धर्म न तो अवैज्ञानिक है और न अनुपयोगी - Akhandjyoti February 1985

धर्म की आधारशिला अति सुदृढ़ है। उसे नृतत्व विज्ञान की समस्त दिशा को ध्यान में रखकर तत्व−दर्शियों ने इस प्रकार बनाया है कि उसकी उपयोगिता में कहीं त्रुटि न रह जाय। व्यक्तिगत सुख, शान्ति, प्रगति और समृद्धि का आधार धर्म है। समाज की सुव्यवस्था भी व्यक्तियों की धर्म−परायण कर्त्तव्य बुद्धि पर निर्भर है। धार्मिकता का अवलम्बन लेकर कोई घाटे में नहीं रहता वरन् अपनी सर्वांगीण प्रगति का पथ ही प्रशस्त करता है।

धार्मिक मान्यतायें न तो अवैज्ञानिक है और न काल्पनिक। किन्हीं साम्प्रदायिक रीति−रिवाजों अथवा कथा किंवदंतियों को धर्म का परिवर्तनशील कलेवर कहा जा सकता है। उसमें सुधार और परिष्कार होता रहता है। धर्म की मूल आत्मा द्वारा उच्च मानवीय सद्गुणों का प्रतिपादन होना सनातन एवं शाश्वत है। न तो उसकी उपयोगिता से इन्कार किया जा सकता है और न उसे अदूरदर्शितापूर्ण ठहराया जा सकता है। सच तो यह है कि मनुष्य की सामाजिकता धर्म सिद्धान्तों पर ही टिकी हुई है।

धर्म का तात्पर्य है−सदाचरण, सज्जनता, संयम, न्याय, करुणा और सेवा। मानव प्रकृति में इन सत् तत्वों को समाविष्ट बनाये रहने के लिए धर्म मान्यताओं को मजबूती से पकड़े रहना पड़ता है। मनुष्य जाति की प्रगति उसकी इसी प्रवृत्ति के कारण सम्भव हो सकी है। यदि व्यक्ति अधार्मिक अनैतिक एवं उद्धत मान्यतायें अपना ले तो उसका अपना ही नहीं, समस्त समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।




तप का अवलम्बन एवं साधना की सार्थकता - Akhandjyoti February 1985

व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक बन्धन और सामाजिक संवेदन−तीनों अध्याय एक−एक कर दृश्य पटल पर घूमते जाते हैं। महाश्रमण महावीर के धर्मोपदेश उस प्रकार की तरह हैं जिसमें इन तीनों के उज्ज्वल पृष्ठ ही नहीं कषाय−कल्मषों के कथानक भी एक के ऊपर एक उभरते चले आते हैं। मेघ अनुभव करते हैं कि तृष्णाओं, वासनाओं और अहन्ताओं के जाल में जकड़ा जीवन नष्ट होता चला जा रहा है, पर लिप्साएँ शान्त नहीं हो पा रहीं वरन् और अधिक बढ़ती हैं। उनकी पूर्ति के लिए और अधिक अनैतिक कृत्य पापों की गठरी बढ़ रही है। काल दौड़ा आ रहा है जहाँ से उपभोग का अन्त हो जायेगा। शरीर को नाश कर देने वाला क्षण अब आया कि तब आया, तब फिर पश्चाताप के अतिरिक्त हाथ कुछ लगने वाला नहीं। विषय वासनाओं के कीचड़ में फँसे जीवन को विवेक−ज्योति से देखने पर निज का जीवन ही अत्यधिक घृणास्पद लगा। मेघ ने उधर से दृष्टि फेर ली।

काम, क्रोध, मद, मोह, द्वेष, द्वन्द्व, घृणा, तिरस्कार, अनैतिकता, अवांछनीयताएं यदि यही संसार है तो इसमें और नरक में अन्तर ही क्या। कुविचारों की कुत्सा में झुलसते मायावी जीवन में भी भला किसी को शान्ति मिल सकती है। हमारे महापुरुष महावीर यही तो कहते हैं कि मनुष्य को अध्यात्मवादी होना चाहिये, उसके बिना लोक−जप सम्भव नहीं। मुझे तप का जीवन जीना चाहिये।

निश्चय अटल हो गया। श्रोणिक पुत्र मेघ ने भगवान महावीर से मन्त्र दीक्षा ली और महाश्रमण के साथ ही रहकर तपस्या में लग गये?

विरक्त मन को उपासना से असीम शान्ति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि−मुक्ता की-सी ज्योति झल-झलाने लगती है, मन वाणी चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं साधक को रस मिलने लगता है सो मेघ भी अधिकाँश समय उसी में लगाते। किन्तु आर्य श्रेष्ठ महावीर की दृष्टि अत्यन्त तीखी थी वह जानते थे रस−रस सब एक हैं−चाहें वह भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर नवीनता से बँधी है इसीलिये जब तक नयापन है तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जायेगा अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार−बार उधर धकेलने लगे।

मेघ ने कभी रूखा भोजन नहीं किया था अब उन्हें रूखा भोजन दिया जाने लगा, कोमल शैया के स्थान पर भूमि शयन, आकर्षक वेषभूषा के स्थान पर मोटे वल्कल वस्त्र और सुखद सामाजिक संपर्क के स्थान पर राजगृह आश्रम की स्वच्छता, सेवा व्यवस्था एक−एक कर इन सब में जितना अधिक मेघ को लगाया जाता उनका मन उतना ही उत्तेजित होता, महत्वाकांक्षाएं सिर पीटतीं और अहंकार बार−बार आकर खड़ा होकर कहता− ओ रे मूर्ख मेघ! कहाँ गया वह रस जीवन के सुखोपभोग छोड़कर कहाँ आ फँसा। मन और आत्मा का द्वन्द्व निरन्तर चलते−चलते एक दिन वह स्थिति आ गई जब मेघ ने अपनी विरक्ति का अस्त्र उतार फेंका और कहने लगे “तात! मुझे तो साधना कराइये, तप कराइये जिससे मेरा अन्तःकरण पवित्र बने।”

महाश्रमण मुस्कराये और बोले−तात! यही तो तप है। विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता−यह गुण जिसमें आ गया वही सच्चा तपस्वी है, वही स्वर्ग विजेता है उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।

मेघ की आंखें खुल गईं और वे एक सच्चे योद्धा की भाँति मन से लड़ने को चल पड़े।




Quotation - Akhandjyoti February 1985

स्वर्ग जाने की आकाँक्षा पूर्ण करने से पूर्व हमें स्वर्ग अपने भीतर उगाना चाहिए।




आत्मिकी का परिष्कार एवं उसकी चमत्कारी परिणतियाँ - Akhandjyoti February 1985

आदिम काल के मनुष्य के पास हाथ पैर भर थे। पेट भरने के लायक समझ। इतने में ही उसे गुजारा करना पड़ता था। आज की तुलना में उस स्थिति को दयनीय और दुर्दशाग्रस्त उपहासास्पद ही कहा जा सकता है। दैवी अनुग्रह से आग जलाने से लेकर धातु गलाने तक के अनेकानेक वैज्ञानिक रहस्य उसके हाथ लगते गये और तद्नुरूप प्रगति और सम्पन्नता के मार्ग पर वह बढ़ता चला आया। विज्ञान उसके हाथ न लगा होता तो पिछले लाखों वर्षों में प्रकृति के जो उतार−चढ़ाव हुए हैं उनसे मनुष्य जैसा दुर्बल काय प्राणी कब का अपना अस्तित्व गँवा बैठा होता। भौतिक विधान ही है जिसने मनुष्य शरीर से प्रत्यक्ष सम्बन्ध न रखने वाले पदार्थों को तोड़-मरोड़कर इस योग्य बनाया ताकि वे जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण योगदान देने लगे।

मानवी सत्ता दो हिस्सों में बँटी हुई है। एक शरीर कार्या−पदार्थ। दूसरी चेतना, मन, बुद्धि, अन्तस्। इनका भी एक विज्ञान है। इनका सही दिशा में विकास करने और सदुपयोग करने की प्रथम भूमिका है। इस भूमिका को सम्पन्न करने वाली विद्या का नाम है- अध्यात्म-विज्ञान। पुरातन सतयुग की बेला में अध्यात्म विज्ञान पर मनीषियों ने अधिक जोर दिया था ताकि उपलब्ध सामग्री का श्रेष्ठतम उपयोग करके न केवल आन्तरिक दृष्टि से बलिष्ठ रहा जाय वरन् उपलब्ध भौतिक सामग्री का भी श्रेष्ठतम सदुपयोग सम्भव हो सके। व्यक्तित्व की उत्कृष्टता और बलिष्ठता इसी पर निर्भर रहती रही है।

समय का फेर ही कहना चाहिए कि भौतिक विज्ञान अपनी गति से चलता रहा और उस तक जा पहुँचा जहाँ मनुष्य अपने आपको सृष्टि का मुकुट मणि और सृष्टि का अधिष्ठाता बनने का दावा करता है। दूसरे क्षेत्र में खेदजनक स्थिति उत्पन्न हुई। अध्यात्म के सम्बन्ध में जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण रहना चाहिए था वह एक प्रकार से विस्मृत ही हो गया। बदले हुए समय के अनुरूप पुरातन प्रतिपादनों में जो हेर−फेर होना चाहिए था वह न हो सका फिर निर्धारणों की जो निरन्तर परीक्षा होती रहनी चाहिए थी उसका भी कोई आधार न रहा। ऐसी प्रयोगशालाएँ भी मिट गईं, जिनमें असाध्य विज्ञान को युग की आवश्यकताएँ पूरी कर सकने वाली विधाओं का प्रस्तुतीकरण सम्भव हो सकता। गाड़ी के दो पहियों में से एक टूट जाय तो उसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा? भौतिक विज्ञान की दिशा में परिपूर्ण दिलचस्पी ली जाती रहे और अध्यात्म−विज्ञान उपेक्षा के ही नहीं भ्रान्तियों के अन्ध कूप में गिरा दिया जाय तो उसे भाग्य की क्रूर विडम्बना ही कहा जायेगा।

इन दिनों अध्यात्म का एक ही भौंड़ा स्वरूप जहाँ−तहाँ दिख पड़ता है कि अमुक देवी−देवता की औंधी−सीधी पूजा−पत्री की जाय और बेबात की बात में प्रसन्न होकर दर्शन दें और पूछें “वर माँग, वर माँग।” तथाकथित भक्त उनके सामने अपनी मनोकामनाओं की लम्बी लिस्ट रखें। देवता तथास्तु कहकर, अंतर्ध्यान हो जाय। इसमें कर्मकाण्ड ही मुख्य माना गया है। साधक के व्यक्तित्व को परिष्कृत करने की आवश्यकता नहीं समझी गई जबकि उसी की चुम्बकीय शक्ति से अदृश्य लोक से कुछ कहने लायक उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं।

यदि आध्यात्म सनकी लोगों की परिकल्पना मात्र है तो उसका अन्त होना चाहिए ताकि उस जंजाल में उलझे हुए लाखों व्यक्तियों का चिन्तन, समय और श्रम बर्बादी से बचाया जा सके। यदि वह सही है तो उसकी प्रामाणिकता इस तरह निखर कर आनी चाहिए जिसे कोई चुनौती न दे सके। बिजली को, आग को, बर्फ को, विष को कोई चुनौती नहीं दे सकता। क्योंकि उनके लाभ और हानि प्रत्यक्ष हैं। अध्यात्म विज्ञान भी ठीक इसी तरह है उसका कोई भी पक्ष ऐसा नहीं है जिसे झुठलाया जा सके। पर यह सम्भव तभी है जब उसके उपकरण और प्रयोग विधान सही हों।

प्रयोगशाला को सही एवं आवश्यक उपकरणों से सुसज्जित करना भौतिक विज्ञान की प्रथम आवश्यकता है। अध्यात्म विज्ञान के प्रयोगों में साधक को अपना शरीर और मनःसंस्थान इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उपयुक्त बनाना पड़ता है। भगवान ने मनुष्य को इतना सुसम्पन्न बनाकर भेजा है कि उसमें ब्रह्माण्ड की न केवल झाँकी की जा सकती है वरन् उसकी ज्ञात अविज्ञात क्षमताएँ भी उसमें प्रसुप्त रूप से विद्यमान पाई जाती हैं। बरगद का बीज राई जितना होता है पर उसे विधिवत् अंकुरित करने और पोषण करने से कुछ ही समय में इतना बड़ा विशाल वृक्ष हो जाता है कि उसकी छाया में सैकड़ों पशु−पक्षी और मनुष्य गुजारा कर सकें। मनुष्य के बारे में भी यही समझा जाना चाहिए कि पेट प्रजनन के कोल्हू में पिलता हुआ हाड़−माँस का पुतला मात्र है पर उसकी पाँचों परतें उखाड़ कर देखा जाय तो उन तिजोरियों में एक से एक बहुमूल्य रत्न राशि भरी पाई जा सकती है। इन्हीं सब सम्भावनाओं और यथार्थताओं का प्रत्यक्षीकरण अध्यात्म विज्ञान है।

भौतिक विज्ञान की शाखा प्रशाखाओं से सम्बन्धित फलश्रुतियाँ स्कूल के विद्यार्थियों को भी विदित हैं किन्तु अध्यात्म विज्ञान की दिशाधारा एवं विद्या से अपरिचित होने के कारण समझदारों के लिए भी उसका सही स्वरूप समझना और समझाना कठिन है। उसका स्वरूप बिगड़ते−बिगड़ते बाजीगरों के कौतुक जैसा बन गया है। जिनकी नकल कोई भी चतुर व्यक्ति उतार कर लोगों को आश्चर्यचकित कर सकता है। सिद्धियाँ इतनी ही रह गई हैं। एक ओर लम्बी और अनिश्चित मंजिल है कि देवी देवताओं की मनुहार उपहार करके मनोकामनाएँ पूर्ण करा लेने के दिवा स्वप्न देखे और दिखाये जाँय। इसमें देवताओं का मूल्य घटता है कि वे पूजा पत्री के लिए इतने अधिक ललचाते रहते हैं कि उसका प्रलोभन दिखाकर उनसे कुछ भी उचित अनुचित कराया जा सके।

प्रचलित मान्यताओं से वास्तविकता बिलकुल भिन्न है। उस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले हर साधक को अपना शरीर और मन ऐसा परिष्कृत बनाना पड़ता है जिससे जीव विद्युत का अतिरिक्त उत्पादन सम्भव हो सके। मनुष्य शक्तियों का भण्डार है। उसके स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में इतनी अद्भुत विभूतियाँ भरी पड़ी हैं कि उनके जागरण मात्र से वह असाधारण दृष्टिगोचर हो सके। अपने आपके लिए भी− दूसरों के लिए भी और समस्त संसार के लिए भी। यह दिव्य क्षमताएँ वह अपने भीतर से भी उगाता है और इस ब्रह्माण्ड में सर्वत्र संव्याप्त होने के कारण उसमें से भी अभीष्ट मात्रा में खींचता है। पुरातन काल में ऋषियों को अपनी आध्यात्मिक प्रयोगशाला में कार्य के अनुरूप उपयुक्त वातावरण भी बनाना पड़ता रहा है। साथ ही अपने व्यक्तित्व को भी इस योग्य बनाना पड़ा है जिसमें दिव्य क्षमताओं के उगने एवं उतरने में कठिनाई न हो। यह प्राथमिक आवश्यकता है इसे जो पूरा कर सके हैं उन्हें दिव्य मानव, देव मानव, ऋषि, कल्प तपस्वी आदि नामों से जाना जाता रहा है। वे अपने उपार्जन को निज के और दूसरों के काम में भरपूर मात्रा में लाते रहे हैं। मल्लाह बाढ़ वाली नदी को स्वयं भी पार करता है और दूसरों को भी बिना हिचक इधर से उधर पार करता रहता है। आत्म विज्ञानियों में से प्रत्येक की स्थिति ऐसी ही होती है।

आत्म विज्ञान के आधार पर कुछ लाभ स्वयं को मिलते हैं? इसके मिलने से उसकी प्रामाणिकता का पता चलता है कि वह वस्तुतः गहरा गोता लगाकर मोती बीन लाने की स्थिति में हुआ या नहीं। इसके बाद यह विश्वास भी होता है कि वह उपार्जित सम्पदा में दूसरों के लिए रत्नाभूषण बनाकर उपहार में दे सकता है या नहीं।

अध्यात्म का प्रथम प्रतिफल निरोगी काया के रूप में दृष्टिगोचर होता है आहर विहार का संयम बरतने के कारण वह तो दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु से बच जाता है। आमतौर से उसे काय कष्ट नहीं उठाने पड़ते। साधक का मन प्रसन्न सन्तुष्ट और उल्लसित रहता है जबकि यह लाभ कोटयाधीशों के भाग्य में भी बदा नहीं होता। वे हर समय सोते जागते चिंतातुर ही रहते हैं। खीज और थकान उन पर निरन्तर छाई रहती है। उपार्जन, संरक्षण, आक्रमण हानि जैसे कितने ही भय उन्हें त्रास देते रहते हैं उस दबाव से शारीरिक और मानसिक दोनों ही प्रकार के स्वास्थ्य खो बैठते हैं। गहरी नींद का आनन्द उन्हें कदाचित् ही कभी आता है। चेहरे पर फूल जैसी मुस्कान कदाचित् ही कभी दृष्टिगोचर होती हो। इसके लिए तड़पते हैं तो मदिरा और व्यभिचार का आश्रय लेते हैं उसमें भी उत्तेजना भर मिलती है और फिर भी मन को खिला देने वाली प्रसन्नता तो कदाचित् ही कभी दृष्टिगोचर होती है। यह स्थिति आये बिना चैन की लम्बी निरोग जिन्दगी नहीं जियी जा सकती जिसे कि ऋषि कल्प स्थिति के लोग सहज ही हस्तगत कर लेते हैं।

ऐसे व्यक्तियों की मन की प्रसन्नता का क्या कहना? जो राग−द्वेष से ऊपर उठ जाते हैं, उन पर हर घड़ी प्रसन्नता की मस्ती छाई रहती है। यही सोम रस है। इसे पीकर अमर हुआ जा सकता है। मस्तक का क्षरण काम करने से नहीं मनोविकारों से होता है। अंतर्द्वंद्वों में शरीर गलता है। जिसने प्रसन्नता सिद्ध कर ली, वह साँसारिक दृष्टि से खिला हुआ फूल समझा जायेगा और तितलियों, मधु-मक्खियों, भौरों को अपनी और आकर्षित करेगा। इतना ही नहीं, उसका मस्तिष्क असाधारण क्षमताओं से सम्पन्न रहेगा। ऐसे कितने ही जादुई मस्तिष्क देखे जाते हैं, जिन्हें लायब्रेरियां की लायब्रेरियां जबानी याद थीं। जो छोटी आयु में ही ढेरों कक्षाओं के विद्वान हो गये थे। जिनने 3 वर्ष की आयु में ही भाषा ज्ञान प्राप्त कर लिया था। एक घटना तो ऐसी है जिसमें गर्भस्थ बालक ऐसी बातें करने लगा था मानों वह कोई भरा−पूरा वैज्ञानिक हो। विलक्षण प्रतिभाओं का यह चमत्कार मस्तिष्क को क्षीणता से बचा लेने मात्र का प्रतिफल है।

सामान्यतया मनुष्य जीवित लोगों से ही संपर्क रख सकने में समर्थ होता है। पर यदि मनोमय कोश का धरातल कुछ ऊँचा हो जाय तो उस विश्व ब्रह्माण्ड में परिभ्रमण करती हुई अनेकानेक दिवंगत आत्माओं से संपर्क सध सकता है, और एक−एक लोक के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रह सकता है, जिसके बारे में अब तक नहीं के बराबर जानकारी रही है। मोटेतौर पर यही समझा जाता है कि भूत−प्रेत कहीं श्मशान, पीपल, खण्डहर पर बैठे रहते और जिस−तिस को डराकर कुछ पूजा पत्री ऐंठते रहते हैं पर गहरी जानकारियों ने बताया है कि उनका एक सुविस्तृत लोक अपने इस मनुष्य लोक जैसा ही है जहाँ के निवासी जीवित मनुष्यों की कई तरह से सेवा सहायता भी करते रहते हैं। उन्हें पूर्वाभास कराते और कई मुसीबतों से बचाते हुए अप्रत्याशित सुविधाओं का सुयोग बिठाते हैं। विकसित सूक्ष्म शरीर का तन्त्र विज्ञान के माध्यम से इनके साथ सरलतापूर्वक सम्बन्ध सध सकता है।

कितने ही देवोपम ऋषि व्यक्ति ऐसे भी हैं जो अपने सूक्ष्म शरीर को तो साधनारत देखते हैं पर स्थूल शरीर से अन्य उपयुक्त व्यक्तियों के माध्यम से ऐसे कृत्य करते कराते रहते हैं जो संसार के हित साधन में महत्वपूर्ण सहायता करें।

मन्त्र शक्ति−अस्त्र-शस्त्रों की सामर्थ्य से बढ़कर है घटकर नहीं। अन्तरात्मा की दिव्य ऊर्जा जब जागृत होती है तो समीपवर्ती समस्याओं के समाधान में सहायता करती है। वातावरण बदलती है और जिन्हें उपयुक्त समझती है उन्हें शाप से दण्डित और उपहार से पुरस्कृत करती है।

मनुष्य के शरीर और मन में अनेकानेक सामर्थ्यों के पुँज भरे पड़े हैं पर उनमें से जितने दैनिक प्रयोजनों में काम आते हैं उतने ही जागृत स्थिति में रहते हैं। शेष सोई स्थिति में रहते हैं। यदि उनमें थोड़ी-सी भी सामर्थ्य जगाई जा सके तो व्यक्ति सिद्ध पुरुष विभूतिवान बन जाता है और सामान्य व्यक्ति की तुलना में कई गुनी क्षमता का परिचय देता है और वह क्षमता भी सामान्य स्तर की न होकर विशेष स्तर की होती है। ऐसे व्यक्ति एक होते हुए भी, एक शरीर में रहते हुए भी ऐसी भूमिकाएँ निभाते हैं, मानों कितने ही सामर्थ्यवान मिल-जुलकर किसी बड़े मोर्चे को सम्भाले हुए हों। संख्या की दृष्टि से उन्हें एक गिना जा सकता है किन्तु क्रियाओं की दृष्टि से वे अत्यधिक प्रयास करते और उतना करते हैं जितना अनेकों मिलकर भी कदाचित् ही कर पाते। कई बार तो उन अकेले का ही ऊर्जा प्रवाह एक वातावरण को उलट देने का अप्रत्याशित काम करता है।

वर्तमान व्यापक संकटों में आत्म शक्ति के विकसित होने पर कितने ही समाधान निकल सकते हैं। अणु युद्ध की बात सोचने वालों के दिमाग उलट सकते हैं उनके दुस्साहस भयभीत होकर अपना ही मरण सोच सकते और हाथ खींच सकते हैं। चलने वाले आयुध जमीन पर गिरने की अपेक्षा पंख लगाकर आकाश में उड़ सकते हैं। पर्यावरण में छाया हुआ विकिरण कोई बुहार कर महा अंतरिक्ष में कूड़े करकट की तरह फेंक सकता है। वृक्षों की कमी से आक्सीजन की कमी पड़ने पर उसकी पूर्ति घास−पात या अनाज के छोटे पौधों में कराई जा सकती है। बादलों को दिशा देकर वर्षा का अभाव दूर किया जा सकता है। इसी प्रकार खनिजों की कमी से उत्पन्न होने वाला विश्व संकट किसी अन्य उपचार द्वारा सरल हो सकता है। उमड़ते युद्ध की घुमड़ती घटाटोप घटाएं किसी आँधी तूफान के प्रवाह में पड़कर कहीं से कहीं पहुँच सकती हैं।

मनुष्य की पीढ़ियाँ वंशानुक्रम एवं जीन्स स्थिति के कारण कुमार्गगामी, कुत्सा और कुण्ठाग्रस्त बनती जा रही है, उन्हें सुधारने के लिए एक−एक व्यक्ति की सूक्ष्म सर्जरी होना कठिन है किन्तु अध्यात्म शक्ति यदि एक्सरे की तरह एक−एक मनुष्य में होकर पार होती चली जाय तो उनमें ऐसे भीतरी परिवर्तन हो सकते है जिससे भावी पीढ़ियों का स्वभाव एवं स्तर ही बदल जाय। इतने लोगों को पढ़ाना, समझाना और मस्तिष्क की धुलाई करना वर्तमान प्रशिक्षण प्रक्रिया के अंतर्गत बहुत कठिन है। किन्तु यदि मनुष्यों का स्तर झाँर अन्तराल बदलने वाला विद्युतीय तूफान आ धमके तो युग परिवर्तन के अवसरों पर भूतकाल में जो चमत्कार होते रहे है वे अभी भी हो सकते है। विश्व परिवर्तन की−युग परिवर्तन की दिशा में और भी ऐसा बहुत कुछ हो सकता है जिससे स्वरूप की अभी तो कल्पना भी नहीं की गई है। नये युग का मनुष्य ऐसा हो सकता है। जिसमें न केवल गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से वरन क्षमताओं की दृष्टि से भी ऐसा परिवर्तन हो सके जिसका अभी तो यदा−कदा परिचय मिलने पर ही अपने को हतप्रभ होना पड़ सकता है।

ऐसी−ऐसी वैयक्तिक सामूहिक−प्रगति गत अनेक कल्पनाओं के करते हुए असम्भव जैसा कुछ भी अनुभव नहीं करना चाहिए। यह विश्व जिस नियन्ता का बनाया हुआ है अपनी कलाकृति में थोड़ा बहुत अन्तर कर दे तो उसमें अनहोनी जैसी बात क्या है? मनुष्य देखने में कीट पतंगों में से एक है। पर स्मरण रहे वह ईश्वर का अविनाशी अंश और राजकुमार भी है। जो ब्रह्माण्ड में है वह बीज रूप में पिण्ड में भी है इस तथ्य को भुला देने की आवश्यकता नहीं है। फिर दोनों के बीच इतना अन्तर कैसे पड़ गया? इसका एक ही उत्तर है कि व्यक्ति हर दृष्टि से अनैतिक बन गया है। उसका चिन्तन, चरित्र, व्यवहार, मान्यता, आकाँक्षा, भावना, क्रिया, सभी कुछ अवाँछनीय दिशा में उलट गई हैं। उसे उलटेपन को उलट कर यदि सीधा किया जा सके तो आज की चिन्ताएँ और समस्याएं कल ही सरल और सुगम हो गई दृष्टिगोचर होंगी।

प्राचीन काल में जिन प्रयोजनों की आवश्यकता थी उनको ध्यान में रखते हुए उन दिनों की साधना का उपक्रम बनाया गया था। अतएव उसका स्वरूप कुछ भिन्न था लेकिन आज की परिस्थितियाँ, आवश्यकता और वातावरण का प्रवाह ही भिन्न नहीं है वरन साधना करने वालों के शरीर एवं मन जिस अन्न जल से जिस संपर्क संसर्ग में जिस ढाँचे में ढल गये हैं उसका एक बार नये सिरे से काया−कल्प करना पड़ेगा। छुरी चाकू मामूली लोहे में भी ढल जाते हैं पर तोपें ढालने के लिए उनमें अष्ट धातुओं का संमिश्रण प्रयुक्त करना पड़ता है। अन्यथा इतनी अधिक और इतनी तेज बारूद का धमाका होने से निशाना सही स्थान पर लगना तो दूर, वह तोप ही टुकड़े−टुकड़े हो जायेगी। आज की स्थिति के अनुरूप अध्यात्म शक्ति का उद्भव और प्रकटीकरण करने के लिए परोक्ष जगत में क्रियाशील तपःपूत आत्माओं को काया−कल्प स्तर का प्रयोग करना पड़ रहा है। एक नहीं अनेकों उच्चस्तरीय आत्माएँ उस प्रयोग में लगी हैं जिससे आत्मिकी की परिष्कृति से चमत्कारी नवयुग का आगमन सम्भव हो सके।




मानवी काया की चेतन सत्ता का वैज्ञानिक विवेचन - Akhandjyoti February 1985

पिण्ड रूप में समष्टि चेतन सत्ता के एक घटक मानवी काया के स्थूल दृश्यमान रूप को सभी जानते हैं। बहुरंगी बहुमुखी क्रियाकलाप नजर आने के कारण उसकी महत्ता भी सब को समझ में आती है। यही कारण है कि किसी अंग अवयव के व्याधिग्रस्त होने पर लोग−बाग दौड़−धूप करते व भाँति−भाँति के उपचारों में लगे देखे जाते हैं। आत्मिकी का सारा ढाँचा इस स्थूल दृश्यमान कायकलेवर पर नहीं, अपितु सूक्ष्म रूप से क्रियाशील चेतना की विभिन्न परतों पर अवलम्बित है, उन्हीं से विनिर्मित है। वे प्रत्यक्ष नजर तो नहीं आतीं पर स्फुट रूप से अपनी गतिविधियों की एक झलक झाँकी स्थूल काया के माध्यम से ही दर्शाती रहती हैं।

अस्तु अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करने वाले अथवा ब्राह्मी चेतना से संपर्क स्थापित कर उस विराट् की खोज हेतु उत्सुक जिज्ञासुओं के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि उस सूक्ष्म चेतन सत्ता की संरचना, विलक्षणता एवं क्रियाकलापों को भली भाँति समझें। इस संबंध में वीरभद्र प्रकरण में पंचकोशों की चर्चा गत दो अंकों से की जाती रही रही है। इस संदर्भ में यह भली प्रकार समझ लिया जाना चाहिए कि स्थूल से सूक्ष्म की संगति बिठाने का जो प्रयास किया जाता है, वह प्रत्यक्षवादी तथ्यान्वेषी बुद्धि के लिये समाधान परक संकेत मात्र है। आत्म सत्ता की प्रयोगशाला में कार्यरत योग साधकों को इन संकेतों के माध्यम से समझने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे स्वयं पर प्रयोग कर इसे प्रत्यक्ष कर दिखाते हैं। प्रदर्शन से अधिक महत्वपूर्ण है−अनुभूति। जो इन सूक्ष्म चेतन परतों को एक−एक कर अनावृत्त करते हैं, वे क्रमशः उसी अनुपात में लाभान्वित होते, विराट् सत्ता से तादात्म्य स्थापित करते देखे जा सकते है।

जिन पाँच सूक्ष्म चेतन परतों की चर्चा की जा चुकी है, वे इस प्रकार हैं−हारमोन्स एवं एन्जाइम्स के रूप में क्रियाशील अन्नमय कोश, जैव विद्युत के रूप में क्रियाशील द्वितीय प्राणमय कोश, जैव चुम्बकत्व के रूप में क्रियाशील तृतीय मनोमय कोश, स्नायुरस स्रावों (न्यूरोह्यूमरल सिक्रीशन्स) के रूप में सक्रिय चतुर्थ विज्ञानमय कोश एवं रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम तथा कार्टिकल न्यूकलाई के रूप में विद्यमान आनन्दमय कोश। पंचकोश के संदर्भ में स्थूल दृष्टि से कार्य कर रहे, अपनी उपस्थिति का बोध कराते जिन एनाटामिकल संरचनाओं की चर्चा की गयी, वे उसी स्थान पर गतिशील हों, यह बात नहीं। इन्हें इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप इत्यादि के माध्यम से पिनप्वाइंट भी नहीं किया जा सकता। मात्र इनकी परिणतियों−स्थूल प्रतिक्रियाओं से जागरण की फलश्रुति को जाना−समझा जा सकता है।

यों पिचहत्तर हजार अरब जीवकोशों के समुच्चय से बनी मानवी काया में अनेकों स्वतन्त्र शक्तियाँ क्रियाशील रहती हैं। न्यूकलीय अम्लों, जीन्स एवं क्रोमोसोम के रूप में कार्यरत प्रजनन एवं आनुवाँशिकी रूपी सृजनात्मक शक्ति उन्हीं में से एक है। जैव विद्युत एवं जैव चुम्बकत्व से ही जुड़ी हुई एक और शक्ति पुँज है जीवनी शक्ति के रूप में। प्रतिरोधी संस्थान के रूप में विद्यमान यह संरचना शरीर की प्रतिकूलताओं से जूझने की सामर्थ्य−प्राणशक्ति का एक सम्बल है। ये सभी ऐसे हैं, जिन्हें स्थूल रूप से रक्त में, स्नायुरस स्रावों में, टीश्यू हिस्टोलाँजी के माध्यम से एवं इलेक्ट्रोमीटर इलेक्ट्रोएनसेफेलोग्राफ, मैग्नेटोग्राफ रेडियो इक्यूनोएसे इत्यादि माध्यम से जाँचा−मापा जा सकता है। यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि ये मात्र सूक्ष्म की स्थूल में दृश्यमान प्रतिक्रियाएँ हैं। अमुक व्यक्ति में उपरोक्त शक्तिपुंजों का होना यह प्रामाणित नहीं करता कि वह उच्चस्तरीय साधक है। परन्तु उनके परिमाण, प्रखरता समुच्चय में अभिवृद्धि यह संकेत देती है कि सूक्ष्म आध्यात्मिक काय संरचना में क्रमशः जागृति आ रही है व इसके परिणाम स्वरूप चमत्कारी फलश्रुतियाँ प्रकट होने की संभावनाएँ हैं।

कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्र भेदन, योगत्रयी, पंचकोश जागरण, सूक्ष्मी करण इत्यादि सभी साधनाओं में अनेकों दृष्टि से साम्य है। इन सभी में स्थूल चेतना को सूक्ष्म बनाया एवं ध्यान योग के माध्यम से उसका सुनियोजन किया जाता है। माध्यम कुछ भी हो, लक्ष्य एक ही है− अन्तः की प्रसुप्त सामर्थ्य का उभार−जागरण−उन्नयन। यह कैसे सम्भव हो पाता है, इसे सूक्ष्म संरचना के परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। यह विवरण गुह्य है, रहस्यमय है एवं रोचक भी। विशेषकर इस क्षेत्र में प्रवेश कर उत्कर्ष के मार्ग पर बढ़ने की इच्छा रखने वालों के लिए जानने समझने योग्य है।

स्थूल सत्ता पर सूक्ष्म के नियन्त्रण का प्रमाण अन्तःस्रावी ग्रन्थियों−हारमोन्स के अदृश्य क्रियाकलापों को माना जा सकता है। शरीर विज्ञानी तो उनके रोग परक असामान्य (पैथालाजीकल) पक्ष को ही अधिक जानते वह ऊहापोह करते दिखाई देते हैं। परन्तु शरीर का यह रसायन शास्त्र और भी विलक्षण है, एवं चेतना के स्तर को सामान्य से असामान्य की ओर ऊँचा उठा कर ले जाने वाली विद्या है। जब से भ्रूण का गर्भाशय में विकसित होना आरम्भ होता है, तब से ही ये हारमोन्स गतिशील हो जाते हैं। यहाँ तक कि गर्भाशय में शुक्राणु के निषेचन एवं स्थापन के लिये आवश्यक विद्युत रासायनिक एवं संरचनात्मक कार्यवाही भी माता के हारमोन्स द्वारा संचालित होती है। आनुवांशिकता के माध्यम से संस्कारों के स्थानान्तरण आदि की प्रक्रिया इसी समय सम्पन्न होती है। शरीर, मन, व्यक्तित्व, स्वभाव आदि का निर्धारण यहीं होता है।

जब सभी अंग अवयवों रूपी वैभव से अभिपूरित जीव सत्ता अपना भ्रूण काल पूरा कर कणों−प्रतिकणों एवं आयन मण्डल से लिपटी बहिरंग दुनिया में प्रवेश करती है, तो नवीन परिवर्तनों, प्रतिकूलताओं से निपटने में यही सूक्ष्म रसस्राव अपनी भूमिका निभाते हैं। शरीर की आकृति, अंगों का विकास इत्यादि तो इन पर निर्भर है ही, प्रकृति रुझाव−चिन्तन−क्रियाकलापों की डोर भी इन सूक्ष्म रसस्रावों के मजबूत हाथों में है। पीनियल, पीटुटरी, थायराइड, पैराथायराइड, थाइमस, एडरीनल्स एवं गोनेड्स नाम से ये सात ग्रन्थि समूह काया के शिखर स्थल से पेडू तक उत्तरी ध्रुव से लेकर दक्षिणी ध्रुव तक विद्यमान होते हैं एवं शरीर के सभी जैव रासायनिक क्रियाकलापों पर अपना कठोर नियन्त्रण रखते हैं। यौन-विकास, दृष्टिकोण का परिष्कार, पुंसकत्व एवं कामेच्छा पर नियन्त्रण इन ग्रन्थि समूहों के आधार पर ही बन पड़ता है। स्थूल स्तर की आहार−विहार की एवं बंध, मुद्रा, आसन जैसी सूक्ष्म काय संस्थान को प्रभावित करने वाली साधनाएं हारमोन्स को सीधे प्रभावित कर उच्चस्तरीय साधना हेतु अभीष्ट सक्षमता प्रदान करती है। बहिरंग की दृष्टि से कितना ही सुन्दर, आकर्षक कोई क्यों न हो, जब तक उसके अन्तरंग में सक्रिय−रक्त में घुले हारमोन्स का स्तर नहीं, बदला जाता, वह भावनात्मक एवं आत्मिक दृष्टि से अपरिपक्व ही रहेगा। शारीरिक अंगों की असामान्यता जो होगी, वह अलग से विद्यमान रहेगी।

एस्ट्रोकेमीस्ट्री एवं कास्मोबायोलाजी के विद्वानों ने ब्राह्मी चेतना का व्यष्टि चेतना से संबंध इन ग्रन्थि समूहों के माध्यम से होता बताया है। वे सूर्य की पीनियल से चन्द्र की पीटुटरी से, मंगल की पैराथायराइड से, बुध की थाइराइड से, बृहस्पति की एड्रीनल्स से तथा शुक्र की गोनेड्स से संगति बैठाते हैं। यह कहाँ तक सही है, कहना कठिन है। किन्तु यह स्पष्ट है कि व्यष्टि सत्ता समष्टिगत चेतना से निश्चित ही प्रभावित होती है। एवं अपनी सामर्थ्य का बहुत−सा अंश साधना−उपादानों के माध्यम से इस अविज्ञात शक्ति समुच्चय से खींचती है।

जैवविद्युत एवं प्राण संस्थान जिसे थियोसाफी में “इथरीक डबल” नाम दिया गया है, परस्पर गुँथे हुए हैं। हर जीवकोश, ऊतक एवं अंग अवयव विद्युत शक्ति से अभिपूरित हैं। बाह्यजगत में फोटॉन कणों की प्रकाश की गति से चलने वाले कणों के रूप में परिकल्पना को अब प्रामाणित किया जा चुका है। ऐसे ही प्रकाशाणुओं के आयन्स जीवकोशों में होते हैं। शरीर संस्थान की छोटी से छोटी इकाई न्यूकलीय अम्लों से बने जीन्स हैं। ये भी विद्युत आवेश से भरे होते हैं। सोडियम पम्प के माध्यम से जीव कोशों का धन−ऋण आवेश बदलता व क्रमशः विद्युत संचार होता चला जाता है। ए. डी. पी., ए. टी. पी. सिम्टम एवं साहक्लिक ए. एम. पी. आदि ऐसे ही सूक्ष्म स्तर पर क्रियाशील विद्युत रासायनिक प्रक्रियाएँ हैं जो शरीर के अंग प्रत्यंग में हो रही विभिन्न गतिविधियों के लिए उत्तरदायी हैं।

जैव विद्युत का उपपाचय (इलेक्ट्रीकल मेटाबॉलिज्म) किस प्रकार होता है, इसकी एक झलक आज से बीस वर्ष पूर्व डा. फ्रेड व्लेस द्वारा किये गये अध्ययन में दिखाई देती है। इस विश्लेषण के अनुसार हर जीवधारी वायुमण्डल से ऋण विद्युत आयन्स श्वास द्वारा अन्दर खींचता है। ये आयन्स सारे शरीर को विद्युतमय बना देते हैं। त्वचा के माध्यम से ये फिर सारे वातावरण में फैल जाते हैं। यह एक प्रकार का विद्युत चक्र है। ऋण विद्युत फेफड़ों द्वारा अवशोषित की जाती है एवं त्वचा द्वारा निष्कासित कर दी जाती है। आधुनिकतम उपकरणों ने अब इस जानकारी को और विशद बना दिया है। पीजो, पायरो एवं मेटाबॉलिक विद्युत के माध्यम से मनुष्य जैव विद्युत का एक पुँज, जीते जागते बिजलीघर के रूप में देखा जा सकता है। शरीर के अनेकों ऊतक ऐसे विशिष्ट क्रिस्टल्स के रूप में कार्य करते देखे जा सकते हैं जो “सॉलीड स्टेट फिजीक्स” में ट्रांसड्यूसर्स की भूमिका मानी जाती है। यह भी पाया गया है कि शरीर के हर कार्बोनिक अणु में विद्युत संधारण की क्षमता होती है। प्राण संस्थान की इस विशेषता को अपवाद रूप में किसी व्यक्ति में अनायास ही जागृत होते देखा जा सकता है। किन्तु साधना प्रक्रिया द्वारा शरीर स्थिति प्राण प्रवाह को जागृत एवं प्रचण्ड बना सकना संभव है। यह विद्युत ऊर्जा सामान्यतः चमक, ताजगी, उत्साह, स्फूर्ति के रूप में क्रियाशील देखी जा सकती है। प्रतिरोधी सामर्थ्य का मूल आधार यही जीवनी शक्ति है। एवं सोऽहम् की हंस योग साधना इत्यादि द्वारा इस सामर्थ्य में अभिवृद्धि की जा सकती है। साधक के रोम−रोम से इसे फूटते देखा जा सकता है। वाणी के माध्यम से यही जैव विद्युत सक्रिय होती एवं व्यक्तियों तथा वातावरण को प्रभावित करती है।

जैव चुम्बकत्व एवं जैव विद्युत में अन्तर इतना ही है कि दोनों भिन्न−भिन्न अवस्थाओं में क्रियाशील शरीर की शक्तियाँ हैं जिनमें शरीर संचालन के अतिरिक्त बहिरंग को वातावरण को प्रभावित करने की सामर्थ्य होती है। प्रभा मण्डल, ओरा, सायकिक हीलिंग, प्राण प्रहार, वासिंग, गेजिंग हिप्नोटिज्म, शक्तिपात जैव चुम्बकत्व से संबंधित प्रक्रियाएँ हैं जिन्हें योगीजनों द्वारा सम्पन्न करते देखा जाता है। हृदय के आस-पास जो चुम्बकीय क्षेत्र बनता है उसे मैग्नेटोकार्डियोग्राम द्वारा वैज्ञानिकों ने नापा व इसे 5×10” टेस्ला इकाई के समकक्ष पाया है। एक स्क्वीड नामक यंत्र के माध्यम से हर पल प्राण प्रवाह द्वारा बदलती चुंबकीय धारा एवं क्षेत्र को अति सूक्ष्म मात्रा तक नापा जा सकता है। अब इसी यंत्र से मानवी काया के डायपोल मैग्नेट सुषुम्ना के दोनों ध्रुवों सहस्रार−ब्रह्मरंध्र एवं मूलाधार के आस−पास चुम्बकीय क्षेत्र को भी मापा जा सकना सम्भव हो सका है। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि उत्तरी ध्रुव पृथ्वी के दो ध्रुवों की तरह अवशोषण की एवं दक्षिणी ध्रुव निष्कासन की भूमिका निभाता है। अब एम. ई. जी. (मैग्नेटोएनसेफेलोग्राम) के द्वारा यह भी देखा जा सकता है कि डी. सी. पोटेन्शियल्स के कारण कितना चुम्बकत्व शिखा स्थान के आस−पास एवं मूलाधार केन्द्र के आस−पास विद्यमान है। जैव-चुम्बकत्व ध्यान योग के विभिन्न उपादानों के द्वारा बढ़ाया जा सकता है एवं यही मनोमय कोश की जागृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसी स्थिति तक पहुँचे साधक भावयोग की उच्च कक्षा में प्रवेश करते हैं, साथ ही अपनी सम्मोहक सामर्थ्य से अन्यान्यों को प्रभावित करते, अपनी शक्ति का अंश सुपात्रों को देते हैं। एकाग्रता सम्पादन द्वारा वे उन कार्यों को अल्पायु में ही कुशलतापूर्वक कर लेते हैं, जो प्रतिभा, स्मरण शक्ति, संकल्पशक्ति से संबंधित हैं।

स्नायु रसायन मस्तिष्क एवं सुषुम्ना के नाड़ी संस्थान में क्रियाशील वे रसस्राव हैं जो सक्रिय होने पर इन्द्रियों में सीमाबद्ध मानसिक चेतना को अतीन्द्रिय स्तर तक पहुँचा देते हैं ‘‘न्यूरोह्यूमरल सिक्रीशन्स” नाम से जाने जाने वाले ये रसस्राव वैज्ञानिकों द्वारा अभी−अभी जाने पहचाने गये हैं किन्तु इनकी प्रतिक्रियाओं का अतीन्द्रिय क्षमता के रूप में उभार शास्त्र वचनों एवं प्रतिपादनों में देखने को मिलता है। साधना का स्तर जैसे−जैसे सूक्ष्म प्रखर होता जाता है, सीढ़ियाँ उतनी ही ऊँची साधक चढ़ता चला जाता है। विज्ञानमय कोश जागरण की साधना ऐसी ही है जो इन रसस्रावों से संबंधित है। डोपामीन, एसिटील कोलीन, गाबा, सिरोटोनिन, एन्डार्फिन्सएनकेफेलीन्स के रूप में विद्यमान ये स्नायु रसायन एकाग्रता, प्रसन्नता, भावप्रवणता, आनंदानुभूति, जागृति, स्फूर्ति, स्मरण शक्ति, मेधा इत्यादि विशेषताओं से संबंधित हैं। ध्यान योग की उच्चस्तरीय साधनाएं सीधे इनके रसस्राव को प्रभावित करती व साधक में उपरोक्त विशेषताओं को उभारती हैं। विभिन्न मुद्रा, बंध, आहार−विहार के नियमों व नियम ध्यानयोग की साधना में सहायक भूमिका निभाते हैं। अतीन्द्रिय सामर्थ्यों में विचार संप्रेषण, दूर श्रवण, दूर−दर्शन, पदार्थ हस्तान्तरण आदि अनेकों आती हैं पर इनका सुनियोजित उपयोग अध्यात्म क्षेत्र के जो साधक करते हैं वे चमत्कारी प्रदर्शनों में स्वयं को उलझाते नहीं। वे इनको लौकिक प्रयोजनों में नष्ट भी नहीं करते। स्नायुकोशों की जागृति के फलस्वरूप जो भी प्रतिक्रियाएं होती हैं वे उससे भली−भाँति अवगत होते हैं एवं इस उपलब्धि का प्रयोग लोकोपयोगी प्रयोजन हेतु ही होने देते हैं। चेतना के चतुर्थ आयाम की यह वह स्थिति है जिसमें विभूतियाँ अनायास ही हस्तगत हो जाती हैं। वैज्ञानिकों मनीषियों के आविष्कारों−रचनाओं को इस संदर्भ में देखा जा सकता है।

चेतना का पांचवां व अंतिम महत्वपूर्ण आयाम है− रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम एवं थेलिमिल−कार्टिकल न्यूकलाई के रूप में विद्यमान मस्तिष्क के ऊर्ध्व केन्द्र पर अवस्थित आनन्दमय कोश। इसके विषय में पहले भी बहुत कुछ कहा जा चुका है परन्तु जैसे−जैसे मेडिकल इलेक्ट्रॉनिक्स ने प्रगति की है, मस्तिष्क के इस संस्थान के संबंध में जो चेतनता बनाए रखने के लिए उत्तरदायी माना जाता है, जानकारी और बढ़ी है। प्रायोगिक रूप से इलेक्ट्रोडों के माध्यम से सुषुम्ना के ऊर्ध्व भाग में स्थित इस विद्युत्स्फुल्लिंग के फव्वारे के विषय में जितना भी कुछ पता चला है, वह विलक्षण है। मस्तिष्क के विभिन्न कार्टीकल न्यूकलाई प्रसुप्त अचेतन को सचेतन एवं सुपरचेतन में परिवर्धित करने की क्षमता रखते हैं, बशर्ते उन्हें थेलेमीक प्रोजेक्शन के माध्यम से तन्तुजाल से विनिर्मित “रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम” से उत्तेजन मिलता रहे। यह कार्य उच्चस्तरीय ध्यान साधना से सम्भव हो पाता है। निदिध्यासन, ध्यान धारणा, प्रत्याहार, समाधि की अवस्था में ये केन्द्र जाग्रत होते एवं सूक्ष्म “माइजेन” कणों एवं न्यूट्रीनो कणों के माध्यम से व्यष्टि चेतना का समष्टि चेतना से संपर्क स्थापित कर देते हैं। चेतना की सर्वोच्च स्थिति आनन्दमय कोश के जागरण की स्थिति में आती है। मस्तिष्क नहीं, मन में संव्याप्त चेतना के ऊर्ध्वीकरण का यह सोपान जब पूरा हो जाता है, पंचकोशी साधना समग्र हुई मानी जाती है।

यह सब कुछ जितने विज्ञान सम्मत ढंग से प्रतिपादित करने का प्रयास किया गया है, तथ्यतः प्रक्रिया उससे भी अधिक जटिल है। ब्रह्मरंध्र−सहस्रार की स्थिति तक पहुँचने पर “अयमात्मा ब्रह्म”, सच्चिदानंदोऽहम् की जिस परिणति तक साधक पहुँच पाता है, उसका वर्णन शब्दों में व्यक्त कर पाना सम्भव नहीं। (क्रमशः)




कृष्ण से भेंट करने युधिष्ठिर गये (kahani) - Akhandjyoti February 1985

कृष्ण से भेंट करने युधिष्ठिर गये तो उन्हें आसन पर बैठे ध्यान मग्न सिंहासन में बैठे पाया।

ध्यान समाप्त हुआ तो युधिष्ठिर ने पूछा− ‘‘आप तो भगवान हैं। संसार आपका ध्यान करता है। फिर आप किसका ध्यान करते है?”

श्रीकृष्ण ने कहा− ‘‘जो मेरा ध्यान रखते हैं, उनका मुझे भी रखना पड़ता है। मुझे ध्यानावस्था में यहीं से देखना पड़ता है कि किसके उपकार का मुझे क्या प्रतिकार देना चाहिए।”




ध्यान योग का उद्देश्य और स्वरूप - Akhandjyoti February 1985

जब साँसारिक वस्तुओं, विषयों या व्यक्तियों में से किसी पर चित्त पड़ा रहता है, उसका आधा-अधूरा कल्पना चित्र मस्तिष्क में घूमने लगता है। इसमें कोई अनोखापन भी नहीं है। ध्यान के नाम पर किसी देवता या चक्र उपत्यिका आदि का कल्पना चित्र गढ़ा जाय और कुछ देर उस पर एकाग्र हुआ जाय तो वैसी ही कुछ अनुभूति भी होने लगती है। इतने भर को प्रगति मानकर कोई प्रसन्नता, सफलता अनुभव करने लगे तो उसे नकारा भी क्यों जाय?

इतने भर से यदि योगाभ्यास हो जाता है और योगी बना जा सकता है तो इससे सरल बात और क्या हो सकती है। योग एक बड़ी बात है। उसमें अतीन्द्रिय क्षमताओं का जागरण और दिव्य सत्ताओं के साथ समीकरण होता है तो उस सरलता का लाभ कोई क्यों न उठाना चाहेगा?

किन्तु वास्तविकता ऐसी है नहीं। ध्यान का मोटा स्वरूप एकाग्रता है। एकाग्रता किसी भी प्रयोजन के लिए क्यों न की जाय, उसका लाभ तत्काल प्रकट होता है। द्रौपदी स्वयंवर में केवल अर्जुन ही मत्स्य बेध की चुनौती में उत्तीर्ण हुये थे क्योंकि उनने एकाग्रता की साधना सिद्ध कर ली थी। सूर्य किरणों को कानवेक्स लेन्स पर एकत्रित कर लिया जाय तो एक दो इंच की धूप से देखते−देखते अग्नि प्रकट हो जाती है। तनिक−सी भाप को एक नली में केन्द्रित कर लिया जाय तो रेल का शक्तिशाली इंजन द्रुतगति से दौड़ने लगता है। बन्दूक की नली में थोड़ी−सी बारूद अवरुद्ध कर लेने पर शीशे की गोली पिघल जाती है और निशाने को आरपार करती है। एकत्रीकरण के ऐसे चमत्कार हम आये दिन देखते हैं।

ध्यान का सामान्य रूप मानसिक क्षमता के बिखराव को रोककर एक केन्द्र पर नियोजित करना है। सरकस के अचम्भे में डालने वाले खेलों में से अधिकाँश एकाग्रता पर अवलम्बित हैं। रस्सी पर चलना, झूले पर कहीं से कहीं कूद जाना जैसे खेलों में मात्र एकाग्रता के ही चमत्कार दृष्टिगोचर होते हैं। महत्वपूर्ण काम करने वाले इसी विद्या को अपनाते हैं। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कलाकार अपनी सफलता इसी आधार पर प्रस्तुत करते रहते हैं। लम्बे चौड़े हिसाबों को सही रखने वाले एकाउण्टैण्ट, एक पाई की भी भूल नहीं पड़ने देते इसमें उनकी यही विशेषता काम करती है। निशानेबाजों की सफलता इसी अभ्यास पर निर्भर रहती है। आर्चीटेक्ट विशालकाय भवनों का राई रत्ती स्वरूप बना देते हैं और उसमें क्या वस्तु किस स्तर की लगेगी इसका लेखा−जोखा ऐसा बना देते हैं जिसमें तनिक भी भूल न रहे। उनकी तन्मयता को ही इसका श्रेय जाता है। योजनाएँ बनाने और इनकी पूर्ति में क्या करना पड़ेगा, इसका सही ढाँचा खड़ा करना चिन्तन की तल्लीनता का प्रतिफल है। जो भी काम पूरी दिलचस्पी और तन्मयता के साथ किये जाते हैं वे सही सुन्दर और सफल होते हैं। यही है ध्यान का चमत्कार।

एक बार सन्त विनोबा से किसी ने पूछा− ‘‘आपको ध्यान योग का पारंगत माना जाता है। कृपया उसका विधान बताइए?” उत्तर में उनने कहा “मैं जो सोचता या करता हूँ, उसमें समग्र तन्मयता केन्द्रीभूत कर देता हूँ। सोचता हूँ उस समय यही कार्य मेरे लिए सर्वोपरि महत्व का है। इस संदर्भ का चिन्तन ही मेरे लिए अभीष्ट है। इसे करने में मुझे इस प्रकार जुटना है कि शक्ति का एक कण भी बिखरने न पाये। यही वह विधान है जिसे मैं अपने हर कृत्य में अपनाता हूं। इस प्रकार जागृत स्थिति में निरन्तर ध्यान योग में तल्लीन रहता हूं। यहाँ तक कि विश्राम के समय भी यही मनःस्थिति रहती है। फलतः थोड़े समय का विश्राम भी पूरी तरह थकान मिटा देता है।

ध्यान योग का यही तरीका है। हम हाथ में लिये हुए प्रत्येक कार्य को सर्वोपरि महत्व का समझें और चिन्तन तथा कर्म से उसी में घुल जायें तो समझना चाहिए कि व्यावहारिक जीवन में हम ध्यान योगी हो गये। फलतः जो भी करेंगे वह सफल और शानदार होगा।

अध्यात्म दर्शन का ध्यानयोग यह है कि निर्धारित समय पर अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्तियों को समेटकर अन्तर्मुखी बनाये। संसार की गतिविधियों के सम्बन्ध में कुछ समय विचार करना छोड़कर हृदय या मस्तिष्क केन्द्र में आत्मा की प्रकाश ज्योति का ध्यान करें। इसमें दृश्य मात्र ही पर्याप्त नहीं है वरन् यह भी अनुभव करना चाहिए कि अपनी सत्ता शरीर से सर्वथा पृथक ईश्वर की अंश ज्योति मात्र है। परमात्मा में जो विशेषताएँ विभूतियाँ हैं, वे सब अपने भीतर भी विद्यमान हैं। करना इतना भर है कि धुंधलेपन को दूर किया जाय। कषाय−कल्मषों की जो हल्की-सी परत जम गई है उसे रगड़ कर साफ किया जाय। रगड़ से तात्पर्य तपश्चर्या से है। तप का अर्थ है संयमी और कष्ट सहिष्णु जीवन। इस प्रक्रिया को अपनाते ही आत्म ज्योति का धुँधलापन दूर होने लगता है और क्रमशः आत्मबोध की वह स्थिति उभरने लगती है जो बोधि वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध के अन्तराल में प्रकट हुई थी।

देवी देवताओं का ध्यान करना उतना उपयोगी नहीं है। यदि उसके लिए बहुत मन हो तो इतनी ही मान्यता बनानी चाहिए कि परब्रह्म का यह अपनी अभिरुचि के अनुरूप गढ़ा हुआ साकार स्वरूप है। निराकार भगवान का प्रकाश रूप में और साकार भगवान का देवी देवताओं की आकृति में ध्यान किया जाता है। यह मान्यता भ्रम पूर्ण है कि देवी देवताओं की स्वतन्त्र सत्ता है और जो उनमें से जिसकी आराधना करता है वे उसके साथ पक्षपात करते हैं, मनोकामना पूरी करते हैं। इस आधार पर किये ध्यान बाल बुद्धि के परिचायक हैं।

शरीराभ्यास के वशीभूत होना ही माया ग्रस्तता है। मृत्यु को भूल जाना ही अज्ञान है। शरीर में प्रति मनुष्य के सीमित कर्त्तव्य हैं। मनुष्य जन्म की सार्थकता इसी में है कि आत्म-सत्ता को ईश्वर का अविनाशी अंश माने और पूर्णता प्राप्ति के लिए जिन कर्त्तव्यों और दायित्वों का निर्वाह आवश्यक है, उसमें प्रमाद न बरतें।

ध्यानयोग में आत्म सत्ता के स्वरूप, कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व पर चित्त को केन्द्रीभूत करना है। यह सुयोग्य भगवान का सबसे बड़ा अनुग्रह है। इसका सही उपयोग इतना ही है कि अपनी अपूर्णताओं से निपटते हुए पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचें। इसी मानवी काया में देवत्व को उभरने दें। दूसरा उद्देश्य है भगवान के इस विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुरम्य और समुन्नत बनाने के लिए वर्तमान परिस्थितियों में जो संभव है उसे कार्यान्वित करने में चूक न करें।

हठयोग की प्रक्रिया में षट्चक्र, पंचकोश, कुण्डलिनी, तीन नाड़ियों आदि का ध्यान किया जाता है और इन शक्ति संस्थानों के अंतर्गत जो अतीन्द्रिय क्षमताएँ विद्यमान हैं उसे जागृत करने एवं सशक्त बनाने का प्रयत्न किया जाता है। किन्तु अन्ततः इन उपलब्धियों का प्रयोजन संसार क्षेत्र में अपनी विभूति विशेषता प्रकट करना है। इन सिद्धि साधनाओं में आत्मश्लाघा प्रदर्शित करने के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं सधता। अस्तु प्रज्ञावान साधक खेल-खिड़वाड़ों में अपना समय नष्ट नहीं करते एकाग्रता सम्पादन का उद्देश्य पहले पूरा करते हैं।

चित्त वृत्तियाँ साँसारिक ऐषणाओं में भ्रमण करती रहती हैं। उन्हें वासना, तृष्णा और अहन्ता के रसास्वादन की ललक सताती रहती है। मृग तृष्णा की भाँति उन्हें इसी व्यामोह में भटकते जीवन बीत जाता है। अस्तु योगाभ्यास में इन चित्तवृत्तियों के निरोध की आवश्यकता पूरी की जाती है। संसार की ललक लिप्साओं से मन समेटकर आत्म ज्योति में चेतना को केन्द्रीभूत किया जाता है। यह प्रक्रिया सम्पन्न की जा रही है और उसमें सफलता भी मिल रही है, ऐसा ध्यान जब भी अवसर अवकाश मिले, तभी करना चाहिए।

तरह−तरह के दृश्यों की कल्पना करना और उनका मूर्तिमान देखने के लिए प्रयत्न करना, बाल−बुद्धि का यही प्रयास चलते देखा गया है। योग के नाम पर इसी कौतुक कौतूहल में लोग मन बहलाते रहते है। प्रज्ञावानों को अपने स्तर के अनुरूप उच्चस्तरीय ध्यान धारणा का अवलम्बन करना चाहिए। ध्यानयोग की सफलता इसी आधार पर सम्भव हो जाती है।

तरह−तरह के दृश्यों की कल्पना करना और उनका मूर्तिमान देखने के लिए प्रयत्न करना, बाल−बुद्धि का यही प्रयास चलते देखा गया है। योग के नाम पर इसी कौतुक कौतूहल में लोग मन बहलाते रहते हैं। प्रज्ञावानों को अपने स्तर के अनुरूप उच्चस्तरीय ध्यान धारणा का अवलम्बन करना चाहिए। ध्यानयोग की सफलता इसी आधार पर सम्भव हो जाती है।




मनोनिग्रह ऋद्धि-सिद्धियों का भाण्डागार - Akhandjyoti February 1985

जिस प्रकार मन का वाहन उपकरण शरीर है। उसी प्रकार चेतना का वाहन मन। मन को जो कुछ कराना होता है अपनी इच्छाएं शरीर द्वारा पूरी करता है। चेतना की रुझान या आकाँक्षा को कार्यान्वित करने का ताना−बाना मन के द्वारा बुना जाता है। जड़ शरीर और चेतन आत्मा का मध्यवर्ती कार्यवाहक मन है।

मन की शक्ति असाधारण मानी गई है। व्यक्तित्व के उत्थान पतन का वही निमित्त कारण है। गुण, कर्म, स्वभाव उसी के प्रयासों की परिणति है। भव−बन्धनों में उसी की ललक लिप्साएँ बाँधती हैं और हथकड़ी बेड़ियाँ उसी के संकल्प से कटती हैं। वह चाहता है तो जीवन रहते मुक्त होकर रहता है। अपूर्णता को घटाते−घटाते पूर्णता की स्थिति तक पहुँचा देता है। आत्मा का प्रतिनिधि जो ठहरा है। सर्व साधन सम्पन्न वह है। शरीर राज्य का राजा तो है वही इससे बाहर संसार को प्रभावित करने, उसमें बिखरे साधन बटोर लेने की क्षमता भी उसमें है। उसी का चिन्तन सीधा उलटा होकर सुख−दुःख की भूमिका बनाता है। उत्थान और पतन का अधिष्ठाता निश्चित रूप से वही है।

निजी जीवन की लगाम जिस भी दिशा विशेष में मोड़नी पड़े, उसमें मन का पुरुषार्थ ही काम देता है। प्रतीत भर यह होता है कि शरीर को इन्द्रियों या आदतों ने जकड़ रखा है। पर बात वैसी है नहीं, आदतों को मन अपनाता है, उसी की परतों में वे अपना घोंसला बनाती है और छिपकर बैठी रहती हैं। कामनाओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। मन चाहे तो उन्हें चाहे जब उधेड़कर फेंक सकता है। मकड़ी अपने मुँह में से लार निकाल कर जीलर बुनती है। फिर जब उसकी मौज आती है तभी उस जाले की गोली बनाना और निगलना शुरू कर देती है। देखते−देखते वह ताना बना समाप्त होने और खेल खतम होने की स्थिति बन जाती है। निजी जीवन को जिन गुण, कर्म, स्वभावों को विनिर्मित, सुदृढ़ करना हो अथवा हटाना, मिटाना, हो उनके लिए मन की संकल्पशक्ति पूर्णतया समर्थ रहती है। आरम्भ में ही शरीर पुराने अभ्यासों को छोड़ने में थोड़ा अनख दिखाता है पर सर्वथा अवज्ञा करने की सामर्थ्य उसमें है नहीं। ऐड़ लगाने और चाबुक फटकारने भर से वह सीधा हो जाता है और जिस भी राह पर चलाना हो− चलने लगता है।

मन बदलने भर की देर है कि निकृष्ट को श्रेष्ठ और श्रेष्ठ को निकृष्ट बनते देर नहीं लगती। नहुष, ययाति, विश्वामित्र जैसों को कामुकता ने घर दबोचा और विल्व मंगल अम्बपाली जैसों को उस कीचड़ से एक छलाँग मार कर ऊपर उबरने में देर नहीं लगी। बाल्मीकि अंगुलिमाल और अजामिल जैसों ने अपना पूर्व इतिहास इस प्रकार बदल दिया मानों वे उस रास्ते पर पहले कभी चले ही नहीं। इन्द्र और चन्द्र इतने उच्च पद पर आसीन होते हुए भी गौतम शाप से अपनी दुर्गति कराते फिरे और सर्वत्र निन्दा के भाजन बने। वह और कुछ नहीं मन रूपी बाजीगर की कलाबाजी मात्र है। वह किसी को भी पशु−पिशाच या देवता की पंक्ति में बिठा सकता है।

जिन्हें आत्म साधना अभीष्ट है उन्हें मन देवता की मनुहार करनी पड़ती है। वही गुरुओं का गुरु है। बाहर वालों के दिये हुए उपदेश इस कान सुनकर उस कान निकल जाते हैं। पर यदि किसी तथ्य को हृदयंगम कर ले तो वह पत्थर की लकीर बन जाते हैं।

यह अन्तरंग जीवन की बात हुई। बहिरंग जीवन पर दृष्टिपात करने से भी यही प्रतीत होता है कि परिस्थितियां बदल देने में उसी को श्रेय है। लिंकन और वाशिंगटन जिन परिस्थितियों में−जिस परिवार में उत्पन्न हुए थे, उसी हवा में बहते रहते तो अनगढ़ श्रमिक जैसी जिन्दगी जी रहे होते। गाँधी, बुद्ध जैसे महामानव घर परिवार की जन्मजात परिस्थितियों ने इतने ऊँचे नहीं उठाते थे। हरिश्चंद्र, अशोक, हर्षवर्धन जैसों का कुछ से कुछ हो जाना और किसी का वरदान या पराक्रम नहीं था। यह चमत्कार उनके बदले हुए मन ने ही कर दिखाया। कालिदास और वरदराज जैसों को मूर्धन्य विद्वान बनाने में उनकी बदली हुई अन्तरंग उमंगों ने ही असाधारण भूमिका निभाई। रक्त माँस की दृष्टि से सभी मनुष्य लगभग एक जैसी स्थिति के हैं, पर एक का आसमान पर चढ़ जाना और दूसरे का खाई के गर्त में गिरना यह सब कुछ मन द्वारा अपनाई गतिविधियों के ऊपर निर्भर है।

मन की शक्ति अपार है। चेतना को−आत्मा को सर्वशक्तिमान का अविनाशी अंश माना जाता है, पर उसके कौशल का परिचय मन के माध्यम से ही मिला है। योगीजन मन को साधने की साधना में ही निरत रहते हैं। इसी एक प्रयोजन के लिए वे विभिन्न विधि−विधान अपनाते हैं। जिसे जितनी सफलता मिल जाती है वह उसी स्तर का चमत्कारी सिद्ध पुरुष बन जाता है। ऋद्धि−सिद्धियों का उद्गम और कार्यक्षेत्र मानोलोक में ही सीमित और विस्तृत है। यह उक्ति अक्षरशः सत्य है कि जिसने मन जीता उसने संसार को जीत लिया।” जिसके हाथ में अपना मन है उसके हाथ में संसार का समस्त वैभव सिमट कर एकत्रित होता है।

मन की निग्रहित करने का असाधारण महत्व माहात्म्य बताया है और साथ ही उस प्रयोजन की सिद्धि के लिए अनेकानेक विधि−विधान बताये हैं। इन सबमें सर्वसुलभ इन्द्रिय जप है। मन को वायु वेग जैसा चंचल कहा गया है। उसकी यह घुड़दौड़ वासना, तृष्णा और अहन्ता के क्षेत्र में ही लगती रहती है। उसे रसों की अनुभूति इन्हीं में लगती है। इनमें से सर्वप्रथम वासना की बारी आती है। तृष्णा और अहन्ता इससे थोड़े ऊँचे स्तर पर आती हैं। यह इन तीनों से ही मन सकोड़ लिया जाय तो उस एकाग्रता की सिद्धि में देर न लगेगी जिसके आधार पर आत्म जप का लाभ मिलता है और साथ ही अभीष्ट प्रयोजन के लिए प्रबलतम पुरुषार्थ बन पड़ता है। बिखराव को समेट लेना ही चेतना क्षेत्र का प्रबलतम पुरुषार्थ है। मन उपरोक्त तीन लिप्साओं में ही घुड़दौड़ लगाता रहता है। इन्हीं में उसे रस प्रतीत होता है। यदि इन केन्द्रों के रसानुभूति को समेट लिया जाय तो समझना चाहिए किसी मनोनिग्रह की सिद्धि हस्तगत हो गई। और मनुष्य आध्यात्मिक पुरुषार्थों में से किसी को भी कर गुजरने की स्थिति में पहुँच गया।

साधना क्षेत्र के विद्यार्थियों को सर्वप्रथम इन्द्रिय जप का अभ्यास करना चाहिए। ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं और उनके अपने−अपने रस हैं। सामान्य स्तर के व्यक्ति इन्हीं में लटकते रहते हैं पीछे तृष्णा, अहन्ता की कल्पनाशील अभिलाषा जागृत होती और मनुष्य को कठपुतली की तरह नचाती है।

इन्द्रियों में प्रथम है- रसना। जीभ का रस चिन्तन को सर्वप्रथम और सर्वाधिक प्रभावित करता है। यह जन्मजात सहचर है। दूसरा रस कामुकता का है इसके लिए यौवन के उभार तक की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। वयोवृद्ध होने पर वह असमर्थता के कारण अनायास ही समाप्त भी हो जाती है, किन्तु रसना की स्वाद लिप्सा ऐसी है जो जन्म से लेकर मरण पर्यन्त साथ रहती है। अर्थ और अनर्थ उसी के द्वारा सबसे अधिक होते हैं। स्वाद के वशीभूत होकर लोग अभक्ष्य भक्षण करते हैं और आवश्यकता से अधिक मात्रा में उदरस्थ करते रहते हैं। इसका प्रतिफल पाचन तन्त्र की खराबी के रूप में हाथोंहाथ सामने आता है। अपच से उत्पन्न सड़न ही अनेक स्तर के विष उत्पन्न करती और अनेक नाम रूप के रोगों के उत्पन्न करने का विभिन्न कारण बनती है। यह कुटेब यदि बनी रहे तो चिकित्सा के हेतु किये गये सभी उपचार व्यर्थ होते हैं। औषधियाँ अपने क्षणिक चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती है। स्वाद के कुचक्र में जकड़ा हुआ मनुष्य पकवान, मिष्ठान जैसे अनेक आहार ढूँढ़ता और निकालता रहता है। स्वाद के कारण अधिक मात्रा में खाया हुआ तथा चिकनाई, मिठाई, नमक, मसाले आदि के कारण दुष्पाच्य बना हुआ आहार धीरे−धीरे पाचन तन्त्र को अशक्त ही नहीं विषाक्त भी बना देता है। फलतः स्थिर आरोग्य का सूत्र ही हाथ से चला जाता है और मनुष्य दुर्बलता रुग्णता का आयेदिन शिकार रहते हुए अकाल मृत्यु का ग्रास बनता है। ऐसे लोग निरोग जीवन का आनन्द ले ही नहीं पाते और रोते−कलपते ज्यों−त्यों करके आधी−अधूरी जिन्दगी में ही दिन काट कर बिस्तर बाँधकर काल के गाल में चले जाते हैं।

रसना का अन्य इन्द्रियों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह बिगड़ती है तो शेष चार को भी बिगाड़ लेती है। इनमें से अगला कदम जननेन्द्रिय लिप्सा का आता है। चटोरा व्यक्ति कामुक प्रवृत्तियों का गुलाम हुए बिना रहता नहीं। अध्यात्म साधना में ब्रह्मचर्य का बहुत महत्व बताया गया है उसे तेजस् का भण्डार कहा गया है। मनोबल उसी पर निर्भर रहता है। ओजस् तेजस् और वर्चस् जन्य विभूतियों का तादात्म्य ब्रह्मचर्य के साथ रहता है। यदि वह क्षीण होता रहे तो मनुष्य आत्मबल गँवा देगा। सामान्य बुद्धिबल तक घट जाता है फिर प्रज्ञा और मेधा का तो कहना ही क्या है? जो आत्मोत्कर्ष की आधारशिला मानी गई है। जो स्वाद को नहीं जीत सकता। उसके लिए ब्रह्मचर्य साधन असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य है।

शरीर का आधार पाचन तन्त्र है और आत्मा का वर्चस्व ब्रह्मचर्य पर निर्भर है। दोनों को एक−दूसरे से जुड़ा हुआ समझा जाना चाहिए। जो स्वाद नहीं जीत सका उससे ब्रह्मचर्य निभेगा नहीं, ब्रह्मवर्चस् गँवाकर ऐसा व्यक्ति उच्चस्तरीय विभूतियों से वंचित होकर ही रहेगा। (क्रमशः)




महावीर साधना में लीन (kahani) - Akhandjyoti February 1985

तीर्थंकर महावीर साधना में लीन थे। पास ही मैदान में एक ग्वाला अपने बैल चरा रहा था। उसे किसी आवश्यक कार्य से गाँव में जाना था। उसने सोचा पास में बाबा बैठे हैं, यह बीच−बीच में बैल देख लिया करेंगे तब तक मैं घर से लौट ही आऊँगा।

महावीर ध्यानस्थ थे। बैल चरते−चरते दूर निकल गये। ग्वाला लौट कर आया तो महावीर पर बहुत नाराज हुआ। वह समझा कि यह कोई चोर है और इसी की हरकत से बैल कहीं चले गये हैं। वह महावीर को ताड़ना देने लगा। रस्सी के एक टुकड़े से सपासप उनकी पिटाई शुरू कर दी। उनके शरीर पर इस निर्मम प्रहार के कई निशान पड़ गये।

देवराज इन्द्र से ग्वाला की यह ताड़ना न देखी गई उन्होंने तीर्थंकर से आकर प्रार्थना की भगवन्! यह ग्वाला अज्ञानी है, आपके अलौकिक माहात्म्य से पूरी तरह अनभिज्ञ है। मेरी इच्छा सदैव आपके साथ रहने की है ताकि आने वाले कष्टों का निवारण करता रहूँ। आप मुझे सतत् सेवा में उपस्थित रहने की आज्ञा दीजिये।

महावीर ने जो उत्तर दिया वह जैन साहित्य की अमूल्य निधि है और निराश व्यक्तियों को सैंकड़ों वर्षों से प्रेरणा देता रहा है−

“स्ववीर्येणैव गच्छन्ति जिनेन्द्रा परमाँ गतिम्।”

किसी दूसरे के सहारे रहकर अथवा दूसरे के पुरुषार्थ के भरोसे बैठकर आज तक कोई आत्मा बोधि लाभ प्राप्त नहीं कर सकी। अपने पुरुषार्थ से ही अपना निर्माण किया जा सकता है। अपने भाग्य को बनाने वाला कोई दूसरा नहीं वरन् उसका पुरुषार्थ ही होता है। अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए पुरुषार्थ का स्थान ही सर्वोपरि है।




बीज जैसी जीवन की तीन गतियाँ - Akhandjyoti February 1985

बीज की तीन गति हैं− जमीन में गढ़े− गलकर उगे ओर पौधा बने, पौधे के बाद वृक्ष बने। वृक्ष पर फल लगें और उनसे अनेक बीज निकले और वंश परम्परा चलायें इसे बहादुरी कहते हैं।

दूसरी गति यह है कि किसी गृहस्थ के हाथ पड़े, पिसकर आटा बने। आटे की रोटी बने। उसे कोई खाये और अन्त में उसके मल के रूप में परिणति हो। यह विवशता की गति है।

तीसरी गति है−कृपणता की। दाना अपने आपको सब झंझटों से बचाकर कहीं लुका छिपा रहे और कीड़े−मकोड़ों की खुराक बनकर सड़ गल जाय।

मनुष्य जीवन की भी तीन गति हैं। वह जिसमें पुण्य परमार्थ के निमित्त अपने को लगाया जाय। ऐसे काम में अपने पराक्रम पुरुषार्थ को− सत्ता को अस्तित्व को खपाया जाय, जिससे इस समय तो अपनी सत्ता किसी श्रेष्ठ काम में खपा दी जाय पर उस पराक्रम का प्रतिफल ऐसा मिले जिससे लोक मंगल के उपयोगी कार्य बनें। पीछे की एक परम्परा बने। अनेक लोग स्मरण किया करे।

दूसरी गति विवशता में अपने को किसी के हवाले होने दिया जाय। सामर्थ्य और वीरता के अभाव में अपने को बचाया भी नहीं जा सकता। कोई न कोई पकड़ ही लेता है। पकड़ने वाला अपना स्वार्थ सिद्ध करता है। भावना के अभाव में हर किसी की यही गति होती है। जो कमजोर हैं उन्हें किसी न किसी के चंगुल में फँसना पड़ता है। इसके उपरान्त मल के रूप में उनकी दुर्गति होती है। कोई उनकी चर्चा नहीं करता।

तीसरी गति मनुष्य जीवन की संकुचित स्वार्थियों की है। कायरों और कृपणों की है। वे अपने आपको छिपाते बचाते रहते हैं। छिपते लुकते रहते हैं। किसी के काम नहीं आते। किसी के चंगुल में नहीं फँसते। चाहते हैं कि कोई उनसे किसी के काम में आने की न कहे। कहे तो अपने को छिपा लें। ऐसे लोग सड़ते घुनते हैं। किसी के काम नहीं आते। बचते लुकते रहने पर भी अन्ततः किसी न किसी के कुचक्र में फँसते ही हैं। कीड़े−मकोड़े उन्हें खाने लगते हैं और ऐसी धूलि बन जाते हैं जिसे झाड़−बुहार कर कुड़े−करकट के ढेर में फेंक दिया जाता है।

हर किसी का जीवन इन तीन में से एक गति का भागीदार होता है।

पुण्यात्मा लोग बीज बनकर अपने को गलाते हैं। अंकुर के रूप में फूटते और पौधों के रूप में हरियाली से खेत की शोभा बढ़ाते हैं। कितने ही लोग उनके बढ़ने की आशा लगाये रहते हैं। खाद पानी देते हैं। रखवाली करते हैं और जीव पेड़ के रूप में बड़े बनकर फलते फूलते हैं तो अपनी तथा लगाने वाले की कीर्ति बढ़ाते हैं। जो छाया में बैठते हैं सो प्रसन्न। जो फल खाते हैं सो प्रमुदित। फलों में से बीज निकलते हैं और वह एक बीज जो गला था, उसकी वंशवृद्धि होती चली जाती है। एक के स्थान पर सैंकड़ों बीज उत्पन्न होते हैं और वंश परम्परा को हर साल बढ़ाते रहते हैं। सराहनीय जीवन यही है।

आलसी, अकर्मण्य, भावना रहित लोग भी प्रकृति क्रम के अनुसार किसी न किसी के चंगुल में फंसेंगे ही। कोई न कोई उनसे अपना स्वार्थ सिद्ध करेगा ही और अन्त में मल के रूप में किसी निरर्थक स्थान पर फेंक देंगे। वे दुर्गन्ध बनकर अपने भाग्य को कोसते रहेंगे।

सबसे अभागे वे हैं जो अपनी जान बचाते रहते हैं पर वह भी बचती नहीं। कीड़े मकोड़ों की खुराक बनाकर हर दृष्टि से निरर्थक बन जाते हैं। ऐसा जीवन हर दृष्टि से निन्दनीय और निरर्थक ही है।




Quotation - Akhandjyoti February 1985

विजेता आतंक जमाता है। ज्ञानी का हम आदर करते हैं। लेकिन उदार हमारा अन्तःकरण छूता है।




गुह्य योग साधनाओं का पात्रता सम्बन्धी अनुशासन - Akhandjyoti February 1985

योग विधा को गुह्य रखने की परम्परा है। सामान्य बुद्धि से विचार करने पर यह अनुचित लगता है कि किसी अच्छी बात को सर्व साधारण से छिपाकर रखा जाय। अच्छी बात को जितने अधिक लोग जानें उतना ही अच्छा। सामान्य बुद्धि इसी बात का प्रतिपादन करके ही छिपाने वाले निर्देशन की भर्त्सना करेगी।

तथ्य तक पहुँचने के लिए महत्वपूर्ण बातों को जानने के लिए तद्नुरूप पात्रता होने की बात समझनी चाहिए। अस्त्र−शस्त्र छोटे बच्चे के हाथ में नहीं दिये जाते क्योंकि भय रहता है कि वे बुद्धि विकास के अभाव में उसका अनुचित उपयोग कर सकते हैं और अपने लिए तथा दूसरों के लिए संकट खड़ा कर सकते हैं। तिजोरी में क्या है इसे बच्चों को नहीं बताया जाता। जमीन में धन गाढ़ना हो तो भी बच्चों को हटा देते हैं। वे कौतूहल वश दूसरों को बता सकते हैं और घर का भेद अनुपयुक्त लोगों तक पहुँच जाने पर चोरी−डकैती का संकट खड़ा हो सकता है। चूहे या खटमल मारने की दवाएँ बच्चों की पहुँच से बाहर रखी जाती है। खेल-खेल में ही वे उसे खा जायें तो लेने के देने पड़ सकते हैं। इस प्रकार के छिपाव में अनुचित कुछ नहीं है। मात्र सावधानी का− पात्रता का ध्यान रखने भर का भाव है।

योग का आरम्भिक शिक्षण चिन्तन और चरित्र की उत्कृष्टता सिखाने से होता है। राजयोग का पूर्वार्ध यम, नियम, और आसन प्राणायाम हैं, अर्थात् शारीरिक, मानसिक पवित्रता− परिपक्वता। वह स्थिति पूरी होने पर अगले चार चरणों को सीखने की बारी आती है। प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि का अभ्यास इसके आदत करना पड़ता है। छोटी कक्षाओं के बालक, वर्णमाला, मात्रा−स्वर, व्यंजन, गिनती, पहाड़े आदि याद करते हैं। इसके बाद उन्हें सरल स्तर का पढ़ना−लिखना तथा जोड़, घटाना, गुणा, भाग स्तर का गणित पढ़ाया जाता है। प्रगति का एक निर्धारित क्रम है। अंकगणित, रेखागणित, बीज गणित आदि की जानकारियाँ कई कक्षाएं उत्तीर्ण कर लेने के उपरान्त कराई जाती हैं। आरम्भिक कक्षा का विद्यार्थी उन्हें सीखने का आग्रह करे तो अध्यापक हँस भर देते हैं। समय आने पर बताने की बात कहकर टाल देते हैं। बच्चा रूठे तो भी उसकी परवाह नहीं करते। जो बात जिस स्थिति में उपयुक्त नहीं उसमें वह कर गुजरने की हठ करें तो उसे पूरा नहीं किया जाता। पाँच वर्ष का बालक पड़ौस में ब्याह शादी होते देखकर अपने विवाह की हठ करे तो माता−पिता उसकी बात पर कहाँ ध्यान देते हैं। योग की उच्चस्तरीय अतीन्द्रिय क्षमताओं से सम्बन्धित योग पक्ष के सम्बन्ध में भी यही बात है।

आध्यात्मिक प्रगति चरित्र निर्माण से आरम्भ होती है। यह आरम्भिक बाल कक्षाएँ सबके लिए खुली हुई हैं। उससे ऊँची कक्षाओं में प्रवेश करने की पात्रता बढ़ती है। मेडिकल या इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश करने की परीक्षा से पूर्व पात्रता नापने की टैस्ट परीक्षाएँ होती हैं। यदि उसे उत्तीर्ण न कर पाये तो दाखिला नहीं मिलता। इस प्रतिबन्ध के पीछे कोई दुर्भाव छिपा हुआ नहीं है। एक कक्षा के बाद दूसरी तीसरी चौथी आदि कक्षाओं में प्रवेश पाने की सुनियोजित व्यवस्था का समावेश भर है। इसे कोई दुराव ठहराये या विद्यार्थियों के साथ अनीति, पक्षपात करने जैसा दोष लगाये तो वह आक्षेप मान्य नहीं हो सकता।

चरित्र निष्ठा अपने आप में एक योगाभ्यास है। उसके आधार पर मनुष्य अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करता है और उतने भर से भी अपना व्यक्तित्व विकसित करके संसार क्षेत्र में भी बड़े उत्तरदायित्वों को वहन करता है, बड़ी सफलताएँ प्राप्त करता है। संसार में जितने भी महामानव हुए हैं−उन सभी को अपने से छोटे, बराबर वालों और बड़ों के बीच अपनी चरित्रनिष्ठा को प्रामाणित करना पड़ा है और इस आधार पर उनका विश्वास अर्जित करना पड़ा है। इसके पश्चात उन्हें बड़े उत्तरदायित्व सम्भालने के लिए कहा गया है। ऐसा कहीं नहीं हुआ कि अनजानों को ऐसे ही शासनाध्यक्ष या कोषाध्यक्ष या सेना पति बना दिया गया। ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों के लिए प्रामाणिकता का सबूत प्रस्तुत करना पड़ता है। अतीन्द्रिय क्षमताएँ कमाने में उतनी कठिनाई नहीं है जितनी कि सम्भालने में। इस क्रम का व्यतिक्रम करने में हानि ही हानि है, लाभ नहीं।

योग की दो दिशा धाराएँ हैं। एक में विचार परिष्कार, चरित्र शोधन, संयम साधन, पुण्य परमार्थ जैसी ज्ञान वैराग्य की साधना करनी पड़ती है। यह भक्त सन्तों का, सन्त सज्जनों का मार्ग है। इस आधार पर जो शक्ति प्राप्त होती है। वह आत्म−कल्याण तथा जन−कल्याण दोनों ही प्रयोजनों के काम आती है। गाँधी, तिलक, सुभाष, नेहरू, पटेल, विनोबा आदि की साधनाएं ऐसी ही थीं। उन्हें भी एक प्रकार के योग साधक ही कह सकते हैं। यह मार्ग सबके लिये खुला है। इसकी शिक्षा किसी भी श्रेष्ठ सज्जन के परामर्श से किसी को भी उपलब्ध हो सकती है। स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन मनन से भी यह शालीनता का मार्ग किसी को भी सहज सुलभ हो सकता है। उच्चस्तरीय व्यक्तियों के क्रिया कलाप में सम्मिलित रहने से भी उस प्रकार की उत्कृष्टता, आदर्शवादिता हस्तगत हो सकती है। ऐसे लोग जब चमत्कार तो नहीं दिखाते और न वरदान आशीर्वाद देते हैं पर ऐसे योगियों की तुलना में अपना और अन्यान्यों का−समाज और समय का जो हित साधन करते हैं, वह किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं होता।

अतीन्द्रिय क्षमताएँ जागृत करके असामान्य स्तर के चमत्कार दिखाना सम्भव होता है। इसके लिए हठयोग की−तन्त्र योग की साधनाएँ करनी पड़ती हैं। उनके लिए मनोबल को असाधारण स्थिति तक पहुँचाने के लिए असाधारण स्तर की ऐसी साधनाएँ करनी पड़ती हैं, जिनमें निर्धारित विधि विधान में तनिक भी भूल नहीं होनी चाहिए। भूल करने पर साधक को क्षति उठानी पड़ सकती है। कई बार तो वह क्षति इतनी बड़ी होती है कि प्राण संकट जैसा व्यवधान सामने आ खड़ा होता है उनको साधने के लिए कठोर अनुशासन के निर्वाह की साहसिकता चाहिए। विधि−विधान पर अटूट श्रद्धा और तन्मयता चाहिए। बीच में मन उचट जाने, श्रद्धा डगमगा जाने में साधना खण्डित हो जाने का डर रहता है। खण्डित साधना साधक के लिए विपत्ति खड़ी करती है। उन हानि को न केवल व्यक्ति विशेष सहन करता है वरन् परिवार का सन्तुलन भी बिगड़ जाता है। दूसरों के बीच निंदा होती है। अपनी, साधना की, गुरु की, सभी की निन्दा होती है।

चमत्कारी सिद्धियाँ दिखाने को मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, प्राण प्रहार, मारण, मोहन, उच्चारण, वशीकरण जैसी करामातें हाथ आ जाने पर घटिया स्तर के लोग उनका कौतुक कौतूहल प्रदर्शित किये बिना रुक नहीं सकते। इससे अनेक पात्र कुपात्र लाभ उठाने के लिए पीछे लगते हैं। किसी की मनोकामना पूरी न की जा सके तो वे ही फिर शत्रु बन जाते हैं और जैसे बन पड़े वैसे क्षति पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं। काम कर दिया जाय तो अनेकों से चर्चा करते हैं। इस आधार पर फिर पात्र−कुपात्रों की भीड़ लगने लगती है और निन्दकों प्रशंसकों का एक निरर्थक हज्जूम पीछे लग जाता है। इनका काम कर देने में भी अनर्थ और न करने में भी अनर्थ। कौतुक दिखाने वाले सिद्ध पुरुष अपनी कष्ट उपार्जित साधना का एकाकी बाजीगर स्तर के खेल तमाशे में नष्ट करके स्वयं छूँछ बन जाते हैं। संचित भण्डार समाप्त हो जाने पर करामात दिखाने की क्षमता भी समाप्त हो जाती है।

ऐसे लोग कई बार अपने स्वार्थ साधन के लिए उन करामातों का उपयोग करने लगते हैं और नीति−अनीति का अन्तर भूल जाते हैं। कर्मफल से कोई नहीं बच सकता। सिद्ध करामाती भी नहीं। लाभवश ऐसे कुकृत्य करने लगने पर चरित्र की सम्पदा शेष नहीं रहती है और वे गये बीते लोगों के स्तर पर जा पहुँचते और अधोगामी बनते हैं। इन खबरों को देखते हुए सत्पात्र की परीक्षा किये बिना चमत्कारी सिद्ध साधनाओं के सम्बन्ध में उन्हें गुह्य रखने का ही अनुशासन है। सत्पात्र साधक मिले तो ही उन्हें सिखाये जाने का निर्देशन है।




भक्त का स्तर एवं भगवान की मनुहार - Akhandjyoti February 1985

भगवान के दर्शन की इच्छा, हमारे पुराणों, कथा वाचक किंवदंतियों, जन श्रुतियों ने इस कदर फैला और फुला दी है कि उससे हर स्तर के धार्मिक व्यक्ति को इसी की लगन लगी रहती है। पूजा−पाठ का, जप ध्यान का, तीर्थ यात्रा का जो भी क्रिया−कृत्य चलता है उसके पीछे प्रथम उद्देश्य मनोकामनाओं की पूर्ति और दूसरे भगवान की दर्शन झाँकी का मन होता है। ऐसा होना सम्भव है। ऐसा हम आये दिन सुनते आ रहे हैं। यह सब इतना अधिक कहा और सुना गया है कि इस प्रतिपादन के सम्भव या असम्भव होने तक यह कभी विचार नहीं उठता। इन सम्भावनाओं पर तर्क और विवेक का उपयोग करने तक की इच्छा नहीं होती। इस संदर्भ में जनमानस सम्मोहन ग्रस्त जैसा हो गया है। किसी असत्य को सत्य जैसी मान्यता मिले यह बड़े दुर्भाग्य की बात है।

कर्मफल का सिद्धांत सही और सर्वमान्य है। इसी मान्यता से प्रेरित प्रभावित होकर लोग सत्कर्म करते और दुष्कर्मों से यथा सम्भव बचते हैं। पुरुषार्थ भी संसार में इसीलिए जीवित है कि उसके द्वारा क्षमता सम्पदा और सफलता की उपलब्धि को विश्वस्त माना जाता है। कभी अपवाद आते हैं तो भी उसका समाधान इस प्रकार कर लिया जाता है कि कोई कर्मफल आगे पीछे के व्यतिक्रम में उलझ गया होगा। देर हो रही होगी, अन्धेर नहीं होना है।

मानवी नीति निष्ठा और अनुशासन परायण को स्थिर रखने और विश्व व्यवस्था न बिगड़ने देने की दृष्टि से यह मान्यता सर्वथा उचित एवं आवश्यक है। इसमें व्यतिरेक उत्पन्न करना लगभग नास्तिकता को अपना लेने जैसा है। कर्मफल नहीं मिलता। न बुरे को बुरा न अच्छे का अच्छा। संसार में ऐसे ही अँधेर चल रहा है। जो बलिष्ठ और आक्रान्ता है सफलताएँ उसी को मिलने वाली हैं। इस प्रकार के चिन्तन ने असुरता को बढ़ावा दिया है और पाप अनाचार की बाढ़ आई है। अस्तु “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाला सिद्धान्त विचारशील समाज द्वारा अमान्य और निन्दनीय ठहराया गया है। संसार में कर्म के प्रतिफल की मान्यता जीवित ही रहनी चाहिए।

इसी मान्यता का सहोदर भाई एक और है। वह यह कि देवी देवताओं की हलकी−फुलकी पूजा−पत्री कर देने से उन्हें प्रसन्न किया जा सकता है और वह मनोरथ चुटकी बजाते पूरा हो सकता है जिसके लिए योग्यता बढ़ाने, साधन जुटाने, कष्ट साध्य परिश्रम एवं देर तक प्रतीक्षा करने की आवश्यकता पड़ती है। पूजा से प्रसन्न करके देवताओं से मनमाने वरदान पाने का सिद्धांत बड़ा विचित्र है। यह एक तो कर्मफल के सर्वमान्य सिद्धान्त को काटता है और दूसरे देवी−देवताओं की गरिमा गिराता है। वे तनिक−सी पूजा पत्री पर उतने प्रसन्न और उदार क्यों हो जाते हैं। भक्तजनों की योग्यता, पात्रता की ओर से आंखें क्यों बन्दर लेते हैं? औचित्य और न्याय की देखभाल उनके यहाँ क्यों नहीं होती?

देवताओं के पास कुछ और भी काम है या इसी एक झंझट में उलझे रहते हैं कि किसने कितनी पूजा की और उसका मनचाहा वरदान हाथों हाथ भेजा गया या नहीं? देवता एक−माँगने वाले भक्त लाखों करोड़ों। सबका हिसाब निपटाना उन बेचारों के लिए कितना बड़ा सिर दर्द होगा। सम्भव है कभी सोचते हों कि ऐसी देवतागिरी से क्या लाभ मिला? जरा-सी प्रशंसा की शब्दावली सुनने और दो चार पैसे के निरर्थक सामान की पूजा भेंट पाकर उनका क्या काम चला?

फिर देवता एक नहीं उनकी पूरी फौज है। पुराण प्रसिद्ध देवता भी तैंतीस कोटि हैं। फिर अपने−अपने वंश, कुल, क्षेत्र के अलग−अलग इन सबकी आजीविका इन पूजा करने वाले भक्तों से ही चलती है। तभी वे वरदान देंगे। कोई भूल जाता है या उपेक्षा करता है तो उसके घर वालों में से किसी को विशेषतया बच्चों को बीमार कर देने और जब मुआवज़ा पूरा मिल जाय तब शान्त होने का कृत्य ऐसा है जो साधारण श्रेणी के लोगों के लिए भी अशोभनीय है।

व्रत कथाओं देवी−देवताओं की कथा गाथाओं में जब यही सब आये दिन सुनने को मिलता है, तो अपने ऊपर, देवताओं के ऊपर पूजा पत्री की बाजीगरी का ऐसा न समझ में आने वाला माहात्म्य सुनते हैं तो विवेकशीलता विद्रोह कर उठती है। बेचारी भावुकता की तो कोई कहे क्या? उसे तो झुनझुना देकर भी चुपाया, हँसाया, बहकाया जा सकता है।

इसी के साथ−साथ लगे हाथों भगवान जी के दर्शनों का प्रसंग चलता है। भक्त से भगवान प्रसन्न हुए कि नहीं। इसकी एक पहचान यह है कि वे भक्त के घर दर्शन देने के लिए दौड़े−दौड़े आये कि नहीं। आने पर ही तो−‘‘वर माँग−वर माँग की रट लगावेंगे और भक्त जब लौकिक पारलौकिक सारी कामनाओं की लिस्ट उनके हाथ में थमा देगा तो वे तथास्तु का अभ्यस्त उच्चारण करके अंतर्ध्यान हो चलेंगे।’’

यहाँ विचारणीय बातें कई हैं। भगवान की छवियाँ प्रतिमाएँ अपने हिन्दू धर्म में ही हजारों तरह की हैं। संसार भर के सभी धर्मों के भगवान की छवियों का लेखा−जोखा लिया जाय तो उन सबके आकार−प्रकारों का एक पूरा अजायब घर की बन जाता है। हर मान्यता वाले का अलग भगवान रहा। जिस भक्त ने दर्शन की आकाँक्षा की है उसके लिए उसी रूप में उन्हें आना पड़ेगा। नहीं तो जिस प्रकार तुलसीदास जी कृष्ण की प्रतिमा को देखकर विदक गये थे, वैसी ही गड़बड़ी हर जगह होने लगेगी। भक्त की इच्छा के अनुरूप वेश विन्यास बनाकर भगवान को दर्शन देने की तैयारी करनी पड़ेगी। एक घण्टे में हजारों भक्तों को निपटाना पड़ेगा। ऐसी हालत में लोक−लोकान्तरों में कोटि−कोटि प्रकार के जीव जन्तुओं की व्यवस्था बनाने के लिए समय कहाँ से मिलेगा। भक्त की याचना और भगवान का उसे दर्शन देने के लिए दौड़ पड़ना, इस एक काम को ही वे निपटा सकें तो बहुत समझना चाहिए। विश्व−व्यवस्था के लिए शायद उनने दूसरे मुनीम गुमाश्ते रखे हों।

भक्त और भगवान को दो रास्ते आपस में बाँधे हुए हैं एक मनोकामना की पूर्ति−दूसरा दर्शन देने के लिए भगवान का पधारना। इस सम्बन्ध में भगवान ही घाटे में रहे। अपना घर छोड़कर दौड़ते हुए भक्त के घर भी उन्हीं को आना पड़ा और बिना किसी कर्म, पुरुषार्थ की, औचित्य और पात्रता की देखभाल किये। मनोकामना भी उन्हीं को तत्काल पूरी करनी पड़ी। नफे में तो भक्त ही रहा।

भगवान सम्बन्धी प्रचलित मान्यताओं के सम्बन्ध में हममें से हर एक को विचार करना चाहिए, और सोचना चाहिए कि क्या वे सही हैं? यदि सही हैं तो भक्त और भगवान का स्तर क्या रह गया?

पात्रता अर्जित करने के लिए अपने व्यक्तित्व को निखारना, इसके लिए संयम की कठोर आग में अपने आपको तपाना फिर क्यों किसी के मन भावेगा। वास्तविक झंझट भावुक किंवदंतियों और तथ्यान्वेषी विचारशीलता का है। जो विवेकवान हैं, वे सही रास्ता ही अपनाते हैं।




सन्त मंसूर (kahani) - Akhandjyoti February 1985

सन्त मंसूर एक दिन साथियों समेत किसी पथरीले रास्ते से गुजर रहे थे कि पैर में ठोकर लगी और उँगली टूटने से खून बहने लगा। उन्होंने पट्टी बाँधी और अल्लाह को इस इनायत के लिए धन्यवाद दिया।

साथियों ने पूछा− मुसीबत आने पर इनायत किस बात की? मंसूर ने कहा− ‘‘अल्लाह वन्दे की सिर्फ भलाई ही कहता है। हमारे कर्मफल से कोई बड़ा अनिष्ट होने वाला होगा उसे छोटी चोट के रूप में बदल कर अल्लाह ने इनायत ही तो की है।”

सही चिंतन से मनुष्य मुसीबतों के बीच भी प्रसन्नता के आधार ढूँढ़ सकता है।




प्रकृति का अनुसरण कीड़े मकोड़ों जैसा आचरण नहीं - Akhandjyoti February 1985

आधुनिक दर्शन के पक्ष में दो दलीलें असंख्य मुखों से सुनी जाती हैं कि बड़ी मछली छोटी को निगल जाती है। बड़ा पेट छोटे की खुराक खींचकर खा जाता है। प्रकृति का यही नियम है। इसी को पालन करने में भलाई है। अन्यथा दुर्बल और कमजोर इस जमीन को घेर लेंगे और असंख्यों समस्याएँ उत्पन्न करेंगे। “जीवन के लिए संघर्ष” और “योग्यतम का चुनाव”, यही हैं दो बीज मन्त्र जिनकी व्याख्या विवेचना करते हुए आधुनिक संस्कृति की रूपरेखा खड़ी की गई है।

प्रकृति का अर्थ पशु पक्षी कीड़े−मकोड़े तक ही सीमित हो तब बात दूसरी है। अन्यथा प्रकृति के नियमों का अनुसरण करते समय मनुष्य की विशेषताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। इन विशेषताओं को अध्यात्म विज्ञान के अनुरूप “आत्मा” कहा जा सकता है और उसकी मौलिक संरचना तथा प्रेरणा को भी कहीं जगह देनी होगी। किन्तु यदि प्रकृति का अर्थ वहाँ तक ले जाना हो, जहाँ मनुष्य को चलने−फिरने वाला पौधा अथवा दो पैर वाला जानवर मानना हो तो ऋतु प्रकृति पर उन्हीं नियमों को लागू करना होगा जो बन्दर की औलाद पर लागू होते हैं।

यदि आधुनिक दर्शन ‘आत्मा’ से इन्कार करके प्रकृति के प्राणियों पर लागू होने वाले नियमों को ही सब कुछ मानने लगे तो भी प्रकृति का सुविस्तृत पर्यवेक्षण करना होगा। उसके नियमों में से अपने मतलब के जो हों उन्हीं को सब कुछ मान बैठने से अन्यान्यों को छोड़ देने से दर्शन शास्त्र की मर्यादा न निभ सकेगी। प्रकृति में अरबों−खरबों प्राणी रहते हैं। उनकी गतिविधियाँ बहुमुखी हैं। उनमें से बड़ी मछली द्वारा छोटी को खाया जाना और बड़े पेट द्वारा छोटे की खुराक अपहरण कर लिया जाना यह दो उदाहरण ही पर्याप्त न होंगे। यह उदाहरण भी सर्वांगपूर्ण नहीं हैं। यह भी आधे−अधूरे हैं। इन दो को समग्र कहना हो तो यों कहना पड़ेगा कि जीव−जन्तु अपने सजातीय बच्चों को ही खा जाते हैं। यदि ऐसा हुआ होता तो अभिभावकों द्वारा बच्चों के पालन पोषण की परम्परा ही समाप्त हो गई होती। मछलियों के कोई बच्चे दिखाई न पड़ते। उनकी माताएँ ही उन्हें खा-पीकर साफ कर दिया करती यदि सारी प्रकृति मछली तक ही सीमित नहीं है, अन्य प्राणी भी उसमें शामिल हैं, तो मादाओं द्वारा अपने बच्चों का पालन−पोषण किस आधार पर चल रहा है? सिंह जैसे खूंखार जानवर तक अपने बच्चों को पालते हैं। यद्यपि वे उनकी तुलना में कमजोर भी होते हैं, माँस आदि में हिस्सा भी बँटाते हैं।

प्रकृति का एक छोटा नियम ऐसा अवश्य है जिसमें हिंस्र पशु क्षुधा निवृत्ति के लिए छोटे प्राणियों को खा जाते हैं। पर वे भी अपने सजातियों को नहीं खाते। मछली अपवाद है, सो भी आँशिक रूप से अन्यथा मछलियाँ ही अपने अण्डे बच्चों का सफाया कर दिया करतीं। पेड़ों के बगीचे कहीं दिखाई न पड़ते। कोई पेड़ एकाकी भले ही खड़ा होता। पास उगने वाले पेड़ों को जब बड़े खा ही जाया करते हों तो बगीचे कैसे बनते? झाड़ियाँ कैसे सघन होतीं?

प्रकृति का नियम सहयोग भी है। दया और सेवा भी। दुर्बलों को सबल बनाने के लिए सहायता करना भी। अन्यथा किसी मादा के थनों से दूध कहाँ से आता और क्यों आता? मादाएँ अपने बच्चों को साथ क्यों लगाए फिरतीं?

डार्विन प्रभृति प्रत्यक्षवादियों ने मनुष्य की सत्ता और उसकी प्रकृति का स्वरूप निर्धारित करने में जीव जगत की परम्पराओं को आधार माना है। प्राणी किस प्रकार बने, बढ़े और सशक्त हुए, इसका इतिहास खोजते−खोजते वे उसी परम्परा को अपनाना मनुष्य के हित में मान बैठे हैं। इसी आधार पर उनने भावी मनुष्य समाज का ढाँचा खड़ा किया है। इसी को वे समय के अनुरूप सही दर्शन मानते हैं। इस संदर्भ में नीत्से आदि विचारकों का कथन है कि मनुष्यों का कमजोर वर्ग बना रहने पर सशक्त वर्ग की क्षमता क्षीण होगी। इसलिए उन्हें पालने की अपेक्षा समाप्त कर देने में ही लाभ है। पशुओं के बूढ़े और बेकार होने पर, वे उनका वध कर देने की प्रथा का समर्थन करते हैं। गौशाला, अनाथालय, अपंग सेवा सदन, भिक्षुक गृह, रुग्ण आश्रम जैसे संस्थान चलाने का परिणाम वे यह बताते हैं कि इससे समर्थ लोगों के फलने फूलने में बाधा पड़ेगी। फलतः दुनिया वैसी सुन्दर और सशक्त न बन सकेगी जैसी फलतः दुनिया वैसी सुन्दर और सशक्त न बन सकेगी जैसी कि वह बनती। नाज़ीवाद में अनेक तर्कों का आश्रय लेकर उन्होंने युद्ध की आवश्यकता पर जोर दिया है और उसे उपयोगी ठहराया है। साथ ही उनने जर्मन जाति की श्रेष्ठता का पक्ष लिया है और कहा कि विश्व शासन उन्हीं के हाथ में रहना चाहिए। अन्य कमजोर जातियों को युद्ध के बहने समाप्त कर देना चाहिए। यह दर्शन जर्मन जाति को उन्मत्त स्थिति तक पहुँचाकर उन्हें युद्ध के लिए आकुल करता रहा है। वे अपने समुदाय को विकसित करने के लिए समीपवर्ती क्षेत्रों को खाली रखने और वहाँ की साधन सामग्री अपने लोगों तक सीमित सुरक्षित रखने पर जोर देते रहे हैं।

यह एकाँगी चिन्तन न केवल अधूरा वरन् अनुपयुक्त भी सिद्ध होता जा रहा है। इसमें दोनों पक्ष के लोगों की ही अधिक हानि हुई है। वे ही मरते या घायल होते रहे हैं। उनके आश्रितों की संख्या बढ़ने से फिर दुर्बल वर्ग बढ़ गया जिसे कि वे समाप्त करना चाहते थे। इससे तो तैमूरलंग आदि को कत्लेआम पद्धति अधिक तर्क संगत थी, जिसमें मजबूत आदमी गुलामों के रूप में पकड़कर आश्रित बना लिए जाते थे और कमजोरों को काटते मारते चले जाते थे। आधुनिक दर्शन शास्त्र ने अब तक तो प्रतिपादन एवं तर्क और उदाहरण दिये हैं वे हर दृष्टि से हलके पड़ते हैं।

अब तक जीवन के लिए संघर्ष का तात्पर्य यह निकाला जाता रहा है कि पड़ौसी के मुँह का ग्रास छीन लिया जाय। जबकि यह होना चाहिए कि प्रकृति के साथ लड़−झगड़ कर उसके अंचल में भरी हुई विपुल सम्पदा में से अधिक उपलब्ध किया जा। अमेरिका अब से दो सो वर्ष पूर्व सूना पड़ा था। वहाँ जो लोग योरोप से जा−जाकर बसे, उनने जीवन के लिए संघर्ष किया और प्रकृति के अन्तराल में भरी हुई विपुल सम्पदा का दोहन किया। और देखते−देखते सुसम्पन्न हो गये।

प्रकृति में समर्थ व्यक्ति नेतृत्व के लिए चुने जाते हैं। वे अपने साथ अनेकों को लेकर चलते हैं। जो कार्य वे अपने बुद्धि बल और बाहुबल से नहीं कर सकते थे उसे करते हुए वातावरण को समुन्नत बनाकर करते हैं। यह सर्वोत्तम के चयन का सिद्धान्त है। टाटा ने साधन रहित होते हुए भी अपने बुद्धि कौशल से लोहे का विशाल कारखाना खड़ा कर दिया। उसमें लाखों श्रमिकों को आजीविका मिली और साथ ही देश की महती आवश्यकताओं की पूर्ति हुई। हर मनुष्य यदि बुद्धिपूर्वक काम कर सके तो अपने निर्वाह के अतिरिक्त समाज के लिए कुछ न कुछ प्रगति में सहायता कर सकता है। इस वैयक्तिक क्षमता को किस प्रकार सही तरीके से काम में लाया जाय यही निर्धारण कर सकने वाले के सम्बन्ध में नेतृत्व की क्षमता सम्पन्न होने से उन्हें सराहा जाता है। इसके अर्थ यह कभी नहीं हैं कि पड़ौसियों को मार−काट कर खतम किया जाय और सर्वत्र अपने ही अपने को अधिपति घोषित किया जाय।

प्रकृति से शिक्षा ग्रहण करके उसके आदर्शों पर चलने के लिए बड़ी मछली द्वारा छोटी को खा जाने का एक ही उदाहरण नहीं है। प्रकृति की ओर वापस लौटने का तात्पर्य रहन−सहन में सादगी का समावेश करना है। न कि संचित सभ्यता तो तिलाञ्जलि दे बैठना। पशु और कीड़े ही हमारे शिक्षक हैं तो शिक्षा के झंझट का परित्याग करना होगा। भाई बहिन के रिश्तों को तिलाञ्जलि देनी होगी। आग का उपयोग बन्द करना होगा। सौंदर्य और कला का परित्याग करना होगा, क्योंकि मनुष्य के अतिरिक्त और कोई भी प्राणी इन विशेषताओं का अभ्यस्त नहीं है। मनुष्य की अपनी विशेष संरचना है। उससे अन्य प्राणियों का हित साधन होना चाहिए न कि नीति और व्यवस्था के सम्बन्ध में मनुष्य निम्न कोटि के जीव जन्तुओं से वह सीखे जिससे उसकी गरिमा का सर्वनाश होता है।




दुनिया के दर्पण में अपना ही चेहरा दिख पड़ता है। - Akhandjyoti February 1985

एक राजा ने ऐसा महल बनवाया जिसमें छोटे-छोटे अनेकों दर्पण जड़े हुए थे। राजा उसमें प्रवेश करता तो उसे चारों दिशाओं में तथा छत पर अपनी ही अनेकानेक छवियाँ दिखाई देतीं। वह अपने जैसे इस समुदाय को देखकर बहुत प्रसन्न होता।

एक दिन गलती से एक कुत्ता उसमें बन्द हो गया। उसे बहुत से कुत्ते दिखाई पड़े। अपने घर में इतने शत्रुओं को घुसा हुआ देखा कर वह आग बबूला हो गया। भौंकने लगा। अब दर्पण वाले भी सभी कुत्ते भौंकने लगे। महल से प्रतिध्वनि की आवाज उठने लगी और हर ओर से कुत्ते दाँत निकालकर आक्रमणों की मुद्रा में दिखने लगे। कुत्ता उनके साथ लड़ने, मरने पर आमादा हो गया। जिधर देखता उधर दुश्मन ही नजर आते। दिन भर उनसे लड़ता रहा और अन्ततः उन सबके साथ अकेला लड़ते−लड़ते लहूलुहान होकर मर गया।

दूसरे दिन सफाई के लिये महल खुला तो वह कुत्ता मरा पड़ा निकला उसने दीवारों में जड़े कई काँच भी तोड़ डालते थे। कुत्ते को देखकर सभी उपस्थित जनों की समझ में आ गया कि इसका कारण क्या हो सकता है। दर्पणों में उसने अपने प्रतिद्वन्द्वी देखे और उन्हें परास्त करने के आवेश में अपनी जान गँवा बैठा।

यह संसार एक दर्पण है। इसमें जितने ही मनुष्य हैं वे अपनी ही जैसे दिखाई पड़ते हैं। यदि सब वैसे न हों तो भी इतनी बात सर्वथा सच है कि अपनी प्रकृति के लोग ही कहीं न कहीं से आकार अपने मित्र सम्बन्धी बन जाते हैं और एक अच्छा−खासा गिरोह बन जाता है। चोर, जुआरी, ठग, जेबकट, डाकू, शराबी अपनी प्रकृति के लोगों को ढूँढ़ लेते हैं और अन्ततः उनका भी अपने ढंग का गिरोह बन जाता है। हर प्रकृति में अपना एक अनोखा आकर्षण होता है। वह चुम्बक ही तरह अपनी बिरादरी वालों को समीप बुला लेता है या उनके पास जा पहुँचता है। हिरन कबूतर ही नहीं मनुष्य भी अपनी बिरादरी के साथ रहना पसन्द करते हैं। बिरादरी से मतलब यहाँ स्वभाव या प्रकृति से है।

एक व्यक्ति फोटोग्राफर से अपना फोटो खिंचवाकर लाया वह बहुत सुन्दर था। उसे देखकर एक दूसरे व्यक्ति ने भी अपना वैसा ही फोटो बनवाने की इच्छा की। फोटो ग्राफर ने उसका भी खींच दिया। पर वह उसकी आकृति के अनुरूप कुरूप था। इस पर वह फोटोग्राफर से लड़ने मरने को तैयार हो गया। दूसरे का इतना सुन्दर और मेरा इतना कुरूप? इसके पीछे द्वेष या पक्षपात किया गया है। फोटोग्राफर वस्तुस्थिति समझाने की बहुत कोशिश करता रहा पर वह मानने को तैयार न होता था। झगड़ा बढ़ गया और हाथापाई होने लगी तब पड़ौसी इकट्ठे हो गये और वाकया सुनकर खिंचवाने वाले की ही गलती बताने लगे और कहने लगे कि वस्तुस्थिति जानो, तुम्हारा चेहरा ही कुरूप है तो फोटो सुन्दर कैसे बन सकता है?

अपना स्वभाव और दृष्टिकोण जैसा भी होता है। सम्बन्धित लोगों में वही दोष दिखाई पड़ते हैं। बुरी प्रकृति दूसरों को मालूम पड़ती है जबकि होती अपनी है और उनके व्यक्तित्व में दर्पण की तरह परिलक्षित भर होती है।

धूप में चलने पर एक काली कलूटी छाया कभी आगे, कभी पीछे चलती है। इस चुड़ैल के हर घड़ी साथ लगे रहने पर काया ने बहुत बुरा माना और भगाने का प्रयत्न किया। गालियाँ दीं और डण्डे लगाये पर वह दूर हटने को तैयार ही नहीं हुई। समझदारों ने झंझट का शरण पूछा और मालूम होने पर बहुत हँसे। उनने कहा− ‘‘हम लोग थोड़ी देर में भगा देंगे।” दोपहर को बाहर बजे सूरज जब ठीक सिर पर आ गया तब उसे बुलाया और कहा− देखें! वह चुड़ैल कहाँ है? वह पैरों तले पहुँच गई थी। इसलिए कहीं भी दिखाई नहीं पड़ती थी। उसे खुश देखकर लोगों ने इतना और समझा दिया कि धूप में चलोगे तो छाया साथ रहेगी ही।

सन्तों की−सज्जनों की−सेवा भावियों की दोस्ती अपने जैसे लोगों से हो जाती है। आवश्यकता नहीं कि वे एक ही गाँव या इलाके के हों। दूर−दूर के रहने वाले होने पर भी एक दूसरे का परिचय कहीं न कहीं से प्राप्त कर लेते हैं और उनके बीच मेल−जोल का सिलसिला चल पड़ता है और अन्ततः वे घनिष्ठ बन जाते हैं। चोर डाकुओं के गिरोह बनते रहते हैं। इसका कारण एक ही है कि हर मनुष्य की अपनी प्रकृति होती है। उसे साथियों की आवश्यकता पड़ती है। चुम्बक लोहे के टुकड़ों को खींचकर अपने पास जमा कर लेती है। मनुष्य भी अपनी−अपनी प्रकृति के अनुरूप मण्डलियाँ बना लेते हैं, और उनके मिले−जुले प्रयास चमत्कार दिखाने लगते हैं। यदि मनुष्य अपनी प्रकृति बदल डाले और नई रीति−रीति अपनाले, तो पुराने सभी मित्र धीरे−धीरे छिन्न−भिन्न हो जायेंगे और नई परिवर्तित प्रकृति के अनुरूप जमघट बढ़ने लगेगा।

एक बच्चा पिता के साथ नदी तट पर गया। हवा चल रही थी और लहरें उठ रही थीं। हर लहर पर एक अलग सूरज चमक रहा था। बच्चे ने पिता से पूछा ये आकाश में सूरज एक ही बड़ा है। पर हर लहरों पर तो सैकड़ों हजारों की संख्या में दिख रहा है और आकार में छोटी भी है। पिता ने समझाया कि अवकाश वाला सूरज तो एक ही है। लहरों पर तो उसके प्रतिबिम्ब भर चमक रहे हैं।

इस संसार में जन समुदाय नदी की लहरों की तरह है। उनके अपने−अपने गुण स्वभाव हैं। पर उनकी वहीं विशेषताएँ उभर कर हमारे सामने आती हैं, जिन्हें हम ढूँढ़ते हैं। सज्जनों के साथ आमतौर से दूसरे लोग भी सज्जनता का व्यवहार करते हैं। इसके विरुद्ध क्रोधी लोगों का हर किसी से झगड़ा होता रहता है। बाजार में अनेकों दुकानें होती हैं। पर उनमें पहुँचते वहीं लोग हैं जिन्हें जिस चीज की जरूरत होती है। जिसे मिठाई खरीदनी है वह लोहे की दुकान पर जाकर व्यर्थ हैरान होगा और निराश वापस लौटेगा।

कुंए में नीचे मुँह करके या गुम्बज में ऊँचा मुँह करके जोर से जो कुछ भी बोला जाय, उलटकर उन्हीं शब्दों की प्रतिध्वनि सुनाई पड़ेगी। संसार की बनावट भी ऐसी है। अपनी प्रकृति और आदतें ही लोगों के साथ संपर्क साधने पर अपनी उसी प्रकार की प्रतिक्रिया लेकर वापस लौटती है। गेंद को जिस ऐंगिल पर मारा जाया सामने वाली दीवार से टकराकर वह उसी तेजी से उसी एंगल पर वापस लौटती है।

यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि लोगों में अपनी−अपनी भली−बुरी विशेषताएँ हैं ही नहीं। वे तो होती हैं और बनी भी रहेंगी पर प्रश्न यह है कि हमारे साथ किनका कैसा व्यवहार हो। हम यदि चाहते हैं कि दूसरे हमसे सज्जनता बरतें तो सर्वप्रथम हमें अपने व्यवहार में शालीनता का समावेश करना चाहिए। देखा जाय कि सामने वाला कुछ भी क्यों न हो हमारे साथ सज्जनता का ही व्यवहार करेगा। आमतौर से यही होता है। यों इसके प्रतिकूल व्यवहार भी होता है पर उसे अपवाद ही कहना चाहिए जो कभी-कभी होता है।

सयानी लड़कियों के साथ गुण्डागर्दी, छेड़छाड़, आवाजकशी प्रायः तभी होती है जब उनने बेतुका श्रृंगार बना रखा हो। कपड़े, बेशऊर ढंग से पहने हों। तो उस फूहड़ सज्जा को देखकर चरित्र का ढीलापन, मनचलापन उजागर होता है और छेेड़खानी की हिम्मत पड़ती है। सादा जीवन उच्च विचार का आदर्श अपनाकर रहा जाय तो फैली हुई गुण्डागर्दी सहज ही बहुत घट सकती है। इस संसार में जो भी कुछ है, प्रतिक्रिया स्वरूप ही है, इस तथ्य को हमेशा मानकर चलना चाहिए।




Quotation - Akhandjyoti February 1985

ईश्वर पाने का उपाय पूछने पर जीसस ने कहा− ‘अपने आपको खोकर ही उसे पाया जा सकता है।’

बर्तन खाली होने पर ही उसमें कीमती वस्तु भरी जा सकती है जब तक स्वार्थ भरी अहंता की कीचड़ से मन भरा है तब तक उसमें ईश्वर का दर्शन और निवास सम्भव नहीं।




काम विज्ञान का आध्यात्मिक स्वरूप - Akhandjyoti February 1985

उल्लास और उत्साह मनःक्षेत्र की अति शक्तिशाली क्षमताएँ हैं। उन्हें मृत संजीवनी सुधा कह सकते हैं। सूखे, मुरझाये, टूटे, हारे, निराश व्यक्ति में नव जीवन का संचार करने की इनमें क्षमता है। इसलिए जीवन की जिन चार महती आवश्यकताओं की गणना की जाती है, उनमें इसी को प्राथमिक दी गई है। जीवन के परम लाभ चार हैं− धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। इनमें काम प्रथम है। काम का सीधा सादा−सा अर्थ हैं− प्रसन्नता, प्रफुल्लता उमंग और आशा की झलक−छलक। यह जिन माध्यमों से सम्भव हो सके उन्हें काम कहा जा सकता है। काम अर्थात् क्रीड़ा−विनोद। कला की समूची व्याख्या इतने में ही सीमित की जा सकती है।

कई बार दो परस्पर विरोधी तथ्य भी एक जैसे दिख पड़ते हैं। कई बार असली का भ्रम नकली उत्पन्न कर देता है। कई बार छद्म पाखण्ड धर्म जैसा प्रतीत होता है। ऐसा ही एक दुर्दैव काम के साथ भी जुड़ गया है। काम वासना−कामुकता, वासना, अश्लीलता, यौनाचार जैसे प्रसंग जब “काम’ शब्द के साथ जुड़ते हैं तो अर्थ का अनर्थ उत्पन्न करते हैं।

कामाचार विशुद्ध रूप से एक प्रजा उत्पादन प्रक्रिया है। इसकी ओर मन ले जाने वाले विचारशील को हजारों बातें सामने रखनी होती हैं। क्या नर−मादा दोनों की शारीरिक, मानसिक स्थिति ऐसी है जिसके संयोजन से ऐसे नये प्राणी की उत्पत्ति हो सके जो अपने लिए ही नहीं−समूचे समाज के लिए वरदान बन सके। जिनके शरीर दुर्बल रुग्ण हैं, जो मन से खिन्न−विपन्न रहते हैं, उनके वे दोष निश्चित रूप से सामने आवेंगे। फिर यह भी देखना है कि जिस वातावरण में उसका भरण पोषण होगा उसमें स्नेह, सहयोग, दुलार एवं सुसंस्कार भरे हैं या नहीं। नवजात शिशु को खेलने−कूदने के लिए जगह है या नहीं। कहीं सारे दिन एकाकी उदास तो नहीं बैठा रहेगा। उसे घृणा, तिरस्कार, अवज्ञा, उपेक्षा का मानसिक त्रास तो नहीं सहना पड़ेगा। बच्चे को सही पोषण बड़े आदमी से सस्ता नहीं महंगा ही पड़ता है। फिर उसे विनोद खेलकूद भी चाहिए। साथी भी, खिलौने भी जो उसके खाली समय में साथ रह सके। इसके अतिरिक्त आज कल उपयुक्त शिक्षा के लिए स्थान तलाश करना और उसका खर्च वहन करना भी एक आवश्यकता है। जो इतना प्रबन्ध कर सके, वे ही संतानोत्पादन की बात सोचें। अन्यथा पिता, माता, परिवार और समूचे समाज को उस मूर्खता का अभिशाप जैसा दण्ड भुगतना पड़ेगा। अनगढ़, सन्तान को जन्म देना प्रत्यक्ष पाप है जिसका दण्ड हाथों हाथ उस प्रसंग से सम्बन्धित हर व्यक्ति को सहन करना पड़ता है।

जननी का शारीरिक और मानसिक विकास उचित आयु तक पहुँच चुका होना चाहिए। इसके लिए न्यूनतम आयु बीस वर्ष मानी गई है। फिर हर सन्तान के बीच अन्तर न्यूनतम पाँच वर्ष का होना चाहिए ताकि पहले बच्चे की माता पर से निर्भरता छूट जाय और वह ठीक तरह दूसरे पर ध्यान दे सके। इससे कम समय में उस क्षति की पूर्ति भी नहीं होती। जो प्रथम शिशु का शरीर बनाने, प्रसव पीड़ा सहने, दूध पिलाने, पूरी नींद न ले पाने, आदि के कारण जननी को सहन करना पड़ा है।

फिर आजकल देश की बढ़ती हुई जनसंख्या एक विकट समस्या बनती जा रही है। जिस अनुपात से बच्चे जन्मते हैं उतनी निर्वाह सामग्री पैदा नहीं होती। फलतः भुखमरी, तंगी, गरीबी, अशिक्षा, दुर्बलता आदि का भार हर नये पुराने नागरिक पर बढ़ता है। इस अनर्थ के भागी वे बनते हैं जो बिना सोचे विचारे सन्तान उत्पन्न करने में लगे रहते हैं। काम कौतुक का स्वाद राई भर और उसका दण्ड दुष्परिणाम पहाड़ भर, जो इसका विचार नहीं कर सकते। उन्हें नर पामर ही कहना चाहिए।

सृष्टि में कुछ ऐसे प्राणी भी हैं जो घासपात की तरह दूसरों की भूख बुझाने के लिए उत्पन्न होते हैं। कीड़े−मकोड़े इसी श्रेणी में आते हैं। उनके ढेरों अंडे बच्चे होते हैं। उनमें से अधिकाँश प्रकृति प्रकोप के शिकार हो जाते हैं। कुछ ही उनसे बचे प्राणी खा पीकर निपटा देते हैं। इस पर भी जो बचे रहते हैं, उनके लिए प्रकृति ठिकाने लगाने वाले बहाने ढूँढ़ निकालती है। कुछ भूखे मर जाते हैं। कुछ पैरों तले कुचल जाते हैं। कुछ को बीमारियाँ खा जाती हैं, कुछ आवेशग्रस्त होकर आत्महत्या के लिए दौड़ पड़ते हैं। इन उद्भिजों और कीट−पतंगों में अपनी गणना करानी हो और उत्पादन को ऐसी ही दयनीय दुर्दशा में धकेलना हो तो फिर यौनाचार की छूट है। कोई कुछ भी कर सकता है और अपने कृत्यों के फल भुगतता रह सकता है। किन्तु जिन तक मानवोचित्त कर्त्तव्य उत्तरदायित्वों की कोई किरण पहुँची हो, उन्हें इस गम्भीर कार्य में हाथ डालने से पूर्व हजार बार सोचना चाहिए। कृत्य के उपरान्त उत्पन्न होने वाली समस्याओं पर विचार करना चाहिए और विवेक स्वीकृति प्रदान करे तो ही कदम बढ़ाना चाहिए।

जिन पशु पक्षियों की समझदार प्राणियों में गणना होती है, उनकी मादाएँ अपनी प्रजनन क्षमता के अनुरूप उत्तेजना प्रकट करती हैं। इसी आधार पर नर उनसे संभोग साधते हैं। इसके बिना कोई मादा से छेड़खानी नहीं करता। गाय, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़ी, गधी और सभी पशु नर मादाओं के रूप में रहते और चरते हैं। नर कभी किसी मादा को अपनी ओर से नहीं छेड़ता। मादा की प्रजनन क्षमता जब उभरती है तब उसी संकेत पर यौनाचार बनता है। मनुष्य को इतना विवेक तो होना ही चाहिए कि इस सम्बन्ध में विशुद्ध रूप से नारी की स्थिति को समझे। अपनी ओर से कोई प्रलोभन या दबाव न डाले। इस आधार पर पाँच या कम से कम तीन वर्ष बाद ही उस ओर ध्यान देने की आवश्यकता पड़ेगी। विवाह का अर्थ यौनाचार की उच्छृंखल छूट मिलना नहीं है वरन् एक परिवार को मिल−जुलकर समुन्नत बनाना, दो जीवनों को पारस्परिक सहयोग हर्षोल्लास से भर देना है।

जो इस विवेक प्रेरणा की अवज्ञा करते हैं और अमर्यादित काम सेवन करते हैं, उन पुरुषों को एक प्रकार से नर भक्षी ही कहा जा सकता है। इससे साथी को धीमी आत्मा−हत्या करने के लिए विवश किया जाता है। नारी जननेन्द्रियाँ संरचना इतनी कोमल है कि वे प्रजनन कृत्य आवश्यक हो जाने पर एक दो बार का नर संपर्क सहन कर सके। अमर्यादा बरतने पर वे कोमल अंग कई तरह के रोगों के शिकार हो जाते हैं। उनसे पीछा छुड़ाना कठिन होता है। प्रजनन अपने आप में एक बहुत बड़ा आपरेशन है। उसमें ढेरों रक्त जाता है। बच्चे के शरीर जितना माँस जननी की देह में से ही भरता है। इसके बाद भी दूध पिलाने के रूप में उस क्षति का सिल−सिला चलता ही रहता है। हजार प्रसवों पीछे 13 प्रसूताओं की जान तो बच्चा जनते समय ही चली जाती है। सब मिला कर अन्त तक अनेकों दबाव जननी को सहने पड़ते हैं। इनके लिए बाधित करना किसी भी प्रकार मित्र धर्म नहीं है। नर भक्षी भेड़िये मनुष्यों या दूसरे जानवरों को खाते हैं। अपनी मण्डली के सदस्यों की चमड़ी नहीं उधेड़ते। पर एक मनुष्य है जो पत्नी पर प्रेम प्रकट करते हुए वस्तुतः उसका जीवन रस ही चूस लेता है। उसे रुग्णता, दुर्बलता का त्रास सहते हुए समय से बहुत पहले मर जाने लिए बाधित करता है। अपनी स्वार्थ सिद्धि भी इतनी कि क्षण भर की लोलुप उत्तेजना का समाधान हो।

जिस वर्ग के नरों में कामुक लोलुपता की मात्रा अधिक पाई जाती हैं, वे साथी का अनर्थ करते हुए अपने लिए भी कम संकट खड़ा नहीं करते। शास्त्रकार ने ठीक ही कहा हैं− ‘‘मरणं बिन्दुपातेन, जीवनं बिन्दु धारणात्” अर्थात् वीर्यनाश से मरण और और उसके संरक्षण में जीवन है। इसके उदाहरण में हनुमान, भीष्म, शंकराचार्य, दयानन्द आदि अनेकों के नाम गिनाये जा सकते हैं जो शारीरिक और आत्मिक दृष्टि से अपनी बलिष्ठता सिद्ध कर सके। असुरों के उदाहरण इस सम्बन्ध में स्मरण किए जा सकते हैं जिन्होंने कई−कई विवाह किए व बुरी मृत्यु को प्राप्त हुए।

कई थलचरों और जलचरों की बढ़ी हुई कामुकता किस प्रकार उनके लिए प्राण घातक बनती है, उसके उदाहरण प्रत्यक्ष हैं। आश्विन के महीने में कुत्ते आपस में किस प्रकार लड़ते−भिड़ते, घायल होते और सड़ते हैं। यह कौतुक हर साल देखा जा सकता है। हिरनों की भी यही दुर्गति होती है। उनके ऋतुकाल में यही मल्लयुद्ध ठनते हैं। परस्पर सींगों से घायल होकर कितने ही भारी कष्ट सहते हैं। मकड़ी ही खुद अपने नर को हाथोंहाथ मजा चखा देती है। मकड़े को प्रसंग के उपरान्त थका हुआ पाती है तो स्वयं ही उसको कतर व्यौंत कर डालती है। बिच्छू को भी काम प्रसंग के उपरांत ऐसी ही त्रास सहना पड़ता है। कोई−कोई ही उस संकट से अपनी जान बचा पाता है।

मछलियों में अधिकाँश नर सज्जन प्रकृति के होते हैं। मादा की पूरी−पूरी सहायता करते हैं और प्रजनन काल में उन्हें अधिक से अधिक सुविधा पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं। पर कुछ ऐसे दुष्ट भी होते हैं, जिन्हें हरम इकट्ठा किये बिना चैन नहीं। फाग फिश अपने घेरे में प्रायः एक दर्जन युवा मछलियाँ समेटे रहता है और उनके साथ क्रीड़ा कल्लोल का मजा लूटता है। साथ ही यह भी होता रहता है कि उसके प्रतिद्वन्द्वी उसके हरम पर धावा बोलकर कुछ को झपट ले जाय। दूसरी ओर उस मण्डलाधीश को भी चैन नहीं। वह जितनी हैं उनसे सन्तुष्ट न रहकर नई नवेलियाँ तलाश करता है और किसी दूसरे के हरम पर छापा मारता है। इस कारण उनमें मल्लयुद्ध ठन जाता है। हर साल उनमें से इसी महाभारत में खेत आते है। मछलियाँ भी नरों से शिक्षा प्राप्त करती हैं और किसी एक के चंगुल में बहुत दिन न रहकर जल्दी−जल्दी ससुराल बदलती और पुनर्विवाह रचती रहती हैं। इस कारण असन्तुष्ट मछलियाँ भी आपस में लड़ बैठती हैं। इस वर्ग के नर मादा चैन से नहीं बैठते। विशेषतया ऋतु काल में तो उनमें खून खच्चर मचता ही रहता है। जबकि दूसरी सन्तोषी प्रकृति के जल जीव लम्बे समय तक पतिव्रत निबाहते हैं और सहयोग और आनन्द भरा जीवन जीते हैं।

गरुड़ मादा यह खोजती रहती है कि उससे बलिष्ठ साक्षी है या नहीं। इस प्रयोजन के लिए ताक झाँक करने वाले से सर्वप्रथम वह मल्लयुद्ध की चुनौती देती है। युद्ध में दोनों पक्ष लहूलुहान हो जाते हैं। नर यदि भाग खड़ा हुआ तो उसे क्षमा कर दिया जाता है। अन्त तक डटा रहा तो अपने पौरुष के आधार पर स्वयंवर का लाभ उठाता है।

अध्यात्म विज्ञान के तन्त्र पक्ष में कुण्डलिनी योग की साधना का सुविस्तृत प्रकरण है। उसमें मूलाधार चक्र और सहस्रार चक्र को शक्ति केन्द्र माना गया है और दोनों को प्रखर प्रचण्ड बनाकर परस्पर सहयोग की स्थिति तक पहुँचा देना परम सिद्धि का आधार माना गया है। मूलाधार चक्र जननेन्द्रिय मूल में है और सहस्रार मस्तिष्क मध्य ब्रह्मरन्ध्र में। यही दोनों केन्द्र उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव है। वे हेय प्रयोजन में अपनी शक्ति गंवाते रहते हैं। इसलिए अपनी ऊर्जा एक−दूसरे तक नहीं पहुँचा पाते। बिजली के दोनों तार में शक्ति हो और मिले तो महाकाली जैसा प्रचण्ड उत्पन्न होता है। इसी आधार पर कुण्डलिनी जागृत होकर अनेकानेक चमत्कारी सिद्धियों का परिचय देती है। सहस्रार चक्र की ध्यान योग और मूलाधार चक्र को ब्रह्मचर्य द्वारा जागृत एवं प्रखर बनाया जाता है। यह साधना क्रम सुविस्तृत है, पर उसका सार संक्षेप इतने में ही समझना चाहिए कि आध्यात्मिक काम विज्ञान के सिद्धान्तों का समग्र परिपालन किया जाय। नर नारी साथ−साथ तो रहें, स्नेह और सहयोग भी करें, पर उसमें कामुकता के विष का प्रवेश न होने दें। बाँध में नदी का पानी रोक देने पर पानी का इतना एकत्रीकरण हो जाता है कि उसमें से अनेकों नहर निकल सकें और सुविस्तृत भूमि खण्डों को हरा−भरा फूला फला बनाया जा सके। पानी न रोका जाय तो वह बहता और घटता रहेगा और अन्त में गहरे समुद्र मैं गिरकर ऐसा खारा पानी बन जायेगा जो पीने के भी काम न आ सके।

नर और मादा का साथ−साथ समीप रहना, प्रकृतिगत स्वाभाविक स्थिति बनाये रहता है। यदि दोनों एक−दूसरे से बचे, भागे, डरे अथवा आक्रामक नीति अपनायें तो उसमें सृष्टा की उस कलाकारिता का अपमान है जो गंगा, यमुना की तरह मिलकर नई सरस्वती उत्पन्न करती है और सबके लिए सब प्रकार श्रेयस्कर परिणाम ही उत्पन्न करती हैं। खतरा तो रस में विष मिला देने से उत्पन्न होता है।




ज्ञान और विज्ञान एक दूसरे का अवलम्बन अपनाएँ - Akhandjyoti February 1985

ज्ञान और विज्ञान यह दोनों सहोदर भाई हैं। ज्ञान अर्थात् चेतना को मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन तथा चरित्र के लिए आस्थावान बनने तथा बनाने की प्रक्रिया। यदि ज्ञान का अभाव हो तो मनुष्य को भी अन्य प्राणियों की भाँति स्वार्थ परायण रहना होगा। उसकी गतिविधियाँ पेट की क्षुधा निवारण तथा मस्तिष्कीय खुजली के रूप में काम वासना का ताना−बाना बुनते रहने में ही नष्ट हो जायेगी। अन्यान्य सभी जीवधारी पेट और प्रजनन के सम्बन्ध में ही सोचते और इन्हीं दो कृत्यों में निरत रहते हैं। अकेला मनुष्य ही है जो जीवन का मूल्य और महत्व समझता है। वह आदर्शों के साथ जीने की बात सोचता है और इस निमित्त यदि कष्ट सहने पड़े तो भी प्रसन्नता पूर्वक सहन करता है। इस स्तर की मनोभूमि बनाने का कार्य ज्ञान है। इस शब्द से काम न चले तो उसे सद्ज्ञान कह सकते हैं।

ज्ञान का मोटा अर्थ जानकारी है। इस जानकारी की परिधि में वे सब बातें भी आती हैं जो वस्तु विनियोग से सम्बन्ध रखती हैं। कृषि, पशु−पालन, वास्तु, शिल्प आदि के जीवनयापन में काम आने वाली अनेकानेक गतिविधियाँ एवं वस्तुओं की जानकारी को भी यों ज्ञान शब्द की परिभाषा में लपेटा जा सकता है। पर यहाँ जिस हेतु को ध्यान में रखकर ज्ञान की महिमा बखानी जा रही है, वहाँ उसे चेतना को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने की प्रक्रिया समझना चाहिए।

मनुष्य भी एक तरह का पशु है। जन्मजात रूप से उसमें भी पशु प्रवृत्तियाँ भरी होती हैं। उन्हें परिमार्जित करके सुसंस्कारी एवं आदर्शवादी बनाने का काम जिस चिन्तन पद्धति का है उसे ज्ञान कहा गया है। गीताकार का कथन है कि− ‘‘ज्ञान से अधिक श्रेष्ठ और पवित्र अन्य कोई वस्तु नहीं है। “न हि ज्ञानेन पवित्रमिद्द विद्यते”

ज्ञान वह अग्नि है जो सड़े गले लोहे को अग्नि संस्कार करके माण्डूर भस्म−लौह भस्म आदि अमृतोपम गुण दिखा सकने योग्य बनाती है। पतित, पापी, मूढ़, पशु, महामानव, ऋषि आदि की काया एक ही तरह की होती है। उनकी बनावट और रहन−सहन पद्धति में कोई अन्तर नहीं होता। फिर जो एक को गया−गुजरा और दूसरे को आकाश में छाया देखते हैं। वह उसकी ज्ञान चेतना का ही चमत्कार है। वह हेय स्तर की हो तो मनुष्य निरर्थक या अनर्थ मूलक कामों में लगा हुआ दृष्टिगोचर होगा। यदि यह ज्ञान पवित्र, श्रेष्ठ और उत्साहवर्धक हो तो वही शरीर ऐसे काम करते हुए दिखाई देगा जिनसे असंख्यों को प्रेरणा मिले और उसका अनुगमन करने वालों के लिए भी प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो।

ज्ञान आन्तरिक जीवन से सम्बन्धित है और वह चेतना क्षेत्र में प्रभावित करके उचित अनुचित कर अन्तर करना सिखाता है। दूरदर्शी विवेकशीलता के आधार पर जो निर्णय या निर्धारण किये जाते हैं उन्हें ज्ञान का−सद्ज्ञान का− ही अनुदान कहना चाहिए।

ज्ञान का सहोदर है− विज्ञान। विज्ञान अर्थात् पदार्थ ज्ञान। हमारे चारों ओर अगणित वस्तुएँ बिखरी पड़ी हैं। वे अपने मूल रूप में प्रायः निरर्थक जैसी हैं उन्हें उपयोगी बनाने और उनकी विशेषताओं को समझने की प्रक्रिया विज्ञान है। विज्ञान ने मनुष्य को साधन सम्पन्न बनाया है। अन्य प्राणी इस जानकारी से रहित हैं इसलिए वे निकटवर्ती आहार को उपलब्ध करने में ही अपनी क्षमता समाप्त कर लेते हैं। यौवन की तरंग मन में उठने पर वे प्रजनन कृत्य में भी अपना विशेष पुरुषार्थ प्रदर्शित करते देखे जाते हैं। यह प्रकृति प्रदत्त शरीर के साथ मिलने वाली स्वाभाविकता है। उन्हें विज्ञान नहीं मिला। विज्ञान केवल मनुष्य की विशेष उपलब्धि है। आग जलाना, कृषि, पशु पालन, वास्तु, शिल्प, भाषा, चिकित्सा आदि एक से एक बढ़कर जानकारियाँ उसने प्राप्त की हैं और उनके सहारे साधन सम्पन्न बना है।

कभी विज्ञान की परिधि छोटी थी और उसके सहारे जीवनोपयोगी वस्तुओं तक का ही उत्पादन एवं प्रस्तुतीकरण होता था, पर अब बात बहुत आगे बढ़ गई और प्रकृति के अनेकानेक रहस्य खोज निकाल लिये गये हैं। इतना ही नहीं वरन् इससे भी आगे बढ़कर दूसरों के साधन छीनने वाले, उन्हें असमर्थ बनाने वाले प्राण घातक अस्त्र−शस्त्र भी बनने लगे हैं। जिस विज्ञान से सुख साधनों की वृद्धि का स्वप्न देखा जाता है वही यदि विनाश या पतन की सामग्री प्रस्तुत करने लगे तो आश्चर्य और असमंजस की बात है।

जिन्हें पिछले दो विश्वयुद्धों की जानकारी है। जो तीसरे अणुयुद्ध की तैयारी से परिचित हैं। इसी शताब्दी में 175 की लगभग छोटे और स्थानीय युद्धों की जिन्हें जानकारी है वे उस विभीषिका के पीछे विज्ञान की ही विनाश लीला को विभीषिका के रूप में सामने खड़ी देखते हैं। जिस विज्ञान के सहारे मांसाहार का व्यवसाय चमका, नशेबाजी की चित्र−विचित्र वस्तुएँ बनकर तैयार हुई। कामुकता को उत्तेजित करके वर्जनाओं पर प्रहार करने वाले अश्लील साहित्य एवं फिल्मों का घटाटोप उमड़ा वह विज्ञान की ही काली करतूत है। जहां चिकित्सा क्षेत्र में सर्जरी जैसे उपयोगी साधन बनाये वहाँ उद्योगीकरण के नाम पर ऐसे विशालकाय तन्त्र भी खड़े किये जिनने मुट्ठी भर लोगों को धन कुबेर बनाकर अगणित लोगों को बेकारी, बीमारी और भुखमरी के गर्त्त में बिलख-बिलख कर मरने के लिए छोड़ दिया। शहरों की तोंद फूल गई और देहातें उड़कर वनवासियों के झोंपड़ों में अभावग्रस्त हो गईं। यह भी विज्ञान का ही चमत्कार है जो प्रत्यक्ष सामने व आकार परोक्ष में बाजीगर की तरह कठपुतली का तमाशा दिखाता रहता है।

आज ज्ञान और विज्ञान दोनों ही अपनी प्रौढ़ावस्था में हैं। विडम्बना एक ही है कि वे सीधी राह चलने की अपेक्षा उलटी दिशा अपना रहे हैं और एक दूसरे का सहयोग न करके विरोध का रुख अपनाये हुए हैं और तरह तरह के दाँव पेचों का आविष्कार कर रहे हैं। इन गतिविधियों से वह धारा अवरुद्ध हो गई जो अब तक मनुष्य को समर्थ और सुखी बनाती रही है। अब उनमें प्रयास भस्मासुर जैसे हो चले हैं। जिसने उन्हें विकसित किया उसी मनुष्य को हेय, हीन बनाने और जीवन संकट खड़ा करने के लिए उद्यत दिखते हैं।

मानवोचित्त दूरदर्शिता और विवेकशीलता का तकाजा है कि ज्ञान और विज्ञान मिलकर चलें। ज्ञान के क्षेत्र में अनैतिकता, अन्ध श्रद्धा एवं अवाँछनीयता का प्रचलन बढ़ा−चढ़ा है। कुरीतियाँ और दुष्प्रवृत्तियाँ घट नहीं रही वरन बढ़ रही हैं। इसका ताना−बाना ‘ज्ञान’ द्वारा बुना जा रहा है। जानकार समझदार लोग अपने−अपने ढंग से इसका समर्थन कर रहे हैं। धर्म अपनी गरिमा से बहुत नीचे उतरकर साम्प्रदायिकता कट्टरता के विषय बीज बो रहा है और जिन्हें वे प्रभावित कर सकते हैं उन्हें अशिक्षितों और अधर्मियों से भी गया बीता बना रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि वे वैज्ञानिकता की तथ्यान्वेषी प्रवृत्ति अपनायें और अन्ध−परम्पराओं को अमान्य ठहराकर धर्म और अध्यात्म को सत्य के निकट पहुँचाने वाली वैज्ञानिक दृष्टि प्रदान करें।

ठीक इसी प्रकार विज्ञान के लिए भी आवश्यक है कि वह अपनी उपलब्धियों का प्रयोग करते समय ज्ञान से परामर्श करे कि उपलब्धियों का उपयोग आँखें मूँदकर−अनीति के समर्थन में न होने पाये। शक्ति के ऊपर अंकुश रहे और शक्तियों को औचित्य के अनुशासन में जकड़कर रख जाय।

सुन्द और उपसुन्द दो भाई थे। दोनों ने इतनी शक्ति अर्जित कर ली कि संसार में कोई भी उन दोनों की संयुक्त शक्ति को चुनौती नहीं दे सकता था। किन्तु दुर्भाग्यवश वे अपनी इस विश्व विजयी शक्ति का संयुक्त उपयोग न सके। किसी छोटी बात पर अहंकार वश वे दोनों आपस में भिड़ गये और परस्पर लड़−भिड़कर समाप्त हो गये। यह उदाहरण ज्ञान और विज्ञान की संयुक्त शक्ति के सामने भी प्रस्तुत है। विज्ञान द्वारा अर्जित विभूतियों को यदि सद्ज्ञान के मार्गदर्शन में विवेकपूर्वक लोक मंगल के लिए प्रयुक्त किया जाय तो प्रस्तुत जन−समाज के प्रत्येक मनुष्य−प्रत्येक प्राणी−निर्वाह के ही नहीं प्रगति की भी आवश्यक सामग्री प्रचुर परिमाण में प्राप्त कर सके। तब मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण दिवा स्वप्न नहीं वरन् एक सुनिश्चित सम्भावना के रूप में सामने आ सकता है। जो मस्तिष्क जो अनुसन्धान विघातक क्षमता बढ़ाने के प्रयास में लगे हुए हैं। जो सम्पदा महामरण का साधन साधने में लगी हुई है यदि वह उलटकर ऐसे उपकरण खोजे जो मनुष्य का श्रम समय बचाकर सद्ज्ञान के मार्ग दर्शन में लोकहित संजो सके तो आज जितने वैभव का मनुष्य स्वामी है उतने से ही गरीबी, बीमारी, बेकारी, अशिक्षा और कलह कारणों का सरलता पूर्वक उन्मूलन हो सकता है।

शिक्षितों, विद्वानों की कमी नहीं। पर वे अपने मस्तिष्क को पैसे के लिए बेचकर किसी भी उचित अनुचित के समर्थन में बिना हिचक के संलग्न हैं। यदि उनने प्रज्ञा का अवलम्बन लेकर मनीषा को श्रेय देने वाली प्रखरता को गति दी होती तो जन शक्ति की यथार्थता का भान हुआ और प्रयासों का प्रवाह औचित्य की दिशा में बहा होता। वैज्ञानिक साधन कितने ही सशक्त क्यों न हों, उनका प्रयोग तो मनुष्य ही करता है। यदि इस प्रयोगकर्त्री विवेक−बुद्धि को श्रेयानुगामी बनाया गया होता तो वह साधनों का दुरुपयोग होने देने से रोकने के लिए आगे बढ़ी होती और उन्हें चुनौती दे रही होती जो निर्द्वन्द्व होकर विनाशकारी प्रयासों में लगे हुए हैं।

विज्ञान की सशक्तता के सम्बन्ध में दो मत नहीं हो सकते। पर यह भी सुनिश्चित है कि उनका भला−बुरा प्रयोग मनुष्य ही करता है। क्या निर्णय किया जाय इसका भार मुट्ठी भर सशक्तों पर छोड़कर शेष जन समुदाय मूक दर्शक बना रहे तो यह एक परले सिरे का दुर्भाग्य ही होगा। अनीति की गतिविधियाँ चलती रहें तो इसमें दोषी वे लोग भी होते हैं जो विरोध करने में डरते हैं या उसे आवश्यक कर्त्तव्यों में सम्मिलित नहीं करते। यह कार्य विचारशील विज्ञजनों का है कि विज्ञान को महाविनाश की दिशा में अग्रसर होने से रोकें और उन्हें स्वेच्छाचार न बरतने दें जिन्हें समर्थता उपलब्ध हो गई है।

चाकू को कलम बनाने के काम में लाया जा सकता है और किसी को अंग−भंग करने में भी। विज्ञान एक चाकू है जिसे मानवी प्रगति के लिए ही प्रयुक्त होना चाहिए। यह काम ज्ञान का है कि जन−साधारण की विचारणा का उद्बोधन करे और ऐसा वातावरण बनाये जिससे सामूहिक आत्म−हत्या के लिए समूची मानवता को विवश करने वालों के हाथ रुकें और पैर थमें।

ज्ञान को विज्ञानवादियों के संपर्क में आना चाहिए। और विज्ञान को अपनी सत्यान्वेषण की सहज प्रकृति से ज्ञानवानों का द्वार खटखटाना चाहिए। ताकि वे जन−मानस का इतना सान्निध्य करे कि मुट्ठी भर सत्ताधारी इस समूची दुनिया का भविष्य अन्धकार में न झोंक सके।

ज्ञान और विज्ञान की सत्ता पुरानी है पर नई परिस्थिति को देखते हुए उन दोनों को एक दूसरे का अवलम्बन लेते हुए समय की समस्याओं का समाधान करने में लिए उद्यत होना चाहिए।




सुकरात से पूछा (kahani) - Akhandjyoti February 1985

जिज्ञासुओं में एक ने सुकरात से पूछा− ‘‘भगवान हैं?” उनने इनकार कर सिर हिलाते हुये कहा− ‘नहीं’।

दूसरे दिन वही प्रश्न एक दूसरे जिज्ञासु ने किया जो उनने कहा− ‘हैं’।

परस्पर विरोधी उत्तर सुनकर उनके प्रिय शिष्यों ने इस भिन्नता का कारण पूछा तो सुकरात ने कहा− ‘‘चर्म चक्षुओं से उसे आकृतिवान देखना चाहता है उसको ‘नहीं’ के निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा। पर जो वस्तुओं के पीछे काम करने वाली शक्ति को अपनी विवेक बुद्धि से देख सकता है उसे ईश्वर की सत्ता और महत्ता का अनुभव करने में तनिक भी कठिनाई नहीं होगी।”




भीतर की दुनिया हर हालत में सही रहे - Akhandjyoti February 1985

हम दो दुनिया के बीच रहते हैं। एक हमारे भीतर की, जो बाहर की दुनिया को प्रभावित करती है, एक हमारे बाहर की जो भीतर को प्रभावित करती है। देखना यह है कि हमने किसे कितना महत्व दिया है, और किस सीमा तक किसे अपनाया है।

भीतर की दुनिया विचारों और भावनाओं की है। बाहर की दुनिया परिस्थिति और साधनों की। भावनाएँ यदि उच्चस्तरीय हैं, तो वह मजबूती बड़े काम की होती है। वह प्रामाणिकता और नैतिकता हर हालत में बनाये रहती है। परिस्थितियाँ विपरीत और साधनों की कमी रहने पर भी व्यक्ति सीधा खड़ा रहता है। बाहर के दबाव पड़ने पर भी झुकता नहीं। गरीबी और विपत्ति में भी दिन हँसते हुए गुजार लेता है। भीतर प्रसन्नता है, तो बाहर भी मस्ती बनी रहती है। इसके विपरीत जो बाहर की दुनिया में रहते हैं, उनके लिए परिस्थितियाँ ही सब कुछ रहती हैं, वे पैसा कम पड़ते ही रोने−बिलखने लगते हैं और संघर्ष−झंझट सामने आने पर तिलमिला जाते हैं, अनीति पर उतर आते हैं, शान्ति खो बैठते हैं और जिस उपाय से सम्पन्नता−सफलता हाथ लगे, उसे करने लगते हैं, भले ही उसमें नीति हाथ से गँवानी पड़े।

भीतर की दुनिया विचारों की हैं, आदर्शों और भावनाओं की। उसका स्तर यदि ऊँचा है, तो व्यक्ति हर हालत में प्रसन्न बना रहेगा। सिद्धान्तों का परिपालन उसे इतना साहस दे सकेगा, जिसके सहारे परिस्थितियों की विपरीतता भी कुछ बिगाड़ न सकें, विचलित न कर सके। गिराने के लिए यदि लोगों ने दबाव डाले और जाल बिछाये हैं, तो इस सीमा तक हैरान न कर सकेंगे कि आदर्शों को छोड़े और अनुकूलता खरीदने के लिए अनीति अपनाने पर उतारू हो। परिस्थितियाँ यदि मनः स्थिति को दबा डाले, तो समझना चाहिए कि मनुष्य बाहर की दुनिया में रहता है और भीतर की दृष्टि से खोखला है। जिसने सिद्धान्त−आदर्शों, विचार−भावनाओं का महत्व समझा है, वह सफलता उसी सीमा तक स्वीकार करेगा, जो अनुचित कदम उठाने और अनीति अपनाने के लिए बाधित न कर सके। उसे सम्पन्नता की चाह तो रहेगी, इसी सीमा तक जिसमें आदर्शों से विचलित न होना पड़े।

जिनने दोनों संसदों का सन्तुलन बिठा लिया है, वह योजना ऊँची बनाते समय यह ध्यान रखता है कि महत्वाकाँक्षा इतनी बड़ी न हो, जिसके लिए अनुचित कदम उठाने पड़ें। महत्वाकाँक्षा पूरी करने के लिए पराक्रम करना तो उचित है, पर वह पराक्रम ऐसा नहीं जो मर्यादा का उल्लंघन करने लगे। इसी प्रकार सन्तुलन मन वाला अपनी अपनी कार्य−पद्धति को इस स्तर की बनाता है, जिसमें प्रगति की गुंजाइश रहे। उन्नति की राह पर चलने में रुकावट न पड़े। साथ ही कुछ ऐसा न करना पड़े, जिसमें अपने को अप्रामाणिक ठहराया जाय।

बुद्धिमत्ता इसमें है जिसमें भीतरी और बाहरी दुनिया के साथ तालमेल बैठ सके। स्वजन सम्बन्धी प्रसन्न रहें। कारोबार में प्रगतिशीलता बनी रहे। साथ ही कार्य−कौशल ही हाथ से जाने न पाये।

जिसके लिए बाहर की दुनिया ही सब कुछ है, वह अन्तरात्मा की पुकार को प्राथमिकता न दे सकेगा। उसे बाहर वालों का ध्यान रहेगा। लोग जिस कदम में बड़प्पन प्रदान करें भले ही आदर्शों के हिसाब से हलका या गलत सिद्ध होना पड़े, बाहर की दुनिया में प्रचलन यही है कि सफलता और सम्पन्नता खरीदने के लिए जो भी करना पड़े, किया जाय। आदर्शों का ध्यान न रखने वाले को सीमित लाभ में सन्तोष करना पड़ेगा। लोग मूर्ख कहें और व्यवहार कुशलता से अनजान ठहरावें, तो उसके लिए भी तैयार रहना पड़ेगा। जिसने भीतर की दुनिया को सही रखा है, उसकी बाहर की दुनिया भी ऐसी रहेगी, जिसे गलत न कहा जा सके।




धर्म का व्यावहारिक स्वरूप - Akhandjyoti February 1985

अमेरिका का एक व्यक्ति आरम्भ में तो गरीब था। पर पीछे वह उद्यमपूर्वक व्यवसाय करके धनवान बना। पैसा तो उसके पास बहुत हो गया, पर यह नहीं समझ सका कि इसका सही उपयोग क्या करना चाहिए? चाटुकार दिन भर पीछे लगे रहते और तरह−तरह के षड़यन्त्र रचकर उसे ठगते रहते। पीछे उसे पछताना पड़ता। पैसे को तिजोरियों में रखा तो वहाँ चोरों ने ऐसी तरकीबें निकाली जिसे सुरक्षा का उद्देश्य पूरा न हुआ। अपनी नासमझी और चोरों की चालाकी पर उसे बहुत खीज आती। खीज कई बार तो इतनी अधिक बढ़ जाती कि सारा कारोबार समेटकर कहीं एकान्त में चले जाना या आत्मा−हत्या करने को मन करता।

इस बीच उसके एक मित्र ने उसे अच्छी किताबें दीं जिनमें धर्म और विवेक के समन्वय से सूझ−बूझ पर कदम उठाने और औचित्य का पग−पग पर सहारा लेने की सलाह दी गई थी। इस सलाह को उसने अपनाया, सभी चाटुकारी छूट गये और चोरों को घात लगाने का अवसर ही नहीं रहा। साथ ही कारोबार पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ गया। वह अनुभव करता था कि मेरे जीवन का कायाकल्प “धर्म विज्ञान” ने कर दिया। यह रास्ता दूसरों को भी मिले तो उनका भी भला हो सकता है।

पहले वह धर्म को भी अन्ध−विश्वास मानता था और सोचता था कि यह भी भोले लोगों को बहकाने का एक तरीका है। पीछे जब उसने धर्म का तत्वज्ञान गम्भीरता से पढ़ा तो उसे पता चला कि वह पूर्णतया समझदारी और सचाई पर अवलम्बित है। उसने इस विषय पर जितनी किताबें मिल सकी ढूँढ़−ढूँढ़कर पढ़ डालीं। विचारशील विद्वानों के साथ जितना संपर्क साध सका उसका एक भी अवसर उसने नहीं गँवाया। उसकी सभी बाहरी समस्याओं और भीतरी उलझनों का समाधान हो गया।

पर उसने देखा कि इस तरह के विचारशील साहित्य का सृजन ही नहीं हुआ है जो धर्म के व्यवहारवादी पक्ष को सर्वसाधारणों के लिए प्रस्तुत कर सके और बिना धर्म के जो हानियाँ उठानी पड़ती हैं उनसे बच सके। उसे यह विषय इतना प्रिय लगा कि उसे व्यवसाय, व्यवहार और आरोग्य से भी अधिक महत्वपूर्ण होने पर भी उस विषय पर नहीं के बराबर साहित्य छपा है।

इस कमी की पूर्ति के लिए रोपरमार्टन नामक इस व्यक्ति ने अपनी समस्त पूँजी से “फाउण्डेशन आफ रिलीजन एण्ड फिलासॉफी” नामक संस्था का निर्माण किया। इसका उद्देश्य एक ही है कि “धर्म का व्यावहारिक जीवन में स्थान” विषय पर साहित्य का लेखन और प्रकाशन किया जाय ताकि सर्वसाधारण को यथार्थता से अवगत होने का अवसर मिले। धर्म को कोई रहस्यवाद समझता है तो कोई पाखण्ड किसी की दृष्टि से मूर्खों का धूर्तों द्वारा मूर्ख बनाने की कला का नाम धर्म है।

ईश्वर से मिलन, दर्शन, मुक्ति, मोक्ष, स्वर्ग, नरक की चर्चा धर्म के नाम पर आये दिन होती रहती है। यह सभी विषय ऐसे हैं जिनके प्रत्यक्ष प्रमाण कुछ भी न होने के कारण वे विशुद्ध रूप से मनुष्य की श्रद्धा के ऊपर अवलम्बित हैं। यदि श्रद्धा हो तो यह सभी विषय किसी को सन्तोष दे सकते हैं और प्रिय लग सकते हैं। यदि अश्रद्धा हो तो इन प्रसंगों में से एक भी ऐसा नहीं है जिसे तात्कालिक जीवन में उनका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव देखा एवं प्रमाण पाया जा सके।

श्री मार्टन चाहते हैं कि उनकी पूँजी में जो भी प्रकाशन हो वह ऐसा हो जिसमें व्यवहारिक जीवन में आये दिन प्रस्तुत होने वाली कठिनाइयों और समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया जा सके। प्रगतिशील जीवन के लिए जिन सिद्धान्तों एवं नीति व्यवहारों की आवश्यकता है। उन सबका समावेश धर्म के अंतर्गत रहे और वे सभी प्रतिपादन ऐसे हों जो बुद्धिजीवियों को मान्य हों।

ये प्रसंग बड़ा ही महत्वपूर्ण है। यदि उसे ठीक ढंग से प्रस्तुत किया जा सका तो न तो धर्म अन्ध−विश्वास रहेगा और न कलह का कारण। ऐसी स्थिति में धर्म सर्वप्रिय भी होगा और सर्वमान्य भी।




समष्टि की हलचलों का व्यष्टि चेतना पर प्रभाव - Akhandjyoti February 1985

इस सृष्टि में कोई भी वस्तु सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है। प्रत्येक वस्तु और प्राणी अपने आस−पास की दूरवर्ती और कहा जाये कि विश्व ब्रह्माण्ड की सभी ज्ञात अज्ञात वस्तुओं और घटनाओं से प्रभावित होते हैं। प्रत्यक्षतः भले ही कोई स्वतन्त्र, अपनी मनमानी का स्वामी मालूम पड़े पर वस्तुतः उसके क्रिया−कलापों को उनके परिणामों को कितनी ही बातें प्रभावित करती हैं।

यह बात और है कि हम उन प्रभाव कारणों को समझ न पाते हों। हमारी स्थूल उन वस्तुओं की शक्ति और महत्ताएँ स्वीकार करती हैं, जो आँखों से दिखती हैं या प्रत्यक्ष अनुभव में आती हैं। किन्तु गहराई से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि दृश्य का सूत्र संचालन अदृश्य से हो रहा है। जितनी महत्वपूर्ण शक्तियाँ संसार में हैं, वे सभी परोक्ष रूप से क्रियाशील हैं।

डा. क्लारेन्स ए. मिल्स ने अपनी खोज पूर्ण पुस्तक “क्लाइमेट मेक्स दि मैन” में ऐसे आँकड़े प्रस्तुत किये हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि मौसम के उतार−चढ़ाव के अनुसार अमुक बीमारियाँ घटतीं और अमुक बढ़ती हैं इसी प्रकार लोगों की प्रसन्नता−अप्रसन्नता, शांति तथा उद्विग्नता में भी अनायास ही अन्तर आता है। जुलाई, अगस्त में जब बड़ी गर्मी पड़ती है तब अक्सर पारिवारिक कलह बढ़ते हैं अप्रैल से अगस्त तक ही अवधि में सामूहिक उपद्रवों की बाढ़ आती है। मौसम की गर्मी लोगों का पारा गरम कर देती है। मानसून आने पर इस प्रकार के फिसाद अपने आप कम हो जाते हैं।

मौसम का मनुष्य की प्रवृत्तियों पर क्या असर पड़ता है इसका विशाल अध्ययन प्रो. ई. डेक्सटर ने किया है। उन्होंने 40 हजार अपराधों की−घटनाओं की जाँच−पड़ताल करके यह पाया कि जैसे−जैसे मौसम गरम होता गया वैसे−वैसे अपराध बढ़ते गये और जिस क्रम से ठण्डक आई उसी अनुपात से अपराधों की संख्या घटती चली गई।

जार्ज स्टीवर्ट ने अपने ग्रन्थ ‘स्टोर्म’ में यह दर्शाया है कि मौसम के उतार−चढ़ाव राज सत्ताओं को उखाड़ सकने वाले उपद्रवों की पृष्ठभूमि बना सकते हैं और ठण्डक में लोग निराश एवं ठण्डी तबियत के साथ दिन गुजार सकते हैं।

बसन्त ऋतु मनुष्यों में ही नहीं अन्य प्राणियों में भी कामोत्तेजना उत्पन्न करती है। गर्भ धारण का आधा औसत उन्हीं दो महीने में पूरा हो जाता है, जबकि शेष दस महीनों में कुल मिलाकर उतनी ही मात्रा पूरी होती है। कोई अविज्ञात शक्ति प्राणियों के मन में अकारण ही प्रणय केलि के लिये उत्साह भर देती है और वे उस दिशा में किसी के द्वारा खींचे, धकेले जाने वाले की तरह उस प्रयोजन में प्रवृत्त हो जाते हैं।

सूर्य विशेषज्ञों का कथन है कि जिन दिनों सूर्य में लम्बे धब्बों की लाइनें बनती हैं, भयंकर विस्फोट होते हैं, उन दिनों लोगों के दिमागों और परिस्थितियों में भी भयंकर उथल−पुथल होती है। अमेरिकी क्रान्ति, फ्रांसीसी राज क्रान्ति, रूपी क्रान्ति उन्हीं दिनों हुई जिन दिनों सूर्य में चिन्ह धब्बों के रूप में दिखाई पड़ रहे थे। इनका असर मौसम, फसल, वनस्पति, समुद्र तथा प्राणियों की शारीरिक और मानसिक स्थिति पर असाधारण रूप से पड़ता है।

सूर्य ग्रहण के समय प्रकृति पर पड़ने वाले प्रभाव तो आसानी से देखे व समझे जा सकते हैं। जब सूर्य ग्रहण होता है चौबीस घण्टे पूर्व से ही कुछ पक्षी चह-चहाना बन्द कर देते हैं, बन्दर वृक्षों को छोड़कर चुपचाप जमीन पर आकर बैठ जाते हैं। सदा चंचल रहने वाला बन्दर उस समय इतना शान्त हो जाता है कि लगता है उस जैसा शान्त और सीधा प्राणी कोई है ही नहीं। बहुत से जंगली जानवर भयभीत से दिखने लगते हैं।

वैज्ञानिक अन्वेषक निरन्तर इस तथ्य की पुष्टि कर रहे हैं कि हमारी धरती का भाग्य ऊपर लाकों तथा ग्रहों से सीधा सम्बद्ध है। सूर्य में सतत् एक विशेष प्रकार के ज्वाला प्रकोप फूटते रहते हैं, तब धरती पर प्रचण्ड, चुम्बकीय तूफान उठते हैं और मानसिक दृष्टि से क्षीण व्यक्ति अस्त-व्यस्त हो उठते हैं, उनकी कमजोरी, खीझ और परेशानी बढ़ जाती है। इससे शराबखोरी, झगड़े−टंटे, सड़क दुर्घटनाएँ, आत्म−हत्याएँ आदि की संख्या कई गुनी बढ़ जाती है क्योंकि मस्तिष्कीय विद्युत की अल्फाएनर्जी पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र से सम्बद्ध है और धरती का चुम्बकीय क्षेत्र आकाशीय पिण्डों से जुड़ा है। इस तरह आकाशीय पिण्ड हमारे जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। पदार्थ में ऊर्जा कम्पन के रूप में होती है। तीव्रतम कम्पन की स्थिति में पदार्थ ऊर्जा में परिवर्तित हो जाते हैं। जड़−पदार्थों की सक्रियता का कारण इलेक्ट्रानिक शक्तियाँ हैं। ये सौर−मण्डल की ही शक्तियाँ हैं।

विगत 22 फरवरी 1956 की रात्रि में सूर्य में प्रचण्ड विस्फोट हुआ और सौर−कण धरती की ओर तेजी से दौड़े। उन्हीं सौर−कणों की वायुमण्डल से टकराहट से कई एशियाई देशों और आस्ट्रेलिया में भयानक आँधी तूफान आये।

पहले माना जाता था कि पृथ्वी का मौसम केवल सूर्य के ही द्वारा मुख्यतः प्रभावित होता है। पर अब जाना गया है कि ऐक्स विकिरण के अनेक तारे अनन्त आकाश में हैं। छः वर्षों में ऐसे तीस तारे खोजे जा चुके हैं। पहला तारा 1962 में प्रक्षेपास्त्रों के परीक्षण के दौरान खोजा गया, जिसकी पृथ्वी से दूरी 1 हजार प्रकाश वर्ष है। पाया गया है कि यह वर्तमान सौर एक्स विकिरण की अपेक्षा दस लाख गुनी तीव्र गति से एक्स विकिरण कर रहा है। इसका नाम रखा गया− स्को एक्स वन। अभी विशिष्ट प्रभाव सम्पन्न अनेक तारे हैं, जिनकी विविध प्रकार की अति महत्वपूर्ण किरणें हैं। वैज्ञानिक अभी इनकी बाबत कुछ नहीं जान सके हैं।

वैज्ञानिकों का मत है कि अंतर्ग्रही शक्तियों के परिवर्तनों से मानवी काया में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन आना स्वाभाविक है। इसका अनुमान चन्द्रमा की घट−बढ़ से लगाया जा सकता है। गाँधी मेडिकल कालेज (भोपाल) के डा. बी. के. तिवारी ने अपने शोध−पत्र प्रस्तुत करते हुए बताया है कि चन्द्रमा की कलाओं का नारी के मासिक धर्म पर विशेष प्रभाव पड़ता है।

“मासिक का चक्र और उससे सम्बद्ध घातक घटनाएँ” नामक विषय पर ‘फोरेंसिक मेडिसन तथा टाक्सिकॉलाली’ के प्रथम काँग्रेस में चर्चा करते हुए डा. तिवारी ने कहा कि पूर्णिमा के दिन का चाँद नारी में अवसाद और मानसिक तनाव की स्थिति उत्पन्न करता है। लम्बे समय तक चल रहे शोध कार्यों से पता चला है नारी के मासिक चक्र के नियन्त्रण की प्रक्रिया बड़ी जटिल है। रक्त स्राव व हारमोन की घट बढ़ के कारण महिलाएँ डिप्रेशन का शिकार बनती चली जाती हैं। उनके द्वारा हत्या और की जाने वाली आत्म−हत्याओं की घटनाएँ भी इसी समय अधिक होती देखी गयी हैं। 12 से 50 वर्ष की 50 महिलाओं के मृत शरीरों का परीक्षण डा. तिवारी ने किया और निष्कर्ष निकाला कि इनकी मृत्यु मासिक काल में ही हुई। इनमें से 33 दुर्घटना, 15 आत्म−हत्या, 1 मानव घात के रूप में काल का ग्रास बन गयीं। मात्र 1 महिला प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त हुयी थी। ये मौतें पूर्णिमा के निकट ही हुईं।

चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञों का कहना है कि ये दुर्घटनायें नारी की मानसिक दुर्बलताओं के फलस्वरूप हुई हैं जिसका एक मात्र कारण चन्द्र कलाओं का समय विशेष पर कुप्रभाव ही सिद्ध हुआ है।

अनेकानेक प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि मानव के चिन्तन को परोक्ष रूप से प्रभावित करने में मौसम की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह भी प्रकारान्तर से ग्रह नक्षत्रों से आने वाली किरणों के प्रवाहों से विनिर्मित होता है। इस तरह कई बार जब अपराधों, आत्म−हत्याओं, रोगों की अनायास बाढ़ सी आने लगती है तो देखा जाना चाहिए कि कहीं अंतर्ग्रही परिस्थितियाँ तो इसका कारण नहीं हैं। यदि ऐसा है तो स्वयं को, अन्यों को इन प्रभावों से बचाकर अपने सुरक्षा कवच को मजबूत बनाकर अप्रिय प्रसंगों से बचा जा सकता है। ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी इस प्रकार अनिवार्य भी है, लाभकारी भी।




जो मान लिया गया वह अन्तिम नहीं है। - Akhandjyoti February 1985

प्राचीन काल से अद्यावधि मनुष्य का ज्ञान निरन्तर विकसित हुआ है। वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर उपलब्ध साधन सुविधाओं की बात छोड़ भी दें तो मनुष्य का ज्ञान ही अकेले इतना विकसित हुआ है कि वह उस अर्जित सम्पदा के बल पर विकसित होता जा रहा है। ज्ञान के विकास की यह प्रक्रिया निरन्तर अबाध गति से चल रही है और इस विकास के कारण कई प्राचीनकालीन धारणाएँ टूटी हैं तथा नये सत्य सामने आए हैं। उदाहरण के लिए अति प्राचीनकाल में यह समझा जाता था कि धरती एक फर्श की तरह है, उस पर नीले आसमान की छत टंगी हुई है। उस छत पर चाँद सूरज के रूप में दो झाड़−फानूस टंगे हैं तथा सितारों के जुगनू चमकते हैं।

समुद्र एक छोटे तालाब की तरह समझा जाता था। किन्तु अब वे सब धारणाएँ मिथ्या सिद्ध हुई हैं और यह तथ्य सामने आए हैं कि हमारी पृथ्वी विशालकाय ब्रह्माण्ड की एक राई रत्ती जितनी छोटी−सी सदस्या मात्र है। उसके जैसे असंख्य पिण्ड इस अनन्त आकाश में छितरे पड़े हैं। समूचे ब्रह्माण्ड का विस्तार मनुष्य की कल्पना शक्ति से बाहर है। अपनी धरती पर भी जितनी दृश्य पदार्थ है उससे असंख्य गुना विस्तृत और शक्तिशाली वह है जो विद्यमान रहते हुए भी अदृश्य है। प्राचीन और अर्वाचीन कल्पनाओं में इतना विचित्र अन्तर है कि लगता है मनुष्य खाई खन्दक के अन्धेरों से निकल कर सर्वप्रथम आलोकित होने वाले पर्वत शिखरों पर पहुँच गया है।

प्राचीन काल और अर्वाचीन काल की मान्यताओं के सम्बन्ध में अन्तर का इतना ही कारण है कि हमारे ज्ञान एवं साधन क्षेत्र का विस्तार हुआ है। तद्नुसार यह विश्व भी, जिसे हम अपना संसार कह सकते हैं अधिकाधिक विस्तृत होता चला गया है। संसार इतना विस्तृत तो पहले भी था, किन्तु उसका प्रत्यक्षीकरण अब हुआ है। इसलिए यही कहना होगा कि हमारा संसार इन दिनों बहुत अधिक विस्तृत हुआ है और भविष्य में भी हम जिस गति से बढ़ेंगे, हमारा विश्व भी उसी अनुपात से अधिक विकसित होता चला जाएगा। यूनान के लोगों की मान्यता थी कि पृथ्वी हरक्यूलस देवता के कन्धे पर टिकी हुई है। भारतीय उसे शेषनाग के फन पर या गाय के सींग पर टिकी मानते थे, सूर्य देवता के रथ में सात घोड़े जुते होने और अरुण सारथी द्वारा हांके जाने की मान्यता को अब सूर्य किरणों के सात रंग और प्रभातकालीन रक्ताभ आलोक कहकर संगतीकरण करना पड़ता है।

पौराणिक आख्यानों के अनुसार कभी पृथ्वी चटाई की तरह चपटी बिछी हुई थी और उस पृथ्वी को हिरण्याक्ष कागज की तरह लपेट कर भाग गया था तथा समुद्र में जा छिपा था। पृथ्वी को उसके शिकंजे से निकालने के लिए भगवान विष्णु को वाराह का रूप धारण करना तथा हिरण्याक्ष से छीनना छुड़ाना पड़ा था। उपलब्ध ज्ञान और प्राप्त तथ्यों के संदर्भ में इन घटनाओं को देखते हैं तो ये बातें बाल−बुद्धि की कल्पना ही सिद्ध होती है। पृथ्वी के लपेटे जाने की और उसी पर भरे हुए समुद्र में छिपा लेने की बात अब समझ से बाहर की बात है पर किसी समय यही मान्यता शिरोधार्य थी।

विद्वान आर्यभट्ट ने पहली बार पाँचवीं शताब्दी में पृथ्वी को गोल गेंद की तरह बताया। बारहवीं शताब्दी में भाष्कराचार्य ने उसमें आकर्षण शक्ति होने की बात जोड़ दी। प्राचीन ज्योतिष विज्ञान धरती को स्थिर और सूर्य को चल मानता था। सहज बुद्धि यही सोच सकती थी, किन्तु पीछे पृथ्वी को भ्रमण शील बताया गया तो बताने वालों को उपहासास्पद ही नहीं माना गया, वरन् उन्हें नास्तिक कहकर नास्तिकता के अपराध में सूली पर चढ़ा दिया गया। किन्तु तथ्य तो तथ्य है। सत्य की कितनी ही उपेक्षा की जाये उसे स्वीकार करना ही पड़ता है। पीछे जब अन्ध मान्यताओं की जकड़न ढीली हुई तो इन तथ्यों को भी स्वीकार किया जाने लगा और अब स्थिति यह है कि अब किसी को भी अपनी पृथ्वी के विश्व का नगण्य घटक मानने में कोई आपत्ति नहीं है।

अपने विश्व में असंख्य निहारिकाएँ हैं। वे इतनी बड़ी हैं कि उनके एक कोने में करोड़ों सूर्य पड़े रह सकें और वे पृथ्वी से इतनी दूर हैं कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में लाखों वर्ष लग जाते हैं जबकि प्रकाश एक सेकेंड में एक लाख छियासी हजार मील की गति से चलता है। आसमान में जो तारे दिखाई पड़ते हैं उनमें से कई तो अपने सूर्य से भी हजारों गुना बड़े महासूर्य हैं। उनके अपने अपने सौर मण्डल तथा ग्रह−उपग्रह हैं। वे आपस में नजदीक दिखते भर हैं परंतु वास्तव में उनका फासला अरबों खरबों मील है। वे सभी एक−दूसरे के साथ पारस्परिक आकर्षण शक्ति के रस्सों से बँधे हैं। आकाश से नीचे गिने या ऊँचे उछलने जैसी कोई शक्ति नहीं है। उस पोल में हर वस्तु अधर में सहज ही लटकी रह सकती है। हलचल तो ग्रह−नक्षत्रों की अपनी आकर्षण शक्ति के कारण होती है। उसी के प्रभाव से वे अपनी धुरी पर अपनी कक्षा में घूमते हैं। यह बातें सुनने−पढ़ने विचित्र अवश्य लगती हैं पर हैं−सत्य। अब से कुछ सौ वर्षों पूर्व तक इन बातों पर कोई विश्वास न ही करता था, किन्तु अब मनुष्य का ज्ञान बढ़ा है और साथ ही उसका संसार भी। इसलिए इन मान्यताओं को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं है।

सूर्य सौर मण्डल का केन्द्र है। उसका व्यास पृथ्वी से 109 गुना वजन 3,30,000 गुना तथा घनफल 13,00,000 गुना बड़ा है। उसके एक वर्ग इंच स्थान में इतना प्रकाश उत्पन्न होता है जितना कि इतने ही स्थान में तीन लाख मोमबत्तियाँ जलाने से उत्पन्न हो सकता है। उसकी गर्मी 6 हजार डिग्री होती है, जिसकी तुलना में पृथ्वी की आग को बरफ जैसा ठण्डा माना जा सकता है। इतनी अधिक गर्मी के कारण सूर्य का सारा पदार्थ वाष्पीभूत है और उस द्रव्य में सदा भयंकर तूफान उठते रहते हैं जिनके कारण कभी−कभी तो इतने बड़े खड्ड हो जाते हैं कि उनमें अपनी पृथ्वी के समान कई धरतियाँ समा सकें। काले धब्बे के रूप में सूर्य पर दिखाई देने वाली आकृतियाँ यही हैं।

अपनी पृथ्वी ही उतर से दक्षिण तक 7896 मील तथा पूर्व से पश्चिम तक 7926 मील है। इसका 71 प्रतिशत भाग समुद्र में डूबा हुआ है। समुद्र की सर्वाधिक गहराई 35 हजार फीट है तथा भू−तल के ऊँचे−ऊँचे पहाड़ 29 हजार फूट तक ऊँचे हैं। पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में 58 करोड़ 46 लाख मील की यात्रा एक वर्ष में पूरी करनी होती है। वह 66,600 मील प्रतिघण्टे की गति से अपनी कक्षा में भागती है साथ ही स्वयं भी लट्टू की भाँति 24 घण्टे में अपनी धुरी पर घूम लेती है।

पोले आकाश में साँस लेने योग्य हवा कुछ ही दूरी तक है। इससे आगे बन्द राकेटों में साँस लेने के लिए अतिरिक्त प्रबन्ध करना पड़ता है। प्राचीनकाल के लोग अन्यान्य लोकों में ऐसे ही विचरण करते थे जैसे पृथ्वी पर। इस तरह के कथा−प्रसंगों से पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है। अब तो वस्तुस्थिति सामने आ रही है उस आधार पर वैसा करना या यह मानना असम्भव हो ही गया है।

पिछले जमाने में सूर्य को ठण्डा माना गया था। उसका एक नाम ‘आतप’ भी है। आतप अर्थात् जो स्वयं तो ठण्डा हो किन्तु दूसरों को प्रकाश दे। किन्तु अब वैसा नहीं कहा जा सकता। ऐसा मानने का उन दिनों एक मात्र कारण यह था कि हम जितने ही ऊँचे चढ़ते जाते हैं, उतनी ही ठण्डक बढ़ती है। पहाड़ों पर बर्फ जमीं रहती है यह सर्वविदित है। जितनी ऊँचाई उतनी ठण्डक, इस सिद्धान्त ने सूर्य के ठण्डा होने की कल्पना दी थी पर अब इस बात की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

चन्द्रमा किसी जमाने में पूर्ण ग्रह माना जाता था। उसे ‘तारापति’ कहते थे। सौर−मण्डल में ही नहीं आकाश में चमकने वाले ताराओं का भी वह अधिनायक था, किन्तु अब जो नये तथ्य सामने आये हैं उनके अनुसार चन्द्रमा पूर्ण ग्रह नहीं है, वह केवल सूर्य की ही नहीं वरन् पृथ्वी की भी परिक्रमा करता है। इसलिए उसे पृथ्वी का उपग्रह ही कहा गया है। सूर्य की तुलना में तो वह करोड़ों का हिस्सा भी नहीं।

पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा की अपनी−अपनी अलग गतियाँ हैं। इस चक्र में कई बार सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा के ऊपर पड़ने के मार्ग में पृथ्वी आ जाती है तो चन्द्रग्रहण दिखता है और जब पृथ्वी तथा सूर्य के बीच में चन्द्रमा आ जाता है तो सूर्य ग्रहण दिख पड़ता है। कौन और कितना आड़े आया। इसी हिसाब से ग्रहण की छाया न्यूनाधिक दिखती है। पहले कभी यह मान्यता रही थी कि राहु केतु राक्षस सूर्य व चन्द्रमा पर आक्रमण करते हैं, किन्तु अब वैसी बात नहीं कही जा सकती। मानवी प्रगति ने ऐसी कितनी ही पुरानी मान्यताओं को अस्वीकार कर दिया है और वह कड़वी गोली किसी प्रकार पुरातन पन्थियों को भी गले उतारनी पड़ रही है।

सूर्य, चन्द्र, ग्रहण को राहु केतु नामक राक्षसों का उत्पात मानने की तरह ही उल्कापात के सम्बन्ध में भी यह मान्यता प्रचलित थी कि ये देवताओं तथा प्रेतात्माओं की हलचलें हैं। समझा जाता था कि किसी महापुरुष के मरने पर एक तारा टूटता है। देवता लोग उल्कापात के माध्यम से पृथ्वीवासियों के लिए विपत्ति भेजते हैं। इस धारणा के कारण लोग भयभीत होकर देवताओं को प्रसन्न करने के लिए कर्मकाण्ड आदि रचा करते थे। किन्तु वैज्ञानिक गवेषणाओं ने सिद्ध कर दिया है कि उल्कापात अब प्रकृति की एक साधारण−सी घटना है। अनन्त आकाश में किन्हीं ग्रह नक्षत्रों के टूटे−फूटे टुकड़े कंकड़ पत्थरों के रूप में उड़ते रहते हैं। वे कभी पृथ्वी के वायु मण्डल में घुस पड़ते हैं तो हवा के घर्षण से वे जलकर खाक होने लगते हैं। यह जलना और दौड़ना ही उल्कापात है। कभी−कभी एक साथ सैकड़ों कंकड़ घुसते हैं तो आकाश में आतिशबाजी जैसी जलने लगती है। कुछ पिण्ड बहुत बड़े और अधिक कठोर होते हैं और उनका अध जला हिस्सा धरती पर आ गिरता है। ऐसी उल्काएं संसार भर में जब तब गिरती रहती हैं और उनके अधजले टुकड़े अजायब घरों में रखे जाते हैं।

ज्वालामुखी और भूकम्पों के सम्बन्ध में भी ऐसी ही मान्यताएँ थीं। भूकम्प के सम्बन्ध में समझा जाता था कि शेषनाग जब अपना फन हिलाते हैं तो पृथ्वी पर भूकम्प आते हैं। अब यह मान्यता केवल अशिक्षित, देहाती ओर पिछड़े इलाकों भर में रह गई है अन्यथा शिक्षित समुदाय अच्छी तरह जानता है कि पृथ्वी आरम्भ में आग के गोले की तरह थी उसकी ऊपरी परत धीरे−धीरे ठण्डी होती गई और उस पर प्राणियों तथा वनस्पतियों का निवास सम्भव हो सका। अभी भी पृथ्वी के भीतर प्रचण्ड गर्मी है सारा पदार्थ पिघला हुआ है और कड़ाही में खौलते हुए तेल की तरह खुद−बुद करता रहता है। इसकी भाप अक्सर धरती−धरती के ऊपरी परत को बेधकर निकलती है तो जिधर से वह निकलती है वहाँ या तो ज्वालामुखी विस्फोट होता है अथवा भूकम्प आते हैं।

यह हलचलें निरन्तर होती रहती है। औसतन हर तीसरे दिन एक बड़ा और दस मिनट बाद एक हलका भूकम्प पृथ्वी पर कहीं न कहीं निरन्तर आता रहता है इसके अनेक कारण हैं। समुद्र की तली से पानी रिसकर उस आग्नेय द्रव पदार्थ तक जा पहुँचता है तो उसकी भाप विस्फोट करती हुई ऊपरी सतह को फाड़ती है। नये पहाड़ों के भीतर जहाँ−तहाँ गुफाओं की तरह बड़ी−बड़ी पोले हैं वे धंसकती रहती हैं। पृथ्वी की ऊपरी पपड़ी सिकुड़ती रहती है। ऐसे−ऐसे अनेकों कारण पृथ्वी पर ज्वालामुखी फटने अथवा भूकम्प आने के हैं। अब शेषनाग के फन हिलाने पर भूकम्प आने की बात मानना या स्वीकार करना अथवा इसी मान्यता पर अड़े रहना बाल हठ तथा दुराग्रह ही कहा जायेगा।

कहा जा चुका है कि मनुष्य निरन्तर प्रगति−पथ पर बढ़ता जा रहा है। उसका ज्ञान बढ़ रहा है और ज्ञान बढ़ने के फलस्वरूप पुरानी मान्यताओं के स्थान पर नये प्रतिपादन सामने आ रहे हैं। यह क्रम अनादिकाल से चला आ रहा है और भविष्य में भी अनन्त काल तक चलता रहेगा। आज की अपनी स्थापनाओं में भी भविष्य में विकास क्रम के अनुसार परिवर्तनों की श्रृंखला चलती रही है। अतः हमें दुराग्रही नहीं होना चाहिए और पूर्वजों के प्रति पूर्ण आस्थावान रहते हुए भी यह मानकर चलना चाहिए कि जो कहा अथवा माना जाता रहा है या माना जा रहा है वही अन्तिम नहीं है।




Quotation - Akhandjyoti February 1985

भगवान ने मनुष्य के एक हाथ में पुरुषार्थ और दूसरे में श्रेय रखा है। दोनों एक साथ ही मिलते हैं। जो पुरुषार्थ से रहित हैं, उन्हें श्रेय भी नहीं मिलता।




समरसता एवं सहानुभूति पर आधारित ज्योतिर्विज्ञान - Akhandjyoti February 1985

एक मनोरंजक आख्यान है। एक बार एक सज्जन पानी के जहाज में सफर करते हुए जुंग उठने पर एक दिन तेजी से डेक पर चहलकदमी करने लगे। शेष ने सोचा सम्भवतः टहलने का व्यायाम कर रहे हैं। किन्तु जब बहुत देर तक यही क्रम जारी रहा तो एक से रहा न गया। पूछा बैठा−भाई साहब! क्या बात है? तो जवाब मिला− ‘‘मुझे जरा जल्दी है। आप लोगों से जल्दी घर पहुँचना है। काफी जरूरी काम है घर पर! ऐसे ही बैठा रहा तो पहुँच गया समय पर।” सब उनकी नादानी पर हँस पड़े। पर क्या यह सच नहीं है कि इस सतत् चलायमान पृथ्वी पर, जो विराट् ब्रह्माण्ड में अपने सूर्य की निरन्तर परिक्रमा कर रही है, ऐसे नादानों की संख्या अच्छी खासी है। वे विराट् चेतन सत्ता के व्यष्टि घटक होते हुए भी स्वयं को उस महासत्ता से असम्बद्ध मानते हैं। विराट् की लयबद्धता में एक ही बने रहना है, यही ज्योतिर्विज्ञान का मूलभूत दर्शन है ज्योतिर्विज्ञान वह ज्योतिष नहीं है जिसे कुण्डली देखकर या हाथ देखकर ग्रहों की दशा का डर दिखाकर शान्ति कराने हेतु अनेकानेक चित्र−विचित्र उपचार कराने वाले एक पुरातन पन्थी एवं ठगे जाने वाले मूर्खों के रूप में देखा जा सकता है। वस्तुतः यह अध्यात्म का आद्याक्षर है, आत्मिकी की कुँजी है।

आज ज्योतिर्विज्ञान का जो प्रचलित रूप है वह उस पुरातन विधा का खण्डहर भर है। कितने ही परिवर्तन हुए हैं, इस ब्रह्माण्डीय विज्ञान के बाह्य कलेवर में। वेदों से सविता को सृष्टि का अधिष्ठाता केन्द्र बताते हुए उसकी उपासना का प्रतिपादन किया गया है। यह मान्यता अंतर्दृष्टि सम्पन्न ऋषियों की थी कि यह सूर्य स्थिर है, शेष ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं एवं ऐसे एक नहीं, अनेकों सूर्य हैं जो एक महासूर्य के चारों ओर धूम रहे हैं। ऐसे एक नहीं, अनेकों ब्रह्माण्ड हैं जिन सबका अधिपति एक है−सृष्टि संचालन की सुव्यवस्था करने वाला परब्रह्म। सत्य की शोध मानव मूल वृत्ति है। बहुत बार सत्य मिलता है, बहुत बार खो जाता है। ईसा के जन्म से भी तीन सो वर्ष पूर्व एरिस्टोकारिस नामक एक यूनानी ने वैदिक प्रतिपादन को सत्य बताते हुए कहा कि सूर्य केन्द्र है, पृथ्वी केन्द्र नहीं है। लेकिन ईसा के सौ वर्ष बाद (100 ए डी) ही टोलियों ने इस सूत्र के विलोम प्रतिपादन दिया कि पृथ्वी केन्द्र है, सूर्य उसका चक्कर लगा रहा है। 16-17 शताब्दी लगी। कोपर्निकस एवं कैपलर को यह खोज कर सत्यापित करने एवं लोगों के गले यह तथ्य उतारने में कि पृथ्वी नहीं, सूर्य केन्द्र है एवं पृथ्वी अपनी धुरी पर भी घूमती है व सूर्य के भी चारों ओर चक्कर लगाती है। अन्तर्ग्रही प्रभावों से सभी जीवधारी प्रभावित होते हैं, आर्यभट्ट की इस मान्यता को दुराग्रही समाज की मोहर लगी बीसवीं सदी में। यह वस्तुतः सत्यान्वेषण की दिशा में चली एक यात्रा है जिसमें व्यष्टि चेतना का समुच्चय, एक छोटा−सा घटक, यह मनुष्य उस विराट् से प्राण चेतना पाते हुए भी उस विराट् को खोजता अभिभूत होता रहता है।

अब यह बात अच्छी तरह समझ लें कि मनुष्य पृथ्वी पर बसने वाला विराट् सत्ता का एक घटक है एवं पृथ्वी उस विराट् के प्रतीक सूर्य के मण्डल का ही एक अंग है। तीनों में एक ही रक्त प्रवाहित हो रहा है। बच्चा गर्भावस्था में व जन्म के तुरन्त बाद तक रज्जुनाल से माँ से जुड़ा रक्त पाता रहता है। इस रक्त प्रवाह से ही जो माँ के हृदय की गंगोत्री से प्रवाहित होता है, शिशु के सारे क्रियाकलाप चलते हैं। सारे जीवकोशों का निर्माण, एक ही निषेचित डिम्बाणु से अरबों सेल्स का बनना इसी प्रक्रिया के सहारे बन पड़ता है। इसे वैज्ञानिक अपनी भाषा में समानुभूति (एम्पैथी) कहते हैं। मनुष्य−पृथ्वी−सूर्य−महासूर्य एवं परब्रह्म ये सभी इसी सहानुभूति की एक कड़ी हैं। जी भी सूर्य पर घटित होगा, वह मनुष्य एवं अन्यान्य जीवधारियों के रोम−रोम में स्पन्दित होगा। मानवी रक्त में तैर रही रक्त कोशिकाएँ एवं न्यूक्लिक एसिड जैसा जीन्स बनाने वाला लघुतम घटक सूर्य के अणुओं से समानुभूति−ऐक्य रखता है एवं अच्छे−बुरे सभी प्रभावों में बराबर हिस्सा लेता है। सूर्य के हमसे करोड़ों मील दूर अवस्थित होने पर भी इस प्रभाव में कोई अन्तर आने वाला नहीं।

इस अंतर्ग्रही प्रभाव को, सौर गतिविधियों के मानवी काया पर पड़ने वाले प्रभाव को जुड़वा बच्चों के उदाहरण से भली प्रकार समझा जा सकता है। एक ही अण्डे से पैदा हुए दो बच्चे जो गर्भाशय में साथ−साथ विकसित होते हैं, (मोनोव्युलरट्वीन्स) की जन्मोपरांत कहीं कितनी भी दूर क्यों न रखा जाय, उनके व्यवहार−चिन्तन−आदतों सभी में समानता पाई जाती है। यह एक अणु से एक पर्यावरण में विकसित होने की परिणति है। मानव, पृथ्वी, सूर्य भी इसी तरह से एक ही अणु से विनिर्मित होने के कारण सहानुभूति के आधार पर परस्पर प्रभावित होते हैं। यही ज्योतिर्विज्ञान का केन्द्र बिन्दु है। हर क्षण, हर पल, पृथ्वी के कण−कण का सूर्य के महाकणों से एक सम्बन्ध सूत्र जुड़ा हुआ है। इसी प्रकार मानवी जीवकोशों का भी उस विराट् से, विभु से, सम्बन्ध ऐसे जुड़ा है जैसे दो बिजली के तार जुड़े होते हैं, जिनमें सतत् विद्युत प्रवाहित होती रहती है।

इस सहानुभूति को अब विज्ञान ने एक नयी परिभाषा दी है− ‘‘क्लीनिकल इकॉलाजी” अर्थात् पर्यावरण से प्रभावित जीव विज्ञान। इसी में सूर्य पर घटने वाली सभी घटनाओं−धब्बों, सूर्य की लपटों और कलंकों, भू−चुम्बकीय तूफानों, मौसम में अप्रत्याशित परिवर्तनों के जीवधारियों पर प्रभाव के शुमार किया जाता है। यह चेतन जगत की एक लयबद्धता का, परोक्ष के प्रभाव का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य कलंकों के आने व अति सम्वेदनशील वृक्षों में रिंग्स बनने का जो परस्पर सम्बन्ध है, वह वैज्ञानिकों को आश्चर्यचकित कर देता है। वृक्ष में कितने रिंग बने, यह देखकर उसकी आयु का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। यदि मौसम अधिक गर्म होता है तो ये रिंग चौड़े बनते हैं व जब मौसम ठण्डा व शुष्क होता है तो ये रिंग सकरे होते हैं। मौसम के इतने से व्यतिरेक से भी इतनी दूर अवस्थित पृथ्वी के वनस्पति समुदाय पर बिल्कुल “टू द पाइण्ट” प्रभाव पड़ सकता है, यह इसका प्रमाण है।

जब वृक्ष वनस्पति इतने सम्वेदनशील हैं कि करोड़ों मील दूर अवस्थित सूर्य पर होने वाले परिवर्तनों को अपने ऊपर अंकित होने देते हैं तब मानवी काया के सूक्ष्मतम जीवकोशों एवं अति सूक्ष्म स्नायुकोशों का तो इन प्रभावों के प्रति और भी अधिक गहरी सहानुभूति होनी चाहिए। वैज्ञानिक बताते भी हैं कि सौर मण्डल स्थित पल्सार्ज एवं ब्लैक होल्स से निकलने वाले न्यूट्रीनो कण जो प्रकाश की गति से भी तेज चलकर धरती को पार कर जाते हैं, मानवी मस्तिष्क के ‘माइन्जेन’ अणुओं से बहुत अधिक मेल खाते हैं। इसी प्रकार अति सूक्ष्म न्यूकलीय अम्लों पर भी उनका प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार सौर मण्डल के परिवार के किसी भी सदस्य के धरती स्थित जीवधारियों पर पड़ने वाले प्रभाव को झुठलाया नहीं जा सकता। मालूम नहीं वृक्ष की तरह मानवी मस्तिष्क में भी हर ग्यारहवें वर्ष वर्त्तुल (रिंग्स) पड़ते हैं या नहीं। किन्तु यह सत्य है कि इस अवधि में मानसिक आवेग, उत्तेजना, उन्माद, बेचैनी बहुत तेज हो जाती हैं। आत्म−हत्या, परस्पर आक्रामक व्यवहार एवं दुर्घटनाओं में सहसा वृद्धि हो जाती है। रेडियो धर्मिता के परिवर्तन जो इतने विराट् अन्तरिक्ष में घटते हैं कैसे समष्टिगत मानसिकता को प्रभावित करते हैं, इसका अध्ययन ज्योतिर्विज्ञान विधा के अंतर्गत आता है।

जैसे यह ग्यारह वर्ष का सौर चक्र चलता है, ऐसे ही बड़े धूमकेतुओं का हर छिहत्तर वर्ष में उदित होने का क्रम चलता रहता है। अपनी करोड़ों मील लम्बी पूँछ में विषाक्त गैसें समेटे यह उपग्रह ज्यों ही पृथ्वी के घोड़ा समीप आता है, अपने दुष्प्रभाव छोड़ने लगता है। पहले 1835, फिर 1910 में, अब 1986 में जो विशाल धूमकेतु दृष्टिगोचर होने जा रहा है जिसका नाम इसकी खोज करने वाले सर एडमण्ड हैली के नाम पर हैली कामेट रखा गया है, अपने आने से पूर्व संकेत 2 वर्ष पूर्व से ही देना आरम्भ कर चुका है। जब−जब भी ये विषाक्त धूम पृथ्वी के समीपस्थ वातावरण में आते हैं, गृह−युद्ध, विश्व−युद्ध, संक्रामक रोगों का बाहुल्य बढ़ जाता है। यह भी अंतर्ग्रही प्रभावों का एक अंग है।

एक ऐसा ही कास्मो बायोलॉजीकल साइकल इजिप्ट में देखा जाता है। इजिप्ट के सम्राट हमेशा से ही सूर्य देवता के आराधक रहे हैं। वे सूर्य एवं मिश्र देश के मध्य से बहने वाली नील नदी में परस्पर गहन सम्बन्ध मानते थे। सम्राट फराहो ने अपने पुरोहितों के निर्देश पर अपने वैज्ञानिक समुदाय को कहा कि नील नदी में कब जल घटता है, कब बढ़ता है, इसका वर्णन सतत् लिखा जाता रहे। ईसा के पन्द्रह सौ वर्ष से पूर्व से अब तक की लगभग साढ़े तीन हजार वर्षों की जीवन गाथा इस नदी की थोड़ा भी बढ़ने या घटने, बाढ़ आने, पानी कम होने की लिखी रखी है। अब उसका अध्ययन करने पर ज्ञात हुआ है कि जो भी महत्वपूर्ण परिवर्तन नील नदी में हुए हैं, वे नब्बे वर्ष के अन्तराल पर घटित हुए हैं। इजिप्शियन विद्वान तस्मान ने यह तथ्य पता लगाया है एवं आधुनिक वैज्ञानिकों के इस निष्कर्ष से उसे सम्बद्ध बताया है कि सूर्य नब्बे वर्ष में अपनी आयु के उतार−चढ़ाव का एक अन्तराल पूरा करता है। 45 वर्ष वह जवान होता है एवं 45 वर्ष उसकी आयु के ढलने के होते हैं। पूर्वार्द्ध क्लाइमेक्स है तो उत्तरार्द्ध एण्टी क्लाइमेक्स जब नब्बे वर्ष पूरे होते हैं तो भू चुम्बकीय तूफान तेजी से आते हैं, भूकम्पों की बाढ़ आ जाती है एवं सुप्त पड़े ज्वालामुखी भी फूट पड़ते हैं। यही कारण था कि नील नदी के परिवर्तनों की एक बायोग्राफी मिस्र के पुरोहितों ने बनवाई। जब भूगर्भ तक सौर लपटों का प्रभाव पड़ता है तब मानवी काया के अरबों जीवकोश इस प्रभाव से कैसे अछूते रह सकते हैं। निश्चित ही उनके अन्दर भी उलट−पुलट भरे परिवर्तन होते हैं जो सीधे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं।

ज्योतिर्विज्ञान की जानकारी वाला पक्ष यहीं तक सही है। जब यह कहा जाता है कि अमुक ग्रह अमुक नुकसान पहुँचाते हैं एवं उनकी शान्ति के लिये अमुक प्रकार से तन्त्र विधानादि कर दान−दक्षिणा देना चाहिए तो फिर यह कोरा अन्ध−विश्वास रह जाता है, जो धूर्तों को लाभ पहुँचाता है, बुद्धिजीवियों को नास्तिक बनाता है। एस्ट्रालॉजी व एस्ट्रानॉमी में फर्क समझा जाना चाहिए एवं ज्योतिर्विज्ञान के उन ज्ञात−अविज्ञात पक्षों से लाभान्वित होने का प्रयास किया जाना चाहिए जो अब तक विज्ञान की पोथी में बन्द हो चुके हैं। चिर पुरातन ऋषि प्रणीत शोधों को इस वैज्ञानिक जानकारी से भली−भाँति समन्वित किया जा सके तो इस अमृत से निश्चित ही मनुष्य जाति को लाभ ही मिलेगा। विराट् के एक ही घटक होने की मान्यता विकसित हो सके तो सहानुभूति की भावना और भी व्यापक रूप में स्वीकारी जाने लगेगी, परस्पर सहकार और बढ़ेगा।




बड़ा संयमी असुर था (kahani) - Akhandjyoti February 1985

पाताल नरेश शम्भर बड़ा संयमी असुर था। उसने देवलोक के सभी राजाओं को जीत कर अपने साम्राज्य का दूर तक विस्तार किया। देवता चिन्तित होकर प्रजापति ब्रह्मा के पास गये और उनसे मुक्ति का उपाय पूछा। ब्रह्मा जी बोले− ‘‘देवो! असुरों का एक ही अस्त्र है हिंसा। वे प्राणियों का वध करके अपनी शक्ति बढ़ाते हैं, यही पाप एक दिन उनके विनाश का कारण बनेगा।”

सचमुच वहीं हुआ। शम्भर के तीन प्रधान सेनापति दाम, ब्याल और कट ने सारे राज्य में माँसाहार का प्रचार किया। एक दिन नागरिक वमहिन ने ब्याल से पूछा− ‘‘जब आप भी माँस खाते हैं तो स्वयं पशुओं का वध भी अपने ही हाथ से किया करें। तीनों ने यह बात स्वीकार कर ली।

दूसरे दिन दाम, तीसरे दिन ब्याल और चौथे दिन कट ने एक−एक पशु का वध किया। मरते समय पशु को छटपटाहट देखकर तीनों के मन में मृत्यु का भय समा गया। भय के उत्पन्न होते ही उनकी शक्ति घट चली और एक दिन देवताओं ने उन पर फिर से धावा बोल दिया। इस बार वे भयवश वीरतापूर्वक न लड़ सके और युद्ध में मार डाले गये।




सतत् गतिशील उस विराट् की एक झाँकी - Akhandjyoti February 1985

मोटी आँखों से जब हम अपने चारों ओर नजर उठा कर देखते हैं तो जमीन, पेड़, खेत, आसमान, सूरज, तारे जैसी मोटी वस्तुएँ ही देखकर रह जाते हैं, पर जब बारीकी के साथ खोजबीन करते हैं तब पता चलता है कि हम प्रचण्ड शक्ति से भरे−पूरे एक ऐसे समुद्र में मछली की तरह रह रहे हैं जिसके एक−एक कण को अद्भुत और आश्चर्यजनक कहा जा सकता है।

मिट्टी का एक ढेला छदाम से भी कम कीमत का होता है, जिसमें अणु परमाणुओं की एक अगणित संख्या रहती है, ऐसी दशा में मूल्य और महत्व की दृष्टि से उसकी कीमत नगण्य ही होगी। छोटे ढेले के प्रहार का परिणाम स्वल्प सा होता है, फिर हाथ से छूने और आँख से देखने तक में न आने वाले परमाणु की प्रतिक्रिया कितनी हो सकती है, उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

यह मोटी दृष्टि हुई। शक्ति के अनन्त भाण्डागार की प्रत्येक छोटी इकाई अपने आप में इतनी महत्ता संजोये बैठी है कि दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। जब एक कण का यह हाल है तो फिर इन अगणित इकाइयों के पुञ्ज की सत्ता और महत्ता को किस प्रकार समझा और आँका जाय।

अति लघु से अति विशाल कितना बड़ा है। इसकी गणना तो दूर, कल्पना कर सकना भी मानवी बुद्धि से बाहर की बात है। परमाणु भी अब सबसे छोटी इकाई नहीं रहीं। उनके भी भेद−उपभेद हैं। वह भी एक सौर मण्डल है और इस सबसे छोटी इकाई की सूक्ष्मता के अन्त में अपना एक अलग संसार भरा और बसा पड़ा है। उसकी उद्भुतता विराट् ब्रह्मांड की विलक्षणता से कम रहस्यमय है?

फिर विराट् कितना बड़ा है? इसकी थोड़ी कल्पना करने के लिए पहले उस दूरी का नाप लेने के फीते का स्वरूप समझना चाहिए। प्रकाश एक सेकेंड में एक लाख छियासी हजार मील चलता है। यह प्रकाश समस्त पृथ्वी का एक चक्कर एक सेकेंड के सातवें हिस्से जैसे स्वल्प समय में लगा लेता है। पृथ्वी से चन्द्रमा तक पहुँचने में डेढ़ मिनट और सूर्य तक पहुँचने में आठ मिनट लगते हैं। यह है प्रकाश की चाल। इस चाल से चलते हुए एक वर्ष में प्रकाश जितनी दूर तक पहुँच सके, वह हुआ एक प्रकाश वर्ष। खगोल भौतिकी में गणना का माप यह प्रकाश वर्ष ही है।

ब्रह्माण्ड और पृथ्वी की तुलना करना, अपनी चिन्तन परिधि से कल्पना शक्ति से बाहर की चीज है। इसलिए उस कल्पना की तुक बिठाने के लिए सूर्य को एक मध्यवर्ती आधार मानकर चलें तो उस तुलना को करने में थोड़ी सहायता मिलेगी। यद्यपि ब्रह्माण्ड में करोड़ों सूर्य अपने ग्रह उपग्रहों के साथ अपना−अपना सौर−मंडल बना कर भ्रमण करते रहते हैं और फिर से स्वयं भी किसी महाकेन्द्र की परिक्रमा में संलग्न रहते हैं। तो भी अपने सौर−मण्डल के केन्द्र सूर्य का ही ऊहापोह इतना विशाल हो जाता है कि उसकी कल्पना करने से ही मानवीय बुद्धि एक प्रकार से हताश होकर स्तब्ध रह जाती है। फिर करोड़ों सूर्यों की सम्मिलित शक्ति एक विशालता की कल्पना किस तरह की जाय?

ज्वलनशील गैसों के पिण्ड−सूर्य का व्यास पृथ्वी से 109 गुना बड़ा है। व्यास 865380 मील, परिधि 2700000 मील और उसका क्षेत्र 3393000 अरब वर्गमील है। यदि वह पृथ्वी से 9 करोड़ 30 लाख मील की दूरी पर न होकर कुल 10 लाख मील दूर होता तो हमें आकाश में एक मात्र सूर्य ही दिखाई देता।

सूर्य की शक्ति का कोई पारावार नहीं। उस की सतह का तापक्रम 600 डिग्री सेंटीग्रेड है तो अन्दर का अनुमानित ताप 15000000 डिग्री सेंटीग्रेड। 12 हजार अरब टन कोयला जलाने से जितनी गर्मी पैदा हो सकती है उतनी सूर्य एक सेकेण्ड में निकाल देता है। अनुमान है कि सूर्य का प्रत्येक वर्ग इंच क्षेत्र 60 अश्वों की शक्ति (हार्स पावर) के बराबर शक्ति उत्सर्जित करता है। उसके सम्पूर्ण 3393000000000000 वर्गमील क्षेत्र में शक्ति का अनुमान करना हो तो इस गुणन खण्ड को हल करना चाहिए− 3393000000000000×1760×3×12। इतने हार्स पावर की शक्ति न होती तो यह जो इतनी विशाल पृथ्वी और विराट् सौर जगत आँखों के सम्मुख प्रस्तुत है वह अन्धकार के गर्त में बिना किसी अस्तित्व के डूबा पड़ा होता।

इस प्रचण्ड क्षमता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि यदि 93000000 मील लम्बी और 880 गज मोटी बर्फ की शिल्ली के ऊपर उसको केन्द्रित कर दिया जाये तो सारी बर्फ एक सेकेंड में गलकर बह निकलेगी। सूर्य के 1 वर्ग इंच में जिस ऊर्जा व प्रकाश की कल्पना की गयी है वह 5 लाख मोमबत्तियों के एक साथ जलाने की शक्ति के बराबर होता है। यदि यह सारी शक्ति एक साथ पृथ्वी पर फेंक दी जाती तो यहाँ की मिट्टी भी जलने लगती। जलने ही नहीं लगती, यह भी एक प्रकार का सूर्य पिण्ड हो जाती। जबकि सामान्य स्थिति में पृथ्वी को सूर्य शक्ति का 220 करोड़वाँ हिस्सा ही मिलता है। 3 अरब आबादी मनुष्यों की, 100 अरब आबादी पक्षियों की, 1000 अरब आबादी अन्य जीव जन्तुओं की और पृथ्वी पर पाये जाने वाले विशाल वनस्पति जगत तथा ऋतु संचालन का सारा कार्य उस 220 करोड़वें हिस्से जितनी शक्ति से सम्पन्न हो रहा है। पूरी शक्ति जो सौर मण्डल के करोड़ों ग्रहों−उपग्रहों, क्षुद्र ग्रहों का नियमन करती है, प्रकाश और गर्मी देती है। अपने 19 करोड़ 98 लाख महाशंख भार को 200 मील प्रति सेकेंड की भयानक गति से 25 करोड़ वर्ष में पूरी होने वाली विराट् आकाश की परिक्रमा भी वह महासूर्य अपनी इसी शक्ति से पूरी करता है। जब सम्पूर्ण शक्ति और सक्रियता को कूता जाना सम्भव नहीं। उसे तो भावनाओं की परिधि में केवल उतारा जाना भर ही सम्भव है।

वह तो पृथ्वी से उसकी उतनी दूरी है, जो जीव जन्तुओं को हँसने-कुदकने का अवसर दे रही हैं यदि यह दूरी घट जाय तो जीवन अग्नि रूप हो जाय अर्थात् जो चेतना अब दिखाई दे रही है वह सूर्य के गहरे कराल अग्नि ज्वाल में समा जाये। कल्पना करें कि, कदाचित किसी तेज से तेज रफ्तार वाली रेलगाड़ी से सूर्य तक जाना सम्भव हो जाय तो वहाँ तक पहुँचते−पहुँचते एक मनुष्य को 85-85 वर्ष के दो जीवन धारण करने पड़ जायें इसमें मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच की निद्रा के 5 वर्ष अभी जोड़े ही नहीं गये। ध्वनि से भी तीव्र रफ्तार वाले सुपरसोनिक जेट एवं राकेट्स को ही वहाँ पहुँचने तक 20 वर्ष लग सकते हैं और इस बीस वर्ष में तो सारी पृथ्वी का खाका ही बदल सकता है।

शक्ति की, विशालता की, कर्तृत्व की, वैभव की थोड़ी-सी झाँकी अपने सूर्य के सम्बन्ध में ऊपर दी है। इससे भी हजारों गुने बड़े सूर्य करोड़ों की संख्या में अपने सौर−मण्डलों सहित उस ब्रह्माण्ड में घूम रहे हैं। उन सबकी गरिमा का लेखा−जोखा कैसे लिया जाय? पर देखते हैं कि वे समस्त शक्ति केन्द्र अपने−अपने कार्य में नियमितता व्यवस्था और मर्यादा लेकर चल रहे हैं। कहीं न उद्धतता है, न उच्छृंखलता। निर्धारित कर्त्तव्य−कर्म को अणु से लेकर महत् तक सभी पालन कर रहे हैं। यदि ऐसा न होता तो यह इतना बड़ा ब्रह्माण्ड−व्यवसाय एक क्षण में बिखर जाता। ग्रह−नक्षत्र आपस में टकरा जाते या शक्ति का व्यतिक्रम करके सारी ईश्वरीय व्यवस्था को नष्ट−भ्रष्ट करके रख देते।

“खगोल भौतिकी की महत्वपूर्ण खोजों से यह स्पष्ट हो चला है कि ब्रह्माण्ड का निरन्तर विस्तार हो रहा है। समस्त आकाश−गंगाएँ, समस्त सौर मण्डल और ग्रह−नक्षत्र क्रमशः अपना आकाशीय−क्षेत्र आगे बढ़ाते चले जा रहे हैं। कहा जाता है कि अरबों वर्ष पूर्व सृष्टि के अन्तराल में ‘घनीभूत’ पदार्थ के मध्य एक भयंकर विस्फोट हुआ था। उसी के छिटक कर ग्रह−नक्षत्र बने और वह छिटकना तब से लेकर अब तक क्रमशः आने ही बढ़ता चढ़ता चला जा रहा है। सभी आकाश−गंगाएँ एक−दूसरे से दूर हटती जा रही हैं और यही हाल सौर मण्डलों का है। शून्य आकाश के उन्मुक्त क्षेत्र की विशालता इतनी बड़ी है कि अभी करोड़ों−अरबों वर्षों तक यह दौड़ ऐसे ही चलती रह सकती है।

भारतीय मनीषियों की भी यही मान्यता रही है कि सृष्टि के आरम्भ में एक मूल द्रव्य हिरण्यगर्भ था। उसी के विस्फोट से आकाश−गंगाएँ विनिर्मित हुईं। इस विस्फोट की तेजी कुछ तो धीमी हुई है, पर अभी भी उस छिटकाव की चाल बहुत तीव्र है।

विश्व ब्रह्माण्ड के सदस्य ग्रह−नक्षत्र अपनी सूत्र−संचालक आकाश−गंगाओं के साथ जुड़े हैं और आकाश-गंगायें महातत्व हिरण्यगर्भ की उँगलियों में बँधी हुई कठपुतलियाँ भर हैं। अगणित सौर मण्डल भी एक−दूसरे का परिपोषण करते हुए अपना क्रिया−कलाप चला रहे हैं। सूर्य ही अपने ग्रहों को गुरुत्वाकर्षण में बांधे हो और उन्हें ताप प्रकाश देता हो सो बात नहीं है, बदले में ग्रह परिवार भी अपने शासनाध्यक्ष सूर्य का विविध आधारों पर पोषण करता है। सौर परिवार के ग्रह अपनी जगह से छिटक कर किसी अन्तरिक्ष में अपना कोई और पथ बनालें तो फिर सूर्य का सन्तुलन भी बिगड़ जायेगा और वह आज की स्थिति में न रहकर किसी चित्र−विचित्र विभीषिका में उलझा हुआ दिखाई देगा।

सौर परिवार का ग्रह मण्डल एवं निहारिकाएँ एक सुव्यवस्थित क्रम से सतत् क्रियाशील हैं, भ्रमणशील हैं। लगता है कोई विशाल तन्त्र इस पूरे विराट् तत्व का सुसंचालन कर रहा हो। ब्रह्माण्ड की गति और विस्तार का क्रम सर्वत्र एक सा है। हर ग्रह−नक्षत्र अपनी धुरी पर घूमता है। पृथ्वी 24 घण्टे में अपनी एक परिक्रमा पूरी करती है जबकि चन्द्रमा 336 घण्टे में। अर्थात् वहाँ के दिन और रात में हमारी पृथ्वी के दिन व रात से 14 गुने बड़े दिन और 14 गुनी बड़ी रात होगी है। बुध की परिस्थितियाँ भिन्न हैं। अर्थात् उसका एक भाग निरन्तर सूर्य की ही ओर बना रहता है दूसरा अन्धकार में, पर अपने आप में गतिशील वह भी है। हम समझते हैं सूर्य स्थिर है, पर ऐसा नहीं वह भी 1 सेकेंड में 13 मील की गति से घूमता है, मन्दाकिनियाँ भी अपने सौर परिवारों को लेकर किसी विराट् परिक्रमा में संलग्न हैं, अपनी “स्पाइरल” आकाश गंगा की स्वयं की गति 200 मील प्रति सेकेंड है। इसी तरह ब्रह्माण्ड 150 मील प्रति सेकेंड की गति से विकसित हो रहा है। यह गति हर जगह है। एक प्रकार से मानव के लिए एक शिक्षण है कि हर व्यक्ति को अपनी एक आचार संहिता ऐसी निर्धारित करनी चाहिए, जिससे समाज में गतिशीलता तो रहे पर किसी भी सीमा, किसी के अधिकारों का अतिक्रमण न हो। हर ग्रह अपने मुखिया की परिक्रमा में लगा है। हर चन्द्रमा अपने ग्रह का, ग्रह सौर परिवार का, सौर−मण्डल मन्दाकिनियों की परिक्रमा करते रहने का अपना कर्त्तव्य बखूबी निभाते देखे जा सकते हैं। मनुष्य क्यों नहीं मर्यादा में बना रह अपना कर्त्तव्य पूरा कर सकता है?

ब्रह्माण्डीय चेतना की सबसे बड़ी विशेषता है−सतत् विकास। जड़ समझे जाने वाले ब्रह्माण्ड में बैठे जुगनू रूपी तारे−ग्रह नक्षत्रादि अपनी−अपनी निहारिकाओं के साथ सतत् और अधिक विकसित होते जा रहे हैं। फैलाव की यह सीमा अपरिमित है, अनन्त है।

चेतना और उसके परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाली गति विकास की प्रक्रिया को पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा से लेकर अखिल ब्रह्माण्ड में देखा जा सकता है। उदाहरण के लिए पिछले दिनों वैज्ञानिकों ने अपने अन्तरिक्ष उपकरणों और खगोलीय शोधों के आधार पर कहा कि सारा ब्रह्माण्ड निरन्तर फैलता जा रहा है। इन खगोल वैज्ञानिकों में विख्यात नक्षत्रविद् डा. हबल, फ्रेड हायल, सर एडिंग्टन, कार्ल साँगा आदि का नाम लिया जाता है। आज से कोई 60 वर्ष पूर्व की बात है− विश्वविख्यात नक्षत्रविद् डा. हबल अपने दूरदर्शी स्पेक्ट्रोमीटर पर सुदूर नक्षत्रों से आने वाले प्रकाश के वर्णक्रम का अध्ययन करते थे। सूर्य का श्वेत प्रकाश सात रंगों के मेल से बना है। स्पेक्ट्रोमीटर एक ऐसा यन्त्र है जिसमें एक त्रिपार्श्व काँच लगा रहता है, जब प्रकाश की एक किरण को उसमें कुदाया जाता है तो इस काँच के गुण के अनुसार वह अपने सातों रंगों में फूट पड़ता है। इन रंगों के वर्णक्रम से प्रकाश की स्थिति अन्तरंग खनिज स्रोतों की जानकारी भी की जाती है पर यहाँ जो प्रयोग चल रहा था उसका प्रयोजन एक आकाशगंगा की दूरी की जाँच करना था जो उस समय ब्रह्माण्ड की सीमा पर प्रतीत हो रही थी।

जाँच के समय एक बिलकुल ही नया तथ्य प्रकाश में आया। वर्णक्रम का लाल रंग निरन्तर सरकता और क्षीण होता प्रतीत हो रहा था, जिसका अर्थ था कि आकाश गंगा परे हट रही है। उससे आने वाला नाद भी क्रमशः मन्द पड़ता जा रहा था, उससे भी उपरोक्त तथ्य की पुष्टि हो रही थी। इस परिवर्तन को “डॉपलर प्रभाव” की संज्ञा दी गई और एक नये दर्शन ने जन्म लिया कि ब्रह्माण्ड निरन्तर बढ़ रहा है। यह चौंका देने वाली जानकारी थी, जिसने वैज्ञानिकों के समाने विचार के लिये सैकड़ों प्रश्न छोड़े हैं।

फ्रीडमैन से लेकर आइन्स्टीन तब अब संसार के सभी प्रमुख अन्तरिक्ष विज्ञानी यह स्वीकार करते हैं कि ब्रह्माण्ड निरन्तर फैल रहा है। सभी खगोलीय पिण्ड एक−दूसरे से दूर हटते जा रहे हैं। अभी कुछ दिनों पूर्व एक अन्य ज्योतिर्विद् डा. जेम्म क्लार्क भारत वर्ष आये थे, विज्ञान भवन में उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा− अंतरिक्ष की गहराइयाँ जितनी अनन्त की ओर बढ़ेंगी, उसमें झाँककर देखने से मानवीय अस्तित्व का अर्थ और प्रयोजन उतना ही स्पष्ट होता चला जायेगा। शर्त यह रहेगी कि हमारी अपनी अन्वेषण बुद्धि का भी विकास और विस्तार हो। यदि हमारी बुद्धि, विचार और ज्ञान मात्र पेट प्रजनन, तृष्णा, अहन्ता तक ही सीमित रहती है, तब तो हम पड़ौस भी नहीं जान सकेंगे। पर यदि इन सबसे पूर्वाग्रह मुक्त हों तो ब्रह्माण्ड इतनी खुली ओर अच्छे अक्षरों में लिखी चमकदार पुस्तक है कि उससे हर शब्द का अर्थ, प्रत्येक अस्तित्व का अभिप्राय समझा जा सकता एवं अनुभव किया जा सकता है।

वस्तुतः चेतना का मुख्य गुण है− विकास। जहाँ भी चेतना या जीवन का अस्तित्व विद्यमान दिखाई देता है, वहाँ अनिवार्य रूप से विकास, वर्तमान स्थिति से आगे बढ़ने की हलचल दिखाई देती है। इस दृष्टि से मनुष्यों, जीव−जन्तु और पेड़−पौधों को ही जीवित माना जाता है। परन्तु भारतीय अध्यात्म की मान्यता है कि जड़ कुछ है ही नहीं, सब कुछ चैतन्य ही है। सुविधा के लिए स्थिर निष्क्रिय और यथास्थिति में बने रहने वाली वस्तुओं को जड़ कहा जाता है, परन्तु वस्तुतः वे प्रचलित अर्थों में जड़ है नहीं। इस तत्त्वदर्शन को भली−भाँति हृदयंगम किया जाना चाहिए।




धन प्राप्त करने का आशीर्वाद (kahani) - Akhandjyoti February 1985

एक कंजूस किसी महात्मा के पास और भी अधिक धन प्राप्त करने का आशीर्वाद माँगने गया। उस समय तो वे कुछ न बोले पर दूसरे दिन आने को कहा।

नियत समय पर कंजूस पहुँचा तो देखा कि महात्मा जी एक गड्ढा खोदकर उसे कंकड़ पत्थरों से भरने में तल्लीन हैं।

प्रतीक्षा के बाद उसने कारण पूछा कि जब इस इलाके में सर्वत्र कंकड़ पत्थरों के ही भण्डार बिखरे पड़े हैं तो उन्हें इस प्रकार बटोरने से क्या लाभ?

महात्मा हँस पड़े। मूर्ख! जब इस संसार में आवश्यकता की सभी वस्तुएँ प्रचुर परिमाण में विद्यमान हैं तब तिजोरियाँ भरने की ललक में समय और श्रम भी बर्बादी क्यों?




सम्भव है मनुष्य देवताओं का वंशज रहा हो - Akhandjyoti February 1985

डार्विन के विकास सिद्धांत में एक बड़ी खामी यह है कि उसमें मूल प्रकृति किसी की भी नहीं बदलती। आकृति में भी नाम मात्र का ही अन्तर हुआ माना जाता है। मनुष्य को जिन वानरों की सन्तान बताया जाता है, वे सामान्य वानरों से बहुत बातों में भिन्न हैं। लेकिन विकास अवधि का उन पर भी कुछ विशेष अन्तर नहीं हुआ है। विचार करने की शैली, भाषण, लेखन जैसी मानवी विशेषताओं का इतने दिन बाद भी कुछ शिक्षण नहीं हो पाया है। यहाँ तक कि घर बनाना, कल के लिए आवश्यक वस्तुओं का संकलन का विचार तक नहीं उठा है। दैनिक जीवन में काम आने वाले उपकरण तक उनके पास नहीं हैं। जबकि मनुष्य ने दो शताब्दियों में ही इतने वैज्ञानिक उपकरण उपलब्ध कर लिये हैं कि उसकी स्थिति कहाँ से कहाँ पहुँची। रेल, मोटर, जलयान, वायुयान, तार, रेडियो एवं बारूदी अस्त्र हाथ में आ जाने से उसकी शक्ति अनेक गुनी बढ़ गई है। भाषा लिपि के साथ विचार विज्ञान का भी असाधारण विकास हुआ है। जबकि जिन वानरों को मनुष्य का पूर्वज कहा जाता है तो अच्छी तरह दो पैरों के सहारे तक चलना न सीख पाये। यह कारण बताते हैं कि जीव विकास का वह क्रम ठीक नहीं है, जो डार्विन ने बताया है। मनुष्य का अपना इतिहास जितना लम्बा है उतनी अवधि में उसकी आकृति−प्रकृति में अन्तर हुआ होता। या फिर अब वह कुछ ऐसे प्रयत्न कर रहा होता जिससे उसकी अगली पीढ़ी कुछ से कुछ बन जाती।

मौसम और आहार की सुविधा के दैनिक दबाव से विवश होकर अन्य प्राणियों ने अपनी स्थिति के अनुरूप यत्किंचित् सुधार किये हैं या इन्हीं समस्याओं से टकराकर अपना अस्तित्व गँवा बैठें हैं। यदि वस्तुतः प्राणी प्रगतिशील रहे होते तो उनने प्रकृति को अनुकूल बनाने के लिए कुछ तो प्रयत्न किया ही होता। पर देखते हैं कि सब प्राणी यथावत् हैं।

मनुष्य अपने आप में सर्वांगपूर्ण है। उसकी पूँछ गायब नहीं हुई है वह सदा से बिना पूँछ का ही था। चार पैर से वह कभी नहीं चला। उसकी प्रकृति ही दो पैर से चलने की है। दो वर्ष का होते−होते अभिभावकों की भाषा बोलने लगते हैं और वैसे ही स्वभाव की प्रकृति बना लेता है। यह मौलिकता है विकास क्रम नहीं। जब अन्य किसी प्राणी में न पाई जाने वाली विचारणाएँ, भावनाएँ, आकाँक्षाएँ, मान्यताएँ, कुशलताएँ मनुष्य की मौलिक हैं तो फिर यही मानना पड़ेगा कि यह भी मौलिक ही है।

यह मौलिक विशेषताएँ इतनी तीव्रता से कैसे बढ़ीं। इसका उत्तर यह हो सकता है कि मनुष्य की सूक्ष्म संरचना एवं वंश परम्परा ऐसी है जो सम्भवतः अन्य किसी लोकसेवी परिजनों से उसे विरासत में मिली हों। मनुष्य के देव पुत्र होने की सम्भावना बहुत कुछ सही प्रतीत होती है।

सृष्टि की आदिम अवस्था में मनुष्य ने जो संरचनाएँ की हैं, वे उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए किसी प्रकार सम्भव दिखाई नहीं पड़ती। उदाहरण के लिए मिश्र के पिरामिडों को लिया जाय। जिस इलाके में दूर−दूर तक पत्थर नहीं हैं वहाँ इतने भारी पत्थर, इतनी ऊँचाई पर इतनी कुशलतापूर्वक परस्पर फिट किये जाना। असाधारण कठिनाई का काम है। आज का विकसित विज्ञान जिस वास्तु कला पर आश्चर्यचकित है वह उपकरणों के सर्वथा अभाव वाले समय में किस प्रकार बन पड़े होंगे। इसके उत्तर में हमें उन लोगों के अनुग्रह की ओर ताकना पड़ता है, जिनका वंशज मनुष्य रहा है।

पुरातन काल के निर्माणों में जो कुछ भी आश्चर्यजनक है, वह ऐसा है जो काल गणना ज्योतिर्विज्ञान से सम्बन्धित है अथवा अन्य लोकों के साथ आवागमन की रहस्यभरी कुँजियाँ खोलता है। यों तो देव पूर्वजों का पृथ्वी के हर भाग में आवागमन रहा है। पर अधिकता उस क्षेत्र में रही है जहाँ से आवागमन उनके लिए सुविधाजनक पड़ता रहा हो अथवा मार्ग न भटकने के संकेत सिगनल सुविधापूर्वक मिल जाते हों।

पिरामिडों के मात्र फराहो के मकबरे नहीं माना जाना चाहिए। उनमें ऐसे रहस्य भरे तथ्य भरे पड़े हैं जो अन्य लोकों से आवागमन की कड़ी जोड़ते हैं। दक्षिण अफ्रीका में कुछ समय पूर्व मय सभ्यता का वर्चस्व रहा है। उस क्षेत्र में उपलब्ध ध्वंसावशेषों का सीधा सम्बन्ध ज्योतिर्विज्ञान से जुड़ता है। कहना न होगा कि अंतर्ग्रही आवागमन के लिए आवश्यकता सही काल गणना की पड़ती है। दक्षिण अमेरिका का सूर्य मन्दिर आदि से अन्त तक तत्कालीन पंचांग है, जिसमें 10 महीने 24 दिन के और दो महीने साठ−साठ दिन के हैं। उस हिसाब से भी सूर्यग्रहण चन्द्रग्रहण आदि का हिसाब ठीक बैठ जाता है। आकाश पर चढ़कर देखी जा सकने वाली चमकीली रेखाएँ इस तरह सही बनाई गई हैं जिससे उच्चस्तरीय कौशल भली प्रकार प्रकट होता है।

पिरामिडों के बारे में अब तक मात्र वास्तुकला पर ही आश्चर्य किया जाता था। पर पृथ्वी के सही अक्षांशों पर उनका निर्माण हुआ। ऐसी वस्तुओं का प्रयोग होना जो धरती के वातावरण का दबाव सहन कर लेती हैं, एक नयी बात है। पिरामिडों की छत में पाये जाने वाले छिद्र मात्र सूराख नहीं ग्रह तारकों की नाप−तौल करने के लिए सोद्देश्य विनिर्मित खिड़कियाँ हैं।

कुतुब मीनार का लोहा इस प्रकार बनाया गया है जिस पर धरती के मौसम का प्रभाव नहीं पड़ता। इस लोहे की लाट का टुकड़ा ऐसी ही धातु का बना हुआ है जो लाखों वर्ष पुराना हो जाने पर भी धरती के मौसम से प्रभावित नहीं हुआ है।

नील नदी के तटवर्ती क्षेत्र में इस तरह की आकृतियाँ पाई गई हैं जिनमें अन्तरिक्ष यानों और उनमें बैठकर आने जाने वालों के स्तर, डिजाइनों का पता चलता है। रूस में भी एक शिलाखण्ड पर ऐसी ही प्रतिमाओं का अंकन पाया गया है, जिससे अनुमान लगता है कि पृथ्वी और आकाश के बीच आवागमन में किस प्रकार वाहन, वस्त्र, उपकरण आदि का प्रयोग होता रहा होगा।

ईस्टर द्वीप में बनी हुई विशाल काय प्रतिमाएँ−उस वीरान जगह में कैसे बनी होंगी?, किस उद्देश्य के लिए बनाई गई होंगी?, इसकी संगतियाँ बिठाने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि इसके पीछे अंतर्ग्रही रहस्य हैं। कुछ समय पहले अमेरिका के सुविस्तृत क्षेत्र पर मोटी चिनगारियों की वर्षा हुई थी पर वे जमीन तक पहुँचने से पहले ही बुझ गईं। किसी का किसी प्रकार का नुकसान नहीं हुआ। इसे भी लोकोत्तर जीवधारियों का क्रियाकलाप माना गया था।

साइबेरिया के ऊपरी क्षेत्र में लगभग 3000 फूट ऊँचा एक विस्फोट हुआ था। जिसका प्रकाश तीन दिन हजारों मील के दायरे में छाया रहा। किन्तु उस गिरी हुई वस्तु का जमीन पर कोई अता−पता न लगा। उसकी झुलसन से पेड़-पौधे तथा प्राणी अवश्य नष्ट हो गए। अनुमान लगाया जाता है कि यह किसी अन्तरिक्ष यान की रास्ते में खराबी होकर गिरने का चिन्ह है।

ऐसी−ऐसी और भी कितनी ही कृतियां इस पृथ्वी पर पाई जाती हैं, जिससे प्रतीत होता है कि अब तक की विकसित सभ्यता के बलबूते ऐसे निर्माण कार्य बन नहीं सकते।

पौराणिक कथा गाथाओं में अन्तरिक्षीय आवागमन में अगणित प्रसंग हैं। नारद इस विद्या में प्रवीण माने जाते हैं। अन्य लोकवासियों पर मुसीबत आने पर अर्जुन, दशरथ आदि उनके आमन्त्रणों के सहारे पहुँचे हैं और अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति के उपरान्त लौटकर वापस आये थे।

कुन्ती ने पाँच पुत्र देवता पाँच प्रमुख देवताओं के अनुग्रह से प्राप्त किये थे। सुर और असुर दो वर्ग के अतिमानव पृथ्वी पर अथवा उसके निकटवर्ती क्षेत्र में निवास करते रहे हैं। उनकी आकृति, प्रकृति, क्षमताएँ तथा विभूतियाँ−पृथ्वीवासियों की तुलना में कहीं अधिक थीं। इन कथनोपकथनों को यदि तथ्यपूर्ण माना जाय तो इस निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ेगा कि धरती के साथ−देवलोक वासियों के कुछ समय तक घनिष्ठ सम्बन्ध रहे हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ब्रह्माण्डों में अरबों−खरबों लोकों में से कुछ हजार ऐसे अवश्य हो सकते हैं, जिनमें मनुष्य से तालमेल खाती हुई सभ्यताएँ रह रही हों और वे लोग पृथ्वी निवासियों को प्रगतिशील बनाने में समय−समय पर किसी न किसी प्रकार की सहायता करते रहें हों। सम्भव है, मनुष्य देवताओं का वंशज रहा हो।




स्वप्नों के माध्यम से शरीर और मन की विवेचना - Akhandjyoti February 1985

जो आज पीड़ित है या होने वाला है उसकी कष्ट पीड़ित या उलझन भरी स्थिति स्वप्न में दिखाई पड़ने पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ किसी रोग ने जड़ जमा ली है। ऐसे स्वप्न एकाकी दिखाई पड़ते हैं। उनके साथ अलग से जंजाल गुँथा हुआ नहीं होता। घर गृहस्थी की, काम धंधे की, तिजारत व्यापार की बातें जन स्वप्नों के साथ जड़ी हुई ही होती।

जिस अंग में पीड़ा है उसी को कोई दवा रहा है, मालिश कर रहा है, जाँच पड़ताल कर रहा है ऐसा प्रतीत होता है। पीड़ा का प्रवेश हो रहा है, या निकल रही है ऐसा प्रतीत होता है। कभी−कभी ऐसा भी लगता है कि कोई अन्य व्यक्ति यह सलाह दे रहा है कि तुम्हारे इस अंग में कुछ गड़बड़ी मालूम पड़ती है। कभी कोई व्यक्ति किसी औषधि सेवन की सलाह देता है। कभी−कभी ऐसा भी होते देखा गया है कि इसके स्थान पर अमुक वस्तु लेनी चाहिए। पीड़ित अंग का संकेत ऐसे स्वप्नों में अवश्य होता है। कभी अच्छा होने का कभी स्थिति बिगड़ने की सूचना भी किसी मित्र शत्रु परिचित अपरिचित के मुख से सुनाई पड़ती है। किन्हीं स्वप्नों में अपनी और किसी दूसरे से पूछा जाता है और किन्हीं में अपनी ओर से किसी दूसरे से परामर्श दिया जाता है।

कई बार अपने से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता किसी तीसरे व्यक्ति की चर्चा से रोग का प्रसंग आ जाता है। इलाज का प्रसंग तो नहीं बन पड़ता पर सहानुभूति स्वरूप देखने के लिए कोई आता है या हम स्वयं किसी को सहानुभूति दिखाने जा पहुँचते हैं। कभी कोई महामारी फैलती है उससे अनेकों व्यक्ति आक्रान्त होते हैं। स्वयं सेवकों की तरह उनकी सेवा करने पहुँचते हैं। या भयभीत होकर सुरक्षा के लिए वह स्थान छोड़कर अन्यत्र कहीं जाने के लिए चल पड़ते हैं। इन सभी प्रकार के स्वप्नों की किस्में यह बताती हैं कि शरीर के किसी भाग में रोग का प्रवेश हो चुका है या होने वाला है।

कभी−कभी मृत्यु के स्वप्न भी दिखते हैं। हम मर गये या कोई और मर रहा है। किसी की मरण यात्रा में अपना या अपने मित्रों का जाना हो रहा है, यह मात्र चेतावनी होती है। मृत्यु का स्वप्न शुभ माना गया है। उसमें अनिष्ट की आशंका नहीं होती। उनसे भयभीत होने की जरूरत नहीं है और ऐसी आशंका नहीं करनी चाहिए यह दुर्घटना अपने साथ घटेगी। कभी−कभी दूसरों की मृत्यु के सपने किन्हीं सम्बन्धियों, पड़ोसियों के सम्बन्ध में घटित होते देखे गये हैं। कई बार अपने किसी अवयव में हलकी चुभन, दर्द या जलन का अनुभव होता है। नींद खुलती नहीं। सपना चलता रहता है। यह संकेत है कि उसके अंग में कुछ होने वाला है।

किसी अन्य व्यक्ति को किसी गम्भीर रोग से ग्रसित देखा जाय, उस प्रकार के समाचार मिलें, अपने को चिन्ता होने लगे और उसके रोग का इलाज कराने की पूछताछ करने की भाग−दौड़ करनी पड़े तो समझना चाहिए, कि प्रत्यक्षतः इस समय वह रोग अपने में नहीं है तो नहीं भविष्य में वैसा होने की आशंका है नहीं। किसी पुस्तक या पत्रिका का किसी रोग विशेष के सम्बन्ध में लेख पढ़ने को मिले तो भी कुछ दाल में काला होने की आशंका समझी जा सकती है।

जो रोग अपने को अभी है उसका विवेचन चल पड़े तो समझना चाहिए कि यह अब अच्छा होने की स्थिति में आ पहुँचा। जो नहीं है उसका ऊहापोह चलना इस बात का चिन्ह है कि नवागन्तुक रोग के आक्रमण होने की आशंका है। चिकित्सा जोरों से चल रही हो और किसी श्रद्धा भाजन चिकित्सा द्वारा अमुक उपचार करने का प्रबन्ध किया जा रहा हो या परामर्श किया जा रहा हो तो समझना चाहिए कि रोग का अन्त समीप है।

यही घटनाक्रम स्त्री बच्चों या किसी घनिष्ठ कुटुम्बी के सम्बन्ध में घटित होता दिखाई पड़े तो समझना चाहिए कि यह उनके सम्बन्ध में पूर्व सूचना है।

इन सूचनाओं का तात्पर्य यह नहीं है कि अकाट्य भवितव्यता समझकर हाथ पैर फुला लिये जाँय और चिन्ता में डूब जाया जाय वरन् मात्र इतना है कि पूर्व सूचना के आधार पर अधिक सतर्कता बरती जाय और नये सिरे से शरीर का पर्यवेक्षण कराया जाय। कहीं कोई आशंका परिलक्षित हो तो समय रहते पर्यवेक्षण तथा निराकरण का दुहरा मार्ग अपनाया जाय। सतर्कता बुद्धिमानी की निशानी है। उसके सहारे अशुभ को भी टाला जा सका है और आशंका को निरस्त किया जा सकता है।

कई बार बहुत छोटी बात भी स्वप्न में बड़ी दिखाई पड़ती है। जैसे अपच होने पर पेट भारी रहता है। वायु रुक जाने से भारी पेट मालूम पड़ता है। मितली आती है और मुँह में खट्टा पानी भर आता है। यह सामान्य अपच के चिन्ह हैं आवश्यकता से अधिक खा जाने पर पेट पर छाया भारीपन स्वप्न में बढ़े−चढ़े रूप में दिखता है। लगता है पेट पर कोई बड़ा संकट आ गया। नींद खुलने पर उसका साधारण उपचार कर लेने, दस्त की एक गोली खा लेने पर से वह कठिनाई दूर हो जाती है। यदि कोई इस कारणवश कोई भयंकर स्वप्न देखने लगे और परेशानी होने लगे तो परेशानी व्यर्थ है नींद गहरी हो और मल−मूत्र त्यागने की अच्छा हो तो स्वप्न में इसके लिए स्थान तलाश करने के लिए जाना पड़ता है पर उपयुक्त स्थान नहीं मिलता। इस पर रात्रि में आँखें खुल जाती हैं। यह शारीरिक परेशानियों का स्वप्न रूप में प्रकट होने का प्रसंग हुआ। दूसरा क्षेत्र मानसिक है। उस क्षेत्र की उलझनें भी विग्रह बनकर प्रकट होती हैं।

किसी के साथ झगड़ा झंझट चल रहा हो। आक्रमण करने या होने की स्थिति बन रही हो तो वह बड़ी मार−काट के रूप में दिखाई देगी। सोते समय क्रोध में भरकर सोचा जाय तो ऐसे सपने दिखते रहेंगे कि उस व्यक्ति को अथवा किसी और को नीचा कैसे दिखाया जाय। इसके द्वारा अपने विरुद्ध षड़यन्त्र रचे जाते दिखाई पड़ते हैं। आर्थिक हो चुकी हो या होने वाली हो तो चोरी हो जाने जैसे सपने दिखाई देते हैं। बुरे सपने अधिक दिखते हैं उत्साहवर्धक कम। लाटरी खरीदने वाले, सट्टा लगाने वाले हर महीने सैकड़ों रुपये बहाते खर्च करते रहते हैं। पर इस आधार पर लाभ होने के स्वप्न कदाचित् ही दिखाई पड़ते हैं क्योंकि अचेतन मन पहले से ही यह मानकर चलता है कि यह निरर्थक माया जाल है। यदि यह सही रहा होता तो अपने जैसे असंख्यों लखपति करोड़पति हो गये होते। परीक्षा के दिनों में पढ़ाई अच्छी हुई है तो पास होने के सपने दिखे हैं और पढ़ाई में मन चुराते रहे हैं तो अंतर्गत वस्तुस्थिति समझता है और फेल होने के सपने दिखावेगा।

वस्तुतः स्वप्न मन के दर्पण हैं, विशेषतया अंतर्मन के। रहस्यमयी परतों का उनमें उभार−स्पष्टीकरण होता है। इनमें से सर्वथा निरर्थक कम होते हैं। शेष की व्याख्या विवेचना की जाय तो अपनी मनःस्थिति की जानकारी इस आधार पर अच्छी तरह प्राप्त की जा सकती है।

एक आदमी रस्सी में गाय बाँधकर घर लिये जा रहा था। रास्ते में दो फकीर उसे देखते हुए उधर से गुजरे। उनमें से एक बोला− आदमी ने गाय बाँध रखी है। दूसरे ने कहा−नहीं, गाय ने आदमी को बाँध रखा है। बात दोनों की किसी कदर सही थी। रस्सी का एक सिरा आदमी के हाथ में था दूसरा गाय के गले में। दोनों एक दूसरे को जकड़े हुए थे।

दोनों फकीरों में से किसका कहना अधिक सच है, यह जानने के लिए रस्सी आदमी के हाथ से छुड़ा दी गई। गाय जंगल की तरफ भागी और आदमी उसके पीछे−पीछे दौड़ा।

बूढ़े फकीर ने कहा− ‘‘देखा न, गाय ने ही आदमी को जकड़ रखा है न। आँखें खोलकर देखो−कौन किसके पीछे भाग रहा है।” आज संसार में यही तो हो रहा है। माया-वैभव ही आदमी को नचाता दिखाई पड़ता है।




साधना से सिद्धि - Akhandjyoti February 1985

सिद्धि के लिए−सफलता के लिए−साधना की अनिवार्य आवश्यकता मानी है। कहा गया है कि साधक को सिद्धि मिली है। जो सिद्धि चाहते हैं पर साधना से जी चुराते हैं उन्हें असफल रहना पड़ता है। भले ही वे उसका दोष किन्हीं व्यक्तियों, परिस्थितियों, ग्रह नक्षत्रों को लगाते रहें।

संसार में हर वस्तु मूल्य देकर खरीदी जाती है। मुफ्त में ही सड़क पर पड़ा हुआ कूड़ा−करकट ही कोई समेट सकता है। बहुमूल्य मोती बीनने वाले को समुद्र की तली से गहरे गोते लगाने पड़ते हैं। इतना ही नहीं सफल गोताखोर बनने के लिए उस कला ही बारीकियाँ समझने और प्रवीणता प्राप्त करने के लिए मुद्दतों का समय लग जाता है।

कहा जाता है कि साधना बारह वर्ष में पूरी होती है और तब इस योग्य बनती है कि अभीष्ट सफलता के दर्शन हो सकें। यह बात अध्यात्मिक साधनाओं के लिए ही नहीं साँसारिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए समान रूप से सही है। कलाकार, संगीतकार, गायक, वादक, बनने के लिए जो महीने पन्द्रह दिन का समय पर्याप्त समझते हैं वे भूल करते हैं। साधक को कई मंजिलें पार करनी पड़ती हैं। उसमें सबसे पहली कठिनाई है। चित्त की ऊब से निपटना। बाल बुद्धि में अस्थिरता होती है वह अधिक देर किसी काम पर नहीं टिकती। बच्चे अभी बालू का महल बनाते हैं। वह बन नहीं पाता कि टहनियाँ तोड़कर बगीचा लगाना आरम्भ कर देते हैं। वह भी जब तक पूरा नहीं हो पाता कि तीसरा आरम्भ करते हैं और फिर चौथे पांचवें का सिलसिला चला देते हैं। मन की उतावली चाहती है कि जिस प्रकार चिन्तन में जल्दबाजी मची रहती है उसी उतावली से काम भी बनते चले जाँय। पानी के बबूले उठते तो बहुत जल्दी हैं पर उन्हें फूटने में भी देर नहीं लगती। यह खेल−खिलवाड़ की दृष्टि से तो ठीक है पर महत्वपूर्ण कार्यों के लिए जितना श्रम और समय चाहिए उसे देखते हुए उतावली का कोई मूल्य नहीं है।

शेख-चिल्ली की कहानी सभी ने सुनी होगी। वह तेल का मजूरी से मिलने से पहले ही मुर्गी−मुर्गी से बकरी−बकरी से भैंस−भैंस से मकान−मकान में बीबी, बीबी के बच्चे होने की योजना बनाने लगा था। उतावली इतनी थी कि तेल का घड़ा सिर से गिर गया और मजूरी मिलना तो दूर मालिक के लात घूँसे खाने पड़े। यह कहानी सच न भी हो तो भी हममें से अधिकाँश के ऊपर लागू होती है। जो योजनाएँ तो बड़ी बनाते हैं और आकर्षक भी। पर उन्हें पूरा करने के लिए जिस एकाग्रता, श्रमशीलता एवं धैर्य की आवश्यकता है उनमें से एक भी सँजोते नहीं, सफलता चाहते हैं। पर साथ ही इस बात के लिए भी व्याकुल रहते हैं कि उसके लिए निरंतर अभ्यास न करना पड़े और जब तक प्रवीणता प्राप्त होने के लिए परिश्रम की आवश्यकता है उतनी देर प्रतीक्षा न करनी पड़े। इस उतावली में कितने ही व्यक्ति एक काम भारी उत्साह के साथ पकड़ते हैं और जब हथेली पर सरसों नहीं जमती तो अधीर हो जाते हैं। उस निराशा में जो कर रहे थे उसे छोड़ बैठते हैं और फिर कोई नया काम अपनाते हैं। उसमें भी देर तक मन नहीं लगता और इस प्रकार एक के बाद दूसरे अधूरे काम छोड़ने और उन असफलताओं का दोष जिस−तिस पर लगाते हुए भाग्य को कोसते हैं। इस प्रकार मनोबल टूट जाता है और थोड़े समय में−सामान्य परिश्रम से बन पड़ने वाले काम भी पूरे नहीं हो पाते।

किसी भी महत्वपूर्ण काम की सफलता के लिए आवश्यक योग्यता की वृद्धि, अभीष्ट साधन एवं अनवरत श्रम की आवश्यकता होती है। इतने पर भी बीच−बीच में परिस्थितिवश असाधारण कठिनाइयाँ आतीं और असफलताएँ दिखती रहती हैं। जो इतने भर से घबरा गये उन्हें निराशा घेर लेती है।

एक विद्वान का कथन है कि हर असफलता यह बताती है कि जितने साधन और श्रम की आवश्यकता थी उसमें कमी रह गई। इसलिए अबकी बार उसे दूने उत्साह के साथ करना चाहिए। राणा प्रताप जैसे अनेकों योद्धाओं को जीवन भर कठिनाइयाँ और असफलताएँ घेरे रहीं। पर उनने मन मलीन नहीं होने दिया और एक तरह न सही दूसरी तरह निश्चित लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयत्न किया।

ईसा−मसीह आजीवन अपने निश्चित संकल्प की पूर्ति में लगे रहे, फिर भी सफलता नाम मात्र की मिली और शूली पर चढ़ना पड़ा। इतना होते हुए भी उनकी न तो प्रशंसा हुई न अप्रतिष्ठा। क्योंकि वे आरम्भ से लेकर अन्त कर संकल्पपूर्वक अपनी साधना में लगे रहे। सफलता का अपना महत्व है पर साधना पथ पर अन्त तक आरूढ़ रहना यह भी कम महत्व की बात नहीं है। उससे मनुष्य की गरिमा घटती नहीं है।

आध्यात्मिक साधनाओं के मार्गदर्शक अपने शिष्यों को कहते हैं कि अपनाये हुए मार्ग पर जन्म-जन्मान्तरों तक आरूढ़ रहना चाहिए। एक जन्म में लक्ष्य पूरा न हो सके तो बिना उदास हुए उसे अगले जन्म में पूरा करने का संकल्प सुनिश्चित रखना चाहिए। जिनका मनोबल इतना प्रबल होता है ऐसे ही साधक सिद्ध पुरुष बनते हैं।

अनेकों वैज्ञानिक ऐसे हुए हैं जिन्हें अपनी शोध में सारा जीवन खपा देना पड़ा। तब उन्हें कुछ प्रकाश हाथ लगा। ऐसा भी हुआ है कि उनके प्रयास से लाभ उठाकर अगली पीढ़ी के वैज्ञानिक ने सफलता सम्पन्न की। शब्द कोश बनाने जैसे समय साध्य कार्य कभी−कभी एक पीढ़ी के लोग पूरा नहीं कर पाते तब छोड़ा हुआ काम अगले लोग पूरा करते हैं। इससे उन पर कोई असफलता का दोष नहीं मढ़ता वरन् धैर्य और साहस की प्रशंसा की होती है। कलाकारों में से कितने ही हुए हैं जो अपने विषय के प्रवीण पारंगत बने। जबकि आरम्भ में उनकी सामान्य बुद्धि उपहासास्पद लगती थी। लगन बड़ी चीज है। तत्परता का बड़ा महत्व है, वह कालिदास जैसे मूर्खों की लगन की कसौटी पर कसने के उपरांत मूर्धन्य होने का श्रेय प्रदान करती है। अमेरिका की खोज निकालने वाले कोलम्बस की लम्बी समुद्री यात्राओं और बीच−बीच में आती रही प्राणघाती असफलताओं को जो जानते हैं उन्हें मनुष्य की तत्परता का मूल्य समझने का अवसर मिलता है।

जो काम करना हो उसे समझ सोचकर किया जाय। अपनी सामर्थ्य, साधन, परिस्थिति आदि का आरम्भ में ही अनुमान लगा लिया जाय। मार्ग की कठिनाइयों की कल्पना कर लेने में हर्ज नहीं, इतने पर भी यदि अपना धैर्य और साहस साक्षी देता हो तो संकल्पपूर्वक उस मार्ग पर कदम बढ़ाना चाहिए। बढ़ाने के उपरान्त उस पर दृढ़ रहना चाहिए। प्रयास की दिलचस्पी घटने नहीं देनी चाहिए। ऐसी मनःस्थिति ही साधना कही जाती है। और साधना यदि सच्ची हो तो वह सिद्धि के लक्ष्य तक पहुँच कर रहती है। साधना के लिए एक मोटी अवधि बारह वर्ष की निर्धारित की गई है। जिनमें इतने समय का धैर्य और उत्साह होता है वे देर सबेर में−सिद्ध पुरुष सफल मानव होकर रहते हैं।




पण्डित गंगाधर शास्त्री (kahani) - Akhandjyoti February 1985

मिथिला के पण्डित गंगाधर शास्त्री एक विद्यालय में पढ़ाते थे। उनका लड़का गोविंद भी उसी विद्यालय में पढ़ता था। गोविन्द भी पिता की तरह शिष्ट और अनुशासन−प्रिय था। सहपाठी उसको बहुत स्नेह और सम्मान देते थे। एक दिन शास्त्री जी के साथ गोविन्द विद्यालय नहीं पहुँचा। स्कूल बन्द करके जब वे चलने लगे तो विद्यार्थियों ने पूछा− गोविन्द आज क्यों नहीं आया? शास्त्री जी ने भारी मन से कहा− गोविन्द को अचानक दौरा पड़ा और वह वहाँ चला गया जहाँ से फिर कोई नहीं लौटता।

विद्यार्थी स्तब्ध रह गये। साथी के निधन का भारी दुःख हुआ। साथ ही इस बात का आश्चर्य भी ऐसी दुर्घटना होने पर भी शास्त्री जी पढ़ाने कैसे आ सके और बिना माथे पर शिकन लाये किस प्रकार रोज जैसी कथा कहते रहे। अपना असमंजस लड़कों ने शास्त्री जी के सामने प्रकट भी किया। पण्डित जी ने उत्तर दिया− बच्चों, पिता के हृदय से गुरु का कर्त्तव्य बड़ा होता है।




सम्भावित घटनाक्रमों के पूर्वाभास - Akhandjyoti February 1985

साधारणतया यही समझा जाता है कि घटना का आसार बनने अथवा उसके घटित होने पर उसकी जानकारी प्रकट होती है। किन्तु−कई बार ऐसा भी देखा जाता है कि वैसी कोई पूर्व भूमिका न होने पर भी कईयों को पूर्वाभास मिल जाता है। इसमें जानकारी प्राप्त करने वाले की विशेष अतींद्रिय क्षमता की तो पुष्टि होती ही है, साथ ही यह भी प्रकट होता है कि घटनाओं का पूर्व उपक्रम अदृश्य जगत में बनता रहता है। ऐसा कैसे होता है, यह एक आश्चर्य का विषय है। क्या सब कुछ पूर्व निर्धारित है? क्या निर्धारित विधि-विधान के अनुसार ही संसार का घटनाक्रम चल रहा है? यदि ऐसा है तो मनुष्य के प्रयास पुरुषार्थ का क्या मूल्य रहा? यह गुत्थी वस्तुतः बहुत पेचीदा है और उसका स्पष्ट उत्तर नहीं दिया जा सकता। फिर भी यह तथ्य स्वीकारने योग्य है कि कइयों को भवितव्यता का पूर्वाभास होता है।

अमेरिका के सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एलेक्स टैनस अपने भाग्य निर्णायक भविष्यवाणियों के लिए प्रख्यात हैं। 23 अगस्त 1980 को अमेरिका सोसाइटी फार साइकिकल रिसर्च द्वारा आयोजित एक इंटरव्यू में एलेक्स ने एक दुखद भविष्यवाणी टैप कराई। उन्होंने बताया कि न्यूयार्क सिटि के डैकोटा एपार्टमेन्ट में कुछ महीने के अन्दर ही एक प्रसिद्ध राक स्टार की अनिश्चित समय में हत्या कर दी जायगी। जिसके कारण बहुत से लोग प्रभावित होंगे। प्रभावित होने कारण उसकी प्रसिद्ध होगी।

इस टैप को 5 सितम्बर 1980 को एक शो में लोगों को सुनाया गया। 8 दिसम्बर को विश्व प्रसिद्ध राक म्यूजिसियन जान लेनन को उनके निवास स्थान डैकोटा के दरवाजे पर गोली मारकर हत्याकर दी गई। भविष्यवाणी करते समय टैनस ने किसी का नाम नहीं बताया था परन्तु टैप करने वाले ली स्पीजल ने छः प्रख्यात सितारों की एक सूची बनाई थी जिसमें जान लेनन का नाम प्रथम था।

सन् 1979 में फिलाडेल्फिया स्थित अपने मकान में हेलेन टिलोट्सन नामक एक महिला सो रही थी। 5 बजे सुबह किसी ने दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलने पर हेलन ने देखा कि सामने उसकी माँ खड़ी हुई थी। वह कह रही थी− हेलेन क्या तुम यहाँ हो? मुझे अन्दर आने दो।

जैसे ही हेलेन ने दरवाजा खोला उसकी माँ, जो सड़क के पार बने अपने मकान में रह रही थी, कहने लगी कि कुछ मिनट पहले उसका दरवाजा क्यों खटखटाया गया। हेलेन ने बताया कि वह तो रात्रि 11 बजे से अब तक सोती रही, बीच में जगी ही नहीं। जबकि श्रीमती टिलोट्सन का कहना था कि हेलेन, तुम्हीं ने तो मुझे जगाया है। मैंने तुझे देखा है और तुमसे बातें की हैं परन्तु तुम मौन रही और अपने पीछे आने का इशारा कर चली आई।

कुछ देर बाद सबने देखा कि श्रीमती टिलोट्सन के कमरे से धुँआ उठा और जोर से एक धमाके के साथ पूरा मकान ध्वस्त हो गया। इस दृश्य को देखकर फायर चीफ ने कहा− इसमें कोई सन्देह नहीं था कि यदि श्रीमती टिलोट्सन उस मकान में सो रही होती तो निश्चय ही उनकी मृत्यु हो गई होती।

सिनसिनैटी, ओहियो के एक आफिस मैनेजर 23 वर्षीय नवयुवक डेविड बूथ को रात्रि में सोते समय दस दिनों तक लगातार एक ही दुःस्वप्न दिखाई देता रहा। स्वप्न में जो दृश्य दिखाई देता वह अमेरिकन एयर लाइन्स के डी-10 जेट लाइनर वायुयान का था जो अपने रास्ते से मुड़कर बलखाता हुआ जमीन पर आते-आते रक्तिम वर्ण के नरक में परिणित हो जाता है। तथा उसमें सवार सभी यात्री मारे जाते हैं। यह स्वप्न इतना स्पष्ट होता था जैसे डेविड किसी दृश्य को टेलीविजन पर देख रहा हो। डेविड को निश्चय हो गया कि कोई अनहोनी घटना घटित होने वाली है।

22 मई 1979 को मंगलवार के दिन डेविड ने ग्रेटर सिनसिनैटी इंटरनेशनल एयर पोर्ट के फेडरल एविएसन एडमिनिस्ट्रेशन, अमेरिका एयर लाइन्स और सिनसिनैटी विश्वविद्यालय के एक मनःचिकित्सक को अलग−अलग फोन करके स्वप्न में देखे गये दृश्य का हवाला दिया। संयोग से 26 मई को अमेरिकन एयर लाइन्स का एक जेट लाइनर डी-10 शिकागो के ओ’ हेयर इंटर नेशनल एयरपोर्ट पर उड़ान भरते ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया। उसमें सवार सभी 275 यात्री काल कवलित हो गये। अमेरिका के इतिहास में यह सबसे बड़ी हवाई दुर्घटना थी।

फेडरल एविएसन एडमिनिस्ट्रेशन ने जब डेविड बूथ द्वारा बताये गये स्वप्नों से इस दुर्घटना की जाँच करके मिलाया तो दोनों दृश्य अक्षरशः समान निकले।

स्पेन के एक होटल मालिक जेम कास्टेल की धर्मपत्नी छह माह से गर्भवती थी। एक स्वप्न में जेम ने सुना कि गर्भस्थ शिशु उससे कह रहा है कि तुम मुझे देख नहीं पाओगे। जेम्स कास्टेल को विश्वास हो गया कि शीघ्र ही उसकी मृत्यु होने वाली है। अतः जल्दी में उसने दस लाख डालर का अपना बीमा करा लिया।

कुछ सप्ताह बाद जेम होटल से वापस घर की ओर अपनी कार में बैठा 50 एम पी एच की रफ्तार से आ रहा था। सामने से विपरीत दिशा में 100 एम पी एच गति से आती हुई एक दूसरी कार कास्टेल की कार के ऊपर चढ़ गई। इस दुर्घटना में कास्टेल और उनके कार चालक की मृत्यु हो गई। कम्पनी ने श्रीमती कास्टेल को बीमे की राशि का तुरन्त भुगतान कर दिया।

4 दिसम्बर 1978 को एडवर्ड पियर्सन नामक व्यक्ति को स्काटलैण्ड में इन्वर्नेस से पर्थ की ओर बिना टिकट के यात्रा करने के अपराधी में गिरफ्तार कर लिया गया। अगले दिन पर्थ की कोर्ट में उपस्थित किया गया, जहाँ पियर्सन ने परिचय पूछे जाने पर अपने को “एक बेरोजगार भविष्य वक्ता” बताया और कहा कि वह इस रास्ते से लन्दन को जा रहा था जहाँ पर्यावरण के मन्त्री को यह सूचित करना था कि अतिशीघ्र ही ग्लैस्गो में भयंकर भूकम्प होने वाला है।

एडवर्ड पियर्सन की यह कहानी 6 दिसम्बर के डण्डी क्यूरियर एण्ड एडवर टाइजर में “भविष्य वक्ता ने टिकट नहीं लिया” नामक मुख्य शीर्षक प्रकाशित हुआ। तीन सप्ताह बाद ग्लैस्गो तथा स्काटलैण्ड के अन्य भागों में एक भयंकर भूकम्प आया जिससे अनेकों भवन ध्वस्त हो गए और क्यूरियर एण्ड एडवर टाइजर के पाठक अपने बिस्तरों पर लड़खड़ाने डगमगाने लगे।

ब्रिटिश आइजलेस के किसी भी भाग में इस तरह के भूकम्प की प्रक्रिया बहुत ही विरली मानी जाती है।

सन् 1972 में रेजेन्सी प्रेस ने हैरिसन जेम्स द्वारा लिखित उपन्यास का प्रकाश किया। उपन्यास का नाम था− ‘‘ब्लैक एवडक्टर” (काला अपहर्ता) और हैरिसन जेम्स का पेन नाम था−जेम्स रस्क जूनियर। उपन्यास में आतंकवादियों द्वारा एक सुप्रसिद्ध धनी दक्षिणपंथी व्यक्ति की एक लड़की के अपहरण की कहानी का वर्णन था। आतंकवादियों का ग्रुप एक काले नेता द्वारा संचालित होता है जो कालेज कैम्पस में अपने बाप फ्रेन्ड के साथ खेल रही पेट्रीसिया नामक लड़की का अपहरण कर लेता और लड़के द्वारा विरोध करने पर उसकी जमकर पिटाई की जाती है। आतंकवादी पैट्रासिया का पोलराइड फोटोग्राफ उसके पिता के पास भेजकर उस काण्ड को अमेरिका का “प्रथम राजनैतिक अपहरण” की संज्ञा देते हैं। नाटक का अन्त पुलिस द्वारा आतंकवादियों का घिराव करके अश्रुगैस छोड़ने और उन्हें मौत के घाट उतार देने में होता है।

ब्लैक एवडक्टर उपन्यास के प्रकाशन के एक महीने बाद ही दक्षिण पन्थी रन्डोल्फ हर्स्ट नामक एक धनीमानी व्यक्ति के पेट्रीसिया हर्स्ट नामक लड़की का कालेज केम्पस से सन् 1974 में सिम्बिओनीज लिवरेशन आर्मी के सदस्यों ने अपहरण कर लिया। इस आर्मी का नेता एक काले रंग का व्यक्ति था। पेट्रीसिया के ब्वायफ्रेन्ड स्टीवेनवीड को मारपीट का घायल कर दिया था। एफ. वी. आई ने स्टीवेनवीड और उपन्यासकार जेम्स रस्क जूनियर को साक्ष्य के रूप में पकड़ लिया क्योंकि जेम्स का उपन्यास सभी ने पढ़ा था। जेम्स का उपन्यास एक भविष्यवाणी की तरह सबके सामने आया। आतंकवादियों को पुलिस ने घेर लिया और अश्रुगैस छोड़कर सभी सदस्यों गैस छोड़कर सभी सदस्यों को पकड़ कर मार डाला।

शिकागो के अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न जोसेफ डि लूइस अपने भविष्यवाणियों लिए प्रख्यात हैं। जोसेफ पेशे से एक हेयर ड्रेसर हैं। भविष्यवाणियों के लिए वे एक क्रिस्टल बाल का उपयोग करते हैं जिस पर भविष्य में घटित होने वाली घटनाएँ टेलीविजन की तरह अंकित हो जाती हैं।

16 जनवरी 1969 की रात्रि को जोसेफ शिकागो की एक मधुशाला में चहलकदमी करते हुए समाचार पत्र का बेताबी से इन्तजार कर रहे थे। जोसेफ ने उपस्थित लोगों को बताया कि शिकागो से दक्षिण कुछ दूरी पर घने कुहासे के कारण दो ट्रेनों में भिड़ंत हो गई है। जिसमें सवार अधिकाँश व्यक्ति घायल हो गये और कुछेक मारे गये हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 25 वर्षों में इस तरह की यह पहली भयंकर रेल दुर्घटना है। लोगों ने जोसेफ को बताया कि समाचार पत्रों में इस प्रकार की दुर्घटना का कोई समाचार प्रकाशित नहीं हुआ और न ही रेडियो प्रसारण पर किसी प्रकार की अप्रिय घटना का समाचार सुनने को मिला।

दूसरे ही दिन 27 जनवरी को शिकागो से 45 मील दूर दक्षिण में दो इलीनोइस सेण्ट्रल ट्रेनें घने कुहरे के कारण आपस में टकरा गईं जिससे 47 व्यक्ति घायल हो गये और तीन व्यक्तियों की मृत्यु हो गई। 25 वर्षों के अन्दर इस क्षेत्र की यह सबसे बड़ी रेल दुर्घटना थी।

डि लूइस ने 14 दिसम्बर 1968 को ग्रे इन्डियाना के एक रेडियो इंटरव्यू में भविष्यवाणी की थी कि उक्त दुर्घटना पाँच अथवा छः सप्ताह के अन्दर ही घटित होगी। टेलीविजन पर और प्रेस में इस तरह की अनेकों भविष्यवाणियाँ जोसेफ डि लूइस पहले भी कर चुके थे।

जोसेफ ने 25 नवंबर 1967 को एक पुल के बैठ जाने की भविष्यवाणी की थी। तीन सप्ताह बाद 16 दिसम्बर को ओहियो नदी पर बना सिल्वर ब्रिज धँस गया जिसमें 36 व्यक्ति तत्काल काल कवलित हो गये तथा 10 व्यक्तियों का कोई पता नहीं चला।

7 अप्रैल 1968 को शिकागो में होने वाले विद्रोह की पूर्व घोषणा डि लूइस ने 4 जनवरी 1968 को ही कर दी थी।

14 दिसम्बर 1968 को डि लूइस ने अपने एक भविष्य कथन में कहा था कि केनेडी परिवार जल सम्बन्धित एक दुखांत घटना के कुचक्र में फँसेगा। उसने देखा कि इस संदर्भ में एक महिला को पानी में डूबा दिया गया। 18 जुलाई 1968 को मेरी जो कोपक्ने नामक एक महिला की चौपाक्विडिक में एक कार एक्सीडेन्ट में मृत्यु हो गई जिसे समीप के एक नदी में डुबो दिया गया। इस दुर्घटना में सीनेटर एडवर्ड केनेडी भी सम्मिलित थे।

21 मई 1969 को डि लूइस ने भविष्यवाणी में कहा था कि इन्डियाना पोलिस के सन्निकट एक जेट प्लेन दुर्घटनाग्रस्त होगा जिसमें 79 व्यक्ति मारे जायेंगे।

9 सितम्बर 1969 को सायं 3.30 बजे इन्डियाना पोलिस के निकट एलेघेनी एयरलान्स डी सी-9 एक प्राइवेट प्लेन से टकरा गया जिसमें सवार 78 यात्री तथा 4 अन्य चालक दल के सदस्य सभी मारे साथ ही प्राइवेट यान का पाइलट भी मारा गया।

मन की शक्ति अपार है। जो भी कुछ समष्टि में घटित होता है या होने वाला होता है, उसका पूर्व से ही छाया चित्र मनः पटल पर बन जाता है। न्यूरान्स की यह अतीन्द्रिय सामर्थ्य ही अनेकों भवितव्यताओं के पूर्वाभास के रूप में प्रकट होकर अपनी विलक्षण सामर्थ्य एवं असीम सम्भावनाओं का एक तनिक-सा परिचय भर देती है। साधना उपक्रमों के सहारे तो इस सामर्थ्य को और भी अधिक विकसित कर परिष्कृत रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।




Quotation - Akhandjyoti February 1985

शर शैया पर पड़े भीष्म पितामह से युधिष्ठिर ने पूछा− देव, राष्ट्र अजेय कैसे बनते हैं? उत्तर में पितामह ने कहा− तात, जिस देश में विभिन्न वर्गों के लोग एक प्राण होकर रहते हैं, जहाँ के नागरिक पुरुषार्थी और नीति परायण होते हैं। जिसमें नारी के सम्मान की रक्षा की जाती हो वह अजेय होकर रहता है।




क्या यह भवितव्यता टाली नहीं जा सकती? - Akhandjyoti February 1985

वृद्धावस्था क्यों आती है और इसके बाद मृत्यु के मुख में क्यों जाना पड़ता है, इसके अनेक कारणों में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मनुष्य के स्नायु संस्थान में काम करने वाला विद्युत प्रवाह−चुम्बकत्व क्रमशः घटता जाता है। फलतः उसकी जीवनी शक्ति क्षीण होने लगती है। इससे शारीरिक क्रिया−कलापों में वैसी समस्वरता नहीं रहती जैसी कि बचपन एवं यौवन काल में रहा करती थी।

आयु बढ़ने के साथ−साथ काय−कलेवर की स्थूलता एवं परिपक्वता भले ही बढ़ जाय पर चुम्बकत्व घटता जाता है। फलतः आकर्षक प्रभाव में न्यूनता आने लगती है। वृद्धावस्था में मनुष्य और भी अधिक अनावर्धक हो जाता है। स्वरूप में रूखापन आ जाने से दूसरों को उनके साथ रहने में रुचि नहीं रहती। दूसरों को प्रभावित करने की दृष्टि से भी वे दुर्बल पड़ते जाते हैं। चुम्बकत्व की कमी न केवल बाह्य आकर्षण एवं प्रभाव को कम करती है वरन् आन्तरिक दुर्बलता के कारण क्षति पूर्ति के लिए आवश्यक क्षमता भी अर्जित नहीं कर पाती। आमदनी से खर्च बढ़ते जाने पर दिवालिया होने की स्थिति आ जाती है। जीवन व्यवसाय में इसी को मरण कहते हैं।

यह क्रम न केवल मनुष्य पर वरन् समस्त ब्रह्माण्ड पर लागू होता है। जन्म, विकास और अवसान त्रिविधि सृष्टि प्रक्रिया ही अध्यात्म क्षेत्र में ब्रह्मा, विष्णु, महेश के नाम से परिकल्पित की गई है। उनके क्रम चक्र पर जड़ चेतन सभी को परिभ्रमण करना पड़ता है। अपना भूलोक भी इसका अपवाद नहीं है। धरती कब जन्मी थी इसका काल निरूपण विज्ञान क्षेत्र के गणितज्ञ बड़ी बारीकी से कर रहे हैं और क्रमशः तथ्य के निकट पहुँच रहे हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि पृथ्वी मरण की दिशा में भी अग्रसर हो रही है। इस मरण धर्मा संसार में जब कोई भी दृश्य पदार्थ या प्राणी अमर नहीं रह सकता तो धरती ही कैसे अपवाद हो सकती है। भूत की तुलना में भविष्य और भी अधिक उत्सुकता पूर्ण होता है, धरती कब जन्मी, कैसे जन्मी, इसका विवरण रोचक है, साथ ही यह ज्ञातव्य भी कम रोमाञ्चकारी नहीं है कि धरती मरेगी कैसे? उसे किस रोग से ग्रसित होकर कितने दिन अपंग अशक्त और इस स्थिति में रहना होगा और फिर दम तोड़ने के समय का दृश्य कैसा हृदय विदारक होगा।

प्राणियों की तरह ही पदार्थों में भी चुम्बकत्व होता है। इसी ऊर्जा को प्राणि वर्ग में प्राण कहा जाता है और पदार्थों में विद्युत कहते हैं। इसकी मात्रा जिसमें जितनी अधिक है वह उतना ही समर्थ है। इस भण्डार में कमी आने से दुर्बलता बढ़ती है और क्रमशः मरण की घड़ी समीप आ पहुँचती है धरती का मरण भी नियति की इसी क्रिया प्रक्रिया के माध्यम से सम्पन्न होगा।

“निकट भविष्य में ही धरती पर महाप्रलय होगी और उसके बाद पैदा होने वाला मानव या तो दैत्याकार होगा या वामनाकार”। यह कोरी कल्पना नहीं, बल्कि वैज्ञानिकों की लम्बी शोध के बाद की गयी भविष्यवाणी है।

धुँधले अतीत से चली आ रही जल−प्रलय की पौराणिक कथा कितनी सत्य है, यह तो नहीं मालूम, पर एक बात तो निर्विवाद सत्य है कि उस आदिकाल में कोई न कोई घटना ऐसी अवश्य हुई होगी, जिससे संसार के अधिकाँश प्राणियों का नाश हुआ होगा। अब जिस प्रलय की बात वैज्ञानिक कहते हैं वह जल प्रलय से नहीं, अपितु धरती का चुम्बकत्व लोप हो जाने की वजह से होगी। इस दिशा में जितनी जानकारियाँ एकत्र की गयी हैं, उनके अनुसार वह समय अब कुछ ही शताब्दियों बाद आने वाला है। वस्तुतः उसके लक्षण व प्राणी जगत पर दुष्प्रभाव तो अभी से ही नजर आने लगे हैं।

धरती एक विशाल चुम्बक है, जिसकी क्रोड़ में तरल पदार्थ भरा पड़ा है। पृथ्वी की सतह पर जो चुम्बकीय बल कार्य करते है, उनका उद्गम स्थल यही क्रोड़ है। यह पृथ्वी रूपी शक्तिशाली चुम्बकत्व ही है, जिसके कारण लटकती हुई कम्पास सुई इसकी बल रेखाओं के साथ सदा उत्तर−दक्षिण दिशा में संकेत करती रहती है। ‘धरती चुम्बक’ के ये 2 ध्रुव वे स्थान है, जहाँ पृथ्वी के चुम्बकत्व का प्रभाव सर्वाधिक होता है। ये चुम्बकीय ध्रुव स्थिर नहीं होते। उत्तर ध्रुव घूमकर दक्षिण की ओर व दक्षिण ध्रुव उत्तरी ध्रुव की वर्तमान स्थिति की ओर घूम रहा है। पृथ्वी के ऐसे भाग जहाँ आज गर्मी पड़ती है, किसी समय बर्फ में दबे हुए थे। वैज्ञानिकों ने विश्व के विभिन्न भागों में स्थित प्राचीन चट्टानों का भी अध्ययन किया है व विभिन्न प्रकार के जीव−जन्तुओं, पेड़−पौधों के फासलों की खोज की है। अन्वेषण के दौरान वैज्ञानिकों ने यह जाना कि धरती के उत्तरी ध्रुव व दक्षिणी ध्रुव पर, जहाँ आज बेहद ठण्ड पड़ती है व बर्फ ही बर्फ जमी रहती है, किसी समय गर्म मौसम था। ध्रुवों के बदलते इतिहास को देखकर वैज्ञानिक कहते हैं कि सम्भव है एक समय अमेरिका, अफ्रीका व एशिया में उत्तर ध्रुव का स्थान बन जाय। वैज्ञानिकों के अनुसार ईस्वीसन 4000 के लगभग ये ध्रुव एक दूसरे से स्थान पूर्णतया बदल चुके होंगे।

पृथ्वी का चुम्बकत्व नष्ट होने के बारे में वैज्ञानिकों का यह विचार है कि इन ध्रुवों के स्थान बदलने के क्रम में एक ऐसी अवधि आयेगी, जब चुम्बकत्व का लोप हो जायेगा यह अवधि 1-2 शताब्दी की होगी। इस अवधि में असंख्य प्राणी सदा कि लिये समाप्त हो जायेंगे। जो भी बचे रहेंगे, उनमें इतने अधिक आनुवाँशिक परिवर्तन हो जायेंगे कि उनकी जाति आज के अपने पूर्वजों से भिन्न होगी। ये ही या तो दानवाकार या वामनाकार होंगे।

इस भविष्यवाणी के अनुसार वह समय अभी तो दूर है पर उसके पूर्व लक्षण दिखाई देने लगे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के अन्त में हुआ हिरोशिमा पर बम विस्फोट व ध्वंस इस महाप्रलय की शुरुआत कहा जा सकता है। इस महानाश के बाद के दुष्परिणाम हमारी आँखों के सामने प्रत्यक्ष हैं। रेडियो धर्मिता के कारण जन्म विकलांग सन्तानों एवं कई तरह के आनुवाँशिक रोगों का वर्णन ठीक उसी नई मानव सृष्टि का उल्लेख है जिसका जिक्र ये वैज्ञानिक कर रहे हैं।

आज सम्पूर्ण विश्व में विचित्र मौसम परिवर्तन, महामारी, बाढ़ तथा अकाल के समाचार सुनने में आ रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वह विभीषिका और भी जल्दी आ रही है जिसकी सुदूर भविष्य में घटित होने वाली तथ्यपूर्ण आशंका है। प्रश्न यह उठता है कि ऐसा क्यों हो रहा है? अमेरिकी वैज्ञानिक ‘हीगन’ व नील उपडायक कहते हैं कि चुम्बकत्व समाप्त होते ही पृथ्वी का सुरक्षा कवच (ओजोनोस्फियर) समाप्त हो जायेगा। तब इस पृथ्वी पर अन्तरिक्ष से कास्मिक किरणों की निरन्तर बौछार होने लगेगी। इन कास्मिक किरणों से धरती पर स्थित जीवन का सर्वनाश तो होगा ही, अपितु मनुष्यों में भी आनुवाँशिक परिवर्तन होंगे। नये प्रकार के विचित्र फल−फूल पैदा होने लगेंगे। नये कीड़े−मकोड़े व जीवाणु−विषाणु जन्मने लगेंगे। नये प्रकार का इंसान राक्षस भी हो सकता है व कद में बौना भी। उसकी अनेकों आंखें, कान व सींग हो सकते हैं।

पृथ्वी की चारों ओर से रक्षा करने वाला अभेद्य कवच ओजोनोस्फियर इन्हीं घातक किरणों की बौछार से प्राणी जगत को बचाये रखता है। ओजोनोस्फियर−चुम्बकत्व घटने पर ही क्षीण होता जाय, ऐसी बात नहीं है। विभीषिकाएँ जो इन दिनों पृथ्वी को अपने चंगुल में लिये हुए हैं, इसी ओजोन की परत की सघनता में कमी आने के कारण जन्मी हैं, ऐसा मत खगोल भौतिकविदों का है।

ओजोनोस्फियर वैज्ञानिकों के अनुसार 3 कारणों से कम होता जा रहा है। एक−सुपरसोनिक ट्राँसपोर्ट यानी काफी ऊँचाई पर उड़ने वाले यानों द्वारा होने वाला वायु प्रदूषण ओजोन की निष्क्रिय ऑक्सीजन में बदल देता है। आज विश्व भर में इन कान्कार्ड वायुयानों का हल्ला मचा हुआ है। लगता है जब तक प्रत्यक्ष दुष्परिणामों के दण्ड कास्मिक किरणों से होने वाली हानि के मनुष्यों को नहीं मिलेंगे, तब तक यह प्रदूषण जारी रहेगा।

दूसरा कारण वैज्ञानिक कीटनाशकों की वजह से होने वाले प्रदूषण को बताते हैं। इनमें मौजूद सल्फर डाई ऑक्साइड ओजोन से प्रतिक्रिया कर इसकी सघनता को समाप्त करती है। तीसरा सर्वविदित कारण है−रेडियो धर्मिता में वृद्धि।

वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी धीरे−धीरे गरम होती रही है। उनके अनुसार पृथ्वी पर कुल बर्फ का एक बड़ा हिस्सा अब तक पिघल चुका है। अमेरिका के राष्ट्रीय सामुद्रिक और वातावरणीय प्रशासन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पृथ्वी के गर्म होने का कारण कल−कारखानों से निकलने वाले प्रदूषक तत्व हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार सन् 2030 तक पृथ्वी का तापमान 2 से 9 डिग्री सेण्टीग्रेड बढ़ जायेगा। इसका प्रभाव पृथ्वी की जलवायु पर असाधारण रूप से पड़ेगा। पिछले 70 वर्षों में उत्तरी ध्रुव की बर्फ 1/3 एवं अमेरिका की आधी बर्फ गल चुकी है। आल्प्स एवं हिमालय पहाड़ के ग्लेशियर भी गलते जा रहे हैं।

अमेरिकी समुद्र तट के निरीक्षक डा. एच. ए. मार्नर का कहना है कि शहरों की ऊँचाई समुद्र तल से कम होती जा रही है। ध्रुवीय हिमावरण के पिघलते जाने से महासागरों का तल धीरे−धीरे ऊपर उठता जायेगा एवं सागर के निकट विशाल नगरों का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा।

सबसे हास्यास्पद बात यह है कि वैज्ञानिक गम्भीर विचार विमर्श के बाद इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि महाप्रलय की स्थिति से मुकाबला करने के लिये भावी माताओं को धरती के भीतर गुफाओं में रख दिया जाये ताकि वे पूर्णतया सुरक्षित रहें वह नवशिशुओं पर इस स्थिति का कोई प्रभाव न पड़े।

पर धरती के गर्म होने की सम्भावना भी इन्हीं वैज्ञानिकों की है। कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि ध्रुवों के बल क्षेत्र के दिशाभिमुखीकरण की अवधि में पृथ्वी के चारों ओर कृत्रिम चुम्बकीय बल स्थापित किया जाय ताकि अन्तरिक्ष से आने वाली घातक किरणों से बचाव हो सके।

क्या हम महाप्रलय से पूर्व संकेतों को समझकर प्रकृति से खिलवाड़ करना बन्द नहीं कर सकते? वृक्षों को काटना बंदकर भूक्षरण एवं बाढ़ की विभीषिका से बचा जा सकता है एवं वातावरण प्रदूषणजन्य हानि से भी बचा जा सकता है। कल-कारखानों द्वारा छोड़े जाने वाले जहर को यदि कम किया जा सके, छोटे−छोटे गृह−उद्योगों से काम चलाया जा सके तो कास्मिक किरणों द्वारा किये जाने वाले विध्वंस से बचा जा सकता है। चेतावनी तो वातावरण दे ही रहा है पर विज्ञान वेत्ता इसे न समझ पायें तो महाप्रलय अवश्यम्भावी है। इसे देरी तक टाला नहीं जा सकता।

प्रकृति प्रदत्त चुम्बकत्व को यदि उचित रीति से खर्च किया जाय तो समर्थता, सुव्यवस्था एवं दीर्घजीवन का लाभ हर किसी को मिल सकता है। पर यदि उसका अपव्यय दुरुपयोग किया जाय तो अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह समय से पूर्व ही दिवालिया बनने और अकाल मृत्यु के मुख में गिरने के संकट का सामना करना पड़ेगा।

पृथ्वी की स्वाभाविक मृत्यु में अभी बहुत विलम्ब है, पर हम उस पर आश्रय प्राप्त करने वाले और बुद्धिमान होने का दावा करने वाले मनुष्य ही उसे अकाल मृत्यु के मुख में धकेल देने के लिए आतुर हो रहे हैं। अदूरदर्शी आतुर प्रगति के लिये हम जो नीति अपना रहें हैं, उसने न केवल मनुष्य जाति का वरन् इस सुन्दर भूलोक का भविष्य भी अन्धकारमय हो रहा है। क्या समय रहते हम इस भवितव्यता को टाल नहीं सकते?




राजा शतायुध (kahani) - Akhandjyoti February 1985

राजा शतायुध प्रजा निरीक्षण के लिये निकले। एक झोंपड़ी में जराजीर्ण वयोवृद्ध दिखा।

राजा रुक गये। कौतूहल वश पूछा− आपकी आयु कितनी है। देखने में शतायु की परिधि तक पहुँचे दिखते थे। वृद्ध ने झुकी गर्दन उठायी और कहा− मात्र पांच वर्ष।

राजा को विश्वास न हुआ। फिर से पूछा तो वही उत्तर मिला। वृद्ध ने कहा− पिछला जीवन तो पशु प्रयोजनों में निरर्थक ही चला गया। पाँच वर्ष पूर्व ज्ञान उपजा और तभी से मैं परमार्थ प्रयोजनों में लगा। सार्थक आयु तो तभी से गिनता हूँ।




तनाव जन्य व्यथा से कैसे छूटें? - Akhandjyoti February 1985

कोई दृष्टि दोष ऐसा भी होता है, जिसमें बड़ी वस्तु छोटी अथवा छोटी−बड़ी दिखाई पड़ती है। कहते हैं कि हाथी की आँखें आकार की तुलना में छोटी होती हैं इसलिए सामने से गुजरने वाले छोटे जीव−जन्तु भी बड़े लगते हैं। इसलिए सामने से गुजरने वाले छोटे जीव-जन्तु भी बड़े लगते हैं। आदमी को भी अपने बराबर मानता है इसलिए डरकर उसके वशवर्ती हो जाता है।

मनुष्यों की आँखों में तो उतनी गड़बड़ नहीं होती पर उसके सोचने समझने के तरीके में−दृष्टिकोण में−ऐसा मतिभ्रम पाया जाता है कि सामने प्रस्तुत समस्याओं और कठिनाइयों को उनकी वास्तविकता से कहीं अधिक समझ बैठता है। साथ ही दूसरी गलती यह करता है कि प्रतिकूलताओं से निपटने की अपनी सामर्थ्य को भूल जाता है या नगण्य मान बैठता है। ऐसी दशा में जो भी कठिनाइयाँ−प्रतिकूलताएँ सामने होती हैं उन्हें वह बढ़ा−चढ़ा कर देखता है और समाधान के बारे में अविश्वस्त, अनिश्चित एवं आतंकित रहने के कारण भीतर ही भीतर घुटने लगता है। वास्तविक कठिनाइयाँ जितनी होती हैं, उससे भी अधिक काल्पनिक चित्र गढ़ने में भी दिमाग दौड़ता है और अच्छा−खासा कल्पना लोक सामने ला खड़ा करता है।

शेख−चिल्ली ने तेल को यथास्थान पहुँचाने के एक घण्टे की अवधि में शाही सम्भावनाएँ गढ़कर खड़ी कर ली थीं और दिवा स्वप्न देखने वालों में प्रख्यात हो गया था। डरावनी कल्पनाएँ करवाना और भी सरल है। रस्सी का साँप−झाड़ी का भूत−बनने की निरर्थक आशंकाएँ, उनकी मनगढ़न्त करने वाले को कितना त्रास देती है यह सभी जानते हैं, ज्योतिषी लोग हाथ देखकर या कुण्डली देखकर अशुभ अनिष्टों को सिर पर मंडराता हुआ बताते हैं और भोले विश्वासी की नींद हराम कर देते हैं। इसी धंधे में वे लोग गुलछर्रे उड़ाते हैं और संपर्क में आने वाले किसी भी व्यक्ति को भयभीत कर देते हैं। यह कल्पनाओं का ही चमत्कार है, जिनके पीछे वास्तविकताएँ नहीं के बराबर होती हैं। फिर जहाँ थोड़े बहुत तथ्य भी हों, वहाँ तिल का ताड़ बनना क्या मुश्किल है। शनि या राहु केतु की दशा होने पर विश्वास करने वाले सामने प्रस्तुत काम में असफलता मिलने और कहीं से संकट टूट पड़ने की ही आशंका करते रहते हैं। फलतः दिल में दिन में बेचैनी छाई रहती है और रात को नींद नहीं आती। इन परिस्थितियों में मानसिक तन्त्र उत्तेजित उद्विग्न रहने लगता है। धीरे−धीरे निषेधात्मक चिन्तन की आदत परिपक्व हो जाती है और अपने लिए−परिवार के लिए−व्यवसाय के लिए संकट की सम्भावना चारों ओर दिखाई पड़ती है और लगता है कि मित्र सम्बन्धी दगा देने जा रहे हैं या अफसर द्वेष मानते हैं और नीचा दिखाने वाले हैं। कल्पना को अशुभ चिन्तन के साथ जोड़ भर दिया जाय तो इसे राई का पर्वत बनाने में कितनी देर लगती है।

ऐसे लोग सदा शंका से शंकित रहते हैं। मन उद्विग्न रहता है और उस उद्विग्नता का परिणाम फिर शरीर को भुगतना पड़ता है। शरीर का नियामक मन है। उसकी स्थिति डाँवाडोल हो तो ऐसे लक्षण उभरने लगते हैं जिनसे प्रतीत होता है कि भयानक रोगों ने आ घेरा और मौत का शिकंजा अब नजदीक आया, अब आया। रक्तचाप, दिल की धड़कन, बहुमूत्र, सिर का भारीपन, अनिद्रा, अपच आदि रोगों को तनावजन्य माना जाता है। उद्वेग ग्रस्त लोगों को तनावग्रस्त माना जाता है। डाक्टरों के पास इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है। सामयिक समाधान के लिए वे तत्काल तो कोई नशीली गोलियाँ दे देते हैं जिससे रोगी की चिन्तन धारा में व्यतिरेक उत्पन्न हो जाय। इससे तात्कालिक राहत भी मिलती है। पर जैसे ही नशा उतरता है, विस्मृति दूर हो जाती है और आदत के अनुसार विपत्ति भरी कल्पनाएँ शिर के इर्द−गिर्द नाचने लगती हैं और उनका प्रभाव शरीर को अस्त−व्यस्त करने वाली रोग श्रृंखला के रूप में अपना त्रास दिखाने लगता है।

उद्विग्नता देखने में छोटा किन्तु परिणाम में भयानकता की दृष्टि से बड़ा रोग है। यह कुछ दिन लगातार बनी रहे तो उत्तेजना के दबाव से भीतरी अवयवों को अशक्त बना जाते हैं और वे अपना काम ठीक तरह कर नहीं पाते। इस व्यतिक्रम के कारण रोगों की घुड़−दौड़ चल पड़ती है। जब तक एक को समेटते हैं तब तक दूसरे का प्रकोप सामने आ धमकता है। शरीरगत आहार-बिहार की गड़बड़ी से उत्पन्न होने वाले रोग, पथ्य परिचर्या और चिकित्सा के द्वारा आसानी से काबू में आ जाते हैं। पर जिनकी जड़ मस्तिष्क में हैं, जो अशुभ चिन्तन और भय आशंका के कारण उत्पन्न हुए हैं, उनकी जड़ मनःक्षेत्र में होती है और उनके अंकुर शरीर में फूटते ही रहते हैं। एक से निपटने नहीं पाते कि दूसरे की उत्पत्ति एवं अभिवृद्धि अपना कमाल दिखाने लगती है। जड़ हरी रहने पर पत्तों को तोड़ते रहने से कोई काम नहीं चलता। मस्तिष्कीय विकृति शारीरिक रुग्णता से मिलकर एक−एक मिलकर ग्यारह होने का उदाहरण बनता है। संक्षेप में यही है तनाव की महाव्याधि जिससे एक तिहाई लोग ग्रसित पाये जाते हैं। चिकित्सा काम देती नहीं। कभी किसी अंग में−कभी किसी में उपजने−उभारने वाली रुग्णता डाकिन की तरह पीछे लग लेती है तो रक्त माँस को चूसकर मनुष्यों को हड्डियों का ढाँचा बना देती है और अन्ततः उसे अकाल मृत्यु के मुँह में घसीट ले जाती है।

तनाव यों चिकित्सकों के रजिस्टरों में दर्ज होने वाले रोगियों में से अधिकाँश में पाया जाता है और वे इसी मर्ज की चित्र विचित्र औषधियाँ देकर धन्धा चलाते रहे हैं। ज्योतिषियों के लिए ग्रह दशा की प्रतिकूलता का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। शान्ति के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों के नाम पर वे मोटी दक्षिणाएँ इसी आधार पर बटोरते हैं। घर भर चिन्तित रहता है और मित्र हितैषियों में से हर कोई इस दुर्भाग्य पर आँसू बहाता है।

किन्तु यह रोग कुकल्पनाओं का उत्पादन है। उसका उद्गम छिद्र बन्द न किया जाय तो पानी रिसता, फैलता और बहता ही रहेगा। सही सोचने का तरीका यह है कि मनुष्य के पुरुषार्थ, साधन एवं सहयोगी समुदाय की सम्मिलित क्षमता ऐसी है जो किसी भी आपत्ति का सामना कर सकती है। आपत्तियों में आधी से अधिक कुकल्पनाओं की डरपोक स्वभाव की उत्पत्ति हैं। उन्हें अपनी विधेयात्मक क्षमताओं को स्मरण करते हुए बात भी बात में बुहार भगाया जा सकता है। जो शेष रह जाती हैं उनके साथ लड़ने की रणनीति बनाकर निरस्त किया और मार भगाया जा सकता है। इसके बाद जो बचती हैं, वे बहुत स्वल्प मात्रा में रहती हैं। वे बनी भी रहें तो भी मनुष्य इतनी मजबूत धातुओं का बना हुआ है कि उनका वजन ढोने से वह न चरमरा सकता है और न टूट सकता है। मनुष्य जिस प्रकार सुविधाओं, लाभों और सफलताओं को पाकर यथावत् बना रहता है, उसी प्रकार थोड़ी बहुत छोटी−मोटी कठिनाइयों को सहन एवं वहन करने से उसका कुछ बिगड़ता नहीं। वरन् सच तो यह है कि उसकी क्षमता बढ़ती है। संकल्प बल और मनोबल बढ़ाने का लाभ कठिनाइयों से जूझने में ही मिलता है। लड़ाकू जुझारू सैनिक ही अपनी प्रतिभा का परिचय देकर पदोन्नति प्राप्त करते और सेनापति बनते हैं। मुसीबतें एक प्रकार की अग्नि परीक्षा है जो हर किसी के व्यक्तित्व को निखारती और परिपक्व बनाती है। चतुरता बढ़ाने और कौशल निखारने के लिए संकटों से लौह लेने के अतिरिक्त और कोई सुनिश्चित उपाय है नहीं।

तनाव की स्थिति सामने आने पर अपनी चिकित्सा आप करनी चाहिए। देखना चाहिए कि किन चिन्ताओं का भार सिर पर लदा है। जो दिखाई पड़े उनके बारे में नया परीक्षण यह करना चाहिए कि यह काल्पनिक भी तो हो सकती है। ऐसा क्या सुनिश्चित प्रमाण है कि जो अनुमान लगाया गया है, वह सही ही हो। बरसात में कई बार काली घटाएँ उठती हैं और तेज हवा के आ धमकने पर ऐसे ही बिना बरसे उड़ जाती हैं। ऐसा क्यों न माना जाय कि जिन कुकल्पनाओं से अपना मन भयभीत है, वे अवास्तविक ही सिद्ध होंगी। फिर यह भी सोचना चाहिए कि कुछ अपनी भी तो क्षमताएँ हैं। भगवान ने हमें भी तो सामर्थ्य दी है। सामर्थ्यवानों का इतिहास है कि उनने विपन्न परिस्थितियों में भी टक्कर मारी और उलटे को उलटकर सीधा कर दिया। हम क्यों वैसा नहीं कर सकते हैं। अपनी क्षमताओं को भूले रहने के कारण ही लोग आपत्तियों में पिस जाने और उनका सामना न कर पाने की बात सोचते हैं। किन्तु जब सीना तानकर−कमर कसकर जूझने का निश्चय किया गया तो प्रतीत होगा कि मनुष्य की सामर्थ्य संसार की हर कठिनाई से बड़ी है। हनुमान सोचते थे कि समुद्र पार करना कठिन है। पर जब जामवन्त ने उनकी क्षमता का स्मरण दिलाया तो वे लंका तक छलाँग लगाकर या तैरकर जा पहुँचने में सफल हो गये। इतना ही नहीं, रास्ते में बैठी दृष्टांत सुरक्षा के मुँह में ग्रास बन जाने पर भी उसमें से निकल भागे। समूची लंका में भरे हुए दुष्ट दानवों के गढ़ में अकेले ही पुरुषार्थ दिखाते और चमत्कार बताते रहे। यदि आत्म−गौरव का स्मरण न हुआ होता तो वही स्थिति बनी रहती, जिसमें भगोड़े सुग्रीव के यहाँ नौकरी करके वे किसी प्रकार अपने दिन गुजार रहे थे।

मनुष्य की सामर्थ्य असीम है। वह कोलम्बस की तरह सुदूर देश तक नौका लेकर अमेरिका की तलाश कर सका और फिर असंख्यों को वहाँ पहुँचकर बसने और सुसम्पन्न बनने का द्वार खुल गया। साधनों में सबसे बड़ा साधन मनुष्य का मनोबल है। उसे प्रसुप्ति से जागृति की स्थिति में यदि लाया जा सके तो वह दूसरा कुम्भकरण सिद्ध हो सकता है। संसार के शूरवीरों की सफलताएँ उनके साधनों पर नहीं साहस पर निर्भर रही हैं। इसकी साक्षी में नैपोलियन जैसों की जीवन गाथाएँ प्रस्तुत की जा सकती हैं। गान्धी और बुद्ध जैसे दुर्बलकाय मनुष्यों ने अपने समय की विपन्न परिस्थितियों का एक प्रकार से काया−कल्प ही कर दिखाया था।

यह भली−भांति समझ लिया जाना चाहिए कि रोग शरीरगत दिखाई पड़ता हो एवं यदि तनाव के लक्षण शरीर में दिखाई पड़ रहे हों तो उसके लिए चिंतन पद्धति एवं आहार−विहार में सुधार परिवर्तन कर लेने से बहुत बड़ा प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। भोजन भी सौम्य सात्विक वस्तुएँ भूख के साथ तालमेल बिठाते हुए खाया जाय। स्वच्छता और नियमितता को सतर्कता पूर्वक अपनाया जाय। और हँसते−हँसाते, हलका−फुलका जीवन जीने का अभ्यास किया जाय, तो तनावजन्य व्यथाओं से निश्चयपूर्वक छुटकारा पाया जा सकता है।




सभी जीव−जन्तु परेशान (kahani) - Akhandjyoti February 1985

सिंह द्वारा आये दिन अनेकों प्राणियों का वध होते रहने से सभी जीव−जन्तु परेशान थे। मिल−जुलकर उनने सिंह के साथ समझौता किया कि एक जानवर उसकी माँद पर पहुँच जाया करेगा। इससे उसे भी निश्चिन्तता रहेगी और अन्य प्राणी भी शान्तिपूर्वक रह सकेंगे।

ढर्रा बहुत दिन तक इसी प्रकार चलता रहा। एक दिन बुद्धिमान खरगोश की बारी आई। वह जान−बूझकर देर से पहुँचा। सिंह ने क्रुद्ध होकर विलम्ब का कारण पूछा−उसने बताया रास्ते में दूसरा स्वयं को वनराज बताने वाला बैठा है। उसने मुझे रोका और आपको गालियां दीं। सो किसी प्रकार चतुरता से बचकर आपके पास आ सका।

सिंह को इसी इलाके में दूसरा वनराज आने पर बड़ा क्रोध आया और उससे लड़ने के लिए खरगोश को साथ लेकर तत्काल चल पड़ा। खरगोश ने एक गहरे कुँए की तरफ इशारा किया वह इसी में छिपकर आपके विरुद्ध मोर्चा बन्दी कर रहा है।

झाँक कर देखने पर सिंह को अपनी परछाई दिखी। दहाड़ लगाई तो उलटकर प्रति−ध्वनि सुनाई दी। वह क्रोधांध होकर कुएँ में कूद पड़ा और डूबकर मर गया।

क्रोधांध की समझदारी कैसे चली जाती है और बुद्धिमानी से किस प्रकार विपत्ति टलती है यह दो निष्कर्ष इस कहानी से निकलते हैं।




प्रज्ञा परिजनों के लिये विशेष ज्ञातव्य - Akhandjyoti February 1985

बसन्तोत्सव

बसन्त पर्व इस बार प्रायः सभी 2400 गायत्री शक्ति पीठों तथा 12 हजार स्वाध्याय मण्डल प्रज्ञा संस्थानों में उत्साहपूर्वक मनाया गया। सभी संचालकों ने एक ही प्रतिज्ञा की कि गुरुदेव का प्रत्यक्ष संपर्क न होने पर भी हम सदा उन्हें अपने निकट अनुभव करेंगे और मिशन का अपने−अपने क्षेत्र में आलोक वितरण में तनिक भी शिथिलता न आने देंगे।

हिमालय का सन्देश वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों के लिए

बसन्त पर्व प्रज्ञा अभियान का जन्मदिवस एवं प्रेरणा पर्व है। उस दिन मिशन के वरिष्ठजनों को उनकी स्थिति एवं स्तर के अनुरूप हिमालय के ध्रुव केन्द्र से प्रेरणा उपलब्ध होती रही है। अब तक मिशन के सूत्र−संचालक को एक प्रेरणा मिलती थी और एक नया कदम आगे बढ़ाने के लिए कहा जाता था। इस उपक्रम को चलते लम्बा समय हो गया।

संचालक को जो आदेश मिल रहे हैं वे विशुद्ध रूप से उन्हीं से सम्बन्धित और एकाकी हैं। उनका किन्हीं अन्य से सीधा सम्बन्ध नहीं है? सूक्ष्मीकरण की साधना कब तक चलेगी। कहाँ चलेगी? किस रूप में चलेगी? इसका स्वरूप और उद्देश्य सीध उन्हीं से सम्बन्धित है। इसलिए उसका प्रकटीकरण अब एकाकी उन्हीं तक सीमित रहेगा। प्रकाशित न हुआ करेगा। गुरुदेव अब शान्तिकुंज हैं, हिमालय हैं, या कहाँ हैं? यह कोई पूछताछ न करें। न मिलने का या दर्शन का आग्रह करें। उनके बारे में इतना ही सोचें की उनकी सूक्ष्म प्रेरणा एवं सहायता सदा उपलब्ध रहेगी।

विभीषिकाएँ निरस्त होंगी

इन दिनों हर क्षेत्र में अवाँछनीयताओं और आशंकाओं के घटाटोप छाये हुए हैं। लगता है कि कुमार्ग गामिता और अनीति परायणता संसार को विनाश के गर्त में धकेल कर छोड़ेगी।

किन्तु इन्हीं दिनों आशा की एक अभिनव किरण जगी है। घटाएँ छटती जायेंगी और सन्तोषदायक प्रकाश उत्पन्न होगा। भविष्य को शान्तिमय और प्रगतिशील बनाने के लिए इन्हीं दिनों दिव्य अध्यात्म साधनाएँ चल रही हैं उसका परिणाम निष्फल न होगा। गुरुदेव की इन दिनों इसी विशेष प्रयोजन के लिए चल रही है।

साधना के अनुभव

साधना के अनुभव अभी तक सर्वसाधारण को विदित नहीं हैं। उनके सम्बन्ध में कहा जाता रहा है कि वे हमारे जीवित रहते प्रकाशित न होंगे। सूक्ष्मीकरण प्रक्रिया ऐसी है उसे अदृश्य होना समझा जा सकता है। इसलिए उन अनुभवों में से कुछ को प्रकाशित करने में हर्ज नहीं समझा गया।

अखण्ड−ज्योति के इस अंक से ही यह शुभारम्भ कर दिया गया है। आगामी पाँच अंकों में वे अनुभव गुरुदेव की कलम से लिखे हुए ही छपेंगे। पहली−बार यह रहस्योद्घाटन उन्हीं की लेखनी से होने जा रहा है। पाठक उनकी उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करें।

108 वरिष्ठों को एक सन्देश

अब एक के स्थान पर 108 वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों की एक श्रृंखला ऐसी बनी है जिन्हें सीधे हिमालय से संकेत प्राप्त होते रहेंगे। ठीक वैसे ही जैसे अब तक गुरुदेव को प्राप्त होते रहे हैं। इस बार वसन्त पर्व का उच्चस्तरीय आदेश एक ही आया है कि लोभ मोह की हथकड़ी बेड़ी तोड़ें और शांतिकुंज पहुँचने की योजना बनायें। यहीं से समग्र प्रज्ञा अभियान का सूत्र संचालन एवं कार्य विधि का निर्धारण होगा।

यह एक ही सन्देश वरिष्ठ प्रज्ञा पुत्रों को बसन्त के दिन मिला है। उनके अपने प्रत्यक्ष अनुभव का विवरण भी लिख भेजा है। किसे क्या काम सौंपा जाय। यह शान्तिकुंज में बता दिया जायेगा। अपने घरेलू कामकाज की चिन्ता न करें। एक बीज बोकर सौ दाने उत्पन्न होने की सिद्धि जिस प्रकार गुरुदेव ने पाई उसी प्रकार उनके उपरान्त के अन्य 108 वरिष्ठों को भी अपने लिए वही निर्देशन समझना चाहिए और उसे कार्यान्वित करना चाहिए।

सम्प्रति शांतिकुंज में कार्यरत पूर्व समयदानी कार्यकर्ता की संख्या कम है। गुरुदेव ने अपने जीवन काल में पाँच से अधिक व्यक्तियों का जीवन जिया है एवं अपने मार्गदर्शक द्वारा सौंपे गए उत्तरदायित्व को पूरी तरह निभाया है। अब वे ही सूक्ष्म संकेत भेज रहे हैं कि जिन्हें युग परिवर्तन के महान प्रयोजन में श्रेयार्थी बनना है, अपने जीवन की शेष अवधि, प्रतिभा रूपी संपदा को समाज को समर्पित कर दें। जो इस नाजुक घड़ी को जानते समझते होंगे, वे अब देर करेंगे नहीं, उनकी अन्तः प्रेरणा उन्हें सतत् कचोटती ही रहेंगी।

प्रज्ञा पुराण का दूसरा और तीसरा खण्ड गुरुदेव ने पूरा कर दिया है। यह भी गायत्री जयन्ती तक छप जायेंगे। मूल्य दोनों खण्डों का बीस−बीस रुपया होगा।

चालीस पैसा सीरीज के चार सौ फोल्डर हिन्दी में गायत्री जयन्ती तक पूर्ण हो जायेंगे। इनमें से विशेष रूप से छाँटे हुए फोल्डर 200 की संख्या में गुजराती, मराठी, उड़िया और अँग्रेजी में भी छपने दे दिये गये हैं। यह साहित्य गुरुदेव ने इस बसन्त पर्व तक लिखकर पूर्ण कर दिया है।

टैप कैसेट और वीडियो कैसेट्स

गुरुदेव को सर्वसाधारण से जो कहना था, विगत जून के अंक में छप चुका है। जिन्हें उनके मुख से सुनना था। उनके लिए छः टैप कर दिये गये हैं। जो सुनना चाहेंगे उन्हें सुन सकेंगे।

उन्हीं के वीडियो कैसेट से भी छः टैप किये गये हैं। जो लोग छवि देखते हुए सुना चाहते हैं वे उनसे सुन सकेंगे। आडियो टैप और वीडियो टैप दोनों ही उपलब्ध हैं।

आंवलखेड़ा में स्कूल और अस्पताल

गुरुदेव की जन्मभूमि आंवलखेड़ा (आगरा) में गुरुदेव का बनवाया हुआ हाईस्कूल पहले से ही था। अब एक बड़ा अस्पताल और भव्य गायत्री मन्दिर भी गायत्री जयन्ती तक बनकर तैयार हो जायेगा। जिन्हें कभी देखना हो गायत्री जयन्ती के बाद जा सकते हैं। आगरा से 27 किलोमीटर जलेसर रोड पर आंवलखेड़ा स्थित है।




विशेष धारावाहिक लेखमाला-1 - जिज्ञासा, संदेह और उसका समाधान - Akhandjyoti February 1985

गुरुदेव की कलम से लिखी जा रही उनके दृश्य जीवन की ये अनुभूतियाँ इन्हीं पृष्ठों पर अगले कुछ अंकों में प्रकाशित की जाती रहेंगी। उनका जीवन एक खुली पुस्तक के समान रहा है। परन्तु इन सिद्धियों के स्वरूप एवं मर्म को जिस परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत होना था, अब तक हुआ नहीं। अब उस रहस्य के पर्दे को हटाया जा रहा है।

पौन शताब्दी से काया और चेतना के ईंट-गारे से बनी इस प्रयोगशाला में हम दत्त-चित्त होकर एक ही प्रयत्न करते रहे हैं कि अध्यात्म तत्वज्ञान की यथार्थता और प्रतिक्रिया वस्तुतः है क्या? विकसित बुद्धिवाद की दृष्टि में वह भावुकों का अन्धविश्वास और धूर्तों का जादुई व्यवसाय है। इसे उनका स्वनिर्मित जाल−जंजाल और बता दिया जाता तो हमें इतनी पीड़ा न होती जितनी कि उन्हें ऋषि प्रणीत, शास्त्र सम्मत और आप्तजनों द्वारा परिक्षित, अनुमोदित कहा जाता रहा है और साथ ही परीक्षा की कसौटी पर अप्रामाणिक भी ठहराया जाता है तो असमंजस का ठिकाना नहीं रहता। एक ओर चरम सत्य, दूसरी और पाखण्ड कहकर उसे विलक्षण स्थिति में लटका दिया जाता है, तो मन की व्याकुलता यह कहती है कि इस संदर्भ में किसी निर्णायक निष्कर्ष पर पहुँचा जाना चाहिए।

आज नास्तिकवादी ही उसका मजाक नहीं उड़ाते। आस्तिकवादी भी यही कहते हैं कि बताये हुए क्रियाकृत्यों को लम्बे समय तक करते रहने पर भी उनके हाथ ऐसा कुछ नहीं लगा जिस पर वे सन्तोष एवं प्रसन्नता व्यक्त कर सकें। ऐसा दशा में सिद्धांतों एवं प्रयोगों में कहीं−न−कहीं त्रुटि होनी चाहिए। इस त्रुटि का निराकरण करने एवं अध्यात्म की यथार्थता प्रकाश में लाने के लिए कुछ कारगर प्रयत्न होने ही चाहिए। इसे कौन करे? सोचा कि जब अपने को इतना लगाव है तो यह कार्य खुद अपने ही कंधों पर ले लेना चाहिए। अध्यात्म यदि विज्ञान है तो उसका सिद्धांत यथार्थता से जुड़ा होना चाहिए और परिणाम ऐसा होना चाहिए जैसा कि वैज्ञानिक उपकरणों का तत्काल सामने आता है। प्रतिपादन और परिणाम की संगति न बैठने पर लोग आडम्बर का लाँछन लगाएँ तो उन्हें किस प्रकार रोका जाय? यदि वह सत्य है तो उसका जो बढ़ा−चढ़ा माहात्म्य बताया जाता है, उससे अन्य अनेकों को लाभ ले सकने की स्थिति तक क्यों न पहुँचाया जाय?

अब तक का प्रायः पौन शताब्दी का हमारा जीवनक्रम इसी प्रकार व्यतीत हुआ है। इसे एक जिज्ञासु साधक का प्रयोग परीक्षण कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

घटनाक्रम पन्द्रह वर्ष की आयु से आरम्भ होता है, जिसे अब 60 वर्ष से अधिक हो चले। इससे पूर्व की अपरिपक्व बुद्धि कुछ कठोर दृढता अपनाने की स्थिति में भी नहीं और न ही मन में उतनी तीव्र उत्कंठा थी। आरम्भिक दिनों में उठती जिज्ञासा ने तद्विषयक अनेकों पुस्तकों को पढ़ने एवं इस क्षेत्र के अनेकों प्रतिष्ठित व्यक्तियों से पूछताछ करना आरम्भ कर दिया। इसमें सिद्धि सिध्याने की लिप्सा नहीं, वरन् तथ्यों को अनुभव में उतारने के लिए कठिन से कठिन प्रक्रिया अपनाने की साहसिकता थी। पूछताछ से−अध्ययन से समाधान न हुआ तो वह उत्कंठा अन्तरिक्ष में भ्रमण करने लगी और एक पारंगत समाधानी को सहायता के लिए ढूंढ़ लाई।

ब्राह्मण कुल में जन्म लेने और पौरोहित्य कर्मकाण्ड की परम्परा से सघन सम्बन्ध होने के कारण दस वर्ष की आयु में ही महामना मालवीय जी के हाथों पिताजी ने उपनयन करा दिया था और गायत्री मन्त्र की उपासना का सरल कर्मकाण्ड सिखा दिया है। इस गुह्य विद्या के अन्याय पक्ष तो हमें बाद के जीवन में विदित हुए। निर्धारित क्रम अपनी जगह ज्यों का त्यों करके चल रहा था और लक्ष्य तक पहुँचने का जिज्ञासा भाव क्रमशः अधिक प्रचण्ड हो रहा था। इसी उद्वेग में कितनी ही रातें बिना सोए निकल जातीं।

पूजा की कोठरी अलग एकान्त में थी। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त में अपनी कोठरी दिव्य गन्ध और दिव्य प्रकाश से भर गई। माला छूट गई और मनःस्थिति तन्द्राग्रस्त जैसी हो गयी। लगा कि सामने पूर्व कल्पनाओं से मिलते−जुलते एक ऋषि खड़े हैं− प्रकाश पुंज के रूप में। इस दिव्य दर्शन ने घबराहट उत्पन्न नहीं की वरन् तन्द्रा सघन होती चली गईं और शरीराभ्यास लगभग छूटकर अपनी भी चेतना ही और चैतन्य होती चली गयी। प्रकट होने वाली सत्ता ने कुछ संक्षिप्त शब्द कहे− ‘‘तेरी पात्रता और इच्छा की हमें जानकारी है, सो सहायता के लिए अनायास ही दौड़ आना पड़ा। अपनी पात्रता को अधिक विकसित करने के लिए महाप्रज्ञा की एक समग्रता साधना कर डाल।’’ उनका तात्पर्य था, ‘‘गायत्री महामन्त्र का एक वर्ष में एक महापुरश्चरण करते हुए चौबीस वर्षों में चौबीस महापुरश्चरण सम्पन्न करना।’’ विधि−विधान उनने संक्षेप में बता दिया। यह अवधि जौ की रोटी और छाछ पर बिताने की आज्ञा दी ताकि इन्द्रिय संयम से लेकर अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम तक की समस्त मनोनिग्रह प्रक्रियाएँ सम्पन्न हो सकें और तत्वज्ञान धारण कर सकने की पात्रता परिपक्व हो सके। उनका संकेत था− ‘‘इतना कर सका तो आगे का मार्ग बताने हम स्वयं अबकी भाँति फिर आएंगे। इतना कहकर वे अन्तर्ध्यान हो गये।

जिज्ञासु का मस्तिष्क भगवान ने दिया है और उसमें तर्क बुद्धि की न्यूनता नहीं रखी है। आश्चर्य है कि इस स्तर की विचारणा के साथ−साथ उतनी ही प्रचण्ड श्रद्धा और संकल्प शक्ति का भण्डार कहाँ से और कैसे भर गया? दोनों दिशाएँ एक−दूसरे के विपरीत हैं, पर अपनी मानसिक बनावट में इन दोनों का ही परस्पर विरोधी समन्वय मिल गया। दूसरे दिन से वही चौबीस वर्ष की संकल्प साधना समग्र निष्ठा के साथ आरम्भ कर दी। कुटुम्बियों−सम्बन्धियों ने इसी प्रयोजन में 8 घण्टे नित्य बिताने की 24 वर्ष लम्बी प्रतिज्ञा की बात सुनी तो सभी खिन्न हुए। अपने−अपने ढंग से समझाते रहे। जौ पर निर्वाह इतने लम्बे समय तक शरीर को क्षति पहुँचाएगा। विद्या पढ़ना रुक गया तो भविष्य में क्या बनेगा। आदि आदि−। बहुत कुछ ऐसा सुनने को मिलता रहा। जिसका अर्थ होता था कि इतना लम्बा और कठोर साधन न किया जाय। पर अपनी जिज्ञासा इतनी प्रचण्ड थी कि अध्यात्म की तात्विकता को समझाने के लिए एक क्या ऐसे कई शरीर न्यौछावर कर देने का मनोबल उमंगता रहा और समझाने वालों को अपना निश्चय और अभिप्राय स्पष्ट शब्दों में कहता रहा है। घर में गुजारे के लायक बहुत कुछ था, सो उसकी चिंता करने की बात सामने नहीं आई।

एक−एक करके वर्ष बीतते गए। पूछने वालों को एक ही उत्तर दिया− ‘‘एक जुआ खेला है। इसको अन्त तक ही सम्भाला जाएगा। चौबीस वर्ष एक−एक करके इस प्रकार पूरे हो गए। सात घण्टे की नित्य प्रक्रिया से मन ऊबा नहीं। जौ की रोटी और छाछ का आहार स्वास्थ्य की दृष्टि से अपूर्ण और हानिकारक कहा जाता रहा, पर वैसा कुछ घटित नहीं हुआ। लम्बे समय तक लम्बी प्रक्रिया के साथ सम्पन्न करने का क्रम यथावत् चलता गया। उसमें ऊब नहीं आई। रुचि यथावत् बनी रही। इस अवधि में मनोबल घटा नहीं, बढ़ा ही। चौबीस वर्ष पूरे होने के दिन निकट आने लगे तो मन आया कि एक और ऐसा ही क्रम बता दिया जाएगा तो उसे भी इतनी ही प्रसन्नतापूर्वक किया जायेगा। परिणाम की कुछ और जन्मों तक प्रतीक्षा की जा सकती है।’’

यह पंक्तियाँ आत्म कक्षा के रूप में लिखी नहीं जा रही हैं और न उसके साथ अप्रासंगिक विषयों का समावेश किया जा रहा है। अध्यात्म भी विज्ञान है क्या? इस प्रयोग परीक्षण के संदर्भ में जो कुछ भी बन बड़ा है, उसी की चर्चा की जा रही है। ताकि अन्यान्य जिज्ञासुओं को भी कुछ प्रकाश और समाधान मिल सके।

इन 24 वर्षों में कुछ भी शास्त्राध्ययन नहीं किया और न समीप आने वाले विद्वान−विज्ञजनों से कोई चर्चा की। कारण कि इसमें निर्धारित दिशा और श्रद्धा में व्यतिरेक हो सकता था। जबकि अध्यात्म का मूलभूत आधार प्रचण्ड इच्छा और गहन श्रद्धा पर टिका हुआ था। दिशा विभ्रम से अन्तराल डगमगाने न लगे, इसलिए प्रयोग का एकनिष्ठ भाव से चलना ही उपयुक्त था और वही किया भी गया। मन दिन में ही नहीं, रात की स्वप्नावस्था में भी उसी राह पर चलता रहा।

नियत अवधि भारी नहीं पड़ी, वरन् क्रमशः अधिक सरस होती गई। समय पूरा हो गया। प्रकाश पुनः मार्ग−दर्शक का पहले जैसी स्थिति में फिर दर्शन हुआ। इसी प्रभात बेला में। देखते ही तन्द्रा आरम्भ हुई और क्रमशः अधिक गहरी होती गई। मूक भाषा में पूछा गया− ‘‘इन 24 वर्षों में कोई चित्र−विचित्र अनुभव हुआ हो तो बता?’’ मेरा एक ही उत्तर था− निष्ठा बढ़ती ही गयी है और इच्छा उठती रही है कि अगला आदेश हो और उसकी पूर्ति इससे भी अधिक तत्परता तथा तन्मयता को संजोकर किया जाय। आकाँक्षा तो एक ही है कि अध्यात्म आडम्बर है या विज्ञान?, इसकी अनुभूति स्वयं कर सकें। ताकि किसी से बलपूर्वक कह सकना सम्भव हो सके।

अपनी बात समाप्त हो गयी। मार्गदर्शक ने कहा− ‘‘विश्वास में एक पुट और लगाना बाकी है ताकि वह समुचित रूप से परिपक्व हो सके। इसके लिए 24 लाख आहुतियों का गायत्री यज्ञ करना अभीष्ट है।’’ मैंने इतना ही कहा कि ‘‘शरीरगत क्रियाएँ करना मेरे लिये शक्य है। पर इतने बड़े आयोजन के लिए जो राशि जुटाई जाएगी और प्रबन्ध में असाधारण उतार−चढ़ाव आयेंगे, उन्हें कर सकना कैसे बन पड़ेगा? निजी अनुभव और धन इस स्तर को है नहीं। तब आपका नया आदेश कैसे निभेगा?’’

मन्द मुस्कान के बीच उस प्रकाश पुनः ने फिर कहा कि− ‘‘विश्वास की कमी रही न? हमारे कथन और गायत्री के प्रतिफल से क्या नहीं हो सकता? इसमें सन्देह करने की बात कैसे उठ पड़ी? यही कच्चाई है, जिसे निकालना है। शत−प्रतिशत श्रद्धा के बल पर ही परिपक्वता आती है।’’

मैं झुक गया और कहा− ‘‘रूपरेखा बता जाइये। मैं ऐसे कामों के लिए अनाड़ी हूँ।’’ उन्होंने संक्षेप में, किन्तु समग्र रूप में बता दिया कि ‘‘एक हजार कुण्डों में 24 लाख आहुतियों का गायत्री यज्ञ कैसा हो? इन दिनों जो प्रमुख गायत्री उपासक हैं, उन्हें एक लाख की संख्या में कैसे निमन्त्रित किया जाय? मार्ग में आने वाली कठिनाइयाँ अनायास ही हल होती चलेंगी।’’

दूसरे दिन से वह कार्य आरम्भ हो गया। कार्तिक सुदी पूर्णिमा सम्वत् 2015 का मुहूर्त था। चार दिन पहले आयोजन आरम्भ होना था। एक लाख आगन्तुक और इससे दूने−तीन गुने दर्शकों के लिए बैठने, निवास करने, भोजन, राशन, लकड़ी, सफाई, रोशनी, पानी आदि के अनेकानेक कार्य एक दूसरे के साथ जुड़े हुए थे। जैसे मन में आया, वैसा ढर्रा चलता रहा। आगन्तुकों के पते कलम अपने आप लिखती गई। आयोजन के लिए छह सात मील का एरिया आवश्यक था। वह कहीं खाली मिल गया, कहीं माँगने पर किसानों ने दे दिया। जिनके पास डेरे, तम्बू, राशन, लकड़ी, कुओं में लगाने के पम्प−जनरेटर आदि थे, उन सभी ने देना स्वीकार कर लिया। एडवाँस माँगने का ऐसे कामों में रिवाज है, पर न जाने कैसे लोगों का विश्वास जमा रहा कि हमारा पैसा मिल जायेगा। न किसी न देने के लिये कहा और न ही दिया गया। पूरी तैयारी होने में एक महीने में भी कम समय लगा। सहायता के लिए स्वयंसेवकों का अनुरोध छापा गया तो देखते देखते वे भी 500 की संख्या में आ गए। सभी ने मिल-जुलकर काम हाथों में ले लिया।

नियम समय पर निमन्त्रित गायत्री उपासकों की एक लाख की भीड़ आ गई। उनके साथ ही दर्शकों के हुजूम थे। अनुमान दस लाख आगन्तुकों का किया जाता है। स्टेशनों पर अन्धाधुन्ध भीड़ देखी गयी और बस स्टैण्डों पर भी वही हाल। भले अफसरों ने स्पेशल ट्रेनें और बसें छोड़ना आरम्भ किया। मथुरा शहर से चार मील दूर यज्ञ स्थल था। अपने−अपने बिस्तर सिर पर लादे सभी आते चले जाते थे। एक लाख के ठहरने का प्रबन्ध किया गया था पर उसी में चार लाख समा गए। भोजन के लंगर चौबीस घण्टे चलते रहे। किसी को भूखे रहने की, छाया न मिलने की शिकायत न करनी पड़ी। कुओं में पम्प वालों ने अपने पम्प लगा दिए। बिजली कम पड़ी तो दूर−दूर कस्बों तक से गैस बत्तियाँ आ गईं। टट्टी−पेशाब और स्नान की समस्या सबसे अधिक पेचीदा थी। वह इतनी सुव्यवस्था से सम्पन्न हो गयी, कि देखने वाले चकित रह गए।

जंगल में पैसा पास न रखने एवं अमानत रूप में दफ्तर में रखने का ऐलान किया गया। फलतः अमानतें जमा होती चली गयीं। सब कुछ व्यवस्था से था। किसी का एक पैसा न खोया। देखने वाले इस आयोजन की तुलना इलाहाबाद के कुम्भ मेले से करते थे। पर पुलिस या सरकार का एक आदमी न था। लोगों ने अपनी ओर से डिस्पेन्सरियाँ, प्याऊ व स्वल्पाहार केन्द्र खोल रखे थे। सात मील का एरिया खचाखच भरा हुआ था। यज्ञ नियत समय पर विधिवत् होता रहा। यज्ञशाला की परिक्रमा करने तीन−पचास मील दूर से अनेकों बसें आई थीं। पूर्णाहुति के दिन हम और हमारी धर्मपत्नी हाथ जोड़कर तख्त पर खड़े रहे। सभी से प्रसाद लेकर (भोजन करके) जाने की प्रार्थना की। न जाने कहाँ से राशन आता गया। न जाने कौन उसका मूल्य चुकाता गया। न जाने किसने इतने बड़े राशन के पर्वत को खा−पीकर समाप्त कर दिया।

सबसे बड़े आश्चर्य की बात यह कि न किसी का एक पैसा खोया न किसी को चोट लगी, न किसी को ढूढँना−खोजना पड़ा। पैसा कहीं से आता व कहीं से जाता रहा। अन्त में खेरीज की कुछ बोरियाँ शेष रह गयी थीं, जिससे क्षेत्र की सफाई की व्यवस्था कर दी गयी। स्वयं सेवकों को टिकट दिला दिये गये। बचना तो क्या था, पर घटा कुछ नहीं। लोग कहते थे− रेत के बोरे आटा बन जाते हैं, पानी का घी बन जाता है, यह किंवदंती यहाँ सही होती देखी गयी। कुम्भ मेलों जैसी संरक्षकों, बजट, टैक्स आदि की यहाँ कोई व्यवस्था न थी। फिर भी सारी व्यवस्था वहाँ सुचारु रूप से ऐसे चल रही थी, मानों किसी यन्त्र पर सारा ढर्रा घूम रहा है।

मथुरा के इर्द−गिर्द सौ−सौ मील तक यह चर्चा फैल गयी कि महाभारत के बाद इतना बड़ा यज्ञायोजन इसी बार हो रहा है। जो उसे देख न सकेंगे, जीवन में दुबारा ऐसा अवसर न मिल सकेगा। इस जन श्रुति कारण आदि से अन्त तक प्रायः दस लाख व्यक्ति उसे देखने आए। आयोजन समाप्त होने के बाद भी तीन दिन तक परिक्रमा चलती रही। कुण्डों की भस्म लोग प्रसाद स्वरूप झाड़−झाड़ कर लेकर गए।

वस्तुतः आयोजन हर दृष्टि से अलौकिक दर्शनीय था। हजार कुण्ड की भव्य यज्ञशाला। एक लाख प्रतिनिधियों के बैठने लायक पण्डाल, 24 घण्टे चलने वाली भोजन व्यवस्था, रोशनी, पानी, बिछावट−जिधर भी दृष्टि डाली जाय, आश्चर्य लगता था। सात मील का पूरा क्षेत्र ठसाठस भरा था। लोकसभा अध्यक्ष अनन्त शयनम आयंगर उसका उद्घाटन करने आये थे। पूर्णाहुति के बाद भी तीन दिन तक आगन्तुक भोजन करते रहे। अक्षय भण्डार कभी चुका नहीं। जो आरम्भ में आए थे, उनने जाते ही अपने क्षेत्रों में चर्चा की और बसों−बैलगाड़ियों की भीड़ बढ़ती चली गयी। भीड़ और भव्यता देखकर हर आगन्तुक अवाक् रह जाता था। ऐसा दृश्य वस्तुतः इन लाखों में से किसी ने भी इससे पूर्व देखा न था।

यह गायत्री महा−पुरश्चरण के जप-तप, साधन एवं पूर्णाहुति यज्ञ की चर्चा हुई। सबसे बड़ी उपलब्धि इस आयोजन की यह थी कि आमन्त्रित किन्तु अपरिचित गायत्री उपासकों में से प्रायः एक लाख हमारे मित्र सहयोगी एवं घनिष्ठ बन गए। कंधे से कन्धा और कदम से कदम मिलकर चलने लगे। गायत्री परिवार का इतना व्यापक गठन देखते−देखते बन गया और नवयुग के सूत्रपात का क्रिया−कलाप इस प्रकार चल पड़ा मानों उसकी सुनिश्चित रूपरेखा किसी ने पहले से ही बनाकर रख दी हो। (क्रमशः)




Quotation - Akhandjyoti February 1985

लोग मुझे मान दें जब कोई यह चाहता है तो वह अपनी आँख में खुद छोटा बन जाता है। मैं लोगों को मान दूँ, यह सोचने वालों को दानियों जैसे बड़प्पन की अनुभूति होती है।




प्रयाण गीत - Akhandjyoti February 1985




प्रयाण गीत (kavita) - Akhandjyoti February 1985

ज्ञान की मशाल है, सूर्य लाल−लाल है। नींद आ रही तुम्हें, कमाल है कमाल है॥

रात का पता नहीं, हँसा प्रभात ज्ञान का, प्राण−प्राण लीन है, चढ़ा खुमार ध्यान का,

सहास अश्रु−पात, से भरा कमल−मृणाल है। ज्ञान की मशाल है, सूर्य लाल−लाल है। नींद आ रही तुम्हें, कमाल है कमाल है॥

हँसी−हँसी है पाँखुरी, सहस्र दल खिले−खिले, कि प्राण की बयार से हृदय कमल हिल−डुले,

बौर से लदी−लदी कि कल्प वृक्ष डाल है। ज्ञान की मशाल है सूर्य लाल−लाल है। नींद आ रही तुम्हें, कमाल है कमाल है॥

प्राण−पुष्प, तुम खिला−खिला के अर्घ्यदान दो, आज तक दिया नहीं वो दान दो, वो ध्यान दो,

जिन्दगी के देवता का एक ही सवाल है। ज्ञान की मशाल है सूर्य लाल−लाल है। नींद आ रही तुम्हें, कमाल है कमाल है॥

अबोध, बोधमय हुआ, जगी प्रज्ञा, ऋतम्भरा, ऋद्धि−सिद्धि नाचती, हरी भरी वसुंधरा,

पास स्वर्ग का जुलूस, अब न अन्तराल है। ज्ञान की मशाल है, सूर्य लाल−लाल है। नींद आ रही तुम्हें, कमाल है कमाल है॥

-लाखन सिंह भदौरिया

*समाप्त*