उतरी तो विश्वास टिकता भी कैसे ?

हमारी जीवन गाथा एक प्रकाश स्तम्भ का काम कर सकती है। यह एक बुद्धि जीवी और यथार्थवादी द्वारा अपनाई गई कार्यपद्धति है। छद्म जैसा कुछ उसमें है नहीं। असफलता का लाँछन भी उन पर नहीं लगता। ऐसी दशा में जो गम्भीरता से समझने का प्रयत्न करेगा कि सही लक्ष्य तक पहुँचने का सही मार्ग हो सकता था, शार्टकट के फेर में भ्रम-जंजाल न अपनाये गये होते तो निराशा, खीज ओर थकान हाथ न लगती। तब या तो महंगा समझकर हाथ ही न डाला जाता, यदि पाना ही था तो उसका मूल्य चुकाने का साहस पहले से ही संजोया गया होता। ऐसा अवसर उन्हें मिला नहीं, इसी को दुर्भाग्य कह सकते हैं। यदि हमारी जीवन गाथा पढ़ी गई होती? उसके साथ आदि से अन्त तक गुँथे हुए अध्यात्म तत्व-दर्शन और क्रिया विधान को समझने का अवसर मिला होता तो निश्चय ही प्रच्छन्न भ्रमग्रस्त लोगों की संख्या इतनी न रही होती जितनी अब है।

एक ओर वर्ग है- विवेक दृष्टि वाले यथार्थवादियों का। वे ऋषि परम्परा पर विश्वास करते हैं और सच्चे मन से विश्वास करते हैं कि वे आत्मबल के धनी थे। उन विभूतियों से उनने अपना, दूसरों का और समस्त विश्व का भला किया था। भौतिक विज्ञान की तुलना में जो अध्यात्म विज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं उनकी एक जिज्ञासा यह भी रहती है कि वास्तविक स्वरूप और विधान क्या है? कहने को तो हर कुँजड़ी अपने बैरो को मीठा बताती है पर कथनी पर विश्वास न करने वालों द्वारा उपलब्धियों का जब लेखा-जोखा लिया जाता है तब प्रतीत होता है कि कौन कितने पानी में है।

सही क्रिया, सही लोगों द्वारा, सही प्रयोजनों के लिए अपनाये जाने पर उसका सत्परिणाम भी होना ही चाहिए। इस आधार जिन्हें ऋषि परम्परा के अध्यात्म का स्वरूप समझना हो, उन्हें निजी अनुसंधान करने की आवश्यकता नहीं है। वे हमारी जीवनचर्या को आदि से अन्त तक पढ़ और परख सकते हैं। विगत साठ वर्षों में से प्रत्येक वर्ष इसी प्रयोजन के लिए व्यतीत हुआ है। उसके परिणाम भी खुली पुस्तक की तरह सामने हैं। इन पर गम्भीर दृष्टिपात करने पर यह अनुमान निकल सकता है कि सही परिणाम प्राप्त करने वालों ने सही मार्ग भी अवश्य अपनाया होगा। ऐसा अद्भुत मार्ग दूसरों के लिए भी अनुकरणीय हो सकता है। आत्म विद्या ओर अध्यात्म विज्ञान की गरिमा से जो प्रभावित हैं। उसका पुनर्जीवन देखना चाहते हैं, प्रतिपादनों को परिणतियों की कसौटी पर कसना चाहते हैं, उन्हें निश्चित ही हमारी जीवनचर्या के पृष्ठों का पर्यवेक्षण सन्तोषप्रद और समाधान कारक लग सकता है।

अब तक उस संदर्भ में कभी कोई कहने लायक प्रकाश नहीं डाला गया। अब समय आ गया कि उन रहस्यों का प्रकटीकरण कर दिया जाय। अन्यथा दूसरे लोग रागद्वेष वश उसमें भली बुरी अत्युक्तियों का समावेश कर सकते हैं।

प्रत्यक्ष घटनाओं की दृष्टि से हमारे जीवन क्रम में बहुत विचित्रताएँ एवं विविधताएँ नहीं हैं। कौतुक-कौतूहल व्यक्त करने वाली उछल-कूद एवं जादू-चमत्कारों की भी उसमें गुंजाइश नहीं है। एक सुव्यवस्थित और सुनियोजित ढर्रे पर निष्ठापूर्वक समय कटता रहा है। इसलिए विचित्रताएँ ढूँढ़ने वालों को उसमें निराशा भी लग सकती है पर जो घटनाओं के पीछे काम करने वाले तथ्यों ओर रहस्यों में रुचि लेंगे, उन्हें इतने से भी सनातन अध्यात्म की परम्परागत प्रवाह का परिचय मिल जायेगा और वे समझ सकेंगे कि सफलता, असफलता का कारण क्या है? क्रियाकाण्ड को सब कुछ मान बैठना और व्यक्तित्व के परिष्कार की- पात्रता की प्राप्ति पर ध्यान न देना यही एक कारण है जिसके चलते उपासना क्षेत्र में निराशा छाई और अध्यात्म की उपहासास्पद बनने- बदनाम होने का लाँछन लगा। हमारे क्रिया-कृत्य सामान्य हैं। पर उसके पीछे उस पृष्ठ भूमि का समावेश है जो ब्रह्म तेजस् को उभारती और उसे कुछ महत्वपूर्ण कर सकने की समर्थता तक ले जाती है।

घटनाओं का विवरण आते संक्षिप्त है। पन्द्रह वर्ष तक की आयु का बचपन तथा अध्ययन। इसके बाद चौबीस गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला। स्वतन्त्रता संग्राम आंदोलनों में भागीदारी एवं जेलयात्रा। स्वराज्य के उपरान्त धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण के क्षेत्र में प्रवेश। साहित्य, संगठन, सृजन प्रयोजनों में संलग्नता। संक्षिप्त में इतना भर ही क्रियाकलाप है। उसके भेद-उपभेदों पर प्रकाश डालते हुए उसे विस्तृत भी किया जा सकता है। पर उस घटना परक विस्तार से कौतूहल बढ़ने के अतिरिक्त और कुछ लाभ है नहीं। काम की बात है की इन क्रियाओं के साथ जुड़ी हुई अंतर्दृष्टि और उस आन्तरिक तत्परता का समावेश जो छोटे से बीज की खाद पानी आवश्यकता पूरी करते हुए विशाल वृक्ष बनाने में समर्थ होती रही। वस्तुतः साधक का व्यक्तित्व ही साधना क्रम में प्राण फूँकता है अन्यथा मात्र किया कृत्य खिलवाड़ बनकर रह जाते हैं।

तुलसी का राम, सूर का रहे कृष्ण, चैतन्य का संकीर्तन, मीरा का गायन, रामकृष्ण का पूजन मात्र क्रिया-कृत्यों के कारण सफल नहीं हुआ था। ऐसा औड़म बौड़म तो दूसरे असंख्य करते रहते हैं पर उनके पल्ले विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता। बाल्मीकि ने जीवन बदला तो उल्टा नाम जपने ही मूर्धन्य हो गए। अजामिल, अंगुलिमाल, गणिका, आम्ब्रपाली मात्र कुछ अक्षर दुहराना ही नहीं सीखे थे, उनने अपनी जीवनचर्या को भी अध्यात्म आदर्शों के अनुरूप ढाला था।

आज कुछ ऐसी विडंबना चल पड़ी है कि लोग कुछ अक्षर दुहराने और कुछ क्रिया-कृत्य करने स्तवन उपहार प्रस्तुत करने भर से अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार तो उस आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालने का प्रयत्न नहीं करते जो आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप में आवश्यक है। हमारी साधना पद्धति में इस भूल का समावेश न होने देने का आरम्भ से ही ध्यान रखा गया। अस्तु वह यथार्थ वादी भी है और सर्वसाधारण के लिए उपयोगी भी।




समर्थ गुरु का प्राप्त- अजस्र सौभाग्य - Akhandjyoti June 1984

रामकृष्ण विवेकानन्द को ढूंढ़ते हुए उनके घर गये थे शिवाजी को समर्थ गुरु रामदास ने खोजा था। चाणक्य चंद्रगुप्त को पकड़कर लाये थे। गोखले गान्धी पर सवार हुए थे। हमारे सम्बन्ध में भी यही बात है। मार्गदर्शक सूक्ष्म शरीर से पंद्रह वर्ष की आयु में घर आये थे ओर आस्था जगाकर उन्होंने दिशा विशेष पर लगाया था।

सोचता हूँ कि जब असंख्यों सद्गुरु की तलाश में फिरते ओर धूर्तों से सिर मुड़ाने के उपरान्त खाली हाथ वापस लौटते हैं तब अपनी ही ऐसी क्या विशेषता थी जिसके कारण एक दिव्य शक्ति को बिना बुलाये स्वेच्छापूर्वक घर आना और अनुग्रह बरसाना पड़ा। इसका उत्तर एक ही हो सकता है कि जन्मान्तरों से पात्रता के अर्जन का प्रयास। यह प्रायः जल्दी नहीं हो पाता। व्रतशील होकर लम्बे समय तक कुसंस्कारों के विरुद्ध लड़ना होता है।

संकल्प धैर्य और श्रद्धा का त्रिविध सुयोग अपनाये रहने पर मनोभूमि ऐसी बनती है कि अध्यात्म के दिव्य अवतरण को धारण कर सके। यह पात्रता ही शिष्यत्व है, जिसकी पूर्ति कहीं से भी हो जाती है। समय पात्रता विकसित करने में लगता है, गुरु मिलने में नहीं एकलव्य के मिट्टी के द्रोणाचार्य असली की तुलना में कहीं अधिक कारगर सिद्ध होने लगे थे। कबीर को अछूत होने के कारण जब रामानन्द ने दीक्षा देने से इन्कार कर दिया तो उनने एक युक्ति निकाली। काशी घाट की जिन सीढ़ियों पर से रामानन्द नित्य स्नान के लिए जाया करते थे, उन पर भोर होने से पूर्व ही कबीर जा लेटे रामानंद अंधेरे में निकले तो उनका पैर लड़के के सीने पर पड़ा। चौंके और राम-नाम कहते हुए पीछे हट गये। कबीर ने इसी को दीक्षा संस्कार मान लिया और राम नाम को मन्त्र तथा रामानन्द को गुरु कहने लगे। यह श्रद्धा का विषय है। जब पत्थर की प्रतिमा देवता बन सकती है तो श्रद्धा के बल पर किसी उपयुक्त व्यक्तित्व को गुरु क्यों नहीं बनाया जा सकता? आवश्यक नहीं कि इसके लिए विधिवत् संस्कार कराया ही जाय कान फुकवाये ही जायें।

अध्यात्म प्रयोजनों के लिए गुरु स्तर के सहायक की इसलिए आवश्यकता पड़ती है कि उसे पिता और अध्यापक का दुहरा उत्तरदायित्व निभाना पड़ता है। पिता बच्चे को अपनी कमाई का एक अंश देकर पढ़ने की सारी साधन सामग्री जुटाता है। अध्यापक उसके ज्ञान अनुभव को बढ़ाता है। दोनों के सहयोग से ही बच्चे का निर्वाह और शिक्षण चलता है। भौतिक निर्वाह की आवश्यकता तो पिता भी पूरी कर देता है पर आत्मिक क्षेत्र में प्रगति के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता है उसमें मनःस्थिति के अनुरूप मार्गदर्शन करने तथा सौंपे हुए कार्य को कर सकने के लिए आवश्यक सामर्थ्य गुरु अपने संचित तप भण्डार में से निकालकर हस्तांतरित करता है। इसके बिना अनाथ बालक की तरह शिष्य एकाकी पुरुषार्थ के बलबूते उतना नहीं कर सकता जितना कि करना चाहिए। इसी कारण “गुरु बिनु होहि न ज्ञान” की उक्ति अध्यात्म क्षेत्र में विशेष रूप से प्रयुक्त होती है।

दूसरे लोग गुरु तलाश करते फिरते भी हैं। पर सुयोग्य तक जा पहुंचने पर भी निराश होते हैं। स्वाभाविक है इतनी घोर परिश्रम और कष्ट सहकर की गई कमाई ऐसे ही किसी कुपात्र को विलास संग्रह अहंकार, अपव्यय के लिए हस्तांतरित नहीं की जा सकती। देने वाले में इतनी बुद्धि भी होती है कि लेन वाले की प्रामाणिकता किस स्तर की है और जो दिया जा रहा है उसका उपयोग किस कार्य में होगा। जो लोग इस कसौटी पर खोटे उतरते हैं, उनकी दाल नहीं गलती। इन्हें वे ही लोग मूँडते हैं जिनके पास देने को कुछ नहीं है। मात्र शिकार फँसाकर शिष्य से जिस-बहाने दान, दक्षिणा मूँड़ते रहते हैं। प्रसन्नता की बात है कि इस विडम्बना भरे प्रचलित कुचक्र में हमें नहीं फँसना पड़ा। हिमालय की एक सत्ता अनायास ही घर बैठे मार्गदर्शन के लिए आ गई और हमारा जीवन धन्य हो गया।

हमें इतने समर्थ गुरु अनायास ही कैसे मिले? इस प्रश्न का एक ही समाधान निकलता है कि उसके लिए लम्बे समय से जन्म-जन्मान्तरों में पात्रता अर्जन की धैर्य पूर्वक तैयारी की गई। उतावली नहीं बरती गई। बातों में फँसाकर किसी गुरु की जेब काट लेने जैसी उस्तादी नहीं बरती गई वरन् यह प्रतीक्षा की गई कि अपने गले को किसी पवित्र सरिता में मिलाकर अपनी हस्ती का उसी में समापन किया जाये। किसी भौतिक प्रयोजन के लिए इस सुयोग की ताक-झाँक नहीं की जाये वरन् बार-बार यही सोचा जाता रहे कि जीवन सम्पदा की श्रद्धांजलि किसी देवता के चरणों में समर्पित करके धन्य बना जाय।

दयानन्द ने गुरु विरजानन्द की इच्छानुरूप अपने जीवन का उत्सर्ग किया था विवेकानन्द अपनी सभी इच्छाएँ समाप्त करके गुरु को सन्तोष देने वाले कष्टसाध्य कार्य में प्रवृत्त हुए थे। इसी में सच्ची गुरु भक्ति और गुरु दक्षिणा है। हनुमान ने राम को अपना समर्पण करके प्रत्यक्षतः तो सब कुछ खोया ही था पर परोक्षतः वे सन्त तुल्य ही बन गये थे ओर वह कार्य करने लगे थे जो राम के ही बलबूते के थे। समुद्र छलाँगना पर्वत उखाड़ना, लंका जलाना बेचारे हनुमान नहीं कर सकते थे। वे तो अपने स्वामी सुग्रीव को बाली के अत्याचार तक से छुड़ाने में समर्थ नहीं हो सके थे। समर्पण ही था जिसने एकात्मता उत्पन्न कर दी। गंदे नाले में थोड़ा गंगाजल गिर पड़े तो वह भी गन्दगी बन जायेगा किन्तु यदि बहती हुई गंगा में थोड़ी गन्दगी जा मिले तो फिर उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। जो बचेगा मात्र गंगाजल ही होगा। जो स्वयं समर्थ नहीं हैं वे भी समर्थों के प्रति समर्पित होकर उन्हीं के समतुल्य बन गये हैं। ईंधन जब आग से लिपट जाता है तो फिर उसकी हेय स्थिति नहीं रहती वरन् अग्नि के समान प्रखरता आ जाती है। वह तद्रूप हो जाता है।

श्रद्धा का केन्द्र भगवान है और प्राप्त भी उसी को करना पड़ता है पर उस अदृश्य के साथ सम्बन्ध जोड़ने के लिए किसी दृश्य प्रतीक का सहारा लेना आवश्यक होता है। इस कार्य को देव प्रतिमाओं के सहारे भी सम्पन्न किया सकता है और देहधारी गुरु यदि इस स्तर का है तो भी उस आवश्यकता की पूर्ति करा सकता है।

हमारे यह मनोरथ अनायास ही पूरे हो गये। अनायास इसलिए कि उसके लिए पिछले जन्मों से पात्रता उत्पन्न करने की पृथक साधना आरम्भ कर दी गई थी। कुण्डलिनी जागरण, ईश्वर दर्शन स्वर्ग मुक्ति तो बहुत पीछे की वस्तु है। सबसे प्रथम देवी अनुदानों को पा सकने की क्षमता अर्जित करनी पड़ती है। अन्यथा जो वजन न उठ सके, जो भोजन न पच सके वह उलटे और भी बड़ी विपत्ति खड़ी करता है।

प्रथम मिलन के दिन समर्पण सम्पन्न हुआ और उसके सच्चे झूठे होने की परीक्षा भी तत्काल ही चल पड़ी। दो बातें कही गईं। “संसारी लोग क्या करते और क्या कहते हैं उसकी ओर से मुँह मोड़कर निर्धारित लक्ष्य की ओर एकाकी साहस के बलबूते चलते रहना। दूसरा यह है कि अपने को अधिक पवित्र और प्रखर बनाने के लिए तपश्चर्या में जुट जाना। चौबीस वर्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण के साथ जौ की रोटी और छाछ पर निर्वाह करने का अनुशासन रखा। सामर्थ्य विकसित होते ही वह सब कुछ मिलेगा जो अध्यात्म मार्ग के साधकों को मिलता है। किन्तु मिलेगा विशुद्ध परमार्थ क लिए। तुच्छ स्वार्थों की सिद्धी में उन दैवी अनुदानों को प्रयुक्त न किया जा सके।” वह बसन्त पर्व का दिन था। इस गुरु अनुशासन का अवधारण ही हमारे लिए नया जन्म बन गया। याचकों की कमी नहीं पर सत्पात्रों पर सब कुछ लुटा देने वाले सहृदयों की भी कमी नहीं। कृष्ण ने सुदामा पर सब कुछ जो लुटा दिया था। सद्गुरु की प्राप्ति हमारे जीवन का अनन्य एवं परम सौभाग्य रहा।




उपासना की दिशा में बढ़ते चरण - Akhandjyoti June 1984

जीवन धारण के लिए अन्न, वस्त्र और निवास की आवश्यकता पड़ती है। साहित्य सृजन के लिए कलम, स्याही और कागज चाहिए। फसल उगाने के लिए बीज और खाद-पानी का प्रबन्ध करना है। यह तीनों ही अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। उनमें एक की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। आत्मिक प्रगति के लिए उपासना, साधन और आराधना इन दोनों के समान समन्वय की आवश्यकता पड़ती है। इनमें से किसी अकेले के सहारे लक्ष्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। कोई एक भी ऐसा नहीं है जिसे छोड़ा जा सके।

भूल यह होती रही है कि जो पक्ष इनमें सबसे गौण है से “पूजापाठ” की उपासना मान लिया गया और उतने पर ही आदि अन्त कर लिया गया। पूजा का अर्थ है हाथों तथा वस्तुओं द्वारा की गई मनुहार, दिये गये छुटपुट उपचार उपहार। पाठ का अर्थ है- प्रशंसा परक ऐसे गुणगान जिसमें अत्युक्तियाँ ही भरी पड़ी है। समझा जाता है कि ईश्वर या देवता कोई बहुत छोटे स्तर के हैं, उन्हें प्रसाद, नैवेद्य, नारियल, इलायची जैसी वस्तुएँ कभी मिलती नहीं। पावेंगे तो फूलकर कुप्पा हो जायेंगे। जागीरदारों की तरह प्रशंसा सुनकर चरणों को निहाल कर देने की उनकी आदत है। ऐसी मान्यता बनाने वाले देवताओं के स्तर एवं बड़प्पन के संबंध में सर्वथा बेखबर होते और बच्चों जैसा नासमझ समझते हैं, जिन्हें इन्हीं खिलवाड़ों में फुसलाया, बरगलाया जा सकता है। मनोकामना पूरी करने के लिए उन्हें लुभाया जा सकता है। भले ही वे उचित हों अथवा अनुचित। न्याय संगत हो या अन्याय पूर्ण। आम आदमी इसी भ्रान्ति का शिकार है। तथाकथित भक्तजनों में से कुछ सम्पदा पाना या सफलता माँगते हैं, कुछ स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि की फिराक में रहते हैं। कइयों पर ईश्वर दर्शन का भूत चढ़ा रहता है। माला घुमाने ओर अगरबत्ती जलाने वालों में से अधिकतर संख्या ऐसे ही लोगों की है। मोटे अर्थों में उपासना उतने तक ही सीमित समझी जाती है। जो इस विडंबना में से जितना अंश पूरा कर लेते हैं। वे अपने को भक्तजन समझने का नखरा करते हैं और बदले में भगवान ने उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति नहीं की तो हजार गालियाँ सुनाते हैं। कई इससे भी सस्ता नुस्खा ढूँढ़ते हैं। वे प्रतिमाओं की सन्तों की दर्शक झाँकी करने भर से ही यह मानने लगते हैं कि इस अहसान के बदले यह लोग झकमार कर अपना मनोरथ पूरा करेंगे।

बुद्धिहीन स्तर की कितनी ही मान्यताएँ समाज में प्रचलित हैं। लोग उन पर विश्वास भी करते और अपनाते भी हैं। उन्हीं में से एक यह भी है कि आत्मिक क्षेत्र की उपलब्धियों के लिए दर्शन-झाँकी या पूजा पाठ जैसा नुस्खा अपना लेने भर से काम चल जाना चाहिए। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। यदि होता तो मन्दिरों वाली भीड़ और पूजापाठ वाली मण्डली अब तक कब की आसमान के तारे तोड़ लाने में सफल हो गई होती।

समझा जाना चाहिए कि जो वस्तु जितनी महत्वपूर्ण है, उसका मूल्य भी उतना ही अधिक होना चाहिए। प्रधानमन्त्री के दरबार का सदस्य बनने के लिए पार्लियामेंट का चुनाव जीतना चाहिए। उपासना का अर्थ है पास बैठना। यह वैसा नहीं है जैसा कि रेलगाड़ी के मुसाफिर एक-दूसरे पर चढ़ बैठते हैं। वरन् वैसा है जो कि दो घनिष्ठ मित्रों को दो शरीर एक प्राण होकर रहना पड़ता है। सही समीपता ऐसे ही गम्भीर अर्थों में ली जानी चाहिए। समझा जाना चाहिए कि इसमें किसी को किसी के लिए समर्पण करना होगा। चाहे तो भगवान अपने नियम, विधान, मर्यादा, अनुशासन छोड़कर किसी भजनानन्दी के पीछे-पीछे नाक में नकेल डालकर फिरें और जो कुछ भला-बुरा वह निर्देश करे, उसकी पूर्ति करता रहे। अन्यथा दूसरा उपाय यही है कि भक्त को अपना जीवन भगवान की मर्जी के अनुरूप बनाने के लिए आत्मसमर्पण करना होगा।

हमें हमारे मार्गदर्शक ने जीवनचर्या को आत्मोत्कर्ष के त्रिविधि कार्यक्रमों में नियोजित करने के लिए सर्वप्रथम उपासना का तत्वदर्शन और स्वरूप समझाया। कह- “भगवान तुम्हारी मर्जी पर नहीं नाचेगा। तुम्हें भी भगवान का भक्त बनना और उसके संकेतों पर चलना पड़ेगा। ऐसा कर सकोगे तो तद्रूप होने का लाभ प्राप्त करोगे।”

उदाहरण देते हुए उनने समझाया कि “ईश्वर की हस्ती दो कौड़ी की होती है। पर जब वह अग्नि के साथ जुड़ जाता है तो उसमें सारे गुण अग्नि के आ जाते हैं। आग ईंधन नहीं बनती ईंधन को आग बनना पड़ता है। नाला नदी में मिलकर वैसा ही पवित्र और महान बन जाता है पर ऐसा नहीं होता कि नदी उलट कर नाले में मिले और वैसी ही गन्दी बन जाये। पारस को छूकर लोहा सोना होता है। लोहा पारस नहीं बनता। किसी भक्त का यह आशा करना कि भगवान उसके इशारों पर नाचने के लिए सहमत हो जाएगा। आत्म प्रवंचना भर है। भक्त को ही भगवान के संकेतों पर कठपुतली की तरह नाचना पड़ता है। भक्त की इच्छायें भगवान पूरी नहीं करते। वरन् भगवान की इच्छा पूरी करने के लिए भक्त को आत्म-समर्पण करना पड़ता है। बूँद को समुद्र में घुलना पड़ता है। समुद्र बूँद में नहीं बनता। यही है उपासना का एकमात्र तत्वदर्शन। जो भगवान के समीप बैठना चाहे, वह उसी का निर्देशन अनुशासन स्वीकार करे। उसी का अनुयायी सहयोगी बने।”

हमें ऐसा ही करना पड़ा है। भगवान की उपासना गायत्री माता की जप और सविता पिता का ध्यान करते हुए करते रहे। भावना एक ही रखी है कि श्रवणकुमार की तरह आप दोनों को तीर्थ यात्रा कराने के आदर्श का परिपालन करेंगे। आपसे कुछ माँगेंगे नहीं। आपके सच्चे पुत्र कहला सकें, ऐसा व्यक्तित्व ढालेंगे। आपकी निकृष्ट सन्तान जैसी बदनामी न होने देंगे।

ध्यान की सुविधा के लिए गायत्री को माता और सविता को पिता माना तो सही पर साथ ही यह भी अनुभव किया कि वे सर्वव्यापक ओर सूक्ष्म हैं। इसी मान्यता के कारण उनको अपने रोम में और अपनी उनकी हर तरंग में घुल सकना सम्भव हो सका। मिलन का आनन्द इससे कम में आता ही नहीं। यदि उन्हें व्यक्ति विशेष माना होता तो दोनों के मध्य अन्तर बना ही रहता ओर घुलकर आत्मसात होने की अनुभूति होने में बाधा ही बनी रहती।

अभ्यास के लिए आरम्भिक चरणों में अपने को बेल भगवान को वृक्ष मानकर उनके साथ लिपटते हुए उतनी ही ऊँचाई तक जा पहुँचने की मान्यता ठीक है। इसी प्रकार अपने को वंशी और भगवान को वादक मानकर उनके द्वारा अनुशासित अनुप्राणित किये जाने का ध्यान भी सुविधाजनक पड़ता है। बच्चे के हाथ में डोरी और उसके इशारे पर पतंग के आकाश तक उड़ते जाने का ध्यान भी उत्साहवर्धक है। यह तीनों ही ध्यान हमने समय-समय पर किये हैं और उनसे उत्साहवर्धक अनुभूतियाँ प्राप्त की हैं पर सबसे सुखद ओर प्राणवान अनुभूति एकाकार अनुभव में हुई है। पतंगे का दीपक पर आत्म-समर्पण करना- पत्नी का पति के हाथों अपना शरीर, मन और धन वैभव सौंप देना भक्त को भगवान के साथ तादात्म्य मिलाने का एक अच्छा अनुभव है। उपासना काल में इन्हीं कृत्यों को अपनाते हुए जप ओर ध्यान की प्रक्रिया पूरी करते रहा गया है।

हमारी उपासना क्रिया प्रधान नहीं, श्रद्धा प्रधान रही है। निर्धारित जप संख्या को पूरा करने का अनुशासन कठोरतापूर्वक पाला गया है। प्रातः एक बजे उठ बैठने और निर्धारित संकल्प को पूरा करने में कभी कदाचित ही आपत्तिकाल में भूल हुई हो। जो कमी पड़ी है उसकी अगले दिनों पूर्ति कर ली गई। उपेक्षा में नहीं डाला गया इतने पर भी उस अवधि में भावनाओं से ओत-प्रोत रहने की मनःस्थिति बनाये रहने का अभ्यास किया गा है ओर वह सफल भी होता रहा है। समर्पण, एकता, एकात्मता, अद्वैत की भावनाओं का अभ्यास आरम्भ में कल्पना के रूप में किया गया था। पीछे वह मान्यता बन गई और अन्त में अनुभूति प्रतीत होने लगी।

गायत्री माता की सत्ता कारण शरीर में श्रद्धा- सूक्ष्म शरीर में प्रज्ञा और स्थूल शरीर में निष्ठा बनकर प्रकट होने लगी। यह मात्र कल्पना ही तो नहीं है। इसके लिए बार-बार कठोर आत्म-परीक्षण किया जाता रहा। देखा कि आदर्श जीवन के प्रति- समष्टि के प्रति अपनी श्रद्धा बढ़ रही है या नहीं। इनके लिये प्रलोभनों और दबावों से इन्कार कर सकने की स्थिति है या नहीं। समय-समय पर घटनाओं के साथ जोड़कर भी परख की गई और पाया गया कि भावना परिपक्व हो गई है। उसने अपनी स्वस्थ साधन श्रद्धा का वैसा ही बना लिया जैसा कि ऋषि कल्प साधक बनाया करते थे।

गायत्री माता मात्र स्त्री शक्ति के रूप में छवि दिखाती हैं। अब प्रज्ञा बनकर विचार संस्थान पर आच्छादित हो चलीं। इसका जितना बन पड़ा विश्लेषण किया जाता रहा। अनेक प्रसंगों पर हमने परखा भी है कि समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी के रूप में प्रज्ञा का समन्वय आत्म चेतना की गहराई तक हुआ या नहीं। यदि पक्षपात की चूक न हुई हो तो प्रतीत होता रहा है कि भाव चेतना में प्रज्ञा के रूप में गायत्री माता का अवतरण हुआ है और उनकी उपासना, ध्यान धारणा फलवती हो चली है। मान्यता का गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तित होना यही तो उपासनात्मक धारणा की परख है।

त्रिपदा गायत्री का तीसरा स्वरूप है- निष्ठा। निष्ठा अर्थात् धैर्य, साहस, पराक्रम, तप, कष्ट सहन। जिस प्रकार आंवे से निकले बर्तन को उँगली से ठोंक-ठोंक कर देखा जाता है कि यह फूटा तो नहीं है, उसी प्रकार प्रलोभन और मय के प्रसंगों पर दृढ़ता डगमगाई तो नहीं, यह क्रिया और भावना की दृष्टि से जाँच-पड़ताल की जाती रही। पाया कि प्रगति रुकी नहीं है। हर कदम क्रमशः आगे ही बढ़ता रहा है।

सविता का तेजस्- ब्रह्मवर्चस् कहलाता है। उसी को ओजस्, तेजस्, मनस् वर्चस् कहते हैं। पवित्रता, प्रखरता और प्रतिभा के रूप में इसका प्रत्यक्ष परिचय मिलता है। सविता के आलोक के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर प्रवेश की विधि पहले ही ऐसा अनुभव कराती रही कि शरीर में बल, मस्तिष्क में ज्ञान और हृदय में भाव साहस भर रही है। पीछे अनुभव होने लगा कि अपनी समूची सत्ता ही अग्नि पिण्ड के- ज्योति पिण्ड के समान बन गई है। नस-नस में कण-कण में अमृत संव्याप्त हो रहा है। सोमरस पान जैसी तृप्ति, तुष्टि, शान्ति का आनन्द मिल रहा है।

संक्षेप में यही है- हमारी चार घण्टा नित्य की नियमित उपासना का उपक्रम। यह समय ऐसी अच्छी तरह कटता रहा है, मानों आधे घण्टे में ही समाप्त हो गया, कभी न ऊब आई, न थकान, न जम्हाई। हर घड़ी नसों में आनन्द का संचार होता रहा और ब्रह्म सान्निध्य का अनुभव होता रहा। यह सहज सरल स्वाभाविक प्रक्रिया चलती रही है। न कहीं गणना करनी पड़ी, न कभी गर्व हुआ, न प्रमाण की अपेक्षा मन में उठी। जिस प्रकार दिनचर्या के अन्य कार्य सहज सरल हो जाते हैं, उसी प्रकार भगवान के पास बैठना भी एक ऐसा कार्य है, जिसे किये बिना अब हमारे लिए एक दिन बिताना तक सम्भव नहीं है। नियत घन्टे तो उपासना के ऐसे हैं जैसे नशा पीने, ताड़ी खाने में जाने का, जो पिया है, उसकी खुमारी तो चौबीस घन्टे बनी रहती है। अपने को भगवान में और भगवान को अपने में अनुभव करते हुए क्षण गुजरते रहते हैं।

इस मनःस्थिति में अब उतार-चढ़ाव की परिस्थितियाँ भी सरल स्वाभाविक लगती हैं। न हर्ष होता है- न शोक। चारों ओर आनन्द का समुद्र जैसा लहराता दीखता है।

जिधर भी देखते हैं- भगवान दीखता है। आगे भी- पीछे भी- जिधर चलते हैं, वह साथ ही चलता है। बाडीगार्ड की तरह पायलट की तरह उसकी उपस्थिति हर घड़ी परिलक्षित होती रहती है। समुद्र तो बूँद नहीं बन सकता। हर बूँद के समुद्र बन जाने की अनुभूति में अब कोई सन्देह भी नहीं रह गया है। उसकी उपस्थिति में न निश्चिंतता की कमी है न निर्भयता की।

आत्मा को परमात्मा से मिला देने वाली जिस श्रद्धा को लम्बे जीवन काल में संजोया गया है, वह अब साक्षात भगवती की तरह अपनी उपस्थिति और अनुभूति का परिचय देती रहती है।




जीवन साधना जो असफल नहीं हुई - Akhandjyoti June 1984

बालक की तरह मनुष्य सीमित है। उसे असीम क्षमता उसके सुसम्पन्न सृजेता भगवान से उपलब्ध होती है पर यह सशर्त है। छोटे बच्चे वस्तुओं का सही उपयोग नहीं जानते, न उसकी संभाल रख सकते हैं। इसलिए उन्हें दुलार में जो मिलता है, हलके दर्जे का होता है, गुब्बारे, झुनझुने, सीटी, लेमनचूस स्तर की विनोद वाली वस्तुएँ ही माँगी और पाई जाती हैं। प्रौढ़ होने पर लड़का घर की जिम्मेदारियाँ समझता और निबाहता है। फलतः बिना माँगे उत्तराधिकार का हस्तान्तरण होता जाता है। इसके लिए प्रार्थना याचना नहीं करनी पड़ती। न दाँत निपोरने पड़ते हैं और न नाक रगड़नी पड़ती है। जितना हमें माँगने में उत्साह है, उससे हजार गुना देने में उत्साह भगवान को और महामानवों को होता है। कठिनाई एक अड़ती है “सदुपयोग कर सकने की पात्रता विकसित हुई या नहीं?”

इस संदर्भ में भविष्य के लिए झूठे वायदे करने से कुछ काम नहीं चलता। प्रमाण यह देना पड़ता है कि अब तक जो हाथ में था उसका उपयोग वैसा होता रहा है। “हिस्ट्रीशीट” इसी से बनती है और प्रमोशन में यह पिछला विवरण ही काम आता है। हमें पिछले कई जन्मों तक अपनी पात्रता और प्रामाणिकता सिद्ध करनी पड़ती है। जब बात पक्की हो गई तो ऊँचे क्षेत्र से अनुग्रह का सिलसिला अपने आप ही चल पड़ा।

सुग्रीव, विभीषण, सुदामा, अर्जुन आदि ने जो पाया- जो कर दिखाया वह उनके अपने पराक्रम का फल नहीं था, उसमें ईश्वर की सत्ता और महत्ता काम करती रही है। बड़ी नदी के साथ जुड़ी रहने पर नहरें और नहरों के साथ जुड़े हुए रजवाहे खेतों को पानी देते रहते हैं। यदि एक सूत्र में कहीं गड़बड़ी उत्पन्न होगी तो अवरोध खड़ा होगा और सिलसिला टूटेगा। भगवान के साथ मनुष्य अपने सुदृढ़ सम्बन्ध सुनिश्चित आधारों पर ही बनाये जा सकता। उसमें चापलूसी जैसी कोई गुंजाइश नहीं है। भगवान को किसी से न निजी मित्रता है न शत्रुता वे नियमों से बँधे हैं। समदर्शी हैं।

हमारी व्यक्तिगत क्षमता सर्वथा नगण्य है। प्रायः जन साधारण के समान ही उसे समझा जा सकता है। जो कुछ अतिरिक्त दीखता है या बन पड़ता है, उसे विशुद्ध दैवी अनुग्रह समझा जाना चाहिए। वह सीधा कम और मार्ग दर्शक के माध्यम से अधिक आता रहा है। पर इससे कुछ अन्तर नहीं आता। धन बैंक का है। भले ही वह नकदी के रूप में, चैक, ड्राफ्ट आदि के माध्यम से मिला हो।

यह दैवी उपलब्धि किस प्रकार सम्भव हुई। इसका एक ही उत्तर है- पात्रता का अभिवर्धन। उसी का नाम जीवन साधना है। उपासना के साथ उसका अनन्य एवं घनिष्ठ सम्बन्ध है। बिजली धातु में दौड़ती है, लकड़ी में नहीं। आग सूखे को जलाती है गीले को नहीं। माता बच्चे को गोदी तब लेती है जब वह साफ सुथरा हो। मल, मूत्र से सना हो तो पहले उसे धोएगी, पोंछेगी। इसके बाद ही गोदी में लेने और दूध पिलाने की बात करेगी।

भगवान की समीपता के लिए शुद्ध चरित्र आवश्यक है। कई व्यक्ति पिछले जीवन में तो मलीन रहे हैं, पर जिस दिन से भक्ति की साधना अपनाई, उस दिन से अपना कायाकल्प कर दिया। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, विल्व मंगल, अजामिल आदि पिछले जीवन में कैसे ही क्यों न रहे हों, जिस दिन से भगवान की शरण में आये, उस दिन से सच्चे अर्थों में सन्त बन गये। हम लोग “राम-नाम जपना पराया माल अपना की नीति अपनाते हैं। कुकर्म भी करते रहते हैं, पर साथ ही भजन-पूजन के सहारे उनके दण्ड से छूट मिल जायेगी, ऐसा भी सोचते रहते हैं। यह कैसी विडम्बना है।

कपड़े को रंगने से पूर्व धोना पड़ता है। बीज बोने से पूर्व जमीन जोतनी पड़ती है। भगवान का अनुग्रह अर्जित करने के लिए भी शुद्ध जीवन की आवश्यकता है। साधक ही सच्चे अर्थों में उपासक हो सकता है। जिससे जीवन साधना नहीं बन पड़ी, उसका चिन्तन, चरित्र, आहार, विहार मस्तिष्क अवाँछनीयताओं से भरा रहेगा। फलतः मन लगेगा ही नहीं। लिप्साएं और तृष्णायें जिसके मन को हर घड़ी उद्विग्न किये रहती हैं, उससे न एकाग्रता सधेगी और न चित्त की तन्मयता आयेगी। कर्मकाण्ड की चिन्ह पूजा भर से कुछ बात बनती नहीं। भजन का भावनाओं से सीधा सम्बन्ध है। जहाँ भावनाएं होंगी, वहाँ मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव में सात्विकता का समावेश अवश्य करेगा।

सम्भ्रान्त मेहमान घर में आते हैं, कोई उत्सव होते हैं तो घर की सफाई पुताई करनी पड़ती है। जिस हृदय में भगवान को स्थान देना है, उसे कषाय-कल्मषों से स्वच्छ किया जाना चाहिए। इसके लिये आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की चारों ही दशा धाराओं में बढ़ना आवश्यक है। इन तथ्यों को हमें भली प्रकार समझाया गया। सच्चे मन से उसे हृदयंगम भी किया गया। सोचा गया कि आखिर गर्हित जीवन बनता क्यों है? निष्कर्ष निकाला कि इन सभी के उद्गम केन्द्र तीन हैं- लोभ, मोह ओर अहंकार। जिसमें इनकी जितनी ज्यादा मात्रा होगी, वह उतना ही अवगति की ओर घिसटता चला जाएगा।

क्रियाएँ वृत्तियों से उत्पन्न होती हैं। शरीर मन के द्वारा संचालित होता है। मन में जैसी उमंगें उठती हैं, शरीर वैसी ही गतिविधियां अपनाने लगता है। इसलिए अवाँछनीय कृत्यों- दुष्कृत्यों के लिए शरीर को नहीं मन को उत्तरदायी समझा जाना चाहिए। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए विष वृक्ष की जड़ काटना उपयुक्त समझा गया और जीवन साधना को आधार भूत क्षेत्र मन से ही आरम्भ किया गया।

देखा गया है कि अपराध प्रायः आर्थिक प्रलोभनों या आवश्यकताओं के कारण होते हैं। इसलिए इनकी जड़ें काटने के लिए औसत भारतीय स्तर का जीवन-यापन अपनाने का व्रत लिया गया। अपनी निज की कमाई ही क्यों न हो, भले ही वह ईमानदारी या परिश्रम की क्यों न हो पर उसमें से अपने लिए परिवार के लिए खर्च देशी हिसाब से किया जाय, जिससे कि औसत भारतीय गुजारा करना सम्भव हो। यह सौदा जीवन उच्च विचार का व्यावहारिक निर्धारण है। सिद्धांततः कई लोग इसे पसन्द करते हैं और उसका समर्थन भी। पर जब अपने निज के जीवन में इसका प्रयोग करने का प्रश्न आता है तो उसे असम्भव कहने लगते हैं। ऐसा निर्वाह व्रतशील होकर ही निवाहा जा सकता है। साथ ही परिवार वालों को इसके लिए सिद्धांततः और व्यवहारतः तैयार करना पड़ता है। इस संदर्भ में सबसे बड़ी कठिनाई लोक प्रचलन की आती है। जब सभी लोग ईमानदारी-बेईमानी की कमाई से गुलछर्रे उड़ाते हैं तो हम लोग ही अपने ऊपर ऐसा अंकुश क्यों लगायें? इस प्रश्न पर परिजनों और उनके पक्षधर रिश्तेदारों को सहमत करना बहुत कठिन पड़ता है। फिर भी यदि अपनी बात तर्क, तथ्य और परिणामों के सबूत देते हुए ठीक तरह प्रस्तुत की जा सके, और अपने निज का मन दृढ़ हो तो फिर अपने समीपवर्ती लोगों पर कुछ भी असर न पड़े, ऐसा नहीं हो सकता। आर्थिक अनाचारों की जड़ काटनी है तो यह कार्य इसी स्तर के लोक शिक्षण एवं प्रचलन से सम्भव होगा। उस विश्वास के साथ अपनी बात पर दृढ़ रहा गया। “अखण्ड-ज्योति” घीया मण्डी में अपना परिवार पाँच सदस्यों का था। तब उसका औसत खर्च 200 रु. मासिक बनाये रखा गया। मिल-जुलकर, मितव्ययितापूर्वक लोगों से भिन्न अपना अलग स्तर बना लेने के कारण यह सब मजे में चलता रहा। यों आजीविका अधिक थी। पैतृक संपत्ति से पैसा आता था। पर उसका व्यय घर में अन्य सम्बन्धी परिजनों के बच्चे बुलाकर उन्हें पढ़ाते रहने का नया दायित्व ओढ़कर पूरा किया जाता रहा। दुर्गुणों-दुर्व्यसनों के पनपने लायक पैसा बचने ही नहीं दिया गया और जीवन साधना का एक महत्वपूर्ण पक्ष सरलतापूर्वक निभता रहा।

मोह परिवार को सजाने, सुसम्पन्न बनाने, उत्तराधिकार में सम्पदा छोड़ मरने का होता है। लोग स्वयं विलासी जीवन जीते हैं और वैसी ही आदतें बच्चों को भी डालते हैं। फलतः अपव्यय का सिलसिला चल पड़ता है और अनीति कमाई के लिए अनाचारों के विषयों में सोचना और प्रयास करना होता है। दूसरों के पतन अनुभव से लाभ उठाया गया और उस चिन्तन तथा प्रचलन का घर में प्रवेश नहीं होने दिया गया। इस प्रकार अपव्यय भी नहीं हुआ, दुर्गुण भी नहीं बढ़े- कुप्रचलन भी नहीं चला, सुसंस्कारी परिवार विकसित होता चला गया।

तीसरा पक्ष अहंता का है। शेखीखोरी, बड़प्पन ठाठ-वाट, राजधन फैशन आदि में लोग ढेरों समय और धन खर्च करते हैं। निजी जीवन तथा परिवार में नम्रता और सादगी का ऐसा ब्राह्मणोचित माहौल बनाये रखा गया कि अहंकार के प्रदर्शन की कोई गुँजाइश नहीं थी। हाथ से घरेलू काम करने की- आदत अपनाई गई। माताजी ने मुद्दतों हाथ से चक्की पीसी है। घर का तथा अतिथियों का भोजन तो वे मुद्दतों बनाती रही हैं। घरेलू नौकर की आवश्यकता तो तब पड़ी जब बाहरी कामों का असाधारण विस्तार होने लगा और उनमें व्यस्त रहने के कारण माताजी का उनमें समय दे सकना सम्भव नहीं रह गया।

यह अनुमान गलत निकला कि ठाठ-वाट से रहने वालों को बड़ा आदमी समझा जाता है और गरीबी से गुजारा करने वाले उद्विग्न, अभागे, पिछड़े पाए जाते हैं। हमारे सम्बन्ध में यह बात कभी लागू नहीं हुई। आलस्य ओर अयोग्यतावश गरीबी अपनाई गई होती तो अवश्य वैसा होता पर स्तर उपार्जन योग्य होते हुए भी यदि सादगी का हर पक्ष स्वेच्छापूर्वक अपनाया गया है तो उसमें सिद्धान्तों का परिपालन ही लक्षित होता है। जो भी अतिथि आये- जिन भी मित्र सम्बन्धियों को रहन सहन का पता चलता रहा उनमें से किसी ने भी इसे दरिद्रता नहीं कहा वरन् ब्राह्मण परम्परा का निर्वाह ही माना। मिर्च न खाने, खड़ाऊ पहनने जैसे एकाध उपकरण सादगी के नाम पर अपनाकर लोग सात्विकता का विज्ञापन भर करते हैं। वस्तुतः आध्यात्मिकता निभती है सर्वतोमुखी संयम और अनुशासन से। उसमें समग्र जीवनचर्या को ब्राह्मण जैसी बनाना पड़ता है और उसके लिए मन को आदर्शों के प्रति निष्ठावान बनाने एवं अभ्यास में उतारने के लिये सहमत करना होता है। यह लम्बे समय की और क्रमिक साधना है। हमने इसके लिए अपने को साधा और जो भी अपने साथ जुड़े रहे उन्हें यथा सम्भव सधाया।

संचित कुसंस्कारों का दौर हर किसी पर चढ़ता रहता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर अपनी उपस्थिति का परिचय देते रहे पर उन्हें उभरते ही दबोच दिया गया। बेखबर रहने, दर-गुजर करने से ही वे पनपने और कब्जा जमाने में सफल होते हैं। वैसा अवसर जब-जब आया उन्हें खदेड़ दिया गया। गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का ध्यान रखा गया कि इनमें साधक के अनुरूप सात्विकता का समावेश है या नहीं। सन्तोष की बात है कि इस आंतरिक महाभारत को जीवन भर लड़ते रहने का करण अब चलते समय अपने को विजयी घोषित कर सकें।

जन्मतः भी अनगढ़ होते हैं। जन्म-जन्मान्तरों के कुसंस्कार सभी पर न्यूनाधिक मात्रा में लदे होते। वे अनायास ही हट या भग नहीं जाते। गुरु कृपा या पूजा पाठ से भी वह प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। उनके समाधान का एक ही उपाय है- जूझना। जैसे ही कुविचार उठें उनके प्रतिपक्षी सद्विचारों की सेना को पहले से ही प्रशिक्षित कटिबद्ध रखा जाय और विरोधियों से लड़ने के लिए छोड़ दिया। जड़ जमाने का अवसर न मिले तो कुविचार या कुसंस्कार बहुत समय तक ठहरते नहीं। उनकी सामर्थ्य स्वल्प होती है। वे आदतें और प्रचलनों पर निर्भर रहते हैं, जबकि सद्विचारों के पीछे तर्क, तथ्य प्रमाण, विवेक आदि अनेकों का मजबूत समर्थन रहता है। इसलिए शास्त्रकार की उक्ति ऐसे अवसरों पर सर्वथा खरी उतरती है जिसमें कहा गया है कि “सत्य ही जीतता है असत्य नहीं।” इसी बात को यों भी कहा जाता है कि परिपक्व किए गए सुसंस्कार ही जीतते हैं, आधार रहित कुसंस्कार नहीं। जब सरकस के रीछ वानरों को आश्चर्य जनक कौतुक, कौतूहल दिखाने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि अनगढ़ मन और जीवन क्रम को संकल्पवान साधना के हण्टर से सुसंस्कारी न बनाया जा सके।




आराधना जिसे निरन्तर अपनाये रहा गया - Akhandjyoti June 1984

गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलने से त्रिवेणी संगम बनने और उसमें स्नान करने वाले का काया-कल्प होने की बात कही गई है। बगुले का हंस और कौए का कोयल आकृति में बदल जाना तो सम्भव नहीं पर इस आधार पर विनिर्मित हई अध्यात्म धारा का अवगाहन करने से मनुष्य का अन्तरंग और बहिरंग जीवन असाधारण रूप से बदल सकता है, यह निश्चित है। यह त्रिवेणी उपासना साधना और आराधना के समन्वय से बनती है। यह तीनों कोई क्रियाकाण्ड नहीं है, जिन्हें इतने समय में, इस विधि से इस प्रकार बैठकर सम्पन्न करते रहा जा सके। यह चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में होने वाले उच्च स्तरीय परिवर्तन हैं। जिनके लिए अपनी शारीरिक और मानसिक गतिविधियों पर निरन्तर ध्यान देना पड़ता है। दुरितों के संशोधन में प्रखरता का उपयोग करना पड़ता है और नई दिशाधारा में अपने गुण कर्म, स्वभाव को इस प्रकार अभ्यस्त करना पड़ता है जैसे अनगढ़ पशु−पक्षियों को सरकस के करतब दिखाने के लिए जिस-तिस प्रकार प्रशिक्षित किया जाता है। पूजा कुछ थोड़े समय की हो सकती है, पर साधना तो ऐसी है जिसके लिए गोदी के बच्चे को पालने के लिए निरन्तर ध्यान रखना पड़ता है। फलवती भी वही होती है। जो लोग पूजा को बाजीगरी समझते हैं और जिस-तिस प्रकार क्रिया-कृत्य करने भर के बदले ऋद्धि-सिद्धियों के दिवास्वप्न देखते हैं, वे भूल करते हैं।

हमारे मार्गदर्शक ने प्रथम दिन ही त्रिपदा गायत्री का व्यवहार स्वरूप, उपासना, साधना, आराधना के रूप में भली प्रकार बता दिया था। नियमित जप-ध्यान करने का अनुबंधों समेत पालन करने के निर्देशन के अतिरिक्त यह भी बताया था कि चिन्तन में उपासना- चरित्र में साधना और व्यवहार में आराधना का समावेश करने में पूरी-पूरी सतर्कता और तत्परता बरती जाय। उस निर्देशन का अद्यावधि यथासम्भव ठीक तरह ही परिपालन हुआ है। उसी के कारण अध्यात्म अवलम्बन का प्रतिफल इस रूप में सामने आया है कि उसका सहज उपहास नहीं उड़ाया जा सकता।

आराधना का अर्थ है- लोक मंगल में निरत रहना। जीवन साधना प्रकारांतर से संयम साधना है। उसके द्वारा न्यूनतम में निर्वाह चलाया और अधिकतम बचाया जाता है। समय, श्रम, धन और मन मात्र इतनी ही मात्रा में शरीर तथा परिवार के लिए खर्च करना पड़ता है जिसके बिना काम न चले। काम न चलने की कसौटी है- औसत देशवासियों का स्तर। इस कसौटी पर कसने के उपरान्त किसी भी श्रमशील और शिक्षित व्यक्ति का उपार्जन इतना हो जाता है कि काम चलाने के अतिरिक्त भी बहुत कुछ बच सके। इसी के सदुपयोग को आराधना कहते हैं। आमतौर से लोग इस बचत को विलास में- अपव्यय में अथवा कुटुम्बियों में बिखेर देते हैं। उन्हें सूझ नहीं पड़ता कि इस संसार में और भी कोई अपने हैं- औरों की भी कुछ जरूरतें हैं। यदि दृष्टि में इतनी विशालता आयी होती तो उस बचत को ऐसे कार्यों में खर्च किया गया होता जिससे अनेकों का वास्तविक हित साधन होता और समय की माँग पूरी होने में सहायता मिलती।

ईश्वर का एक रूप साकार है जो ध्यान धारण के लिए अपनी-अपनी रुचि और मान्यता के अनुरूप गढ़ा जाता है। यह मनुष्य से मिलती-जुलती आकृति-प्रकृति का होता है। यह गठन उस प्रयोजन के लिए है तो उपयोगी, आवश्यक, किन्तु साथ ही यह ध्यान रखने योग्य भी है कि वास्तविक नहीं, काल्पनिक है। ईश्वर एक है उसकी इतनी आकृतियाँ नहीं हो सकती जितनी कि भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में गढ़ी गई हैं। इनका उपयोग मन की एकाग्रता का अभ्यास करने तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। प्रतिमा पूजन के पीछे आद्योपान्त प्रतिपादन इतना ही है कि दृश्य प्रतीकों का माध्यम से अदृश्य दर्शन और प्रतिपादन को समझने, हृदयंगम करने का प्रयत्न किया जाय।

सर्वव्यापी ईश्वर निराकार ही हो सकता है। उसे परमात्मा कहा गया है। परमात्मा अर्थात् आत्माओं का परम समुच्चय। इसे आदर्शों का एकाकार कहने में भी हर्ज नहीं। यही विराट् ब्रह्म या विराट् विश्व है। कृष्ण ने अर्जुन और यशोदा को अपने इसी रूप का दर्शन कराया था। राम ने कौशल्या तथा काकभुसुण्डि को इसी रूप में झलक झाँकी दिखाई थी। तत्वदर्शी इस विश्वव्यापी चेतना के रूप में देखते हैं और प्राणियों से उनका दृश्य स्वरूप। इस मान्यता के अनुसार यह लोक सेवा ही विराट् ब्रह्म की आराधना बन जाती है। विश्व उद्यान को सुखी समुन्नत बनाने के लिए ही परमात्मा ने यह बहुमूल्य जीवन देकर अपने युवराज की तरह यहाँ भेजा है उसकी पूर्ति में ही जीवन की सार्थकता है। इसी मार्ग का अधिक श्रद्धापूर्वक अवलम्बन करने से अध्यात्म उत्कर्ष का वह प्रयोजन सधता है, जिसे आराधना कहा गया है।

हम यही करते रहे हैं। सामान्य दिनचर्या के अनुसार रात्रि में शयन, नित्य कर्म के अतिरिक्त दैनिक उपासना भी उन्हीं बारह घण्टों में भली प्रकार सम्पन्न होती रही है। बारह घण्टे इन तीनों कर्मों के लिए पर्याप्त रहे हैं। चार घंटा प्रातःकाल का भजन इसी अवधि में होता रहा है। शेष आठ घन्टे में नित्य कर्म और शयन- इसमें समय की कोताही कहीं नहीं पड़ी। आलस्य-प्रमाद बरतने पर तो पूरा समय ही ऐंड-बेंड में चला जाता है पर एक-एक मिनट पर घोड़े की तरह सवार रहा जाय तो प्रतीत होता है कि जागरुक व्यक्तियों ने इसी में तत्परता बरतते हुए वे कार्य कर लिये होते जितने के लिए साथियों को आश्चर्यचकित रहना पड़ता है।

यह रात्रि का प्रसंग हुआ। अब दिन आता है। उसे भी मोटे रूप में बारह घन्टे का माना जा सकता है। इसमें से दो घन्टे भोजन विश्राम के लिए कट जाने पर दस घन्टे विशुद्ध बचत के रह जाते हैं। इनका उपयोग परमार्थ प्रयोजनों की लोक-मंगल आराधना में नियमित रूप से होता रहा है। संक्षेप में इन्हें इस प्रकार कहा जा सकता है- (1) जनमानस के परिष्कार के लिए युग चेतना के अनुरूप विचारणा का निर्धारण- साहित्य सृजन (2) संगठन प्राणवान जागृत आत्माओं को युग धर्म के अनुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए उत्तेजन मार्गदर्शन (3) व्यक्तिगत कठिनाइयों में से निकालने तथा सुखी भविष्य विनिर्मित करने वाला परामर्श योगदान। हमारी सेवा साधना इन तीन विभागों में बंटी रही है। इनमें दूसरी और तीसरी धारा के लिए असंख्यों व्यक्तियों से संपर्क साधना और पाना चलता रहा है। इनमें से अधिकाँश को प्रकाश और परिवर्तन का अवसर मिला है।

इनके नामोल्लेख और घटनाक्रमों का विवरण सम्भव नहीं। क्योंकि एक तो जिनकी सहायता की जाय, उनका स्मरण भी रखा जाय। यह अपनी आदत नहीं, फिर उनकी संख्या और विनिर्मित उतनी है कि जितने स्मरण हैं उनके वर्णन से ही एक महापुराण लिखा जा सकता है। फिर इसमें उनको आपत्ति भी हो सकती है। इन दिनों कृतज्ञता व्यक्त करने का प्रचलन समाप्त हो गया। दूसरों की सहायता को महत्व कम दिया जाय। अपने भाग्य या पुरुषार्थ का ही बखान किया जाय। दूसरों की सहायता के उल्लेख में हेटी लगती है। ऐसी दशा में अपनी ओर से उन घटनाओं का उल्लेख करना जिसमें लोगों के कष्ट घटें या प्रगति के अवसर मिलें, उचित न होगा। फिर एक और बात भी है कि बखान करने के बाद पुण्य घट जाता है। इतने व्यवधानों क रहते उस प्रकार की घटनाओं के सम्बन्ध में मौन धारण करना ही उपयुक्त समझा जा रहा है और कुछ न कह कर ही प्रसंग समाप्त किया जा रहा है।

इतने पर भी वे सेवाएँ महत्वपूर्ण हैं। अब तक प्रज्ञा परिवार से प्रायः बीस लाख व्यक्ति सम्बन्धित हैं। उनमें से जो मात्र सिद्धान्तों आदर्शों से प्रभावित होकर इस ओर आकर्षित हुए हैं, वे कम हैं। संख्या उनकी ज्यादा है जिनने व्यक्तिगत जीवन में प्रकाश, दुलार, सहयोग, परामर्श एवं अनुदान प्राप्त किया है। ऐसे प्रसंग मनुष्य के अन्तराल में स्थान बनाते हैं। विशेषतया तब जब सहायता करने वाला अपनी प्रामाणिकता एवं निस्वार्थता की दृष्टि से हर कसौटी पर खरा उतरता हो। संपर्क परिकर में मुश्किल से आधे तिहाई ऐसे होंगे जिन्हें मिशन के आदर्शों और हमारे प्रतिपादनों का गम्भीरतापूर्वक बोध है। शेष तो हैरानियों में दौड़ते और जलती परिस्थितियों में शान्तिदायक अनुभूतियां लेकर वापस लौटते रहे हैं। यही कारण है जिससे इतना बड़ा परिवार बनकर खड़ा हो गया। अन्यथा मात्र सिद्धान्त परक ही सब कुछ रहा होता तो आर्यसमाज सर्वोदय की तरह सीमित सदस्य होते और व्यक्तिगत आत्मीयता घनिष्ठता का जो वातावरण दीखता है, वह न दीखता। आगंतुकों की संख्या अधिक- समय कुसमय आगमन, ठहराने, भोजन कराने जैसी व्यवस्थाओं का अभाव जैसे कारणों से इस दबाव का सर्वाधिक भार माता जी को सहन करना पड़ा है पर उस असुविधा के बदले जितनों की जितनी आत्मीयता अर्जित की है उसे देखते हुए हम लोग अन्य हो गये हैं। लगता है जो किया गया वह ब्याज समेत वसूल होता रहा है। पैसे की दृष्टि से न सही भावना की दृष्टि से भी यदि कोई कुछ कम ले तो वह उसके लिए घाटे का सौदा नहीं समझा जाना चाहिए।

आराधना के लिए- लोक साधना के लिए- गिरह की पूँजी चाहिए। उसके बिना भूखा क्या खाये? क्या बाँटे? यह पूँजी कहाँ से आई? कहाँ से जुटाई? इसके लिए मार्गदर्शक ने पहले ही दिन कहा था- जो पास में है, उसे बीज की तरह भगवान के खेत में बोना सीखा? उसे जितनी बार बोया था सौ गुना होता चला गया। अभीष्ट प्रयोजन में कभी किसी बात की कमी न पड़ेगी। उनने बाबा जलाराम का उदाहरण दिया था, जो किसान थे, अपनी पेट से बचने वाली सारी आमदनी जरूरत मंदों को खिलाते रहते थे। भगवान इस सच्ची साधना से अतिशय प्रसन्न हुए और एक ऐसी अक्षय झोली दे गये, जिसका अन्न कभी निपटा ही नहीं और अभी भी वीरपुर (गुजरात) में उनका अन्न सत्र चलता रहता है, जिसमें हजारों भक्तजन प्रतिदिन भोजन करते हैं। जो अपना लगा देता है उसे बाहर का सहयोग बिना माँगे मिलता है। पर जो अपनी पूँजी सुरक्षित रखता है, दूसरों से मांगता फिरता है, उस चन्दा उगाहने वाले पर लोग व्यंग्य ही करते रहते हैं और यत्किंचित् देकर पल्ला छुड़ाते रहे हैं।

गुरुदेव के निर्देशन में अपनी चारों ही सम्पदाओं को भगवान के चरणों में अर्पित करने का निश्चय किया। (1) शारीरिक श्रम (2) मानसिक श्रम (3) भाव संवेदनाएं (4) पूर्वजों का उपार्जित धन। अपना कमाया तो कुछ था नहीं। चारों को अनन्य निष्ठा के साथ निर्धारित लक्ष्य के लिए लगाते चले आये हैं। फलतः सचमुच ही वे सौगुने होकर वापस लौटते रहे हैं। शरीर से बाहर घण्टा नित्य श्रम किया है। इससे थकान नहीं आई। वरन् कार्य क्षमता बढ़ी ही है। इन दिनों इस बुढ़ापे में भी जवानों जैसी कार्य क्षमता है। मानसिक श्रम भी शारीरिक श्रम के साथ संजोये रखा। उसकी परिणति यह है कि मनोबल में मस्तिष्कीय क्षमता में कहीं कोई ऐसे लक्षण प्रकट नहीं हुए जैसे कि आमतौर से बुढ़ापे में प्रकट होते हैं। हमने खोलकर प्यार बाँटा और बिखेरा है। फलस्वरूप दूसरी और से भी कमी न रही है। व्यक्तिगत स्नेह, सम्मान, सद्भाव ही नहीं- मिशन के लिए जब-जब जो अपील अनुरोध प्रस्तुत किये जाते रहे हैं, उसमें कमी नहीं पड़ती रही है। 2400 प्रज्ञापीठों का दो वर्ष में बनकर खड़े हो जाना इसका एक जीवन्त उदाहरण है। आरम्भ में मात्र अपना ही धन था। पैतृक सम्पत्ति से ही गायत्री तपोभूमि का निर्माण हुआ। जन्मभूमि में हाईस्कूल खड़ा किया गया। आशा कम ही थी कि लोग बिना माँगे भी देंगे और निर्माण का इतना बड़ा स्वरूप खड़ा हो जायेगा। आज गायत्री तपोभूमि, शान्ति कुँज, गायत्री तीर्थ, ब्रह्मवर्चस् की इमारतों को देखकर भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बोया हुआ बीज सौ गुना होकर फलता है या नहीं। यह श्रद्धा का अभाव ही है जिसमें लोग अपनी संचय बगल में दबाये रहना चाहते हैं, भगवान से लाटरी अथवा लोगों से चन्दा माँगते हैं। यदि बात आत्मसमर्पण से आरम्भ की जा सके तो उसका आश्चर्यजनक परिणाम हो। विनिर्मित गायत्री शक्ति पीठों में से जूनागढ़ के निर्माता ने अपने बर्तन बेचकर कार्य आरम्भ किया था और आज वही अब तक विनिर्मित, सभी इमारतों में मूर्धन्यों में से एक है।

बाजरे का- मक्का का एक दाना सौ दाने हो सकता है। यह उदाहरण हमने अपनी एवं संचित सम्पदा के उत्सर्ग करने जैसा दुस्साहस करने में देखा। जो था, वह परिवार के लिए उतनी ही मात्रा में- उतनी ही अवधि तक दिया जाये जब तक कि वे लोग हाथ-पैरों से कमाने खाने लायक नहीं बन गये। उत्तराधिकार में समर्थ सन्तान हेतु सम्पदा छोड़ भरना- अपना श्रम मनोयोग उन्हीं के लिए खपाते रहना, हमने सदा अनैतिक माना ओर विरोध किया है। फिर स्वयं तो वैसा करते ही कैसे? मुफ्त की कमाई हराम की होती है, भले ही वह पूर्वजों की खड़ी की हुई हो। हराम की कमाई न बचती है न फलती है। इस आदर्श पर परिपूर्ण विश्वास रखते हुए हमने शारीरिक श्रम, मनोयोग, भाव संवेदन और संग्रहित धन की चारों सम्पदाओं में से किसी को भी कुपात्रों के हाथ नहीं जाने दिया है। उसका एक-एक कण सज्जनता के संवर्धन में- भगवान के आराधन में लगाया है। परिणाम सामने है। जो पास में था उससे अगणित लाभ उठा चुके। यदि कृपणों की तरह उन उपलब्धियों को विलास में, लालच में, संग्रह में परिवार वालों को धन-कुबेर बनाने में खर्च किया होता तो वह सब कुछ बेकार चला जाता। कोई महत्वपूर्ण काम न बनता वरन् जो भी उस मुफ्त के श्रम साधन का उपयोग करते वे दुर्गुणी, दुर्व्यसनी बनकर नफे में नहीं घाटे में ही रहते।

कितने ही पुण्य फल ऐसे हैं जिनके सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए अगले जन्म की प्रतीक्षा करनी पड़ती है पर लोक साधना का परमार्थ ऐसा है जिसका प्रतिफल हाथों हाथ मिलता है। किसी दुःखी के आँसू पौंछते समय असाधारण आत्म सन्तोष होता है। कोई बदला न चुका सके तो भी उपकारी का मन ही मन सम्मान करता है। आशीर्वाद कहता है। इसके अतिरिक्त एक ऐसा दैवी विधान है जिसके अनुसार उपकारी का भण्डार खाली नहीं होता, उस पर ईश्वरीय अनुग्रह बरसता रहता है और जो खर्चा गया है उसकी भरपाई करता रहा है।

भेड़ ऊन कटाती रहती है। हर वर्ष उसे नई ऊन मिलती है। पेड़ फल देते हैं, अगली बार टहनियां फिर उसी तरह लद जाती हैं। बादल बरसते हैं पर खाली नहीं होते। अगले दिनों वे फिर उतनी ही जल सम्पदा बरसाने के लिए समुद्र से प्राप्त कर लेते हैं। उदारचेताओं के भण्डार कभी खाली नहीं हुए। किसी ने कुपात्रों को अपना श्रम-समय देकर भ्रमवश दुष्प्रवृत्तियों का पोषण किया हो और उसे भी पुण्य समझा हो तो फिर बात दूसरी है। अन्यथा लोक साधना के परमार्थ का प्रतिफल ऐसा है जो हाथों हाथ मिलता है। आत्मसन्तोष, लोक सम्मान, देवी अनुग्रह के रूप में तीन गुना सत्परिणाम प्रदान करने वाला यह व्यवसाय ऐसा है जिसमें जिसने भी हाथ डाला कृतकृत्य होकर रहा है। कृपण ही हैं जो चतुरता में दम भरते किन्तु हर दृष्टि से घाटा ही घाटा उठाते हैं।

लोक साधना का महत्व तब घटता है जब उसके बदले नामवरी लूटने की ललक होती है। यह तो अखबारों में इश्तहार छपा कर विज्ञापन बाजी करने जैसा व्यवसाय है। एहसान जताने और बदला चाहने से भी पुण्यफल नष्ट होता है। दोस्तों के दबाव से किसी भी काम के लिए चंदा दे बैठने से भी दान की भावनापूर्ण नहीं होती। देखा यह जाना चाहिए कि इस प्रयास के फलस्वरूप सद्भावनाओं का संवर्धन होता है या नहीं, सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने का सुयोग बनता है या नहीं। संकटग्रस्तों को विपत्ति से निकालने और सत्प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने में जो कार्य सहायक हों उन्हीं की सार्थकता है। अन्यथा मुफ्तखोरी बढ़ाने और छल प्रपंच से भोले भाले लोगों को लूटते खाने रहने के लिए इन दिनों अगणित आडम्बर चल पड़े हैं। उनमें धन या समय देने से पूर्व हजार बार यह विचार करना चाहिए कि अपने प्रयत्नों की अन्तिम परिणति क्या होगी? इस दूरदर्शी विवेकशीलता का अपनाया जाना इन दिनों विशेष रूप से आवश्यक है। हमने ऐसे प्रसंगों में स्पष्ट इनकार भी व्यक्त किया है। औचित्य-सनी उदारता के साथ-साथ अनौचित्य की गन्ध अपनाने पर अनुदारता अपनाने और नाराजी का खतरा लेने का भी साहस किया है। आराधना में इन तथ्यों का समावेश भी नितान्त आवश्यक है।




सिद्धियाँ जिनका प्रत्यक्ष अनुभव होता रहा - Akhandjyoti June 1984

सम्पदा एकत्रित होती है तो उसका प्रभाव परिलक्षित होता है। शरीर से स्वस्थ मनुष्य बलिष्ठ और सुंदर दीखता है। सम्पदा वालों के ठाट-बाट बढ़ जाते हैं। बुद्धिमानों का वैभव, वाणी, रहन-सहन में दिखाई पड़ता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक सम्पदा बढ़ने पर उसका प्रभाव भी स्पष्ट उदीयमान होता दृष्टिगोचर होता है। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त इसी तथ्य का प्रकटीकरण करता है। सिद्धि का अर्थ होता है, असाधारण सफलताएँ। साधारण सफलताएँ तो सामान्य जन भी अपने पुरुषार्थों और साधनों के सहारे प्राप्त करते रहते हैं और कई तरह की सफलताएँ अर्जित करते रहते हैं। अध्यात्म क्षेत्र बड़ा और ऊँचा है इसलिए उसकी सिद्धियाँ भी ऐसी होनी चाहिए जिन्हें सामान्य जनों के एकाकी प्रयास से न बन पड़ने वाली, अधिक ऊँचे स्तर का मानी जा सके।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि आध्यात्मिकता का अवमूल्यन होते-होते वह बाजीगरी स्तर पर पहुँच गई और सिद्धियों का तात्पर्य लोग किसी ऐसे ही अजूबे से समझने लगे हैं जो कौतुक कौतूहल उत्पन्न करता हो। दर्शकों को अचम्भे में डालता हो। भले ही वे अचरज सर्वथा निरर्थक ही क्यों न हो? बालों में से बालू निकाल देना, कोई ऐसा कार्य नहीं है, जिसके बिना किसी का काम रुकता हो या उस बालू से किसी का भला होता हो। असाधारण कृत्य, चकाचौंध में डालने वाले करतब बाजीगर लोग दिखाते रहते हैं। इसी के सहारे वाह-वाही लूटते और पैसा कमाते हैं। किंतु इनके कार्यों में से एक भी ऐसा नहीं होता जिससे जन-हित का कोई प्रयोजन पूरा होता हो। कौतूहल दिखाकर अपना बड़प्पन सिद्ध करना उनका उद्देश्य होता है। इसके सहारे वे अपना गुजारा चलाते हैं। सिद्ध पुरुषों में भी कितने ही ऐसे होते हैं जो ऐसी ही कुछ हाथों की सफाई दिखाकर अपनी सिद्धियों का विज्ञापन करते रहते हैं। हवा में हाथ मारकर इलायची या मिठाई माँग देने, नोट दूने कर देने जैसे कृत्यों के बहाने चमत्कृत करके कितने ही भोले लोगों को ठग लिये जान के समाचार आये दिन सुनने को मिलते रहते हैं। लोगों का बचपन है, जो बाजीगरी-कौतुकी और अध्यात्म क्षेत्र की सिद्धियों का अन्तर नहीं कर पाते। बाजीगरों और सिद्ध पुरुषों के जीवन क्रम में- स्तर में जो मौलिक अन्तर रहता है उसे पहचानना आवश्यक है।

साधना से सिद्धि का तात्पर्य उन विशिष्ट कार्यों से है , जो लोक-मंगल से सम्बन्धित होते हैं ओर इतने बड़े भारी तथा व्यापक होते हैं, जिन्हें कोई एकाकी संकल्प या प्रयास के बल पर नहीं कर सकता। फिर भी वे उसे करने का दुस्साहस करते हैं- आगे बढ़ने का कदम उठाते हैं और अन्ततः असम्भव लगने वाले कार्य को भी सम्भव कर दिखाते हैं, समयानुसार जन सहयोग उन्हें भी मिलता रहता है। जब सृष्टि नियमों के अनुसार हर वर्ग के मनस्वी को सहयोगी मिलते रहते हैं, तब कोई कारण नहीं कि श्रेष्ठ कामों पर वह विधान लागू न होता हो। प्रश्न एक ही है आध्यात्मवादी साधनों और सहयोगों के अभाव में भी कदम बढ़ाते हैं और आत्म-विश्वास तथा ईश्वर विश्वास के सहारे नाव खेकर पार जाने का भरोसा रखते हैं। सामान्य जनों की मनःस्थिति ऐसी नहीं होती। वे सामने साधन सहयोग की व्यवस्था देख लेते हैं तभी हाथ डालते हैं।

साधनारत सिद्ध पुरुषों द्वारा महान कार्य सम्पन्न होते रहे हैं। यही उनका सिद्धि चमत्कार है। देश में स्वतन्त्रता आन्दोलन आरम्भ कराने के लिए समर्थ गुरु रामदास एक मराठा बालक को आगे करके जुट गये और उसे आश्चर्यजनक सीमा तक बढ़ा कर रहे। बुद्ध ने संव्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध विश्वव्यापी बुद्धिवादी आन्दोलन चलाया और उसे समूचे संसार तक विशेषतया एशिया के कौने-कौन में पहुँचाया। गान्धी ने सत्याग्रह आन्दोलन छेड़ा। मुट्ठी भर लोगों के साथ धरसना में नमक बनाने के साथ शुभारम्भ किया। अन्ततः इसका कैसा विस्तार और कैसा परिणाम हुआ, यह सर्वविदित है। विनोबा द्वारा एकाकी आरम्भ किया गया भूदान आन्दोलन कितना व्यापक और सफल हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। स्काउटिंग रैडक्रास आदि कितने ही आन्दोलन छोटे रूप में आरम्भ हुए और वे कहीं से कहीं जा पहुँचे। राजस्थान का वनस्थली बालिका विद्यालय- बाबा साहब आमटे का अपंग एवं कुष्ठ रोगी सेवा सदन ऐसे ही दृश्यमान कृत्य है, जिन्हें साधना से सिद्धि का प्रत्यक्ष प्रमाण कहा जा सके। ऐसी अगणित घटनाएँ संसार में सम्पन्न हुई हैं जिनमें आरम्भ कर्त्ताओं का कौशल, साधन एवं सहयोग नगण्य था पर आत्मबल असीम था। इतने भर से गाड़ी चल पड़ी और जहाँ-तहाँ से तेल, पानी प्राप्त करती हुई क्रमशः पूर्व से भी अगली मंजिल तक जा पहुँची। सदुद्देश्यों की ऐसी पूर्ति के पीछे साधना से सिद्धि के सिद्धान्त की झाँकी देखी जा सकती है।

हमारी जीवन साधना की परिणतियाँ यदि कोई सिद्धि स्तर पर ढूंढ़ना चाहे तो उसे निराश नहीं होना पड़ेगा। हर कदम अपने कौशल और उपलब्ध साधनों की सीमा से बहुत ऊँचे स्तर का उठा है। आरम्भ करते समय सिद्धि का पर्यवेक्षण करने वालों ने इसे मूर्खता कहा और पीछे उपहासास्पद बनते फिरने की चेतावनी भी दी किन्तु मन में उस ईश्वर क साथ रहने का अटूट विश्वास रहा जिसकी प्रेरणा उसे हाथ में लेने को उठ रही थी। लिप्सा रहित अंतःकरणों में प्रायः ऐसे ही संकल्प उठते हैं जो सीधे लोक मंगल से सम्बन्धित हों और जिनके पीछे दिव्य सहयोग मिलने का विश्वास हो।

साधना की ऊर्जा सिद्धी के रूप में परिपक्व हुई तो उसने सामयिक आवश्यकताएँ पूरी करने वाले किसी कार्य में उसे खपा देने का निश्चय किया। कार्य प्रारम्भ हुआ और आश्चर्य इस बात का है कि सहयोग का साधन जुटने का वातावरण दीखते हुए भी प्रयास इस प्रकार अग्रगामी बने मानो वे सुनियोजित रहे हों और किसी ने उसकी पूर्व से ही साँगोपाँग व्यवस्था बना रखी हो। पर्यवेक्षकों में से अनेकों ने इसे आरम्भ में दुस्साहस कहा था लेकिन सफलताएँ मिलती चलने पर वे उस सफलता को साधना की सिद्धी कहते चले गए।

इन दुस्साहसों में से सबकी तो नहीं पर कुछ की गणना कराई जा सकती है-

(1) पन्द्रह वर्ष की आयु में चौबीस वर्ष तक चौबीस गायत्री महापुरश्चरण चौबीस वर्ष में पूरा करने का अनेक अनुबंधों के साथ जुड़ा हुआ संकल्प लिया गया। वह बिना गड़बड़ाये, बिना लड़खड़ाये नियत अवधि में सम्पन्न हो गया।

(2) इस महापुरश्चरण की पूर्णाहुति में निर्धारित जप का हवन करता था। देश भर के गायत्री उपासक आशीर्वाद देने आमन्त्रित करने थे। पता लगाकर ऐसे चार लाख पाये गये और वे सभी मथुरा में सन् 1958 में सहस्र कुण्डीय यज्ञ में आमन्त्रित किए गए। प्रसन्नता की बात थी कि उनमें से एक भी अनुपस्थित नहीं रहा। पाँच दिन तक निवास, भोजन, यज्ञ आदि का निःशुल्क प्रबन्ध रहा। विशाल यज्ञशाला, प्रवचन मंच, रोशनी, पानी सफाई आदि का सुनियोजित प्रबन्ध था। सात मील के घेरे में सात नगर बसाये गये। सारा कार्य निर्विघ्न-पूर्ण हुआ। लाखों का खर्च हुआ पर उसकी पूर्ति बिना किसी के आगे पल्ला पसारे ही होती रही।

(3) गायत्री तपोभूमि मथुरा के भव्य भवन का निर्माण- शुभारम्भ अपनी पैतृक संपत्ति बेचकर किया। पीछे लोगों की अयाचित सहायता से उसके “धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण” का उत्तरदायित्व सम्भालने वाले केन्द्र के रूप में विशालकाय ढाँचा खड़ा हुआ।

(4) “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका का सन् 1937 से अनवरत प्रकाशन। बिना विज्ञापन और बिना चन्दा माँगे, लागत मूल्य पर निकलने वाली गाँधी जी की हरिजन पत्रिका जबकि घाटे के कारण बन्द करनी पड़ी थी तब अखण्ड-ज्योति अनेकों मुसीबतों का सामना करती हुई निकलती रही और अभी एक लाख पचास हजार की संख्या में छपती है। एक अंक को कई पढ़ते हैं इस दृष्टि से पाठक दस लाख से कम नहीं।

(5) साहित्य सृजन। आर्ष ग्रंथों का अनुवाद तथा व्यावहारिक जीवन में अध्यात्म सिद्धान्तों का सफल समावेश करने वाली नितान्त सस्ती किन्तु अत्यन्त उच्चस्तरीय पुस्तकों का प्रकाशन। इनका अन्यान्य भाषाओं में अनुवाद। यह लेखन इतना है जिसे एक मनुष्य के शरीर भार के समान तोलने पर भी अधिक ही होगा। इसे करोड़ों ने पढ़ा है और नया प्रकाश पाया है।

(6) गायत्री परिवार का गठन- उसके द्वारा लोकमानस के परिष्कार के लिए प्रज्ञा अभियान का और सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए युग निर्माण योजना का कार्यान्वयन। दोनों के अंतर्गत लाखों जागृत आत्माओं का एकत्रीकरण। सभी का अपने-अपने ढंग से नव सृजन में भावभरा योगदान।

(7) युग शिल्पी प्रज्ञा पुत्रों के लिए आत्मनिर्माण- लोक निर्माण की समग्र पाठ्य-विधि का निर्धारण और सत्र योजना के अंतर्गत नियमित शिक्षण। दस-दस दिन के गायत्री साधना सत्रों की ऐसी व्यवस्था जिसमें साधकों के लिए निवास, भोजन आदि का भी प्रबन्ध है।

(8) अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की शोध के लिए ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की स्थापना। इसमें यज्ञ विज्ञान एवं गायत्री महाशक्ति के उच्चस्तरीय अनुसंधान चलता है। इसी उपक्रम को आगे बढ़ाकर जड़ी-बूटी विज्ञान की ‘चरक कालीन’ प्रक्रिया का अभिनव अनुसंधान हाथ में लिया गया है। इसके साथ ही खगोल विद्या की टूटी हुई कड़ियों को नये सिरे से जोड़ा जा रहा है।

(9) देश के कोने-कोने में 2400 निजी इमारत वाली प्रज्ञा पीठों और बिना इमारत वाले 7500 प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना करके नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक पुनर्निर्माण की युगान्तरीय चेतना को व्यापक बनाने का सफल प्रयत्न। इस प्रयास को 74 देशों के प्रवासी भारतीयों में भी विस्तृत किया गया है।

(10) देश की समस्त भाषाओं तथा संस्कृतियों के अध्ययन अध्यापन का एक अभिनव केन्द्र स्थापित किया गया है ताकि हर वर्ग के लोगों तक नवयुग की विचारधारा को पहुँचाया जा सके। प्रचारक हर क्षेत्र में पहुँच सकें। अभी तो जन-जागरण के प्रचारक जत्थे जीप गाड़ियों के माध्यम से हिन्दी, गुजराती, उड़ीसा-मराठी क्षेत्रों में ही जाते रहे हैं। अब वे देश के कौने-कौने में पहुंचेंगे और पवित्रता, प्रखरता एवं एकात्मकता की जड़ें मजबूत करेंगे।

(11) प्रचार तन्त्र अब तक टेप रिकार्डरों और स्लाइड प्रोजेक्टरों के माध्यम से ही चलता रहा है। अब उसमें वीडियो फिल्म निर्माण की एक कड़ी और जोड़ी जा रही है।

(12) प्रज्ञा अभियान की विचारधारा को फोल्डर योजना के माध्यम से देश की सभी भाषाओं में प्रसारित प्रचारित किया जा रहा है ताकि कोई कोना ऐसा न बचे, जहाँ नव चेतना का वातावरण न बने।

(13) प्रज्ञा पुराण के पाँच खंडों का प्रकाशन- हर भाषा में तथा उसके टेप प्रवचनों का निर्माण। इस आधार पर नवीनतम समस्याओं का पुरातन कथा आधार पर समाधान का प्रयास।

(14) प्रतिदिन शान्ति-कुँज के भोजनालय में शिक्षार्थियों अतिथियों और तीर्थयात्रियों की संख्या प्रायः एक हजार रहती है। किसी से कोई मूल्य नहीं माँगा जाता। सभी भावश्रद्धा से प्रसाद ग्रहण करके ही जाते हैं।

(15) अगणित व्यक्ति गायत्री तीर्थ में आकर कल्प साधना करते रहे हैं। इससे उनके व्यक्तित्व में परिष्कार हुआ है, मनोविकारों से मुक्ति मिली है एवं भावी जीवन की रीति-नीति निर्धारित करने में मदद मिली है। विज्ञान सम्मत पद्धति से ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में उनका पर्यवेक्षण थर इसे सत्यापित भी किया गया है।

उपरोक्त प्रमुख कार्यों और निर्धारणों को देखकर सहज बुद्धि यह अनुमान लगा सकती है कि इनके लिए कितने श्रम, मनोयोग, साधन, कितनी बड़ी संख्या में- कितने लोग लगे होंगे इसकी कल्पना करने पर प्रतीत होता है कि सब सरंजाम पहाड़ जितना होना चाहिए। उसे उठाने, आमन्त्रित एकत्रित करने में एक व्यक्ति की अदृश्य शक्ति भर काम करती रही है। प्रत्यक्ष याचना की- अपील की- चन्दा जमा करने की प्रक्रिया कभी अपनाई नहीं गई। जो कुछ चला है स्वेच्छा सहयोग से चला है। सभी जानते हैं कि आजकल धन जमा करने के लिए कितने दबाव, आकर्षण और तरीके काम में लाने पड़ते हैं पर मात्र यही एक ऐसा मिशन है जो दस पैसा प्रतिदिन के ज्ञानघट और एक मुट्ठी अनाज वाले धर्मघट स्थापित करके अपना काम भली प्रकार चला लेता है। जो इतनी छोटी राशि देता है, वह यह भी अनुभव करता है कि संस्था हमारी है, हमारे श्रम सहयोग से चल रही है फलतः उसकी आत्मीयता भी सघनता पूर्वक जुड़ी रहती है। संचालकों को भी इतने लोगों के सामने उत्तरदायी होने- जवाब देने का ध्यान रखते हुए एक-एक पाई का खर्च फूँक-फूँककर करना पड़ता है। कम पैसे में इतने बड़े काम चल पड़ने और सफल होने का रहस्य यह लोकप्रियता ही है।

निःस्वार्थ निस्पृह ओर उच्चस्तरीय व्यक्तित्व वाले जितने कार्यकर्ता इस मिशन के पास हैं, उतने अन्य किसी संगठन के पास कदाचित् ही हों। इसका कारण एक ही है, संचालन सूत्र को अधिकाधिक निकट से परखने के उपरान्त यह विश्वास करना कि यहाँ ब्राह्मण आत्मा सही काम करती है। बुद्ध को लोगों ने परखा और लाखों परिव्राजक घर-बार छोड़कर उनके अनुयायी बने। गाँधी के सत्याग्रहियों ने भी वेतन नहीं माँगा। इन दिनों हर संस्था के पास वैतनिक कर्मचारी काम करते हैं, तब मात्र प्रज्ञा अभियान ही एक मात्र ऐसा तन्त्र है जिसमें हजारों लोग उच्चस्तरीय योग्यता होते हुए भी मात्र भोजन वस्त्र पर निर्वाह करते हैं।

इतने व्यक्तियों का श्रम- सहयोग- बूँद-बूँद करके लगने वाला इतना धन साधन किस चुम्बकत्व से खिंचता हुआ चला आता है, वह भी एक सिद्धि चमत्कार है जो अन्यत्र कदाचित् ही कहीं दीख पड़े।

पिछले दिनों तीन बार हिमालय जाने और एक-एक वर्ष की एकान्त साधना करने का निर्देश निबाहना पड़ा। इसमें क्या देखा? इसकी जिज्ञासा बड़ी आतुरता पूर्वक सभी करते हैं। उनका तात्पर्य, किन्हीं यक्ष, गंधर्व, राक्षस, बेताल, सिद्ध पुरुष से भेंट वार्ता रही हो। उनकी उछल-कूद देखी हो। अदृश्य और प्रकट होने वाले कुछ जादुई गुट के दिए हों। इन जैसी घटनायें सुनाने का मन होता है। वे समझते हैं कि हिमालय माने जादू का पिटारा। यहाँ जाते ही कोई करामाती बाबा डिब्बे में से भूत की तरह उछल पड़ते होंगे और जो कोई उस क्षेत्र में जाता है उसे उन कौतूहलों- करतूतों को दिखाकर मुग्ध करते रहते होंगे। अपने साथ एक भी घटना ऐसी नहीं घटी। झूठ बोलने की- लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कतई इच्छा नहीं-जैसी कि भूत-प्रेतों का मनगढ़ंत कहानियाँ सुनाकर लोग कौतूहल पूरा किया करते हैं।

हिमालय हमें अधिक अंतर्मुखी होने के लिए जाना पड़ा। बहिरंग जीवन पर घटनाएँ छाई रहती हैं और अन्तःक्षेत्र पर भावनाएँ। भावनाओं का वर्चस्व ही अध्यात्मवाद है। कामनाओं और वस्तुओं की घुड़-दौड़- भौतिकवाद। चूँकि अपना जीवन क्रम दोनों का संगम रहा है, इसलिए बीच-बीच में एकान्त में बहिरंग के जमे हुए प्रभावों को निरस्त करने की आवश्यकता पड़ती रही है। आत्मा को प्रकृति सान्निध्य से जितना बन पड़ा उतना हटाया है और आत्मा को परमात्मा के साथ जितना निकट ला सकना सम्भव था उतना हिमालय के अज्ञातवास में किया है। आहार-बिहार में परिस्थिति वश अधिक सात्विकता का समावेश होता ही रहा है। इसके अतिरिक्त सबसे बड़ी बात हुई है- उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं का उन्नयन और रसास्वादन। इसके लिए व्यक्तियों की, साधनों की, परिस्थितियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। जैसा भी भला-बुरा सामने प्रस्तुत है, उसी पर अपने भाव चिन्तन का आरोपण करके ऐसा स्वरूप बनाया जा सकता है, जिससे कुछ का कुछ दीखने लगे। कण-कण में भगवान की- उसकी रस सम्वेदना की झाँकी होने लगे।

जिनने हमारी “सुनसान के सहचर” पुस्तक पढ़ी है, उनने समझा होगा कि सामान्य घटनाओं ओर परिस्थितियों में भी अपनी उच्च भावनाओं का समावेश करके किस प्रकार स्वर्गीय उमंगों से भरा-पूरा वातावरण गठित किया जा सकता है और उसमें निमग्न रहकर सत्-चित्-आनन्द की अनुभूति हो सकती है। यह भी एक उच्चस्तरीय सिद्धि है। इसे हस्तगत करके हम इसी सर्वसाधारण जैसी जीवनचर्या में निरन्तर रहते हुए स्वर्ग में रहने वाले देवताओं की तरह आनन्द मग्न रहते रहे हैं।




सच्ची साधना- सही दिशोधारा - Akhandjyoti June 1984

दैनिक उपासना नित्यकर्म में सम्मिलित रही। उसका लेखा-जोखा व्यर्थ है। शौच, स्नान, शयन, भोजन जैसे कार्य सभी की दिनचर्या में सम्मिलित रहते हैं। न उसका कोई लेखा-जोखा रखता है और न निन्दा परक मूल्यांकन करते हुए कोई उन पर ध्यान देता है। हमने अपनी उपासना को नित्य कर्म में सम्मिलित रखा है। सूर्योदय से पूर्व उसे निपटा दिया है। क्योंकि उसे आत्मा का स्वच्छ और समर्थ रखने का आवश्यक दैनिक क्रिया-कलाप माना है। उसकी अतिरिक्त गणना क्या रखी जाय, उसकी शेखी क्या बघारी जाय?

पन्द्रह वर्ष की आयु से लेकर चौबीस वर्ष तक चौबीस महा-पुरश्चरणों का लेखा-जोखा रखा गया। क्योंकि वह प्रारंभिक अवस्था में मनोबल को सुदृढ़ और सुनिश्चित रखने के लिए था। नियत समय पर, नियत संख्या में नियत विधि से किसी क्रिया-कृत्य को करते रहने, व्यवधानों को आड़े न आने देने की सुनिश्चित परिणति एक ही होती है- संकल्प बल का- मनोबल का परिपक्व होना। यही है अध्यात्म शक्ति के- उद्भव का केन्द्र एवं स्रोत। किसी मन्त्र विशेष में जादू नहीं है। उसके पीछे काम करने वाले संकल्प और उसके सुनिश्चित निर्वाह से जो आस्था परिपक्व होती है, वही मन्त्र विशेष के साथ जुड़कर चमत्कार दिखाती है। यदि इस सम्बन्ध में साधक कच्चा हो तो समझना चाहिए कि कुछ भी पल्ले पड़ने वाला नहीं हैं। आज पाँच माला, कल दो, परसों एक, तरसों एक भी नहीं। कभी सवेरे, कभी शाम, कभी रास्ता चलते, कभी गैर हाजिरी- इस प्रकार की अस्त-व्यस्तता अश्रद्धा या अन्यमनस्कता की परिचायक है। जहाँ श्रद्धा होगी वहाँ संकल्प निभेगा। निश्चय पूरा न हो तो भोजन न करने या सोने से रुके रहने का नियम बना लेने पर कभी किसी की नागा नहीं हो सकता। परिस्थितिवश आगा-पीछा हो सकता है। पुरश्चरण का तात्पर्य व्रत पूर्वक उपासना क्रम को कड़ाई के साथ निबाहना है। संकल्प इसी बात का लिया जाता है। इसका प्रत्यक्ष प्रतिफल मनोबल की परिपक्वता है। इसी को आत्मशक्ति सम्पादन प्रक्रिया का प्राण कहना चाहिए।

सच्ची उपासना के फलस्वरूप सही दिशाधारा मिलती है, वही मुझे भी मिली। दिशा एक ऋषि कल्प जीवन। देव मानव जैसा दृष्टिकोण। इसके लिए मात्र आदर्शवादी महामानवों के जीवनक्रम पर दृष्टि रखना और उसी से प्रेरणा लेनी पड़ती है। इन महाभागों में समीपवर्ती, संपर्क क्षेत्र को बहुत कम मिलते हैं। उनमें से अधिकाँश दिवंगत हो चुके होते हैं पर थोड़ी-सी भाव सम्वेदना जोड़ते ही ऐसा लगता है मानो वे साथ रहते हैं। अपने देश में इस स्तर के नर-नारी अगणित हुए हैं, जो आदर्शों के लिए जिये, जिन्हें न प्रलोभन विचलित कर सका न भय। ऐसा लोगों की जीवन गाथाएँ उपलब्ध हैं। उन्हें पढ़ने से यह अभाव नहीं खटकता कि वे कहीं दूर हैं। समीप लगते हैं और साथी जैसे प्रतीत होते हैं। यही अपना परिवार- यही अपना मित्र मण्डली। प्रत्यक्ष न सही- परोक्ष सही। अन्तर कुछ नहीं पड़ा। यह अभाव कभी खटका नहीं कि आदर्शवादी समुदाय कही ईद-गिर्द है नहीं, हमें अकेले ही- एकाकी उस स्तर का जीवन जीना पड़ रहा है। इनका अनुकरण अनुसरण करने का यथा सम्भव प्रयत्न चला तो उसमें क्रमिक प्रगति ही हुई।

इसी देव संपर्क का एक निषेध पक्ष भी है- लोक प्रवाह की उपेक्षा करना। लोक प्रवाह से तात्पर्य है- मात्र पेट और प्रजनन के लिए कोल्हू के बैल की तरह पिलता, पेलता हुआ जन-समुदाय, जो मुश्किल से शरीर निर्वाह भर प्राप्त करता है पर वासना, तृष्णा, अहंता की कामनाएं असीम होने के कारण पाप को पोटली दिन-दिन भारी करता जाता है। बहुमत इन्हीं का है। इनमें से कुछ शिक्षित- कुछ अशिक्षित, कुछ प्रतिभावान- कुछ अनपढ़ होते हैं। पर सभी की दृष्टि एक ही रहती है। विलास, संग्रह, अपव्यय और उद्धत अहंकार का प्रदर्शन। यह लोग दूसरों को भी अपने ही मार्ग पर घसीटते हैं। परामर्श- दबाव इसी स्तर का देते हैं। न मानने पर असहयोग, उपहास विरोध और झंझट करते हैं। इनमें से अधिकाँश कुटुम्बी, सम्बन्धी, मित्र और शुभ चिन्तक कहे जाते हैं पर उन सबकी खींच-तान एक ही दिशा में होती है।

ऋषि दृष्टिकोण की दिशा जिस दिन मिली, उसी दिन यह भी कह दिया गया कि यह परिवार सम्बद्ध तो है पर विजातीय द्रव्य की तरह है- बचने योग्य। इसके तर्क, प्रमाणों की ओर से कान बन्द किये रहना ही उचित रहेगा। इसलिए सुननी तो सबकी चाहिए पर करनी मन की। उनके परामर्श को- आग्रह को वजन या महत्व दिया गया और उन्हें स्वीकारने का मन बनाया गया तो फिर लक्ष्य तक पहुँचना कठिन है। श्रेय और प्रेस की दोनों दिशाएँ एक दूसरे के प्रतिकूल जाती हैं। दोनों में से एक ही अपनाई जा सकती है। संसार प्रसन्न होगा तो आत्मा रूठेगी। आत्मा को सन्तुष्ट किया जायेगा तो संसार की- निकटस्थों की नाराजगी सहनी पड़ेगी। आमतौर से यही हुआ है, यही होता रहेगा। कदाचित् ही कभी कहीं ऐसे सौभाग्य बने हैं, जब सम्बन्धियों ने आदर्शवादिता अपनाने का अनुमोदन दिया हो। आत्मा को तो अनेकों बार संसार के सामने झुकना पड़ा है। ऊँचे निश्चय बदलने पड़े हैं और पुराने ढर्रे पर आना पड़ा है।

यह कठिनाई अपने सामने पहले दिन से ही आई। वसन्त पर्व को जिस दिन नया जन्म मिला, उसी दिन नया कार्यक्रम भी। पुरश्चरणों की शृंखला के साथ-साथ आहार-बिहार के तपस्वी स्तर के अनुबन्ध भी। तहलका मचा जिसने सुना अपने-अपने ढंग से समझाने लगा। मीठे और कडुए शब्दों की वर्षा होने लगी। मन्तव्य एक ही था कि जिस तरह सामान्य जन जीवन-यापन करते हैं, कमाते-खाते हैं, वही राह उचित है। ऐसे कदम न उठाये जायें जिनसे इन दोनों में व्यवधान पड़ता हो। यद्यपि पैतृक सम्पदा इतनी थी कि उसके सहारे तीन पीढ़ी तक घर बैठकर गुजारा हो सकता था। पर उस तर्क को कोई सुनने तक के लिए तैयार न हुआ। नया कमाओ, नया खाओ, जो पुराना है, उसे भविष्य के लिए कुटुम्बियों के लिए जमा रखो। सब लोग अपने-अपने शब्दों में एक ही बात कहते थे। अपना एक मुँह- सामने वालों के सौ। किस किस को कहाँ तक जवाब दिया जाय? अन्त में हारकर गाँधीजी के तीन गुरुओं में से एक की अपमा भी गुरु बना लिया। मौन रहने से राहत मिली। “भगवान की प्रेरणा” कह देने से थोड़ा काम चल पाता क्योंकि उसे काटने के लिए उन सबके पास बहुत पैने तर्क नहीं थे। नास्तिकवाद तक उतर आने या अन्तःप्रेरणा का खण्डन करने लायक तर्क उनमें से किसी ने भी सीखे समझे नहीं थे। इसलिए बात ठण्डी पड़ गई। मैंने अपना संकल्पित व्रत इस प्रकार चालू कर दिया मानो किसी को जवाब देना ही नहीं था। किसी का परामर्श लेना ही नहीं था। अब सोचता हूँ कि उतनी दृढ़ता न अपनाई गई होती तो नाव दो चार झकझोरे खाने के उपरान्त ही डूब जाती। जिस साधना बल के सहारे आज अपना और दूसरों का कुछ भला बन पड़ा उसका सुयोग ही न आता। ईश्वर के साथ वह नाता जुड़ता ही नहीं जो पवित्रता ओर प्रखरता से कम में जड़ें जमाने की स्थिति में होता ही नहीं।

इसके बाद दूसरी परीक्षा बचपन में ही तब सामने आई जब काँग्रेस का असहयोग आन्दोलन आरम्भ हुआ। गाँधी जी ने सत्याग्रह आन्दोलन का बिगुल बजाया। देशभक्तों का आह्वान किया और जेल जाने- गोली खाने के लिए घर से निकल पड़ने के लिए कहा।

मैंने अन्तरात्मा की पुकार सुनी और समझा कि यह ऐतिहासिक अवसर है। इसे किसी भी कारण चुकाया नहीं जाना चाहिए। मुझे सत्याग्रहियों की सेना में भर्ती होना ही चाहिए। अपनी मर्जी से उन क्षेत्र के भर्ती केन्द्र में नाम लिखा दिया। साधन सम्पन्न घर छोड़कर नमक सत्याग्रह के लिए निर्धारित मोर्चे पर जाना था। उन दिनों गोली चलने की चर्चा बहुत जोरों से थी। लम्बी सजाऐं- कला पाना होने की भी। ऐसी अफवाहें सरकारी पक्ष के- किराये के प्रचारक जोरों से फैला रहे थे ताकि कोई सत्याग्रही बने नहीं। घर वाले उनकी पूरी पूरी रोकथाम करें। मेरे सम्बन्ध में भी यही हुआ। समाचार विदित होने पर मित्र, पड़ोसी, कुटुम्बी, सम्बन्धी एक भी न बचा जो इस विपत्ति से बचाने के लिए जोर लगाने न आया हो। उनकी दृष्टि से यह आत्म-हत्या जैसा प्रयास था।

बात बढ़ते-बढ़ते जवाबी आक्रमण तक की आई। किसी ने अनशन की, धमकी दी तो किसी ने आत्म-हत्या। हमारी माताजी अभिभावक थी। उन्हें यह पट्टी पढ़ाई गई कि लाखों की पैतृक सम्पत्ति से वे मेरा नाम खारिज कराकर अन्य भाइयों के नाम कर देंगी। भाइयों ने कहा- घर से कोई रिश्ता न रहेगा और उसमें प्रवेश भी न मिलेगा। इसके अतिरिक्त भी और कई प्रकार की धमकियां दीं। उठाकर ले जाया जायेगा और डाकुओं के नियन्त्रण में रहने के लिए बाधित कर दिया जायेगा।

इन मीठी-कड़वी धमकियों को मैं शान्तिपूर्वक सुनता रहा। अन्तरात्मा के सामने एक ही प्रश्न रहा कि समय की पुकार बड़ी है या परिवार का दबाव। अन्तरात्मा की प्रेरणा बड़ी है या मन को इधर-उधर डुलाने वाले असमंजस की स्थिति। अन्तिम निर्णय किससे कराता? आत्मा और परमात्मा दो को ही साक्षी बनाया और उनके निर्णय को ही अन्तिम मानने का फैसला किया।

इस संदर्भ में प्रहलाद का फिल्म चित्र आंखों के आगे तैरने लगा। वह समाप्त न होने पाया था कि ध्रुव की कहानी मस्तिष्क में तैरने लगी। इसका अन्त न होने पाया कि पार्वती का निश्चय उछलकर आगे आ गया। इस आरम्भ के उपरान्त महामानवों की वीर बलिदानियों की- सन्त, सुधारक और शहीदों की अगणित कथा गाथाएँ सामने तैरने लगीं। उनमें से किसी के भी घर परिवार वालों ने मित्र संबंधियों ने समर्थन नहीं किया था। वे अपने एकाकी आत्मबल के सहारे कर्त्तव्य की पुकार पर आरूढ हुए और दृढ़ रहे। फिर यह सोचना व्यर्थ है कि इस समय अपने इर्द-गिर्द के लोग क्या करते और क्या कहते हैं? उनकी बात सुनने से आदर्श नहीं निभेंगे। आदर्श निभाने हैं तो अपने मन की ललक लिप्साओं से जूझना पड़ेगा। इतना ही नहीं इर्द-गिर्द जुड़े हुए उन लोगों की भी अपेक्षा करनी पड़ेगी जो मात्र पेट प्रजनन के कुचक्र में ही घूमते और घुमाते रहे हैं।

निर्णय आत्मा के पक्ष में गया। मैं अनेकों विरोध और प्रतिबंधों को तोड़ता- लुक-छिपकर निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा और सत्याग्रही की भूमिका निभाता हुआ जेल चला गया। जो भय का काल्पनिक आतंक बनाया गया था उसमें से एक भी चरितार्थ नहीं हुआ।

छुटपन की एक घटना इन दोनों प्रयोजनों में और भी साहस देती रही। गाँव में एक बुढ़िया महतरानी घावों से पीड़ित थी। दस्त भी हो रहे थे। घावों में कीड़े पड़ गये थे। बेतरह चिल्लाती थी पर कोई छूत के कारण उसके घर में घुसता न था। मैंने एक चिकित्सक से उपचार पूछा। दवाओं का एकाकी प्रबन्ध किया। उसके घर नियमित रूप से जाने लगा। चिकित्सा के लिए भी परिचर्या के लिए भी- भोजन व्यवस्था के लिए भी। यह सारे काम मैंने अपने जिम्मे ले लिये। मेहतरानी के घर में घुसना, उसके मल-मूत्र से सने कपड़े धोना आज से 65 वर्ष पूर्व पूरा गुनाह था। जाति बहिष्कार कर दिया गया। घर वालों तक ने प्रवेश न करने दिया। चबूतरे पर पड़ा रहता और जो कुछ घर वाले दे जाते, उसी को खाकर गुजारा करता। इतने पर भी मेहतरानी की सेवा छोड़ी नहीं। यह पन्द्रह दिन चली और वह अच्छी हो गई। वह जब तक जियी मुझे भगवान कहती रही। उन दिनों 13 वर्ष की आयु में भी मैं अकेला था। सारा घर और सारा गाँव एक ओर। लड़ता रहा हारा नहीं। अब तो उम्र कई वर्ष और अधिक बड़ी हो गई थी, अब क्यों हारता?

स्वतन्त्रता संग्राम की कई बार जेलयात्रा- 23 महापुरश्चरणों का व्रत धारण- इसके साथ ही मेहतरानी की सेवा साधना यह तीन परीक्षाएँ, मुझे छोटी उम्र में ही पास करनी पड़ीं। आन्तरिक दुर्बलताएँ और सम्बद्ध परिजनों के दुहरे मोर्चे पर एक साथ लड़ा। उस आत्मविजय का ही परिणाम है कि आत्मबल संग्रह में अधिक लाभ से लाभान्वित होने का अवसर मिला। यदि दूसरों की तरह पूंजी-पत्री के छुटपुट ताने-बाने बुनते हुए आकाश-पाताल जैसे लाभ उठाने के सपने देखता रहता तो कदाचित् अपने हाथ भी विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ न लगा होता।




ब्राह्मण मन और ऋषि कर्म - Akhandjyoti June 1984

अन्तरंग में ब्राह्मण वृत्ति जगते ही बहिरंग में साधु प्रवृत्ति का उभरना स्वाभाविक है। ब्राह्मण अर्थात् लिप्सा से जूझ सकने योग्य मनोबल का धनी। प्रलोभनों और दबावों का सामना करने में समर्थ। औसत भारतीय स्तर के निर्वाह में काम चलाने से सन्तुष्ट। इन परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने के लिए आरम्भिक जीवन में ही मार्गदर्शक का समर्थ प्रशिक्षण मिला। वही ब्रह्म जन्म था। माता-पिता तो एक माँस पिण्ड को जन्म इससे पहले ही दे चुके थे। ऐसे नर पशुओं का कलेवर न जाने कितनी बार पहनना और छोड़ना पड़ा होगा। तृष्णाओं की पूर्ति के लिए न जाने कितनी बार पाप के पोटले कमाने, लादने, ढोने और भुगतने पड़े होंगे। पर सन्तोष और गर्व इसी जन्म पर है जिसे ब्रह्म जन्म कहा जा सकता है। एक शरीर नर पशु का, दूसरा नर नारायण का प्राप्त करने का सुयोग इसी बार मिला है।

ब्राह्मण के पास सामर्थ्य का भण्डार बच रहता है क्योंकि शरीर यात्रा का गुजारा तो बहुत थोड़े में निपट जाता है। हाथी, ऊँट, भैंसें आदि के पेट बड़े होते हैं, उन्हें उसे भरने के लिए पूरा समय लगे तो बात समझ में आती है। पर मनुष्य के सामने वैसी कठिनाई नहीं है। बीस उँगली वाले दो हाथ- कमाने के, हजार तरकीबें ढूंढ़ निकालने वाला मस्तिष्क- सर्वत्र उपलब्ध विपुल साधन- परिवार सहकार का अभ्यास इतनी सुविधाओं के रहते किसी को भी गुजारे में न कमी पड़नी चाहिए न असुविधा। फिर पेट की लम्बाई चौड़ाई भी तो मात्र छह इंच की है। इतना तो मोर कबूतर भी कमा लेते हैं। मनुष्य के सामने निर्वाह की कोई समस्या नहीं। यह कुछ ही घण्टे परिश्रम में पूरी हो जाती है। फिर सारा समय खाली ही खाली बचता है। उनके अन्तराल में सन्त जाग पड़ता है, वह एक ही बात सोचता है कि समय, श्रम, मनोयोग की जो प्रखरता, प्रतिभा, हस्तगत हुई है, उसका उपयोग कहाँ किया जाय? कैसे किया जाये?

इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने में बहुत देर नहीं लगती। देव मानवों का पुरातन इतिहास इसके लिए प्रमाण उदाहरणों की एक पूरी शृंखला लाकर खड़ी कर देता है। उनमें से, जो भी प्रिय लगे, अनुकूल पड़े, अपने लिए चुना- अपनाया जा सकता है। केवल दैन्य ही हैं जिनकी इच्छाएँ आवश्यकताएँ पूरी नहीं होतीं। कामनाएँ, वासनाएँ, तृष्णायें, कभी किसी की पूरी नहीं हुईं। साधनों के विपुल भण्डार जमा करने और उन्हें अतिशय मात्रा में भोगने की योजनाएँ तो अनेकों ने बनाईं पर हिरण्याक्ष से लेकर सिकन्दर तक कोई भी उन्हें पूरी न कर सका।

आत्मा और परमात्मा का मध्यवर्ती एक मिलन विराम है, जिसे देव मानव कहते हैं। इसके और भी कई नाम हैं- महापुरुष- सन्त, सुधारक, शहीद आदि। पुरातन काल में इन्हें ऋषि कहते थे। ऋषि अर्थात् वे- जिनका अपना निर्वाह न्यूनतम में चलता हो और बची हुई सामर्थ्य सम्पदा को ऐसे कामों में नियोजित किये रहते हों, जो समय की आवश्यकता पूरी करे। वातावरण में सत्प्रवृत्तियों का अनुपात बढ़ाये। जो श्रेष्ठता की दिशा में बढ़ रहे हैं, उन्हें मनोबल अनुकूल न मिले। जो विनाश के लिए आतुर हैं उनके कुचक्रों को सफलता न मिले। संक्षेप में यही हैं वे कार्य निर्धारण जिनके लिए ऋषियों के प्रत्यक्ष और परोक्ष प्रयास अनवरत गति से चलते रहते हैं। निर्वाह से बची हुई क्षमता को वे इन्हीं कार्यों में लगाते रहते हैं। फलतः जब कभी लेखा-जोखा लिया जाता है तब प्रतीत होता है कि वे कितना कार्य कर चुके, कितनी लम्बी मंजिल पार कर ली। यह एक-एक कदम कदम चलते रहने का परिणाम है। एक-एक बूँद जमा करते रहने की ही परिणति है।

अपनी समझ में वह भक्ति नहीं आई जिसमें मात्र भावोन्माद ही हो, आचरण की दृष्टि से सब कुछ क्षम्य हो। न उसका कोई सिद्धान्त जँचा, न उस कथन के औचित्य को विवेक ने स्वीकारा। अतएव जब-जब भक्ति उमगंती रही, ऋषियों का मार्ग ही अनुकरण के योग्य जँचा और जो समय हाथ में था, उसे पूरी तरह ऋषि परम्परा में खपा देने का प्रयत्न चलता रहा। पीछे मुड़कर देखते हैं कि अनवरत प्रयत्न करते रहने वाले कण-कण करके मन जोड़ लेते हैं। चिड़िया तिनका-तिनका बीनकर अच्छा-खासा घोंसला बना लेती है। अपना भी कुछ ऐसा ही सुयोग सौभाग्य है, कि ऋषि परम्परा का अनुकरण करने के लिए कुछ कदम बढ़ाये तो उनकी परिणति ऐसी हुई जिसे समझदार व्यक्ति शानदार कहते हैं।

महर्षि व्यास, चरक, पातंजली, याज्ञवल्क्य, विश्वामित्र, बुद्ध, नारद, परशुराम आदि ऋषियों ने अपने-अपने समय में एकाकी प्रयत्न किये थे। इस प्रकार वे सभी अपने-अपने ढंग से भगवान के हाथ मजबूत करने और उनकी इच्छा पूरी करने में लगे रहे। इसे एक आश्चर्य अथवा सुयोग ही कहना चाहिये कि उपरोक्त सभी ऋषियों की कार्य पद्धति का- दिशोधारा का एक ही स्थान पर समन्वय समावेश बन पड़ा।

जो काम एक ऋषि के लिए कठिनाई से ही पूरा हो सका, उन सबके समन्वय का भार एक व्यक्ति वहन करे, यह किसी प्रकार सम्भव प्रतीत नहीं होता। मानवी बुद्धि इसकी शक्यता स्वीकार नहीं करती पर सच्चे आत्मबल द्वारा उत्पन्न होने वाली सच्ची सिद्धि को क्या कहा जाय जो नकद धर्म की तरह है और हाथों-हाथ अपनी परिणति प्रत्यक्ष उत्पन्न करती है।

विचार ही क्रिया-कृत्यों के जन्मदाता हैं। यदि आज अशुभ, अवाँछनीय वातावरण है तो उसका कारण दुश्चिंतन है। कुकर्म उन्हीं की उत्पत्ति है। दुर्गति को ही दुर्गति की जन्मदात्री माना गया है। अस्तु कुसमय में विचार संशोधन की प्रक्रिया ही हाथ में लेनी पड़ती है। वही लोक सेवा का सर्वोपरि एवं सर्वप्रथम उपाय उपचार है। हमें उसी क्षेत्र को प्राथमिकता देने की प्रेरणा हुई। तद्नुसार विचार-क्रान्ति के प्रथम चरण के रूप में प्रज्ञा अभियान का आलोक जन-जन तक पहुँचाने से अपना कार्य आरम्भ किया। ऋषियों की कार्य पद्धति में यह व्यास परम्परा है। उनने अठारह पुराणों का लेखन किया था। उतना तो अपने लिए कैसे सम्भव होता पर आर्ष साहित्य को सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध कराने का वह कार्य सम्पन्न किया जो एक व्यक्ति के लिए असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य कहा जायेगा।

इसके अतिरिक्त प्रज्ञा साहित्य के लिखने में बहुत कुछ प्रयत्न हुए हैं। उसे प्रारम्भ से ही वरीयता दी है। औसत चार घण्टे नित्य लिखा है। अन्तिम लेखन प्रज्ञा पुराण का चल रहा है। लेखन कार्य को अभी इतनी जल्दी विराम देने का कोई मन नहीं। क्योंकि समय के परिवर्तन और लोक चिन्तन के परिशोधन की आवश्यकता को देखते हुए जो बन पड़ा है, वह बहुत कम है। सूक्ष्मीकरण के उपरान्त भी इसे जारी रखा जायेगा। कोई भी कार्य आवेश में आने पर करना सम्भव है। भूतावेश के नाम पर कई व्यक्ति अनगढ़ काम करते हैं। देवावेश में भी उच्चस्तरीय घटना क्रम घटित होते रहे हैं। हमने देवावेश में जीवन लिया है अन्यथा मात्र अपना बल होता तो कहीं न कहीं शिथिलता अवश्य आती। अब ऋषि आवेश की बारी है। विचार सृजन और लेखन कार्य में हम इस शरीर से या अन्य परखे हुए किसी और शरीर के माध्यम से यह प्रक्रिया जारी रखेंगे। सन् 2000 तक हमारी लेखनी रुकेगी नहीं। प्रज्ञा परिजन अखण्ड-ज्योति के माध्यम से उसे नियमित रूप से पढ़ते रहेंगे। यह व्यास परम्परा के अंतर्गत गतिशील हमारी जीवनचर्या रही है व आगे और भी प्रखर बनेगी।

आज हिंसा प्रतिहिंसा के दौर का कहीं अन्त नहीं दिखाई देता। अनाचार की जड़ें काटनी हों तो कुविचारों का निराकरण करना होता है। सम्भवतः परशुराम ने विचार क्रान्ति अभियान को ठण्डे और गरम दोनों ही उपायों से काबू में लाने का प्रयत्न किया होगा। उनने द्रोणाचार्य की आगे वेद पीछे धनुष वाली नीति अपनाई होगी।

इस परशुराम परम्परा को प्रज्ञा अभियान की सुधार संघर्ष पद्धति में समुचित स्थान दिया गया है। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति में विनम्र और कठोर दोनों ही अध्यायों का समावेश है। सभी स्तर की अवाँछनीयताओं के विरुद्ध असहयोग, विरोध एवं संघर्ष करने के लिए कहा गया है। अपने समाज में फैली हुई अगणित कुरीतियों के विरुद्ध लोहा लिया गया है। दहेज, मृतक भोज, भिक्षा, व्यवसाय, छुआछूत, पर्दा प्रथा, बाल-विवाह, नशा, अस्वच्छता, अशिक्षा आदि के विरुद्ध जो बन पड़ा है उठा नहीं रखा गया है।

नारद परम्परा में गायन-वादन के माध्यम से जन-मानस में भक्ति भावना एवं धर्मधारणा के विस्तार का प्रयास सम्पन्न हुआ। यह कार्य चैतन्य, सूर, कबीर, तुलसी, मीरा, नामदेव, दादू, ज्ञानेश्वर आदि के प्रयासों से जुड़ी एक कड़ी ही है। शान्ति-कुँज में लोक-मानस को तरंगित करने के लिए संगीत को प्रमुखता दी गई है। लोक-शिक्षण और लोकरंजन का समन्वित कार्यक्रम पूरा करने के लिए केन्द्र की शाखाएं- सुगम संगीत विद्यालयों के रूप में चल रही हैं। अब उसमें वीडियो फिल्म का एक साहस भरा सोद्देश्य कदम और सम्मिलित किया गया है। इसे प्रकारांतर से नारद परम्परा ही कह सकते हैं।

मनुष्य अपने आप में एक विद्युत भण्डार है। उसमें ऐसे कलपुर्जे फिट हैं जो भौतिक विज्ञानियों द्वारा अद्यावधि आविष्कृत यन्त्रों की तुलना में कहीं अधिक सही और समर्थ हैं। इस निरर्थक दीखने वाले शरीर और साधारण से मस्तिष्क को किन्हीं विशेष विधियों द्वारा इस योग्य भी बनाया जा सकता हे कि दिव्य शक्तियों का भण्डार दृष्टिगोचर एवं सक्रिय हो सके। यह कार्य साधन विज्ञान द्वारा सम्पन्न होता है। साधनाओं में मन्त्र शक्ति का स्थान सर्वोपरि है। नाद ब्रह्म और शब्द ब्रह्म की साधना से मनुष्य दृश्य और अदृश्य जगत के साथ सम्बन्ध स्थापित कर सकता है और प्रकृति क्षेत्र में जो चल रहा है जो चलने वाला है। उसका पूर्वाभास भी प्राप्त कर सकता है।

गायत्री मन्त्र शक्ति का केन्द्र बिन्दु है। कुछ समय पूर्व तक गायत्री को पण्डित पुरोहितों का- भूत भगाने का- मन्त्र समझा जाता था। अब इसका परिशोधन महर्षि विश्वामित्र की परम्परा में किया गया है और यह प्रत्यक्ष किया गया है कि गायत्री के चौबीस अक्षरों में वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता की क्षमताएँ विद्यमान हैं। वह आद्य शक्ति, युग शक्ति और महाशक्ति के रूप में अपनी महती भूमिका निभा सकती है। इस विज्ञान की नये सिरे से खोज की गई और विश्वामित्र ऋषि की परम्परा की एक अस्त-व्यस्त कड़ी को जोड़ने का नये सिरे से नया किन्तु सफल प्रयत्न किया गया। विश्वामित्र मन्त्र विद्या में पारंगत थे। उन्होंने गायत्री की सिद्धि प्राप्त की एवं शब्द शक्ति की संसार की सर्वोत्तम- सर्वोपयोगी शक्ति सिद्धि करने में अपना जीवन खपा दिया। विज्ञान सम्मत ढंग से जितना बन पड़ा, उसी परम्परा का निर्वाह हमने किया है।

बुद्ध परम्परा में चैत्यों, विहारों, संघारामों की स्थापना को प्रमुखता दी गई। परिव्राजकों को भाषाओं का ज्ञान कराने के लिए नालन्दा और संस्कृतियों का प्रशिक्षण देने के लिए तक्षशिला विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। इन आरण्यकों के माध्यम से कभी हजारों लाखों परिव्राजक प्रशिक्षित हुए थे और उनने सारे संसार का- सारे एशिया का बौद्धिक एवं सामाजिक परिवर्तन किया था, बुद्धिवाद की स्थापना की थी, अन्ध-विश्वासों और कुप्रचलनों को मिटाया था।

यही परम्परा आद्य शंकराचार्य ने छोटे रूप में चार मठ स्थापित करके नये रूप में प्रचलित की थी। चार तीर्थों को सम्प्रदायों और भाषाओं के नाम पर बिखरे हुए देश में एकात्मता उत्पन्न करने का सफल प्रयत्न किया था।

इस तीर्थ परम्परा से प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण कार्य द्वारा नये सिरे से हाथ में लिया गया। 2400 निजी इमारतों वाले शक्तिपीठ और 7500 बिना इमारतों वाले प्रज्ञा संस्थान विनिर्मित किये गये। उनके माध्यम से जन-जागरण में संलग्न युग शिल्पी कार्यकर्ताओं की एक बहुत बड़ी सेना घर-घर अलख जगाने और युग चेतना का आलोक वितरण करने में संलग्न है।

हरिद्वार मथुरा के केन्द्र बहुमुखी प्रवृत्तियों को व्यापक बनाने में संलग्न हैं। अब शान्ति-कुँज में भाषा एवं धर्म विद्यालय की एक नई शृंखला इसी प्रयोजन के लिए जुड़ी है।

परिभ्रमण द्वारा जन-जागरण का तीर्थ परम्परा को ऐसी प्रचार टोलियों द्वारा गतिशील किया गया है जो साइकिलों, मोटर साइकिलों तथा जीप टोलियों द्वारा गाँव-गाँव पहुँचती और युग चेतना से जन-जन को अवगत अनुप्राणित करती हैं।

यह सब बुद्ध परम्परा ही है जिसमें आद्य शंकराचार्य की दिशोधारा भी सम्मिलित है। इसी का अनुगमन अपनी कार्य पद्धति में भी है। उन लोगों का बड़े किन्तु कम केन्द्रों द्वारा जो काम हुआ था, उससे अपनी कार्य पद्धति भी छोटी नहीं हैं। वह अधिक केन्द्रों में विरल होकर फैली हुई है। विदेशों में 74 केन्द्र काम कर रहे हैं।

कभी चरक ने वनौषधियों की खोज की थी। घास पात का साधारणतया कोई महत्व नहीं पर उनने उनमें रोग निवारण और आरोग्य वर्धन की क्षमताएँ देखीं। एक-एक करके खोजीं। समूचा आयुर्वेद शास्त्र रच दिया जिससे समस्त संसार ने लाभ उठाया। किन्तु समय का कुचक्र जो आया कि आज पंसारियों की दुकान पर कुछ की जगह कुछ वर्षों पुरानी सड़ी-गली वनौषधियाँ ही मिलती हैं। जो हैं वे सभी कीमती हैं। बनाने वाले कम मात्रा में डालते हैं। एलोपैथ इस पद्धति को इसलिए स्वीकार नहीं करते कि जड़ी-बूटी में क्या रसायन है और उनका किस रोग पर, किस प्रकार, क्यों व क्या प्रभाव पड़ता है, इसका कोई वैज्ञानिक उत्तर उपलब्ध नहीं है न उनकी वीर्य कालावधि के सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण ही है। “एक्सपायरी डेट” नाम का कोई प्रचलन नहीं। इस सारी कमी की पूर्ति का निश्चय हुआ और जड़ी-बूटी उद्यान लगाने से उनका साँगोपाँग विश्लेषण करने पहचानने तक का काम हाथ में लिया गया। प्रसन्नता की बात है कि उसकी परिणति ऐसी सामने आई है कि उपभोक्ता आश्चर्यचकित रहने लगे हैं। कीमती इन्जेक्शनों को अपनी स्वच्छ-ताजी जड़ी-बूटियों पर निछावर करने लगे हैं। जड़ी-बूटी उद्यान देश भर में लगाने और उनका पुरातन उपयोग पुनः चल पड़ने का एक नया वातावरण बना है।

इस संदर्भ में तुलसी का बिरवा आंगन में स्थापित करने की परम्परा का पुनर्जीवन भी एक है। तुलसी को जड़ी-बूटियों में मूर्धन्य माना गया है। उनमें सभी के तार तत्व हैं। अनुपान भेद से ही किसी भी रोग में उसका उपयोग हो सकता है।

तुलसी की सात्विकता घर के वातावरण में धार्मिकता बढ़ाती है। इसलिए उसकी मान्यता देवता तुल्य है। आँगन में खुला देव मन्दिर बनाने की दृष्टि से तुलसी का बिरवा आँगन में रोपने की पुरातन प्रथा फिर जागृत की गई है। प्रातः सायं आरती, भजन, कीर्तन होने से- दीपक अगरबत्ती जलाने से- सस्ते देवालय की स्थापना का पुण्य प्रयोजन सहज ही पूरा हो जाता है। धुन चढ़ी तो देश भर के लाखों आँगनों में तुलसी के बिरवे रोपने का आन्दोलन चलाया और उसे सफल बनाया।

पुरातन काल में महर्षि पातंजली ने योग साधना के विज्ञान का आविष्कार एवं अभिवर्धन किया था। आसन प्राणायाम द्वारा शारीरिक रोग निवारण की आरोग्य अभिवर्धन की विधियाँ खोज निकाली गई थीं। ध्यान, धारणा, बेध, मुद्रा द्वारा मनोविकारों के शमन का उपाय खोजा गया था। ध्यानयोग, नादयोग, बिन्दुयोग द्वारा स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों को समर्थ बनाने के विज्ञान हस्तगत किया था। कभी इस देश के बाल, वृद्ध, नर-नारी, गृहस्थ सभी योगाभ्यास में अभ्यस्त थे और उस विज्ञान का समुचित लाभ उठाते थे। सभी व्यक्तित्व के धनी थे।

अन्धकार युग ने इस क्षेत्र पर भी पर्दा डाल दिया। योगा के नाम पर न जाने क्या अगड़म-बगड़म चल पड़ा उस जंजाल को हटाकर गहराई में उतरने का प्रयत्न किया गया। पुरातन को नवीनतम रूप में प्रस्तुत किया गया। हर व्यक्ति का समग्र शारीरिक, मानसिक पर्यवेक्षण करके तद्नुसार साधना बताने का उपक्रम अब मात्र शान्ति-कुँज में ही दृष्टिगोचर होता है। कल्प साधना सत्रों की परम्परा ऐसी है जिसका लाभ अगणित लोग उठा चुके हैं। सभी ने अनुभव किया है कि विज्ञान सम्मत योग साधना का उपक्रम और उसका समुचित लाभ प्राप्त करने का सुनियोजित कार्यक्रम जैसा यहाँ चल रहा है यदि वैसा ही अन्यत्र भी रहा होता तो योग विज्ञान की महत्ता प्रदर्शित करने वाले इस देश का स्थान कहीं से कहीं रहा होता।

महर्षि याज्ञवल्क्य ने यज्ञ विज्ञान का सांगोपांग रूप दिया था। महत्वपूर्ण पदार्थों की कारण शक्ति को दिव्य अग्नि के सहारे सूक्ष्मीकृत करके इसे असाधारण शक्ति के रूप में परिणित किया जा सकता है। ऐसी शक्ति के रूप में जो मनुष्य के सूक्ष्म काय-कणों में प्रवेश करके उनका काया-कल्प प्रस्तुत कर सके। अन्तरिक्ष में प्राण ऊर्जा का ऐसा उद्भव कर सके जो पर्जन्य बरसाये, समृद्धि तथा प्रगति का वातावरण बनाये एवं पर्यावरण सन्तुलन स्थापित करे।

पुरातन काल में यज्ञ को भारतीय संस्कृति का पिता माना जाता था। प्रत्येक शुभ कार्य उसी के साथ सम्पन्न होता था। पर अब तो वह एक कर्मकाण्ड मात्र रह गया है। उससे पण्डित पुरोहितों का धन्धा भर चलता है। आवश्यक समझा गया कि इस विद्या को पुनर्जीवन दिया जाय। आदि से अंत तक उसका साँगोपाँग आधार खड़ा किया जाय। तद्नुसार याज्ञवल्क्य परम्परा का पुनर्जीवन प्रस्तुत हो सका। इस संदर्भ में आधुनिकतम उपकरणों की सहायता से यह प्रस्तुत प्रतिपादित किया गया कि यज्ञ एक ऐसा विज्ञान है जिसकी सहायता से प्रदूषण, वातावरण, उत्पादन, परिशोधन आदि की कितनी ही महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं का नये सिरे से उत्कर्ष किया जा सकता है। इसे ऋषि परम्परा का अनुसरण, अन्वेषण अथवा अभिनय जीवन दान कहा जा सकता है।

ऋषि प्रणीत पुरातन विज्ञानों में एक है- “ज्योतिर्विज्ञान”। अन्तर्ग्रही प्रभावों से पृथ्वी के प्राणी और पदार्थ किस प्रकार प्रभावित होते हैं। उसमें से कितना अंश कब, किसके लिए, कितना लाभदायक, कितना हानिकारक होता है, उससे लाभान्वित होने तथा बचने का क्या तरीका है, यह एक समग्र विज्ञान है। भास्कराचार्य, आर्यभट्ट आदि ऋषियों ने इस विधा में प्रवीणता प्राप्त की थी। पीछे यह सब पण्डिताऊ गोरख धन्धे में चला गया। न गणित का ठिकाना रहा न विज्ञान का। आवश्यक यह भी समझा गया कि ज्योतिर्विज्ञान का सामयिक परिशोधन किया जाय। लगन के साथ जो कार्य पकड़ा गया उसे पूरा भी किया गया।

ऋषि परम्परा की टूटी कड़ियों में से कुछ को जोड़ने का उपरोक्त पंक्तियों में वह उल्लेख है जो पिछले दिनों अध्यात्म और विज्ञान की- ब्रह्मवर्चस् शोध साधना द्वारा सम्पन्न किया जाता रहा है। ऐसे प्रसंग एक नहीं अनेकों हैं, जिन पर पिछले साठ वर्षों से प्रयत्न चलता रहा है और यह सिद्ध किया जाता रहा है कि लगनशीलता, तत्परता यदि उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संलग्न हो तो उसके परिणाम कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

सबसे बड़ा और प्रमुख काम अपने जीवन का एक ही है कि प्रस्तुत वातावरण को बदलने के लिए दृश्य और अदृश्य प्रयत्न किये जायें। इन दिनों आस्था संकट सघन है। लोग नीति और मर्यादा को तोड़ने पर बुरी तरह उतारू हैं। फलतः अनाचारों की अभिवृद्धि से अनेकानेक संकटों का माहौल बन गया है। न व्यक्ति सूखी है, न समाज में स्थिरता है। समस्याएँ, विपत्तियाँ, विभीषिकाएँ निरन्तर बढ़ती जा रही हैं। सुधार के प्रयत्न कहीं भी सफल नहीं हो रहे। स्थिर समाधान के लिए जनमानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन यह दो ही उपाय हैं। यह प्रत्यक्ष, रचनात्मक, संगठनात्मक, सुधारात्मक उपयोग द्वारा भी चलने चाहिए और अदृश्य आध्यात्मिक उपचारों द्वारा भी। विगत जीवन में यही किया गया है। समूची सामर्थ्य को इसी में होमा गया है। परिणाम आश्चर्यजनक हुए हैं जो होने वाला है उसे अगले दिनों अप्रत्याशित कहा जाएगा।

एक शब्द में यह ब्राह्मण मनोभूमि द्वारा अपनाई गई सन्त परम्परा अपनाने में की गई तत्परता है। इस प्रकार के प्रयासों में निरत व्यक्ति अपना भी कल्याण करते हैं दूसरे अनेकानेकों का भी।




Quotation - Akhandjyoti June 1984

हो सकता है कि बहस में आपका पक्ष ठीक हो- बिलकुल ठीक हो, परन्तु जहाँ तक दूसरे मनुष्य के मन को बदलने का सम्बन्ध है, निष्फल ही रहेंगे।




हमने आनन्द भरा जीवन जिया - Akhandjyoti June 1984

भगवान जिसे अपनी शरण में लेते हैं, अथवा जो भगवान की शरण में अपना समर्पण भाव लेकर पहुँचता है, उसके ऊपर देव लोक से अजस्र अनुकम्पा बरसने लगती है। उसे तृप्ति, तुष्टि और शान्ति की कहीं कमी नहीं रहती। इसे कोई भी कहीं भी प्रत्यक्ष देख सकता है। हमें यह अनुभूति आजीवन पग-पग पर होती रही है, इसलिए उस आनन्द का सदा सर्वदा रसास्वादन करते रहने का अवसर मिला है, जिसे ब्रह्मानन्द परमानन्द कहते हैं। इसे आत्मानन्द कहा जाय तो और भी अधिक उचित होगा, क्योंकि इसकी उत्पत्ति भीतर से होती है। समझा भर यह जाता है कि जो मिला, वह बाहर का अनुदान वरदान है। पर वास्तविकता निहारने पर पता चलता है, कि यह भीतर का उत्पादन ही बाहर का अनुदान प्रतीत होता है। भीतर वाला खोखला है तो फिर बाहर से कुछ हाथ लगने की आशा चली ही जायगी।

सुर्य में कितना ही प्रकाश क्यों न हो, समीपवर्ती दृश्य कितने ही सुन्दर क्यों न हों पर यदि आँख की पुतली काम न करे तो समझना चाहिए कि सर्वत्र अन्धकार ही अन्धकार है और दिन या रात्रि में कभी भी उसका अन्त न होगा। अपने कान की झिल्ली खराब हो तो फिर गायन वादन या प्रवचन-परामर्श का लाभ ले सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं। अपना मस्तिष्क बिगड़ जाय तो यह समूची दुनिया पागलों से भरी हुई प्रतीत होगी। अपने प्राण निकल जायँ तो फिर इस शरीर को कोई भी साथ या सुरक्षित रखने के लिए तैयार न होगा। अपनत्व का सही होना इस वात का प्रतीक है कि बाहर से भी जो सही है, खिंचकर पास आने लगेगा। अन्यथा बाहर की उपयोगी वस्तुएँ भी अनुपयुक्त स्थान पर जाकर अनुपयुक्त उत्पादन ही करती हैं। साँप को दूध पिलाने पर उससे विष ही उत्पन्न होता है। यद्यपि दूध का गुण विष उत्पन्न करने का है नहीं।

अन्तर ने जब “सियाराम मय सब जग जाना” की मान्यता अपना ली और छिद्रान्वेषण की दुष्प्रवृत्ति का परित्याग करके गुण ग्राहकता अपना ली तो फिर संसार का स्वरूप ही बदल गया। वह दीखने लगा जो दर्शनीय था। वह लुप्त हो गया जो दर्शनीय, कुरूप, अवाँछनीय था। जो सुन्दर है उसे सरस होना ही चाहिए। अपने भीतर से रस बहा तो बाहर से भी उमंगें सम्मिलित होती चली गईं। नदी बहती है तो उसमें समीपवर्ती नाले भी जुड़ते जाते हैं। आगे चलकर वह सरिता समुद्र में जा मिलती है जहाँ अथाह जल राशि के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। यह लाभ बालू के टीलों को नहीं मिलता। वे अन्धड़ के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान तक उड़ते फिरते हैं। धूप निकलते ही आग की तरह तपने लगते हैं। वर्षा होती है तो भी उन्हें शान्ति नहीं। उथली कीचड़ मात्र बनते हैं और किसी जलाशय में पहुँचा देने पर भी तली या किनारे पर फिर बालू के रूप में पूर्ववत् अपने अस्तित्व का परिचय देते हैं।

सदाशयता का दिव्य-दर्शन यही है भगवान की झाँकी जिसे बिना किसी कठिनाई के कोई भी, कहीं भी, कभी भी कर सकता है। अध्यात्म का निर्झर फूटते ही एक नई दृष्टि उत्पन्न हुई, संसार कितना सुन्दर और कितना भला है। इसमें कितनी सद्भावना और सेवा अनुकम्पा भरी पड़ी है। यहाँ जो कुछ है जिसके आधार पर कृतज्ञता ही अनुभव की जाती रहेगी। जो कडुआ लगता है, अप्रिय प्रतीत होता है, उसमें भी बहुत कुछ ऐसा होता है जो आज न सही अपने लिए कल शिक्षाप्रद अनुभव हो सके। सुधारात्मक सेवा साधना करने का अवसर प्रदान कर सके। फिर जो प्रिय है, उपयोगी है, सहयोगी है, उसके गुणानुवादों को यदि थोड़ा बढ़ाकर देखा जा सके तो प्रतीत होगा कि आत्मीयता और सेवा सद्भावना ही चारों ओर से बरस रही हैं। यदा-कदा जो कटुता प्रतीत होती है उसमें भी अपने उस सुधार का तारतम्य छिपा पड़ा है जो अधिक पवित्र, अधिक जागरुक अधिक प्रखर बनने का अवसर प्रदान करता है। यदि प्रतिकूलता न हो तो लोग अपनी जागरुकता ही खो बैठें। सुधार के लिए भी और प्रगति के लिए भी जागरुकता आवश्यक है और वह बिना प्रतिकूलता से पाला पड़े और किसी प्रकार उत्पन्न ही नहीं होती। सुविधा सम्पन्न तो विलासी और आलसी बनकर रह जाते हैं। उन्हें सँभलने, सीखने, सुधरने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। फलतः वे अभागों की तरह जहाँ के तहाँ जड़वत् बने रह जाते हैं। सुविधा और प्रगति में से एक को चुनना हो तो समझदारी सदा असुविधाएँ अपनाकर ऊँचे उठना- आगे बढ़ना स्वीकार करेगी। अपनी मनःस्थिति अध्यात्मवादी दृष्टिकोण ने कुछ ऐसी ही बदल दी जिसमें जहाँ भी नजर उठाकर देखा गया, आनन्द से भरा-पूरा वातावरण ही दीख पड़ा।

यह सब स्व-उपार्जित था, ऐसी मान्यता उदय होते ही कृतघ्नता पनपती और अहमन्यता सिर पर चुड़ैल, डाकिन की तरह चढ़ती है। अहंकारी एक प्रकार का उन्मादी होता है। उसे दूसरों के उपकार दीखते ही नहीं। जो अपना नहीं है, उस कर्तृत्व पर भी दावा करता हे। फलतः धृष्टता बढ़ती है। साथ ही वे लोग जो उस सफलता में प्रत्यक्ष था परोक्ष रूप से सहयोगी थे, खिन्न होते हैं। सहयोगियों की नाराजी, किसी के लिए भी भारी पड़ेगी। कम से कम इन परिस्थितियों में जबकि व्यक्ति एकाकी नहीं रहा। अपने को सबके साथ और सबको अपने साथ वह जोड़ता है। इसमें अनुकूलता तभी रहती है, जब सभी सहयोगी या सम्बन्ध व्यक्ति अपने साथ प्रत्युत्तर में सफलता अनुभव करें। इस व्यावहारिक दृष्टि से भी सघन आत्मीयता की अभिव्यक्ति अपनी ओर से होना आवश्यक है। यह तभी हो सकती है जब वस्तुतः वैसी अनुभूति भी हो। दिखावटी अभिव्यक्ति को अन्तराल कुछ ही समय में नंगी करके रख देता है। वे आवरण उठाने पर भी टिकती ठहरती नहीं।

इस विराट् विश्व के कण-कण से अपने को अजस्र अनुकम्पा बरसती दीखी और उसकी सघन अनुभूति निरन्तर होती रही। लम्बा जीवन इसी उल्लास का रसास्वादन करते हुए बीता है। प्रतिकूलता शत्रुता, अभाव, भय, आशंका, अपेक्षा आदि का अनुभव होते ही सब कुछ नीरस हो जाता है। इतना ही नहीं, भयानक भी दीखने लगता है। यही है- अपने मन का चोर जो चारों ओर प्रेत पिशाच बनकर नाचता है और जीवन की सुख-शान्ति को निगल जाता है। भीतर विक्षोभ पड़े हों तो बाहर विद्रूपता रहेगी ही। भीतर शान्ति और सन्तोष हो तो बाहर स्नेह, सौजन्य भरा वातावरण दीखेगा ही।

चारों ओर दृष्टि पसार कर जब भी देखा, भगवान अनुग्रह बरसाते दीखे। काया पर दृष्टि डाली तो वह बिना कोई अड़ंगा अटकाये, इच्छित क्रिया-कलाप में संलग्न दीखी। बात यह भी थी कि उसे हैरान भी नहीं किया गया। असंयम से चटोरेपन से न पेट खराब किया गया और न जीवनी शक्ति के भण्डार को खोखला। नियमित दिनचर्या अपना कर ऐसा कुछ नहीं किया गया, जिससे काया कोसती और काम करते समय रोग-शोक, दुर्बलता आदि का बहाना बनाती। अभी भी जब छुरे की चोट लगने के दिनों काया की जाँच पड़ताल हुई तो एक्सरे में हड्डियां ऐसी पाई गईं मानो वे अठारह वर्ष के लड़के की हों। रक्त जाँचा गया तो उसमें हिमोग्लोबीनलौह आदि की वैसी कमी न थी जैसी कि पचहत्तर वर्ष के बुड्ढों के शरीर में रक्तस्राव के बाद आमतौर से होनी चाहिए। रक्त चाप, हृदय गति, पाचन तन्त्र, निद्रा आदि से सम्बन्धित सभी अवयव अपना-अपना काम ठीक प्रकार करते पाये गये। इस आधार पर काया के प्रति आपसी कृतज्ञता कम नहीं जो, आजीवन साथ रही और काम से बिना जी चुराये, ईमानदारी के साथ पूरा-पूरा परिश्रम करती रही।

इसके बाद दूसरा नम्बर है- सहधर्मिणी का। उन्होंने भी प्रायः आधी शताब्दी ऐसे ही सहायता की जैसे काया छाया का अभिन्न सम्बन्ध कहा जाता है। हम लोगों की जन्मजात मनःस्थिति ऐसी है, जिसमें बिना गृहस्थ बनाये भी जीवन क्रम भली प्रकार चल सकता था। पर सर्वसाधारण के लिए उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यही उपयुक्त समझा गया कि गृहस्थ बनाकर रहा जाय। इससे आत्मिक प्रगति में कोई व्यवधान नहीं पड़ता वरन् सुविधा ही रहती है। दोनों एक-दूसरे के चौकीदार संरक्षक, सहयोगी, पूरक बनकर रहते हैं तो काम हलका हो जाता है और मंजिल आसान पड़ती है।

माताजी की सेवा सहायताओं का वर्णन करना तो यहाँ आत्मश्लाघा जैसा होगा, ऐसा करने पर तो अपनी काया की भी उतनी ही सराहना करनी पड़ेगी। फिर अनेकों मित्र कुटुम्बी स्नेही, सहयोगी, निकटवर्ती, दूरवर्ती ऐसे गिने जा सकते हैं जिन्होंने यदा-कदा नहीं, अनवरत सेवा सहायताएँ की हैं। माताजी का दर्जा उनमें कुछ ऊँचा बैठता है क्योंकि उनका स्नेह सहयोग ही नहीं, वात्सल्य भी हमने भरपूर पाया है। सन्तानें भी उनकी हैं। उनके प्रति भी उनकी ममता न रह हो ऐसी बात नहीं है। पर हमें वे उनसे अधिक उदारतापूर्वक परिपोषण देती रही हैं, उनका मूल्याँकन, तुलनात्मक दृष्टि से कम नहीं किया जा सकता। वे अनवरत रूप से सहधर्मिणी रही हैं। उनके कारण हमें निजी जीवन में भी धर्मधारणा पर अडिग रहने और दूसरों को उस दिशा में चला सकने में असाधारण सहायता मिली है। एक शब्द में उन्हें “सजल श्रद्धा” कहा जा सकता है। उनकी काया में है तो हाड़माँस भी पर कोई कण ऐसा नहीं है जिसमें श्रद्धा कूट-कूटकर न भरी हो। संपर्क में आने वाले हमारी प्रज्ञा से निष्ठावान बने हैं वरन् उनकी श्रद्धा के साथ वात्सल्य पाकर निष्ठावान बने हैं। मिशन को अग्रगामी बनाने में किसने कितना योगदान दिया जब इसका लेखा-जोखा भगवान के घर लिखा जायेगा तो कदाचित् मूर्धन्यों में माताजी का नाम ही अग्रणी होगा। यह श्रद्धा का उत्पादन है और उसकी उर्वर धारित्री के रूप में हम सब माताजी की जीवन्त प्रतिभा के रूप में साक्षात्कार करते हैं।

काया माता के अनुग्रह से और माता जी भगवान के वरदान की तरह हमें मिली। उनका समुचित सम्मान करने में कदाचित ही कभी चूक की हो। स्नेह तो वे ही देती रही हैं। हम कहाँ से दे पाते? एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता है कि उनने बांये हाथ जैसी नहीं दाहिने हाथ जैसी भूमिका निभाई है। कभी सोचते हैं कि यदि वे साथ न रही होतीं, तो हम इतना कर पाते क्या, जो कर सके? उनकी वात्सल्य ने हमारी ही तरह समूचे गायत्री परिवार को- उनके माध्यम से दूरवर्ती वातावरण को कृतकृत्य किया है।

हमें अगणित विज्ञान और अविज्ञात व्यक्तियों की प्रत्यक्ष और परोक्ष सेवा सहायता स्मरण आती और पुलकित करती रही है। यदि उस अमृत वर्षा का लाभ न मिलता तो हम अकेले क्या कर पाते? अकेले तो अन्न, वस्त्र, निवास, पुस्तक, कलम जैसी आवश्यक वस्तुएँ तक अपने बलबूते उपार्जित न कर पाते। वाणी का उच्चारण कठिन पड़ता और जो जानकारियाँ उपलब्ध हैं, उनमें से एक को प्राप्त कर सकना भी सम्भव न रहा होता। अगणितों के सहयोग का ही प्रतिफल है कि हम जीवित, स्वस्थ और प्रबुद्ध हैं। जिन कामों से श्रेय हमें मिलता है, उनमें से प्रत्येक के पीछे असंख्यों-असंख्यों का छोटा-बड़ा- ज्ञात-अज्ञात- सहयोग जोड़ा हुआ है। लोगों को उनका विवरण नहीं मालूम है, उससे क्या हमारी अन्तरात्मा तो अनुभव करती है, कि वह सहयोग वर्षा अनवरत रूप से न बरसती होती तो फिर कदाचित् ही उनमें से कोई काम बन पड़ता, जिनका श्रेय अनायास ही हमारे पल्ले बँध गया है।

कृतज्ञता हमारे रोम-रोम में बसी है। भूतकाल की जितनी घटनाओं का स्मरण करते हैं उन सबमें असंख्यों के अहसान ही अहसान बरसते दीखते हैं। स्नेह, सौजन्य, मार्गदर्शन, प्रोत्साहन यह भी तो सहयोग के ही परोक्ष स्वरूप हैं। यदि वे न मिल पाते तो वनमानुषों और नर-पामरों से अधिक अच्छी स्थिति अपनी भी नहीं होती। यह लाभ अन्यान्यों को भी मिला होगा किंतु अन्तर इतना ही है कि लोग अपनी ओर से जो लोगों के साथ किया गया है, उसे बढ़ा-चढ़ाकर याद रखते हैं और बदले में लम्बी चौड़ी आशाएँ पूरी होने में जहाँ कभी देखते हैं, वहीं भड़क उठते हैं। इस अर्थ में दुनिया तोता चश्म भी है और अहसान फरोश भी। पर जब हम दृष्टिकोण में मौलिक अन्तर और करलें मात्र दूसरों की भलाइयाँ सोचें, अपने करे धरे पर धूल डालें तो फिर प्रसन्नता का पारावार न रहे। हमारी कृतज्ञता सम्पन्न अन्तरात्मा चारों ओर बिखरे व्यक्तियों, प्राणियों प्रकृति पदार्थों पर दृष्टिपात करती है तो उसे सर्वत्र सदाशयता ही सदाशयता दृष्टिगोचर होती है। जिनने कुछ हानिकारक प्रतीत होने वाले काम किये हैं उनके सत्परिणाम ढूंढ़ लेने के कारण क्षोभ नहीं उभरा वरन् उस घटना के साथ सुयोग जुड़ा ही परिलक्षित हुआ है।

उदाहरण के लिए इसी आठ जनवरी को एक अपरिचित सज्जन ने छुरों से आक्रमण बोल दिया। कितने ही गहरे घाव लगे। वे अपना रिवाल्वर छोड़कर भी भाग खड़े हुए। कदाचित चलाने पर भी वह चला नहीं था।भाग जाने पर भी क्रुद्ध लोगों ने उनके असली नाम-गाँव का पता लगा लिया और बदला चुका लेने का निश्चय किया। यह उनकी बात रही। तीन महीने बिस्तर में पड़े रहने और ठीक होने में लगे। इस बीच हमें एक योगाभ्यास करने का अवसर मिला घावों की पीड़ा में भी हँसते-मुस्कुराते रहा जा सकता है क्या? दुःख के समय भी भगवान का विश्वास यथावत् बना रह सकता है क्या? यह दोनों ही साधनाएं घायल परिस्थितियों में चलती रही और सफल हुई। सोचता हूँ, जिन सज्जनों के कारण यह नई भावनात्मक परिपक्वता प्राप्त हुई उनका अहसान क्यों न माना जाय?

अपने हाथ अपने ही घातक हथगोले से अपना पैर तोड़ लेने और जेल जा पहुँचने के समाचार से जब हमें अवगत कराया गया तो हमें तनिक भी प्रसन्नता नहीं हुई। प्रतिशोध आदि से अन्त तक तिरोहित हो चला था। केवल एक अपरिचित सज्जन अनगढ़ कृत्य करते स्मृति के किसी कोने में रह गये थे। लोगों ने जब सारी परिस्थितियाँ उसके अनुकूल होते हुए भी हमारी सुरक्षा ढाल का बखान शुरू किया और कहा उन पर न रिवाल्वर चला न छुरा। इन शब्दों ने एक और नया उत्साह बढ़ाया कि अनायास ही इतने शूरवीर और किसी अज्ञात संरक्षण से आच्छादित होने का श्रेय मिल गया। इसके लिए उन प्रकार कर्त्ता महोदय का कृतज्ञ क्यों न रहा जाय?

अमृत वर्षा का प्रत्यक्ष रसास्वादन किसी को नहीं मिला, क्योंकि इस धरती की बनावट में हर प्राणी और हर पदार्थ परिवर्तनशील है। अमृत पाकर अमर बनने की कल्पना एक अलंकार मात्र है। फिर क्या अमृत का रसास्वादन नहीं हो सकता है। जिसे आत्मानन्द, ब्रह्मानन्द, परमानन्द आदि कहा गया है उसे नहीं चखा जा सकता है। हमारा अनुभव है कि यह सर्वथा सम्भव है। इसके लिए विधायक पक्ष का चिन्तन करने का अभ्यास डालने की आवश्यकता है। इस संसार में सदाशयता कहाँ है, कितनी है, अपने साथ उसका कितना, कब, किनके द्वारा पाला पड़ा है, इसका स्मरण करते रहा जाय तो भूतकाल अतीव आनन्द से भरा-पूरा प्रतीत होगा। इस स्तर की घटनाएँ अपने अन्तराल में ऐसी गुदगुदी उत्पन्न करेंगी, जिनकी स्मृति से भी पुलकन उत्पन्न होती रहें। जीवन कृत-कृत्य हुआ अनुभव होता रहे।

यह जीवन मात्र भूतकाल से ही बँधा हुआ नहीं है। उसके साथ वर्तमान और भविष्य भी जुड़ा हुआ है। वर्तमान के प्रयासों में आदर्शों का समावेश और कर्त्तव्यों का परिपालन जुड़ा रखने से जो कुछ बन पड़ रहा है वह अपने लिए गर्व नहीं तो सन्तोष तो दे ही सकता है। भविष्य में क्या परिणाम होंगे, इस सम्बन्ध में निराशा, असफलता की बात क्यों सोची जाय? जब भविष्य अनिश्चित ही है तो अशुभ की आशंका करने से क्या लाभ? क्यों न शुभ का चिन्तन किया जाय? क्यों न सफलता का स्वप्न देखा जाय? उससे भी अच्छा यह है कि हर भली-बुरी परिस्थिति के लिए तैयार रहा जाय। अच्छे से अच्छे सपने देखे और बुरे से बुरे के लिए साहस पूर्वक तैयार रहें तो यह सन्तुलित मनोभूमि बनाये रहने वाली अपने कर्त्तव्य धर्म का परिपालन करते हुए हर परिस्थिति में प्रसन्न रह सकता है।

हमने इसी मनःस्थिति में प्रसन्नता भरा जीवन जिया है। इसके लिए उपयुक्त मनोभूमि प्राप्त की है और विश्वास परिपक्व किया है कि जो भी इस प्रकार सोचकर सीखेंगे, सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी होने का हाथों-हाथ पुलकन भरा लाभ प्राप्त करेंगे।




Quotation - Akhandjyoti June 1984

उत्तम पुस्तक के साथ नरक में भी स्वर्ग तुल्य रहा जा सकता है।




अध्यात्म की यथार्थता और परिणति - Akhandjyoti June 1984

मोटेतौर से शरीर को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है (1) हाथ (2) पैर (3) धड़ (4) सिर। बारीकियों में उतारना हो तो उनमें से प्रत्येक के अनेकानेक भाग-विभाजन हो सकते हैं। हृदय, फेफड़े, जिगर, आमाशय, आँतें आदि अकेले धड़ के ही विभाग हैं। फिर उनमें से भी प्रत्येक की अनेकानेक बारीकियाँ हैं। इसी प्रकार हमारे जीवन को मोटेतौर से (1) निर्वाह-परिवार (2) उपासना (3) स्वतन्त्रता संग्राम (4) धर्मतन्त्र से लोकशिक्षण। इन चार भागों में बाँटा जा सकता है। इनमें से प्रत्येक के साथ कितनी ही रोचक, आकर्षक और शिक्षाप्रद घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। उसमें से यदि कुछ का भी विवेचन वर्णन किया जाय तो विस्तार बहुत बड़ा हो जायेगा। इनमें से जहाँ-तहाँ के प्रसंग भी रोचक हैं और उन्हें औपन्यासिक ढंग से लिखने पर तो वे सरस और पढ़ने योग्य भी बन सकते हैं। उदाहरणार्थ- जेल जीवन में कंकड़, तसला और एक अँग्रेजी अखबार, बस इतने भर से काम चलाऊ अँग्रेजी का अभ्यास कर लेना। उदाहरणार्थ- पाँच व्यक्तियों के परिवार का 200 रु. मासिक में बजट बनाना और उसका संतोषजनक ढंग से निभाना। उदाहरणार्थ- जेल में चिड़ियों के साथ खेलने का शौक आरम्भ करना- घर आने पर चुहियों और गिलहरियों का इतना अभ्यस्त हो जाना कि देर होने पर थाली में से रोटी लेकर भागने लगें। गायत्री तपोभूमि के डडडडड, कबूतर हाथ से रोटी खाने आते थे। यह सिलसिला हिमालय वास में चला और कितने ही पशु-पक्षी साथ खाने को अभ्यस्त हो गये। इन प्रसंगों में मानव प्रकृति को दिशाबद्ध करने और उसके सत्परिणाम हाथों-हाथ दीखने के निष्कर्ष निकलते हैं।

हमारा यहाँ पाठकों का मनोरंजन विषय वस्तु नहीं है और न हमारे पास एवं पाठकों के पास समय है, न ही कागज स्याही की उतनी सुविधा है कि उस तरह का लिखा और छापा जाय। इन पंक्तियों के लिखने का प्रयोजन मात्र यह है कि अध्यात्म विज्ञान के अनुभवों और प्रयोगों का स्वरूप यथा परिणाम समझने में सर्वसाधारण को सुविधा मिले। लोगों को भौतिक विज्ञान की परिणतियों का ज्ञान है। उसके आधार पर स्वास्थ्य, सौंदर्य विलास, रौब, वैभव आदि के प्रदर्शन का अवसर मिलता है। इसलिए हर किसी का प्रयत्न चलता है कि भौतिक क्षेत्र की अधिकाधिक जानकारी एवं सुविधा सामग्री प्राप्त करे। वस्तुस्थिति जानने पर उस ओर समुचित प्रयत्न पुरुषार्थ चलने की बात भी स्वाभाविक है। इसके विपरीत अध्यात्म क्षेत्र जो भौतिक की तुलना में असंख्य गुना अधिक फलदायक है, आज पूरी तरह दुर्दशाग्रस्त है। उसके प्रति उपेक्षा और अवज्ञा ही दृष्टिगोचर होती है। सस्ती मोल की लाटरी लगाने और सट्टा खेलने वाले ही कुछ अनगढ़ लोग इस क्षेत्र में दृष्टिगोचर होते हैं। शिकार न फँसने पर निराश होते, गालियाँ सुनाते देखे जाते हैं। कुछ ज्यों-त्यों करके लकीर पीटते रहते हैं। ऐसी दशा में उचित मूल्य पर उचित माल खरीदने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

अध्यात्म विज्ञान मनुष्य के उत्कर्ष और वैभव का एक मात्र अवलम्बन है। शरीर पर आत्मा का ही आधिपत्य है। उसी की गरिमा से जीवन का तारतम्य चलता है। संचालक के सही स्थिति में- सही मार्ग पर होने से ही सुखी और प्रगतिशील जीवन जिया जा सकता है। पदार्थ जगत को भौतिक विज्ञान और चेतना क्षेत्र को अध्यात्म विज्ञान के आधार पर सुनियोजित किया जाता है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि भौतिक विज्ञान का उपार्जन वाला पक्ष हाथ में है और उपयोग वाले पक्ष की बुरी तरह अवमानना हो रही है। अध्यात्म विज्ञान का तो एक तरह से सफाया ही समझा जाना चाहिए। न किसी को उपार्जन के सम्बन्ध में जानकारी है न उपयोग की सूझ-बूझ। बाजीगरी और पाकेट मारी जैसी एक कल्पना लोगों के दिमाग में रहती है। जिनका मन आ जाता है, वे उसी के अनुरूप सस्ते एवं ओंधे-सीधे प्रयोग करते रहते हैं। ऐसी दशा में परिणाम तो होना ही क्या है? निराशा और खीज से ग्रस्त ही इस क्षेत्र में पाये जाते हैं। भीड़ बढ़ती जाती है पर साथ ही खोखलापन भी स्पष्ट हो जाता है।

इन परिस्थितियों में आवश्यक प्रतीत हुआ कि अध्यात्म विज्ञान के महत्व, सही स्वरूप एवं प्रतिफल से सर्वसाधारण को अवगत कराया जाय। ताकि लोग उस विधा और विद्या से अवगत हों जो उनके लिए सर्वोत्तम सत्परिणाम उत्पन्न कर सकती है। इसके लिए शस्त्रकारो आप्तवचनों, कथा पुराणों की साक्षियाँ देने की अपेक्षा यही अधिक उत्तम समझा गया कि एक प्रामाणिक अनुभव- अनुसन्धान का सार्वजनिक प्रकटीकरण किया जाय। इसने वस्तुस्थिति जानने में सुविधा होगी और जो इस विज्ञान की उपयोगिता- आवश्यकता अनुभव करेंगे व उसे उपलब्ध करने के लिए उपयुक्त साहस एवं पुरुषार्थ संजोने का प्रयत्न करेंगे।

हमारी जीवनचर्या में दृष्टव्य वे पक्ष हैं जो महत्वपूर्ण सफलताओं को प्रस्तुत- प्रदर्शित करते हैं। इनमें से एक विवरण उन घटनाओं का है जिन्हें असाधारण सफलताएं कहा जा सकता है। प्रचुर साधन- उपयुक्त साधन होते पर तो इस संसार में बड़े-बड़े काम सम्पन्न हुए हैं होते रहते हैं। आश्चर्य वहाँ होता है, जहाँ साधन रहित एकाकी व्यक्ति किन्हीं दुस्साहस स्तर के कार्यों को हाथ, में लेता है और उन्हें पूरा कर दिखाता है। यह किस प्रकार सम्भव हुआ? इसकी व्याख्या लोग “साधना से सिद्धि के रूप में करते हैं। इनके मूल में मनोबल की प्रखरता एवं व्यक्तित्व का प्रामाणिकता के अतिरिक्त और कोई प्रत्यक्ष कारण दीख नहीं पड़ता। इन्हें कोई चाहे तो ईश्वर का- देवता का वरदान कह सकता है। यह मात्र अपने लिए ही घटित नहीं हुआ। संसार में प्रायः सभी महामानवों की जीवनचर्या में इसी स्तर के चमत्कारों की भरमार है। आरम्भिक स्थिति में वे सामान्यजनों जैसे थे। अन्ततः ऐसे काम कर सकने में समर्थ हुए, जिन्हें असामान्यों जैसे कहा जा सकता है। इसका मध्यवर्ती तारतम्य कैसे बैठा? सुयोग्य कैसे जमा? परिस्थितियां किस प्रकार अनुकूल होती चली गईं? इन प्रश्नों के उत्तर घटनाक्रम की दृष्टि से तो पृथक-पृथक ही हैं, पर तारतम्य की दृष्टि से उनका प्रवाह एक ही प्रकार रहा है वे आदर्शों के प्रति आस्थावान रहे हैं। जीवन-क्रम में पवित्रता, प्रखरता और प्रामाणिकता का अधिकाधिक समावेश करते रहे हैं।

कार्यपद्धति ऐसी बनाते रहे हैं जिसमें निजी निर्वाह न्यूनतम में करने के उपरान्त जितनी भी सामर्थ्य बची उसे सामयिक आवश्यकता के लोग-मंगल कार्यों में नियोजित करते रहे हैं। इससे उन्हें तिहरा लाभ मिला है। निरन्तर आत्म सन्तोष प्राप्त करते रहे हैं फलतः शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक जीवन में हँसती-हँसाती परिस्थितियों से भरे-पूरे रहे हैं। इसके अतिरिक्त प्रामाणिकता और प्रखरता के आधार पर लोक-सम्मान और जन सहयोग अर्जित करते रहे हैं। यह दोनों साधन जिसे उपलब्ध होंगे, उसकी कार्यक्षमता सामान्यजनों की अपेक्षा अनेक गुनी बढ़ जायगी। लोग टूटते और हारते तो तब हैं जब निजी जीवन में अन्तर्द्वन्द्वों की भरमार रहती है और बहिरंग जीवन में विरोध विद्वेषों का सामना करना पड़ता है। सफलताओं के लिए योग्य और उपयुक्त पराक्रम भी इन अंतरंग और बहिरंग विपन्नताओं की चट्टानों से टकराकर चूर-चूर होता रहता है हाथ में काम भी ऐसे लिये जाये हैं जिनमें स्वार्थ, विलास, ग्रह और वैभव की ललक भरी रहने से परिस्थितियाँ भी प्रतिद्वन्द्विता के मैदान में घसीट ले जाती हैं। दाव पेचों और प्रतियोगिताओं में उलझा मनुष्य कठिनाई से ही कुछ सफलताएँ हस्तगत कर पाता है।

इसके अतिरिक्त तीसरा पक्ष है- दैवी सहायता का। वह सत्प्रयोजनों के लिए सदा से सुरक्षित रहा है। अन्यथा असहयोग एवं अभाव के मध्य काम करने वाला कोई व्यक्ति अब तक आदर्शवादी अवलम्बन में सफलता प्राप्त कर ही नहीं पाता। इस विश्व व्यवस्था के सूक्ष्म अन्तराल में नियति का कुछ ऐसा दिव्य विधान क्रिया रत है। सदुद्देश्यों की पूर्ति के लिए कहीं से अदृश्य सहायताएं प्रेषित करता रहता है। दृष्ट दुर्गति वालों के मार्ग में ऐसे अवरोध खड़े करता रहा है जिनसे सर्व समर्थ होते हुए भी वे सफलता के उस स्तर तक न पहुँच पाये जहाँ तक कि वे चाहते हैं। सर्व समर्थ असुरों के पराभव के पीछे यही विधि-विधान काम करता रहा है। सज्जनों की आश्चर्यजनक सफलता के पीछे भी यही अदृश्य शक्ति काम करती रही है। उसे भगवान नाम दिया जाता रहा है। उसी को भक्त की सहायता करने वाली और असुर निकंदिनी शक्ति कहा जाता रहा है।

“साधना से सिद्धि” प्रकरण में उन छोटी-छोटी घटनाओं का उल्लेख किया है जो हमारे जीवन क्रम में घटित हुई। कौशल और साधन के अभाव में- आवश्यकता से कम समय में उनका पूरा हो जाना बताता है कि यहाँ अध्यात्म विज्ञान के मौलिक सिद्धान्तों को अपनाया और पालन किया गया। इसमें किसी व्यक्ति विशेष की प्रशंसा नहीं है वरन् अध्यात्म विज्ञान के उन मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन है जिन्हें अपनाने वाला कोई भी व्यक्ति आदर्शवादिता के क्षेत्र में द्रुतगति से आगे बढ़ सकता है आश्चर्यजनक सफलता अर्जित कर सकता है।

पिछले पृष्ठों पर एक दूसरा अध्याय और भी द्रष्टव्य है। वह है- आकांक्षा और अभिरुचि की दिशाधारा के मिलने का। हर व्यक्ति अपने मन का स्वामी है। कुछ भी सोचने और कुछ भी करने के लिए वह स्वतन्त्र है। पर आमतौर से वैसा होता नहीं। लोग प्रचलनों का अनुकरण करते हैं, हवा के साथ बहते हैं लहरों में तैरते हैं। जो कुछ बहुत लोगों द्वारा किया जा रहा है उसी का अपनाने में सुविधा अनुभव करते हैं। इन दिनों बुरी हवा बह रही है। हर कोई सम्पन्नता और विलासिता के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहता है। संग्रह की ललक लगी है और अहंता के प्रदर्शन में जो भी सरंजाम जुट सकता है, जुटाने में निरत रहता है। संक्षेप में यही है आज की प्रथा परम्परा प्रश्न आवश्यकता का नहीं कि किसे निर्वाह के लिए क्या चाहिए? प्रश्न सर्वथा भिन्न है। बड़प्पन अर्जित करने के लिए कौन दूसरों की तुलना में कितना विलासी और कितना संग्रही बन सकता है, दूसरों पर रौब गाँठने के लिए कौन कितना अपव्ययी ठाठ-बाट जुटा सकता है। आदर्शों की लोग कथा वार्ता में चर्चा तो करते हैं पर उनका जीवन में समावेश अव्यावहारिक मानते हैं। अवसर मिलने पर दुर्व्यसनों और कुकर्मों से भी नहीं चूकते। वे उन दुष्परिणामों से बचते रहने को चातुर्य कहते हैं। जो जितना चातुर्य दिखा सकते हैं वे उतना ही अधिक मूँछों पर ताव देते हैं। कुरीतियाँ भी इसी प्रचलन में सम्मिलित हो गई हैं। नशेबाजी, खर्चीली शादियाँ, पर्दा प्रथा, छूतछात, भिक्षा व्यवसाय जैसे सामाजिक दुमुँग अब किसी को अखरते तक नहीं। बातूनी असहमति भर प्रकट करके लोग इन्हें मान्यता देते और व्यवहार में अपनाये रहते हैं।

संक्षेप में यही है आज का प्रचलन प्रवाह। जिसे औसत आदमी अनायास ही अपनाये रहते हैं। अध्यात्म तत्वज्ञान अपनाने का दूसरा प्रभाव अपने ऊपर यह हुआ कि प्रचलित मान्यताओं में से एकोएक के प्रति अविश्वास उत्पन्न कर दिया और इसके लिए बाधित किया कि जो कुछ सोचा जाय, नये सिरे से सोचा जाय। तर्क, तथ्य, प्रमाण और औचित्य की कसौटी पर हर प्रचलन को कसा जाय और उसमें से उन्हीं को अंगीकार किया जाय जमानवी गरिमा की कसौटी पर खरे सिद्ध हों।

दूरदर्शी विवेकशीलता, अध्यात्म विज्ञान को सच्चे मन से अपनाने की देन है। शास्त्रकारों ने इसी को प्रज्ञा कहा है। वेदमाता, देवमाता, विश्वमाता आदि नामों से इसी की अभ्यर्थना की गई है।

चारों ओर संव्याप्त अन्धकार में हमें अपना दीपक जलाना पड़ा। अपनी कुल्हाड़ी से झाड़ियाँ काटकर राह बनानी पड़ी। एकाकी चलना पड़ा। साथियों में से कोई भी इस दुस्साहस में सहयोगी बनने के लिए तैयार न हुआ। जिससे भी पूछा- ओंधे प्रचलन को अस्वीकार करना चाहिए और जो सच है उसे अपनाने के लिए एकाकी साहस करना चाहिए”, इसे किसी ने भी न स्वीकारा प्रवाह के विरोध में चलने के दुष्परिणाम सभी ने समझाये। कहा- बहती नदी में हाथी तक लहरों की दिशा में बहने में खैर मानते हैं तो तुम किस खेत की मूली हो। उत्तर में अपने पास एक ही उदाहरण था- मछली का। जो धार को चीरती हुई उल्टी दिशा में बहती है। जब मछली उलटी तैर सकती है तो हम क्यों नहीं तैर सकते? इसके उत्तर में प्रायः सभी का मिलता जुलता जवाब था- “पहले मछली बनो, तब बात करना।

सूर्य एक है- अन्धेरा व्यापक। सूर्य सत्य है। अन्धेरा प्रकाश के अभाव का विस्तार। इसलिए वह झूँठ है। अध्यात्म जिसे क्रियाकाण्ड से पहले आदर्श रूप में अपनाया था उसने कहा- एकाकी रहने से- एकाकी चलने में हर्ज नहीं। अनीति को समर्पण करके उसके स्वर्ण रथ पर बैठने से इन्कार करना चाहिए, सत्य की दिशा पकड़नी चाहिए, भले ही घिसटते हुए चलना पड़े। वही अवलम्बन है जो ऋषि परम्परा अपनायी और उनने जो काम किये थे उनमें से जितने बन पड़े, उनका यथासंभव अनुकरण करने का प्रयास किया। देवता पूजा के लिए हैं। ऋषि नमन वन्दन के लिए। आज इनमें से एक भी ऐसा नहीं माना जाता जिन्हें भावना, आकाँक्षा, विचारणा और जीवनचर्या में कोई स्थान देने के लिए साहस कर सके।

पुरातन काल में अनेकों ऋषि हुए हैं। अपने अपने-अपने समय में परिस्थितियों के अनुरूप रीति-नीति अपनाई है। स्वयं साधना-रत रहे और दूसरों को युग धर्म अपनाने की प्रेरणा देने का प्रयास किया है। कहा जाता है कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का मध्यवर्ती स्वरूप ऋषि है। सन्त अब इसलिए नहीं कहा जा सकता कि उसके साथ अनेकानेक जंजाल गुँथ गये हैं। सन्त भगवान से अपनी मर्जी पूरी कराने लगे हैं। अपने को सर्वतोभावेन भगवान को समर्पण नहीं करते। इसलिए वह वर्ग इन दिनों विलुप्त हो चला, किन्तु प्राचीन काल का प्रतीक शब्द ‘ऋषि’ विद्यमान है। उस ऊंचाई तक पहुँचने का किसी को साहस नहीं हुआ। इसलिए कम से कम शब्दार्थ की दृष्टि से तो अपनी पवित्रता बनाये हुए है।

ऋषि कौन है कौन नहीं? इस प्रश्न का विवेचन यहाँ व्यर्थ है। सार्थक इतना ही है कि ऋषि परम्परा जीवित रहे। उसी स्तर की भावनाएँ उठें और उनकी प्रेरणा से मनुष्य योजनाएँ बनायें। गतिविधियाँ निर्धारित करे और संकल्पपूर्वक जो व्रत लिया है उस पर बिना पैर डगमगाये आदि से अन्त तक चलता रहे।

हमारे जीवन में ऋषि परम्परा का जितना समावेश दृष्टिगोचर हो, समझना चाहिए उतनी ही मात्रा में सच्चे अध्यात्मवाद का प्रवेश हुआ है। सप्त ऋषियों ने कभी इस देश का- विश्व का सच्चे अर्थों में उत्थान किया था। सतयुग का वातावरण धरती पर उतारा था। इन्हीं हाड़-मांस के मनुष्य में देवत्व का अवतरण किया था। यह ऋषि परम्परा है, जिसे पुनर्जीवित होना चाहिए। अध्यात्म की यथार्थता और ऋषि परम्परा को आपस में सघनतापूर्वक गुँथना चाहिए।

भूमि की उर्वरता और उपयुक्त बीज का आरोपण उचित परिस्थितियों में भली प्रकार फूलता है। उस फसल को यदि खर्चा न जाता, बार-बार बोया जाता रहे तो कुछ ही बार की फेरा बदली में उसमें व्यापक क्षेत्र में वही फसल लहलहाती हुई दीख पड़ेगी।

अध्यात्म यदि यथार्थवादी सिद्धान्तों पर आधारित हो और उसे सघन श्रद्धा के साथ अपनाया जाय तो उसकी परिणति भी ऐसी ही होती है। कुछेक व्यक्तियों द्वारा किया गया यह प्रयत्न सारा वातावरण बदल सकता है। कभी सतयुगी परिस्थितियाँ इसी आधार पर बनी थीं। उसी का प्रत्यावर्तन अब फिर आवश्यक है। सत्पात्र इस दिशा में बढ़ें तो अपना और असंख्यों का कल्याण कर सकते हैं। प्रतिभा और प्रेरणा का उभयपक्षीय लाभ इस आधार पर समस्त संसार उठा सकता है।

हमारी जीवनचर्या को घटना क्रम की दृष्टि से नहीं वरन् इस पर्यवेक्षण की दृष्टि से पढ़ना चाहिए कि उसमें दैवी अनुग्रह के अवतरण होने से साधना से सिद्धि वाला प्रसंग जुड़ा या नहीं। इसी प्रकार यह भी दृष्टव्य है कि दूसरों के अवलम्बन योग्य आध्यात्मिकता का प्रस्तुतीकरण करते हुए हमारे कदम ऋषि परम्परा अपनाने के लिए बढ़े या नहीं? जिसे जितनी यथार्थता मिले वह उतनी ही मात्रा में यह अनुमान लगाये कि अध्यात्म विज्ञान का वास्तविक स्वरूप यही है। आन्तरिक पवित्रता और बहिरंग की प्रखरता में जो जितना आदर्शवादी समन्वय कर सकेगा वह उन विभूतियों से लाभान्वित होगा जो अध्यात्म तत्वज्ञान एवं क्रिया-विधान के साथ जोड़ी और बताई गई हैं।




स्थूल का सूक्ष्म में परिवर्तन - Akhandjyoti June 1984

युग परिवर्तन की यह ऐतिहासिक बेला है। इन बीस वर्षों में हमें जमकर काम करने की ड्यूटी सौंपी गई है। सन् 1980 से लेकर अब तक के चार वर्षों में जो काम हुआ है, वह पिछले 30 वर्षों की तुलना में कहीं अधिक है। समय की आवश्यकता के अनुरूप तत्परता बरती गई है और खपत को ध्यान में रखते हुए तद्नुरूप शक्ति उपार्जित की गई है। यह वर्ष कितनी जागरुकता, तन्मयता, एकाग्रता और पुरुषार्थ की चरम सीमा तक पहुंचकर व्यतीत करने पड़े हैं, उनका उल्लेख उचित न होगा। क्योंकि इस तत्परता का प्रतिफल 2400 प्रज्ञा पीठों और 7500 प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण के अतिरिक्त और कुछ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता। एक कड़ी हर दिन एक फोल्डर लिखने की इसमें और जोड़ी जा सकती है। शेष सब कुछ परोक्ष है। परोक्ष का प्रत्यक्ष लेखा जोखा किस प्रकार सम्भव हो?

युग सन्धि की बेला में अभी 16 वर्ष और रह जाते हैं। इस अवधि में गतिचक्र और भी तेजी से भ्रमण करेगा। एक ओर उसकी गति बढ़ानी होगी, दूसरी ओर रोकनी। विनाश को रोकने और विकास को बढ़ाने की आवश्यकता पड़ेगी। दोनों ही गतियाँ इन दिनों मन्थर हैं। इस हिसाब से सन् 2000 तक उस लक्ष्य की उपलब्धि न हो सकेगी जो अभीष्ट है। इसलिए सृष्टि के प्रयास चक्र निश्चित रूप से तीव्र होंगे। उसमें हमारी भी गीध- गिलहरी जैसी भूमिका है। काम कौन, कब, क्या किस प्रकार करे- यह बात आगे की है। प्रश्न जिम्मेदारी का है। युद्ध काल में जो जिम्मेदारी सेनापति की होती है, वही खाना पकाने वाले की भी। आपत्ति काल में उपेक्षा कोई भी नहीं बरत सकता।

इस अवधि में एक साथ कई मोर्चों पर एक साथ लड़ाई लड़नी होगी। समय ऐसे भी आते हैं जब खेत की फसल काटना, जानवरों के चारा लाना, बीमार लड़के का इलाज कराना, मुकदमे की तारीख पर हाजिर होना घर आये मेहमान का स्वागत करना जैसे कई काम एक ही आदमी को एक ही समय पर करने होते हैं। युद्धकाल में तो यह बहुमुखी चिन्तन और उत्तरदायित्व और भी अधिक सघन तथा विरल हो जाता है। किस मोर्चे पर कितने सैनिक भेजना, जो लड़ रहे हैं, उनके लिए गोला बारूद कम न पड़ने देना, रसद का प्रबन्ध रखना, अस्पताल का दुरुस्त होना,मरे हुए सैनिकों को ठिकाने लगाना, अगले मोर्चे के लिए खाइयाँ खोदना जैसे काम बहुमुखी होते हैं। सभी पर समान ध्यान देना होता है। एक में भी चूक होने से बात बिगड़ जाती है। करा-धरा चौपट हो जाता है।

हमें अपनी प्रवृत्तियां बहुमुखी बढ़ा लेने के लिए कहा गया है। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई स्थूल शरीर का सीमा बन्धन है। यह सीमित है, सीमित क्षेत्र में ही काम कर सकता है। सीमित ही वजन उठा सकता है। काम असीम क्षेत्र से सम्बन्धित हैं और ऐसे हैं जिनमें एक साथ कितनों से ही वास्ता पड़ना चाहिए। यह कैसे बने? इसके लिए एक तरीका यह है कि स्थूल शरीर को बिल्कुल ही छोड़ा दिया जाय और जो करना है उसे पूरी तरह एक या अनेक सूक्ष्म शरीरों से सम्पन्न करते रहा जाय। निर्देशक को यदि यही उचित लगेगा तो उसे निपटाने में पल भर की भी देर न लगेगी। स्थूल शरीरों का एक झंझट है कि उनके साथ कर्मफल के भोग विधान जुड़ जाते हैं। यदि लेन-देन बाकी रहे तो अगले जन्म तक वह भार लदा चला जाता है और फिर खींचतान करता है। ऐसी दशा में उसके भोग भुगतते हुए जाने में निश्चिन्तता रहती है।

रामकृष्ण परमहंस ने आशीर्वाद वरदान बहुत दिए थे। उपार्जित पुण्य भण्डार कम था। हिसाब चुकाने के लिए गले का कैन्सर बुलाया गया। बेबाकी तब हुई। आद्य शंकराचार्य को भी भगन्दर का फोड़ा ही जान लेकर गया था। महात्मा नारायण स्वामी को भी ऐसा ही रोग सहना पड़ा। गुरु गोलवलकर कैन्सर से पीड़ित होकर डडडडडस्सी हुए। ऐसे ही अन्य उदाहरण भी हैं जिनमें पुण्यात्माओं को अन्तिम समय व्यथा पूर्वक बिताना पड़ा। इसमें उनके पापों का दण्ड कारण नहीं होता वह पुण्य व्यतिरेक की भरपाई करना होता है। वे कइयों का कष्ट अपने ऊपर लेते रहते हैं। बीच में चुका सके तो ठीक अन्यथा अन्तिम समय हिसाब-किताब बराबर करते हैं, ताकि आगे के लिए कोई झंझट शेष न रहे और जीवन मुक्त स्थिति बने रहने में पीछे का कोई कर्मफल व्यवधान उत्पन्न न करे।

मूल प्रश्न जीव सत्ता के सूक्ष्मीकरण का है। सूक्ष्म व्यापक होता है। बहुमुखी भी। एक ही समय में कई जगह काम सकता है। कई उत्तरदायित्व एक साथ ओढ़ सकता है। जबकि स्थूल के लिए एक स्थान, एक सीमा के बन्धन हैं। स्थूल शरीरधारी अपने भाग-दौड़ क्षेत्र में ही काम करेगा। साथ ही भाषा ज्ञान के अनुरूप विचारों का आदान-प्रदान कर सकेगा। किन्तु सूक्ष्म में प्रवेश करने पर भाषा सम्बन्धी झंझट दूर हो जाते हैं विचारों का आदान-प्रदान चल पड़ता है। विचार सीधे मस्तिष्क या अन्तराल तक पहुँचाए जा सकते हैं। उनके लिए भाषा माध्यम आवश्यक नहीं। व्यापकता की दृष्टि से यह एक बहुत बड़ी सुविधा है। यातायात की व्यवस्था भी स्थूल- शरीरधारी को चाहिए। परों के सहारे तो वह घण्टे में प्रायः तीन मील ही चल पाता है।वाहन जिस गति का होगा, उसकी दौड़ भी उतनी ही रह जायगी। एक व्यक्ति की एक जीभ होती है। उसका उच्चारण उसी से होगा। किन्तु सूक्ष्म शरीर की इन्द्रियों पर इस प्रकार का बन्धन नहीं है। उनकी देखने की, सुनने की, बोलने की सामर्थ्य स्थूल शरीर की तुलना में अनेक गुनी हो जाती है। एक ही शरीर समयानुसार अनेक शरीरों में भी प्रतिभासित हो सकता है। रास के समय श्रीकृष्ण के अनेकों शरीर गोपियों को अपने साथ सहनृत्य करते दीखते थे। कंस वध के समय तथा सिया स्वयंवर के समय उपस्थित समुदाय को राम और कृष्ण की विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ दृष्टिगोचर हुई थीं। विराट् रूप दर्शन में भगवान् ने अर्जुन को, यशोदा को जो दर्शन कराया था, वह उनके सूक्ष्म एवं कारण शरीर का ही आभास था। अलंकार काव्य के रूप में उसकी व्याख्या की जाती है, सो भी किसी सीमा तक ठीक ही है।

यह स्थिति शरीर त्यागते ही हर किसी को उपलब्ध हो जाय हय सम्भव नहीं। भूत-प्रेत चले तो सूक्ष्म शरीर में जाते हैं पर वे बहुत ही अनगढ़ स्थिति में रहते हैं। मात्र संबंधित लोगों को ही अपनी आवश्यकताएँ बताने भर के कुछ दृश्य कठिनाई से दिखा सकते हैं। पितर स्तर की आत्माएँ उनसे कहीं अधिक सक्षम होती हैं। उनका विवेक एवं व्यवहार कहीं अधिक उदात्त होता है। इसके लिए उनका सूक्ष्म शरीर पहले से ही परिष्कृत हो चुका होता है। सूक्ष्म शरीरों को उच्चस्तरीय क्षमता सम्पन्न बनाने के लिए विशेष प्रयत्न करने पड़ते हैं। व तपस्वी स्तर के होते हैं। सामान्य काया को सिद्ध पुरुष स्तर की बनाने के लिए अनेक साधनाएँ करनी पड़ती हैं इससे अगला कदम सूक्ष्मीकरण का है सिद्ध पुरुष अपनी काया की सीमा में रहकर जो दिव्य क्षमता अर्जित कर सकते हैं, कर लेते हैं। उसी से दूसरों की सेवा सहायता करते हैं। किन्तु सूक्ष्म शरीर विकसित कर लेने वाले उन सिद्धियों के भी धनी देखे गए हैं जिन्हें योगशास्त्र में अणिमा, महिमा, लघिमा आदि कहा गया है। शरीर का हलका, भारी, दृश्य, अदृश्य हो जाना, यहाँ से वहाँ जा पहुँचना, प्रत्यक्ष शरीर के रहते हुए सम्भव नहीं। क्योंकि शरीरगत परमाणुओं की संरचना ही ऐसी नहीं है जो पदार्थ विज्ञान की सीमा मर्यादा से बाहर जा सके। कोई मनुष्य हवा में नहीं उड़ सकता और न पानी पर चल सकता है। यदि ऐसा कर सका होता तो उसने वैज्ञानिकों जूमेंकी चुनौती अवश्य स्वीकार की होती और प्रयोगशाला जाकर विज्ञान के प्रतिपादनों में एक नया अध्यात्म अवश्य ही जोड़ा हाता। किंवदंतियों के आधार पर कोई किसी से इस स्तर की सिद्धियों का बखान करने भी लगे, तो उसे अत्युक्ति ही माना जायेगा। अब प्रत्यक्ष को प्रामाणित किए बिना किसी की गति नहीं।

प्रश्न सूक्ष्मीकरण का है। यह एक विशेष साधना है, जो स्थूल शरीर में रहते हुए भी की जा सकती है और उसे त्यागने के उपरान्त भी करनी पड़ती है। दोनों ही परिस्थितियों में यह स्थिति बिना अतिरिक्त प्रयोग-पुरुषार्थ के- तप साधना के- सम्भव नहीं हो सकती। इसे योगाभ्यास तपश्चर्या का अगला चरण कहना चाहिए।

इसके लिए किसे क्या करना होगा, यह उसके वर्तमान स्तर एवं उच्चस्तरीय मार्गदर्शन पर निर्भर है। सबके लिए एक पाठ्यक्रम नहीं हो सकता। किन्तु इतना अवश्य है कि अपनी शक्तियों का बहिरंग अपव्यय रोकना पड़ता है। अण्डा जब तक पक नहीं जाता तब तक एक खोखले में बन्द रहता है। इसके बाद वह इस छिलके को तोड़कर चलने-फिरने और दौड़ने-उड़ने लगता है। लगभग यही अभ्यास सूक्ष्मीकरण के हैं। प्राचीन काल में गुफा सेवन, समाधि आदि का प्रयोग प्रायः इसी निमित्त होता था।

सूक्ष्म शरीर धारियों का वर्णन और विवरण पुरातन ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक मिलाता है। यक्ष और युधिष्ठिर के मध्य विग्रह तथा विवाद का महाभारत में विस्तार पूर्वक वर्णन है। यक्ष, गंधर्व, ब्रह्मराक्षस जैसे कई वर्ग सूक्ष्म शरीर धारियों के थे। विक्रमादित्य के साथ पाँच “वीर” रहते थे। शिवजी के गण “वीरभद्र’ कहलाते थे। भूत, प्रेत जिन्न, समानों की अलग ही बिरादरी थी। ‘अलाद्दीन का चिराग’ जिनने पढ़ा है। उन्हें इस समुदाय की गतिविधियों की जानकारी होगी। छाया पुरुष साधना में अपने निज के शरीर से ही एक अतिरिक्त सत्ता गढ़ ली जाती है और वह एक समर्थ अदृश्य साथी सहयोगी जैसा काम करती है।

इन सूक्ष्म शरीर धारियों में अधिकाँश का उल्लेख हानिकर या नैतिक दृष्टि से हेय स्तर पर हुआ है। सम्भव है उन दिनों अतृप्त विक्षुब्ध स्तर के योद्धा रणभूमि में मरने के उपरान्त ऐसे ही कुछ हो जाते रहे हों। उन दिनों युद्धों की मार-काट ही सर्वत्र संव्याप्त थी, पर साथ ही सूक्ष्म शरीरधारी देवर्षियों का भी कम उल्लेख नहीं है। राजर्षि और ब्रह्मर्षि तो स्थूल शरीरधारी ही होते थे पर जिनकी गति सूक्ष्म शरीर में भी काम करती थी वे देवर्षि कहलाते थे। वे वायुभूत होकर विचरण करते थे। लोक-लोकान्तरों में जा सकते थे। जहाँ आवश्यकता अनुभव करते थे वहाँ भक्त जनों का मार्गदर्शन करने के लिए अनायास ही जा पहुँचते थे।

ऋषियों में से अन्य कइयों के भी ऐसे उल्लेख मिलते हैं। वे समय-समय पर धैर्य देने, मार्गदर्शन करने या जहाँ आवश्यकता समझी है, वहाँ पहुंचे हैं, प्रकट हुए हैं। पैरों से चलकर उन्हें जाना नहीं पड़ा है। अभी भी हिमालय के कई यात्री ऐसा विवरण सुनाते हैं कि राह भटक जाने पर कोई उन्हें साथ ले गया और उपयुक्त स्थल तक छोड़कर चला गया। कइयों ने किन्हीं गुफाओं में, शिखरों पर अदृश्य योगियों को दृश्य तथा दृश्य को अदृश्य होते देखा है। तिब्बत के लामाओं की ऐसी कितनी ही कथा-गाथाएँ सुनी गई हैं। थियोसोफिकल सोसायटी की मान्यता है कि अभी भी हिमालय के ध्रुव केन्द्र पर एक ऐसी मण्डली है जो विश्व शान्ति में योगदान करती है। इसे उन्होंने ‘अदृश्य सहायक’ नाम दिया है।

यहाँ स्मरण रखने योग्य बात यह है कि यह देवर्षि समुदाय भी मनुष्यों का ही एक विकसित वर्ग है। योगियों सिद्ध पुरुषों और महामानवों की तरह वह सेवा-सहायता में दूसरों की अपेक्षा अधिक समर्थ पाया जाता है। पर यह मान बैठना गलती होगी कि वे सर्व समर्थ हैं और किसी की भी मनोकामना को तत्काल पूरी कर सकते हैं, या अमोघ वरदान दे सकते हैं। कर्मफल की वरिष्ठता सर्वोपरि है। उसे भगवान ही घटा या मिटा सकते हैं। मनुष्य की सामर्थ्य से वह बाहर है। जिस प्रकार बीमार की चिकित्सक, विपत्ति ग्रस्त की धनी सहायता कर सकता है ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म शरीरधारी देवर्षि भी समय-समय पर सत्कर्मों के निमित्त बुलाने पर अथवा बिना बुलाये भी सहायता के लिए दौड़ते हैं। इससे बहुत लाभ भी मिलता है। इतने पर भी किसी को यह नहीं मान बैठना चाहिए कि पुरुषार्थ की आवश्यकता ही नहीं रही, या उनके आड़े आते ही निश्चित सफलता मिल गई। यदि ऐसा रहा होता तो लोग उन्हीं का आसरा लेकर निश्चिन्त हो जाते और फिर निजी पुरुषार्थ की आवश्यकता न समझते। निजी कर्मफल आड़े आने- परिस्थितियों के बाधक होने की बात को ध्यान में ही न रखते।

यहाँ एक अच्छा उदाहरण हमारे हिमालयवासी गुरुदेव का है। सूक्ष्म शरीरधारी होने के कारण ही वे उस प्रकार के वातावरण में रह पाते हैं, जहाँ जीवन निर्वाह के कोई साधन नहीं हैं। समय-समय पर हमारा मार्गदर्शन और सहायता करते रहते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें कुछ करना ही नहीं पड़ा, कोई कठिनाई मार्ग में आई ही नहीं, कभी असफलता मिली ही नहीं। यह भी होता रहा है। पर निश्चित है कि हम एकाकी जो कर सकते थे उसकी अपेक्षा उस दिव्य सहयोग से मनोबल बहुत बढ़ा-चढ़ा रहा है। उचित मार्गदर्शन मिला है। कठिनाई के दिनों में धैर्य और साहस यथावत् स्थिर रहा है। यह कम नहीं है। इतनी ही आशा दूसरों से करनी भी चाहिए। सब काम करके कोई और रख जाएगा ऐसी आशा तो भगवान् से भी नहीं करनी चाहिए। भूल यही होती रही कि दैवी सहायता का नाम लेते ही लोग समझते हैं कि वह जादू की छड़ी घूमा और मनचाहा काम बन गया। ऐसे ही अतिवादी लोग क्षण भर में आस्था खो बैठते देखे गए हैं। दैवी शक्तियों से, सूक्ष्म शरीरों से हमें सामयिक सहायता की आशा करना चाहिए। साथ ही अपनी जिम्मेदारियाँ आप वहन करने के लिए कटिबद्ध भी रहना चाहिए। असफलताओं तथा कठिनाइयों का अच्छा शिक्षक मानकर अगले कदम अधिक सावधानी के, अधिक बहादुरी के उठाने की तैयारी करनी चाहिए।

सूक्ष्म शरीरों की शक्ति सामान्यतः भी अधिक होती है। दूर दर्शन, दूर श्रवण, पूर्वाभास, विचार-सम्प्रेषण आदि में प्रायः सूक्ष्म शरीरों की ही भूमिका रहती है। उनकी सहायता से कितनों को ही विपत्तियों से उबरने का अवसर मिला है। कइयों को ऐसी सहायताएँ मिली हैं जिनके बिना उनका कार्य रुका ही पड़ा रहता। दो सच्चे मित्र मिलने से लोगों की हिम्मत कई गुना बढ़ जाती है। वैसा ही अनुभव अदृश्य सहायकों के साथ सम्बन्ध जुड़ने से भी करना चाहिए।

जिस प्रकार अपना दृश्य संसार है और उसमें दृश्य शरीर वाले जीवधारी रहते हैं। ठीक उसी प्रकार उससे जुड़ा हुआ एक अदृश्य लोक भी है। उसमें सूक्ष्म शरीरधारी निवास करते हैं। इनमें कुछ बिलकुल साधारण, कुछ दुरात्मा और कुछ अत्यन्त उच्चस्तर के होते हैं। वे मनुष्य लोक में समुचित दिलचस्पी लेते हैं। बिगड़ों को सुधारना और सुधरों को अधिक सफल बनाने में अयाचित सहायता करते रहते हैं। फिर सहयोग मांगने का प्रयोजन और मांगने वाले का स्तर उपयुक्त होने पर तो वह सहायता और भी अच्छी तरह और भी बढ़ी मात्रा में मिलती है।

यह सूक्ष्म शरीरों की, सूक्ष्म लोक की सामान्य चर्चा हुई। प्रसंग अपने आपे का है। यह विषम बेला है। इसमें प्रत्यक्ष शरीरों वाले, प्रत्यक्ष उपाय-उपचारों से जो कर सकते हैं सो तो कर ही रहे हैं। करना भी चाहिए। पर दीखता है कि उतने भर से काम चलेगा नहीं। सशक्त सूक्ष्म शरीरों को बिगड़ों को अधिक न बिगड़ने देने के लिए अपना जोर लगाना पड़ेगा। सँभालने के लिए जो प्रक्रिया चल रही है वह पर्याप्त न होगी। उसे और भी अधिक सरल-सफल बनाने के लिए अदृश्य सहायता की भी आवश्यकता पड़ेगी। यह सामूहिक समस्याओं के लिए भी आवश्यक होगा और व्यक्तिगत रूप से सत्प्रयोजनों में संलग्न व्यक्तित्वों को अग्रगामी- यशस्वी बनाने की दृष्टि से भी।




Quotation - Akhandjyoti June 1984

गुणग्राहिता हृदय से निकलती है और चापलूसी दाँतों से। गुण ग्राहिता निःस्वार्थ होती है और चापलूसी स्वार्थमय।

हमें यह काम सौंपा गया है तो उसे करने में आनाकानी कैसी? दिव्य सत्ता के संकेतों पर चिरकाल से चलते आ रहे हैं और जब तक आत्मबोध जागृत रहेगा तब तक यही स्थिति बनी रहेगी। यही गतिविधि चलेगी। यह विषम बेला है, इन दिनों दृश्य और अदृश्य क्षेत्र में जो विषाक्तता भरी हुई है उसका परिशोधन प्रयास अविलम्ब आवश्यक हो गया है। तो संजीवनी बूटी लाने के लिए पर्वत उखाड़ लाने और सुषैन वैद्य की खोज में जाने के लिए जो भी करना पड़े, करना ही चाहिए। यह कार्य स्थूल शरीर से बनता न देखकर सूक्ष्म शरीर को प्रसुप्त से जागृत स्थिति में लाने के लिए हमें अविलम्ब जुटना पड़ रहा है।




मूर्धन्यों को झकझोरने वाला हमारा भागीरथी पुरुषार्थ - Akhandjyoti June 1984

धरती पर रहने वाले मनुष्यों में से तीन चौथाई संख्या बालकों, असमर्थों, न कमाने वालों की है। इनके अतिरिक्त भी जो बचते हैं उनमें बड़ा भाग उनका है जिनकी दुनिया पेट-प्रजनन तक सीमित है। दिन गुजारने के अतिरिक्त न उनकी कोई महत्वाकाँक्षा है, न क्षमता। धरती अधिकाँश इन्हीं के भार से लदी है। जिनमें दूरदर्शी विवेकशीलता की मात्रा विद्यमान है वस्तुतः उन्हीं को मनुष्य कहना सार्थक है। वे अपनी, समाज की, समय की समस्याओं पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने और उनके समाधान खोजने में सक्षम भी हैं।

हमारी भावी क्षमता इसी समुदाय के लिए कार्यरत रहेगी। सूक्ष्मीकरण के उपरान्त जो भी कुछ कार्यक्षमता हस्तगत होगी उसका उपयोग इस जाग्रत समुदाय के निमित्त ही होगी। इन जागृतों में वे बालक भी सम्मिलित हैं जो आयु या शरीर की दृष्टि से छोटे होते हुए भी भविष्य में कुछ करने की क्षमता पूर्वजन्मों से ही सँजोये हुए हैं। एक शब्द में हमारे कार्यक्षेत्र को जागृत आत्माओं का समुदाय कह सकते हैं। हम इस वर्ग के पीछे लगेंगे और प्रयत्न करेंगे कि उनकी सहायता से सृष्टा का वह प्रयोजन पूरा हो जिसमें मनुष्य को अशुभ से बचाकर उज्ज्वल भविष्य तक घसीट ले जाया जाना है।

अपने कार्यक्षेत्र के हम तीन विभाग करते हैं। एक मूर्धन्य। द्वितीय मध्यम। तीसरे कनिष्ठ। मूर्धन्यों में संसार के भाग्य-विधाताओं की गणना होती है, जो संसार को अपनी उँगलियों पर नचाते हैं। इनमें चार स्तर के लोग हैं। एक वे जिन्हें राजनेता कहते हैं। दूसरे वैज्ञानिक, तीसरे धनाध्यक्ष, चौथे मनीषी- जिनमें साहित्यकार, कलाकार से लेकर सेनापति तक वे सभी लोग आते हैं जो अपनी प्रतिभा से परिस्थितियों को असाधारण रूप से प्रभावित करते हैं। सारी समस्याएँ इन्हीं चारों का समुदाय उपजाता है और चाहे तो समेट भी सकता है। पर ऐसा होता नहीं दीखता।

युद्ध की दृष्टि से दो भागों में बँटी हुई दुनिया अब झगड़ते-झगड़ते इतनी समीप आ गई है कि किसी को भी पीछे हटना कठिन पड़ रहा है। विपक्षी दबोच ले तो हम कहीं के भी न रहेंगे- यह डर खाये जा रहा है। साथ ही अर्थचक्र जिस ढर्रे पर घुमा दिया है, उसमें यही एक राह है कि जो चल रहा है वह चलते रहने दिया जाय। अन्यथा पूँजी व्यय हो जाएगी। कारखाने बन्द होंगे। बेकारी फैलेगी और उपद्रव होंगे।

इन असमंजसों का हल किसी को सूझा नहीं रहा है। न आगे बढ़ने में ठिकाना न पीछे हटने में। ऐसी दशा में सर्वनाश के अतिरिक्त और क्या हल हो सकता है यह ढूंढ़ना समझदारी का काम है। समय रहते यह प्रकट होगी। नये विकल्प सूझेंगे। पीछे हटने में भलाई लगेगी। विनाश-साधना बनाने के स्थान पर सृजन के लिए अभी नये निर्माण का क्षेत्र बहुत बड़ा खाली पड़ा है। उसकी ओर मुड़ने में, दिशा बदलने में वर्तमान ढर्रे में उलट-पुलट तो बहुत करनी पड़ेगी पर ऐसी नहीं है जो न हो सके। यह कार्य, चारों मूर्धन्यों के मनःक्षेत्र में यदि नयी सूझ-बूझ उदय हो तो हो सकता है। वह होगी भी। शासनाध्यक्ष अपने ढंग से सोचेंगे और धनाध्यक्षों की पूँजी सुरक्षित रखने और बढ़ाने के नये विकल्प ध्यान में आयेंगे। वैज्ञानिकों को नये मार्ग मिलेंगे। सूर्य-ऊर्जा का दोहन, समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाना, खाद्य-उत्पादन जैसे कितने ही काम ऐसे हैं जो वैज्ञानिकों द्वारा इन्हीं दिनों किए जाने चाहिए। अन्तरिक्ष यात्रा और सर्वनाशी आयुध बनाना उतना जरूरी नहीं है। इस प्रकार साहित्यकारों, कलाकारों के लिए मानवी गरिमा को मान्यता देने वाली विचारणा एवं भाव सम्वेदना देने का बहुत बड़ा काम करने के लिए सूना पड़ा है। क्या आवश्यकता कि वे धनाध्यक्षों के लिए ‘कसाई के कूकर’ की भूमिका निबाहें और वह करें जो न तो आवश्यक है और न शोभनीय।

इन चारों में अगले ही दिनों फूट पड़ेगी। अभी तो मिल-जुलकर काम कर रहे हैं और संयुक्त प्रयास से गाड़ी प्रलय युद्ध की ओर सरपट चाल से दौड़ रही है। पर अगले दिनों चारों घोड़े अपनी-अपनी मर्जी प्रकट करेंगे और अलग-अलग दिशा में चलने की सोचने लगेंगे और अपनी मर्जी के अनुरूप दिशा निर्धारित करेंगे तो फिर यह विनाश-तन्त्र इस रूप में न रहेगा जिसमें कि आज है।

युद्ध के उपरान्त दूसरी समस्या है औद्योगीकरण की। विशालकाय यन्त्रों ने जनता का शहरीकरण किया है और उसके कारण अनेकों संकट भरी समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। उपनिवेशवाद को उसी के कारण प्रोत्साहन मिला है। पूँजीवाद पनपा है। प्रदूषण के कारण सर्वत्र विष व्यापा है। यह भी एक धीमा महायुद्ध है जो चलता रहा तो सर्वनाश किये बिना रुकेगा नहीं। भले ही अणुयुद्ध की तुलना में देर लगे।

हमारा प्रयत्न होगा कि सादगी आन्दोलन चले। विकेन्द्रीकरण की बात सूझे। लोग हाथ की बनी वस्तुओं से काम चलाने की आदत डालें। फैशन छोड़ें। अपव्यय, ठाट-बाट के विरुद्ध जनता में घृणा-भाव उत्पन्न हो। लोग शहरों से विमुख हों। कस्बे पनपें। गाँधीजी ने स्वराज्य आन्दोलन के साथ-साथ खादी को जोड़ा था। तब यह विचित्र लगता था। पर अब अर्थशास्त्र का दूरदर्शी विद्यार्थी यह स्वीकार करता है कि यदि शान्ति से रहना है तो सादगी को जीवनचर्या में अविच्छिन्न स्थान देना पड़ेगा। बड़े कारखाने मात्र मशीन बनाने जैसे अनिवार्य प्रयोजनों के लिए रहें, पर उन्हें जन-जीवन की आवश्यकताओं के क्षेत्र में प्रवेश न करने दिया जाय। वस्त्र-उद्योग विशेषतया हाथ करघों के लिए सुरक्षित रहे। दैनिक आवश्यकता की अन्यान्य वस्तुएँ गाँव में बनें। इस कार्य में शायद पूँजीपति और सरकारें सहमत न हों। तो भी यह सादगी की, हाथ उद्योग की, देहातों में लौटने की हवा जनसामान्य में प्रारम्भ करनी होगी। इसके बिना बेकारी का और कोई विकल्प नहीं। प्रदूषण से निपटने के लिए छोटे उद्योग, छोटे कारखाने देहातों में चलाने से काम बन सकता है। खाली स्थानों पर पेड़ लगाने के लिए हर सम्भव प्रयत्न किए जायें क्योंकि बढ़ते प्रदूषण से बचने के लिए वही एक कारगर उपचार है। वाहनों की द्रुतगामिता कम की जा सकती है। बैलगाड़ियां काम में लाई जा सकती हैं। बिजली से चलने वाले वाहन भी विनिर्मित हो सकते हैं। साइकिल युग तो लौटने ही वाला है।

शिक्षा क्रान्ति इन्हीं सिद्धान्तों पर अवलम्बित है। नौकरी के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करने की वर्तमान भेड़चाल ने युवा वर्ग को दिग्भ्रान्त, निराश एवं क्षुब्ध किया है। शिक्षा ऐसी हो जो दैनिक जीवन की सभी आवश्यकताओं की जानकारी दे। विशेषज्ञ बनने के इच्छुक हैं, उन विषयों को पढ़ें। सर्वसाधारण पर निरर्थक भार ने लदे।

अभी तो समूची मानव-जाति अनेक टुकड़ों में बँटी है और विश्व परिवार का कोई सुयोग नहीं बन पड़ रहा है पर वह दिन दूर नहीं जब एक राष्ट्र, एक भाषा एवं संस्कृति और एक व्यवस्था इस संसार में चलेगी और विग्रह न्यायालयों द्वारा निपटाये जाया करेंगे। बड़े युद्धों की कहीं आवश्यकता न पड़ेगी। स्थानीय झंझट पुलिस निपटा लिया करेगी। सामर्थ्य भर काम- आवश्यकतानुरूप दाम की जब अर्थनीति चलेगी और विलास तथा संग्रह पर अंकुश रहेगा तो अपराधों का आधारभूत कारण ही समाप्त हो जायेगा। चिंतन, चरित्र और व्यवहार में जब शिक्षा व्यवस्था तथा प्रचलन परम्परा द्वारा आदर्शों के समावेश का भरपूर प्रयत्न रहेगा तो कोई कारण नहीं कि उन जघन्य अपराधों का अस्तित्व बना रहे जो आज सर्वत्र बेतरह छाए हुए हैं। जन-जन को आशंकित आतंकित बनाए रहते हैं।

राजनेता, धनाध्यक्ष, वैज्ञानिक, मनीषी- यह चार वर्ग जन-साधारण की वर्तमान दुर्दशा के लिए उत्तरदायी हैं। इन चारों को ही व्यापक स्तर पर ढूँढ़ा, झकझोरा और कचोटा जाएगा। यह कार्य एक स्थूल शरीर से सम्भव नहीं हो पा रहा था। इसके लिए असंख्यों तक पहुँचने की आवश्यकता समझी गई। उसे अगले दिनों सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न करके रहा जाएगा। उत्पादित सामर्थ्य और ईश्वरेच्छा का समन्वय इस कठिन कार्य को सरल बनादे तो किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए।




जागृत आत्माओं से भाव भरा आग्रह - Akhandjyoti June 1984

चार मूर्धन्य वर्गों को विशेष रूप से प्रभावित परिवर्तित करने के प्रयास में संलग्न होने के अतिरिक्त हमारा दूसरा कार्यक्षेत्र होगा जाग्रत आत्माओं को कचोटना। यह वर्ग दूध में घी की तरह छिपा रहता है पर गरम करने पर उछलकर ऊपर भी तैरता हुआ देखा जाता है। ब्राह्मण और साधु इसी की देन है। महामानव, मनीषी, इन्हीं को कहते हैं। सन्त, सुधारक और शहीद लोगों में इन्हीं का स्मरण किया जाता है। एक शब्द में देवमानव इन्हीं को कहते हैं। यह वर्ग जब जिस अनुपात से सक्षम, सक्रिय रहा है, तब तक सर्वतोमुखी सुख-शान्ति के दृश्य दृष्टिगोचर होते रहे हैं। इन्हीं का बाहुल्य किसी समय सतयुगी वातावरण बनाये हुए था। आवश्यकता इस बात की है कि वह समुदाय फिर से नव जागरण के क्षेत्र में प्रवेश करे और समय की जिम्मेदारियाँ सम्भालें।

मनुष्य की क्षमता असीम है। साथ ही आवश्यकताएँ बहुत कम। यदि कोई औचित्य की मर्यादा में रहे तो औसत भारतीय स्तर का निर्वाह कुछ घण्टे के परिश्रम से ही पूरा हो सकता है। परिवार छोटा रखा जाय। जो है उसे सुसंस्कारी और स्वावलम्बी बनाया जाय तो परिवार भी किसी पर भार न रहे। थोड़े में गुजर करने वाला, स्वल्प सन्तोषी, ब्राह्मण कहलाता है और जब वह चरम पुरुषार्थ में संलग्न रहकर शेष सामर्थ्य को युग धर्म के निमित्त समर्पित करता है तो उसे साधु कहते हैं। इस देश की महती गरिमा और विश्व की सुख-शान्ति स्थिर रखने का उत्तरदायित्व यहाँ के साधु-ब्राह्मण ही पूरा करते रहे हैं। भविष्य में भी संव्याप्त विकृतियों का निराकरण और उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण उन्हीं के द्वारा सम्भव होगा। अस्तु समय की सबसे बड़ी माँग इसी वर्ग के अधिकाधिक उत्पादन की है। हम प्रयत्न करेंगे कि जहाँ भी इस स्तर के बीजाँकुर हों वहाँ उन्हें विकसित पल्लवित करने में कुछ उठा न रखेंगे।

अनुदानों में यही सबसे बढ़कर है। हमारे गुरुदेव ने हमें यही दिया और निहाल कर दिया। उस उपहार के स्थान पर यदि उनने धन, वैभव, पद आदि दिया होता तो उससे गर्व और विलास की अनुभूति तो अवश्य होती पर साथ ही यहां भी निश्चित था कि लोभ, मोह और अहंकार के तीनों ही पिशाच अपना आधिपत्य अधिक अच्छी तरह जमाते। वासना, तृष्णा और अहंता की कभी न पटने वाली खाई और अधिक चौड़ी होती। अनेक दुर्व्यसन और दुर्गुण पनपते। आकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए उपलब्ध साधन कम पड़ते, फलतः कुकर्म करने पड़ते। इस ईश्वर प्रदत्त अनुपम सुयोग की सार्थकता न बन पड़ती और पापों का पोटला अगले जन्मों तक परिपक्व करने के लिए साथ ले जाना पड़ता। तब वे उपहार बहुत महंगे पड़ते जिनके लिए लोग लालायित फिरते हैं और सन्त महात्माओं से वैसा कुछ झटक लेने की फिराक में रहते हैं।

गुरुदेव ने जो हमें दिया है। अद्भुत है- अनुपम है। वही हम अपने प्राण प्रिय परिजनों में से सत्पात्रों को देना चाहते हैं और उसी प्रकार निहाल करना चाहते हैं जैसे कि हम स्वयं हुए। साँसारिक दृष्टि से हम किसी प्रकार के घाटे में नहीं रहे वरन् औरों की तुलना में कहीं अधिक अच्छे रहे। संयम की शिक्षा मिली तो चटोरेपन पर तनिक-सा अंकुश लगा, पर बदले में पेट ठीक रहा और स्वास्थ्य फौलाद जैसा बना रहा। कामुकता में कटौती हुई पर बदले में मस्तिष्कीय क्षमता ऐसी रही जिसे देखकर लोग दाँतों तले उँगली दबाते हैं। आलसी, अस्त-व्यस्त जीवनक्रम को लोग शौक-मौज कहते हैं। वह तो छिना पर बदले में समय को नियमित अनुबन्धित करके इतना काम कर लिया जितना 75 वर्षों में नहीं 750 वर्षों में ही किया जा सकता था। विवेकानन्द, शंकराचार्य, रामतीर्थ, ज्ञानेश्वर आदि तीस वर्षों के लगभग जिए पर इतने दिनों में ही 300 वर्षों के बराबर काम कर गये। यह समय की सुव्यवस्था का प्रतिफल है। गुरुदेव ने आरम्भिक जीवन में उपासना साधना, आराधना का जो क्रम बताया था वे तीनों ही एक-से-एक बढ़कर थे। लोग उन अनुशासनों में से मात्र एक अत्यन्त प्रत्यक्ष को ही स्मरण रखे हुए हैं- 24 लक्ष पुरश्चरण को। वस्तुतः हमें जो मिला वह मात्र जप संख्या की परिणति नहीं है, वरन् समग्र जीवन में आध्यात्मिक आदर्शों का पूरी तरह समन्वय किये रहने का ही प्रतिफल है। इसके लिए आवश्यक परामर्श और दबाव देकर गुरुदेव ने हमारा कितना बड़ा उपकार किया इसका अनुमान वे लोग नहीं लगा सकते जिन्हें धन और पद के अतिरिक्त और कुछ चाहिए ही नहीं। जो इतनी ही मर्यादा में वरदान को सीमित रखते हैं। जिन्हें निरर्थक मनोकामनाओं की पूर्ति ही आशीर्वाद प्रतीत होती है। जो लिप्साओं की हविश बुझाने के लिए सन्तों के कष्टसाध्य तप की जेब काटने को फिरा करते हैं- उन्हें न भक्त कहा जा सकता है न शिष्य। मात्र जीभ हिला देने भर से तो कोई आशीर्वाद फलित होता नहीं, उसके साथ तप का भी तो एक बड़ा अंश देना पड़ता है। किसी सन्त का तप लेकर अपना विलास-वैभव बढ़ाना, अध्यात्म-तत्वज्ञान से कोसों दूर की बात है। उसमें तो तपना पड़ता है। तप से ही प्रसुप्त शक्तियों को जगाते हुए मनुष्य महान बनता है।

मनुष्य की अपनी इच्छाएँ, योजनाएँ, बड़ी अनगढ़ होती हैं। उनमें प्रकारान्तर से यश, लाभ जैसे हेय उद्देश्य छिपे रहते हैं। अपने लिए हितकर क्या है? यह रोगी स्वयं कहाँ जाता है। उसे चिकित्सक के अनुशासन में चलना पड़ता है। बच्चे अपनी दिनचर्या तभी ठीक रख पाते हैं जब अध्यापक का निर्देशन मानें। हमने भी यही नीति अपनाई। गुरुदेव ने इतना ही कहा- हमारे परामर्शों को आदर्शों की कसौटी पर कसते रहना। यदि वे खरे हों तो अपनी अनगढ़ अकल को उसमें विक्षेप व्यतिरेक उत्पन्न न करने देना। इसी समर्पण को उनने भक्ति का सार-संक्षेप बताया और उसे अपनाये रहने के लिए सहमत किया है।

अब हम देखते हैं कि एक सुनिश्चित मार्गदर्शन में चलते हुए हमने सही रास्ता अपनाया और सही कदम उठाया। इस बीच अपने मन में भी अनेकों योजनाएँ आती रहीं, मित्रगण भी चित्र-विचित्र परामर्श देते रहें। पर उन सभी की अनसुनी करके जिस मार्ग पर चला गया वह ठीक सिद्ध हुआ।

इन दिनों हमारे अन्तराल में ऐसे ही अनुयायी ढूंढ़ने की बेचैनी है जो अपना जीवनक्रम साधु-ब्राह्मण की परम्परा अपनाकर संयम और तप से श्रीगणेश करें। समग्र अध्यात्म का अवलंबन करें। मात्र पूजा-पत्री से ही सब कुछ मिल जाने के भ्रम-जंजाल में न भटकें। उपासना साधना और आराधना की वे तीनों ही शर्तें पूरी करें जो आध्यात्मिक विभूतियाँ उपार्जित करने के लिए आवश्यक हैं। ऐसे लोगों की औसत भारतीय-स्तर के निर्वाह से अपनी जीवनचर्या का नया अध्याय आरम्भ करना चाहिए और कटिबद्ध होना चाहिए कि जो क्षमता बचती है उसी भगवान के खेत में बोने का साहस जुटायेंगे। निश्चय ही यह साहस सौ गुना हजार गुना होकर फलित होता है।

हमने अपना श्रम, समय, मनोयोग प्रभाव तथा धन समग्र रूप से भगवान के- समाज के- सत्प्रयोजनों के निमित्त बोया है। उसी का प्रतिफल है, जो लोगों को हमारे वैभव और चमत्कारों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। कृपणता बरती होती और जादूगरी तथा चिड़ीमारी के धन्धे को अध्यात्म माना होता तो औरों की तरह झक मारते और पूरी तरह खाली हाथ फिरते। विभूतियाँ और उपलब्धियाँ जिन्हें भी अभीष्ट हैं बीज बोने का रीति-नीति पर विश्वास करना चाहिए।

परामर्श तो हर तथाकथित मित्र-सम्बन्धी देता है पर सत्परामर्श देने की क्षमता किन्हीं परिष्कृतों में ही होती है पर धारणा कर सकना तो कुछ ही वरिष्ठों का काम होता है। नारद ने उपदेश तो अनेकों को दिया होगा, पर उसे धारण कोई-कोई ही कर पाए। जो कर सके वे धन्य हो गए। गान्धी के प्रवचन और लेख अनेकों ने पड़े-सुने होंगे पर उनमें से हृदयंगम कुछ ही कर सके। जिनने वैसा साहस जुटाया वे विनोबा, नेहरू, पटेल, राजेन्द्रबाबू, राजगोपालाचार्य आदि कहलाये। बात कहते-सुनते रहने भर से नहीं बनती। कदम उठाना और साहस करना पड़ता है। जो कर-गुजरते हैं वे नफे में रहते हैं। आदर्शों पर चलने का मार्ग ऐसा है जिनमें आरम्भ के दिनों थोड़ी कसमकस सहनी पड़ती है। बाद में तो सन्तोष और श्रेय दोनों ही मिलते हैं। हमारा जीवन इस मार्ग पर चला है। इतिहास के पृष्ठ उलटते हैं तो प्रत्येक महामानव को इसी राजमार्ग पर चलना पड़ा है। किसी पर भी आसमान से सोने-चाँदी के सितारे नहीं बरसे।

सूक्ष्म शरीर की जागृति का लाभ मिलते ही हम यह प्रयत्न करेंगे कि जहाँ कही भी आत्माएँ जागृत स्तर की हों, वे हमारा उद्बोधन, परामर्श, अनुरोध और आग्रह सुनें। समझें कि यह समय ऐतिहासिक है। ऐसे ही अवसरों पर हनुमान, अंगद, नल, नील, केवट, शबरी गीध, गिलहरी सहयोग के हाथ बढ़ाकर धन्य हुए थे। समय चूक जाने के बाद तो भारी वर्षा का लाभ भी नगण्य होता है। रेल निकल जाने पर अगली के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है। जिनका अन्तराल युग चेतना से अनुप्राणित हो उनका एक ही कर्त्तव्य है कि न्यूनतम में निर्वाह करने और अधिकतम युगधर्म में विसर्जित करने की बात सोचें। यदि साहस साथ दे तो उसे कर भी गुजरें। इससे सम्बन्धियों, कुटुम्बियों, मित्रों की सहमति मिलने की प्रतीक्षा न करें।

क्या करें? इस प्रश्न का इन दिनों एक ही उत्तर है- विचारक्रान्ति के युग धर्म का परिपालन करने के लिए एकनिष्ठ भाव से जुट पड़ें। आज की समस्याएँ अगणित हैं। उनके स्वरूप और प्रतिफल भी भिन्न-भिन्न है। किन्तु यह मानकर चलना होगा कि सभी का निमित्त कारण एक है- चिन्तन में विकृतियों का भर जाना। आस्था संकट ही अपने युग का सबसे बड़ा विनाश कारण है। इससे बड़ा दुर्भिक्ष और कोई हो नहीं सकता। निराकरण का उपाय भी एक ही है। उलटे को उलट-कर सीधा करना। यदि लोकमानस को परिवर्तित परिष्कृत किया जा सके तो हर समस्या सरलतापूर्वक सुलझने लगेगी। नाली की कीचड़ साफ किए बिना मक्खी-मच्छरों से पीछा छूटना कठिन है। हमें युगधर्म के रूप में विचार-क्रान्ति को ही मान्यता देनी चाहिए और छुटपुट कार्यों में ध्यान बँटाने, शक्ति खपाने की अपेक्षा इसी काम में जुट जाना चाहिए। इस मन्त्र को गुनगुनाते रहना चाहिए कि “एकहि साधे सब सधे- सब साधे सब जायँ।” नाम और यश को प्रधानता देने वाले, अपनी ढाई ईंट की मस्जिद अलग खड़ी करने को आतुर दृष्टिगोचर होते हैं। डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग से पकाते तो हैं पर उसमें पेट किसी का भरता। ढिंढोरा भर पिट जाता है। जिन्हें अपना ढिंढोरा पिटवाना ही अभीष्ट हो वे चित्र-विचित्र योजनाएँ बनाते और सेवा के नाम पर कौतुक कौतूहल खड़े करते रहें पर जिन्हें एक ही ताली से सब ताले खोलने का मन हो वे विचार परिवर्तन के कार्य को सर्वोपरि मानकर उसी का लक्ष्य रखें और उसी से सम्बन्धित कार्यों में हाथ डालें।

समय के कुप्रभाव से इन दिनों कोई व्यक्ति लोभ और मोह की परिधि से बाहर एक कदर नहीं रखता और पूजा-पाठ से लेकर व्यवसाय-अपराध तक इसी निमित्त करता है। समय के परिवर्तन का प्रत्यक्ष चिन्ह यहाँ से प्रकट होना चाहिए कि सब न सही जागृत आत्माओं में से जो जीवन्त हों वे समय को समझें और व्यामोह के दायरे से निकलकर बाहर आयें। उन्हीं के बिना प्रगति का रथ रुका पड़ा है।

अपने संपर्क क्षेत्र में, बिना संपर्क क्षेत्र में जहाँ कहीं भी हमें जागृत आत्माएँ दृष्टिगोचर होंगी- पकड़ में आवेंगी। उन्हें वाणी से न सही बिना वाणी के, एक अनुरोध करेंगे कि वे इन दिनों व्यामोह में कटौती करलें। उस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए हमारे गुरुदेव ने हमें सहमत किया और धन्य बनाया।




Quotation - Akhandjyoti June 1984

परिश्रम से शरीर बलिष्ठ होता है। इस सिद्धान्त पर विश्वास करके श्रमिक और पहलवान दोनों ही मेहनत करने लगे। श्रमिक आठ घण्टे मेहनत करता फिर भी दुबला होने लगा। पहलवान तीन घण्टे कसरत करता पर मोटा हो चला।

आश्चर्य का निराकरण करते हुए स्वास्थ्य विज्ञानी ने कहा- भार समझकर किया गया भारी पड़ता और थकाता है जबकि आशा और विश्वास के साथ प्रसन्न मन से किया गया परिश्रम बल बढ़ाता और सुफल देता है।




आत्मीय जनों के नाम वसीयत और विरासत - Akhandjyoti June 1984

सूक्ष्मीकरण से उपलब्ध अतिरिक्त सामर्थ्य को विश्व के मूर्धन्य वर्गों को हिलाने उलटने में लगाने का हमारा मन है। अच्छा हाता सुई और धागे को आपस में पिरो देने वाले कोई सूत्र मिल जाते। अन्यथा सर्वथा अपरिचित रहने की स्थिति में तारतम्य बैठने में कठिनाई होगी। मूर्धन्यों में सत्ताधीश, धनाध्यक्ष, वैज्ञानिक, और मनीषी वर्ग का उल्लेख है। यह सर्वोच्च स्तर के भी होंगे और सामान्य स्तर के भी। सर्वोच्च स्तर वालों की सूक्ष्मता जहाँ पैनी होती है वहाँ वे अहंकारी और आग्रही भी कम नहीं होते। इसलिए मात्र उच्च वर्ग तक ही अपने को सीमित न रखकर हम माध्यम वृत्ति के इन चारों को भी अपनी पकड़ में लेंगे ताकि बात नीचे से उठते-उठते ऊपर तक पहुँचने का भी कोई सिलसिला बने।

दूसरा वर्ग जागृत आत्माओं का है। इसका उत्पादन सदा से भारत भूमि में अधिक होता रहा है। महामानव, ऋषि, मनीषी, देवता यहाँ कितने जन्मे हैं उतने अन्यत्र कहीं नहीं। हमारे लिए समीप भी पड़ता है। अस्तु प्रयत्न यह करेंगे कि जहाँ कहीं भी पूर्व संचित संस्कारों वाली आत्माएँ दृष्टिगोचर हों, उन्हें समय का सन्देश सुनायें, युग-धर्म बताएँ और समझाएँ कि यह समय व्यामोह में कटौती करके, किसी प्रकार निर्वाह भर में सन्तोष करने का है। जो हस्तगत है उसे बोया, उगाया और हजार गुना बनाया जाना चाहिए। हम अकेले ही उगे, बढ़े और गलकर समाप्त हो गए तो यह एक दुर्घटना होगी। एक से हजार वाली बात सोची और कही जा रही है तो उसकी प्रत्यक्ष परिणति भी वैसी ही होनी चाहिए। प्रज्ञा परिवार बड़ा है। फिर भारत भूमि की उर्वरता कम नहीं है। इसके अतिरिक्त अपनी योजना विश्वव्यापी है। उसकी परिधि में अकेला भारत ही नहीं समूचा संसार भी आता है। अस्तु प्रयत्न यह चलेगा कि विचार-क्रान्ति की प्रक्रिया को परिस्थितियों के अनुरूप व्यापक बनाने के लिए जागृत आत्माओं का समुदाय हर क्षेत्र में, हर देश में मिले। कार्य पद्धतियाँ क्षेत्रीय वातावरण के अनुरूप बनती रहेंगी पर लक्ष्य एक ही रहेगा- “ब्रेन वाशिंग”- विचार परिवर्तन- प्रज्ञा अभियान। हम सब तीर की तरह सनसनाते हुए एक ही लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयत्न करेंगे। जिनमें इस प्रकार की जीवट होगी वे अनुभव करेंगे कि उन्हें कोई कोंचता, कुरेदता, झकझोरता, घसीटता और बाधित करता है। यों ऐसे लोग समय की पुकार पर अन्तरात्मा की प्रेरणा से भी जग पड़ते हैं। ब्राह्ममुहूर्त में मुर्गा तक बाँग लगाने के लिए उठ खड़ा होता है तो कोई कारण नहीं कि जिनमें प्राण चेतना विद्यमान है वे महाकाल का आमन्त्रण न सूनें और पेट-प्रजनन की आड़ में व्यस्तता और अभाव-ग्रस्तता की ही बहानेबाजी करते रहें। समय की पुकार और हमारी मनुहार का संयुक्त प्रभाव कुछ भी न पड़े ऐसा हो ही नहीं सकता। विश्वास किया गया है कि इस स्तर का एक शानदार वर्ग उभर कर ऊपर आयेगा और सामने ही कटिबद्ध खड़ा दृष्टिगोचर होगा।

तीसरा वर्ग प्रज्ञा परिवार का है। इसमें हमारा व्यक्तिगत लगाव है। लम्बे समय से जिस-तिस बहाने साथ-साथ रहने के कारण घनिष्ठता ऐसी और इतनी बढ़ गई है कि उसका समापन किसी के कारण हो सकना सम्भव नहीं। इसके कई कारण हैं। प्रथम यह है कि हमें अनेक जन्मों का स्मरण है। लोगों को नहीं। जिनके साथ पूर्वजन्मों से सघन सम्बन्ध रहे हैं उन्हें संयोगवश या प्रयत्न पूर्वक हमने परिजनों के रूप में एकत्रित कर लिया है और वे जिस-तिस कारण हमारे इर्द-गिर्द जमा हो गए हैं। इन्हें अखण्ड-ज्योति अपने अंचल में समेटे बटोरे रही है। संगठन के नाम पर चलने वाले रचनात्मक कार्यक्रम भी इसी संदर्भ में आकर्षण उत्पन्न करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त बच्चों और अभिभावकों के बीच जो सहज वात्सल्य भरा आदान-प्रदान रहता है वह भी चलता रहा है। बच्चे सहज स्वभाव अभिभावकों से कुछ चाहते रहते हैं। भले ही उसे मुँह खोलकर मांगें अथवा भाव भंगिमा से प्रकट करते रहें। बच्चों की आकाँक्षा बढ़ी-चढ़ी होती है। भले ही यह उपयोगी हो या अनुपयोगी। आवश्यक हो या अनावश्यक। दे-दिलाकर ही उन्हें चुपाया जाता है। इतनी समझ होती नहीं कि पैसा व्यर्थ जाने और वस्तु किसी काम न आने का तर्क उनके गले उतारा जा सके। बच्चों और अभिभावकों के बीच यह दुलार भरी खींचतान तब तक चलती रहती है जब तक वे परिपक्व बुद्धि के नहीं हो जाते और उपयोगिता-अनुपयोगिता का अन्तर नहीं समझने लगते। हमारे साथ एक रिश्ता परिजनों का यह भी चलता रहा है।

मान्यता सो मान्यता। आदत सो आदत। प्रत्यक्ष रिश्तेदारी न सही पूर्व संचित सघनता का दबाव सही। एक ऐसा सघन सूत्र हम लोगों के बीच विद्यमान है जो विचार विनिमय, संपर्क सान्निध्य- तक ही सीमित नहीं रहता, कुछ ऐसा ही चाहता हे कि अधिक प्रसन्नता का कोई साधन कोई अवसर हाथ लगे। कइयों के सामने कठिनाइयाँ होती हैं। कई भ्रमवश जंजाल में फँसे होते हैं। कइयों को अधिक अच्छी स्थिति चाहिए। कारण कई हो सकते हैं पर देखा यह जाता रहा है कि अधिकाँश लोग इच्छा आकाँक्षा लेकर आते हैं। वाणी से या बिना वाणी के व्यक्त करते हैं। साथ ही सोचते हैं कि हमारी बात यथास्थान पहुँच गई। उसका विश्वास उन्हें तब होता है जो पूरा न सही आधा-अधूरा उपलब्ध भी हो जाता है।

याचक और दानी का रिश्ता दूसरा है। पर बच्चों और अभिभावकों के बीच यह बात लागू नहीं होती। बछड़ा दूध न पिये तो गाय का बुरा हाल होता है। मात्र गाय ही बछड़े को नहीं देती। बछड़ा भी गाय को कुछ देता है। यदि ऐसा न होता तो कोई अभिभावक बच्चे जनने और उनके लालन-पालन में समय लगाने, पैसा खर्च करने का झंझट मोल न लेते।

कहने को गायत्री परिवार, प्रज्ञा परिवार आदि नाम रखे गए हैं और उनकी सदस्यता का रजिस्टर तथा समयदान, अंशदान का अनुबन्ध भी है। पर वास्तविकता दूसरी ही है जिसे हम सब भली-भाँति अनुभव करते हैं। वह है जन्म-जन्मान्तरों से संग्रहित आत्मीयता। जिसके पीछे जुड़ी हुई अनेकानेक गुदगुदी उत्पन्न करने वाली घटनाएँ हमें स्मरण हैं। परिजन उन्हें स्मरण न रख सके होंगे। फिर भी वे विश्वास करते हैं कि परस्पर आत्मीयता की कोई ऐसी मजबूत डोरी बंधी है तो कई बार तो हिलाकर रख देती है। एक दूसरे के अधिक निकट आने, परस्पर कुछ अधिक कर गुजरने के लिए आतुर होते हैं। यह कल्पना नहीं वास्तविकता है जिसकी दोनों पक्षों को निरन्तर अथवा समय-समय पर अनुभूति होती रहती है।

यही तीसरा वर्ग है- बालकों का। इनकी सहायता से मिशन का कुछ काम भी चला है पर वह बात गौण है। प्रमुख प्रश्न एक ही है कि इन्हें हँसता-हँसाता खिलता-खिलाता देखने का आनन्द कैसे मिले? अब तक भेंट, परामर्श, सत्संग, सान्निध्य से भी इस भाव सम्वेदना की तुष्टि होती थी। पर अब तो नियति ने यह सुविधा भी हाथ से छीन ली। अब परस्पर भेंट मिलन का अभ्यास समाप्त होता है। इसमें समय की कमी या कोई व्यवस्था सम्बन्धी कठिनाई कारण नहीं है। बात इतनी भर है कि इससे सूक्ष्मीकरण में बाधा पड़ती है। चित्त भटकता है और जिस स्तर का दबाव अन्तराल पर पड़ना चाहिए वह बिखर जाता है। फलतः उस लक्ष्य की पूर्ति में बाधा पड़ती है जिसके साथ समस्त मनुष्य समुदाय का भाग्य-भविष्य जुड़ा हुआ है। अपनी निज की मुक्ति, सिद्धि या स्वर्ग उत्कर्ष जैसा कारण रहा होता तो उसे आगे कभी के लिए टहलाया जा सकता था। पर समय तो ऐसा विकट है जो एक क्षण की भी छूट नहीं देता। ईमानदार सिपाही की तरह मोर्चा सम्भालने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं। इसलिए सूक्ष्मीकरण के संदर्भ में मिलने-जुलने में चलती रही पिछले दिनों वाली सुविधा का अब अन्त ही समझना चाहिए। हमें अपनी ओर से किसी को प्रयोजन विशेष के लिए बुलाना पड़े तो बात दूसरी है।

बच्चों के प्रज्ञा परिजनों के- सम्बन्ध में चलते-चलाते हमारा इतना ही आश्वासन है कि वे यदि अपने भाव सम्वेदना क्षेत्र को थोड़ा और परिष्कृत कर लें तो निकटता अब की अपेक्षा भी अधिक गहरी अनुभव करने लगेंगे। कारण कि हमारी सूक्ष्म शरीर सन् 2000 तक और भी अधिक प्रखर होकर जियेगा। जहाँ उसकी आवश्यकता होगी, बिना विलम्ब लगाए पहुँचेगा। इतना ही नहीं, स्नेह-सहयोग, परामर्श-मार्गदर्शन जैसे प्रयोजनों की पूर्ति भी करता रहेगा। कठिनाइयों में सहायता करने और बालकों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की हमारी प्रकृति में राई-रत्ती भी अन्दर नहीं होने जा रहा है। वह लाभ पहले की अपेक्षा और भी अधिक मिलता रहा सकता है।

हमारे गुरुदेव सूक्ष्म शरीर से हिमालय रहते हैं। विगत 60 वर्षों में हमने निरन्तर उनका सान्निध्य अनुभव किया है। यो आँखों से देखने की बात मात्र जीवन भर में तीन वार ही, तीन-तीन दिन के लिए सम्भव हुई है। भाव सान्निध्य में श्रद्धा की उत्कटता रहने से उसकी परिणति एकलव्य के द्रोणाचार्य, मीरा के कृष्ण और रामकृष्ण परमहंस के कालीदर्शन जैसी होती है। हमें भी यह लाभ निरन्तर मिलता रहा है। जो अपनी भाव सम्वेदना बड़ा सके, भविष्य में हमारी निकटता अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह अनुभव करते रहेंगे।

बच्चे बड़ों से कुछ चाहते हैं, सो ठीक है। पर बड़े बदले में कुछ न चाहते हों ऐसी बात भी नहीं है। नियत स्थान पर मल-मूत्र त्यागने, शिष्टाचार समझने, हँसने-हँसाने, वस्तुएँ न बिखेरने, पढ़ने जाने जैसी अपेक्षाएँ वे भी करते हैं। जितना सम्भव है उतना तो उन्हें भी करना चाहिए। हमारी अपेक्षाएँ भी ऐसी ही हैं। गोवर्धन उठाने वाले ने अपने अनगढ़ ग्वाल-बालों के सहारे ही गोवर्धन उठाकर दिखाया था। हनुमान की बात किसी ने नहीं सुनी तो अपने सहचर रीछ-वानरों को ही समेट लाए। नव-निमार्ण के कन्धे पर लदे उत्तरदायित्व को वहन करने में हम अकेले समर्थ नहीं हो सकते थे। यह मिल-जुलकर सम्पन्न हो सकने वाला कार्य था। सो, समझदारों में से कोई हाथ न लगा तो अपने इसी बाल परिवार को लेकर जुट पड़े और जो कुछ, जितना कुछ सम्भव हो सका करते रहे। अब तक की प्रगति का यही सार संक्षेप है।

बात अगले दिनों की आती है। हमें अपने बच्चों के लिए क्या करना चाहिए इस कर्त्तव्य-उत्तरदायित्व का सदा ध्यान रहा है और जब तक चेतना का अस्तित्व है उसका स्मरण बना भी रहेगा। इस सम्बन्ध में स्मरण दिलाने योग्य बात एक ही है कि हमारी आकाँक्षा और आवश्यकता को भुला न दिया जाए। समय निकट है। इसमें प्रत्येक परिजन का समयदान और अंशदान हमें चाहिए। जितना मिलता रहा है उससे भी अधिक मात्रा में। क्योंकि जो करना है उसके लिए तत्काल कदम उठाने हैं। सो भी बड़े। बड़े कामों के लिए बड़े-बड़े लोग चाहिए। बड़े साधन भी। हमारे परिवार का हर व्यक्ति बड़ा है। छोटेपन का तो उसने मुखौटा भर पहन रखा है। उतारने भर की देर है कि उसका असली चेहरा दृष्टिगोचर होगा। भेड़ों के समूह में पले सिंह-शावक की कथा अपने प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक के ऊपर लागू होती है या हो सकती है।

हमें हमारे मार्गदर्शक ने एक पल में क्षुद्रता का लबादा झटककर महानता का परिधान पहना दिया था। इस काया-कल्प में मात्र इतना ही हुआ था कि लोभ, मोह की कीचड़ से उबरना पड़ा। जिस-तिस के परामर्शों-आग्रहों की उपेक्षा करनी पड़ी और आत्मा-परमात्मा के संयुक्त निर्णय को शिरोधार्य करने का साहस जुटाना पड़ा। एकाकी चलने का आत्म-विश्वास जागा और आदर्शों को भगवान मानकर कदम बढ़े। इसके बाद एकाकी नहीं रहना पड़ा और न साधनहीन उपेक्षित स्थिति का कभी आभास हुआ। सत्य का अवलम्बन अपनाने भर की देर थी कि असत्य का कुहासा अनायास ही हटता चला गया।

अपने अनन्य आत्मीय प्रज्ञा परिजनों में से प्रत्येक के नाम हमारी यही वसीयत और विरासत है कि हमारे जीवन से कुछ सीखें। कदमों की यथार्थता खोजें। सफलता जाँचे और जिससे जितना बन पड़े अनुकरण का, अनुगमन का प्रयास करें। यह नफे का सौदा है घाटे का नहीं।




किस जगत से मुक्ति चाहूँ! - Akhandjyoti June 1984

(माया वर्मा)

क्या उसी से? जिस जगत में प्यार का मधुपर्क चाखा। पी अमित श्रद्धा, कि जिसका मूल्य भी जाता न आँका॥

परिजनों के प्यार की सरि में नहाए डूबकर हम। वह सुखद अनुभूति? घावों पर लगा जब स्नेह मरहम॥

क्रीड़ माता की सुखद तज, क्यों अकेला बन कराहूँ ? किस जगत से मुक्ति चाहूँ!

क्या उसी से? जहाँ पर मधु स्वाद पर हित का लिया है। रिक्त गागर भर किसी की, तृप्ति का अमृत पिया है॥

पुण्य अर्जन का यही तप धाम, अपने शास्त्र कहते। देह पाने के लिये यह देवता तक नित तरसते॥

यह मिली मुझ को, न क्यों फिर भाग्य मैं अपना सराहूँ ? किस जगत से मुक्ति चाहूँ!

इस धरा पर ब्रह्मा ने भी तृप्ति के मधु क्षण बिताये। माँ यशोदा का मधुर वात्सल्य पाने कृष्ण आये॥

राधिका के आँसुओं की, स्वर्ग के सुख में न समता। यहाँ वन-वन घूमती है साथ में साकार ममता॥

शेष होंगे पुण्य जो बन मनुज इस भू पर बसा हूँ। इस जगत से मुक्ति चाहूँ ? किस जगत से मुक्ति चाहूँ!

*समाप्त*