संपदा को रोकें नहीं - Akhandjyoti January 1985

परमात्मा के अनंत वैभव से विश्व में कभी किसी बात की नहीं। भगवान आपके हैं और उसके राजकुमार के नाते सृष्टि की हर वस्तु पर आपका समग्र अधिकार है। उसमें से जब जिस चीज की जितनी आवश्यकता हो उतनी लें और आवश्यकता निबटते ही अगली बात सोचें। संसार में सुखी और संपन्न रहने का यही तरीका है।

बादल अपने, नदी अपनी, पहाड़ अपने, वन उद्यान अपने। इनमें से जब जिसके साथ रहना हो, रहें। जिसका जितना उपयोग करना हो, करें। कोई रोक-टोक नहीं है। दुःखदायी तो संग्रह है। नदी को रोककर यदि अपनी बनाना चाहेंगे और किसी दूसरे को पास न आने देंगे, उपयोग न करने देंगे तो समस्या उत्पन्न होगी। एक जगह जमा किया हुआ पानी अमर्यादित होकर बाढ़ के रूप में उफनने लगेगा और आपके निजी खेत खलिहानों को ही डुबो देगा। बहती हुई हवा कितनी सुरभित है पर उसे आप अपने ही पेट में भरना चाहेंगे तो पेट फूलेगा, फटेगा। औचित्य इसी में है कि जितनी जगह फेफड़े में है, उतनी ही सांस लें और बाकी हवा दूसरों के लिए छोड़ दें। मिल-बांटकर खाने की यह नीति ही सुखकर है।




भक्त के लिए ईश्वर का उपहार - Akhandjyoti January 1985

ईश्वर अपने हर भक्त को एक प्यार भरी जिम्मेदारी सौंपता है और कहता है इसे हमेशा सम्भाल का रखा जाय। लापरवाही से इधर-उधर न फेंका जाय। भक्तों में से हर एक को मिलने वाली इस अनुकम्पा का नाम है- दुःख। भक्तों को अपनी सच्चाई इसी कसौटी पर खरी साबित करनी होती है।

दूसरे लोग जब जिस-तिस तरीके से पैसा इकट्ठा का लेते हैं और मौज-मजा उड़ाते हैं तब भक्त को अपनी ईमानदारी की रोटी पर गुजारा करना होता है। इस पर बहुत से लोग बेवकूफ बताते हैं न बनायेंगे तो भी उनकी औरों के मुकाबले तंगी की जिन्दगी अपने को अखरती, और यह सुनना पड़ता है कि भक्ति का बदला खुशहाली में क्यों नहीं मिला। यह परिस्थितियाँ सामने आती हैं। इसलिए भक्त को बहुत पहले से ही तंगी और कठिनाई में रहने का अभ्यास करना पड़ता है। जो इससे इनकार करता है उसकी भक्ति सच्ची नहीं हो सकती। जो सौंपी हुई अमानत की जिम्मेदारी सम्भालने से इन्कार करे उसकी सच्चाई पर सहज ही सन्देह होता है।

दुनिया में दुःखियारों की कमी नहीं। इनकी सहायता करने की जिम्मेदारी भगवान भक्त जनों को सौंपते हैं। पिछड़े हुए लोगों को ऊंचा उठाने का काम हर कोई नहीं सम्भाल सकता। इसके लिए भावनाशील और अनुभवी आदमी चाहिए। इतनी योग्यता सच्चे ईश्वर भक्तों में ही होती है। करुणावान के सिवाय और किसी के बस का यह काम नहीं कि दूसरों के कष्टों को अपने कन्धों पर उठाये और जो बोझ से लदे हैं उनको हलका करें। यह रीति-नीति अपनाने वाले को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

ईश्वर का सबसे प्यारा बेटा है ‘‘दुःख’’। इसे सम्भाल कर रखने की जिम्मेदारी ईश्वर अपने भक्तों को ही सौंपता है। कष्ट को मजबूरी की तरह कई लोग सहते हैं। किन्तु ऐसे कम हैं जो इसे सुयोग मानते हैं और समझते हैं कि आत्मा की पवित्रता के लिए इसे अपनाया जाना आवश्यक है।

जो सम्पन्न हैं, जिन्हें वैभव का उपयोग करने की आदत है उन्हें भक्ति रस का आनन्द नहीं मिल सकता। उपयोग की तुलना में अनुदान कितना मूल्यवान और आनंददायक होता है, जिसे यह अनुभव हो गया वह देने की बात निरन्तर सोचता है। अपनी सम्पदा, प्रतिभा और सुविधा को किस काम में उपयोग करूं इस प्रश्न का भक्त के पास एक ही सुनिश्चित उत्तर रहता है दुर्बलों को समर्थ बनाने, पिछड़ों को बढ़ाने और गिरों को उठाने के लिए। इस प्रयोजन में अपनी विभूतियाँ खर्च करने के उपरान्त संतोष भी मिलता है और आनन्द भी होता है। यही है भगवान की भक्ति का प्रसाद जो ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ के हिसाब से मिलता रहता है।

भक्त की परीक्षा पग-पग पर होती है। सच्चाई परखने के लिए और महानता बढ़ाने के लिए। खरे सोने की कसौटी पर कसने और आग पर तपाने में उस जौहरी को कोई एतराज नहीं होता जो खरा माल बेचने और खरा माल खरीदने का सौदा करता है। भक्त को इसी रास्ते से गुजरता पड़ता है। उसे दुःख प्यारे लगते हैं क्योंकि वे ईश्वर की धरोहर हैं और इसलिए मिलते हैं कि आनन्द, उल्लास, संतोष और उत्साह में क्षण भर के लिए भी कमी न आने पाये।




Quotation - Akhandjyoti January 1985

लोग धर्म के लिए झगड़ते हैं, लिखते हैं, बोलते हैं, खर्च करते व समय लगाते हैं। पर आश्चर्य है कि धर्म शिक्षाओं के अनुरूप जीवन नहीं जीते।




प्रार्थना बनाम याचना - Akhandjyoti January 1985

प्रार्थना और याचना शब्दार्थ की दृष्टि से लगभग समान मालूम पड़ते हैं, पर तत्त्वतः दोनों के बीच जमीन आसमान जैसा अन्तर है। प्रार्थना आत्म निवेदन को कहते हैं। अपने आपको नितान्त विश्वास पात्र आत्मीय जन के सम्मुख रख देना, खरे-खोटे का बिना पूछे इजहार करना प्रार्थना है। इसमें याचना का कुछ अंश रहता है तो इतना कि खोटेपन को हटा दें और खरेपन को बढ़ा दें ताकि परमेश्वर की पवित्रता में अपने आप से मिला सकने की, घुला सकने की स्थिति बन जाय। समान स्तर की वस्तुएँ परस्पर मिल जाती हैं। भिन्नता रहने पर विलगाव ही बना रहता है। दूध में पानी मिल जाता है। घटिया बढ़िया होते हुए भी दोनों के अणुओं का वजन और स्तर एक ही है। दूध में बालू नहीं मिल सकती। मिला देने पर नीचे बैठ जाती है क्योंकि दोनों के परमाणुओं के वजन में अन्तर है।

दो के एक में मिल जाने पर दोनों का स्तर एक हो जाता है। परमात्मा में आत्मा का मिलन सम्भव हो सके इसका उपाय एक ही है दोनों का स्तर एक हो जाय। जीव के साथ कषाय-कल्मष, माया, मोह मिल जाते हैं फलतः दोनों की एकता कठिन पड़ती है। एकता के बिना समानता का आनंद नहीं आता। द्वैत को मिटाकर अद्वैत की स्थिति बनाने के लिए समर्पण आवश्यक है। ईंधन घटिया होता है तो भी आग के साथ लिपट जाने पर वह भी अग्नि बन जाता है। नाला तब नदी बनता है जब अपने आपको पूरी तरह उसमें समर्पित कर देता है। पत्नी और पति की एकता के सम्बन्ध में भी यही बात है। यह समर्पण बन पड़े तो एकता में जो व्यवधान रह जाता है वह न रहे। यही प्रार्थना का प्रयोजन है। वह विशुद्ध आध्यात्मिक होती है। आत्म निवेदन उसे इसीलिए कहा गया है। प्रार्थना में याचना का अंश इतना ही है कि परमेश्वर समर्थ है। वह बाँह पकड़कर छोटे को ऊपर उठा सकता है। जिन कारणों से आत्मा का समर्पण, मिलन परमात्मा के साथ नहीं हो पाता, उन व्यवधानों को हटा देने का अनुग्रह करने की याचना की गई है। यों नाला नदी में मिलने को मिल ही पड़े तो नदी उसे दुत्कार थोड़े ही सकती है, पर रहने में शोभा इसी में बढ़ती है कि नदी अनुग्रह करके नाले को अपने में मिला ले। समर्पण तो पत्नी का ही असली होता है, पर कहने को यही कहा जाता है कि पति ने पाणिग्रहण किया, माथे में सिन्दूर भरा, अपनाया। यों अपना कुटुम्ब, घर छोड़कर पत्नी ही पति के साथ जाती है। यह समर्पण तुच्छ स्वार्थों के कारण अधूरा रह जाता है। इस अधूरेपन को परमेश्वर दूर कर दे– अग्नि ईंधन को अपने समान बना ले, प्रार्थना इन्हीं शब्दों में उपयुक्त है।

अग्नि देवता है। ईंधन सस्ते मोल का है। इसलिए बड़प्पन का ध्यान रखते हुए अग्नि की ही कृपा समझी जाती है कि उसने ईंधन को अपनी सारी विशेषताएं दे दीं। असल में जलता तो ईंधन है। आग के ऊपर गिरता वही है। समर्पण उसी का है। यह समर्पण सार्थक बने इसके लिए आत्मा परमात्मा से प्रार्थना करती है ताकि द्वैत रहने न पाये। लकड़ी इतनी गीली न रहे कि अग्नि को उसे आत्मसात करने में अड़चन पड़े। प्रार्थना इससे कम स्तर की नहीं हो सकती इससे ज्यादा कुछ सोचने या करने की भी आवश्यकता नहीं है।

याचना शब्द भिक्षा के, चिरौरी के अर्थ में प्रयोग होता है। भिक्षा भौतिक वस्तुओं की माँगी जाती है। भिखारी दरवाजे-दरवाजे पर रोटी के टुकड़े माँगते हैं अथवा अनाज आटे की एक मुट्ठी। इनकी इज्जत भी कोई नहीं करता। पत्नी को पालकी में बिठाकर लाया जाता है। सोने चाँदी के जेवरों से लादा जाता है, ग्रह प्रवेश के समय मंगलाचरण गाया जाता है। पर वेश्या को इनमें से एक भी सम्मान या उपहार नहीं मिलता। वरन् आये दिन का झंझट होता रहता है। भड़ुआ कम देकर मतलब गाँठना चाहता है और वेश्या इस फिकर में रहती है कि जो मिला है उसे कम बताया जाय और अधिक पाने के लिए रूठने-मटकने का ढोंग दिखाया जाय।

भिखारी का, वेश्या का उदाहरण याचना का स्वरूप प्रकट करता है। याचक पूजा−पाठ करते तो हैं, पर उनका असली प्रयोजन मनचाही वस्तुएँ प्राप्त करना होता है। यह अनुचित भी है और अनैतिक भी। सो इसलिए कि मनुष्य को समर्थ शरीर और विशिष्ट बुद्धिबल दिया गया है। यह दोनों मिलाकर इतने भारी हो जाते हैं कि उनके माध्यम से मनुष्य जीवन की सभी उचित आवश्यकताएँ भली−भांति पूरी की जा सकती हैं। कोई इन दोनों का समुचित प्रयोग न करने पर भी नाना प्रकार के मनोरथ करे और इन्हें पूरा करने के लिए याचना की तरकीब भिड़ाये तो उसे अनैतिक ही कहा जायेगा। जितना पराक्रम है, उसके बदले जितना मिलता है उसमें संतोष करने का औचित्य है। अधिक चाहना है तो अधिक मेहनत की जाय और अधिक जुटाये जाँय, तो जो चाहा गया है मिलेगा। जो पूजा−पाठ नहीं करते, नास्तिक हैं, वे भी अपनी अभीष्ट वस्तुएँ उपयुक्त मेहनत के बलबूते प्राप्त करते हैं। फिर भजन करने वालों को ही क्या ऐसी पोल हाथ लगी है कि उलटी-पुलटी माला घुमाकर ऐसे मनोरथ पूरे करायें जिनका मूल्य चुकाने के लिए योग्यता, मेहनत, अक्ल और साधनों का उपयुक्त मात्रा में नियोजन करना पड़ता है।

देवता को प्रसन्न करने के लिए बार-बार नाम रटना और साथ ही पुष्प, अक्षत जैसे सस्ते उपहार भेंट करना किसी भक्ति भावना का चिन्ह नहीं है। यह तो जेबकटी का, चापलूसी का धंधा हुआ। भीख माँगने वाले छोटी वस्तु माँगते हैं और इस बात के लिए तैयार रहते हैं कि मुफ्तखोरी के लिए दुत्कारे भी जा सकते हैं। उतना मिलेगा ही या मिलना ही चाहिए, इसे अपना अधिकार नहीं मानते।

किंतु जेबकटों की तरकीब दूसरी है, वे जिसके पास जो कुछ देखते हैं, उसी पर ब्लेड चला देते हैं। जब ले आते हैं तो कहते हैं मुफ्त में थोड़े ही लाये हैं। जेब काटने की चतुराई का प्रयोग करना पड़ा है। मनोकामना की पूर्ति में जो पूजा−पाठ करना पड़ा, उसे याचना नहीं जेबकटी की संज्ञा दी जायेगी।

‘‘भगवान बड़े दयालु हैं, जो माँगो वही देते हैं।’’ यदि यही बात सही रही होती तो संसार में से पुरुषार्थ समाप्त हो गया होता और हर कोई पूजा प्रार्थना करके, जो चाहे वही प्राप्त कर लिया करता। फिर पुरुषार्थ के झंझट में कोई क्यों पड़ता? इस दृष्टि से वे लोग मूर्ख रहे जो कर्मफल की बात सोचते हैं और इतनी सस्ती लूटमार का फायदा नहीं उठाते।

सस्ते मूल्य में सारी कठिनाइयों का दूर हो जाना और अभीष्ट मनोकामनाओं का पूरा होना आदि से अंत तक गलत है। यदि ऐसा ही क्रम चला होता तो संसार में न कोई दुःखी रहता और न अभावग्रस्त पाया जाता। तब हर आदमी ने यह सस्ती तरकीब सीखकर सम्पत्ति के भण्डार भर लिये होते और कठिनाइयों को चुटकी बजाते हल कर लिया होता।

धूर्तों और मूर्खों की यह मनगढ़ंत मान्यता है कि इस देवी देवता का इस विधि से हलका-फुलका पूजा−पाठ करके मनोरथ पूरे हो सकते हैं। यदि हो गये हों तो इस संसार में अकर्मण्यता और अनैतिकता का ही बोलबाला रहा होता। सज्जन कहीं दिखाई नहीं पड़ते। ईश्वर के नाम पर भ्रान्तियों का फैलना निश्चय ही दुःख दायक है।

ईश्वर से केवल प्रार्थना की जाती है। प्रार्थना माने आत्म निवेदन। अपने को श्रेष्ठ, पवित्र, कर्मठ, नैतिक बनाने के लिए ईश्वर की सहायता माँगना सच्ची प्रार्थना है। सच्चे मन से की गई ऐसी सच्ची प्रार्थना सार्थक फलदायी भी होती है।




Quotation - Akhandjyoti January 1985

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्। शेषाः स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥ -महाभारत वनपर्व

नित्य अगणित मनुष्य मृत्यु के मुख में प्रवेश कर रहे हैं–यह देखते हुए भी बचे प्राणी न जाने क्यों यह सोचते हैं कि हम तो सदा बने ही रहेंगे। इससे बढ़कर आश्चर्य की बात और क्या हो सकती है?




साध्य, साधना और साधक - Akhandjyoti January 1985

साध्य, साधना और साधक इन तीनों की संगति है। तीनों के समन्वय से एक पूरी बात बनती है।

साध्य ईश्वर है। ईश्वर अर्थात् सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय। मोक्ष की भी इसी में गिनती होती है। दुष्प्रवृत्तियां ही बंधन हैं। भव बन्धनों की चर्चा जहाँ होती है वहाँ उसका तात्पर्य कषाय-कल्मषों से है। कषाय अर्थात् पूर्व जन्मों के अभ्यस्त संस्कार, कल्मष अर्थात् प्रस्तुत ललक लिप्साओं को आकर्षण से किये हुए दुरित। इनसे छुटकारा पाने का नाम मोक्ष है।

यह मान्यता सही नहीं है कि जन्म मरण से छूट जाने का नाम मोक्ष है। जन्म, अभिवर्धन और मरण यह प्रकृति का नियम है। ईश्वर की सत्ता इस प्रकृति क्रम को इसी निमित्त बनाती है। जीव जन्तु, वृक्ष वनस्पति से लेकर मानव शरीर धारियों तक, प्रत्येक को इस चक्र में अनिवार्यतः भ्रमण करना पड़ता है। अवतारी महामानव भी बार-बार जन्म लेते और मरते हैं। अवतारों की संख्या अब दस या चौबीस हो चुकी है। इनमें से सभी को अपने-अपने ढंग से जन्म लेना और मरना पड़ा है। सृष्टि चक्र में जो भी बँधा है उसे उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन के क्रम में घूमना ही पड़ता है। सूक्ष्म शरीर धारियों को भी एक अवधि के लिए नियत उत्तरदायित्व संभालने के लिए भेजा जाता है उसे पूरा करने के उपरांत वे भी वापस लौट जाते हैं और आवश्यकतानुसार उसी क्रम की पुनरावृत्ति करते रहते हैं। जब अवतारों और देवताओं को आवागमन की प्रक्रिया पूर्ण करनी पड़ती है, तो भक्तजनों के लिए ही उसका अपवाद कैसे हो सकता है।

मोक्ष का तात्पर्य कषाय-कल्मषों से छुटकारा पाना है। इसी को ईश्वर की प्राप्ति कहते हैं। यह इस जीवन की सर्वोपरि परिस्थिति है, जिसमें निरन्तर सत् का, चित का और आनन्द का अनुभव होता रहता है। ईश्वर का स्वरूप भक्त के लिए सच्चिदानन्द स्वरूप ही है। इसी में उसे कषाय-कल्मषों से छुटकारा मिलता है। कर्म बन्धन से बलात् बंधकर जन्म-मरण के चक्र में फँसना बन्दी की तरह कष्टकारक भी हो सकती है। पर जो ईश्वर की इच्छा से उसकी व्यवस्था संभालने के लिए जेलर की तरह आता जाता रहता है उसके लिए, ईश्वर के इस स्वर्गोपम उद्यान का आनन्द लेने के लिए बार-बार आने-जाने का अवसर प्राप्त करना सुख भी है और सौभाग्य भरा भी।

ईश्वर की किसी मनुष्य आकृति के प्राणी के रूप में कल्पना मिथ्या है। इसी प्रकार उसका कोई नगर गाँव लोक होना भी सम्भव नहीं है। जो सर्वव्यापी है वह एक देशी नहीं हो सकता। जो शक्ति रूप है वह किसी गाँव देश में रहे ऐसी मान्यता भी विसंगत है। ईश्वर एक व्यवस्था है। भावनाशीलों के लिए उसकी भावना के अनुरूप भी। इसलिए मरने के बाद मोक्ष मिलने की कल्पना निरर्थक है उसे भावनाशील जीवित स्थिति में भी प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर प्राप्ति के लिए मरने तक का इन्तजार करना व्यर्थ है। सगुण भक्तों ने भी जीवित स्थिति में भगवान को पाया है। निराकार वादियों के लिए तो वह और भी सरल है-

‘‘दिल के आइने में है तस्वीरें यार-- जब जरा गरदन झुकाई देख ली।’’

अपना अन्तरात्मा ही शुद्ध होने की स्थिति में परमात्मा हो जाता है। उससे सबसे निकट देखना हो सबसे सरलता पूर्वक देखना हो तो अपने शुद्ध अन्तःकरण में ही उसकी झाँकी करनी चाहिए।

साधना में साध्य एक ही है- ईश्वर प्राप्ति। इसी को मोक्ष कहना हो तो भी कुछ हर्ज नहीं। इसे प्राप्त करते ही साधक अज्ञान, अभाव और अशक्ति जन्म समस्त दुःख दरिद्रों से छूट जाता है। सच्चिदानन्द के साथ एकीभूत हो जाता है। अपनी और ईश्वर की स्थिति में भिन्नता नहीं रहती।

साध्य को समझ लेने के बाद साधना का स्वरूप समझने की आवश्यकता है। जो साधना करने लगे, उसमें रस आने लगे समझना चाहिए कि वह साधक हो गया। जो साधक है वही सिद्ध है। ईश्वर के संपर्क में आने पर उसके गुण भी अनायास ही आ जाते हैं। अग्नि के साथ ईंधन का संपर्क सुदृढ़ हो जाने पर जो गुण आ गये हैं वही ईंधन में भी पैदा हो जाते हैं। ईश्वर सिद्धियों का भण्डार है उसके साथ संपर्क साधने वाला साधक सिद्ध ही होकर रहता है।

साधना के लिए दो कार्य करने होते हैं एक योग दूसरा तप। योग का अर्थ है अपने दृष्टिकोण की उत्कृष्टता को साथ जोड़ देना। तप का अर्थ है ललक लिप्साओं की अवाँछनीय आदतों को बलपूर्वक खींच-घसीटकर सीधे रास्ते पर लाना।

मनुष्य का चिन्तन शरीराभ्यास के साथ बुरी तरह गुँथ जाता है। अपने को निरन्तर शरीर समझता है। शरीरगत सुख ही उसके सुख और शरीरगत दुःख ही उसके दुःख बन जाते हैं। इन्द्रियजन्य वासनाएं और मनोगत तृष्णा से इन्हीं दो की पूर्ति में शरीर लगा रहता है। इन दो के अतिरिक्त तीसरी है- अहंता। सारे सुखों का केन्द्र इन तीन में केन्द्रीभूत रहता है। इन्हीं की पूर्ति के लिए निरन्तर सोचने और करने की क्रिया चलती रहती है। आत्मा सूझ ही नहीं पड़ती। शरीर के भीतर जो है वह सूझता नहीं उसकी आवश्यकताओं और इच्छाओं की ओर ध्यान ही नहीं जाता। दृष्टिकोण के इस पृथक्करण को योग कहते हैं। योगी को अपनी दृष्टि शरीर से हटाकर आत्मा के साथ जोड़नी पड़ती है। एक ओर से खींचकर दूसरी ओर जोड़ने का नाम योग है। यह चिन्तन क्षेत्र को उलट देता है। इसके लिए आत्मचिन्तन में निरति पकानी पड़ती है। शरीर और आत्मा का भेद समझना पड़ता है। शरीरजन्य इन्द्रियाँ, मनोजन्य तृष्णाएं कितनी आकर्षक और कितनी अभ्यस्त होती हैं? उनसे मन को विरत करके यथार्थता को समझना यही आत्मज्ञान है, आत्मज्ञान होने पर तीसरा नेत्र खुल जाता है और निरर्थक के लिए मरते-खपते रहने, सार्थक की ओर से मुँह मोड़े रहने का अन्तर समझ में आता है। इसी का नाम योग है। इस दृष्टिकोण के परिवर्तन को ही अन्तर का कायाकल्प कहते हैं। योगी की स्थिति संसारी से बिलकुल विपरीत होती है। योगी को आत्मा का हित ही अपेक्षित होता है जबकि भोगी को वासना, तृष्णा और अहंता के अतिरिक्त चौथा कुछ सूझता ही नहीं। साधना का वास्तविक अर्थ योग साधना है। योग का अर्थ है भोग से विरत्ति। चिन्तन को एक ओर से खींच कर दूसरी ओर नियोजित करने का नाम योग है। इसमें आंखें मूँद कर अंतर्मुखी होना पड़ता है और जो भीतर है, उसके कल्याण की साधना करनी पड़ती है।

तप योग का दूसरा पक्ष है। विचार कर्म में समाविष्ट हो जाते हैं। वे आदतों का रूप धारण कर लेते हैं और अभ्यास बनकर कार्यान्वित होने लगते हैं। कामुकता के विचार मात्र मस्तिष्क में ही नहीं घूमते। वरन् यौनाचार बनकर क्रियान्वित भी होते हैं। मर्यादा न रह कर मर्यादाओं का उल्लंघन करते हैं। व्यभिचार के रूप में परिणति होने लगता है। लोभ मात्र धन इच्छा तक ही सीमित नहीं रहता। वरन् चोरी बेईमानी, छल, प्रपंच आदि के रूप में जैसे बने वैसे धन संग्रह में लग जाता है। आरम्भ में मन कुछ हिचकिचाता भी है पीछे अभ्यास में आई हुई आदतें उसे स्वाभाविक मान लेती है। अहंकार प्रदर्शन के लिए श्रृंगार, ठाट-बाट में ढेरों पैसा खर्च होने लगा है और अपने को दूसरों से बड़ा सिद्ध करने के लिए आतंकवादी कार्य किये बिना चैन नहीं पड़ता। नीति, अनीति का विचार मन में से चला जाता है और अनीति करते हुए अपनी चतुरता एवं सफलता मालूम पड़ने लगती है।

इन आदतों को सहज ही नहीं छुड़ाया जा सकता है। अपने आप से लड़ना पड़ता है। कुटेवों को निरस्त करने के लिए अपने साथ सख्ती बरतनी पड़ती है। सख्ती हर किसी को अखरती है इसलिए अभ्यास डालने के लिए हर इन्द्रिय को व्रतशील बनाना पड़ता है। स्वादेंद्रियों को संयम में लाने के लिए व्रत, आधा वस्त्र, अस्वाद का एक क्रम बनाकर तपश्चर्या करनी पड़ती है। ब्रह्मचर्य में कड़ाई बरतनी पड़ती है। दानशीलता अपनानी होती है ताकि लोभ पर अंकुश लगे। चिंतन को स्वाध्यायशील बनाना होता है ताकि उतना समय शरीराभ्यास की विडम्बनाओं में से कटे। सर्दी-गर्मी सहन करने के अभ्यास डालने पड़ते हैं ताकि त्वचा को सहनशीलता की आदत पड़े। अभाव-ग्रस्तता गरीबी का चिन्ह माना जाता है, पर जब उसे व्रतशीलता में सम्मिलित किया जाता है। तो वर्ग गौरव का निमित्तिकरण बन जाता है। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनाने में आदर्शवादिता चरितार्थ होती है।

विभिन्न साधनाओं में विभिन्न व्रत नियमों का समावेश है। कुछ नियम थोड़े समय के लिए पालन किये जाते हैं। कुछ को सदा के लिए अपना लिया जाता है। जैन धर्म के साधु साध्वी कठोर नियमों का व्रतधारण करते हैं और उन्हें आजीवन निबाहते हैं। हिमालय कन्दराओं में निवास करना, कन्दमूल फल के आहार पर गुजारा करना, भूमि पर सोना जैसे नियम कितने ही साधु पालन करते हैं। इन तपश्चर्याओं के पीछे वही उद्देश्य छिपा हुआ है कि विलासिता की आदतों को निरस्त किया जा सके और सादा जीवन उच्च विचार की साधना को ऊँचे स्तर तक-लम्बे समय तक निबाहा जा सके। यह शरीराभ्यास की लिप्साओं से सम्बन्धित पड़ी हुई आदतों को धीरे-धीरे अथवा एक ही झटके में समाप्त किया जा सके। शरीर के साथ सख्ती बरतना-मन के ऊपर कठोर अंकुश लगाना, तपश्चर्या का उद्देश्य है। यह योग का पूरक है। मन में शुभ चिन्तन और व्यवहार में कठोर संयम की दोनों ही व्यवस्था बना लेने से मन की उच्छृंखलता काबू में आती है।

साध्य निश्चित हो जाने-साधना निरत रहने के साथ ही व्यक्ति अपने आपको साधक अनुभव करता है और कहता भी है। यह प्रतिष्ठा का प्रश्न है। प्रकट या अप्रकट घोषणा करने के उपरान्त व्यक्ति को अपनी प्रतिष्ठा का ध्यान रहता है कि हमने अपने बारे में जो घोषणा की है उसे निभाया भी जाय। उसे तोड़ने पर अप्रतिष्ठा होगी। मनुष्य का सम्मान बहुमूल्य है। उसे भले आदमी गिरने बिगड़ने नहीं देते। साधक होना छोटी बात नहीं बड़ी बात है। हम साधक हैं, यह घोषित करना ऐसा ही है जैसे अपने का सरपंच, न्यायाधीश,महामहोपाध्याय आदि के रूप में जनता को परिचित कराना। उसके व्रतों को पालना ही चाहिए तोड़ने में उपहास होता है। प्रतिष्ठित व्यक्ति अपना उपहास नहीं होने देते।

साध्य कौन?, ईश्वर- साधना किस प्रकार? तप और योग द्वारा। साधक बनना याने अपने को प्रतिष्ठित व्रतशील घोषित करके जिसके सम्मान की रक्षा होनी ही चाहिए। यह तत्त्वदर्शन जिसके समझ में आ जाए उसका जीवन सार्थक जो जाता है।




शकडाल भाग्यवादी (kahani) - Akhandjyoti January 1985

शकडाल भाग्यवादी था। वह पुरुषार्थ की उपेक्षा करता और हर बात में भाग्य की दुहाई देता। जाति का वह कुम्भकार था। उस दिन वह अपने विश्वास की पुष्टि कराने भगवान महावीर के पास पहुँचा और अपनी मान्यता के समर्थन में उनका अभिमत प्राप्त करने की हठ करने लगा।

भगवान ने उससे उलटकर कुछ प्रश्न किये, कोई तुम्हारे बनाये बर्तन को तोड़-फोड़ करने लगे तो? कोई तुम्हारी पत्नी का शील भंग करने लगे तो? कोई तुम्हारे धन का अपहरण करने लगे तो? क्या करोगे। चुप बैठे रहोगे न?

शकडाल ने कहा-देव, ऐसा अनाचार सहन नहीं हो सकेगा, मैं उसके साथ लड़ पड़ूंगा और अच्छी तरह खबर लूँगा।

भगवान ने कहा- तो फिर तुम्हारा भाग्यवाद कहाँ रहा? मान्यता तो तब सही होती जब तक सब कुछ होते देखकर भी चुप बैठे रहते यहाँ तक कि बर्तन बनाने और रोग की चिकित्सा तक न करते। शकडाल समझ गया कि भाग्यवाद का सिद्धान्त निरर्थक है। पुरुषार्थ ही सब कुछ है। कर्म ही भाग्य बनता है।




अदृश्य सिद्ध पुरुष - Akhandjyoti January 1985

एक महात्मा थे। योगाभ्यास और तपश्चर्या के प्रति उनकी गहरी निष्ठा थी। संयम पालते और मन को एकाग्र बनाकर अंतर्मुखी रखते। जैसे गुण, कर्म और स्वभाव की दृष्टि ने एक सन्त को जैसा होना था, वैसे ही थे।

चौबीस वर्ष की अवधि पूरी हुई। महामन्त्र के अनुष्ठान पूरे हुए। साधना सिद्धि के निकट पहुँच गई। रात्रि को गणेश जी ने दर्शन दिये। कहा तुम्हारी साधना सफल हो गई। देवाधि देव शिवजी बहुत प्रसन्न हैं। उन्होंने मुझे भेजा है और पूछा है जो अभीष्ट हो वरदान माँगें।

तपस्वी ने कहा- मैंने वरदान के लिए साधना थोड़े ही की है। मैं तो अंतःकरण पर चढ़े कषाय-कल्मष धो रहा था और इस योग्य बनने जा रहा था कि स्वच्छ आत्मा में परमात्मा के दर्शन कर सकूँ? सो वह स्थिति जब आ जायेगी समझूँगा वरदान मिल गया।

गणेश जी समझाने लगे, साधक के पास सिद्धियां होनी चाहिए ताकि उसे आत्म-विश्वास हो और लोग उसकी विभूतियों का दर्शन करें। इससे लोगों का श्रद्धा विश्वास बढ़ता है। साथ ही कई उपकार भी बन पड़ते हैं। सो आप सिद्धियों के वरदान माँग लें। देवाधि देव इससे अप्रसन्न नहीं होंगे।

तपस्वी ने अत्यन्त नम्रतापूर्वक कहा- इससे मेरा अहंकार बढ़ेगा। अनेकों प्रशंसा करेंगे। कोई प्रत्युपकार भी देना चाहेंगे। देवाधि देव के स्थान पर मेरी पूजा प्रशंसा होने लगेगी। इससे लक्ष्य तक पहुँचने में भटकाव पैदा होगा।

गणेश जी निरुत्तर हो गये। संत का कथन आदर्शों से भरा-पूरा था। इतने ऊँचे साधक से पहले उनकी भेंट नहीं हुई थी। सो वे सीधे कैलाश आसुतोष भगवान के पास पहुँचे और वार्तालाप का सारांश कह सुनाया। जो आप्त काम है उसे क्या दिया जाय?

अबकी बार शंकर भगवान स्वयं चल पड़े और बोले इसमें दाता की अवज्ञा होती है। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त कटता है। तुम अपने लिए न सही, लोकहित के लिए ही सही। कुछ तो माँग ही लो। हमें देते हुए प्रसन्नता होगी।

साधक बहुत देर विचार करता रहा। इष्ट देव की अवज्ञा न हो और मेरा अहंकार न बढ़े। कोई मध्यवर्ती मार्ग ढूंढ़ने में वह माथा पच्ची करने लगा।

समय तो लगा पर मार्ग मिल गया। साधक ने माँगा- मेरी छाया जहाँ भी पड़े कल्याण ही कल्याण होता चले।

देवाधि देव मुसकराये और तथास्तु कहकर चले गये।

सन्त की छाया जहाँ भी पड़ती सूखे पेड़ हरे हो जाते। तालाब पानी से भर जाते। रोगियों की काया चंगी हो जाती। कष्ट ग्रस्तों के संकट छूट जाते। उदासों के चेहरे पर मुस्कान फूटने लगती।

यह सब होता रहता, पर सन्त की दृष्टि आगे ही रहती। वे मुड़कर पीछे की ओर न देखते और उनकी वजह से किसी का कुछ भला हुआ है या नहीं, यह भी न देखते।

जिनका कल्याण होता वे जिस-तिस से पूछताछ करते कि वह देवता कौन है? वह सिद्ध पुरुष कहाँ है, जिसके अनुग्रह से हमारा इतना कल्याण हुआ। उसके लिए कृतज्ञता तो व्यक्त कर दें। कोई दूसरा पूछे तो उसे उस देवात्मा का नाम-पता तो बता दें।

पता किसका बताया जाता। संत आगे बढ़ते चले जाते। छाया भी रुकती नहीं थी। लोग पूछते तो बताते- संध्या तक छाया के सहारे चलेंगे और रुकने पर जहाँ रुकेंगे उसी के यहाँ ठहरेंगे।

सिद्धि व छाया हमेशा उनके साथ बनी रही। लोकेषणा से विरक्ति होना ही महामानव की विशेषता है। वे अपने साथ अनेकों को पार लगा देते हैं पर उद्घोष नहीं करते फिरते, न बाजीगरी ही दिखाते हैं।




चेतन सत्ता के भिन्न-भिन्न आयाम - Akhandjyoti January 1985

मानवी सत्ता में अंतर्निहित दिव्य शक्तियों का विभाजन छः वर्गों में किया गया है। इनमें से एक ऐसी है जो काय-कलेवर को स्थिर एवं गतिशील बनाये रहने में काम आती है। शेष पाँच ऐसी हैं, जिनको भौतिक जगत के लोक-लोकान्तरों के विविध प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जाता है। इसलिए वर्गीकरण में कहीं पाँच का, कहीं छः का उल्लेख होता हो तो उसमें किसी भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। गणना दोनों ही प्रकार से सही है।

कोशों के आधार पर जब गणना होती है तो पंचकोश कहे जाते हैं। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमयकोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश। यह पाँच हैं। शरीर जिन तत्वों से बना है वे भी पाँच ही हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन, आकाश। चेतना को प्राण कहते हैं। इनका वर्गीकरण भी पाँच में ही होता है। प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान। देवताओं की संख्या 33 कोटि या तैंतीस है। पर उनमें प्रख्यात पाँच ही हैं। ब्रह्म, विष्णु, महेश, गणेश और दुर्गा और भी कितने ही पंचक प्रसिद्ध हैं। पंचामृत, पंचगव्य, पंचरत्न, पंचांग आदि।

जहाँ छः की गणना है, वहाँ षट्चक्रों का उल्लेख है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञाचक्र एवं सहस्रार। सहस्रार चेतना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। शेष पाँच को विभूतियों के रत्न भाण्डागार माना जाता है। ऋद्धि सिद्धियों के स्रोत इन्हीं में हैं। पौराणिक गाथाओं में गणेश के उपरान्त दूसरे हैं- शनि देव। जिन्हें षडानन भी कहते हैं। षडानन अर्थात् छः मुख वाले। यह प्रकारान्तर से षट्चक्र ही है। पुराणों के अनुसार इनका भरण-पोषण छः कृतिकाओं (अग्नियों) ने मिल-जुलकर अत्यंत सतर्कता पूर्वक किया था। इन सबको मानवी चेतना का विभिन्न प्रयोजनों में प्रयुक्त होने वाला वर्गीकरण ही समझा जाना चाहिए।

एक दूसरे वैज्ञानिक विभाजन के अनुसार इन्हें लोक विशेष कहा गया है। लोकों के सम्बन्ध में एक पुरातन मान्यता ग्रह नक्षत्र स्तर के स्थान विशेष भी हो पर वह परिकल्पना ठीक नहीं बैठती। ग्रह नक्षत्रों की संख्या अरबों-खरबों है उनमें से देव, असुर आदि के- ऊपर या नीचे स्थित लोक किन्हें माना जाय? इस आधार पर संगति बिठाने से खगोल विज्ञान के अनुरूप कोई क्रम नहीं बैठता।

इस संदर्भ में थियोसाफी के आत्म विद्या विशारदों के अनुरूप की गई व्याख्या अधिक युक्ति संगत है। उस स्थापना में ब्रह्मांड और पिण्ड को तत्सम माना गया है। और चेतना के आयामों को लोक की संज्ञा दी है। सातवाँ परमात्मा का निवास स्थल है। छः में आत्मा का विस्तार है। इन छः लोकों को छः शरीर भी कहा गया है। (1) फिजीकल बाडी (2) ईथरिक डबल (3) मेण्टल बाडी (4) कॉजल बाडी (5) एस्ट्रल बाडी (6) कास्मिक बाडी।

जिस प्रकार भारतीय अध्यात्म में स्थूल, सूक्ष्म और कारण यह तीन शरीर मानें जाते हैं उसी प्रकार आधुनिक अध्यात्म विज्ञानियों ने उन्हें उपरोक्त छः शरीरों में विभाजित किया है। वे लोक शब्द में किसी ग्रह नक्षत्र जैसे स्थान विशेष की संगति नहीं बिठाते वरन् आत्म सत्ता को परिस्थिति विशेष गिनते हैं। जो व्यक्ति अपनी मान्यता, भावना, आकांक्षा, विचारणा के अनुरूप इनमें से जिस स्तर होता है उसे उसी लोक का निवासी कहा जाता है। स्थिति बदलती रहती है। इस आधार पर मनुष्य के आवरण, आयाम या लोक भी ऊँचे नीचे होते रहते है।

तात्पर्य यह कि तीन शरीर, पाँच कोश एवं छः लोक यह सभी चेतना के स्तर विशेष हैं। साधना के आधार पर- पूर्व संग्रहित संस्कारों से तथा दिव्य अनुदानों से इनकी स्थिति ऊँची-नीची होती रहती है। इन्हीं का विस्तार अगले पृष्ठों पर किया गया है।




सूक्ष्म शरीर के पाँच कोश एवं उनका वैज्ञानिक विवेचन - Akhandjyoti January 1985

ब्रह्मांडीय चेतना के एक क्षुद्र घटक मानवी काया में जो अभूतपूर्व विलक्षण सामर्थ्य छिपी पड़ी है, उसका परिचय पंचकोशों की रहस्यमयी फलश्रुतियों के रूप में देखने को मिलता है। यह उस विराट् की एक झलक झाँकी भर है। यदि इन्हीं घटकों को विकसित समुन्नत बनाया जा सके तो महाप्राण के इस विशाल महासागर से अपना संपर्क सूत्र जोड़कर ऋद्धि सिद्धियों को करतलगत किया जा सकता है। श्रुति के अनुसार पिण्ड एवं ब्रह्मांड में, अणु एवं विभु में, काया एवं प्रकृति में चेतन सत्ता के जो भिन्न-भिन्न स्तर एवं स्थितियाँ दिखाई पड़ती हैं वे सुनियोजित एवं क्रमबद्ध हैं। पाँच विशिष्ट स्तरों के रूप में पंचकोशों को मानवी चेतना का प्रतीक-प्रतिनिधि माना जा सकता है। चेतना की कोई स्थूल एनॉटामिकल या फिजीकल बनावट नहीं होती। फिर भी ऐसे शक्ति स्त्रोत मानवी काया में विद्यमान हैं जिनसे श्रुति में वर्णित पंचकोशों के प्रभाव, परिणाम एवं असीम सम्भावनाओं की संगति भली प्रकार बिठायी जा सकती है। इन्हें कोई दुराग्रह युक्त हो उसी रूप में प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखना चाहे, जिस प्रकार का कि अलंकारिक वर्णन शास्त्र ग्रन्थों में मिलता है तो उसे निराश ही होना पड़ेगा। विवेक दृष्टि का अवलंबन लेकर समष्टि एवं व्यष्टि के मध्य तारतम्य बिठाने वाले इन पाँच केंद्रों की महत्ता को समझा जा सकता है ताकि योग साधनाओं के माध्यम से इन्हें विकसित कर आकस्मिक प्रगति की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।

जिस शरीरगत स्थूल संरचनाओं से इन पाँच कोशों को सम्बद्ध माना जाता है वे सभी स्वयं में एक परिपूर्ण शक्ति संस्थान हैं। इन्हें उत्तेजित करने पर जो फलश्रुतियाँ सम्भावित हैं उन्हीं को ध्यान में रखते हुए योग विद्या के वेत्ताओं ने उनका सम्बन्ध पंचकोशों से जोड़ा है एवं उन्हीं को स्थूल काया में चेतन शक्तियों का प्रतिनिधि करने वाला माना है।

एक तथ्य यहाँ स्पष्ट समझ लिया जाना चाहिए कि चेतना का विशाल महासागर मानव की अन्वेषण बुद्धि की बोध की परिधि में आने वाला आभास भर है। बोध रूपी यह चतुर्थ आयाम मानव मेधा को उस परोक्ष जगत की एक झलक भर देता है, समग्र सम्पूर्ण जानकारी नहीं। चौथे आयाम सम्बन्धी विभिन्न वैज्ञानिक खोजें ऐसा आश्वासन अवश्य दिलाती हैं कि प्रगति क्रम में क्रमशः वह विधा खोज निकाल ली जाएगी जिससे और भी गहरे प्रवेश कर चेतना की सूक्ष्म परतों का रहस्योद्घाटन संभव हो सके। अभी लेसर एवं होलोग्राफी के आविष्कार ही अपनी चमत्कृतियों के रूप में वैज्ञानिकों को हतप्रभ कर रहे हैं तो चतुर्थ आयाम तो उन्हें मनुष्य की सूक्ष्म आध्यात्मिक संरचना के सम्बन्ध में बहुमुखी जानकारी दे सकेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।

पंचकोश सूक्ष्म हैं। सूक्ष्म अर्थात् अप्रत्यक्ष-अदृश्य। किन्तु इस प्रकार की व्याख्या प्रत्यक्षवादी भौतिक विज्ञान को मान्य नहीं है। वे ऐसे प्रतिपादनों को काल्पनिक और अप्रामाणिक मानते हैं। अस्तु। प्रत्यक्षवादी अध्यात्म विज्ञान ने शरीर संरचना विद्वान के अनुरूप ही पंचकोशों के प्रभाव क्षेत्र और परिणामों को देखते हुए प्रत्यक्ष शरीर में पंचकोशों की उपस्थिति बतायी है और उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव में आ सकने योग्य कहा है।

अन्नमय कोश की चमत्कारी हारमोन ग्रन्थियों से, प्राणमय कोश की जैव विद्युत संस्थान से, मनोमय कोश की जैव चुंबकत्व से, विज्ञानमय कोश की न्यूरोह्यूमरल रस स्रावों (स्नायु रसायन) से तथा आनन्दमय कोश की मस्तिष्क मध्य अवस्थित रेटीकुलर ऐक्टीवेटिंग सिस्टम रूपी विद्युत्स्फुल्लिगों के फव्वारे से संगति बिठायी जाती है। वस्तुतः से सभी घटक स्थूल जान पड़तें हुए भी जादुई क्षमताओं से भरे पूरे हैं। इनकी कार्य पद्धति और परिणति वैसी सीधी सादी नहीं है जैसी कि पाचन तन्त्र, श्वसन तन्त्र आदि की होती है। इन केन्द्रों को यदि उपेक्षित पड़ा रहने दिया जाय, उनके उत्कर्ष का उपाय विदित न हो वो बात दूसरी है। अन्यथा व्यक्ति इन्हीं के सहारे उन ऋद्धि-सिद्धियों का अधिष्ठाता बन सकता है जो प्रत्यक्ष हैं जो सामान्य को असामान्य बनाती हैं।

व्यक्ति की सूक्ष्म सत्ता का वर्गीकरण, तीन शरीरों के रूप में स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों में किया जाता रहा है। आत्मिकी की व्याख्यानुसार अन्नमय एवं प्राणमय कोशों का समुच्चय ही स्थूल शरीर है। हारमोन ग्रन्थियों से स्रवित जादुई सूक्ष्म द्रव्यों एवं बायो इलेक्ट्रीसिटी की चमत्कारी क्षमताओं से भरी यह काया कितनी विलक्षण-सामर्थ्यवान है, इसका आभास इन्हें विकसित करने पर उपलब्ध होने वाली सिद्धियों से मिलता है। मनोमय कोश जैव चुम्बकत्व का भाण्डागार है। यह प्रभामण्डल के रूप में मनुष्य के चारों और तेजोवलय का घेरा बनाता है। सायकिक हीलिंग, सम्मोहन की प्रभाव सामर्थ्य एवं शक्ति हस्तान्तरण के रूप में इसकी परिणतियां देखी जा सकती हैं। इसे सूक्ष्म शरीर का पर्यायवाची माना जा सकता है। यही थियॉसाफिस्टों द्वारा बतायी गयी मेण्टल बॉडी है जो अपनी प्राण शक्ति की सामर्थ्य से दूसरों को प्रभावित करने की सामर्थ्य रखती है।

कारण शरीर विज्ञानमय कोश एवं आनन्दमय कोश को सम्मिलित रूप माना जा सकता है। स्नायु समुच्चय के सन्धि स्थलों (सिनेप्सों) से सुषुम्ना, मस्तिष्क एवं ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम के भिन्न-भिन्न महत्वपूर्ण केन्द्रों पर स्रवित होने वाले स्नायु रसायनों (न्यूरो ह्यूमरल सिक्रीशन्स) एवं थेलेमस मध्य स्थित रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम को क्रमशः विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोशों का प्रतीक रूप माना जा सकता है। यह सारी संरचना इतनी जटिल किन्तु विलक्षण सामर्थ्यों से भरी पूरी है कि उनकी स्थूल प्रतिक्रिया मात्र वैज्ञानिकों को हतप्रभ कर देती है। जब योग साधना का अवलम्बन लेकर सूक्ष्म प्रयोगों द्वारा उनमें हलचल उत्पन्न की जाती है तो इसके परिणाम तो और भी अद्भुत एवं रहस्यमय होंगे। अभी तक जितना भी कुछ वैज्ञानिक इस सम्बन्ध में जान पाए हैं, वह जानकारी अध्यात्म को विज्ञान सम्मत बनाने के पक्षधर विद्वज्जनों को उत्साहित करने में सफल रही है।

काया के इस सूक्ष्म ढाँचे का विवेचन अन्नमय कोश से हो आरम्भ होता रहा है। स्थूल शरीर की सूक्ष्म विशेषताओं एवं दृश्यमान विलक्षणताओं के लिए उत्तरदायी वस्तुतः इसी संस्थान में छिपे घटक हैं। नगण्य सी रसायन की बूंदें कैसे परिवर्तनकारी हलचलें उत्पन्न कर समग्र काया को क्या बना सकती हैं, इसे इस संस्थान में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। शरीर की आकृति ही नहीं, प्रकृति का निर्धारण भी माइक्रोलीटर की सूक्ष्मतम मात्रा में स्रवित इन रस बूँदों द्वारा किया जाता है।

जो कुछ भी प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है, उसका कारण तो शरीर संरचना व क्रिया पद्धति से तालमेल बिठाते हुए कहीं न कहीं जोड़ लेते हैं। ऐसे कई अद्भुत रहस्यमय परिवर्तन होते हैं जिनकी संगति रासायनिक हलचलों से बैठती प्रतीत नहीं होती। वस्तुतः इन रहस्यों की कुँजी सूक्ष्म शरीर से अवस्थित होने के कारण ही प्रत्यक्षवादी विज्ञान कुछ कह पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है। हारमोन्स को ही लें तो लिंग निर्धारण के साथ ही स्वाभाविक पुरुषोचित दृढ़ता, पुंसकत्व, स्त्रियोचित कोमलता एवं कामोल्लास की व्यक्ति-व्यक्ति में पायी जाने वाणी न्यूनाधिकता इत्यादि का मूलभूत कारण क्या है, यह शीघ्र समझ में आता नहीं। व्यक्तित्व का आमूल-चूल कलेवर इन सूक्ष्म रस स्रावों पर निर्भर है। शरीर विज्ञानी तो इनकी असामान्यता को पैथालाजी के स्तर पर ही समझ पाए हैं पर फिजियालाजी की परिधि में बने रहकर स्वेच्छा से किन्हीं योग साधनाओं के अवलम्बन से वाँछित परिवर्तन सम्भव कैसे हो जाता है, इसका समाधान चिकित्सा विज्ञानियों के पास नहीं है। वस्तुतः दशाब्दियों पूर्व डा क्रु कशैन्क ने इन हारमोन ग्रन्थियों को “जादुई ग्रन्थियां” कहा था, वह मिथ्या नहीं था।

पीनियल, पीटुटरी, थायराइड, पैराथाइराइड, थाइमस, एडरीनल्स एवं गोनेड्स के नाम से जाने वाले ये सात ग्रन्थि समूह जन्म से लेकर मृत्यु तक अपनी भिन्न-भिन्न परस्परावलम्बित भूमिका निभाते रहते हैं। व्यक्तित्व के उतार-चढ़ाव, स्वभाव, चिन्तन, दृष्टिकोण इत्यादि का निर्धारण इन्हीं के द्वारा होता है। मनःशास्त्रियों एवं जैव वैज्ञानिकों ने समय-समय पर अपनी शोध निष्कर्षों के हवाले से कहा है कि शरीर संरचना सम्बन्धी बहुत कुछ जानकारी होते हुए भी यह कहना कठिन है कि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में वैचारिक एवं भावनात्मक विकास अलग-अलग प्रकार से क्यों होता है? ‘‘आकल्ट केमिस्ट्री’’ एवं ‘‘एस्ट्रालाजीकल कोरिलेशन ऑफ डक्टलेस ग्लैड्स’’ जैसे ग्रन्थों में विद्वान लेखकों का कहना है कि ब्रह्मांडीय चेतना सूक्ष्म रूप में अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को प्रभावित करती है एवं व्यक्तित्व की विविध क्षमताओं को उभारने में सहायक भूमिका निभाती है। आवश्यक हारमोन्स को बढ़ाना एवं अनावश्यक को कम करना अन्नमय कोश की साधना द्वारा सम्भव है। ऐसा योगवेत्ताओं का मत है।

बायो इलेक्ट्रीसिटी एवं प्राणमय कोश या ‘‘इथरीक डबल’’ की परस्पर संगति समझने के पूर्व जैव विद्युत के सम्बन्ध में कुछ प्राथमिक तथ्य समझ लेना जरूरी है। इसे जैव चुम्बकत्व से भी कुछ हटकर समझना चाहिए जो प्रभा मण्डल बनाता एवं कोश से सम्बन्धित माना जाता है। यों शरीर में विज्ञान सम्मत नाप, प्रकाश, चुम्बक, विद्युत ध्वनि एवं यांत्रिक छहों ऊर्जाओं के प्रमाण भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न रूपों में पाये जाते हैं। किन्तु प्राणमय कोश को समझने के लिए उसे जैव विद्युत से भली-भाँति जोड़ते हुए विवेचन किया जाना अनिवार्य है।

शरीर के लगभग सभी ऊतक, जीवकोश प्रबल स्थायी विद्युत ऊर्जा सम्पन्न पाये जाते हैं। यहाँ तक कि यही सब मिलकर मस्तिष्क रूपी प्रधान कम्प्यूटर का नियन्त्रण सुसंचालन भी करते हैं। लगभग बीस मिली बोल्ट का स्थायी विद्युत क्षेत्र तो मस्तिष्क की बाह्य परत के आर-पार स्थायी रूप से पाया जाता है। शरीर में स्थायी रूप से चल रहे अनेकों चक्रों, जो रासायनिक, चयापचाय (केमिकल मेटाबॉलिज्म) की प्रक्रिया निर्धारित करते हैं, की तरह एक विद्युत चक्र भी चलता है जो रसायनों से बनी काया के सजीव या निर्जीव होने का कारण बनता है। ऑक्सीजन हम श्वास से भीतर सोखते या कार्ब डाई ऑक्साइड प्रश्वास द्वारा प्रदूषित वायु के रूप में बाहर निकालते हैं। यह ऑक्सीजन जितनी देर शरीर में परिभ्रमण करती है, ऋण आयनों द्वारा जीवकोशों को ऊर्जा प्रदान करती है। लगभग इसी प्रकार वायुमण्डल में संव्याप्त विद्युत आवेश को हर व्यक्ति फेफड़ों एवं त्वचा के मार्ग से अवशोषित करता है। वातावरण में विद्युत विभव सौर ऊर्जा, कास्मिक किरणों और भूमण्डल की स्वाभाविक रेडियो धर्मिता से विनिर्मित होता है। ये सूक्ष्माणु ऋण विभव धारण किए होते हैं एवं वायुमण्डल में 5 बोल्ट प्रति मीटर के औसत से आयनोस्फियर की निचली परत में विद्यमान होते हैं। मानव शरीर में प्रभावित विद्युतधारा लगभग दस पीको एम्पीयर की ताकत की होती है। इस अल्प मात्रा में प्रवाहित विद्युत की सामर्थ्य कितनी प्रचण्ड होती है। यह सहज ही जाना नहीं जा सकता।

फ्राँस की स्ट्रासबर्ग यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विज्ञानी श्री फ्रेड वैलेस ने अपनी पुस्तक ‘‘द बायोलॉजीकल कन्डीशन्स क्रिएटेड बॉय द इलेक्ट्रीकल प्रार्टीज ऑफ एटमॉस्फीयर’’ में विभिन्न प्रयोगों के माध्यम से काया में प्रविष्ट व उससे उत्सर्जित होने वाले प्रवाह को मापा व इस विद्युत चक्र के कारण मनुष्य को एक चलता फिरता बिजली घर माना है। शरीर में लगभग पिचहत्तर हजार अरब कोश हैं एवं सभी में विद्युत ऊर्जा विद्यमान है। प्रत्येक कोशिका के आस पास 60 से 90 मिली बोल्ट का विद्युत विभव पाया जाता है। हर सेल बैटरी है व सम्पूर्ण शरीर इनका समुच्चय। हर सेल एक विद्युत सन्धारक (कैपेसीटर) है एवं सम्पूर्ण शरीर एक समग्र कंप्यूटराइज्ड उपकरण। लगभग एक सेमी कन्डक्टर या इन्टीग्रेटेड सर्किट (आय॰ सी॰) के समक्ष हर कोश झिल्ली मानवी काया को विद्युत भण्डार का स्वरूप दे देती है। भौतिकी का यह विवेचन क्लिष्ट होते हुए भी शरीर की सूक्ष्म संरचना के लिए अनिवार्य भी है।

त्वचा, जननेंद्रिय, आँखों व चेहरे से यह विद्युत ऊर्जा निरन्तर उत्सर्जित होती रहती है। त्वचा पर प्रतिरोध मानव (जी॰ एस॰ आर॰) के माध्यम से उत्सर्जन को मापा जा सकता है। हृदय की विद्युत को ई. सी. जी., मस्तिष्कीय विद्युत को ई॰ ई॰ जी॰ व डीप डी॰ सी॰ ब्रेन पोटेन्शियल्स के द्वारा तथा आँखों की विद्युत को इलेक्ट्रोनिस्टेग्मो व रेटीनोग्राम से नापा जाता है। माँस पेशियों की विद्युत इलेक्ट्रोमायोग्राम द्वारा मापी जा सकती है एवं नाक व ओठों की विद्युत को इलेक्ट्रोनिसो लेवियोग्राम द्वारा मापा जा सकना सम्भव है। प्राण शक्ति का यह समुच्चय ही प्राणमय कोश की संरचना करता है। इसमें आने वाली कमीवेशी ही व्याधि का कारण बनती है। समय-समय पर आग के शोले फूटने की तरह शरीर से ज्वाला-चिनगारियाँ निकलने, स्वतः जलन (आटोकम्बशन) के रूप में इनके प्रमाण भी देखे जाते हैं जिनका वर्णन अखण्ड ज्योति में पहले भी किया जाता रहा है। अध्यात्म प्रयोजनों में यह ऊर्जा जीवनी शक्ति का संचय करने एवं अधोगामी प्रवाह को रोककर ऊर्ध्वगामी बनाने की भूमिका निभाती है। क्षरित विद्युत जब सत्प्रयोजनों में नियोजित होती है। तो प्रसुप्त सामर्थ्य, संकल्प बल, इच्छा शक्ति को जगाकर असम्भव कार्य कर दिखाती है। इसका छोटा सा रूप सिद्धियों के रूप में देखा जाता है। जबकि यह जल के ऊपर दिखाई देने वाला हिमखण्ड का एक टुकड़ा मात्र है। जो मूलभूत सम्पदा है, वह विराट है, अक्षय है। प्रश्न केवल सुनियोजन का है।

अब तीसरे मनोमय कोश की चर्चा करें जो मानवी चुम्बकत्व की शरीर में सूक्ष्म रूप में प्रतिकृति रूप में विद्यमान है। भूमण्डल व वातावरण में गामा, बीटा, लेसर, अल्ट्रावायलेट, इन्फारेड आदि शक्ति किरणें भिन्न-भिन्न रूपों में क्रियाशील रहती हैं। मानवी काया में इन सबका समुच्चय जैव चुम्बकत्व (बायोमैग्नेटिज्म) के रूप में विद्यमान होता है। जो प्रभा मण्डल सम्मोहन, सायकीक हीलिंग (आध्या॰ मनश्चिकित्सा), शक्ति संचार इत्यादि आध्यात्मिक विभूतियों के रूप में अपने अस्तित्व का परिचय देता रहता है। क्वाण्टा के ब्रह्माण्डव्यापी महासागर में चुम्बकीय बल का ही आधिपत्य है जिसके बलबूते ये ग्रह नक्षत्र परस्पर सन्तुलित क्रियाशील दिखाई देते हैं। चुम्बकीय ऊर्जा मानवी काया में उसी तरह ध्रुवीकरण रूप में विद्यमान है जैसे कि पृथ्वी के दो ध्रुवों में एक चुम्बक डायपल (द्विध्रुवीय मैग्नेट) होता है। जिसमें उत्तरी और दक्षिणी दो सिरे होते हैं। एक उत्तरी सिरा ग्रहण करता है व दूसरा दक्षिणी सिरा चुम्बकीय बल निस्सृत करता है। यह एक प्रकार का ‘‘इलेक्ट्रो मैग्नेटिक डायपोल’’ है। मानवी काया में शुक्राणु की सत्ता का आधिपत्य जमते ही डिम्ब में ध्रुवीकरण प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है एवं यही सारे शरीर के 75 हजार अरब कोशों में इस चुंबकत्व को फैलाती है। मूलतः वह चुंबकत्व की शक्ति के दो ध्रुवों- स्थायी इलेक्ट्रो मैग्नेटिक डायपोल की तरह सुषुम्ना के मूलाधार रूपी दक्षिणी एवं सहस्रार रूपी उत्तरी ध्रुव के रूप में विद्यमान होती है।

पृथ्वी के ध्रुवों पर उसका चुम्बकीय क्षेत्र (मैग्नेटोस्फीयर) सौर हवाओं से टकराकर ‘‘ध्रुव प्रभा’’ (अरोरा बोरिएलिस ) बनाता है। ठीक इसी प्रकार मानवी चुम्बकत्व अपने उत्तरी ध्रुव पर आभा मण्डल के रूप में विराजमान होता है। आज सम्पन्न मनीषी इसी के सहारे अन्यान्य मनुष्यों के अन्तश्चेतना को परखते व प्राण सम्बल प्रदान करते रहते हैं। डा. किलनर ने इसे ‘‘आरा’’ के रूप में मापा व किर्लियन फोटोग्राफी के सहारे उंगलियों की पारों से उत्सर्जित होता पाया। शक्तिपात, प्राण संचार, अध्यात्म चिकित्सा,आशीर्वाद इन्हीं प्रक्रिया के सहारे चुम्बकत्व की मात्रा अधिक रखने वाले को, अन्यान्यों को लाभान्वित करते देखे जाते हैं। मनोमय कोश को साधने में ध्यान योग एकाग्रता की प्रधान भूमिका है। इच्छा शक्ति के चमत्कार इसी अर्जित जैव चुम्बकीय की सामान्य से अधिक की मात्रा के बल पड़ते हैं।

विज्ञानमय एवं आनंदमय कोश अन्तश्चेतना के गहन अन्तराल में निहित वे दिव्य संरचनाएँ हैं जिनका प्रत्यक्ष सम्बन्ध ब्राह्मी चेतना से होता है। स्थूल पदार्थ विज्ञान की दृष्टि से तत्त्ववेत्ताओं ने विज्ञानमय कोश की स्नायु रसायनों (न्यूरोह्यूमरल सिक्रीशन्स) से तथा आनन्दमय कोश की थैलेमस स्थित मस्तिष्कीय फव्वारे ‘‘एसेण्डिन्ग रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम’’ से संगति बिठाने का प्रयास किया है। दोनों ही संरचनाएं स्वयं में जटिल व बड़ी रहस्यमय हैं।

विज्ञान का अर्थ है कामकाजी नहीं विशिष्ट ज्ञान। असामान्य प्रज्ञा, प्रतिभा को उभारने वाली परत निस्सन्देह विलक्षण होती है। यह कार्य उन ‘‘न्यूरो ट्रांसमीटर्स’’ के जिम्मे आता है जो सामान्य अवस्था में तो सिनेप्सों पर स्नायु संचार भर की भूमिका निभाते हैं किन्तु उत्तेजित किए जाने पर प्रसुप्त केंद्रों, विलक्षण प्रतिभा केंद्रों को भी जगाने की सामर्थ्य रखते हैं। एसीटाइल कोलीन, मार्फीन सलेक्टीव ओपिएट्स (एन्डार्फिन्स), एन्केफेलीन, एडीनोसिन समूह, गाबा समूह, सिरोटोनिन (5-एच टी), अल्फा एड्रीनर्जिक, बीटा एड्रीनर्जिक एवं मस्केरीनिक कोलीनर्जिक समूह के नाम से ये सारे मस्तिष्क एवं स्नायु तन्त्र में संव्याप्त हैं। मस्तिष्कीय सत्व के दस लाख में से एक भाग का प्रतिनिधित्व करने वाले ये सूक्ष्म रसायन मन की अचेतन, चेतन व सुपर चेतन परतों के उत्तेजन द्वारा विलक्षण प्रतिभाओं, आविष्कार बुद्धि, स्वप्नों के माध्यम से सन्देश आदि के रूप में अपनी सक्रियता का परिचय देते रहते हैं। विशिष्ट योग साधनाओं द्वारा इस सारे समुदाय को सक्रिय बना कर अतीन्द्रिय क्षमताओं का धनी एवं विलक्षण आनन्द की अनुभूति कर सकने में समर्थ योगी बना जा सकता है।

आनन्दमय कोश एवं सहस्रार चक्र परस्पर अन्योऽन्याश्रित सूक्ष्म संरचना संस्थान के दो नाम हैं जो रेटीकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम के रूप में मस्तिष्क मध्य में अवस्थित होता है। लक्षाधिक न्यूरॉन्स यहाँ शरीर से प्रवेश करते व यहाँ से मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न केंद्रों को जाते हैं। चेतना को उच्चतर स्थितियाँ इसी विद्युत स्फुल्लिंग छोड़ते रहने वाले फव्वारे की सक्रियता पर निर्भर हैं। जो महत्व स्नायु रसायनों का है, उससे अधिक इस संस्थान का है जो मनश्चेतना की भिन्न-भिन्न स्थितियों के लिये उत्तरदायी है। वाणी से संबंधित भिन्न-भिन्न केन्द्र (विजुअल, आडीटरी, स्पोकन वर्बल, रिटन एवं ग्रफिक स्पीच), श्रवण दृश्य वीक्षण दिक्-काल में सामंजस्य, भूतकाल की स्मृतियाँ आदि सभी मस्तिष्क में कैद हैं। दाहिना मस्तिष्क व उसका पैराइटल कार्टेक्स, दोनों को जोड़ने वाला कार्पस कैलोसम तथा लिम्बिक सिस्टम विभिन्न विलक्षणताएँ अपने अन्दर समाए हुए हैं। अभी तो मात्र 7 से 13 प्रतिशत इस पूरे समुच्चय का भाग वैज्ञानिकों को ज्ञात है। जब शेष प्रसुप्त की जागृति-आनन्दमय कोश के जागरण की फलश्रुतियों से वे परिचित होंगे तो मानवी असीम सामर्थ्य एवं ऋद्धि-सिद्धियों के प्रत्यक्ष रूप को देख हतप्रभ हो रह जाएंगे। बहुत कुछ विलक्षण इस उत्तरी ध्रुव केन्द्र में छिपा पड़ा है। गायत्री की उच्चस्तरीय प्राण साधना कुण्डलिनी जागरण की विधि, व्यवस्था, शिव शक्ति का संगम यहीं बन पड़ता है। मानव के भाव पक्ष को उभारने एवं उसे महामानव-अतिमानव बनाने का पुरुषार्थ यहीं सम्पन्न होता है। भक्ति और शक्ति के समन्वय का प्रतीक आनन्दमय कोश बहुत कुछ रहस्यों को अपने अन्दर समाए हुए है। पंचकोशी साधना के अंतर्गत आने वाले ये पांचों ही कोश पूर्णतः विज्ञान सम्मत हैं एवं इन्हें प्रयोगों की कसौटी पर कसा भी जा सकता है। (क्रमशः)




Quotation - Akhandjyoti January 1985

श्रेष्ठ कर्म करने वाले पुण्यात्मा अनायास ही स्वर्ग जाते हैं। कुकर्मी दुष्टता का सहारा लेकर स्वयं ही नरक के द्वार तक जा पहुँचते हैं।




मनोमुग्धकारी प्रतिमा देखी (kahani) - Akhandjyoti January 1985

भक्त ने भगवान की मनोमुग्धकारी प्रतिमा देखी। देर तक टक-टकी लगाये रहा और बोला- कितने सुन्दर हैं आप जिनकी छवि देखते-देखते नेत्र अघाते नहीं।

प्रतिमा तनिक मुस्कराई और संकेत में कहा- “सौंदर्य तो उस कला में खोजो, जिसके सहारे किसी अनगढ़ पत्थर से बदल कर मुझे इस स्थिति तक पहुँचाया।”




नव सृजन के निमित्त समर्थ तंत्र की स्थापना - Akhandjyoti January 1985

चेतना क्षेत्र की और प्रकृति क्षेत्र की वस्तुएँ तथा क्षमताएँ मिलकर ही व्यक्ति और ब्रह्मांड की गतिविधियों का सूत्र-संचालन कर रही हैं। बाजीगर की तरह वे ही कठपुतलियां नचाती और संसार में अनेकानेक कलाकारिताओं का, गतिविधियों का मनमोहक दृश्य खड़ा करती रहती हैं। मनुष्य का शरीर प्रकृति पदार्थों से और प्राण चेतना तरंगों से विनिर्मित हुआ है। इसलिए उसका इन सबसे प्रत्यक्ष और परोक्ष सम्बन्ध है। वह इनसे प्रभावित होता है साथ ही इन्हें प्रभावित भी करता है।

सामग्री सामने हो और निर्माण का शिल्प अभ्यास में आ गया हो तो उससे कितनी ही महत्वपूर्ण वस्तुएँ बन सकती हैं। सोना, अंगीठी और साँचे ठप्पे हाथ में हों तो कुशल स्वर्णकार अनेक प्रकार के आभूषण गढ़ सकता है। कुम्हार के पास गूंथी हुई मिट्टी, चाक तथा अवा हो विभिन्न प्रकार के बर्तनों, खिलौनों का ढेर लगा सकता है। कपड़ा कैंची, मशीन, सुई, धागा पास में होने पर दर्जी विभिन्न डिजाइनों के छोटे-बड़े कपड़े बना सकता है। यही बात दिव्य विभूतियों और शक्तियों के सम्बन्ध में भी है। नैष्ठिक साधन ने तपश्चर्या और योगाभ्यास द्वारा अपना व्यक्तित्व चुम्बकीय विलक्षणताओं से भर लिया हो तो आवश्यकतानुसार वह उत्पादन कर सकता है जिसे विलक्षण सिद्धि कहते हैं। यही युग साधना का मर्म है।

मनुष्य परमेश्वर तो नहीं है, पर उसके हाथ में न केवल पदार्थ उत्पन्न करने की वरन् जीवन्त प्राणी उत्पन्न करने की भी सामर्थ्य है। पशु पालक अभीष्ट नस्ल के दुधारू तथा बोझ ढोने वाले जानवर पैदा करते रहते हैं। मुर्गी, मछली पैदा करने के लिए तो सरकार मुफ्त में बीज बांटती है। लोग विवाह होते ही सन्तानोत्पादन में लगते हैं और कुछ ही वर्षों में घर आँगन बच्चों से भर देते हैं। शिल्पी, कलाकार, सैनिक, डाक्टर, इंजीनियर आदि विशेष योग्यताओं के व्यक्ति ढालने के लिए कितने ही कारखाने चलते हैं।

यहाँ सूक्ष्म जगत में, पुण्य करने वाले, सूक्ष्म प्रकृति के निष्णात पारंगतों के सम्बन्ध में चर्चा चल रही है कि उन्हें विशेषज्ञों द्वारा ढाला बनाया जा सकता है, या नहीं? उत्तर हाँ में ही देना पड़ेगा

प्रकृति के अन्तराल में काम करने वाले विलक्षण शक्तियों के साथ मानवीय विद्युत और ब्रह्मांडीय चेतना को गूँथ कर ऐसी सत्ताएँ खड़ी की जा सकती हैं। जो सूजन कर्ता की इच्छा तथा आवश्यकता के अनुसार अपनी प्रचण्ड क्षमता का परिचय दे सके और ऐसे काम कर सके जैसे कि निर्माता स्वयं भी नहीं कर सकता। लुहार मल्लयुद्ध में एक दो सामने वालों को ही चोट पहुँचा सकता है। पर उसके कारखाने में डाली गई बंदूकें एक दिन में ही सैकड़ों योद्धाओं का सफाया कर सकती हैं। यहाँ ऐसे ही विलक्षण सृजन की चर्चा तथा तैयारी हो रही है।

पौराणिक तथा ऐतिहासिक गाथाओं में ऐसे उत्पादन का अनेकानेक स्थलों पर चर्चा उल्लेख है। शिवजी का प्रमुख कार्यवाहक वीरभद्र था, किन्तु साथ में गण समुदाय की एक बड़ी सेना भी थी। यह उन्हीं का निजी सृजन था। दक्ष से कुपित होकर शिवजी ने अपनी जटा का एक बाल उखाड़ कर देखते-देखते वीरभद्र गण उत्पन्न कर दिये थे और उनने संकेत मात्र से महाबली दक्ष का मान मर्दन कर दिया था। नंदी भी उनके व्यक्तित्व के साथ ही सदा सर्वदा जुड़ा रहा।

रक्त बीज, आसुरी कर्तृत्व था। उसके रक्त की बूंद जहाँ भी गिरती थी, वहीं से एक नया असुर बनकर खड़ा हो जाता था। यह मध्यवर्ती उत्पादन समझा जा सकता है। उसके माता पिता का कोई अता पता नहीं।

विक्रमादित्य के साथ पाँच बेताल रहते थे और वे कठिन कार्य कर दिखाते थे जो विक्रमादित्य स्वयं भी नहीं कर पाते। वे पाँचों कब जन्मे, कब मरे ऐसा सामान्य प्राणियों जैसा उनका कोई इतिहास नहीं है। राजा विक्रम की जीवन यात्रा समाप्त होते ही वे सभी बेताल भी अंतर्ध्यान हो गये।

यक्ष, सूक्ष्म शरीरधारी मनुष्य ही होते हैं। महाभारत की यक्ष कथा प्रसिद्ध है। उसके सरोवर में पानी पीने से पाण्डव पत्थर हो गये थे। युधिष्ठिर ने उसका समाधान करके भाइयों को पुनर्जीवित कराया था। वह यक्ष उच्च भूमिका वाले प्रेत पितर स्तर के ही होते हैं। अनाचारी विद्वान जब मरते हैं तो ब्रह्म राक्षस हो जाते हैं। सामान्य प्रेत परिवार की तुलना में उनकी क्षमता और चतुरता कहीं अधिक बढ़ी चढ़ी होती है।

भवानी तन्त्र विज्ञान की अधिष्ठात्री है। उसका सामना कर सकने में कोई दुर्दान्त दैत्य भी समर्थ नहीं हुआ था। भवानी अकेली नहीं चलती थी भैरव और योगिनियों का पूरा परिवार उनके साथ रहता था। वह भी शिवजी के गणों की तरह ही थे। भैरवों और योगिनियों का विस्तार और संकोचन भवानी अपनी आवश्यकतानुसार करती रहती है। उनकी उपस्थिति तथा पराक्रम का तो वर्णन मिलता है। पर यह कहीं उल्लेख नहीं है कि उनमें से कितने कब, कहाँ उत्पन्न हुए और तिरोहित होते रहे। स्पष्ट है कि वह भवानी का निजी उत्पादन था। आवश्यकतानुसार यह परिकर घटता-बढ़ता रहता था।

सामान्य भूत प्रेतों की चर्चा होती रहती है। वे किसी के बनाये नहीं बनते। अपने ही उद्वेगों के कारण बवण्डर की तरह उठते और मन शान्त होते ही दूसरी दिशा में मुड़ जाते हैं।

ऋषियों, सिद्ध पुरुषों में भी यह सामर्थ्य देखी गई है कि वे अपने स्थूल और सूक्ष्म दोनों शरीर से काम करते रहते हैं। अदृश्य शरीर का प्रकटीकरण तथा उपयोग वे किन्हीं विशेष आवश्यकताओं के समय ही करते हैं।

इन दिनों विश्व विभीषिकाओं के कितने ही विनाशकारी घटाटोप उठ रहे हैं। वे अपना समाधान और निराकरण चाहते हैं। इसी प्रकार नव सृजन के अगणित अंकुर उगे तो हैं पर सिंचाई के अभाव में वे कुम्हलाते-मुरझाते और सूखते चले जा रहे हैं। इस संदर्भ में भी उपेक्षा बरतने की गुंजाइश नहीं है। लंका दमन और रामराज्य स्थापना जैसी समस्याएँ अधिक विकराल रूप में सामने हैं। उनके निमित्त सूक्ष्म शरीरधारी सत्ताओं का परिकर बन रहा है और मोर्चे सम्भालने के लिए कटिबद्ध हो रहा है तो यह उचित भी है और आवश्यक भी। यह परिकर कैसे, किस प्रकार अपनी सामर्थ्य का सुनियोजन करेगा यह गोपनीय पक्ष है। वीरभद्र, रक्तबीज, बेताल, यक्ष, भैरवी इत्यादि के प्रसंग पौराणिक होने के कारण अथवा किंवदंतियों में शुमार किए जाने के कारण, सम्भव है। बुद्धि जीवी वर्ग की स्वीकार्य न हो, पर वास्तविकता तो वास्तविकता है। नवनिर्माण अभीष्ट है तो वह होगा उसी सूक्ष्म धरातल पर। ऋषि सत्ता का यह दायित्व सदा से ही रहा है वह परोक्ष वातावरण निर्मित करे, एक तन्त्र ऐसा खड़ा करे जो संव्याप्त समस्याओं विभीषिकाओं से मानव जाति को त्राण दिला सके। इसी को अवतार प्रक्रिया के आश्वासन के रूप में भी समझा जा सकता है। पृष्ठभूमि में तो वही अदृश्य संचालन सत्ता सक्रिय रहती है, कठपुतली वह जिसे चाहे बना ले। मानवी सत्ता विराट ब्राह्मी सत्ता का बीज रूप होने के कारण सर्व सामर्थ्यवान है एवं वह सब में सक्षम है जिसकी आवश्यकता अब अनुभव की जा रही है।




राजा आमात्य जनश्रुति (kahani) - Akhandjyoti January 1985

राजा आमात्य जनश्रुति ने महर्षि वशिष्ठ से पूछा- ‘‘भगवान में पुण्यात्मा हूँ। धर्म के नियमों पर चलता हूँ। उपासना में भी चूक नहीं करता फिर भी न मेरा लक्ष्य ही पूरा होता दिखाई पड़ता है, न भीतर का सन्तोष ही मुझे प्राप्त है।”

वशिष्ठ ने कहा- ‘‘वत्स! सदाचरण और साधन का महत्व है किन्तु वे दोनों ही स्नेह और सेवा बिना अपूर्ण रहते हैं। तुम उन दो साधनाओं को भी अपनाकर अपूर्णता दूर करो और समग्र प्रतिफल प्राप्त करो।”




काम तत्व की विकृति एवं परिष्कृति - Akhandjyoti January 1985

सृष्टा एक कुशल कलाकार और असाधारण शिल्पी है। उसने अपनी कलाकृतियों में युग्म पद्धति का बड़ा ही सुन्दर समन्वय किया है। शरीर संरचना में दो हाथ, दो पैर, दो आँख, दो कान दो नितम्ब आदि अवयवों को सुन्दर और पूरक बनाने की दृष्टि से सृजा है। यों काम तो एक से भी चल जाता पर काया इतनी सर्वांग सुन्दर न बन पाती। इसी दृष्टि से नर और नारी को सृजा गया है। वे अपनी-अपनी विशेषताओं से भरे-पूरे हैं। इतना ही नहीं, वे परस्पर एक दूसरे के लिए अनेक दृष्टियों से पूरक हैं। इसमें एक तो सर्व विदित प्रजनन परम्परा और वंश-वृद्धि की नैसर्गिक आवश्यकता है ही, पर बात उतने से ही समाप्त नहीं होती। आध्यात्मिक, मानसिक, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक, शारीरिक क्षेत्रों की अनेकानेक ज्ञात और अविज्ञात आवश्यकताएँ ऐसी हैं, जिन्हें मिलजुलकर वे पूरा करते हैं। न केवल एक-दूसरे को समग्र बनाते हैं वरन् सृष्टि क्रम के सुसंचालन और सौंदर्य परिकर में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

अकेला नर अपूर्ण है। अकेली नारी भी। फूल पत्तियों का युग्म फबता है। नर नारी का समुदाय भी मिलजुल कर समग्रता उत्पन्न करता है। यही कारण है कि प्रायः सभी देवता और सभी ऋषि युग्म बन कर रहे हैं। आवश्यक नहीं कि इसके साथ वासना जुड़ी ही रहे और संतानोत्पादन अनिवार्य रूप से चले। एक दूसरे को जो भावनात्मक उल्लास एवं उत्साह प्रदान करते हैं, वे अपने आप में इतने समग्र हैं कि सृष्टा की इच्छा और मनुष्य की आवश्यकता दोनों की ही पूर्ति हो जाती है।

परिवार को धरती का स्वर्ग कहा जाता रहा है। दैवी पुष्पोद्यान। उसमें पूर्णता लड़की और लड़के दोनों ही मिलकर उत्पन्न करते हैं। व्यवस्था और बहुलता के साथ-साथ भावना क्षेत्र की उत्कृष्टताएं इस समन्वय से ही उत्पन्न होती हैं।

अनगढ़ मनुष्य भौंड़ा पशु है। वह लिंग प्रति पक्ष को पत्नी रूप में ही देखता है और जब अवसर मिलता है, बिना किसी मान-मर्यादा का विचार किये यौनाचार के लिए सचेष्ट होता है। इसमें उसे भय, लज्जा, अनौचित्य जैसा कोई अन्तर प्रतीत नहीं होता। माता, भगिनी, पुत्री के साथ पत्नीवत् व्यवहार करने में उसे किसी नीति या मर्यादा का व्यतिरेक हुआ प्रतीत नहीं होता। किन्तु मनुष्य की मर्यादा इससे सर्वथा भिन्न है। उसके साथ धर्म, कर्तव्य, आदर्श के जो अनेकों अनुबन्ध लगे हुए हैं, वे नर और नारी के बीच उत्कृष्टता के अनेकानेक अनुबन्ध स्थापित करते हैं और उन स्थापनाओं का निर्वाह तथा पोषण ऐसे परिवार के बीच रहकर ही सम्भव होता है जिसमें नर और नारी मिलजुलकर कर रहते हैं। घर में जितने सदस्य रहते हैं, उनमें से नर वर्ग को बाबा, ताऊ, चाचा, भाई भतीजा आदि के शिष्टाचारों से व्यवहृत किया जाता है। इसी प्रकार महिलाएँ दादी, ताई, चाची, भुआ, बहिन, भाभी, भतीजी, बेटी आदि के रिश्तों में सँजोया जाता है। हर रिश्ते की अपनी सुषमा, शोभा, भाव सम्वेदना, मिठास अलग-अलग ही हैं। सब मिलकर एक गुलदस्ता बनता है। भोजन में अनेक प्रकार के व्यंजन जिस प्रकार बनते हैं उसी प्रकार परिवार के नर-नारी सदस्यों के माध्यम से आध्यात्मिकता, आदर्शवादिता और मर्यादा के अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्र विकसित होते हैं इसलिए गृहस्थ बनाकर रहने की परम्परा है। जिसे सामान्य जन ही नहीं, उच्चस्तरीय विभूतियाँ भी निर्वाह करती हैं।

आत्म मार्ग के पथिकों के लिए तो विवाह करने पर एक प्रकार के तप का अवसर अनायास ही मिलता है। युवावस्था में प्रकृति यौनाचार की उत्तेजना देती है। इसे हठपूर्वक रोकने से हठयोग सधता है। और दोनों परिवार देव बुद्धि विकसित करके श्रद्धा सम्वर्धन के निमित्त उसे मोड़ दें तो भावयोग की साधना ठीक वैसी ही सध जाती है जैसी कि प्रतिमा पूजन के माध्यम से देवाराधना की, योग की अनेकानेक शाखा प्रशाखाओं में एक अति महत्वपूर्ण गृहस्थ योग भी है। परिवार तो समूह साधना- सृष्टि में सुसंस्कारी श्रेष्ठतम नागरिकों के निर्माण का कारखाना- विद्यालय जैसा चलाना है ही। इसके अतिरिक्त दाम्पत्य जीवन में प्रणय परिचर्या को श्रद्धा, भक्ति, आत्मीयता, समर्पण, स्नेह, जैसे उत्कृष्ट आधारों की ओर मोड़ देना, एक ऐसा प्रयास है जिसमें ईश्वर भक्ति की प्रक्रिया की पूर्ति होती है। पत्नी के लिए पति को परमेश्वर माना गया है और पति के लिए पत्नी को जगदम्बा सदृश मानने के लिए शास्त्र वचन है। नारी तत्व को नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमस्तस्यै-नमो नमः॥ की मान्यता दी गई है। सीता, पार्वती, सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा आदि के रूप, सौंदर्य आदि को देवी चित्रों में देखकर श्रद्धा, सम्वेदना ही बढ़ाई जाती है। किसी कुटिल कलुषता को मन में नहीं आने दिया जाता। ठीक उसी प्रकार अपनी धर्मपत्नी के रूप में भी उसी तत्व की अभ्यर्थना की जानी चाहिए। यही बात पत्नी के सम्बन्ध में पति के निमित्त भी है। वे उनमें राम, कृष्ण, शिव, गणेश, आदि की झलक झाँकी करती हुई प्रभुभूत होती रह सकती हैं। भावनाओं का परिष्कार ही अध्यात्म है। अध्यात्म साधना के अनेकानेक उपाय उपचार हैं। उनमें एक धर्म पत्नी को मान्यता है। धर्म शब्द इसीलिए जोड़ा गया है कि यदि वह मात्र पत्नी होती तो नर मादा के मध्यवर्ती चलने वाले लोकाचार में कोई सोचने विचारने की आवश्यकता न पड़ती।

विवाहित जीवन में लोकाचार की दृष्टि से काम कौतुक का कोई प्रतिबन्ध नहीं है पर अध्यात्म जीवन में तो श्रद्धा का परिष्कार ही करना है। गोबर को गणेश बनाना है। खम्भे में से नृसिंह प्रकट करना है। पत्थर को मीरा की तरह गिरधर गोपाल स्तर तक ले जाना है और राम कृष्ण परमहंस की तरह दक्षिणेश्वर प्रतिमा में से साक्षात काली का रूप प्रकट करना है। दोनों पक्षों को ही एकलव्य द्रोणाचार्य की कथा को चरितार्थ कर दिखाना है। तुलसी का पौधा और शालिग्राम का पत्थर जब भगवान बन सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि पति-पत्नी एक दूसरे को जीवन्त देवसत्ता मानकर उसके सहारे प्राकृतिक कुत्साओं का संशोधन न कर सकें। आयुर्वेद में विषों का शोधन, जारण, मारण करके अमृत बनाया जाता है तो बदले में सेवा, सद्भावना, स्नेह, सौजन्य का परिचय देने वाले साथी में दिव्यता का आरोपण करते हुए अपना आत्मिक स्तर जमीन से आसमान तक ऊँचा उठाना पति व पत्नी दोनों का कर्तव्य है। इसमें दृष्टिकोण को परिवर्तन करने का आत्म शोधन, तप, दोनों को करना पड़ता है।

सभी देवताओं के विवाह हुए हैं पर सन्तान किसी को भी नहीं हुई। अपवाद मात्र शिव का है जिन्हें देवताओं की विपत्ति निवारण करने के लिए दो पुत्र पैदा किये और जिनका भरण पोषण कृतिकाओं ने किया। ऋषियों में भी ऐसे अपवाद हो सकते हैं। पर वे आपत्तिकालीन आवश्यकता की पूर्ति के लिए देव प्रयोजनों के लिए ही हुए होंगे। अन्यथा गृहस्थ होते हुए भी उनने निजी सन्तानोत्पादन का झंझट नहीं उठाया। याज्ञवल्क्य की दो पत्नियाँ थी, पर सन्तान एक को भी नहीं। इसी प्रकार अरुन्धती, अनसूया आदि ऋषिकाओं के इतिहास हैं। जब सारा संसार सारा गुरुकुल ही अपनी सन्तान है तो निजी प्रजनन का झंझट उठाकर निर्धारित सेवा कार्य में विघ्न विक्षेप क्यों उत्पन्न किया जाय।

बिना पत्नी का- बिना परिवार का ब्रह्मचर्य सरल है क्योंकि उसमें अभावजन्य विवशता है। पर जहाँ प्रतिबन्ध न होते हुए स्वेच्छा प्रतिबन्ध लगता है वहाँ वह प्रक्रिया तप बन जाती है। घर में भोजन न हो और भूखा रहना पड़े तो वह विवशता का उपवास है, पर जहाँ घर में व्यंजनों की कमी न होते हुए भी आहार का परित्याग किया जाता है, उपवास उसी को माना जायेगा।

कुण्डलिनी योग साधना को आध्यात्मिक काय विज्ञान कहा गया है। उसमें नर के लिए नारी और नारी के लिए नर शक्ति केन्द्र एवं शक्ति स्त्रोत बनते हैं। पत्नी भाव का मातृभाव में बदलते ही यौनाचार अवयव प्राण संचार उद्गम बन जाते हैं। माता की जननेन्द्रिय से अपनी काया उपजती है और धरती के समान पवित्र है। स्तन दूध पिलाते हैं। ये कामधेनुवत् है। माता का चुम्बन आलिंगन कितना पुनीत कितना उल्लास भरा होता है। उसमें अश्लीलता जैसी अनुभूति कहीं कोई नहीं होती। देवियों के चित्रों प्रतिमाओं में भी सभी नारी अंग होते हैं, पर कोई उपासक उन्हें देखकर अश्लील कल्पना नहीं करता। यही बात नारी आराधिका के सम्बन्ध में नर आकृति के इष्टदेव के सम्बन्ध में है। वास्तविक ब्रह्मचर्य यही है। अविवाहित तो रहा जाय पर कुकल्पनाएं मस्तिष्क पर छाई रहें तो वह प्रकारान्तर से व्यभिचार ही हुआ और पत्नी साथ रखकर राम सीता की तरह- वनवास बिताया जाय तो उसमें प्रणय चर्या की गंध भी नहीं सूँघी जाती है।

कुण्डलिनी साधना का प्रथम चरण यही है। उसमें दृष्टिकोण को ब्रह्मचारी समान बनाना पड़ता है। राम-कृष्ण परमहंस जब आध्यात्मिक साधना की परिपक्वावस्था में थे, तब उन्होंने माता शारदामणि से विवाह किया है। पाण्डुचेरी के अरविन्द घोष जब मौन एकान्त साधना में संलग्न हुए तब उन्हें अकेली माताजी को उनकी आध्यात्मिक सहचर को उनसे भेंट करते रहने की सहमति मिली। गाँधी जी ने 32 वर्ष की आयु में कस्तूरबा को माँ कहना आरम्भ किया और आजीवन दोनों के बीच वही माँ पुत्र का रिश्ता स्थिर रहा।

कुण्डलिनी साधक विवाहित हैं या अविवाहित इसका झंझट नहीं। अनुबन्ध इस बात का है कि समीपवर्ती अथवा स्मृति में आने वाले प्रतिपक्ष के प्रति देव भाव उत्पन्न हुआ या नहीं। दोनों के सम्बन्ध में वासना का विष घुल रहा है या नहीं। यह विष सामान्य गृहस्थों के जीवन में भी जितना अधिक होगा उनका लौकिक जीवन भी उसी अनुपात से विषाक्त होता चला जायेगा। विवाह का तात्पर्य यौनाचार की अमर्यादा नहीं। इस खाई खड्ड में धंस पड़ने पर दोनों पक्ष अपना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य गँवा बैठते हैं। पारिवारिक झंझटों से इतना अधिक लद जाते हैं कि उस बोझ को उठाते-उठाते कमर टूटती है।

तथाकथित समय और सम्पन्न देशों में इन दिनों विलासिता का उन्माद भूत पिशाच की तरह चढ़ा है। विलासिता में सजधज के समान ही यौनाचार की दुष्प्रवृत्ति बढ़ी है। इसका विषाक्त प्रतिफल सर्वप्रथम नारी को और उससे कुछ ही कम नर को भुगतान पड़ रहा है। नर अपनी जीवनी शक्ति का भण्डार चुकाता जा रहा है। बौद्धिक कुशाग्रता बेतरह घट रही है। उठती आयु में उत्तेजक आहार के कारण शरीर का ढकोसला तो बिगड़ने नहीं पाता। पर भीतर ही भीतर स्थिति घुने हुए गेहूं जैसी हो जाती है।

मनुष्य की औसत आयु विगत पचास वर्षों में बढ़ी है। पर बुढ़ापा दस वर्ष पहले आने लगा है। क्रिया शक्ति बेहतर क्षीण हो रही है। माँस के चलते-फिरते लोथड़े की तरह जीना पड़ रहा है। मस्तिष्कीय क्षमता में बेहतर गिरावट आई है। फलस्वरूप सनकी और अर्ध विक्षिप्त की तरह इस स्थिति में रहना पड़ता है। जिसमें न किसी के साथ रहा जा सके न कोई अपने साथ रह सकें। सनकों की दुनिया में तैरने वाला आदमी हमेशा असन्तुष्ट और चिन्तित रहता है। भयभीत या उत्तेजित भी। स्त्रियों की स्थिति और भी अधिक दयनीय है। कामुक पुरुष समुदाय उन्हें छात्रावस्था से ही निचोड़ना शुरू करता है। इसके लिए प्रलोभनों की हाट लगी रहती है। कुशिक्षण के लिए अश्लील साहित्य, ब्लू फिल्में तथा इसी प्रशिक्षण में पारंगत बनाने वाले लाल, गली मुहल्लों में खुले रहते हैं। भेड़ियों की कहीं कमी नहीं। अन्तर सभ्यों और असभ्यों का है, कहीं रुलाकर, कहीं हंसाकर तरीके अपने-अपने हैं, पर नारी आखिर नारी है। वह वासना की कामधेनु नहीं है कि उसे निरन्तर दुहते रहने पर भी अक्षय बनी रहे। परिणाम सामने है। तथाकथित सभ्य देशों की नारियों में से अस्सी प्रतिशत यौन रोगों से ग्रसित पाई गई हैं। वासना की पूर्ति और जन्म निरोध की दुहरी मार उन्हीं पर पड़ती है। फलतः वे रंग बिरंगी गुड़िया दिखने के अतिरिक्त और कुछ रह नहीं जाती। इस खोखली स्थिति को वे किसी प्रकार टॉनिकों, नशों और नींद की गोलियों के सहारे घसीटती हैं। आयु बढ़ने के साथ वे हर दृष्टि से खोखली होती जाती हैं। मर्दों से भी अधिक दयनीय स्थिति उनकी होती है।

यह सभ्य और सम्पन्न देशों के नर नारियों की दुर्दशा है जिससे पीड़ित होकर वे भीतर रोते और बाहर हँसते रहते हैं। भारत जैसे पिछड़े और अशिक्षित देशों की स्थिति और भी गई बीती है। बूढ़े, अन्धेपन, खाँसी, विक्षिप्त, अशक्त स्थिति में दिन काटते हैं। बाल विवाह की लानत लड़कियों को सीधे बुढ़ापे में धकेल देती है। उन्हें पता भी नहीं चलता कि यौवन कब आया और कब चला गया। जो दिन इसके होते हैं उनमें से प्रजनन के भार से इस बुरी तरह लदी रहती हैं कि चैन की साँस लेने के दिन ही खाली नहीं मिलते। पच्चीस की आयु होते-होते चार पाँच बच्चों की माँ बन जाती है। मातृत्व पारिवारिक श्रम, आये दिन के अपमान, बन्दी जीवन साथ में कुछ न कुछ रोग भी समेट लाता है। श्वेत प्रदर, कमर का दर्द, शिर का दर्द, पैरों की फड़कन, अपच, अनिद्रा, थकान आदि अनेकों जंजाल शिर पर लादे हुए वे जिन्दगी की लाश ढोती रहती हैं। वे अपने लिए, परिवार के लिए, बच्चों के लिए, पति के लिए भार बनकर ही जीती हैं। इसका कारण एक ही है वासना का अत्यधिक और अनगढ़ दबाव।

इसका प्रमाण प्रत्यक्ष खोजा जा सकता है। विधवाएँ परित्यक्ताएँ, कुमारियाँ जिनकी गोदी में बच्चे नहीं हैं। अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ और सुखी रहती हैं। यों ऐसे जीवन में उन्हें अनिश्चित और अर्थाभाव की स्थिति में रहना पड़ता है तो भी वे सुहागिनों की तुलना में शारीरिक और मानसिक दृष्टि से कहीं अधिक निश्चिंत और सन्तुष्ट रहती हैं। जिन तक इस दुर्व्यसन की हवा जितनी कम पहुँची है वे नर-नारी उतने ही अधिक सुखी हैं। आदिवासी, वनवासी, किसान, श्रमजीवी जिनके मस्तिष्क पर निर्वाह की समस्याओं को सुलझाना भर रहता है जिन पर वासना का प्रकोप जितना कम हुआ है, वे निर्धन और अशिक्षित होते हुए भी कम से कम स्वास्थ्य को गँवा बैठने के अभिशाप से तो बचे ही रहते हैं।

इन पंक्तियों में एक झाँकी उस स्थिति की कराई गई है जो आज की उद्धत पीढ़ी को वासना विलासिता की बलि वेदी पर चढ़कर सहन करनी पड़ती है। उनके लिए आध्यात्मिक प्रगति का, समाज सेवा का, उत्कृष्ट चिन्तन का, व्यक्तित्व के परिष्कार का तो सुयोग मिलता ही कहाँ है?

आध्यात्मिक काम विज्ञान की दिशाधारा और विलासी कुकर्मियों की कुचेष्टा में जहाँ जमीन आसमान जैसा अन्तर है वहाँ उसका कर्मफल भी निश्चित है। ब्रह्मचर्य को तप और योगाभ्यास कहा गया है इसका कारण प्रत्यक्ष है। उसे अपनाने पर नर और नारी के बीच जो सहज उमंग होती है और निकट आने पर उल्लास का निर्झर बनकर फूटती है, उसे कभी भी, कहीं भी, कोई भी प्रत्यक्ष देख सकता है।

नारी शक्ति है। नर तेजस्। दोनों एक दूसरे को उत्साह और बल प्रदान करते हैं, पर यह होता तभी है जब दोनों के बीच, कुत्सा का प्रवेश न होने पावे। काम का अर्थ क्रीड़ा है। क्रीड़ा अर्थात् विनोद, हास्य, पर वह होना चाहिए सात्विक। बालकों जैसा निश्छल। ऐसी मनःस्थिति बनाये रहकर, छोटी, बड़ी, समान आयु के नर नारी निकटता रखें। आत्मीयता भरें, सान्निध्य को बनायें, बढ़ायें तो उससे साँसारिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से दोनों ही पक्षों का लाभ होता है।

वे गलती पर हैं जो नर नारी की समीपता में पाप का दृष्टि का अनुमान लगाते हैं, और एक दूसरे को सर्वथा दूर रखने की बात सोचते हैं। पर्दे का प्रतिबन्ध लगाते हैं और जब भी किसी प्रकार के वार्तालाप या सहयोग का अवसर हो तभी जासूसी चौकीदारी करने के लिए मध्यवर्ती की नियुक्ति पुलिस मैन की तरह करना आवश्यक समझते हैं। ऐसे लोगों का मन ही कलुषित समझना चाहिए, जो मनुष्य-मनुष्य के बीच रहने वाली श्रद्धा, सद्भावना पर विश्वास नहीं करते। सर्वत्र पाप ही पाप खोजते हैं। नर और नारी भी तो दो मनुष्य ही हैं। उनकी बारूद माचिस जैसी बनावट नहीं है जो निकट आते ही विस्फोट या अनर्थ उपस्थित करें।




Quotation - Akhandjyoti January 1985

ईसा के परिवार वाले उनसे मिलने आये। वे सत्संग परामर्श में तल्लीन थे। लोगों ने कहा- “घर वालो की ओर ध्यान देंगे क्या?”

ईसा ने कहा- ‘‘संसार में मेरा न कोई भाई है न कुटुम्बी। जो स्वर्ग स्थित पिता की बातों में रस लेते और रास्ते पर चलते हैं उन्हीं को मैं कुटुम्बी मानता हूं।




आधुनिक दर्शन जिसमें दुर्बल के लिए कोई स्थान नहीं - Akhandjyoti January 1985

दर्शन संस्कृतियों को जन्म देता है और उसी के अनुरूप बनने वाली मान्यताएँ प्रथा परम्पराएँ बन जाती हैं। कभी आरण्यक दर्शन था। तब साधुओं और ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा। प्रथाएँ तद्नुरूप चलती रहीं। बाद में दर्शन ने मोड़ लिया। वह भक्ति परक बना। देवता उपास्य बने। उनके प्रति विशेष भावना प्रदर्शित करने वालो ने देवालयों का निर्माण किया और अपने अपने इष्ट देव को अधिक वैभव सम्पन्न प्रदर्शित करने के लिए उन्हें राजा रईस की तरह ठाट-बाट युक्त बना डाला। इन दिनों खिड़की के रास्ते पाश्चात्य दर्शन भारतीय लोक मानस पर स्थान जमा रहा है। स्वभाव और आदतें, वेश विन्यास धीरे-धीरे पश्चिमी ढर्रे में ढलता जा रहा है।

आरम्भ में दर्शन बदले हैं और बाद में उन्होंने संस्कृतियों का रूप धारण कर लिया है। मान्यताएँ और प्रथाएँ इसी आधार पर बनती बदलती हैं। मध्यकाल में ईसाई और इस्लाम धर्म प्रायः इसी उत्साह में चले जैसा कि कभी बौद्ध परम्परा ने अपने बल विक्रम का परिचय दिया था। ईसाई और इस्लाम धर्म प्रायः समकालीन हैं। दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा सी रही है कि कौन अधिक व्यापक बने? किसका वर्चस्व मान्यता प्राप्त करे? इसके लिए बल प्रयोग को भी मान्यता मिली। ईसाई और मुसलमानों के बीच मारकाट होती रही। वही नीति हथियाये हुए इलाकों पर भी बरती गई। काफिरों के कत्ल में सबाब मिलने के प्रतिपादन हुए जिससे नादिरशाह, तैमूरलंग, औरंगजेब आदि द्वारा कत्ले आम की नीति भी अपनाई गई। यह सब बदल हुए दर्शन की करामात है। वे बदलते हैं तो अपने साथ एक नई परिपाटी भी लाते हैं और एक नई संस्कृति को भी जन्म देते हैं।

अपने समय दार्शनिक उथल पुथल इतनी तेजी से और इतनी बहुमुखी हो रही है कि उसका स्वरूप समझना कठिन हो रहा है। फिर भी यह निश्चित है कि भूत कालीन दर्शनों की तुलना में वह अपेक्षाकृत अधिक सशक्त है। कारण कि उसे श्रद्धा मूलक नहीं रक्खा गया है। वरन् तर्क, तथ्य और प्रमाणों का आश्रय इस स्तर का बनाया गया है कि उसे इतिहास, विकासवाद नृतत्व विज्ञान आदि का रूप मिले और वह सहज स्वाभाविक प्रतीत हो। यह भान न हो पाए कि किसी दर्शन को गढ़ा और किसी संस्कृति को जन्म दिया जा रहा है पर यथार्थता यह है कि हम वस्तुतः सशक्त दर्शन और संस्कृति को जन्म दे रहे हैं।

इसकी पृष्ठभूमि विकासवाद के आधार पर रखी गई है। विकासवाद अर्थात् प्राणियों की उत्पत्ति और अभिवृद्धि का इतिहास। इसमें बताया गया है कि प्राणी का आरम्भ कीटाणुओं के रूप में हुआ और उसने प्रगति की आशंका से प्रेरित होकर जीवन संघर्ष “स्ट्रगल फौर लाइफ” का क्रम अपनाया। सजातियों से प्रतिद्वन्द्विता और उनके साधन हथियाना आरम्भ कर दिया। इसी रास्ते पर चलते हुए सभी जीवधारी आगे बढ़े हैं। मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं है। संसार में जो कुछ दिख पड़ता है, वह इसी मान्यता को अपनाने का प्रतिफल है। भविष्य में यदि प्रगतिक्रम जारी रखना है तो यही करते रहना पड़ेगा।

“जीवन संघर्ष” के सिद्धांत की मोटी रूप रेखा तो यह भी है कि अधिक परिश्रम किया जाय। योग्यता बढ़ाई जाय। स्वामित्व जगाने वाला स्वभाव बढ़ाया जाय पर साथ ही उसी दर्शन का एक भाग यह भी है कि अन्यान्यों में विशेष कर साथियों से उपयोगी साधनों को छीन लिया जाय, उन्हें वशवर्ती बनाया और अपने लिए मजूरी करने वाला बनाया जाय। जो इस योग्य नहीं अथवा इन्कार करे उनका सफाया कर दिया जाय। स्वच्छन्द विलास के अतिरिक्त वर्तमान का प्रगतिवादी दर्शन यही है। इसी के अनुरूप पिछले पाँच सौ वर्षों का इतिहास बना है दो सौ वर्षों में तो उसकी प्रौढ़ावस्था रही है। “सरवाइवल ऑफ दी फिटेस्ट” के तर्क को यह विकासवाद इन्हीं सिद्धांतों के माध्यम से प्रस्तुत करता है।

छुटपुट लड़ाइयों के अतिरिक्त पिछले दिनों दो महायुद्ध होकर चुके हैं। उनके सामयिक कारण इतने बड़े नहीं थे कि उन्हें टाला न जा सकता हो, हलका न किया जो सकता हो या पंच फैसले से गुत्थी को सुलझाया न जा सकता हो। दोनों युद्धों की जड़े इतनी उथली थीं कि उन्हें अन्य समस्याओं की तरह सुलझाया जा सकता था। यह दो बड़े युद्ध प्रख्यात हैं। इनके अतिरिक्त पिछले पचास वर्षों में एक दिन भी शांति का नहीं बीता है। छोटे-बड़े युद्ध बराबर चलते रहते हैं। कोरिया, वियतनाम, ईराक, ईरान, अफ्रीका के क्षेत्रों में गोली की गड़गड़ाहट बराबर सुनी जाती रही है। हजारों मरते और घायल होते रहे हैं। पश्चिमी पाकिस्तान के साथ दो बार और बंगाली पाकिस्तान (अब बंगला देश) के साथ एक बार हमारी करारी टक्करें होकर चुकीं हैं। इन गरम युद्धों के अतिरिक्त शीत युद्धों का तो कहना ही क्या? इससे सूना तो कोई क्षेत्र दिखाई नहीं पड़ता। शतरंज की गोटी की तरह बराबर चालें चली जाती रहती हैं, व अभी भी निरन्तर चली जा रही हैं।

यहाँ उनके राजनैतिक और सामयिक कारनामों पर विचार नहीं किया जा रहा है। क्योंकि इस विचारणा से कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होना है। अब तो समय का दर्शन ही यह कहता है कि संसार में केवल सशक्त ही जीवित रहें। कमजोरों को तभी तक जीने दिया जाय जब तक कि वे सशक्तों के लिए वफादार नौकर की तरह प्रसन्नतापूर्वक काम करने के लिए आत्मसमर्पण हेतु सहमत हों। इसके कमी पड़ते ही उनसे सारे साधनों को छीन लिया जाय और कमजोर होते हुए भी वे उनका उपभोग करते रहें।

कुछ समय पूर्व अफ्रीका के जंगलों में से मनुष्यों को रस्सों से कसकर लाया जाता था और अमेरिका में ही नहीं योरोप में भी उन्हें जानवरों की तरह बेच दिया जाता था। इन से वही व्यवहार होता था जो पशुओं के साथ मुद्दतों से होता आया है। जब विरोध में आन्दोलन उठे तो साथ में पूरा आधुनिक दर्शन ही प्रस्तुत किया गया, जिसमें बताया गया कि समर्थों और चतुरों को दुर्बलों के दोहन का अनादिकाल से अधिकार मिला हुआ है।

साम्यवाद के सशक्त एवं आकर्षक नारे को सुनकर लोगों ने यह अनुभव किया था कि दुर्बल सबल सबके समान न्याय मिलेगा। गाय सिंह एक घाट पर पानी पियेंगे, किंतु क्रान्ति के नारे ठण्डे होते ही परिस्थितियाँ बदल गईं। रूस और चीन की क्रांतियों में सरकारें उखाड़ने में जितने लोग हताहत हुए। उससे दूने साँस्कृतिक क्रान्ति के नाम पर नेताओं द्वारा भून डाले गये। इनका कसूर इतना भर था कि वे बँधुआ मजूरों की स्थिति स्वीकार करने में आनाकानी कर रहे थे। जिन्हें जीवित रहना मंजूर था। उनने हाथ ऊँचे करके समर्पण कर दिया कि जो कहा जायेगा वही करेंगे, जैसे रखा जायेगा वैसे रहेंगे।

कभी-कभी मानवी अधिकारों के लुभावने प्रतिपादन सुनने को मिल जाते हैं। लिखने का अधिकार, बोलने का अधिकार, सोचने का अधिकार, जीने का अधिकार आदि मौलिक अधिकारों के सम्मिलित किये गये हैं और उनकी व्याख्या एवं वकालत भी आकर्षक ढंग से की जाती है। लगता है कि सतयुग जैसा शांति युग निकट आ रहा है, पर इस छलावे का नंगा रूप तब खुलता है जब इस दर्शन का वह स्वरूप सामने आता है जिसे एक प्रकार से हर समर्थ ने स्वीकार कर लिया है।

अब समय ने दर्शन वह प्रस्तुत किया है कि समर्थों को उन्नति और सुख-सुविधा तभी मिलेगी या बढ़ेगी जब दुर्बलों के निमित्त जो साधन व्यय होते हैं न होने दिये जांय। उन्हें ठण्डे या गरम तरीके से छीन लिया जाय। इस दर्शन को ‘‘जीवन के लिए संघर्ष’’ नाम दिया गया है। इसके लिए प्रकृति का समर्थन प्रस्तुत किया जाता है। कि वह “वह योग्यतम का चुनाव” स्वीकार करती है। जो योग्यतम नहीं है वह जीकर जगह क्यों घेरे? जीवन संघर्ष में जो हारता है वह हानि का दण्ड भोगे और अपने साधनों को योग्यतम वर्ग के लिए खाली करे। यही है वह दर्शन जिसने अपने जन्मकाल के सौ वर्ष के भीतर ही करोड़ों को उदरस्थ कर लिया है और जो बचे हैं उन्हें जितनी जल्दी सम्भव हो, निगल जाने के लिए योजनापूर्वक कटिबद्ध है। यही है आज की परिस्थितियों का अब तक का लेखा-जोखा।




धर्म और विज्ञान का पारस्परिक सहयोग नितान्त आवश्यक - Akhandjyoti January 1985

धर्म के बिना विज्ञान अन्धा है बिना विज्ञान के धर्म लँगड़ा। दोनों के समन्वय से ही हम शक्तिशाली यथार्थता तक पहुँचते हैं। धर्म हमें श्रद्धा प्रदान करता है पर यदि वह श्रद्धा विवेकहीन हो तो अन्ध श्रद्धा कहलायेगी और लाभ के स्थान पर हानि उत्पन्न करेगी। इसलिए दोनों का औचित्य इसी में है कि एक दूसरे का आश्रय ग्रहण करें और उसे अपनाने का प्रयत्न करें, जो यथार्थता के अत्यधिक समीप है।

इस सम्बन्ध में विज्ञान की पहल सराहनीय है। उसने दुराग्रह नहीं अपनाया। सत्य के लिए अपने द्वार खुले रखे हैं। यदि आज कोई बात गलत निकली तो वह अपनी बात सुधारने के लिए तैयार है। उसका कथन है कि हम सब सत्य की राह के पथिक मात्र हैं। यदि रास्ता भटक गए तो इसमें बेइज्जती की कोई बात नहीं है। हठ करने की अपेक्षा यह अच्छा है कि जो बात गलत साबित हुई है उसे सुधार लिया जाय। इस मान्यता से उसकी ईमानदारी साबित होती है। धर्म को भी उसका अनुकरण करना चाहिए। इससे उसकी सर्वज्ञता का त्रिकालदर्शी होने का दावा करने में कुछ हेठी तो होगी पर उसकी पूर्ति इस बात से हो जायेगी कि देर सबेर में जब भी गलती मालूम हो वह ईमानदारी से उसे स्वीकार के लिए तैयार है।

सर्वज्ञता का दावा तो ऐसे भी कट जाता है। क्योंकि धर्म एक नहीं है। उसकी शाखाएं बहुत बड़ी संख्या में हैं और प्रत्येक की मान्यता एक दूसरे से भिन्न है। यथार्थवादिता को अपनाने वाले इतनी भिन्नताओं को कैसे अंगीकार कर सकते हैं। यदि ऐसा नहीं तो किसी एक धर्म को स्वीकारना चाहिए और शेष सब को गलत कह देना चाहिए। यदि गलत कहा जाय तो किसे कहा जाय? कौन अपने को असत्य कहे जाने के लिए तैयार होगा? अथवा कौन यह कहेगा कि मैं उन आक्षेपों को स्वीकार करता हूँ जो तथ्यों और तर्कों की कसौटी पर खरे सिद्ध नहीं हो रहे।

धर्म और विज्ञान के बीच तालमेल बिठाने से पहले धर्मों को आपस में निपटना होगा और यह सोचना होगा कि किन बातों पर श्रद्धा रखी जाय, किन पर नहीं? आचरणों में से किन्हें धर्म का अंग माना जाय, किन्हें नहीं। दर्शन की दृष्टि में किन प्रतिपादनों को मान्यता दी जाय, किनको नहीं?

इन न सुलझने वाले विवादों को एक ही समुद्र की अनेक लहरें एक ही पेड़ की अनेकों पत्तियाँ कहकर मन को समझाया जाता रहा है। लहरों या पत्तियों में मौलिक अन्तर नहीं होता। इनकी प्रकृति में भिन्नता नहीं पाई जाती। पर धर्मों के बारे में ऐसा नहीं है। उनके मतभेद असीम हैं। इतने असीम कि उन्हीं को लेकर शास्त्रार्थों से लेकर रक्तपात तक होते रहे हैं और अपने अतिरिक्त अन्य सबको असत्य ठहराते रहे हैं। ऐसी दशा में न एकरूपता बनती है और न समस्वरता।

ऐसी दशा में एक मध्यवर्गी मार्ग यह हो सकता है कि कुछ नैतिक नियमों को मान्यता दी जाये और प्रथा प्रचलनों को ऐच्छिक छोड़ दिया जाय। ऐसा करने से कलह मिट जायेगा और आपस में एक दूसरे को असत्य ठहराने का विग्रह रुकेगा।

उदाहरण के लिए ईश्वर के अस्तित्व को मान्यता मिले और उसे कर्मफल का फलदाता ठहराया जाय। कर्मफलों में नैतिक नियमों को पर्याप्त माना जाय। प्रथा प्रचलनों पर विवाद करने की अपेक्षा उन्हें ऐच्छिक ठहरा कर काम चल सकता है। इस प्रकार ईश्वर और धर्म दोनों की प्रारम्भिक सीमा में वैसा ही एकीकरण हो सकता है। जैसा कि विज्ञान की विभिन्न शाखा प्रशाखाओं के अंतर्गत है।

धर्म और विज्ञान दोनों को ही भावी शोध प्रक्रिया और परिमार्जन शैली पर सहमत होना चाहिए। पिछले सौ वर्षों में विज्ञान के अनेक सिद्धांतों में प्रगति हुई है। इसमें पूर्व मान्यताओं को न तो तिरस्कृत कर दिया गया है और न झूठा ही ठहराया गया है। वरन् केवल इतना ही कहा गया है कि जो बच्चा कुछ समय तीन फुट का था और अब पाँच फुट का हो गया। तो दोनों ही परिस्थितियों में किसी प्रकार का टकराव नहीं है। मात्र प्रगति के एक-एक फुट लम्बे दो चरण जुड़ गए हैं। इससे खिन्न होने के स्थान पर प्रसन्न होने की बात है। ईश्वर का अस्तित्व मानने से काम चल जाएगा। फिर उस मान्यता के साथ विधान कर्म जोड़ना हो तो भले बुरे कर्मों के प्रतिफल की व्यवस्था को मान्यता दी जा सकती है। कितना दण्ड पुरस्कार मिलेगा, कब मिलेगा, कहाँ मिलेगा? यह प्रश्न ऐसे हैं। जिनका निर्णय होना फिर कभी के लिए छोड़ा जा सकता है, शोध के लिए।

यही बात धर्म के सम्बन्ध में भी है। धर्म को नैतिक नियमों की मर्यादा में बाँधा जा सकता है। नैतिक नियमों को चिंतन, चरित्र और व्यवहार की ऐसी व्यवस्था के अंतर्गत लाया जा सकता है जो सार्वभौम हो। ‘‘वह मत कीजिए जो आपको अपने लिए अच्छा न लगे। जो बरताव आप अपने साथ किया जाना ना पसन्द करते हैं वह दूसरों के साथ न करें।’’ धर्म के लिए इतनी सार्वभौम परिभाषा जन-जन को स्वीकृत हो सके तो समझना चाहिए कि ईश्वर और धर्म का प्रारम्भिक एवं निर्विवाद रूप बन गया। प्रथा प्रचलनों की परम्परा इसके बाद कभी पीछे के लिए सुरक्षित रखी जा सकती है। इतना धैर्य हमें रखना होगा कि क्रमिक विकास की पद्धति स्वीकार करें और उसमें से जितना सर्वमान्य निकलता चले उतना अंगीकृत करते चलें।

विज्ञान की धर्म रहित स्थिति दयनीय है। इस कारण वह निरंकुश और निष्ठुर हो गया है। उसकी दृष्टि उपयोगितावादी है। प्रस्तुत विज्ञान में दया और करुणा के लिए कोई स्थान नहीं है। यह उसे धर्म से उधार लेनी पड़ेगी। बूढ़े बैल को कसाई के सुपुर्द कर देना वैज्ञानिक अर्थशास्त्र है। औषधि अनुसन्धान के लिए कितने ही जीव जन्तुओं को निर्मम पीड़ा होने से एतराज करना वैज्ञानिक वर्जनाओं के अंतर्गत नहीं आता। विज्ञान को परमाणु बम, रासायनिक बम बनाने और उनका जापान की तरह कहीं भी प्रयोग करने से विज्ञान अपने हाथ नहीं रोक सकता। अन्याय और न्याय में अन्तर करना विज्ञान का काम नहीं है। यह उसकी हृदय हीन प्रकृति है, जो एक कड़वा सत्य है। वह मनुष्य को भी मशीन मानकर चलता है। ऐसी दशा में उसकी उपलब्धियाँ कुछ ही के लिए सुविधाजनक और असंख्यों के लिए असुविधादायक हो सकती है। विज्ञान अपने को ऐसी स्वसंचालित मशीन बनाने में गौरवान्वित होता है जिसे एक यन्त्र मानव चलाता रहे। एक पूँजीपति के लिए प्रचुर मुनाफा कमाता रहे, भले ही उसके बदले हजारों लाखों की आजीविका छिनती रहे।

विज्ञान मस्तिष्क प्रधान है और धर्म हृदय प्रधान। करुणा, सम्वेदना, स्नेह, सहयोग हमें धर्म से मिलते हैं। इनके लिए विज्ञान की प्रयोगशाला में कोई मान्यता नहीं मिलती। धर्म परोक्ष के सपने दिखाता है और यह नहीं देखता कि इससे प्रत्यक्ष प्रगति में बाधा तो नहीं पड़ती।

पूजा सेवा के दो सार्थक शब्द प्राचीन काल से भी मिलते चले आ रहे हैं। अब उन्हें नए सिरे से फिर मिलाया जा सकता है। परमार्थ को ईश्वर की पूजा में सम्मिलित करके लोकोपकारी कार्यों को गठबन्धन में बाँधा जा सकता है। इसके लिए गाँधी जी ने दारिद्र नारायण शब्द ठीक दिया है। सेवा धर्म अपनाकर श्रमदान, अंशदान करते रहना और साथ-साथ मन ही मन भगवान का स्मरण करते रहना उस देवी जागरण या अखण्ड कीर्तन से कहीं अच्छा है, जिसमें विद्यार्थियों की पढ़ाई, नागरिकों का सुख चैन व बीमारों की चिकित्सा में कठिनाई पड़ती है।

विज्ञान को धर्म की प्रकृति पहचाननी चाहिए और धर्म को सोचना चाहिए कि समय हर बात को बुद्धिवाद की कसौटी पर कसे बिना अपनाने के लिए तैयार नहीं। विज्ञान ने अपनी प्रकृति सच्चाई को स्वीकार करने की बनाई तो है पर वह भावना रहित। धर्म ने भाव लोक में विचरण किया है, पर यह नहीं सोचा कि अब इलहाम की दुहाई देने से काम नहीं चलेगा। बच्चे से लेकर बूढ़े तक को अब इस तरह समझना और समझाना पड़ेगा कि प्रतिपादन भावना संगत भी हो और बुद्धि सम्मत भी।




क्षतिग्रस्तता और सहानुभूति - Akhandjyoti January 1985

मनुष्य जीवन में ज्वार भाटे की तरह कई तरह के उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। इनमें से कुछ सफलता परक होते हैं कुछ असफलता परक। सामान्य क्रम हो तो बात दूसरी है, अन्यथा बड़ी असफलता बड़ा दुःख देती है और बड़े लाभ में हर्ष भी विशेष स्तर का होता है। मानसिक संतुलन दोनों ही स्थितियों में गड़बड़ाता है। हानिजन्य कष्ट भी बहुत दुःख देता है और उसका त्रास भी लम्बे समय तक छाया, क्षुभित किए रहता है। सफलता की प्रसन्नता देर तक नहीं टिकती क्योंकि उससे अहंकार का पोषण हो जाने से सन्तुलन पुनः बन जाता है। पर क्षति होने पर इस प्रकार की पूर्ति नहीं होती।

देर तक मन पर प्रभाव डालने वाली योनियों में स्वजनों में से किसी का मर जाना विशेष रूप में अखरता है। जो जितना उपयोगी होता है, जिससे जितनी आशाऐं होती हैं, जिसके साथ जितना लगाव होता है उसके मरण की व्यथा भी अधिक होती है। वयोवृद्ध, जीर्ण शीर्ण देर तक इलाज और सेवा करने पर भी न अच्छे होने वालो के प्रति सद्अवसर होते हुए भी मरण की जिनकी आयु होती है, उपयोगिता भी उतनी नहीं रहती तब उनका देहावसान उतना अखरता नहीं। लोकाचार की दृष्टि से तो दुःख मनाना ही पड़ता है। घर-परिवार के अतिरिक्त कुछ रिश्तेदारियां भी ऐसी हैं, जो अति समीप होती हैं। साले और बहनोई ऐसे ही लोगों में गिने जाते हैं। उनमें से कोई जवान उम्र में चला जाय तो उनके बच्चों को कठिनाई सहनी पड़ती है। साथ ही प्रकारान्तर से अपने को भी उसमें भागीदारी बनना पड़ता है।

मरण के अतिरिक्त बीमारी, चोरी, मुकदमा आदि के झंझट आये दिन खड़े हो जाते हैं, तो उनसे चलती गाड़ी रुक जाती है। बीमारी में एक चारपाई पकड़ता है तो दूसरे को उसकी तीमारदारी के लिए भाग दौड़ करनी पड़ती है। पैसा खर्च होता है सो अलग। कभी-कभी ऐसे रोग हो जाते हैं जिनमें जान जाने की आशंका रहती है। अखरने वाली कठिनाइयों में बीमारी का दूसरा नम्बर है। कभी-कभी कोई बड़ी आर्थिक हानि हो जाती है। किसी बड़ी रकम का चोरी हो जाना, किसी के द्वारा ठगी या बेईमानी से कोई रकम दबा लेना यह भी कम कष्ट दायक कठिनाई नहीं है। जिनके पास काम चलाऊ पैसा है, वे तो ऐसी हानियों को आसानी से बर्दाश्त कर लेते हैं, पर जितने पर जो काम चलाऊ था वही चला जाय तो बड़ी कठिनाई पड़ती है। मुकदमेबाजी भी एक तरह की बीमारी है उसमें चिन्ता, भाग दौड़ तथा आये दिन का खर्च जैसी कठिनाईयाँ सिर पर लदी रहती हैं।

सुविधा का समय सदा रहता है तो असुविधा का भी कभी न कभी जरूर आता है। ऐसा आदमी संसार में कोई नहीं हुआ जिस पर सदा अच्छे दिन ही रहे हों।

बुरे दिनों में सबसे बड़ा सहायक अपना मानसिक सन्तुलन होता है। भीतर का साहस और धैर्य हो तो ऐसी चोटों को कम कष्ट देकर भी सहन कर लिया जाता है। भीतर हड़बड़ी मचे, धीरज छूटे तो मनुष्य कष्ट तो अधिक सहता ही है, परेशान भी ज्यादा दिन रहता है। सबसे बड़ी बात यही है कि उस हड़बड़ी की स्थिति में यह नहीं सूझता कि अगला कदम क्या उठाना चाहिए। क्षति पूर्ति आगे की बात है। सबसे पहली बात है मन की स्थिरता स्थापित करना। क्योंकि इसके बिना सही मस्तिष्क से सही उपाय सोचते ही नहीं बन पड़ता। घबराहट में दूसरे अन्य काम भी बिगड़ने लगते हैं।

कहते हैं कि मुसीबत अकेली नहीं आती, साथ में और भी संकट झंझट लेकर आती है। इसका तात्पर्य यह है कि घबराया हुआ व्यक्ति जो सोचता है, जो करता है, प्रायः वह सब अस्त-व्यस्त होता है। फलतः नये काम बिगड़ने से नये झंझट खड़े होते हैं।

इसलिए मुसीबत के समय के सबसे सच्चे मित्र धैर्य और साहस होते हैं। सन्तुलित मस्तिष्क से समय पर वह सूझ उठती है कि अब क्या करना चाहिए। क्षतिपूर्ति के लिए क्या कदम उठाना चाहिए? यह निर्णय सही हो तो एक तरह न सही दूसरी तरह से समाधान निकल आता है। जीवन का एक निर्धारित कार्यक्रम नहीं है। परिस्थिति के अनुसार उसमें आवश्यक हेर-फेर किया जाता रहता है और किया जाना चाहिए। प्रस्तुत क्षति का समाधान किसी दूसरे ढंग से निकालना स्थिर बुद्धि का ही काम है। ऐसे समय में मानसिक सन्तुलन से बढ़कर और कोई मित्र नहीं हो सकता है, जो बताता है कि मुसीबत का दबाव हलका करने के लिए क्या नीति अपनानी चाहिए, क्या कदम उठाना चाहिए? इतनी बात ठीक बन पड़े, तो समझना चाहिए कि आधा बोझ हलका हो गया।

इसके बाद सहानुभूति प्रकट करने वाले आगंतुकों का नम्बर आता है। प्रचलित रिवाज के अनुसार किसी हितू पर मुसीबत आने पर निकटवर्ती स्वजन सहानुभूति प्रकट करने पहुँचते हैं। सहानुभूति का स्वरूप यह होना चाहिए कि संकटभ्रांत का मनोबल बढ़े और ऐसी सलाह मिले जिससे वह प्रस्तुत समस्या का समाधान सही रीति से खोज सके। यह कार्य व्यवहार कुशल अनुभवी आदमियों का है। इसलिए यदि कारगर सहानुभूति प्रकट करना अभीष्ट हो तो उन्हें दो उद्देश्य लेकर जाना चाहिए कि वे मनोबल, धैर्य, साहस और सन्तुलन बढ़ाकर लौटेंगे। साथ ही क्षति के कारण जो खाई पड़ी है उसे किसी प्रकार पाटेंगे। उपयुक्त सलाह भी कई बार बहुत काम दे जाती है। जो बात स्वयं नहीं सोची जाती, उन्हें बुद्धिमान लोग सोचकर बता देते हैं। सहानुभूति प्रकट करने वालों को एक बात और ध्यान रखनी चाहिए कि हर आदमी के पास रहने के सीमित मकान होते हैं। उनसे बाहर के मेहमानों को खपाने में भारी कठिनाई होती है। परेशानी में फंसे हुए आदमी के ऊपर आदर सत्कार का, ठहराने का तथा विशेष भोजन का भार नहीं लादना चाहिए। अच्छा हो रात वहाँ न बसे। बसना ही पड़े तो किसी बहाने अन्यत्र ठहरने की व्यवस्था कर लें।

कई बार सहानुभूति प्रकट करने के नाम पर ऐसे मूर्ख जा पहुंचते हैं जिन्हें इस सम्बन्ध में कोई ज्ञान या अनुभव नहीं है। जब तक रहते क्षति वाली घटना को ही दुहराते रहते हैं। या मालूम होते हुए भी घर वालों से पूछते रहते हैं। इस कथानोपकथन में शोक और दुःख की ही चर्चा होती रहती है। इनमें दूर या पड़ौस के दस सहानुभूति प्रकट करने वाले आये तो वही चर्चा निरन्तर चलती रहेगी। इसमें दुःखी व्यक्ति का दुःख और भी अधिक बढ़ता है। समय तो खराब होता ही है। यदि दुःख हलका करने वाली बातें कही गई होतीं, मनोबल बढ़ाया होता, कोई उपयोगी परामर्श दिया होता तो भी कोई बात थी। पर सहानुभूति के नाम पर घटित हुई घटना की चर्चा ही दिन भर चलती रही तो इससे दुःख घटा कहाँ बढ़ा? इस पुनरावृत्ति में कई बार तो पीड़ित व्यक्ति खीजने लगता है और उपेक्षा दिखाने लगता है।

इसलिए सहानुभूति प्रकट करने के लिए बड़े बूढ़ों के, समझदारों के जाने भेजने का रिवाज है। नई उम्र के, नये रिश्तेदार, अपना ठाट-बाट दिखाने जा पहुँचते हैं तो चाहते हैं कि घर के सब लोगों का ध्यान हमारी ओर ही रहे। हमारी खातिरदारी होती रहे। चर्चा के नाम पर न साहस बढ़ाना आता है न नया कार्य सुझाना। बेहूदे ढंग से यह दोनों काम किये जाँय तो उलटे बुरे लगते हैं। ऐसे समय में जो कहा जाये उससे न तो दुर्घटना की दुःख भरी चर्चा को सर्वथा छोड़ा जा सकता है और न पूरे समय वही राम कहानी कहते रहने की कोई तुक है। नया परामर्श दें तो वह भी दबी जवान से देना चाहिए अन्यथा माना जा सकता है कि हमारा मखौल उड़ाया जा रहा है। हमें बेवकूफ समझा जा रहा है। सहानुभूति की रस्म निभाना भी बड़ी समझदारी का शिष्टाचार का काम है। बेअकल आदमी का उस रस्म को पूरा करने के लिए जा पहुँचना प्रसन्नता का नहीं नाराजी का कारण बनता है। सहानुभूति वाले भी खीज पैदा करते हैं इसलिए या तो दुर्घटना होते ही जा पहुँचे या फिर बात ठण्डी पड़ जाय तब बाद में जाना उचित है।

सहानुभूति रस्म की चर्चा इसलिए की गई कि वह एक लोकाचार बन गई है। अच्छा हो वह पत्र से ही प्रकट कर दी जाय। अथवा शान्ति हो जाने पर कोई काम की बात कहने जाया जाय। अथवा शांति हो जाने पर कोई काम की बात कहने जाया जाय। असली सहानुभूति तो व्यक्ति अपने धैर्य और साहस के सहारे स्वयं ही बनाता है। क्योंकि शान्त चित्त से सोचना उसी को है और बिगड़ी बनाने के लिए उपयुक्त कदम उसी को ही उठाना है।




उलटवाँसियों में निहित कबीर का रहस्यवाद - Akhandjyoti January 1985

कबीर की उलटवाँसियाँ पहेली बुझौअल के रूप में है। उनने अध्यात्म तत्वज्ञान तथा साधना विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को इनमें गागर में सागर की तरह भर दिया है। पहेलियों के रूप में इनकी गम्भीरता को समझा जा सके और कौतूहल के साथ इन्हें चिरकाल तक स्मरण भी रखा जा सके यह कबीर का प्रमुख प्रयोजन मालूम पड़ता है। यहाँ ऐसी ही तीन उलटवाँसियाँ और दी जा रही हैं।

मिथ्या मनोविनोद-

हरि के बारे बड़े पकाये, जिन जारे तिन पाये। ज्ञान अचेत फिरै नर लोई, तामे जनमि जनमि डहकाये।

धाल मन्दलिया बैल रबाबी, कऊआ ताल बजावै। पहिर चोलिनी गदहा नाचै, भैंसा निरति करावै।

स्यंध बैठा पान कतरै, घूंस गिलौरा लावै। उदरी बपुरी मंगल गावै, कहू एक आनन्द सुनावै।

कहे कबीर सुनो रे सन्तो, गड़री परवत खावा। चकवा बैठि अंगारै निगलै, समुद्र अकासा धावा।

अर्थात्- हरि के बाड़े में बड़े पके- जिनने पकाये, उनने पाये। मनुष्य में अचेत फिरता है, हे लोई! इसी से जन्म जन्म बहकाया है।

बैल ने थाली और रकाबी भर ली। कौआ ताल बजाने लगा। चोलनी पहन कर गदहा नाचा। भैंसा ने निरति कराई। घोड़ा बैठा पान कुतरे। घूसने गिलौरा खाये। बेचारी चुहिया मंगल गाती है। कुहू एक आनन्द भरी ताल सुनाता है।

कबीर संतों को सुनाकर कहते हैं भेड़ ने पर्वत खा लिया। चकवा ने बैठकर अँगारे निगले और समुद्र आकाश की ओर दौड़ पड़ा।

तात्पर्य है कि ईश्वर के बाड़े में क्षेत्र में जिनने बड़े पकाये, उन्हीं ने उसके प्रतिफल चखे। बड़े पकाने से तात्पर्य साधना करने से है और बाड़ा अर्थात् क्षेत्र। बाड़े बड़े पकाना अर्थात् भगवान की परिधि में साधना करना जो करेगा उसका प्रतिफल मिलेगा ही। कबीर अपनी पत्नी लोई को संबोधित करते हुए कहते हैं उनकी चेतना गगन में अचेत होकर फिरती है। डहकाये अर्थात् डगमगाती हुई। जो बड़े बन गये उन्हें खाने के लिए बैल थाली और रकाबी लेकर आ पहुँचा। चेतना ने साधना का परिश्रम किया पर मन रूपी मूर्ख बैल उसका प्रतिफल पाने के लिए पहले तैयार होकर आ गया और साथ-साथ ही कुसंस्कारी चित्त (कौआ) ताली बजाने लगा। प्रसन्नता प्रकट करने लगा अथवा ताल में ताल देकर समर्थन करने लगा। (गदहा) अहंकार चुनरी ओढ़ कर नाचने लगा। बिना परिश्रम किए ही बड़े खाने को मिलेंगे तो साथियों के साथ मजा उड़ाने में कितना आनन्द आयेगा। इतने में भैंसे की भी बन आई। गदहा मूढ़ता का और भैंसा जड़ता का प्रतीक है। भैंसे से कुछ और श्रृंगार करते तो बन न पड़ा तो इन सबसे निरति कराने लगा। निरति से अभिप्राय यहाँ गुदा मैथुन से है साथ ही दूसरा अर्थ है समाधि का। भैंसा समाधि का सपना देखने लगा अथवा उसका ढोंग बनाने लगा। इस माहौल में स्पन्दन (रथ अथवा घोड़ा) पान कुतरने लगा। सब मूर्खों के साथ उनकी भी बन आई। घूंस (बड़ा चूहा) गिलौरा खाने लगी। गिलौरा दुहरे पान को भी कहते हैं और लड्डू को भी। जब इतना त्यौहार मनाया जा रहा है। खुशी का अवसर आया तो बेचारी चुहिया मंगल गीत गाने लगी। चुहिया अर्थात् बुद्धि भी सुखद सम्भावनाओं के गीत गाने लगी।

इतने में कुहू की भी बन आई और वह आनन्द गीत गाने लगी। कुहू से मतलब इस मलमूत्र की गठरी जैसे शरीर से है। इस माहौल में कामना (भेड़) ने पर्वत खा लिया। लक्ष्य को प्राप्त करना पर्वत है और उसे प्राप्त करने वाले के लिए कल्पना ने ही ताना-बाना बुनना शुरू कर दिया। चकवा बादलों का जल पीता है पर उसने चकोर की तरह अंगार खाना शुरू कर दिया। सभी ठाट उलटे ठनने लगे। चेतना परिकर के सभी सदस्यों ने बड़े पकाने का सरंजाम जुटाते-जुटते इतनी खुशियाँ मनानी शुरू कर दी मानो यह सभी बड़ा सरल हो। इतनी सस्ती और सुखद शेखचिल्ली वाली कल्पना तो ऐसी है मानो समुद्र उछलकर आकाश निगलने की तैयारी कर रहा हो।

लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है। उसके लिए धैर्यपूर्वक कठोर साधना लम्बे समय तक करनी पड़ती है। पर चेतना परिकर की मूर्खता तो देखिये। समय से पहले ही बिना मूल्य चुकाये ही पूरा समुदाय ऐसी कल्पना कर रहा है मानो यह सब बहुत ही सरल है। उड़ाने उड़ने भर से सारा प्रयोजन पूरा हो जायेगा। खुशियाँ इसी बात की मनाई जा रही हैं और यह भुला दिया जा है कि लक्ष्य प्राप्ति के लिए जितनी कठिन मंजिल पार करनी पड़ती है। वह लोहे के चने चबाने और तलवार की धार पर चलने के समान कठिन है। जो इतना कर पाते हैं वे ही बड़े खाकर पेट भरते हैं। अन्यथा कल्पना के साथी सहचर तो झूठी खुशियाँ मनाते रहते हैं।

जागृति और सुषुप्ति- सन्तो जागत नीद न कीजै। काल नहीं खाई कल्प नहीं व्यापै, देह जरा नहि छीजै। उलटि गंगा समुद्रहि सोखै, शशि और सूर गरासै। नवग्रह मारि रोगिया बैठे जल में बिब प्रकाशै। बिनु चरणन कै दुहु दिस धावै, बिनु लोचन जग सूझै। ससा उलटि सिंह को ग्रासै, अचरज कोऊ बूझै।

शब्दार्थ- ‘‘संतो गहरी नींद में निरत मत हो जाओ। यदि जागते रहोगे तो काल नहीं खा सकेगा। कल्प नहीं व्यापेगा और देह बुढ़ापे के कारण छीजेगी नहीं।

गंगा उलटकर समुद्र को सोखेगी। सूर्य और चन्द्रमा को ग्रस लेगी। रोगिया (मन) नवग्रहों को मारकर बैठेगा। पानी में बिम्ब भर दिखेगा।

बिना पैरों के दोनों दिशाओं में दौड़ना होगा। बिना आंखों के सब कुछ दिख पड़ेगा। खरगोश उलटकर सिंह को निगलेगा। इस अचम्भे का कोई रहस्य बताये तो बात बने।’’

तत्वार्थ- कबीर सोने को हानि और जागने को लाभ बताते हैं। यह सोना जागना शरीर का नहीं, अन्तःकरण का है। शरीर तो दिन का काम करने के बाद जब थकेगा तो उसे सोना ही पड़ेगा। न सोए तो बीमार पड़ेगा। यहाँ जागने से तात्पर्य आत्मा की जागरुकता से है। प्रमाद रहित स्थिति एवं लक्ष्य के प्रति तत्परता से है। जो चौकन्ना रहेगा, चारों ओर से होने वाले आक्रमणों से अपने को बचाता रहेगा और यात्रा पथ में रुकेगा नहीं। वह ऐसे आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त करेगा जिसे कौतूहल से कम महत्व का नहीं समझा जा सकेगा। उसे काल नहीं खायेगा और बुढ़ापे के कारण खीजना नहीं पड़ेगा। यह जागृत आत्मा के लक्षण हैं। शरीर तो समयानुसार बदलता ही रहेगा।

आत्मज्ञान की गंगा इस संसार की वासना, तृष्णा के समुद्र को सोख लेगी और ऐसा धुँधला कर देगी जैसा कि ग्रहण पड़ने पर सूर्य व चंद्र धूमिल हो जाते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, वासना, तृष्णा, अहंता यह नौ ग्रह हैं। यह रोगी मन को त्रास देते हैं और मन चाहा नाच नचाते रहते हैं। पर जागृत आत्मा का मन जिसे रोगी समझा जाता है इन दुर्गुण रूपी नवग्रहों को पछाड़ देता है। इतना ही नहीं आत्मा इतना निर्मल हो जाती है कि उसमें भगवान के दर्शन वैसे ही होने लगते हैं जैसे निर्मल जल में चन्द्रमा की झाँकी होती है।

चेतना के चरण नहीं हैं तो भी वह ऊपर उठते और आगे बढ़ने की दोनों दिशाओं में सरलतापूर्वक बढ़ता चलता है। चेतना की आंखें नहीं हैं तो भी उसे वस्तुस्थिति के प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों क्षेत्रों में दर्शन होते हैं। ईश्वर का अंश और “अणोरणीयान् महतोमहीयान्’’ होने के कारण चेतना को खरगोश की उपमा दी गई है, पर जब आत्मा की स्थिति सशक्त और पवित्र हो जाती है तो इस विस्तृत, भयंकर संसार की माया को सहज ही निगल जाता है।

कबीर संतों से पूछते हैं कि इस रहस्य भरे आत्म ज्ञान को तुमसे कोई जानता हो तो बताओ।

‘सहस्र दल’ कमल-

ब्रह्म अगिनि में काया जारै, त्रिकुटी संगम जागै। कहै कबीर सोई जोगेश्वर, सहज सुन्न ल्यौ लागै।।

सहज सुन एक बिरवा उपजा, धरती जलहर सोख्या। कहि कबीर हो ताका सेवक, जिन यहु बिरवा देख्या॥

जन्म मरन का भय गया, गोविन्द लौ लागी। जीवन सुन्न समानिया गुरु साखी जागी।

शब्दार्थ- ब्रह्म अग्नि में काया जलायें। त्रिकुटी का संगम जग पड़े। कबीर कहते हैं कि जोगेश्वर वही है जिसकी लौ सहज शून्य में लग जाये।

सहज शून्य में एक पेड़ उपजा। धरती ने समुद्र सोख लिया। कबीर कहते हैं- जिसने यह पेड़ देखा होगा मैं उसका सेवक हूँ।

गोविन्द से लौ लगी तो जन्म मरण का भय चला गया। जीवित रहते हुए ही शून्य में समा गया। ऐसे जागरण का गुरु साक्षी है।

तात्पर्य- ब्रह्माग्नि में काया को जलाया। अर्थात् ब्रह्मज्ञान से शरीर भाव को नष्ट किया। शरीर को वासनाओं का केन्द्र न मानकर ईश्वर का घर मानें, ऐसी अन्तःचेतना जगायें जिससे आत्मभाव ही परिलक्षित हो। शरीर रहे तो उसमें शरीर के साथ रहने वाले कषाय-कल्मषों का अस्तित्व ही न रहे।

त्रिकुटी में संगम करने से आज्ञाचक्र जगता है और दिव्य दृष्टि प्रखर होती है। त्रिकुटी में संगम करने से ब्रह्म कमल जागृत होता है और उससे खेचरी वाला अमृत टपकता है।

कबीर कहते हैं कि जो कोई इस स्थिति को प्राप्त कर लेता है वही सच्चा योगेश्वर है। उसमें सहज ही तुरीयावस्था, शून्यावस्था, समाधि प्राप्त हो जाती है।

सहज शून्य में एक वृक्ष उपजता है। साथ ही धरती समुद्र को सोख लेती है। यह वृक्ष सहस्र दल कमल है। इसी को सहस्र फन वाला शेष नाग कहा गया है। यही शिवजी का कैलाश पर्वत है। यही गीता का वह अश्वत्थ है जिसकी जड़े ऊपर और शाखाएँ नीचे बताई गई हैं। यह स्थिति आने पर धरती-आत्मा, इस विश्व विस्तार के माया जंजाल को सोख लेती है।

कबीर कहते हैं कि जिस किसी आत्मज्ञानी योगी ने यह वृक्ष देखा हो, मैं उसका सेवक हूँ। यह स्थिति आने पर जन्म मरण का भय चला जाता है और आत्मा भगवान में लवलीन हो जाती है। जीवन रहते शून्य समाधि का अनुभव होता है। इस तथ्य को मात्र गुरु साक्षी से ही जाना जा सकता है।




पेट भरने की फिराक (kahani) - Akhandjyoti January 1985

एक सियार सवेरे-सवेरे पेट भरने की फिराक से निकला। छाया लम्बी थी। अपने आकार का अनुमान उसने इसी छाया से लगाया। सोचा इतने बड़े पेट के लिए हाथी का शिकार तो चाहिए ही।

सो वह हाथी खोजने के लिए चल पड़ा। झाड़ियों पर झाड़ियाँ खोजी पर हाथी का पता न चला। कई घंटे बीते और दोपहर हो गयी।

थका सियार सुस्ताने के लिये खड़ा हो गया। छाया पर दुबारा नजर डाली तो वह सिकुड़ कर पैरों के नीचे आ गई थी।

अब उसे नये सिरे से सोचना पड़ा। जब आकार इतना ही छोटा है तब तो वह एक मेंढ़की से भी भर सकता है। उसने चिन्ता छोड़ दी और सरलता से पेट भरकर झाड़ी में सो गया। साढ़े पाँच फुट का मनुष्य क्या जीवन भर यही नहीं करता फिरता।




कर्मफल व्यवस्था का एक सुनिश्चित स्वचालित तंत्र - Akhandjyoti January 1985

हमारे कर्म ही समयानुसार भले बुरे परिणामों के रूप में सामने आते रहते हैं। सृष्टा ने ऐसी स्वसंचालित प्रक्रिया बनाई है कि अपने कृत्यों का परिणाम स्वयं भुगत लेने का चक्र सुव्यवस्थित रूप से चलता रहता है। यह उचित ही हुआ। अन्यथा हर व्यक्ति के द्वारा चौबीस घण्टे में जो भले बुरे कृत्य होते रहते हैं वे जन्म भर में इतने अधिक इकट्ठे हो जाते हैं कि इन फाइलों को पढ़ना और दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करना एक न्यायाधीश के लिए सम्भव न होता। इतने मनुष्य के लिए इतने न्यायाधीश नियुक्त करने में भगवान की कितनी परेशानी पड़ती।

झंझट से बचने और व्यवस्था को सुचारु रखने के लिए भगवान ने मनुष्य के भीतर ऐसा स्वसंचालित तन्त्र फिट कर दिया है जो कर्मों का लेखा जोखा रखता और उसके दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करता है। यह है मनुष्य का अचेतन मन जिसे धर्म ग्रंथों की भाषा में चित्र गुप्त भी कहा गया है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार प्रत्येक मनुष्य के कर्मफल का बहीखाता उन्हीं के पास है और प्रतिफल का निपटारा यथावत् वे ही करते रहते हैं। फोटोग्राफी के फिल्म की तरह वे दृश्यों का अंकन करते रहते हैं। टेप रिकार्डर की तरह उनकी मशीन पर जो घटित होता रहता है उसका अंकन चलता रहता है और समय आने पर उसकी प्रतिक्रिया यथा समय सामने आ खड़ी होती है।

शास्त्रों ने अनेक स्थानों पर इस बात का उल्लेख किया है कि मनुष्य अपने कर्मों को स्वयं ही भोगता रहता है। साधारणतया यही देखने में भी आता है। सत्कर्म करने वाले ऊँचे उठते, प्रतिष्ठा पाते और सुखी रहते हैं। कुकर्मी उनकी बुरी परिणति भुगतते रहते हैं। इसमें कई बार देर लग जाती है और मनुष्य अधीर होकर कर्मफल पर अविश्वास व्यक्त करने लगता है और निर्भय होकर उच्छृंखलता पर उतारू हो जाता है। सत्कर्म करने वाले जैसे सत्परिणामों की आशा करते थे वैसा न मिलने पर वे भी निराश होते और अविश्वासी बनते देखे गये हैं। इसे सृष्टि व्यवस्था का एक रहस्य कह सकते हैं। कर्मों का परिणाम यथावत् होने की बात निश्चित होते हुए भी उसमें विलम्ब लग जाता है। इस विलम्ब का समाधान बताने के लिए इतने शास्त्रों की रचना हुई है। धर्मों उपदेशकों को समय-समय पर इसके लिए भारी श्रम करते रहना पड़ा है। मनुष्य की विवेक बुद्धि एवं श्रद्धा निष्ठा की परीक्षा इसी पर होती रही है। अन्यथा यदि हाथों हाथ कर्मफल मिला होता तो समझने समझाने की इतनी जरूरत न पड़ती।

चोरी करते ही हाथों में लकवा मार जाय। कुमार्ग पर चलने वालों के पैर लड़खड़ा जाते। झूठ बोलने वाले की जीभ ठप्प हो जाती। कुदृष्टि डालने वालों को दिखना बन्द हो जाता। व्यभिचारी नपुंसक हो जाते तो फिर धर्मशास्त्रों की, उपदेशकों की, पुलिस कचहरी की कोई आवश्यकता न पड़ती। कुकृत्य करने की किसी की हिम्मत ही न पड़ती। अच्छे कर्मों के सत्परिणाम हाथों हाथ मिलते तो हर आदमी इसी को लाभदायक व्यवसाय समझकर अपने मन से ही किया करता। पर इसे भगवान की मसखरी ही समझना चाहिए कि विलम्ब से प्रतिफल मिलने के कारण लोग अधीर हो उठते हैं और विश्वास ही गँवा बैठते हैं। उससे उत्पन्न होने वाले असन्तुलन को सम्भालने के लिए संतों और सुधारकों को आना पड़ता है और बात बेकाबू होती है तो उसके लिए भगवान को आना पड़ता है। मनुष्य की अपनी दूरदर्शिता की परीक्षा का तो यही केन्द्र है।

बीजों में कुछ ऐसे होते हैं जो एक सप्ताह के भीतर हरियाली दे जाते हैं और तीन महीने उनकी फसल भी कट जाती है। पर कुछ ऐसे हैं जो बहुत देर लगाते हैं। ताड़ का बीज बोने पर एक वर्ष में अंकुर फोड़ता है हर वर्ष कुछ इंच बढ़ता है और पाँच सौ वर्ष की आयु तक जीता है जबकि मक्का पकने में थोड़े ही दिन लगते हैं। स्कूल में दाखिल होने के उपरान्त स्नातक बनने और अफसर पद पर नियुक्त होने में चौदह वर्ष प्रतीक्षा करनी पड़ती है। होता यह भी है कि मजूर दिन भर मेहनत करने के बाद शाम को अपनी मजूरी के पैसे ले जाता है।

असंयम बरतने वालो का स्वास्थ्य खराब तो होता है पर उसमें देर लगती है। देखा यह भी गया है कि नशा पीते ही मदहोशी चढ़ दौड़ती है। उपरोक्त उदाहरणों में यह प्रकट है कि कभी-कभी तो परिणाम जल्दी मिलता है पर कभी उसमें देर हो जाती है। कुछ देर तो हालत में लगती है, आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता है। कर्मफल के सम्बन्ध में भी यह देर सबेर का चक्र चलता है। पर परिणाम होना सुनिश्चित है। भाग्य का कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं वह पिछले किये हुए कर्मों का ही प्रतिफल है।

चिकित्सा विज्ञान की नवीनतम खोज यह है कि शारीरिक और मानसिक बीमारियों का प्रधान उद्गम केन्द्र मस्तिष्क है। क्योंकि सारे शरीर पर मूल नियंत्रण उसी का है। मनः क्षेत्र उद्विग्न होगा तो शरीर की स्थिति सामान्य होने पर भी कोई न कोई रोग आये दिन घेरे रहेंगे। विकृति रहने तक औषधि उपचार में कोई स्थायी निराकरण न हो सकेगा। यदि मन प्रफुल्ल और हलका हो तो शारीरिक कारणों से उठने वाले रोग तो प्रकृति ही समयानुसार अच्छे कर देती है या फिर मामूली उपचार से दूर हो जाते हैं। पर एक के बाद एक उठते रहने का सिलसिला मनोविकारों के कारण ही होता है।

मानसिक दृष्टि से कितने ही व्यक्ति बड़े बेतुके, अविचारी, उद्धत, सनकी, शेख चिल्ली लोकाचार का ध्यान न रखने वाले होते हैं। उन्हें पागल तो नहीं कह सकते पर अधपगले से कम भी उनकी स्थिति नहीं होती। ऐसे लोग अपने लिए और दूसरों के लिए भारभूत ही सिद्ध होते हैं। वे किसी को नहीं सम्भाल पाते उल्टे उन्हीं को दूसरों के द्वारा सम्भालना पड़ता है। ऐसे लोगों को विकृत व्यक्तित्व कहते हैं। उनकी उपयोगिता, प्रगति एवं सफलता निरन्तर घटती ही जाती है। बुढ़ापा आने पर तो ऐसे लोगों की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो जाती है।

मानवी चेतना का मौलिक स्वभाव सज्जनता सद्भावना से जुड़ा हुआ है। उसमें जब अनाचार घुसते पड़ते हैं तो काँटे की तरह चुभते रहते हैं और बेचैनी उत्पन्न करते हैं। दुष्टता बरतने से दूसरों की जो हानि होती है उसकी तुलना में अपनी हानि कहीं अधिक होती है। दूसरे तो चोट खाते समय ही हैरान होते हैं पर अपने भीतर आत्म प्रताड़ना का एक ऐसा राक्षस घुस बैठता है जो आजीवन त्रास देता रहता है।

कुकर्मों की आदत डालते ही अपने भीतर एक असुर उत्पन्न होता है। स्वाभाविक प्रकृति दैवी है। जगह एक के रहने लायक ही है पर मनःक्षेत्र में दो व्यक्तित्व परस्पर विरोधी प्रकृति के घुसते हैं तब निरन्तर संघर्ष करते हैं। देवासुर संग्राम की स्थिति बना देते हैं। एक आगे धकेलता है दूसरा पीछे घसीटता है। दो साँड जिस खेत में लड़ते हैं उसकी हरी-भरी फसल को रौंद कर रख देते हैं। कोई उपयोगी सामान उधर रखा हो वह भी बिखर जाता है। एक म्यान में दो तलवारें ठूंसने पर म्यान फटता है और तलवारों को भी खरोंच आती है। दो परस्पर विरोधी व्यक्तित्व गढ़ लेने पर उनका द्वन्द्व युद्ध देखते ही बनता है। आत्म हनन इसी स्थिति को कहते हैं।

संसार में पागलपन तेजी से बढ़ रहा है। आँकड़े बताते हैं कि शारीरिक रोगियों की तुलना में मानसिक रोगियों की संख्या कई गुनी है। सनकी एवं अर्ध विक्षिप्तों की संख्या गिनी जाय और उनके द्वारा हानियों का लेखा जोखा लगाया जायेगा तो प्रतीत होगा कि मानव समाज की सबसे बड़ी समस्या यही है। गरीबी से भी बड़ी। गरीब की समझदारी तो कायम रहती है पर अधपगले तो आये दिन ऐसा सोचते और करते रहते हैं जिससे उन्हें स्वयं भी नहीं, मित्र-शत्रुओं, परिचितों तक को पग-पग पर त्रास सहने पड़ें।

मनोविज्ञान शास्त्र में मस्तिष्क की श्रेष्ठता को खा जाने वाला दो व्यक्तित्वों का उपजना, परस्पर अन्तर्द्वन्द्व करना ही प्रधान कारण है। यह दूसरा असुर अपने ही अचिन्त्य चिन्तन और कुकर्म करने से उत्पन्न होता है। ऐसे व्यक्ति स्वयं तो सदा बेचैन रहते ही हैं, जिनके भी संपर्क में आते हैं उन्हें भी सताते रहते हैं। कुकर्मी, दुर्व्यसनी भी होते हैं। उन्हें नशेबाजी, व्यभिचार, चोरी, छल, ठगी, शेखीखोरी जैसी कितनी ही कुटेवें पीछे लग लेती हैं। और उनकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक एवं पारिवारिक स्थिति दयनीय बना देती हैं। ऐसे लोगों पर से दूसरों का विश्वास उठ जाता है। अविश्वासी के साथ कोई आदान-प्रदान नहीं करता। सहयोग देना तो दूर। साथियों का अविश्वास पात्र बना हुआ व्यक्ति मरघट के भूत की तरह एकाकी रह जाता है। समय पर काम आने वाला उसका एक भी मित्र नहीं रहता। चाटुकार ही स्वार्थ सिद्धि के लिए पीछे लगे रहते हैं और जब उन्हें उसमें कमी दिखती है तो छिटक कर अलग हो जाते हैं। यह हानि साधारण नहीं समझी जानी चाहिए, व्यक्तित्व गँवा बैठने के उपरान्त फिर आदमी के पास बचता ही क्या है। वह जीवित रहते हुए भी मृतकों में गिना जा सकता है।

यह नारकीय स्थिति है। भीतर से आत्म प्रताड़ना और बाहर से भर्त्सना जिस पर बरसती है उसे साक्षात् नरकवासी कहा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक रोगों से उद्विग्न रहने वाले नरक ही भोगते हैं। लोक-लोकांतरों में नरक है या नहीं। कुम्भीपाक, वैतरणी आदि का अस्तित्व है या नहीं। इस विवाद में पड़े बिना इतने से भी काम चल सकता है कि जो अपनी शांति और प्रतिष्ठा गँवा बैठा उसके लिए मानव जीवन की सरसता कोसों पीछे रह गयी।

सरकार को चकमा देकर राज दण्ड से बचा जा सकता है। समाज की आंखों में भी धूल झोंकी जा सकती है। पर आत्मा की अदालत ऐसी है जिसने सब कुछ देखा सुना है उसके दण्ड से छुटकारा पा सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। यहाँ देर तो है पर अन्धेर नहीं है। मनुष्य के लिए थोड़े से दिन का विलम्ब ही उसकी आस्था डगमगा देता है, पर तत्वज्ञानियों की दृष्टि से यह जीवन असीम और अनन्त है। एक जन्म का समय बीतना उसके लिए एक रात की निद्रा लेकर नये प्रभात पर फिर उठने के समान है। आज का लिया कर्ज परसों चुकाने की शर्त पर मिल गया है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह सदा के लिए मुफ्त में मिल गया और फिर कभी वह देना न पड़ेगा। बहुत से लोग जन्म से ही अन्धे, अपंग उत्पन्न होते हैं। कइयों की प्रतिभा जन्म से ही ऐसी अद्भुत होती है कि दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। इसे पूर्व संचित संस्कारों का प्रतिफल कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी

किसी के पास यदि पैसा कम है, पद छोटा है अथवा शरीर मोटा नहीं है तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि वे भाग्यहीन हैं। सच तो यह है कि यह जंजाल जितने कम होंगे आदमी उतनी ही तेजी से श्रेय पथ पर बढ़ सकेगा और वह लाभ प्राप्त कर सकेगा। जिसके कारण आत्मा की प्रसन्नता और परमात्मा की अनुकम्पा अजस्र मात्रा में बरसने लगे। ऋषियों में से प्रत्येक के पास साधन सामग्री स्वल्प थी। विवेकवानों को औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकार करना पड़ता है और इससे अधिक यदि वे किसी प्रकार उपलब्ध कर सकें तो दूसरे हाथ से उसे सत् प्रयोजनों के लिए अविलम्ब लगा भी देते हैं। तपस्वी शक्ति संग्रह करते हैं। यह प्रक्रिया अपने साथ कठोरता बरतने और सर्वतोमुखी संयम अपनाने से ही बन पड़ती है। इस मार्ग को अपनाने वालो में से किसी को अपने दुर्भाग्य की शिकायत करते नहीं सुना गया। वरन् उनकी गरीबी की गरिमा को समझते हुए, हरिश्चन्द्र, हर्ष-वर्धन, अशोक आदि ने अपनी अमीरी को स्वेच्छापूर्वक निछावर कर दिया था।

ऊँचा उठने वालों को हलका बनाना पड़ता है, यदि किसी को कम वैभव से काम चलाने की परिस्थिति में रहना पड़ रहा है। अथवा अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने में कष्ट सहना पड़ रहा है तो उसे आन्तरिक दृष्टि से प्रसन्नता अनुभव करते ही पाया जायेगा। इसके विपरीत जिनने अनीतिपूर्वक वैभव जमा कर लिया है। अथवा उच्छृंखल विलास दम्भ पूर्ण प्रदर्शन का साधन जुटा लिया है तो उसे भीतर और बाहर से लानत ही बरसती अनुभव होगी। इस सन्तोष पर कुबेर के खजाने को निछावर किया जा सकता है।

कर्मफल सुनिश्चित है। उसके लिए किसी अन्य न्यायाधीश की या अन्य लोक में जाने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। अपने भीतर ही ऐसा स्वसंचालित तंत्र विराजमान है, जो कृतियों का प्रतिफल उपस्थित करता रहता है, इसमें थोड़ा विलम्ब लगते देखकर किसी को तनिक भी अधीर नहीं होना चाहिए।




घ्राणेन्द्रियों का महत्व भी कम नहीं - Akhandjyoti January 1985

ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से ही मनुष्य ने वे उपलब्धियाँ हस्तगत की हैं, जो अन्यान्य जीवधारियों को प्राप्त नहीं हैं। मानवी मस्तिष्क रूपी ऊर्जा नाभिक के चारों ओर ही वे सारे क्रिया-कलाप होते दिखाई पड़ते हैं जिन्हें महत्वपूर्ण माना जाता है। इनमें भी आंखों व कानों को अधिक महत्ता प्राप्त है। दैनन्दिन जीवन में, सीखने, पारस्परिक व्यवहार में जिन ज्ञानेंद्रियों का उपयोग होता है, उन्हें महत्व मिलना स्वाभाविक है। घ्राणेंद्रियों को अभी तक गौण माना जाता रहा है, लेकिन अब वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि घ्राण एवं स्वाद सम्बन्धी ज्ञान तन्तु भी मस्तिष्कीय विकास हेतु उतने ही उत्तरदायी हैं जितने कि आँख व कान। जैसे वाक् शक्ति व कान परस्पर सम्बन्धित हैं, वैसे ही गन्ध सम्बन्धी ज्ञान तन्तु एवं स्वादेंद्रियों के स्नायु तन्त्र का भी परस्पर आपस में सम्बन्ध है। जो बहरे होते हैं, वे बोलना नहीं सीख पाते, उसी प्रकार जिनकी गन्ध सामर्थ्य चली जाती है, उनकी स्वादेंद्रियां भी प्रभावित होती हैं।

अभी तक तो यही माना जाता रहा है कि गन्ध सामर्थ्य के होने न होने से कोई अन्तर नहीं पड़ता किन्तु अब मस्तिष्कीय विकास पर शोध करने वाले जैव रसायन विदों एवं व्यवहार विज्ञानियों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि गन्ध शक्ति मानवी मस्तिष्क के व्यवहार एवं चिन्तन सम्बन्धी दोनों ही पक्षों के विकास के लिए उत्तरदायी है। पूल्सविले मेरी लैण्ड (यू॰ एस॰ ए॰) की ‘‘ब्रेन इवॉल्युशन एण्ड बिहेवियर’’ विषय पर कार्यरत प्रयोगशाला के प्रमुख वैज्ञानिक डा॰ पाल मैक्लिन ने यह निष्कर्ष निकाला है कि मस्तिष्क की सबसे भीतरी परत को, जिसे एनिमल ब्रेन, प्रिमीटिव ब्रेन (आदिम-पुरातन मस्तिष्क) कहकर नकारा जाता रहा है, गन्ध शक्ति से तो सम्बन्धित है ही, व्यवहार विकास सम्बन्धी अनेकानेक पक्षों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ मेण्टल हैल्थ, जिसके प्रावधान में यह कार्य किया जा रहा, मूलतः आज मनुष्य की बढ़ती हिंसक वृत्ति, तनाव, बेचैनी, आवेश, आतुरता एवं मास हिस्टीरिया जैसे मनोविकारों के मूल कारण की शोध कर रहा है एवं यह निष्कर्ष निकाला है कि गन्ध के माध्यम से इन केंद्रों पर शामक प्रभाव डालकर मनुष्य की वृत्ति को, यहाँ तक कि व्यक्तित्व को आमूल चूल बदला जाना सम्भव है। डा॰ पॉल मैक्लिन के अनुसार मस्तिष्क के तीन भाग प्रमुख माने जा सकते हैं। सबसे भीतरी परत है रैप्टीलियन या एनिमल ब्रेन जिससे घ्राण तन्तु जुड़े होते हैं। इसमें आलफैक्टरी स्ट्राएटम, कार्पस स्ट्राएटम (काडेट न्यूकलियस एवं पुटामेन) तथा ग्लोब पैली उस जैसी महत्वपूर्ण मस्तिष्कीय संरचनाएँ आती हैं। इस पूरे स्नायु समुच्चय को उन्होंने आर॰ काम्पलेक्स नाम दिया है। मनोविकारों के लिए इसे ही उत्तरदायी माना है। यह मूलतः घ्राण एवं आत्म रक्षा से सम्बन्धित होता है जो कि पशु पक्षियों की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता होती है। इसमें कही भी किसी प्रकार की विकृति आने से मनुष्य में उत्तेजना परक मनोविकार एवं हिंसक वृत्ति पनपने लगती है।

दूसरी मस्तिष्कीय परत जो केन्द्रीय परत के चारों और होती है- ‘‘लिम्बिक ब्रेन’’ कहलाती है। स्नेह एवं दुलार, रख-रखाव, करुणा, मैत्री, दया, प्रसन्नता, यौन भावना सम्बन्धी केन्द्र यही होते हैं। यह केन्द्र स्नायु तंतुओं के माध्यम से रेप्टीलियन ब्रेन या आर॰ काम्पलेक्स से जुड़ा रहता है। दोनों ही इस तरह परस्पर अन्योन्याश्रित हैं। एक की विकृति दूसरे को भी अछूता नहीं छोड़ती। तीसरी बाह्य परत जिसे मानवी विशेषता कहा जाता है ‘‘निओकार्टेक्स’’ कहलाती है। विकास क्रम से सबसे अन्त में अवतरित यह उच्चस्तरीय स्नायु कोशों का समूह सबसे अधिक स्थान घेरता है एवं लिखने, पढ़ने, समझने, तथ्यान्वेषण करने, नया चिन्तन करने की मौलिक क्षमता सम्बन्धी केन्द्र यही होते हैं।

स्नायु संरचना इतनी ही समझना पर्याप्त है क्योंकि हमारा मूल विषय है उपेक्षित घ्राण शक्ति एवं उसके विकास की आवश्यकता। वास्तविकता यह है कि आधुनिक विज्ञान ने प्रत्यक्ष क्रिया-कलाप हेतु उत्तरदायी, बौद्धिक कार्य सम्बन्धी मनःशक्ति को तो अधिक महत्व दिया है किन्तु अचेतन जहाँ विकसित होता है, व्यवहार सम्बन्धी जानकारियाँ, प्रवृत्तियाँ व आदतें जहाँ ढलती है, उस मूल केन्द्र को भुला ही दिया है। डा॰ मैक्लीन ने इसी कारण आर॰ काम्पलेक्स पर अत्यधिक जोर देते हुए कहा है कि मनुष्य के व्यवहार की कुँजी इसी अन्तःमस्तिष्क में छुपी पड़ी है।

अचेतन मस्तिष्क की इस परत रेप्टीलियन ब्रेन पर घ्राण शक्ति सर्वाधिक प्रभाव डालती है। गन्ध सम्बन्धी सम्वेदनशील ज्ञान तन्तु नासिका में अवस्थित होते हैं। यहाँ से गन्ध सीधे स्नायु तंतुओं के माध्यम से अग्र मस्तिष्क एवं फिर वहाँ स्थित आल फैक्टरी कार्टेक्स में जाती है। सम्भवतः नाक को जान-बूझकर विधाता ने आंखों व कानों के बीज बनाया ही इसलिये है कि अचेतन सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारियाँ व उत्तेजना सतत् अन्तःमस्तिष्क को मिलती रहे। यही अचेतन व सचेतन को प्रभावित उत्तेजित करता है। इस कारण गन्ध का-नासिका का महत्व कम नहीं माना जाना चाहिये।

पशु पक्षियों में सम्प्रेषण का एकमात्र माध्यम गन्ध होती है। इसलिये उनकी रेप्टीलियन ब्रेन अधिक विकसित होती है व निओकार्टेक्स नहीं के बराबर। आकार भी आर॰ काम्पलेक्स का जीव जंतुओं में अधिक होता है व क्रियाशीलता भी अधिक होती है। इस गन्ध के सहारे ही समस्त जीवधारी अपनी जीवन यात्रा चलाते हैं। हिंसक पशु गन्ध के माध्यम से ही जंगल में अपने शिकार को खोज निकालते हैं। जबकि छोटे जन्तु आत्म-रक्षा हेतु अपनी घ्राण शक्ति का ही सहारा लेते हैं। खतरा देखते ही वे गन्ध के सहारे तुरन्त चौकन्ने हो भाग निकलते हैं। जीव जन्तु बोल पाते नहीं, लिख सकते नहीं किन्तु जंगल में क्षेत्र विभाजन, अधिकार भाव, प्यार-दुलार जैसी वृत्तियों का आदान-प्रदान इसी घ्राण शक्ति के सहारे बन पड़ता है। इस केन्द्र को उत्तेजित करके या नष्ट करके ही पशुओं में हिंसक वृत्ति या आत्मरक्षा वृत्ति विकसित कर वैज्ञानिक यह प्रामाणित करते हैं कि यह केन्द्र मूलतः किन वृत्तियों से सम्बन्धित है। मधुमक्खी, तितली, चींटियां, मछलियाँ, अन्यान्य कृमि-कीटक इस गन्ध की भाषा का ही आश्रय लेकर काम चलाते हैं।

मनुष्य की घ्राणेंद्रियां इस प्रयोजन के लिये नहीं बचाकर रखी गयीं। उसे अन्यान्य विकसित ज्ञानेन्द्रियाँ प्राप्त हैं जिनके माध्यम से चेतन मस्तिष्क पोषण पाता रहता है। लेकिन इससे घ्राणेंद्रियों का महत्व कम नहीं हो जाता। महत्ता की जानकारी के अभाव में उसकी प्रमुखता दब भर गयी है। शरीर विज्ञान का यह सिद्धान्त है कि जिस वस्तु का उपयोग न होता हो, वह क्रमशः निकम्मी, निठल्ली पड़ जाती है। मनुष्य की नासिका की भी लगभग यही दशा हुई है। यह मात्र साँस ग्रहण कर फेफड़ों तक पहुँचाने व प्रश्वास द्वारा निकाल बाहर करने के काम आती है। लेकिन थोड़ा भी सर्दी जुकाम होने पर हमें इसकी महत्ता का पता चलता है। गन्ध शक्ति ऐसे में दब जाती है एवं खाते समय हर चीज स्वाद रहित लगने लगती है। वस्तुतः गन्ध सम्वेदना से ही हमें खाद्य पदार्थों को ग्रहण करने न करने की उत्तेजना मिलती है। इसी आधार पर आहार के प्रति रुचि अरुचि विकसित होती है।

वैज्ञानिकों ने गन्ध की भाषा को मनुष्य की सबसे पुरानी एवं प्रभावशाली भाषा माना है। उनका मत है गन्ध की प्रतिक्रिया फेरोमोन नामक रसायन समूह की शरीर के हारमोन्स से प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होती है एवं इसी कारण गन्ध अपने विविध रूपों में पहचानी जाती है। सामान्यतया व्यक्ति न्यूनतम 4000 किस्म की व अधिकतम 10,000 किस्म की गंधों को पहचानने की क्षमता रखते हैं। काया के आन्तरिक रसायन व हारमोन्स तथा बहिरंग की गन्ध व फेरोमोन्स की सम्मिश्रित प्रतिक्रिया ही गन्ध विशेष की छाप मस्तिष्क के आर॰ काम्पलेक्स पर डालती व तद्नुसार अनुभूति देती है।

मनुष्य के जीवन में गन्ध को बड़ा महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इससे न केवल रोगों के निदान में अपितु चिकित्सा में भी मदद मिली है। विभिन्न प्रकार के रोगियों की गन्ध भिन्न-भिन्न होती है। डायबिटीज, गुर्दे की बीमारी पेट में अवरोध इत्यादि रोगों से शरीर से भिन्न-भिन्न गन्ध निकलती हैं जिन्हें योग्य चिकित्सक तुरन्त पहचान लेते हैं व तद्नुसार चिकित्सा की व्यवस्था बनाते हैं। मनुष्य लगातार लाखों रासायनिक संदेश गन्ध के माध्यम से पकड़ता-छोड़ता रहता है जिन्हें सिर्फ हमारी नाक जानती है व जिनका विश्लेषण करने की सामर्थ्य हमारे मध्य मस्तिष्क के गन्ध सम्बन्धी केंद्रों में है।

जार्ज टाऊन यूनिवर्सिटी मेडीकल सेण्टर के शबर्ट हैनकिन के अनुसार गन्ध द्वारा बेचैनी, तनाव से काफी हद तक कम किया जा सकता है। श्रमिकों की कार्य क्षमता बढ़ायी जा सकती है। अपराधियों की अपराधी हिंसक वृत्ति काफी हद तक कम की जाती है। गन्ध शक्ति के माध्यम से मनःस्थिति, परिस्थिति को प्रभावित करने वाली इस विधा को ऑस्फ्रेजियालॉजी नाम दिया गया है एवं इसके आधार पर एक नयी चिकित्सा पद्धति उभर कर आयी है, एरोमा थेरेपी, जिसमें पौधों के सत्व तेलों के बन्ध के प्रयोग द्वारा चिकित्सा की जाती है।

गन्ध विज्ञान की उपेक्षा न हो इसलिये विदेशों में बड़े-बड़े केंद्र इस माध्यम से चिकित्सा के प्रतिपादन हेतु खोले गए हैं। जहाँ तक हमारे राष्ट्र का प्रश्न है सुगंधियों का प्रयोग हर धर्म मत के कर्मकांडों से जुड़ा हुआ है। धूप, अगरबत्ती, हवन के माध्यम से सुगन्धमय वातावरण बनाकर वातावरण तथा उपस्थित व्यक्तियों की चिकित्सा का अपना पूरा विधान है। पारसी लोग पवित्र अग्नि में धूप जलाने की प्रथा मनाते हैं। बाइबिल में भी वर्णित है कि प्रभु ईशु ने मोजेज को स्वर्ण स्तम्भ के ऊपर धूप जलाने का आदेश दिया था। वेद, कुरान, बाइबिल इत्यादि धर्म ग्रंथों में वर्णित विभिन्न प्रकरणों से इस मत की पुष्टि होती है कि सुगंधियों का प्रयोग आदि काल से होता आ रहा है।

प्रकृति में सुगंधियां तेल और रेजिन के रूप में पौधों छिपी पाई जाती है। असली तेल ही वस्तुतः प्रयोग में लाए जाने चाहिए, संश्लेषित नहीं क्योंकि उन्हीं का वाँछित प्रभाव मस्तिष्क पर देखा जाता है। तभी तक पंजीकृत सुगंधियों की संख्या विश्व भर में 2 लाख से भी ऊपर है।

गन्ध शक्ति के प्रयोग द्वारा क्रुद्ध भीड़ को नियन्त्रित करने के अतिरिक्त वाँछित सुगन्ध के प्रयोग से स्मरण शक्ति बढ़ाने, पढ़ाई में अधिक मन लगे, ऐसे प्रयोग भी सफलता पूर्वक किये गये हैं। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य जो डा॰ पाल मैक्लिन ने रखा है वह यह कि इस अध्ययन से मानव की वृत्तियों को बदलने, व्यक्तित्व में आमूल-चूल परिवर्तन न लाने जैसे क्रान्तिकारी प्रयोग गन्ध के माध्यम से सम्भव हैं। इन दिनों हिंसक वृत्ति बढ़ती जा रही है। बढ़ते औद्योगीकरण प्रदूषण व आबादी से व्यक्ति तनाव ग्रस्त हुआ है, चिढ़-चिढ़े स्वभाव का हो गया है। उसके स्वभाव को बदलने हेतु गन्ध शक्ति का प्रयोग बड़ी सफलतापूर्वक किया जा सकता है। कामोद्दीपन जैसी वृत्तियों को उभारने के प्रयोग के स्थान पर यदि गन्ध शक्ति के विधेयात्मक स्वरूप को, जो सदा-सदा से भारतीय अध्यात्मविद् अपनी अग्निहोत्र एवं उपासना-चर्चा में, प्रयुक्त करते आए हैं। उभारा और प्रतिपादित किया जा सके तो उपलब्ध अनेकानेक गंधों से मानव जाति को लाभ दिया जा सकता है। मूल प्रवृत्तियों के आदिम रूप को देवत्व परक मोड़ मिलने पर इस ज्ञानेन्द्रिय की उपलब्धि की सार्थकता भी सिद्ध होगी।




चाइसेन चीन के उच्च अधिकारी (kahani) - Akhandjyoti January 1985

चाइसेन चीन के उच्च अधिकारी थे। एक व्यापारी कुछ रियासत पाने की दृष्टि से उनके पास अशर्फियों की थैली लेकर पहुंचा। इसे रख लें, किसी को पता नहीं चलेगा। बस मेरा काम करे दें।

चाइसेन ने कहा- ‘‘बात फूटे बिना न रहेगी। तीन को तो पता चल ही गया अब वे दूसरों तक खबर पहुँचाने में चूकेंगे नहीं।” “भला तीन कौन?” व्यापारी ने आश्चर्य से पूछा। चाइसेन ने कहा- ‘‘एक आप, दूसरा मैं, तीसरा परमेश्वर। थैली लौटाते हुए उनने कहा- “जो न्यायोचित है वह कुछ दिये ही हो जायेगा। आपकी भेंट आपको ही मुबारक।”




मोटा बटेर और दुबला कौआ - Akhandjyoti January 1985

जातक कथाओं में एक बड़ी रोचक तथा ज्ञानवर्धक कथा आती है। पुरातन काल में एक बार भगवान का जन्म बटेर की योनि में हुआ। उनकी काया बहुत परिपुष्ट थी। आकार में छोटे होते हुए और तिनके खाते हुए भी बड़े प्रसन्न लगते थे और उस उपवन के पेड़ों पर क्रीड़ा कल्लोल करते रहते थे।

उनके पड़ौस में कौआ रहता था। श्मशान भूमि में जो काक बलि दी जाती थी उसके खीर समेत माल पुए उसे खाने को मिलते थे। फिर इधर-उधर चक्कर काटकर मरे हाथियों, ऊंटों और बैलों का माँस तलाश करता रहता था, सो उसे आसानी से मिल जाता। पेट उसका कभी खाली रहता ही न था। इस पर भी उसका मन चिन्तातुर रहता था। जब देखो तभी भयभीत दिखाई पड़ता था। रक्त की कमी से उसका स्वाभाविक काला रंग, हलका सिलहटी जैसा हो गया था। क्षण भर चैन न ले पाता, इधर उधर ताकता रहता और जब भी खटका दिखता तभी वह क्षण भर रुके बिना सिर पर पैर रखकर भागता।

एक दिन बरसाती बूंदें पड़ने लगी। पक्षियों के लिए घोंसले से बाहर जाने के लिए अवसर न रहा। बटेर से बात करने के लिए कौए का मन इच्छुक तो बहुत दिनों से था, पर आज अनायास ही अवसर मिल गया। सो वह बहुत प्रसन्न हुआ। घोंसले से चोंच बाहर निकालकर कौए ने बटेर का अभिवादन किया और अपनी एक जिज्ञासा का समाधान करने के लिए अनुरोध किया।

बटेर ने सिर झुकाकर कहा- आप बड़े हैं, हर दृष्टि से सौभाग्यशाली भी। आप जैसे अच्छे पड़ोसी के साथ रहते हुए मुझे बहुत प्रसन्नता रहती है। कोई बात पूछनी हो तो निःशंक होकर पूछें।

कौए ने कहा- ‘‘आपकी काया छोटी है। घास-फूँस भर खाते हैं। इतने पर भी कितने प्रसन्न परिपुष्ट और प्रसन्न रहते हैं। एक मैं हूँ जो दुबला हुआ जा रहा हूँ। चिन्ता के बिना एक क्षण भी नहीं बीतता। इसका कारण समझाकर कहिए।”

बटेर ने कहा- ‘‘जो मिल जाता है उससे सन्तुष्ट रहता हूँ। तिनकों को रसायन मानकर सेवन करता भगवान की कृपा को सराहता रहता है। मेरी पुष्टाई का कारण बस इतना ही है। आप अब अपनी दुर्बलता का कारण बतायें।”

कौए ने कहा- ‘‘श्मशान घाट पर जो श्राद्ध बलि मिलती है, उसका बड़ा भाग पाने की चेष्टा करता हूँ तो, साथियों में से सभी प्रतिद्वन्द्विता करते हैं। न ले जाने के लिए आक्रमण करते हैं और मेरे पंख उखाड़ लेते हैं। मरे हाथी-ऊँट आदि का माँस देखता हूँ तो श्रृंगाल, कुत्ते और गिद्ध पहले से ही पहुंचे मिलते हैं। मुझे भाग नहीं लेने देते और झपट्टा मारकर भगा देते हैं। सो मल भक्षण ही हाथ लगता है। जिनसे प्रतिद्वन्द्विता चलती है सो शत्रुता पालते हैं। किसी का आक्रमण न हो जाय सो चिन्तित रहकर समय काटना पड़ता है। आत्म रक्षा के लिए चारों और झाँकता हूँ। चिड़ियों के अण्डे चुरा लेता हूँ सो भय रहता है कि समूह बनाकर वे बदला लेने के लिए टूट न पड़ें। यही कारण है कि खाया अंग नहीं लगता। चेन से सो नहीं पाता और दिन-दिन कृश हुआ जाता हूं।’’

बटेर वेशधारी बोधिसत्व बोले- हे बड़भागी! अपने बड़प्पन की ओर देखो। इस उपवन में हम सब की रखवाली किया करो और अपना प्रेम तथा विश्वास दिया करो।

फिर जो कुछ भी आहार मिले उसे पहले दूसरों को खिलाकर पीछे आप भी खा लिया करो। इस प्रकार रसायन आहार से आप का मन प्रसन्न रहा करेगा और असमय वृद्धता वार्धक्य ने जो आक्रमण किया है, सो छूट जायेगा।

कौए ने कहा- ‘‘आपके अमृत वचन ज्ञान और प्रेम से भरे हैं। पर क्या करूं। जन्म भर संग्रह हुए कुसंस्कार बदलने में कठिनाई दिखती है।”

बटेर ने कहा- हिम्मत न हारिए, प्रयत्न कीजिए। स्वभाव जितना भी बदल सकेंगे, उतने ही आप प्रसन्न रहेंगे, परिपुष्ट होंगे और सम्मान के भाजन बनेंगे।

अपनी कोंतरों में बैठे अन्य पक्षियों ने भी सुना और उस पर आचरण करने का व्रत लिया।




प्राण ऊर्जा के विभिन्न पक्षों का वैज्ञानिक विश्लेषण - Akhandjyoti January 1985

मनुष्य के शरीर के सूक्ष्म क्रिया-कलापों में से बहुसंख्य के ऊपर से अब पर्दा हट चुका है एवं प्रत्यक्ष क्रिया-कलापों के मूल में कार्य करने वाले ऊर्जा समुच्चय को अब विज्ञान सम्मत माना जाने लगा है। वैज्ञानिक जहाँ हतप्रभ हैं, वह है मनुष्य की परामनोवैज्ञानिक क्षमता विचार ऊर्जा की परोक्ष सामर्थ्य एवं ऐसी असम्भव प्रतीत होने वाली क्रियाएं जिनका प्रत्यक्षतः कोई वैज्ञानिक आधार नहीं दिखाई देता। चूंकि इनका अस्तित्व है, उन्हें नकारा नहीं जा सकता अतः उन्हें भी एक विद्या के अंतर्गत सम्मिलित कर रहस्यों की जाँच पड़ताल जारी है। वैज्ञानिक प्रतिक्रिया को नहीं, प्रक्रिया को देखना चाहते हैं एवं यह जान कर सबको एक सुखद आश्चर्य होना चाहिए कि आज के बीसवीं सदी के आधुनिक युग में गुह्य विद्या पर कार्य करने वाले वैज्ञानिकों की संख्या पदार्थ विज्ञानियों से कुछ कम नहीं, अधिक ही है।

गुह्य समझी जाने वाली अनेकानेक परामनोवैज्ञानिक क्षमताओं में से एक है- परामनश्चिकित्सा अथवा ‘‘सायकिक हीलिंग’’। किसी में यह सामर्थ्य हो सकती है एवं बिना किसी औषधि या स्थूल उपादान के रोगी को ठीक किया जा सकता है, इस पर गत तीन दशकों में काफी कुछ विवाद छिड़ चुका है। ऐसे अनेकों व्यक्तियों की सामर्थ्य पर संदेह व्यक्त करते हुए वैज्ञानिकों ने पाँच पड़ताल की है एवं वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यह रहस्यमयी विद्या अस्तित्व रखती है। एवं अपवाद स्वरूप कुछ व्यक्तियों में ऐसी विलक्षण सामर्थ्य भी पायी जाती हैं जिससे वे अपनी ऊर्जा का हस्तान्तरण कर रोगियों को ठीक कर देते हैं।

पूर्वार्त्तदर्शन एवं मनोविज्ञान इसे चिकित्सा का रूप न देकर प्राण ऊर्जा के सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्ति से अन्यों में स्थानान्तरण की एक दैवी प्रक्रिया मानता है जो अध्यात्म साधना के बलबूते कतिपय योगी महामानवों में विकसित होती देखी जाती है। इस मान्यता के अनुसार चिकित्सा तो इस प्राण-प्रवाह की एक प्रतिक्रिया भर है। यह होती वस्तुतः एक उच्चस्तरीय प्रक्रिया है जिसमें दैवी क्षमता सम्पन्न सिद्ध साधक सुपात्रों को अपनी ऊर्जा से लाभान्वित करते हैं। विशुद्धतः आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए उपलब्ध इस ऊर्जा समुच्चय की एक प्रतिक्रिया पदार्थपरक बहिर्मुखी भी हो सकती है किन्तु वही सब कुछ नहीं है।

इस ऊँची स्थिति तक वैज्ञानिक न तो चिन्तन कर पाये हैं, न वे इसे प्रतिपादित कर पाने की स्थिति में हैं। किन्तु मनश्चिकित्सा, फेथ हीलिंग, सायकिक हीलिंग जैसे पक्षों पर उन्होंने विचार अवश्य किया है व अनेक महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी निकाले हैं।

मॉट्रियल की मैक्गिल यूनिवर्सिटी के डा॰ बर्नार्ड ग्राड ने यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है कि ऐसे व्यक्ति जिनमें यह क्षमता होती है, जब अपने हाथ में रख फ्लास्क के जल को जौ के बीजों पर डालते हैं तो उनमें तुलनात्मक दृष्टि से काफी वृद्धि होती है, इसी जल को रोगियों को पिलाने पर वे ठीक होते देखे जाते हैं। उनका एक महत्वपूर्ण प्रतिपादन यह है कि यदि यही जल किसी अवसाद ग्रस्त मनःस्थिति वाले व्यक्ति द्वारा बीजों या अन्य रोगी पर आरोपित किया जाय तो इसकी प्रतिक्रिया निषेधात्मक होती है। इससे उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि जो भी व्यक्ति ‘‘सायकिक हीलिंग’’ की क्षमता रखता है, उसकी मन स्थिति के अनुरूप ही प्राण-ऊर्जा का स्थानांतरण होता देखा जाता है। यह प्राण ऊर्जा अन्ततः है क्या? इसका उत्तर देते हुए उन्होंने इसे ‘‘एक्स फैक्टर’’ नाम दिया है। यह वह ऊर्जा है जो हर व्यक्ति में उसकी मनःशक्ति के अनुरूप न्यूनाधिक मात्रा में होती है। हीलिंग से लेकर प्रायोगिक परीक्षणों में यह एनर्जी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती देखी जा सकती है। बर्नार्ड ग्राड द्वारा ‘‘सम बायोलॉजीकल इफेक्ट्स ऑफ लेयिंग ऑन हैण्ड्स’’ नाम से जरलन ए.एस.पी. आर. के अप्रैल 1965 में प्रकाशित इस शोध प्रबन्ध में कहा गया है कि ‘हीलर्स’ के हाथ से निकली तीव्र आभायुक्त जिन प्रकाश तरंगों को डा॰ किर्लियन ने अपनी फोटोग्राफी में सेल्युलाइड पर अंकित किया है, वह यही ‘‘एक्स एनर्जी’’ है।

शीला ऑस्ट्रेण्डर एवं लिन श्रोडर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘साइकिक डिस्कवरीज विहाइन्ड दी आयरन करटेन’’ में लिखते हैं कि प्राण चिकित्सा की प्रक्रिया में चिकित्सक की बायोप्लाज्मिक काया से रोगी को वायोप्लाज्मिक काया में प्राण ऊर्जा स्थानान्तरित होती है। इस प्रक्रिया में जो स्थूल परिवर्तन होते हैं, वे रोग निवारण के रूप में देखे जाते हैं। इस सिद्धान्त के आधार पर वैज्ञानिकों ने बायोप्लाज्मिक बॉडी के कार्य करने की प्रणाली के मॉडल के समानान्तर ऋण आयन्स, विद्युतचुम्बकीय दबाव एवं सतत् कम्पायमान चुम्बकीय क्षेत्र को मिलाकर अनेकों असाध्य व्याधियों हेतु चिकित्सा का एक वैकल्पिक रूप निकाला है जो सम्भवतः आने वाले दिनों में कैंसर, तनाव, अवसाद, मेनिया, मस्तिष्कीय रक्त स्राव जैसे रोगों में कारगर सिद्ध हो सके।

अभी तक स्पर्श द्वारा चिकित्सा को झाड़-फूँक के स्तर की ओझागिरी माना जाता रहा है। किन्तु अब इस सम्बन्ध में प्राप्त वैज्ञानिक जानकारियों से ये मान्यताएँ क्रमशः बदली हैं। मेस्मर द्वारा प्रतिपादित निर्देश चिकित्सा या हैण्ड-पास थेरोपी को लगभग 2 शतक तक उपेक्षा का सामना करना पड़ा लेकिन अब चिकित्सा विज्ञान में इस मान्यता को बल मिल रहा है कि क्षमता सम्पन्न व्यक्तियों के माध्यम से संप्रेषित ऊर्जा प्रवाह अथवा विचारों की शक्ति से चिन्तन एवं शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से दुर्बल व्यक्तियों पर विधेयात्मक प्रभाव डाला जा सकता है।

श्रीमती ओल्गा वॉरेल को एक सायकिक हीलर माना जाता है। वे ‘‘अमेरीकी होलीस्टीक हेल्थ ऐसोसिएशन’’ की सदस्या हैं एवं सभी प्रकार के वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए सतत् तैयार रहती हैं। उनका दावा है कि वे स्पर्श मात्र से रोगियों को स्वस्थ कर सकती हैं। अनेकों रोगी उनके पास आकर स्वस्थ होकर भी गए हैं, पर वैज्ञानिक इससे सन्तुष्ट नहीं हुए। वे इस प्रक्रिया को समझना चाहते थे। अटलाण्टा जॉर्जिया के डा॰ राबर्ट॰ ए॰ मिलर ने अपने द्वारा बनाए हुए क्लाउड चेम्बर में श्रीमती वाँरेल के हाथ से निकलने वाले ऊर्जा प्रवाह का परीक्षण करना चाहा। इस चेम्बर में उच्चस्तरीय ऊर्जा युक्त न्क्यूलीयर कणों को देखा व उन्हें फोटोग्राफ किया जा सकता है। उन्होंने एटॉमिक लेबोरेट्रीज की मदद से एक चेम्बर बनाया जो 7 इंच व्यास के एक शीशे के सिलेंडर का बना था। इसकी लम्बाई 5 इंच थी, वह एल्युमीनियम की एक चादर पर फिट किया गया था इसके अन्दर मिथाइल अलकोहल की 1/4 इंच की तह जमाकर पूरी ईकाई को सूखे बर्फ पर रख दिया गया। ऊपर से झांककर देखने के लिये एक खिड़की थी। अल्कोहल के वाष्पीभूत होने से आयन मिश्रित धुएँ से यह चेम्बर भर गया। इस पूरी प्रक्रिया से यह सुनिश्चित हो गया कि इससे होकर गुजरने वाले ऊर्जा विकिरण या आवेश युक्त कण को क्लाउड्स के अन्दर देखा जा सकता है। श्रीमती वॉरेल को क्लाउड चेम्बर के एक ओर बैठा दिया गया एवं रोगी को दूसरी ओर। बिना इस चेम्बर को स्पर्श किए उन्होंने हाथ किनारे रखकर ध्यान एकाग्र किया मानो वे रोगी पर ऊर्जा प्रवाह फेंक रही हों। उनके हाथों के समानान्तर एक तरंग चित्र उस चेम्बर में बनता देखा गया। उन्होंने अपने हाथों को जब 90 डिग्री अंश पर मोड़ा तो तरंगें भी उसी दिशा में मुड़ गयीं। इन्गो स्वान, एम॰ एच॰ टेस्टर, रालिंग थण्डर, हैनरी माडेल (सभी अमेरिका के), विक्टर क्रिवो रोटोव (रशिया), हैरी एडवर्ड्स (इंग्लैंड) एवं जोसेफ पेड्रो डि फ्रेटास उर्फ एरिगो (ब्राजील) ऐसे सायकिक हीलर हैं जिनकी पाश्चात्य जगत में काफी चर्चा है। एरिगो के ऊपर तो अनेकों शोधकर्ता काफी वर्ष खपा चुके किन्तु उनकी दैवी सामर्थ्य का कारण उनकी मृत्यु तक न जान पाए। फिलीप्पीन्स की फेलीसा मकानास एवं जौसेफीना सीमन तथा टोनी एप्गोआ, जोस मर्केडो, रोमी बुगेरीन एव मार्सेलोजीनर की साइकिक हीलर्स की टीम भी वैज्ञानिक जगत में काफी तहलका मचा चुकी है।

उस सूक्ष्म ऊर्जा प्रवाह को, जो चिकित्सा प्रयोजन हेतु सायकिक हीलर्स द्वारा विकिरण के रूप में छोड़ा जाता है, क्या भौतिक शक्ति माना जाए अथवा पूर्वार्त्त गुह्यविज्ञान के अनुसार एक पराभौतिक प्रभामण्डल से निस्सृत प्रवाह माना जाए, इस पर अच्छा, खास विवाद है। इन दिनों यू॰ सी॰ एल॰ ए॰ के डा॰ थेल्मा मॉस एवं स्टेन फोर्ड विश्वविद्यालय के डा॰ टिलर इसी विषय पर शोधरत हैं। अभी तक प्राप्त निष्कर्ष उन्हें परामनोविज्ञान की गुत्थियों में उलझाए हुए हैं। विल्गिंग्टन डेलावेयर की डा॰ एडवर्ड ब्रेम ने “हीलर्स’’ की उंगलियों से निस्सृत विद्युत से गुजरे जल का विश्लेषण कर यह पाया कि सामान्य जल में सौ प्रतिशत हाइड्रोजन अणु संयुक्त होते हैं, जबकि “संस्कारित जल” में 97.04 प्रतिशत हाइड्रोजन बाइब्डिंग थी। इसका अर्थ यह हुआ कि निस्सृत विद्युत निश्चित ही जल की आणविक संरचना को तोड़कर उसे सूक्ष्मीकृत बना देती है। ऊर्जा इस जल से गुजरी है, इसका प्रमाण बदले हुए सरफेस टेन्सन पृष्ठीय तनाव (अर्थात् धरातल पर दबाव) से भी मिलता है। यह एक स्मरणीय तथ्य है कि जब भी यह दबाव कम होता है, जल की रोग निवारक-प्रतिरोधी-भेदक क्षमता बढ़ जाती है। डा॰ मिलर जिनका वर्णन क्लाउड चेम्बर के साथ किया गया था, ने फिशर मॉडल टेन्शियोमीटर का प्रयोग इस प्रयोजन हेतु किया था, जिससे किसी प्रकार की शंका की गुंजाइश नहीं रह जाती।

साइंस डाइजेस्ट (मई 1982) में प्रकाशित एक शोध प्रबन्ध में एक महत्वपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत किया है। जिससे इस साइकिक ऊर्जा पर प्रकाश पड़ता है। मेनिन्जर फाडण्डेशन टोपे का कन्सास के जैव मनोविज्ञानी डा॰ एल्मर ग्रीन एवं पेन एण्ड हेल्थ रिहेबिलीटेशन सेंटर विस्कान्सिन के डा॰ सी॰ नारमन ने परामनश्चिकित्सकों के मानवी फिजियालॉजी पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन कर कुछ निष्कर्ष निकाले हैं। लम्बी व्याधि से पीड़ित रोगी जिनके विभिन्न संस्थान रोग ग्रस्त थे, इन प्राण चिकित्सकों के संपर्क में लाये गये। उनके हाथ रखने एवं ध्यानस्थ होने पर रोगियों की हृदय एवं श्वसन दर, मस्तिष्क की विद्युत तरंगें, तापक्रम, त्वचा प्रतिरोधी एवं रोग निरोधी कोषाणुओं में विलक्षण परिवर्तन देखा गया। रोगियों से उनके अनुभवों के विषय में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें लगा-मानों दिव्य ऊर्जा प्रभाव उनके अन्दर प्रवेश कर गया हो। किसी-किसी को बिजली के तेज झटके से लगे। इस प्रयोग के बाद 80 प्रतिशत रोगियों के दर्द व अन्य लक्षणों में कमी देखी गयी। कई पूर्णतः रोग मुक्त हो गए।

वस्तुतः यह क्षमता हर मनुष्य में विद्यमान है। दैनंदिन जीवन में हम देखते हैं कि जिस चिकित्सक पर अमुक रोगी का विश्वास होता है वह उसकी दी हुई किसी भी औषधि से आरोग्य लाभ प्राप्त कर लेता है जबकि उसी चिकित्सक पर अन्य रोगी का विश्वास न होने से वही रोग व लक्षण होते हुए भी चिकित्सा कारगर नहीं होती। प्राण विद्युत, संकल्प बल, विश्वास की शक्ति परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बन्धित है। चाहे उसका प्रयोग रोग निवारण हेतु किया जाय अथवा आत्मबल बढ़ाने हेतु, हर किसी के लिये उसकी प्रचण्ड मात्रा अपने ही अन्दर विद्यमान है। यह बात अलग है कि अपवाद रूप में कुछ में वह अधिक मात्रा में होती व अपने परिणाम प्रत्यक्षतः दिखाती है। महामानवों में यही ऊर्जा भाण्डागार विपुल मात्रा में होता है। स्पर्श, अभिसिंचित जल एवं दृष्टिपात द्वारा भी वे मानव समुदाय में इसे वितरित करते देखे जाते हैं। सायकिक हीलिंग से लेकर इस ऊर्जा वितरण तक हरेक के मूल में एक ही शक्ति काम करती है। वैज्ञानिक उसे कुछ भी रूप दे दें, उसका अस्तित्व तो नकारा नहीं जा सकता।




VigyapanSuchana - Akhandjyoti January 1985

॥ नये वर्ष का पंचाँग प्रकाशित ॥

ज्योतिर्विज्ञान वेधशाला, शान्तिकुँज, गायत्री तीर्थ, हरिद्वार से उपलब्ध संशोधित एवं शुद्धतम आँकड़ों द्वारा तैयार वि॰ सं॰ 2042 शाके 1907 (1985-86) का ब्रह्मवर्चस् पंचाँग प्रकाशित हो गया है। ग्रह नक्षत्रों के अतिरिक्त पर्व, त्योहार, व्रत, जयन्ती, सम्वत् फल आदि सभी का इसमें समावेश है। सुन्दर तिरंगा कवर तथा बढ़िया कागज पर प्रकाशित मूल्य मात्र 5 रु॰। डाक से मँगाने पर पोस्टेज अतिरिक्त। प्राप्ति- शाँतिकुँज, हरिद्वार।




संकल्प के अभाव में शक्ति निरर्थक है। - Akhandjyoti January 1985

संकल्प को सफलता की जननी कहा गया है। यह इच्छा शक्ति का ही सघन रूप है। इच्छा-आकाँक्षा ही घनीभूत होकर व्यक्ति को कर्म मार्ग पर अग्रसर करती है और उसे अपने अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है। किसी भाप से चलने वाली रेलगाड़ी को पटरी पर दौड़ने के लिए भाप आवश्यक है। यद्यपि उसके साथ चालक की इच्छा आकाँक्षा और नियन्त्रण दक्षता भी आवश्यक है। चालक की कुशलता और दक्षता को इच्छा शक्ति का प्रतिरूप कहें तो अकेले रेलगाड़ी और चालक का होना ही पर्याप्त नहीं है। उसके लिए वाष्प से उत्पन्न की गई शक्ति जिसके कारण कि रेल के पहियों में गति आती है- का होना भी अति आवश्यक है।

यह सच है कि संकल्प के अभाव में शक्ति का कोई महत्व और मूल्य नहीं है। उसी प्रकार यह भी सच है कि शक्ति के अभाव में संकल्प भी पूरे नहीं होते। केवल संकल्प करने वाला निरुद्यमी व्यक्ति उस आलसी व्यक्ति की तरह कहा जायेगा जो अपने पास गिरे हुए आम को उठाकर मुँह में भी रखने की कोशिश नहीं करता और इच्छा मात्र से आम का स्वाद ले लेने की आकाँक्षा करता है।

संकल्प के साथ शक्ति को संयुक्त करना एक कला है और इसमें बहुत थोड़े लोग ही पारंगत हो पाते हैं। इसका कारण है परिश्रम और प्रयोगों के प्रति निरपेक्ष बने रहना। बहुत से लोग मानस शास्त्र के सिद्धांत पढ़-पढ़कर यही विश्वास करने लगते हैं कि- हम जो कुछ भी चाहते हैं वह हार्दिक आकाँक्षा होने पर हमें स्वतः ही प्राप्त हो जायेगा, जबकि सच्चाई यह है कि केवल वे ही इच्छायें पूरी होती हैं, जिनके साथ सशक्त प्रयास भी जुड़े हों। यहाँ शक्ति का अर्थ उद्देश्य के प्रति दृढ़ निष्ठा, उसे पूरा करने के लिए आवश्यक प्रयास, मार्ग में आने वाली कठिनाइयों और बाधाओं से संघर्ष का मनोबल और साहस है। इनके बिना संकल्प कभी भी शक्ति नहीं बन पाते। उनके अनुसार मन के लड्डू भले ही फोड़े जाते रहें।

शक्ति-जो संकल्प को परिणामदायक बनाती है उसे अर्जित करना एक साधना है। अपनी आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए आवश्यक उत्साह ही उस साधना का नाम है। कभी न ठण्डा पड़ने वाला उत्साह ही हमें लक्ष्य तक पहुँचाता है। पानी को भाव बनाने के लिए 212 डिग्री फारनेहाइट तक गर्म करना आवश्यक है। इससे पहले पानी कभी वाष्पीभूत नहीं होता। 200 डिग्री तक गर्म किया जायेगा, 211.9 डिग्री तक-पानी भाप नहीं बनेगा। उसका एक निर्धारित क्वथनाँक है और उस क्वथनाँक पर पहुँचकर ही पानी भाप बनता है। उसी प्रकार उत्साह का भी एक उच्चतम आवश्यक स्तर है और उस स्तर तक पहुँचने के पूर्व असफल होने की ही सम्भावना रहती है, सफल होने की नहीं।

उत्साह में, उस स्तर की अभिवृद्धि के लिए क्या किया जाना चाहिए? और इस स्तर की अभिवृद्धि का क्या मापदण्ड है। लक्ष्य के प्रति ईमानदारी, भविष्य के प्रति आशापूर्ण दृष्टिकोण और मार्ग में आने वाली सभी कठिनाइयों से जूझने का साहस। संक्षेप में उद्यम, आशा और साहस- ये तीन ही वे प्राथमिक कसौटियाँ हैं जिनके आधार पर अपने उत्साह को परखा जा सकता है और संकल्प के साथ शक्ति को संयुक्त किया जा सकता है।

निष्कर्षतः सफलता की प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्प के साथ उद्यम, आशा और साहस का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। अन्यथा खयाली फुलाव के अतिरिक्त और कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।




संयोगों के विचित्र किन्तु सुव्यवस्थित घटनाक्रम - Akhandjyoti January 1985

संयोग सदा से ही वैज्ञानिकों के लिये चुनौती का विषय रहा है। चमत्कार कहकर वैज्ञानिक स्वयं को नासमझ पिछड़ा हुआ घोषित नहीं करना चाहते, फिर भी उन्हें झुठला नहीं पाते। इसी कारण अपवाद कहकर बहुधा उन्हें टाल दिया जाता है। प्रसिद्ध लेखक-दार्शनिक आर्थर-कोस्लर ने संयोगों को अद्भुत चमत्कार मानते हुए कहा है कि वे दैनंदिन जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं, उन्हें नकारा नहीं जाना चाहिए।

पिछले दिनों प्रकाशित ऐलन वॉन की पुस्तक “इन क्रेडिवल कॉइन्सीडेन्स” में कोस्लर की मान्यताओं का प्रतिपादन करते हुए संयोग सम्बन्धी ऐसी एक सौ बावन घटनाओं का उल्लेख किया गया है जिनका प्रत्यक्षतः ढूंढ़ने पर कोई कारण नहीं मिलता। अनेकों वैज्ञानिकों को ये प्रसंग इतने रोचक लगे कि उनसे चुप नहीं बैठे रहा गया। पिछले पाँच दशक की ऐसी सभी घटनाओं का उन्होंने संकलन कर खोज-बीन की व यह पाया कि कोई अदृश्य सत्ता जिसकी अभी खोज नहीं हो पायी है, ऐसे संयोगों के मूल में काम करती है। प्रसिद्ध गणितज्ञ एड्रियन डॉब्स ने विभिन्न परीक्षणों के उपरान्त बताया कि इस निखिल ब्रह्मांड में ऐसी शक्तियाँ निरन्तर गतिशील रहती हैं जो राडार की तरह भावी सम्भावनाओं का पूर्व संकेत दे देती हैं। अपनी पुस्तक “द रूट्स ऑफ कॉरइन्सीडेन्स” में कोस्लर ने डा. डॉब्स के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा है कि ये सन्देश वाहक शक्तियाँ मनुष्य की ज्ञानेन्द्रियों के सतत् संपर्क में रहती हैं एवं मस्तिष्क में एक प्रकार से पूर्वानुभूति को जन्म देती हैं।

कोस्लर ने मनो विश्लेषक-चिकित्सक जुंग की एक पुस्तक “संयोग” का हवाला देते हुए लिखा है कि जुंग ने भी संयोगों के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए उन्हें सिन्कोनिसीटी (सहसामयिकता) नाम दिया था। जुंग के सहयोगी बुल्फ गैंग पाऊली जो कि भौतिकीविद् हैं, ने तो यह बात कहकर बला टाल दी थी कि संयोग ऐसे सिद्धान्तों के दिखाई देने वाले चिन्ह हैं जिनकी खोज नहीं की जा सकती। लेकिन जुंग ने इतने से सन्तोष नहीं किया, अपनी खोज को आगे जारी रखा। ऐसी हर बात पर जो कारण और परिणाम के सम्बन्धों पर पूरी न उतरती हो, अचेतन का प्रभाव होता है, ऐसा जुंग का मत था। उनका कहना था कि “यह अचेतन मन नहीं स्मृतियों का ऐसा गुप्त आगार है जिससे विभिन्न मस्तिष्क एक दूसरे को अपनी बात पहुँचाते हैं।”

“इनक्रेडिबल कॉइन्सीडेन्स” पुस्तक में ऐलन बान ने एक घटना का उल्लेख किया है। प्रिंस एडवर्ड द्वीप के निवासी कोगलान की टैक्सास स्थित गाल वेस्टन नामक स्थान पर 1899 में एक यात्रा के दौरान मृत्यु हुई। उन्हें वहाँ के एक मकबरे में सीसों की परतों से मढ़े हुए ताबूत में दफना दिया गया। एक वर्ष भी पूरा नहीं हुआ था कि सितम्बर 1900 में गाल वेस्टन द्वीप में भीषण तूफान आया और पूरे कब्रिस्तान में पानी भर गया। तूफान की स्थिति में ही कोगलान का ताबूत मकबरे से निकलकर बहता-बहता मैक्सिको की खाड़ी जा पहुँचा। वहाँ से वह ताबूत फ्लोरिडा का चक्कर काटकर अटलांटिक महासागर में आ गया। क्रमशः पानी का प्रवाह उसे उत्तर दिशा में ले गया। आठ वर्ष बाद अक्टूबर 1908 में प्रिंस एडवर्ड द्वीप के मछुआरों ने तूफानी लहरों के बीच पड़े डिब्बे को पानी में तैरते पाया तो उत्सुकता वश किनारे लाकर उसे खोलकर देखा। कोगलान का नाम अंकित देख वे उसे तुरन्त पहचान गए। यह समुद्री किनारा उसके गाँव से कुछ ही मील दूरी पर था। कोगलान के शव को उचित सम्मान के साथ उस गिरजे के कब्रिस्तान में पुनः दफना दिया गया। यह ताबूत भटकते-भटकते किस प्रकार आठ वर्ष बाद मृतक के जन्म स्थान पर पहुँच गया, इस पर आश्चर्य होना स्वाभाविक है।

आर्थर कोस्लर ने ऐसी अनेकों घटनाओं के विश्लेषण के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि “जीव विज्ञान और भौतिक विज्ञान सम्बन्धी आधुनिक खोज प्रकृति की उस मूल शक्ति की ओर प्रबल संकेत करती है जो अव्यवस्था में भी व्यवस्था बनाए रखती है। इसी को देखकर लगता है कि हमारे ज्ञान से परे कोई शक्ति काम कर रही है।”

अपनी पुस्तक “द रूट्स ऑफ कॉइन्सीडेन्स” में कोस्लर ने स्पष्ट लिखा है कि हम निस्सन्देह संयोग परक चमत्कारों से घिरे हैं, जिनके अस्तित्व की अब तक हम उपेक्षा करते रहे हैं। यही कारण है कि इन्हें अन्ध विश्वास से अधिक कुछ माना नहीं गया है। यह रहस्य मनुष्य सदियों तक नहीं समझ पाया कि सूक्ष्म जगत कितना अद्भुत-विलक्षण है, ऐसी कितनी ही घटनाएँ इसकी साक्षी हैं।

प्रसिद्ध लेखक रिचर्ड बॉक 1966 में अमेरिका के मध्य पश्चिम क्षेत्र में दो फलक वाले एक विमान में यात्रा कर रहे थे। यह विमान दुर्लभ प्रकार का था क्योंकि 1929 में निर्मित डेट्राइट-पी-2 ए टाइप के विमान केवल आठ ही बने थे व इतने ही विश्व में थे। विस्कॉन्सिन स्थित पायीरो नामक स्थान में रिचर्ड ने यह विमान अपने को पायलट साथी, मित्र को चलाने के लिये दिया। विमान उतारते समय मित्र से थोड़ी भूल हो गयी और विमान क्षतिग्रस्त हो गया। “नथिंग बायचांस” (कुछ भी अनायास नहीं) नामक पुस्तक में रिचर्ड बॉक स्वयं लिखते हैं कि “हमने दबाव को रोकने वाले एक पुरजे को छोड़कर शेष हर पुरजे की मरम्मत कर दी थी। इस पुरजे की मरम्मत इसलिये न हो सकी कि उसके दुर्लभ होने से वह भाग कहीं भी मिलना सम्भव न था। तभी एक व्यक्ति आया जिसने स्वयं की उत्सुकतावश उनकी परेशानी पूछी। संयोगवश उसकी विमानशाला में उस विमान के उपयुक्त 40 वर्ष पुराना पुर्जा मिल गया व हम विमान को फिर चला पाने में समर्थ हो गए। यह एक संयोग ही था कि उस अपरिचित इलाके में ठीक वही पुर्जा मिल गया जिसे खोज कर हम हार गए थे।”

न्यूजीलैण्ड के कुक जलडमरुमध्य में दो शौकिया नाविक महिलाएँ अपना सप्ताहांत बिता रही थीं। इसी बीच उनकी नाव एक समुद्री चक्रवात में फँसकर उलट गयी। दोनों महिलाएँ कुछ दूर तक तैरीं पर किनारा मीलों दूर था, नजदीक कोई साधन नहीं। इसी बीच एक मृत ह्वेल मछली की लाश पानी में तैरती उनके समीप लहरों के साथ आयी। वे उस पर चढ़कर उसे नाव की तरह खेती हुई किनारे पर आ गयी और सकुशल घर पहुँच गयीं।

फैलमाऊथ (मेन- यू0 एस0 ए0) के एडविन रॉबिन्सन नामक व्यक्ति की आँखों की ज्योति 9 वर्ष पूर्व एक सड़क दुर्घटना में चली गयी थी। उसके चिकित्सक विलियम टेलर ने परीक्षणोपरांत बताया कि अब इसका आना सम्भव नहीं। संयोगवश 1982 की जुलाई में वे अकेले घर लौटते हुए भयंकर वर्षा वाले तूफान में फँस गए। पेड़ के नीचे शरण पाने के लिए उन्होंने अपनी धातु की छड़ी का प्रयोग किया। तभी जोरों से विद्युतगर्जन हुआ और उन्हें लगा कि कहीं समीप ही बिजली गिरी है। वे धक्का खाकर गिर पड़े, लेकिन 5 मिनट बाद जब किसी तरह उठे तो पाया कि उनका श्रवण यन्त्र तो बेकाम हो निकल गया, लेकिन वे इसके बिना भी सुन सकते हैं। प्रसन्न मन वे वापस घर लौटे। चिकित्सकों के अनुसार यह विज्ञान के समझ में न आ पाने वाले कई वैचित्र्यपूर्ण संयोगों में से एक है, जिसका कोई समाधान नहीं दिया जा सकता।

मैरी गैलेन्ट प्रान्त के फ्राँसीसी गवर्नर की तीन वर्षीय पुत्री एक समुद्री यात्रा पर पिता के साथ थी। रास्ते में वह बीमार पड़ी और मर गई। उसकी लाश बोरे में सी-कर बन्द कर दी गई ताकि उस जल में उपयुक्त स्थान पर डाला जा सके। कुछ समय उपरान्त देखा गया कि जहाज में पालतू बिल्ली लाश के पास चक्कर काट रही है। आमतौर से बिल्ली लाश से दूर रहती है। सन्देह हुआ कि कहीं बच्ची जीवित तो नहीं है। 24 घण्टे बीत चुके थे, फिर भी बोरा खोला गया तो देखा कि लड़की की हलकी-हलकी साँसें चल रहीं हैं। उसको उपचार मिला और वह ठीक हो गयी। बड़ी होने पर उसके विवाह फ्राँस के राजा लुई चौदहवें के साथ हुआ और वह 84 वर्ष की आयु तक जीवित रही।

सन् 1825 की घटना है। पश्चिमी जर्मनी के वाइक कस्बे के समुद्र तट पर भयानक समुद्री तूफान आया। असंख्यों परिवार उसमें डूब गए। फिर भी पालने से बँधे दो बच्चे जीवित अवस्था में किनारे पर पड़े पाए गये। किसी माता ने इन बच्चों के तैरने की सुविधा सोचकर पालने से बाँध दिया होगा। वे डूबे नहीं, किनारे आ लगे। उन्हें एक समुद्री जहाज के मालिक ने उठाया और पाल लिया। बड़े होने पर वे उस पालने वाले के उत्तराधिकारी बने और जहाजों के मालिक कहलाए। जिन्दगी उन्होंने समुद्र में ही बिताई और अन्ततः किसी समुद्री तूफान में फँसकर जहाज समेत समुद्र के गर्भ में ही समा गए।

कैन्सास के आर्थर स्टिवैल ने एक लम्बा रेल मार्ग बनाने की जिम्मेदारी ली थी। काम ठीक तरह आरम्भ भी नहीं हो पाया था कि एक अप्रत्याशित झंझट आ खड़ा हुआ। इस जमीन पर एक व्यक्ति ने अपने अधिकार का दावा किया और कोर्ट से निषेधाज्ञा निकलवाकर काम रुकवा दिया। बहुत समय तक इस अवरोध के बाद आर्थर ने सपना देखा कि जमीन का असली मालिक कोई कर्से नामक व्यक्ति है। खोज की गयी। कर्से मर चुका था। उसके उत्तराधिकारी भी इस जमीन के सम्बन्ध में अनभिज्ञ थे। पर जब सपने के हवाले से उसने जबरन कागजों की खोज-बीन कराई तो ऐसे प्रमाण मिल गए जिनसे वे लोग ही जमीन के मालिक सिद्ध होते थे। अन्ततः उन लोगों से समझौता करके रेलवे लाइन का काम फिर चालू किया गया और वह यथासमय पूरा भी हो गया। यह काम पूरा होने पर उसे करोड़ों का लाभ हुआ।

ऐसी ही घटना 15 वीं शताब्दी की है जो लन्दन के समीपस्थ शॉपहान कस्बे में प्रख्यात है। यहाँ एक चर्च है जिसमें एक लकड़ी का पुतला विद्यमान है। इसके नीचे नाम लिखा है- फेरी वाला लॉनचैपमेन। सारे गाँव में इसकी उदारता की अब भी चर्चा होती रहती है। प्रसंग यह है कि चैपमेन को रात्रि में एक स्वप्न में संकेत मिला कि “तुम लन्दन जाओ। वहाँ थेम्स नदी के पुल पर एक आदमी तुम्हें मिलेगा जो गढ़े खजाने के संदर्भ में तुम्हें बताएगा। उसका उपयोग सत्कार्यों में ही करना।”

नींद खुलने पर चैपमेन ने निश्चय किया कि यदि स्वप्न सच है तो वास्तविकता का पता अवश्य लगाना चाहिए। वह पैदल ही लन्दन के लिए रवाना हो 5 दिन बाद थेम्स के पुल पर पहुँचा। वहाँ तीन दिन तक वह टहलता रहा। किन्तु संकोच वश किसी को स्वप्न की बात बता नहीं पाया। उसी समय एक व्यापारी ने उसे एक पुल पर उसे बार-बार टहलते देखकर पूछा कि तुम्हें क्या परेशानी है? चैपमेन ने स्वप्न का जिक्र उसे कह सुनाया। व्यापारी हँसकर बोला कि गाँव के लोग बड़े भोले होते हैं एवं बेकार ही स्वप्नों पर विश्वास कर लेते हैं। आगे वह बोला- ‘‘मुझे भी 3 रात पूर्व एक स्वप्न में संकेत मिला था कि यहाँ से सौ मील दूर शॉपहन कस्बे में चैपमेन नामक एक व्यक्ति मिलेगा। उसके घर के पीछे पेड़ के नीचे एक खजाना गड़ा हुआ मिलेगा। लेकिन मैं तुम्हारी तरह बेवकूफ नहीं हूँ कि ऐसे ही स्वप्न पर विश्वास कर चैपमेन को ढूंढू व खजाने का पता लगाऊँ?” चैपमेन को इस वार्तालाप से खजाने का संकेत मिल गया। वह चुपचाप वहाँ से अपने घर के पिछवाड़े के पेड़ के नीचे की जमीन खोदना आरम्भ किया। 2 घण्टे के परिश्रम के बाद ही उसे एक बड़े बर्तन में गढ़े हुए सोने एवं चाँदी के सिक्के मिले। उसने यह धन परिवार के लिए तो खर्च किया ही लेकिन मुक्त हस्त से गाँव वालों को भी सम्पत्ति वितरित की। एक चर्च व अस्पताल उसने बनवाया। उसकी मृत्यु के बाद वहाँ के निवासियों ने उसका एक लकड़ी का पुतला बनाकर चर्च में लगाया ताकि उसकी स्मृति अक्षुण्ण रहे।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सन् 1914 में एक जर्मन जासूस पीटर कार्पन, फ्राँस में पकड़ा गया। फ्राँसीसियों ने उसकी गिरफ्तारी को गुप्त रखा, साथ ही उसके नाम से झूठे समाचार जर्मनी भेजते रहे। साथ ही जो वेतन भत्ता जर्मनी से आता उसे झूठे दस्तखतों से वसूल करते रहे। सन् 1917 में पीटर का दाँव लगा एवं वह किसी तरह जेल से निकल भागा। दूसरी ओर पीटर के नाम से मिली धनराशि से गुप्तचर विभाग के लिए एक गाड़ी खरीदी गयी। संयोग की बात कि शहर में घूमते समय एक व्यक्ति उस गाड़ी की चपेट में आ गया। मृतक के बारे में खोज-बीन की गयी तो पता चला कि वह और कोई नहीं, कैद से भागा हुआ जासूस पीटर ही था।

ओहियो के फिलिप रैडेल के दाहिने फेफड़े में एक गोली लगी और इतनी गहरी घुस गयी कि उन दिनों के साधनों को देखते हुए निकालना संभव न था। शल्य चिकित्सकों ने निराशा व्यक्त की और ऑपरेशन करने से इन्कार कर दिया। घायल ऐसे ही अस्पताल में पड़ा रहा। एक दिन उसे जोरों की खाँसी आयी और गोली मुँह के रास्ते बाहर निकल गयी।

संयोगों का सिलसिला अपने आप में बड़ा विचित्र है। संयुक्त राज्य अमेरिका के इतिहास में 140 वर्षों से एक श्रृंखला-सी घटती चली आ रही है कि प्रति बीस वर्ष के अन्तराल पर वहाँ के राष्ट्रपति की मृत्यु अपने कार्यकाल में ही हो गयी। या तो वे मारे गये या स्वतः मृत्यु को प्राप्त हुए किन्तु अपना कार्यकाल पूरा न कर सके।

सन् 1840 में 68 वर्षीय विलियम हैरीसन राष्ट्रपति बने। मार्च 1841 में उनकी न्यूमोनिया से मृत्यू हो गयी। 1830 में लिंकन राष्ट्रपति बने और उनकी हत्या 1865 में गोली मारकर कर दी गयी। 1880 में प्रेसीडेन्ट गारफील्ड राष्ट्रपति बने किन्तु 1881 में ही एक व्यक्ति की गोली का शिकार हो गए। 1900 में विलियम मैकनले राष्ट्रपति बने और अगले वर्ष गोली लगने के कारण मर गए। 1920 में प्रेसीडेन्ट हार्डिग ने कार्यभार सम्भाला और स्वाभाविक मृत्यु से 1923 में मृत्यु को प्राप्त हुए। 1940 में फ्रैंकलिन रूजवेल्ट राष्ट्रपति बने किन्तु 1945 के आरम्भ में ही मर गए। 1960 में प्रेसीडेन्ट जॉन कैनेडी ने 1963 तक एक नक्स्लवादी फैनेटिक द्वारा गोली मारे जाने तक राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया था।

इनमें से 1860, 1900, 1940 में चुने गए राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में तो मृत्यु को प्राप्त हुए ही थे, सब दूसरी बार चुने गए थे। एकमात्र अपवाद 1980 में चुने गए राष्ट्रपति रीगन हैं। संयोग यह भी है कि इस श्रृंखला में वर्णित सभी राष्ट्रपतियों में वे सबसे वयोवृद्ध हैं एवं आगामी चुनाव के लिये इन पंक्तियों के लिखे जाने तक अपनी पार्टी द्वारा अनुमोदित भी कर दिये गए हैं। संयोगों पर सर्वाधिक विश्वास रखने वाले अमेरिकनों का मत है कि वे भी उसी नियति को प्राप्त होंगे। क्या होना है, यह तो समय बताएगा, किन्तु यह समय से जुड़ी संयोगों की विचित्रता अपने में रहस्यमय है।

मानव जीवन एवं प्रकृति जगत में इसी प्रकार कई बार विचित्र संयोग देखे जाते हैं। वे लगते तो संयोग, दैवी प्रयास, भाग्य जैसे हैं, पर वस्तुतः उनके पीछे विश्व व्यवस्था के किन्हीं अकाट्य नियमों को काम करते समझा जा सकता है और उन रहस्यों का पता लगाते हुए नए सिरे से प्रयास-पुरुषार्थ आरम्भ किया जा सकता है।




देश के माने हुये सन्त (kahani) - Akhandjyoti January 1985

रिनझाई, कोरिया देश के माने हुये सन्त थे। उनके निकट रहकर अनेकों ने सिद्धियाँ पाई थीं।

एक धनी व्यक्ति आया और कहा- मुझे बहुत व्यस्तता है, जल्दी सिद्धियाँ मिले, ऐसा उपाय बता दीजिए।

रिनझाई ने कहा- बस मात्र तीस वर्ष लगेगा। इतने समय ठहरना पड़ेगा आश्चर्यचकित होकर उसने पूछा भला इतना समय किसलिए? उत्तर मिला- गलती हो गयी- तुम्हें साठ वर्ष ठहरना पड़ेगा। उतावली दूर करने के तीस वर्ष और सन्देह हटाने के लिए तीस वर्ष।

उस बार व्यक्ति वापस लौट गया। पर घर जाकर विचार करने लगा। इतने बड़े लाभ के लिए यदि सारी जिन्दगी भी लग जाय तो क्या हर्ज है। वह वापस लौट आया और साठ वर्ष साधना करने के लिए तैयार हो गया।

तीन वर्ष पूरे हो पाये थे कि साधना पूरी हुई और सिद्धि मिल गयी।

इतनी देर में होने वाला काम इतनी जल्दी कैसे हो गया, इस शंका का समाधान करते हुये रिनझाई ने कहा- उतावली और असमंजस यह दो ही साधना मार्ग के दो बड़े विघ्न हैं, यदि धैर्य और विश्वास जम सके तो आत्मिक प्रगति में देर नहीं लगती।




अभिशप्त सम्पदा को ढूँढ़ निकालने के असफल प्रयास - Akhandjyoti January 1985

प्रस्तुत एक शताब्दी में दो महायुद्ध लड़े गये हैं और उनमें युद्ध कला का आमूल-चूल परिवर्तन हो गया है। पुराने जमाने में राजा या सेनापति आगे चलता था। अपने पराक्रम के जौहर दिखाता था और पीछे चलने वाले सैनिक अपनी वफादारी साबित करते हुए पीछे चलते थे। अब सेनापति किसी गुप्त स्थान पर बैठा हुआ नक्शा बनाता रहता है। गोला बारूद के भण्डार पीछे रहते हैं और जरूरत के मुताबिक सप्लाई होते रहते हैं। पुराने जमाने में रास्ते में पड़ने वाले गाँवों को लूटकर राशन, नकदी और दास, दासी पकड़े जाते थे और उसी के सहारे आगे का प्रयाण चलता था। छोटी कोठियां, किले लूटते हुए बड़े राज पर चढ़ाई की जाती थी। आज की रण-नीति अर्थ प्रधान है। हर चीज बाजार से खरीदनी पड़ती है और उसका मूल्य नोट नहीं सोना होता है। इसलिए दोनों पक्ष अपने पैर मजबूत करने के लिए जहाँ से भी उपलब्ध हो- जैसे भी हाथ लगे सोना एकत्रित करने का प्रयत्न करते हैं। मित्र पक्ष अपनी बदनामी नहीं उड़ने देते पर शत्रु को जो भी ऐसे स्त्रोत हाथ लगते हैं उनका अच्छा खासा विज्ञापन करते हैं।

हिटलर ने हार के दिनों या जीत के दिनों प्रचुर परिमाण में सोने के भंडार भरे थे। और सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें नितान्त गोपनीय स्थानों पर रखा था। जीत के दिनों इसलिए कि अस्त-व्यस्त हुए अपने देश या अधीनस्थ देशों को अपने पैरों खड़ा करने के लिए वह सोना काम आये। हारने की स्थिति में जमा इसलिए किया जाता था कि पीछे हट कोई और मोर्चा खोलना पड़े तो पूँजी की आवश्यकता जुटाई जा सके। यदि पूर्णतया हार ही हार होती है तो प्रमुख लोग अपने और अपने परिवार के गुजारे के लिए एक बड़ी राशि सुरक्षित छोड़ रखें।

उपलब्ध विवरणों से हिटलर द्वारा छिपाकर रखे हुए सोने की कुछ जानकारी हाथ लगी है। पर वह है इतनी गोपनीय कि विजेता राष्ट्र उसका पता लगाकर लाभ न ले सके। जर्मन पराजय के बाद युद्ध बन्दी पकड़ने के साथ साथ सर्वाधिक प्रयत्न इसी बात का हुआ कि छिपाया हुआ सोना कहाँ है? ओर उसे किस प्रकार हस्तगत किया जा सकता है। जो नहीं मिल सका उसकी जानकारियाँ प्रकाश में लाई गई हैं।

जर्मनी के मूर्धन्य अधिकारियों की पराजय के बाद जो पकड़ हुई उससे कुछेक सूत्र ऐसे मिले हैं जिनमें छिपाये हुए सोने की कुछ जानकारी मिलती है।

-स्विट्जरलैंड, स्वीडन और पुर्तगाल में गुप्त तहखाने बनाकर उन में छिपाया हुआ सोना 130 टन, जर्मनी के बैंकों से समेटा गया सोना 57 टन, उच्च अधिकारी जिस सोने को मिलजुल कर पचा गये 225 टन। आस्ट्रिया की कई झीलों में डुबाया हुआ सोना 500 टन। अपने भण्डार में 70 टन। मोडसी झील में डुबाया हुआ सोना 400 टन। उत्तरी आस्ट्रिया के गवर्नर की निजी जानकारी पर छोड़ा गया सोना 150 टन। निवेसु जैन भण्डार का सोना 80 टन। त्क्रालेगा सागर में डुबाया हुआ सोना 200 टन। यहूदियों से संग्रह किया गया सोना 611 टन।

यह जानकारी उन सूत्रों के सहारे मिली है जो नाजी गुप्तचरों के मूर्धन्य लोगों के हिटलर की कड़ी जानकारी में रखे गये हैं। ऐसे 14 स्थानों में जितना निकल सकता था उतना निकाला भी गया है। बाकी स्थानों की खोज जारी रखी गई है और उसमें से यदा-कदा कुछ हाथ लगता भी रहता है। बाकी स्थान ऐसे हैं जिनके स्थानों का अनुमान भी नहीं है। क्योंकि या तो उन्हें रखने वाले मर गये या जितना उनके हाथ पड़ा उसे लेकर गायब हो गये। अनुमान है कि जितने सूत्र हाथ लगे हैं उससे भी अधिक अविज्ञात है। अभिशप्त होने के कारण यह कभी हाथ लगेगा नहीं।

किसी समय अमेरिका में डाकुओं का बड़ा आतंक था। एक डाकू दल ने अपार सम्पत्ति लूटकर एक लोहे के घड़े में भरकर मिसीसीपी नदी के डेल्टा के पास जमीन में दबा दिया। इस भूमि पर आजकल एक बड़ा कृषि फार्म है, जिसका स्वामी ‘रीडर वोव’ है। इस भूमि को ‘रीडर वोव’ के पूर्वजों ने धन के लालच में खरीद लिया था।

‘रीडर वोव’ के पूर्वजों ने वहाँ एक मकान भी बनवा लिया। परन्तु इस सात फुट चौड़े, चार फुट ऊँचे घड़े को निकालने के लिए उनके सारे प्रयास विफल हो गये। कुछ ऐसी विचित्र घटनाएँ घटीं कि उन्हें वह स्थान ही छोड़ देना पड़ा।

‘रीडर वोव’ ने पूर्वजों द्वारा छोड़े गये नक्शों के आधार पर इस खजाने को निकालने का प्रयास किया। ‘रीडर वोव’ कीचड़ निकालते-निकालते घड़े के पास तक पहुँच गये। परन्तु ज्यों-ज्यों घड़े के आस-पास से कीचड़ निकालते थे, घड़ा अन्दर धँसता जाता था। ‘रीडर वोव’ स्वयं इस पूरी तरह कीचड़ में फँस गये कि उन्होंने उस घड़े को निकालने का विचार ही त्याग दिया।

सन् 1939 में ‘बूलेक व स्टिक्लोन’ ने कुशल इंजीनियरों द्वारा बुलडोजरों तथा क्रेनों से कीचड़ निकालने की मशीन आदि की सहायता से इस घड़े को निकालने का प्रयत्न किया। घड़े का मुँह क्रेन में फँसा दिया गया। ठीक उसी समय-बिजली की भयानक गर्जना के साथ इतनी तेज अप्रत्याशित वर्षा शुरू हो गई कि वहाँ ठहरना असम्भव हो गया। इसके बाद इस अभिशप्त खजाने को ढूंढ़ने के प्रयास बन्द कर दिए गए।

कहते हैं कि मुसोलिनी ने भी मृत्यू के बाद भयंकर प्रेत पिचास का रूप धारण कर लिया। वह अपने खजाने का लाभ किसी और को नहीं लेने देना चाहता था, खुद तो अशरीरी होने से उसका लाभ उठा ही क्या सकता था। कहा जाता है कि उसी ने प्रेत रूप में खुद खजाना छिपाया ओर खुद ही रखवाली की। जिनने उसका पता लगाने की कोशिश की उनके प्राण लेकर छोड़े, इतना ही नहीं जिनके प्रति उसके मन में प्रतिहिंसा की आग धधक रही थी, उन्हें भी उसने मार कर ही चैन लिया।

हिटलर की भी सदैव यही नीति रही कि जिस देश को जीता, उसके बैंकों तथा व्यवसायिक संस्थाओं को खाली करा लिए। जब हारने लगा तो भी उसने यही किया कि जो क्षेत्र छोड़ने पड़ेंगे उन्हें पूरी तरह खोखला करने के बाद खाली किया जाय। यह कठोरता प्रजाजनों के साथ भी बरती गई। सम्पत्तिवानों से सम्पत्ति आपस में बेचकर उसके बदले का सोना नाजियों के हवाले करने को कहा गया। हिसाब तो सही रहता नहीं था इसलिए बीच के लोग लूटपाट भी बहुत करते थे। इस प्रकार जानकारी वाली सोने की तुलना में गैर जानकारी वाला और भी अधिक रहता है। इसे खोज निकालना विजेताओं के लिए भी सरल नहीं पड़ता था। नाजियों के लूटे सोने में से अधिकाँश को अभी तक खोजा नहीं जा सका है।

भारतवर्ष में भी छोटे-बड़े खजानों की खोज अभी भी होती रहती है। यह कहाँ से आये, किसने गाड़े, कहाँ से लाये? इसका अनुमान हिटलर की एकतंत्री व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाकर अनुमान लगाया जा सकता है। विजेता इसलिए जमा करते थे कि भविष्य में उसके सहारे राज्य विस्तार कर सकें। पराजित होने की सम्भावना देखकर भी खजाने इसलिए गाड़े जाते थे कि अवसर मिलेगा तो उसे निकालकर अपनी कठिनाई का हल निकालेंगे।

खजाने एवं बहुमूल्य सम्पदा जो अनीति अनाचार की कमाई होती है कभी भी किसी व्यक्ति विशेष के हाथ नहीं लगते। सृष्टि की नियम व्यवस्था का उल्लंघन कोई कर नहीं सकता। छप्पर फाड़कर सोना बरसने व गढ़ा खुदा खजाने मिलने की कथाएँ तो बालकों के एडवेंचर साहित्य की उपज भर हैं। संपदा इस तरह कुपात्रों को प्राप्त होने लगे तो श्रम से उपलब्धि का सिद्धान्त ही समाप्त हो जाएगा। इस तथ्य को भली-भांति समझ लिया जाना चाहिए।




प्रगति और अवगति पुरुषार्थ पर अवलम्बित - Akhandjyoti January 1985

कितनी ही मछलियाँ अपने शरीर से बिजली उत्पन्न करती हैं और उसका झटका मारकर शिकार को बेहोश करके उदरस्थ करती हैं। शिकार का यह तरीका अपेक्षाकृत अधिक सरल पड़ता है। शार्क इस प्रकार की मछलियों में प्रसिद्ध है। ह्वेल अपने आकार के अनुसार 600 बोल्ट तक बिजली पैदा करती है। इतना झटका खाकर कोई मजबूत आदमी भी ढेर हो सकता है।

इन मछलियों को ऐसी विशेषता कैसे मिली इसकी खोज करने वालों का कथन है कि विद्युत उत्पादन के अवयव हर मछली में होते हैं। उनके द्वारा उत्पादन भी होता रहता है। पर वे उसे अन्य क्रिया-कलापों में खर्च करने की आदत डाल लेती है। फलतः ऐसा चमत्कार नहीं दिखा पाती जैसा कि शार्क मछली शिकार पर आक्रमण करने के लिए बिजली का प्रहार करने में अभ्यस्त हो गई है। किसी अन्य जाति की मछली को यदि प्रयत्नपूर्वक इसके लिए सधाया जाय तो वह भी वही काम कर सकती है जो शार्क करती है।

मनुष्य शक्तियों का भण्डार है। उसमें इतने अधिक प्रकार की- इतनी अधिक मात्रा में क्षमताएँ विद्यमान हैं कि उनका आभास पाने पर आश्चर्य होता है। वे किसी-किसी में दृष्टिगोचर होती हैं, किसी में नहीं, इसका कारण एक ही है कि जिनने प्रस्तुत भण्डार में से आवश्यक को खोजा और उभारा। उनमें जो काम करने लगी। इसके विपरीत जो अनजान या अकर्मण्य बना रहे उन्हें सामान्य लोगों अथवा गये गुजरों जैसा जीवन व्यतीत करना पड़ा।

भूमि में उर्वरता होती है, पर बिना प्रयत्न किये उसमें से अनायास ही फसल उग पड़े ऐसा कहाँ होता है। पुरुषार्थ छोटे-बड़े हर काम के लिए आवश्यक है, अन्यथा थाली में रखा ग्रास तक मुँह में प्रवेश न कर सकेगा। पुरुषार्थ का तात्पर्य इतना ही है कि जो विद्यमान है उसे सही तरीके से उगाया और काम में लगाया जाय। जो है ही नहीं उसके लिए पुरुषार्थ करने पर भी कुछ बनता नहीं। चट्टान पर उपवन कैसे उगेगा? मानवी पुरुषार्थ की प्रशंसा इसलिए है कि आत्म-सत्ता में- समर्थ काया में- सफलता की अजस्र और अगणित सम्भावनाएँ भरी पड़ी हैं। ईश्वर ने उसे विभूतिवान बनाया है। प्रयत्न करने और समुन्नत बनाने का अवसर प्राप्त करना उसकी अपनी मर्जी पर निर्भर है।

संसार में अनगिनत विशिष्ट व्यक्ति हुए हैं। उनमें अपनी-अपनी मर्जी से क्षेत्रों में असाधारण सफलताएँ प्राप्त की हैं। उन उपलब्धियों को देखकर उन्हें चमत्कारी, भाग्यवान अथवा वरदान सम्पन्न बताया है पर वस्तुतः ऐसा कुछ भी होता नहीं है। सूझ-बूझ, लगन और मेहनत का नाम ही चमत्कार है। यह वैभव हर किसी के पास समुचित मात्रा में विद्यमान है पर उसे समझने और कुरेदने का कोई बिरले ही प्रयत्न करते हैं।

राबर्ड एल॰ बिले ने रहस्य रोमाँच भरे ऐसे घटना क्रमों को खोजा, जिन पर मनुष्य को सहज विश्वास नहीं होता। इसके लिए उसने पुस्तकों से संकलन नहीं किया वरन् 198 देशों में भ्रमण करके जो सामग्री जुटाई उसके प्रमाण और चित्र भी एकत्रित किये। इस प्रयास के लिए इंग्लैण्ड के राजा ने उसे दूसरा मार्कोपोलो कहा।

यही व्यक्ति कार्टन निर्माता के रूप में भी प्रख्यात हुआ। उसके बनाये व्यंग चित्र 38 देशों के प्रायः 300 समाचार पत्रों में 18 भाषाओं प्रकाशित होते रहे। इन अखबारों की पाठक संख्या करोड़ों थी।

ऐसे उदाहरणों में भूतकालीन इतिहास के अगणित पृष्ठ भरे पड़े हैं और सभी भी आये दिन ऐसे घटनाक्रम सामने से गुजरते रहते हैं। शरीर की संरचना की दृष्टि से लोगों के बीच नगण्य-सा अन्तर है। मस्तिष्क भी न्यूनाधिक मात्रा में एक जैसा ही है। कठिनाइयों और सुविधाओं के अवसर हर किसी के सामने रहते हैं। सहयोगी और विरोधी हर किसी का पीछा करते हैं। फिर कुछ ऊँचे उठते हैं कुछ नीचे गिरते हैं, और कुछ त्रिशंकु की तरह बीच में लटके रहते हैं। यह उनकी निजी प्रतिभा और तत्परता के न्यूनाधिक होने की परिणति है। उन्हें घटाने-बढ़ाने हेतु मनुष्य स्वयं ही उत्तरदायी है।




मानवी वरिष्ठता अक्षुण्ण बनी रहे - Akhandjyoti January 1985

सृष्टा ने प्राणियों और पदार्थों को जो दिया है उतनी ही उनसे अपेक्षा रखी है। कोयल कूकती और चिड़िया फुदकती है। भेड़ से ऊन और गाय से दूध के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहा गया। वृक्ष छाया और फल देते हैं। सूरज को गर्मी और बादल को वर्षा की क्षमता दी गई है। वे वही प्रस्तुत भी करते हैं जिसके लिए उन्हें योग्य बनाया गया है।

मनुष्य के सम्बन्ध में भी यह बात आँशिक रूप से ही लागू होती है। उसे प्रतिकूलताओं से घिरा रखा गया है और साथ ही यह कहा गया है कि उसे बदलें और अनुकूलता उत्पन्न करें। अन्धेरे में प्रकाश-अभाव में वैभव, सुनसान में सौंदर्य और जड़ता के स्थान पर प्रगति उत्पन्न करने के लिए कहा गया है। यही है उसकी विशेषता की परीक्षा। जो सुधारने और उभारने में समर्थ है उसी पर सृष्टा का श्रम सार्थक हुआ समझ जाता है।

निर्वाह हर प्राणी के लिए सरल है। नियति ने इसके लिए व्यवस्था बना रखी है। कृमि कीटकों से लेकर जलचरों तक सहज बुद्धि से जहाँ रहते हैं वहीं निर्वाह प्राप्त कर लेते हैं। केंचुए के हाथ, पैर आँख कान कुछ भी नहीं होते, इतने पर भी वह अन्य प्राणियों की तरह जीवनयापन की यथोचित सामग्री प्राप्त कर लेता है। गूलर के भीतर उत्पन्न होने वाले भुनगों को उसी छोटी परिधि में शरीर यात्रा की सुविधा सामग्री उपलब्ध होती रहती है। गहरे समुद्र और बर्फीले पर्वत शिखरों पर जन्मने वाले प्राणी भी अपना गुजारा करते हैं। ध्रुवप्रदेशों की कठिन परिस्थितियों में भी जीवधारी जन्मते और दिन गुजारते हैं।

मनुष्य विशिष्ट है। उसकी गरिमा अन्याय प्राणियों से अतिरिक्त और अधिक है। इसे किसने कितना समझा और उसका किस प्रकार क्या उपयोग किया? इसी से सही परीक्षा होती है कि उपलब्धियों को सार्थक बनाना बन पड़ा या नहीं।

वरिष्ठता की चुनौती यह है कि मनुष्य अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न करें और खाद से खाद्य उगाये। सभी प्राणी जन्मते और मरते हैं, पर मनुष्य से आशा की गई कि वह जन्म-मरण के चक्र से छूटे और अमरत्व प्राप्त करे। मौत सबको जीतती है पर मनुष्य से कहा गया है कि वह मौत को जीतकर दिखाये। पदार्थ सत्ता आसक्त है। यहाँ सब कुछ टूटता और बदलता है। मनुष्य को इसी में से सत्, चित और आनन्द को न केवल खोज निकालने के लिए वरन् उसका रसास्वादन अन्यान्यों को भी कराने का उत्तरदायित्व सौंपा गया है।

गरिमा किसी के हाथ अकारण नहीं सौंपी जाती। उच्चपदों के पीछे जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी हैं। सृष्टि का मुकुट मणि प्राणियों में मूर्धन्य और सृष्टा का युवराज होने जैसे सम्मान प्राप्त करने के साथ-साथ मनुष्य उस पुरुषार्थ का परिचय देने के लिए भी बाधित किया गया है जिसमें उसकी वरिष्ठता सार्थक सिद्ध हो सके।

प्राणी वर्ग में मलमूत्र विसर्जन के उपरान्त स्वच्छता का एवं यौनाचार की मर्यादाओं का प्रतिबन्ध नहीं है। वे जहाँ भी जिसका भी उपार्जित आहार पाते हैं बिना संकोच के उदरस्थ करते हैं, पर मनुष्य की अपनी नीति मर्यादा है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से मनुष्य को ऐसा होना चाहिए जिससे उसकी गरिमा एवं वरिष्ठता का प्रमाण परिचय मिल सके।

निर्वाह भर की आकाँक्षा और श्रमशीलता में घिरे रहकर नर पशु ही रहा जा सकता है। पेट और प्रजनन के निमित्त जीवनचर्या नियोजित रखकर सामान्य प्राणियों की प्रकृति चक्र के निमित्त उपकरण बने रहना पड़ता है। वे अपनी हलचलों से सृष्टि सन्तुलन बनाये रहने भर की आवश्यकता पूरी करते हैं। पर मनुष्य का सृजन इतने भर के लिए नहीं हुआ है। उसे इस विश्व उद्यान को अधिक सुन्दर-समुन्नत बनाने का विशेष उत्तरदायित्व सौंपा गया है। सृष्टा को उससे एक ही अपेक्षा है कि इस अनुपम कलाकृति की गरिमा बनाये रहे और ऐसी गतिविधियाँ अपनाये जिससे नियन्ता के युवराज के अनुरूप विशिष्टता एवं वरिष्ठता का स्वरूप दृश्यमान होता रहे।




स्वप्नों में दार्शनिक गुत्थियों के हल - Akhandjyoti January 1985

धर्म और राजनीति को प्रभावित करने के अतिरिक्त साँस्कृतिक इतिहास को भी स्वप्नों ने प्रभावित किया और संसार को नया स्वरूप प्रदान करने में महती भूमिका सम्पादित की है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 17 वीं शताब्दी के फ्रेंच दार्शनिक रेने डेस्कार्ट्रेस का है, जिन्हें आधुनिक युग के वैज्ञानिक तरीकों, उनके सिद्धान्त और उनसे सम्बन्धित दर्शन को प्रतिपादित करने वाले वैज्ञानिक युग का जनक माना जाता है।

सन् 1619 में 23 वर्षीय रेने डेस्कार्ट्रेस महान भावनात्मक और बौद्धिक तनाव से गुजर रहे थे। गणित विज्ञान मैथेमेटिकल साइन्स को एकीकृत करने की महत्वाकाँक्षी योजना की कल्पना को पेपर पर साकार रूप नहीं दे पा रहे थे। इस योजना में व्यक्तिगत और कुछ धार्मिक भावनाएँ बाधाएँ डाल रही थीं। 10 नवम्बर की रात्रि को उन्होंने क्रमशः तीन सपने देखे। जिसे बाद में डेस्कार्ट्रेस ने “ऊपर से आये हुए दिव्य संकेतों” की संज्ञा दी थी। संकेतों के आधार पर डेस्कार्ट्रेस अपनी महत्वपूर्ण योजना को दुबारा लिखना आरम्भ किया। स्वप्न से डेस्कार्ट्रेस के चिन्तन मनन की दिशाधारा बदल गई और सत्य की खोज में ही उनका अधिकाँश समय व्यतीत हुआ। जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने एक दर्शन का विकास किया जिसने बुद्धिवादियों और धार्मिकों को एक सूत्र में पिरोया। इस दर्शन से पश्चिमी विज्ञान 300 वर्षों तक बराबर प्रभावित बना रहा। स्वप्न के तथ्य इतने शक्तिशाली थे जिनसे न केवल डेस्कार्ट्रेस प्रभावित हुए वरन् सम्पूर्ण वैज्ञानिक जगत इन सम्भावनाओं से अनुप्राणित हुआ।

डेस्कार्ट्रेस की कहानी इस तथ्य को उजागर करती है कि डीमिंग और क्रिएटीविटी-स्वप्न और सर्जनात्मकता में कोई विशेष सम्बन्ध है। लेखक, कलाकार, कवि, वैज्ञानिक और आविष्कारकों में से अधिकाँश को सर्जनात्मक बुद्धि, अंतर्दृष्टि, सूत्र संकेतों की उपलब्धि स्वप्नों में हुई थी। इनकी मान्यता थी कि सामान्य जागृत अवस्था में चेतनात्मक तार्किक बुद्धि के सहारे वे अपने क्षेत्र में इतनी सूक्ष्मता से गहराई तक नहीं पहुँच सकते थे। फ्रेंच दार्शनिक मार्क्विस डे कान्डोरेक्ट दावे के साथ कहा करते थे कि कठिन गणनाओं प्रश्नों को वे बहुधा अपूर्ण छोड़ देते थे और सोने चले जाते थे। स्वप्न में ही उनके जटिल प्रश्नों के सम्पूर्ण हल मिल जाते थे। सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शारलोट ब्रोन्टे ने अपने बायोग्राफर को बताया था कि कठिन समस्याओं को लेखन के समय सही ढंग से प्रस्तुत न कर पाने के कारण वे उसे वहीं छोड़ देती थीं। सोते समय स्वप्न में उनके हल उन्हें बहुधा मिल जाया करते थे। इटली के सोलहवीं सदी के प्रख्यात लेखक जेरोम कार्डन ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक को स्वप्नों में मिले ज्ञान के आधार पर पूरा किया था। यह स्वप्न लगातार आते रहे, जब तक पुस्तक पूर्ण होकर प्रकाशित नहीं हो गई।

अठारहवीं सदी के विख्यात संगीतज्ञ जिउसेप्पी टार्टिनी ने स्वप्न में एक शैतान को दास बना लिया, जो वायलिन बजाने में उस्ताद था। स्वप्न में टार्टिनी ने शैतान की एक ऐसी संगीत रचना सुनी जिसे उसने कभी न सुना था और न ऐसी कल्पना की थी। नींद खुलते ही टार्टिनी अपना वायलिन उठाकर जितना अच्छा बजा सकते थे, बजाने का प्रयास किया। “द डेविल्स ट्रिल” के नाम से उनकी संगीत रचना प्रसिद्ध हो गई।

स्वप्नों के ऐसे अनेकों उदाहरण विद्यमान हैं जिनसे यह तथ्य उद्घाटित होता है कि मनुष्य का अचेतन एक क्रमबद्ध सुसंगठित फैकल्टी है जिसे जागृत कर लेने पर बहुत कुछ जाना और पाया जा सकता है। जबकि चेतन मस्तिष्क के सहारे क्रमशः तर्क बुद्धि की प्रखरता को बढ़ा लेने पर भी एक सीमा तक ही किसी चीज का ज्ञान हासिल हो पाता है।

यह सर्वविदित है कि जर्मनी के प्रख्यात रसायन शास्त्री केकुले को कार्बोनिक रसायन में बेंजीन के फार्मूले का ज्ञान स्वप्न में ही उपलब्ध हुआ था। वैज्ञानिकों के सम्मेलन में केकुले ने कहा था- ‘‘भद्रजनों! हमें स्वप्न का अध्ययन करना चाहिए और तब हम सत्य के अधिक नजदीक पहुँच सकते हैं।”

बीसवीं शताब्दी में वैज्ञानिक क्रान्ति के जन्मदाता डेनमार्क निवासी सुविख्यात भौतिक विज्ञानी नील्स बहर परमाणु ऊर्जा और क्वान्टम मेकेनिक्स के विकास में अग्रणी माने जाते रहे हैं। उन्हें हाइड्रोजन एटम-एटामिक “मशरूम” का ज्ञान स्वप्न में मिला था। सन् 1913 में एक विशेष प्रकार के परमाणु का ज्ञान भी स्वप्न के माध्यम से ही उन्हें ज्ञात हुआ था।

18 वीं सदी के गोथिक रोमांसवादी उपन्यासों की प्रसिद्ध लेखिका अन रेडक्लिफे ने अपने सभी उपन्यास स्वप्नों के आधार पर लिखे थे। लिखने की पूर्व सन्ध्या को वे अधिक मात्रा में गरिष्ठ भोजन कर सो जाती थीं।

साहित्यिक क्षेत्र में स्वप्नों से प्राप्त जानकारी के आधार पर कथा साहित्य लिखने वाले कथाकारों में राबर्ट लूइस स्टिवेन्सन का नाम सबसे आगे है। ‘लिटिल प्यूपिल’ “बाउनीज” तथा ‘डा. डेथ और मि. हाइडे” की रोमाँचकारी कहानियाँ राबर्ट लुइस की सर्वोत्तम कृति मानी जाती है। सभी पुस्तकें स्वप्न में मिली जानकारी और देखे गये दृश्यों के आधार पर लिखी गई हैं।

कोलरिज की विख्यात अँग्रेजी कविता “कुबला खान” स्वप्नों के इतिहास में लिखी गई रहस्यपूर्ण, गीतात्मक एवं बहुत ही प्रतीकात्मक शैली में लिखी गई अनुपम कृति है। स्वप्न भंग होते ही कोलरिज उठ बैठते थे और मस्तिष्क में अंकित कविताओं को लिपिबद्ध कर डालते थे। एक दिन कोलरिज कुबला खान से सम्बन्धित एक लेखांश पढ़ते हुए अपनी कुटिया में सो गये। जागने पर स्वप्न में देखी कविता को लिपिबद्ध कर ही रहे थे कि अचानक एक आगन्तुक आ धमका और उनकी तन्द्रा भंग हो गई। उसके चले जाने के एक घण्टे बाद कोलरिज ने अधूरी कविता को पूरा करने का भरसक प्रयत्न किया, परन्तु वह उनकी स्मृति पटल से ओझल हो चुकी थी।

अमेरिका के प्रख्यात मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक विलियम जेम्स को स्वप्न में ब्रह्मांड के रहस्य को सुलझाने वाली एक वैचारिक कल्पना सूझी। उत्तेजित और अर्ध सुषुप्तावस्था में ही उन्होंने उन पंक्तियों को संक्षेप में पैड पर नोट कर लिया।

मानवी सभ्यता के विकास में सपनों का एक अपना ऐतिहासिक महत्व है। 4000 वर्ष पूर्व बैबिलोनिया में लिखी गई सबसे पुरानी पुस्तक “द एपिक आफ गिज्गामेस” स्वप्न और स्वप्न प्रतिमावली से परिपूर्ण एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। ‘ओल्ड टेस्टामेन्ट’ में जोसेफ की कहानियाँ स्वप्न शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। जोसेफ को भविष्य में आने वाले संकटों का पूर्वाभास स्वप्नों के माध्यम से हो गया था। सात वर्ष तक पड़ने वाले भीषण अकाल से निपटने के लिए इजिप्टवासियों ने समय रहते साधन जुटा लिये थे और दुर्भिक्ष के समय अपनी जान बचाने में समर्थ हुए थे।

स्वप्नों की कहानियाँ इस तथ्य का उद्घाटन करती हैं कि मनुष्य के अचेतन या अवचेतन में छिपे ज्ञान भण्डार संकेत रूप में समय-समय पर बाहर आते रहते हैं और अपने अस्तित्व का बोध कराते हैं।

स्वप्नों के माध्यम से दैवी संकेतों का मिलना एक महत्वपूर्ण तथ्य है। 600 वर्ष ईसा पूर्व बेबीलोन के राजा नेबूचाड ने जार को स्वप्न के माध्यम से न केवल अपने राज्य के पतन की जानकारी मिल गई थी वरन् अपने पागल हो जाने के दृश्य भी देख गये थे।

मेडिया के राजा अस्ट्यागेस ने स्वप्न में देखा कि उनकी लाड़ली राजकुमारी मैण्डेन का विवाह किसी विजातीय लड़के से हो गया है जिसने राजा को पदच्युत करके मेडिया का राज्य छीन लिया। स्वप्न से राजा इतना अधिक भयभीत हो गया कि वयस्क होते ही राजकुमारी की शादी महत्वाकाँक्षाहीन निम्नवर्गीय एक पारसी व्यक्ति से सम्पन्न कर दी जिससे राजा को भविष्य में कोई खतरा अथवा आशंका न रहे। मैण्डेन के गर्भवती होते ही राजा अस्ट्यागेस ने एक दूसरे सपने में देखा कि लड़की के डिम्बाशय से एक बेल निकलकर सम्पूर्ण एशिया में फैल गई है। राज्य सत्ता को बनाये रखने के उद्देश्य से राजा ने अपने ग्रैण्ड चाइल्ड का जन्म होते ही हत्या करा देने का निश्चय कर लिया। दैव योग से राजा के उद्यम कंस की तरह असफल रहे और मैण्डेन का लड़का आगे चलकर विजयी साइरस महान कहलाया।

ग्रीस के सुप्रसिद्ध इतिहास वेत्ता हीरोडोटस ने लीडिया के राजा क्रोएसस के एक चिन्ताजनक स्वप्न का वर्णन किया है। क्रोएसस के दो लड़के थे जिनमें से एक गूँगा एवं मन्द बुद्धि वाला था। दूसरा लड़का अट्यस कुशाग्र बुद्धि सम्पन्न बलवान योद्धा था। राजा ने एक स्वप्न में देखा कि अट्यस को किसी ने तीखे नोक वाले लौहअस्त्र से मार डाला है। स्वप्न ने राजा को विचलित एवं भयभीत कर दिया। अट्यस के भावी खतरे को देखते हुए उसे मिलेट्री के कड़े सुरक्षा घेरे में रखा जाने लगा। अट्यस कैदियों की-सी जीवन चर्या से तंग आ गया। एक दिन जंगली सुअर के शिकार करने के लिए उसने अपने पिता से अनुमति माँगी। विश्वासपात्र एवं अनुभवी सुरक्षा सैनिक अस्ट्राडस के साथ शिकार खेलने की अनुमति मिल गई। जंगल में सुअर को चारों तरफ से घेर लिया गया और गोलियों की बौछार करने लगे। अस्ट्राडस का निशाना चूक गया और गोली अट्यस के सीने में जा घुसी और वह मर गया। क्रोएसस का सपना सच साबित हुआ।

शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य का स्वप्नों से सम्बन्ध खोजने का श्रेय फ्रायड को दिया जाता है परन्तु इससे भी पूर्व कितने ही मनोवैज्ञानिकों ने स्वप्नों का रहस्योद्घाटन किया था। ईसा से दो सौ वर्ष पूर्व ग्रीस तथा अन्य भूमध्यसागरीय प्रान्तों में चिकित्सा के देवता-एस्कूलैपियस को लोग स्वप्न प्रणेता के रूप में पूजते थे। वर्तमान इजिप्ट और मेसोपोटेमिया में भी इनकी पूजा होती थी। वर्तमान इजिप्ट में आज भी भूत पिशाचों को भगाने-मारने के लिए स्वप्नों के द्वारा संकेत-गाइड लाइन प्राप्त किए जाते हैं। अनेक पिछड़ी जातियाँ कोई विशेष निर्णय-शिकार करने का समय निर्धारण स्वप्नों के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं। इजिप्ट में अनेकों मन्दिर ऐसे थे जहाँ एक पादरी के निर्देशन में स्थानीय लोग स्वप्न के माध्यम से दुःख दर्दों से छुटकारा पाने के लिए आते थे। पादरी को “मास्टर आफ दी सेक्रट थिंग्स” के नाम से जाना जाता था। “स्वप्न चिकित्सा’ इन मन्दिरों का व्यवसायिक पेशा हो गया था। पुरातत्व विदों ने ऐसी एक व्यवसायिक प्लेट खोज निकाली है जिस पर स्वप्न द्वारा उपचार करने का विवरण खुदा हुआ है।

इजिप्ट में हाथौर के मन्दिर के पास सेनेटोरियम के ध्वंसावशेष अब भी मौजूद हैं जहाँ स्वप्नों के द्वारा बीमारियों की पहचान की जाती थी और उनका चिकित्सा उपचार किया जाता था।

एस्कूलैपियस के मन्दिर में ‘ड्रीम इन्क्यूबेसन राइट्स (स्वप्न उष्मायन अनुष्ठान) की प्रक्रिया बहुत ही जटिल रूप में सम्पन्न की जाती थी। सम्भावित ड्रीमर को एक सच्चे निष्ठावान साधक की भाँति माँस, मदिरा, चौड़ी फलियां-सेम, आदि और रतिक्रिया से परहेज करना पड़ता था। इसके बाद धार्मिक रीति के अनुसार पवित्र होने के लिए ठण्डे जल से स्नान करना पड़ता था। सायंकाल में चिकित्सा के देवता एस्कूलैपिस की प्रार्थना करके ड्रीमर निर्विष पीले साँपों के ऊपर विशेष प्रकार से बनी स्वप्न शय्या पर सो जाता था। सुबह उठकर रोगी-ड्रीमर देवता द्वारा स्वप्न में बताये गये चिकित्सा उपचार, पथ्य, औषधियों का विवरण सुनाता था और तद्नुरूप उपचार करके स्वस्थ हो जाता था। कुछ लोग स्वप्न शय्या पर सोते समय रात्रि में ही भले चंगे हो जाते थे।

ग्रीक के प्रख्यात चिकित्सा शास्त्री क्लौडिअस गेलन सन् 130 से 200 तक सर्जरी के लिए विख्यात रहे। उनका कहना था कि सर्जरी का सूक्ष्मतम ज्ञान उन्हें स्वप्न में देवता द्वारा उपलब्ध कराया गया था।

ग्रीक दार्शनिक अरस्तू ने ईसा से 400 वर्ष पूर्व प्रतिपादित किया था कि स्वप्नों के माध्यम से कभी-कभी हमें अचेतन की परतों का-भविष्य का ज्ञान हो जाता है। बाह्य उत्तेजनाओं के समाप्त होते ही चंचल मन शाँत हो जाता है और अंतराल की गहराई में प्रविष्ट करके उपयोगी जानकारियों को ढूंढ़ निकालता है। अरस्तू ने सदियों पूर्व स्वप्नों के वैज्ञानिक स्वरूप को लोगों के समक्ष रखा था। प्लेटो के विचार अरस्तू से भिन्न थे। उनकी मान्यता थी कि कुछ स्वप्न डिवाइन ओरिजिन के-दिव्य सन्देश होते हैं। मनुष्य का आन्तरिक व्यक्तित्व ही स्वप्नों के माध्यम से बाहर आती है। इस तथ्य को प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “रिपब्लिक” में प्रतिपादित करते हुए लिखा था- ‘‘अच्छे सभ्य लोगों में भी एक अनैतिक कानून रहित वनचर प्रकृति विद्यमान रहती है जो निद्रावस्था में प्रकट होती है।” इसी तथ्य को प्लेटो से 2300 वर्ष बाद फ्रायड ने अपनी पुस्तक “इण्टर प्रिटेशन आफ ड्रीम्स” में प्रतिपादित किया।

अरस्तु के बाद रोम के प्रख्यात विद्वान सिसरो ने अपनी पुस्तक “आन डिविनेशन” में स्वप्नों का जिक्र किया है। रोम के ही सुविख्यात लेखक आर्टेमीडोरस ने दूसरी शताब्दी में विभिन्न देशों, स्थानों, ड्रीम इन्क्यूवेशन केन्द्रों का निरीक्षण किया था और स्वप्न से सम्बन्धित व्यक्तियों से साक्षात्कार करके स्वप्न से जुड़ी सभी जानकारियों और हस्तलिपियों को एकत्रित किया था और ‘‘ओनीरोक्रिटिका” नामक अपनी पुस्तक में स्वप्न के पाँच प्रकारों का वर्णन किया गया है। (1) साँकेतिक (2) भविष्य सूचक (दिव्य रहस्योद्घाटन) (3) इच्छापूर्ति (4) दुःस्वप्न और (5) दिव्य स्वप्न (दिव्य दर्शन)। इसके बाद इन्सोम्नियम और सौम्नियम नाम से स्वप्नों को दो श्रेणियों में विभक्त किया गया है। जिनमें प्रथम शारीरिक और मानसिक स्तर के और दूसरे भविष्य का परिचय साक्षात्कार करने वाले होते हैं। बाद में जुंग ने इसी को आधार मानकर स्वप्नों की सामान्य और दिव्य दो श्रेणियां निर्धारित कीं। भारत, चीन और जापान में स्वप्न सम्बन्धी अनेकों पुस्तकें उपलब्ध हैं, जिनमें आत्मिकी के आधार पर स्वप्नों के माध्यम से दार्शनिक गुत्थियों के हलों का वर्णन बहुलता से मिलता है।




Quotation - Akhandjyoti January 1985

विधाता ने चन्दन का वृक्ष फल फूल से रहित बनाया, तो भी वह दूसरों के सन्ताप मिटाता है।




दान बड़ा या ज्ञान (kahani) - Akhandjyoti January 1985

विवाद यह चल रहा था कि दान बड़ा या ज्ञान। दान के पक्षधर थे वाजिश्रवा और ज्ञान के समर्थक थे याज्ञवल्क्य।

निर्णय हो नहीं पा रहा था। दोनों प्रजापति के पास पहुँचे। वे बहुत व्यस्त थे सो निर्णय कराने के लिए शेष जी के पास भेज दिया।

दोनों ने अपने-अपने पक्ष प्रस्तुत किये। शेष जी ने कहा मैं बहुत थक गया हूं। सिर पर रखा पृथ्वी का बोझ बहुत समय से लदा है। थोड़ी राहत पाऊँ तो विचारपूर्वक निर्णय करूं। आप में से कोई एक मेरे बोझ को एक घड़ी अपने सिर पर रख लें। इसी बीच निर्णय हो जायेगा।

वाजिश्रवा आगे आये। अपनी दानशीलता को दाँव पर लगाकर उनके धरती के बोझ को अपने सिर पर रखने का प्रयत्न किया। पर वे उसमें तनिक भी सफल न हुए।

याज्ञवल्क्य को आगे आना पड़ा। उनने अपने ज्ञान बल का प्रयोग किया और देखते-देखते भू-भार कन्धों पर उठा लिया।

निर्णय हो गया। शेष भगवान बोले- ज्ञान बड़ा है। उस अकेले के बलबूते भी अपना और असंख्यों का उद्धार हो सकता है जबकि दान अविवेक पूर्वक दिया जाने पर कुपात्रों के हाथ पहुँच सकता है और पुण्य के स्थान पर पाप बन सकता है।




देवताओं और मनुष्यों के मध्य आदान-प्रदान की कथा गाथा - Akhandjyoti January 1985

इतिहास की दो धाराओं में क्रमबद्धता परिलक्षित होती है। एक तो पिछले छः हजार वर्ष का इतिहास जिसे पुस्तकों, शिला-लेखों, ताम्र पत्रों के सहारे ढूंढ़ निकाला गया है ओर कोई अन्य विकल्प न होने के कारण उसे ही प्रामाणिक मानना पड़ता है।

दूसरी वह श्रृंखला है, जिसे प्राणी विकास की श्रृंखला कहा जा सकता है। छोटे अमीबा से विकसित होते-होते डायनासौर तक जा पहुँचना, फिर बुद्धिवादी प्रतिद्वन्द्विता में उनमें से भीमकायों का नष्ट होना, चतुरों द्वारा बाजी मारना, इसी परिप्रेक्ष्य में बानर का मनुष्य स्तर पर विकसित होना- यह श्रृंखला भी अब मान्यता प्राप्त कर चुकी है। उस हिसाब से वर्तमान मानव पुरखों की तुलना में सर्वाधिक बुद्धिमान बैठता है। ज्ञान और विज्ञान, दोनों ही पक्षों में उसने बाजी मारी है।

इन दो धाराओं के अतिरिक्त प्रमाणों की एक संदिग्ध धारा और बच रहती है, जिसमें अब की अपेक्षा कहीं अधिक बुद्धिमान समर्थ और सम्पन्न मानवों का पता चलता है। उनके छोड़े हुए प्रमाण अवशेष उनके अस्तित्व की सचाई सिद्ध करते हैं। इनकी गणना किस श्रृंखला में की जाय?

लौह युग, ताम्र युग तो आदिम मनुष्य की कहानी कहते हैं, पर ऐसे सुविकसितों को जो आज की तुलना में अधिक बुद्धिमान रहे हैं, किस वर्ग में गिना जाय? लगता है लम्बा हिमयुग मनुष्य जाति के एक बड़े वर्ग को अपने पेट में निगल गया। पृथ्वी पर जमी हुयी बर्फ की मोटी परतें जब पिघली होंगी तो समुद्र तल ऊँचा उठा होगा और उससे भौगोलिक उथल-पुथल खड़ी हुई होगी। तब पिछली सभ्यता के ध्वंसावशेष भी उसमें समा गये होंगे। समुद्र उलट-पुलट कर थल बना होगा। इस भयानक परिवर्तन ने उन विकसित सभ्यताओं को भी निगल लिया होगा। उसके यत्र-तत्र बिखरे हुए चिन्ह जहाँ कहीं मिल जाते हैं तो आज के मनुष्य को आश्चर्य में डालते हैं।

प्रमाणों द्वारा स्पष्ट है कि आज का आर्कटिक महासागर कभी एक सुविकसित द्वीप था। उस समुद्र में जहाँ-तहाँ जन शून्य टापुओं का पर्यवेक्षण करने से ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि इस क्षेत्र में कभी सुविकसित सभ्यता रही है। कभी एशिया और अमेरिका परस्पर जुड़े हुए थे। थल मार्ग से आवागमन था, पर हिमयुग में बहुत-सी भूमि डुबा दी और दोनों को पृथक कर दिया। इतने पर भी जहाँ-तहाँ विकसित सभ्यता के चिन्ह मिलते हैं। ऐसा नहीं है कि कोलम्बस ने पहली बार अमेरिका खोजा हो और वहाँ जंगली रेड-इण्डियन भर मिले हों।

इस दृष्टि से समस्त भूमण्डल का पर्यवेक्षण करते हैं तो एक क्षेत्र में नहीं लगभग समस्त भूमण्डल में विकसित सभ्यता के चिन्ह मिलते हैं। कई बार तो ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय के लोग अर्वाचीन बुद्धिमत्ता की तुलना में कहीं अधिक बढ़े-चढ़े थे। मिश्र के पिरामिडों का रहस्य अभी तक हाथ नहीं आ रहा है कि इतने बड़े पत्थरों का इतना मजबूत और इतना रहस्यमय भवन किस कला और किन साधनों के सहारे बन सके होंगे। मैक्सिको क्षेत्र में बिखरी हुई ‘मय’ सभ्यता के ध्वंसावशेष बताते हैं कि वहाँ की विकसित स्थिति असाधारण थी। इस्टर द्वीप की विशाल मानव आकृतियाँ अभी भी रहस्य हैं कि उन्हें किसने, किन साधनों से और क्यों विनिर्मित किया होगा। मैक्सिको की भू-रेखाएँ जो धरती से तो दिखायी नहीं पड़ती, पर रात्रि को चन्द्रमा की चाँदनी में आकाश भली प्रकार दिख पड़ता है, विदित होता है कि वे वायुयानों के आवागमन के प्रकाश चिन्हों के रूप में ही विनिर्मित किये गये हैं।

एरिक वान डेनिफेन लिखित ‘देवताओं के रथ’ नामक पुस्तक में अनेक प्रमाणों से यह सिद्ध किया गया है कि वर्तमान मनुष्यों से पूर्व एक देवताओं की विकसित बिरादरी हो चुकी है।

देवताओं का एक वर्ग था। दैत्य लंका में उनने अपना वंशानुक्रम तथा शौर्य विज्ञान सुरक्षित रखा था। मनुष्यों के साथ उनका वंश संपर्क कदाचित ही कहीं हुआ था। भीम पत्नी हिडिम्बा से महापराक्रमी घटोत्कच्छ जन्मा था। हनुमान पुत्र मकरध्वज की भी कथा है। कुन्ती ने देवताओं का विशेष अनुदान प्राप्त कर असाधारण पराक्रमी पाँच पाण्डव अपनी गोद में खिलाये थे।

साइबेरिया, सिन्धु घाटी, जावा, कम्बोदिया, रोम, यूनान, काला सागर, सहारा, जिब्राल्टर, एटलाण्टिक आदि क्षेत्रों का पुरातन शिल्प तथा उसके साथ बोलती हुई उस समय की सम्पन्नता तथा सभ्यता का जो पता चलता है, वह आश्चर्यचकित कर देने वाला है। कई बार तो उसे आज की विकसित सभ्यता से भी बढ़ी-चढ़ी मानना पड़ता है। सम्भवतः वह वैदिक युग रहा हो और ऋषि स्तर के लोगों को देव कहा है। अर्थात् सूक्ष्म देवताओं और स्थूल ऋषियों के बीच कोई घनिष्ठ सम्बन्ध रहा हो।

यह वास्तु शिल्प की चर्चा हुयी। इसके अतिरिक्त असंख्यों अन्य धाराएँ हैं। तब 24 दिन का कलैंडर था और दो महीनों को बढ़ाकर वर्ष को सही किया गया था। धातु शोधन में कुटुम्ब मीनार की लाट के बारे में अभी तक पता नहीं लगाया जा सका कि इतनी शुद्ध धातु शोधन की प्रणाली क्या थी?

इतिहास की इस टूटी हुई कड़ी के बारे में यह अनुमान लगाया जाता है कि कोई देव युग रहा है, जिसके बचे लोगों ने पिछड़े लोगों को खोयी हुयी सभ्यता की श्रृंखला जोड़ने में मदद की होगी। कल्पना कीजिए कि परमाणु युद्ध हो और उसमें सभ्य इत्यादि सभी मटियामेट हो जाय। कोई सघन वनों में रहने वाला आदिवासी मड़ुवे आदि बचे रहें। वे उनकी पीढ़ियाँ ध्वंसावशेष को देखकर आश्चर्यचकित रह जाय, कि इतने विचित्र महान और विज्ञान के ऐसे परिवार कितने, किस प्रकार, क्यों? बनाये होंगे? आज की पीढ़ी का कोई जानकार बचा रहे और उन आदिम लोगों को ज्ञान-विज्ञान के कुछ पाठ पढ़ाये, तो यही समझा जायेगा कि कोई देवता रहस्यमय अनुदान बाँट रहे हैं।

पुरातन काल में हिमयुग, खाद्य अभाव, महामारी, भौगोलिक उलट-पुलट आदि कारणों से बचे हुए लोग नितान्त जंगली रह गये होंगे। उन्हें बचे-खुचे सभ्य जन ने जो पाठ पढ़ाये होंगे, जो चमत्कार दिखाये होंगे, उस आधार पर सहज ही किसी अन्य लोक के निवासी या दिव्य शक्तियों-विभूतियों से सम्पन्न मान लिया गया होगा और उनका समुचित मान-सम्मान किया गया होगा।

किसी अन्य लोक से देवताओं के आने के सम्बन्ध में किसी निर्णय पर पहुँचना कठिन है, क्योंकि वर्तमान खोजों ने सौर मण्डल की स्थिति को जान लिया है और पता लगा लिया है कि इनकी स्थिति इस योग्य नहीं है कि मनुष्य शरीर जैसे प्राणियों का उन पर निर्वाह हो सके। सौर मण्डल से बाहर कोई बुद्धिमान प्राणी हो सकता है अथवा सौर मण्डल के भीतर सूक्ष्म शरीर धारण करके किसी भी परिस्थिति में उनमें रहा जा सकता है, पर वे होंगे अदृश्य ही। अदृश्य देवता दृश्य शरीर वाले मनुष्य को प्रशिक्षण एवं अनुदान प्रस्तुत करें यह भी रहस्यमय प्रसंग है।

देवताओं की एक पीढ़ी को स्थान दिये बिना इतिहास की दोनों ही धाराएँ अपूर्ण रह जाती हैं। संसार में जो विलक्षण ध्वंसावशेष अथवा ज्ञान प्रवाह परिलक्षित होते हैं, वे छः हजार वर्ष के लिखित इतिहास के साथ तालमेल नहीं बैठने देते और आदिम कालीन बन्दर से विकसित होकर बना हुआ मनुष्य भी प्रगति की उतनी लम्बी छलाँग नहीं भर सकता, जो आज की प्रगतिशीलता से भी बढ़कर अपने कृतित्व को सिद्ध कर सके।

ऐसी दशा में देवताओं के एक वर्ग की मान्यता आवश्यक हो जाती है। वे लुप्त महासभ्यता का प्रतिनिधित्व करते होंगे और सामान्य मनुष्य के साथ स्वेच्छापूर्वक सम्बन्ध जोड़कर उन्हें भी सुविकसित बनाने का प्रयत्न करते होंगे। हो सकता है कि पिछड़े लोगों के साथ देवताओं ने आनुवाँशिक सम्बन्ध बनाये हों और उनसे ऋषि, दिव्य मानव, विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, उत्पन्न किये हों।

इस प्रकार देवताओं का पूरा न सही अधूरा ज्ञान आधुनिक लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उपलब्ध हुआ है और उसने इतिहास के एक शून्य को भरने में सहायता की है।




मानवी और दैवी वाणियाँ - Akhandjyoti January 1985

मुख मार्ग से निकलने वाले शब्दों को वाणी कहते हैं। विचारों का आदान-प्रदान इसी के माध्यम से होता है। एक-दूसरे के सामने अपनी अभिव्यक्तियों का प्रकटीकरण इसी माध्यम से करते हैं। ज्ञान का प्रमुख स्त्रोत इसी को बताया गया है। यों संकेतों के सहारे भी थोड़ा बहुत काम चल जाता है। इस प्रकार साहित्य स्वाध्याय से ज्ञान का संकल्प नेत्र माध्यम से भी संभव है। पर प्रथम आधार वाणी ही है। उसके द्वारा लिपि भाषा, शब्द व्याकरण आदि का प्रथम ज्ञान वाणी से ही करना पड़ता है।

कहने-सुनने के पीछे प्रयोजन भी होते हैं। कई बार विनोद, व्यंग, उपहास के लिए निरर्थक भी बहुत कुछ बोला जाता है। जिह्वा का उपयोग निरन्तर करते रहने पर भी उसकी समग्र शक्ति में कोई-कोई ही परिचित होते हैं। जो परिचित होते हैं वे उसका बहुमूल्य रत्न जैसा उपयोग करते हैं। जो अपरिचित होते हैं वे इस भांडागार को ऐसे ही निरर्थक लुटाते गँवाते रहते हैं।

बोलना सरल है। वार्तालाप द्रुतगति से होता रहता है। उसमें कुछ लगता नहीं दीखता। पर सच तो यह है कि उस माध्यम से सामर्थ्य का बहुमूल्य श्रोत खाली होता रहता है। यों हाथ-पैर चलने में थकान आती है, पर जीभ चलने में वैसा भी कुछ लगता नहीं दीखता।

वाणी का एक प्रयोग उथल भर है, जो कंठ, होठ, तालु, दन्त के सहयोग से शब्दों की, भाषणों की झड़ी लगाता रहता है पर इसके पीछे जो कुछ है, वह जानने ही योग्य है।

वाणी के दो विभाग हैं। एक वह जिसे जिह्वा की सहायता से मनुष्य बोलता रहता है, दूसरा वह है जिसके माध्यम से देवता बोलते हैं।

श्रुति वचन है-

अपक्रायन् पौरुषेदनाद् वृणानौद्वप वचः।

एक से मनुष्य बोलते रहते हैं और अपना मन हलका करते रहते हैं। दूसरी वाणी देवताओं की है जिसके माध्यम से दिव्य अनुदान लिये और दिये जाते हैं।

इस महाशक्ति को आगे चलकर चार भागों में विभक्त कहा गया है-

चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्णह्मणा ये मनीषणः। गुहात्रीणि निहिता नैंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या बदानीः।

मनीषी जानते हैं कि वाणी के चार विभेद हैं। इनमें से तीन रहस्यमय गुफा में छिपे हैं और एक को मनुष्य वार्तालाप में बोलते रहे हैं।

बैखरी वार्तालाप में बोली जाती है। यह मनुष्यों की है। देवताओं की तीन वाणियाँ हैं जो रहस्यमय गुफा में छिपी रहती हैं। यह तीन हैं मध्यमा, परा और पश्यन्ति। यह बोली नहीं जाती किन्तु देवताओं द्वारा बोली और प्रकट की जाती हैं। इनमें शब्दोच्चार तो नहीं होता किन्तु शक्तियों का भाण्डागार छिपा रहता है। जो उन्हें ग्रहण करते हैं वे धन्य हो जाते हैं।

इन तीन चार वाणियों से चार वेद बने हैं। इस ब्रह्मांड की संचालन व्यवस्था में चार ऋषि काम करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में उनके नाम वसु, रुद्र, आदित्य और इन्द्र कहे जाते हैं। रहस्य यही तीन वाणियों का मार्ग जानना हो तो उसकी व्याख्या चारों वेदों की ऋचाओं में और देवताओं के साथ जुड़ी हुई विभूतियों में खोजनी चाहिए। जो देव वाणी का मर्म समझता है विभूतियाँ उसके सम्मुख अपने नग्न रूप में प्रकट कर देती हैं।

मध्यमा मुखाकृति, भाव भंगिमा, चेष्टा एवं मुद्रा के साथ प्रकट होती है। उसमें मनोभावों का पुट रहता है। मन निग्रहित या विकृत जिस भी स्तर का होगा उसी स्तर की तरंगें निस्सृत होंगी। सम्बद्ध मनुष्य उसमें प्रभावित होते हैं। बैखरी वाणी से चाहे कुछ भी क्यों न कहा जाता रहें पर एक मन दूसरे के मन को पढ़ लेता है। मौन बैठे रहने पर भी सामने वाले व्यक्ति के लिये जो भी सोचा गया है वह भाव तरंगें अनायास ही उठती और दूसरे को प्रभावित करती रहेंगी।

परावाणी प्राण से निकलती है और समीपवर्ती सारे वातावरण में गूंजती है। गुम्बज की आवाज जिस प्रकार गूंजने लगती है उसी प्रकार एक का प्राण दूसरे प्राणों में स्पन्दन उत्पन्न करता है। ऋषियों के आश्रम में गाय, सिंह एक घाट पर पानी पीते थे। जितने दायरे में यह प्राण गुंजन रहता है उतने में प्राणियों के बीच अहिंसा वृत्ति और प्रेम भाव बना रहता है। दुष्ट प्राण भी यदि जागृत कर रखा है तो दुर्व्यसनी, व्यभिचारी लोग अपने समीपवर्ती लोगों को बिना कुछ कहे-सुने ही उस प्रकार की वृत्ति का संचार करते हैं। सन्त सज्जन भले ही वाणी से प्रवचन न करें, पर उनकी अन्तरात्मा अपनी भावनाओं, मान्यताओं, आकाँक्षाओं को क्षेत्रवर्ती लोगों के अन्त करण तक पहुँचा देती हैं। कितने ही प्राणवान व्यक्ति मौन रहते हैं। उपदेश आदि नहीं करते पर उनके शरीर की विद्युत शक्ति दूसरों तक अपनी विद्युत तरंगों को फैला देती है। इनका स्पर्श करने मात्र से लोग प्रभाव ग्रहण करते हैं। बिना स्पर्श किये भी वातावरण में ऐसी ऊर्जा का संचार होता है यह देव वाणी है जो एक से अनेकों तक पहुँचती है। अपने समान विचार और स्वभाव वाली परतों पर यह प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है। प्रचार माध्यमों में तो कोई आदमी सीमित क्षेत्र में ही अपनी समझाने, बुझाने की समर्थ, तर्क प्रमाण के आधार पर ही प्रभाव छोड़ सकता है। पर परावाणी के माध्यम से असंख्य लोगों को बिना कुछ कहे-सुने ही सुधार सकता है।

पश्यन्ति वाणी आत्मा से निस्सृत होती है और आत्माओं को अपने ढांचे में ढालती चली जाती है। असुरों ने किसी जमाने में पश्यन्ति वाणी के प्रभाव से समूचे लंका जैसे प्रदेश के सभी निवासियों को असुर स्वभाव में ढाल दिया था। इसलिए कोई विद्यालय उन्हें नहीं बनाना पड़ा था। पश्यन्ति वाणी से सम्पन्न तपस्वी समय को बदलने में असाधारण सफलता प्राप्त करते हैं। अरविन्द, महर्षि रमण जैसे योगियों ने सत्याग्रह आंदोलन के समय उस स्तर की अनेकों उच्चस्तरीय आत्माएं विनिर्मित कर दी थीं। रामराज्य की स्थापना के समय ऋषियों का असाधारण योगदान रहा था। लंकादमन में राम रावण युद्ध की भूमिका काम दे गई थी, किन्तु जब समूची प्रजा का धर्मात्मा बनाने का प्रसंग आया तो उस प्रयोजनों के लिए ऋषियों ने पश्यन्तिवाणी के विस्तार का महाअनुष्ठान सम्पन्न किया था। अश्वमेध यज्ञ जैसे प्रयोजनों से वह कार्य सम्पन्न हुआ।

शेष तीन वाणियाँ, मन, प्राण और आत्मा से निस्तृत होती हैं। उन्हीं गुफाओं में वे छिपी रहती हैं। इसलिए उन्हें सशक्त बनाने के लिए उनके स्थानों को योगाभ्यास एवं तपश्चर्या के माध्यम से प्रखर बनाना पड़ता है। ऐसे साधकों को बैखरी वाणी स्तर विशेष रूप से संयम करना पड़ता है। अन्यथा इस मार्ग में शक्तियों का क्षरण होने लगने से शेष तीन देववाणियों का संशोधन और अभिवर्धन जैसा चाहिए वैसा नहीं हो पाता।

शाप और वरदान से सम्बन्धित अनेकों विभूतियाँ जब चमत्कारी प्रतिफल प्रस्तुत कर रही हों तो समझना चाहिए कि यह परा और पश्यन्ति की साधना का सत्परिणाम है। यह वाणियाँ मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार शुद्ध होने से ही निखरती हैं। व्यक्तित्व जितना मजा हुआ होगा। साधना द्वारा कषाय-कल्मषों का जितना अधिक निराकरण हो चुका होगा, उतनी ही यह वाणियाँ तेजस्वी होती चली जाएंगी।

जब आयुष्य मौन हो जाता है तब देवता बोलते हैं। देवता ऋचाओं की भाषा में बोलते हैं। उसके उच्चारण को मन्त्र कहते हैं। मन्त्र सिद्धि के लिए जो साधना की जाती है उसे तीन देववाणियों को प्रखर करने की साधना ही समझना चाहिए।




शांतिकुंज में “समग्र स्वास्थ्य सम्वर्धन” सत्रों का अभिनव शुभारम्भ - Akhandjyoti January 1985

विगत कई वर्षों से शान्तिकुंज में एक महीने वाले युग शिल्पी सत्र और दस दिन तथा एक माह वाले कल्प साधना सत्र चलते रहे हैं। उनमें सम्मिलित होने का परिजनों का उत्साह असाधारण रहा और उन्हें जो सफलता मिली वह भी देखने ही योग्य रही। इतने कम समय में, इतने सरल साधन से इतना अधिक प्रतिफल उत्पन्न हो सकता है इसकी कल्पना भी नहीं की गई थी। पर गम्भीरता पूर्वक किसी काम को हाथ में लिया जाना और तत्परता पूर्वक उसे सम्पन्न किया जाना यह बताता है कि सामान्य साधनों से, सामान्य परिस्थितियों में भी उच्चस्तरीय सफलता प्राप्त की जा सकती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण दोनों सत्रों की कुछेक वर्षों की सफलता को देखते हुए आँका जा सकता है।

युग शिल्पी- युग गायक, युग चेतना के आलोक वितरण कर्ता इतनी संख्या में हो गये हैं कि उनने 2400 शक्ति पीठों और उस हजार स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थानों की आलोक वितरण प्रक्रिया बड़े शानदार ढंग से चलने लगी है। देश की हर संस्था के पास सुयोग्य प्रचारकों की कमी है। वे इधर-उधर से माँग-जाँचकर अपना काम चलाते हैं। किन्तु प्रज्ञा परिवार के पास इस प्रयोजन की पूर्ति करने वाले युग शिल्पी इतनी संख्या में हैं कि न केवल अपनी आवश्यकता पूरी करते हैं वरन् अपने संगठन से बाहर के लोगों की माँग को भी पूरा करते रहते हैं। उनकी क्षमता और कुशलता सर्वत्र सराही गई है।

एक महीने में गायन, वादन, प्रवचन, संगठन, व्यवस्था, चिकित्सा, कुरीति उन्मूलन, सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन जैसे कार्यों को भली प्रकार समझ लेना और समझा दिया जाना एक आश्चर्य है। अब तक इस देश में ऐसा सफल प्रयास कदाचित् ही कहीं किया गया हो। शान्तिकुँज के शानदार कार्यों में युग शिल्पी सत्रों की श्रृंखला चार चाँद लगाती रही है। अस्तु वे अभी भी इतने ही उत्साह से चल रहे हैं। शिक्षार्थियों की संख्या पिछले सत्र की तुलना में अगले में बढ़ती ही जाती है।

एक माह एवं दस दिन वाले कल्प साधना सत्रों में सम्मिलित होकर जो लौटे हैं उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति में असाधारण अन्तर हुआ है। काया-कल्प शब्द में कुछ जादुई गन्ध आती थी और भ्रम होता था कि जब कुछ दिनों बाद लौटेंगे तो च्यवन ऋषि की तरह बूढ़े से जवान हो जायेंगे। अब उस भ्रामक शब्द को हटा देना उचित समझा गया है ताकि वस्तुस्थिति को समझने में सुगमता हो।

अब नए दस दिन के सत्रों को “समग्र स्वास्थ्य सम्वर्धन सत्र” नाम दिया गया है। बाकी नियमोपनियम पूर्ववत् रहेंगे उनमें यत्किंचित् ही अन्तर किया गया है। प्रज्ञा परिजनों को अगले दिनों नव-निर्माण की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य करने हैं। यह तभी संभव है जब वे शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिकता दृष्टि में स्वयं समर्थ हैं। आधि-व्याधियाँ उन्हें हैरान न करती हों। शरीर में रुग्णता, मन में उद्विग्नता और अन्तःकरण में निकृष्टता भरे रहने पर आदमी इतना दुर्बल हो जाता है कि और किसी की सेवा सहायता कर सकना तो दूर अपने निज की गाड़ी भी ठीक तरह खींच नहीं सकता। अस्तु प्रज्ञा परिजनों में से हर एक का व्यक्तित्व निखारने के लिए अब दस दिवसीय सूत्रों को और भी अधिक साधन सम्पन्न बना दिया गया है।

शारीरिक रोग है या होने की आशंका है। मानसिक उद्विग्नता छाई रहती है या निकट भविष्य में उसके उभरने जैसे लक्षण प्रतीत होते हैं। आध्यात्मिक जीवन में दुष्प्रवृत्तियाँ भर चली हैं या उनके पनपने के बीजांकुर फूटने लगे हैं। इसकी जाँच पड़ताल का ऐसा तन्त्र खड़ा किया गया है जिससे वस्तुस्थिति को समझने के उपरान्त निदान स्पष्ट हो जाने के पश्चात् उपचार का सही निर्धारण किया जा सके। जो अवाँछनीयता उभर रही है उसे समय रहते निरस्त किया जा सके। निदान के अभाव में वस्तुस्थिति समझी नहीं जा सकती और उस दशा में उपचार भी फलदायक नहीं होता।

शान्तिकुँज ब्रह्मवर्चस के दोनों आश्रमों में उपरोक्त प्रयोजन के लिए अभी-अभी परीक्षण प्रयोजन के जिए दुर्लभ एवं बहुमूल्य मशीनें और मँगाई गई हैं। इस दिशा में विज्ञान ने जो प्रगतिशील आविष्कार किये हैं और नवीनतम यन्त्र उपकरण बनाये हैं उन्हें मँगाने का प्रबन्ध, पूर्व में मँगाए गए उपकरणों के अतिरिक्त इसी महीने किया गया है। शरीर, मन और अन्तःकरण को अनेक दृष्टियों से परखने के लिए तीनों ही प्रयोजनों के उपयुक्त देश विदेश से उन्हें जुटाया गया है। पैथोलॉजी एवं अन्याय रोग निदान हेतु सामान्य डाक्टर हृदय, फेफड़े, मूत्राशय, गुर्दे, मस्तिष्क आदि अवयवों की अनेक प्रकार से जाँच पड़ताल करने की फीस सहज ही सौ दो सौ रुपया वसूल कर लेते हैं। प्रज्ञा परिजनों को यह खर्च न करना पड़े और उच्चस्तरीय डाक्टरों द्वारा आवश्यक समझी जाने वाली जाँच-पड़ताल निःशुल्क हो जाय ऐसी सुविधा अन्यत्र किसी संस्था में कदाचित् ही देखी जा सके। नयी वैज्ञानिक मान्यताओं ने यह बताया है कि मानसिक ही नहीं शारीरिक रोगों की जड़ें भी मस्तिष्क की अचेतन परतों में छिपी रहती हैं। इसलिए जब तक उस गहराई में प्रवेश करके उपचार न किया जाय तब तक शारीरिक रोग मात्र समझकर उसकी दवा दारु चलती रहे तो उसका कोई स्थाई प्रभाव नहीं पड़ता। एक रोग हलका नहीं होने पाता कि नया रोग उठ खड़ा होता है। स्थायी आरोग्य के लिए शरीर चिकित्सा के साथ मानसोपचार भी अब एक प्रकार से अनिवार्य हो गया है। इस संदर्भ में जाँच पड़ताल के जिन यन्त्र उपकरणों की आवश्यकता है उन्हें शान्तिकुँज ब्रह्मवर्चस् की दोनों ही उपचार आश्रमों में अत्यधिक महंगे एवं अनुपलब्ध होते हुए भी मँगाया सँजोया गया है।

आत्मिक क्षेत्र की दुष्प्रवृत्तियाँ अन्तःकरण की अत्यधिक गहराई तक छिपी होती हैं। इसका भी प्रामाणिक परीक्षण करने हेतु देश में पहली बार अपनी संस्था द्वारा व्यक्ति का आभा मण्डल मापने तथा अंक विज्ञान (न्यूमरोलॉजी) की विज्ञान सम्मत विधा के माध्यम से निदान करने की व्यवस्था की गयी है। काय विद्युत की धारा इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना में बहती है। इसकी स्थिति के अनुसार बदलते तेजोवलय एवं जन्मजात एवं तदुपरान्त से मूल्यांकन कर साधना उपचार के निर्धारण की व्यवस्था की गयी है।

शारीरिक व्यथाओं का उपचार आहार, व्यायाम तथा दिव्य वनौषधियों द्वारा। मानसिक उपचार प्राणायाम और ध्यान धारणा द्वारा यथा यज्ञोपचार द्वारा किया जाता है। आध्यात्मिक क्षेत्र की खामियों को सुधारने के जिए गायत्री मन्त्र का संक्षिप्त अनुष्ठान तो आवश्यक ही है। इसके अतिरिक्त बन्ध, मुद्राएँ, जैसी साधनाएँ इसी बीच करते रहने का निर्धारण किया जाता है। इस प्रकार शरीर, मस्तिष्क और अन्तःकरण के तीनों ही क्षेत्रों पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ने वाली समग्र चिकित्सा पद्धति का क्रम साथ-साथ चलता रहता है। अधिकाँश रोग आपस में गुँथे होते हैं और उनकी जड़ें न केवल शरीर में वरन् मन और अन्तःकरण में भी जमी होती हैं, स्थूल शरीर-सूक्ष्म शरीर-कारण शरीर में से एक भी रुग्ण होता है तो शेष दो अन्य शरीरों को भी आधि-व्याधियों से ग्रसित होने की स्थिति बना देता है। इसलिए समग्र चिकित्सा वही है जो तीनों की ही सफाई करे और गुँथे हुए जाले की जड़ें उखाड़ दे।

कई बार रोग प्रत्यक्ष प्रकट तो नहीं होते, पर उनकी कुसुमुसाहट भीतर ही भीतर उभरती रहती है और व्यक्ति स्वयं अनुभव करता है कि कोई, छिपा हुआ विकार भीतर ही भीतर काम कर रहा है। पाचन ठीक से न होना, शिर भारी रहना, नींद कम आना, उदासी छाई रहना जैसी विकृतियां यों प्रत्यक्षतः किसी विशेष रोग में नहीं गिनी जा सकती। पर उनके सहारे यह जाना जा सकता है कि निकट भविष्य में कोई संकट खड़ा होने वाला है। रोग प्रकट होने से पूर्व ही उसका उपचार हो जाना समय भी कम लेता है और देर तक कष्ट सहन करने की स्थिति भी नहीं आने देता।

दस दिवसीय समग्र उपचार सत्रों में स्थल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के त्रिविधि परीक्षण के सर्वांगीण निदान की व्यवस्था है और तद्नुरूप चिकित्सा का प्रबन्ध भी हर साधक के लिए अलग-अलग चिकित्सा क्रम बताया जाता है। हरिद्वार में दस दिन क्या करना है और यहाँ से चले जाने के उपरान्त भविष्य में अपना आहार, रहन-सहन किस प्रकार रखना है यह विधि व्यवस्था हर शिक्षार्थी को भली प्रकार समझा दी जाती है। ताकि यदि उपचार आगे भी चलना है तो उसे घर जाकर यथावत् या थोड़े हेर-फेर के साथ जारी रखा जा सके।

आमतौर से चिकित्सक निदान करने और उपचार बताने के साथ अपने कर्त्तव्य की छुट्टी पा लेते हैं। जबकि रोगी को उसकी स्थिति तथा उसमें परिवर्तन की विद्या भी समझाई जानी चाहिए। किसी चिकित्सक के पास इतना समय नहीं होता। जो समय वे खर्च करते हैं उसके बदले हाथों-हाथ पैसा भुनाना चाहते हैं। वे क्यों रोगी को सामयिक विपत्ति से छूटने और भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न होने देने के झंझट में पड़ेंगे। किन्तु शान्ति-कुँज अस्पताल नहीं है और न चिकित्सक ही पैसे के लिए काम करते हैं। अपना उद्देश्य ही प्रज्ञा परिजनों को इतना समर्थ बनाना है जो नव-निर्माण की बेला में असंख्यों में प्राण फूँक सकें। ऐसी दशा में पैसे को माध्यम बनाकर योजना बननी न तो उचित थी न बनाई गई है। जितना चिकित्सा का महत्व है उससे अधिक उस जानकारी की महिमा है जिसके आधार पर न केवल शरीर निरोग रहे वरन् मन भी शान्त, सन्तुलित और अन्तःकरण पवित्रता और प्रखरता अपनाने लगे। इसलिए हर साधक के लिए एक घण्टा परामर्श प्रवचन का रखा गया है।

शान्तिकुँज की उपरोक्त उपचार प्रक्रिया ऋषि परम्परा के अनुरूप है। ऋषि आश्रमों में शिक्षा और चिकित्सा की दोनों ही व्यवस्थाएँ रहती थीं। वस्तुतः यह कार्य व्यवसाई वेतन भोगियों के हैं नहीं। इन कार्यों में ऋषियों को ही हाथ डालना चाहिए। शांतिकुंज में शारीरिक और मानसिक चिकित्सा करने हेतु सक्षम एम॰ डी॰, एम॰ एस॰ एवं आयुर्वेद की स्नातकोत्तर उपाधि पाए उच्चस्तरीय डाक्टर हैं जो अपने ऊँचे पदों पर से विशुद्धतः सेवा भावना के लिए इस्तीफा देकर आये हैं।

आध्यात्मिक चिकित्सा में अन्तःकरण में जमी हुई दुष्प्रवृत्तियों के लिए साधना प्रायश्चित्त एवं तप साधन का विधान चलता है और इस योगाभ्यास के साथ ही स्वाध्याय सत्संग का समावेश रहता है। हिमालय का तट गंगा का किनारा, सप्त ऋषियों की भूमि, गंगाजल पान अपनी स्थिति विशेष के लिए सर्वतोमुखी प्रगति के लिए परामर्श, प्राण शक्ति से भरा-पूरा वातावरण, इतनी सारी सुविधायें अन्यत्र कदाचित् ही मिल सकें। जो काय चिकित्सा करते हैं उन्हें मानसोपचार का ज्ञान नहीं। जो मन का शोधन जानते हैं उनमें चेतना के अन्तःकरण केन्द्र को समझाने या सुधारने की क्षमता नहीं है। यह त्रिविधि संयोग गंगा, यमुना, सरस्वती के संगम की तरह मात्र शान्तिकुँज में ही उपलब्ध है। यह कारण है कि जो शिविर में आकर स्वास्थ्य सुधारने के निमित्त आते हैं। वे उससे कहीं अधिक बहुमूल्य विद्या जीवन सुधार को लेकर जाते हैं।

हर मनुष्य का जीवन दो बातों पर निर्भर है। एक यह है कि भूतकाल की भूलों के कारण वर्तमान का स्वरूप जो अस्त-व्यस्त हो रहा है उसे सँभालना। इसके अतिरिक्त वर्तमान के साथ ऐसे सुधारे कार्यक्रम का समावेश करना, जिसमें भविष्य उज्ज्वल बन सके। अतएव यहाँ की कार्य पद्धति में रुग्णता की आधि-व्याधियों से मुक्त करना उद्देश्य है उसमें भी अधिक ध्यान इस बात पर दिया जाता है कि आगन्तुक ऐसा प्रकाश और मार्गदर्शन लेकर जाय जिससे वे न केवल स्वयं कृत-कृत्य हो सकें- वरन् अपने परिवार को- संपर्क क्षेत्र को भी ऊँचे उठाने- आगे बढ़ने में कुछ कहने लायक भूमिका निभा सकें।

दस दिन के अब तक चले रहे शिविरों में सम्मिलित होने वालों को भी इसका सन्तोष रहा है पर अब उसमें अनेक अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकने वाले अनेकानेक विशेषताओं का समावेश किया गया है। उनके माध्यम से नये आगन्तुकों को कहीं अधिक लाभ मिल सकेगा ऐसी आशा विश्वासपूर्वक की जा सकती है।

कैंसर, क्षय, सुजाक, अतिसार, गठिया, खांसी, दमा तथा दाद कोढ़ जैसे साथियों को असुविधा पहुँचाने वाले छूत के रोगों की चिकित्सा व्यवस्था यहाँ नहीं रखी गई है। इन रोगों के रोगियों को नहीं आना चाहिए। वस्तुतः यह एक सेनेटोरियम स्तर की व्यवस्था है जिसे समग्र स्वास्थ्य सुधार का उपक्रम कह सकते हैं। गम्भीर, भयंकर असाध्य या छूत के रोगों लिए के लिए जैसी सुविधा होनी चाहिए वैसी यहाँ की नहीं गयी है, न की जाएगी इसलिए उन्हें आने से रोका गया है।

हर सत्र हर महीने ता॰ 1 से 10 तक, 11 से 20 तक, 21 से 30 तक चलेगा। आगन्तुकों को एक दिन पूर्व आ जाना चाहिये। जिन्हें आना हो स्वीकृति प्राप्त करने के उपरान्त ही आना चाहिए। इसके लिए जो आवेदन पत्र भेजा उसमें निम्न जानकारियाँ विस्तार पूर्वक लिखी जांय- (1) पूरा नाम (2) पूरा पता (3) आयु (4) शिक्षा (5) व्यवसाय (6) जन्म-जाति (7) मिशन की पत्रिकाओं के नियमित सदस्य कब से हैं। (8) यहाँ आकर कठोर अनुशासन पालन करने का आश्वासन। ये आवेदन पत्र शान्तिकुँज से मंगाये जा सकते हैं।

बिना स्वीकृति के अन्य साथियों को तीर्थयात्रा के उद्देश्य से भी किसी को भी नहीं लाना चाहिए। यहाँ के सत्रों में इतनी व्यस्तता रहती है कि पर्यटन के उद्देश्य से आने वाले खीजते हैं और व्यर्थ का झंझट बढ़ता है। बिना पढ़ी स्त्रियाँ, जराजीर्ण वृद्धों तथा छोटे बच्चे न तो स्वीकृति माँगें और न साथ चल पड़े।

अपने आवश्यक कपड़े बिस्तर साथ लेकर चलना चाहिए। जेवर आदि ऐसी वस्तुएँ लेकर न चलें जिनकी सुरक्षा का अतिरिक्त प्रबन्ध करना पड़े। सत्र के बीच में ही एक या दो दिन की पर्यटन की छूट दी जाती है। इसके अतिरिक्त सत्र काल में पूरा समय व्यस्त कार्यक्रम में लगाना होता है।

भोजन के लिए आश्रम की केन्टीन में व्यवस्था है। रोटी, दाल, चावल, शाक दोनों समय का भोजन 4) रु. प्रतिदिन है। प्रज्ञापेय का भी 50 पैसा प्रति कप के हिसाब से व्यवस्था है। जिन्हें इन शिविरों से लाभ उठाना है, अगले दिनों महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है, वे समय रहते अपने आवेदन पत्र मंगा कर भरकर भेज दें ताकि उन्हें स्वीकृति समय रहते भेजी जा सके।




चन्द्रमा की दो सन्तानें (kahani) - Akhandjyoti January 1985

चन्द्रमा की दो सन्तानें थीं- एक पुत्र और दूसरी पुत्री। पुत्र का नाम पवन और पुत्री का नाम आँधी। पुत्री को एक दिन ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरे पिताजी साँसारिक पिताओं की तरह पुत्र और पुत्री में भेद करते हैं। चन्द्रमा आँधी की व्यथा को ताड़ गये। उन्होंने पुत्री को आत्म-निरीक्षण का एक अवसर देने का निश्चय किया।

चन्द्रमा ने आँधी और पवन दोनों को अपने पास बुलाकर कहा- ‘बच्चों! क्या तुमने स्वर्गलोक में इन्द्र के कानन में पारिजात नामक देव वृक्ष को देखा है?

‘हाँ!’ दोनों ने एक स्वर से उत्तर दिया।

‘तो तुम पारिजात की सात परिक्रमा करके आओ।’

पिता की आज्ञा शिरोधार्य कर दोनों चल दिये, पारिजात देव वृक्ष की ओर। आँधी सिर पर पैर रखकर दौड़ी। वह धूल, पत्ते और तमाम कूड़ा-करकट उड़ाती हुई बात की बात में परिक्रमा करके आ खड़ी हुई। आँधी समझ रही थी पिता का काम कर मैं जल्दी लौटी हूँ तो जरूर पिताजी मेरी पीठ ठोकेंगे।

थोड़ी देर बाद पवन लौटा, पर उसके आगमन पर सोंधी सुगन्ध से सारा भवन महक उठा। चन्द्रमा ने कहा- ‘बेटी! अब तुम अच्छी तरह समझ गई होगी कि जो अत्यधिक तेज गति से दौड़ता है वह खाली झोली लेकर आता है और जिसकी गति स्वाभाविक होती है वह मन को मुग्ध करने वाली सुगन्ध लाता है, जिससे सम्पूर्ण वातावरण सुगन्धित हो जाता है।’




देने वाला कभी घाटे में नहीं रहता - Akhandjyoti January 1985

जो रोकता है, सो सड़ता है, जो देता है, सो पाता है। छोटे पोखर का पानी सूखता है, घटता है और सड़ता है, किन्तु झरने में सदा गतिशीलता के साथ-साथ स्वच्छता भी बनी रहती है। न वह सूखता है, न सड़ता है। उसका स्त्रोत कभी समाप्त होता ही नहीं। गतिशीलता का नियम तोड़ेगा, संचय करेगा, उसे थोड़ा ही मिलेगा। अक्षय अनुदान पाने की पात्रता से उसे वंचित ही रहना पड़ेगा।

धरती अपना जीवन तत्व निरन्तर वनस्पतियों को देती रहती है। अनादि काल से यह क्रम चल रहा है। सभी प्राणी अपना अहार धरती से प्राप्त करते हैं। इतने पर भी उसका भण्डार कभी रीता नहीं हुआ। वनस्पति के सूखे पत्ते और प्राणियों का मल-गोबर उसकी उर्वरता को घटने नहीं देते। प्रकृति उसके दान के बदले अनुदानों का विपुल वैभव उसे निरन्तर लौटाती रहती है। सबका पेट भरने वाली धरती ने अपना पेट खाली होने की शिकायत कभी की नहीं है।

वृक्ष वनस्पतियाँ अपनी हरितमा और जीवनी शक्ति प्राणियों को निरन्तर प्रदान करती हैं। लगता है इनका कोश अब नहीं तो तब खाली होकर रहेगा। पर जड़े हैं,जो धरती की गहराई में घुस जाती हैं और उस वनस्पति सम्पदा को यथावत जीवन्त बनाये रहती हैं।

समुद्र बादलों को देता है। बादलों की माँग कभी पूरी नहीं होती। लगता है बादल समुद्र को खाली करके रहेगा, किन्तु सृष्टि के आदि से लेकर अब तक चली आ रही इस याचना को इन्कारी का उत्तर नहीं सुनना पड़ा है। नदियों में समुद्र के घर पहुँच-पहुँच कर उसका भण्डार भरते रहने की कसम खायी और पूरी तरह निभायी है। समुद्र अब तक घटा नहीं, बादलों को उसने जो दिया है, नदियों ने उस क्षति को पूरी तरह पूर्ण कर दिया है।

फिर नदियाँ घाटे में रहती होंगी? बादल नदियों के ऊपर इतने नहीं बरसते, जिससे वे समुद्र के द्वारा बादलों को दिया अनुदान पूरा कर सकें। इस कमी को हिमालय पर जमने वाली बर्फ पूरा करती है और किसी शानदार नदी को घाटे में नहीं रहने देती। बर्फ पिघलती रहती है और नदियों का पेट पूरी तरह भरती रहती है। फिर पिघलता हुआ हिमालय ठूँठ हो जाता होगा? वह भी नहीं होता। आसमान के खजाने में इतनी बर्फ भरी पड़ी है कि नदियों को दिये गये उसके अनुदान को पूरा कर सके। हिमानी चोटियाँ हजारों वर्ष पहले जिस तरह बर्फीली थीं। उससे कम कभी भी नहीं हुई हैं।

जो दिया था, वह किस दिन वापस लौटेगा, इसकी तिथियाँ गिनने की जरूरत नहीं है। इस तथ्य पर विश्वास किया जा सकता है कि देने वाले का खजाना खाली नहीं होता। कल नहीं तो परसों इस हाथ का दिया हुआ उस हाथ में वापस लौट आता है।

पतझड़ में पत्ते जमीन पर गिरते हैं ताकि भूमि को खाद मिलती रहे और उसकी उर्वरता घटने न पाये। पीले पत्ते गिरते देर नहीं लगती कि हरी कोपलें उग आती हैं और पेड़ पहले से भी अधिक हरा-भरा हो जाता है। फलों का सिलसिला भी इसी प्रकार चलता है। खाने वाले उन्हें तोड़ने में कोताही नहीं करते, पर इससे कुछ बिगड़ता नहीं। साल में दो बार हर टहनी पर नये फल आते हैं और ‘दानी को घाटा नहीं उठाना पड़ता, इस तथ्य को अक्षरशः सही सिद्ध करते रहते हैं।

ऊन वाली भेड़ की आदत भी यही है। वह बच्चों के लिए गरम कपड़े बनाने के लिए नयी ऊन उगाती है। काटने वाले उसे काटते रहते हैं, पर हर मौसम में नयी ऊन आती रहती है। सारी जिन्दगी वह यही करती रहती है, पर उसका शरीर कभी बिना ऊन का नहीं देखा गया।




अपनों से अपनी बात- - Akhandjyoti January 1985




शांतिकुंज आगमन के लिए निमन्त्रण - Akhandjyoti January 1985

मानवी सौभाग्यों में कई सुयोगों की गणना होती है। स्वस्थता, सुन्दरता, सम्पन्नता, शिक्षा, कलाकारिता, उच्च पदवी, कुशलता, प्रतिष्ठा आदि की गणना ऐसे सुयोगों में होती है जिसके लिए लोग तरसते हैं, और उनमें से कुछ के मिल जाने पर भी फूले नहीं समाते। पर इन सबसे बड़ी और भिन्न सुविधा में उत्कृष्ट वातावरण में रह सकने की सुविधा।

वातावरण का अपना प्रभाव है। लव-कुश को चक्रवर्ती भरत जैसी सुविधा साधनों की दृष्टि से कुछ भी प्राप्त नहीं था। वे ऋषि परकर के साथ अभावग्रस्त जीवन जीते थे, पर उस उच्चस्तरीय संपर्क, सान्निध्य जो उन्हें अनायास ही मिलता रहा उसके कारण वे इस स्तर के बन सके जिसके लिए राजकुमार भी तरसते होंगे। हनुमान और उनके साथी सहचर वानरों का निजी अस्तित्व वैभव तथा कौशल नगण्य था। पर वनवास में राम लक्ष्मण के साथ रहकर वे वैसे हो गये जैसे इतिहास में खोजे नहीं मिलेंगे। नल नील में भूतकाल में किसी नदी का पुल तक नहीं बनाया था और न लंका काण्ड समाप्त होने के उपरान्त वैसा कोई चमत्कारी निर्माण कर सके जैसा कि उन्होंने समुद्र सेतु बनाकर प्रदर्शित किया था। उसे वातावरण का प्रभाव ही कह सकते हैं।

प्राचीन काल में सुसंपन्न लोग भी अपने सुकोमल बालकों को ऋषियों के आश्रम में गुरुकुल की शिक्षा कठिन प्रक्रिया सम्पन्न करने के लिए भेज देते थे। वहाँ से लम्बी अवधि के उपरान्त लौटते थे। स्पष्ट है कि घर पर उन राजकुमारों को सुविधाएँ थी वे गुरुकुलों के कष्ट साध्य जीवन में कहाँ हो सकती थीं, फिर भी जो वहाँ गये रहे, वे लौटने पर अपने को कृत-कृत्य अनुभव करते रहे। जिस वातावरण में गाय, सिंह एक घाट पानी पीते थे, उसमें रहने पर मनुष्य सर्वगुण सम्पन्न न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। पुरातन गुरुकुलों में पाठ्यक्रम उतना असाधारण नहीं था जैसा कि वहाँ का प्राण प्रेरणा से भरा-पूरा वातावरण। इसी ऊर्जा को अवशोषित करके साधारण लोग- लौह पुरुष महामानव बनते रहे हैं। इसलिए सुयोग सौभाग्यों में उत्कृष्ट वातावरण में रहने का मुक्त कण्ठ से सराहा जाता रहा।

अब वैसा वातावरण अन्यत्र कहाँ है? कुछ कहा नहीं जा सकता पर गायत्री तीर्थ- शान्तिकुँज में- पुरातन ऋषि परम्पराओं की जैसी अनुकृति बनाई गई है उसे अनुपम एवं अद्भुत ही कह सकते हैं। संक्षेप में यह समस्त ऋषियों की कार्य प्रणालियों की झाँकी दिखाने वाला एक आरण्यक माना जा सकता है।

कभी उत्तराखण्ड हिमालय के प्रमुख तीर्थों में ऋषियों के तपोवन थे। उनके उत्पादन ऐसे थे जिनके कारण इस देव भूमि को स्वर्ग कहा जाता रहा। ऋषियों का वर्चस्व ही भारत भूमि की सर्वतोमुखी गरिमा के रूप में सूर्य चन्द्र की आभा किरण बनकर चमकती रही। उन समस्त देव मानवों की योजनाओं एवं कृतियों का समीकरण एक स्थान पर देखा जा सके इसका प्रयत्न शान्तिकुँज में प्राण-प्रण से चला है। कहना न होगा कि उसमें आशाजनक सफलता भी मिली है।

यहाँ के कार्यक्रमों को देखकर कोई भी पुलकित हुए बिना रह नहीं सकता। ऋषि युग की झाँकी इस भूमि में सहज ही मिलती है। कुछ समय ठहरने का जिन्हें अवसर मिले वे यह भी देखते हैं उस पुरातन ऊर्जा से अनुप्राणित होने का सुअवसर उन्हें किस प्रकार मिलता है। इस आश्रम को बने मात्र 13 वर्ष हुए हैं। इस अवधि में थोड़े-थोड़े समय के लिए आने और साधना युक्त प्रशिक्षण प्राप्त करने वालों की संख्या 12 हजार के ऊपर है। और जिनने अपने को इस संस्था का अंग मानकर जीवनदानी की तरह स्थायी निवास का स्थिर संकल्प किया है उनकी संख्या समय लगभग 200 है। इसी मण्डली का चमत्कार है कि भारत भूमि का कोना-कोना आलोकमय बनाया गया है। 74 देशों में जागृति केन्द्र विनिर्मित हुए हैं। प्रचारकों की 25 जीप मण्डलियाँ निरन्तर परिभ्रमण पर रहती हैं और नव-सृजन की ऐसी योजनाएँ हाथ में ली गई हैं जिनका परिचय मात्र पाने से आशा भरे नेत्र चमकते हैं और उज्ज्वल भविष्य की झाँकी मिलती है। जो दृष्टिगोचर होता है वह यह विश्वास दिलाने के लिए समर्थ है कि मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण स्वप्न नहीं, कार्यक्रम नहीं- वरन् एक सुनिश्चित सम्भावना का परिचायक है।

गुरुदेव के सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया में लग जाने के उपरान्त उनके स्थल शरीर का विराट् रूप शान्तिकुँज गायत्री नगर के रूप में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। इसमें बिखरी हुई दिव्य क्षमता का अवलोकन करना हो तो यहाँ के वातावरण को उलट-पुलट कर देखा जा सकता है। उसकी प्रभाव को परखा जा सकता है।

गुरुदेव ने अपने प्रत्यक्ष क्रिया-कलाप को विराम देते हुए एक इच्छा प्रकट की है कि भावनाशील 108 नये कार्यकर्ता इस वर्ष स्थायी निवास के लिए आमन्त्रित किये जांय। पुराने जो यहाँ रह रहे हैं, वे इस संख्या से कहीं अधिक हैं। प्रसंग नयों का चल रहा है। जिन्हें सूक्ष्मीकरण के कारण होने वाली प्रत्यक्ष क्षति की पूर्ति करने वाले घटक कहा जा सके। यह एक उक्ति बन गई है कि गुरुदेव अकेले ही सौ के बराबर काम करते थे। यदि यह बात सही है तो उनके हाथ समेट लेने पर 100 ऐसे कार्यकर्ता शान्तिकुँज में निवास करने के लिए बुलाये जाने चाहिए जिससे उनकी वृत्तियां किसी को गुरुदेव की कमी खटकने न दें। प्रतीत होता रहे कि मात्र एक शरीर ही आँखों से प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता। वे जो चाहते थे, जो करते थे, करना चाहते थे, वह सब इस नई भर्ती ने आकर पूरा करना आरम्भ कर दिया।

जिनके पास अपनी संचित सम्पदा से गुजारे की व्यवस्था है वे उससे चलायें और शान्तिकुँज आकर रहें। जिनके पास कम पड़ता है वह उतने की पूर्ति ब्राह्मणोचित व्यवस्था में यहाँ से कर सकते हैं। पर यह राशि तीन सौ रुपये से अधिक भारी न होनी चाहिए अन्यथा दूसरे साथियों के हिस्से में कमी कटौती करनी पड़ेगी।

निवास के लिए छोटे-बड़े मकान सभी के लिए हैं। रोशनी पानी का प्रबन्ध है। बच्चों को दसवीं कक्षा तक सरकारी पढ़ाई पढ़ाने वाला अपना मान्यता प्राप्त स्कूल है, जिसकी पुस्तकें आदि आश्रम की ओर से दी जाती हैं। जिनके साथ स्त्रियाँ हैं उनको मिशन सम्बन्धी जानकारी नियमित रूप से बढ़ाने की व्यवस्था है। बाजार से थोक भाव खरीद कर खाद्य सामग्री ला दी जाती है जिससे बिना मार्ग व्यय दिये उसी भाव निर्वाह सामग्री मिल जाती है जिस भाव की थोक से मिलती है। खेलने की चिकित्सा की सभी के लिए सुविधा है। इन बातों को देखते हुए 300) मासिक मिलना उन लोगों के लिए कम नहीं पड़ना चाहिये जो औसत भारतीय स्तर का निर्वाह अंगीकार करते हैं। हम में से प्रत्येक को घर छोड़ते समय ऐसा मन बना लेना चाहिए कि अपरिग्रही ब्राह्मण स्तर का स्तर स्वीकारेंगे। स्पष्ट है कि जिनका मन विलासी जीवन की सुविधाओं के लिए ललकता है वे उस कार्य को न कर सकेंगे जो गुरुदेव कराना चाहते हैं यहाँ स्पष्ट कर देना ठीक होगा कि महत्वाकाँक्षी स्तर के अहंकारी व्यक्तियों को यहाँ से पिछले दिनों निराश होकर लौटना पड़ा है। महाकाल ने इसी कारण मात्र तेजस्वी आत्माओं को आमन्त्रित किया है।

गुरुदेव ने अपना प्रत्यक्ष कार्यकाल समाप्त किया है और उससे भी महत्वपूर्ण उससे भी सशक्त-सूक्ष्मीकरण प्रयोग अपनाया है। इस परिवर्तन की बेला में प्रत्यक्ष स्थान पूर्ति के निमित्त उनने 108 कमरे शान्तिकुँज में उनके लिए बनवाये हैं जो यहाँ अकेले-सपरिवार हों तो सपरिवार इनमें आकर रहेंगे और मिल-जुलकर वह कार्य करेंगे जो नव निर्माण के हेतु गुरुदेव अपने स्थूल शरीर से किया करते थे। जन संपर्क लोक-शिक्षण, जनमानस का परिष्कार, सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन जैसे काम ही वे प्रत्यक्षतः करते थे और परोक्षतः ऐसा वातावरण बनाते थे जिसके संपर्क में आकर कोई भी प्रभावित हुए बिना न रहे। इसके लिए उन्हें अभीष्ट ऊर्जा हिमालय के ध्रुव केन्द्र से मिलती थी। वही सिलसिला आगे भी जारी रखा जायेगा।

अखण्ड-ज्योति के पाठकों- प्रज्ञा परिजनों में से उन्हें इन पंक्तियों द्वारा आमन्त्रित किया जा रहा है जो लोभ-मोह के भव-बन्धनों को काट न पाये हों तो भी उन्हें ढीला कर चुके हों। जिन्हें सामयिक दृष्टि से निर्वाह भर की आवश्यकता हो और मन से वह कर सके जिसकी जन-साधारण को- महाकाल को- गुरुदेव को नितान्त आवश्यकता है। यह कार्य घर बैठे न हो सकेगा। जब तब महीने दो महीने का समय देने से भी काम न चलेगा। आधा मन यहाँ-आधा वहाँ, एक पैर यहाँ-एक पैर वहाँ- इस प्रकार कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं बन सकता। ऐसे तो खेल खिलवाड़ होती रहती है। इस प्रकार मन बहलाने से काम न चलेगा। जो आस्थावान हों- जो समय की महत्ता और अपने विशिष्टजनों की गरिमा समझते हों, उन सभी को इन पंक्तियों द्वारा आमन्त्रण है कि शान्तिकुँज गायत्री नगर में स्थायी रूप से आने की तैयारी करें। इसके लिए अनेकों से परामर्श करने की- जिस-तिस से साथ चलने-सहयोग देने की- पूछताछ करने की आवश्यकता न पड़ेगी। रवीन्द्र का ‘एकला चलोरे’ मन्त्र ही उनका साथ देगा।

जिनका मन हुलसे वे हरिद्वार आने की तैयारी करें। पहले अवकाश लेकर एक महीने या कुछ अधिक समय तक प्रायोगिक रूप में आएं ताकि उस अवधि में यह देख सकें कि उनका मन यहाँ लगा कि नहीं और यहाँ वालों को उनका स्वभाव गले उतरा या नहीं? अपने आपको वे यहाँ के माहौल में फिटकर सकेंगे या नहीं?

इन दिनों युग शिल्पी सत्र शान्तिकुँज में चल रहे हैं, वे एक महीने के होते हैं। हर महीने पहली तारीख से 30 तक चलते हैं। उनमें आने के लिए निर्धारित आवेदन पत्र भेजें, जिसमें अपना पूर्ण परिचय लिखा हो। साथ में उल्लेख कर दें, पूर्ण समयदानी के रूप में आना चाहते हैं। स्वीकृतियाँ उसी को देखकर भेजी जायेंगी। अन्य रुटीन के शिविरार्थियों से उन्हें अलग किया जायेगा।

चाहे जो चल पड़े, जिस स्थिति का हो, ऐसा न बनेगा, गुरुजी का स्थाना पत्र बनने के लिए आगन्तुकों को ऐसा होना चाहिए जिसे हर कसौटी पर कसा और खरा पाया जा सके। गुरुजी जब गाँधी जी के आश्रम में गये थे तब उन्हें कई महीने टट्टी साफ करने का काम सौंपा गया था। यहाँ आने वालों को इसी स्तर की स्वयं सेवक भूमिका लेकर आना चाहिए। जिनका यह आग्रह हो कि हम यह करेंगे, यह न करेंगे। उनका निर्वाह कदाचित यहाँ न हो सकेगा। नम्र, शालीन और परिश्रम साधक स्तर की मनोभूमि वाले व्यक्ति ही यहाँ चाहिए।




लालची साहूकार (kahani) - Akhandjyoti January 1985

एक लालची साहूकार था। किसी देवता की अभ्यर्थना करके उसने धन कामना पूर्ति के लिये पारस मणि प्राप्त कर ली। देवता ने एक सप्ताह में उसे लौटा देने के लिए कहा सावधान किया कि लोहे को इससे सटाकर जितना सोना कमाना हो कमा लें। लालची साहूकार सस्ता लोहा अधिक मात्रा में खरीदने के लिए निकल पड़ा ताकि सोना एक साथ बनाया जा सके।

सस्ता और अधिक, यही दो बातें सिर पर छाई रहीं। एक स्थान से दूसरे स्थान के लिए दौड़ता रहा। यह याद ही नहीं रहा कि एक सप्ताह में लौटा जाना है।

सारी अवधि ढूंढ़ खोज में ही बीत गई। जो आसानी से मिल सकता था उसका ध्यान ही न रहा। देवता नियत समय पर आए और अपना पारस वापस लौटा ले गये।




वरिष्ठ परिजन बसन्त पर्व पर दिव्य सन्देश एवं सहयोग प्राप्त करें। - Akhandjyoti January 1985

इस वर्ष का बसन्त पर्व 26 जनवरी को है। युग निर्माण मिशन के लिए यह सर्वोपरि पर्व है। कल्पवृक्ष की तरह मिशन अत्यधिक सुविस्तृत दीखता है। उसका बीजारोपण बसन्त के दिन ही हुआ था। उसके सूत्र-संचालन द्वारा 24 वर्षों के गायत्री महापुरश्चरण का संकल्प उनके महान मार्गदर्शक ने 60 वर्ष पूर्व इसी दिन कराया था। इसके उपरान्त एक से एक बढ़कर लोक-मंगल कार्यों का शुभारम्भ इसी मुहूर्त में होता रहा। गायत्री तपोभूमि, युग निर्माण योजना की इमारतें मथुरा में बना और शान्तिकुँज गायत्री तीर्थ तथा ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान का शिलान्यास भी इसी दिन हुआ। आर्य साहित्य जन-जन को उपलब्ध कराने का गोवर्धन उठाने जैसा भारी कार्य इसी दिन से आरम्भ हुआ और समयानुसार पूरा होकर रहा। एक व्यक्ति द्वारा चारों वेद, 18 पुराण, छहों दर्शन, 108 उपनिषद्, 24 स्मृतियाँ आदि आर्ष ग्रन्थों का प्रस्तुतीकरण किया गया हो ऐसा या इसके समतुल्य दूसरा उदाहरण संसार में नहीं है। अखण्ड-ज्योति के डेढ़ लाख छपने का अपना कीर्तिमान है। सस्ते फोल्डर साहित्य ने ईसाई मिशन के समतुल्य उदाहरण प्रस्तुत किया है।

2400 गायत्री शक्ति पीठों का शानदार निर्माण 24000 स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना 24 लाख परिजनों के परिवार का गठन ऐसा काम है जिसकी दूसरी उपमा भारत में हिन्दू धर्म में दूसरी नहीं है। दस पैसा और एक घण्टा श्रम के सदस्यता शुल्क पर प्रज्ञा अभियान के अनेकानेक रचनात्मक और सुधारात्मक कार्य किसी ने कभी चलाये हों यह भी एक चकित करने वाली बात है।

परिजन मिशन की गतिविधियों को जानते हैं। इसलिए उनका विस्तृत स्मरण दिलाने की आवश्यकता नहीं। हम सब अपने इस महान पर्व को हर वर्ष परिपूर्ण श्रद्धा के साथ मनाते हैं और योजना के प्रति भावभरी श्रद्धांजलियां प्रस्तुत करते हैं। छोटे या बड़े रूप में सभी जगह परिजनों द्वारा इस दिन आयोजन मनाये जाते हैं। प्रातःकाल सामूहिक जप, हवन। सायंकाल दीपदान, संगीत, प्रवचन। इसके साथ-साथ मिशन की अब तक की कार्यपद्धति एवं सफलता तथा भविष्य में जो करना है उसका स्वरूप उपस्थित लोगों को समझाने का प्रयास होता है। मिशन द्वारा अब तक जो बन पड़ा है उसे एक शब्द में अद्वितीय एवं अनुपम कहा जा सकता है। विज्ञान बाजी की अपनी नीति न होने के कारण ही कर्तृत्व का परिचय अपने लोगों तक की जानकारी तक सीमित रहा उसे अन्यान्यों को भी बताने की आवश्यकता है। यह कार्य बसन्त आयोजनों द्वारा ही सम्पन्न होता रहा है। अखण्ड-ज्योति के युग-निर्माण योजना के नये सदस्य बनाने, पुरानों से चन्दा वसूल करने का कार्य भी ऐसा है जो मिशन का कार्यक्षेत्र बढ़ाता और उस विचारधारा को जन-जन के मन-मन में हृदयंगम कराने के काम आता है।

इस वर्ष जहाँ प्रज्ञा आयोजन हो रहे हैं उन सभी को निर्देश दिये गये हैं कि अपने-अपने समीपवर्ती क्षेत्रों में न्यूनतम दो ऐसे ही कार्यक्रम अगले वर्ष सम्पन्न कराने का उत्तरदायित्व उठायें और उन्हें सफल बनाने में कुछ उठा न रखें। इस वर्ष 20 गाड़ियाँ कार्यक्षेत्र में गई हैं और 1000 कार्यक्रम हो रहे हैं। अगले वर्ष गाड़ियों की संख्या तथा प्रशिक्षित प्रचारकों की टोलियाँ दूनी और बढ़ा देने का निश्चय किया गया है।

विगत 60 वर्षों से बसन्त पर्व पर हिमालय के ध्रुव केन्द्र से- युग परिवर्तन के सूत्र संचालक द्वारा दिव्य सन्देश अवतरित होते और उसी आधार पर कार्यक्रम बनते रहे हैं। दिव्य शक्ति का मार्गदर्शन सहयोग साथ रहने से वे पहाड़ जैसे कार्य राई बनकर आश्चर्यजनक रीति से सफल सम्पन्न होते रहे हैं।

इस वर्ष गुरुदेव के सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया में संलग्न होने के कारण वह दायित्व वरिष्ठ प्रज्ञा परिजनों के कन्धों पर गया है और अब वे ही स्थानापन्न सूत्र-संचालक रहेंगे। बसन्त पर्व इस माह 26 जनवरी का है। उस दिन परिजन दिन में अन्याय कार्य करें, पर रात को दिन छिपने से लेकर सूर्य निकलने तक की अवधि में दो घण्टे दिव्य संपर्क के लिए किसी समय निकाल लें। इस अवधि में एकान्त में रहें। मौन धारण करें। अंतर्मुखी ध्यान मग्न होकर आज्ञाचक्र में उगते हुए सूर्य का ध्यान करें। इस स्थिति में उन्हें इस प्रक्रिया के संकेत मिलेंगे जो उन्हें अगले वर्ष एक साल के भीतर सम्पन्न कर दें।

गुरुदेव को इस स्थिति में हर साल दिव्य प्रकाश मिलता रहा है। अब प्रत्येक वरिष्ठ प्रज्ञा परिजन को उसी आधार पर अपने लिए आवश्यक सन्देश और उसे पूरा करने के लिए दैवी सहयोग प्राप्त करना है।




‘‘आत्म-विश्वास जगाओ रे’’ - Akhandjyoti January 1985

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आत्म-विश्वास जगाओ रे (kavita) - Akhandjyoti January 1985

अरे! ईश के अंश, आत्म-विश्वास जगाओ रे। होकर राजकुमार, न तुम कंगाल कहाओ रे॥1॥

दीन, हीन बनकर, क्यों अपना साहस खोते हो। क्यों अशक्ति, अज्ञान, अभावों को ही रोते हो॥ जगा आत्म-विश्वास, दैन्य को दूर भगाओ रे। होकर राजकुमार न तुम कंगाल कहाओ रे॥2॥

आत्म-बोध के बिना, सिंह-शावक सियार होता। आत्म-बोध होने पर, वानर सिंधु पार होता॥ आत्म-शक्ति के धनी, न कायरता दिखलाओ रे। होकर राजकुमार तुम कंगाल कहाओ रे॥3॥

जिसके बल पर नैपोलियन, आल्पस से टकराया। जिसके बल पर ही प्रताप से, अकबर घबराया॥ उसके बल पर अपनी बिगड़ी बात बनाओ रे। होकर राजकुमार तुम कंगाल कहाओ रे॥4॥

सेनापति के बिना, न सेना लड़ने पाती है। सेनापति का आत्म-समर्पण, हार कहाती है॥ गिरा आत्मबल, जीती बाजी हार न जाओ रे। होकर राजकुमार तुम कंगाल कहारे रे॥5॥

आज मनुजता, अनगिन साधन की अधिकारी है। बिना आत्म-विश्वास, मनुजता किन्तु भिखारी है॥ अरे! आत्मबल की पारस मणि तनिक छुआओ रे। होकर राजकुमार, न तुम कंगाल कहाओ रे॥6॥

अडिग आत्म-विश्वास, मनुज का रूप निखरेगा। उसका संबल मनुज, धरा पर स्वर्ग उतारेगा॥ इसके बल पर जो भी चाहो, कर दिखलाओ रे। होकर राजकुमार, न तुम कंगाल कहाओ रे॥7॥

*समाप्त*