जब कभी ऐसा आभास हो कि आपको किसी ने आवाज दी है, किन्तु आस-पास खोजने पर भी किसी पुकारने वाले का पता न चले तो निश्चित रूप से समझ लीजिए कि वह अपनी ही अन्तरात्मा की पुकार है और उसका एक ही तात्पर्य है कि मुझे खोज, देख और पाने का प्रयत्न कर। ढूँढ़ने का अर्थ है यह खोजना कि हम अपने जीवन लक्ष्य के प्रति ईमानदार हैं या नहीं। यदि नहीं तो जहाँ भूल हो रही हैं उसे अविलम्ब सुधारा जाय।
वह पुकार जागरूकता के लिए है। उपेक्षा और प्रमाद जो जिस-तिस तरह करते रहे हैं, वैसे आगे न करें। जीवन की चौकीदारी की जाय और भीतर तथा बाहर से जिन शत्रुओं के आक्रमण होते रहते हैं, उनकी रोकथाम अविलम्ब की जाय।
इस आवाज का तात्पर्य है बहुमूल्य अवसर धीरे−धीरे हाथ से निकलता चला जा रहा है। क्रम ऐसे ही चलता रहा तो वह सब कुछ गुम हो जायेगा, जो देने वाले ने बड़ी उदारतापूर्वक बहुमूल्य रत्न राशि के रूप में किसी विशेष प्रयोजन के लिए दिया है।
आध्यात्मिक उन्नति की परम अवस्था तथा ईश्वर प्राप्ति की अन्तिम भक्ति−अवस्था प्रेम है भक्ति का स्वरूप भी निस्वार्थ प्रेम ही कहा गया है। इस विषय में कोई विवाद नहीं है कि परमात्मा की प्राप्ति के अन्य सभी साधनों में प्रेम दिव्य एवं सुखद साधन है और उसका प्रत्येक साधन में समावेश होना चाहिये। वस्तु कितनी ही सुन्दर क्यों न हो यदि उसके प्रति आकर्षण का भाव नहीं होगा तो न तो उसकी प्राप्ति का प्रयत्न ही हो सकता है और न उस प्रयत्न में चिरस्थायी ही रहा जा सकता है। प्रेम का विकसित रूप ही आध्यात्मिक गुणों—श्रद्धा−भक्ति विश्वास आदि के रूप में प्रकट होता है पर ईश्वर उपासना में उसे किसी न किसी रूप में प्रकट होना आवश्यक है। इसके बिना उपासना अधूरी है। सच्ची भक्ति तो प्रेम ही है। प्रेम ही परमात्मा का प्रकट स्वरूप है।
प्रेम ईश्वर प्राप्ति की साधना की वह कसौटी है जिसमें तपकर जीवन विशुद्ध बनता है और ब्रह्म में मिलन की स्थिति प्राप्त करता है। जीव और परमात्मा के बीच जो तादात्म्य है वह अपने शुद्ध रूप में प्रेम द्वारा ही प्रकट होता है। प्रेम न होता तो इस पृथ्वी पर लोगों को आध्यात्मिक तत्वों की अनुभूति भी न होती। यह स्थिति प्रारम्भ में आत्मस्वरूप की प्राप्ति के लिये विकलता, विरह के रूप में प्रकट होती है पर जिन्हें स्वाभाविक रूप में वह स्थिति प्राप्त न हो और वे ईश्वर को प्राप्त करना अपने जीवन का उद्देश्य मान गये हों तो उन्हें भी प्रेम का अभ्यास करना पड़ता है। तप, त्याग और सुख की इच्छाओं का दमन कर अन्तःकरण की प्रेम-प्रवृत्ति को जागृत करना पड़ता है।
प्रेम जो मनुष्य का मनुष्य के साथ संबंध स्थापित करता है उसे उसकी सत्ता के मूल स्रोत में पहुँचा देता है। जो वस्तु मनुष्य-समाज को धारण किये रखती है, उसके विकास और नैतिक उत्कर्ष में सहायक होती है, वह प्रेम ही है। यदि मनुष्य-मनुष्य के बीच प्रेम का आदान-प्रदान न रहा होता और मानव जाति को प्रवृत्ति के मूल में प्रेम का प्रेरक भाव न होता तो नैतिक क्षेत्र में उसने कोई भी उन्नति न की होती।
मनुष्य विकास-क्रम में सृष्टि के अन्य जीवों की अपेक्षा बहुत पीछे है। संसार के अन्य प्राणियों में जो नैतिक मर्यादायें देखी जाती हैं वे ईश्वर प्रदत्त होती हैं। यदि उसके जीवन में प्रेम परिचालक न रहा होता तो उसकी सारी नैतिक मर्यादायें भंग हुई होतीं। स्वार्थ या छल−कपट की अधिकता वाले प्रदेशों में आज भी इस सिद्धान्त को स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है।
प्रेम विश्व की सर्वाधिक शक्तिशाली सत्ता है, उसी के आधार पर मनुष्य−समाज जीवित है यह न होता तो मनुष्य बड़ा दरिद्र एवं अविकसित रहा होता। उसे केवल अपना ही ध्यान रहा होता, अपने ही स्वार्थों की फिक्र रही होती, अपने ही सुख सुहाये होते। न तो उसे समाज-सेवा के लिये प्रोत्साहन मिला होता न व्यक्तिगत जीवन में पराक्रम करने की प्रेरणा मिली होती। प्रेम की शक्ति का साम्राज्य आज सुव्यवस्थित और सुनियोजित विश्व के रूप में देखने को मिल रहा है।
प्रेम के बगैर मनुष्य मुर्दा है। जब मनुष्यों में प्रेम का अभाव होगा तो कोई आकर्षण भी किसी चीज के लिये न होगा और जब आकर्षण न होगा तो क्रिया न होगी, क्रिया न होगी तो यह सारा संसार नीरव उदासीन और जड़वत हो जायेगा। इसीलिये प्रेम ही जीवन है।
ईश्वर उपासना में इस उद्दात्त भावना का दर्शन संसार के सभी धर्मों में पाया जाता है। भगवान को प्रेममय समझ कर प्रेम मार्ग द्वारा उसकी साधना सभी देशों के भक्तों एवं साधकों में देखी जाती है। उपनिषद् में भगवान को “मधुब्रह्म” कहा है यह उसका विशुद्ध प्रेममय स्वरूप ही है। परमात्मा प्रेम द्वारा ही मधुर होता है—‘मधुक्षरन्तितद्ब्रह्म’, जिससे मधु अर्थात् प्रेम प्रकीर्ण होता है वही ब्रह्म है। अपने इसी रूप में वे भक्त के लिये, आराधक के लिये पुत्र, धन आत्मीय स्वजन—इन सबसे बढ़कर प्रियतम हो जाते हैं।
मस्तिष्क और हृदय दो केन्द्र ऐसे हैं जो शरीर के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। यों तो महत्व हर अंग अवयव का है। शरीर परिचालन तथा विभिन्न क्रिया-कलापों में उनकी अपनी-अपनी भूमिकाएँ हैं, पर जो भूमिका मस्तिष्क और हृदय की है, अन्य किसी भी कायिक अंग−प्रत्यंग की नहीं है। मस्तिष्क की सामान्य जानकारी विभिन्न तन्त्रों के ऊपर नियन्त्रण रखने तथा हृदय की रक्त परिवहन में केन्द्रीय भूमिका निभाने के रूप में मिलती है। ये कार्य स्थूल हैं। इनकी सूक्ष्म भूमिकाएँ और भी अधिक महत्वपूर्ण है। सोचने विचारने निर्णय लेने आदि की क्षमता मस्तिष्क में ही होती है। हृदय से भाव सम्वेदनाएँ निस्सृत होती हैं बाह्य जगत से आदान−प्रदान का क्रम भी इन्हीं दो केन्द्रों के माध्यम से चलता है। ये स्वयं भी बाह्य परिस्थितियों से प्रभावित होते तथा दूसरों को भी अपनी स्थिति के अनुरूप प्रभावित करते हैं। अत्याधिक सम्वेदनशील होने के कारण इनकी स्थिति में समय−समय पर परिवर्तन होते रहते हैं, जिसकी प्रतिक्रियाएँ व्यक्ति एवं वातावरण पर दिखाई पड़ती हैं। समूचे शरीर में क्या परिवर्तन हो रहे हैं, उसकी सूक्ष्म जानकारी इन दो मर्मस्पर्शी केन्द्रों की स्थिति से मिल जाती है। विचारणा के स्तर तथा अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के आधार पर उसका परिचय आसानी से मिल जाता है।
सौर मण्डल शरीर की तरह ही एक विराट् शरीर है। ब्रह्माण्ड में ऐसे अगणित विराट् घटक क्रियाशील हैं, उनकी संख्या एवं स्वरूप की सही−सही जानकारी किसी को भी नहीं है। अपने सौर−मंडल में नौ ग्रह हैं। उल्टी कक्षा में घूमने वाले एक अन्य ग्रह का भी प्रमाण मिला है जिसे दसवाँ ग्रह समझा जा रहा है। मंगल, पृथ्वी, बृहस्पति, बुध, शनि, शुक्र, प्लेटो, नैप्च्यून, यूरेनस के अतिरिक्त दसवाँ ग्रह भी उस परिवार में सम्मिलित हो गया है। ये सभी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं। हर ग्रह के अनेकानेक उपग्रह हैं। अपनी पृथ्वी का चन्द्रमा है। सौर−मण्डल के हर घटक परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। पृथ्वी का निज का जितना वैभव है उससे अनेक गुना दूसरे घटकों के अनुदानों से मिला है। गर्मी, प्रकाश, वर्षा आदि अनुदान तो प्रत्यक्ष दिखते हैं पर सूक्ष्म दिखायी नहीं पड़ते। सूक्ष्म आदान−प्रदान के अतिसंवेदी केन्द्रों का परिचय पृथ्वी के ध्रुव केन्द्रों के रूप में मिला है। उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव के रूप में दो गह्वर पर अवस्थित इन केन्द्रों के अतिरिक्त भूगर्भ में एक हृदय संस्थान भी है। पृथ्वी का घोर ताप युक्त यह हृदय केन्द्र अत्यन्त विशाल है। इसकी त्रिज्या 2100 मील है। इस भाग को ‘बेरी स्फियर’ कहते हैं।
भूगर्भ विज्ञान के अनुसार पृथ्वी गोल है। केवल ध्रुवीय क्षेत्रों में कुछ पिचकी हुई है। भूमध्य रेखा क्षेत्र में कुछ उभरी हुई है। पृथ्वी का व्यास 7900 मील है। पर्वतों की सर्वोच्च चोटी प्रायः 5॥ ऊँची और समुद्र की अधिकतम गहराई 7 मील है।
वैज्ञानिक कहते हैं कि ऊर्जा प्रदान करने वाले सौरमण्डल का अब अन्त समीप आ गया। काल गणना करने वालों का मत है कि सूर्य का किशोर काल अतीत हो गया है। प्रौढ़ावस्था अभी चल रही है। यह उसकी ढलती उम्र है जो उसे क्रमशः मरण की दिशा में घसीटे लिये जा रही है। जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं वह शतपथ ब्राह्मण के अनुसार सूर्य की पतिव्रता पत्नी है वह उसी की कमाई खाती है। सुरक्षा के लिये उसी पर आश्रित है और पति के मरण पर साथ सती होने के लिये समुद्यत है। अस्तु सूर्य के मरण का सीधा संबंध अपनी पृथ्वी के साथ होते और उसके अंचल में पलने वाले हम सब मनुष्यों का भाग्य भी इन अभिभावकों की स्थिति पर अवलम्बित है।
पृथ्वी के अन्य भागों की अपेक्षा ध्रुवों की परिस्थितियाँ असामान्य हैं। ऐसा माना जाता है कि अंतर्ग्रही विशिष्ट अनुदान इन्हीं केन्द्रों से अवतरित होकर समस्त भू-मण्डल पर वितरित होते हैं तथा विजातीय द्रव्य दक्षिणी ध्रुव के माध्यम से अन्तरिक्ष में फेंक दिये जाते हैं, एवं यह मान्यता पूर्णतः विज्ञान सम्मत भी है।
इन ध्रुव प्रदेशों पर दुर्लभ मनोरम दृश्य दिखाई पड़ते हैं। उत्तरी ध्रुव पर छाया रहने वाला सुविस्तृत तेजोवलय ‘अरोरा बोरिएलिस’ अपनी अद्भुत आभा से हर किसी का मन मोह लेता है। “दि नेशनल एरौना−टिक्स एण्ड स्पेश एडमिनिस्ट्रेशन” (नासा) द्वारा छोड़े गये डायनामिक्स एक्सप्लोरेटर सेटेलाइट से अनेकों हाई रिजोल्यूशन फोटोग्राफ्स लिए गये। उससे आश्चर्यजनक जानकारियाँ मिलीं। अध्ययन−अन्वेषण में लगे वैज्ञानिकों का मत है कि अन्तरिक्ष से आने वाले सब एटोमिक पार्टिकल्स पृथ्वी के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र में प्रवेश करके आवेशित हो जाते हैं तथा ध्रुव केन्द्रों पर ध्रुव प्रभा के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। ध्रुव प्रभा का क्षेत्र विस्तार 4000 कि.मी. व्यास है। इसकी किरणों की पट्टियाँ जो ध्रुव केन्द्र को आवृत्त किये होती हैं, उनकी चौड़ाई 1000 कि.मी. हुआ करती है। यह प्रभा मण्डल जमीन से 100 कि.मी. ऊपर चमकता है तथा उसके स्वयं की ऊँचाई दस से लेकर सैंकड़ों किलोमीटर तक होती है। दिन में चर्म चक्षुओं से आरोरा को देखने में कठिनाई होती है पर रात को वह स्पष्ट दिखाई पड़ता है। दिन और रात के आरोरा में विशेष अन्तर भी पाया जाता है। सूर्य किरणों के आड़े−तिरछे पड़ने से उसका रूप, रंग बदलता रहता है। उसे शक्तिशाली कैमरों से ही देखा और उनका फोटो लिया जा सकता है।
यूनाइटेड स्टेट्स के उत्तरी क्षेत्र के आकाश मार्ग से ध्रुवीय ज्योति को सैंनफ्रेंसिसको, मेमफिस तथा एटलान्टा के दक्षिण छोर पर रंग−बिरंगे रूप में देखा जा सकता है। 53 डिग्री अक्षांश पर तथा मध्य रात्रियों में उसके दर्शन किए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों का अभिमत है कि ध्रुवीय ज्योति का प्रकाश हाइड्रोजन आयन अथवा प्रोटोन के प्रवाह से उत्पन्न होता है जो सूर्य से 1500 मील प्रति सेकेंड की गति से फेंका जाता है। प्रकाश कण प्रोटान्स इलेक्ट्रान्स को भी साथ खींचकर लिये चलते हैं जिनका कुछ अंश पृथ्वी तक पहुँचता है जहाँ का चुम्बकीय क्षेत्र इलेक्ट्रानों तथा प्रोटॉनों को अलग कर देता है। प्रोटॉनों का जल अंश पृथ्वी के वायुमण्डल से स्पर्श करता है तो ध्रुवीय ज्योति (आरोरा) के रूप में प्रकट होता है। इसका यथार्थ स्वरूप तथा भूमिका अविज्ञात हुए भी सम्भावना व्यक्त की गई है कि धरती पर अंतर्ग्रही अनुदानों की वर्षा का यह स्थूल प्रकटीकरण है।
अलेक्जेण्डर मार्शेक ने सघन अन्तरिक्ष में प्रकाश के रूप में भी, शब्दों के रूप में भी सौर−मण्डल तथा मन्दाकिनी आकाश गंगा से आने वाले शक्ति प्रवाहों को सुना है। उसका यन्त्र अंकन किया है। यह आवाज क्रमबद्ध संगीत एवं स्वर लहरियों की तरह है। यों कान से वे ध्वनि मात्र सुनाई पड़ती हैं उनका कोई विशेष महत्व समझ में नहीं आता पर खगोल विद्या की नवीनतम शोधें यह स्पष्ट करती चली जा रही हैं कि यह शब्द प्रवाह भी सूर्य से ध्रुव प्रदेशों पर बरसने वाले गति प्रवाहों की तरह ही अतीव सामर्थ्यवान है और उनके द्वारा प्राणियों के शरीर तथा मन पर ऐसा प्रबल प्रभाव पड़ता है जैसा व्यक्तिगत प्रयत्नों से बहुत परिश्रम करने पर भी सम्भव नहीं, यह प्रभाव भले और बुरे दोनों ही स्तर का हो सकता है।
इस सबके बावजूद यह तथ्य भुलाया नहीं जा सकता कि पृथ्वी को सूर्य से ही सर्वाधिक अनुदान मिलते हैं और वह उसकी स्थिति, गति एवं परिवर्तनों से प्रभावित भी होती है। उन प्रभावों को इन ध्रुवों पर अध्ययन कर सकना अधिक सुगम है। ध्रुवीय ज्योति का सूर्य कलंकों से भी घना संबंध है। जब सूर्य की प्रकृति शान्त रहती है तब ध्रुवीय ज्योति मन्द दिखाई पड़ती है पर उग्र होने पर उस ज्योति का दर्शन दिन और रात को अधिक समय तक किया जा सकता है।
स्पेस क्राफ्ट से किये गये निरीक्षणों के अनुसार सोलर विण्ड की धारायें सूर्य के विषुवत् वृत्त से उत्तर एवं दक्षिण की ओर क्रमशः फैलते−उतरते हुए उत्तरी−दक्षिणी ध्रुव तक जा पहुँचती हैं। सोलर विण्ड की गति जब तीव्र रहती है तो सूर्य के उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव के पोलर होल्स अधिक चौड़े रहते हैं। जिसके कारण ध्रुव प्रदेशों में सोलर विण्ड की धारा अत्यन्त तेज पाई जाती है। जब उनकी गति कम होती है तो ध्रुव प्रदेशों में भी उस प्रवाह की गति कम दिखाई पड़ती है।
न केवल अंतर्ग्रहीय प्रभावों को इन ध्रुव केन्द्रों पर देखा जा सकता है बल्कि पृथ्वी एवं उसके वातावरण में हुए हेर-फेर का भी प्रभाव वहाँ देखना सम्भव है। विगत दिनों यह आश्चर्यजनक तथ्य विदित हुआ है कि पृथ्वी पर होने वाले नाभिकीय परीक्षणों से होकर विकिरण दक्षिणी ध्रुव तक न जाने कैसे और क्यों पहुँच जाते हैं। खतरनाक विकिरणों की एवं उत्तरी ध्रुव के प्रदूषण की बड़ी मात्रा दक्षिणी ध्रुव के किनारे एकत्रित होती चली जा रही है।
इन ध्रुवों के संबंध में जैसे−जैसे विस्तृत जानकारियाँ मिलती जा रही हैं, इनकी विलक्षणता वैज्ञानिक समुदाय को हतप्रभ तो करती ही है, नवीन अन्वेषणों के लिए उत्साहित भी करती है।
उत्तरी ध्रुव एक गड्ढा है तो दक्षिण ध्रुव गुमड़ा। उत्तरी ध्रुव की बर्फ दक्षिणी ध्रुव से अधिक गर्म होती है जल्दी गलने और जल्दी जमने वाली भी होती है। दक्षिणी ध्रुव उजाड़ क्षेत्र है यहाँ कुछ पक्षी जलचरों के अतिरिक्त एक पंखहीन मच्छर भी पाया जाता है। वह क्या खाकर जीता है और कैसे इतनी भयंकर शीत में जीवन धारण किये रहता है। वैज्ञानिक इस प्रश्न का आज तक समाधान नहीं कर सके।
उत्तरी ध्रुव में जीवन का बाहुल्य है पौधों तथा जन्तुओं की संख्या करोड़ों तक पहुँचती है। यहाँ दिन और रात समान नहीं होते, 6-6 माह के भी नहीं होते—कई बार रात 80 दिन के बराबर होती है। यह सबसे लंबी रात होती है। क्षितिज के बीच सूर्य वर्ष में 16 दिन रहता है। यहाँ चन्द्रमा इतनी तेजी से चमकता है कि उसके प्रकाश में, दिन में सूर्य की रोशनी के समान ही काम किया जा सकता है।
कुछ मेरुप्रकाश विस्तृत और आकृतिहीन होते हैं कुछ सजीव और हलचल करते हुए। कभी वे किरणों की लंबाई के रूप में जान पड़ते हैं कभी प्रभा और ज्वाला के रूप में, कभी वह दृश्य बदलता हुआ, कभी चाप, पट्टी और कोरोना के रूप में होता है तो कभी प्रकाश गुच्छे सर्चलाइट के समान। यहाँ रात भर तरह−तरह के दृश्य बदलते हैं। हर दृश्य और परिवर्तन सूर्य की अपनी आन्तरिक हलचल का प्रतीक है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण अन्तर्राष्ट्रीय भू-भौतिक वर्ष अनुसंधान के दौरान आया और उसके विलक्षण आकार-प्रकार देखने में आये। स्मरण रहे भू−भौतिक वर्ष सूर्य के 11 वर्षीय चक्र के दौरान मनाया जाता रहा है इस अवधि में सूर्य की आन्तरिक हलचल बहुत बढ़ जाती है, यह प्रकाश मुख्यतः चुम्बकीय तूफान होता है जो पृथ्वी की सारी यान्त्रिक क्रिया में क्रान्ति उत्पन्न करके रख देता है।
मार्च तथा सितम्बर में (चैत्र तथा क्वार) जब कि पृथ्वी का अक्ष सूर्य के साथ उचित कोण पर होता है मेरुप्रकाश अधिक मात्रा में पृथ्वी पर पड़ता है जबकि अन्य समय गलत दिशा के कारण प्रकाश लौटकर ब्रह्माण्ड में चला जाता है। यही वह अवधि होती है जब पृथ्वी में फूल−फलों की वृद्धि और ऋतु परिवर्तन होता है। पूरी पृथ्वी पर पलने वाले जीवधारी एवं वृक्ष वनस्पति अपना ऊर्जा अनुदान सूर्य के साथ बदलती स्थिति के अनुरूप पाते रहते हैं। उनके जीवन का प्राणाधार यही सूर्य है जो स्वयं किसी महासूर्य से संचालित होता है। इस महासूर्य को परब्रह्म का प्रतीक रूप या महापिण्ड भी कह सकते हैं।
उत्तरी ध्रुव की तरह दक्षिणी ध्रुव में भी ध्रुव प्रभा के दर्शन होते हैं। उत्तरी ध्रुव से उसकी भिन्नता होने के कारण वैज्ञानिकों ने उसका नाम ‘आरोरा आस्ट्रेलिस’ दिया है। दिन यहाँ भी बहुत ही लंबे होते हैं। जिन अन्वेषी दलों ने वहाँ की परिस्थितियों का अध्ययन किया है उनका कहना है कि कई दिनों तक रात्रि के दर्शन नहीं हो सके। आकाश में रंग−बिरंगे गैसों के बादल मँडराते रहते हैं। तापक्रम शून्य से भी कई डिग्री नीचे बारहों माह तक बना रहता है। सदा बर्फ की मोटी परत जमीं रहती है। सफेद भालू, पेन्गुइन पक्षी तथा मछलियाँ उस भयंकर शीत में भी जीवित रहते हैं। अनुसंधान कर्ताओं का मत है कि उत्तरी दक्षिणी ध्रुव पर दिखने वाला प्रभा मण्डल का अंतर्ग्रहीय परिस्थितियों के आदान−प्रदान से गहरा संबंध है जिसकी यथार्थ जानकारी तो उपलब्ध नहीं हो सकी है, पर अगले दिनों मिलने की सम्भावना है। ये ध्रुव स्थिर भी नहीं हैं। मान्यता यही है कि कालान्तर में ये अपना स्थान बदलें, क्योंकि ये पहले भी ऐसा करते रहें हैं।
कुछ भी हो ध्रुवी संबंधी यह विवेचन व्यष्टि एवं समष्टि के मध्यवर्ती संबंधों को स्पष्ट करते हैं एवं ब्रह्माण्ड संबंधी ऐसे अनेकों रहस्यों का उद्घाटन करता है जो प्रगति की चरम सीमा पर पहुँचे हुए विज्ञान को विलक्षण अद्भुत लगती है।
वस्तुतः आत्मिकी का यह मत है कि सारा विश्व ब्रह्माण्ड ही एक है। समग्र विश्व की चेतना का अधिष्ठाता विश्वात्मा है। बिखरी हुई आत्माएँ इसी के छोटे−छोटे घटक हैं। जब तक यह इकाइयाँ परस्पर मिलकर रहती हैं और एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हैं तभी तक दृश्यमान सौंदर्य का अस्तित्व है यदि इनका विघटन होने लगे तो केवल धूलि मात्र ही इस संसार में शेष रह जायगी विश्व मानव की विश्वात्मा यदि अपनी समग्र चेतना से विघटित होकर संकीर्ण स्वार्थपरता में बिखरने लगे तो समझना चाहिए विश्व सौंदर्य की समाप्ति का समय निकट आ गया।
डा. फ्रिटजॉफ काप्रा जिन्होंने ‘ताओ ऑफ फिजीक्स” व “टर्निंग प्वाइंट” जैसी प्रसिद्ध पुस्तकें लिखी हैं। स्वीकार करते हैं कि परमाणु का प्रत्येक घटक विश्व ब्रह्माण्ड का परिपूर्ण घटक है अर्थात् प्रत्येक अंश में ब्रह्माण्ड सत्ता ओत-प्रोत है। अणु में ही विराट् ब्रह्माण्ड के दर्शन किये जा सकते हैं। यह पारस्परिक संबंध इतने प्रगाढ़ हैं कि इन्हें कभी निरस्त नहीं किया जा सकता। जहाँ इस तरह का प्रयास होता है, वहाँ भयंकर दुष्परिणाम उपस्थित हो उठते हैं।
परामनोविज्ञान की नवीनतम शोधें भी इसी निष्कर्ष पर पहुँची हैं कि मनुष्य चेतना ब्रह्माण्ड चेतना की अविच्छिन्न इकाई है। अस्तु प्राण सत्ता शरीर में सीमित रहते हुए भी असीम के साथ अपना संबंध बनाये हुए है। व्यष्टि और समष्टि के मूल सत्ता में इतनी सघन एकता है कि एक व्यक्ति समूची ब्रह्म चेतना का प्रतिनिधित्व कर सकता है। इस संबंध में विज्ञान की दृष्टि भी उदार बनती जा रही है अब विज्ञान अपनी भाषा में परब्रह्म को, परमात्मा को ‘ब्रह्माण्डीय चेतना’ के रूप में स्वीकार करने लगा है और उसका घनिष्ठ संबंध जीव चेतना के साथ जोड़ने में उसे विशेष संकीर्ण नहीं रह गया है। यह मान्यता जीव और ब्रह्म अंश और अंशी के रूप में मानने की वेदान्त व्याख्या से बहुत भिन्न नहीं है।
वानप्रस्थ का अर्थ पलायन नहीं है। इसमें जीवन में जहाँ साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा में निरत रहने का अनुशासन है, वहाँ एक अनुबन्ध यह भी है कि वन क्षेत्र में रहा जाय। आरण्यक ही उस उच्चस्तरीय जीवनचर्या के लिए उपयुक्त स्थान हो सकते हैं। घिचपिच बसे, कोलाहल भरे नगरों और गन्दे गली−कूचों में ऐसा वातावरण होता है जिसमें आध्यात्मिकता पनपती नहीं। उस घुटन भरी विषाक्तता में उच्चस्तरीय भावनाएँ पनपने नहीं पाती और किया हुआ स्वाध्याय तथा सुना हुआ सत्संग निरर्थक चला जाता है। वातावरण की श्रेष्ठता कई कारणों पर अवलम्बित है। उनमें से एक तो अनिवार्य ही है और यह है पेड़−पौधों की सघनता और निकटता। वानप्रस्थ का शब्दार्थ है—वनप्रदेश में निवास व्यवस्था। ऊँचे विचार ऐसे ही क्षेत्रों में पनपते और फूलते−फलते हैं। इसलिए ऋषि आरण्यक एवं आश्रम वन−क्षेत्रों में होते पाये गये हैं।
मुक्ति पथ पर चलना कहाँ से आरम्भ किया जाय और कौन से विरामों पर ठहरते हुए लक्ष्य तक पहुँचने की मंजिल कैसे पूरी की जाय, इसका एक सुनिश्चित मार्गदर्शन गीताकार ने इस प्रकार किया है।
विषयाविनिवर्त्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोष्यस, परं दृष्ट्वा निवर्त्तते॥
विषय भव बंधन हैं। जीवात्मा को वे ही बाँधते हैं। इन विषयों से छुटकारा प्राप्त करने की पहली मंजिल है उपवास। उपवास का अर्थ यहाँ शत प्रतिशत अन्न जल का परित्याग नहीं वरन् आहार पर नियन्त्रण है। नियन्त्रण अर्थात् मात्रा में कभी। साथ ही स्वाद का परित्याग। सामान्य एवं सात्विक स्वाद प्रत्येक खाद्य पदार्थ में होता है। उसी में सन्तोष किया जाय। ऊपर से जो नमक मिर्च आदि मसाले मिलाये जाते हैं और शक्कर का सम्मिश्रण किया जाता है, उन्हें छोड़ा जाय। मसाले एवं शक्कर की भरमार से भोजन स्वादिष्ट तो हो जाता है पर जीभ के चटोरेपन का पोषण होने से वह अनावश्यक मात्रा में खा लिया जाता है। इसका सीधा परिणाम अपच होता है। अपच का अर्थ है पेट में खाद्य पदार्थ का सड़ना। सड़न विष उत्पन्न करती है जो रक्त के साथ मिलकर अनेक प्रकार के रोगों की उत्पत्ति करता है। तले हुए, भुने हुए, चिकनाई से सने हुए मिष्ठान्न पकवान हर कोई अधिक मात्रा में खा जाता है। एक तो मात्रा की अधिकता, दूसरे मसाले, चिकनाई, मिठाई जैसे गरिष्ठ पदार्थों का मिलना भोजन को तमोगुणी बना देता है। वे पाचन में भारी होने के कारण पाचन तन्त्र को खराब करते हैं और उनका परिणाम स्वास्थ्य के लिए अहितकर होता है।
आहार का मन से सीधा संबंध है। “जैसा खाये अन्न—वैसा बने मन” की उक्ति तथ्यों पर आधारित है। गरिष्ठ भोजन मन को विकारग्रस्त बनाता है। उससे अन्य इन्द्रियों की लिप्सा भड़कती है। मन विषय विकारों से ग्रसित होता है। इसलिए साधना का प्रथम चरण आहार संयम से आरम्भ होता है। व्रतों की व्याख्या करते हुए अस्वाद को प्रथम व्रत बताया गया है। गाँधी जी ने सप्त महाव्रतों की गणना करते हुए अस्वाद को प्रथम व्रत बताया है। इसमें आहार संयम ही नहीं इन्द्रिय निग्रह का भी समावेश है। जो स्वादेन्द्रिय पर काबू कर लेगा उसके लिए ब्रह्मचर्य व्रत की साधना सरल है। चटोरा व्यक्ति जिह्वा को अनियन्त्रित करने के उपरान्त कामुकता का भी शिकार होता है। उसके मन में कामुक अनियंत्रण घूमता रहता है, जो समयानुसार फलित होकर ब्रह्मचर्य भंग एवं व्यभिचार जन्य क्रिया−कलापों तक जा पहुँचता है।
भारतीय धर्मशास्त्रों में व्रतों का सुविस्तृत वर्णन है। आये दिन उपवासों के विधान हैं। उनके अनेक माहात्म्य भी बताये गये हैं। उन अलंकारिक प्रतिफलों में अत्युक्ति हो सकती है किन्तु इतना सर्वथा सत्य है कि आहार संयम हर दृष्टि से उत्तम है। उससे शारीरिक और मानसिक दोनों ही स्वास्थ्य संभलते हैं।
शरीर से मन बनता है। जीभ का चटोरापन सीधे कामुकता को भड़काता है। यह मनोविकार अकेला नहीं है। इनकी एक पूरी सेना है। जहाँ एक चलता है वहाँ साथी संगतों की पूरी बरात चल पड़ती है। वासना, तृष्णा और अहन्ता का एक समुदाय है। लोभ, मोह, और क्रोध का एक समूह है। यह सब आपस में गुँथे हुए हैं। एक के साथ दूसरा चलता है। जहाँ वासना भड़केगी वहाँ तृष्णा भी पीछे न रहेगी। लोभ−लालच में मन भटकेगा। सम्पदा की ओर मन ललचाएगा कि उसे जैसे बने संग्रह किया जाय। उचित रीति से उपार्जन थोड़ा ही हो सकता है। बहुत संग्रह करके अहंकार की पूर्ति−कुटुम्बियों को विलासी बनाने का मोह बढ़ाती है और उस संग्रह के लिए ईमानदारी से काम नहीं चलता। बेईमानी का आश्रय लेना पड़ता है। अर्थ लोभ मात्र व्यवसाय में बेईमानी करने तक सीमित नहीं रहता वरन् चोरी, ठगी, झूठ, हत्या जैसे अनेकों छोटे−बड़े कुकर्मों में रस आने उगता है। उन्हें करने में भय लज्जा संकोच का अनुभव नहीं होता वरन् रस आने लगता है। रस की कोई सीमा नहीं, वह अमुक सीमा तक पहुँचकर तृप्त कर सके, ऐसा भी तो नहीं होगा। जीभ से आरम्भ हुआ रसास्वादन सभी इन्द्रियों को चटोरी बनाता है और फिर मन की ललक लिप्साएँ भड़कने लगती हैं। फुलझड़ी में माचिस लगाने के उपरान्त एक के बाद दूसरी चिनगारी छूटने लगती है और फिर ऐसा तमाशा बनता है कि पूरे खेल का सफाया करने के उपरान्त ही समाप्त होता है। अवाँछनीयता का रस जीभ के चटोरेपन से आरम्भ होकर जहाँ तक जगह मिलती है वहाँ तक बढ़ता ही जाता है।
व्रत उपवास का प्रथम उपास वह है जिससे मनुष्य अन्यान्य संयम की ओर बढ़ता है। संयम को ही तप कहते हैं। इन्द्रिय संयम के बाद अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम का क्रम है। संयमी तपस्वी कहलाता है। स्वल्प सीमित में अपना काम चलाने की विवेक बुद्धि जिसमें जगती है उसमें साथ ही इतनी उदारता दूरदर्शिता भी जगती है कि बचत को परमार्थ प्रयोजनों में लगता रह सके। मनुष्य यदि आलसी, प्रमादी न हो, पराक्रम पुरुषार्थी हो तो स्वभावतः उसके पास धन ही नहीं, समय, श्रम से लेकर प्रतिभा पराक्रम तक ढेरों साधन बच जाते हैं। तपश्चर्या के साथ में जमी हुई उदारता उसे सत्प्रयोजनों में लगाने की प्रेरणा भरती है। संयमी की विवेकशीलता उदारता के साथ−साथ दानशीलता की ऐसी प्रेरणा भरती है जो चरितार्थ हुए बिना रुकती ही नहीं। चैन से बैठने ही नहीं देती।
यह निराहार रहने के व्रत उपवास की साधना करने के प्रतिफल हैं। जिसने इतनी मंजिल पार कर ली उसकी “परापश्य” परा प्रज्ञा जागृत होती है और परमात्मा को देख सकने वाला तीसरा नेत्र- ज्ञानचक्षु खुलता है। फलस्वरूप वह दिख पड़ता है जिसकी ओर से विषम परायणों की आंखें बन्द रहती हैं।
व्रत उपवासों का प्रथम पाठ साधना क्षेत्र में सर्वप्रथम पढ़ाया जाता है। पूजा−पाठ, जप, तप, देव−दर्शन, नदी सरोवर स्नान आदि की शिक्षा इसके बाद की है। संयम प्रथम, उपासना पश्चात्। संयम के बाद उपासना न ही उदारता का दूसरा चरण आता है। न्यूनतम में निर्वाह। सादा जीवन उच्च विचार का अवलंबन। इतना कर गुजरने पर स्वल्प में निर्वाह करने वाला अपने साधनों से बचत करेगा ही और जहाँ उदारता तथा बचत का संयोग है वहाँ परमार्थ के लिए दान की उत्कंठा उठे बिना रह नहीं सकती। जो संयमी है, जो उदार है, जो मितव्ययी है, साथ ही जो पुरुषार्थ परायण है वह अपने साधनों का पुण्य परमार्थ में नियोजन करता ही रहेगा।
उपरोक्त दो चरण पूरे करने के उपरान्त वह भावना जग पड़ती है जिसके सहारे उपासना सम्भव है। ऐसे व्यक्ति थोड़ा कर्मकाण्ड करने पर भी विशालकाय पूजा−पाठ कर लेने का फल प्राप्त कर लेते हैं। इसके विपरीत जो केवल भजन पूजन की लकीर को पीटते रहते हैं, किन्तु गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट बनाने वाली संयम साधना से दूर रहते हैं, असंयमी जीवन जीते हैं। काम, क्रोध, लोभ−मोह, मद−मत्सर के भूत−प्रेम साथ लिए फिरते हैं। मात्र नाम उच्चारण अथवा कर्म काण्डों के क्रिया-कलाप से, पूजा-पत्री के उपहार उपचार भेंट करने से परमात्मा को प्राप्त करने के स्वप्न देखते रहते हैं, उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। हमें पहले वर्णमाला पढ़नी चाहिए। बीजगणित, रेखागणित का कार्य बाद में हाथ में लेना चाहिए। तपश्चर्या, उदारता के उपरान्त ही उपासना अपनाने की सार्थकता है।
एक बूँद बड़ी अहंकारिणी थी समुद्र में अपनी सत्ता का विलय अच्छा न लगा। वह अपनी अहन्ता और पृथकता बनाये रखना चाहती थी। नदियों ने इस आग्रह से विरत भी करना चाहा पर वह मानी नहीं। अलग ही बनी रही। कड़ाके की धूप निकली और वह भाप बनकर हवा में उड़ गई। बादलों के साथ मिलना उसे फिर भी पसन्द नहीं आया। रात हुई और वह पत्ते पर ओस बनकर अलग-अलग पड़ी रही। धूप रोज निकलती, उसे ऊपर उठाती, पर उसे नीचे ही गिरना पसन्द जो था। सर्प ने उस ओस को चाटा और विष में बदल दिया। जो न समुद्र बनते हैं, न बादल तो विष बूँद बनकर रहना ही पड़ता है।
विज्ञान, भौतिक जगत की एक महती शक्ति है। प्रकृति के भण्डार में असीम प्रयोजनों में काम आने वाली अगणित क्षमताएँ भरी पड़ी हैं। उनमें से क्रमशः प्रयत्नपूर्वक मनुष्य के हाथों कितनी ही सामर्थ्यें लगती चली गई हैं। अग्नि का, कृषि, पशु पालन, धातुओं के उपकरण बनाने का पहिये के निर्माण का सिद्धान्त प्रगति के आरम्भिक दिनों में हस्तगत हुआ। तब का मनुष्य इतने भर से भौतिक जीवन में असाधारण सुविधाएँ हस्तगत करता गया। यह लोभ आगे भी संवरण न हो सका। एक के बाद एक खोज करते हुए वह विद्युत ही नहीं अणु शक्ति और लेसर किरणों तक का अधिष्ठाता बन गया। यान्त्रिक वाहन, जलयान, नभयान उसने बनाये और मुद्रण कला जैसे अनेकों सुविधा साधन ढूंढ़ निकाले। जब वह अन्तरिक्ष पर अधिकार जमाने के फेर में है। प्रक्षेपणास्त्र उसके हाथ आ गये हैं अनेकों उपग्रह अन्तरिक्ष में विचरण कर रहे हैं। कल कारखानों के सहारे अनेकों सुविधा साधन बनते चले गये हैं। विज्ञान ने मनुष्य के हाथों असीम सामर्थ्य प्रदान की है। इस आधार पर वह संपन्न भी हुआ है और बुद्धि बल बढ़ाता प्रगति पथ पर निरन्तर आगे बढ़ा है। यह प्रकृति के रहस्यों को खोजते जाने और उसके ज्ञान के सहारे उपयोगी उपकरण बनाते जाने का ही प्रतिफल है।
इन प्रशंसनीय प्रयासों के साथ एक दुर्भाग्य भी पीछा करता आया है कि मारक और घातक उपकरणों का निर्माण भी कम नहीं हुआ और उपार्जित पूँजी का कम अंश उसमें नहीं लगा। इनके द्वारा करोड़ों को जान गँवानी पड़ी और उनके आश्रित बिलखते रह गये। ऐसे महायुद्ध का प्रतिफल यही तो हो सकता था।
विज्ञान ने सुखोपभोग के जहाँ अनेकों साधन प्रदान किये वहाँ मनुष्य को आलसी प्रमादी भी बनाया। नशे को ही लें। उसने अच्छे−खासों को निकम्मा बनाकर रख दिया। यान्त्रिक उत्पादन से अमीरों की अमीरी गरीबों की गरीबी बढ़ाकर दोनों के मध्य खाई चौड़ी कर दी। हर हाथ को काम मिलना सम्भव न रहा। बेकारी−बेरोजगारी के कुचक्र में असंख्यों पिसने लगे। वैज्ञानिक प्रगति में मानवी बुद्धिमता की प्रशंसा तो की जा सकती है, पर उसके द्वारा अपनाये मार्ग को देखते हुए यह भी कहना पड़ता है कि उपलब्धियों का सदुपयोग नहीं हुआ। उससे लाभ थोड़ों को हुआ और हानिकारक दुष्परिणाम असंख्यों को भुगतने पड़े। अभी भी जिस मार्ग पर कदम बढ़ रहे हैं, उन्हें देखते हुए भविष्य और भी अधिक अन्धकारमय दिखता है। स्वसंचालित विशालकाय मशीनें अगणित लोगों को बेरोजगार भूखों मरने के लिए विवश करेंगी। उत्पादन को खपाने के लिए मण्डियों पर अधिकार करने के लिए समर्थों की लिप्सा युद्धोन्माद बढ़ाकर नये−नये युद्ध क्षेत्र रचेंगी। वाहन और कारखाने जो जहरीला धुंआ उगलते रहते हैं, उससे वायु मण्डल विषाक्त हो चला है। कारखानों की गन्दगी, नदी नालों के मारफत समुद्र में पहुँचती है जिससे जल जीवों का ही सफाया नहीं होता, वर्षा भी जहरीली होती है। हवा की तरह पानी भी क्रमशः अधिक जहरीला होता चला जा रहा है। अधिक अन्न उपजाने के लिए रासायनिक खाद और फसल के कीड़े मारने के लिए बनने वाले जहरीले छिड़कावों ने खाद्य−पदार्थों को विषाक्त करना आरम्भ कर दिया है। अणु शक्ति का उपयोग चाहे युद्ध करने के लिए हो या बिजली बनाने के लिए वह हर हालत में विकिरण उत्पन्न करती है। इस प्रकार वैज्ञानिक प्रगति जितनी सुविधाएँ उत्पन्न कर रही है उससे कहीं अधिक जीवन संकट उत्पन्न करने वाले दुष्परिणाम भी खड़े कर रही है। मारक औषधियों ने स्वास्थ्य का संरक्षण कम और भक्षण अधिक किया है।
अच्छा होता, वैज्ञानिकों को पैसे के बल पर मुट्ठी में रखकर उनके द्वारा नई शोधें कराने और नये उपकरण बनवाने वाले सत्ताधीश एवं धनाध्यक्ष अपनी बिरादरी को अधिक समर्थ बनाने की अपेक्षा सर्वसाधारण का हित सोचते और ऐसे निर्माण करते, जिससे देहातों में बिखरे अशिक्षित भारत में छोटे−छोटे उपकरणों के सहारे बहुसंख्यक लोगों को उपयोगी उत्पादन में सुविधा मिलती। इस संदर्भ में मानवता की एक बड़ी चुनौती विज्ञान के सामने है। उसे एक दो हार्स पावर की बिजली से चल सकने वाली कुटीर उद्योगों के यन्त्र बनाने चाहिए। हवा और पानी की शक्ति से चलने वाले सस्ते बिजली घर बनाने चाहिए। जमीन से ऊपर पानी लाने वाले पम्प, छोटे हल, ट्रैक्टर, करघे, लकड़ी चीरने और लोहा गलाने की भट्टियाँ बना सकना कुछ अधिक कठिन नहीं होना चाहिए। वजन ढोने की हल्की गाड़ियाँ, बैलों पर कम वजन डालने वाले जुए, छोटी पवनचक्कियां, जैसे यन्त्र मनुष्यों का—पशुओं का श्रम हलका कर सकते हैं, साथ ही रोजगार भी देते रह सकते हैं। अन्न के बाद मनुष्य की दूसरी आवश्यकता कपड़े की है। इसके लिए रुई बनाने, कातने−बुनने, धोने, रंगने की छोटी−छोटी मशीनें बन सकती हैं और क्षेत्र में बड़े मिलों की प्रतिद्वन्द्विता रोककर लाखों बेरोजगारों को काम दिया जा सकता है। सरकार ही शिक्षा का सारा भार अपने ऊपर उठाए, यह आवश्यक नहीं। निजी विद्यालय चलाने को भी एक स्वतन्त्र व्यवसाय (प्राइवेट सेक्टर) के रूप में छूट दी जा सकती है। इस प्रकार सरकार जनता एवं वैज्ञानिक मिलकर देश के लिए एक ऐसा रचनात्मक तन्त्र खड़ा कर सकते हैं जिसमें स्वल्प पूँजी वाले भी अपने लिए तथा दूसरे साथियों के लिए आजीविका, उपार्जन के नये स्रोत खोल सकें। विज्ञान को “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए और सदा काम आने वाले छोटे यन्त्रों के निर्माण में तत्परतापूर्वक लगना चाहिए। इससे यन्त्र बनाने वाले उद्योगी और उनसे काम लेने वाले प्रयोक्ता सभी का हित साधन हो सकता है। यों अभी कुछ तो यन्त्र बने हैं पर वे बेमन से उपेक्षा पूर्वक बनाये गये हैं, उनकी खामियाँ दूर नहीं की गई। अन्यथा अम्बर चरखा जैसे उपकरण असफल क्यों होते? इस दिशा में अब नये सिरे से सोचा और सहकारिता के आधार पर कारगर कदम उठाया जाना चाहिए।
बड़े लोग इस दिशा में कम ध्यान दें तो छोटे लोग मिलजुलकर सहकारी स्तर पर बड़ी पूँजी वाले कारखाने खड़े कर सकते हैं। करोड़ों की पूँजी वाले कारखाने, शेयरों में, बैंकों के ऋण से, सरकारी अनुदान से बनकर खड़े हो जाते हैं तो कोई कारण नहीं कि देहातों में काम आ सकने वाले गृह उद्योगों के लिए आवश्यक उपकरण न बन सकें। शहरों पर आबादी का बढ़ता हुआ दबाव और बढ़ता हुआ गन्दगी का प्रभाव कम करने के लिए कस्बों को विकसित किया जाना चाहिए। सड़कों का जाल इस तरह बिछाया जाना चाहिए कि पास वाले कस्बों तक सस्ते वाहन आसानी से पहुँच सकें। सरकारी कोष में धन कम हो तो वाहनों पर टैक्स लगाकर उसकी पूर्ति उसी प्रकार की जा सकती है जैसे कि नये पुल बनाने पर यातायात टैक्स लगता है। विज्ञान को सब कुछ अमीरों के लिए बड़े पैमाने पर काम करने वाले साधन ही नहीं जुटाने चाहिए वरन् देहातों में चल सकने वाले उपकरण भी बनाने चाहिए। जिससे बेरोजगारी का निराकरण हो सके। कृषि में शाक और सस्ते फल उत्पादन की काफी गुंजाइश है। आवश्यकता लगन पूर्वक काम करने भर की है।
यह सुविधा साधन उत्पन्न करने वाले, अर्थ प्रधान उपायों की चर्चा हुई। यह भौतिक विज्ञानियों का और उनके लिए बड़ी पूँजी जुटाने वालों का क्षेत्र हुआ। विज्ञान को इतने क्षेत्र तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। उसे चेतना क्षेत्र में भी प्रवेश करना चाहिए और व्यक्तित्व निखारने वाले कामों में भी हाथ डालना चाहिए। यह कार्य अध्यात्म विज्ञानियों का है। संसार में पदार्थ क्षेत्र ही सब कुछ नहीं है उसके समतुल्य एवं अधिक महत्वपूर्ण चेतना क्षेत्र भी है। मनुष्य को अन्य प्राणियों का स्वास्थ्य, बुद्धि, प्रतिभा, कला−कौशल, व्यवहार, संयम आदि की दृष्टि से अधिकाधिक समुन्नत और सुसंस्कृत बनाना अध्यात्म क्षेत्र के विज्ञानियों−प्रज्ञावान मनीषियों, योगी तपस्वियों का काम है। उनका कार्यक्षेत्र भौतिक विज्ञान से भी कहीं अधिक बढ़ा-चढ़ा और अधिक उपयोगी है। पदार्थ विज्ञान सुविधा साधन विनिर्मित कर रहा है। उन साधनों का उपयोग जिसको करना है उस मनुष्य का दृष्टिकोण परिष्कृत करना असामान्य काम है। उसने अनेकों कुटेवें अपना ली हैं और ऐसे क्रिया−कलाप अपना लिए हैं जो मात्र व्यक्ति के लिए ही नहीं समूचे समाज के लिए हानिकारक हैं। ढेरों दुष्प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं जिनसे पीछा छूटना और छुड़ाया जाना चाहिए। ढेरों सत्प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं जिन्हें अभी अपनाया नहीं गया। अन्यथा सामान्य परिस्थितियों में रहने वाले व्यक्ति भी महामानव स्तर का बन सकता था। इस संदर्भ में प्रयोग करना और उपलब्धियों से साधारण को अभ्यास कराना यह आत्मवेत्ताओं का मनीषियों का काम है।
मनुष्य का शरीर और मस्तिष्क बहुमूल्य यन्त्र है। उसके अन्तराल में प्रकृति की पदार्थपरक और परब्रह्म की चेतना परक अनेकानेक विभूतियाँ समाविष्ट हैं। वे बीज रूप से प्रसुप्त स्थिति में रहती हैं, उन्हें अंकुरित और पल्लवित किया जा सके तो नर के भीतर सोया हुआ नारायण जगाया जा सकता है और पुरुष में पुरुषोत्तम की झाँकी देखने को मिल सकती है। इस स्तर के प्रयत्नों को योगाभ्यास एवं तपश्चर्या कहते हैं। साधना भी इसी को कहा जाता है। पुरातन काल के तत्त्वदर्शी अपनी काया में सन्निहित उन सूक्ष्म केन्द्रों को समझते थे साथ ही उन्हें प्रखर बनाने की विद्या का प्रयोग करके न केवल अपने को असामान्य बनाते थे वरन् अन्यान्यों को भी इस कौशल से लाभान्वित करते थे। यह गुह्य विद्या है तो भी यथार्थ और प्रचण्ड। जिनमें श्रद्धा हो वे अनुभवी प्रवीण पारंगतों के मार्गदर्शन में यह प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं और अभ्यास की परिणतियों से लाभान्वित हो सकते हैं। पिण्ड में ब्रह्माण्ड का समग्र ढाँचा विद्यमान है। बीज से समग्र वृक्ष और शुक्राणु से परिपूर्ण मनुष्य को उदय करने के लिए उस प्रसुप्ति को जागृति में बदलना होगा। यह योगाभ्यास का विषय है। इसे चेतना परक विज्ञान क्षेत्र ही समझना चाहिए। पिछले दिनों यह क्षेत्र पाखण्डियों के हाथों रहा है। अब उसे मनस्वी, तेजस्वी और तपस्वी हाथ में लें। तो विज्ञान के अधूरे भाग की भी पूर्ति हो चले और उस प्रगति से ऐसा लाभ मिले जो भौतिक विज्ञान से भी उपलब्ध नहीं हुआ है।
इन दिनों “ब्रेन वाशिंग’’ के नाम से जाने−जाने वाले प्रयोग की महती आवश्यकता है। इस क्षेत्र में भौतिक विज्ञानियों ने भी यत्किंचित् प्रवेश किया है और विरोधियों को समर्थ बनाने में आंशिक सफलता पाई है। उनकी कल्पना है कि सशक्तों को दुर्बलों के मनों पर आधिपत्य करने के उपरान्त पालतू पशुओं जैसा इच्छानुवर्ती होने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। उनके प्रयोग सफल हुए तो समर्थ नफे में रहेंगे किन्तु मनुष्य का स्वतन्त्र चिन्तन और आत्मबल समाप्त हो जायेगा। अस्तु यह क्षेत्र विशुद्ध रूप से अध्यात्मवादियों का है। उन्हें लोककल्याण की दृष्टि से उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाने के लिए जन−साधारण को प्रशिक्षित करना चाहिए। “ब्रेन वाशिंग’’ उन्हीं का काम है। इसे हाथ में लेकर वे मनुष्य जाति की महती सेवा साधना कर सकते हैं।
पंच भौतिक मानवी काया के हृदय, फुफ्फुस आदि अवयवों और रक्त−माँस−अस्थि आदि घटकों का स्वरूप और क्रिया−कलाप समझ लिया है। शल्य−क्रिया क्षेत्र में उसने श्रेय भी प्राप्त किया है। मस्तिष्कीय घटकों के स्थान एवं क्रिया−कलाप समझकर इलेक्ट्रोडों द्वारा उस क्षेत्र को वशवर्ती किया जा रहा है।
वस्तुतः मनःक्षेत्र चेतना से जुड़ता है और इसे सम्भालने की जिम्मेदारी तत्वज्ञानियों—अध्यात्मवादियों पर आती है पर उनने गहराई से उतरना छोड़ दिया है। पाखण्ड के सहारे अपनी गाड़ी चला रहे हैं। यह जादू का खेल तभी तक चल सकता है जब तक भारत में अंध श्रद्धा वाले अनपढ़ भावुक भक्तजनों का अस्तित्व बना रहेगा। भौतिक विज्ञानियों ने जब अध्यात्म क्षेत्र का मोर्चा खाली देखा तो उसमें भी अपनी टाँग अड़ानी आरम्भ कर दी और प्रसन्नता की बात है कि उन्होंने कुछ न कुछ सफलता प्राप्त कर ली है। मैस्मरेजम−हिप्नोटिज्म का सिद्धान्त बहुत दिन पहले ही हाथ लग गया था। अब मेटाफिजीक्ज एक मान्यता प्राप्त विज्ञान की शाखा है। दूरदर्शन, दूरवर्ती, भविष्य कथन, मन को पढ़ना आदि इसमें नई धाराएँ सम्मिलित हो गईं और परामनोविज्ञान, मरणोत्तर जीवन, अतीन्द्रिय क्षमता आदि पर नया प्रकाश डाला है। फिर सन्देह इस बात का है कि वे अध्यात्म के आत्मा परक अन्तःकरण से संबंधित पक्ष पर अधिक सफलता प्राप्त न कर सकेंगे। क्योंकि उसके लिए चारित्रिक पवित्रता की विशेष रूप से आवश्यकता होती है। जबकि पाश्चात्य विज्ञानी इस संदर्भ में काफी पिछड़े हुए होते हैं।
जिन रहस्यों पर अधिक प्रकाश पड़ने की आवश्यकता है उसमें मानवीय विद्युत मस्तिष्कीय घटकों के कम्पन अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ और उनसे निकलने वाले स्रावों पर नियन्त्रण करने की पद्धति मानवी चेतना को प्रभावित करने की दृष्टि से अत्यधिक आवश्यक है। हारमोनों पर नियन्त्रण की तरह ही गुण सूत्रों को इच्छानुरूप प्रवाह दे सकने की बात भी असामान्य है। शरीर में संव्याप्त रासायनिक पदार्थों में हेरा−फेरी की बात भी है। जीव कोशों और ज्ञान तन्तुओं की सूक्ष्म संरचना को प्रभावित करना, मस्तिष्क की विभिन्न कोशिकाओं के प्रवाह में परिवर्तन करना यह तथ्य है जिनके ऊपर आध्यात्मिक ऋद्धि−सिद्धियों का आधार टिका है।
मनुष्य को हर दृष्टि से समुन्नत स्तर का बनाना है, उसमें देवत्व का अभ्युदय करना है तो इन रहस्यों को समझना ही नहीं वशवर्ती करना भी आवश्यक है। यह कार्य भौतिक यन्त्रों, उपकरणों एवं क्रिया−कलापों से सम्भव नहीं। इसके लिए अध्यात्म क्षेत्र पर अधिकार रख सकने वाले पवित्रता एवं प्रचुरता सम्पन्न लोगों को कार्य क्षमता एवं विशिष्ट योग्यता की आवश्यकता पड़ेगी। भौतिक उपलब्धियों के समान ही यदि आत्म विज्ञान अन्तःक्षेत्र की विभूतियों को करतलगत कर सके तो ही समझना चाहिए कि समग्र विज्ञान में प्रवेश पाना सम्भव हुआ। मात्र पदार्थों पर अधिकार करना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जिनके बिना मानवी विशिष्टता अवरुद्ध बनी रहे। बिना सुविधा साधनों के भी काम चल सकता है। आत्मवेत्ता तो विशेष रूप में कम से कम साधनों से काम चलाते हुए यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि यह सब इतना आवश्यक नहीं कि इनके बिना व्यक्तित्व को उत्कृष्ट स्तर का न बनाया जा सके और सच्चे अर्थों में विभूतिवान न बना जा सके। भौतिक साधनों की प्राचीन काल में कमी थी। इतनी बहुलता न थी जितनी इन दिनों है तो भी मनुष्य आत्मबल के सहारे सुखी भी रहते थे और समुन्नत एवं सुसंस्कृत भी। इसके विपरीत इन दिनों जिनके पास साधनों की बहुलता है वे भी बहिरंग एवं अन्तरंग क्षेत्र में विपन्न उद्विग्न पाये जाते हैं।
मनुष्य व्यक्तिगत जीवन में उल्लसित विकसित रहें तथा आनन्द से अपरिपूर्ण दिखाई पड़े तो समझना चाहिए कि उभयपक्षीय उपलब्धियाँ हस्तगत करके मनुष्य सच्चे अर्थों में अपनी गरिमा उपलब्ध कर सके। ऐसे व्यक्तियों की जितनी बहुलता होगी उतना ही वातावरण सुख−शान्ति से भरा-पूरा होगा और स्वल्प साधनों में भी प्रगति एवं समृद्धि की परिस्थितियों का अनुभव होगा।
ऋषियों ने इतने उच्च स्तर की विभूतियाँ उपलब्ध की थीं, जिन पर आज तो सहसा विश्वास करना कठिन होता है। समूचे समाज को आगे बढ़ाने एवं ऊँचा उठाने की क्षमता जिस प्रवाह एवं वातावरण में है, उसकी उपलब्धि आत्म विज्ञान की प्रगति से ही सम्भव हो सकती है।
न्यूटन की विद्वता ही नहीं नम्रता और सज्जनता भी प्रख्यात थी। एकबार चौकी पर जलती हुई मोमबत्ती को उनके पालतू कुत्ते ने चौंक कर गिरा दिया। शोध संबंधी बहुत ही महत्वपूर्ण कागज उससे जलकर नष्ट हो गये। लौटने पर न्यूटन ने गहरी साँस छोड़ी और कहा-‘‘मूर्ख! तू कैसे जान पायेगा कि तनिक सी गड़बड़ी करके कितना बड़ा नुकसान कर दिया। पर ईश्वर की कृपा से वह कार्य फिर कर दिखाऊँगा।” यही हुआ भी। वे अपने प्रशंसकों से इतना ही कहते थे- ‘‘समुद्र के किनारे बैठकर सीप घोंघे चुनने वाले बालकों की तरह में ज्ञान के अगाध सागर में से कुछ कंकड़ पत्थर ही चुन पाया।”
दस इन्द्रियों में जहाँ तक अध्यात्म प्रयोजनों का संबंध है। वहाँ पाँच ज्ञानेंद्रियों की चर्चा होती है। इसमें मनोविकार उत्पन्न करने वाली दुरुपयोग करने पर भयानक प्रतिशोध लेने वाली दो ही हैं। स्वादेन्द्रिय और कामेन्द्रिय। शेष तीन नेत्र, कान और नासिका का संबंध मस्तिष्क के साथ जुड़ा होने और उत्कर्ष में सहायक मात्र रहने के कारण उनका निग्रह करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। सदुपयोग करते रहने भर से सत्प्रयोजनों की सिद्धि होती है। वाणी, कान, नेत्र यह तीनों ही ज्ञान वृद्धि के काम आते हैं। इनके द्वारा कई साधनाएँ भी सम्भव होती हैं। नासिका के गन्ध बोध रहने से उपयुक्त वातावरण का ज्ञान होता है और प्राणायाम जैसी साधनाएँ सधती हैं। इसलिए उनकी विशेष चर्चा इन पंक्तियों में नहीं की गई हैं और स्वादेन्द्रिय तथा कामेन्द्रिय के नियन्त्रण को इन्द्रिय निग्रह मान लिया गया है। मन के संयम का प्रारम्भिक एवं प्रत्यक्ष प्रयोजन इतने भर से सध जाता है।
अब मानसिक क्षेत्र की साँसारिक इच्छा आकाँक्षाओं में दो चरण तृष्णा और अहंता के आते हैं। इनके आकर्षण ऐसे हैं जो मानसिक क्षमता का अधिकाँश भाग अपने घेरे में समेटकर निगलते रहे हैं। जीवन जिन महान प्रयोजनों के लिए मिला है उनमें से एक को भी साधने का अवसर नहीं मिलता। समय, श्रम, चिन्तन, साधन आदि जो कुछ भी उपलब्धियाँ पास में हैं। वे इन्हीं दोनों की ललक लिप्सा में खप जाती हैं। इनके आकर्षण इतने तीव्र होते हैं कि इनसे छूटने की इच्छा तक नहीं होती। फिर उत्कृष्टता के मार्ग पर चलना और चढ़ना बन कैसे पड़े। यह दोनों ही हथकड़ी बेड़ी की तरह बंध जाती हैं। आश्चर्य यह कि यह प्रिय भी लगने लगता है और अवसर होने पर भी छोड़ना तो दूर इनमें कटौती करने तक का मन नहीं होता। तृष्णा और अहंता को ही भव−बन्धन कहा गया है। यह चेतना को जकड़ते हैं। जब कि वासना मात्र शरीर को ही बर्बाद करती है। और उस बर्बादी का एक सीमित दुष्प्रभाव ही अन्तः चेतना पर पड़ता है। उनकी तुलना में तृष्णा और अहंता की क्षति कहीं अधिक है।
तृष्णा का तात्पर्य है वैभव को अधिकाधिक मात्रा में अपने लिए और प्रिय जनों के लिए समेटना। यह विशुद्ध मूर्खता है फिर भी लोग इसे बुद्धिमत्ता एवं सफलता मानकर प्रसन्न होते और शेखी बघारते, देखे गये हैं।
मछली पानी में रहती है। जितना उसके उपयोग में आता है वस्तुतः वही उसकी सम्पदा है। समूचे समुद्र को वह अपना माने और उस पर आधिपत्य घोषित करे तो वह उसकी नासमझी है। समुद्र में अगणित जल−जन्तु रहते हैं। वह उन सबकी संयुक्त सम्पत्ति है। अथवा यों कहना चाहिए कि वह भगवान की सम्पदा है, उसमें से जो जितने का उपयोग कर सके उतना ही उसका है। समेटकर अपनी छाती के नीचे दबाना और आधिपत्य घोषित करना निरर्थक है। यह भूल संसार का और कोई प्राणी नहीं करता कि विश्व वैभव में से अपने निज के लिए अधिकाधिक समेटे और उसे अपनी निज की सम्पदा घोषित करे। यह भगवान का तिरस्कार करना और विधि−व्यवस्था में टाँग अड़ाना है। जिस घर को उसके आस-पास की जमीन को हम अपना मानते हैं उसके ऊपर सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक लाखों करोड़ों व्यक्ति अपनी बताते और दावेदारी जानते रहे हैं। वह जमीन एक के हाथ से दूसरे के में जाती रही है। आगे भी प्रलय का दिन आने तक उसके अभी और लाखों करोड़ों मालिक बनने वाले हैं फिर कैसे कहा जाय कि वह किसकी सम्पदा है। जीवन काल में जिससे जितना उपयोग कर लिया बस उतना ही उसका। जो आदमी आता है और साथ में कुछ भी नहीं लाता। और जाते समय भी खाली हाथ जाना पड़ता है।
मनुष्य आधा सेर आटा खाता और दस गज कपड़ा शरीर पर लपेटता है। यही उसका अपना कहा जा सकता है। भगवान ने संसार में जो वैभव उत्पन्न किया है वह इसलिए है कि सभी जीवधारी उसमें से अपनी-अपनी आवश्यकता पूरी कर सकें। इससे अधिक पर दावेदारी करना अपने और दूसरों के लिए विग्रह खड़ा करना है। अनावश्यक संचय करने पर उससे अनेकों दुर्गुण उत्पन्न होते हैं और दुष्प्रवृत्तियों की आदत पड़ती है। दूसरे ईर्ष्या करते हैं और अपहरण की घात लगाते हैं। भले ही उसका तरीका खुशामद हो या आक्रमण।
स्मरण रखने योग्य है कि ऊँची दीवार उठाने के लिए दूसरी जगह से गड्ढा खोदना पड़ेगा। एक आदमी सम्पन्न बने तो दूसरों का उतना ही हिस्सा कटेगा और उन्हें ही अभावग्रस्त रहना पड़ेगा। संसार में दौलत उतनी ही है जिससे सबकी काम चलाऊ आवश्यकताएं पूरी होती चलें। जो अधिक जमा करेगा वह प्रकारान्तर से इस या उसका अभाव ग्रस्त रहने के लिए मजबूर कर रहा होगा। उचित यही है कि औसत देशवासियों जितना ही अपना निर्वाह स्तर बनाया जाय और यदि किसी प्रकार अपने पास अधिक जमा हो गया है तो उसका एक ही उपाय है कि हाथों−हाथ दूसरे जरूरत मन्दों के लिए हस्तान्तरित कर दिया जाय। अथवा उसका कोई ऐसा सार्वजनिक तन्त्र खड़ा कर दिया जाय जिसकी आजीविका उस कार्य में लगे लोगों में वितरित होती रहे कोई एक व्यक्ति या परिवार उस पर अपनी दावेदारी सिद्ध न करे। धनवान बनने के लिए प्रयत्नशीलों को या तो अपराधी प्रवृत्तियाँ अपनानी पड़ती हैं या फिर निष्ठुरता धारण करके अपने विलास अपव्यय में उस संग्रह को उड़ाना बखेरना पड़ता है। इसी जंजाल में फँसने का नाम तृष्णा है। तृष्णा एक कुटेव है जो आवश्यकता न होने पर भी संग्रह की ललक उत्पन्न करती है। इसके दोनों ही पक्ष कीचड़ में सने हुए हैं। अधिक कमाने में अपराधी प्रवृत्ति का अवलंबन। अधिक उड़ाने बखेरने या जमा करने में दुष्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन। तृष्णा इन्हीं दोनों कुचक्रों में फँसाती है। साथ ही अपने समय, श्रम, चिन्तन एवं कौशल को इसी फेर में लगाये रहने के लिए बाधित करती है। यदि यह मार्ग न अपनाया गया होता तो मध्यवर्ती गुजारा थोड़े से उपार्जन में ही हो सकता था। वह ईमानदारी के साथ थोड़े समय में ही कमाया जा सकता है। और बचे हुए साधन आत्म-कल्याण एवं विश्व-कल्याण में अत्यन्त आवश्यक एवं उपयोगी कामों में लग सकते हैं। इस मार्ग का अवलंबन करने वाला महामानव कहलाता है और अपने कल्याण के साथ−साथ अन्य असंख्यों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में सफल होता है। इस सौभाग्य से वंचित करने का सारा दोष इस तृष्णा पिशाचिनी का ही है जो अपना जीवन, दुष्प्रयोजनों में गँवा देने और समाज में अनेक प्रकार के विग्रह खड़े करने के लिए विवश करती है।
दौलत के अतिरिक्त तृष्णा कुछ सीमित व्यक्तियों को भी अपना परिवारी कल्पित करती है और उन्हें भी उस मुफ्तखोरी में शामिल करती है। वस्तुतः सभी प्राणी भगवान के हैं। जिनके पालन−पोषण का दायित्व परिवारी के नाते सिर पर आ गया हो उनके लिए इतना ही कर्त्तव्य बनता है कि उन्हें स्वावलंबी सुसंस्कारी भर बनाया जाय। उनके लिए धन दौलत उत्तराधिकारी में छोड़ मरना या कमाने योग्य होते हुए भी बैठे−ठाले गुलछर्रे उड़ाने की सुविधाएँ देना सब प्रकार अनुचित है। तृष्णा ऐसे ही अनुचित कर्म कराती है और जिसके पीछे पड़ती है उसे आदर्शों की दृष्टि से गया गुजरा- हेय -बनाकर छोड़ती है। कोई लोक-मंगल जैसा काम करने योग्य तो छोड़ती ही नहीं।
इन दिनों बढ़ती आबादी संसार के सामने सबसे बड़ी विपत्ति बनकर खड़ी है। इन दिनों भी नई सन्तान उत्पन्न करना समाज द्रोह और मानवता के प्रति अपराध है। फिर भी कितने ही लोग तृष्णा के वशीभूत होकर- वंश चलने के नाम पर औलाद पर औलाद पैदा करते जाते हैं। यह तक नहीं देखते कि इससे पत्नी पर क्या बीतती है। उसके स्वास्थ्य और आयुष्य की कितनी बर्बादी होती है। जिनके पास बच्चों को सुयोग्य सुसंस्कारी बनाने योग्य साधन नहीं हैं वे भी यदि बच्चे उत्पन्न करते हैं तो उन नवागन्तुकों को घर बुलाकर पीछे उनका भविष्य बिगाड़ने जैसा विश्वासघात है।
धरती पर स्वल्प साधन होते हुए भी आँख बन्द करके उपभोक्ता बढ़ाते जाना और सभी के मुँह में जाने वाले ग्रास में से कटौती करना - इन दिनों नये सन्तानोत्पादन का सीधा अर्थ यही है। फिर भी जिन्हें “मेरेपन” की ललक खाये जा रही है वे तृष्णाग्रस्त लोग अपनों की संख्या बढ़ाने और उनके लिए खर्च जुटाने के लिए कोल्हू के बैल की तरह पिसते रहने से तृष्णा की तनिक−सी क्षणिक पूर्ति होती है। एक लालसा पूरी होते देर नहीं लगती कि सौ नई कामनाएँ चित्र−विचित्र वेश बनाकर सामने आ खड़ी होती हैं।
इन तृष्णाओं से बचा जा सके तो मनुष्य को निरन्तर मानसिक शान्ति उपलब्ध होती रह सकती है। सन्तोष को सबसे बड़ा धन माना गया है। वह मात्र उसी को प्राप्त हो सकता है जो तृष्णा की सुरसा के निरन्तर फटते जाने वाले मुँह में से छोटा मच्छर बनकर बाहर निकल आने की हनुमान जैसी बुद्धिमत्ता दिखा सकता है।
आत्मिक प्रगति के लिए जिस शान्ति और सन्तोष की आवश्यकता है उसे प्राप्त करने के लिए सर्वभक्षी तृष्णा से पिण्ड छुड़ाना आवश्यक है। उसकी पूर्ति तो कोई कर ही नहीं सकता। आग में ईधन डालते, रहने से वह बुझेगी कैसे? वह तो निरन्तर बढ़ती ही रहेगी चाहे कितना ही वैभव कमा लिया जाय। चाहे कितना ही परिवार बढ़ा लिया जाय। जो भी हाथ लगेगा वह सब कम ही प्रतीत होता रहेगा और अधिक कमाने के फेर में जीवन के दीपक का तेल ही चुक लेगा।
मनोनिग्रह के लिए वासना के शमन के लिए जिस प्रकार चटोरेपन और कामुकता से पीछा छुड़ाना आवश्यक है उसी प्रकार जीवन लक्ष्य की पूर्ति के अनेक सत्प्रयोजनों में निरत रहने के लिए तृष्णा के घड़ियाल मुँह में फँसा हुआ पैर निकालना पड़ेगा। अन्यथा यह ललक ऐसी है जिसके बने रहने पर मन का अन्य किसी उच्चस्तरीय प्रयोजन में संलग्न हो सकना सर्वथा असंभव है।
इसीलिए साधना मार्ग पर चलने वाले भगवद् भक्तों को साधु और ब्राह्मणों की तरह अपरिग्रही बनना पड़ता है। औसत भारतीय स्तर का जीवन यापन करने के लिए जितने साधनों की नितान्त आवश्यकता है उतने न्याय और श्रम के उपार्जन से उपार्जित करने के पश्चात अपना शेष समय आत्म-शोधन के आवश्यक कार्यों में लगाना चाहिए। ईश्वर की सच्ची पूजा उसके विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने में है इसके लिए भी श्रम और साधन चाहिए। इसकी पूर्ति कर सकना उन्हीं के लिए सम्भव है जो निजी निर्वाह स्वल्प साधनों में करलें। जिसे निरर्थक का बोझ लादने की तृष्णा से छुटकारा मिलेगा वही ऊँचा उठ सकेगा। आगे बढ़ सकेगा, पिछड़ों को सहारा दे सकेगा और आगे चलने वाले के साथ कदम से कदम मिलाकर बढ़ सकने में समर्थ हो सकेगा। अतएव आत्मिक प्रगति के लिए तृष्णा को घटाना और हटाना नितान्त आवश्यक माना गया है।
एक बार की बात है। एक कंजूस गहरे गड्ढे में गिर पड़ा। पानी में डुबकियाँ लगाने लगा। किसी उदार व्यक्ति ने मुँडेर पर बैठकर सान्त्वना दी और कहा अपना हाथ लाओ। मैं पकड़कर खींच लूँगा, पर वह इस प्रस्ताव को स्वीकार न कर रहा था।
इतने में सेठ जी का पड़ौसी आ पहुँचा। वह उनकी प्रकृति को भली-भाँति जानता था, सो उनने उस प्रस्ताव को दूसरे शब्दों में रखा। हाथ बढ़ाते हुए कहा- ‘‘लो लाला जी मेरा हाथ, इसे पकड़ कर ऊपर चढ़ जाओ। वे तुरन्त तैयार हो गये और ऊपर निकल आये।”
निकालने वाले आपस में हँसने लगे और बोले देखा- ‘लाओ’ और ‘लो’ का अन्तर।
जिसे किसी को देना ही नहीं उसे देने की आवश्यकता भगवान क्यों अनुभव करने लगे?
दीपक जल रहा था। घृत चुकने को आया। लौ क्षीण हो चली। वायु के झोंकों ने देखा अब दीपक पर विजय पाना आसान है तो वे वृन्द−वृन्द मिलकर तेज आक्रमण करने लगे। अंधकार नीचे दबा पड़ा था-अट्टहास कर हँसा और बोला- दीपक अब तो तुम्हारा अन्त आ गया अब कुछ ही देर में यहाँ हमारा साम्राज्य होगा।
दीपक मुस्कराया और बोला- बन्धु यह देखना काम विधाता का है, मेरा ध्येय है प्रकाश के लिये निरन्तर जलना सो अब अन्त समय उससे विमुख क्यों होऊँ, यह कहकर वह एक बार इतने वेग से जला कि वहाँ का सम्पूर्ण अन्धकार सिमट कर रह गया, भले ही दूसरे क्षण दीपक का अस्तित्व स्वयं भी शेष न रहा हो।
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अन्तरीप द्वीप से आया जीवन के संघर्ष और आँधियों से दुःखी एक नाविक जहाज से उतर कर बाहर आया। समुद्र के मध्य अडिग और अविचलित चट्टान की स्वच्छता को देखकर उसको कुछ शान्ति मिली। वह थोड़ा आगे बढ़ा और एक टेकरी पर खड़ा होकर चारों ओर दृष्टिपात करने लगा। उसने देखा समुद्र की उत्ताल तरंगें चारों ओर से उस चट्टान पर निरन्तर आघात कर रही हैं तो भी चट्टान के मन में न रोष है और न विद्वेष। संघर्ष पूर्ण जीवन पाकर भी उसे कोई ऊब और उत्तेजना नहीं है। मरने की भी उसने कभी इच्छा नहीं की।
यह देखकर नाविक का हृदय श्रद्धा से भर गया उसने चट्टान से पूछा- तुम पर चारों ओर से आघात लग रहे हैं फिर भी तुम निराश नहीं हो चट्टान। और तब चट्टान की आत्मा धीरे से बोली- तात, निराशा और मृत्यु दोनों एक ही वस्तु के उभय पृष्ठ हैं, हम निराश हो गये होते तो एक क्षण ही सही दूर से आये अतिथियों को विश्राम देने, उनका स्वागत करने से वंचित रह जाते। नाविक का मन एक चमकती हुई प्रेरणा से भर गया, जीवन में कितने संघर्ष आयें अब मैं चट्टान की तरह जिऊँगा ताकि हमारी न सही, भावी पीढ़ी और मानवता के आदर्शों की रक्षा तो हो सके।
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एक था फूल एक था काटा दोनों हरे-भरे उद्यान में आजू-बाजू पल रहे थे। मानो प्रकृति ने उनको यह सन्देश देने को नियुक्त किया हो कि इस संसार की बनावट उभयनिष्ठ है, यहाँ सब कुछ सुखद और सौंदर्ययुक्त ही नहीं, दुःखद और कुरूपता भी उसका आवश्यक अंग है।
काँटे ने कहा- प्यारे दोस्त? तुम्हें भी भगवान ने व्यर्थ ही बनाया, कितने कोमल हो तुम कि शीत और ताप के हलके झोंके भी सहन नहीं कर सकते? एक दो दिन खिलकर मुरझा जाने की तुम्हारी इस क्षण-भंगुरता पर तरस आता है, इधर देखो कितने दिनों से जी रहा हूँ, तुम्हारे कितने ही पूर्वजों को इसी डाली पर खिलते और मुरझा जाते मैंने देखा पर मेरा अब तक भी कुछ नहीं बिगड़ा, जानते हों क्यों? इसलिये कि मैं अपना जो कुछ है तुम्हारी तरह लुटाते नहीं, जो भी मेरे पास आता है, काट खाता हूँ लोग मुझसे भय खाते हैं, हाथ भी नहीं लगाते एक तुम हो चाहे जो, चाहे जब तोड़ ले और मरोड़ कर फेंक दे।
फूल ने कहा- बन्धुवर! तुम्हारा कहना यथार्थ है, किन्तु मैं क्या करूं मुझे मरने जीने का तो कभी ध्यान ही नहीं आता- उत्सर्ग मेरे जीवन का ध्येय बन गया है। मैं चाहता हूँ कि मेरा जीवन एक पल के लिये ही क्यों न हो पर ऐसा हो कि जो भी देखे प्यार और प्रसन्नता से गदगद हो जाये। किसी को यह कहने का अवसर न मिले कि भगवान् ने मेरे संसार को सुखद और सुन्दर न बनाकर दुःखदायी और कुरूप ही बनाया है।
काँटे का घमण्ड चकनाचूर हो गया, उस दिन से उसने ऐंठ छोड़कर फूलों की रक्षा को ही अपना कर्तव्यमान लिया।
बीमार हो जाने के उपरान्त चिकित्सा करने या कराने का प्रचलन है। पर होना यह चाहिए कि ऐसी नौबत ही न आये जिससे बीमार पड़ना पड़े।
सृष्टि के समस्त जीवधारियों में प्रकृति प्रदत्त वह क्षमता है कि अपने शरीर की क्रमबद्धता अनायास ही बनाये रहते हैं। चोट दुर्घटना की बात दूसरी है पर वे साधारणतया बीमार नहीं पड़ते। पालतू पशुओं को छोड़कर वन क्षेत्र के निवासियों में पशु−पक्षी तो क्या, जनजातियों के लोग तक बीमार नहीं पड़ते। उन्हें कोई टॉनिक मिलते हों, रोग निवारक औषधियाँ खाते रहते हों, सो बात भी नहीं। प्रकृति के साधारण नियमों का पालन करने भर से हर किसी के स्वास्थ्य की सहज सुरक्षा हो सकती है।
क्या आरोग्य साधना के कोई गुप्त रहस्य हैं? क्या बीमारियों से निपटने की कोई चमत्कारी रसायनें हैं? इसका उत्तर नहीं में ही दिया जा सकता है। कारण कि इसमें यदि कहीं रहस्यवाद का समावेश होता तो शिक्षा से हजारों मील दूर रहने वाले प्राणी उन्हें किससे, क्यों कर सीखते और उस जटिल प्रणाली से अपरिचित रहने की स्थिति में ऋतु प्रकोपों को सहते हुए आहार तक का सुप्रबंध न होने की स्थिति में निरोग कैसे रह पाते?
मानव शरीर दूसरे प्राणियों की तुलना में हर दृष्टि से श्रेष्ठ है। मस्तिष्कीय संरचना ही नहीं, कायिक ढाँचा भी ऐसा है जिसकी सुरक्षात्मक दीवारें बहुत मोटी और मजबूत हैं। उसमें साधारण रोग कीटकों का प्रवेश नहीं हो सकता। यदि हो भी जाय तो वे संरक्षक चौकीदारों से लड़कर जीत नहीं सकते। यहाँ सफाई कर्मचारियों का उदाहरण सामने है। वे संक्रामक बीमारियों के मरीजों का भी मल−मूत्र साफ करते रहते हैं। कपड़े धोते रहते हैं। उनकी सेवा में निरत रहते हैं। डाक्टर, कम्पाउण्डर, नर्स, आदि रोगियों को छूकर हाथ भर धो लेते हैं पर उनकी साँसों में से उड़ने वाली रुग्णता की फौज को किस प्रकार बाहर रोके या दूर भगाते रह सकते हैं। ऐसी दशा में घर की परिचर्या करने वालों—कुशल क्षेम पूछने वालों—स्नेह दुलार में स्पर्श करने वालों को उस विपत्ति में फँस जाना पड़ता। बीमार माता के संपर्क में रोकने पर भी न रुकने वाले बालकों की सुरक्षा का क्या प्रबन्ध होता? उनकी सुरक्षा कैसे हो पाती?
हमारा रक्त, तापमान, विशेषतया श्वेत कण- स्रवित होने वाले रसायन सभी ऐसे होते हैं जो रोग कणों को नष्ट करने में पूरी तरह समर्थ हैं। कठिनाई तब आती है जब इस रक्षा पंक्ति को हम स्वयं दुर्बल करते हैं।
इसके लिए तीन मोर्चों पर सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। एक-आहार, दूसरा-श्रम, तीसरा-मानसिक सन्तुलन। यदि इन तीनों पर सतर्कता भर से काम लिया जाय तो हम सहज ही निरोग रह सकते हैं और बीमारियों के वातावरण में रहकर भी अपने को बचाये रह सकते हैं। जब महामारियाँ फैलती हैं तो अनेक स्वयंसेवी सज्जन बीमारों की परिचर्या करने से लेकर मृतकों की लाशें जलाने में निरन्तर लगे रहते हैं किन्तु देखा गया है कि उनका बाल भी बाँका नहीं होता।
आहार की प्रथम सुरक्षा-दीवार में आवश्यक यह है कि भूख से कम खाया जाय, कड़ाके की भूख लगे बिना कुछ न खाया जाय। तली भुनी, चिकनाई या मसालों से भरे स्वादिष्ट पदार्थों को स्वाद वश अधिक मात्रा में खा लिया जायेगा तो उन दुष्पाच्य पदार्थों से अपच होने की सम्भावना रहेगी। इसलिए जल्दी हजम होने वाले दूध, फल, तरकारी, दलिया, खिचड़ी वस्तुओं पर निर्भर रहा जाय और उन्हें अच्छी तरह चबाकर खाया जाय तो पाचन सही रहने से रक्त भी शुद्ध बनेगा और उसके आगे रोगों का प्रकोप ठहर न सकेगा।
नशे सभी ऐसे हैं जो जीवनी शक्ति पर घातक प्रहार करते हैं। सिगरेट से लेकर शराब तक सभी मादक द्रव्य ऐसे हैं जो अपनी विषाक्तता से सभी अवयवों को अशक्त ही नहीं विषाक्त भी बनाते हैं। इनसे बचे रहना उसी प्रकार आवश्यक है जैसे साँप बिच्छू से बचा जाता है। इनका अभ्यास अनेक रोगों को आमन्त्रित करता है। जो किसी प्रकार भीतर पहुँच जाते हैं उनकी जड़ काटना कठिन पड़ता है।
श्रम के कारण सभी अंगों का संचालन होता रहता है और वे सक्षम एवं सक्रिय बने रहते हैं। यह बड़े आदमियों के नखरे हैं कि वे शारीरिक श्रम करते हुए हेटी अनुभव करते हैं और बैठे−ठाली आरामतलबी में समय बिताते हैं। बौद्धिक श्रम को वस्तुतः परिश्रम नहीं माना गया। उससे पाचन में सहायता नहीं मिलती और अवयवों को सुसंचालित रहने की प्रक्रिया में बाधा पड़ती है। बेकार पड़ा रहने वाला चाकू भी जंग खाकर भौंथरा हो जाता है। श्रम से जी चुराने वाले भी थुलथुले होते जाते हैं और मधुमेह, रक्तचाप जैसे रोगों के शिकार बनते हैं। जिनके पास कृषकों श्रमिकों जैसा काम नहीं है उन्हें टहलने की आदत डालनी चाहिए। प्रातः सायं एक−एक मील रीढ़ सीधी रखकर हाथ हिलाते हुए तेज चाल से चला जाय तो भी अंग संचालन हो सकता है। एक तरीका यह भी है कि बिस्तर पर पड़े−पड़े समस्त अवयवों का क्रमबद्ध नीचे ऊँचे, करने का क्रम चलाया जाय। दुर्बल बीमार, बच्चे, वृद्ध आदि के लिए व्यायाम का यह तरीका सरल पड़ता है।
तीसरी सुरक्षा दीवार है—मानसिक सन्तुलन बनाये रहना। कोई न कोई घटना, आशंका, सम्भावना, कल्पना ऐसी हो सकती है जो आवेश या अवसाद उत्पन्न करे। आवेश अर्थात् क्रोध, चिन्ता, भय, ईर्ष्या आदि। अवसाद का अर्थ है निराशा, उदासी, आत्महीनता आदि। जिस प्रकार शरीर में गर्मी या ठण्डक का नियत अनुपात बढ़ जाने से शरीर अस्त-व्यस्त हो जाता है उसी प्रकार मानसिक असन्तुलन भी ऐसी स्थिति उत्पन्न करता है जिससे शरीर की सहज स्वाभाविकता लड़खड़ाने लगे और मानसिक अस्त-व्यस्तता का प्रभाव शरीर पर पड़ने लगे।
हँसते मुसकाते रहने, निश्चिन्त, निर्भय और सन्तुष्ट रहने का स्वभाव न केवल मनुष्य को सुन्दर, चरित्रवान एवं सद्गुणी एवं साहसी प्रामाणित करता है वरन् शरीर के भीतरी क्रिया-कलाप को ऐसा बनाये रहता है जिस पर बीमारियों का असर न पड़े। मानसिक सन्तुलन मनुष्य को बुद्धिमान, दूरदर्शी, साहसी तो बनाता ही है साथ ही ऐसी स्थिति भी उत्पन्न करता है कि किसी बाहरी रोग का आक्रमण न होने पाये और यदि होने लगे तो उसके ठहरने की गुंजाइश न रहे।
चरित्रवान व्यक्ति बाहर से भले ही किसी कठिनाई में हो पर भीतर अपने सज्जनता एवं चरित्रनिष्ठा के कारण सन्तुष्ट प्रसन्न रहते हैं। जिनके मन में छल, कपट, झूठ, पाखण्ड के ताने−बाने बुने जाते रहते हैं उनके भीतर दुहरा—परस्पर विरोधी व्यक्तित्व बढ़ने लगता है और अन्तर्द्वन्द्व के कारण अनिद्रा, आशंका जैसे रोग घेरने लगते हैं। उद्विग्नता का पाचन तन्त्र पर बुरा असर पड़ता है। जो विक्षुब्ध रहता है उसकी मनोदशा अर्ध विक्षिप्तों जैसी बनने लगती है। इतना ही नहीं रक्त संचार, श्वसन क्रिया, मूत्राशय तन्त्र, एवं पाचक रसों का उचित मात्रा में स्राव अवरुद्ध होने लगता है। ऐसी दशा में स्वस्थ जीवाणु भी सड़कर रोग कीट बन जाते हैं। भीतर की गन्दगी साफ न होती रहे तो उस भीतरी सड़न में भी कई रोग अनायास उठ सकते हैं। किन्तु जिनकी सुरक्षात्मक तीनों दीवारें सुदृढ़ हैं उन्हें बीमार नहीं होना पड़ता और कदाचित् कोई प्रकोप होने भी लगे तो वह देर तक ठहर नहीं सकता।
यह मात्र दृष्टि की भ्रान्ति ही है कि पृथ्वी पर बैठे मनुष्य को सूर्य व चन्द्रमा एक ही आकार के दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि चन्द्रमा से सूर्य चार सौ गुना अधिक बड़ा होने के साथ-साथ पृथ्वी से चन्द्रमा की अपेक्षा सूर्य चार सौ गुना अधिक दूरी पर भी स्थित है। यह सृष्टा की माया की एक झलक भर है।
वृक्षों की ऊँचाई, चौड़ाई और जिन्दगी इस बात पर निर्भर है कि उसकी जड़ें, कितने मजबूत एवं गहरी हैं। उस पर लगने वाले फल-फूल आसमान से उतर कर नहीं लद पड़ते वरन् उस रस संचय पर अवलम्बित रहते हैं जो जड़ों द्वारा भूमि से खींचा जाता है। दृश्यमान वैभव अदृश्य जड़ों की सक्षमता पर निर्भर रहता है।
मनुष्य को भी एक वृक्ष माना जाय तो गुण, कर्म;, स्वभाव के अदृश्य समुच्चय को वे जड़ें कहा जा सकता है जो बाहरी वैभव के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं। इसलिए पत्तों को सींचने की अपेक्षा जड़ों को उपयुक्त खाद पानी मिलता रहे इसका प्रबन्ध किया जाना चाहिए।
एक जैसी परिस्थितियों में उत्पन्न दो व्यक्तियों का भविष्य एक जैसा नहीं होता। मनःस्थिति के अनुरूप वे अपनी−अपनी स्वतन्त्र दिशाएं पकड़ते हैं। साधनों का उपयोग एक उत्कर्ष के लिए करता है दूसरा अपकार्य के लिए, इसलिए उनका भविष्य एक−दूसरे से सर्वथा भिन्न होता है। एक सम्मान और वैभव का धनी होता है। दूसरा पूर्वजों की सम्पदा की होली जला कर बदले में दरिद्रता और भर्त्सना का भागी बनता है। इसमें यों परिस्थितियों की, व्यक्तियों की, भाग्य रेखाओं की सराहना या शिकायत की जाती है। पर इससे आत्म वंचना के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। वस्तुतः मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है और यह कार्य वह अपने गुण, कर्म, स्वभाव जैसे उपकरणों और कौशलों के सहारे सम्पन्न करता है।
लोग अक्सर बाहरी परिस्थितियों, साधनों और अनुग्रहों की ओर तकते हैं और सोचते हैं, इन्हीं की अनुकूलता पर प्रगति के अवसर निर्भर हैं। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। अदृश्य गुण संपदा का महत्व है। उन्हीं का चुम्बकत्व अपने अनुरूप, साधन और सहयोग घसीट लाता है। गड्ढा होने पर उसके समीप जाने वाले गिरेंगे ही और पर्वत की चोटी पर निगाह रखने वालों का उत्साह ऊँचा चढ़ने के लिए ही प्रयास करता है। चोटी और खाई की प्रशंसा निन्दा करना व्यर्थ है। वे तो सृष्टि संरचना के अंग भर हैं। उनमें किसी को खींचने और उछालने की सामर्थ्य नहीं है। यह कार्य तो अपना मानसिक स्तर ही करता है।
भौतिक प्रगति अभीष्ट तो हर किसी को है पर वह हस्तगत उन्हीं को होती है जो उसे उपलब्ध करने के लिए समुचित मूल्य चुकाने के लिए तत्पर रहते और तैयारी करते हैं। यह तैयारी मात्र योजना बनाने और साधन एकत्रित करने तक सीमित नहीं है। वरन् उसके लिए वह करना पड़ता है जो अत्यधिक महत्वपूर्ण है भले ही उसकी आवश्यकता और महत्ता कोई समझ पाये या नहीं। तात्पर्य उन सद्गुणों की संपदा से है जो अपने अनुरूप चुपके−चुपके आश्चर्यजनक ताना−बाना बुनती रहती हैं। वृक्ष का वैभव उसकी जड़ों पर निर्भर रहता है, इस उपमा को यहाँ पूरी तरह लागू किया जा सकता है।
प्रगति प्रयोजन के लिए दृश्यमान गुणों में सर्व प्रमुख उठने से लेकर सीने तक के समय का उद्देश्य पूर्ण नियोजन है। यह कार्य रात को सोते समय अगले दिन के लिए अथवा प्रातःकाल उठते ही अपना कार्यक्रम करने के लिए निर्धारित करना चाहिए। किसी आकस्मिक कार्य के आ खड़े होने पर ही यदा-कदा अपवाद स्वरूप ही उसमें परिवर्तन होने की बात ही क्षम्य हो सकती है। अन्यथा मन मर्जी के या दूसरों के सुझाये काम अस्त-व्यस्त रूप में करते रहना और उन्हें आधे−अधूरे छोड़कर दूसरा कुछ करने लगना बाल-विनोद ही कहा जा सकता है। बन्दर प्रायः ऐसी ही बेसिलसिले की उछल−कूद करते रहते हैं। जिन्हें किसी लक्ष्य तक पहुँचना है उन्हें इस दुर्गुण से अपने आपको बचाने के लिए पूरा−पूरा प्रयत्न करना चाहिए।
निर्धारित कार्यक्रम में पूरी तत्परता और तन्मयता से जुटना चाहिए। शारीरिक श्रम में उत्साह और साथ में मनोयोग की गहराई का नियोजन यही है कि वह रहस्य जो काम में अब उच्चाटन उत्पन्न नहीं होने देता, वरन् उसे बढ़िया किस्म का खेल समझकर पूरा−पूरा रस लेता है। उचित समय में, उचित रीति से, उचित मात्रा में काम कर सकना तभी बन पड़ता है जब उसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बिना लिया जाय। इस प्रवृत्ति में कमी रहेगी तो अधूरे मन और अधूरे श्रम से किये हुए काम फूहड़ों जैसे आधे−अधूरे काने−कुबड़े रहेंगे। उन पर लोग तो हँसेंगे ही स्वयं भी कम असन्तोष न होगा। सफल जीवन का प्रथम गुण इसीलिए क्रमबद्ध कार्य पद्धति अपनाना और उनमें पूरी तरह निमग्न हो जाना बताया गया है। प्रत्येक सफल व्यक्ति को यह प्रक्रिया अनिवार्यतः अपनानी पड़ी है।
दूसरा गुण है। साहस और उत्साह बनाये रहना। इनके अभाव में भीतर का शक्ति स्रोत सूखता है और बाहर अनुत्साह, आलस्य, प्रमाद और भटकाव घेरता है। आत्मविश्वास ऊँचे दर्जे का गुण है। सफल होकर रहने की उमंगें मनुष्य को वस्तुतः इस योग्य बनाती हैं और वह कल नहीं परसों लक्ष्य तक पहुँचाकर ही रहती हैं। जो बबूले की तरह उछलते और झाग की तरह बैठते हैं। उनका मन चंचल अस्थिर और अवसाद ग्रस्त देखा जाता है। अनेक सुयोगों के रहते यह एक ही दुर्गुण ऐसा है जो अभीष्ट की पूर्ति में हजार व्यवधान खड़े कर देता है।
आत्मविश्वास की, दृढ़ निश्चय की, प्रामाणिक चरित्र की, बहिरंग पहचान एक ही है। होठों पर मन्द मुसकान और आँखों में आशा की चमक है। सफल जीवन जीने वाले कभी भी निराश, उदास, गम्भीर, विचार मग्न असमञ्जस ग्रस्त नहीं देखे गये। इन व्यथाओं को अपनाने वाला बात-बात में आवेशग्रस्त होने लगता है। यह व्यक्तित्व की कुरूपता है जो कायिक सुन्दरता और परिधानों की शोभा−सज्जा को धूलि में मिला देती है और किसी के संपर्क में आने, मन की बात पूछने या सहयोग करने की हिम्मत नहीं पड़ती। इसलिए आवश्यक है कि हर किसी को अपनी वरिष्ठता का विश्वास दिलाने वाली होठों की मुस्कान और आँखों में आशा की चमक उत्पन्न करने का प्रयत्न करे। यदि यह अब तक अभ्यास में नहीं आया है तो उसे दर्पण की सहायता से वैसा अभिनय करने की साधना करनी चाहिए। कोई भी देख सकता है कि उदासी के रहते चेहरा कितना कुरूप दिखता है और अक्षमता का कितना विज्ञापन करता है। इसके विपरीत खिले फूल सा चेहरा कितना सुन्दर लगता है और कितनी तितलियाँ, मधु-मक्खियों को अपनी आश्रय पाने के लिए आमन्त्रित करता है।
एकाँगी उत्साह प्रायः ऐसी भूलें कराता है जिनके कारण अगले ही दिनों हौसला टूट जाय। हमें अपने कार्य के हर पक्ष पर विचार करना चाहिए। सम्भावना पर भी और व्यवधान पर भी। आशा रखें पर कठिनाइयों से निपटने की भी योजना बनाकर रखें। आवश्यक नहीं कि अपनी कल्पना के अनुरूप ही सब कुछ घटित होता चला जाय, या जिन व्यक्तियों से जो आशा रखी है वह पूरी होती ही चली जाय। आवश्यकता नहीं कि परिस्थितियाँ अनुकूल ही बनी रहें। इसलिए सतर्कता रखना और तथ्यों के दोनों पहलू समझना आवश्यक है। समझदारी बढ़ाने का यही तरीका है और सफलता तक पहुँचने के लिए सामयिक हेर-फेरों की सूझबूझ रखकर चढ़ पाना ही सम्भव होता है। अन्यथा भावुक व्यक्ति सरलतापूर्वक ठगा जा सकता है और अपना धैर्य गंवाँ बैठ सकता है।
स्मरण रखने योग्य बात यह है कि यह समूचा मानव समाज एक−दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यहाँ कोई भी मात्र एकाकी पुरुषार्थ के सहारे नहीं बढ़ सका है। हर छोटे−बड़े कामों में दूसरों के स्नेह सहारे की आवश्यकता पड़ती है। इसे अर्जित करने का तरीका आदान−प्रदान है। हम देते हैं और पाते हैं। शुरुआत अपनी ओर से होनी चाहिए। इस प्रतीक्षा में नहीं बैठे रहना चाहिए कि हम किसी के लिए कुछ न करें और लोग हमारे ऊपर अकारण ही स्नेह सहयोग बरसाते रहें। इसके लिए मधुर वचन बोलने का, व्यवहार के शिष्टाचार का निर्वाह तो आवश्यक ही है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि सम्मान दें और सहयोग करें। इसके आवश्यक नहीं कि किसी पर थोपी ही, उड़ेली ही जाय। जब मिलना हो छुटपुट कार्यों में हाथ बँटाना, खुशी और रंज में सम्मिलित होना और अपने योग्य सेवा की बात पूछना। यह भी सहयोग का एक बड़ा तरीका है। पर छोटा वह है जिसमें कोई बड़ा खर्च नहीं करना पड़ता और बहुत सहयोग नहीं देना पड़ता पर दूसरे के हिस्से के काम में अपना हाथ लगा देना, इतने से भी काम चल जाता है, पर कदाचित किसी को आकस्मिक विपत्तियों में फँस जाना पड़े तो उसकी यथासम्भव सहायता करना ऐसा तरीका है जिससे कितनों को अपना बनाया जा सकता है और उनके योगदान से समयानुसार अपने प्रगति कार्यों में आयाचित सहयोग प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए अपनी आवश्यकता का संकेत कर देने भर से उन्हें प्रत्युपकार की बात स्मरण हो आती है। जो मित्र बनाना, उपेक्षित रहना और सहयोग अर्जित करना यह तीनों ही स्थितियाँ अपनी उदारता, नम्रता और व्यवहार कुशलता पर निर्भर हैं। इस दिशा में प्रयत्नरत रहने का स्वभाव ही बना लेना अच्छा है।
सम्मान, सद्भाव प्राप्त करने की इच्छा तो सभी की रहती है और इसके लिए अपनी विशेषताओं का ढिंढोरा पीटने के लिए लोग प्रयत्न भी करते रहते हैं। पर यह अस्थिर और उथला तरीका है। ठोस और वास्तविक तरीका है- अपनी प्रामाणिकता की छाप दूसरों के मन पर बिठा देना। यह प्रपंचों का विषय नहीं, वरन् सीधा वास्तविकता से संबंधित है। यह एक दिन में नहीं, लंबे समय तक उच्च चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाने से ही सम्भव है। लोक प्रतिभा के आधार पर जितने प्रभावित होते हैं उसकी तुलना में मनुष्य की ईमानदारी सज्जनता, शालीनता के प्रसंगों का यथार्थवादी परिचय जानना चाहते हैं और उसे आसानी से कर भी लेते हैं। हमारी भीतरी और बाहरी दुश्चरित्रता को पैरों तले की जमीन, ऊपर का आसमान देखता है और हवा के साथ उस वास्तविकता को समूचे वातावरण में बिखेर देता है फलतः वह विश्वास के रूप में न सही आशंका के रूप में हर किसी के मन में जा बैठता है। अप्रामाणिकता पर कोई विश्वास नहीं करता और यह सन्देह हर किसी को बना रहता है कि ऐसी ही कुटिलता धूर्तता से कोई कभी हमें भी हानि न पहुंचा बैठे। ऐसे लोग सीधे रास्ते प्रगति तो कर ही नहीं पाते। उलटे रास्ते यदि कर भी लें तो वह अधिक देर टिकती नहीं। विभूति को अर्जित करना जितना कठिन है उससे कहीं अधिक कठिन उन्हें सुरक्षित रख सकना है। संपदा हो या प्रतिभा उन्हें सुरक्षित रख सकना हर किसी के बलबूते की बात नहीं है इसके लिए चरित्रवान होना नितांत आवश्यक है।
सद्गुणों में सुव्यवस्था का अत्यधिक महत्व है। व्यवसाय की, सार्वजनिक क्षेत्र की, परिवार की सुव्यवस्था तथा साथियों को सही रखना तथा उपयोगी बनाना सम्भव होता है। संसार में जितने महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं उनमें प्रत्यक्षतः सुयोग्य साथियों, श्रमिकों एवं साधनों का महत्व दृष्टिगोचर होता है, पर परोक्षतः उसे व्यवहार कुशलता का चमत्कार दिखाते देखा जाता है जिसे सुव्यवस्था कहा जाता है। हानि−लाभ के जितने भी प्रसंग हैं उसमें अस्त−व्यस्तता का अभिशाप अथवा सुव्यवस्था का वरदान ही काम करते दिखता है। जो शतरंज की तरह अपनी गोटें यथास्थान फिट करता रहता है। उसे सूत्र-संचालक कहते हैं। प्रबन्धक, मैनेजर आदि भी। यह योग्यता संसार की अन्यान्य योग्यताओं की तुलना में सैंकड़ों गुनी अधिक महत्वपूर्ण है। व्यवस्था बुद्धि को विकसित करने के लिए व्यक्तिगत क्षमताओं का सुनियोजन करना चाहिए इसके लिए परिवार की प्रयोगशाला अभ्यास के लिए सर्वसुलभ और सर्वोत्तम है। अच्छा हो परिवार को छोटा रखा जाय और जो सदस्य अपने से बँधे हैं उनमें से प्रत्येक के दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप को, गुण, कर्म, स्वभाव को, दिशाधारा को सुनियोजित करते रहने में दत्त चित्त रहा जाय, जिससे अपनी प्रसन्नता बढ़े और उनको सही राह मिलने का सन्तोष रहे।
यह मौलिक और आरम्भिक गुणों की चर्चा है। इससे कम में मौलिक प्रगति का तारतम्य बनता नहीं। यदि ये ही सद्गुण उलट कर दुर्गुण बन जाय तो समझना चाहिए कि घड़े में अनेकों छेद हो गये और उसमें भरा हुआ आकाँक्षाओं एवं प्रयत्नों का सार जल बिखर गया। प्रगति शीलों को ऐसा अवसर नहीं ही आने देना चाहिए।
स्वास्थ्य की महिमा बताने के लिए जो भी कहा जाय कम है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन या आत्मा का निवास होता है। यह उत्साहवर्धन कथन है। पर ऐसा नहीं समझना चाहिए कि यह आत्यन्तिक सत्य है। शरीर के बिना तो मन काम नहीं कर सकता। पर वह टूटा−फूटा, रुग्ण, अपंग, असमर्थ शरीर होने पर भी अपनी विलक्षणता यथावत् बनाये रहता है वरन् उसे अधिक सजग, सक्षम, सक्रिय बना सकता है इस प्रतिपादन के उदाहरण भौतिक जगत में भी विद्यमान हैं।
प्राचीन काल में च्यवन और बाल्मीकि जैसों के ऐसे कथानक मिलते हैं, जिनने तप करते हुए शरीर को निष्क्रिय बना लिया था और उसके खोखले में मात्र आत्मा ही काम करती थी। समाधि अवस्था में ऐसा ही होता है। उसका प्रयोगात्मक प्रदर्शन करने वाले हृदय और मस्तिष्क की गति बन्द होने पर भी जो जीवित बने रहते हैं और निर्धारित समय पर उस निष्क्रियता को समाप्त करके पूर्ववत् सक्रिय हो उठते हैं।
यह अध्यात्म प्रसंगों की चर्चा हुई। एक भौतिक उदाहरण अभी भी हमारे सामने है जिसमें शरीर जीवित रहने भर के लिए सक्रिय है अन्यथा उससे कोई उपयोगी कार्य नहीं बन पड़ता है। यह सज्जन हैं ब्रिटेन के ऐसे वैज्ञानिक जिनके बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है। इनने सृष्टि की उत्पत्ति के पुरातन सिद्धान्तों की इस प्रकार व्याख्या की है जिसके आधार पर अब तक की मान्यताओं में भारी उलट−पुलट करनी पड़ सकती है।
बयालीस वर्षीय इस वैज्ञानिक ने एक दशाब्दी पूर्व ऐसे विचित्र पक्षाघात ने घेरा जिसके संबंध में ऊँचे चिकित्सकों को भी कोई विशेष जानकारी न थी और वे ऐसे ही अनुमान के आधार पर चिकित्सा करते रहे। कैंब्रिज विश्व विद्यालय के यह गणित अध्यापक अपनी नियुक्ति के उपरान्त ही संसार में मूर्धन्य भौतिक विज्ञानियों में गिने जाने लगे थे। विशेषतया ब्रह्म संरचना के रहस्यों के नूतन सन्दर्भों के संबंध में।
पक्षाघात का असर तब भी बहुत हद तक हो चुका था किन्तु उनकी प्रतिभा से प्रभावित विज्ञान की एक छात्रा ने उनसे विवाह कर लिया था जिसके उदर से एक बालिका भी जन्मी। पर वे अब पत्नी की सेवा सहायता पर भी निर्भर नहीं हैं। एक विशेष प्रकार की मोटर लगी कुर्सी उनके लिए बना दी गई हैं। उसी पर वे कसे रहते हैं। अब उनके हाथों ने ही साथ नहीं छोड़ा है वरन् वाणी भी दगा दे गई है। उन्हें कुछ कहने में बहुत जोर लगाना पड़ता है फिर भी उच्चारण अस्पष्ट ही रहता है। मेज पर लगे कम्प्यूटर की सहायता से ही वे अपने चिन्तन को प्रकट कर पाते हैं। उनके अभ्यस्त सहायक मन्तव्य समझ लेते हैं और जिन वैज्ञानिकों के साथ वे काम कर रहे हैं उन्हीं के सामने प्रस्तुत कर देते हैं।
कहा जाता है कि वे इस अर्ध-शताब्दी के दूसरे आइंस्टीन हैं। उनने ब्रह्माण्ड की गुत्थियों को इस नये ढंग से सुलझाया है। जिसके संबंध में पूर्ववर्ती वैज्ञानिकों को कल्पना तक न थी। यदि उनका प्रयास पूरी तरह−सफल हो गया तो प्रकृति की अनेकों अनबूझ पहेलियों पर नया प्रकाश पड़ेगा। यह वैज्ञानिक श्री स्टीफन हाँकिंग अभी 50 वर्ष के नहीं हुए हैं। दस वर्ष से शरीर आहार, निद्रा जैसी काम चलाऊ हरकतें ही कर पाता है। मशीन की कुर्सी और कंप्यूटर ही उन्हें जीवित कहे जाने योग्य ही नहीं संसार का अद्भुत मानसिक क्षमता की स्थिति में बनाये हुए है। ऐसी दिशा में शरीर को मन का निमित्त कारण माना जाय या नहीं यह भी एक नया प्रश्न सामने आता है।
हृदय में क्षमा करने की शक्ति सदैव रहती है। —स्वेट चाइन
किसी में मानवी उदारता की कमी देखते हैं तो उसे नर पशु कहते हैं। इसका तात्पर्य होता है भावना रहित होना। पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। मनुष्येत्तर प्राणियों में भी उनके कार्य क्षेत्र में काम आने वाली उदारता समुचित मात्रा में पाई जाती है। वह उदारमना मनुष्यों के समान ही होती है कई बार उनसे भी अधिक।
बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में मनुष्य को अपनी विशिष्टता का दावा करना बेकार है क्योंकि अन्य प्राणी जिस स्तर का जीवनयापन करते हैं उसमें काम आने वाली बुद्धि की तनिक भी कमी नहीं पाई जाती। यदि ऐसा होता तो साधनों की कमी रहते हुए भी वे इतना प्रसन्न जीवन कैसे जी लेते हैं, वह किस प्रकार संभव हुआ होता।
मनुष्य को भी भगवान ने जिस प्रयोजन के लिए बनाया है उसके लायक ही बुद्धि प्रदान की है। उस पर उसको गर्व करना व्यर्थ है। मनुष्य जिस कारण सराहा जाता है वह उसकी भावनाशीलता है। सहकारिता, उदारता, करुणा जैसे गुणों में मानवी गरिमा सन्निहित है। जिनमें यह संवेदनाएँ नहीं, मात्र चतुरता का ही बाहुल्य है उसी को नर पशु की उपमा दी जाती है।
किन्तु ध्यानपूर्वक देखा जाय तो मानवी भाव संवेदनाओं की पशु पक्षियों में भी कमी नहीं होती। अपने कार्य क्षेत्र में जितनी आवश्यकता है कई बार तो वे उससे भी अधिक सद्भावनाओं का परिचय देते हैं। संतान पालन के संबंध में उनका वात्सल्य और प्रयास मनुष्य की तुलना में निश्चय ही अधिक होता है।
पशु पक्षियों को प्रकृति ने अपना पराया पहचानने तथा भेद करने, तद्नुसार आचरण करने की विलक्षण योग्यता प्रदान की है। विभिन्न प्रयोग इसके साक्षी हैं।
सियरा नेवादा (अमेरिका) में 14 फीट की बर्फ जम जाती है। भीषण जाड़ा पड़ता है। “वेलिंग“ नामक गिलहरी दीर्घ शीत निद्रा के बाद बर्फ कुतरकर बाहर निकल आती है। पांल शर्मान तथा सहयोगियों के एक दल ने लगातार 9 वर्षों तक इन गिलहरियों का अध्ययन किया। करर्नेल वि. वि. के जीव शास्त्र के मूर्धन्य शर्मान पता लगा रहे थे गिलहरियाँ कैसे अपने संबंधी लोगों को पहचान लेती हैं और वैसा व्यवहार करती हैं। अकेले शर्मान ही नहीं विश्व के अनेकानेक विश्व विद्यालयों के पशु पक्षियों की पहचान तथा तत्संबंधी व्यवहार एवं पूरे खानदान की अन्तः भावनाओं पर शोध कर रहे हैं।
प्रकृति में विशेषतः पशु-पक्षी जगत में रक्त की नजदीकी के अनुसार अच्छा या बुरा व्यवहार की परम्परा का होना एक महत्वपूर्ण पैरामीटर समझा जाता है। जीवन शास्त्रविदों के सामने यह प्रश्न है कि पशु पक्षी रक्त संबंध को कैसे पहचान जाते हैं। प्रकृति ने उसके लिए कौन से संयंत्र उनके पास लगाए हैं। दूसरा सवाल यह है कि पशुओं में अपना और पराया क्यों व कैसे होता है उसे जानकर वे अपना व्यवहार कैसे परिवर्तित कर लिया करते हैं। कौन हमारे परिवार का है और कौन बाहरी और इसके अनुसार क्यों वे अपने व्यवहार को सतत् बदलते रहते हैं।
प्रयोग से यह देखा गया है कि गिलहरियों की मादा अपने जान की भी बाजी लगाकर अपनी बहन तथा बेटियों को भय का संकेत देकर उन्हें बचा लेती है। मेंढकों में कुछ इतने परिवार प्रेमी होते हैं कि वे अपने ही सगे भाई बहन के साथ घूमना पसंद करते हैं न कि सौतेले भाई बहन के साथ।
मधु मक्खियाँ अपने छत्ते में उन्हीं मक्खियों को प्रवेश करने देती हैं जो उनके छत्ते की ही होती हैं। चाहे आने वाला समूह अपनों को पहचानने की जानकारी अपने पास क्यों न रखता हो। छत्ते से बाहर वालों को तो भगा कर ही रहती हैं।
सोशियो बॉयलोजी विज्ञान शाखा के एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त का विकास ब्रिटिश बायलाजिस्ट विलियम मिल्टन ने किया है। यह सिद्धान्त है—‘‘किन सलेक्शन” संबंधियों का चयन।
जमीन पर दौड़ने वाली गिलहरियों में सबसे अधिक शिकार, शिकारी पशु उन गिलहरियों का करते हैं जो शिकारी के आगमन की जानकारी प्रसारित करती हैं। क्या कारण है कि ये गिलहरियाँ अपनी जान को खतरे में डालकर भी अपने संबंधियों को सावधान कर दिया करती हैं। अनुसंधान से पता लगा कि यह “जीन्स” का है। जिसके द्वारा यह सन्ततियों को लाखों वर्षों से जीने मरने की प्रेरणा देता आ रहा है।
परोपकार की प्रवृत्ति पशुओं में भी पाई जाती है। इसकी पुष्टि पेरिस का निकटवर्ती कब्रिस्तान करता है जहाँ लगभग सवा सौ ऐसे जीव जन्तु दफनाये गए हैं, जिन्होंने अपने तुच्छ जीवन को महानता से जोड़ लिया है। प्रवेश शुल्क भुगतान कर देने के बाद ज्यों ही दर्शक एक कलात्मक द्वार से घुसता है, सबसे पहले उसे एक कुत्ते की मूर्ति बरबस आकृष्ट कर लेती है। इस कुत्ते ने अपने जीवन काल में एक दो नहीं 40 ऐसे व्यक्तियों की जान बचायी जो मदद न मिलने पर मौत के घाट उतर जाते।
कुत्ते के जीवन-वृत्तान्त से ज्ञात है कि ऐसा परोपकारी कुत्ता “बेरी” आल्पस के ढलान पर रहा करता था। उसका स्वामी सैलानी पर्वतारोहियों के मार्गदर्शक के रूप में काम करता था।
आल्पस पर्वत की सुषमा शीत ऋतु में साहसी पर्वतारोहियों को अपनी ओर आकर्षित करती रहती है। इन साहसिक यात्रियों को सांय होते-होते अपने सुनिश्चित कैम्पों तक वापस हो जाना पड़ता है। किन्तु कभी−कभी यात्री मार्ग भूल कर या बर्फीली आँधियों के कारण भटक जाते हैं। पैर के नीचे वाली पतली बर्फ के टूटते ही नीचे खड्ड में गिर पड़ते हैं। रात्रि का तुषारापात उनकी जीवित समाधि बना देता है, जहाँ पड़ा व्यक्ति असहाय एकाकी मरने को ही बाध्य होता है।
बेरी का शौक ही था, जो उसे भयंकर जानलेवा शीत में भी अपने गर्म कोठरी त्यागने को बाध्य करता था। प्रातः होते ही वह हिम-शिखर की ओर सूंघते-सूंघते निकल पड़ता। अपनी घ्राणेन्द्रियों द्वारा वह मानव गन्ध की आहट लेता था कि कहीं कोई आफत का मारा मुसाफिर तो फँसा नहीं है। ज्यों ही उसे किसी की गन्ध लगी, तुरन्त वह चीख−चीख कर अपने स्वामी के पास दौड़ कर पहुँचता। मूक प्राणी के इन संकेतों की उपेक्षा उसके मालिक ने कभी नहीं की। कुत्ता जब अपने स्वामी के साथ उसी स्थान पर लौटता तो उसके संकेतों पर ज्यों ही बर्फ काटी और हटाई जाती, उसमें से लगभग मृत व्यक्ति निकाल लिए जाते। प्रारम्भिक उपचार करके उन्हें मौत से उबार लिया जाता था।
बेरी का दैनन्दिन स्वभाव यही था जिसके बलबूते उसने 40 आफत के मारों को पुनर्जीवित कराया। यह संयोग ही था कि अन्तिम व्यक्ति, जिसको उसने हिम समाधि से उबारा, वह कृतघ्न निकला। बर्फ में पड़े−पड़े वह भूख के मारे इतना छटपटा रहा था कि बाहर निकलते ही उसने अपने जीवन दाता कुत्ते को ही गोली का शिकार इसलिए बना लिया ताकि उसकी क्षुधा पूर्ति हो सके। उसने चालीस को बचाया लेकिन एक मानव की कृतघ्नता ने उसका जीवन अन्त कर दिया। इसी का प्रायश्चित्त वहाँ के नागरिक समुदाय ने उस कुत्ते की कब्र बनाकर किया है।
लोकमान्य तिलक अपने भविष्य के विषय में कभी विचार नहीं करते थे। उन्होंने अपनी भरी जवानी में पूना में न्यू इंग्लिश स्कूल नामक एक विद्यालय की स्थापना की थी। उसमें कार्य करते हुए वे वेतन के रूप में अपने निर्वाह के लिये केवल 30 रुपये लेते थे। एक दिन उनके एक मित्र ने कहा- ‘इतनी छोटी-सी राशि में से तो आप अपने देहावसान के बाद शरीर के दाह संस्कार के लिये भी कुछ नहीं बचा सकेंगे।’ तिलक जी ने धीरे गम्भीर स्वर में कहा− इसकी चिन्ता समाज को होनी चाहिए। यदि लोगों को ठीक प्रतीत होगा तो वे देह का अग्नि संस्कार कर देंगे।
जीव जगत का विकास जिन दो गुण विशेषों के आधार पर होता है उनमें से एक है- ‘स्व’ केन्द्रित आकाँक्षा एवं दूसरी ‘पर’ केन्द्रित सामूहिकता। प्रकारान्तर से इन्हीं को स्वार्थ एवं परमार्थ क्रमशः कहा जा सकता है। अध्यात्म की भाषा में तत्त्ववेत्ता इन्हें आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के नाम से पुकारते हैं।
आकाँक्षा की चमत्कृतियाँ कितनी सशक्त हैं, इसके परिणाम पग-पग पर देखे जा सकते हैं। संकल्पशक्ति, श्रद्धा की प्रचण्ड पुरुषार्थ के रूप में परिणति एवं चिन्तन के बिखराव के एकीकरण से प्रकट होने वाले परिणामों से इनकी एक झलक भर मिलती है। इस पर भी यह नहीं मान लेना चाहिए कि इतने भर से प्रगति-पथ प्रशस्त हो गया। इससे तो एक पक्ष की ही पूर्ति होती है जिसे परिष्कृत व्यक्तित्व कह सकते हैं। यह गाड़ी के एक पहिए के समान है। दूसरा पहिया सक्षम न हो तो बात कैसे बने? दूसरा पक्ष है सामूहिकता या सहकारिता। इस आदान-प्रदान के बिना बहुत छोटे स्तर के अदृश्य प्राणी ही जीवित रह सकते हैं। अन्यथा हर विकसित प्राणी को अन्य सहयोगियों का सहकार उपलब्ध करना और उसके बदले में अपना सहकार प्रदान करना पड़ता है। गर्भावस्था में भ्रूण स्थिति हो या अण्डे की, शुक्राणु इकाई के रूप में केन्द्रित जीव कण को माता का सहकार अनुदान चाहिए ही। इसके उपरान्त प्रसव से लेकर अपने बलबूते जीवनचर्या चलाने योग्य होने तक की स्थिति प्राप्त करने के लिए जन्मदात्री का संरक्षण परिपोषण चाहिए। सर्वथा होय स्तर के जीव ही बिना माता के सहयोग के स्वावलंबी रहते देखे गये हैं अन्यथा जिनका थोड़ भी विकास हो चुका है, उनमें से चींटी से हाथी तक के समस्त जीवधारियों को आरम्भिक अशक्तता दूर होने तक माता के अंचल का आश्रय तथा आहार के लिए अनुदान चाहिए।
प्राणियों को जो क्षमता, सुविधा अनुकूलता उपलब्ध होती है, उसका एक सीमित अंश ही उनका स्व उपार्जित होता है। शेष तो सहचरत्व के साथ चलने आदान-प्रदान का ही प्रतिफल होता है। चींटी, दीमक, मधु-मक्खी जैसे छोटे जीव अपनी जीवनचर्या एवं कार्य पद्धति की दृष्टि से असाधारण प्रतिभा, दक्षता एवं समर्थता का परिचय देते हैं। इस विशेषता में उनका परोक्ष अंश ही पैतृक एवं परम्परागत होता है। क्रिया-कलापों का समूचा कार्य क्षेत्र तो पारस्परिक सहयोग से ही विकसित होता है। उन प्राणियों को समूह से पृथक करके एक−एक करके रहने के लिए बाधित कर दिया जाय तो वे अपनी पैतृक विशेषता को भी क्रियान्वित न कर सकेंगे और उमंगों को चरितार्थ न कर पाने की विवशता अनुभव करते हुए जीवन लीला समाप्त कर देंगे।
बड़े प्राणी समूह बनाकर रहते हैं। उनके अपने परिवार होते हैं। पक्षियों को, वन्य पशुओं को झुण्डों में रहते देखा जाता है। यों वे आपस में उलझते-सुलझते भी रहते हैं फिर भी एकाकी रहने का साहस नहीं करते क्योंकि सामूहिकता की छत्रछाया में उन्हें अधिक सुविधा, सुनिश्चितता एवं प्रसन्नता की अनुभूति होती है। एक दूसरे से बहुत कुछ सीखते सिखाते हैं। इतना ही नहीं, अप्रत्यक्ष आदान-प्रदान से उनकी जीवनचर्या में असाधारण रूप से सहायक भी होते हैं। जो प्राणी पारस्परिक सहकारिता के लाभ से जितने वंचित रहे, उन्हें उपयोगी होते हुए भी अपने अस्तित्व का खतरा उसी अनुपात से उठाना पड़ा। इसके विपरीत जो झुण्ड बनाकर रहे, वे बन्दर जैसे हानिकारक होते हुए भी अपनी स्थिति मनुष्य के साथ बैर−विरोध मोल लेकर भी बनाये रहे। प्रत्यक्ष है कि सिंह, व्याघ्र जैसे स्व वर्ग द्रोही क्रमशः घटते और संसार से अपना अस्तित्व समाप्त करते चले जा रहे हैं।
मनुष्य की प्रगति में आकाँक्षा के उपरान्त दूसरी अद्भुत क्षमता सहकारिता ही है। इसी प्रवृत्ति न उसे आदिमकाल की वन−मानुष जैसी वीभत्स स्थिति से उबारकर वर्तमान सभ्य एवं सम्पन्न स्तर के प्रतिभाशाली, गौरवान्वित मनुष्य के स्तर तक पहुँचाया है। उच्चारण, भाषा, लिपि, चिन्तन उसका अपना निज का उपार्जन नहीं है। इसके पीछे चिरकाल की, असंख्यों की अनुभूतियों एवं उपलब्धियों का अनुदान क्रम चला जा रहा है। मिट्टी के उपलों पर आड़ी-टेढ़ी लकीरें बनाने की प्रक्रिया के सहारे एक ने दूसरे को अपने विचारों से अवगत कराने का जो भौंड़ा सिलसिला चलाया, वही आज सुव्यवस्थित लिपि, भाषा, शब्दकोष आदि के रूप में सामने है। अन्न उगाने, पेड़ लगाने, पशु पालने, आग जलाने, वस्त्र बनाने, घर घरौंदे खड़े करने की विद्या भी अतीत काल में आज के बिजली जैसे आविष्कारों जैसी ही उत्साहवर्धक उपयोगी सिद्ध हुई थी। वह समस्त उपार्जन किसी एक व्यक्ति के नहीं थे वरन् अनुभवी का लाभ एक से दूसरे को मिलते−मिलते उस स्थिति तक पहुँचना सम्भव हुआ कि उपरोक्त सुविधा, साधनों से लाभ उठाया जा सके। पहियेदार गाड़ी, तैरती नाव, कम्पास, दीपक आदि का जिन दिनों आविष्कार हुआ होगा, उस दिन आदमी फूला न समाया होगा और अन्य साथी प्राणियों की तुलना में एक बारंगी सहस्रों योजन आगे बढ़ गया। यह सर्वथा स्मरणीय है कि उन वरदानों को प्राप्त करने का श्रेय उस सहकारिता की प्रवृत्ति को ही रहा होगा जिसे स्नेह, सहयोग, परमार्थ आदि नामों से भी पुकारा जा सकता है।
समाज की संरचना इसी आधार पर हुई है। कुटुम्ब इसी प्रेरणा से बने। अन्यथा मनुष्य भी मात्र बन्दरों की तरह झुण्डों में तो रहता पर आदान-प्रदान का द्वार न खुलने से अद्यावधि पूर्वजों की तरह ही नर वानर बना रहता।
यहाँ पिछले प्रगति क्रम पर दृष्टिपात इसलिए किया जा रहा है कि भावी प्रगति में सामूहिकता का महत्व अच्छी तरह समझा जा सके और उसकी अपार सामर्थ्य का उपयोग आज के संदर्भ में कर सकना सम्भव हो सके। समाज संरचना, वर्ग संगठन, जातीयता, शासन व्यवस्था को सामूहिकता की प्रवृत्ति का सुनियोजित निर्धारण की समझा जा सकता है। मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा जाता है। इसे कथन का तात्पर्य यह है कि उसका इतिहास, वर्तमान एवं भविष्य पूरी तरह सामूहिकता, सहकारिता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ समझा जा सके। मनुष्य अब इस तरह पारस्परिक आदान−प्रदान की प्रक्रिया पर निर्भर हो गया कि उससे हटकर उसके लिए जीवित रह सकना तक कठिन है।
सभ्यता आकाश से नहीं टपकी है। वह पारस्परिक सहयोग से अनुभव अनुसंधान के सहारे कमाई हुई प्रक्रिया है। ऐसी प्रक्रिया जिसने मनुष्य के आदिम स्वरूप, स्तर दृष्टिकोण एवं व्यवहार में काया-कल्प जैसा अन्तर उपस्थित कर दिया।
प्रगति के लिए सहकारिता का सिद्धान्त ही सन्तोषजनक और फलप्रद हो सकता है। अन्यथा एकाधिकार, स्वेच्छाचार, संग्रह एवं सर्वजनीन स्तर से अत्यधिक ऊँचे वैभव के फलस्वरूप अनेकानेक विकृतियाँ उत्पन्न होंगी। संग्रही दुर्व्यसन अपनाएंगे और दुरुपयोग की उच्छृंखलता से समाज व्यवस्था में अवाँछनीय उदाहरण प्रस्तुत करेंगे। दूसरे लोग या तो साधन रहित होते हुए वैसी ही नकल करेंगे या फिर ईर्ष्याग्रस्त होकर हानि पहुँचाने के लिए उतारू होंगे। अपराधी आचरण करेंगे।
सामंतवाद, अधिनायकवाद, पूँजीवाद आदि कितने ही व्यक्तिवादी तन्त्रों के प्रयोगों और परिणामों को भूतकाल में तथा वर्तमान काल में अधिक बारीकी से समझा गया है और लोक चिन्तन तथा मूर्धन्यों का निष्कर्ष एक ही केन्द्र पर एकत्रित हुआ है कि संपदा का अधिक मात्रा में उपार्जन एवं अधिक सही उपयोग सहकारी रीति-नीति अपनाने से ही सम्भव हो सकता है। प्रजातन्त्र, समाजवाद जैसे सिद्धान्तों का राजनैतिक क्षेत्रों में इसी आधार पर विकास हुआ है कि मानवी प्रगति के भूतकालीन इतिहास को देखते हुए भावी विकास के लिए भी सहकारिता को हर क्षेत्र में मान्यता दी जाय और उसे आगे बढ़ाने के लिए जहाँ, जिस प्रकार जो सम्भव हो सके, उसके लिए प्रयत्न किया जाय।
जीवन क्षेत्र मात्र अर्थ और शासन तक ही सीमित नहीं है। उसके साथ और भी कितने ही पक्ष जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए कुटुम्ब, विनोद एवं प्रशिक्षण जैसे तथ्यों पर दृष्टि डाली जा सकती है। इनमें से एक भी ऐसा नहीं है जो एकाकी पुरुषार्थ के सहारे चल सके। कोई व्यक्ति कितना ही समर्थ, सुयोग्य एवं सम्पन्न क्यों न हो, उपरोक्त क्षेत्रों में बिना दूसरों का सहयोग अर्जित किये एक इंच भी आगे बढ़ नहीं सकता।
नये परिवार का आरम्भ विवाह से होता है। विवाह का अर्थ है दो व्यक्तियों का अधिक सहयोगी बनकर एक दूसरे का पूरक बनना और संयुक्त शक्ति उपार्जित करना। यही है वह मूलभूत सिद्धान्त जो परिवार के अन्यान्य सदस्यों पर उनके स्तर के अनुरूप क्रियान्वित किया जाता है। गाता और सन्तान, बालक और अभिभावकों के बीच जो आत्मीयता पाई जाती है, उसे उदारता या उच्च-स्तरीय सहकारिता ही कह सकते हैं। अभिभावक बालकों के लिए सुरक्षा, सुविधा के साधन जुटाते हैं और बालक अभिभावकों को आत्म-विस्तार की सेवा साधना की आन्तरिक प्यास को पूरी करके कृत-कृत्य बनाता है।
विनोद कोई अकेला नहीं कर सकता। उसके लिए मनचाहे साथी चाहिए। ताश शतरंज से लेकर खेल−कूदों और प्रतियोगिताओं तक के अनेकों मनोरंजन हैं। उनका आनन्द लेने के लिए सहयोगी तलाश करने के अतिरिक्त और कोई तरीका नहीं। पार्टियाँ, प्रीतिभोज, सभा, सम्मेलन, नाटक, सिनेमा जैसे सभी स्तर के विनोद आकर्षणों में कलाकारों एवं दर्शकों की भीड़ जुड़ती और प्रतिभा खपती है। जब ईश्वर तक का मनोरंजन की आवश्यकता पड़ने पर सुविस्तृत सृष्टि गढ़नी और प्राणियों की, देव दानवों की चतुरंगिणी खड़ी करनी पड़ी तो फिर मनुष्य की तो बात ही क्या है। पशु पक्षी तक झुण्ड बनाते और मिल−जुलकर क्रीड़ा−कल्लोल करते पाये जाते हैं।
प्रशिक्षण संस्थानों में छात्रों, अध्यापकों और मध्यवर्ती व्यवस्थापक तथा सूत्र संचालकों का एक अच्छा-खासा समुदाय मिल−जुलकर काम करता है। अभिभावकों की भी उस पर नजर रहती है और पर्यवेक्षकों, समीक्षकों की देखभाल का सिलसिला चलता है। इतनी व्यवस्था बनने पर भी ही कला, विज्ञान, दर्शन आदि की शिक्षा व्यवस्था ठीक प्रकार चल पाती है। अकेला विद्यार्थी एक कोने में बैठकर, पुस्तकों में सँजोए हुए अनेकानेक मनीषियों की ज्ञान सम्पदा से भी कुछ काम चला सकता है, पर अकेला अध्यापक क्या करे? किसे पढ़ाये?
उत्पादन, व्यवस्था, परिवार, विनोद, शिक्षण जैसे जीवनचर्या के साथ जुड़े हुए अनेकानेक प्रसंगों में पारस्परिक सहयोग की भूमिका का ही वर्चस्व दिखता है। अन्य पक्षों में भी सहयोग के बिना एक कदम आगे बढ़ने की बात नहीं बनती। दैनिक जीवन में काम आने वाले साधनों, उपकरणों में से एक ऐसा नहीं है जो एकाकी प्रयत्नों से बन पड़े। अब वह समय चला गया जब अन्न उगाने से लेकर, आटा पीसने और रोटी बनाने तक के काम आदमी स्वयं कर लेता था। पत्तों से या चमड़े से तन ढक लेता था। पढ़ने की आवश्यकता थी नहीं। भूमि, तालाब एवं वृक्ष वनस्पति का सहारा लेकर दिन कट जाते थे। अब तो माचिस, कपड़ा, जूता, भोजन पकाने के बर्तन, तेल, साबुन, नमक, मिर्च, कुँए से पानी निकालने का घड़ा रस्सा जैसी, घोर वन्य प्रदेशों में भी, दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के लिए अन्यान्य लोगों का सहारा लेना पड़ता है। यह सभी वस्तुएँ ऐसी हैं जिनमें सहकारिता की चमत्कारी शक्ति ही अग्रिम पंक्ति में खड़ी दिखती है।
सहकारिता की जितनी उपेक्षा होगी, उतने ही अनुपात में पिछड़ापन सिर पर लदता चला जायेगा। उत्कर्ष की बात सोचनी हो तो लगे हाथों इस वास्तविकता को भी ध्यान में रखना होगा कि जिस प्रकार व्यक्तिगत रूप से आकाँक्षा का उभार आवश्यक है, उसी प्रकार लोक व्यवहार में जन सहयोग की आवश्यकता अनुभव करने पर सहकारिता की प्रवृत्ति को असाधारण महत्व देना और उसे उच्चस्तरीय सिद्धान्तों के अनुरूप बनाकर लोक−चिन्तन में गहराई तक उतारने का प्रबन्ध करना होगा।
झूठे मित्र हमारे साये की तरह होते हैं, जो धूप में चलते समय तो साथ−साथ चलते किन्तु अन्धेरे में साथ छोड़ देते हैं। —बोबी
भगवान एक है। उन्हीं की विशिष्ट विभूतियों को देव नाम दिया गया है। ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि देवता कोई व्यक्ति विशेष हैं। भगवान की सत्ता में न कोई साझीदार है और न उनका कोई सहायक। इस समूची सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता वह एक ही है। उसके विभिन्न गुणों को विभिन्न देवताओं के नाम से ऋषियों ने पुकारा है, कहा है—
“एको विश्वस्य भुवनस्य राजा”
अर्थात्- एक ही परब्रह्म को विद्वानों ने अनेक नामों से सम्बोधित किया है।
“सर्ववल्विद मेवाहं, नान्यदसि सतानम्”। —देवी भागवत् 1।15।55
महाभाग्याद् देवलाया एक आत्मा बहुधा स्तूयते। —निसक्त 7।1।4
अर्थात्- एक ही परमात्मा को बहुत देवताओं के नाम से संबोधित किया जाता है।
देवताओं के अनेक नाम हैं। यहां तक कि उन्हें 33 या 33 कोटि भी कहा है। इनमें पांच प्रमुख हैं- (1) सूर्य (2) गणेश (3) ब्रह्मा (4) विष्णु (5) महेश।
यह शरीर के पाँच तत्वों अथवा चेतना के पाँच प्राणों के प्रतीक माने जाते हैं। सूक्ष्म शरीर में पंचकोश हैं। ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं और कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए इन महान शक्ति स्रोतों को देव संज्ञा दी गई हैं।
महत्वपूर्ण तथ्यों का स्मरण दिलाने के लिए उनके प्रतीक बनाने की परम्परा है। ऐसा भी है कि उनसे हमें लाभ मिलता है उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उनकी प्रतीक पूजा की जाती है। इन सब बातों का समन्वय करते हुए देव पूजा का प्रचलन हुआ है।
पंचतत्वों का हम सदुपयोग करें, उन्हें अनावश्यक मात्रा में नष्ट न करें। मलीन न होने दें। जब जितने उपयोग की आवश्यकता है तब उन्हें बरतने में कृपणता भी न करें? आदि बातों की स्मृति दिखाने के लिए पंच देव पूजा का विधान है।
मिट्टी, पानी, हवा, गर्मी, आकाश इन पंच देवों की सहायता से खोया हुआ आरोग्य फिर से प्राप्त हो सकता है। यह विद्या प्राकृतिक चिकित्सा की पुस्तकों में विस्तार पूर्वक बताई गई है। साथ ही वह भी कहा गया है कि इनके सदुपयोग करने की प्रक्रिया अपनाते हुए प्राकृतिक जीवन जिया जाय तो निरोग एवं दीर्घजीवी रहा जा सकता है।
पाँच प्राण पाँच सद्गुणों के प्रतीक हैं- श्रम, निष्ठा, मनोयोग, साहस, सज्जनता एवं उदारता। यह पाँच गुण पाँच प्राणों से संबंधित हैं इन्हें व्यावहारिक अध्यात्म भी कह सकते हैं। पाँच उप प्राणों में अहिंसा, सत्य, अतृन्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि सद्गुणों का समावेश है। इनकी आराधना की जाय अर्थात् जीवन क्रम में इनका प्रयोग समावेश रखा जाय तो इनका प्रतिफल हाथों-हाथ व्यक्तित्व को सुविकसित रूप में उपलब्ध होता है। यह शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है।
गणेश सद्बुद्धि के देवता हैं सूर्य प्रखरता तेजस्विता के। ब्रह्मा सृजन प्रिय हैं। विष्णु परिपोषण के। शिव परिवर्तन एवं अनुशासन के। यह सभी प्रयास ऐसे हैं जिनके लिए सदा सर्वदा सचेष्ट रहना चाहिए। विद्या बुद्धि को विकसित करने के लिए अध्ययन, परामर्श एवं अनुभव का सम्पादन किया जाता है। यह गणेश पूजा हुई। साहसिकता, बलिष्ठता, प्रतिभा आदि को तेजस्विता कहते हैं। अपने व्यक्तित्व में इन विभूतियों का समावेश करना सूर्य पूजा है। हमारी कार्य पद्धति सृजन प्रिय हो। निर्माण कार्यों में समुचित अभिरुचि का होना विष्णु पूजन है। अनुशासन का पालन समयानुसार परिवर्तन की सूझ-बूझ, यह शिव आराधना है। दैवी गुणों की जीवन में समाविष्ट करना ही देव पूजा है। सद्गुणों की संख्या और प्रकृति असीम है पर उनमें पाँच प्रमुख हैं। उन्हें अपनाते हुए हम देव पूजा का सत्परिणाम निरन्तर प्राप्त करते रह सकते हैं।
भौतिक विज्ञान के अनुसार चेतना का तात्पर्य उस प्राण विद्युत से है जो शरीर के हर-क्षेत्र में ज्ञान-तन्तुओं के साथ प्रवाहित होती रहती है। इसका केन्द्र मस्तिष्क माना गया है। संगठित ऊतकों द्वारा उसका उत्पादन होता है अथवा कुछ मस्तिष्कीय केन्द्र उसे मिल-मिलकर उत्पन्न करते हैं। यह अब पूर्व काल की तरह विवादास्पद नहीं रहा और यह माना जाता है कि दोनों ही कारण एक-दूसरे के पूरक हैं। इनमें किसे प्रमुख माना जाय, किसे गौण, इस विवाद को अनसुलझा छोड़ देने में भी हर्ज नहीं। दोनों में से एक कारण ही उभर पड़े तो मृत्यु निश्चित है।
विज्ञान की आरंभिक प्रगति के युग में कहा जाता था कि प्राणी समुदाय एक विशेष प्रकार का रासायनिक गुच्छक है और अपनी वंश परंपरा के घटकों द्वारा किये जाने वाले मार्ग दर्शन पर अपना स्वभाव बनाता और रीति-नीति अपनाता है। शरीर के साथ ही चेतना का अन्त बहुत समय तक माना जाता रहा। अणुओं के विघटन के साथ−साथ चेतना की आत्यन्तिक मृत्यु मानी गई। यों यह नास्तिकता की पूर्ववर्ती मान्यता है पर इसमें एक प्रतिशत की कमी है। शरीर के न रहने पर उनके घटक किसी के पेट में जाते भूमि या जल में पड़ते और भटकते भटकाते कोई खाद्य बनते हैं, उसे जो खाता है उसमें यदि पूर्ववर्ती प्राणी के जीवनकोश पहुँचे हैं तो उसी आधार पर पुनर्जन्म हो जाता है। यह आत्मा का नहीं वंशानुक्रम घटकों का पुनर्जन्म है। यह घटक प्रकृति के अंग माने गये। उनके पीछे किसी चेतन तत्व की सत्ता स्वीकार नहीं की गई।
इसी अर्थ में भौतिकवाद को नास्तिकतावादी या नास्तिकवाद को भौतिकवाद माना गया था और कहा गया था कि शरीर ही आत्मा है। शरीर के साथ ही आत्मा का भी अन्त हो जाता है। इस कथन के प्रतिपादन और समर्थन में पिछली शताब्दी में इतना बल दिया जाता रहा मानों उनने कोई आत्यन्तिक सत्य हस्तगत कर लिया हो और उन लोगों की पूरी तरह उपहासास्पद ठहरा दिया गया हो जो आत्मा और परमात्मा की कथा-गाथा कहते रहते थे।
बहुत समय नहीं गुजरा कि उस खोज को बालहठ समझा जाने लगा और इस पर नये सिरे से खोज करने की आवश्यकता अनुभव की गई कि मरने के बाद भी चेतना का अस्तित्व रहता है या नहीं एवं एक शरीर में रहते हुए भी चेतना दूसरे शरीर में प्रवेश करने या प्रभावित करने में समर्थ हो सकती है या नहीं।
पाया यह गया कि शरीर में विद्युत रहती है। यह मान्यता ठीक होते हुए भी उसमें यह परिशिष्ट और जोड़ना पड़ा कि प्राण विद्युत का एक घेरा शरीर के बाहर भी घिरा रहता है, जैसे सूर्य के घेरे से बाहर उसकी किरणों का विस्तार होता है। जिस प्रकार बहुत से तारे चिरकाल पूर्व मर गये पर उनका प्रकाश अभी भी धरती पर आ रहा है उसी प्रकार मनुष्य का शरीर मर जाने पर भी उसका तेजोवलय उसी पूर्व स्थिति में उसी आकार में बना रहता है। स्थिति से तात्पर्य यह है कि उसका स्वभाव प्रायः बहुत कम बदलता है और इच्छा अभिरुचियों का प्रवाह पूर्ववत् बना रहता है और राग द्वेष भी पूरी तरह नहीं छूटता। मरणोपरान्त बना रहने वाला यह प्राण शरीर अब विज्ञान की अनेक कसौटियों पर अपनी सत्ता सिद्ध करने में समर्थ हो चुका है। इसे अदृश्य या अशरीरी शरीर कह सकते हैं। यह अस्थि माँस आदि प्रत्यक्ष पदार्थों का बना न होकर विद्युत तरंगों जैसा होता है। इतने पर भी उसका अस्तित्व सर्वथा समाप्त नहीं होता और उसका परिचय समय-समय पर इन्द्रिय गम्य न होते हुए भी अनुभव गम्य बना रहता है। स्वेच्छा पूर्वक उदासीनता अपनाकर वह किसी अन्य प्रिय विषय की ओर भी लुढ़क सकता है और छोड़े हुए जीवन के पदार्थ व्यक्तियों एवं घटनाओं के साथ विशेष लगाव होने पर वह उसी पूर्व भूमिका के इर्द-गिर्द परिभ्रमण कर सकता है। भीतर से उत्तेजना उमंगें तो वह किन्हीं के सम्मुख अपने वायुभूत शरीर को प्रकट भी कर सकता है। अपनी मनःस्थिति का परिचय भी दे सकता है और कुछ कहना हो तो वह भी अवगत करा सकता है।
इस प्रयोजन में प्रेरक सत्ता की क्षमता अधिक होती है और ग्रहण कर्ता की स्वल्प। जिस प्रकार मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म में प्रयोक्ता की सामर्थ्य ही अपनी इच्छा शक्ति की प्रमुखता का परिचय देती है, वही बात यहाँ भी है। ग्रहणकर्त्ता को, सामान्य, साधारण, सहमत मनःस्थिति का होना चाहिए उसे प्रतिरोध खड़ा नहीं करना चाहिए। इतने भर से हिप्नोटिज्म प्रयोगों का सिलसिला चल पड़ता है। मनुष्य के जीवन काल में अथवा मृतक हो जाने पर प्राण शरीर के तेजोवलय का अदृश्य अस्तित्व बना रहता है। वह अपना परिचय जिस भी सम्बन्ध के अनुरूप देना चाहे दे सकता है। अभिभावक-सन्तान, मित्र-मित्र, पति-पत्नी जैसे रिश्ते प्रमुख होते हैं उनमें अपेक्षाकृत अधिक घनिष्ठता पाई जाती है। इस प्रकार की मनःस्थिति वाला प्राण शरीर अपने प्रिय सम्बन्धी को अपने अस्तित्व का परिचय सरलतापूर्वक दे सकता है। यदि घोर शत्रुता हो तो भी आक्रामक या भयावह झलक झाँकी देता रह सकता है। यदि अन्य मनस्कता हो तो फिर मिलन-परिचय की बात झीनी पड़ जायेगी और बहुत समय बीत जाने पर वह उपेक्षा के गर्त में भी जा गिरेगी। स्मरण रखने योग्य बात यह है कि जीवित पक्ष का आग्रह आमन्त्रण उतना काम नहीं करता जितना प्राण शरीरधारी का। फिर सूक्ष्म शरीर की प्रौढ़ता भी आवश्यक है। वयोवृद्ध चिर रोगी, उथले सम्बन्धों वाले, इस प्रकार की मिलन चेष्टा नहीं करते। करते भी हैं तो उनकी शिथिलता अन्य मनस्क स्थिति में रहने के कारण, स्वल्प इच्छा शक्ति के कारण अपनी ओर से कोई प्रभावी हलचल उत्पन्न नहीं कर पाती। स्वप्न में कभी स्मरण ही आने जैसे प्रसंगों में ही उथला-सा मिलन हो सकता है।
प्रौढ़ता की मनःस्थिति में प्राण शरीर अपने प्रियजनों को कुछ लाभदायक परामर्श भी दे सकते हैं। सहयोग करने सहायता देने, कष्ट से उबरने जैसी क्षमता थी उनमें देखी गई है, किन्तु सामर्थ्य की पूँजी स्वल्प रहने के कारण वे कोई वैसी सहायता नहीं दे सकते जैसी कि जीवित अवस्था में अपने बुद्धि कौशल अथवा साधन वैभव के सहारे दे सकते हैं। हाँ यदि शत्रुता या प्रतिशोध का भाव हो तो डराने, तनाव उत्पन्न करने, रुग्णता में धकेल देने, बुद्धि भ्रम उत्पन्न करने जैसे संकट खड़े कर सकते हैं। शत्रुता का बदला एक सीमा तक लिया जा सकता है। विश्वास घात, हत्या, आत्महत्या, छल बहकावा आदि की घटनाओं को प्रायः प्रेतात्माएँ भूल नहीं पातीं और जिस-तिस प्रकार प्रतिशोध लेकर अशान्ति उद्विग्न करती रहती हैं।
यह विवरण स्थूल संकट की छत्र छाया में बने हुए सूक्ष्म शरीर का है। आमतौर से पुनर्जन्म से पूर्ण पिछला प्राण शरीर समाप्त प्रायः हो जाता है और नये शरीर के साथ नई प्राण विद्युत का तेजोवलय बनना बनाना आरम्भ हो जाता है। किन्तु अपवाद स्वरूप ऐसा भी होता है कि पुराने प्रौढ़ शरीर की छाया मजबूत बनी रहे और नये की विनिर्मित होने में मन्द गति से काम कर रही है तो पहले जन्म की घटनाएँ, स्मृतियाँ बनी रहती हैं और ऐसे बालक अपने पुराने जन्म का प्रमाण परिचय देने और विवरण बताने लगते हैं। किन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रहती। दस वर्ष का होते-होते बालक विगत जन्म की स्मृतियों को भुला बैठता है। तब तक नया तेजोवलय परिपक्व होने लगता है और जो बचपन में याद था उसे भी भूल जाता है।
परामनोविज्ञान की पहुँच और पकड़ अभी इसी सीमा तक है। जीवित शरीर के साथ काम करने वाले तेजोवलय की प्रौढ़ता के आधार पर ओजस्, तेजस्, वर्चस् वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है। इस आधार पर व्यक्तित्व का निखार और प्रतिभा का विस्तार होता है। सामान्य जीवन में इस बढ़ोतरी के आधार पर मनुष्य साहसी, पराक्रमी होता है। शरीर दुर्बल होने पर भी उसमें प्रभावोत्पादक क्षमता बढ़ी-चढ़ी होती है। किन्तु यदि इस तत्व की कमी रहे तो व्यक्ति उदास, नीरस, निराश, थका-माँदा दिखाई पड़ता है। यह ओजस् किन्हीं में जन्मजात रूप से अच्छी मात्रा में होता है। कुछ उसे प्रयत्नपूर्वक बढ़ा लेते और कुछ निषेधात्मक चिन्तन से ग्रस्त, भयभीत, शंका शंकित रहने के कारण उसे क्रमशः खोते, गँवाते चले जाते हैं।
परामनोविज्ञान के अंतर्गत मस्तिष्कीय प्रसुप्त शक्तियों का जागरण-शरीर के भीतर ठुसी हुई प्राण विद्युत और बाहरी क्षेत्र में तेजोवलय के रूप में अनुभव की जा सकने वाली, क्षमता का पता लगाया गया है। उससे यह जाना गया है कि उसकी उन्नति या अवगति की स्थिति में मनुष्य किस प्रकार लाभान्वित होता या घाटे में रहता है। इससे आगे के क्षेत्र में परामनोविज्ञान की पहुँच नहीं है। शरीर विज्ञान भौतिक विज्ञान है। इसलिए उससे संबंधित प्रकट और अप्रकट शक्तियों तथा गतिविधियों के प्रमाणों का जो संग्रह किया गया है उसे शरीर क्षेत्र का भौतिक विज्ञान ही कह सकते हैं। भले ही वह प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष।
“फेट” मासिक पत्रिका में मध्य अफ्रीका की कोलोनियल सर्टिस के उच्च पदाधिकारी क्वीलन हेयर ने आप बीती एक घटना प्रकाशित कराई है। उसे सूचना मिली की किवि नदी को पार करके हाथियों का एक बड़ा झुण्ड मैदानी इलाके में उतर रहा है और उस क्षेत्र की वनस्पतियों को तहस-नहस करने पर उतारू है। उसे तत्काल पीछे लौटाना आवश्यक था। इसलिए क्वीलन अपनी साज-सज्जा के साथ उधर चलने की तैयारी करने लगे।
उसी बीच उनकी भेंट उस क्षेत्र के प्रख्यात ताँत्रिक ‘निगी’ से हो गई। उसने विश्वास दिलाया कि उनकी कठिनाई को वह कुछ ही देर में हल कर देगा। उसने चीते की खाल से अपना शरीर ढका और एक वृद्ध के रूप में नियत स्थान पर जा पहुँचा। एक विचित्र ढोल बजाया। फलतः हाथियों का झुण्ड जिधर से आया था, उसी ओर वापस लौट गया।
इस घटना में न कोई दुराव था न षड्यन्त्र। आँखों देखी घटना और परिस्थिति को देखते हुए उसे विश्वास करना पड़ा कि जीवित मनुष्य की काया में घुली हुई किसी शक्तिशाली सत्ता का यह चमत्कार था।
ऐसी ही अनेक प्रत्यक्षदर्शी और आजमाई घटनाओं का संकलन प्रख्यात मनोविज्ञानी गर्नी पाडमेल्या मायस ने ग्रन्थ रूप में प्रकाशित किया है। नाम है उसका- ‘‘फिनामिना आफ दि लिविंग’’। उसके प्रथम संस्करण में 1200 पृष्ठ थे। पर अगले संस्करण में बड़ी हुई घटनाओं के 200 पृष्ठ और जोड़े गये। इसमें 700 में अधिक ऐसी घटनाओं का उल्लेख है। जिसमें मनुष्य की अदृश्य शक्तियों द्वारा प्रस्तुत किये गये चमत्कारों का उल्लेख है। उन उल्लेखों में वह सब भी अंकित किया गया है कि घटनाओं की वास्तविकता को किन सुयोग्य पर्यवेक्षकों की समितियों के सम्मुख किस प्रकार जाँचा गया और जब बात को पूरी तरह विश्वस्त मान लिया गया तभी उनका प्रस्तुत पुस्तक में उल्लेख किया गया।
‘ब्रिटिश सोसाइटी फार साइकिक रिसर्च’ में ऐसी घटनाओं का अपने प्रकाशन में उल्लेख किया है कि अमुक व्यक्ति इच्छा पूर्वक अपने सूक्ष्म शरीर को रात्रि के समय मंगेतर के यहाँ ले जा पहुँचा। उसके बाल छुए। इसकी पुष्टि मंगेतर ने भी की।
ऐसे ही विवरणों का संकलन फ्राँसीसी मनोविज्ञान वेत्ता डी. रोकास ने भी अपनी पुस्तक में किया है। जर्मनी की द्विमासिक पत्रिका ‘डेर ब्लाक’ में लारडल की वर्णित उस घटना का उल्लेख है जिसमें उसने आर्कविशाप के चौके में उस समय क्या पक रहा है यह बताया है तभी ही यह भी कही-ठीक इसी समय सोने की अँगूठी पकाने वाली से खो गई है और वह कोयले की टोकरी में है।
हर बैकर की जर्मन पुस्तक ‘गैस पेंस्टर एण्ड स्यूक’ में विस्तार से लिखा है कि किस प्रकार उसी का छाया पुरुष उसके उलझन भरे गणित को हल करके गायब हो गया था।
परा शक्तियों की अन्वेषक श्रीमती एलीन जे. गैरेट है अपनी पुस्तक “माई लाइफ एण्ड द सर्च फार दि मीनिंग आफ मीडियमशिप” में ऐसे अनेक विवरणों का जिक्र कर चुकी है जिनसे प्रतीत होता है कि मनुष्य उतना ही नहीं है जितना कि दिख पड़ता है। उसमें अदृश्य क्षमताओं का प्रचुर भण्डार भी भरा पड़ा है जिसे अभी कुरेदा नहीं गया है।
देखने और छूने पर मनुष्य की काया एक ही आवरण से आच्छादित दिखती है। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। शवोच्छेद करने पर उनके अनेक घटक अपनी-अपनी जगह पर अवस्थित और एक दूसरे के साथ संबद्ध दिख पड़ते हैं। अस्थि पंजर के ढाँचे के साथ लिपटी हुई अनेकों इकाइयाँ अपना-अपना काम करती दिखाई पड़ती हैं। साँसें चलने तक यह ढाँचा जीवित रहता है और हृदय एवं मस्तिष्क की गतिविधियाँ बन्द होते ही यह समझ लिया जाता है कि मृत्यु हो गयी। तब काया को येन-केन प्रकारेण नष्ट करने की आवश्यकता पड़ती है अन्यथा उसके भीतर से कृमि उत्पन्न होकर उसे खाते और समाप्त कर देते हैं।
यह प्रत्यक्ष काया की बात हुई। इसी के अन्दर सूक्ष्म शरीर है जिसका आरम्भ माता की उदरदरी में आरम्भ होता है और श्मशान भूमि में उसकी समाप्ति हो जाती है। पर बात इतने तक सीमित नहीं है। पुरातन मान्यताओं के अनुसार मरणोत्तर जीवन बना रहता है। भूत, प्रेत, स्वर्ग, नरक, पुनर्जन्म आदि का अस्तित्व यह बताता है कि प्रत्यक्ष काया का अस्तित्व समाप्त हो जाने पर परोक्ष काया का अस्तित्व बना रहता है। जीवन काल में भी स्वप्न देखने के संबंध में कभी यही मान्यता थी कि शरीर से बाहर निकलकर सूक्ष्म शरीर कहीं परिभ्रमण के लिए निकल जाता है और वहाँ जो कुछ देखता है उसे स्मृति के सहारे आँख खुलने पर बताता है। यह मान्यताएं पुरानी हुईं और किंवदंती के रूप में प्रचलित हैं फिर भी पता चलता है कि अस्थि पंजर के अतिरिक्त किसी सूक्ष्म शरीर के अस्तित्व की मान्यता चिरकाल से चली आ रही है। मरण के उपरान्त परिवार वालों द्वारा जो क्रिया−कृत्य किये जाते हैं वे उस उद्देश्यपूर्ण शरीर की सत्ता को मान्यता देते हुए ही किये जाते हैं।
योगाभ्यास द्वारा सूक्ष्म शरीर को विकसित, सशक्त एवं क्रियान्वित करने के कतिपय विधि−विधान हैं। उसके आधार पर इस प्राण सूक्ष्मता के अंतर्गत कोई भेद−प्रभेद भी बताये जाते हैं। मोटेतौर पर इन्हें सूक्ष्म और कारण कहा जाता है। त्रिविधि शरीरों के अतिरिक्त एक और सिद्धान्त है जिसे पंचकोश कहते हैं। उन्हीं को थोड़े भेद−उपभेद से षट्चक्र प्रकरण कहा गया है। कुण्डलिनी विज्ञान में षट्चक्र की प्रक्रिया आती है। इस विभाजन के आधार पर क्षमताओं का विभाजन भी है और जिस क्षमता से जो प्रयोजन सधता है उसका विवरण भी। अभिवर्धन और उपयोग की कार्य पद्धति को सूत्र रूप में वैदिक एवं तान्त्रिक विधि-विधानों ने अपने-अपने ढंग से बताया है। अनुभवियों की गुरु परम्परा के आधार पर साधक की मनःस्थिति तथा उपयोग से संबंधित परिस्थितियों का ध्यान रखकर चलने पर यह पगडण्डियाँ गुरु परम्परा भी बन जाती हैं। कभी कोई एक राजमार्ग भी रहा होगा, पर इन दिनों देश, काल, पात्र का ध्यान रखते हुए अपनाये गये अनुभवों और हस्तगत हुए परिणामों को ध्यान में रखते हुए काम चलाने का प्रचलन है।
दूसरा मार्ग परामनोविज्ञान का है उसके अंतर्गत अद्भुत घटनाओं की प्रामाणिकता एवं सम्भावना ही जाँची जाती है। यह सब किस साधना या प्रक्रिया के आधार पर सम्भव हुआ इस ओर अधिक ऊहापोह नहीं हुआ है। परामनोविज्ञान इस अन्तर के संबंध में मौन है। उसे विलक्षणताओं से संबंध माना जाता है। इन्द्रिय जन्य सामान्य क्रिया-कलाप का व्यतिक्रम करके जो अतीन्द्रिय क्षमताएँ यदा-कदा—जहाँ-तहाँ दिख पड़ती हैं, उन्हीं के संबंध में यह टोह ली जाती है कि वह घटना क्रम वास्तविक हैं या अवास्तविक।
अवास्तविक अर्थात् इन्द्रजालिक। जादूगरी, हाथफेरी भ्रम जंजाल, कइयों द्वारा मिल-जुलकर रचा गया षड्यन्त्र। इस आधार पर भी ऐसे घटनाक्रम गढ़े जा सकते हैं जो लोगों को दैवी चमत्कार जैसे प्रतीत हों, पर वस्तुतः उनके पीछे छद्म चातुर्य ही काम कर रहा है। परामनोविज्ञान का उद्देश्य है अतीन्द्रिय स्तर के दिख पड़ने वाले क्रिया−कलापों को वैज्ञानिकों, बुद्धिवादियों एवं छिद्रान्वेषियों के तत्वावधान में सत् असत् का निर्णय करना। अभी परामनोविज्ञान इतनी ही भूमिका निभा रहा है। आगे चलकर उसे यह देखना पड़ेगा कि यदि वस्तुस्थिति के बारे में निश्चिन्तता हो जाय तो फिर अगले कदम में यह देखा जाय कि ऐसे अद्भुत घटनाक्रम क्योंकर घटित होते हैं और उनकी पृष्ठभूमि में विज्ञान के कौन से नियम काम करते हैं।
भौतिक विज्ञान के अंतर्गत अभी तक जो नियम और विधान हस्तगत हुए हैं, उनकी प्रामाणिकता परखली गई है, पर यह नहीं समझा जाना चाहिए कि जो जान लिया गया है वह पूर्ण या पर्याप्त है। अभी प्रकृति के रहस्यों को और अधिक खोजा जाना और उनके पीछे काम करने वाले विषयों का बहुत कुछ रहस्योद्घाटन होना बाकी है। प्रयोग परीक्षण के उपरान्त ही उनकी यथार्थता विज्ञान की कोई सुनिश्चित धारा मानी जा सकेगी। अध्यात्म के प्रयोग गुरुगम्य हैं। उन्हें वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षणों के लिए इस प्रकार प्रस्तुत नहीं किया गया है कि अविश्वासियों को विश्वास हो सके। किन्तु परामनोविज्ञान ने अपना कार्यक्षेत्र दृश्य को प्रामाणिक तक सीमित भले ही रखा हो पर वे उसकी गहराई में प्रवेश करते हैं और देखते हैं कि इस कथन के पीछे कोई छद्म तो काम नहीं कर रहा है।
अतीन्द्रिय क्षमताओं के अस्तित्व की चर्चा चलाते हुए और उनके प्रमाण संकलित करते हुए लंबा समय हो गया। दूर दर्शन, दूर कथन, भविष्य की जानकारी, विगत का घटनाक्रम आदि की असंख्यों घटनाएँ घटित होती देखी गई हैं। जिन व्यक्तियों में ये विशेषताएँ थीं उनने योगी या योगाभ्यासी होने का दावा नहीं किया, इसलिए निष्कर्ष यह निकाला गया है कि मस्तिष्क के जो पक्ष व्यवहार में नहीं आते, वे यदा-कदा अनायास ही सजग हो उठते हैं और अपनी विशेष क्षमताओं का परिचय देने लगते हैं। स्वप्नों की सार्थकता, संभावनाओं का पूर्वाभास सुदूर क्षेत्र में घटित हुए घटनाक्रमों का विवरण जान पाना अचेतन मस्तिष्क की किन्हीं रहस्यमयी क्षमताओं का जागरण माना गया है। ऐसा किन्हीं पशु-पक्षियों में भी होता है। वर्षा, तूफान, भूकम्प आदि आने की पूर्व सूचनाएँ कितने ही पशु-पक्षियों को सही रूप में मिल जाती है और वे उसी सुनिश्चित सूचना के आधार पर अपना बचाव करने, स्थान बदलने लग जाते हैं। कुत्तों की घ्राणशक्ति का उपयोग करने के लिए शिकारी लोग उन्हें पालते थे और अब जासूसी खोजबीनों के लिए उन्हें पुलिस द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। गर्भाधान की उत्तेजना भी गन्ध विशेष के माध्यम से मिलती थी। फूल से मधु बना लेने का एक विशेष तन्त्र मधु मक्खियों के भीतर पाया जाता है। चींटी दीमक आदि आकार में छोटी और किसी शिक्षा से रहित होते हुए भी अपने समुदाय के ऐसे नियमोपनियम बनाती है मानो वे किसी सुसभ्य समुदाय की विधिवत् ट्रेनिंग लिये हों। ऐसी ही अनेक विलक्षणताएँ कितने ही पशु-पक्षियों एवं कीड़े-मकोड़ों के संबंध में पाई गई हैं, यह सब आश्चर्यजनक होते हुए भी विज्ञान ने इतना ही माना है कि मस्तिष्क के किन्हीं अनभ्यस्त प्रसुप्त कोष्ठकों का जागरण है, जो न्यूनाधिक मात्रा में सभी में होता है। जिनके अंकुर बड़े हो जाते हैं वे प्रख्यात हो जाते हैं और चमत्कारी समझे जाने लगते हैं। कारण का विवेचन करते हुए इतना ही कहा गया है कि घटनाएँ अथवा वस्तुएँ इस निखिल ब्रह्माण्ड में सूक्ष्म तरंगों के रूप में अपनी हलचलें चलाती रहती हैं। उनके तारतम्य का जो सही अनुमान लग सकने योग्य मस्तिष्कीय क्षमता के अभ्यस्त हो जाते हैं वे अपने में ऐसी विशेषताओं का परिचय देने लगते हैं। यह क्षमताएँ अमुक अभ्यास करने से ही जागृत हों, यह आवश्यक नहीं। किन्हीं में वे अनायास ही जागृत हो जाती हैं और लोगों को अचम्भे में डालती हैं।
रूस की एक महिला नेल्या मिखाइलोवा आँखों में पट्टी बाँधकर अँगुलियों से छूकर पुस्तकें पढ़ देती है और जहाँ−तहाँ रंगों की भिन्नता का प्रयोग हुआ है उसका विवरण बता देती है। इसका परीक्षण वैज्ञानिकों की कितनी ही परीक्षा गोष्ठियों के सम्मुख हो चुका है। इंग्लैंड में एक व्यक्ति आँख का काम नाक से लेता था और गन्ध के आधार पर दृश्य को पहचानने की परीक्षा में सफल हुआ था। आगे पीछे की घटनाओं को बताने में कितनों ने ही असाधारण ख्याति प्राप्त की है। कुछ व्यक्ति धरती के भीतर पाये जाने वाले जल या धातु भण्डार (डाउजिंग) का पता बताने में सफल हुए हैं।
योगाभ्यास के नाम पर कई जादूगर विषपान करते, हृदय की धड़कन रोकते, समाधि लगाते देखे गये हैं। इन्हें भी मनोबल का चमत्कार कहा जाता है। सरकस के कलाकार शरीर को साधने और उसका बैलेन्स सम्भाले रहने की कितनी ही अद्भुत क्रियाओं का अभ्यास कर लेते हैं इस आधार पर वे दर्शकों को आकर्षित करते और स्वयं अच्छी आजीविका कमाते हैं। वे इस कौशल के पीछे मनोबल और नियमित अभ्यास के आधार पर उपलब्ध हुई प्रवीणता को ही कारण बताते हैं। इसमें वे किसी योगाभ्यास का दावा नहीं करते और न उनका रहन-सहन, खान-पान ही ऐसा होता है जिन्हें योगी लोग संयम साधना के रूप में अनिवार्यतः अपनाया करते हैं। उन्हें किसी भी तरह तपस्वी योगी नहीं कहा जा सकता।
स्थूल-दृश्य-शरीर के विशेषतया मस्तिष्क के, कितने ही झटक ऐसे हैं जिन्हें यदि साधारण क्रियाकलाप की सीमा से आगे बढ़कर अभ्यास क्षेत्र में विशेष पराक्रम करने का अवसर मिले तो वे अपनी प्रतिभा का ऐसा विशिष्ट परिचय देने लगते हैं कि अजनबी के लिए उसमें आश्चर्य ही आश्चर्य दृष्टिगोचर होने लगे। कुछ समय पूर्व जब नट विद्या का प्रचलन था तो ऐसे लोग गाँव-गाँव में अपने तमाशे दिखाते थे जिसमें जान जोखिम का खतरा प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता था। अब भी वे कलाएँ प्रख्यात जादूगरों और किन्हीं-किन्हीं सरकस वालों की कृतियों में दृष्टिगोचर होती हैं। यों इनमें इन्द्रजालिक चालाकी का भी सम्मिश्रण होता है पर सर्वथा यह नहीं कहा जा सकता कि इस निमित्त उन्होंने शारीरिक या मानसिक अभ्यास विशेष रूप से नहीं किये हैं। खेल प्रतियोगिताओं में समर्थ शरीर वाले भी हर खेल में विजयी नहीं हो सकते वे उन्हीं में कमाल दिखाते हैं जिनमें पहले से अभ्यास कर रहे होते हैं और प्रवीणता हस्तगत कर लेते हैं। शरीर संरचना में नियोजित हर घटक की स्थिति ऐसी है कि वह सामान्यतया उतनी ही प्रवीणता प्राप्त करता है जितना कि उसे आये दिन काम करना पड़ता है। यदि इससे भिन्न प्रकार का काम करना पड़े तो उनकी स्थिति साधारण या अनगढ़ होते हुए भी वे अपने विषय में पारंगत तो हो ही जाते हैं। वन प्रदेश में रहने वाले आदिवासी लोग तीर-कमान चलाने में इतने प्रवीण होते हैं कि शेरों और सुअरों का शिकार कर लेते हैं। नारियल, खजूर, सुपाड़ी आदि तोड़ने वाले उन ऊँचे और सीधे वृक्षों पर तेजी से चढ़ते उतरते रहते हैं। यही बात आहार-विहार के संबंध में भी है। जिसके कारण साधारण लोगों को तत्काल जुकाम होता या लू मारती है। उसी वातावरण में कुछ लोग पतली लँगोटी लगाते, जीवन भर भ्रमण करते रहते और किसी रोग के शिकार नहीं होते। यह शरीरगत माँसपेशियों की स्थिति का विवेचन है, फिर मस्तिष्क का तो कहना ही क्या, वर्तमान स्थिति में हम मस्तिष्कीय क्षमता का 7 प्रतिशत भाग काम में लेते हैं। 93 प्रतिशत ऐसा हैं जिसे विस्मृत, अनभ्यस्त प्रसुप्त या उपेक्षित ही कह सकते हैं। यदि इस प्रसुप्ति को जागृति में बदला जा सके तो यह सामान्य सूक्ष्म शरीर ही ऐसे करतब दिखा सकता है जैसा कि कीर्तिमान स्थापित करने वालों का पराक्रम देखकर हमें चमत्कृत रह जाना पड़ता है।
ज्ञानेन्द्रियाणि च मनश्च मनोमयः स्यात्कोशो ममाहमिति वस्तु विकल्प हेतुः। संज्ञादि भेद कलनाकलितो बलीयस्तित्पूर्वकोशमभिपूर्य विजृम्भते यः॥ विवेक- 169
अर्थात्- ‘मैं’ ‘मेरा’ आदि निश्चयों का कारण ‘मन’ और ‘ज्ञानेन्द्रियां’ ही ‘मनोमयकोश’ हैं। यह विभिन्न रूपों और क्रियाओं के आधार पर विभिन्न नामों से जाना जाने वाला, बड़ा बलवान् और अन्नमय तथा प्राणमय कोशों को व्याप्त किये रहता है।
किशोरावस्था से लेकर परिपक्व यौवन काल आने तक जहाँ माँस पेशियों और ऊतकों में दृढ़ता आती है वहाँ एक अनुपयुक्तता यह भी बढ़ती पाई गई है कि जल्दबाजी, नाराजी, उत्तेजना, अविश्वास, आशंका जैसे दुर्गुण उपज खड़े होते हैं।
यौवन के उभार में कुछ लज्जाजनक अवयवों में उभार आता है और उन्हें सतर्कता पूर्वक ढकने की आवश्यकता होती है। छोटे बच्चे कभी−कभी नंग धड़ंग भी फिरते रहते हैं। जान-बूझ कर न सही अनजाने में कपड़े उतर जाँय तो न बच्चे बहुत शर्माते हैं और न बड़े ही उसे अनुपयुक्तता कहकर नाराज होते हैं। किन्तु यह छूट आयु के बढ़ने के साथ-साथ समाप्त होने लगती है। सोलह अठारह वर्ष के लड़के लड़की कपड़ों संबंधी अदब का पग-पग पर ध्यान रखते हैं और ऐसी नग्नता किसी भी कोने में नहीं प्रकट होने देते तो उन्हें अशिष्ट या लापरवाह सिद्ध करे। ठीक इसी तरह स्वाभावजन्य आवेशों पर नियन्त्रण करने की आवश्यकता है।
इसी प्रसंग में यह भी ध्यान रखने योग्य है कि आतुरता, जिसे एक हद तक उच्छृंखलता भी कहा जा सकता है हमारे स्वभाव, वार्त्तालाप एवं आचरण में परिलक्षित न होने पाये। यह हो सकता है कि इन दिनों यह उत्तेजना स्वभावतः उठे। जिस तिस से झगड़ पड़ने की या अपनी बात कटु शब्दों में कह बैठने की आतुरता छलके। किन्तु मानवी सभ्यता का ध्यान रखते हुए उठती आयु के प्रारम्भिक दिनों में ही हमें आत्म नियन्त्रण का अभ्यास करना चाहिए और उसे तब तक जारी रखना चाहिए जब तक वयस्कता की उत्तरदायित्व सम्भालने वाली आयु न आ पहुँचे।
हिन्दुस्तान में एक कहावत में ‘गधा पच्चीसी’ का बार−बार उल्लेख होता रहता है। जिसका अर्थ होता है कि जब तक पच्चीस वर्ष की आयु पूरी नहीं हो जाती तब तक गधेपन जैसी बेवकूफी का खुमार चढ़ा रहता है। जो करना है तुरन्त कर बैठे, जो कहना है, अविलम्ब कह बैठे, भीतर किसी प्रसंग में नाराजी हुई है तो उसे दबाने की अपेक्षा तत्काल उगल बैठे। यह स्वभावतः चढ़ते खून का लक्षण है। पर इससे क्या प्रकृति के अनुरूप हर बात में चलें यह आवश्यक नहीं। दाढ़ी मूँछ के बालों की सफाई न की जाय तो उनसे चेहरा कुरूप हो जाता है। इसी प्रकार दूसरी जगह बढ़े हुए बालों की स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार उठती आयु के साथ उफनने वाले आवेशों पर नियन्त्रण करने की आवश्यकता है अन्यथा वे तत्काल तो संकट विग्रह उत्पन्न करेंगे ही आदत पड़ जाने पर बड़ी आयु में भी नीचा दिखायेंगे और व्यक्तित्व को तिरस्कृत स्तर का बना देंगे।
जिनमें उग्रता की मात्रा अनुपयुक्त स्तर तक पाई गई उनमें से प्रति हजार 50 को कई प्रकार के रोगों ने घेरा। उन्हें डाक्टरों की शरण लेनी पड़ी और अशिष्टता के लिए जिस-तिस से क्षमा माँगनी पड़ी अथवा द्वेष प्रतिशोध के शिकार हुए। किन्तु जिन्होंने नम्रता का अभ्यास कर लिया था जो आवेशों पर नियन्त्रण की कला सीख गये थे उन्हें हजार पीछे 2 बार ही चिकित्सा करानी पड़ी और मित्र सहयोगियों की संख्या बढ़ी-चढ़ी रहने से कई दिशाओं में प्रगति कर सके, सफलताओं के उत्साहवर्धक सुयोग प्राप्त कर सके। उठती आयु में जिस प्रकार अच्छे कपड़े पहनने की- खेल में आगे रहने की इच्छा होती है उसी प्रकार यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि इस आयु में आवेशों का बाहुल्य रहने के संकटों को स्मरण में रखे और उनसे निपटने के लिए आत्मसंयम का, शिष्टाचार के निर्वाह का, विशेष रूप से समाधान करने के लिए प्रयत्नशील रहें।
जीवन क्या है? इसका उत्तर एक शब्द में अपेक्षित हो तो कहा जाना चाहिए- ‘समय’। समय और जीवन एक ही तथ्य के दो नाम हैं। कोई कितने दिन जिया? इसका उत्तर वर्षों की काल गणना के रूप में दिया जा सकता है। समय की सम्पदा ही जीवन की निधि है। उसका किसने किस स्तर का उपयोग किया, इसी पर्यवेक्षण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसका जीवन कितना सार्थक अथवा निरर्थक व्यतीत हुआ।
शरीर अपने लिए ढेरों समय खर्च करा लेता है। आठ दस घंटे सोने सुस्ताने में निकल जाते हैं। नित्य कर्म और भोजन आदि में चार घंटे से कम नहीं बीतते। इस प्रकार बारह घण्टे नित्य तो उस शरीर का छकड़ा घसीटने में ही लग जाते हैं जिसके भीतर हम रहते और कुछ कर सकने के योग्य होते हैं। इस प्रकार जिन्दगी का आधा भाग तो शरीर अपने ढाँचे में खड़ा रहने योग्य बनने की स्थिति बनाये रहने में ही खर्च हो लेता है।
अब आजीविका का प्रश्न आता है। औसत आदमी के गुजारे की साधन सामग्री कमाने के लिए आठ घंटे कृषि, व्यवसाय, शिल्प, मजूरी आदि में लगा रहना पड़ता है। इसके साथ ही पारिवारिक उत्तरदायित्व जुड़ते हैं। परिजनों की प्रगति और व्यवस्था भी अपने आप में एक बड़ा काम है जिसमें प्रकारान्तर से ढेरों समय लगता है। यह कार्य भी ऐसे हैं जिनकी उपेक्षा नहीं हो सकती। इस प्रकार आठ घंटे आजीविका और चार घंटे परिवार के साथ बिताने में लगने से यह किश्त भी बारह घंटे की हो जाती है। बारह घंटे नित्य कर्म, शयन और बारह घंटे उपार्जन परिवार के लिए लगा देने पर पूरे चौबीस घंटे इसी तरह खर्च हो जाते हैं जिसे शरीर यात्रा ही कहा जा सके। औसत आदमी इस भ्रमण चक्र में निरत रहकर दिन गुजार देता है।
मनुष्य को विचारशील कहा जाता है। यदि यह विचारशीलता गहरी और वास्तविक है तो उसमें सर्वाधिक महत्त्व का एक ही प्रश्न उभरना चाहिए कि मनुष्य जन्म सचमुच ही महत्त्वपूर्ण है। यदि है तो उसका उपयोग निर्वाह के ढर्रे में समय गँवा देने के अतिरिक्त और भी कुछ हो सकता है क्या?
जिनके अन्तराल में इस स्तर की जिज्ञासा उठे उसे ब्रह्म जिज्ञासा वाला तत्वज्ञानी कहना चाहिए भले ही अशिक्षित दरिद्र या अनगढ़ अभावग्रस्त ही क्यों न हो? यह ज्वलंत प्रश्न है। जिसका हल न निकल पाने पर ईश्वर का अमोघ वरदान—मनुष्य जन्म—न केवल निरर्थक चला जाता है वरन् कई बार तो लिप्साओं से ग्रसित होकर कुकर्म करता और पाप का गट्ठर भी शिर पर लादता है। यह तो उपलब्ध बुद्धिमत्ता का अभिशाप जैसी परिणति हुई।
समय का सदुपयोग यह एक ही समाधान है—जीवन सम्पदा का समुचित सत्परिणाम उपलब्ध करने का। इसके लिए एक ही निर्धारण करना है कि शरीर यात्रा के साधन जुटाते रहने के अतिरिक्त भी कुछ किया जाय। क्या किया जाय? इसके उत्तर में जीवन तथा समाज क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों का आरोपण अभिवर्धन की ही एक बात कही जा सकती है।
यदि दूरदर्शी विवेकशीलता का समुचित दबाव उमँगें तो समझदारी ऐसा सुयोग सहज ही बना देती है जिसमें निर्वाह और परिवार के अतिरिक्त दो आदर्शवादी प्रयोजनों के लिए कुछ समय नियमित रूप से लगाया जा सके। सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन की पुण्य प्रक्रिया को भी अन्यान्य क्रिया-कृत्यों की तरह नियमित रूप से संपन्न किया जा सके। रुझान बदलती है तो तदनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ढलता है। यह ढलाई यदि आदर्शों के साँचे में ढल सके तो समझना चाहिए कि जीवन की सार्थकता का राजमार्ग मिल गया।
भगवान बुद्ध उन दिनों अपरिग्रह में लोक शिक्षण कर रहे थे। विलासी और लालचियों को कृपणता के चंगुल से छुड़ाने के लिए यह आवश्यक भी था। फिर सत्प्रयोजनों के लिए साधन कहाँ से आवें? अपव्यय और संग्रह की सर्प कुण्डली से लक्ष्मी को निकालने के लिए यह उपदेश समय की दुहरी आवश्यकता पूरी कर रहे थे। इसमें लालचियों को दुर्व्यसनों से छूटने और अभावग्रस्तों को सहारा मिलने का दुहरा लाभ था।
बहुतों ने अपना संग्रह परमार्थ के लिए बुद्ध बिहारों को दान कर दिया। इतने पर भी अर्थवसु पर उसका कोई प्रभाव न पड़ा। उनने अपने संग्रह में से कानी कौड़ी भी दान न की एक धनाढ्य की, यह कृपणता जन−जन की चर्चा का विषय बन गई।
एक दिन अर्थवसु के पुत्र ने कहा—तात, हमारे निर्धनों जैसे वस्त्र देखकर लोग उपहास करते हैं। पुत्र वधू बोला—दिवाली पूजन पर मुझे आभूषण रहित देखकर सहेलियाँ व्यंग करती हैं। आपके इस संग्रह का लाभ हम लोगों को भी न मिला तो फिर इसका होगा क्या?
अर्थवसु मौन ही बने रहे। जब उन पर बुद्ध के अपरिग्रह त्याग का कोई प्रभाव न पड़ा तो पुत्र और पुत्रवधू का आग्रह ही वे क्यों मानते। उनने गरदन घुमा ली मानो कुछ सुना ही न हो।
सामान्य जनों को भी यह व्यवहार कुछ विचित्र ही लग रहा था। पर इसे सहज ही एक धनिक की कृपण वृत्ति मानते हुए उन्होंने अन्य कोई टिप्पणी नहीं की। चूँकि बुद्ध अपना प्रवचन क्रम वहीं चलाये हुए थे एवं नित्य ही कोई न कोई महादान का प्रसंग आ ही जाता था, तुलनात्मक रूप से अर्थवसु की भी चर्चा आपस में होने लगती एवं लोग उसका खूब उपहास उड़ाते। बुद्ध धर्म चक्र प्रवर्तन के अपने क्रम में वह स्थान छोड़कर आगे बढ़ते चलते गए।
बहुत दिन बीत गये। नालन्दा विश्व विद्यालय की नींव रखी गई। ज्ञान चेतना जगाने के लिए तपस्वी परिव्राजकों को सुविज्ञ बनाने की यह विशाल योजना थी। अर्थवसु ऐसा ही कुछ सोचते थे। निर्धनों को सुविधा प्रदान करने से तो सभी धनवान् तात्कालिक श्रेय सन्तोष प्राप्त करते थे किन्तु वैसे सोचते न बन पड़ रहा था कि ज्ञान आलोक के अभाव में दरिद्रता से छुटकारा कैसे मिलेगा? पत्ते धोने और जड़ सींचने की उपेक्षा होने की बात उन्हें जँच नहीं रही थी। सो संग्रह उनने किसी के हाथ सौंपा नहीं। जब दान से निष्ठुर बना जा सकता है तो पुत्र और पुत्र वधू का अनुरोध ही वे क्यों मानते। आज उपयुक्त अवसर आया था उदारता प्रदर्शित करने का।
एक दिन लोग यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गये कि कृपण धनपति अर्थवसु ने अपनी विपुल सम्पदा नालन्दा संघाराम को दान कर दी और स्वयं श्रवण बनकर उसकी इमारत बनवाने की सेवा साधना में निरत हो गये।
तथागत इस आकस्मिक निर्णय पर स्वयं चकित थे। पास बुलाया और कारण पूछा तो उनने एक ही उत्तर दिया। सर्वोत्तम कार्य तलाश के लिए ही कृपणता अपनाये रहा। वस्तुतः मैं निष्ठुर नहीं था—उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करने के लिए रुका रहा।
बुद्ध ने उसकी दूरदर्शिता को मुक्त कण्ठ से सराहा।
दया मनुष्य का जन्मजात गुण नहीं है। बच्चे और असभ्य आदिमानव सदा ही क्रूर होते हैं। दया प्रयत्नपूर्वक अर्जित की जाती है और बुद्धि के संस्कार से निखरती है। —डा. जान्सन
भौतिकी के क्षेत्र में निरंतर अनुसंधान चल रहे हैं एवं नये-नये अनुसंधान सृष्टि में क्रियाशील मूल बलों तथा उनके एकीकरण संबन्धी प्रतिपादनों पर हो रहे हैं। इस क्षेत्र में एक कठिनाई यही आती है कि पदार्थ विज्ञान तक दृष्टि सीमित रखने वाले भौतिकी विद पराभौतिकी (पैराफिजीक्स) के प्रतिपादनों को गले उतारने को तैयार नहीं हैं। देखा यह गया है कि ब्रह्माण्ड संबंधी आत्मिकी की मान्यताओं को यदि आज के अनुसंधानों से समन्वित किया जाता है तो कई सिद्धान्त ऐसे जन्म लेते हैं जिन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वीकार किया जा सकता है। ब्रह्माण्ड के रहस्यों को उजागर करने वाली यह प्रतिपाद्य सामग्री गणित के सिद्धान्तों पर भी खरी उतरती है।
एक भारतीय अणु वैज्ञानिक परमहंस तिवारी के अनुसार यह भौतिक संसार जो हम अन्तरिक्ष में देखते हैं सब शून्य से बना है। डा. तिवारी का कहना है कि यह ब्रह्माण्ड खाली खाली नहीं है वरन् भार रहित, लचीलेपन से युक्त (इन्काम्प्रेसी बल), गतिशील तथा ऊर्जा से लबालब द्रव इसमें भरा हुआ है।
इस द्रव द्वारा ही किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों में खाली स्थान में से पदार्थों की रचना हुई है। श्री तिवारी द्वारा लिखित पुस्तकों “स्पेसवोर्टेक्स प्योरी” तथा “ओरिजिन आफ इलेक्ट्रान्स फ्राम एम्टी स्पेस” में इसका विस्तृत वर्णन है।
श्री तिवारी ने गणित के माध्यम से सिद्ध करके बताया कि गतिशील द्रव जब प्रकाश की गति से चलता है तो छोटे−छोटे छिद्र “द्रव में” पैदा हो जाते हैं। यही छिद्र (परशुन्य) जो वास्तव में खाली हैं और 1।3000,00,000000 मी.मी. व्यास के हैं।
श्री तिवारी के अनुसार मूल बल (बेसिक फोर्स) की उत्पत्ति घूमते हुए ब्रह्मांडीय द्रव से हुई है। हमें ज्ञात गुरुत्वाकर्षण विद्युत चुम्बकीय तथा नाभिकीय बल इस “बेसिक फोर्स” के ही कारण हैं। भौतिकी की सभी मूल इक्वेशन्स “वोरटेक्स थ्योरी” के अनुसार प्रतिपादित की जा सकती हैं। जिसमें आइन्स्टीन की “थ्योरी आफ रिलेटिविटी” भी शामिल है। एक और नया तथ्य ब्रह्माण्ड की इस शोध से उभर कर आया है। अब तक प्रकाश की गति को ही सर्वोपरि गति माना जाता रहा है। आइन्स्टीन कहते थे, इससे तीव्रगति नहीं हो सकती। पर अब ‘कर्क’ निहारिका की गतिविधियों का विश्लेषण करते हुए इस गतिशीलता का नया कीर्तिमान सामने आया है। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के डा. एल. एल. और डा. ज्याफे एनडीन ने इस निहारिका के विद्युतीय चुम्बकीय क्षेत्र की चल रही गतिशीलता को प्रति सेकेंड 5, 95, 200 मील नापा है जो प्रकाश गति की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है। इस निहारिका के मध्य एक छोटा सूर्य ऐसा पाया गया है जिसका तापमान अपने सूर्य से 100 गुना अधिक है। वह अपनी धुरी पर प्रति सेकेंड 33 बार परिक्रमा कर लेता है, यह भ्रमण गति भी अब तक की कल्पनाओं से बहुत आगे है।
कार्ल साँगा जैसे कुछ साइन्स फिक्शन लिखने वाले ब्रह्माण्ड वैज्ञानिकों का विचार है कि अब शीघ्र ही वह दिन निकट आता चला आ रहा है, जब अपनी आकाश गंगा के साथ जुड़े हुए ग्रह उससे छिटक कर दूर चले जायेंगे और अनन्त अन्तरिक्ष में स्वतंत्र रूप से विचरण करने लगेंगे। इसका प्रभाव सौर परिवार पर ही नहीं; ग्रहों के साथ भ्रमण करने वाले उपग्रहों पर भी पड़ेगा और एक विश्रृंखल अराजकता की ऐसी बाढ़ आयेगी कि सर्वत्र एकाकीपन दृष्टिगोचर होने लगेगा, पर अन्तर्ग्रहीय आदान की श्रृंखला टूट जाने से ऐसी स्थिति उत्पन्न होगी कि हर नक्षत्र विविधताओं के कारण बनी हुई विशेषताओं और सुन्दरताओं को खोकर अपने स्वरूप की तुच्छताओं से सीमाबद्ध अपंग और कुरूप स्तर को ही प्राप्त होगा। लेकिन यह मात्र कल्पना ही है। विधेयात्मक चिन्तन वाले वैज्ञानिकों का मत है कि अपने सौरमण्डल में नौ ग्रह हैं, इक्कीस उपग्रह हैं और जो गिन लिये गये ऐसे बीस हजार क्षुद्र ग्रह हैं। ये सभी अपनी-अपनी कक्षा मर्यादाओं में निरन्तर गतिशील रहने के कारण ही दीर्घ जीवन का आनन्द ले रहे हैं। यदि वे व्यतिक्रम पर उतारू हुए होते तो इनमें से एक भी जीवित न बचता। कब के वे परस्पर टकराकर चूर्ण विचूर्ण हो गये होते।
इन नौ ग्रहों में से जो ग्रह सूर्य के जितना समीप है उसकी परिक्रमा गति उतनी ही तीव्र है। बुध सबसे समीप होने के कारण प्रति सेकेंड 45 किलोमीटर की गति से चलता है और एक परिक्रमा 88 दिन में पूरी कर लेता है। पृथ्वी एक सेकेंड में 28.6 किलोमीटर की चाल से चलती हुई 365.25 दिन में परिक्रमा पूरी करती है। प्लूटो सबसे दूर है वह सिर्फ 4.3 कि0मी0 प्रति सेकेंड की चाल से चलता है और 248.43 वर्ष में एक चक्कर पूरा करता है।
वास्तविकता यह है कि अपना सौर मण्डल इतना व्यवस्थित, जीवित और गतिशील है कि वहाँ प्रत्येक ग्रह अपनी मर्यादाओं में चल रहा है और एक दूसरे के साथ अदृश्य बन्धनों में बँधा हुआ है। यदि यह प्रकृति इन ग्रहों की न होती तो वह न जाने कब का बिखर गया होता और टूट-फूट कर नष्ट हो गया होता।
सौर परिवार अति विशाल है। सूर्य की गरिमा अद्भुत है। उसका वजन सौर परिवार के समस्त ग्रहों उपग्रहों के सम्मिलित वजन से लगभग 750 गुना अधिक है। सौर-मण्डल केवल विशाल ग्रह और उपग्रहों का ही सुसम्पन्न परिवार नहीं है, उसमें छोटे और नगण्य समझे जाने वाले क्षुद्र ग्रहों का अस्तित्व भी अक्षुण्य है और उन्हें भी समान सम्मान एवं सुविधायें उपलब्ध हैं। यह क्षुद्र यह किस प्रकार बने? इस संबंध में वैज्ञानिकों का मत है कि दो समर्थ ग्रह परस्पर टकरा गये। टकराहट किसी को लाभान्वित नहीं होने देती। उसमें दोनों का ही विनाश होता है, विजेता का भी और उपविजेता का भी। यह विश्व सहयोग पर टिका हुआ है, संघर्ष पर नहीं, संघर्ष की उद्धत नीति अपना कर बड़े समझे जाने वाले भी क्षुद्रता से पतित होते हैं। यह क्षुद्र ग्रह यह बताते रहते हैं कि हम कभी महान थे पर संघर्ष के उद्धत आचरण ने हमें, दुर्गति के गर्त में पटक दिया।
मंगल और बृहस्पति के बीच करोड़ों मील खाली जगह में क्षुद्र ग्रहों की एक बहुत बड़ी सेना घूमती रहती है। सीरिस, पैलास, हाइडालगो, हर्मेस्ट, वेस्ट, ईराल आदि बड़े हैं। छोटों को मिलाकर इनकी संख्या 44 हजार आँकी गई है इनमें कुछ 427 मील व्यास तक के बड़े हैं और कुछ पचास मील से भी कम।
कहा जाता है कि कभी मंगल और बृहस्पति के बीच कई ग्रह आपस में टकरा गये हैं और उनका चूरा इन क्षुद्र ग्रहों के रूप में घूम रहा है। पर यह बात भी कुछ कम समझ में आती है क्योंकि इन सारे क्षुद्र ग्रहों को इकट्ठा कर लिया जाय तो भी वह मसाला चन्द्रमा से छोटा बैठेगा। दो ग्रहों के टूटने का इतना कम मलबा कैसे? कल्पना यह है कि सौर मण्डल बनते समय का बचा खुचा फालतू मसाला इस तरह बिखरा पड़ा है और घूम रहा है।
वैज्ञानिकों की एक कल्पना यह भी है कि प्रशान्त महासागर की जमीन किसी खण्ड प्रलय के कारण उखड़ पड़ी और उड़कर चाँद बन गई। जहाँ से वह मिट्टी उखड़ी- वहाँ का गड्ढा समुद्र बन गया। यह उखड़ी हुई जमीन आकाश में मंडराने लगी और धरती का चक्कर काटती हुई चन्द्रमा बन गई। इस प्रकार वह पृथ्वी का बेटा हुआ। इसी संदर्भ में यह भी कहा गया है कि जिन दिनों पृथ्वी की सतह लाल अंगारे की तरह तप रही थी, उन दिनों वह घूमती भी तेजी से थी, अपनी धुरी पर तब वह एक चक्कर तीन घंटे में ही लगा लेती थी और आये दिन गरम लावे के ज्वार-भाटे जैसे भूकम्प आते थे। उन्हीं दिनों कई विशालकाय उल्कायें धरती से टकराई और कई समुद्र तथा झील सरोवर बन गये।
स्थूल दृश्यमान इन पिण्डों की चर्चा न भी करें तो भी हमारे समक्ष एक पहेली तो अब भी रह जाती है। वह है इस पोले आकाश में अवस्थित प्लाज्मा की। गैलेक्सी की व्याख्या करते हुए एस्ट्रोफिजिसिस्ट कहते हैं कि दस खरब नक्षत्रों के समुच्चय से विनिर्मित इसके केन्द्रीय क्षेत्र में कणों का विघटन तेजी से होता है। तारों से अदृश्य कण निकलकर प्लाज्मा के रूप में पोले दिखने वाले आकाशीय क्षेत्र में फैल जाते हैं। इनके इस फैलाव से ही विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र तथा गुरुत्वाकर्षण आदि की क्रियायें सम्पन्न होती हैं। ऐसे फैले हुये प्लाज्मा को आयनीकृत प्लाज्मा (आइनोस्फेरिक प्लाज्मा) कहते हैं। आइनोस्फेरिक प्लाज्मा द्वारा कई तरह के क्षेत्र बनते हैं। आइनोस्फेरिक प्लाज्मा के रूप में फैले हुये ये कण ही विभिन्न विचारों प्रक्रियाओं, घटनाओं, दृश्यों वाले हलचल पूर्ण जगत का कारण हैं तथा उसे प्रभावित नियन्त्रित करते हैं। लाखों वर्षों से आवारागर्दी करते-करते ये कण भूल ही गये हैं कि वे कहाँ से आये हैं।
ये भूले हुए कण की कास्मिक कणों के रूप में पृथ्वी की ओर भी आते रहते हैं। इन कणों में उच्च गति वाले प्रोटान तथा कई तत्वों के परमाणु होते हैं, इनमें अत्यधिक ऊर्जा होती है। वायुमण्डल में इनके प्रवेश करते ही हलचल मच जाती है। इसी हलचल से एक्सटेन्डेड एयर शावर्स (फैले हुए वायु—शावरों) का निर्माण होता है। पृथ्वी की स्थूल हल-चल इस प्रकार इन अनेक स्वभाव तथा गुणों वाले कणों के कारण ही होती है।
1959 में डा. मेघनाद साहा ने अपनी खोजों से यह सिद्ध किया था कि सूर्य के प्लाज्मा में दृश्य जगत का हर तत्व विद्यमान है। उनका मत था कि लोगों को सूक्ष्म अस्तित्व में भी आत्मिक आनन्द की सभी सामग्री बताई जाती है तो लोग विश्वास नहीं करते उनकी स्थूल दृष्टि में दृश्य जगत और स्थूल पदार्थ ही प्रसन्नता के मूल हैं, पर हमारी अनुभूतियाँ जितनी सूक्ष्म और विशाल होती जाती हैं रस और आनन्द के तत्व भी उसी अनुपात में असीम तृप्ति वाले बनते चले जाते हैं। इस भारतीय वैज्ञानिक से सम्मति व्यक्त करते हुए विज्ञानी हाइसेन वर्ग ने प्रतिपादन किया था कि “अन्तरिक्ष में अमुक स्थिति पर पहुँचने पर परमाणु पदार्थ न रहकर अपदार्थ में, ऊर्जा में परिणत हो जाते हैं। पदार्थ सत्ता परिधि, काल और रूप में ढाँचे में बँधी है मनःसत्ता में अनुभूतियाँ, स्मृतियाँ, विचार और बिंब के रूप में व्याख्या होती है। इतना अन्तर रहते हुए भी उन दोनों के बीच अत्यधिक घनिष्ठता है यहाँ तक कि वे दोनों एक दूसरे को प्रभावित ही नहीं वरन् परस्पर रूपांतरित भी होते रहते हैं।
इस तथ्य को नोबेल पुरस्कार विजेता यूजोन विगनर ने और भी अधिक स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि “यह जान लेना ही पर्याप्त नहीं कि वस्तुओं की हलचलों से चेतना ही प्रभावित होती है। वस्तुस्थिति यह कि चेतना से पदार्थ भी प्रभावित होता है।”
गेटे ने कहा था ब्रह्माण्डीय चेतना का अस्तित्व सिद्ध कर सकने योग्य ठोस आधार मौजूद हैं। रुडोल्प स्टीनर ने अपने ग्रन्थ में गेटे के प्रतिपादन को और भी अच्छी तरह सिद्ध करने के लिये आधार प्रस्तुत किये हैं।
जीव विज्ञानी टामस हकसले ने ब्रह्माण्डीय चेतना के अस्तित्व और उसके कार्य क्षेत्र पर और भी अधिक प्रकाश डाला है वे उसे जीवाणुओं में अपने ढंग से और परमाणुओं में अपने ढंग से काम करती हुई बताते और भारतीय दर्शन की परा और अपरा प्रकृति को ब्रह्मपत्नी के रूप में प्रस्तुत करने वाली मान्यता के समीप ही जा पहुँचते हैं।
एक घने झुरमुट में उल्लुओं की जमात रहती थी। एक दिन कहीं से हंस उड़ता हुआ वहाँ आ पहुँचा और ठहर गया।
हँस समझाता रहा- ‘‘भाइयो! बाहर निकलो सूर्य के प्रकाश से संसार कितना सुन्दर लगता है। चलो, उसे तो देखो।” उल्लू सूर्य के अस्तित्व से सर्वथा इन्कार करते रहे और उसकी सलाह को हँसी में उड़ाकर मूर्ख कहने लगे।
बुलबुल ने हँस को समझाया “वंश परम्परा के अनुसार ही मान्यता बनाकर जो लोग चलते हैं, उन्हें औचित्य समझाना बहुत कठिन है। आप चुप रहें।”
गया श्राद्ध से जीव की सद्गति होती है ऐसी मान्यता है। परन्तु भागवत् माहात्म्य कथा के पात्र धुँधकारी का गया श्राद्ध उसके भाई गोकर्ण ने विधिवत् किया फिर भी उसकी प्रेत योनि न छूटी। इसका कारण शौनक जी ने व्यास जी से पूछा। उन्होंने बतलाया- ‘गया’ श्राद्ध का आध्यात्मिक मर्म समझ लोगे तो बात समझ में आयेगी। उन्होंने गया श्राद्ध की एक कथा सुनाई।
“एक असुर था, गयासुर। उसने तप शक्ति से सारी विभूतियाँ पा लीं। तप से प्रसन्न होकर ब्रह्माजी आये, वर माँगने को कहा। असुर बोला “मैं आपसे क्या वर माँगू मुझे क्या कमी है?” आप चाहें तो मुझसे कुछ माँग लें।”
ब्रह्माजी ने सोचा यह अहंकारी असुर किसी के मारे न मरेगा। शायद यज्ञ के प्रभाव से मर जाय। उन्होंने यज्ञ के लिए उसका शरीर माँग लिया। उसकी छाती पर सौ वर्ष तक यज्ञ किया गया। पर वह मरा नहीं, वह उठने को हुआ। ब्रह्माजी ने भगवान का स्मरण किया। उन्होंने प्रकट होकर गयासुर की छाती पर दोनों चरण रखे। चरण छाप पड़ने से असुर नष्ट हुआ। उसने मरते समय वर माँगा। यह यज्ञ क्षेत्र में विष्णुपाद पर जिसका श्राद्ध हो उसे सद्गति मिले। भगवान ने गयासुर की इस मंगल कामना का आदर किया। उसे भी सद्गति दी तथा वरदान भी प्रदान किया।
कथा सुनाकर व्यास जी बोले, हे भ्रद! ‘गय’ प्राणों को कहते हैं। प्राण अपने सहयोगी अनुचरों, शरीर, मन, बुद्धि, इन्द्रियों के सहयोग से कुछ भी अर्जित कर सकता है। अभिमानी प्राणी ही गया सुर है वह भूल जाता है कि उसे किसी उद्देश्य विशेष के लिए बनाया गया है। बनाने वाले ने अपने लिए दिशा प्राप्त करने की अपेक्षा उसी से वर माँगने की अहंकार भरी बात करता है।
यह अहंकारी जीव सामान्य देव वृत्तियों के काबू में नहीं आता। उन्हें सताता है। ब्रह्माजी ने ठीक ही सोचा कि लंबे समय तक यज्ञ का परमार्थ का संस्कार मिले तो शायद यह अभिमान समाप्त हो जाय। इसी दृष्टि से उन्होंने उससे उनका शरीर यज्ञ के लिए माँग लिया।
सौ वर्ष मनुष्य की आयु है। पूरे समय यज्ञ हुआ, पर वह केवल द्रव्य से हुआ। अभिमान के भाव से किया गया द्रव्य यज्ञ अधूरा यज्ञ होता है, राजसिक यज्ञ होता है। सात्विक यज्ञ जब तक वह न बने, उसका वह प्रभाव नहीं होता जैसा चाहिए। ब्रह्माजी की समझ में भूल आयी। उन्होंने भगवान का आह्वान किया। गयासुर के हृदय पर भगवद् चरण पड़े, अर्थात् प्रभु के प्रति श्रद्धा उपजी तो जीवाभिमान गल गया। मुक्ति हो गयी।
गयासुर ने ब्रह्मा को शरीर दान कर दिया था। शरीर को पिण्ड भी कहा गया है। ‘जो ब्रह्म में सो पिण्ड में इस उक्ति में पिण्ड का अर्थ मनुष्य देह ही होता है। गयासुर का शरीर दान, पिण्ड दान कहला सकता है, परन्तु उससे श्रद्धा तो थी नहीं इसी लिए वह श्राद्ध नहीं बना और जब तक श्रद्धा नहीं जुड़ी तब तक मुक्ति नहीं हुई।
व्यास जी बोले “शौनक जी गया श्राद्ध किसी भी तीर्थ में किया जा सकता है जहाँ यज्ञीय चेतना का जीवन्त प्रयोग होता तो। गयासुर को भगवान ने जो वरदान दिया है उसकी लौकिक अर्थों में लकीर पीटने से उद्देश्य पूरा नहीं होता। आध्यात्मिक संदर्भ में किया गया प्रयास अवश्य सफल होता है। परन्तु परमात्मा के प्रति श्रद्धा भाव के बिना न यज्ञ होता है न श्राद्ध। यह बात सदैव ध्यान में रखनी चाहिए।
एक समय था जब नव विकसित विज्ञान ने मनुष्य को भी पेड़ पौधों की तरह उगने और मरने वाला कहा था। उसके पुनर्जन्म की वैसी मान्यता को झुठलाया था जैसी कि धर्मग्रन्थों में व्यक्त की गई थी। बीज के पेड़-पेड़ से बीज-वाले सिद्धान्त को ही पदार्थ विज्ञानी मान्यता देते थे और कहते थे कि यदि पुनर्जन्म होता है तो वह वंशजों के रूप में ही होना चाहिए। आत्मा का अलग अस्तित्व मानने और मृत्यु के उपरान्त भी उसकी कोई सत्ता बनी रहने से वे इनकार करते थे।
यह प्रतिपादन कुछेक दार्शनिकों को भी भाया और उनमें से चार्वाक जैसों ने कहा इस देह का भस्मीभूत होने पर अन्त हो जाता है। दुबारा जन्म नहीं होता। पर यह मान्यताएं नये उत्साह के उभार में ही पनपी थीं। पीछे इस संदर्भ में जब गहराई के साथ दार्शनिक आधार पर विचार किया गया और विज्ञान ने अपनी विकास पृष्ठभूमि पर विचार करना आरम्भ किया तो माना कि आरम्भिक अत्सुहास में कही गई इनकारी पर नये सिरे से विचार की आवश्यकता है। उन्हें ऐसे अनेक प्रमाण मिले जो मरने के बाद भी जीवन का अस्तित्व बने रहने की पुष्टि करते थे।
जन्मजात रूप से पशु पक्षियों और कीट पतंगों में प्रायः एक जैसी आदतें होती हैं। किन्तु मनुष्य में ऐसी विलक्षणताएँ बहुत बार पाई गई हैं जिनका वंश परम्परा एवं विशेष प्रशिक्षण के साथ कोई संबंध नहीं जुड़ता। पड़ोसियों से साथियों से अनुकरण का अक्सर मिला होगा ऐसा भी कोई प्रमाण नहीं मिलता।
साम्प्रदायिक मान्यताओं के अनुसार यह तो मतभेद है कि मरने के बाद कितने दिन बाद- किस कारण- किस रूप में नया जन्म होता है। पर सभी धर्म यह मानते हैं कि मरने के बाद दूसरा जन्म भी होता है और उसमें भले−बुरे कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। भले−बुरे कर्म क्या हैं? इसमें भी मतभेद है। कई मान्यताओं में इसके लिए स्वर्ग नरक में रहना पड़ता है और वहाँ सुविधाओं तथा असुविधाओं का उपभोग करना पड़ता है।
कुछ मान्यताएँ यह बताती हैं कि मरने के बाद पशु-पक्षियों की योनि में जाना पड़ता है और असुविधा जन्य त्रास भुगतना पड़ता है। दूसरी मान्यताएं यह हैं कि मनुष्य को दूसरा जन्म भी मनुष्य रूप में ही मिलता है। सुख−दुःख इस शरीर में भी कम नहीं हैं। मनुष्यों में से कितने ही बहुत सुखी होते हैं और कितने ही रोग आदि के कारण कष्ट भी बहुत सहते हैं।
पिछले जन्म की स्मृति गाथा सुनाने वालों में से कितनी ही घटनाएँ अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करती हैं जिनसे प्रतीत होता है कि मनुष्य को दूसरी बार भी मनुष्य जन्म ही मिला। एक जन्म का अंत होने पर दूसरा कितने दिन में मिला और वह मध्यवर्ती समय कहाँ व्यतीत हुआ। इस पर थोड़ा प्रकाश परामनोविज्ञान को आधुनिक शोधों के अनुसार मिला है।
पूर्व जन्म की स्मृति सुनाने वालों के पुराने और नये जन्मों के बीच कई वर्षों का अन्तर रहा है। इससे प्रतीत होता है कि उस अन्तर वाले समय में स्वर्ग नरक आदि में निवास करना पड़ा होगा।
कितनी ही घटनाएँ भूत-प्रेतों की भी इस रूप में सामने आई हैं जिनसे प्रतीत होता है कि मध्यवर्ती समय सम्भवतः इस प्रकार सूक्ष्म शरीर में रहते हुए व्यतीत करना पड़ता होगा।
पाश्चात्य देशों में पुरानी मान्यता प्रलय के बाद नया जन्म मिलने की रही है। पर मध्ययुग में दार्शनिकों ने इस शास्त्र प्रतिपादन का खण्डन किया है। पैथागोरस—प्लेटों, प्लाटीनस, क्रेल, प्रिटन के अतिरिक्त यहूदी एवं हिंदू धर्माचार्यों ने भी अपने व्यक्तित्व अनुभवों के आधार पर यह कहा है कि पुराने और नये जन्म के बीच दस वर्ष से अधिक का अन्तर होना चाहिए।
ईसाई और इस्लाम धर्म की मान्यता के अनुसार प्रलय काल तक नये जन्म पाने की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। हिन्दू, धर्म के अनुसार प्रेतात्मा एक वर्ष तक अपने कुटुम्बियों के साथ संबंध बनाये रहता है और इसके बाद प्रेत लोक में स्वर्ग नरक की अनुभूतियों के लिए चला जाता है। पुनर्जन्म होता है यह तो कहा गया है पर यह नहीं बताया गया कि इसमें कितना समय लगता है।
वंशानुक्रम वाद की मान्यता भी निर्विवाद नहीं है क्योंकि कितने ही बच्चों की आकृति तथा प्रकृति ऐसी पाई जाती है जो माता−पिता की कई पीढ़ियों तक नहीं पाई गई। चमड़ी का रंग, बाल जैसी मोटी पहचान ही वंश परम्परा में चलती है। इनमें वर्ण भेद उदाहरणों में दोनों के सम्मिश्रित लक्षण पाये जाते हैं अफ्रीकी काले तथा यूरोपियन गोरों के संपर्क से उत्पन्न हुई सन्तान के बारे में जब मिश्रित चिन्ह पाये जायें तो उसे किसका वंशज कहा जाय? मिश्रित होने पर आत्मा के पुनर्जन्म का सिद्धान्त कटता है।
हैक्सले, मैलस्का, आर्थर, थामसन, डार्विन जैसे विकासवादी कहते हैं कि वंश परम्परा में विकासवाद के सिद्धान्त भी जुड़ते हैं और सन्तानें, अपने जन्म दाताओं की अपेक्षा अधिक समय एवं सुयोग्य होती हैं।
डा. डंकन मैकडानल्ड ने मरणासन्न रोगियों को काँच के बक्से में रखकर तोला तो मालूम हुआ कि जीवन और मरण के मध्य एक औंस वजन घट गया। इस आधार पर वे आत्मा को कोई भौतिक पदार्थ मानते हैं तो मृत्यु के उपरान्त अन्तरिक्ष में चला जाता है।
‘अमेरिकन सोसाइटी फार साइकिक रिसर्च’ के अन्वेषण का निष्कर्ष यह है कि जीवन एक पदार्थ है जिसका आकार भी है और वजन भी। शरीर के इर्द−गिर्द जो तेजोवलय पाया जाता है वह बाहर ही नहीं भीतर भी होता है यही आत्मा का रूप है और जीवन और मरण के बीच जो वजन घटता है वह उसका वजन। इस प्रकार जीवात्मा भी एक खास प्रकार का पदार्थ ही होना चाहिए।
वरनार्ड जानसन फाउण्डेशन के डा. वाटर्स ने भी काँच के चम्बर में प्राणियों को रखकर उनके जीवन और मरण के अन्तर को देखा। एक चूहे का प्राण चैम्बर के भीतर ऊपर हवा में तैरता पाया गया। इस आधार पर वे प्राणी के सूक्ष्म शरीर की कल्पना करते हैं और सोचते हैं कि मृतक का अस्तित्व भाप जैसा होना चाहिए।
पैरासाइकिक रिसर्च द्वारा अनेक क्षेत्रों में अनेक आधार पर जो खोजें की हैं उनसे प्रतीत होता है कि प्राणी अपने साथ अपनी आदतें और इच्छाएँ साथ लेकर जाता है। नया जन्म लेने पर वे विशेषताएँ भी पाई जाती हैं। भले ही आकृति पूर्व जन्म की तुलना में भिन्न हो।
कई आत्म विज्ञानी वंशानुक्रम का इतना ही संबंध मानते हैं कि किसी माता−पिता की सन्तानें उनके रंग रूप से मिलती−जुलती हों। पर आत्मा का उस शरीर से कोई संबंध नहीं होता। आत्मा का सूक्ष्म शरीर ही प्रबल होता है और वह नया जन्म लेने के लिए ऐसे वातावरण की तलाश करता है जिसमें उसके पूर्व संचित संस्कारों का चरितार्थ करने का अवसर मिल सके। मनुष्य प्रगतिशील है अपनी भली या बुरी आदतों को आगे बढ़ाने के लिए वह पिछली स्थिति में प्रेरणा ग्रहण करता है और जैसा भी कुछ था अगले जन्म में उससे प्रगतिवान बनने की कोशिश करता है।
कर्मेन्द्रियैः पंचभिरञ्चितोऽयं, प्राणों भवेत् प्राणमयस्तु कोशः। येनात्मवानन्नमयोऽन्नपूर्णः, प्रवर्ततेऽसौ सकल क्रियासु॥ —विवेक.-167
अर्थात्- ‘अन्नमय कोश’ जिससे युक्त होकर अन्न से तृप्त होता है और समस्त कर्मों में प्रवृत्त होता है, वह पाँच कर्मेन्द्रियों से युक्त प्राण-समुच्चय (प्राण-अपान-समान-उदान-व्याण आदि) ही ‘प्राणमय कोश’ कहलाता है।
देवदूत अनेक बार मनुष्यों को चेतावनी, सत्परामर्श, भविष्यवाणी बताते एवं मनुष्यों को अपने अदृश्य रूप का प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं। उनके बताये संकेतों पर चलकर कितने ही धर्मप्रेमी लाभ भी उठाते हैं। ऐसे घटनाक्रमों में से कुछ प्रामाणिक प्रसंग बहुचर्चित भी रहे हैं एवं कौतूहल के विषय भी।
यूरोप में दैवी सत्ता के अस्तित्व एवं उनके चमत्कारों पर विश्वास करने वाले सर्वाधिक व्यक्ति पाए जाते हैं। कुछ तथ्यान्वेषियों द्वारा पश्चिम जर्मनी के बर्लिन शहर में 5 वर्ष पूर्व किये गये पर्यवेक्षणों से पता चला है कि वहाँ की 53 प्रतिशत जनता अलौकिक चमत्कारों पर पूरी तरह विश्वास करती है।
एक घटना 1947 की है। ब्रैसिया (इटली) से पाँच किलोमीटर दक्षिण में ‘मौन्टीकियारी’ नगर में पैरिनागिली नाम की एक परिचारिका (नर्स) रहती थी। अचानक ही पैरिना की दृष्टि एक हवा में तैरती हुई महिला पर पड़ी। अस्पताल के प्रार्थना स्थल की ओर से आती इस अजनबी महिला की छाती पर तीन तलवारें गढ़ी हुई थीं। लेकिन खून का नामों निशान तक नहीं था। इस भयावह दृश्य को देखकर साथ चल रहे अनेकों व्यक्ति चीख उठे और चीत्कार करते हुये इधर−उधर दौड़ते बने। पैरिना नहीं घबराई। अपने सत्साहस का परिचय देते हुये उसे दिव्य प्रतिमा से उसके प्रकटीकरण का कारण पूछने लगी। प्रत्युत्तर में उस विलक्षण प्रतिभा ने बड़े ही दुःखद शब्दों में कहा कि तप, त्याग और प्रार्थना का व्रत जीवन में निरन्तर बना रहना चाहिए। इसका अभाव ही आज की विपन्न परिस्थितियों का मूल कारण है।
13 जुलाई, 1947 को यह घटना पुनः घटी। अबकी बार तलवार के स्थान पर तीन फूल उसके पास थे। जिनका रंग सफेद, लाल और पीला था। पैरिना ने जब इस प्रेतात्मा से इस रहस्य के विषय में पूछा तो श्वेत वस्त्रधारी महिला ने बताया कि “मैं ईसा मसीह की ही नहीं वरन् जगत जननी हूँ।” 13 जुलाई को हर वर्ष “रोजा मिस्टिका” के रूप में मनाया जाना चाहिए जिससे लोगों में धार्मिकता का भावनाएँ जग सकें।” तब से निरन्तर यह दिन उसी रूप में मनाया जाता है।
(फेथ हीलिंग) रोगोपचार में भी इस दिव्यात्मा की भूमिका बड़ी ही विलक्षण रही है। अभी भी मौन्टीकियारी के निवासियों का ऐसा विश्वास है कि सामूहिक प्रार्थना के बल पर इस शक्ति का आह्वान करके अनेकानेक आधि−व्याधियों से मुक्ति पाना सम्भव है। इसी घटना के परिणाम स्वरूप रोम तथा इटली के लोगों ने सामूहिक उपासना तथा धर्मानुष्ठानों को जीवन का अति आवश्यक अंग मानते हुए अपनाया एवं अपने पूर्व जीवन-क्रम को आमूल-चूल बदला है।
स्पेन में आइबोरा नामक एक स्थान है। जहाँ पर स्मृति अवशेष के रूप में रखा हुआ एक रक्त रंजित वस्त्र आज भी लोगों की श्रद्धा का प्रतीक बना है। वर्ष में हर 16 अगस्त को यहाँ सामूहिक उपासना का क्रम चलता है। धर्मानुष्ठान का यह उपक्रम ईसवी शताब्दी 1010 से प्रचलित है। लोगों का अभिमत है कि यह वस्त्र किसी बलिदानी शहीद का है जो अपने धर्म की रक्षा हेतु प्राण न्यौछावर कर चुका है। जब सामूहिक उपासना का क्रम चलता है तो यह रक्त अचानक ही खौलने लगता है। घटनाक्रम की सत्यता का गहनता से अवलोकन करते हुये पोप चतुर्थ ने इसे सार्वजनिक साधना का केन्द्र घोषित किया। लोग बड़ी श्रद्धा से आते एवं यहाँ उपासना कर प्राण शक्ति लेकर जाते हैं।
“मिरेकल्स आफ दी गौड्स” के लेखक एरिक बॉन डैनीकेन ने विश्व के लगभग सभी तीर्थ स्थानों को बड़ी गहनता के साथ अवलोकन किया है। मिलान के दक्षिण में सैन डैमियानो एक ऐसा तीर्थ स्थल है जहाँ पर अभी भी सूर्य की देवी की उपासना का उपक्रम चलता है। जप पुरश्चरण की ध्वनि बड़े ही लयबद्ध ढंग से धीमे स्वर में यात्रियों को सुनाई देती है। लोगों का ऐसा विश्वास है कि सूर्य की देवी की उपासना से रोगोपचार में काफी सफलता मिलती है। वहाँ के पुरोहित अध्यात्मिक चिकित्सा को अत्यधिक महत्व देते हैं। प्रत्येक गुरुवार को “मामारोजा” जो वहाँ की प्रसिद्ध देवी समझी जाती है, उपस्थित श्रद्धालुओं को अभिनय प्रेरणा प्रदान करती है। 17 नवम्बर 1970 को वहाँ उपस्थित सैकड़ों व्यक्तियों ने सूर्य-चिकित्सा से लाभ उठाया। इस घटना का उल्लेख “औब्जरवेटरे रोमनो” में हुआ है।
जिन पुण्य आत्माओं ने अपने धर्म और संस्कृति की सुरक्षा हेतु अपने को बलिदान कर दिया उनकी प्रेतात्माएँ आज भी लोगों के लिए प्रेरणाप्रद बनी हुई हैं। 23 फरवरी 1238 को मुस्लिम सैनिकों ने स्पेन की कोडोल पहाड़ी पर निवासरत पुरोहितों की हत्या कर दी और उन्हें अलग−अलग कपड़ों में बाँधकर फेंक दिया। दर्शकों का कहना है कि कोई भी दुराचारी प्रवृत्ति का मनुष्य उनके दिव्य प्रकाश के पास जाते ही विकलाँगता का शिकार होता तथा बेहोश होकर गिर पड़ता है। डैरोका धर्मस्थल पर प्रतिष्ठापित इन छः पुरोहित सैनिकों की रक्तवेदी आज भी पूरे स्पेन के लोगों के लिए श्रद्धा का विषय बनी हुई है। प्रायश्चित करने एवं उपासना कृत्य अपनाने पर दुराचारियों को भी क्षमा मिल जाती है एवं थोड़ा कष्ट भुगतने के बाद वे स्वस्थ हो जाते हैं।
अपर ऐल्सेक (फ्रांस) में ट्रौइस—ऐपिस के निकट एक धार्मिक प्रवृत्ति के किसान की बड़े ही दर्दनाक ढंग से हत्या कर दी गयी। 3 मई 1491 को डैटर स्कोर नाम का एक लुहार वहाँ से गुजरा तो उसे नारी स्वरूप शक्ति का दिव्य दर्शन हुआ जिसके एक हाथ में श्वेत हिम वर्त्तिका तथा दूसरे हाथ में हरीतिमा का प्रतीक अनाज की तीन बालियाँ थी। उसका कहना था कि यदि अपराधों की गति ऐसी ही रही तो लोगों को प्राकृतिक प्रकोपों का शिकार बनना पड़ेगा। दुर्भिक्ष से लेकर अनेकानेक बीमारियाँ फैलेंगी। ट्रौइस−ऐपिस में ऐसा ही हुआ और वहाँ के लोगों को बड़ी ही मुसीबतों का सामना करना पड़ा। तभी से एल्सेक को वहाँ के एक सुप्रसिद्ध धर्म स्थल के स्वरूप में माना जाने लगा है। भारत की ही तरह वहाँ भी वार्षिक मेले लगते हैं एवं नित्य लोग दर्शन कर देवदूतों के सन्देश को दुहराते हुए संकल्प लेकर जाते हैं।
धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत लोगों को ईश्वर ने प्रत्यक्ष रूप से अनुग्रहित किया है। जैसा कि अनेकों उदाहरणों से प्रकट होता है। फ्रांस में बैसंकन नाम का एक नगर है। 3 दिसंबर 1712 को वहाँ के मैगाफोलिस नामक मन्दिर में एक घटना घटी। उस समय पुजारी के अतिरिक्त स्थानीय लोग भी 10 हजार की संख्या में उपस्थिति थे। उपस्थित जन समुदाय ने प्रातःकाल 8 बजे विशालकाय आकृति वाले मनुष्य को हवा में तैरते हुये देखा। उसने बड़े तेजी के साथ तीन आवाजें निकाली “मनुष्यो, मनुष्यो, मनुष्यो”! तुम्हें अपनी रीति−नीतियों को सही ढंग से निर्धारित करना चाहिए। अन्यथा विपत्तियों का सामना करना पड़ सकता है।” दृश्य को देखने वालों का ऐसा विश्वास है कि यह दिव्य ज्योति कोई दिव्य चेतना का ही सन्देश पहुँचाने आई है। अपराधों में वृद्धि के परिणाम स्वरूप ही ऐसा हुआ है। भय से आक्रान्त होकर कुछ की मृत्यु तो तत्काल हो गयी। कुछेक ने अपनी सूझ-बूझ का परिचय देते हुए धार्मिक कृत्यों की परम्परा को पुनः आरम्भ कर दिया। घनघोर वर्षा तथा भूकम्प के कारण पूरा नगर नष्ट हो चुका था लेकिन तीन इमारतें सुरक्षित बच गयीं। जहाँ पर उक्त धर्मकृत्यों को पूरा किया गया। बैसंकन में उस समय से ही अपनी चिर पुरातन मान्यताओं को पुनः स्थापित करने हेतु उत्साहवर्धक प्रयास जारी हैं।
ये कतिपय उदाहरण दैवी सत्ता के अस्तित्व के परिचायक तो हैं ही, यह भी प्रामाणित करते हैं कि समय-समय पर परम सत्ता इनके माध्यम से जन-जन को चेतावनी देती है। यदि समय रहते अपनी जीवन पद्धति बदल ली जाय, आचरण में परिवर्तन लाया जा सके तो दैवी प्रकोपों से बचा एवं अन्यों को बचाया जा सकता है।
पृथ्वी पर अन्य लोकवासियों के आवागमन के प्रमाण चिन्हों में उड़नतश्तरियों की चर्चा होती है। इन दिनों प्रति रविवार को टेलीविजन पर एक सीरियल ‘प्रोजेक्ट यू. एफ. ओ.’ भी प्रसारित हो रहा है जो कथा प्रसंग नहीं अपितु ऐसी घटनाओं पर आधारित एक तथ्यपूर्ण फिल्म है, इससे वैज्ञानिकों की रुचि का पता लगता है। वस्तुतः प्रागैतिहासिक काल के चिन्ह जहां−तहां ऐसे पाये गये हैं जिन्हें किन्हीं अतिमानवों की कृतियाँ ही माना जा सकता है। सबसे बड़ी बात है मनुष्य के अन्तराल में पाई जाने वाली आदर्शवादी सदाशयता और योगाभ्यास के आधार पर अथवा कई बार बिना प्रयास के भी अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकसित होना। यह सभी बातें ऐसी हैं जो डार्विन की विकास थ्योरी से तालमेल नहीं बिठाती। क्रमिक विकास का सिद्धान्त मनुष्येत्तर छोटे जीव−जन्तुओं पर तो किसी कदर लागू हो सकता है, पर मनुष्य पर नहीं। उनकी मानसिक स्थिति ही असाधारण नहीं है वरन् भाव संरचना भी ऐसी है जिसे वंशानुक्रम प्रवाह से उपलब्ध हुआ सिद्ध करना कठिन है। यह स्वउपार्जित भी नहीं है। क्योंकि जिन परिस्थितियों में मनुष्य रहता है उसमें ऐसी गुंजाइश है नहीं कि आदर्शवादी दृढ़ता को इतने क्रमबद्ध ढंग से नियोजित किया जा सके। मनुष्य प्राणी समाज में अनेक दृष्टियों से एक मौलिक संरचना है। उसमें शारीरिक और मानसिक क्षेत्र में ऐसी विलक्षणताएँ बीज रूप में विद्यमान हैं कि उनसे विकास का तनिक सा प्रयास करने पर ही वह अपनी विलक्षण विभूतियों का परिचय देने लगता है। यह क्यों है? इसका उत्तर वंशानुक्रम परम्परा के आधार पर दिया जा सकना शक्य नहीं है।
अध्यात्मवादी इस रहस्य का समाधान इस प्रकार करते हैं कि मनुष्य दैवी परिवार का एक घटक है। वह देवताओं की सन्तति है। पुरातत्व वेत्ता और जीवन विज्ञानी ऐसा ही कुछ सोचते हैं कि मानवी संरचना मात्र रासायनिक पदार्थ की परिणति नहीं है कि वे विकास क्रम को नभचरों एवं जल थल में विचरण कर सकने वाले पक्षियों से आगे बढ़ने में अत्यन्त कठिनाई अनुभव करते हैं। वे जीव विज्ञानी भी अब कुछ इसी तरह से सोचते हैं कि मनुष्य स्तर का जीवन किसी अन्य ग्रह से धरती पर उतरा है। ग्रह-नक्षत्रों को सर्वथा रासायनिक संरचना नहीं माना जाता है वरन् इस मान्यता को बहुत हद तक सही माना जाता है कि पृथ्वी से भी पुरानी और विकसित सभ्यताएँ इस ब्रह्माण्ड के कितने ही तारकों में विद्यमान रही होंगी।
इस दिशा में विशिष्ट प्रमाण वे अवशेष हैं जो उड़न−तश्तरियों के धरती पर गिरने के उपरान्त हस्तगत हुए हैं। चमकने और घूमने वाले और लुप्त होने वाले घटकों को प्रकृति के चमत्कार एवं मानवी दृष्टि भ्रम कहा जाता है पर उन अवशेषों को क्या कहा जाय जो टूटकर धरती पर गिरे हैं। इतना ही नहीं ऐसे प्राणियों के अस्तित्व को भी एक विचारणीय रहस्य माना गया है जो उड़न तश्तरियों के साथ पृथ्वी पर आये किन्तु परिस्थितियाँ गड़बड़ा जाने से वापस न लौट सके। यह मान्यता इसलिए और भी पुष्ट होती है कि इन अवशेषों और आगन्तुकों को जितने देखा या हस्तगत किया है उन्हें इस संदर्भ की कोई बात न कहने के लिए के प्रतिबन्धित किया गया है। हो सकता है कि मनुष्य कृत अन्तरिक्षीय खोज में इन उपलब्धियों से कुछ ऐसे सूत्र हाथ लगे जो अन्तर्ग्रही आवागमन संबंधी तथ्यों का कोई रहस्योद्घाटन कर सकें और मानवी प्रयासों में सहयोगी सिद्ध हो सकें? इस संदर्भ में जहाँ भी जो जानकारियाँ मिली है, उन्हें इतना गोपनीय रखा गया है कि बात जहाँ की तहाँ रुक जाय। सहयोगी या विपक्षी उस संबंध में कोई सुरक्षा हस्तगत न कर सके।
अमेरिका के न्यू मैक्सिको क्षेत्र में सन् 1946 से 1948 तक इतनी उड़न तश्तरियाँ देखी गईं कि इस बात को आश्चर्यजनक माना गया कि संसार के अन्य स्थानों की अपेक्षा यह अभिवर्धन लगातार एक ही क्षेत्र में इतना अधिक क्यों होता है। अनुमान लगाया गया कि लुप्त प्रायः मय सभ्यता के पुरातन अवशेष इसी क्षेत्र में सर्वाधिक पाये गये हैं। हो सकता है उस सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वालों का संपर्क अभी भी उस क्षेत्र से बना हुआ हो।
जुलाई 1947 में एक उड़नतस्तरी पृथ्वी से टकरा कर गिर पड़ी थी। इन्हीं दिनों अमेरिकी गुप्तचर विभाग को अन्तरिक्ष में ऐसी ही विचित्र वस्तुओं से पाला पड़ा था। इसलिए गश्त तेजकर दी गयी ताकि वस्तुस्थिति का पता लगाया जाय। 25 जून को इससे पहले डाक्टर आर. एफ. सेन से बाबर ने ऐसी घटना पहले भी देखी थी। उनने इस संबंध में कितने ही अन्य प्रत्यक्ष दर्शियों से पूछताछ की थी। 26 जून को ऐसा ही एक अद्भुत प्रमाण कैंटकी के डाक्टर लियो आरगिह ने देखा। 27 जून को मेजर जार्ज विलिवाक्स ने उसे और भी नजदीक से देखा। डा. विलिमोर की धर्मपत्नी ने भी उसे पास से देखा। इस संदर्भ में जो ऊहापोह हुआ उसके एक सप्ताह के तारतम्य का सिलसिला जोड़ते हुए” रीजवेल के स्थानीय संवाददाता ने खबर को प्रकाशनार्थ भेजने की जैसे ही तैयारी की वैसे ही उसके पास प्रतिबंध पहुँचा कि खुफिया पुलिस नहीं चाहती कि यह समाचार प्रकाश में आये। यह मामला टाप सीक्रेट का है। इसी प्रकार की पाबन्दी वायु सेना पर भी लगा दी गई और कहा गया कि वे इस संदर्भ में किसी से कुछ न कहें।
दूसरे दिन सरकार की ओर से एक फौजी दफ्तर में प्रेस कानफ्रेन्स बुलाकर इतना भर कह दिया गया कि “वह एक मौसमी आँकड़े एकत्रित करने वाला गुब्बारा भर था।” पर इस संबंध में कोई प्रकाश न डाला गया कि जो मलबा फैजिनको में भर−भर कर ले जाया गया था। उसका क्या हुआ। ब्रिटेन की रॉयल फोर्स से संबंधित एक अधिकारी ने तो इस पर भी कह दिया कि एक उड़नतस्तरी ‘रायबेल’ क्षेत्र में गिरी है।
इसके अतिरिक्त प्रत्यक्षदर्शी गवाहों का तांता लगा रहा। श्रीमती बैनेट ने कहा उनने वह तश्तरी जमीन से टकराती स्वयं देखी है और उसमें कुछ मृत प्राणी भी थे।
एक दूसरी सूचना के अनुसार 1947 में सेन्ट आगिस्टियान के मैदान में एक उड़नतस्तरी गिरी थी जिसमें 16 मृत और 1 जीवित प्राणी भी थे। इस सूचना का विस्तृत विवरण स्प्रिंग फील्ड नामक जासूस ने एकत्रित किया था, किन्तु उसे भी यह रहस्य प्रकट न करने की हिदायत कर दी गई।
इन प्रतिबंधों के बावजूद एक सैनिक ने अपने बेटे को जो पत्र लिखा था उसमें गिरे हुए मृतकों तथा जीवितों के संबंध में विस्तृत जानकारी दी। उसमें प्राणियों को चार फुट का बताया गया था और शरीर बलदार होने के कारण किसी प्रकार की पोशाक न पहने होने का उल्लेख किया गया था। यह पत्र अखबारों के हाथ लग गया और उसकी चर्चा जनता की जानकारी तक पहुँची। किन्तु उसके बाद यह पता नहीं चला कि उस मलबे का मृत एवं जीवित शरीरों का क्या हुआ।
यह एक विवरण है जिससे कुछ घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है। रूस में, दूसरे देशों में पर्वतों, जंगलों या जलाशयों में भी ऐसी घटनाएँ घटी हैं और उन्हें जिनने पाया हो उन्होंने ‘टाप सीक्रेट’ की तरह अपने कब्जे में कर लिया हो तो क्या आश्चर्य है।
फिर यह आवश्यक नहीं कि जो अन्तरिक्षीय विमान धरती पर आते हों वे सभी गिर पड़ते हैं। यह हो सकता है कि सकुशल वापस लौटने वालों और अपने जन्म नक्षत्रों में पृथ्वी की वर्तमान स्थिति के विवरण पहुँचाते हों।
निश्चय ही यह कोई आक्रामक योजना नहीं है जिससे हमें किसी अन्तर्ग्रही ही विपत्ति की आशंका से भयभीत होना पड़े। यह एक खोज प्रयास है जिसका उद्देश्य पारस्परिक आदान-प्रदान और सहयोग का सिलसिला आगे बढ़ाना ही हो सकता है। जैसा कि मय सभ्यता अथवा दूसरे अन्य अवसरों पर होता रहा है।
प्रत्येक बालक यह सन्देश लेकर आता है कि ईश्वर अभी मनुष्यों के सुधारने से हताश नहीं हुआ है। —रवीन्द्रनाथ टैगोर
उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटेन में विनिर्मित दो कुख्यात जलपोतों को प्रेतात्माओं द्वारा अभिशप्त करने की घटनाओं को नाविकों द्वारा यथार्थ माने जाने के कारण बड़ा महत्व मिला। इनमें “हिनेमोआ” जो कि 2000 टन इस्पात से विनिर्मित किया गया था, ने अपनी प्रथम जलयात्रा सन् 1892 में लन्दन के एक प्राचीन कब्रिस्तान से मिट्टी और मलबे की खेप भरकर आरम्भ की थी। अपनी प्रथम यात्रा की अवधि में ही उसके चार शिक्षार्थी नाविकों की टाइफ़ाइड ज्वर से मृत्यु हो गई। इसके पश्चात् यह क्रम चलता रहा। उसका प्रथम कैप्टन पागल हो गया, दूसरा अपराधी बना, तीसरे को अपने पद से इसलिये च्युत कर दिया गया क्योंकि वह सदैव नशे में धुत रहने लगा था। चौथा कैप्टन अपने केबिन में मृत पाया गया पांचवें ने अपनी जीवन लीला को स्वयं ही अपने आपको गोली मारकर समाप्त कर लिया। छठे कैप्टन के नियन्त्रण में पहुँचने पर यह जलपोत एक दुर्घटना में उलट ही गया। इस दुर्भाग्यशाली जलपोत, हिनेमोआ का अन्त सन् 1908 में एक तूफान में हो गया। कुछ दिनों के बाद जब यह जलपोत बरबाद होकर स्काटलैण्ड के पश्चिमी तट पर बहते हुए पहुँचा तो लोगों ने देखा कि यह पूर्ण रूप से नष्ट−भ्रष्ट हो चुका था। उस पर कुछ भी उपयोगी सामान नहीं बचा था। नाविकों की मान्यता थी कि उसकी प्रथम यात्रा में मिट्टी और मलवे की खेप के साथ−साथ उसमें मानव कपाल एवं अस्थियों का भी समावेश था जिससे प्रेम आत्माओं ने कुपित होकर उस जलपोत को अपनी प्रथम यात्रा में ही अभिशप्त कर दिया था।
“ग्रेट इर्स्टन” नामक एक अन्य जहाज का इसामबर्ड किंगडम ब्रुनेल नामक एक विख्यात ब्रिटिश इंजीनियर द्वारा 1854 में निर्माण आरम्भ किया गया था। यह अपने समय के एक विशालतम जलपोतों में से था किन्तु यह बड़ा ही दुर्भाग्यशाली सिद्ध हुआ। इसका निर्माण एक महान सागरीय आश्चर्य व तैरने वाले एक राज महल के रूप में किया गया था, जिसमें चार हजार व्यक्तियों को पूर्ण सुख−सुविधा, आमोद−प्रमोद सहित सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण करवाने की पूर्ण व्यवस्था थी। इसमें छः मस्तूल और पाँच चिमनियाँ धुएं के निकास के लिये लगी थीं, जो कि किसी भी जहाज पर उन दिनों प्रथम बार ही देखी गई थीं।
“ग्रेट् इर्स्टन” में भारी इस्पात की चादरें बड़ी मजबूती से लगाई गई थी। इतना ही नहीं उनमें 3 फीट के अन्तर से दूसरी उतनी ही मजबूत इस्पात की चादर और लगाई गई थी इनको जोड़ने के लिये एक इंच मोटे इस्पात के रिबिटों का प्रयोग किया गया था। दो चादरों के बीच में 16 कंपार्टमेंट बनाये गये जो कि पूर्णतः जलरोधी थे। इसकी रूपरेखा बनाते समय इस बात पर विशेष रूप से बल दिया गया था कि यह जलपोत किसी भी स्थिति में न डूबने पावे और अन्तिम समय तक यह देखा गया कि यह जहाज डूबा नहीं यद्यपि विभिन्न कारणों से यह दुर्भाग्यशाली जहाज नितान्त निकम्मा ही सिद्ध हुआ।
इसके निर्माण में एक इंच मोटे 30 लाख रिबिट हथौड़ों की चोटों के द्वारा लगाये गये थे, जिसके लिये एक हजार दिनों तक 200 रिबिट दस्तों को कार्य करना पड़ा था। इसके निर्माण की अवधि में होने वाली दुर्घटनाओं में एक दर्शक और चार मजदूरों ने प्राण गँवाये। इसके अतिरिक्त एक रिबिट करने वाला और एक एप्रेन्टिस कार्य करते हुए लुप्त हो गये थे। कुछ लोगों का मत था कि वे किसी कम्पार्टमेंट में फँसकर रह गये होंगे और उनकी सहायता के लिये की गई पुकार हथोड़ों की आवाज में डूब गयी होगी।
इसी बीच स्पात को प्लेटों के भाव में वृद्धि होने से आर्थिक कठिनाइयाँ आईं और कुछ दिनों के लिये निर्माण कार्य को स्थगित करना पड़ा। किन्तु ब्रुनेल ने शीघ्र ही और अधिक द्रव्य जुटा लिया। निर्माण का एक चरण पूर्ण होने पर इस महान और सबसे भारी जल पोत को थेम्स नदी के जल तक पहुंचाने के लिए 330 फीट के अंतर को तय करना था जो कि एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया। इस साधारण सी लगने वाली दूरी को तय करने में पूरे तीन महीने का चौंका देने वाला समय लगा। इस विशालतम ढांचे को एक-एक इंच खिसकाने में अनेक प्रकार की बाधाओं का सामना करना पड़ा। अनेक बार जंजीरें टूटती गईं। अनेक नौकाएं डूब गईं व अनेकानेक हाइड्रोलित रेम्स फट गये तब कहीं यह थेम्स नदी के जल में पहुंचा। सन् 1858 की 31 जनवरी को यह महान पोत अपनी यात्रा के योग्य बना तब तक इस पर 100 लाख से अधिक व्यय किया जा चुका था। अब आगे की यात्रा के लिए और धन की आवश्यकता थी अतः डायरेक्टरों के नये बोर्ड का गठन किया गया, जिन्होंने इस जल पोत से लाभ कमाने की बात सोची और उसे भारत और आस्ट्रेलिया की ओर न भेजकर उसे अमेरिका की ओर भेजने का निश्चय किया। अभी तक उसमें केवल पहले दर्जे के केबिन ही बन पाये थे। दूसरे और तीसरे दर्जे के प्रवासियों के लिए निर्माण कार्य को अगले कुछ वर्षों के लिए छोड़ दिया गया। इस महान जलपोत की यात्रा आरंभ होने से एक दिन पूर्व 53 वर्षीय ब्रुनेल उसका अंतिम निरीक्षण करने आया। उसने अपने कुछ विशिष्ट साथियों के साथ फोटो खिंचवाया ही था कि अचानक वह लड़खड़ाया, एक झटका खाया और गिरते ही उसके प्राणांत हो गये। ब्रुनेल की मृत्यु को एक सप्ताह ही बिता था कि एक समाचार मिला कि ग्रेट इस्टर्न की एक चिमनी में भयंकर विस्फोट हो गया है जिसके फलस्वरूप पांच कर्मचारी जलकर और एक कर्मचारी पैडल व्हील में फंस कर मर गये हैं। विस्फोट के कारण उसका दिवानखाना जिसमें चारों ओर आयने जड़े हुए थे व बड़े ही सुंदर ढंग से संवारा गया था, पूरी तरह नष्ट-भ्रष्ट हो चुका था। विस्फोट का कारण था एक भाप बल्ब का असावधानी से बंद की स्थिति में ही रह जाना।
अब इस स्थिति में उसकी मरम्मत अनिवार्यतः होनी थी, जिसमें अपेक्षा से अधिक समय लगा, अतः संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा को रद्द कर दिया और डायरेक्टरों ने इस कुख्यात से कुछ अर्थलाभ प्राप्त करने के उद्देश्य से उसे वेल्स की एक धार्मिक यात्रा के लिए दर्शनार्थियों को रवाना करने का निश्चय किया। इसी बीच एक जोर की आंधी ने उसकी समस्त बंधन और लंगरों को तोड़कर इस जल पोत को बीच समुद्र में पहुंचा दिया। जहां कि यह 18 घंटे तक तूफान से जूझता रहा जब कि आस-पास के सारे जहाज डूब चुके थे। इसकी सर्वोत्तम बनावट के कारण ही यह डूबने से बच गया, यद्यपि तूफान के कारण उसका दिवानखाना फिर से पूर्णतः क्षतिग्रस्त हो चुका था। इसके तीन माह पश्चात् ग्रेट इस्टर्न कैप्टन, उसके कर्णधार व उनके खजांची का एक 9 वर्षीय पुत्र किनारे पर एक नौका द्वारा जाते हुए डूबकर मर गये।
किसी भी जहाज की प्रारंभिक यात्रा के समय उसके कैप्टन की मृत्यु होना एक बड़ा ही अशुभ चिन्ह माना जाता है। जैसे ही लंदन में यह समाचार पहुंचा ग्रेट इस्टर्न के मैनेजिंग डायरेक्टरों ने अपना इस्तीफा दे दिया। दूसरे बोर्ड का गठन होने पर उन्होंने उसकी यात्रा की तिथि 9 जून 1830 निश्चित की किंतु जो 300 टिकट बेचे जा चुके थे, उनमें से केवल 35 प्रवासी ही शेष बचे थे क्योंकि अन्य यात्री प्रतीक्षा करते-करते थक चुके थे और वे अन्य जहाज से रवाना हो चुके थे। अंत में इन 35 यात्रियों को ही लेकर यह जहाज 16 जून 1860 को अपनी यात्रा पर रवाना हुआ। नये कैप्टन की सहायता के लिए 418 कर्मचारियों का एक बड़ा दल था।
न्यूयार्क पहुंचने पर इस जहाज का भव्य स्वागत किया गया। न्यूयार्क में इस जहाज पर दो दिन के भ्रमण का विज्ञापन किया गया। 2000 टिकट बिके किंतु जहाज पर केवल 300 व्यक्तियों के विश्रामार्थ ही बिस्तर थे। लोगों ने बड़ी परेशानी में रात्रि व्यतीत की। इसी बीज भंडार गृह में एक पाइप के फट जाने से पूरा खाद्यान्न भीगकर बेकार हो गया। खाने योग्य केवल थोड़ा-सा बेक्ड बीफ और सख्त बिस्कुट ही जिन्हें बड़ी ऊँची कीमत पर बेचा गया। भूखे प्यासे जल्दी ही किनारा आने पर उतर जाना चाहते थे किन्तु रात्रि में मल्लाहों की गलती के कारण इस जहाज ने मार्ग छोड़ दिया था और यह 100 मील दूर समुद्र में पहुँच चुका था। जहाज को उचित दिशा में घुमाया गया किंतु यात्रियों को जब किनारा मिला तब वे भूख और प्यास के कारण बुरी तरह थक चुके थे। भ्रमण की एक और यात्रा का प्रयत्न असफल ही रहा। न्यूयार्क वासियों को अब इस विशालकाय जलपोत में कोई रुचि नहीं रह गई थी।
जब यह जलपोत रात्रि में चुपचाप न्यूयार्क से रवाना हुआ तो पर केवल 90 यात्री ही थे। अभी अटलांटिक महासागर को आधा ही पार किया था कि उसकी एक स्क्रू-शाफ्ट निकल गई। मिलफोर्ड ह्वेन में एक छोटी नौका को छूने भर से उसके दो यात्री डूबकर मर गये। आगे चलकर ब्लेन हेम नामक एक जहाज को इसने टक्कर मारकर क्षतिग्रस्त कर दिया।
तीसरे कैप्टन को लाया गया किन्तु बोर्ड द्वारा कर्मीदल के एक तिहाई व्यक्तियों को कम कर देने से उसने अपना पद छोड़ दिया। अब चौथे कैप्टन को लाया गया, जो केवल 100 यात्रियों को लेकर ही रवाना हुआ।
सन् 1861 के सितम्बर में ग्रेट इर्स्टन एक बड़े तूफान में फँस गया, जिसमें किसी अन्य जहाज का बचना दूभर ही होता। इस तूफान के कारण उसके दोनों ओर के पैडल क्षतिग्रस्त हो गये, समस्त बचाव नौकाएँ टूट−टूट कर बह गईं, उसका पतवार टूट गया और उसके स्क्रू को क्षति पहुँचाने लगा। इसकी मरम्मत में 60 हजार पौण्ड का व्यय हुआ। अगले वर्ष जब यह जलपोत लांग आयलैण्ड साउण्ड के पास से यात्रा कर रहा था। एक नुकीली चट्टान से वह टकरा गया जिसने उसके बाह्य आवरण को लंबाई में 83 फीट और चौड़ाई में 9 फीट तक चीर दिया। यात्रा चार्ट में इस चट्टान का कोई उल्लेख नहीं था। इस प्रकार मरम्मत पर 70 हजार पौण्ड व्यय करना पड़ा।
इस दुर्भाग्यशाली जहाज से परेशान होकर डायरेक्टरों ने इसे बेचना उचित समझा और सन् 1864 में यह जहाज केवल 25000 पौण्ड के मूल्य का बिका। अब इस जहाज का उपयोग समुद्र में केबिल बिछाने के लिए किया गया। किन्तु दुर्भाग्य ने उसे वहाँ भी नहीं छोड़ा। जब वे आयरलैण्ड से न्यू फाउण्डलैण्ड की ओर 1186 मील पर पहुँचे ही थे कि केबिल का अन्तिम छोर उनके पास से खिसक कर समुद्र में तीन मील गहरा चला गया। उसकी शोध की गई किन्तु जब कोई उपयोग होता नहीं दिखा तो जहाज को इंग्लैण्ड वापस लौटना पड़ा। सन् 1866 में एक प्रयास और दूसरे जहाज से किया गया जिसके सफल होने पर यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच प्रथम सन्देश 27 जुलाई को भेज पाना सम्भव हो सका। बाद में सन् 1869 में इस जहाज ने अदन और भारत के बीच केबिल बिछाने में सफलता प्राप्त की।
सन् 1874 में इस जहाज ने केबिल डालने का कार्य पूर्ण किया और इसे मिलफोर्ड ह्वेन में लाकर रखा गया जहाँ कि यह पंद्रह वर्षों तक उसी स्थिति में जंग खाता खड़ा रहा। इसकी कोई उपयोगिता न मानकर इसे उसके दूसरे मालिकों ने सन् 1886 में 20 हजार पौण्ड में बेच दिया। कुछ दिनों तक इस तैरते हुए राजमहल से विज्ञापन प्रसारण का कार्य लिया गया। इस पर विज्ञापन लिखे जाते थे। अन्त में इसे लोहे व अन्य धातुओं के व्यापारी को बेच दिया गया।
इसको तोड़ना भी उतना ही कष्टप्रद सिद्ध हुआ जितना कि उसका निर्माण करना। जब उन दुहरी चादर से निर्मित कम्पार्टमेन्टों को तोड़ा गया, तब उसमें दो मानव हाड़-कंकाल पाये गये। ये दोनों हाड़ कंकाल उस रिबिट करने वाले और उसके एप्रेन्टिस के ही थे जो कि निर्माण के समय लुप्त हो गये थे। अब उन लोगों की शंका का समाधान हो गया था जो कि इस सागरीय आश्चर्य, तैरते हुए राजमहल को प्रेतात्माओं द्वारा शापित होने की बात कहते थे।
प्रस्तुत घटनाक्रम बताते हैं कि कोई भी वस्तु चाहे कितनी ही मूल्यवान क्यों न हो, यदि वे शापग्रस्त हों अथवा निरीहों की आहें इनसे जुड़ी हों, अन्ततः वे हानिकारक ही सिद्ध होती हैं। मिस्र के पिरामिडों से लेकर कोहिनूर के हीरे तक के प्रसंग यही तथ्य प्रामाणित करते हैं।
पारसी धर्म के प्रवर्त्तक महात्मा जरथुश्त्र का प्रभाव बढ़ रहा था। सुसंस्कारी बादशाह गुश्तास्प ने विवेक पूर्वक परख कर उन्हें गुरु मान लिया था। उनके बढ़ते प्रभाव से संकीर्ण सभासद जलने लगे। उन्होंने धूर्तता पूर्ण चला चली। जरथुश्त्र के चौकीदार को लालच देकर मिला लिया और उनके घर में मनुष्य की खोपड़ी तथा हड्डियाँ रखवा दीं। बादशाह से शिकायत की कि जरथुश्त्र संत नहीं छिपकर हीन जादू टौने करते हैं। प्रमाण के रूप में घर से वे वस्तुएँ बरामद करा दीं। चौकीदार ने भी बयान दे दिया कि जरथुश्त्र की गैर हाजिरी में कोई भी घर में नहीं गया है। इस प्रकार बादशाह भ्रम में पड़ गये और उन्होंने जरथुश्त्र को कैद खाने में डाल दिया। प्रभु की लीला मानकर संत उस समय चुप रहे।
कुछ ही दिनों बाद बादशाह के सबसे प्रिय घोड़े की चारों टाँगे पेट से चिपक कर रह गयीं। वह उठने से लाचार हो गया। हर प्रकार की दबा दारु बेकार होने लगी।
एक पहरेदार ने सूचना दी कि संत जरथुश्त्र ने कहा है कि बादशाह चाहें तो वे एक प्रयास कर सकते हैं। बादशाह ने उन्हें कैद खाने से बाहर बुलवाया और कहा आपके महान प्रभु का प्रभाव देखना चाहता हूँ।
संत बोले शहंशाह महाप्रभु का प्रभाव आँखों से नहीं आस्था से देखा जाता है। आस्था की दृष्टि आपकी ठीक होगी तो देख लेंगे। मैं आस्था की चार परीक्षाएँ लूँगा और उसी आधार पर उपचार करूंगा। बादशाह मान गये।
जरथुश्त्र ने पहला प्रश्न किया गुश्तास्प तुम विवेक पूर्वक मेरी परीक्षा कर चुके हो, मेरे जीवन और उसके उद्देश्य को भी परख समझ चुके हो। बोलो क्या तुम्हारे अंदर से यह विश्वास उठता है कि मैं ईश्वर के लिए समर्पित उसका संदेश वाहक हूँ?
बादशाह ने आत्म चिन्तन किया और अनुभव किया कि सचमुच ही उसने महान सन्त पर सामान्य लोगों के कहने से शक किया? वह बोला हे पवित्र आत्मा! मुझे क्षमा करें मैं सचमुच भ्रम में पड़ गया था। अब आपके और महाप्रभु के निर्देशों का ही पालन करूंगा।”
सन्त सन्तुष्ट हुए। उन्होंने प्रार्थना की हे प्रभु! बादशाह भ्रमित था, यह अपनी आस्थाएँ शुद्ध कर रहा है, इसे विकास का मौका दें।” इस प्रार्थना के साथ घोड़े का एक पैर मुक्त हो गया।
जरथुश्त्र ने दूसरा प्रश्न किया “तुम स्वयं जिस मार्ग पर बढ़ रहे हो क्या उस पर अपने बेटे को भी चलाना चाहोगे? बादशाह ने स्वीकार किया तथा युवा बेटे को संत के सामने हाजिर कर दिया। सन्त बोले “नौजवान तुम राज्य के सबसे वीर पुरुष हो। क्या यह प्रतिज्ञा ले सकते हो कि अपनी बहादुरी का उपयोग सदा न्याय के पक्ष में ही करोगे? शाहजादे ने यह प्रतिज्ञा की। संत ने पुनः प्रार्थना की हे परमपिता! बादशाह अपने उत्तराधिकारी को भी आपके आदर्शों के लिए समर्पित कर रहा है इसे शरण में आने दें।” इसके साथ घोड़े का दूसरा पैर भी मुक्त हो गया।
अब संत ने महारानी को तलब किया। उनसे पूछा “हे बुद्धिमान पति और वीर पुत्र वाली सौभाग्य शालिनी! क्या आपको भी प्रभु की राह स्वीकार है? अपने प्रभाव और साधनों का उपयोग उसके लिए करेंगी? रानी ने श्रद्धापूर्वक अनुगमन की शर्त स्वीकार की। जरथुश्त्र ने प्रार्थना की “प्रभु! बादशाह अपनी अर्धांगिनी को भी आपके चरणों में झुकाता है, इसे अपने तक पहुँचने का रास्ता दें और घोड़े का तीसरा पैर भी ठीक हो गया।
चौथी परीक्षा में उनके घर के चौकीदार को पुनः बुलाया गया। संत ने पूछा “बादशाह अपनी पत्नी और पुत्र सहित प्रभु मार्ग पर चलना चाहता है। क्या उसके अधिकारियों को उसका सहयोग नहीं करना चाहिए? चौकीदार रो पड़ा, बोला “चाहे जो सजा दे लें, मैं झूठ बोला था। खोपड़ी आदि सभासदों ने घर में रखवायी थी। बादशाह आग बबूला हो उठा। उसने भ्रष्ट सभासदों को देश निकाला दे दिया।
सन्त बोले- ‘‘बादशाह! यह आपके लिए प्रभु का शिक्षण है। थोड़ा तुम्हारी प्रगति क प्रतीक है। इसके पैर ठीक न होने से तुम यात्रा नहीं कर सकते थे। इसी प्रकार जब तक मनुष्य अपनी निजी आस्था, धर्मपत्नी, उत्तराधिकारी पुत्र और अपने अधिकार क्षेत्र, इन चारों को ईश्वर के अनुकूल नहीं बनाता, तब तक पूर्णता नहीं प्राप्त कर सकता।
मानसिक-विकास की आवश्यकता को आज इसलिए भी जरूरी समझा जा रहा है, कि जब से मनुष्य का जन्म हुआ है, तब से अब तक लम्बे काल में वह बुद्धिवाद के धरातल तक में ही विकास कर पाया है। पिछले दो सदियों से वह उसी रूप में पड़ा हुआ है और मनुष्य उसे ही सब कुछ मान बैठा है, जिससे अनेकानेक समस्याएँ आ खड़ी हुई हैं, वह उन्हीं के जाल में बुरी तरह उलझा अपंग—असहायों की तरह छटपटा रहा है।
मनुष्य मन और बुद्धि के वर्तमान धरातल से अब तक ऊपर नहीं उठ जाता समस्याएँ और परेशानियाँ उसका पीछा करती रहेंगी। ‘सावित्री’ महाकाव्य में योगी अरविंद ने कहा है—मानव के अन्दर अनेकानेक संभावनाएँ उसी प्रकार प्रतीक्षा में है, जिस प्रकार एक बीज में छिपा विशाल वट वृक्ष विकसित होने के लिए उपयुक्त समय का इन्तजार करता रहता है।
वे समझाते हुए कहते हैं- ‘‘आरोह” अर्थात् विकास, “अवरोह” अर्थात् अवतरण, प्रगति के में दो चरण हैं। दूसरे शब्दों में आरोह मानवी प्रयास पुरुषार्थ से संबद्ध है एवं अवरोह भगवद् करुणा में अर्थात् जब हम प्रयत्नपूर्वक मनसा—वाचा—कर्मणा से पवित्र बन जायेंगे, अपने सुपात्र को विकसित कर लेंगे तभी भागवत् करुणा स्वयं को निर्मल मानवी अन्तःकरण में उड़ेलेगी और फिर उस पवित्र अन्तराल में अतिमानवी ‘अतिमानस’ का प्रादुर्भाव होगा।
अरविंद ने- जड़ तथा चेतन मन इन्हें चेतना के निम्नस्तरीय एवं आरम्भिक सोपान बताया गया है, जबकि उच्चतर मन, प्रकाशित मन, संबुद्ध मन ओवर माइण्ड तथा अतिमन को उच्चस्तरीय चेतना-सोपान में रखा गया है और इन्हें विकास की अन्तिम स्थिति बतायी गयी है।
दर्शन के अनुसार बुद्धि ने निश्चय ही मनुष्य को काफी प्रगतिशील बनाया है और प्रतिगामी आदिम स्थिति से उबार कर विकास की वर्तमान अवस्था तक पहुँचाया है। यही इसका चरमोत्कर्ष है। आगे की प्रगति उसके बस की बात नहीं, वह इसके सीमा−क्षेत्र से बाहर है। इसके बाद का विकास अब सद्बुद्धि (इण्ट्यूशन) द्वारा ही संभव है, तत्पश्चात् ओवर माइण्ड और फिर अतिमन। अतिमानसी धरातल पर पहुँच कर मानव प्रगति के शिखर पर पहुँच जाता है। यह विकास का अन्तिम पड़ाव है। इस स्तर पर आकर मनुष्य सर्वज्ञ बन जाता है।
अरविंद दर्शन के अनुसार अतिमानसी विकास कोई कपोल−कल्पना नहीं, वरन् एक सुनिश्चित तथ्य है और समष्टि को इस स्तर का पहुँचना ही है किन्तु श्री अरविंद ऐसा तभी संभव बताते हैं जब मानव स्वयं को वर्तमान तुच्छ स्तर से ऊपर उठायेगा, अन्यथा उसकी बुद्धि उसे सर्वनाश के कगार तक पहुँचा देगी। पर दूसरी ओर वे यह भी कहत हैं कि विनाश आने से पूर्व ही वह सम्भल जायेगा और अपने अस्तित्व को बचा लेगा। फिर मनुष्य की जो स्थिति होगी, वह उसकी सर्वोत्कृष्ट एवं सर्वोच्च स्थिति होगी।
योगीराज ने यहाँ तक कहा है कि रूपांतरण अपनी स्वाभाविक गति से होगा, न तो इसमें कोई दैवी चमत्कार जैसी बात दिखेगी, न ही यह आकस्मिक रूप में आयेगा, उसकी प्रगति धीरे−धीरे होगी।
जब आध्यात्मिकी की संसार की स्थापना हो जायेगी, तो महर्षि के अनुसार व्यक्तिगत चेतना समष्टिगत चेतना से मिलकर एकाकार हो जायेगी। तब मनुष्यों को न तो आज जैसी त्रासदी झेलनी पड़ेगी, न ही उसमें रागद्वेष का, कामना−वासना, तृष्णा-अहंता का लेश मात्र भी रहेगा। सब स्वल्प−सन्तोषी बनेंगे और आनन्द की जिन्दगी जियेंगे।
यह सब यूटोपिया जैसा लगते हुए भी वास्तविक प्रतीत होता है। अनेक बार अनेक मनीषियों ने इस प्रकार की कल्पना की है, पर महर्षि अरविंद की कल्पना से इसलिए आशा बँधती है, कि वे एक मनीषी के साथ-साथ योगी भी थे, भविष्य-दर्शन की अपनी अर्जित क्षमता के आधार पर ही उनने सब कुछ लिखा होगा।
तुमने मुफ्त में पाया है। इसे मुफ्त में दो। अपने पास दौलत जमा न करो। परिग्रही मत बनो। विलासी मत बनो, अन्यथा वही तुम्हारे पैर की बेड़ी बनेगा।
तुम सर्प की तरह चतुर और कबूतर की तरह भोले बनो। चौकन्ने रहो ताकि अपने ओर विराने तुम्हें पथ भ्रष्ट न करें।
उनसे मत डरो, जो शरीर को घायल या नष्ट कर सकते हैं। डरने योग्य वे हैं जो तुम्हारी आत्मा को गिराते, चरित्र बिगाड़ते और अन्धेरे में धकेलते हैं।
यह न समझो कि मैं मेल−मिलाप बढ़ाने और सुख सुविधाएँ बरसाने आया हूँ। मैं तलवार की धार पर चलना सिखाता हूँ और छोटे परिवार की उपेक्षा कर बड़े परिवार में प्रवेश करने की शिक्षा देता हूँ।
जो अपने प्रियजनों को मुझसे अधिक चाहता है वह मेरे योग्य नहीं। जो अपने को बचाता है वह खोयेगा और जो उसे खोने में नहीं झिझकता वह उसे पायेगा।
एक विद्वान ने कहा- ‘‘मैं आपके आश्रम पर रहा करूंगा।” ईसा ने कहा- ‘‘लोमड़ियों की माद होती है और पक्षियों के बसेरे। तू मुझ निरन्तर भ्रमण करने वाले के साथ कहाँ टिकेगा।”
एक शिष्य ने पूछा- मेरा बाप मर गया है-आज्ञा दें तो उसे गाढ़ आऊँ। ईसा ने कहा- मुर्दों को मुर्दे गाढ़ने दे, तू मेरे साथ चल।
ईसा के साथ मछुए और दूसरे गिरे हुए लोग लगे रहते थे। धनियों ने कहा- यह आपको शोभा नहीं देता। ईसा ने कहा- वैद्य की रोगियों को जरूरत होती है। मैं पापियों और पतितों के बीच क्यों न जाऊँ?
निस्पृह ईसा को किसी ने समाचार दिया- आपके कुटुम्बी लोग बाहर बैठे प्रतीक्षा कर रहे हैं—ईसा ने कहा- मेरा कुटुम्बी वह है जो मेरे साथ चले। जिनको ईश्वर के आदेशों पर विश्वास है वे ही मेरे सच्चे कुटुम्बी हैं।
स्वर्ग का राज्य जिसके लिए है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ईसा ने एक छोटा बालक गोदी में उठाया और सबको दिखाते हुए कहा- ‘जिसका मन इस बालक की तरह निर्मल है, स्वर्ग का राज्य उन्हीं के लिए है।’
धनी नीकुदेमुसन ने पूछा- ईश्वर के दर्शन कब होते हैं। ईसा ने कहा- नया जन्म होने पर। जब शरीर से ऊँचा उठकर मनुष्य आत्मा के लोक में प्रवेश करता है तो भगवान के दर्शन पाता है।
शिष्यों ने ईसा की नीति पूछी—सुनने कहा- सच कहने में डरना नहीं। मौत से अकारण उलझना नहीं और मरने का दिन आ खड़ा हो तो डरना नहीं। हमें विवेक और वीरता का समन्वय करना चाहिए।
ईसा को मृत्यु दण्ड मिला तो उनने लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा- मेरा मरना तुम्हारे लिए अच्छा है क्योंकि मैं परलोक जाकर तुम्हारे लिए प्रेरक आत्माएँ भेज सकूँगा।
गेहूँ का दान जमीन में घुसकर भर नहीं जाता। वरन् अपने जैसे असंख्य दाने पैदा करता है।
ईश्वर से प्रेम करने का अर्थ है- जीवन, बुद्धि और मन को ईश्वर मय बनाना।
खून न कर, व्यभिचार न कर, चोरी न कर, झूठ मत बोल, ठगी न कर और पड़ौसी से अपने समान प्यार कर। धर्म का यही सार है।
लाठी का बदला लाठी, गाली का बदला गाली और खून का बदला खून नहीं हो सकता। तुम लोगों का दिल बदलने की कोशिश करो। जो कुरता छीने उसको दोहर भी दे दो। भलमनसाहत की मार बदला लेने की अपेक्षा अधिक कारगर होती है।
कहा गया है कि व्यभिचार करना पाप है। पर मैं कहता हूँ कि जो स्त्रियों को कुदृष्टि से देखता है और उनके बारे में अशुद्ध चिन्तन करता है वह व्यभिचार कर चुका।
पृथ्वी पर धन जमा न करो। इसमें चोरी होने, ईर्ष्या बढ़ने और अहंकारी विलासी होने कर डर है। अपने धन परलोक में जमा करो जहाँ वह घटता नहीं बढ़ता ही रहता है।
तुम वैभव और परमेश्वर दोनों की सेवा एक साथ नहीं कर सकते।
परमेश्वर के राज्य में धनवान का प्रवेश उतना ही कठिन है जितना सुई के छेद में से ऊँट का निकलना।
माँगों तो पाओगे। खोजोगे तो मिलेगा और खटखटाओगे तो खोला जायेगा।
रट्ट कोई जो हे प्रभु, कहता है, स्वर्ग में प्रवेश न पा सकेगा। द्वार उसी को खुला मिलेगा जो परमेश्वर की इच्छा पर चलता है।
धन्य वे हैं जो नम्र हैं। प्राणियों और पदार्थों पर उन्हीं का शासन होगा।
दान करना है तो उन्हें मत दो जिनका पेट भरा है। उनसे उपहास ही मिलेगा। देना हो तो उन्हें दो जो उसके बिना पिछड़ गये हैं और दुःख पाते हैं।
प्रभु का मार्ग सीधा बनाओ। समतल लाने के लिए खाई भरनी पड़ेगी और पहाड़ों को खोदना पड़ेगा।
देवालय के विश्राम घर में जो सट्टा लगा रहे थे और कबूतर बेचने खरीदने का धन्धा कर रहे थे। ईश्वर पुत्र ने उनकी चौकियाँ उलट दीं और कहा- ‘परमेश्वर के घर को डाकुओं की खोह न बनाओ।’
यह याजक को कहते हैं उन्हें सुनो, उनमें से जो उचित हो उसे अपनाओ। पर वे जो करते हैं सो न करो। क्योंकि इन पुरोहितों की कथनी और करनी में जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है।
तुम जैसा सलूक दूसरों से अपने लिए चाहते हो, उनके साथ तुम वैसा ही व्यवहार आरम्भ कर दो।
लोक सेवा में निरत होकर तुम अपने गाँव और घर में सम्मान नहीं पा सकते। इसलिए अच्छा है कहीं अन्यत्र ढूँढो।
बड़ाई सुनने का लालच न करो। ढिंढोरा न पीटो न पिटवाओ। ढोंगी लोगों की तरह मंच सजाने और बढ़-बढ़कर बातें करने का प्रयत्न न करो। जो देना है दाँये हाथ से ही दे डालो ताकि बाँया हाथ उसे जान न पाये।
भलाई इसलिए करो कि ईश्वर को प्रसन्नता दूँ। दीपक की तरह जलो ताकि उजाला फैले। उचकने की कोशिश न करो। दीपक सदा दीवट पर रखा जाता है। उपयुक्त जगह उसे अनायास ही मिल जाती है।
सत्संग और कुसंग के भले बुरे परिणामों से सभी अवगत हैं। इसमें कुछ भाग तो कथन परामर्श का भी रहता है और कार्य पद्धति के अवलोकन का भी। किन्तु अधिक प्रभाव व्यक्तित्व का रहता है जो प्रकाश की तरह अपने संपर्क क्षेत्र पर अपनी छाप छोड़ता है। अग्नि के समीप जाने पर उसकी गर्मी एक परिधि तक स्वयमेव पहुँचती है।
इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि उसका स्पर्श आवश्यक हो। पुष्पों की सुगंध और कूड़े करकट की सड़न का एक दायरा बन जाता है और उसका प्रभाव सहज ही उन लोगों तक पहुँचता है जो उस परिधि में होते हैं। आग में मिर्च जलाये जाने पर उससे छीकें आने और खाँसी उठने का सिलसिला दूर−दूर तक उठता दिखाई देता है। हर व्यक्ति का अपना एक प्रभाव क्षेत्र होता है और वह बिना कुछ कहे भी एक आदान−प्रदान का क्रम चला देता है। सत्संग और कुसंग का प्रभाव मात्र वातावरण से भी सम्भव है।
मनुष्य के शरीर के चारों ओर एक तेजोवलय होता है उसे यन्त्रों की सहायता से प्रकाश युक्त भाप की तरह देखा जा सकता है। इसके साथ जुड़े रहने से विद्युत कण आगे−आगे उड़ते रहते हैं ओर सामर्थ्य के अनुरूप समीपवर्ती व्यक्तियों पर ही नहीं पदार्थों पर भी छाप छोड़ते हैं इस प्रसंग में निकटता का और भी अधिक महत्व है। कमजोर पक्ष पर समर्थ पक्ष अनायास ही छा जाता है।
बच्चों को जिन बड़े व्यक्तियों के साथ रहने, गोदी में चढ़ने या खेलने का अवसर मिलता है। उनका स्वभाव तदनुरूप ढलना आरम्भ हो जाता है। इसलिये उन्हें यदि सुसंस्कारी बनाना है तो अनुपयुक्त व्यक्तियों के सान्निध्य से यथा सम्भव बचाया ही जाना चाहिए।
यह प्राण ऊर्जा उन पदार्थों में भी घुस पड़ती है जो व्यक्ति विशेष के संपर्क में आते हैं। वस्त्र, छड़ी, कलम माला आदि जो वस्तुएँ अधिक समय तक जिस किसी के साथ रहती हैं उसका प्रभाव ग्रहण कर लेती हैं और फिर जिनके भी पास जाती हैं उन्हें प्रभावित करती हैं।
नारी और नर में यह चुम्बकत्व विशेष रूप से काम करता है। नारी में आकर्षण और पुरुष में विकर्षण स्तर का चुम्बकत्व होता है जो निकटता होने पर अपनी चुम्बकीय ऊर्जा का हस्तान्तरण करने लगता है।
अध्यात्म साधकों को ब्रह्मचर्य की शिक्षा दी जाती है और कहा जाता है कि वे विपरीत लिंग के साथ घनिष्ठता न बनाये। उनसे यथा सम्भव अधिक से अधिक दूरी बनाये रहें। विशेषतया दृष्टि न मिलाये क्योंकि चुम्बकत्व की मात्रा उनके माध्यम में अपना गहरा प्रभाव छोड़ती है। यौनाचार में तो जननेन्द्रियों का ही नहीं प्राण ऊर्जा का भी पारस्परिक घुलन-मिलन और आदान-प्रदान एक सीमा व्यक्तित्वों के स्तर में एक आश्चर्यजनक परिवर्तन करते हैं। इतना ही नहीं बहुधा भ्रूण स्थापित होने और दोनों के संयोग का प्रतिफल एक नये व्यक्ति का जन्म होने तक भी जा पहुँचता है।
व्यभिचार का प्रतिबन्ध आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी किया गया है क्योंकि उसमें नर पक्ष अधिक घाटे में रहता है अपनी प्राण ऊर्जा का एक अंश गँवा बैठता है। साथ ही नारी पक्ष का चुम्बकत्व अनायास ही उससे बहुत कुछ अपहरण करके स्वयं तो लाभान्वित रहता है और अपने बहुत से दोष दुर्गुण नारी पक्ष में छोड़ देता है। ऐसे ही रहस्यमय कारणों से पतिव्रत और पत्नी व्रत मर्यादाओं के अनुशासन पालन पर अंकुश लगाया गया है। विशेषतया आत्मिक प्रगति को लक्ष्य मानकर समर्थ पक्ष अपनी आध्यात्म सम्पदा को हस्तान्तरित करते समय यह विशेष रूप से परखता है कि किन्हीं अपनी बहुमूल्य सम्पदा को किसी कुपात्र के कीचड़ जैसे व्यक्तित्व पर तो नहीं उड़ेला जा रहा है। इसके लिए पात्रता का विशेष रूप से ध्यान रखना पड़ता है। अन्यथा उस उपलब्धि का दुरुपयोग होने पर ग्रहण कर्ता को ही नहीं देने वाले चलने वालों को विशेष रूप में सतर्क किया गया है।
अध्यात्म क्षेत्र में इसी प्रक्रिया का आदान−प्रदान उच्चस्तरीय भूमिका पर गुरु शिष्य के बीच भी होता है। गुरु अपनी संग्रहित प्राण ऊर्जा का एक बड़ा भाग कारण विशेष के निमित्त शिष्य के लिए भी हस्तान्तरित कर सकता है। इस प्रक्रिया को शक्तिपात कहते हैं। इसमें भी संकट उठाना पड़ता है और भस्मासुर जैसी स्थिति बन पड़ती है। विभूति वरदान को पचा न पाने के कारण भस्मासुर तो बेमौत मरा ही। शंकर पार्वती ही नहीं, विष्णु भगवान तक को उस कारण हैरान होना पड़ा।
विवेकानन्द, दयानन्द आदि की निज की साधना उतनी नहीं थी, उन्हें गुरु पक्ष से जो असाध्य अनुदान मिले उनके कारण वे इतना कुछ कर सके जितना एकाकी पुरुषार्थ से कदाचित् वे न कर पाते।
प्राचीन काल के गुरुकुलों की एक विशेषता यह भी थी कि वे अध्ययन करने वाले छात्रों में से सभी की पात्रता परखते रहते थे और उनमें से जो जिस प्रकार की जितनी प्राण ऊर्जा का अनुदान प्राप्त करने का अधिकारी होता था उसे उतना देकर उन्हें निहाल करने में कृपणता नहीं बरतते थे। किन्तु साथ ही यह भी अनुशासन निर्धारित करते थे कि अनुदान का उपभोग लिप्सा, तृष्णा, अहन्ता की पूर्ति जैसे क्षुद्र प्रयोजनों के लिए न किया जाय। उस सामर्थ्य के सहारे कहीं कोई अनीति परक दुष्कर्म न किया जाय। ऐसी दशा में उस अनुदान देने वाले को भी दण्ड भुगतना पड़ता है क्योंकि उसने पात्रता परखे बिना, उपलब्धि का उद्देश्य जाने बिना क्यों देने में उतावली बरती। कोई अपनी बन्दूक किसी अनाड़ी के हाथ सौंप दे और उसे पाकर वह किसी को मौत के घाट उतार दे या धमका कर लूट−पाट करे तो इस अनर्थ में वह व्यक्ति जिसने बंदूक अनुपयुक्त प्रयोग की आशंका का अनुमान लगाये बिना देने वाला व्यक्ति भी अपराधी बनता है और उसे भी आक्रमणकारी की सहायता करने का दण्ड भुगतना पड़ता है। शक्तिपात के संबंध में यह सतर्कता भी रखी जाती है। जिसके पास इस प्रकार का भण्डार है उसे प्रायः प्रकट करने से कतराते हैं ताकि कोई धूर्त चापलूस झूठ-झूठ भक्ति-भाव दिखाकर या झूठे आश्वासन देकर उनकी सज्जनता का अनुचित लाभ न उठा ले।
जहाँ सामर्थ्य के अभाव में कोई उच्चस्तरीय कार्य रुकता है वहाँ उस कार्य को बिगड़ने न देने के लिए बिना माँगे भी महान आत्माएँ अपनी शक्ति का एक बड़ा भाग उन सत्पात्रों को अनायास ही सौंप देते हैं। ऐसा भी होता है कोई महान कार्य कराने के लिए कोई उच्च आत्मा किसी सत्पात्र को आग्रहपूर्वक ही ऐसा अनुदान हस्तान्तरित करे। शिवाजी और चन्द्रगुप्त ने बिना माँगे ही किसी उच्च प्रयोजन के निमित्त ऐसा अनुदान उपलब्ध किया था।
जो लोग शक्तिपात कर सकने की क्षमता का विज्ञापन करते हैं उनमें से कदाचित् ही कोई इस योग्य होता हो। जो कर सकते हैं वे अकारण जहाँ तहाँ चर्चा नहीं करते अन्यथा जेब का पैसा बार-बार दिखाने वाले को कोई जेबकतरा सहज ही चकमा दे सकता है।
जिस प्रकार पिता अपनी सम्पदा का उत्तराधिकार अपनी प्रिय सन्तान को दे जाता है उसी प्रकार आत्म-बल के धनी योगी तपस्वी भी अपने शिष्यों को शक्ति का अनुदान देते हुए आना-कानी वहीं करते।
धन पास रहने में उतना आनन्द नहीं मिलता, जितना कि उसके खोने या छिनने में कष्ट होता है।
—सेन्ट ग्रेगरी
संकल्प शक्ति के धनी और अपनी योजनाओं का साहसिक मूल्य चुकाने वाले व्यक्ति ही संसार को अपने साँचे में ढाल सकने में समर्थ हुए हैं।
—गेटे
हेली धूमकेतु 76 वर्ष बाद आगामी वर्ष सन् 1986 में प्रकट होने वाला है। इससे पूर्व वह 1456, 1531, 1607, 1682, 1758 में प्रकट होता रहा है। इसके सम्बन्ध में दैवज्ञ हेली ने बहुत खोज-बीन की थी, इसलिए उन्हीं के नाम पर इस पुच्छल तारे का नामकरण किया गया। उनकी मृत्यु के पश्चात दूसरे वैज्ञानिक उसकी कक्षा एवं गति का सहायता लगाने का प्रयत्न करते रहे हैं पर अभी उस संदर्भ में उतनी सुनिश्चित जानकारी नहीं मिली है जिस पर सन्तोष किया जा सके।
धूमकेतु की संरचना ठोस द्रवों एवं वाष्पीय पदार्थों से हुई है पर वह परिभ्रमण करते हुए जब सूर्य के निकट पहुँचता है तो बढ़ी हुई ऊर्जा का दबाव पड़ता है। जिस भाग पर यह दबाव पड़ता है वह वाष्पीकृत होकर फूलने और फैलने लगता है। इसी को धूमकेतु की पूँछ कहते हैं। इस पूँछ की विशेषता के कारण ही प्राचीन ज्योतिषी उसे पुच्छल तारा कहते थे।
मंगल ग्रह के परिक्रमा पथ के निकट पहुँचने पर दुम का यह विस्तार विशेष रूप से बढ़ने लगता है कभी-कभी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के कारण यह दुम छोटे-छोटे कई खण्डों में बँट भी जाती है। खगोल शास्त्रियों के गणितानुसार औसत धूमकेतु का वजन 19 मिलियन टन होता है। उसकी परिक्रमा 76.1 वर्ष में पूरी होती है। अपनी धुरी पर वह 10.3 घण्टे में घूम लेता है।
240 वर्ष पूर्व ज्योतिर्विदों की दृष्टि इस पर गई थी। तब से अब तक उसके सम्बन्ध में नई जानकारियाँ जुड़ती आई हैं। इसकी लम्बाई 10 करोड़ कि.मी. आँकी गई है। इस बार यों इसी वर्ष के क्रिसमस के एक दिन पूर्व में वह दिखने लगेगा। पर बिना दूरबीन की सहायता के उसे खुली आँखों से 11 अप्रैल सन् 86 को देखा जा सकेगा। उस दिन यह पृथ्वी से मात्र 80.7 करोड़ कि.मी. दूर होगा। ग्रह नक्षत्रों की गणना के हिसाब से इतनी दूरी निकटवर्ती ही मानी जाती है।
बम्बई की नेहरू वेधशाला के निर्देशक का कथन है कि सन् 85-86 में पृथ्वी को हेली लहर प्रभावित करेगी और उसके कारण धरती के स्वाभाविक क्रम में कई प्रकार की अस्त-व्यस्तताएँ उत्पन्न होने की सम्भावना है।
इस बार हेली धूमकेतु के सम्बन्ध में कितनी ही अभिनव जानकारियाँ एकत्रित करने की तैयारी अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से की जा रही है। जापान, रूस, फ्राँस आदि के सहयोग से एक उपग्रह उन दिनों भेजा जायेगा जो 1000 कि.मी. दूर रहकर उसकी परिस्थितियों का पता लगायेगा और चित्र खींचेगा। इसे जुलाई 85 में भेजने का प्रस्ताव है। इस पुच्छल तारे को दूरबीनों के सहारे जनवरी 86 से ही देखा जाने लगेगा। धूमकेतु के पृथ्वी के निकट से निकलना किसी संकट की आशंका उत्पन्न करता है। सन् 1908 में साइबेरिया क्षेत्र में एक भयंकर विस्फोट हुआ था उसने धरती के सुदूर क्षेत्रों को प्रभावित किया था। इसके सम्बन्ध में खगोल वेत्ताओं का एक अनुमान यह भी है कि धूमकेतु की किसी आड़ी-टेढ़ी चपेट के कारण हुआ था। आवश्यक नहीं कि इसकी समीपता कोई संकट खड़ा ही करे पर यह आशंका अवश्य है कि उसकी धूल उड़कर पृथ्वी की ओर आने लगे तो सूर्य को अन्धेरे में बदल देने वाले अन्धड़ भी आ सकते हैं। कई प्रकार के ऐसे रोग कीटाणु भी पृथ्वी पर उतर सकते हैं जिनका अस्तित्व अभी पृथ्वी पर नहीं देखा गया। यह अवतरण किन्हीं असाध्य महामारियों की उत्पत्ति का निमित्त कारण हो सकता है। इस थोड़े से टकराव में हिमयुग लौट पड़ने की सम्भावना का भी अनुमान लगाया जा सकता है।
पुरातन मान्यता के अनुसार धूमकेतुओं का उदय देवताओं द्वारा छोड़ी गई क्रोध सूचक दुर्गन्ध से होता है जो कि पृथ्वी निवासियों का अनिष्ट करता है। इस मान्यता की आँशिक पुष्टि केपलर, गैलीलियो, कोपरनिक्स, न्यूटन, प्लेटो आदि वैज्ञानिकों ने भी की है और कहा है कि इनका पृथ्वी के निकट आना चिन्ताजनक ही हो सकता है। आधुनिक वैज्ञानिक ऐसा तो नहीं मानते, पर इस नवागन्तुक द्वारा उत्पन्न हो सकने वाले खतरों से बेखबर भी नहीं हैं। वैज्ञानिक फ्रेडहाइल का कथन है कि उसकी पूँछ पृथ्वी पर कई प्रकार के नए अविज्ञात रोग कीटाणु बिखेर सकती है।
प्रस्तुत धूमकेतु का वजन अन्यों की अपेक्षा 10 हजार मिलियन टन आँका गया है। वह 10 नवम्बर 85 से 29 अप्रैल 86 तक पृथ्वी के निकट रहेगा। उस बीच कभी-कभी वह दूरबीनों से ही नहीं नंगी आँखों से भी देखा जा सकेगा। संसार के अनेक देश, अपने पृथक साधनों से भी और संयुक्त साधनों से भी उसकी जाँच पड़ताल करेंगे और इसके लिये इस वर्ष के मध्य में अन्तरिक्ष यान भेजे चुके हैं। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्राँस आदि इस में अग्रणी रहे हैं। उसकी कुछ धूलि बटोर कर पृथ्वी पर भी लाने का विचार है ताकि उसके इतिहास और प्रभाव का अधिक अच्छा मूल्याँकन हो सके।
अन्तरिक्ष में छोटे-बड़े प्रायः 1 खरब धूमकेतु विचरते खोजे गये हैं। इनमें सबसे बड़ा वर्तमान धूमकेतु ‘हेली’ है। पिछले छोटे धूमकेतु जब कभी पृथ्वी के निकट आये हैं। तब भारी उथल−पुथल करते रहे हैं। उनने पृथ्वी का नक्शा बदला और विशालकाय प्राणियों का नस्लों का, अन्त कर दिया। सन् 1908 में 30 जून को आये एक छोटे से धूमकेतु ने साइबेरिया की भूमि पर एक भयंकर विस्फोट तो किया ही था आकाश को चमकती धूलि से भी भर दिया था। प्रथम विश्वयुद्ध इसी की परिणति रूप में माना जाता रहा है।
धूमकेतु अध्ययन के लिए उसके निकट 10 किलोमीटर रहने पर भी किसी दुर्घटना की आशंका की जाती है, ऐसी दशा में उसे दूर भगा देने के लिए शक्तिशाली अणु आयुध तैयार रखे गये हैं। जो उसका शीर्ष भाग उड़ा देने या रास्ता बदल देने में समर्थ हो सकें। इतने पर भी यह आशंका बनी ही रहेगी कि धकेले जाने पर सौर मण्डल के किसी अन्य ग्रह का सन्तुलन न बिगड़े। अच्छाई इतनी ही है कि वह निकटतम होते हुए भी पृथ्वी से 650 लाख किलोमीटर दूर रहेगा। उसकी पूँछ 8 करोड़ किलोमीटर लंबी होगी जो दूर रहते हुए भी पृथ्वी को प्रभावित करेगी।
इन सब आशंकाओं को ध्यान में रखते हुए ईश्वर से प्रार्थना यही की जानी चाहिए कि यह विपत्ति भी उसी तरह टल जाय जिस प्रकार कि इन परिस्थितियों में पहले भी “स्काई लैब” जैसी एवं अनेकों विपत्तियाँ, प्रकृति प्रकोप टलते रहे हैं अथवा कम हानि पहुँचाकर ही इतिश्री करते रहे हैं। हर दृष्टि से प्रस्तुत वर्ष एवं आने वाले तीन वर्ष विश्व वसुधा की भविष्य की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे। इन दिनों मानवता को एक नहीं, अनेकानेक विभीषिकाओं का सामना करना पड़ सकता है। परीक्षा की घड़ी तो है ही यह। ऐसे में सामूहिक धर्मानुष्ठानों का वातावरण परिशोधन की दृष्टि से सर्वोपरि महत्व है। धरती को यदि मँझधार पार करनी है तो सभी या तो एक साथ पार होंगे या डूबेंगे। आशा करनी है चाहिए कि सब विपत्तियों के निवारण हेतु संबद्ध होंगे।
पाल ब्रिटेन ने अपनी “गुप्त भारत की खोज” में जहाँ अनेकों योगियों की अद्भुत चमत्कारी घटनाओं का उल्लेख किया है वहाँ अध्यात्म विषय में अभिरुचि रखने वालों और खोजियों के मन्तव्यों का भी संकलन किया है। उनके अनुसार भारतीय वैज्ञानिक सी.वी. रमन के सम्मुख एक योगी को साइनाइड विषपान करने का उदाहरण सामने आया तो उनने इतना ही कहा कि यह विज्ञान के लिए एक चुनौती है। उसे तथ्य प्रमाणों एवं तर्कों द्वारा इनका खण्डन अथवा मण्डन करना चाहिए।
“लिविंग यूनीवर्स” के लेखक सर यंग हस्वैण्ड का कथन है कि जैसे जड़ ब्रह्माण्ड का ऊहापोह भौतिक विज्ञान द्वारा किया जाता है, उसके अन्तराल में एक चेतन ब्रह्माण्ड भी है जिसमें आत्मा की गतिविधियाँ और रीति-नीतियाँ काम करती हैं। इस संदर्भ में भारत अभी भी बहुत कुछ रहस्योद्घाटन करने की स्थिति में है। हिमालय की कन्दराओं में ऐसी आत्माएँ अवस्थित हैं जिन पर मानवी शरीर के साधारण नियम लागू नहीं होते।
अपने इसी ब्रह्माण्ड में एब्सोल्यूट वैक्युम (पूर्ण शून्य) की यत्र−तत्र परिस्थितियाँ हैं। वे स्वेच्छाचारी प्रतीत होती हैं। मनमर्जी से जहाँ−तहाँ परिभ्रमण करती हैं पर यह सम्भव है कि उन्हें आत्म−शक्ति द्वारा किसी स्थान विशेष पर घसीट कर लाया जा सके और उस क्षेत्र में चलने वाली समस्त गतिविधियों को ठप्प किया जा सके, भले ही वे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हों।
इन दिनों अणु बम, हाइड्रोजन बम, रसायन बम, नापाम, बम आदि की बहुत चर्चा होती है और इनकी विघातक शक्ति का भयावह वर्णन किया जाता है। यह हो सकता है कि जिस क्षेत्र में इनका उत्पादन एवं प्रयोग की योजना है उसे पूर्ण शून्य के प्रभाव में ले लिया जाय और इनका प्रयोग ही न हो सके। अन्तरिक्ष में एक इस प्रकार की “पूर्ण शून्य” की रचना हो सकती है जिसमें “लेसर” और मृत्यु किरणों तक को ठप्प किया जा सके। उनके सामने प्रक्षेपणास्त्रों और बमों की क्षमता तो खिलौने जैसी कही जा सकती है।
विनाश की शक्तियाँ अद्भुत हैं, वे अपने मारक कृत्यों और क्षमताओं का प्रदर्शन बहुधा करते रहते हैं। पर यह भी असम्भव नहीं है कि पूर्ण शून्य की क्षमता के सम्मुख वे अपने को असहाय एवं असमर्थ अनुभव करें और विघातक योजनाएँ उनके निर्माताओं के मस्तिष्क तक ही सीमित रहें। जो करना चाहती हैं, वे न कर सकें।
प्रकाश की गति सर्वोपरि मानी गई है। अब तक के गणित की पहुँच यहीं तक है कि एक सेकेंड में 1, 86,000 मील चल सकने वाला प्रकाश ही सर्वाधिक द्रुतगामी है। किन्तु इससे भी आगे गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश पा सकने पर प्रकाश की गति से भी अधिक गति हस्तगत हो सकती है।
“ब्लैक होल” जिन ग्रहों के—पदार्थ के संपर्क में आते हैं उसे इस प्रकार पराभूत कर लेते हैं कि उसे तनिक दूरी तक भी देखा न जा सके। किन्तु इन ब्लैक होलों के केन्द्र बिन्दु जहाँ होता है वहाँ इतनी गति होती है कि प्रकाश का समूचा परिकर ही उसमें अदृश्य हो सके। यह गति की ज्ञात चरम सीमा है। इसे प्रकाश गति से कही अधिक समर्थ माना गया है।
जिस प्रकार वर्षा के दिनों में पानी, ठण्डक के दिन में ओस और गर्मी के दिनों में धूल ऊपर से नीचे की ओर बरसती देखी जाती है। उसी प्रकार अनन्त अन्तरिक्ष में कितने ही तारक और प्रवाह अपनी धरती पर विभिन्न स्तर के प्रमाण एवं तरंग विकिरण बिखेरते रहते हैं। इनमें पृथ्वी की पाचन शक्ति जिन्हें उपयोगी एवं आवश्यक समझती है उन्हें ग्रहण करती एवं पचाती रहती है। जो अनुपयोगी होते हैं उन्हें अपने इर्द−गिर्द तनी छतरी से रोकती और जिधर−तिधर छितरा जाने देती है। फिर भी उस छतरी को बेधकर कुछ न कुछ मात्रा में वह विशिष्ट विद्युत प्रवाह नीचे आता रहता है।
छतरी तान लेने पर कड़ी धूप का एक अंश ऊपर रुक जाता है फिर भी उसे पार करके गर्मी का एक अंश नीचे उतर आता है और मनुष्य अनुभव करता है कि उसे गर्मी लग रही है। इसी प्रकार वर्षा के दिनों में छाता लगा होने पर पानी का एक अंश इधर−उधर बह जाता है फिर भी उसके बारीक छेदों में से रिसकर पानी हलकी फुहारों के रूप में नीचे आता रहता है और छाता लगाकर चलने पर भी कपड़े या शरीर का कुछ भाग नम हो जाता है। छाते का कपड़ा मोटा है या झीना इस बात पर छनकर नीचे आने वाली बात बहुत कुछ निर्भर करती है।
पृथ्वी से कुछ मील ऊँचाई पर विचित्र पदार्थों की विनिर्मित छतरियां तनी हैं जिन्हें आयनोस्फियर, ट्रोपोस्फियर, लीयोस्फियर, बायोस्फियर आदि नाम दिये गये हैं। यह कवच पृथ्वी से लेकर 4000 किलोमीटर तक चले गये हैं। इन्हें एक छलनी के बाद दूसरी छलनी कह सकते हैं। इनसे टकराते और छितराते हुए अन्तरिक्षीय विकिरण का अनुपयुक्त भाग इधर−इधर बिखर जाता है और ऊपर ही रुक जाता है और पृथ्वी अपनी काम चलाऊ स्थिति में बनी रहती है। यदा−कदा ऐसे अवसर भी आते रहते हैं कि अधिक सशक्त ऊपर से नीचे तक आ पहुँचता है और उससे वातावरण असाधारण रूप में प्रभावित होता है। ऐसे अवसर पृथ्वी के जन्म से लेकर अब तक अनेक बार आये हैं जिसमें अन्तरिक्षीय तरंग वर्षा की प्रबलता से पृथ्वी की परिस्थितियों में असाधारण उथल−पुथल होती रही है। हिम युग, जल प्रलय, अत्यधिक ऊष्मा, प्राण घातक वायु आदि के अभिवर्षण से ऋतुओं में भारी उलट−पुलट हुई है और अभ्यस्त वातावरण में अन्तर आने से जीवधारियों ने या तो अपनी प्रकृति बदली है या फिर उनमें से अधिकाँश समाप्त हो गये हैं। यही बात वनस्पतियों के संबंध में है। उनकी आकृति और प्रकृति में हेर−फेर हुआ है। प्राणधारी जल, वायु और वनस्पति जन्य आहार के आधार पर अपना जीवन धारण किये रहते हैं। इस आधार पर उनकी आदतें बदलती हैं और गुण स्वभाव में परिवर्तन होता है। यों ऐसे अवसर यदाकदा ही हजारों वर्षों बाद कारण विशेष में आते हैं अन्यथा एक बार का निर्धारित ढर्रा लंबे समय तक चलता रहता है थोड़े परिवर्तन को ध्रुव प्रदेशों की संरचना और कार्य पद्धति अपने ढंग से सन्तुलित कर लेती है। यह क्रम इस प्रकार चलता रहता है कि सर्व साधारण को उसका पता भी नहीं चल पाता और आने वाले आँधी तूफान अपने ढंग से उतर जाते हैं।
पृथ्वी के ऊपर चढ़े हुए छातों का यथा स्थिति बने रहना आवश्यक है। वह ऐसे ही हैं जैसे शरीर पर कपड़े या मकान पर छत का आच्छादन। यह आवरण फट जाय या झीना पड़ जाय तो ऋतु प्रभाव शरीर को प्रभावित करेगा और असाधारण होने पर स्वस्थता को लड़खड़ा देगा।
ब्रह्माण्ड में बरसने वाले तरंग प्रवाह को जितना पृथ्वी की साधारण संरचना रोक सकती है उतना ही सम्भाल कर पाती है यदि वह दबाव अत्यधिक मात्रा में हो जाय तो बेचारी पृथ्वी क्या, कोई भी सशक्त ग्रह पिण्ड भी उसकी चपेट में आ सकता है और उसका कचूमर निकल सकता है। तारकों का जन्म−मरण इसी आधार पर होता रहता है। स्वाभाविक मौत तो उनमें से बहुत कम की आती है। उनमें से अधिकाँश को ऐसे ही किसी अन्तरिक्षीय प्रवाह की चपेट में आकर दुर्घटनाग्रस्त होना पड़ता है।
आवश्यकता इस बात की है कि भौतिक विज्ञान के आधार पर विघातक शक्तियों पर अंकुश लगा सकने जैसी कोई विशिष्ट क्षमता विकसित हो और अनर्थ को रोक सकने के लिए ऐसे साधन जुटायें जो भयभीत मानवता को सान्त्वना दे सके और जो उपलब्ध सामर्थ्य के आधार पर मदोन्मत्त हो रहे हैं उन्हें नये ढंग से सोचने के लिए सहमत कर सके। आवश्यक नहीं कि जो आज का निश्चय है, वह कल भी उसी रूप में बना रहे। एकाँगी चिन्तन मनुष्य की दुराग्रही बनाता है पर जब विपरीत पक्ष को ध्यान में रखते हुए विचार करने का अवसर मिलता है तो वह अपनी राह बदल भी सकता है।
परा मनोविज्ञान के अंतर्गत मेण्टल ट्रान्स फार्मेशन की, ‘ब्रेन वाशिंग’ की एक सशक्त प्रक्रिया है जो मनुष्य को आज की अपेक्षा कल दूसरे ढंग से सोचने और अहंकारी उन्माद को दूरदर्शी विवेक अपना कर नये ढंग से सोचने के लिए सहमत कर सकती है।
यहाँ अणु आयुध सब कुछ हैं, अन्तरिक्ष बढ़िया किस्म का रण क्षेत्र है, दूसरे का विनाश करके हम सुरक्षित रह सकते हैं, यदि इस विचारधारा का कोई दूसरा विकल्प सूझ पड़े, अपनी भूल का आभास हो और साथ ही यह अनुभूति हो कि जिस आक्रामक योजना को सफल सुनिश्चित माना गया था वह व्यर्थ निरर्थक भी सिद्ध होने जा रही है तो कोई कारण नहीं कि आक्रमण की दिशा में उठते पैर और बढ़ते हाथ रुक न सकें।
दया प्रेम की चेरी है।
—डेनियल
राजा जनक महल की छत पर सोये हुए थे। हंस हंसिनी, अटारी की मुंडेर पर बैठे वार्त्तालाप करने लगे। हंसिनी बोली- इन दिनों सबसे बड़े ब्रह्मज्ञानी राजा जनक हैं। हंस ने बात काट कर कहा- तुम रैक्य को जानती नहीं। अपने समय के वे ही सबसे बड़े ब्रह्मवेत्ता हैं। हंसिनी ने पूछा- भला कौन है-रैक्य? हंस ने उत्तर दिया- अरे, वही गाड़ी वाला रैक्य, जो गाड़ी खींचकर बोझ ढोता और अयाचित वृत्ति से निर्वाह करता है।
जनक अधजगे थे। वे पक्षियों की भाषा जानते थे। सो करवट बदलकर हंस हंसिनी की वार्ता ध्यान पूर्वक सुनने से निमित्त करवट बदलने लगे। आहट पाकर युग्म चौकन्ना हुआ और उड़ गया। बात अधूरी रह गई।
राजा को नींद नहीं आई। रैक्य कौन हैं? कहां रहते हैं? उनसे कैसे संपर्क सधे? यह विचार उन्हें बेचैन किये हुए था। सवेरा होते ही दरबार लगा। राजा ने सभासदों से गाड़ी वाले रैक्य को ढूँढ़ निकालने का आदेश दिया। दौड़-धूप तेजी से आरम्भ हो गई।
कठिनाई से बहुत दौड़−धूप के बाद रैक्य का पता चला। राजदूतों ने उनसे जनक नगरी चलने का अनुरोध किया। जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। मुझे राजा से क्या लेना देना, अपना प्रस्तुत कर्त्तव्य पूरा करूं या इधर−उधर भागता फिरूं?
दूतों ने सारा विवरण कह सुनाया। जनक स्वयं ही चल पड़े और वहाँ पहुँचे जहाँ गाड़ी खींच धकेलकर निर्वाह चलाते और साधना सेवा का समन्वित क्रम चलाते थे।
राजा ने इतने बड़े ब्रह्मज्ञानी को ऐसा कष्ट साध्य जीवनयापन करते देखा तो द्रवित हो उठे। सुविधा साधनों के लिए उनने धनराशि प्रस्तुत की।
अस्वीकार करते हुए रैक्य ने कहा- राजन्, यह दरिद्रता नहीं, ब्रह्मवेत्ता का अपरिग्रह है। जिसे गंवा बैठने पर तो मेरे हाथ से ब्रह्म तेज भी चला जायेगा।
तत्वज्ञान के अनेक मर्म रहस्यों को सत्संग से जानने के उपरान्त जनक यह विचार लेकर वापस लौटे कि विलासी नहीं, अपरिग्रही ही सच्चा ब्रह्मज्ञानी हो सकता है। उन्हें नई दिशा मिली। उस दिन से उन्होंने अपने हाथों कृषि करने, हल चलाने की नई योजना बनाई और श्रम उपार्जन के सहारे निर्वाह करते हुए राज−काज चलाने लगे।
जहाँ एक ओर विश्व के अनेकों राष्ट्र भुखमरी, अशिक्षा, बीमारी से ग्रसित हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ विकसित देश—विश्व के कुल उत्पादन का 85 प्रतिशत मूर्खतावश सैनिक साज−सज्जा एवं अस्त्र−शस्त्रों पर व्यय कर रहे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद विश्व का रक्षा व्यय चौगुना हो गया है जो इन दिनों 600 मिलियन डालर है।
अन्तर्राष्ट्रीय मिलीट्री स्ट्रेटेजी संस्था लन्दन के आँकड़ों के अनुसार विश्व की दोनों महा शक्तियों के अणु अस्त्रों तथा शस्त्रों पर 100 मिलियन डालर प्रतिदिन खर्च होता है। इन दिनों सैनिक कुल 25 मिलियन और उनके लिए साज−सज्जा तैयार करने वाले व्यक्ति 50 मिलियन हैं। विश्व की दुर्दशा और युद्ध की तैयारी का परस्पर अति घनिष्ठ संबंध है।
युद्ध लिप्सु देशों पर यह अर्थ शास्त्र सवार है कि युद्ध का वातावरण बनाए रखो, कहीं न कहीं उसके विस्फोट कराते रहें ताकि अन्य देश डर से या आक्रोश से अधिक हथियार उन देशों से खरीदें जिससे उनकी शस्त्र उत्पादन क्षमता का व्यापार अक्षुण्ण बना रहे।
एक ओर अस्त्र उत्पादन की यह चरम प्रक्रिया है वहाँ दूसरी ओर भुखमरी के आँकड़े भी कम भयानक नहीं हैं। पिछले चार वर्षों में कुपोषण से मरने वाले बच्चों की संख्या हर वर्ष 1 करोड़ 70 लाख के अनुपात में रही है। चीन, पाकिस्तान, बंगला देश, भारत जैसे अनेकों एशियाई और अफ्रीकी देशों को बाहर से अन्न मँगाने के लिए लालायित रहना पड़ा है।
सैनिक व्यय कुछ ही वर्षों में 60 गुना अधिक बढ़ गया है। इससे भी अधिक भयंकरता प्रक्षेपणास्त्रों और अणु बमों की है। इस समय विश्व में 1386 प्रक्षेपणास्त्र हैं और पाँच देशों के पास जो अणु बमों का जखीरा है वह समूची पृथ्वी को दस बार भून डालने के लिए काफी है।
जापान का अनुभव लोग अभी भी भुला नहीं पा रहे हैं। दो छोटे बम गिराकर उस देश को पूरी तरह आत्म समर्पण के लिए विवश कर दिया गया था। वही सपने अभी भी देखे जा सकते हैं किन्तु इन 40 वर्षों में परिस्थितियाँ कितनी बदल गईं। यह बात ध्यान में लाई नहीं जाती। उन दिनों जापान अणु आयुधों की दृष्टि से निहत्था था जबकि आज प्रमुख पाँच देशों के पास इतने भयानक बम हैं जिनका उपयोग वे सीधे या पिछलग्गुओं के माध्यम से करा सकते हैं।
इस बार का सीमित युद्ध भी असीम होगा और उसका प्रभाव कुछ देशों तक सीमित न रहकर विश्वव्यापी होगा। परमाणु वैज्ञानिक बरनार्ड लिस बौडर्ड के कथनानुसार सीमित युद्ध में भी दुनिया की आक्सीजन का बड़ा भाग नष्ट हो जायेगा। महीनों सूर्य के दर्शन न होंगे। विषैला धुंआ छाया रहेगा और उस घुटन में मरने वालों की संख्या अणु प्रहार से मरने वालों की तुलना में कहीं अधिक होगी। तापमान गिर जायेगा। फसलें नहीं उगेंगी। विकिरण के प्रभाव से घास वनस्पतियों का उगना कम हो जायेगा। जो उगेंगी, वे जहरीली होंगी। ऐसी दशा में पशु पक्षियों का बचना भी कठिन पड़ेगा। उस समय इतने प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होंगी जिनकी आज तो कल्पना तक नहीं की जा सकती। जब पेट भरना और बीमारों के लिए कारगर दवा का मिलना ही सम्भव न होगा तो अन्य कठिनाइयों का तो कहना ही क्या? मनुष्य आदिमकाल की असभ्य स्थिति से बुरी दशा में पहुँचेगा। आशा करनी चाहिए कि दुर्बुद्धि पर विवेक का अंकुश लगेगा और ऐसा कुछ न होगा जिसमें यह सृष्टि नष्ट हो जाय।
तैराकी तालाब में घुसकर सीखी जाती है और पहलवानी अखाड़े में। पढ़ना पाठशाला में होता है और व्यवसाय हाट बाजार में। इस धरती पर सबसे अधिक समर्थ माना जाने वाला आत्मबल जुटाना और बढ़ाना हो तो सेवा मार्ग अपनाने का और कोई उपाय नहीं। संयम साधना के बिना—उदारता और सज्जनता विकसित करना आध्यात्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जप तप इसी पृष्ठभूमि पर उगते और फलते−फूलते हैं। मात्र कर्मकाण्डों के सहारे दिशा निर्धारण और स्वाध्याय सत्संग से उपयुक्त मार्ग−दर्शन होता है। जिस कल्प वृक्ष पर गौरव और वर्चस्व के फूल खिलते और फल लगते हैं वह आत्मशोधन के खाद और परमार्थ परायण का पानी पाकर ही ऊँचा उठता और किसी को छाया में बिठा कर अभीष्ट अनुदानों से निहाल करता है।
इस तथ्य को प्रजा परिजनों को समय−समय पर अवगत कराया जाता रहा है। जो सीखा और सिखाया गया है उसकी परीक्षा प्रतियोगिता का इन्हीं दिनों विशेष आयोजन किया गया है—हीरक जयन्ती का। किसकी जयन्ती इसे जानने को किसी को भ्रमित नहीं होना चाहिए। पच्चीस वर्ष में रजत जयन्ती, पचास में स्वर्ण जयन्ती, पचहत्तर में हीरक जयन्ती और सौ वर्ष में शताब्दी मनाई जाती है। यह काल गणना गुरुदेव से यत्किंचित् ही संबंध रखती है। उनका शरीर भले ही पचहत्तर वर्ष का हुआ हो उनका तप साधना भले ही साठ वर्ष पूरे कर चुका हो, पर वस्तुतः वे इस प्रकार के गणित से बहुत ऊपर हैं। आत्माएँ न जन्मती हैं, न बढ़ती हैं और न मरती हैं। जो अजर अमर है उसकी किस पैमाने से नाप−तौल की जाय। वे भगवान बुद्ध के शब्दों में अनेक बार दुहराते रहे हैं कि जब तक एक भी प्राणी बँधन में बँधा है तब तक हमें स्वर्ग या मुक्ति में नहीं जाना। जब सभी पार हो चुके, मल्लाह के डाँड़ तभी रुकेंगे। जिन्हें निरन्तर जन्म लेने हैं और विश्व परिवार के साथ जीना मरना है, उनके लिए हर दिन नया जन्म और हर रात नई मौत बन कर रहती है। ऐसी दशा में किस काल गणना के हिसाब से उनकी हीरक या कोई जयन्ती मनाई जाय?
अब अवसर विशेषतया एक महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए किया गया है जिसमें स्वर्ण सदृश परिजनों को तपा हुआ कुन्दन बनाया जाय। जिसमें कोयले की खदान को उलट−पलट कर उसमें से हीरों का ढेर लगाया जाय। इतना ही नहीं साथ ही वह भी किया जाता है कि उन्हें खरादा, चमकाया एवं जौहरी के बाजारों में ऊँचा मूल्याँकन हो सकने योग्य बनाया जाय। यह अवसर एक प्रतिस्पर्धा समारोह है जिसमें सभी प्राणवानों को अपना जौहर दिखाने और उपयुक्त पुरस्कार पाने का अवसर मिलेगा। विवाह शादियों के समय एक उल्लास बरसता है उसी के आनन्द लेने के लिए सभी स्वजन संबंधी एकत्रित होते हैं। उसमें समय, श्रम और धन की दृष्टि से घाटा ही रहता है। हीरक जयन्ती को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए और उसके संदर्भ में किन्हें क्या करना है इसका निर्धारण किया जाना चाहिए।
शुभ कामना, बधाई, घनिष्ठ पारिवारिक होने की दिशा में ओछे शिष्टाचार भर रह जाते हैं। धूमधाम और समारोह आयोजन की भी इन दिनों उपयोगिता नहीं समझी गई ताकि लक्ष्य से किसी का ध्यान न हटे। कुछ प्रत्यक्ष कृत्य करना हो तो दो बातें नोट की जा सकती हैं। एक यह कि बसन्त पर्व तक निरन्तर चलने वाले सत्रों में से किसी में सम्मिलित होने का समय निकाला जाय और अतिरिक्त प्राण ऊर्जा साथ लेकर वापस लौटा जाय। दूसरा यह कि आगामी बसन्त पर्व पर स्थानीय स्तर का छोटा गायत्री यज्ञ और युग निर्माण सम्मेलन अपनी स्थिति के अनुरूप कर लिया जाय। उसके लिए बाहर से मिशन के प्रवक्ताओं के आने वाले की आशा न की जाय क्योंकि वे अपने−अपने स्थानों में गायत्री यज्ञ और ज्ञानयज्ञ युग निर्माण सम्मेलन का प्रबंध करने में लगे होंगे।
यह अभिव्यक्ति का प्रदर्शन है। ठोस काम वह किया जाना चाहिए जिसे करने का दायित्व महाकाल ने वरिष्ठ प्रज्ञा−पुत्रों के कन्धों पर सौंपा है। वह कार्य एक ही है—जनमानस में महाप्रज्ञा का आलोक भर देना। इसके लिए किस स्थिति में किन्हें क्या करना चाहिए इसका उल्लेख इन पंक्तियों में होता रहा है। उस पर एक बार फिर दृष्टिपात किया जा सकता है कि जो सौंपा गया था वह बन पड़ा या नहीं। बन पड़ा तो इतना कम तो नहीं है जो तपती धरती को मूसलाधार जल बरसने वाले महामेघ की गरिमा से कम पड़े। समय की माँग बड़ी है उसके लिए उबली पूजा से काम नहीं चल सकता। जलते तवे पर पानी की कुछ बूंदें पड़ने से क्या काम चलता है। इसके लिए इन दिनों समर्थों का ऐसा पुरुषार्थ होना चाहिए जो उलटे को उलट कर सीधा कर सके।
इसके लिए प्रत्येक वरिष्ठ प्रज्ञापुत्र सर्वथा समर्थ है। यदि परिस्थितियाँ बाधक हैं तो उन्हें ठोकर मारकर रास्ता रोकने से हटाया जा सकता है सृष्टा का राजकुमार मनुष्य केवल इसलिए दुर्बल पड़ता है कि उसे लोभ, मोह और अहंकार की बेड़ियाँ बेतरह जकड़कर असह्य बना देती हैं। यदि औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अपनाया जाय परिवार को छोटा, सभ्य, सुसंस्कृत, स्वावलंबी रखा जा सके तो युग धर्म के उच्चस्तरीय निर्वाह की सुविधा हर किसी को सहज ही मिल सकती है। संकीर्ण स्वार्थपरता और अहंकारी साज−सज्जा जुटाने में तनिक कटौती की जा सके तो हर विचारशील को इतना अवकाश मिल सकता है। जिसमें वह आत्म−कल्याण और युग निर्माण की महती आवश्यकताओं को पूरा कर सके। प्रकारान्तर से यही कोयले को बहुमूल्य हीरा बनाने वाला काया कल्प है। इसे स्वेच्छापूर्वक किया जा सकता है। सहयोग की कमी हो तो सत्पात्र की सुगन्ध सूँघकर खिले पुष्प पर मंडराने वाले भ्रमरों की तरह समूचा देव परिकर दौड़ पड़ता है। गुरुदेव ने मात्र अपनी पात्रता बढ़ाने में अथक प्रयास किया है और वह पाया है जो सच्चे अध्यात्म का सच्चा अवलम्बन करने पर मिलना चाहिए। इसी के अनुकरण की आवश्यकता है। हीरक जयन्ती का एक ही सन्देश है कि यदि किसी की प्रज्ञा अभियान में उसके सूत्र−संचालक में वास्तविक श्रद्धा हो तो उसका बखान करके नहीं कार्य रूप में अपनी ऐसी श्रद्धाञ्जलि प्रस्तुत करनी चाहिए जिसकी इस विनाश के ज्वालामुखी पर बैठे संसार को नितान्त आवश्यकता है। ऐसी आवश्यकता है जिसकी अनिवार्य आवश्यकता है। इतनी अनिवार्य कि उसे एक क्षण के लिए भी ढाला नहीं जा सकता।
क्या किया जाय? इसका संक्षिप्त उत्तर इतना ही है कि अपने प्रभाव क्षेत्र में दीपक की तरह अपने को श्रद्धा का प्रतीक बनाया जाय और संपर्क क्षेत्र में युग चेतना का आलोक जगाया जाय। घर−घर नव परिवर्तन का अलख जगाने के लिए कटिबद्ध होकर निकल पड़ा जाय। इसके निमित्त क्या किया जाय। इसका सार संक्षेप छः सूत्री योजना के रूप में मई की अखण्ड−ज्योति में तथा बाद की अन्यान्य पत्रिकाओं, टाइटिल के तीसरे पृष्ठ पर छप चुका है। उसमें नवीनता कुछ नहीं पुनः स्मरण कराया जाना मात्र है। इसे परिजन चाहें तो अनुरोध आग्रह या निर्देश भी मान सकते हैं। ऐसा अनुरोध जिसे फिर कभी के लिए नहीं ही टाला जाना चाहिए।
कोयले का काया कल्प हीरा है। हममें से कौन अब तक क्या था इसकी चर्चा अप्रासंगिक है। अभीष्ट तो परिवर्तन है। ऐसा परिवर्तन जिसे नये जन्म का नाम दिया जा सके। मनुष्य में देवत्व उभरता हुआ इन्हीं दिनों इन्हीं आँखों से देखा जा सके। यह कठिन लगता हो तो भी सरल है क्योंकि कदम बढ़ाने वाले के लिए, उपयुक्त सहयोग देने के लिए वे देव शक्तियाँ वचनबद्ध हैं जो गुरुदेव की गोदी में खिलाती और उनकी राई जैसी निजी क्षमता को पर्वतोपम बनाती रही हैं।
यों अब तक भी जो प्रगति हुई है वह उत्साहवर्धक है, किन्तु अनेकानेक धर्मों, देशों, भाषाओं में बढ़े हुए 500 करोड़ पढ़ों और अनपढ़ों तक युग चेतना का आलोक पहुँचाने का—उन में नव जीवन भरने का लक्ष्य बहुत बड़ा है—उसे देखते हुए समग्र सफलता अभी काफी दूर दिखती है उसे करने के लिए अभी बहुत कुछ करना बाकी है। जो बाकी है उसकी पूर्ति के लिए अभी इतना भारी भरकम प्रयास करना है जिसे सन्तोषजनक कहा जा सके। जिसकी पृष्ठभूमि पर आशा के अंकुर उग सकें। करना तो भगवान को ही है। इतना बड़ा गोवर्धन उठाने और समुद्र सेतु बाँधने जैसी योजना को पूर्ण करना तो उसी के बलबूते से हो सकता है। पर यह तथ्य भी निश्चित है कि ऐसे ही अवसरों पर भगवान अपने सच्चे भक्तों की परीक्षा लेते, पात्रता परखते और तद्नुरूप श्रेय पुरस्कार देकर कृत−कृत्य करते हैं। ऐसे समय चाहे जब नहीं आते। ओलम्पिक खेलों जैसी विशालकाय प्रतियोगिता का नियोजन चाहे जब नहीं होता, उन्हें हर कोई मनमर्जी के समय पर सामने खड़ा नहीं देख सकता। उन्हें बुलाने और व्यवस्था बनाने के लिए बहुत बड़ी सामर्थ्य चाहिए और वह मात्र भगवान में है। पर इतना कर गुजरने की हर किसी को सुविधा है कि उनमें भाग लेने की तैयारी व्यक्तिगत रूप से करे और अपनी प्रयत्नशीलता के अनुरूप असंख्यों के सम्मुख अपनी दक्षता प्रस्तुत करे और तदनुरूप श्रेय सम्मान और पुरस्कार प्राप्त कर सके। पर यह सब किसी विशेष समय पर ही हो सकता है। सुविधा आयोजकों की मुख्य है। अपनी फुरसत का समय आने पर यह किया जायेगा। बात इस तरह नहीं बनती। जब अफसरों की भर्ती होती है तभी प्रार्थियों को उपस्थित होना पड़ता है। जब प्रार्थी चाहें तभी जगह खाली हों और तभी आवेदन−पत्र माँगे जाय और तद्नुरूप नियुक्ति हो यह नहीं हो सकता। सुयोग से हमें लाभ उठाना होता है। पर्व अपनी मर्यादा के अनुरूप आते हैं वे हमारे बुलाते ही नहीं आ धमकते हैं। वर्षा अपने समय पर होती है। हमारे पुकारते ही बादल नहीं आ धमकते।
हीरक जयन्ती की अवधि ऐसी ही है जिसे प्रत्येक प्रज्ञा परिजन को अपना सौभाग्य उभारने वाला अनुपम अवसर है इसे चुका नहीं जाना। यह उपेक्षा करने और बहाने ढूँढ़ने की भी घड़ी नहीं है। यह तो कोई भी कभी भी सड़कची करता रह सकता है पर बिगुल बजते ही पंक्ति में जा खड़े होने की घड़ी छावनी में कप्तान की योजनानुसार ही निर्धारित होती है। इसमें सैनिकों की सुविधा और मर्जी को महत्व नहीं मिलता।
समझना चाहिए कि यह समय वरिष्ठ प्रज्ञा परिजनों के बहुमूल्य हीरक बनने का है। यह वस्तुतः उन्हीं के सौभाग्य की बेला है। गुरुदेव तो अपने को उस आत्मिक स्थिति में विकसित कर चुके हैं, जिसमें मरण का और जयन्ती मनाने जैसे हर्षोत्सव का कोई विशेष महत्व रह नहीं गया है। अतः हीरक जयन्ती को इसके सही परिप्रेक्ष्य में समझने और तद्नुरूप ही संकल्प लेने का परिजनों से इन पंक्तियों में आग्रह अनुरोध किया जा रहा है।
एक पुलिस के हवलदार साहब घर पर सो रहे थे। पत्नी को चोरों की आहट मिली उसने उन्हें जगाया और कहा- लगता है चोर घुसे हैं। हवलदार साहब नींद में बोले- सोने दे, बिना चोरी किए किसी को नहीं पकड़ा जा सकता।
पत्नी बेचारी आहट लेती रही जब चोर सामान बाँधकर चलने लगे तो फिर जगाया कहा- अब तो चोर सामान बाँधकर जा रहे हैं। हवलदार जी ने पूछा कितने बजे हैं। उत्तर मिला 4 बजे हैं। वे बोले- क्यों तंग करती हो। मेरी ड्यूटी तो 8 बजे से है। मुझे सोने दो।
अद्वितीय है निर्माणों में, गुरुओं का निर्माण। जिनने फूँके चलती−फिरती प्रतिमाओं में प्राण॥1॥
विश्वामित्र और संदीपन, राम कृष्ण निर्माता। अंगुलिमाल, अंबपाली का जुड़ा बुद्ध से नाता॥ थे चाणक्य कि चन्द्रगुप्त के अनुपम भाग्य विधाता। और शिवा भी थे समर्थ के सपनों के उद्गाता॥ गुरु के अनुदानों की महिमा अनुपम और महान। अद्वितीय है निर्माणों से गुरुओं का निर्माण॥ 2॥
दयानन्द बन सके मूलशंकर, गुरु की गरिमा से। बने विवेकानन्द नरेन्द्र भी, गुरु की ही महिमा से॥ एकलव्य वो धन्य हुआ, केवल गुरु की गरिमा से। ‘जगतगुरु’ बन गया देश, इस तरह कि गुरु गरिमा से॥ पावनतम गुरु-परंपरा के अनगिन हैं अनुदान। जिनने फूँके चलती−फिरती प्रतिमाओं में प्राण॥ 3॥
किन्तु पात्रता, प्रमाणिकता और समर्पण−भाव। कर पाता है गुरु-गरिमा का ग्रहण अचूक प्रभाव॥ मृदु माटी कर सहज समर्पण वाला सरल स्वभाव। कुंभकार से रहने देता नहीं दुराव-छुपाव॥ तभी शिल्प को मिल पाते हैं शिल्पी को वरदान। अद्वितीय है निर्माणों में, गुरुओं का निर्माण॥ 4॥
हमें मिला है इस युग से भी ऐसा ही सहयोग। नहीं हाथ से जानें दें यह अवसर और सुयोग॥ कर अपना शिष्यत्व प्रमाणित करें अचूक प्रयोग। ताकि कट सकें गुरु अनुकम्पा से सारे भव-रोग॥ करें समर्पण द्वारा आओ! नवयुग का उत्थान। अद्वितीय है निर्माणों में गुरुओं का निर्माण॥5॥
*समाप्त*