VigyapanSuchana - Akhandjyoti April 1985

गुरुदेव द्वारा लिखित फोल्डरों एवं नवीनतम पुस्तकों में से कुछ का अँग्रेजी अनुवाद कराना है। अनुवाद ऐसा हो जो बुद्धिजीवी वर्ग एवं विदेशों में त्रुटिहीन माना जा सके, सराहा जा सके। अखण्ड-ज्योति परिजनों में जिनकी अँग्रेजी अनुवाद की उच्चस्तरीय योग्यता हो, कृपया सहयोग करने का अनुग्रह करें। अनुवाद शाँतिकुँज रहकर ही करना है।




आत्मा और परमात्मा की एकता - Akhandjyoti April 1985

मनुष्य शरीर, इस निखिल ब्रह्माण्ड का छोटा स्वरूप है। इस काया को व्यापक प्रकृति की अनुकृति कहा गया है। विराट् का वैभव इस पिण्ड के अंतर्गत बीज रूप से प्रसुप्त स्थिति में विद्यमान है। कषाय-कल्मषों का आवरण चढ़ जाने से उसे नर-पशु की तरह जीवन यापन करना पड़ता है। यदि संयम और निग्रह के आधार पर इसे पवित्र और प्रखर बनाया जा सके तो इसी को ऋद्धि-सिद्धियों से ओत-प्रोत बनाया जा सकता है। कोयला ही हीरा होता है। पारे से मकरध्वज बनता है। यह अपने आप को तपाने का-तपश्चर्या का-चमत्कार है।

जीवात्मा परमात्मा का अंशधर ज्येष्ठ पुत्र, युवराज है। संकीर्णता के भव-बन्धनों से छूटकर वह “आत्मवत् सर्व भूतेषु” की मान्यता परिपुष्ट कर सके, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना परिपक्व कर सके तो इसी जीवन में स्वर्ग और मुक्ति का रसास्वादन कर सकता है। जीव को ब्रह्म की समस्त विभूतियाँ हस्तगत करने का सुयोग मिल सकता है।

हम काया को तपश्चर्या से तपायें और चेतना को परम सत्ता में योग द्वारा समर्पित करें तो नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम, क्षुद्र को महान बनने का सुयोग निश्चित रूप से मिल सकता है।




सौभाग्य सुयोग का आरम्भ - Akhandjyoti April 1985

पन्द्रह वर्ष तक की आयु ऐसे ही बचपन के खेल-कूद में निकल गई। इनका परिचय देना हो तो कुछ काम की बातें इतनी ही हैं कि पिताजी अपने सहपाठी महामना मालवीय जी के पास उपनयन संस्कार कराके लाये। उसी को गायत्री दीक्षा कहा गया। ग्राम के स्कूल में प्राइमरी पाठशाला तक की पढ़ाई की।

पिताजी ने ही लघु कौमुदी-सिद्धान्त कौमुदी के आधार पर संस्कृत व्याकरण पढ़ा दिया। वे श्रीमद् भागवत की कथाएँ कहने राजा महाराजाओं के यहाँ जाया करते थे। मुझे साथ ले जाते। इस प्रकार भागवत का आद्योपांत वृत्तान्त याद हो गया।

इसी बीच विवाह भी हो गया। पत्नी अनुशासन प्रिय, परिश्रमी, सेवाभावी और हमारे निर्धारणों में सहयोगिनी थी। बस समझना चाहिए कि पन्द्रह वर्ष समाप्त हुए।

सन्ध्या वन्दन हमारा नियमित क्रम था। मालवीयजी ने गायत्री यन्त्र की विधिवत् दीक्षा दी थी और कहा था कि यह ब्राह्मण की कामधेनु है। इसे बिना नागा किये जपते रहना। पाँच माला अनिवार्य, आर्थिक जितनी हो जाय उतनी उत्तम। उसी आदेश को मैंने गाँठ बाँध लिया और उसी क्रम को अनवरत चलाता रहा।

बसन्त पर्व का दिन था उस दिन ब्रह्म मुहूर्त में कोठरी में ही सामने प्रकाश-पुँज के दर्शन हुए। आंखें मलकर देखा कि कहीं कोई भ्रम तो नहीं है। प्रकाश प्रत्यक्ष था। सोचा कोई भूत-प्रेत या देव-दानव का विग्रह तो नहीं है। ध्यान से देखने पर भी वैसा कुछ लगा नहीं। विस्मय भी हो रहा था और डर भी लग रहा था। स्तब्ध था।

प्रकाश के मध्य में से एक योगी का सूक्ष्म शरीर उभरा। सूक्ष्म इसलिए कि छवि तो दीख पड़ी पर वह प्रकाश-पुँज के मध्य अधर लटकी हुई थी। यह कौन है? आश्चर्य।

उस छवि ने बोलना आरम्भ किया व कहा- हम तुम्हारे साथ तीन जन्मों से जुड़े हैं। मार्गदर्शन करते आ रहे हैं। अब तुम्हारा बचपन छूटते ही आवश्यक मार्गदर्शन करने आये हैं। सम्भवतः तुम्हें पूर्व जन्मों की स्मृति नहीं है इसी से भय और आश्चर्य हो रहा है। पिछले जन्मों का विवरण देखो और अपना संदेह निवारण करो। उनकी अनुकम्पा हुई और योग-निद्रा जैसी झपकी आने लगी। बैठा रहा। पर स्थिति ऐसी हो गई मानों मैं निद्राग्रस्त हूँ। तन्द्रा-सी आने लगी। योग निद्रा कैसी होती है इसका अनुभव मैंने जीवन में पहली बार किया। ऐसी स्थिति को ही जागृत समाधि भी कहते हैं। इस स्थिति में डुबकी लगाते ही एक-एक करके मुझे अपने पिछले तीन जन्मों का दृश्य क्रमशः ऐसा दृष्टिगोचर होने लगा मानों वह कोई स्वप्न न होकर प्रत्यक्ष घटनाक्रम ही हो। तीन जन्मों की तीन फिल्में आँखों के सामने से गुजर गयीं।

पहला जीवन- सन्त कबीर का, सपत्नीक काशी निवास। धर्मों के नाम पर चल रही विडम्बना का आजीवन उच्छेदन। सरल अध्यात्म का प्रतिपादन।

दूसरा जन्म- समर्थ रामदास के रूप में दक्षिण भारत में विच्छ्रंखलित राष्ट्र को शिवाजी के माध्यम से संगठित करना। स्वतन्त्रता हेतु वातावरण बनाना एवं स्थान-स्थान पर व्यायामशालाओं एवं सत्संग भवनों का निर्माण।

तीसरा जन्म - रामकृष्ण परमहंस, सपत्नी कलकत्ता निवास। इस बार पुनः गृहस्थ में रहकर विवेकानन्द जैसे अनेकों महापुरुष गढ़ना व उनके माध्यम से संस्कृति के नव-जागरण का कार्य सम्पन्न कराना।

आज याद आता है कि जिस सिद्ध पुरुष- अंशधर ने हमारी पन्द्रह वर्ष की आयु में घर पधार कर पूजा की कोठरी में प्रकाश रूप में दर्शन दिया था, उनका दर्शन करते ही मन ही मन तत्काल अनेकों प्रश्न सहसा उठ खड़े हुए थे। सद्गुरुओं की तलाश में आमतौर से जिज्ञासु गण मारे-मारे फिरते हैं। जिस-तिस से पूछते हैं। ऐसा लाभ मिलने को अपना भारी सौभाग्य मानते हैं। कोई कामना होती है तो उसकी पूर्ति के वरदान माँगते हैं। पर अपने साथ जो घटित हो रहा था, वह उसके सर्वथा विपरीत था। महामना मालवीय जी से गायत्री मन्त्र की दीक्षा पिताजी ने आठ वर्ष की आयु में ही दिलवा दी थी। उसी को प्राण दीक्षा बताया गया था। गुरु वरण होने की बात भी वहीं समाप्त हो गई थी। और किसी गुरु के प्राप्त होने की कभी कल्पना भी नहीं उठी। फिर अनायास ही वह लाभ कैसे मिला, जिसके सम्बन्ध में अनेकों किम्वदंतियां सुनकर हमें भी आश्चर्यचकित होना पड़ा है।

शिष्य गुरुओं की खोज में रहते हैं। मनुहार करते हैं। कभी उनकी अनुकम्पा भेंट दर्शन हो जाय तो अपने को धन्य मानते हैं। उनसे कुछ प्राप्त करने की आकाँक्षा रखते हैं। फिर क्या कारण है कि मुझे अनायास ही ऐसे सिद्ध पुरुष का अनुग्रह प्राप्त हुआ। यह कोई छद्म तो नहीं है? अदृश्य में प्रकटीकरण की बात भूत-प्रेत से सम्बन्धित सुनी जाती है और उनसे भेंट होना किसी अशुभ अनिष्ट का निमित्त कारण माना जाता है। दर्शन होने के उपरान्त मन में यही संकल्प विकल्प उठने लगे। संदेह उठा, किसी विपत्ति में फँसने जैसा कोई अशुभ तो पीछे नहीं पड़ा।

मेरे इस असमंजस को उन्होंने जाना। रुष्ट नहीं हुए। वरन् वस्तुस्थिति को जानने के उपरान्त किसी निष्कर्ष पर पहुँचने और बाद में कदम उठाने की बात उन्हें पसंद आई। यह बात उनकी प्रसन्न मुख-मुद्रा को देखने से स्पष्ट झलकती थी। कारण पूछने में समय नष्ट करने के स्थान पर उन्हें यह अच्छा लगा कि अपना परिचय, आने का कारण और मुझे पूर्वजन्म की स्मृति दिलाकर विशेष प्रयोजन के निमित्त चुनने का हेतु स्वतः ही समझा दें। कोई घर आता है तो उसका परिचय और आगमन का निमित्त कारण पूछने का लोक व्यवहार भी है। फिर कोई वजनदार आगन्तुक जिसके घर आते हैं उसका भी कोई वजन तौलते हैं। अकारण हलके और ओछे आदमी के यहाँ जा पहुँचना उनका महत्व भी घटता है और किसी तर्क बुद्धि वाले के मन में ऐसा कुछ घटित होने के पीछे कोई कारण न होने की बात पर संदेह होता है और आश्चर्य भी।

पूजा की कोठरी में प्रकाश-पुँज उस मानव ने कहा- ‘‘तुम्हारा सोचना सही है। देवात्माएँ जिनके साथ सम्बन्ध जोड़ती हैं उन्हें परखती हैं। अपनी शक्ति और समय खर्च करने से पूर्व कुछ जाँच-पड़ताल भी करती हैं। जो भी चाहे उसके आगे प्रकट होने लगें और उसका इच्छित प्रयोजन पूरा करने लगे ऐसा नहीं होता। पात्र-कुपात्र का अंतर किये बिना चाहे जिसके साथ सम्बन्ध जोड़ना किसी बुद्धिमान और सामर्थ्यवान के लिए कभी कहीं सम्भव नहीं होता। कई लोग ऐसा सोचते तो हैं कि किसी शक्ति सम्पन्न महामानव के साथ सम्बन्ध जोड़ने में लाभ है। पर यह भूल जाते हैं कि दूसरा पक्ष अपनी सामर्थ्य किसी निरर्थक व्यक्ति के निमित्त क्यों गँवायेंगे।

हम सूक्ष्म दृष्टि से ऐसे सत्पात्र की तलाश करते रहे जिसे सामयिक लोक-कल्याण का निमित्त कारण बनाने के लिए प्रत्यक्ष कारण बनावें। हमारा यह सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म शरीर से स्थूल कार्य नहीं बन पड़ते। इसके लिए किसी स्थूल शरीर धारी को ही माध्यम बनाना और शस्त्र की तरह प्रयुक्त करना पड़ता है। यह विषम समय है। इसमें मनुष्य का अहित होने की अधिक सम्भावनाएँ हैं। उन्हीं का समाधान करने के निमित्त तुम्हें माध्यम बनाना है। जो कमी है उसे दूर करना है। अपना मार्गदर्शन और सहयोग देना है। इसी निमित्त तुम्हारे पास आना हुआ है। अब तक तुम अपने सामान्य जीवन से ही परिचित थे। अपने को साधारण व्यक्ति ही देखते थे। असमंजस का एक कारण यह भी है। तुम्हारी पात्रता का वर्णन करें तो भी कदाचित तुम्हारा संदेह निवारण न हो। कोई किसी की बात पर अनायास ही विश्वास करें ऐसा समय भी कहाँ है। इसीलिये तुम्हें पिछले तीन जन्मों की जानकारी दी गयी।”

तीनों ही जन्मों का विस्तृत विवरण जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक का दर्शाने के बाद उन्होंने बताया कि किस प्रकार वे इन तीनों जीवनों में हमारे साथ रहे और सहायक बने।

वे बोले- ‘‘यह तुम्हारा चौथा जन्म है। तुम्हारे इस जन्म में भी सहायक रहेंगे। और इस शरीर से वह करावेंगे जो समय की दृष्टि से आवश्यक है। सूक्ष्म शरीरधारी प्रत्यक्ष जन-संपर्क नहीं कर सकते और न घटनाक्रम स्थूल शरीरधारियों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं इसलिए योगियों को उन्हीं का सहारा लेना पड़ता है।

तुम्हारा विवाह हो गया सो ठीक हुआ। यह समय ऐसा है जिसमें एकाकी रहने से लाभ कम और जोखिम अधिक है। प्राचीन काल में ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सूर्य, गणेश, इन्द्र आदि सभी सपत्नीक थे। सातों ऋषियों की पत्नियाँ थीं। कारण कि गुरुकुल आरण्यक स्तर के आश्रम चलाने में माता की भी आवश्यकता पड़ती है और पिता की भी। भोजन, निवास, वस्त्र, दुलार आदि के लिए भी माता चाहिए और अनुशासन, अध्यापन, अनुदान यह पिता की ओर से मिलता है। गुरु ही पिता है और गुरु पत्नी ही माता। ऋषि परम्परा के निर्वाह के लिए यह उचित भी है आवश्यक भी। आजकल भजन के नाम पर जिस प्रकार आलसी लोग सन्त का बाना पहनते और भ्रम जंजाल फैलाते हैं, तुम्हारे विवाहित होने से मैं प्रसन्न हूँ। इसमें बीच में व्यवधान तो आ सकता है पर पुनः तुम्हें पूर्व जन्म में तुम्हारे साथ रही सहयोगिनी पत्नी के रूप में मिलेगी जो आजीवन तुम्हारे साथ रहकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। पिछले 2 जन्मों में तुम्हें सपत्नीक रहना पड़ा है। यह न सोचना कि इससे कार्य में बाधा पड़ेगी। वस्तुतः इससे आज की परिस्थितियों में सुविधा ही रहेगी एवं युग परिवर्तन के प्रयोजन में भी सहायता मिलेगी।”

वह पावन दिन- बसन्त पर्व का दिन था। प्रातः ब्रह्म मुहूर्त था। नित्य की तरह सन्ध्या वंदन का नियम निर्वाह चल रहा था। प्रकाश-पुँज के रूप में देवात्मा का दिव्य दर्शन-उसी कौतूहल से मन में उठी जिज्ञासा और उसके समाधान का यह उपक्रम चल रहा था। मैंने अपना पिछला जन्म आदि से अन्त तक देखा। इसके बाद दूसरा भी। तदुपरान्त तीसरा भी। तीनों ही जन्म दिव्य थे। साधना में निरत रहे थे एवं तीनों ही में समाज के नवनिर्माण की महती भूमिका निभानी पड़ी थी। उन सामने उपस्थिति देवात्मा के मार्गदर्शन तीनों ही जन्मों में मिलते रहे थे। इसलिए उस समय तक जो अपरिचित जैसा कुछ लगता था वह दूर हो गया। एक नया भाव जगा घनिष्ठ आत्मीयता का। उनकी महानता अनुकम्पा और साथ ही अपनी कृतज्ञता का। इस स्थिति ने मन का काया-कल्प कर दिया। कल तक जो परिवार अपना लगता था वह पराया लगने लगा और जो प्रकाश-पुँज अभी-अभी सामने आया था। वह प्रतीत होने लगा कि मानो यही हमारी आत्मा है। इसी के साथ हमारा भूत-काल बंधा हुआ था और अब जितने दिन जीना है, वह अवधि भी इसी के साथ जुड़ी रहेगी। अपनी ओर से कुछ कहना नहीं। कुछ चाहना नहीं। किंतु दूसरे का जो आदेश हो उसे प्राण-पण से पालन करना। इसी का नाम समर्पण है। समर्पण मैंने उसी दिन प्रकाशपुंज देवात्मा को किया और उन्हीं को न केवल मार्गदर्शक वरन् भगवान के समतुल्य माना। उस सम्बन्ध निर्वाह को प्रायः साठ वर्ष होने को आते हैं। बिना कोई तर्क बुद्धि लड़ाये, बिना कुछ ननुनच किये, एक ही इशारे पर-एक ही मार्ग पर गतिशीलता होती रही है। सम्भव है, नहीं, अपने बूते यह हो सकेगा या नहीं, इसके परिणाम क्या होंगे? इन प्रश्नों में से एक भी आज तक मन में उठा नहीं।

उस दिन मैंने एक और नई बात समझी कि सिद्ध पुरुषों की अनुकम्पा मात्र लोक-हित के लिए-सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त होती है। न उनका कोई सगा सम्बन्धी होता है न उदासीन विरोधी। किसी को ख्याति, सम्पदा या कीर्ति दिलाने के लिए उनकी कृपा नहीं बरसती। विराट् ब्रह्म- विश्व मानव ही उनका आराध्य होता है। उसी के निमित्त अपने स्वजनों को वे लगाते हैं। अपनी इस नवोदित मान्यता के पीछे रामकृष्ण- विवेकानन्द का, समर्थ रामदास- शिवाजी का, चाणक्य- चन्द्रगुप्त का, गान्धी- विनोबा का, बुद्ध- अशोक का गुरु शिष्य सम्बन्ध स्मरण हो आया। जिनकी आत्मीयता में ऐसा कुछ न हो, सिद्धि-चमत्कार, कौतुक-कौतूहल, दिखाने या सिखाने का क्रिया-कलाप चलता रहा हो, समझना चाहिए कि वहाँ गुरु और शिष्य की क्षुद्र प्रवृत्ति है और जादूगर बाजीगर जैसा कोई खेल-खिलवाड़ चल रहा है। गन्ध बाबा- चाहे जिसे फूल की सुगन्धि सुंघा देते थे। बाघ बाबा, अपनी कुटी में बाघ को बुलाकर बिठा लेते थे। समाधि बाबा कई दिन तक जमीन में गढ़े रहते थे। सिद्ध बाबा आगन्तुकों की मनोकामना पूरी करते थे। ऐसी-ऐसी अनेक जनश्रुतियाँ भी दिमाग में घूम गईं और समझ में आया कि यदि इन घटनाओं के पीछे मैस्मरेजम स्तर की जादूगरी थी तो वे ‘महान्’ कैसे हो सकते हैं। ठण्डे प्रदेश में गुफा में रहना जैसी घटनाएँ भी कौतूहल वर्धक ही हैं। जो काम साधारण आदमी न कर सके उसे कोई एक करामात की तरह कर दिखाए तो इसमें कहने भर की सिद्धाई है। मौन रहना, हाथ पर रखकर भोजन करना, एक हाथ ऊपर रखना, झूले पर पड़े-पड़े समय गुजारना जैसे असाधारण करतब दिखाने वाले बाजीगर सिद्ध हो सकते हैं। पर यदि कोई वास्तविक सिद्ध या शिष्य होगा तो उसे पुरातन काल के लोग मंगल के लिए जीवन उत्सर्ग करने वाले ऋषियों के राजमार्ग पर चलना पड़ा होगा। आधुनिक काल में भी विवेकानन्द, दयानन्द, कबीर, चैतन्य, समर्थ की तरह उसी मार्ग पर चलना पड़ा होगा। भगवान अपना नाम जपने वाले मात्र से प्रसन्न नहीं होते। न उन्हें पूजा-प्रसाद आदि की आवश्यकता है। जो उनके इस विश्व उद्यान को सुरम्य, सुविकसित करने में लगाते हैं, उन्हीं का नाम जप सार्थक है। यह विचार मेरे मन में उसी बसन्त पर्व के दिन, दिनभर उठते रहे। क्योंकि उनने स्पष्ट कहा था कि पात्रता में जो कमी है उसे पूरा करने के साथ-साथ लोक-मंगल का कार्य भी साथ-साथ करना है। एक के बाद दूसरा नहीं दोनों साथ-साथ। चौबीस वर्ष का उपासना क्रम समझाया। गायत्री पुरश्चरणों की श्रृंखला बताई। इसके साथ पालन करने योग्य नियम बताये, साथ ही स्वतन्त्रता संग्राम में एक सच्चे स्वयंसेवक की तरह काम करते रहने के लिये कहा।

उस दिन उन्होंने हमारा समूचा जीवनक्रम किस प्रकार चलना चाहिए इसका स्वरूप एवं पूरा विवरण बताया। बताया ही नहीं स्वयं लगाम हाथ में लेकर चलाया भी। चलाया ही नहीं हर प्रयास को सफल भी बनाया।

उसी दिन हमने सच्चे मन से उन्हें समर्पण किया। वाणी ने नहीं, आत्मा ने कहा- “जो कुछ पास में है, आपके निमित्त ही अर्पण। भगवान को हमने देखा नहीं पर वह जो कल्याण कर सकता था वही आप भी कर रहे हैं। इसलिए आप हमारे भगवान हैं। जो आज सारे जीवन का ढाँचा आपने बताया है उसमें राई रत्ती प्रमाद न होगा।

उस दिन उनने भावी जीवन सम्बन्धी थोड़ी-सी बातें विस्तार से समझाई (1) गायत्री महाशक्ति के चौबीस वर्ष में चौबीस महा-पुरश्चरण (2) अखण्ड घृत दीप की स्थापना (3) चौबीस वर्ष में एवं उसके बाद समय-समय पर क्रमबद्ध मार्गदर्शन के लिए चार बार हिमालय अपने स्थान पर बुलाना और प्रायः छह माह से एक वर्ष तक अपने समीपवर्ती क्षेत्र में ठहराना।

इस संदर्भ में और भी विस्तृत विवरण उन्हें बताना था, सो बता दिया। विज्ञ पाठकों को इतनी ही जानकारी पर्याप्त है, जिसका ऊपर की पंक्तियों में उल्लेख है। उनके बताये सारे काम साथ-साथ निभाते चले गए। रात्रि में पात्रता परिष्कृत करने की उपासना, साधना। दिन में परमार्थ प्रयोजन की आराधना। सम्भव हुआ तो जौ की रोटी। न सम्भव हुआ तो परोसे गए सामान में से जो सात्विक हो उसका चयन। यह दोनों क्रम साथ-साथ चलते रहे। दोनों परिपूर्ण श्रद्धा और सच्चाई के साथ बन पड़े। इसलिए अहर्निश आनन्द में डूबे रहने जैसी मनःस्थिति बनी रही। चार घण्टे की नींद पर्याप्त बैठती रहीं। इतने समय में थकान पूरी तरह दूर हो जाती। पूरे मन में काम करने की आदत ने सोने की आदत भी ऐसी डाली जिसमें चार घण्टे इतनी गहरी नींद में सोना होता कि दीन दुनियाँ का कोई पता न चलता। एक रात्रि तो बाहर वर्षा में सोना हुआ, कपड़े भीगते रहे। पर नींद न खुली। नियत समय पर उठना हुआ तब तक पता चला कि कपड़े पूरी तरह भीग गये हैं।

निद्रा की तरह जिह्वा भी काबू में रही। उसने भी कभी हैरान न किया। कितने ही दिन, पालक, बथुआ, मेथी स्तर के पत्तों से कट गये। कितने ही दिन अंकुरित अन्न से, कई बार बिना नमक का सत्तू काम दे गया। स्वाद किसे कहते हैं, जाना ही नहीं पेट इतना सही रहा कि अच्छी तरह चबाकर ध्यान रखने पर जो विवेकपूर्वक खाया गया वह भली प्रकार हजम होता रहा।

स्वाध्याय का, अध्ययन का व्यसन रहा। उसके लिए रास्ता चलते हुए पढ़ने की आदत रही। उससे एक साथ दो काम सधते रहे। पैर चलते रहे और आंखें पुस्तकों देखते हुए पढ़ती रहीं। हाथों को पुस्तक थामें रहने और पन्ने उलटते रहने का काम करना पड़ा। इस प्रकार नित्य नियमित रूप से टहलने के साथ पढ़ने का प्रतिफल आश्चर्यजनक हुआ।

‘समय की कमी’ की शिकायत करने वालों के लिए हमारी दिनचर्या और कार्यविधि की नियमित संगति- यह दो अति महत्वपूर्ण सूत्र हैं। 24 घंटे बहुत होते हैं। इनका ढीले-पीले ढंग से नहीं। कसकर-मुस्तैदी के साथ उपयोग किया जाय तो इतने भर में बहुत बड़ी उपलब्धि हो सकती है। हमारी जीवनचर्या में 15 में से लेकर 39 वर्ष की आयु तक का जो विविध उपयोग हुआ वह हर किसी जागरूक व्यक्ति के लिए सम्भव है। इस पद्धति को अपनाने पर किसी को भी समय की कमी की कभी शिकायत नहीं रह सकती।

हमारे जीवन के सौभाग्य का सूर्योदय आज से लगभग 60 वर्ष पूर्व हुआ उसे हम जन्म-जन्मान्तरों तक स्मरण रखेंगे। भगवान ऐसा सुयोग सबको दे, जिससे स्वयं पार होना और दूसरों को अपने कन्धे पर बिठाकर पार लगाना सम्भव हो सके।




Quotation - Akhandjyoti April 1985

मैं धुँधले तौर पर यह अनुभव करता हूँ कि जब मेरे चारों ओर सब कुछ बदल रहा है, मर रहा है, तब भी इन सब परिवर्तनों के नीचे एक जीवित शक्ति है, जो कभी नहीं बदलती, जो सबको एक में ग्रथित करके रखती है, उसका संहार करती है और फिर नये सिरे से पैदा करती है, यही शक्ति ईश्वर है, परमात्मा है। मैं मानता हूँ कि ईश्वर जीवन है, सत्य है, प्रकाश है, प्रेम है, वह परम मंगल है।

- महात्मा गाँधी

मृत व्यक्ति वापस नहीं लौटते, गत रजनी फिर नहीं आती, अतः मृत भूतकाल की पूजा छोड़ कर, आओ, सप्राण वर्तमान की पूजा करें। विलीन विनष्ट पथ के अनुसन्धान में शक्ति क्षय न करके, आओ, सुप्रशस्त नवीन मार्ग पर जो सामने है, चल पड़ें। इसी में बुद्धिमत्ता है।

-स्वामी विवेकानन्द

भगवान निराकार, सर्वव्यापी एवं जन्म-मरण से रहित हैं। विकृत परिस्थितियों को सन्तुलित करने के लिए उनकी प्रेरणा से तूफानी आन्दोलन उभरते रहते हैं। ये आन्दोलन ही अवतार कहलाते हैं। धर्मचक्र प्रवर्तन, महाभारत संयोजन, स्वतन्त्रता संग्राम की तरह प्रज्ञा अभियान भी एक ऐसा ही आन्दोलन है।

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Quotation - Akhandjyoti April 1985

महामानव, सन्त, सुधारक और शहीद का जीवन जीते हैं। वे अपने चरित्र और प्रयासों से असंख्यों को ऊँचा उठाते, आगे बढ़ाते हैं। उन्हें देवात्मा या ऋषि भी कहते हैं। ये ऋषि अवतार सत्ता के ही अंश होते हैं।




तीन जन्मों का सम्बन्ध इस जन्म का समर्पण - Akhandjyoti April 1985

पिछले जिन तीन जन्मों का दृश्य गुरुदेव ने हमें दिखाया उनमें से प्रथम थे सन्त कबीर, दूसरे समर्थ रामदास, तीसरे रामकृष्ण परमहंस। इन तीनों का कार्यकाल इस प्रकार रहा है- कबीर ई. (सन् 1398 से 1518) समर्थ रामदास (सन् 1608 से 1682) श्री रामकृष्ण परमहंस (सन् 1836 से 1896)। यह तीनों ही भारत की सन्त सुधारक परम्परा के उज्ज्वल नक्षत्र हैं। उनके शरीरों द्वारा ऐसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न हुए जिससे देश, धर्म, समाज और संस्कृति का महान कल्याण हुआ।

भगवान के भक्त तीनों ही थे। इसके बिना आत्म बल की समर्थता और कषाय-कल्मषों का निराकरण कठिन है। किन्तु साथ ही भगवान के विश्व उद्यान को सींचने और समुन्नत सुविकसित करने की प्रक्रिया भी साथ-साथ ही चलनी चाहिए तो इन तीनों के जीवनों में यह परम्पराऐं भली प्रकार समाहित रहीं।

कबीर को एक मुसलमान जुलाहे ने तालाब किनारे पड़ा हुआ पाया था। उन्हें कोई ब्राह्मण कन्या अवैध सन्तान होने के कारण इस प्रकार छोड़ गई थी। जुलाहे ने उन्हें पाल लिया। वे सन्त तो आजीवन रहे पर गुजारे के लिए रोटी अपने पैतृक व्यवसाय से कमाते रहे।

अपने बारे में उनने लिखा है-

काशी का मैं वासी ब्राह्मण, नाम मेरा परबीना। एक बार हर नाम बिसारा, पकरि जुलाहा कीन्हा॥ भई मेरा कौन बुनेगा ताना॥

कबीर ने तत्कालीन हिन्दू समाज की कुरीतियाँ और मत-मतान्तरों की विग्रह विडम्बनाओं को दूर करने के लिए प्राण-पण से प्रयत्न किये। उन पर इस्लाम विरोधी होने का इल्जाम लगाया गया और हाथ-पैरों में लोहे की जंजीर बाँधकर नदी में डलवा दिया गया पर ईश्वर कृपा से जंजीर टूट गई और वे जीवित बच गये। कुल वंश को लेकर उन्हें समाज का विग्रह विरोध सहना पड़ा पर वे एकाकी अपने प्रतिपादन पर अड़े रहे। उन दिनों काशी में मृत्यु से स्वर्ग मिलने और मगहर में मरने पर नरक जाने की मान्यता प्रचलित थी। वे इसका खण्डन करने के लिए अन्तिम दिनों मगहर ही चले गये और वहीं शरीर छोड़ा। कबीर विवाहित थे। उनकी पत्नी का नाम लोई था वह आजीवन उनके हर कार्य में उनके साथ रहीं। जीवन का एक भी दिन उनने ऐसा न जाने दिया, जिसमें भ्रान्तियों के निवारण और सत्परम्पराओं के प्रतिपादन में प्राणपण से प्रयत्न न किया हो। विरोधियों में से कोई उन्हें तनिक भी न झुका सका।

मरते समय उनकी लाश को हिन्दू जलाना चाहते थे मुसलमान दफनाना। इसी बात को लेकर विग्रह खड़ा हो गया। चमत्कार यह हुआ कि कफ़न के नीचे से लाश गायब हो गई। उसके स्थान पर फूल पड़े मिले। इनमें से आधों को मुसलमानों ने दफनाया और आधों को हिन्दुओं ने जलाया। दोनों ही सम्प्रदाय वालों ने उनकी स्मृति में भव्य भवन बनाये। कबीर पन्थ को मानने वाले लाखों व्यक्ति हिन्दुस्तान में हैं।

दूसरे समर्थ रामदास महाराष्ट्र के उच्चस्तरीय सन्त थे। उन्होंने शिवाजी को स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार किया। भवानी से अक्षय पराक्रम वासी तलवार दिलवाई। उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर 700 महावीर मन्दिर बनवाये। जिनमें हनुमान जी की प्रतिमा तो थी ही साथ ही व्यायामशाला और सत्संग प्रक्रिया भी नियमित रूप से चलती थी। इन देवालयों के माध्यम से शिवाजी को सैनिक, शस्त्र और धन मिलता था। ताकि स्वतन्त्रता संग्राम सफलता पूर्वक चलता रहे। शिवाजी ने राज्य की स्थापना की। उसकी गद्दी पर गुरु के खड़ाऊँ स्थापित किये और स्वयं प्रबन्धक मात्र रहे। शिवाजी द्वारा छेड़ा गया आन्दोलन बढ़ता ही गया और अन्त में गान्धी जी के नेतृत्व में भारत स्वतन्त्र होकर रहा।

तीसरे रामकृष्ण परमहंस कलकत्ता के पास एक देहात में जन्मे थे। वे कलकत्ता दक्षिणेश्वर मन्दिर में पूजा करते थे। हजारों जिज्ञासु नित्य उनके पास आकर ज्ञान पिपासा तृप्त करते थे और उनके आशीर्वाद अनुदानों से लाभ उठाते थे। उनकी धर्मपत्नी शारदामणि थी।

उन्होंने नरेन्द्र के रूप में सुपात्र पाया और संन्यास देकर विवेकानन्द नाम दिया और देश देशान्तरों में भारतीय संस्कृति की गरिमा समझाने भेजा। देश में शिक्षित वर्ग ईसाई एवं नास्तिक बनता चला जा रहा था। विवेकानन्द के प्रवचनों से लाखों के मस्तिष्क सुधरे। उनने संसार भर में रामकृष्ण परमहंस मिशन की स्थापनाऐं कीं, जो पीड़ा निवारण की सेवा करता है। विवेकानन्द स्मारक कन्या कुमारी पर, जहाँ उन्हें नव जागृति का सन्देश गुरु से मिला था, बना है एवं देखने ही योग्य है।

यह एक आत्मा के विभिन्न शरीरों का वर्णन है। इसके अतिरिक्त अन्यान्य आत्माओं में प्रेरणाऐं भरकर उस दैवी सत्ता ने समय-समय पर उनसे बड़े-बड़े काम कराये। चैतन्य महाप्रभु बंगाल के एवं बाबा जलाराम गुजरात के उन्हीं के संरक्षण में ऊँची स्थिति तक पहुँचे और देश को ऊँचा उठाने में, भगवद् भक्ति को उसके वास्तविक स्वरूप में जन-जन तक पहुँचाने में उस अन्धकार युग में अभिनव सूर्योदय का काम किया।

यह तीन प्रधान जन्म थे जिनकी हमें जानकारी दी गयी। इनके बीच-बीच मध्यकालों में हमें और भी महत्वपूर्ण जन्म लेने पड़े हैं पर वे इतने प्रख्यात नहीं हैं, जितने उपरोक्त तीन। हमें समग्र जीवन की रूपरेखा इन्हीं में दिखायी गयी और बताया गया कि गुरुदेव इन जन्मों में हमें किस प्रकार अपनी सहायता पहुँचाते-ऊँचा उठाते और सफल बनाते रहे हैं।

अधिक जानने की अपनी इच्छा भी नहीं हुई जब समझ लिया गया कि इतनी महान आत्मा स्वयं पहुँच-पहुँचकर सत्पात्र आत्माओं को ढूंढ़ती और उनके द्वारा बड़े काम कराती रही हैं, तो हमारे लिए इस जन्म में भी यही उचित है कि एक का पल्ला पकड़े, एक नाव में बैठें और अपनी निष्ठा डगमगाने न दें। इन तीन महान जन्मों के माध्यम से जो समय बचा, उसे हमें कहाँ-कहाँ किस रूप में, कैसा खर्च करना पड़ा, यह पूछने का अर्थ उन पर अविश्वास व्यक्त करना था। अनेक गवाहियाँ माँगना था। हमारे सन्तोष के लिए यह तीन जन्म ही पर्याप्त थे।

महान कार्यों का बोझ उत्तरदायित्व सम्भालने वाले को समय-समय पर अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अनेक प्रकार के असाधारण पराक्रम दिखाने पड़ते हैं। यह हमारे साथ भी घटित होता रहा है। दौड़-दौड़कर गुरुदेव सहायता के लिए पहुँचते रहे हैं। हमारी नन्हीं सी सामर्थ्य में अपनी महती सामर्थ्य मिलाते रहे हैं, संकटों से बचाते रहे हैं, लड़खड़ाते पैरों को सम्भालते रहे हैं। इन तीन जन्मों की घटनाओं से ही पूरी तरह विश्वास हो गया। इसलिए उसी दिन निश्चय कर लिया कि अपना जीवन अब इन्हीं के चरणों पर समर्पित रहेगा। इन्हीं के संकेतों पर चलेगा।

इस जन्म में उन्होंने हमें धर्मपत्नी समेत पाया और कहा- इस विषम समय में आध्यात्मिक जीवन धर्मपत्नी समेत अधिक अच्छी तरह बिताया जा सकता है। विशेषतया जब आश्रम बनाकर शिक्षा व्यवस्था करनी हो, माता द्वारा भोजन, निवास, स्नेह-दुलार आदि का प्रबन्ध और पिता द्वारा अनुशासन, अध्यापन, मार्गदर्शन का कार्य चलने में सुविधा रहती है।




सुकरात (kahani) - Akhandjyoti April 1985

सुकरात बहुत कुरूप थे। फिर भी वे सदा दर्पण पास रखते थे और बार-बार मुँह देखते रहते थे। एक मित्र ने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया और कारण पूछा- तो उनने कहा- “सोचता यह रहता हूँ कि इस कुरूपता का प्रतिकार मुझे अधिक अच्छे कामों की सुन्दरता बढ़ाकर करना चाहिए। इस तथ्य को याद रखने में दर्पण देखने से सहायता मिलती है।” इस संदर्भ में एक दूसरी बात, सुकरात ने कहा- “जो सुन्दर हैं, उन्हें भी इसी प्रकार बार-बार दर्पण देखना चाहिए और सोचना चाहिए कि इस ईश्वर प्रदत्त सौंदर्य में कहीं दुष्कृतों के कारण दाग धब्बा न लग जाय।”




मार्ग दर्शक द्वारा चार हिमालय यात्राओं का निर्देश - Akhandjyoti April 1985

लोग मार्गदर्शकों और सिद्ध पुरुषों की तलाश करते रहते हैं ताकि उनके अनुग्रह एवं सहयोग से अध्यात्म मार्ग पर चलना और सफलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव हो सके। इसी खोज में लोग एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे की खोज में फिरते हैं, फिर भी उन्हें सफलता मिल नहीं पाती। जो दूसरों के लिए सहायक हुए वे भी अपनी ओर से मुँह फेर लेते हैं।

हमारा अनुभव इन लोगों से सर्वथा भिन्न रहा है। जितनी उत्सुकता साधकों को सिद्ध पुरुष खोजने की होती है उससे असंख्यों गुनी उत्कंठा सिद्ध पुरुषों को सुपात्र साधकों की तलाश करने के निमित्त होती है। साधक सत्पात्र चाहिए। जिसने अपना चिन्तन, चरित्र और व्यवहार परिष्कृत कर लिया हो वही सच्चा साधक है। उसे मार्गदर्शक खोजने नहीं पड़ते वरन् वे दौड़कर स्वयं उनके पास आते और उंगली पकड़कर आगे चलने का रास्ता बताते हैं। जहाँ वे लड़खड़ाते हैं वहाँ गोदी में उठाकर कन्धे पर बिठाकर पार लगाते हैं। हमारे सम्बन्ध में यही हुआ है। घर बैठे पधारकर अधिक सामर्थ्यवान बनाने के लिए 24 वर्ष का गायत्री पुरश्चरण उन्होंने कराया एवं उसकी पूर्णाहुति में सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ सम्पन्न कराया है। धर्म तन्त्र से लोक शिक्षण के लिए एक लाख अपरिचित व्यक्तियों को परिचित ही नहीं, घनिष्ठ बनाकर कंधे से कन्धा- कदम से कदम मिलाकर चलने योग्य बना दिया।

अपने प्रथम दर्शन में ही चौबीस महापुरश्चरण पूरे होने एवं चार बार एक-एक वर्ष के लिए हिमालय बुलाने की बात गुरुदेव ने कही।

हमें हिमालय पर बार-बार बुलाये जाने के कई कारण थे। एक यह कि सुनसान प्रकृति के सान्निध्य में- प्राणियों एवं सुविधाओं के अभाव में आत्मा को एकाकीपन अखरता तो नहीं। दूसरे यह कि इस क्षेत्र में रहने वाले हिंसक पशुओं के साथ मित्रता बना सकने लायक आत्मीयता विकसित हुई या नहीं। तीसरे, वह समूचा क्षेत्र देवात्मा है। उसमें ऋषियों ने मानवी काया में रहते हुए देवत्व उभारा और देव मानव के रूप में ऐसी भूमिकाऐं निभाईं जो साधन और सहयोग के अभाव में साधारण जनों के लिए कर सकना सम्भव नहीं थी।

उनका मूल निर्देश था कि अगले दिनों उपलब्ध आत्मबल का उपयोग हमें ऐसे ही प्रयोजन के लिए एक साथ करना है, जो ऋषियों ने समय-समय पर तात्कालिक समस्याओं के समाधान के निमित्त अपने प्रबल पुरुषार्थ से सम्पन्न किया था। यह समय ऐसा है जिसमें अगणित अभावों की एक साथ पूर्ति करनी है। साथ ही एक साथ चढ़ दौड़ी अनेकानेक विपत्तियों से जूझना है। यह दोनों ही कार्य इसी उत्तराखण्ड कुरुक्षेत्र में पिछले दिनों सम्पन्न हुए हैं। पुरातन देवताओं ऋषियों में से कुछ आँशिक रूप से सफल हुए हैं, कुछ असफल भी रहे हैं। इस बार एकाकी वे सब प्रयत्न करने और समय की माँग को पूरा करना है। इसके लिए जो मोर्चे बन्दी करनी है उसकी झलक झाँकी समय रहते कर ली जाय ताकि कन्धों पर आने वाले उत्तरदायित्वों की पूर्व जानकारी रहे और पूर्वज किस प्रकार दाँव-पेंच अपना कर विजय श्री को वरण करते रहे हैं, इस अनुभव से कुछ न कुछ सरलता मिले। यह तीनों ही प्रयोजन समझने, अपनाने और परीक्षा में उत्तीर्ण होने के निमित्त ही हमारी भावी हिमालय यात्राऐं होनी हैं, ऐसा उनका निर्देश था। आगे उन्होंने बताया कि “हम लोगों की तरह तुम्हें भी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से अति महत्वपूर्ण काम करने होंगे। इसका पूर्वाभ्यास करने के लिए यह सीखना होगा कि स्थूल शरीर से हिमालय के किस भाग में-कितने समय तक किस प्रकार ठहरा जा सकता है और निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति में संलग्न रहा जा सकता है।”

“सहज शीत ताप के मौसम में, जीवनोपयोगी सभी वस्तुऐं मिल जाती हैं, शरीर पर भी ऋतुओं का असह्य दबाव नहीं पड़ता। किन्तु हिमालय क्षेत्र के असुविधाओं वाले प्रदेश में स्वल्प साधनों के सहारे कैसे रहा जा सकता है, यह भी एक कला है साधना है। जिस प्रकार नट शरीर को साधकर अनेक प्रकार के कौतूहलों का अभ्यास कर लेते हैं, लगभग उसी प्रकार का वह अभ्यास है जिसमें नितान्त एकाकी रहना पड़ता है। पत्तियों और कन्दों के सहारे निर्वाह करना पड़ता है और हिंसक जीव-जन्तुओं के बीच रहते हुए अपने प्राण बचाना पड़ता है।

जब तक स्थूल शरीर है तभी तक यह झंझट है। सूक्ष्म शरीर में चले जाने पर वे आवश्यकताऐं समाप्त हो जाती हैं जो स्थूल शरीर के साथ जुड़ी हुई हैं। सर्दी-गर्मी से बचाव, क्षुधा पिपासा का निवारण, निद्रा और थकान का दबाव यह सब झंझट उस स्थिति में नहीं रहते हैं। पैरों से चलकर मनुष्य थोड़ी दूर जा पाता है किन्तु सूक्ष्म शरीर के लिए एक दिन में सैकड़ों योजनों की यात्रा सम्भव है। एक साथ, एक मुख से सहस्रों व्यक्तियों के अन्तःकरणों तक अपना सन्देश पहुँचाया जा सकता है। दूसरों की इतनी सहायता सूक्ष्म शरीरधारी कर सकते हैं, जो स्थूल शरीर रहते सम्भव नहीं। इसलिए सिद्ध पुरुष सूक्ष्म शरीर द्वारा काम करते हैं। उनकी साधनाएं भी स्थूल शरीर वालों की अपेक्षा भिन्न हैं।”

“स्थूल शरीरधारियों की एक छोटी सीमा है। उनकी बहुत सारी शक्ति तो शरीर की आवश्यकताऐं जुटाने में दुर्बलता, रुग्णता, जीर्णता आदि के व्यवधानों से निपटने में खर्च हो जाती है। किन्तु लाभ यह है कि प्रत्यक्ष दृश्य मान कार्य स्थूल शरीर से ही हो पाते हैं। इस स्तर के व्यक्तियों के साथ घुलना-मिलना- आदान-प्रदान इसी के सहारे सम्भव है। इसलिए जन साधारण के साथ संपर्क साधे रहने के लिए प्रत्यक्ष शरीर से ही काम लेना पड़ता है। फिर वह जरा जीर्ण हो जाने पर अशक्त हो जाता है और त्यागना पड़ता है। ऐसी स्थिति में उसके द्वारा आरम्भ किये गये काम अधूरे रह जाते हैं। इसलिए जिन्हें लम्बे समय तक ठहराना है और महत्वपूर्ण व्यक्तियों के अन्तराल में प्रेरणाऐं एवं क्षमताऐं देकर बड़े काम कराते रहना है, उन्हें सूक्ष्म शरीर में ही प्रवेश करना पड़ता है।”

“जब तक तुम्हारे स्थूल शरीर की उपयोगिता रहेगी, तभी तक वह काम करेगा। इसके उपरान्त इसे छोड़कर सूक्ष्म शरीर में चला जाना होगा। तब साधनाऐं भिन्न होंगी, क्षमताऐं बढ़ी-बढ़ी होंगी। विशिष्ट व्यक्तियों से संपर्क रहेगा। बड़े काम इसी प्रकार हो सकेंगे।”

गुरुदेव ने कहा- “उचित समय आने पर तुम्हारा परिचय देवात्मा हिमालय क्षेत्र से कराना है। गोमुख से पहले सन्त महापुरुष स्थूल शरीर समेत निवास करते हैं। इस क्षेत्र में भी कई प्रकार की कठिनाइयाँ हैं। इनके बीच निर्वाह करने का अभ्यास करने के लिए, एक-एक साल वहाँ निवास करने का क्रम बना देने की योजना बनाई है। इसके अतिरिक्त हिमालय का हृदय जिसे अध्यात्म का ध्रुव केन्द्र कहते हैं। उसमें चार-चार दिन ठहरना होगा, हम साथ रहेंगे। स्थूल शरीर जैसी स्थिति सूक्ष्म शरीर की बनाते रहेंगे। वहाँ कौन रहता है, किस स्थिति में रहता है, तुम्हें कैसे रहना होगा, यह भी तुम्हें विदित हो जाएगा। दोनों शरीरों का दोनों क्षेत्रों का अनुभव क्रमशः बढ़ते रहने में तुम उस स्थिति में पहुँच जाओगे, जिसमें ऋषि अपने निर्धारित संकल्पों की पूर्ति में संलग्न रहते हैं। संक्षेप में यही है तुम्हें चार बार हिमालय बुलाने का उद्देश्य। इसके लिए जो अभ्यास करना पड़ेगा, जो परीक्षा उत्तीर्ण करनी पड़ेगी, यह उद्देश्य भी इस बुलाये का है। तुम्हारी यहाँ पुरश्चरण साधना में, स्वतन्त्रता आन्दोलन में स्वयं सेवक रूपी सेवा में इस विशिष्ट प्रयोग से कोई विघ्न न पड़ेगा।

सूक्ष्म शरीरधारी उसी क्षेत्र में इन दिनों निवास करते हैं। पिछले हिम युग के बाद परिस्थितियाँ बदल गई हैं। जहाँ धरती का स्वर्ग था, वहाँ का वातावरण अब देवताओं के उपयुक्त नहीं रहा, इसलिए वे अन्तरिक्ष में रहते हैं।

पूर्व काल में ऋषिगण गोमुख से ऋषिकेश तक अपनी-अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार रहते थे। वह क्षेत्र अब पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और व्यवसाइयों से भर गया है। इसलिए उसे उन्हीं लोगों के लिए छोड़ दिया गया है। अनेकों देव मन्दिर बन गये हैं ताकि यात्रियों का कौतूहल पुरातन काल का इतिहास और निवासियों का निर्वाह चलता रहे।”

हमें बताया गया कि थियोसोफी की संस्थापिका ब्लैवेट्स्की सिद्ध पुरुष थीं। ऐसी मान्यता है कि वे स्थूल शरीर में रहते हुए सूक्ष्म शरीरधारियों के संपर्क में थीं। उनने अपनी पुस्तकों में लिखा है कि दुर्गम हिमालय में “अदृश्य सिद्ध पुरुषों की पार्लियामेंट” है। इसी प्रकार उस क्षेत्र के दिव्य निवासियों को “अदृश्य सहायक” भी कहा गया है। गुरुदेव ने कहा कि वह सब सत्य है, तुम अपने दिव्य चक्षुओं से यह सब उसी हिमालय क्षेत्र में देखोगे, जहाँ हमारा निवास है।” तिब्बत क्षेत्र उन दिनों हिमालय की परिधि में आता था। अब वह परिधि घट गई है। तो भी व्लैक्ट्स्की का कथन सत्य है। स्थूल शरीरधारी उसे देख नहीं पाते पर हमें अपने मार्गदर्शक गुरुदेव की सहायता से उसे देख सकने का आश्वासन मिल गया।

गुरुदेव ने कहा- “हमारे बुलावे की प्रतीक्षा करते रहना। जब परीक्षा की स्थिति के लिए उपयुक्तता एवं आवश्यकता समझी जायेगी, तभी बुलाया जायेगा। अपनी ओर से उसकी इच्छा या प्रतीक्षा भी मत करना। अपनी ओर से जिज्ञासा वश उधर प्रयाण भी मत करना। वह सब निरर्थक रहेगा। तुम्हारे समर्पण के उपरान्त वह जिम्मेदारी हमारी हो जाती है।”

कथन समाप्त हुआ और वे उत्तर या समाधान की प्रतीक्षा किये बिना अन्तर्ध्यान हो गये।




बाँसों का झुरमुट (kahani) - Akhandjyoti April 1985

पास ही बाँसों का झुरमुट- पास ही आम का पेड़। बाँस ऊँचा था, आम छोटा। एक दिन बांस ने कहा- देखते नहीं मैं कितना बड़ा हो चला, कितनी तेजी से बड़ा, एक तुम हो जो इतनी आयु होने पर भी अभी छोटे ही बने हुए हो।

आम ने बाँस के सौभाग्य को सराहा पर अपनी स्थिति पर भी असन्तोष व्यक्त नहीं किया।

समय बीतता गया। बाँस पककर सूख चला। किन्तु आम की डालियाँ फलों से लदी और वह अधिक झुक गया।

बाँस फिर इठलाया। देखते हो मैं सुनहरा हो चला और बिना पत्तियों के भी दूर-दूर से कितना सुनहरा दिखता हूं। एक तुम हो, जिसे फलों से लदने पर भी नीचा देखना पड़ रहा है।

आम ने फिर भी अपने सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा, बाँस की सराहना भर कर दी।

एक आया यात्रियों का झुण्ड। ठहरने के लिए आश्रय की तलाश थी। सो फलों से लदा छायादार आम का पेड़ सबको सुहाया। डेरा डाल कर वे वहाँ रात्रि विराम करने लगे।

जरूरत आम की पड़ी- भोजन पकाने के लिए। नजर दौड़ाई तो पास में भी सूखा बाँस खड़ा दिखा, और काटा, जलाना आरम्भ कर दिया।

बाँस बड़बड़ाने लगा। पर आम ठहरे यात्रियों को सुख पाते देखकर सन्तोष की साँस लेता रहा।




तीनों कार्यक्रमों का प्राण-पण से निर्वाह - Akhandjyoti April 1985

हमें प्रथम साक्षात्कार के समय मार्गदर्शक सत्ता द्वारा तीन कार्यक्रम दिए गये थे। सभी नियमोपनियमों के साथ 24 वर्ष का 24 गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न किया जाना था। अखण्ड घृत दीपक को भी साथ-साथ निभाना था। अपनी पात्रता में क्रमशः कमी पूरी करने के साथ लोक-मंगल की भूमिका निभाने हेतु साहित्य सृजन करना दूसरा महत्वपूर्ण दायित्व था। इसके लिए गहन स्वाध्याय भी करना था, जो एकाग्रता सम्पादन की साधना थी। साथ ही जन-संपर्क का कार्य भी करना था ताकि भावी कार्य क्षेत्र को दृष्टिगत रखते हुए हमारी संगठन क्षमता विकसित हो। तीसरा महत्वपूर्ण दायित्व था स्वतन्त्रता संग्राम में एक स्वयंसेवी सैनिक की भूमिका निभाना। देखा जाय तो सभी दायित्व शैली एवं स्वरूप की दृष्टि से परस्पर विरोधी थे। किन्तु साधना एवं स्वाध्याय की प्रगति में इनमें से कोई बाधक नहीं बने। जबकि इस बीच हमें दो बार हिमालय भी जाना पड़ा। अपितु सभी साथ-साथ सहज ही ऐसे सम्पन्न होते चले गये कि हमें स्वयं इनके क्रियान्वयन पर अब आश्चर्य होता है। इसका श्रेय उस दैवी मार्गदर्शक सत्ता को जाता है जिसने हमारे जीवन की बागडोर प्रारम्भ से ही अपने हाथों में ले ली थी एवं सतत् संरक्षण का आश्वासन दिया था।

महा पुरश्चरणों की श्रृंखला नियमित रूप से चलती रही। जिस दिन गुरुदेव के आदेश से उस साधना का शुभारम्भ किया था उसी दिन घृत दीप की अखण्ड-ज्योति भी स्थापित की। उसकी जिम्मेदारी हमारी धर्मपत्नी ने सम्भाली, जिन्हें हम भी माता जी के नाम से पुकारते हैं। छोटे बच्चे की तरह उस पर हर घड़ी ध्यान रखे जाने की आवश्यकता पड़ती थी। अन्यथा वह बच्चे की तरह मचल सकता था, बुझ सकता था। वह अखण्ड दीपक इतने लम्बे समय से बिना किसी व्यवधान के अब तक नियमित जलता रहा है। इसके प्रकाश में बैठकर जब भी साधना करते हैं तो मनःक्षेत्र में अनायास ही दिव्य भावनाऐं उठती रहती हैं। कभी किसी उलझन को सुलझाना अपनी सामान्य बुद्धि के लिए सम्भव नहीं होता, तो इस अखण्ड-ज्योति की प्रकाश किरणें अनायास ही उस उलझन को सुलझा देती हैं।

नित्य 66 माला का जप, गायत्री माता के चित्र प्रतीक का धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, पुष्प, जल से पूजन। जप के साथ-साथ प्रातःकाल के उदीयमान सविता देवता का ध्यान। अन्त में सूर्यार्ध्य दान। इतनी छोटी-सी विधि व्यवस्था अपनाई गयी। उसके साथ बीज मन्त्र सम्पुट आदि का कोई तान्त्रिक विधि विधान जोड़ा नहीं गया। किन्तु श्रद्धा अटूट रही। सामने विद्यमान गायत्री माता के चित्र के प्रति असीम श्रद्धा उमड़ती रही। लगता रहा वे साक्षात सामने बैठी हैं। कभी-कभी उनके अंचल में मुँह छिपाकर प्रेमाश्रु बहाने के लिए मन उमड़ता। कभी ऐसा नहीं हुआ कि मन न लगा हो। कही अन्यत्र भागा हो। तन्मयता निरन्तर प्रगाढ़ स्तर की बनी रही। समय पूरा हो जाता तो अलग अलार्म बजता। अन्यथा उठने को जी ही नहीं करता था। उपासना क्रम में कभी एक दिन भी विघ्न न आया।

यही बात अध्ययन के सम्बन्ध में रही। उसके लिए अतिरिक्त समय न निकालना पड़ा। कांग्रेस कार्यों के लिए प्रायः काफी-काफी दूर चलना पड़ता। जब परामर्श या कार्यक्रम का समय आता तब पढ़ना बन्द हो जाता। जहाँ चलना आरम्भ हुआ वही, पढ़ना भी आरम्भ हो गया। पुस्तक साइज के 40 पन्ने प्रति घण्टे पढ़ने की स्पीड रही। कम से कम दो घण्टे नित्य पढ़ने के लिए मिल जाते। कभी-कभी ज्यादा भी। इस प्रकार 2 घण्टे में 80 पृष्ठ। महीने में 4800 पृष्ठ। साल भर में 58 हजार पृष्ठ। साठ वर्ष की कुल अवधि में 35 लाख पृष्ठ हमने मात्र अपनी अभिरुचि के पढ़े हैं। लगभग 3 हजार पृष्ठ नित्य विहंगम रूप से पढ़ लेने की बात भी हमारे लिए स्नान भोजन की तरह आसान व सहज रही है। यह क्रम प्रायः 60 वर्ष से अधिक समय से चलता आ रहा है और इतने दिन में अनगिनत पृष्ठ उन पुस्तकों के पढ़ डाले जो हमारे लिए आवश्यक विषयों से सम्बन्धित थे। महापुरश्चरणों की समाप्ति के बाद समय अधिक मिलने लगा। तब हमने भारत के विभिन्न पुस्तकालयों में जाकर ग्रन्थों- पांडुलिपियों का अध्ययन किया। वह हमारे लिये अमूल्य निधि बन गयी।

मनोरंजन के लिए एक पन्ना भी कभी नहीं पढ़ा है। अपने विषयों में मानों प्रवीणता की उपाधि प्राप्त करनी हो ऐसी तन्मयता से पढ़ा है। इसलिए पढ़े हुए विषय मस्तिष्क में एकीभूत हो गये हैं। जब भी कोई लेख लिखते थे या पूर्व में वार्त्तालाप में किसी गम्भीर विषय पर चर्चा करते थे तो पढ़े हुए विषय अनायास ही स्मरण हो आते थे। लोग पीठ पीछे कहते हैं “यह तो चलता फिरता एनसाइक्लोपीडिया है।” अखण्ड-ज्योति पत्रिका के लेख पढ़ने वाले उसमें इतने संदर्भ पाते हैं कि लोग आश्चर्यचकित होकर रह जाते हैं और सोचते हैं कि एक लेख के लिए न जाने कितनी पुस्तकों और पत्रिकाओं से सामग्री इकट्ठी करके लिखा गया है। यही बात युग निर्माण योजना, युग शक्ति पत्रिका के बारे में है। पर सच बात इतनी ही है कि हमने जो भी पढ़ा है, उपयोगी पढ़ा है और पूरा मन लगाकर पढ़ा है। इसलिए समय पर सारे संदर्भ अनायास ही स्मृति पटल पर उठ आते हैं। यह वस्तुतः हमारी तन्मयता से की गयी साधना का चमत्कार है।

जन्मभूमि के गाँव में प्राथमिक पाठशाला थी। सरकारी स्कूल की दृष्टि से इतना ही पढ़ा है। संस्कृत हमारी वंश परम्परा में घुली हुई है। पिताजी संस्कृत के असाधारण प्रकाण्ड विद्वान थे। भाई भी। सबकी रुचि भी उसी ओर थी। फिर हमारा पैतृक व्यवसाय पुराणों की कथा कहना तथा पौरोहित्य रहा है सो उस कारण उसका समुचित ज्ञान हो गया। आचार्य तक के विद्यार्थियों को हमने पढ़ाया है, जबकि हमारी स्वयं की डिग्रीधारी योग्यता नहीं थी।

इसके बाद अन्य भाषाओं के पढ़ने की कहानी मनोरंजक है। जेल में लोहे के तसले पर कंकड़ की पेन्सिल अँग्रेजी लिखना आरम्भ किया। एक दैनिक अंक “लीडर” अखबार का जेल में हाथ लग गया था। उसी से पढ़ना शुरू किया। साथियों से पूछताछ कर लेते, इस प्रकार एक वर्ष बाद जब जेल से छूटे तो अँग्रेजी की अच्छी-खासी योग्यता उपलब्ध हो गई। आपसी चर्चा से हर बार की जेलयात्रा में अँग्रेजी का शब्दकोश हमारा बढ़ता ही चला गया एवं क्रमशः व्याकरण भी सीख ली। बदले में हमने उन्हें संस्कृत एवं मुहावरों वाली हिन्दुस्तानी भाषा सिखा दी। अन्य भाषाओं की पत्रिकाएं तथा शब्दकोष अपने आधार रहे हैं और ऐसे ही रास्ता चलते अन्यान्य भाषाएँ पढ़ ली हैं। गायत्री को बुद्धि की देवी कहा जाता है। दूसरों को वैसा लाभ मिला या नहीं। पर हमारे लिए ये चमत्कारी लाभ प्रत्यक्ष है। अखण्ड-ज्योति की संस्कृतनिष्ठ हिन्दी ने हिन्दी के प्राध्यापकों तक का मार्गदर्शन किया है। यह हम जब देखते हैं तो उस महाप्रज्ञा को ही इसका श्रेय देते हैं। अति व्यस्तता रहने पर भी विज्ञ की-ज्ञान की-विभूति इतनी मात्रा में हस्तगत हो गई, जिसमें हमें परिपूर्ण संतोष होता है और दूसरों को आश्चर्य।

साथ में तीसरा काम काँग्रेस में काम करने का रहा है। इससे उन की मूर्धन्य प्रतिभाओं से संपर्क साधने के अवसर अनायास ही आते रहे। सदा विनम्र और अनुशासन रत स्वयंसेवक की अपनी हैसियत रखी। इसलिए मूर्धन्य नेताओं की सेवा में किसी विनम्र स्वयं सेवक की जरूरत पड़ती तो हमें ही पेल दिया जाता रहा। आयु भी इसी योग्य थी। इसी संपर्क में हमने बड़ी से बड़ी विशेषताएँ सीखीं। अवसर मिला तो उनके साथ भी रहने का सुयोग मिला साबरमती आश्रम में गाँधी जी के साथ और पवनार आश्रम में विनोबा के साथ रहने का लाभ मिला है। दूसरे उनके समीप जीते हुए दर्शन मात्र करते हैं या रहकर लौट आते हैं जब कि हमने इन सम्पर्कों में बहुत कुछ पढ़ा और जाना है। इन सबकी स्मृतियों का उल्लेख करना तो यहाँ अप्रासंगिक होगा। पर कुछ घटनाएँ ऐसी हैं जो हमारे लिए कल्पवृक्ष की तरह महत्वपूर्ण सिद्ध हुईं।

सन् 1933 की बात है। कलकत्ता में इण्डियन नेशनल काँग्रेस का अधिवेशन था। उन दिनों काँग्रेस गैर कानूनी थी। जो भी जाते, पकड़े जाते। उसमें गोलीकाण्ड भी हुआ था। जिन्हें महत्वपूर्ण समझा गया, उन्हें बर्दवान स्टेशन पर पकड़ लिया गया और ईस्ट इंडिया कम्पनी के जमाने में बनी गोरों के लिए बनाई गई एक विशेष जेल (आसनसोल) में भेज दिया गया। इसमें हम भी आगरा जिले के अपने तीन साथियों के साथ पकड़े गए। यहाँ हमारे साथ में मदनमोहन मालवीयजी के अलावा गाँधी जी के सुपुत्र देवीदास गाँधी, श्री जवाहर लाल नेहरू की माता स्वरूपा रानी नेहरू, रफी अहमद किदवई, चन्द्रभान गुप्त, कन्हैयालाल खादी वाला, शोभालाल, गुप्त, जगन प्रसाद रावत, गोपाल नारायण आदि मूर्धन्य लोग थे। वहाँ जब तक हम लोग रहे, सायंकाल महामना मालवीय जी का नित्य भाषण होता था। मालवीय जी व माता स्वरूपा रानी सबके साथ सगे बच्चों की तरह व्यवहार करते थे। एक दिन उनने अपने व्याख्यान में इस बात पर बहुत जोर दिया कि हमें आन्दोलन को आगे बढ़ाने के लिए हर मर्द से एक पैसा और हर स्त्री से एक मुट्ठी अनाज के लिए माँग कर लाना चाहिए ताकि सभी यह समझें कि काँग्रेस हमारी है। हमारे पैसों से बनी है। सबको इसमें अपनापन लगेगा एवं मुट्ठी फण्ड ही इसका मूल आर्थिक आधार बन जायेगा। वह बात औरों के लिए महत्वपूर्ण न थी पर हमने उसे गाँठ बाध लिया। ऋषियों का आधार यही “भिक्षा” थी। उसी के सहारे वे बड़े-बड़े गुरुकुल और आरण्यक चलाते थे। हमें भविष्य में बहुत बड़े काम करने के लिए गुरुदेव ने संकेत दिये थे। उनके लिए पैसा कहाँ से आयेगा, इसकी चिंता मन में बनी रहती थी। इस बार जेल में सूत्र हाथ लग गया। जेल से छूटने पर जब बड़े काम पूरे करने का उत्तरदायित्व कन्धे पर आया तब उसी फार्मूले का उपयोग किया। “दस पैसा प्रतिदिन या एक मुट्ठी अनाज” अंशदान के रूप में यही तरीका अपनाया और अब तक लाखों नहीं, करोड़ों रुपया खर्च कर या करा चुके हैं।

काँग्रेस अपनी गायत्री गंगोत्री की तरह जीवनधारा रही। जब स्वराज्य मिल गया तो मैंने उन्हीं कामों की और ध्यान दिया जिससे स्वराज्य की समग्रता सम्पन्न हो सके। राजनेताओं को देश की राजनैतिक और आर्थिक स्थिति सम्भालनी चाहिए। पर नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रांति और सामाजिक क्रांति उससे भी अधिक आवश्यक है, जिसे हमारे जैसे लोग ही सम्पन्न कर सकते हैं। यह धर्मतन्त्र का उत्तरदायित्व है।

अपने इस नये कार्यक्रम के लिए अपने सभी गुरुजनों से आदेश लिया और काँग्रेस का एक ही कार्यक्रम अपने जिम्मे रखा। “खादी धारण।” इसके अतिरिक्त उसके सक्रिय कार्यक्रमों से उसी दिन पीछे हट गए जिस दिन स्वराज्य मिला। इसके पीछे बाप का आशीर्वाद था, दैवी सत्ता का हमें मिला निर्देश था। प्रायः 20 वर्ष लगातार काम करते रहने पर जब मित्रों ने स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी के नाते निर्वाह राशि लेने का फार्म भेजा तो हमने हंसकर स्पष्ट मनाकर दिया। हमें राजनीति में श्रीराम मत्त या (मत्त जी) नाम से जाना जाता है। जो लोग जानते हैं, उस समय के मूर्धन्य जो जीवित हैं उन्हें विदित है कि आचार्य जी मत्त जी कांग्रेस के आधार स्तंभ रहे हैं और कठिन से कठिन कामों में अग्रिम पंक्ति में खड़े रहे हैं। किन्तु जब श्रेय लेने का प्रश्न आया, उन्होंने स्पष्टतः स्वयं को पर्दे के पीछे रखा।

तीनों काम यथावत् पूरी तत्परता और तन्मयता के साथ सम्पन्न किये और साथ ही गुरुदेव जब-जब हिमालय बुलाते रहे तब-तब जाते रहे। बीच के दो आमंत्रणों में उनने छः-छः महीने ही रोका। कहा- “काँग्रेस का कार्य स्वतन्त्रता प्राप्ति की दृष्टि से इन दिनों आवश्यक है, सो इधर तुम्हारा रुकना छः-छः महीने ही पर्याप्त होगा।” उन छह महीनों में हमसे क्या कराया गया एवं क्या कहा गया, यह सर्व साधारण के लिए जानना जरूरी नहीं है। दृश्य जीवन के ही अगणित प्रसंग ऐसे हैं जिन्हें हम अलौकिक एवं दैवी शक्ति की कृपा का प्रसाद मानते हैं उसे याद करते हुए कृतकृत्य होते रहते हैं।




Quotation - Akhandjyoti April 1985

मनुष्य से प्रेम करना ईश्वर से प्रेम करना है। हमारे लिए देश-प्रेम और मानव-प्रेम में कोई अंतर नहीं है। -महात्मा गाँधी




सफलताओं के कुछ रहस्य सूत्र - Akhandjyoti April 1985

स्वतन्त्रता संग्राम के प्रारम्भिक दिनों की बात है। तब तक मार्गदर्शक सत्ता से साक्षात्कार नहीं हुआ था। एक उत्साही स्वयं सेवक के रूप में गाँव में ही कांग्रेस का कार्यकर्ता था। उन दिनों देहातों में गाँधी जी को करामाती बाबा मानते थे और कहते थे अंग्रेज पकड़कर जेल में बन्द करते हैं, और ये अपनी करामात से बाहर निकल जाते हैं। हम तो उन्हें स्वतन्त्रता हेतु भारत में अवतरित देवदूत मानते थे।

ऐसी ही योगियों की कथा-किम्वदंतियां और भी सुन रखी थीं। मन में आया कि योग सीखने के लिए गाँधी जी के पास ही चलना चाहिए। साबरमती अहमदाबाद के पते पर पत्र व्यवहार किया। कुछ समय आश्रम में रहने की आज्ञा माँगी। इसे सुयोग ही कहना चाहिए कि मुझे आज्ञा मिल गई, और दैनिक उपयोग के वस्त्र बिस्तर साथ लेकर अहमदाबाद जा पहुँचा। साबरमती आश्रम में अपना नाम दर्ज करा दिया।

दूसरे दिन से अपने लिए काम पूछा- ड्यूटी टट्टियाँ साफ करने एवं आँगन बुहारने की लगी। प्रायः प्रथम आगन्तुक को वहाँ यही शिक्षा दी जाती थी। गन्दगी दूर करना और उसके स्थान पर स्वच्छता बनाना।

मैंने टट्टियाँ अपनी बुद्धि के अनुरूप साफ कीं। पर जब निरीक्षक आये तो उन्हें काम पसन्द नहीं आया। जो त्रुटियाँ रह गई थीं, सो बताई और कहा कि सफाई ऐसी होनी चाहिए, जैसी रसोई घर में होती है। दूसरी बार मैंने उनकी मर्जी जैसा काम कर दिया। नित्य का सिलसिला यही चलता। निरीक्षक की पसन्दगी का काम करने लगा। सूत कातने सम्बन्धी अन्य काम तो दिनचर्या में सम्मिलित थे ही।

एक दिन लकड़ी चीरने का काम दिया गया, चीर दी। निरीक्षक आये। उनने छोटे-छोटे टुकड़े बिखरे देखे और कहा- यह किसी के पैर में चुभ सकते हैं। सभी को उठाओ और पतले टुकड़ों को ईंधन में रखो, वैसा कर दिया। वह काम कई दिन हमसे कराया गया।

इसके बाद सूत सम्बन्धी काम, प्रार्थना, सफाई, व्यवस्था आदि के काम, कराये जाते रहे। प्रातः साँय जो सामूहिक प्रार्थना होती उसमें सम्मिलित होता रहा।

एक दिन मैंने पेड़ पर से दातौन के लिए लम्बी दातौन तोड़ ली और दाँत घिसने लगा। निरीक्षक थी मीरा बहन। वे दूर से इसे देख रही थी। पास आकर बोली- ‘‘इतनी लम्बी दातौन नहीं तोड़नी चाहिए। तोड़नी थी तो उसे ऐसे ही कूड़े की तरह नहीं डालना चाहिए। बचे टुकड़े को किसी और की आवश्यकता पूरी करने के लिए देना चाहिए था। पत्तियाँ कूड़े दान में डालनी चाहिए थीं और घिसते समय जो पानी मुँह से निकलता है वह फर्श पर नहीं, नाली में डाला जाना चाहिए। अन्यथा मुँह में कोई छूत हो तो दूसरे को लग सकती है। पानी अधिक खर्च नहीं करना चाहिए था।” मैंने भूल मानी और सुधारी और भविष्य में सावधानी बरतने का आश्वासन दिया, पर इतने से बड़ी सिखावन हाथ लग गयी। डायरी रोज लिखता और वह गाँधी जी के पास पहुँचती रहती।

इसी प्रकार के कार्यक्रमों में तीन महीने होने को आये। करामाती योगी, बनने के उद्देश्य से आया था। दूसरा गाँधी बनना चाहता था, पर वैसी कोई साधना सीखने का कोई अवसर न मिला। जाने के दिन समीप आने पर बहुत बेचैनी रहने लगी। एक दिन हिम्मत बाँधकर गाँधी जी के सेक्रेटरी महादेव भाई देसाईं के दफ्तर में गया और संकोच पर नियन्त्रण करके आने का उद्देश्य कह सुनाया। देसाईं जी हँसे और बोले- ‘‘भाई! हम तो करामाती योगी है नहीं। गाँधी जी हो सकते हैं। सो कल प्रातःकाल तुम उनके साथ टहलने चले जाना और योगी बनने का राज पूछकर अपना समाधान कर लेना।” इस उत्तर से मुझे सन्तोष हो गया।

गाँधी जी प्रातःकाल नित्य टहलते समय किसी को साथ ले जाते थे। उसका समाधान भी हो जाता था व गाँधी जी का भ्रमण भी। प्रातःकाल 5 बजे मैं दरवाजे पर जा खड़ा हुआ और जैसे ही गाँधी जी आये उनके पीछे-पीछे चलने लगा। महादेव भाई ने उन्हें मेरी बात बता दी थी। गाँधी जी ने मुड़कर पीछे देखा और अपनी टहलने वाली चाल में चल पड़े। रास्ते में पूछा- ‘‘तुम्हीं गाँधी जी बनने की योग साधना सीखने आये थे।” मैंने हाँ कह दिया। दूसरा प्रश्न पूछा गया- ‘‘वैसा कुछ सिखाया गया या नहीं?” मैंने तीन महीने का कार्य विवरण संक्षेप में सुना दिया। वे बोले- यही है गाँधी बनने की विद्या, जो तुम सीखते रहे?

जिज्ञासा समाधान न होते देखकर उनने टहलते-टहलते मुझे एक ऐतिहासिक घटना सुनाई। वैज्ञानिक थामस डेवी की एक घटना। वह लड़का एक गरीब घर में जन्मा। वैज्ञानिक बनने की इच्छा थी। विधिवत् वैज्ञानिक शिक्षा दिलाने की परिवार में परिस्थितियाँ न थी। डेवी ने सुझाया, मुझे किसी वैज्ञानिक के यहाँ छोड़ दो। उसका घरेलू काम काज करता रहूँगा और जो वे सिखा दिया करेंगे, सीखता रहूँगा?

ऐसा सुयोग देखने के लिए उसकी माँ कितने ही वैज्ञानिकों के पास ले गई पर सभी ने ऐसा झंझट सिर पालने से स्पष्ट मना कर दिया। एक वैज्ञानिक ने कहा- “इसे कल लाना, काम का होगा तो रख लेंगे।”

डेवी की माँ उसे लेकर दूसरे दिन पहुँची। उस वैज्ञानिक ने हाथ में बुहारी थमाई और घर की सफाई करने को कहा। डेवी ने इतनी दिलचस्पी से बुहारी लगाई कि कोई कोना, छत, फर्नीचर, सामान गन्दा न रहा। सब वस्तुऐं सफाई के बाद इस तरह रखी कि वे सुसज्जित जैसी लगती थी। वैज्ञानिक ने ताड़ लिया कि इसमें काम के प्रति दिलचस्पी, तन्मयता और व्यवस्था का माद्दा है। इसे सिखाना सार्थक हो सकता है। यह इस गुण के कारण ही उपयोगी हो सकता है और वैज्ञानिक बन सकता है। लड़के को उनने पास में रख लिया। घरेलू काम करता रहा और पड़ता रहा। क्रमशः उसकी मौलिक जिज्ञासा बुद्धि विकसित होने लगी एवं वह अन्ततः उच्चकोटि का वैज्ञानिक बन गया। उसने कितने ही आविष्कार किये।

यह प्रसंग सुनाते हुए गाँधी जी ने कहा- “यहाँ जो भी काम तुम से कराये गये हैं वे सभी ऐसे थे जिसमें काम के प्रति जिम्मेदारी और दिलचस्पी बढ़े। हमारे अन्दर यही विशेषता है। इसी के सहारे हमारी आदर्शवादिता उठाकर हमें यहाँ तक ले आई है। हमारी सफलता का इतना ही रहस्य है। तुम इस रास्ते पर चलोगे तो जो भी कार्य अपनाओगे उसमें प्रवीण और सफल होकर रहोगे। चाहे धर्मक्षेत्र हो, राजनीति अथवा अपना पारिवारिक जीवन, सफलता का यही एक राजमार्ग है।

बात समाप्त हो गई। सच्चे योगाभ्यास का रहस्य मेरे हाथ लग गया कि मनुष्य को आदर्शवादी कार्यक्रम हाथ में लेने चाहिए। जो करना है उसे पूरी दिलचस्पी और जिम्मेदारी के साथ करना चाहिए। तीन महीने साबरमती आश्रम में रहकर मैंने इसी प्रक्रिया का अभ्यास किया। निरीक्षकों ने उसमें जो त्रुटियाँ रहती थीं वे ठीक कराईं।

मैं करामाती योगी बनने का उद्देश्य लेकर आया था। वह बचपन जैसी उमँग हवा में उड़ गई। ऐसा कोई योगी नहीं होता को जादूगरों जैसी करामात दिखा सके। गाँधी जी भी वैसे नहीं थे। वे महापुरुष थे।

तीन महीने का समय पूरा हुआ, मैं सभी को विदाई का प्रणाम, अभिवादन करके घर लौट आया। गाँधी जी के बताए सूत्र गिरह बाँध लिए। आदर्शों को अपनाया जो काम हाथ में लिया उसे प्राणपण से किया। हमारी सफलताओं के मूल में दैवी अनुदानों के साथ वैयक्तिक पराक्रम की भी भूमिका रही है। इसी को विविध सफलताओं का रहस्य कहा जा सकता है।




Quotation - Akhandjyoti April 1985

सार्थक उपदेश वाणी से नहीं, अनुकरणीय आचरण से दिए जाते है।




प्रथम बुलावा - पग-पग पर खतरे - Akhandjyoti April 1985

गुरुदेव द्वारा हमारी हिमालय बुलावे की बात मत्स्यावतार जैसी बढ़ती चली गई। पुराण की कथा है कि ब्रह्म जी के कमण्डलु में कहीं से एक मछली का बच्चा आ गया। हथेली में आचमन के लिए कमण्डलु लिया तो वह देखते-देखते हथेली भर लम्बी हो गई। ब्रह्मा जी ने उसे घड़े में डाल दिया। क्षण भर में वह उससे भी दूनी हो गई। ब्रह्म जी ने उसे पास के तालाब में डाल दिया, उसमें भी वह समाई नहीं तब उसे समुद्र तक पहुँचाया गया। देखते-देखते उसने पूरे समुद्र को आच्छादित कर लिया। तब ब्रह्माजी को बोध हुआ। उस छोटी सी मछली में अवतार होने की बात जानी, स्तुति की और आदेश माँगा। बात पूरी होने पर मत्स्यावतार अन्तर्धान हो गये और जिस कार्य के लिए वे प्रकट हुए थे। वह कार्य सुचारु रूप से सम्पन्न हो गया।

हमारे साथ भी घटना क्रम ठीक इसी प्रकार चले हैं। आध्यात्मिक जीवन वहाँ से आरम्भ हुआ था जहाँ कि गुरुदेव ने परोक्ष रूप से महामना मालवीय जी से गुरु दीक्षा दिलवाई थी। यज्ञोपवीत पहनाया था और गायत्री मन्त्र की नियमित उपासना करने का विधि-विधान बताया था। छोटी उम्र थी पर से पत्थर की लकीर की तरह माना और विधिवत् निभाया। कोई दिन ऐसा नहीं बीता जिसमें नागा हुई हो। साधना नहीं तो भोजन नहीं। इस सिद्धान्त को अपनाया। वह आज तक ठीक चला है और विश्वास है कि जीवन के अन्तिम दिन तक यह निश्चित रूप से निभेगा।

इसके बाद गुरुदेव का प्रकाश रूप से साक्षात्कार हुआ। उनने आत्मा को ब्राह्मण बनाने के निमित्त 24 वर्ष की गायत्री पुरश्चरण साधना बताई। वह भी ठीक समय पर पूरी हुई। इस बीच में बैटरी चार्ज कराने के लिए- परीक्षा देने के लाए बार-बार हिमालय आने का आदेश मिला। साथ ही हर यात्रा में एक-एक वर्ष या उससे कम दुर्गम हिमालय में ही रहने के निर्देश भी। वह क्रम भी ठीक प्रकार चला और परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर नया उत्तरदायित्व भी कन्धे पर लदा। इतना ही नहीं उसका निर्वाह करने के लिए अनुदान भी मिला, ताकि दुबला बच्चा लड़खड़ा न जाय। जहाँ गड़बड़ाने की स्थिति आई वही मार्गदर्शक ने गोद में उठा लिया।

पूरा एक वर्ष होने भी न पाया था कि बेतार का तार हमारे अन्तराल में हिमालय का निमन्त्रण ले आया। चल पड़ने का बुलावा आ गया। उत्सुकता तो रहती थी पर जल्दी नहीं थी। जो नहीं देखा है उसे देखने की उत्कण्ठा एवं जो अनुभव हस्तगत नहीं हुआ है, उसे उपलब्ध करने की आकाँक्षा ही थी। साथ ही ऐसे मौसम में जिसमें दूसरे लोग उधर जाते नहीं, ठण्ड, आहार, सुनसान, हिंस्र जन्तुओं का सामना पड़ने जैसे कई भय भी मन में उपज उठते। पर अन्ततः विजय प्रगति की हुई। साहस जीता। संचित कुसंस्कारों में से एक अनजाना डर भी था। यह भी था कि सुरक्षित रहा जाय और सुविधापूर्वक जिया जाय जबकि घर की परिस्थितियाँ ऐसी ही थीं। दोनों के बीच कौरव पाण्डवों की लड़ाई जैसा महाभारत चला। पर यह सब 24 घण्टे से अधिक न टिका। ठीक दूसरे दिन हम यात्रा के लिए चल दिये। परिवार को प्रयोजन की सूचना दे दी। विपरीत सलाह देने वाले भी चुप रहे। वे जानते थे कि इसके निश्चय बदलते नहीं।

कड़ी परीक्षा देना और बढ़िया वाला पुरस्कार पाना, यही सिलसिला हमारे जीवन में चलता रहा है। पुरस्कार के साथ अगला बड़ा कदम उठाने का प्रोत्साहन भी। हमारे मत्स्यावतार का यही क्रम चलता आया है।

प्रथम बार हिमालय जाना हुआ तो वह प्रथम सत्संग था। हिमालय दूर से तो पहले भी देखा था पर वहाँ रहने पर किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, इसकी पूर्व जानकारी कुछ भी न थी। वह अनुभव प्रथम बार ही हुआ। सन्देश आने पर चलने की तैयारी की। मात्र देवप्रयाग से उत्तरकाशी तक उन दिनों सड़क और मोटर की व्यवस्था थी। इसके बाद तो पूरा रास्ता पैदल का था ही, ऋषिकेश से देव प्रयाग भी पैदल यात्रा करनी होती थी। सामान कितना लेकर चलना चाहिए जो कन्धे और पीठ पर लादा जा सके, इसका अनुभव न था। सो कुछ ज्यादा ही ले लिया। लादकर चलना पड़ा तो प्रतीत हुआ कि यह भारी है। उतना हमारे जैसा पैदल यात्री लेकर न चल सकेगा। सो सामर्थ्य से बाहर की वस्तुऐं रास्ते में अन्य यात्रियों को बाँटते हुए केवल उतना रहने दिया जो अपने से चल सकता था एवं उपयोगी भी था।

इस यात्रा से गुरुदेव एक ही परीक्षा लेना चाहते थे कि विपरीत परिस्थितियों में जूझने लायक मनःस्थिति पकी या नहीं। सो यात्रा अपेक्षाकृत कठिन ही होती गई। दूसरा कोई होता तो घबरा गया होता, वापस लौट पड़ता या हैरानी में बीमार पड़ गया होता, पर गुरुदेव यह जीवन सूत्र व्यवहार रूप में सिखाना चाहते थे कि मनःस्थिति मजबूत हो तो परिस्थितियों का सामना किया जा सकता है। उन्हें अनुकूल बनाया या सहा जा सकता है। महत्वपूर्ण सफलताओं के लिए आदमी को इतना ही मजबूत होना पड़ता है।

ऐसा बताया जाता है कि जब धरती का स्वर्ग, या हृदय कहा जाने वाला भाग देवताओं का निवास था जब ऋषि गोमुख से नीचे और ऋषिकेश से ऊपर रहते थे, पर हिमयुग के बाद परिस्थितियाँ एकदम बदल गईं। देवताओं ने कारण शरीर धारण कर लिए और अन्तरिक्ष में विचरण करने लगे। पुरातन काल के ऋषि गोमुख से ऊपर चले गये। नीचे वाला हिमालय अब सैलानियों के लिए रह गया है। वहाँ कहीं-कहीं साधु बाबा जी की कुटियाँ तो मिलती हैं। पर जिन्हें ऋषि कहा जा सके ऐसों का मिलना कठिन है।

हमने यह भी सुन रखा था कि हिमालय की यात्रा के मार्ग में अपने वाली गुफाओं में सिद्धयोगी रहते हैं। वैसा कुछ नहीं मिला। पाया कि निर्वाह एवं आजीविका की दृष्टि से वह कठिनाइयों से भरा क्षेत्र है। इसलिए वहाँ मनमौजी लोग आते जाते तो हैं पर ठहरते नहीं। जो साधु संत मिले, उनसे भेंट वार्ता होने पर विदित हुआ कि वे भी कौतूहलवश या किसी से कुछ मिल जाने की आशा में ही आते थे। उनका तत्वज्ञान बढ़ा-चढ़ा था, न तपस्वी जैसी दिनचर्या थी। थोड़ी देर पास बैठने पर भी वे अपनी आवश्यकता व्यक्त करते थे। ऐसे लोग दूसरों को क्या देंगे, यह सोचकर सिद्ध पुरुषों की तलाश में अन्यों द्वारा जब-तब की गई यात्राएँ मजे की यात्रा भर रहीं, यही मानकर अपने कदम आगे बढ़ाते गए। यात्रियों को अध्यात्मिक संतोष समाधान तनिक भी नहीं होता होगा, यही सोचकर मन दुःखी रहा।

उनसे तो हमें चट्टियों पर दुकान लगाए हुए पहाड़ी दुकानदार अच्छे लगे। वे भोले और भले थे। आटा दाल, चावल आदि खरीदने पर वे पकाने के बर्तन बिना किराए लिए- बिना गिने ऐसे ही उठा देते थे। माँगने-जाँचने का कोई धन्धा उनका नहीं था। अक्सर चाय बेचते थे। बीड़ी, माचिस, चना, गुड़, सत्तू, आलू जैसी चीजें यात्रियों को उनसे मिल जाती थीं। यात्री श्रद्धालु तो होते थे, पर गरीब स्तर के थे। उनके काम की चीजें ही दुकानों पर बिकती थीं। कम्बल उसी क्षेत्र के बने हुए किराये पर रात काटने के लिए मिल जाते थे।

शीत ऋतु और पैदल चलना यह दोनों ही परीक्षाएं कठिन थीं। फिर उस क्षेत्र में रहने वाले साधु संन्यासी उन दिनों गरम इलाकों में गुजारे की व्यवस्था करने नीचे उतर आते हैं। जहाँ ठण्ड अधिक है वहाँ के ग्रामवासी भी पशु चराने नीचे के इलाकों में उतर आते हैं। गाँवों में- झोपड़ियों में सन्नाटा रहता है। ऐसी कठिन परिस्थितियों में हमें उत्तरकाशी से नन्दन वन तक की यात्रा पैदल चलकर पूरी करनी थी। हर दृष्टि से यह यात्रा बहुत कठिन थी।

स्थान नितान्त एकाकी। ठहरने खाने की कोई व्यवस्था नहीं, वन्य पशुओं का निर्भीक विचरण, यह सभी बातें काफी कष्टकर थीं। हवा उन दिनों काफी ठण्डी चलती थी। सूर्य ऊँचे पहाड़ों की छाया में छिपा रहने के कारण दस बजे के करीब दिखता है और दो बजे के करीब शिखरों के नीचे चला जाता है। शिखरों पर तो धूप दिखती है, पर जमीन पर मध्यम स्तर का अन्धेरा। रास्ते में कभी ही कोई भूला-भटका आदमी मिलता। जिन्हें कोई अति आवश्यक काम होता, किसी की मृत्यु हो जाती तो ही आने-जाने की आवश्यकता पड़ती। हर दृष्टि से वह क्षेत्र अपने लिए सुनसान था। सहचर के नाम पर थे, छाती में धड़कने वाला दिल या सोच विचार उठाने वाले सिर में अवस्थित मन। ऐसी दिशा में लम्बी यात्रा सम्भव है या असम्भव, यहाँ परीक्षा अपनी ली जा रही थी। हृदय ने निश्चय किया जितनी साँस चलनी है उतने दिन अवश्य चलेगी। तब तक कोई मारने वाला नहीं। मस्तिष्क कहता, वृक्ष वनस्पतियों में भी तो जीवन है। उन पर पक्षी रहते हैं। पानी में जलचर मौजूद हैं। जंगल में वन्य पशु फिरते हैं। सभी नंगे बदन सभी एकाकी। जब इतने सारे प्राणी इस क्षेत्र में निवास करते हैं तो तुम्हारे लिए सब कुछ सुनसान कैसा? अपने को छोटा मत बनाओ। जब “वसुधैव कुटुम्बकम्” की बात मानते हो तब इतने सारे प्राणियों के रहते, तुम अकेले कैसे? मनुष्यों को ही क्यों प्राणी मानते हो? यह जीव-जन्तु क्या तुम्हारे अपने नहीं? फिर सूनापन कैसा?

हमारी यात्रा चलती रही। साथ-साथ चिन्तन भी चलता रहा। एकाकी रहने में मन पर दबाव पड़ता है। क्योंकि वह सदा के समूह में रहने का अभ्यासी है। एकाकीपन से उसे डर लगता है। अन्धेरा भी डर का एक बड़ा कारण है। मनुष्य दिन भर प्रकाश में रहता है। रात्रि को बत्तियों का प्रकाश जला लेता है। जब नींद आती है तब बिलकुल अन्धेरा होता है। उसमें भी डरने का उतना कारण नहीं, जितना कि सुनसान के अंधेरे में होता है।

एकाकीपन में, विशेषतया अंधेरे में मनुष्य के मस्तिष्क को डर लगता है। योगी को इस डर से निवृत्ति पानी चाहिए। “अभय” को अध्यात्म का अति महत्वपूर्ण गुण माना गया है। वह न छूटे तो फिर उसे गृहस्थ को तरह सरंजाम जुटाकर- सुरक्षा का प्रबन्ध करते हुए रहना पड़ता है। मन की कच्चाई बनी ही रहती है।

दूसरा संकट हिमालय क्षेत्र के एकाकीपन में यह है कि उस क्षेत्र में वन्य जीवों विशेषतया हिंस्र पशुओं का डर लगता है। कोलाहल रहित क्षेत्र में ही वे विचरण करते हैं। रात्रि ही उनका भोजन तलाशने का समय है। दिन में प्रतिरोध का सामना करने का डर उन्हें भी रहता है।

रात्रि में, एकाकी, अंधेरे में हिंस्र पशुओं का मुकाबला होना एक संकट है। संकट क्या सीधी मौत से मुठभेड़ है। कोलाहल और भीड़ न होने पर हिंस्र पशु दिन में भी पानी पीने या शिकार तलाशने निकल पड़ते हैं। इन सभी परिस्थितियों का सामना हमें अपनी यात्रा में बराबर करना पड़ा।

यात्रा में जहाँ भी रात्रि बितानी पड़ी, वहाँ काले साँप रेंगते और मोटे अजगर फुफकारते बराबर मिलते रहे। छोटी जाति का सिंह उस क्षेत्र में अधिक होता है। उसमें फुर्ती बब्बर शेर की तुलना में अधिक होती है। आकार के हिसाब से ताकत उसमें कम होती है। इसलिए छोटे जानवरों पर हाथ डालता है। शाकाहारियों में आक्रमणकारी पहाड़ी रीछ होता है। शिवालिक की पहाड़ियों एवं हिमालय के निचले इलाके में इर्द-गिर्द जंगली हाथी भी रहते हैं। इन सभी की प्रकृति यह होती है कि आँखों से आंखें न मिले, उन्हें छेड़े जाने का भय न हो तो अपने रास्ते भी चले जाते हैं। अन्यथा तनिक भी भय या क्रोध का भाव मन में आने पर वे आक्रमण कर बैठते हैं।

अजगर, सर्प, बड़ी छिपकली (गोह), रीछ, तेन्दुए, चीते, हाथी, इनसे आये दिन यात्री को कई-कई बार पाला पड़ता है। समूह को देखकर वे रास्ता बचाकर निकल जाते हैं। पर जब कोई मनुष्य या पशु अकेला सामने से आता है तो वे बचते नहीं। सीधे रास्ते चलते जाते हैं। ऐसी दशा में मनुष्य को ही उनके लिए रास्ता छोड़ना पड़ता है। अन्यथा मुठभेड़ होने पर आक्रमण एक प्रकार से निश्चित ही समझना चाहिए।

ऐसे आमने सामने दिन और रात में मिलाकर दस से बीस बार मुकाबला हो जाता था। अकेला आदमी देखकर वे निर्भय होकर चलते थे और रास्ता नहीं छोड़ते थे। उनके लिए हमें ही बचना पड़ता था। यह घटनाक्रम लिखने और पड़ने में तो सरल है पर व्यवहार में ऐसा वास्ता पड़ना अति कठिन है। कारण कि वे साक्षात मृत्यु के रूप में सामने आते थे, कभी-कभी साथ चलते या पीछे-पीछे चलते थे। शरीर को मौत सबसे डरावनी लगती है। हिंस्र पशु अथवा जिनकी आक्रमणकारी प्रकृति होती है ऐसे जंगली नर-नील गाय भी आक्रमणकारी होते हैं। भले ही वे आक्रमण न करें पर डर इतना ही लगता कि साक्षात् मौत के मुँह में जाने की घड़ी आ गई। जब तब कोई वास्ता पड़े तो एक बात भी है। पर प्रायः हर घण्टे एक बार मौत से भेंट होना और हर बार प्राण जाने का डर लगना, अत्यधिक कठिन परिस्थितियों का सामना करने की बात थी। दिल धड़कना आरम्भ होता। जब तक वह धड़कन बंद न हो पाती, तब तक दूसरी नई मुसीबत सामने आ जाती और फिर नये सिरे से दिल धड़कने लगता। वे लोग एकाकी नहीं होते थे। कई-कई के झुण्ड सामने आ जाते। यदि हमला करते तो एक-एक बोटी नोंच ले जाते एवं कुछ ही क्षणों में अपना अस्तित्व समाप्त हो जाता।

किंतु यहाँ भी विवेक समेटना पड़ा, साहस संजोना पड़ा। मौत बड़ी होती है पर जीवन से बड़ी नहीं होती। अभय और मैत्री भीतर हो तो हिंसकों की हिंसा भी ठण्डी पड़ जाती है और अपना स्वभाव बदल जाती है। पूरी यात्रा में प्रायः तीन चार सौ की संख्या में ऐसे डरावने मुकाबले हुए। पर गड़बड़ाने वाले साहस को हर बार संभालना पड़ा। मैत्री और निश्चिंतता की मुद्रा बनानी पड़ी। मृत्यु के सम्बन्ध में सोचना पड़ा कि उसका भी एक समय होता है। यदि यहीं-इसी प्रकार जीवन की इतिश्री होनी है तो फिर उसका डरते हुए क्यों? हँसते हुए ही सामना क्यों न किया जाय? यही विचार उठे तो नहीं पर बल पूर्वक उठाने पड़े। पूरा रास्ता डरावना था। एकाकीपन- अंधेरे और मृत्यु के दूत मिल-जुलकर डराने का प्रयत्न करते रहे और वापस लौट चलने की सलाह देते रहे। पर संकल्प शक्ति साथ देती रही और यात्रा आगे बढ़ती रही।

परीक्षा का एक प्रश्न पत्र यह था कि सुनसान का- अकेलेपन का डर लगता है क्या? कुछ ही दिनों में दिल मजबूत हो गया और उस क्षेत्र में रहने वाले प्राणी अपने लगने लगे। डर न जाने कहाँ चला गया। सूनापन सुहाने लगा। मन ने कहा प्रथम प्रश्न पत्र में उत्तीर्ण होने का सिलसिला चल पड़ा। आगे बढ़ने पर जो असमंजस होता है वह भी अब न रहेगा।

दूसरा प्रश्न पत्र था, शीत ऋतु का। सोचा कि जब मुँह, नाक, आंखें, शिर, कान, हाथ खुले रहते हैं, अभ्यास से इन्हें शीत नहीं लगती तो तुम्हें ही क्यों लगनी चाहिए।

उत्तरी ध्रुव, नार्वे, फिनलैण्ड में हमेशा शून्य से नीचे तापमान रहता है। वहाँ एस्किमो तथा दूसरी जाति के लोग रहते हैं, तो इधर तो दस बारह हजार फुट की ही ऊँचाई है। यहाँ ठण्ड से बचने के उपाय ढूंढ़े जा सकते हैं। वे उधर के एक निवासी से मालूम भी हो गये। पहाड़ ऊपर ठण्डे रहते हैं पर उनमें जो गुफाएँ पाई जाती हैं वे अपेक्षाकृत गरम होती हैं। कुछ खास किस्म की झाड़ियां ऐसी होती हैं जो हरी होने पर भी जल जाती हैं। लांगडा, मार्चा आदि शाकों की पत्तियाँ जंगलों में उगी होती हैं, वे कच्ची भी खाई जा सकती हैं। भोजपत्र के तने पर उठी हुई गाँठों को उबाल लिया जाय तो ऐसी चाय बन जाती है, जिनसे ठण्डक दूर हो सके। पेट में घुटने और सिर लगाकर उंकडूं बैठ जाने पर भी ठण्डक कम लगती है। मानने पर ठण्डक अधिक लगती है। बच्चे थोड़े से कपड़ों में कहीं भी भागे-भागे फिरते हैं। उन्हें कोई हैरानी नहीं होती। ठण्ड मानने भर की है। उसमें अनभ्यस्त बूढ़े बीमारों की तो नहीं कहते, अन्यथा जवान आदमी ठण्डक से नहीं मर सकता। बात यह भी समझ में आ गई और इन सब उपायों को अपना लेने पर ठण्डक भी सहन होने लगी। फिर एक और बात है कि- ठण्डक-ठण्डक रटने की अपेक्षा मन में कोई और उत्साह भरा चिन्तन बिठा लिया जाय, तो भी काम चल जाता है। इतनी महत्वपूर्ण शिक्षाऐं उस क्षेत्र की समस्याओं का सामना करने के हल निकल आये।

बात वन्य पशुओं की- हिंस्र जन्तुओं की फिर रह गई। वे प्रायः रात को ही निकलते हैं, उनकी आंखें चमकती हैं। फिर मनुष्य से सभी डरते हैं, शेर भी। यदि स्वयं उनसे डरा न जाय उन्हें छेड़ा न जाय तो मनुष्य पर आक्रमण नहीं करते, उनके मित्र ही बनकर रहते हैं।

प्रारंभ में हमें इस प्रकार का डर लगता था। फिर सरकस के सिखाने वालों की बात याद आई। वे उन्हें कितने करतब सिखा लेते हैं। तंजानिया की एक यूरोपियन महिला का वृत्तान्त पढ़ा था “बॉर्न फ्री”, जिसका पति वन विभाग का कर्मचारी था। उसकी स्त्री ने पति द्वारा माँ-बाप से बिछुड़े दो शेर के बच्चे पाल रखे थे। और वे जवान हो जाने पर भी उसकी गोद में सोते रहते थे। अपने मन में यदि वजनदार निर्भयता या प्रेम भावना हो तो घने जंगलों में आनन्द से रहा जा सकता है। वनवासी भील लोग अक्सर उसी क्षेत्र में रहते हैं जिसमें हिंस्र पशु रहते हैं। उन्हें न डर लगाता है और न जोखिम दिखता है। ऐसे-ऐसे उदाहरणों को स्मृति में रखते-रखते निर्भयता आ गई और विचारा कि एक दिन वह आयेगा, जब हम वन में कुटी बनाकर रहेंगे और गाय शेर एक घाट पर पानी पिया करेंगे।

मन कमजोर भी है और मना लिए जाने पर समर्थ भी। हमने उस क्षेत्र में पहुँचकर यात्रा जारी रखी और मन में से भय निकाल दिया। अनुकूल परिस्थिति की अपेक्षा करने के स्थान पर मनःस्थिति को मजबूत बनाने की बात सोची। इस दिशा में मन को ढालते चले गए और प्रतिकूलताएँ जो आरम्भ में बड़ी डरावनी लगती थीं, अब बिल्कुल सरल और स्वाभाविक सी लगने लगीं।

मन की कुटाई, पिटाई और ढलाई करते-करते वह बीस दिन की यात्रा में काबू में आ गया। वह क्षेत्र ऐसा लगने लगा मानों हम यहीं पैदा हुए हैं और यही मरना है।

गंगोत्री तक राहगीरों का बना हुआ भयंकर रास्ता है। गोमुख तक के लिए उन दिनों एक पगडण्डी थी। इसके बाद कठिनाई थी। तपोवन काफी ऊँचाई पर है। रास्ता भी नहीं है। अन्तः प्रेरणा या भाग्य भरोसे चलना पड़ता है। तपोवन का पठार चौरस है। फिर पहाड़ियों की एक ऊँची श्रृंखला है। इसके बाद नन्दन वन आता है। हमें यहीं बुलाया गया था। समय पर पहुँच गये। देखा तो गुरुदेव खड़े थे। प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। हमारी का भी- और उनका भी। वे पहली बार हमारे घर गए थे, इस बार हम उनके यहाँ आए। यह सिलसिला जीवन भर चलता रहे तो ही इस बँधे सूत्र की सार्थकता है।

तीन परीक्षाएँ इस बार होनी थी बिना साथी के काम चलाना-ऋतुओं के प्रकोप की तितीक्षा सहना- हिंस्र पशुओं के साथ रहते हुए विचलित न होना तीनों में ही अपने को उत्तीर्ण समझा और परीक्षक ने वैसा ही माना।

बात-चीत का सिलसिला तो थोड़े ही समय में पूरा हो गया। “अध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रचण्ड मनोबल सम्पादित करना- प्रतिकूलताओं को दबोच कर अनुकूलता में ढाल लेना- सिंह व्याघ्र तो क्या मौत से भी न डरना, ऋषि कल्प आत्माओं के लिए तो यह स्थिति नितान्त आवश्यक है। तुम्हें ऐसी ही परिस्थितियों के बीच अपने जीवन का बहुत-सा भाग गुजारना है।”

उस समय की बात समाप्त हो गई। जिस गुफा में उनका निवास था, वहाँ तक ले गए। इशारे में बताये हुए स्थान पर सोने का उपक्रम किया तो वैसा ही किया। इतनी गहरी नींद आई कि नियम क्रम की अपेक्षा दूना तीन गुना समय लग गया हो तो कोई आश्चर्य नहीं। रास्ते की सारी थकान इस प्रकार दूर हो गई, मानों कहीं चलना ही नहीं पड़ा था।

वहीं बहते निर्झर में स्नान किया। सन्ध्या वन्दन भी। जीवन में पहली बार ब्रह्म कमल और देवकन्द देखा। ब्राह्मी कमल ऐसा जिसकी सुगन्ध थोड़ी देर में ही नींद कहें या योग निद्रा ला देती है। देवकन्द वह जो जमीन में शकरकंद की तरह निकलता है। सिंघाड़े जैसे स्वाद का। पका होने पर लगभग पाँच सेर का, जिससे एक सप्ताह तक क्षुधा निवारण का क्रम चल सकता है। गुरुदेव के यही दो प्रथम प्रत्यक्ष उपहार थे। एक शारीरिक थकान मिटाने के लिए और दूसरा मन में उमंग भरने के लिए।

इसके बाद तपोवन पर दृष्टि दौड़ाई। पूरे पठार पर मखमली फूलदार गलीचा-सा बिछा हुआ था। तब तक भारी बर्फ नहीं पड़ी थी। जब पड़ती है तब यह फूल सभी पककर जमीन पर फैल जाते हैं, अगले वर्ष उगने के लिए।

अब कल से छूटी हुई वार्ता आरम्भ हुई। कम समय में ही इतना सारगर्भित सुनने को मिला, कि यहाँ पहुँचने के सुयोग को हर दृष्टि से कृत-कृत्य माना।




दिन भर गुफा में रहते (kahani) - Akhandjyoti April 1985

एक संत थे। जो उनके निकट पहुँचता उसकी वे सहायता करते। दिन भर गुफा में रहते। सूर्यास्त के उपरान्त ही कुछ समय के लिए गुफा से बाहर निकलते।

एक आपत्तिग्रस्त आया। उसने सन्त का पल्ला पकड़ लिया और बोला तब छोड़ूंगा जब अपना कष्ट दूर करा लूँगा।

संत ने छुड़ाते हुए कहा- पल्ला ईश्वर का पकड़ो। मनुष्य तो एक दूसरे की सीमित सहायता ही कर सकते हैं।




Quotation - Akhandjyoti April 1985

ॐ श्रद्धयाग्निः समिध्यते श्रद्धया हयते हविः। श्रद्धां भगस्य मूर्धनि वचसा वेदयामसि॥ -ऋग्वेद मं0 10 अ॰ 11 सू0 141

अर्थात्- श्रद्धा से अग्नि समिद्ध की जाती है। श्रद्धा से अग्नि में हविष्य का हवन किया जाता है। सम्पूर्ण लौकिक, पारलौकिक, अलौकिक सम्पत्तियों में श्रेष्ठ श्रद्धा ही है। यह तथ्य हम सर्व साधारण के लिए घोषित करते हैं।




बड़ी प्रशंसा सुनी (kahani) - Akhandjyoti April 1985

स्वामी रामतीर्थ ने एक सिद्ध पुरुष की बड़ी प्रशंसा सुनी। वे उससे मिलने दुर्गम स्थान में पहुँचे।

आग्रह करके उनकी साधना सिद्धि की बात पूछी। उनने दो करामात दिखाई। एक नदी के जल पर चलने की दूसरी आसमान में दूर तक उड़ने की।

कौतूहल तो बहुत हुआ पर रामतीर्थ का समाधान न हुआ। उनने कहा- भगवान् यह काम तो मछली और बतख भी कर सकती हैं। इतने भर कर लेने से क्या प्रयोजन हुआ। जनहित के लिये इतना श्रम किया गया होता तो उससे अपना और दूसरों का कितना कल्याण होता। सिद्ध पुरुष निरुत्तर थे। रामतीर्थ वस्तुस्थिति से अवगत हो वापस लौट आये।

महाभारत के दिनों रात्रि के समय आक्रमण नहीं होते थे और विरोधी दल के लोग भी आपस में मिल-जुल लेते थे।

एक रात्रि को दुर्योधन युधिष्ठिर के पास अपनी कुछ समस्याओं का हल पूछने गया। वह जानता था, उनसे सही सलाह ही मिल सकती है।

दुर्योधन ने पूछा- हमारे दल में भीष्म पितामह जैसे मूर्धन्य सेनापति हैं। फिर भी हम हारते जाते हैं और पाण्डव जीतते हैं। लगता है हमारे सेनापति सच्चे मन से नहीं लड़ते।

युधिष्ठिर ने कहा- आप ठीक कहते हैं। नीति और अनीति का विचार हर किसी का उत्साह बढ़ाता तथा घटाता है। आपके दल के सैनिक यह अनुभव करते हैं कि वे अनीति के पक्ष में लड़ रहे हैं। इसलिए सहज ही उनका पराक्रम शिथिल पड़ जाता है। जबकि पाण्डव दल के लोग न्याय समर्थन की बात ध्यान में रहने से सच्चे मन से लड़ते हैं।

दुर्योधन निरुत्तर हो गया। उसने पलटकर फिर पूछा- ‘कि क्या कोई ऐसी तरकीब है कि हमारे सेनापति आत्मा की आवाज न सुनें और पूरे जोश से लड़ने लगें।’

युधिष्ठिर ने इसका समाधान भी बता दिया। इन लोगों को नियत वेतन के अतिरिक्त ऐसा भोजन कराया जाय तो अनीति से कमाया और मुफ्त में खिलाया गया हो।

दुर्योधन को यह बात जंच गई। उसने अधिक पाप से अर्जित धन निकाला और उसके व्यंजन बना-बनाकर खिलाना आरम्भ कर दिया। अब वे लोग अधिक उत्साह के साथ लड़ने लगे। आत्मा की पुकार अनीति के धन ने शिथिल कर दी। अन्न के साथ मन का सम्बन्ध कितना प्रगाढ़ है, यह इस घटना से जाना जा सकता है।




हिमालय की कन्दराओं में ऋषि सत्ता से साक्षात्कार - Akhandjyoti April 1985

नन्दन वन में पहला दिन वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य को निहारने, उसी में परम सत्ता की झाँकी देखने में निकल गया। पता ही नहीं चला कि कब सूरज ढला और रात्रि आ पहुँची। परोक्ष रूप में निर्देश मिला-समीपस्थ एक निर्धारित गुफा में जाकर सोने की व्यवस्था बनाने का। लग रहा था कि प्रयोजन सोने का नहीं, सुरक्षित स्थान पर पहुँचाने का है ताकि स्थूल शरीर पर शीत का प्रकोप न हो सके। सम्भावना थी कि पुनः रात्रि को गुरुदेव के दर्शन होंगे। ऐसा हुआ भी।

उस रात्रि को गुफा में गुरुदेव सहसा आ पहुँचे। पूर्णिमा थी। चन्द्रमा का सुनहरा प्रकाश समूचे हिमालय पर फैल रहा था। उस दिन ऐसा लगा कि हिमालय सोने का है। दूर-दूर बरफ के टुकड़े, तथा बिन्दु बरस रहे थे। वे ऐसा अनुभव कराते थे, मानो सोना बरस रहा है। मार्गदर्शक के आ जाने से गर्मी का एक घेरा चारों ओर बन गया। अन्यथा रात्रि के समय इस विकट ठंड और हवा के झोंकों में साधारणतया निकलना सम्भव न होता। दुस्साहस करने पर इस वातावरण में शरीर जकड़ या इठ सकता था।

किसी विशेष प्रयोजन के लिए ही यह अहैतुकी कृपा हुई है, यह मैंने पहले ही समझ लिया इसलिए इस काल में आने का कारण पूछने की आवश्यकता न पड़ी। पीछे-पीछे चल दिया। पैर जमीन से ऊपर उठते हुए चल रहे थे। आज यह जाना कि सिद्धियों में से ऊपर हवा में उड़ने की- अन्तरिक्ष में चलने की क्यों आवश्यकता पड़ती है। उन बर्फीले ऊबड़-खाबड़ हिम खण्डों पर चलना उससे कहीं अधिक कठिन था जितना कि पानी की सतह पर चलना। आज उन सिद्धियों की अच्छी परिस्थितियों में आवश्यकता भले ही न पड़े। पर उन दिनों हिमालय जैसे विकट क्षेत्रों में आवागमन की कठिनाई को समझने वालों के लिए आवश्यकता निश्चय ही पड़ती होगी।

मैं गुफा में से निकल कर स्वर्णिम और शीत से काँपते हुए हिमालय पर अधर ही अधर गुरुदेव के पीछे-पीछे उनकी पूँछ की तरह सटा हुआ चल रहा था। आज की यात्रा का उद्देश्य पुरातन ऋषियों की तपस्थलियों का दिग्दर्शन कराना था। स्थूल शरीर सभी ने त्याग दिये थे। पर सूक्ष्म शरीर उनमें से अधिकाँश के बने हुए थे। उन्हें भेदकर किन्हीं-किन्हीं के कारण शरीर भी झलक रहे थे। नत मस्तक और करबद्ध नमन की मुद्रा अनायास ही बन गयी। आज मुझे हिमालय पर सूक्ष्म और कारण शरीरों से निवास करने वाले ऋषियों का दर्शन और परिचय कराया जाना था। मेरे लिए आज की रात्रि जीवन भर के सौभाग्यशाली क्षणों में सबसे अधिक महत्व की बेला थी।

उत्तराखण्ड क्षेत्र के कुछ गुफाएँ तो जब तब आते समय यात्रा के दौरान देखी थीं, पर देखी वही थीं जो यातायात की दृष्टि से सुलभ थीं। आज जाना कि जितना देखा है, उससे अनदेखा कही अधिक है। इनमें जो छोटी थी, वे तो वन्य पशुओं के काम आती थीं, पर जो बड़ी थी, साफ सुथरी और व्यवस्थित थी, वे ऋषियों के सूक्ष्म शरीरों के निमित्त थीं। पूर्व अभ्यास के कारण वे अभी भी उनमें यदा कदा निवास करते हैं।

वे सभी उस दिन ध्यान मुद्रा में थे। गुरुदेव ने बताया कि वे प्रायः सदा इसी स्थिति में रहते हैं। अकारण ध्यान तोड़ते नहीं। मुझे एक-एक का नाम बताया और सूक्ष्म शरीर का दर्शन कराया गया। यही है सम्पदा, विशिष्टता और विभूति सम्पदा, इस क्षेत्र की।

गुरुदेव के साथ मेरे आगमन की बात उन सभी को पूर्व से ही विदित थी। सो हम दोनों जहाँ भी जिस-जिस समय पहुँचे, उनके नेत्र खुल गए। चेहरों पर हलकी मुस्कान झलकी और सिर उतना ही झुका, मानों वे अभिवादन का प्रत्युत्तर दे रहे हों। वार्तालाप किसी से कुछ नहीं हुआ। सूक्ष्म शरीर को कुछ कहना होता है, तो वे बैखरी मध्यमा से नहीं, परा और पश्यन्ति वाणी से, कर्ण छिद्रों के माध्यम से नहीं, अन्तःकरण में उठी प्रेरणा के रूप में कहते हैं, पर आज दर्शन मात्र प्रयोजन था। कुछ कहना और सुनना नहीं था। उनकी बिरादरी में एक नया विद्यार्थी भर्ती होने आया, सो उसे जान लेने और जब जैसी सहायता करने की आवश्यकता समझे तब वैसी उपलब्ध करा देने का सूत्र जोड़ना ही उद्देश्य था। सम्भवतः यह उन्हें पहले ही बताया जा चुका होगा कि उनके अधूरे कामों को समय की अनुकूलता के अनुसार पूरा करने के लिए यह स्थूल शरीरधारी बालक अपने ढंग से क्या कुछ करने वाला है एवं अगले दिनों इसकी भूमिका क्या होगी।

सूक्ष्म शरीर से अन्तः प्रेरणाएँ उमंगने और शक्ति धारा प्रदान करने का काम हो सकता है। पर जन साधारण को प्रत्यक्ष परामर्श देना और घटना क्रमों को घटित करना स्थूल शरीरों का ही काम है। इसलिए दिव्य शक्तियाँ किन्हीं स्थूल शरीरधारियों को भी अपने प्रयोजनों के लिए वाहन बनाती हैं। अभी तक मैं एक ही मार्गदर्शक का वाहन था, पर अब वे हिमालय वासी अन्य दिव्य आत्माएँ भी अपने वाहन का काम ले सकती थीं और तद्नुरूप प्रेरणा, योजना एवं क्षमता प्रदान करती रह सकती थीं। गुरुदेव इसी भाव वाणी में मेरा परिचय उन सबसे करा रहे थे। वे सभी बिना लोकाचार, शिष्टाचार, निबाहे बिना समय-क्षेप किये एक संकेत में उस अनुरोध की स्वीकृति दे रहे थे। आज रात्रि की दिव्य यात्रा इसी रूप में चलती रही। प्रभात होने से पूर्व ही वे मेरी स्थूल काया को निर्धारित गुफा में छोड़ कर अपने स्थान को वापस चले गए।

आज ऋषि लोक का पहली बार दर्शन हुआ। हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों- देवालय, सरोवरों, सरिताओं का दर्शन स्पर्श तो यात्रा काल में पहले से भी होता रहा। उस प्रदेश को ऋषि निवास का देवात्मा भी मानते रहे हैं, पर इससे पहले यह विदित न था कि किस ऋषि का किस भूमि से लगाव है। यह आज पहली बार देखा और अंतिम बार भी। वापस छोड़ते समय मार्गदर्शक ने कह दिया कि इनके साथ अपनी ओर से संपर्क साधने का प्रयत्न मत करना। उनके कार्य में बाधा मत डालना। यदि किसी ने कुछ निर्देशन करना होगा तो वैसा स्वयं ही करेंगे। हमारे साथ भी तो तुम्हारा यही अनुबन्ध है कि अपनी ओर से द्वार नहीं खटखटाओगे। जब हमें जिस प्रयोजन के लिए जरूरत पड़ा करेगी, स्वयं ही पहुँचा करेंगे और उसकी पूर्ति के लिए आवश्यक साधन जुटा दिया करेंगे। यही बात आगे से तुम उन ऋषियों के सम्बन्ध में भी समझ सकते हो जिनके कि दर्शन प्रयोजन वश तुम्हें आज कराये गये हैं। इस दर्शन को कौतूहल भर मत मानना वरन् समझना कि हमारा अकेला ही निर्देश तुम्हारे लिए सीमित नहीं रहा। यह महाभाग भी उसी प्रकार अपने सभी प्रयोजन पूरा करते रहेंगे जो स्थूल शरीर के अभाव में स्वयं नहीं कर सकते। जन संपर्क प्रायः तुम्हारे जैसे सत्पात्रों- वाहनों के माध्यम से कराने की ही परम्परा रही है। आगे से तुम इनके निर्देशनों को भी हमारे आदेश की तरह ही शिरोधार्य करना और जो कहा जाय सौ करने के लिए जुट पड़ना। मैं स्वीकृति सूचक संकेत के अतिरिक्त और कहता ही क्या। वे अन्तर्ध्यान हो गये।

यह मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यद्यपि इसके बाद भी हिमालय जाने का क्रम बराबर बना रहा एवं गन्तव्य भी वही है, फिर भी गुरुदेव के साथ विश्व-व्यवस्था का संचालन करने वाली परोक्ष ऋषि सत्ता का प्रथम दर्शन अंतःस्थल पर अमिट छाप छोड़ गया। हमें अपने लक्ष्य, भावी जीवन क्रम, जीवनयात्रा में सहयोगी बनने वाली जागृत प्राणवान आत्माओं का आभास भी इसी यात्रा में हुआ। हिमालय की हमारी पहली यात्रा अनेकों ऐसे अनुभवों की कथा गाथा है जो अन्य अनेकों के लिए प्रेरणाप्रद सिद्ध हो सकती है।




Quotation - Akhandjyoti April 1985

आत्मा के खेत का ज्ञान के हल से जोतिये। उसमें श्रद्धा के बीज बोइए। इस खेती से जो फसल उगेगी, वह आपको महान बना देगी।




आमन्त्रण का प्रयोजन एवं भावी रूप रेखा का स्पष्टीकरण - Akhandjyoti April 1985

नन्दन वन प्रवास का अगला दिन और भी विस्मयकारी था। पूर्व रात्रि में गुरुदेव के साथ ऋषिगणों के साक्षात्कार के दृश्य फिल्म की तरह आँखों के समझ घूम रहे थे। पुनः गुरुदेव की प्रतीक्षा थी- भावी निर्देशों के लिए। धूप जैसे ही नन्दन वन के मखमली कालीन पर फैलने लगी, ऐसा लगा स्वर्ग धरती पर उतर आया हो। भाँति-भाँति के रंगीन फूल ठसाठस थे और चौरस पठार पर बिखरे हुए थे। दूर से देखने पर लगता था मानों एक गलीचा बिछा हो।

सहसा गुरुदेव का स्थूल शरीर रूप में आगमन हुआ। उन्होंने आवश्यकतानुसार पूर्व रात्रि के प्रतिकूल अब वैसा ही स्थूल शरीर बना लिया था जैसा कि प्रथम बार प्रकाश पुंज के रूप में पूजा घर में अवतरित होकर हमें दर्शन दिया था।

वार्तालाप क्रम आरम्भ करते हुए उन्होंने कहा- ‘‘हमें तुम्हारे पिछले सभी जन्मों की श्रद्धा और साहसिकता का पता था। अबकी बार यहाँ बुलाकर तीन परीक्षाएँ लीं और जाँचा कि बड़े कामों का वजन उठाने लायक मनोभूमि तुम्हारी बनी या नहीं। इस पूरी यात्रा में तुम्हारे साथ रहे हैं और घटनाक्रम तथा उसके साथ उठती तुम्हारी प्रतिक्रिया को देखते रहे हैं और भी अधिक निश्चिन्तता हो गई। यदि स्थिति सुदृढ़ और विश्वस्त न रही होती तो इस क्षेत्र के निवासी सूक्ष्म शरीरधारी ऋषिगण तुम्हारे समझ प्रकट न हुए होते और मन की व्यथा न कहते। उनके कथन का प्रयोजन यही था कि जो काम छूटा हुआ है उसे पूरा किया जाय। समर्थ देखकर ही उनने अपने मनोभाव प्रकट किये। अन्यथा दीन, दुर्बल, असमर्थों के सामने इतने बड़े लोग अपना मन बोलते कहाँ हैं?”

“तुम्हारा समर्पण यदि सच्चा है तो शेष सारे जीवन की कार्य पद्धति बनाये देते हैं। इसे परिपूर्ण निष्ठा के साथ पूरी करना। प्रथम कार्यक्रम तो यही है कि 24 लक्ष्य गायत्री महामन्त्र के 24 पुरश्चरण चौबीस वर्ष में पूरे करो। इससे मजबूती में जो कमी रही होगी सो पूरी हो जायेगी। बड़े और भारी काम करने के लिए बड़ी समर्थता चाहिए। उसी के निमित्त यह प्रथम कार्यक्रम सौंपा गया है। इसी के साथ-साथ दो कार्य और भी चलते रहेंगे। एक यह कि अपना अध्ययन जारी रखो। तुम्हें कलम उठानी है। आर्ष ग्रन्थों को अनुवाद प्रकाशन की व्यवस्था करके उसे सर्वसाधारण तक पहुँचना है। इससे देव संस्कृति की लुप्त प्राय कड़ियां जुड़ेंगी और भविष्य में विश्व संस्कृति का ढाँचा खड़ा करने में सहायता मिलेगी। इसके साथ ही जब तक स्थूल शरीर विद्यमान है तब तक कुछ मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने वाला- सर्वसुलभ साहित्य विश्व वसुधा की सभी सम्भव भाषाओं में लिखा जाना है। यह कार्य तुम्हारी प्रथम साधना की शक्ति से सम्बन्ध है। इसमें समय आने पर तुम्हारी सहायता के लिए सुपात्र मनीषी जुटेंगे जो तुम्हारा छोड़ा काम पूरा करेंगे।

तीसरा कार्य स्वतन्त्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहने का है। यह सन 1947 तक चलेगा। तब तक तुम्हारा पुरश्चरण भी बहुत कुछ पूरा हो लेगा। यह प्रथम चरण है। इसकी सिद्धियाँ जन साधारण के सम्मुख प्रकट होंगी। इस समय के लक्षण ऐसे नहीं हैं, जिनसे यह प्रतीत हो कि अंग्रेज भारत को स्वतन्त्रता देकर सहज ही चले जायेंगे। किन्तु यह सफलता तुम्हारा अनुष्ठान पूरा होने के पूर्व ही मिलकर रहेगी। तब तक तुम्हारा ज्ञान इतना हो जायेगा जितना कि युग परिवर्तन और नव निर्माण के लिए किसी तत्त्ववेत्ता के पास होना चाहिए।

पुरश्चरणों की समग्र सम्पन्नता तब होती है, जब उसका पूर्णाहुति यज्ञ भी किया जाय। चौबीस लाख पुरश्चरण का गायत्री महायज्ञ इतना बड़ा होना चाहिए, जिसमें 24 लाख मंत्रों की आहुतियाँ हो सकें एवं तुम्हारा संगठन इस माध्यम से खड़ा हो जाय। यह भी तुम्हें ही करना है। इसमें लाखों रुपयों की राशि और लाखों की सहायक जन संख्या चाहिए। तुम यह मत सोचना कि हम अकेले हैं। पास में धन नहीं है। हम तुम्हारे साथ हैं। साथ ही तुम्हारी उपासना का प्रतिफल भी। इसलिए संदेह करने की गुंजाइश नहीं है। समय आने पर सब हो जायेगा। साथ ही सर्वसाधारण को यह भी विदित हो जायेगा कि सच्चे साधक की सच्ची साधना का कितना चमत्कारी प्रतिफल होता है। यह तुम्हारे कार्यक्रम का प्रथम चरण है। अपना कर्त्तव्य पालन करते रहना। यह मत सोचना कि हमारी शक्ति नगण्य है। तुम्हारी कम सही। पर जब हम दो मिल जाते हैं तब एक और एक मिल कर ग्यारह होते हैं। और फिर यह तो दैवी सत्ता द्वारा संचालित कार्यक्रम है। इसमें संदेह कैसा? समय आने पर सारी विधि व्यवस्था सामने आती जायेगी। अभी से योजना बनाने और चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। अध्ययन जारी रखो। पुरश्चरण भी करते रहो। स्वतन्त्रता सैनिक का काम करो। अधिक आगे की बात सोचने में, व्यर्थ में मन में उद्विग्नता बढ़ेगी। अभी अपनी मातृभूमि में रहो और वहीं से प्रथम चरण के यह तीनों काम करो।

आगे की बात संकेत रूप में कहे देते हैं। साहित्य प्रकाशन द्वारा स्वाध्याय का और विशाल धर्म संगठन द्वारा सत्संग का- यह दो कार्य मथुरा रहकर करना पड़ेगा। पुरश्चरण की पूर्णाहुति भी वहीं होगी। प्रेस प्रकाशन भी वहीं से चलेगा। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रक्रिया सुनियोजित ढंग से वहीं से चलेगी। वह प्रयास एक ऐतिहासिक आन्दोलन होगा जैसा कि अब तक कहीं भी नहीं हुआ।

तीसरा चरण इन सूक्ष्म शरीरधारी ऋषियों की इच्छा पूरी करने का है। ऋषि परम्परा का बीजारोपण तुम्हें करना है। इसका विश्वव्यापी विस्तार अपने ढंग से होता रहेगा। यह कार्य सप्त ऋषियों की तपोभूमि सप्त सरोवर हरिद्वार में रहते हुए करना पड़ेगा। तीनों कार्य तीनों जगह उपयुक्त ढंग से चलते रहेंगे।

अभी संकेत किया है। आगे चलकर समयानुसार इन कार्यों की विस्तृत रूप रेखा हम यहाँ बुलाकर बताते रहेंगे। तीन बार बुलाने के यह तीन प्रयोजन होंगे।

चौथी बार तुम्हें भी चौथी भूमिका में जाना है और हमारे प्रयोजन का बोझ इस सदी के अंतिम दशकों में अपने कंधों पर लेना है। तब सारे विश्व में उलझी हुई विषम समस्याओं के अत्यन्त कठिन और अत्यन्त व्यापक कार्य अपने कंधे पर लेने होंगे। पूर्व घोषणा करने से कुछ लाभ नहीं। समयानुसार जो आवश्यक होगा, सो विदित भी होता चलेगा और सम्पन्न भी।

इस बार की हमारी हिमालय यात्रा में मन में वह असमंजस बना हुआ था कि ‘हिमालय की गुफाओं में सिद्ध पुरुष रहने और उनके दर्शन मात्र से विभूतियाँ मिलने की जन श्रुतियाँ प्रचलित हैं। हमें उनका कोई आधार नहीं मिला। वह बात ऐसे ही किंवदंती मालूम पड़ती है।” था तो मन का भीतरी असमंजस। पर गुरुदेव ने उसे बिना कहे ही ताड़ लिया और कंधे पर हाथ रख कर पूछा? “तुझे क्या जरूरत पड़ गई सिद्ध पुरुषों की? ऋषियों के सूक्ष्म शरीरों के दर्शन एवं हमसे मन नहीं भरा?”

अपने मन में अविश्वास जैसी बात! कोई दूसरा खोजने जैसी बात स्वप्न में भी नहीं उठी थी। मात्र बाल कौतूहल मन में था। गुरुदेव ने इसे अविश्वास मान लिया होगा तो श्रद्धा क्षेत्र में हमारी कुपात्रता मानेंगे। यह विचार मन में आते ही स्तब्ध रह गया।

मन को पढ़ लेने वाले देवात्मा ने हँसते हुए कहा वे हैं तो सही। पर दो बातें नई हो गई हैं। एक तो सड़कों की- वाहनों की सुविधा होने से यात्री अधिक आने लगे हैं। इससे उनकी साधना में विघ्न पड़ता है। दूसरे यह कि अन्यत्र जाने पर शरीर निर्वाह में असुविधा होती है। इसलिए उनने स्थूल शरीरों का परित्याग कर दिया है और सूक्ष्म शरीर धारण करके रहते हैं। जो किसी को दृष्टिगोचर भी न हो और उसके लिए निर्वाह साधनों की आवश्यकता भी न पड़े। इस कारण उन सभी ने शरीर ही नहीं स्थान भी बदल लिये हैं। स्थान ही नहीं साधना के साथ जुड़े हुए कार्यक्रम भी बदल लिये हैं। अब सब कुछ परिवर्तन हो गया तो दृष्टिगोचर कैसे हो? फिर सत्पात्र साधकों का अभाव हो जाने के कारण वे कुपात्रों को दर्शन देने या उन पर की हुई अनुकम्पा में अपनी शक्ति गँवाना भी नहीं चाहते। ऐसी दशा में अन्य लोग जो तलाश करते हैं वह मिलना सम्भव नहीं। किसी के लिए भी सम्भव नहीं। तुम्हें अगली बार पुनः हिमालय के सिद्ध पुरुषों की दर्शन झाँकी करा देंगे।”

परब्रह्म के अंशधर देवात्मा सूक्ष्म शरीर में किस प्रकार रहते हैं, इसका प्रथम परिचय हमने अपने मार्गदर्शक के रूप में घर पर ही प्राप्त कर लिया था। उनके हाथों मैं विधिवत् मेरी नाव सुपुर्द हो गयी थी। फिर भी बालबुद्धि अपना काम कर रही थी। हिमालय में अनेकों सिद्ध पुरुषों के निवास की जो बात सुन रखी थी, उस कौतूहल को देखने का जो मन था वह ऋषियों के दर्शन एवं मार्गदर्शक की साँत्वना से पूरा हो गया था। इस लालसा को पहले अपने अंदर ही मन के किसी कोने में छिपाए फिरते थे। आज उसके पूरे होने व आगे भी दर्शन होते रहने का आश्वासन मिल गया था। सन्तोष तो पहली भी कम न था, पर अब वह प्रसन्नता और प्रफुल्लता के रूप में और भी अधिक बढ़ गया।

गुरुदेव ने आगे कहा कि आगे हम जब भी बुलावें तब समझना कि हमने 6 माह या एक वर्ष के लिए बुलाया है। तुम्हारा शरीर इस लायक बन गया है कि इधर की परिस्थितियों में निर्वाह कर सको। इस नये अभ्यास को परिपक्व करने के लिए इस निर्धारित अवधि में एक-एक करके तीन बार और इधर हिमालय में ही रहना चाहिए। तुम्हारे स्थूल शरीर के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता समझेंगे, हम प्रबन्ध करवा दिया करेंगे। फिर इसकी आवश्यकता इसलिए भी है कि स्थूल से सूक्ष्म में और सूक्ष्म के कारण शरीर में प्रवेश करने के लिए जो तितीक्षा करनी पड़ती है, सो होती चलेगी। शरीर को क्षुधा, पिपासा, शीत, ग्रीष्म, निद्रा, थकान व्यथित करती हैं। इन छह को घर पर रहकर जीतना कठिन है क्योंकि सारी सुविधाएँ वहाँ उपलब्ध रहने से यह प्रयोजन आसानी से पूरे होते रहते हैं और तप-तितिक्षाओं के लिए अवसर ही नहीं मिलता। इसी प्रकार मन पर छाये रहने वाले छः कषाय-कल्मष भी किसी न किसी घटना क्रम के साथ घटित होते रहते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर इन छः रिपुओं से जूझने के लिए आरण्यकों में रहकर इनसे निपटने का अभ्यास करना पड़ता है। तुम्हें घर रहकर यह अवसर भी न मिल सकेगा। इसलिए अभ्यास के लिए जन संकुल स्थान से अलग रहने से उस आन्तरिक मल्लयुद्ध में भी सरलता होती है। हिमालय में रहकर तुम शारीरिक तितीक्षा और मानसिक तपस्या करना। इस प्रकार तीन बार तीन वर्ष वहाँ आते रहने और शेष वर्षों में जन संपर्क में रहने से परीक्षा भी होती चलेगी कि जो अभ्यास हिमालय में रहकर किया था, वह परिपक्व हुआ या नहीं?

यह कार्यक्रम देवात्मा गुरुदेव ने ही बनाया, पर था मेरा इच्छित। इसे मनोकामना की पूर्ति कहना चाहिए। स्वाध्याय, सत्संग और मनन-चिन्तन से यह तथ्य भली प्रकार हृदयंगम हो गया था कि दसों इन्द्रिय प्रत्यक्ष और ग्यारहवीं अदृश्य मन इन सबका निग्रह कर लेने पर बिखराव से छुटकारा मिल जाता है और आत्म संयम का पराक्रम बन पड़ने पर मनुष्य की दुर्बलताएँ समाप्त हो जाती हैं और विभूतियाँ जग पड़ती हैं। सशरीर सिद्ध पुरुष होने का यही राजमार्ग है। इन्द्रिय निग्रह, अर्थ निग्रह, समय निग्रह और विचार निग्रह यह चार संयम हैं। इन्हें साधने वाले महामानव बन जाते हैं और काम क्रोध, लोभ, मोह इन चारों में मन को उबार लेने पर लौकिक सिद्धियाँ हस्तगत हो जाती हैं।

मैं तपश्चर्या करना चाहता था। पर करता कैसे? समर्पित को स्वेच्छा आचरण की सुविधा कहाँ? जो मैं चाहता था, वह गुरुदेव के मुख से आदेश रूप में कहे जाने पर मैं फूला न समाया और उस क्रिया-कृत्य के लिए समय निर्धारित होने की प्रतीक्षा करने लगा।

गुरुदेव बोले- “अब वार्ता समाप्त हुई। तुम अब गंगोत्री चले जाओ। वहाँ तुम्हारे निवास, आहार आदि की व्यवस्था हमने कर दी है। भागीरथ शिला- गौरी कुण्ड पर बैठकर अपना साधना क्रम आरम्भ कर दो। एक साल पूरा हो जाय तब अपने घर लौट जाना। हम तुम्हारी देखभाल नियमित रूप से करते रहेंगे।”

गुरुदेव अदृश्य हो गये। हमें उनका दूत गोमुख तक पहुँचा गया। इसके बाद उनके बतायें हुए स्थान पर वर्ष के शेष दिन पूरे किये।

समय पूरा होने पर हम वापस लौट पड़े। अब की बार इधर से लौटते हुए उन कठिनाइयों में से एक भी सामने नहीं आई, जो जाते समय पग-पग पर हैरान कर रही थी। वे परीक्षाएँ थी, सो पूरी हो जाने पर लौटते समय कठिनाइयों का सामना करना भी क्यों पड़ता।

हम एक वर्ष बाद घर लौट आए। वजन 18 पौण्ड बढ़ गया। चेहरा लाल और गोल हो गया था। शरीर गति शक्ति काफी बढ़ी हुई थी। हर समय प्रसन्नता छाई रहती थी।

लौटने पर लोगों ने गंगा जी का प्रसाद माँगा। सभी को गंगोत्री की रेती में से एक-एक चुटकी दे दी व गोमुख के जल का प्रसाद दे दिया। यही वहाँ से साथ लेकर भी लौटे थे। दिख सकने वाला प्रत्यक्ष प्रसाद यही एक ही था।




दो मनों के मल्लयुद्ध में उत्कृष्ट की विजय - Akhandjyoti April 1985

अपनी पहली यात्रा में ही सिद्ध पुरुषों- संतों के विषयों में वस्तुस्थिति का पता चल गया। मैं स्वयं जिस भ्रम में था, वह दूर हो गया और दूसरे जो लोग मेरी ही तरह सोचते रहे होंगे उनके भ्रम का भी निराकरण करता रहा। अपने साक्षात्कार प्रसंग को याद रखते हुए दुहराया कि अपनी पात्रता पहले से ही अर्जित न कर ली हो तो उनसे भेंट हो जाना अशक्य है क्योंकि वे सूक्ष्म शरीर में होते हैं और उचित अधिकारी के सामने ही प्रकट होते हैं। यह जानकारियाँ पहले न थीं। अन्यों को भी तीर्थ यात्रा कर लेने के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगा होगा।

हमारी हिमालय यात्रा का विवरण पूर्व में अखण्ड-ज्योति की लेखमाला में और बाद में “सुनसान के सहचर” पुस्तक में प्रकाशित किया गया है। वह विवरण तो लम्बा है पर उसका साराँश थोड़ा ही है। अभावों और आशंकाओं के बीच प्रतिकूलताओं को किस तरह मनोबल के सहारे पार किया जा सकता है, इसका आभास उनमें मिल सकेगा। मन साथ दे तो सर्वसाधारण को संकट दिखने वाले प्रसंग किस प्रकार हँसी मजाक जैसे बन जाते हैं कुछ इसी प्रकार के विवरण उन छपे प्रसंगों में पाठकों को मिल सकते हैं। अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले को मन इतना मजबूत तो बनाना ही पड़ता है।

पुस्तक बड़ी है, विवरण भी सुविस्तृत है। पर उसमें बातें थोड़ी सी हैं, साहित्यिक विवेचना ज्यादा है। हिमालय और गंगा तट क्यों साधना के लिए अधिक उपयुक्त हैं इसका कारण हमने उसमें दिया है। एकान्त में सूनेपन का जो भय लगता है, उसमें चिन्तन की दुर्बलता ही कारण है। मन मजबूत हो तो साथियों की तलाश क्यों करनी पड़े? उनके न मिलने पर एकाकीपन का डर क्यों लगे। जंगली पशु पक्षी अकेले रहते हैं। उनके लिए तो हिंस्र पशु-पक्षी भी आक्रमण करने को बैठे रहते हैं। फिर मनुष्य से तो सभी डरते हैं। साथ ही उसमें इतनी सूझ-बूझ भी होती है कि आत्म-रक्षा कर सके। चिन्तन भय की ओर मुड़े तो इस संसार में सब कुछ डरावना है। यदि साहस साथ दे तो हाथ-पैर, आँख मुख और मन, बुद्धि इतनों का निरंतर साथ रहने पर डरने का क्या कारण हो सकता है? वन्य पशुओं में कुछ ही हिंसक होते हैं। फिर मनुष्य निर्भय रहे, उनके प्रति अन्तः से प्रेम भावना रखें तो खतरे का अवसर आने की कम ही सम्भावना रहती है। राजा हरिश्चंद्र श्मशान की जलती चिताओं के बीच रहने की मेहतर की नौकरी करते थे। केन्या के मसाई शेरों के बीच ही झोंपड़े बनाकर रहते हैं। वनवासी आदिवासी सर्पों और व्याघ्रों के बीच ही रहते हैं। फिर कोई कारण नहीं कि सूझ-बूझ वाला आदमी वहाँ न रह सके, जहाँ खतरा समझा जा सकता है।

आत्मा परमात्मा के घर में एकाकी आता है। खाना, सोना, चलना भी अकेले ही होता है। भगवान के घर भी अकेले ही जाना पड़ता है। फिर अन्य अवसरों पर भी आपको परिष्कृत और भावुक मन के सहारे उल्लास अनुभव कराता रहे तो इसमें क्या आश्चर्य की बात है। अध्यात्म के प्रतिफल रूप में मन में इतना परिवर्तन तो दृष्टिगोचर होना ही चाहिए। शरीर को जैसे अभ्यास में ढालने का प्रयास किया जाता है, वह वैसा ही ढल जाता है। उत्तरी ध्रुव के ऐस्किमो केवल मछलियों के सहारे जिन्दगी गुजार देते हैं। दुर्गम हिमालय एवं आल्पस पर्वत के ऊँचे क्षेत्रों में रहने वाले अभावों के बावजूद स्वस्थ लम्बी जिन्दगी जीते हैं। पशु भी घास के सहारे गुजारा कर लेते हैं। मनुष्य भी यदि उपयोगी पत्तियाँ चुनकर अपना आहार निर्धारित कर ले तो अभ्यास न पड़ने तक ही थोड़ी गड़बड़ रहती है। बाद में गाड़ी ढर्रे पर चलने लगती है। ऐसे-ऐसे अनेकों अनुभव हमें उस प्रथम हिमालय यात्रा में हुए और जो मन सर्वसाधारण को कहां से कहाँ खींचे-खींचे फिरता है। वह काबू में आ गया और कुकल्पनाएँ देने के स्थान पर आनन्द एवं उल्लास भरी अनुभूतियाँ अनायास ही देने लगा। संक्षेप में यही है हमारी “सुनसान के सहचर” पुस्तक का सार संक्षेप। ऋतुओं की प्रतिकूलता से निपटने के लिए भगवान में उपयुक्त माध्यम रखे हैं। जब इर्द-गिर्द बर्फ पड़ती है तब भी गुफाओं के भीतर समुचित गर्मी रहती है। गोमुख क्षेत्र की कुछ हरी झाड़ियां जलाने से जलने लगती हैं। रात्रि को प्रकाश दिखाने के लिए ऐसी ही एक वनौषधि झिलमिल जगमगाती रहती है। तपोवन और नन्दन बन में एक शकरकंद जैसा अत्यधिक मधुर स्वाद बाला ‘देवकन्द’ जमीन में पकता है। ऊपर तो वह घास जैसा दिखाई देता है पर भीतर से उसे उखाड़ने पर आकार में इतना बड़ा निकलता है कि कच्चा या भूनकर एक सप्ताह तक का गुजारा चल सकता है। भोज व्रत के तने की मोटी गांठें होती हैं। उन्हें कूटकर चाय की तरह क्वाथ बना लिया जाय तो पीने पर ठण्ड में भी अच्छा-खासा पसीना आ जाता है। नमक डाल लिया जाय तो ठीक, अन्यथा बिना नमक के भी वह क्वाथ बड़ा स्वादिष्ट लगने लगता है। भोजपत्र का छिलका ऐसा होता है कि उसे बिछाने, ओढ़ने और पहनने के काम में आच्छादन रूप में लिया जा सकता है। यह बातें यहाँ इसलिए लिखनी पड़ रहीं हैं कि भगवान ने हर ऋतु की असह्यता से निपटने के लिए सारी व्यवस्था बनाकर रखी है। परेशान तो मनुष्य अपने मन की दुर्बलता से अथवा अभ्यस्त वस्तुओं की निर्भरता से होता है। यदि मनुष्य आत्म-निर्भर रहे तो तीन चौथाई समस्याएँ हल हो जाती हैं। एक चौथाई के लिए अन्य विकल्प ढूंढ़े जा सकते हैं और उनके सहारे समय काटने के अभ्यास किये जा सकते हैं। मनुष्य हर स्थिति में अपने को फिट कर सकता है। उसे तब हैरानी होती है, जब वह यह चाहता है कि अन्य सब लोग उसकी मर्जी के अनुरूप बन जांय, परिस्थितियाँ अपने अनुकूल ढल जांय। यदि अपने को बदल लें तो हर स्थिति से गुजरा और उल्लास युक्त बना रहा जा सकता है।

यह बातें पढ़ी और सुनी तो पहले भी थीं पर अनुभव में इस वर्ष के अंतर्गत ही आईं जो प्रथम हिमालय यात्रा मैं व्यवहार में लानी पड़ी। यह अभ्यास एक अच्छी-खासी तपश्चर्या थी, जिसने अपने ऊपर नियन्त्रण करने का भली प्रकार अभ्यास करा दिया। अब हमें विपरीत परिस्थितियों में भी गुजारा करने से परेशानी का अनुभव नहीं होता था। हर प्रतिकूलता को अनुकूलता की तरह अभ्यास में उतारते देर नहीं लगती।

एकाकी जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह का कोई अवसर नहीं था। इसलिए उनसे निपटने का कोई झंझट सामने नहीं आया। परीक्षा के रूप में जो भय और प्रलोभन सामने आये उन्हें हँसी में उड़ा दिया गया। वहाँ स्वाभिमान भी न काम कर गया। सोचा “हम आत्मा हैं। प्रकाश पुँज और समर्थ। गिराने वाले भय और प्रलोभन हमें न तो गिरा सकते हैं न उलटा घसीट सकते हैं।” मन का निश्चय सुदृढ़ देखकर पतन और पराभव के जो भी अवसर आए, वे परास्त होकर वापस लौट गये। एक वर्ष के उस हिमालय निवास में जो ऐसे अवसर आये, उनका उल्लेख करना यहाँ इसलिए उपयुक्त नहीं समझा कि अभी हम जीवित हैं और अपनी चरित्र निष्ठा की ऊँचाई का वर्णन करने में कोई आत्म-श्लाधा की गन्ध सूँघ सकता है। यहाँ तो हमें मात्र इतना ही कहना है कि अध्यात्म पथ के पथिक को आये दिन भय और प्रलोभनों का दबाव सहना पड़ता है। इनसे जूझने के लिए हर पथिक को कमर कसकर तैयार रहना चाहिए। जो इतनी तैयारी न करेगा उसे उसी तरह पछताना पड़ेगा जिस प्रकार सरकस के संचालक और ‘रिंग मास्टर’ का पद बिना तैयारी किये कोई ऐसे ही सम्भाल ले और पीछे हाथ-पैर तोड़ लेने अथवा जान जोखिम में डालने का उपहास कराये।

उपासना, साधना और आराधना में - “साधना” ही प्रमुख है। उपासना का कर्मकाण्ड कोई नौकरी की तरह भी कर सकता है। आराधना - पुण्य परमार्थ को कहते हैं। जिसने अपने को साध लिया है, उसके लिए और कोई काम करने के लिए बचता ही नहीं। उत्कृष्टता सम्पन्न मन अपने लिए सबसे लाभदायक व्यवसाय पुण्य परमार्थ ही देखता है। इसी में उसकी अभिरुचि और प्रवीणता बन जाती है। हिमालय के प्रथम वर्ष में हमें आत्म-संयम की- मनोनिग्रह की साधना करनी पड़ी। जो कुछ चमत्कार हाथ लगे हैं, उसी के प्रतिफल हैं। उपासना तो समय काटने का एक व्यवसाय बन गया।

घर चार घण्टे नींद लिया करते थे। यहाँ उसे बढ़ाकर छः घण्टे कर दिया। कारण कि घर पर अनेकों स्तर के अनेक काम रहते थे। पर यहाँ तो दिन का प्रकाश हुए बिना मानसिक जप के अतिरिक्त और कुछ कर सकना ही सम्भव न था। पहाड़ों की ऊँचाई में प्रकाश देर से आता है और अंधेरा जल्दी हो जाता है। इसलिये 12 घण्टे के अन्धेरे में छः घण्टे सोने के लिए और छः घण्टे उपासना के लिए पर्याप्त होने चाहिए। स्नान का बन्धन वहाँ नहीं रहा। मध्याह्न को ही नहाना और कपड़े सुखाना सम्भव होता था। इसलिए परिस्थिति के अनुरूप दिनचर्या बनानी पड़ी। दिनचर्या के अनुरूप परिस्थितियाँ तो बन नहीं सकती थी।

“प्रथम हिमालय यात्रा कैसी सम्पन्न हुई?” इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि परिस्थितियों के अनुरूप मन को ढाल लेने का अभ्यास भली प्रकार कर लिया। इसे यों भी कह सकते हैं कि आधी मंजिल पार कर ली। इस प्रकार प्रथम वर्ष में दबाव तो अत्यधिक सहने पड़े तो भी कच्चा लोहा तेज आग की भट्टी में ऐसा लोहा बन गया जो आगे चलकर किसी भी काम आ सकने के योग्य बन गया।

पिछला जीवन बिल्कुल दूसरे ही ढर्रे में ढला था। सुविधायें और साधनों गाड़ी लुढ़क रही थी। सब कुछ सीधा और सरल लग रहा था। हम हिमालय पहुँचते ही सब कुछ उलट गया। वहाँ की परिस्थितियाँ ऐसी थीं, जिनमें निभ सकना केवल उन्हीं के लिए सम्भव था जो छिड़ी लड़ाई के दोनों में कुछ ही समय की ट्रेनिंग लेकर सीधे मोर्चे पर चले जाते हैं और उस प्रकार के साहस का परिचय देते हैं जिसका इससे पूर्व कभी पाला नहीं पड़ा था।

प्रथम हिमालय यात्रा का, प्रत्यक्ष प्रतिफल एक ही रहा कि अनगढ़ मन हार गया और हम जीत गए। प्रत्येक नई असुविधा को देखकर उसने नये बछड़े की तरह हल में चलने में कम आना-कानी नहीं की। किंतु उसे कहीं भी समर्थ न मिला। असुविधाओं को उसने अनख तो माना और लौट चलने की इच्छा भी प्रकट की, किंतु पाला ऐसे किसान से पड़ा था जो मरने-मारने पर उतारू था। आखिर मन को झक मारनी पड़ी और हल में चलने का अपना भाग्य अंगीकार करना पड़ा। यदि जी कच्चा पड़ा होता तो स्थिति वह नहीं बन पड़ती जो अब बन गई है। पूरे एक वर्ष नई-नई प्रतिकूलताएं अनुभव होती रहीं, बार-बार ऐसे विकल्प उठते रहे जिसका अर्थ होता था कि इतनी कड़ी परीक्षा में पड़ने पर हमारा स्वास्थ्य बिगड़ जायेगा। भविष्य की साँसारिक प्रगति का द्वार बन्द हो जायेगा। इसलिए समूची स्थिति पर पुनर्विचार करना चाहिए।

एक बार तो मन में ऐसा ही तमोगुणी विचार भी आया, जिसे छिपाना उचित नहीं होगा। वह यह कि जैसा बीसों ढ़ोंगियों ने हिमालय का नाम लेकर अपनी धर्म ध्वजा फहरा दी है, वैसा ही कुछ करके सिद्ध पुरुष बन जाना चाहिए और उस घोषणा के आधार पर जन्म भर गुलछर्रे उड़ाने चाहिए। ऐसे बीसों आदमियों की चरित्र गाथा और ऐशो आराम भरी विडम्बना का हमें आद्योपांत परिचय है। यह विचार उठा वैसे ही उसे तत्क्षण जूते के नीचे दबा दिया। समझ में आ गया कि मन की परीक्षा ली जा रही है। सोचा कि जब अपनी सामान्य प्रतिभा के बलबूते ऐशो-आराम के आडम्बर खड़े किये जा सकते हैं तो हिमालय को- सिद्ध पुरुषों को- सिद्धियों को भगवान को- तपश्चर्या को बदनाम करके आडम्बर रचने से क्या कायदा?

उस प्रथम वर्ष में मार्गदर्शक ऋषि सत्ता के साक्षात्कार ने मुझे आमूल-चूल बदल दिया। अनगढ़ मन के साथ नये परिष्कृत मन का मल्ल-युद्ध होता रहा और यह कहा जा सकता है कि परिणाम स्वरूप हम पूरी विजयश्री लेकर वापस लौटे।




अध्यात्म का ध्रुव केन्द्र-देवात्मा हिमालय - Akhandjyoti April 1985

देवात्मा हिमालय, विशेषकर उत्तराखण्ड जिसे हिमालय का हृदय कहा जाता है, अध्यात्म विज्ञानियों की दृष्टि में दैवी चेतन सत्ता की निवास स्थली है। मोटी दृष्टि से वह बर्फ से आच्छादित एक पर्वत श्रृंखला है जो तिब्बत के पठार को भारतीय उप महाद्वीप से अलग करती है। आल्पस पर्वत की तरह ही स्थूल दृष्टि रखने वालों ने उसे एक हिम पर्वत माना है। जबकि भारतीय संस्कृति के विकास की दृष्टि से हिमालय का महत्वपूर्ण स्थान है।

पाठकों को यह जानकारी यहाँ दे देना अप्रासंगिक नहीं होगा कि हिमालय का आर्य संस्कृति के उत्थान में कितना महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यह देवताओं, ऋषियों, तपस्वियों की पुण्य स्थली रही है। इसी कारण इसे स्वर्ग कहा जाता हो तो यह गलत नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे अनेकों भौगोलिक एवं नृतत्व विज्ञान सम्बन्धी तथ्य मिलते हैं जो इस मत का समर्थन करते हैं कि हिमालय का महत्व बृहत्तर भारत के साँस्कृतिक विकास के परिप्रेक्ष्य में अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। इतिहासकारों ने लिखा है कि आर्य मध्य एशिया से हिमालय की तराइयों में होते हुए नीचे उतरे और आर्यावर्त में बस गये। आर्यावर्त गंगा यमुना का दोआबा कहलाता था। आरम्भ में उसकी सीमा त्रिवेणी संगम तक थी। पीछे वह गया क्षेत्र तक बढ़ गई।

इतिहासकारों के अनुसार आर्यों का राजा इन्द्र कहलाता था और उनका पुरोहित बृहस्पति। हिमालय का उत्तराखण्ड क्षेत्र इन देवजनों की राजधानी थी। इन्द्र के तत्वावधान में कार्य करने वाले अन्य देवता भी हिमालय के इसी उच्च शिखर भाग में रहते थे। तब हिमालय ऊँचा तो था पर इतना ऊँचा नहीं कि उसकी ठंडक असह्य हो और वृक्ष वनस्पति न होते हों। इन दिनों जो स्थिति गंगोत्री क्षेत्र की है लगभग वही उस क्षेत्र की थी जिसे देवलोक कहते थे। शासकों, विद्वानों और वैज्ञानिकों के समुदाय उसी क्षेत्र में रहते थे। मौसम इतना ठंडा न था जितना वहाँ इन दिनों है।

अब से 17 हजार वर्ष पूर्व पिछला हिमयुग आया था। पृथ्वी के बड़े भाग में बर्फ जम गई थी। समुद्रों में भी उथल-पुथल हुई थी कितने ही भूखण्डों में पानी भर गया था और महाद्वीप कट कर एक-दूसरे से अलग हो गये थे। भू-भागों के कुछ नीचे हो गये- कुछ नीचे-ऊँचे। इस उलट-पुलट का हिमालय पर भी असर पड़ा और मौसम पर भी। गंगोत्री और बद्रीनाथ शिखर ऊँचे उठ गये और वहाँ ठंडक की अधिकता से वृक्ष वनस्पतियों का भी अभाव हो गया। देव युग में ऐसा न था। मध्य एशिया से आर्यावर्त तक आवागमन की, रहन-सहन की सुविधा थी। इसी से आर्य मध्य एशिया छोड़कर आर्यावर्त के उपजाऊ क्षेत्र में आ बसे।

मध्य एशिया का वातावरण उन दिनों अच्छा न था। असुर स्तर के लोग बहु संख्या में उधर रहते थे। उनकी रीति-नीति का आर्यों से तालमेल न बैठता था। आयेदिन देवासुर संग्राम ठने रहते थे। अन्त में यह क्षेत्र उनने खाली कर दिया। अधिक अच्छी भूमि जो उनने तलाश कर ली थी। उत्तराखण्ड का अपेक्षाकृत ऊँचा क्षेत्र इस दृष्टि से भी उत्तम था कि वह सुरक्षा के मध्यवर्ती किले का काम करता था। असुरों में लड़ना होता तो उन्हें ऊपर बसे हुए लोग आसानी से रोक सकते थे और नीचे धकेल देते थे।

यह इतिहासकारों का प्रतिपादन है। इसकी पौराणिक गाथा में भी संगति मिल जाती है। देवताओं का स्वर्ग कहाँ था? इसके लिए अलंकारिक भाषा में उसे ऊपर आसमान में कोई लोक विशेष कहा गया है। ऊपर आसमान- अन्तरिक्ष में बसा हुआ। पर उस कथन की तथ्यात्मक श्रृंखला नहीं मिलती। मनुष्यों का स्वर्ग लोक से आवागमन किस प्रकार सम्भव हो सकता है? मरने के बाद स्वर्ग जाने की बात यदि ठीक है तो आये दिन वहाँ आवागमन कैसे बन पड़ेगा? तथ्य यही था कि गंगा का उद्गम जिस क्षेत्र में है और वहीं से कुछ आगे-पीछे सरयू, यमुना आदि निकलती हैं, पंजाब के पंचनद जहाँ से निकलते हैं, उसी को तत्कालीन स्वर्ग कहा जा सकता है। अभी भी लेह, तिब्बत, आदि का मौसम ऐसा है, जहाँ मनुष्यों का आसानी से निर्वाह हो जाता है। पूर्व काल का देवताओं का स्वर्ग बद्रीनाथ से तिब्बत तक फैला हुआ था। इस क्षेत्र के निवासी मूर्धन्य स्तर के थे। वह विज्ञान की प्रत्येक धारा में पारंगत थे। तत्व दर्शन भी उनका प्रिय विषय था। उपयुक्त सभी विशेषताओं के रहने से उस क्षेत्र का नाम स्वर्ग और निवासियों के नाम उनकी विशिष्टताओं के अनुरूप देवता कहा गया हो तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं है। यदि ब्रह्माण्ड में कहीं अन्यत्र बुद्धिमान प्राणी रहते होंगे तो उनके साथ भी उनकी घनिष्ठता रही हो तो आश्चर्य नहीं। इस पृथ्वी पर यह चरम उत्कर्ष का क्षेत्र तो था ही। ज्ञान और विज्ञान का भण्डार होने के कारण इस प्रकार की उपमा दिया जाना कोई असंगत नहीं है। उनका लोक-लोकान्तरों की प्रतिभाओं के साथ आदान-प्रदान चलना भी कोई आश्चर्य की बात नहीं है। उन दिनों महान विद्याओं, कलाओं, विभूतियों का भण्डार उस क्षेत्र में रहने की बात समझ में भी आती है।

नारद जी स्वर्ग लोक में विष्णुजी से महत्वपूर्ण समस्याओं के सम्बन्ध में विचार विमर्श हेतु बहुधा आते जाते रहते थे। इस आवागमन में उन्हें प्रवीणता प्राप्त थी। पुराणों में और भी ऐसी कथाएँ हैं, जिनसे उपरोक्त तथ्य की पुष्टि होती है। असुरों के आक्रमण मध्य एशिया से देव समुदाय पर जब-जब हुए हैं तब-तब उनने आर्यावर्त के राजाओं को सहायता करने के लिए बुलाया है और वे प्रसन्नता पूर्वक पहुँचे भी हैं। राजा दशरथ एक बार इन्द्र के आमन्त्रण पर वहाँ गये थे। रथ की धुरी में गड़बड़ी पर जाने से उनकी पत्नी ने अपनी उँगली लगा कर यान का यथावत् चालू रहने योग्य बनाया था। इस साहसिकता के बदले दशरथ ने कैकेयी को दो वरदान देने का वचन दिया था। एक बार अर्जुन को इन्द्र ने बुलाया था। वे भी सहायता करने पहुँचे थे सहायता सफल हुई तो इन्द्र ने वहाँ की सर्वोत्तम सुन्दरी उर्वशी का उपहार में देना चाहा। अर्जुन के मनाकर देने पर इन्द्र ने दूसरा उपहार गाण्डीव धनुष के रूप में उन्हें दिया था। उस धनुष के बाण शब्द बेधी होते थे।

असुरों ने मध्य एशिया को छोड़कर देवताओं की सम्पदा पर कब्जा करने के लिए लंका को अपना अड्डा बनाया था और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर को लूटकर लंका में सोने के मकान बना लिये थे। इस प्रकार देवताओं का स्वर्ग इस धरती पर होना ही सिद्ध होता है और भी कितनी ही कथाएँ इस प्रकार की हैं जिनमें स्वर्ग का वर्णन इसी रूप में आता है मानों वह पृथ्वी का ही कोई उत्कृष्ट भाग रहा हो। यह भी कहा जा सकता है कि अधिक विकसित सभ्यता के किन्हीं अन्तरिक्ष वासियों के साथ उन लोगों का आदान-प्रदान रहा हो। ऐसे अनेकों प्रमाण अभी भी उपलब्ध होते हैं।

हिमालय को कार्य क्षेत्र देवताओं ने बनाया हो इसके कई कारण थे। एक यह कि अधिक ऊँचाई होने से असुरों का वहाँ तक पहुँचना और आक्रमण करना सरल नहीं था। इसलिए देवासुर संग्राम आये दिन न होने की सुविधा देवताओं को मिलती थी। दूसरी यह कि उस क्षेत्र में अनेकों गुफाएँ हैं, जिनमें ताप मान सह्य रहता है। उनमें निवास करते हुए तत्वज्ञान और विज्ञान की शोधें एकान्त में - एकाग्रतापूर्वक करना सम्भव होता था। तीसरे यह कि उस क्षेत्र में संजीवनी बूटी जैसे मृतक को जीवित कर कर देने वाली जड़ी-बूटियाँ मिलती थीं। सोमरस यहीं उगता था। च्यवन जैसे को, वृद्ध को, युवा बना देने वाला अष्ट वर्ग यहीं था। संसार को अलभ्य जड़ी-बूटियों की दृष्टि से यह क्षेत्र अनुपम था व अभी भी है। उस समय स्वर्ण की खदानें भी इधर ही थीं। वातावरण में ऐसे तत्व थे जिन्हें अलौकिक कहा जा सके। इन कारणों से ऋषि गण इस क्षेत्र की गुफाओं में रहकर अनेकों सिद्धियों का उपार्जन करते थे। मानव शरीर ब्रह्माण्ड शरीर का संक्षिप्त संस्करण हैं। इसमें प्रकृति की- ब्रह्माण्ड की- महती शक्तियाँ बीज रूप में विद्यमान हैं। उन्हें उठाने और परिपक्व करने के लिए यह क्षेत्र सर्व सुविधा सम्पन्न है। ऋद्धियों और सिद्धियों का भाण्डागार इस क्षेत्र में रहकर सरलता पूर्वक अर्जित किया जा सकता है। इसलिए देवता ही नहीं, देव मानवों, सिद्ध पुरुषों का समुदाय भी इसी क्षेत्र में आकर निवास करता था। इतिहास पुराण इस बात के साक्षी हैं कि ऋषियों में से अधिकाँश ने अपनी योग साधना तपश्चर्या करके दुर्लभ विभूतियां यहीं अर्जित की थीं। उस उपार्जन का लाभ मनुष्य जाति को, विशेषतया आर्यावर्त क्षेत्र को निरन्तर मिलता रहा है। प्रसिद्ध है कि उधर के ऊबड़-खाबड़ नदी नालों को सुव्यवस्थित करके देवताओं ने भागीरथ के तत्वावधान में गंगा को स्वर्ग से नीचे उतारा था और जल के अभाव में पिछड़ा हुआ क्षेत्र हरीतिमा से भरपूर स्वर्ण सम्पदाओं का स्वामी आर्यावर्त बन गया था।

हिमालय के स्वर्ग केन्द्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यहाँ स्थूल शरीर को सूक्ष्म शरीर में विकसित कर लेना और उसे इच्छानुसार लम्बी अवधि तक जीवित बनाये रखना सम्भव था। सूक्ष्म और कारण शरीर को समर्थ बनाने के उपरान्त स्थूल शरीर के न रहने पर भी मनुष्य का अस्तित्व बना रहता है। तब उसे भूख, प्यास, निद्रा आदि की उन आवश्यकताओं को पूरा नहीं करना पड़ता, जो स्थूल शरीर के रहते अनिवार्य रूप से आवश्यक मानी जाती हैं। सूक्ष्म शरीर दृश्यमान न होते हुए भी स्थूल शरीर की तुलना में कहीं अधिक समर्थ एवं स्थिर रहता है। उसे शरीरगत आवश्यकताओं में ही लगाना पड़ता है। जो महान् उद्देश्य सामने है, उसे पूरा करने में बिना किसी विघ्न बाधा के लगे रहने में कोई विघ्न आड़े नहीं आता। स्थूल शरीर को स्वेच्छा पूर्वक परित्याग करके सूक्ष्म शरीर के रूप में अपनी सत्ता को बनाये रहना और जो काम करने हैं, उन्हें अनवरत रूप से चालू रख पाना सम्भव होता है। यह एक बहुत बड़ी सुविधा है। इसे उपलब्ध करने से लम्बे समय तक किसी प्रयोग को जारी रखा जा सकता है। स्थूल शरीर के न रहने पर साधारण मनुष्यों की गतिविधियाँ समाप्त हो जाती हैं किंतु सूक्ष्म शरीरधारी अपनी गतिविधियाँ हजारों वर्षों तक जारी रखे रह सकता है।

जैसा कि पूर्व में बताया गया, अब से 17 हजार वर्ष पूर्व पिछला हिमयुग आया था। उस समय के ऋषि अपने सूक्ष्म शरीर से किन्हीं कन्दराओं, शिखरों एवं दिव्य भूमियों पर विद्यमान हैं। सर्वसाधारण को वे नहीं दिखते। किंतु जिन्हें अपना परिचय देना होता है या कुछ सहायता करनी होती है तब उस शरीर को प्रकट भी कर देते हैं। यह बहुत बड़ी बात है। इस सिद्धि के बल पर ही हिमालय के सिद्ध पुरुष हिमयुग से भी पूर्व की संचित अपनी ज्ञान सम्पदा को यथावत् बनाये हुए हैं। इसके बाद भी वे अपने तप प्रयोगों में संलग्न रहने के कारण अपेक्षाकृत और भी अधिक समर्थ हो गये हैं। हमारा साक्षात्कार इन्हीं ऋषिगणों से गुरुदेव ने कराया था।

पिछड़ों को बढ़ाना और गिरों को उठाना इन सिद्ध पुरुषों का प्रधान कार्य है। जो अध्यात्म मार्ग में बढ़ना चाहते हैं, उन्हें अध्यापकों की तरह पढ़ाना, अभिभावकों की तरह संरक्षण एवं सुविधा प्रदान करना इनका प्रमुख कार्य है। जब उन्हें संसार की सामयिक समस्याओं का समाधान करने के लिए स्वयं कोई बड़ा उत्तरदायित्व ओढ़ना होता है तो किसी शरीर में मनुष्य जन्म भी ले लेते हैं और अपना प्रयोजन पूरा होने पर उस शरीर को त्यागकर पुनः अपने सिद्ध स्वरूप में लौट जाते हैं।

भगवान निराकार हैं। ये शरीर धारण नहीं कर सकते। एक जगह जन्म लेने वाले को अन्यत्र ये अपनी सत्ता समेटनी पड़ेगी। इसलिए वे अपने किसी अंशधर को वह काम सौंप देते हैं, जो उन्हें कराना है। यह अंशधर ही देवात्मा, ऋषि, अवतार महापुरुष आदि कहलाते हैं और वे उन कामों को सम्पन्न करते हैं जो उन्हें सौंपे गये हैं। समय-समय पर ऐसे अंशधर ही प्रकट होते और वे कार्य पूरे कर दिखाते हैं, जो सामान्य मनुष्यों की सामर्थ्य से बाहर है।

इस पृथ्वी का आध्यात्मिक ध्रुव केन्द्र हिमालय है। इसे एक प्रकार से भगवान की विशेष शक्तिशाली सेना की छावनी समझा जाना चाहिए। सूक्ष्म शरीरधारी- अंशधर देवात्मा सिद्ध पुरुष प्रायः इसी क्षेत्र में रहते हैं। महाप्रभु ईसा कुछ समय के लिए इसी क्षेत्र में आये थे। यह ईसवी सदी के प्रारम्भ की बात है। यह उच्च स्तरीय आत्माओं का प्रशिक्षण विद्यालय रहा है। उन्हें आवश्यक अस्त्र-शस्त्र भी यहीं से मिल जाते हैं। जो सिद्धियाँ उनकी निज की उपार्जित नहीं होतीं, उन्हें यह सिद्ध पुरुष अपने विभूति भण्डार में से अभीष्ट उद्देश्य पूर्ति के लिए प्रदान करते हैं और वे भी चमत्कारी महापुरुषों की तरह लोकहित के- सामयिक समाधान इस प्रकार करते हैं कि दर्शकों को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यही है हिमालय का वास्तविक स्वरूप जिसे स्पष्टतः अध्यात्म का ध्रुव केन्द्र मानना चाहिए।




द्वितीय हिमालय यात्रा एवं मथुरा के लिए प्रयाण - Akhandjyoti April 1985

प्रथम परीक्षा देने के लिए हिमालय बुलाये जाने के आमन्त्रण को प्रायः दस वर्ष बीत गये। फिर बुलाये जाने की आवश्यकता नहीं समझी गई। उनके दर्शन उसी मुद्रा में होते रहे जैसे कि पहली बार हुए थे। “सब ठीक है’’ इतने ही शब्द कहकर प्रत्यक्ष संपर्क पूरा होता रहा। अन्तरात्मा में उनका समावेश निरन्तर होता रहा। कभी ऐसा अनुभव नहीं हुआ कि हम अकेले हैं। सदा दो साथ रहने जैसी अनुभूति होती रही। इस प्रकार दस वर्ष बीत गए।

स्वतंत्रता संग्राम चल ही रहा था। इसी बीच ऋतु अनुकूल पाकर पुनः आदेश आया हिमालय पहुँचने का। दूसरे ही दिन चलने की तैयारी कर दी। आदेश की उपेक्षा करना, विलम्ब लगाना हमारे लिए सम्भव न था। जाने की जानकारी घर के सदस्यों को देकर प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में चल पड़ने की तैयारी कर दी। सड़क तब भी उत्तरकाशी तक ही बनी थी। आगे के लिए निर्माण कार्य आरम्भ हो रहा था।

रास्ता अपना देखा हुआ था। ऋतु उतनी ठण्डी नहीं थी जितनी कि पिछली बार थी। रास्ते पर आने-जाने वाले मिलते रहे। चट्टियाँ (ठहरने की छोटी धर्मशालाएँ) भी सर्व था खाली नहीं थी। इस बार कोई कठिनाई नहीं हुई। सामान भी अपेक्षाकृत साथ में ज्यादा नहीं था। घर जैसी सुविधा तो कहाँ, किंतु जिन परिस्थितियों में यात्रा करनी पड़ी, वह असह्य नहीं अनभ्यस्त भर थी। क्रम यथावत् चलता रहा।

पिछली बार जो तीन परीक्षाएँ ली गई थीं इस बार इनमें से एक से भी पाला नहीं पड़ा। जो परीक्षा ली जा चुकी है, उसी को बार-बार लेने की आवश्यकता भी नहीं समझी गई। गंगोत्री तक का रास्ता ऐसा था जिसके लिए किसी से पूछताछ नहीं करनी थी। गंगोत्री से गोमुख के 14 मील ही ऐसे हैं जिसका रास्ता बर्फ पिघलने के बाद हर साल बदल जाता है। चट्टानें टूट जाती हैं और इधर से उधर गिर पड़ती हैं। छोटे नाले भी चट्टानों से रास्ता रुक जाने के कारण अपना रास्ता इधर से उधर बदलते रहते हैं। नये वर्ष का रास्ता यों तो उस क्षेत्र से परिचित किसी जानकार को लेकर पूरा करना पड़ता था या फिर अपनी विशेष बुद्धि का सहारा लेकर अनुमान के आधार बढ़ते और रुकावट आ जाने पर लौट कर दूसरा रास्ता खोजने का क्रम चलता रहा। इस प्रकार गोमुख जा पहुँचे।

आगे के लिए गुरुदेव का संदेश वाहक साथ जाना था। वह भी सूक्ष्म शरीरधारी था। छाया पुरुष यों वीरभद्र स्तर का था। समय-समय पर वे उसी से अनेकों काम लिया करते थे। जितनी बार हमें हिमालय जाना पड़ा तब गोमुख से नन्दन बन एवं और ऊँचाई तक तथा वापस गोमुख पहुँचाने का काम उसी के जिम्मे था। सो उस सहायक की सहायता से हम अपेक्षाकृत कम समय में और अधिक सरलता पूर्वक पहुँच गए। रास्ते भर दोनों ही मौन रहे।

नन्दन वन पहुँचते ही गुरुदेव का सूक्ष्म शरीर- प्रत्यक्ष रूप में सामने विद्यमान था। उनके प्रकट होते ही हमारी भावनाएँ उमड़ पड़ीं। आँखें बरस पड़ीं। होंठ काँपते रहे। नाक गीली होती रही। ऐसा लगता रहा मानों अपने ही शरीर का कोई खोया अंग फिर मिल गया हो और उसके अभाव में जो अपूर्णता रहती हो सो पूर्ण हो गई हो। उनका सिर पर हाथ रख देना हमारे प्रति अगाध प्रेम के प्रकटीकरण का प्रतीक था। अभिवादन आशीर्वाद का शिष्टाचार इतने से ही पूर्ण हो गया। गुरुदेव ने हमें संकेत किया, ऋषि सत्ता से पुनः मार्गदर्शन लिये जाने के विषय में। हृदय में रोमाँच हो उठा।

हिमालय के जिस क्षेत्र का विवरण पूर्ण में हमने धरती का स्वर्ग बताते हुए किया है। सतयुग के प्रायः सभी ऋषि सूक्ष्म शरीरों से उसी क्षेत्र में निवास करते आए हैं। स्थान नियत करने की दृष्टि से सभी ने अपने-अपने लिए एक-एक गुफा निर्धारित कर ली है। वैसे शरीर चर्चा के लिए उन्हें स्थान नियत करने या साधन सामग्री जुटाने की कोई आवश्यकता नहीं है। तो भी अपने-अपने निर्धारित क्रिया-कलाप पूरे करने तथा आवश्यकतानुसार परंपरा मिलते-जुलते रहने के लिए सभी ने एक-एक स्थान नियत कर लिए हैं।

पहली यात्रा में हम उन्हें प्रणाम भर कर पाए थे। अब दूसरी यात्रा में गुरुदेव हमें एक-एक करके उनसे अलग-अलग भेंट कराने ले गये। पहले केवल परोक्ष रूप में आशीर्वाद मिला था, जब उनका सन्देश सुनने की बारी थी। दिखने को वे इनके से प्रकाश पुंज की तरह दिखते थे। पर जब अपना सूक्ष्म शरीर सही हो गया तो उन ऋषियों का सतयुग वाला शरीर भी यथावत दीखने लगा। ऋषियों के शरीर के जैसी संसारी लोग कल्पना किया करते हैं वे लगभग वैसे ही थे। शिष्टाचार पाया गया। उनके चरणों पर अपना मस्तक रख दिया। उन्होंने हाथ का स्पर्श जैसा सिर पर रखा और उतने भर से ही रोमाँच हो उठा। आनन्द और उल्लास की उमंगें फूटने लगीं।

बात काम की चली। हर एक ने परा वाणी में कहा कि हम स्थूल शरीर से जो गतिविधियाँ चलाते थे, वे अब पूरी तरह समाप्त हो गई हैं। फूटे हुए खण्डहरों के अवशेष जिस प्रकार पड़े होते हैं उसी तरह के वे स्थान पड़े हुए हैं। जब हम लोग दिव्य दृष्टि से उन क्षेत्रों की वर्तमान स्थिति देखते हैं, जब बड़ा कष्ट होता है। गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक का पूरा क्षेत्र ऋषि क्षेत्र था। उस एकान्त में मात्र तपश्चर्या की विधा ही पूरी होती थी।

उत्तरकाशी में जैसा जमदग्नि का गुरुकुल आरण्यक था जहाँ-तहाँ वैसे अनेकों ऋषि आश्रम संव्याप्त थे। शेष ऋषि अपने-अपने हिस्से की शोध तपश्चर्याएं करने में संलग्न रहते थे। देवताओं के स्थान यहाँ थे, जहाँ आज कल हम लोग अब रहते हैं। हिमयुग के उपरान्त न केवल स्थान ही बदल गये वरन् गतिविधियाँ बदलीं तो क्या, पूरी तरह से समाप्त ही हो गईं, उनके चिन्ह भर शेष रह गए हैं।

उत्तराखण्ड में जहाँ-तहाँ देवी देवताओं के मन्दिर तो बन गये हैं ताकि उन पर धनराशि चढ़ती रहे और पुजारियों का गुजारा होता चले। पर इस बात को न कोई पूछने वाला है न बताने वाला कि ऋषि कौन थे? कहाँ थे? क्या करते थे? उसका कोई चिन्ह भी अब बाकी नहीं रहा। हम लोगों की दृष्टि में ऋषि परम्परा की तो अब एक प्रकार से प्रलय ही हो गई।

लगभग यही बात उन बीसों ऋषियों की ओर से कही गई जिनसे हमारी भेंट कराई गई। दिखाई देते समय उन सभी की आंखें डबडबाई सी दिखीं। लगा कि सभी व्यक्ति हैं। सभी का मन उदास और भारी है। पर हम क्या कहते? इतने ऋषि मिलकर जितना भार उठाते थे, उसे उठाने की अपनी सामर्थ्य भी तो नहीं है। उन सबका मन भारी देखकर अपना चित्त भी द्रवित हो गया। सोचते रहे। भगवान ने किसी लायक हमें बनाया होता तो इन देव पुरुषों को इतना व्यथित देखते हुए चुप्पी साधकर ऐसे ही वापस न लौट जाते। स्तब्धता अपने ऊपर भी छा गई और आंखें डबडबाने लगीं, प्रवाहित होने लगी। इतने समर्थ ऋषि, इतने असहाय, इतने दुःखी, वह उनकी वेदना हमें विष्णु के डंक की तरह पीड़ा देने लगी।

गुरुदेव की आत्मा और हमारी आत्मा साथ-साथ चल रही थी। दोनों एक दूसरे को देख रहे थे। साथ में उनके चेहरे पर भी उदासी छाई हुई थी। हे भगवान, कैसा विषम समय आया कि किसी ऋषि का कोई उत्तराधिकारी नहीं उपजा। सबका वंशनाश हो गया। ऋषि प्रवृत्तियों में से एक भी सजीव नहीं दीखती। करोड़ों की संख्या में ब्राह्मण हैं और लाखों की संख्या में सन्त। पर उनमें से दस बीस भी जीवित रहे होते तो गाँधी और बुद्ध की तरह गज़ब दिखाकर रख देते। पर अब क्या हो? कौन करे? किस बलबूते पर करे?

राजकुमारी की आँखों से आँसू टपकने पर और इतना कहने पर कि “को वेदान् उद्धरस्मति?” अर्थात्- वेदों का उद्धार कौन करेगा?” इसके उत्तर में कुमारिल भट्ट ने कहा था कि- ‘‘अभी यह कुमारिल भूतल पर है। इस प्रकार विलाप न करो।” तब एक कुमारिल भट्ट जीवित था। उसने जो कहा था, सो कर दिखाया। पर आज तो कोई कहीं न ब्राह्मण है, न सन्त। ऋषियों की बात तो बहुत आगे की है। आज तो छद्म धारी ही चित्र-विचित्र रूप बनाये रंगे सियारों की तरह पूरे वन प्रदेश में हुंआ-हुंआ- करते फिर रहे हैं।

दूसरे दिन लौटने पर हमारे मन में इस प्रकार के विचार दिन भर उठते रहे। जिस गुफा में निवास था, दिन भर यही चिन्तन चलता रहा। लेकिन गुरुदेव उन्हें पूरी तरह पढ़ रहे थे। मेरी कसक उन्हें भी दुःख दे रही थी।

उनने कहा- “फिर ऐसा करो! अबकी बार उन सबसे मिलने फिर से चलते हैं। कहना- आप लोग कहें तो उसका बीजारोपण तो मैं कर सकता हूँ। खाद पानी आप देंगे तो फसल उग पड़ेगी। अन्यथा प्रयास करने से अपना मन तो हलका होगा ही।”

“साथ में यह भी पूछना कि शुभारम्भ किस प्रकार किया जाय, इसकी रूपरेखा बतावें। मैं कुछ न कुछ अवश्य करूंगा। आप लोगों का अनुग्रह बरसेगा तो इस सूखे श्मशान में हरीतिमा उगेगी।”

गुरुदेव के आदेश पर तो मैं कह भी सकता था कि “जलती आग में जल मरूंगा। जो होना होगा, सो होता रहेगा। प्रतिज्ञा करने और उसे निभाने में प्राण की साक्षी देकर प्रण तो किया ही जा सकता है” यह विचार मन में उठ रहे थे। गुरुदेव उन्हें पड़ रहे थे। अबकी बार मैंने देखा कि उनका चेहरा ब्रह्म कमल जैसा खिल गया।

दोनों स्तब्ध थे और प्रसन्न भी। पीछे लौट चलने और उन सभी ऋषियों से दुबारा मिलने का निश्चय हुआ जिसने कि अभी-अभी विगत रात्रि ही मिलकर आये थे। दुबारा हम लोगों को वापस आया हुआ देखकर उनमें से प्रत्येक बारी-बारी प्रसन्न होता गया और आश्चर्यान्वित भी।

मैं तो हाथ जोड़े शिर नबाये मन्त्र-मुग्ध की तरह खड़ा रहा। गुरुदेव ने मेरी कामना, इच्छा और उमंग उन्हें परोक्षतः परावाणी में कह सुनाई। और कहा- “यह निर्जीव नहीं है। जो कहता है उसे करेगा भी। आप यह बताइए कि आपका जो कार्य छूटा हुआ है, उसका नये सिरे से बीजारोपण किस तरह हो। खाद पानी आप हम लोग लगाते रहेंगे तो इसका उठाया हुआ कदम खाली नहीं जायेगा।

इसके बाद उनने गायत्री पुरश्चरण की पूर्ति पर मथुरा में होने वाले सहस्त्रकुण्डी पूर्णाहुति यज्ञ में इसी छाया रूप में पधारने का आमन्त्रण दिया और कहा यह बन्दर तो है, पर है हनुमान। यह रीछ तो है, पर है जामवंत। यह गिद्ध तो है पर है जटायु। आप इसे निर्देश दीजिए और आशा कीजिए कि जो छूट गया है, जो टूट गया है, वह फिर से विनिर्मित होगा और अंकुर वृक्ष बनेगा। हम लोग निराश क्यों हों? इससे आशा क्यों न बाँधें, जब कि यह गत तीन जन्मों में दिये गए दायित्वों को निष्ठापूर्वक निभाता रहा है?

चर्चा एक से चल रही थी पर निमन्त्रण पहुँचते एक क्षण लगा और वे सभी एक-एक करके एकत्रित हो गये। निराशा गई, आशा बँधी और आगे का कार्यक्रम बना कि जो हम सब करते रहे हैं, उसका बीज एक खेत मैं बोया जाय और पौधशाला में एक पौध तैयार की जाय। उसके पौधे सर्वत्र लगेंगे और उद्यान लहलहाने लगेगा।

यह शांतिकुँज बनाने की योजना थी, जो हमें मथुरा के निर्धारित निवास के बाद पूरी करनी थी। गायत्री नगर बसने और ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान का ढ़ांचा खड़ा किये जाने की योजना भी विस्तार से समझाई गयी। पूरे ध्यान से उसका एक-एक अक्षर हृदय पटल पर लिख लिया और निश्चय किया कि 24 लक्ष्य का पुरश्चरण पूरा होते ही इस कार्यक्रम की रूपरेखा बनेगी और चलेगी। निश्चय ही, अवश्य ही और जिसे गुरुदेव का संरक्षण प्राप्त हो, वह असफल रहे ऐसा हो ही नहीं सकता।

एक दिन और रुका। उसमें गुरुदेव ने पुरश्चरण की पूर्णाहुति का स्वयं विस्तार से समझाया एवं कहा कि “पिछले वर्षों की स्थिति और घटनाक्रम को हम बारीकी से देखते रहे हैं और उसमें जहाँ कुछ अनुपयुक्त जँचा है, उसे ठीक करते रहे हैं। अब आगे क्या करना है उसी का स्वरूप समझाने के लिए इस बार बुलाया गया है। पुरश्चरण पूरा होने में अब बहुत समय नहीं रहा है। जो रहा है उसे मथुरा जाकर पुरा करना चाहिए। अब तुम्हारे जीवन का दूसरा चरण मथुरा से आरम्भ होगा।

प्रयाग के बाद मथुरा ही देश का मध्य केन्द्र है। आवागमन की दृष्टि से वही सुविधाजनक भी है। स्वराज्य हो जाने के बाद तुम्हारा राजनैतिक उत्तरदायित्व तो पूरा हो जायेगा, पर यह कार्य अभी पूरा नहीं होगा। राजनैतिक क्रान्ति तो होगी, आर्थिक क्रान्ति तथा उससे सम्बन्धित कार्य भी सरकार करेगी। किन्तु इसके बाद तीन क्रान्तियाँ और शेष हैं- जिन्हें धर्म तन्त्र के माध्यम से ही पूरा किया जाना है। उनके बिना पूर्णता न हो सकेगी। देश इसलिए पराधीन या जर्जर नहीं हुआ था कि यहाँ शूरवीर नहीं थे। आक्रमणकारियों को परास्त नहीं कर सकते थे। भीतरी दुर्बलताओं ने पतन पराभव के गर्त में धकेला। दूसरों ने तो उस दुर्बलता का लाभ भर उठाया।

नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति सम्पन्न की जानी है। इसके लिए उपयुक्त व्यक्तियों को संग्रह करना और जो करना है उससे सम्बन्धित विचारों को व्यक्त करना अभी से आवश्यक है। इसलिए तुम अपने घर-गाँव छोड़कर मथुरा जाने की तैयारी करो। वहां एक छोटा घर लेकर एक मासिक पत्रिका आरम्भ करो। साथ ही तीनों क्रान्तियों के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी देने का प्रकाशन भी। अभी तुम से इतना ही काम बन पड़ेगा। थोड़े ही दिन उपरान्त तुम्हें दुर्वासा ऋषि की तपःस्थली में मथुरा के समीप एक भव्य गायत्री मन्दिर बनाना है। सह कर्मियों के आवागमन, निवास, ठहरने आदि के लिए। इसके उपरान्त 24 महापुरश्चरण के पूरे हो जाने की पूर्णाहुति स्वरूप एक महायज्ञ करना है। अनुष्ठानों की परम्परा जप के साथ यज्ञ करने की है। तुम्हारे 24 लक्ष्य के 24 अनुष्ठान पूरे होने जा रहे हैं। इसके लिए एक सहस्र कुण्डों की यज्ञशाला में- एक हजार मन्त्रिकों द्वार 24 लाख आहुतियों का यज्ञ आयोजन किया जाना है। उसी अवसर पर ऐसा विशालकाय संगठन खड़ा हो जायेगा। जिसके द्वारा तत्काल धर्मतन्त्र से जन जागृति का कार्य प्रारम्भ किया जा सके। यह अनुष्ठान की पूर्ति का प्रथम चरण है। लगभग 25 वर्षों में इस दायित्व ही पूर्ति के उपरान्त तुम्हें सप्त सरोवर हरिद्वार जाना है। वहाँ रहकर वह कार्य पूरा करना है जिसके एक ऋषियों की विस्मृत परम्पराओं के पुनर्जागृत करने हेतु तुमने स्वीकृति सूचक सम्मति दी थी।”

‘मथुरा की कार्य शैली आदि से अन्त तक किस प्रकार सम्पन्न की जानी है, इसकी एक सुविस्तृत रूप रेखा उन्होंने आदि से अन्त तक समझायी। इसी बीच आर्ष साहित्य के अनुवाद, प्रकाशन, प्रचार की तथा गायत्री परिवार के संगठन और उसके सदस्यों को काम सौंपने की रूप रेखा उन्होंने बता दी।

जो आदेश हो रहा है, उसमें किसी प्रकार की त्रुटि नहीं रहने दी जायेगी। यह मैंने प्रथम मिलन की तरह उन्हें आश्वासन दे दिया। पर एक ही सन्देह रहा कि इतने विशालकाय कार्य के लिए जो धन शक्ति और जन शक्ति की आवश्यकता पड़ेगी, उसकी पूर्ति कहाँ से होगी?

मन को पढ़ रहें गुरुदेव हँस पड़े। ‘इन साधनों के लिए चिन्ता की आवश्यकता नहीं है। जो तुम्हारे पास है, उसे बोना आरम्भ करो। इसकी फसल सौ गुनी होकर पक जायेगी और जो काम सौंपे गये हैं, उन सभी के पूरा हो जाने का सुयोग बन जायेगा। क्या हमारे पास है, उसे कैसे, कहाँ- बोया जाना है और उसकी फसल कब, किस प्रकार पकेगी, यह जानकारी भी उनने दे दी।

जो उन्होंने कहा- उसकी हर बात गाँठ बाँध ली। भूलने का तो प्रश्न ही नहीं था। भूला तब जाता है, जब उपेक्षा होती है। सेनापति का आदेश सैनिक कहाँ भूलता है? हमारे लिए भी अवज्ञा एवं उपेक्षा करने का कोई प्रश्न नहीं था।

वार्ता समाप्त हो गई। इस बार छः महीने ही हिमालय रुकने का आदेश हुआ। जहाँ रुकना था, वहाँ की सारी व्यवस्था बना दी गयी थी।

गुरुदेव के वीरभद्र ने हमें गोमुख पहुँचा दिया। वहाँ से हम निर्देशित स्थान पर जा पहुँचे और छः महीने पूरे का लिए। लौटकर घर आये थे तो स्वास्थ्य पहले से भी अच्छा था। प्रसन्नता और गम्भीरता बढ़ गई थी, जो प्रतिभा के रूप में चेहरे के इर्द-गिर्द छाई हुई थी। लौटने पर जिनने भी देखा, उन सभी ने कहा- “लगता है, हिमालय में कहीं बड़ी सुख सुविधा का स्थान है। तुम वहीं जाते हो और स्वास्थ्य संवर्धन करके लौटते हो।” हमने हँसने के अतिरिक्त और कोई भी उत्तर नहीं दिया।

अब मथुरा जाने की तैयारी थी। एक बार दर्शन की दृष्टि से मथुरा देखा तो था पर वहाँ किसी से परिचय न था। चलकर पहुँच गया और “अखण्ड ज्योति” प्रकाशन के लायक एक छोटा मकान किराये पर लेने का निश्चय किया।

मकानों की उन दिनों भी किल्लत थी। बहुत ढूंढ़ने के बाद भी आवश्यकता के अनुरूप मिल नहीं रहा था। ढूंढ़ते-ढूंढ़ते घीया मण्डी जा निकले। एक मकान खाली मिला। बहुत दिन से खाली पड़ा था। मालकिन एक बुढ़िया थी। किराया पूछा तो उसने पन्द्रह रुपया बताया और चाबी हाथ में थमा दी। भीतर घुसकर देखा तो उसमें छोटे बड़े कुल पन्द्रह कमरे थे। था तो जीर्ण-शीर्ण, पर एक रुपया कमरे के हिसाब से वह महँगा किसी दृष्टि से न था। हमारे लिए काम चलाऊ भी था। पसन्द आ गया और एक महीने का किराया पेशगी पन्द्रह रुपया हाथ पर रख दिये। बुढ़िया बहुत प्रसन्न थी।

घर जाकर सभी सामान ले आये और पत्नी बच्चों समेत उसमें रहने लगे। सारे मुहल्ले में काना-फूसी होते सुनी। मानों हमारा वहाँ आना कोई आश्चर्य का विषय हो। पूछा तो लोगों ने बताया कि- “यह भुतहा मकान है। इसमें जो भी आया, जान गंवाकर गया। कोई टिका नहीं। हमने तो कितनों को ही आते और धन जन की भारी हानि उठाकर भागते हुए देखा। आप बाहर के नये आदमी हैं इसलिए धोखे में आ गए। अब बात आपके कान में डाल दी। यदि ऐसा न होता तो तीन मंजिला 15 कमरों का मकान वर्षों से क्या खाली पड़ा रहता। आप समझ-बूझकर भी उसमें रह रहे हैं। नुकसान उठाएंगे।”

इतना सस्ता और इतना उपयोगी मकान अन्यत्र मिल नहीं रहा था। हमने तो उसी में रहने का निश्चय किया। भुतहा होने की बात सच थी। रात भर छत के ऊपर धमा चौकड़ी मचती रहती। ठठाने की, रोने की, लड़ने की, आवाजें आतीं। उस मकान में बिजली तो थी नहीं। लालटेन जलाकर ऊपर गये तो कुछ स्त्री पुरुष आकृतियाँ आगे कुछ पीछे भागते दिखे। पर साक्षात भेंट नहीं हुई। न उन्होंने हमें कोई नुकसान ही पहुँचाया। ऐसा घटना क्रम कोई दस दिन तक लगातार चलता रहा।

एक दिन हम रात को 1 बजे के करीब ऊपर गये। लालटेन हाथ में थी। भागने वालो से रुकने के लिए कहा। वे रुक गये। हमने कहा- “आप बहुत दिन से इस घर में रहते आए हैं। ऐसा करें कि ऊपर की मंजिल के सात कमरों में आप लोग गुजारा करें। नीचे के आठ कमरों में हमारा काम चल जायेगा। इस प्रकार हम सब राजी नामा करके रहें। न आप लोग परेशान हों और न हमें हैरान होना पड़े।” किसी ने उत्तर नहीं दिया। खड़े जरूर रहें। दूसरे दिन से पूरा घटनाक्रम बदल गया। हमने अपनी ओर से समझौते का पालन किया और वे सभी उस बात पर सहमत हो गये। छत पर कभी-कभी चलने फिरने जैसी आवाजें तो सुनी गईं, पर ऐसा उपद्रव न हुआ जिससे हमारी नींद हराम होती, बच्चे डरते या काम में विघ्न पड़ता। घर में जो टूट-फूट थी, अपने पैसों से संभलवा ली। “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका पुनः इसी घर से प्रकाशित होने लगी। परिजनों से पत्र व्यवहार यहीं आरम्भ किया। पहले वर्ष में ही दो हजार के करीब ग्राहक बन गये। ग्राहकों से पत्र व्यवहार करते और वार्तालाप के लिए बुलाते रहे। अध्ययन का क्रम तो रास्ता चलने के समय में चलता रहा। रोज टहलने जाते थे उसी समय में दो घण्टा नियत पढ़ लेते। अनुष्ठान भी अपनी छोटी सी पूजा की कोठरी में चलता रहता। काँग्रेस के काम के स्थान पर लेखन कार्य को अब गति दे दी। अखण्ड-ज्योति पत्रिका, आर्ष साहित्य का अनुवाद, धर्म तन्त्र से लोक शिक्षण की रूपरेखा, इन्हीं विषयों पर लेखनी चल पड़ी। पत्रिका अपनी ही हैण्डप्रेस से छापते, शेष साहित्य दूसरी प्रेसों से छपा लेते। इस प्रकार ढर्रा तो चला। पर वह चिन्ता बराबर बनी रही कि अगले दिनों मथुरा में रहकर जो प्रकाशन का बड़ा काम करना है, प्रेस लगाना है, गायत्री तपोभूमि का भव्य भवन बनाना है, यज्ञ इतने विशाल रूप में करना है, जितना महाभारत के उपरांत दूसरा नहीं हुआ, इन सब के लिए धन शक्ति और जन शक्ति कैसे जुटे? उसके लिए गुरुदेव का वही सन्देश आंखों के सामने आ खड़ा होता था कि “बोओ और काटो”। उसे अब समाज रूपी खेत में कार्यान्वित करना था। सच्चे अर्थों में अपरिग्रही ब्राह्मण बनना था। इसी कार्यक्रम की रूपरेखा मस्तिष्क में घूमने लगीं।




मथुरा के कुछ रहस्यमय प्रसंग - Akhandjyoti April 1985

मथुरा में रहकर जिन गतिविधियों को चलाने के लिए हिमालय से आदेश हुआ था, उन्हें अपनी जानकारी की क्षमता द्वारा कर सकना कठिन था। न साधन, न साथी, न अनुभव न कौशल। फिर इतने विशाल काम किस प्रकार जन पड़े? हिम्मत टूटती सी देखकर मार्गदर्शक ने परोक्षतः लगाम हाथ में सम्भाली। हमारे शरीर भर का उपयोग हुआ। बाकी सब काम कठपुतली नचाने वाला बाजीगर स्वयं कराता रहा। लकड़ी के टुकड़े का श्रेय इतना ही है कि उसने तार मजबूती से जकड़ कर रखे और जिस प्रकार नाचने का संकेत हुआ- वैसा करने से इन्कार नहीं किया।

चार घंटे नित्य लिखने के लिए निर्धारित किया। लगता रहा कि व्यास और गणेश का उदाहरण चल पड़ा। पुराण लेखन में व्यास बोलते गये थे और गणेश लिखते गये थे। ठीक वही यहाँ हुआ। आर्ष ग्रंथों का अनुवाद कार्य अति कठिन है। चारों वेद, 108 उपनिषदें, छहों दर्शन, चौबीसों स्मृतियाँ, आदि आदि सभी ग्रंथों में हमारी कलम और उँगलियों का उपयोग हुआ। बोलती लिखाती कोई और अदृश्य शक्ति रही। अन्यथा इतना कठिन काम इतनी जल्दी बन पड़ना सम्भव न था। फिर धर्म तन्त्र से लोक शिक्षण का प्रयोजन पूरा करने वाली सैंकड़ों की संख्या में लिखी गई पुस्तकें मात्र एक व्यक्ति ने बलबूते किस प्रकार होती रह सकती थी। यह लेखन कार्य जिस दिन से आरम्भ हुआ, उस दिन से लेकर अब तक बन्द ही नहीं हुआ। वह बढ़ते-बढ़ते इतना हो गया जितना हमारे शरीर का वजन है।

प्रकाशन के लिए प्रेस की जरूरत हुई। अपने बलबूते एक हैण्डप्रेस का जुगाड़ किसी तरह जुटाया गया। जिसे काम कराना था, वह इतनी सी बाल क्रीड़ा को देखकर हँस पड़ा। प्रेस का विकास हुआ। ट्रेडिलें, सिलेण्डरे, ओटोमैटिक, आफसैटें एक के बाद आती चली गईं। उन सबकी कीमतें व प्रकाशित साहित्य की लागत लाखों को पार कर गईं।

“अखण्ड-ज्योति” पत्रिका के अपने पुरुषार्थ से दो हजार तक ग्राहक बनने पर बात समाप्त हो गई थी। फिर मार्गदर्शक ने धक्का लगाया तो अब वह बढ़ते-बढ़ते डेढ़ लाख के करीब छपती है जो कि एक कीर्तिमान है। उसके और भी दस गुने बढ़ने की ही सम्भावना है। युग निर्माण योजना हिन्दी, युग शक्ति गायत्री गुजराती, युग शक्ति उड़िया आदि यह सब मिलकर भी डेढ़ लाख के करीब हो जाती हैं। एक व्यक्ति द्वारा रचित इतनी उच्चकोटि की, इतनी अधिक संख्या में बिना किसी का विज्ञापन स्वीकार किये, इतनी संख्या में पत्रिका छपती है और घाटा जेब में से न देना पड़ता हो, यह एक कीर्तिमान है, जैसा अपने देश में अन्यत्र उदाहरण नहीं ढूंढ़ा जा सकता।

गायत्री परिवार का संगठन करने निमित्त- महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के बहाने जो हजार कुण्डीय यज्ञ मथुरा में हुआ था, उसके सम्बन्ध में यह कथन अत्युक्ति पूर्ण नहीं है कि इतना बड़ा आयोजन महाभारत के उपरांत आज तक नहीं हुआ। इसका प्रत्यक्ष विवरण परिजन फरवरी 85 अंक में पढ़ चुके हैं।

उसकी कुछ रहस्यमयी विशेषताएँ ऐसी थीं, जिनके सम्बन्ध से सही बात कदाचित ही किसी को मालूम हो। एक लाख नैष्ठिक गायत्री उपासक देश के कोने-कोने में से आमन्त्रित किये गये। वे सभी ऐसे थे जिनने धर्म तन्त्र में लोक शिक्षण का काम हाथोंहाथ सम्भाल लिया और इतना बड़ा गायत्री परिवार बन कर खड़ा हो गया जितने कि भारत के समस्त धार्मिक संगठन मिलकर भी पूरे नहीं होते। इन व्यक्तियों से हमारा पूर्व परिचय बिल्कुल न था। पर उन सबके पास निमन्त्रण पत्र पहुँचे और वे अपना मार्ग व्यय खर्च करके भागते चले आये। यह एक पहेली है जिसका समाधान ढूंढ़ पाना कठिन है।

दर्शकों की संख्या मिलाकर दस लाख तक प्रतिदिन पहुँचती रही। इन्हें सात मील के घेरे में ठहराया गया था। किसी को भूखा नहीं जाने दिया। किसी से भोजन का मूल्य नहीं माँगा गया। अपने पास खाद्य सामग्री मुट्ठी भर थी। इतनी, जो एक बार में बीस हजार के लिए भी पर्याप्त न होती। पर भण्डार अक्षय हो गया। पाँच दिन के आयोजन में प्रायः 5 लाख से अधिक खा गये। पीछे खाद्य सामग्री बच गई जो उपयुक्त व्यक्तियों को बिना मूल्य बाँटी गई।

व्यवस्था ऐसी अद्भुत रही, जैसी हजार कर्मचारी नौकर रखने पर भी नहीं कर सकते थे।

यह रहस्यमयी बातें हैं। आयोजन का प्रत्यक्ष विवरण तो हम दे चुके हैं। पर जो रहस्य था सो अपने तक ही सीमित रहा है। कोई यह अनुमान न लगा सका कि इतनी व्यवस्था, इतनी सामग्री कहाँ से जुट सकी। यह सब अदृश्य सत्ता का खेल था। उसमें सूक्ष्म शरीर से वे ऋषि भी उपस्थित हुए थे, जिनके दर्शन हमने प्रथम हिमालय यात्रा में किये थे। सभी सूक्ष्म एवं कारण शरीरधारी थे। इन सब कार्यों के पीछे जो शक्ति काम कर रही थी उसके सम्बन्ध में कोई तथ्य किसी को विदित नहीं। लोग इसे हमारी करामात कहते रहे, किन्तु भगवान साक्षी है कि हम जड़ भरत की तरह, मात्र दर्शक की तरह यह सारा खेल देखते रहे। जो शक्ति व्यवस्था बना रही थी उसके सम्बन्ध में कदाचित ही किसी को कुछ आभास हुआ हो।

तीसरा काम जो हमें मथुरा में करना था, वह था- गायत्री तपोभूमि का निर्माण। इतने बड़े संगठन के लिए इतने बड़े कार्यक्रम के लिए छोटी इमारत से काम नहीं चल सकता था। वह बनना आरम्भ हुई। निर्माण कार्य आरम्भ हुआ और हमारे आने के बाद भी अब तक बराबर चलता ही रहा है। प्रज्ञा नगर के रूप में विकसित विस्तृत हो गया है। जो मथुरा गये हैं, गायत्री तपोभूमि की इमारत और उसका प्रेस, अतिथि व्यवस्था देखकर आये हैं वे आश्चर्यचकित होकर रहे हैं। इतना सामान्य दीखने वाला आदमी किस प्रकार इतनी भव्य इमारत की व्यवस्था कर सकता है। इस रहस्य को जिन्हें जानना हो, उन्हें हमारी पीठ पर काम करने वाली शक्ति को ही इसका श्रेय देना होगा, व्यक्ति को नहीं। अर्जुन का रथ भगवान सारथी बनकर चला रहे थे। उन्हीं ने जिताया था। पर जीत का श्रेय अर्जुन को मिला और राज्याधिकारी पाण्डव बने। इसे कोई चाहे तो पाण्डवों का पुरुषार्थ- पराक्रम कह सकता है पर वस्तुतः बात वैसी थी नहीं। यदि होती तो द्रौपदी का चीर उनकी आँखों के सामने कैसे खींचा जाता। वनवास काल में जहाँ-तहाँ छिपे रहकर जिस-तिस की नगण्य-सी नौकरियाँ क्यों करते फिरते?

हमारी क्षमता नगण्य है, पर मथुरा जितने दिन रहे, वहाँ रहकर इतने सारे प्रकट और अप्रकट काम जो हम करते रहे, उसकी कथा आश्चर्यजनक है। उसका कोई लेखा-जोखा लेना चाहे तो तथ्यों को ध्यान में रखें और हमें नाचने वाली लकड़ी के टुकड़े से बनी कठपुतली के अतिरिक्त और कुछ न माने।




मथुरा का विचार क्राँति अभियान एवं प्रयाण की तैयारी - Akhandjyoti April 1985

मथुरा से ही उस विचार क्रान्ति अभियान ने जन्म लिया जिसके माध्यम से आज करोड़ों व्यक्तियों के मन मस्तिष्कों को उलटने का संकल्प पूरा कर दिखाने का हमारा दावा आज सत्य होता दिखाई देता है। सहस्र कुण्डीय यज्ञ तो पूर्व जन्म से जुड़े उन परिजनों के समागम का एक माध्यम था, जिन्हें भावी जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी। इस यज्ञ में एक लाख से भी अधिक लोगों ने समाज से, परिवार से एवं अपने अन्दर से बुराइयों को निकाल फेंकने की प्रतिज्ञाएं लीं। यह यज्ञ नरमेध यज्ञ था। इसमें हमने समाज के लिये समर्पित लोकसेवियों की माँग कीं एवं समयानुसार हमें ये सभी सहायक उपलब्ध होते चले गये। यह सारा खेल उस अदृश्य बाजीगर द्वारा सम्पन्न होता ही हम मानते आये हैं, जिसने हमें माध्यम बनाकर समय परिवर्तन का ढाँचा खड़ा कर दिखाया।

मथुरा में ही नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति के लिए गाँव-गाँव आलोक वितरण करने एवं घर-घर अलख जगाने लिये सर्वत्र गायत्री यज्ञ समेत युग निर्माण सम्मेलन के आयोजनों की एक व्यापक योजना बनाई गई। मथुरा के सहस्र कुण्डी यज्ञ के अवसर पर जो प्राणवान व्यक्ति आए थे उन्होंने अपने यहाँ एक शाखा संगठन खड़ा करने और एक ऐसा ही यज्ञ आयोजन करने का दायित्व अपने कन्धों पर लिया या ये कहें कि उस दिव्य वातावरण में अन्तःप्रेरणा ने उन्हें वह दायित्व सौंपा ताकि हर व्यक्ति न्यूनतम एह हजार विचारशील व्यक्तियों को अपने समीपवर्ती क्षेत्रों में से ढूंढ़कर अपना सहयोगी बनाए। आयोजन चार-चार दिन के रखे गए। इनमें तीन दिन तीन क्रान्तियों की विस्तृत रूप रेखा और कार्य-पद्धति समझाने वाले संगीत और प्रवचन रखे गए। अन्तिम चौथे दिन यज्ञाग्नि के सम्मुख उन लोगों से व्रत धारण करने को कहा गया जो अवाँछनीयताओं को छोड़ने और उचित परम्पराओं को अपनाने के लिए तैयार थे।

ऐसे आयोजन जहाँ तहाँ भी हुए, बहुत ही सफल रहे इनके माध्यम से प्रायः एक करोड़ व्यक्तियों में मिशन की विचारधारा को सुना एवं लाखों व्यक्ति ऐसे थे जिनने अनैतिकताओं अन्धविश्वासों एवं कुरीतियों के परित्याग की प्रतिज्ञाएँ लीं। इन आयोजनों में से अधिकाँश के बिना दहेज और धूमधाम के साथ विवाह हुए। मथुरा में एक और सौ कुंडी यज्ञ में 100 आदर्श विवाह सम्पन्न कराए गये। तब से ये प्रचलन बराबर चलते आ रहे हैं और हर वर्ष इस प्रचार आन्दोलन से अनेकों व्यक्ति लाभ उठाते रहे हैं।

सहस्र कुण्डीय यज्ञ से सम्बन्धित महत्वपूर्ण प्रसंगों की चर्चा हम अखण्ड-ज्योति के फरवरी अंक में कर चुके हैं। उससे जुड़े अनेकानेक रहस्यमय घटनाक्रमों का विवरण बताना अभी जनहित में उपयुक्त न होगा। इस काया को छोड़ने के बाद ही वह रहस्योद्घाटन हो, ऐसा प्रतिबन्ध हमारे मार्गदर्शक का है, सो हमने उसे दबी कलम से ही लिखा है। इस महान यज्ञ से हमें प्रत्यक्ष रूप से काफी कुछ मिला। एक बहुत बड़ा संगठन रातों रात गायत्री परिवार के रूप में खड़ा हो गया। युग निर्माण योजना के विचार क्रान्ति अभियान एवं धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण के रूप में उसकी भावी भूमिका भी बन गयी। उन दिनों जिन-जिन स्थानों से आए व्यक्तियों ने अपने यहाँ शाखा स्थापित करने के संकल्प लिए, लगभग वहीं दो दशक बाद हमारे प्रज्ञा संस्थान एवं स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित हुए। जिन स्थायी कार्य कर्ताओं ने हमारे मथुरा से आने के बाद प्रेस प्रकाशन, संगठन-प्रचार का दायित्व अपने कन्धों पर लिया, वे इसी महायज्ञ से उभर कर आये थे। सम्प्रति शाँतिकुँज में स्थायी रूप से कार्यरत बहुसंख्य स्वयं सेवकों की पृष्ठ भूमि में इस महायज्ञ अथवा इसके बाद देश भर में हुए आयोजनों की प्रमुख भूमिका रही है।

इससे हमारी स्वयं की संगठन सामर्थ्य विकसित हुई। हमने गायत्री तपोभूमि के सीमित परिकर में ही एक सप्ताह, नौ दिन एवं एक-एक महा के कई शिविर आयोजित किए। आत्मोन्नति के लिये पंचकोशी साधना शिविर, स्वास्थ्य संवर्धन हेतु कायाकल्प सत्र एवं संगठन विस्तार हेतु परामर्श एवं जीवन साधना सत्र उन कुछ प्रमुख आयोजनों में से हैं, जो हमने सहस्र एवं शतकुण्डी यज्ञ के बाद मथुरा में मार्गदर्शक के निर्देशानुसार सम्पन्न किए। गायत्री तपोभूमि में आने वाले परिजनों से जो हमें प्यार मिला, परस्पर आत्मीयता की भावना जो विकसित हुईं, उसी ने एक विशाल गायत्री परिवार को जन्म दिया। यह वही गायत्री परिवार है जिसका हर सदस्य हमें पिता के रूप में- उँगली पकड़ कर चलाने वाले मार्गदर्शक के रूप में, घर-परिवार-मन की समस्याओं को सुलझाने वाले चिकित्सक के रूप में देखता आया है।

इसी स्नेह, सद्भाव के नाते हमें भी उनके यहाँ जाना पड़ा, जो हमारे यहाँ आये थे। कई स्थानों पर छोटे-छोटे यज्ञायोजन थे, कहीं सम्मेलन तो कहीं प्रबुद्ध समुदाय के बीच तर्क, तथ्य, प्रतिपादनों के आधार पर गोष्ठी आयोजन। हमने जब मथुरा छोड़कर हरिद्वार आने का निश्चय किया तो लगभग दो वर्ष तक लगातार पूरे भारत का दौरा करना पड़ा। पाँच स्थानों पर तो उतने ही बड़े सहस्र कुण्डी यज्ञों का आयोजन था, जितना बड़ा मथुरा का सहस्र कुण्डी यज्ञ था। ये थे टाटानगर, महासमुन्द, बहराइच, भीलवाडा एवं पोरबन्दर। एक दिन में तीन-तीन स्थान पर रुकते हुए हमने हजारों मील का दौरा अपने अज्ञातवास पर जाने के पूर्व कर डाला। इस दौरे से हमारे हाथ लगे समर्पित समयदानी कार्यकर्ता। ऐसे अगणित व्यक्ति हमारे संपर्क में आये, जो पूर्व जन्म में ऋषि जीवन जी चुके थे। उनकी प्रसुप्त सामर्थ्य को पहचान कर हमने उन्हें परिवार से जोड़ा और इस प्रकार पारिवारिक सूत्रों से बँधा एक विशाल संगठन बनकर खड़ा हो गया।

मार्गदर्शक का आदेश वर्षों पूर्व मिल चुका था कि हमें 6 माह के प्रवास के लिए पुनः हिमालय जाना होगा पर पुनः मथुरा न लौटकर हमेशा के लिए वहाँ से मोह तोड़ते हुए हरिद्वार सप्त सरोवर में विश्वविद्यालय की तप स्थली में ऋषि परम्परा की स्थापना करनी होगी। अपना सारा दायित्व हमने क्रमशः धर्मपत्नी के कन्धों पर सौंपना काफी पूर्व से आरम्भ कर दिया था। वे पिछले तीन में से दो जन्मों में हमारी जीवन संगिनी बनकर रही ही थीं। इस जन्म में भी उन्होंने अभिन्न साथी- सहयोगी की भूमिका निभाई थी। वस्तुतः हमारी सफलता के मूल में उनके समर्पण- एक निष्ठ सेवा भाव को देखा जाना चाहिए। जो कुछ भी हमने चाहा, जिन प्रतिकूलताओं में जीवन जीने हेतु कहा, उन्होंने सहर्ष अपने को उस क्रम में ढाल लिया। हमारी पारिवारिक पृष्ठभूमि ग्रामीण जमींदार के घराने की थी तो उनकी एक धनी शहरी खानदान की। परन्तु जब घुलने का प्रश्न आया तो दोनों मिलकर एक हो गए। हमने अपने गाँव की भूमि विद्यालय हेतु दे दी एवं जमींदारी के बॉण्ड से मिली राशि गायत्री तपोभूमि के लिए जमीन खरीदने हेतु। तो उन्होंने अपने सभी जेवर तपोभूमि का भवन विनिर्मित होने के लिए दे दिए। वह त्याग-समर्पण उनका है, जिसने हमें इतनी बड़ी ऊंचाइयों तक पहुँचाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाईं।

अपनी दूसरी हिमालय यात्रा में उन्होंने हमारी अनुपस्थिति में सम्पादन-संगठन की जिम्मेदारी सँभाली ही थी। अब हम 10 वर्ष बाद 1971 में एक बहुत बड़ा परिवार अपने पीछे छोड़कर हिमालय जा रहे थे। गायत्री परिवार को दृश्य रूप में एक संरक्षक चाहिए था, जो उन्हें स्नेह-ममत्व दे सके। उनकी दुःख भरी वेदना में आँसू पोंछने का कार्य माता ही कर सकती थीं। माताजी ने यह जिम्मेदारी भली−भांति सम्भाली। प्रवास पर जाने के 3 वर्ष पूर्व से ही हम लम्बे दौरे पर रहा करते थे। ऐसे में मथुरा जाने वाले परिजनों से मिलकर उन्हें मार्गदर्शक देने, पत्रों द्वारा उन्हें दिलासा देने का कार्य वे अपने कन्धों पर ले चुकी थीं। हमारे सामाजिक जीवन जीने में हमें उनका सतत् सहयोग ही मिला। 200 रुपये में पाँच व्यक्तियों का गुजारा चलाने वाली माताजी स्वयं ही बता सकती हैं कि ऐसी कौन-सी विधा उनके पास थी, जिससे न केवल उन्होंने परिवार का भरण-पोषण किया, आने वालों का समुचित आतिथ्य सत्कार भी वे करती रहीं। किसी को निराश नहीं लौटने दिया।

मथुरा में जिया हमारा जीवन एक अमूल्य धरोहर के रूप में है। इससे न केवल हमारे भावी क्रान्तिकारी जीवन की नींव ढली अपितु क्रमशः प्रत्यक्ष पीछे हटने की स्थिति में दायित्व सँभाल सकने वाले मजबूत कंधों वाले नर तत्व भी हमारे हाथ लगे।




तीसरा हिमालय यात्रा-ऋषि परम्परा का बीजारोपण - Akhandjyoti April 1985

मथुरा का कार्य सुचारु रूप से चल पड़ने के उपरान्त हिमालय से तीसरा बुलावा आया, जिसमें अगले चौथे कदम को उठाये जाने का संकेत था। समय भी काफी हो गया था। इस बार कार्य का दबाव अत्यधिक रहा और सफलता के साथ-साथ थकान बढ़ती गई थी। ऐसी परिस्थितियों में बैटरी चार्ज करने का यह निमन्त्रण हमारे लिए बहुत ही उत्साहवर्धक था।

निर्धारित दिन प्रयाण आरम्भ हो गया। देखे हुए रास्ते को पार करने में कोई कठिनाई नहीं हुई। फिर मौसम भी ऐसा रखा गया था जिसमें शीत के कड़े प्रकोप का सामना न करना पड़ता और एकाकीपन की प्रथम बार जैसी कठिनाई न पड़ती। गोमुख पहुँचने पर गुरुदेव के छाया पुरुष का मिलना और अत्यन्त सरलता पूर्वक नन्दन वन पहुँचा देने का क्रम पिछली बार जैसा ही रहा। सच्चे आत्मीय जनों का पारस्परिक मिलन कितना आनन्द उल्लास भरा होता है इसे भुक्त-भोगी ही जानते हैं। रास्ते भर जिस शुभ घड़ी की प्रतीक्षा करनी पड़ी वह आखिर आ ही गई। अभिवादन आशीर्वाद का क्रम चला और पीछे बहुमूल्य मार्गदर्शन का सिलसिला चल पड़ा।

अब की बार मथुरा छोड़कर हरिद्वार डेरा डालने का निर्देश मिला और कहा गया कि “वहाँ रहकर ऋषि परंपरा को पुनर्जीवित करने का कार्य आरम्भ करना है। तुम्हें याद है न, जब यहाँ प्रथम बार आये थे और हमने सूक्ष्म शरीरधारी इस क्षेत्र के ऋषियों का दर्शन कराया था। हर एक ने उनकी परम्परा लुप्त हो जाने पर दुःख प्रकट किया था और तुमने यह वचन दिया था कि इस कार्य को भी सम्पन्न करोगे। इस बार उसी निमित्त बुलाया गया है।

भगवान अशरीरी हैं। जब कभी उन्हें महत्वपूर्ण कार्य कराने होते हैं तो ऋषियों के द्वारा कराते हैं। महापुरुषों को वे बनाकर खड़े कर देते हैं। स्वयं तप करते रहते हैं और अपनी शक्ति देवात्माओं को देकर बड़े काम करा लेते हैं। भगवान राम को विश्वामित्र अपने यहाँ यज्ञ रक्षा के बहाने ले गये थे और वहाँ बला- अतिबला- विद्या- (गायत्री और सावित्री) की शिक्षा देकर उनके द्वारा असुरता का दुर्ग ढहाने तथा राम राज्य, धर्मराज्य की स्थापना का कार्य कराया था। कृष्ण भी संदीपन ऋषि के आश्रम में पढ़ने गये थे और वहाँ से गीता गायन, महाभारत निर्णय तथा सुदामा ऋषि की कार्य पद्धति को आगे बढ़ाने का निर्देशन लेकर वापस लौटे थे। समस्त पुराण इसी उल्लेख से भरे पड़े हैं कि ऋषियों के द्वारा महापुरुष उत्पन्न किये गये और उनकी सहायता से महान कार्य सम्पादित कराये गये। स्वयं तो वे शोध प्रयोजनों में और तप साधनाओं में संलग्न रहते ही थे। इसी कार्य को तुम्हें अब पूरा करना है।”

“गायत्री के मन्त्र दृष्टा विश्वामित्र थे। उनने सप्त सरोवर नामक स्थान पर रहकर गायत्री की पारंगतता प्राप्त की थी। वही स्थान तुम्हारे लिये भी नियत है। उपयोगी स्थान तुम्हें सरलता पूर्वक मिल जायेगा। उसका नाम शाँतिकुंज गायत्री तीर्थ रखना और उन सब कार्यों का बीजारोपण करना जिन्हें पुरातन काल के ऋषिगण स्थूल शरीर से करते रहे हैं। अब वे सूक्ष्म शरीर में हैं। इसलिए अभीष्ट प्रयोजन के लिए किसी शरीरधारी को माध्यम बनाने की आवश्यकता पड़ रही है। हमें भी तो ऐसी ही आवश्यकता पड़ी और तुम्हारे स्थूल शरीर को इसके लिए सत्पात्र देखकर संपर्क बनाया और अभीष्ट कार्यक्रमों में लगाया। यही इच्छा इन सभी ऋषियों की है। तुम उनकी परम्पराओं का नये सिरे से बीजारोपण करना। उन कार्यों में अपेक्षाकृत भारीपन रहेगा और कठिनाई भी अधिक रहेगी। किंतु साथ ही एक अतिरिक्त लाभ भी है कि हमारा ही नहीं, उन सबका भी संरक्षण और अनुदान तुम्हें मिलता रहेगा। इसलिए कोई कार्य रुकेगा नहीं।”

जिन ऋषियों के छोड़े कार्य को हमें आगे बढ़ाना था, उसका संक्षिप्त विवरण बताते हुए उन्होंने कहा- विश्वामित्र परम्परा में गायत्री महामन्त्र की शक्ति से जन-जन को अवगत कराना एवं एक सिद्ध पीठ-गायत्री तीर्थ का निर्माण करना है। व्यास परम्परा में आर्ष साहित्य के अलावा अन्यान्य पक्षों पर साहित्य सृजन एवं प्रज्ञा पुराण के 18 खण्डों को लिखने का, पातंजलि परम्परा में योग साधना के तत्वज्ञान के विस्तार का, परशुराम परम्परा में अनीति उन्मूलन हेतु जन-मानस के परिष्कार के वातावरण निर्माण का तथा भागीरथ परम्परा में ज्ञान गंगा को जन-जन तक पहुँचाने का दायित्व सौंपा गया। चरक परम्परा में वनौषधि पुनर्जीवन एवं वैज्ञानिक अनुसन्धान, याज्ञवल्क्य परम्परा में यज्ञ से मनोविकारों के शमन द्वारा समग्र चिकित्सा पद्धति का निर्धारण, जगदग्नि परम्परा में साधना आरण्यक का निर्माण एवं संस्कारों का बीजारोपण, नारद परम्परा में सत्परामर्श- परिव्रज्या के माध्यम से धर्म चेतना का विस्तार, आर्य भट्ट परम्परा में ज्योतिर्विज्ञान का नूतन अनुसन्धान, वशिष्ठ परम्परा में धर्मतंत्र के माध्यम से राजतन्त्र का मार्गदर्शन, शंकराचार्य परम्परा में स्थान-स्थान पर प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण का, पिप्पलाद परम्परा में आहार-कल्प के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य संवर्धन एवं सूत-शौनिक परम्परा में स्थान-स्थान पर प्रज्ञापरिजनों द्वारा लोक-शिक्षण की रूप रेखा के सूत्र हमें बताये गये। अथर्ववेदीय विज्ञान परम्परा में कणाद ऋषि प्रणीत वैज्ञानिक अनुसन्धान पद्धति के आधार पर ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की रूपरेखा बनी।

हरिद्वार रहकर हमें क्या करना है और मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का समाधान कैसे करना है? यह हमें ऊपर बताए निर्देशों के अनुसार क्रम से विस्तारपूर्वक बता दिया गया। सभी बातें पहले की ही तरह गाँठ बाँध लीं। पिछली बार मात्र गुरुदेव अकेले की ही इच्छाओं की पूर्ति का कार्य भार था। अबकी बार इतनों का बोझ लादकर चलना पड़ेगा। गधे को अधिक सावधानी रखनी पड़ेगी और अधिक मेहनत भी करनी पड़ेगी।

साथ ही इतना सब कर लेने पर चौथी बार आने और उससे भी बड़ा उत्तरदायित्व सम्भालने तथा स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म शरीर अपनाने का कदम बढ़ाना पड़ेगा। यह सब इस बार उनने स्पष्ट नहीं किया, मात्र संकेत ही दिया।

यह भी बताया कि हरिद्वार की कार्य पद्धति मथुरा के कार्यक्रम से बड़ी है। इसलिए उतार-चढ़ाव भी बहुत रहेंगे। असुरता के आक्रमण भी सहने पड़ेंगे, आदि आदि बातें उन्होंने पूरी तरह समझा दीं। समय की विषमता को देखते हुए उस क्षेत्र में अधिक रुकना उन्हें उचित न लगा और एक वर्ष के स्थान पर छः महीने रहने का ही निर्देश दिया। कहाँ, किस प्रकार रहना और किस दिनचर्या का निर्वाह करना, यह उनने समझाकर बात समाप्त की और पिछली बार की भाँति ही अंतर्ध्यान होते हुए चलते-चलते यह कह गये कि “इस कार्य को सभी ऋषियों का सम्मिलित कार्य समझना, मात्र हमारा नहीं।” हमने भी विदाई का प्रणाम करते हुए इतना ही कहा कि “हमारे लिए आप ही समस्त देवताओं के, समस्त ऋषियों के और परब्रह्म के प्रतिनिधि हैं। आपके आदेश को इस शरीर के रहते टाला न जायेगा।”

बात समाप्त हुई। हम विदाई लेकर चल पड़े। छाया पुरुष (वीरभद्र) ने गोमुख तक पहुँचा दिया। आगे अपने पैरों से बताये हुए स्थान के लिए चल पड़े।

जिन-जिन स्थानों पर इन यात्राओं में हमें ठहरना पड़ा, उनका उल्लेख यहाँ इसलिये नहीं किया गया कि वे सभी दुर्गम हिमालय में गुफाओं के निवासी थे। समय-समय पर स्थान बदलते रहते थे। अब तो उनके शरीर भी समाप्त हो गये। ऐसी दशा में उल्लेख की आवश्यकता न रही।

लौटते हुए हरिद्वार उसी स्थान पर रुके, सप्त ऋषियों की तपोभूमि में, जिस स्थान का संकेत गुरुदेव ने किया था। काफी हिस्सा सुनसान पड़ा था और बिकाऊ भी था। जमीन पानी उगलती थी। पहले यहाँ गंगा बहती थी। यह स्थान सुहाया भी। जमीन के मालिक से चर्चा हुई और शेष जमीन का सौदा आसानी से पट गया। उसे खरीदने में लिखा-पड़ी कराने में विलम्ब न हुआ। जमीन मिल जाने के उपरान्त यह देखना था कि वहाँ कहाँ, क्या बनाना है। यह भी एकाकी ही निर्णय करना पड़ा। सलाहकारों का परामर्श काम न आया क्योंकि उन्हें बहुत कोशिश करने पर भी यह नहीं समझाया जा सका कि यहाँ किस प्रयोजन के लिए किस आकार-प्रकार का निर्माण होना है। यह कार्य भी हमने ही पूरा किया। इस प्रकार शाँतिकुंज-गायत्री तीर्थ की स्थापना हुई।




शान्तिकुंज- गायत्री तीर्थ - Akhandjyoti April 1985

मथुरा से प्रयाण के बाद हिमालय से 6 माह बाद ही हम हरिद्वार उस स्थान पर लौट आए, जहाँ निर्धारित स्थान पर शाँतिकुंज के एक छोटे से भवन में माताजी व उनके साथ रहने वाली कन्याओं के रहने योग्य निर्माण हम पूर्व में करा चुके थे। अब और जमीन लेने के उपरान्त पुनः निर्माण कार्य आरम्भ किया। इच्छा ऋषि आश्रम बनाने की थी। सर्वप्रथम अपने लिए, सहकर्मियों के लिए, अतिथियों के लिए निवास स्थान और भोजनालय बनाया गया।

यह आश्रम ऋषियों का-देवात्मा हिमालय का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए उत्तराखण्ड का गंगा का प्रतीक देवालय यहाँ बनाया गया। इसके अतिरिक्त सात प्रमुख तथा अन्यान्य वरिष्ठ ऋषियों की प्रतिभाओं की स्थापना का प्रबन्ध किया गया। आद्य शक्ति गायत्री का मंदिर तथा जल कूपों का निर्माण कराया गया, प्रवचन कक्ष का भी। इस निर्माण में प्रायः दो वर्ष लग गये। अब निवास के योग्य आवश्यक व्यवस्था हो गई तब हम और माताजी ने नव निर्मित शाँतिकुंज को अपनी तपःस्थली बनाया। साथ में अखण्ड-दीपक भी था। उसके लिए एक कोठरी और गायत्री प्रतिमा की स्थापना करने के लिए सुविधा पहले ही बन चुकी थी।

इस बंजर पड़ी भूमि के प्रसुप्त पड़े संस्कारों को जगाने के लिए 24 लाख के 24 अखण्ड पुरश्चरण कराये जाने थे। इसके लिए 9 कुमारियों का प्रबन्ध किया गया। प्रारम्भ में चार घण्टे दिन में, चार घण्टे रात्रि में इनकी ड्यूटी थी। बाद में इनकी संख्या 27 हो गयी। तब समय कम कर दिया गया। इन्हें दिन में माताजी पढ़ाती थीं। छः वर्ष उपरान्त इन सब को ग्रेजुएट- पोस्ट ग्रेजुएट स्तर की पढ़ाई आरम्भ कर दी गई। बीस और पच्चीस वर्ष की आयु के मध्य इन सबके सुयोग्य घरों और वरों के साथ विवाह कर दिये गये।

इसके पूर्व संगीत और प्रवचन का अतिरिक्त प्रशिक्षण क्रम भी चलाया गया। देश व्यापी नारी जागरण के लिए इन्हें मोटर गाड़ियों में पाँच-पाँच के जत्थे बनाकर भेजा गया। तब तक पढ़ने वाली कन्याओं की संख्या 100 से ऊपर हो गई थी। इनके दौरे का देश के नारी समाज पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा।

हरिद्वार से ही तेजस्वी कार्यकर्ताओं को ढालने का कार्य हाथ में लिया गया। इसके लिए प्राण प्रत्यावर्तन सत्र, एक-एक मास के युग शिल्पी सत्र एवं वानप्रस्थ सत्र भी लगाये गए। सामान्य उपासकों के लिए छोटे-बड़े गायत्री पुरश्चरणों की श्रृंखला भी चल पड़ी। गंगा का तट, हिमालय की छाया, दिव्य वातावरण, प्राणवान मार्गदर्शन जैसी सुविधाओं को देखकर पुरश्चरण कर्ता भी सैकड़ों की संख्या में निरन्तर आने लगे। पूरा समय देने वाले वानप्रस्थों का प्रशिक्षण भी अलग से चलता रहा। दोनों प्रकार के साधकों के लिए भोजन का प्रबन्ध किया गया।

यह नई संख्या निरन्तर बढ़ती जाने लगी। ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए इसकी आवश्यकता भी थी कि सुयोग्य आत्मदानी पूरा समय देकर हाथ में लिये हुए महान कार्य की पूर्ति के लिए आवश्यक आत्म बल संग्रह करें और उसके उपरान्त व्यापक कार्यक्रमों में जुट पड़े।

बढ़ते हुए कार्य को देखकर गायत्री नगर में 240 क्वार्टर बनाने पड़े। एक हजार व्यक्तियों के प्रवचन में सम्मिलित हो सकने जितने बड़े आकार का प्रवचन हाल बनाना पड़ा। इस भूमि को अधिक संस्कारवान बनाना पड़ा। इस भूमि को अधिक संस्कारवान बनाना था। इसलिए नौ कुण्ड की यज्ञशाला में प्रातःकाल दो घण्टे यज्ञ किए जाने की व्यवस्था की, और आश्रम में स्वामी निवासियों तथा पुरश्चरण कर्ताओं का औसत जप इस अनुपात से निर्धारित किया गया कि हर दिन 24 लक्ष गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न होता रहे। आवश्यक कार्यों के लिए एक छोटा प्रेस भी लगाना पड़ा। इन सब कार्यों के लिए निर्माण कार्य अब तक एक प्रकार से बराबर ही चलता रहा। इसी बीच ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के लिए भव्य भवन बनाना आरम्भ कर दिया था। इस सारे निर्माण में प्रायः चार वर्ष लग गए। इसी बीच वे कार्य आरम्भ कर दिये गए जिन्हें सम्पन्न करने से ऋषि परम्परा का पुनर्जीवन हो सकता था। जैसे-जैसे सुविधा बनती गई, वैसे-वैसे नये कार्य हाथ में लिये गये और कहने योग्य प्रगति स्तर तक पहुँचाये गये।

भगवान बुद्ध ने नालन्दा तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय स्तर के बिहार बनाये थे और उनमें प्रशिक्षित करके कार्यकर्ता देश के कोने-कोने में तथा विदेशों में भेजे गये थे। धर्मचक्र प्रवर्तन की योजना तभी पूरी हो सकी थी।

भगवान आद्य शंकराचार्य ने देश के चार कोनों पर चार धाम बनाये थे और उनके माध्यम से देश में फैले हुए अनेक मत मतान्तरों को एक सूत्र में पिरोया था। दोनों ने अपने-अपने कार्य क्षेत्रों में एक कुम्भ स्तर के बड़े सम्मेलन समारोहों की व्यवस्था की थी ताकि जो ऋषियों के मुख्य-मुख्य सन्देश हों, वे आगन्तुकों द्वारा घर-घर पहुँचाये जा सकें।

इन दोनों के ही क्रिया-कलापों को हाथ में लिया गया। निश्चय किया गया कि गायत्री शक्ति पीठों, प्रज्ञा संस्थानों के नाम से देश के कोने-कोने में भव्य देवालय एवं कार्यालय बनाये जांय, जहाँ केन्द्र बनाकर समीपवर्ती क्षेत्रों में वे काम किये जा सकें, जिनको प्रज्ञा मिशन का प्रण संकल्प कहा जा सके।

बात असम्भव लगती थी। किंतु प्राणवान परिजनों को शक्ति पीठ निर्माण के संकल्प दिये गये तो 2400 भवन दो वर्ष के भीतर बन गये। उस क्षेत्र के कार्यकर्ता उसे केन्द्र मानकर युग चेतना का आलोक वितरण करने और घर-घर अलख जगाने के काम में जुट पड़े। यह एक इतना बड़ा और इतना अद्भुत कार्य है जिसकी तुलना में ईसाई मिशनरियों के द्वारा किये गए निर्माण कार्य भी फीके पड़ जाते हैं। हमारे निर्माणों में जन-जन का अल्पाँश लगा है अतः वह सबको अपना लगता है, जबकि चर्च, अन्यान्य बड़े मंदिर बड़ी धनराशियों से बनाए जाते हैं।

इसके अतिरिक्त चल प्रज्ञापीठों की योजना बनी। एक कार्यकर्ता एक संस्था चला सकता है। यह चल गाड़ियां हैं। इन्हें कार्यकर्ता अपने नगर तथा समीपवर्ती क्षेत्रों में धकेल कर ले जाते हैं। पुस्तकों के अतिरिक्त आवश्यक सामान भी उसकी कोठी में भरा रहता है। यह चल पुस्तकालय अपेक्षाकृत अधिक सुविधाजनक रहे, इसलिए वे दो वर्ष में 12 हजार की संख्या में बन गये। स्थिर प्रज्ञा पीठों और चल प्रज्ञा संस्थानों के माध्यम से हर दिन प्रायः एक लाख व्यक्ति इनसे प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

इसके अतिरिक्त उपरोक्त हर संस्था का वार्षिकोत्सव करने का निश्चय किया गया जिसमें उस क्षेत्र के न्यूनतम एक हजार कार्यकर्ता एकत्रित हों। चार दिन सम्मेलन चले। नये वर्ष का सन्देश सुनाने के लिए हरिद्वार से प्रचारक मण्डलियाँ कन्याओं की टोलियों के समान ही भेजने का प्रबन्ध किया गया, जिनमें 4 गायक और एक वक्ता भेजे गये। पाँच प्रचारकों की टोली के लिए जीप गाड़ियों का प्रबन्ध करना पड़ा ताकि कार्यकर्ताओं के बिस्तर, कपड़े संगीत उपकरण, लाउडस्पीकर आदि सभी सामान भली प्रकार जा सके। ड्राइवर भी अपना ही कार्यकर्ता होता है ताकि वह भी छठे प्रचारक का काम दे सके। अब हर प्रचारक को जीप व कार ड्राइविंग सिखाने की व्यवस्था की गई है, ताकि इस प्रयोजन के लिए बाहर के आदमी न तलाशने पड़े।

मथुरा रहकर महत्वपूर्ण साहित्य लिखा जा चुका था। हरिद्वार आकर प्रज्ञा पुराण का मूल उपनिषद् पक्ष संस्कृत व कथा टीका सहित हिन्दी में 18 खण्डों को लिखने का निश्चय किया गया। इसके अतिरिक्त एक फोल्डर आठ पेज का नित्य लिखने का निश्चय किया गया जिनके माध्यम से सभी ऋषियों की कार्यपद्धति से सभी प्रज्ञा पुत्रों को अवगत कराया जा सके और उन्हें करने में संलग्न होने की प्रेरणा मिल सके। अब तक इस प्रकार के 400 फोल्डर लिखे जा चुके हैं। लक्ष्य एक हजार का है। उसको भारत की अन्य भाषाओं में अनुवाद कराने का प्रबन्ध चल पड़ा है।

देश की सभी भाषाओं और सभी मत-मतान्तरों को पढ़ाने और उनके माध्यम से हर क्षेत्र में कार्यकर्ता तैयार करने के लिए एक अलग भाषा एवं धर्म विद्यालय शान्तिकुँज में ही इसी वर्ष बनकर तैयार हुआ है और ठीक तरह चल रहा है।

उपरोक्त कार्यक्रमों को लेकर जो भी कार्यकर्ता देशव्यापी दौरा करते हैं, वे मिशन के प्रायः 10 लाख कार्यकर्ताओं में उन क्षेत्रों में प्रेरणाऐं भरने का काम करते हैं, जहाँ वे जाते हैं। उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश, हिमाँचल प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात एवं उड़ीसा इन क्षेत्रों में संगठन पूरी तरह सुव्यवस्थित हो गया है। अब देश का जो भाग प्रचार क्षेत्र में भाषा व्यवधान के कारण सम्मिलित करना नहीं बन पड़ा है उन्हें भी एकाध वर्ष में पूरी कर लेने की योजना है।

प्रवासी भारतीय प्रायः 74 देशों में बिखरे हुए हैं। उनकी संख्या भी तीन करोड़ के करीब हैं। उन तक व अन्य देशवासियों तक मिशन के विचारों को फैलाने की योजना बड़ी सफलता पूर्वक आरम्भ हुई है। आगे चलकर कई सुयोग्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से कई राष्ट्रों में प्रज्ञा आलोक पहुँचाना सम्भव बन पड़ेगा। कदाचित ही कोई देश अब ऐसा शेष रहा हो जहाँ प्रवासी भारतीय रहते हों और मिशन का संगठन न बना हो।

ऊपर की पंक्तियों में ऋषियों की कार्य पद्धति को जहाँ जिस प्रकार व्यापक बनाना सम्भव हुआ है वहाँ उसके लिए प्रायः एक हजार आत्मदानी कार्यकर्ता निरन्तर कार्यरत रहकर काम कर रहे हैं। इसके लिए ऋषि जमदग्नि का गुरुकुल आरण्यक यहाँ नियमित रूप से चलता है।

चरक परम्परा का पुनरुद्धार किया गया है। दुर्लभ जड़ी-बूटियों का शाँतिकुँज में उद्यान लगाया गया है। और उनमें हजारों वर्षों में क्या अंतर आया है, यह बहुमूल्य मशीनों से जाँच पड़ताल की जा रही है। एक औषधि का एक बार में प्रयोग करने की एक विशिष्ट पद्धति यहाँ क्रियान्वित की जा रही है, जो अत्यधिक सफल हुई है।

युग शिल्पी विद्यालय के माध्यम से सुगम संगीत की शिक्षा हजारों व्यक्ति प्राप्त कर चुके हैं और अपने-अपने यहाँ ढपली जैसे छोटे से माध्यम द्वारा संगीत विद्यालय चलाकर युग गायक तैयार कर रहे हैं।

पृथ्वी अंतर्ग्रही वातावरण से प्रभावित होती है। उसकी जानकारी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। हर पाँच हजार वर्ष पीछे ज्योतिष गणित को सुधारने की आवश्यकता होती है। आर्यभट्ट की इस विद्या को नूतन जीवन प्रदान करने के लिए प्राचीन काल के उपकरणों वाली समग्र वेधशाला विनिर्मित की गई है। और नैप्च्यून, प्लेटो, यूरेनस ग्रहों के वेध समेत हर वर्ष दृश्य गणित पंचाँग प्रकाशित होता है। यह अपने ढंग का एक अनोखा प्रयोग है।

अब प्रकाश चित्र विज्ञान का नया कार्य हाथ में लिया गया है। अब तक सभी संस्थानों में स्लाइड प्रोजेक्टर पहुँचाये गये थे। उन्हीं से काम चल रहा था। अब वीडियो क्षेत्र में प्रवेश किया गया है। उनके माध्यम से कविताओं के आधार पर प्रेरक फिल्में बनायी जा रही हैं। देश के विद्वानों, मनीषियों मूर्धन्यों नेताओं के दृश्य प्रवचन टैप कराकर उनकी छवि समेत सन्देश घर-घर पहुँचाये जा रहे हैं। भविष्य में मिशन के कार्यक्रमों को उद्देश्य, स्वरूप और प्रयोग समझाने वाली फिल्में बनाने की बड़ी योजना है जो जल्दी ही कार्यान्वित होने जा रही है।

शाँतिकुँज मिशन का सबसे महत्वपूर्ण सृजन है “ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान”। इस प्रयोगशाला द्वारा अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय करने के लिए बहुमूल्य यन्त्र उपकरणों वाली प्रयोगशाला बनाई गई है। कार्यकर्त्ताओं में आधुनिक आयुर्विज्ञान एवं पुरातन आयुर्वेद विद्या के ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट हैं। विज्ञान की अन्य विधाओं में निष्णात उत्साही कार्यकर्ता हैं, जिनकी रुचि अध्यात्म परक है। इसमें विशेष रूप से यज्ञ विज्ञान पर शोध की जा रही है। इस आधार पर यज्ञ विज्ञान की शारीरिक, मानसिक रोगों की निवृत्ति में-पशुओं और वनस्पतियों के लिए लाभदायक सिद्ध करने में, वायुमण्डल और वातावरण के संशोधन में इसकी उपयोगिता जाँची जा रही है, जो अब तक बहुत ही उत्साह वर्धक सिद्ध हुई है।

यहाँ सभी सत्रों में आने वालों की स्वास्थ्य परीक्षा की जाती है। उसी के अनुरूप उन्हें साधना करने का निर्देश दिया जाता है। अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय पर इस प्रकार शोध करने वाली विश्व की यह पहली एवं स्वयं में अनुपम प्रयोगशाला है।

इसके अतिरिक्त भी सामयिक प्रगति के लिए जनसाधारण को जो प्रोत्साहन दिए जाने हैं उनकी अनेकों शिक्षाऐं यहीं दी जाती हैं। अगले दिनों और भी बड़े काम हाथ में लिए जाने हैं।

गायत्री परिवार के लाखों व्यक्ति उत्तराखण्ड की यात्रा करने के लिए जाते समय शांतिकुँज के दर्शन करते हुए यहाँ की रज मस्तिष्क पर लगाते हुए तीर्थयात्रा आरम्भ करते हैं। बच्चों के अन्न प्राशन, नामकरण संस्कार, मुंडन, यज्ञोपवीत आदि संस्कार यहाँ आकर कराते हैं। क्योंकि परिजन इसे सिद्धपीठ मानते हैं। पूर्वजों के श्राद्ध तर्पण कराने का भी यहाँ प्रबन्ध है। जन्मदिन, विवाह दिन मनाने हर वर्ष प्रमुख परिजन यहाँ आते हैं। बिना दहेज की शादियाँ हर वर्ष यहाँ व तपोभूमि में होती हैं। इससे परिजनों को सुविधा भी बहुत रहती है, इस खर्चीली कुरीति से भी पीछा छूटता है।

जब पिछली बार हम हिमालय गये थे और हरिद्वार जाने और शान्तिकुँज रहकर ऋषियों की कार्य पद्धति को पुनर्जीवन देने का काम हमें सौंपा गया था तक यह असमंजस था कि कितना बड़ा कार्य हाथ में लेने में न केवल विपुल धन की आवश्यकता है, वरन् इसमें कार्यकर्ता भी उच्च श्रेणी के चाहिए। वे कहाँ मिलेंगे? सभी संस्थाओं के पास वेतन भोगी हैं। वे भी चिन्ह पूजा करते हैं। हमें ऐसे जीवनदानी कहाँ से मिलेंगे? पर आश्चर्य है कि शान्तिकुँज में ब्रह्मवर्चस में इन दिनों रहने वाले कार्यकर्ता ऐसे हैं जो अपनी बड़ी-बड़ी पोस्टों से स्वेच्छा से त्यागपत्र देकर आए हैं। सभी ग्रेजुएट पोस्ट ग्रेजुएट स्तर के अथवा प्रखर प्रतिभा सम्पन्न हैं। इनमें से कुछ तो मिशन के चौके में भोजन करते हैं। कुछ उसकी लागत भी अपनी जमा धनराशि के ब्याज से चुकाते रहते हैं। कुछ के पास पेन्शन आदि का प्रबन्ध भी है। भावावेश में आने जाने वालों का क्रम चलता रहता है पर जो मिशन के सूत्र संचालक व मूलभूत उद्देश्य को समझते हैं, वे स्थायी बनकर टिकते व काम करते हैं। खुशी की बात है कि ऐसे भावनाहीन नैष्ठिक परिजन सतत आते व संस्था से जुड़ते चले जा रहे हैं।

गुजारा अपनी जेब से एवं काम दिन-रात स्वयंसेवक की तरह मिशन का ऐसा उदाहरण अन्य संस्थाओं में चिराग लेकर ढूंढ़ना पड़ेगा। यह सौभाग्य मात्र शांतिकुंज को मिला है कि उसे पास एम.ए., एम.एस.सी., एम.डी., एम.एस., पी.एच.डी. आयुर्वेदाचार्य, संस्कृत आचार्य स्तर के कार्यकर्ता हैं। उनकी नम्रता, सेवा भावना, श्रमशीलता एवं निष्ठा देखते ही बनती है। जबकि वरीयता योग्यता एवं प्रतिभा को दी जाती है, डिग्री को नहीं, ऐसा परिकर जुड़ना इस मिशन का बहुत बड़ा सौभाग्य है।

जो काम अब तक हुआ है उसमें पैसे की याचना ही करनी पड़ी। मालवीय जी का मन्त्र मुट्ठी भर अन्न और दस पैसा नित्य देने का सन्देश मिल जाने से ही इतना बड़ा कार्य सम्पन्न हो गया। आगे इसकी और भी प्रगति होने की सम्भावना है। हम जन्मभूमि छोड़कर आए, वहाँ हाईस्कूल- फिर इण्टर कालेज एवं अस्पताल चल पड़ा। मथुरा का कार्य हमारे सामने की अपेक्षा उत्तराधिकारियों द्वारा दूना कर दिया गया है। हमारे हाथ का कार्य क्रमशः अब दूसरे समर्थ व्यक्तियों के कन्धों पर जा रहा है। पर मन में विश्वास है कि वह घटेगा नहीं। ऋषियों का जो कार्य आरम्भ करना और बढ़ाना हमारे जिम्मे था, वह अगले दिनों घटेगा नहीं, प्रज्ञावतार की अवतरण बेला में मत्स्यावतार की तरह बढ़ता-फैलता ही चला जाएगा।




Quotation - Akhandjyoti April 1985

वन प्रदेश में भयंकर आँधी आने पर वृक्ष उखड़ जाते हैं जो एकाँकी खड़े हैं। भले ही वे कितने ही विशाल क्यों न हों। इसके विपरीत घने उगे हुए पेड़ एक दूसरे के साथ सट कर रहने के कारण उस दबाव को सहज, सहन कर लेते हैं, अन्धड़ उनका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाते। यह सघनता एवं सहकारिता का चमत्कार है।




ऋषियों की पुरातन योजनाओं का शुभारम्भ एवं क्रियान्वयन - Akhandjyoti April 1985

अपने समय में विभिन्न ऋषिगणों ने अपने हिस्से के काम सम्भाले और पूरे किये थे। उन दिनों ऐसी परिस्थितियाँ, अवसर और इतना अवकाश भी था कि समय की आवश्यकता के अनुरूप अपने-अपने कार्यों को वे धैर्यपूर्वक उचित समय में सम्पन्न करते रह सकें। पर अब तो आपत्तिकाल है। इन दिनों अनेकों काम एक ही समय में द्रुतगति से निपटाने हैं। घर में अग्निकाण्ड हो तो जितना बुझाने का प्रयास बन पड़े उसे स्वयं करते हुए बच्चों को, कपड़ों को, धनराशि को निकालने-ढोने का काम साथ-साथ ही चलता है। हमें ऐसे ही आपत्तिकाल का सामना करना पड़ता है और ऋषियों द्वारा हमारी हिमालय यात्रा में सौंपे गये कार्यों में से प्रायः प्रत्येक को एक ही समय में सम्भालना पड़ा है। एक ही समय में हमें इसके लिए बहुमुखी जीवन जीना पड़ा है। इसके लिए प्रेरणा, दिशा सहायता हमारे संघर्ष मार्गदर्शक की मिली हैं और शरीर से जो कुछ भी हम कर सकते थे, उसे पूरी तत्परता और तन्मयता के साथ सम्पन्न किया है। उसमें पूरी-पूरी ईमानदारी का समावेश किया है। फलतः वे सभी कार्य इस प्रकार सम्पन्न होते चले हैं मानो वे किये हुए ही रखे हों। कृष्ण का रथ चलाना और अर्जुन का गाण्डीव उठाना पुरातन इतिहास होते हुए भी हमें अपने संदर्भ में चरितार्थ होते दिखता रहा है।

युग परिवर्तन जैसा महान कार्य होता तो भगवान की इच्छा, योजना एवं क्षमता के आधार पर ही है पर उसका श्रेय वे ऋषि कल्प जीवनयुक्त आत्माओं को देते रहते हैं। यही उनकी साधना का-पवित्रता का सर्वोत्तम उपहार है। हमें भी इसी प्रकार का श्रेय उपहार देने की भूमिका बनी और हम कृतकृत्य हो गये। हमें सुदूर भविष्य की झाँकी अभी से दिखाई पड़ती है, इसी कारण हमें यह लिख सकने में संकोच रंचमात्र भी नहीं होता।

अब पुरातन काल के ऋषियों में से किसी का भी स्थूल शरीर नहीं है, पर सूक्ष्म शरीर से उनकी चेतना निर्धारित स्थानों में मौजूद है। सभी से हमारा परिचय कराया गया और कहा गया कि इन्हीं के पद चिन्हों पर चलना है। इन्हीं की कार्य पद्धति अपनानी, देवात्मा हिमालय के प्रतीक स्वरूप शांतिकुंज हरिद्वार में एक आश्रम बनाना और ऋषि परम्परा को इस प्रकार कार्यान्वित करना है, जिससे युग परिवर्तन की प्रक्रिया का गतिचक्र सुव्यवस्थित रूप से चल पड़े।

जिन ऋषियों, तपःपूत महामानवों ने कभी हिमालय में रहकर विभिन्न कार्य किये थे, उनका स्मरण हमें मार्गदर्शक सत्ता ने तीसरी यात्रा में बार-बार दिलाया था। इनमें थे, भगीरथ (गंगोत्री), परशुराम (यमुनोत्री), चरक (केदारनाथ), व्यास (बद्रीनाथ), याज्ञवल्क्य (त्रियुगीनारायण), नारद (गुप्तकाशी), आद्य शंकराचार्य (ज्योतिर्मठ), जमदग्नि (उत्तरकाशी), पातंजलि (रुद्रप्रयाग), वशिष्ठ (देवप्रयाग), पिप्पलाद, सूत शौनिक, लक्ष्मण, भरत एवं शत्रुघ्न (ऋषिकेश), दक्ष प्रजापति, कणाद एवं विश्वामित्र सहित सभी सप्त ऋषिगण। इसके अतिरिक्त चैतन्य महाप्रभु, सन्त ज्ञानेश्वर एवं तुलसीदास जी के कर्त्तव्यों की झाँकी दिखाकर भगवान बुद्ध के परिव्रज्या धर्मचक्र प्रवर्तन अभियान को युगानुकूल परिस्थितियों में संगीत, संकीर्तन एवं प्रज्ञा पुराण कथा के माध्यम से देश-विदेश में फैलाने एवं प्रज्ञावतार द्वारा बुद्धावतार का उत्तरार्ध पूरा किए जाने का भी निर्देश था। समर्थ रामदास के रूप में जन्मलेकर जिस प्रकार व्यायामशालाओं महावीर मन्दिरों की स्थापना सोलहवीं सदी में हमसे कराई गयी थी, उसी को नूतन अभिनव रूप में प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञापीठों, चरणपीठों, ज्ञान मन्दिर स्वाध्याय मण्डलों द्वारा सम्पन्न किए जाने के संकेत मार्गदर्शक द्वारा हिमालय प्रवास में ही दे दिये गए थे।

देवात्मा हिमालय का प्रतीक प्रतिनिधि शांतिकुंज को बना देने का जो निर्देश मिला वह कार्य साधारण नहीं श्रम एवं धन साध्य था। सहयोगियों की सहायता पर निर्भर भी। इसके अतिरिक्त अध्यात्म के उस ध्रुव केन्द्र में सूक्ष्म शरीर से निवास करने वाले ऋषियों की आत्मा का आह्वान करके प्राण प्रतिष्ठा का संयोग भी बिठाना था। यह सभी कार्य ऐसे हैं, जिन्हें देवालय परम्परा में अद्भुत एवं अनुपम कहा जा सकता है। देवताओं के मन्दिर अनेक जगह बने हैं। वे भिन्न-भिन्न भी हैं। एक ही जगह सारे देवताओं की स्थापना का तो कहीं सुयोग हो भी सकता है, पर समस्त देवात्माओं ऋषियों की एक जगह प्राण प्रतिष्ठा हुई हो ऐसा तो संसार भर में अन्यत्र कहीं भी नहीं है। फिर इससे भी बड़ी बात यह है कि ऋषियों के क्रिया-कलापों की गतिविधियों का न केवल चिन्ह पूजा के रूप में वरन् यथार्थता के रूप में भी यहाँ न केवल दर्शन वरन् परिचय भी प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार शांतिकुंज ब्रह्मवर्चस गायत्री तीर्थ एक प्रकार से प्रायः सभी ऋषियों के क्रिया कलापों का प्रतिनिधित्व करता है।

भगवान राम ने लंका विजय और रामराज्य स्थापना के निमित्त मंगलाचरण रूप रामेश्वरम् पर शिव प्रतीक की स्थापना की थी। हमारा सौभाग्य है कि हमें युग परिवर्तन हेतु संघर्ष एवं सृजन प्रयोजन के लिए देवात्मा हिमालय की प्रतिमा प्राण प्रतिष्ठा समेत करने का आदेश मिला। शान्तिकुंज में देवात्मा हिमालय का भव्य मन्दिर पाँचों प्रयागों, पांचों काशियों, पांचों सरिताओं और पाँचों सरोवरों समेत देखा जा सकता है। इसमें सभी ऋषियों के स्थानों के भी दिव्य दर्शन हैं। इसे अपने ढंग का अद्भुत एवं अनुपम देवालय कहा जा सकता है। जिसने हिमालय के उन दुर्गम क्षेत्रों के कभी दर्शन न किये हों, वे इस लघु संस्करण के दर्शन से ही वही लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

जमदग्नि पुत्र परशुराम के फरसे ने अनेकों उद्धत उच्छृंखलों के सिर काटे थे। यह वर्णन अलंकारिक भी हो सकता है। उन्होंने यमुनोत्री में तपश्चर्या कर प्रखरता की साधना की एवं सृजनात्मक क्रान्ति का मोर्चा सम्भाला। जो व्यक्ति तत्कालीन समाज के निर्माण में बाधक अनीति में लिप्त थे, उनकी वृत्तियों का उन्होंने उन्मूलन किया। दुष्ट और भ्रष्ट जनमानस के प्रवाह को उलट कर सीधा करने का पुरुषार्थ उन्होंने निभाया। इसी आधार पर उन्हें भगवान शिव से “परशु” (फरसा) प्राप्त हुआ। उत्तरार्ध में उन्होंने फरसा फेंककर फावड़ा थामा एवं स्थूल दृष्टि से वृक्षारोपण तथा सूक्ष्मतः रचनात्मक सत्प्रवृत्तियों का बीजारोपण किया। शांतिकुंज से चलने वाली लेखनी ने वाणी ने उसी परशु की भूमिका निभाई एवं असंख्यों की मान्यताओं, भावनाओं, विचारणाओं एवं गतिविधियों में आमूल-चूल परिवर्तन कर दिया है।

भागीरथ ने जल दुर्भिक्ष के निवारण हेतु कठोर तप करके स्वर्ग से गंगा की धरती पर लाने में सफलता प्राप्त की थी। भागीरथी शिला गंगोत्री के समीपस्थ है। गंगा उन्हीं के तप पुरुषार्थ से अवतरित हुई, इसलिए भागीरथी कहलाई। लोक मंगल के प्रयोजन हेतु प्रचण्ड पुरुषार्थ करके भागीरथी दैवी कसौटी पर खरे उतरे एवं भगवान शिव के कृपा पात्र बने। आज आस्थाओं का दुर्भिक्ष चारों ओर संव्याप्त है। इसे दिव्य ज्ञान की धारा ज्ञान गंगा से ही मिटाया जा सकता है। बौद्धिक और भावनात्मक काल के निवारणार्थ शान्तिकुंज से ज्ञान गंगा का जो अविरल प्रवाह बहा है, उससे आशा बँधती है कि दुर्भिक्ष मिटेगा, सद्भावना का विस्तार चहुँ ओर होगा।

चरक ऋषि ने केदारनाथ क्षेत्र के दुर्गम क्षेत्रों में वनौषधियों की शोध करके रोग ग्रस्तों को निरोग करने वाली संजीवनी खोज निकाली थी। शास्त्र कथन है कि ऋषि चरक औषधियों से वार्ता करके उनके गुण पूछते व समुचित समय में उन्हें एकत्र कर उन पर अनुसंधान करते थे। जीवनी शक्ति सम्वर्धन, मनोविकार शमन एवं व्यवहारिक गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तन करने वाले गुण रखने वाली अनेकों औषधियों इसी अनुसंधान की देन हैं। शांतिकुंज में दुर्लभ औषधियों को खोज निकालने, उनके गुण प्रभाव को आधुनिक वैज्ञानिक यन्त्रों से जाँचने का जो प्रयोग चलता है, उसने आयुर्वेद को एक प्रकार से पुनर्जीवित किया है। सही औषधि के एकाकी प्रयोग से कैसे निरोग रह दीर्घायुष्य बना जा सकता है, यह अनुसंधान इस ऋषि परम्परा हेतु किये जा रहे प्रयासों की एक कड़ी है।

महर्षि व्यास ने नर एवं नारायण पर्वत के मध्य वसुधारा जल प्रपात के समीप व्यास गुफा में गणेशजी की सहायता से पुराण लेखन का कार्य किया था। उच्चस्तरीय कार्य हेतु एकाकी, शान्त, सतोगुणी वातावरण ही अभीष्ट था। आज की परिस्थितियों में, जबकि प्रेरणादायी साहित्य का अभाव है, पुरातन ग्रन्थ लुप्त हो चले, शांतिकुंज में विराजमान तन्त्री ने आज से पच्चीस वर्ष पूर्व ही चारों वेद अठारह पुराण, 108 उपनिषद्, छहों दर्शन, चौबीस गीताएँ, आरण्यक, ब्राह्मण आदि ग्रन्थों का भाष्य कर सर्वसाधारण के लिये सुलभ एवं व्यावहारिक बनाकर रख दिया था। साथ ही जनसाधारण की हर समस्या पर व्यावहारिक समाधान परक युगानुकूल साहित्य सतत् लिखा है, जिसने लाखों व्यक्तियों के मन-मस्तिष्क को प्रभावित कर सही दिशा दी है। प्रज्ञापुराण के 18 खण्ड नवीनतम सृजन है, जिसमें कथा साहित्य के माध्यम से उपनिषद् दर्शन को जन-सुलभ बनाया गया है।

पातंजलि ने रुद्र प्रयाग में अलकनन्दा एवं मन्दाकिनी के संगम स्थल पर योग विज्ञान के विभिन्न प्रयोगों का आविष्कार और प्रचलन किया था। उन्होंने प्रमाणित किया कि मानवी काया निहित सूक्ष्म शक्ति संस्थानों में अगणित आत्मिक ऊर्जा का भण्डार है। इस शरीर तन्त्र के ऊर्जा केन्द्रों को प्रसुप्ति से जागृति में लाकर मनुष्य देवमानव बन सकता है, रिद्धि-सिद्धि सम्पन्न बन सकता है। शान्तिकुंज में योग साधना के विभिन्न अनुशासनों योगत्रयी, कायाकल्प एवं आसन-प्राणायाम के माध्यम से इस मार्ग पर चलने वाले जिज्ञासु साधकों की बहुमूल्य यन्त्र उपकरणों से शारीरिक-मानसिक परीक्षा सुयोग्य चिकित्सकों से कराने के उपरान्त साधना लाभ दिया जाता है एवं भावी जीवन सम्बन्धी दिशाधारा प्रदान की जाती है।

याज्ञवल्क्य ने त्रियुगीनारायण में यज्ञ विद्या का अन्वेषण किया था और उनके भेद-उपभेदों का परिणाम मनुष्य एवं समग्र जीव जगत के स्वास्थ्य सम्वर्धन हेतु, वातावरण शोधन, वनस्पति सम्वर्धन एवं पर्जन्य वर्षण के रूप में जाँचा परखा था। हिमालय के इस दुर्गम स्थान पर सम्प्रति एक यज्ञकुण्ड में अखण्ड अग्नि है जिसे शिव-पार्वती विवाह के समय से प्रज्वलित माना जाता है। यह उस परम्परा की प्रतीक अग्नि शिखा है। आज यज्ञ विज्ञान की लुप्त प्राय श्रृंखला को फिर से खोजकर समय के अनुरूप अन्वेषण करने का दायित्व ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने अपने कंधों पर लिया है। यज्ञोपचार पद्धति (यज्ञोपैथी) के अनुसंधान हेतु समय के अनुरूप एक सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला आधुनिक उपकरणों से युक्त ब्रह्मवर्चस प्राँगण के मध्य में विद्यमान है। वनौषधि यजन से शारीरिक, मानसिक रोगों के उपचार, मनोविकार शमन जीवनीशक्ति वर्धन, प्राणवान पर्जन्य की वर्षा एवं पर्यावरण संतुलन जैसे प्रयोगों के निष्कर्ष देखकर जिज्ञासुओं को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

विश्वामित्र गायत्री महामन्त्र के दृष्टा, नूतन सृष्टि के सृजेता माने गये हैं। उनने सप्तर्षियों सहित जिस क्षेत्र में तप करके आद्यशक्ति का साक्षात्कार किया था, वह पावन भूमि यही गायत्री तीर्थ शान्तिकुँज की है, जिसे हमारे मार्गदर्शक ने दिव्य चक्षु प्रदान करके दर्शन कराये थे एवं आश्रम निर्माण हेतु प्रेरित किया था। विश्वामित्र की सृजन साधना के सूक्ष्म संस्कार यहाँ सघन हैं। महाप्रज्ञा को युग शक्ति का रूप देने, उनकी चौबीस मूर्तियों की स्थापना कर सारे राष्ट्र एवं विश्व में आद्यशक्ति का वसुधैव कुटुम्बकम् एवं सद्बुद्धि की प्रेरणा वाला संदेश यहीं से उद्घोषित हुआ। अनेकों साधकों ने यहाँ गायत्री अनुष्ठान किए हैं एवं आत्मिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त की है। शब्द शक्ति एवं सावित्री विधा पर वैज्ञानिक अनुसंधान विश्वमित्र परम्परा का ही पुनर्जीवन है।

जमदग्नि का गुरुकुल-आरण्यक उत्तरकाशी में स्थित था एवं बालकों वानप्रस्थों की समग्र शिक्षा व्यवस्था का भांडागार था। अल्पकालीन साधना, प्रायश्चित, संस्कार आदि कराने एवं प्रौढ़ों के वानप्रस्थ शिक्षण की यहाँ समुचित व्यवस्था थी। प्रखर व्यक्तित्वों को उत्पादन, वानप्रस्थ- परिव्रज्या हेतु लोकसेवियों का शिक्षण, गुरुकुल में बालकों को नैतिक शिक्षण तथा युग शिल्पी विद्यालय में समाज निर्माण की विधा का समग्र शिक्षण इस ऋषि परम्परा को आगे बढ़ाने हेतु शाँतिकुँज द्वारा संचालित ऐसे ही क्रिया-कलाप हैं।

देवर्षि नारद ने गुप्त काशी में तपस्या की थी। वे निरन्तर अपने वीणावादन से जन-जागरण में निरत रहते थे। उन्होंने सत्परामर्श द्वारा भक्ति भावनाओं को प्रसुप्ति से प्रौढ़ता तक समुन्नत किया था। शान्तिकुँज के युग-गायन शिक्षण विद्यालय ने अब तक हजारों ऐसे परिव्राजक प्रशिक्षित किए हैं। वे एकाकी अपने अपने क्षेत्रों में एवं समूह में जीप टोली द्वारा भ्रमण कर नारद परम्परा का ही अनुकरण कर रहे हैं।

देव प्रयाग में राम को योग वसिष्ठ का उपदेश देने वाले वशिष्ठ ऋषि धर्म और राजनीति का समन्वय करके चलते थे। शान्तिकुँज के सूत्रधार ने सन् 1930 से 1947 तक आजादी की लड़ाई लड़ी है। जेल में कठोर यातनाएँ सही हैं। बाद में साहित्य के माध्यम से समाज एवं राष्ट्र का मार्गदर्शन किया है। धर्म और राजनीति के समन्वय साहचर्य के लिए जो वन पड़ा है, हम उसे पूरे मनोयोग से करते रहे हैं।

आद्य शंकराचार्य ने ज्योतिर्मठ में तप किया एवं चार धामों की स्थापना देश के चार कोनों पर की। विभिन्न संस्कृतियों का समन्वय एवं धार्मिक संस्थानों के माध्यम से जन जागरण उनका लक्ष्य था। शान्तिकुंज के तत्वावधान में 2400 गायत्री शक्ति पीठें विनिर्मित हुई हैं, जहाँ धर्म धारणा को समुन्नत करने का कार्यं निरंतर चलता रहता है। इसके अतिरिक्त बिना इमारत वाले चल प्रज्ञा संस्थानों एवं स्वाध्याय मण्डलों द्वारा सारे देश में चेतना केन्द्रों का जाल बिछाया गया है। ये सभी चार धामों की परम्परा में अपने-अपने क्षेत्रों में युग चेतना का आलोक वितरण कर रहे हैं।

ऋषि पिप्पलाद ने ऋषिकेश के समीप ही अन्न के मन पर प्रभाव का अनुसंधान किया था। वे पीपल वृक्ष के फलों पर निर्वाह करके आत्म संयम द्वारा ऋषित्व पा सके। हमने चौबीस वर्ष तक जौ की रोटी एवं छाछ पर रहकर गायत्री अनुष्ठान किए। तदुपरान्त आजीवन आहार उबले अन्न शाक ही रहे। अभी भी उबले अन्न एवं हरी वनस्पतियों के कल्प प्रयोगों की प्रतिक्रिया की जाँच-पड़ताल शांतिकुंज में अमृताशन-शोध के नाम से चलती रहती है। ऋषिकेश में ही सूत शौनिक कथा-पुराण वाचन से ज्ञान सत्र जगह-जगह लगाते थे। प्रज्ञा पुराणों का कथा वाचन इतना लोकप्रिय हुआ है कि लोग इसे युग पुराण कहते हैं। तीन भाग इसके छप चुके, पन्द्रह और प्रकाशित होने हैं।

हर की पौड़ी हरिद्वार में सर्व मेध यज्ञ में हर्षवर्धन ने अपनी सारी सम्पदा तक्षशिला विश्वविद्यालय निर्माण हेतु दान कर थी। शाँतिकुँज के सूत्रधार ने अपनी लाखों की सम्पदा गायत्री तपोभूमि तथा जन्मभूमि में विद्यालय निर्माण हेतु दे दी। स्वयं या संतान के लिए इनमें से एक पैसा भी नहीं रखा। इसी परम्परा को अब शाँतिकुँज से स्थायी रूप से जुड़ते जा रहे लोक सेवी निभा रहे हैं।

कणाद ऋषि ने अथर्ववेदीय शोध परम्परा के अंतर्गत अपने समय में अणु विज्ञान का एवं वैज्ञानिक अध्यात्मवाद का अनुसंधान किया था। बुद्धिवादी पीढ़ी के गले उतारने के लिए समय के अनुरूप अब आप्त वचनों के साथ-साथ तर्क, तथ्य एवं प्रमाण भी अनिवार्य हैं। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में अध्यात्म देव एवं विज्ञान दैत्य के समन्वय का समुद्र मंथन चल रहा है। दार्शनिक अनुसंधान ही नहीं, वैज्ञानिक प्रमाणों का प्रस्तुतीकरण भी इसकी सबसे बड़ी विशेषता है। इसकी उपलब्धियों के प्रति संसार बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाये बैठा है।

बुद्ध के परिव्राजक संसार भर में धर्म चक्र प्रवर्तन हेतु दीक्षा लेकर निकले थे। शाँतिकुँज में मात्र अपने देश में धर्मधारणा के विस्तार हेतु ही नहीं, संसार के सभी देशों में देव संस्कृति का संदेश पहुँचाने हेतु परिव्राजक दीक्षित होते हैं। वहाँ से आये परिजनों को यहाँ धर्म चेतना से अनुप्राणित किया जाता है। भारत में ही प्रायः एक लाख प्रज्ञापुत्र प्रव्रज्या में निरत रह घर-घर अलख जगाने का कार्य कर रहे हैं।

आर्यभट्ट ने सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रहों का ग्रह गणित कर यह जाना था कि पृथ्वी के साथ सौर परिवार का क्या आदान-प्रदान क्रम है और इस आधार पर धरित्री का वातावरण एवं प्राणी समुदाय कैसे प्रभावित होता है। शाँतिकुंज में एक समग्र वेधशाला बनायी गयी है एवं आधुनिक यन्त्रों का उसके साथ समन्वय स्थापित कर ज्योतिर्विज्ञान का अनुसंधान कार्य किया जा रहा है। दृश्य गणित पंचाँग यहाँ की एक अनोखी देन है।

चैतन्य महाप्रभु, सन्त ज्ञानेश्वर, समर्थ गुरु रामदास, प्राणनाथ महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस आदि सभी मध्य कालीन सन्तों की धर्मधारणा विस्तार परम्परा का अनुसरण शान्तिकुंज में किया गया है।

सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग यह है कि इस आश्रम का वातावरण इतने प्रबल संस्कारों से युक्त है कि सहज ही व्यक्ति अध्यात्म की ओर प्रेरित होता चला जाता है। यह सूक्ष्म सत्ताधारी ऋषियों की यहाँ उपस्थिति की ही परिणति है। वे अपने द्वारा सम्पन्न क्रियाओं का यह पुनर्जीवन देखते होंगे तो निश्चय ही प्रसन्न होकर भावभरा आशीर्वाद देते होंगे। ऋषियों के तप प्रताप से ही यह धरती देवमानवों से धन्य हुई है। वाल्मीकि आश्रम में लव−कुश एवं कण्व आश्रम में चक्रवर्ती भरत विकसित हुए। कृष्ण रुकमणी ने बद्रीनारायण में तप करके कृष्ण सदृश्य प्रद्युम्न को जन्म दिया। पवन एवं अंजनी ने तपस्वी पूषा के आश्रम में बजरंग बली को जन्म दिया। यह हिमालय क्षेत्र में बन पड़ी तप साधना के ही चमत्कारी वरदान थे।

संस्कारवान क्षेत्र एवं तपस्वियों के संपर्क लाभ के अनेकों विवरण हैं। स्वाति बूँद पड़ने से सीप में मोती बनते हैं, बांस में वंशलोचन एवं केले में कपूर। चन्दन के निकटवर्ती झाड़-झंकार भी उतने ही सुगन्धित हो जाते हैं। पारस स्पर्श कर लोहा सोना बन जाता है। हमारे मार्गदर्शक सूक्ष्म शरीर से पृथ्वी के स्वर्ग इसी हिमालय क्षेत्र में शताब्दियों से रहते आए हैं, जिसके द्वार पर हम बैठे हैं। हमारी बैटरी चार्ज करने के लिए समय समय पर वे बुलाते रहते हैं। जब भी उन्हें नया काम सौंपना हुआ है, तब नई शक्ति देने हमें वहीं बुलाया गया है और लौटने पर हमें नया शक्ति भण्डार भरकर वापस आने का अनुभव हुआ है।

हम प्रज्ञा पुत्रों को-जागृतात्माओं को युग परिवर्तन में रीछ वानरों की, ग्वाल वालों की, भूमिका निभाने की क्षमता अर्जित करने के लिए शिक्षण पाने या साधना करने के निर्मित बहुधा शान्तिकुंज बुलाते रहते हैं। इस क्षेत्र की अपनी विशेषता है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, प्राण चेतना से भरा-पूरा वातावरण एवं दिव्य संरक्षण यहाँ उपलब्ध है। इसमें थोड़े समय भी निवास करने वाले अपने में काया कल्प जैसा परिवर्तन हुआ अनुभव करते हैं। उन्हें लगता है कि वस्तुतः किसी जाग्रत तीर्थ में निवास करके अभिनव चेतना उपलब्ध करके वे वापस लौट रहे हैं। यह एक प्रकार का अध्यात्मिक सेनीटोरियम है।

साठ वर्ष से जल रहा अखण्ड दीपक, नौ कुण्ड की यज्ञशाला में नित्य दो घण्टे यज्ञ, दोनों नवरात्रियों में 24-24 लक्ष के गायत्री महापुरश्चरण, साधना आरण्यक में नित्य गायत्री उपासकों द्वारा नियमित अनुष्ठान, इन सब बातों से ऐसा दिव्य वातावरण यहाँ विनिर्मित होता है जैसा मलयागिरि में चन्दन वृक्षों की मनभावन सुगन्ध का। बिना साधना किये भी यहाँ वैसा ही आनन्द आता है मानो यह समय तप साधना में बीता। शान्तिकुंज गायत्री तीर्थ की विशेषता यहाँ सतत् दिव्य अनुभूति होने की है। यह संस्कारित सिद्ध पीठ है क्योंकि यहाँ सूक्ष्म शरीरधारी वे सभी ऋषि क्रिया-कलापों के रूप में विद्यमान हैं, जिनका वर्णन यहाँ किया गया।




अण्डे बहा ले गया (kahani) - Akhandjyoti April 1985

समुद्र टिटिहरी के अण्डे बहा ले गया। अनुरोध करने पर भी वापस करने को तैयार न हुआ। टिटिहरी चोंच में बालू भर-भर कर समुद्र में डालने लगी। अगस्त ऋषि यह दृश्य देख रहे थे। कारण पूछने पर उसने ऋषि को सारी बात बता दी। और कहा अण्डा मिलने या जीवन जाने तक मेरा प्रयास चलता रहेगा।

ऐसे संकल्पवान की सहायता करने का अगस्त का मन हुआ। उनने तीन चुल्लू में समुद्र पी लिया। घबराकर उसने अण्डे वापस कर दिये। तब उसे त्राण मिला। संकल्पवान, साहसी और कर्मठ आदर्शवादियों को सहयोगियों की कमी नहीं रहती।




हमने जीवन भर बोया एवं काटा - Akhandjyoti April 1985

हिमालय यात्रा से हरिद्वार लौटकर आने के बाद जब आश्रम का प्रारम्भिक ढाँचा बनकर तैयार हुआ तो विस्तार हेतु साधनों की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। समय की विषमता ऐसी थी कि जिससे जूझने के लिए हमें कितनी ही साधनों, व्यक्तित्वों एवं पराक्रमों की आवश्यकता अपेक्षित थी। दो काम करने थे- एक संघर्ष, दूसरा सृजन। संघर्ष उन अवाँछनीयताओं से, जो अब तक की संचित सभ्यता, प्रगति और संस्कृति को निगल जाने के लिये मुँह बायें खड़ी हैं। सृजन उसका जो भविष्य को उज्ज्वल एवं सुख-शान्ति से भरा-पूरा बना सके। दोनों ही कार्यों का प्रयोग समूचे धरातल पर निवास करने वाले 500 करोड़ मनुष्यों के लिए करना ठहरा था, इसलिये विस्तार क्रम, अनायास से अधिक हो जाता है।

निज के लिए हमें कुछ भी न करना था। पेट भरने के लिए जिस स्रष्टा ने कीट-पतंगों तक के लिए व्यवस्था बना रखी है, वह हमें क्यों भूखा रहने देगा। भूखे उठते तो सब हैं, पर खाली पेट सोता कोई नहीं। इस विश्वास ने निजी कामनाओं का आरम्भ में ही समापन कर दिया। न लोभ ने कभी सताया, न मोह ने। वासना, तृष्णा और अहन्ता में से कोई भी भव-बन्धन बाँधकर पीछे न लग सकी। जो करना था, भगवान के लिए करना था, गुरुदेव के निर्देशन पर करना था। उन्होंने संघर्ष और सृजन के दो ही काम, सौंपे थे, सो उन्हें करने में सदा उत्साह ही रहा। टाल-मटोल करने की न प्रवृत्ति थी और न कभी इच्छा हुई। जो करना, सो तत्परता और तन्मयता से करना, यह आदत जन्मदान दिव्य अनुदान के रूप में मिली और अद्यावधि यथावत् बनी रही।

जिन साधनों की नव सृजन के लिए आवश्यकता थी, वे कहाँ से मिलें, कहाँ से आयें? इस प्रश्न के उत्तर में मार्गदर्शक ने हमें हमेशा एक ही तरीका बताया था कि ‘बोओ और काटो’। मक्का और बाजरा का एक बीज जब पौधा बनकर फलता है तो एक के बदले सौ नहीं वरन् उससे भी अधिक मिलता है। द्रौपदी ने किसी सन्त को अपनी साड़ी फाड़कर दी थी, जिससे उन्होंने लंगोटी बनाकर अपना काम चलाया था। वहीं आड़े समय में इतनी लंबी बनी कि उस साड़ियों के गट्ठे को सिर पर रखकर भगवान को स्वयं भागकर आना पड़ा। “जो तुझे पाना है, उसे बोना आरम्भ कर दे।” -यही बीज मन्त्र हमें बताया और अपनाया गया। प्रतिफल ठीक वैसा ही निकला जैसा कि संकेत किया गया।

शरीर, बुद्धि और भावनाएँ स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के साथ भगवान सबको देते हैं। धन स्व उपार्जित होता है। कोई हाथों-हाथ कमाते हैं तो कोई पूर्व संचित संपदा को उत्तराधिकार में पाते हैं। हमने कमाया तो नहीं था पर उत्तराधिकार में अवश्य समुचित मात्रा में पाया। इन सबको बो देने और समय पर काट लेने के लायक गुँजाइश थी, सो बिना समय गँवाये उस प्रयोजन में अपने को लगा दिया।

रात में भगवान का भजन कर लेना और दिन भर विराट् ब्रह्म के लिए-विश्व मानव के लिये समय और श्रम नियोजित रखना, यह शरीर साधना के रूप में निर्धारित किया गया।

बुद्धि दिन भर जागने में ही नहीं, रात्रि के सपने में भी लोक मंगल की विधाएँ विनिर्मित करने में लगी रही। अपने निज के लिये सुविधा संपदा कमाने का ताना-बाना बुनने की कभी इच्छा ही नहीं हुई। अपनी भावनाएँ सदा विराट् के लिये लगी रहीं। प्रेम, किसी वस्तु या व्यक्ति से नहीं, आदर्शों से किया। गिरों का उठाने और पिछड़ों को बढ़ाने की ही भावनाएँ सतत् उमड़ती रहीं।

इस विराट् को ही हमने अपना भगवान माना। अर्जुन के दिव्य चक्षु ने इसी विराट् के दर्शन किये थे। यशोदा ने कृष्ण में सृष्टा का यही स्वरूप देखा था। राम ने पालने में पड़े-पड़े माता कौशल्या को अपना यही रूप दिखाया था और काक भुशुंडी इसी स्वरूप की झाँकी करके धन्य हुये थे।

हमने भी अपने पास जो कुछ था, उसी विराट् ब्रह्म को-विश्व मानव को सौंप दिया। बोने के लिये इससे उर्वर खेत दूसरा कोई हो नहीं सकता था। वह समयानुसार फला-फूला। हमारे कोठे भर दिये गये। सौंपे गये दो कामों के लिये जितने साधनों की जरूरत थी, वे सभी उसी में जुट गये।

शरीर जन्मजात दुर्बल था। शारीरिक बनावट की दृष्टि से उसे दुर्बल कह सकते हैं, जीवनी शक्ति तो प्रचण्ड थी ही। जवानी में बिना शाक, घी, दूध के 24 वर्ष तक जौ की रोटी और छाछ लेते रहने से वह और कुश हो गया था। पर जब बोने काटने की विद्या अपनाई तो पचहत्तर वर्ष की इस उम्र में वह इतना सुदृढ़ है कि कुछ ही दिन पूर्व उसने एक बिगड़ैल साँड को कन्धे का सहारा देकर चित्त पटक दिया और उससे भागते ही बना।

सर्वविदित है ही कि अनीति एवं आतंक के पक्षधर एक किराये के हत्यारे ने एक वर्ष पूरे पाँच बोर की रिवाल्वर से लगातार हम पर फायर किये और उसकी सभी गोलियाँ नलियों में उलझी रह गईं। अबकी बार वह छुरेबाजी पर उतर आया। छुरे चलते रहे। खून बहता रहा। पर भौंके गये सारे प्रहार शरीर में सीधे न घुसकर तिरछे फिसलकर निकल गये। डॉक्टरों ने जख्म सी दिये और कुछ ही सप्ताह में शरीर ज्यों का त्यों हो गया।

इसे परीक्षा का एक घटनाक्रम ही कहना चाहिये कि पाँच बोर का लोडेड रिवाल्वर शातिर हाथों से भी काम न कर सके। जानवर काटने के छुरे के बारह प्रहार मात्र प्रमाण के निशान छोड़कर अच्छे हो गये। आक्रमणकारी अपने बम से स्वयं घायल होकर जेल जा बैठा। जिसके आदेश से उसने यह किया था, उसे फाँसी की सजा घोषित हुई। असुरता के आक्रमण असफल हुये। एक उच्चस्तरीय दैवी प्रयास को निष्फल कर देना संभव न हो सका। मारने वाले से बचाने वाला बड़ा सिद्ध हुआ।

इन दिनों एक से पाँच करने की सूक्ष्मीकरण विद्या चल रही है। इसीलिये क्षीणता तो आई है। तो भी बाहर से काया ऐसी है, जिसे जितने दिन चाहें जीवित रखा जा सके। पर हम जान-बूझकर इसे इस स्थिति में रखेंगे नहीं। कारण कि सूक्ष्म शरीर से अधिक काम लिया जा सकता है और स्थूल शरीर उसमें किसी कदर बाधा ही डालता है।

शरीर की जीवनी शक्ति असाधारण रही है। उसके द्वारा दस गुना काम लिया गया है। शंकराचार्य, विवेकानन्द बत्तीस पैंतीस वर्ष जिये, पर 350 वर्ष के बराबर काम कर सके। हमने 75 वर्षों में विभिन्न स्तर के इतने काम किये हैं कि उनका लेखा-जोखा लेने पर वे 750 वर्ष से कम में होते संभव प्रतीत नहीं होते। यह सारा समय नव सृजन की एक से एक अधिक सफल भूमिकाऐं बनाने में लगा है। निष्क्रिय, निष्प्रयोजन कभी नहीं खाली रहा।

बुद्धि को भगवान के खेत में बोया और वह असाधारण प्रतिभा बनकर प्रकटी। अभी तक लिखा हुआ साहित्य इतना है जिसे शरीर के वजन से तोला जा सके। यह सभी उच्च कोटि का है। आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद से लेकर प्रज्ञा युग की भावी पृष्ठभूमि बनाने वाला ही सब कुछ लिखा गया है। आगे का सन् 2000 तक का हमने अभी से लिखकर रख दिया है।

अध्यात्म को विज्ञान से मिलाने की योजना कल्पना में तो कइयों के मन में थी पर उसे कोई कार्यान्वित न कर सका। इस असंभव होते देखना हो तो ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में आकर अपनी आँखों से स्वयं देखना चाहिये। जो संभावनायें सामने हैं उन्हें देखते हुये कहा जा सकता है कि अगले दिनों अध्यात्म की रूपरेखा विशुद्ध विज्ञान परक बनकर रहेगी।

छोटे-छोटे देश अपनी पंचवर्षीय योजनायें बनाने के लिये आकाश-पाताल के कुलावे मिलाते हैं। पर समस्त विश्व की काया-कल्प योजना का चिन्तन और क्रियान्वयन जिस प्रकार शान्तिकुंज के तत्वावधान में चल रहा है, उसे एक शब्द में अद्भुत एवं अनुपम ही कहा जा सकता है।

भावनायें हमने पिछड़ों के लिए समर्पित की हैं। शिव ने भी यही किया था। उनके साथ चित्र-विचित्र समुदाय रहता था और सर्पों तक को वे गले लगाते थे। उसी राह पर हमें भी चलते रहना पड़ा है। हम पर छुरा रिवाल्वर चलाने वाले को पकड़ने वाले जब दौड़ रहे थे, पुलिस भी लगी हुई थी। सभी को हमने वापस बुला लिया और घातक को जल्दी ही भाग जाने का अवसर दिया। जीवन में ऐसे अनेकों प्रसंग आए हैं, जब प्रतिपक्षी अपनी ओर से कुछ न रहने देने पर भी मात्र हँसने और हँसाने के रूप में प्रतिदान पाते रहे हैं।

हमसे जितना प्यार लोगों से किया है, उससे सौ गुनी संख्या और मात्रा में लोग हमारे ऊपर प्यार लुटाते रहे हैं। निर्देशों पर चलते रहे हैं और घाटा उठाने तथा कष्ट सहने में पीछे नहीं रहे हैं। कुछ दिन पूर्व, प्रज्ञा संस्थान बनाने का स्वजनों को आदेश किया तो दो वर्ष के भीतर 2400 गायत्री शक्ति पीठों की भव्य इमारतें बन कर खड़ी हो गईं और उसमें लाखों रुपयों की राशि रकम खप गई। बिना इमारत के 12 हजार प्रज्ञा संस्थान बने सो अलग। छुरा लगा तो सहानुभूति में इतनी बड़ी संख्या स्वजनों की उमड़ी, मानों मनुष्यों का आँधी तूफान आया हो। इनमें से हर एक बदला लेने के लिए आतुरता व्यक्त कर रहा था। हमने-माताजी ने सभी को दुलारकर दूसरी दिशा में मोड़ा। यह हमारे प्रति प्यार की-सघन आत्मीयता की ही अभिव्यक्ति तो है।

हमने जीवन भर प्यार खरीदा बटोरा और लुटाया है। इसका एक नमूना हमारी धर्मपत्नी, जिन्हें हम माताजी कहकर सम्बोधित करते हैं, की भावनाएं पढ़कर कोई भी समझ सकता है। वे काया और छाया की तरह साथ रही हैं और एक प्राण दो शरीर की तरह हमारे हर काम में हर घड़ी हाथ बंटाती रही हैं।

पशु-पक्षियों तक का हमने ऐसा प्यार पाया है कि वे स्वजन सहचर की तरह आगे-पीछे फिरते रहे हैं। लोगों ने आश्चर्य से देखा है कि सामान्यतः जो प्राणी मनुष्य से सर्वथा दूर रहते हैं वे किस तरह कन्धे पर बैठते, पीछे-पीछे फिरते और चुपके से बिस्तर में आ सोते हैं। ऐसे दृश्य हजारों ने हजारों की संख्या में देखे और आश्चर्यचकित रह गये हैं। यह और कुछ नहीं प्रेम का प्रतिदान मात्र था।

धन की हमें समय-समय पर भारी आवश्यकता पड़ती रही है। गायत्री तपोभूमि, शांतिकुंज और ब्रह्मवर्चस् की इमारतें करोड़ों रुपया मूल्य की है। मनुष्य के आगे हाथ न पसारने का व्रत निबाहते हुए अयाचक व्रत-निबाहते हुए यह सारी आवश्यकताएँ पूरी हुई हैं। पूरा समय काम करने वालों की संख्या एक हजार से ऊपर है। इनकी आजीविका की ब्राह्मणोचित व्यवस्था बराबर चलती रहती है। इनमें योग्यता की दृष्टि से इतने ऊँचे स्तर के लोग हैं कि अन्य किसी सामाजिक संस्था में कदाचित् ही इस स्तर के और इतने लोग हों। इनमें अनेकों ऐसे हैं जो समाज की नहीं, अपनी ही जमा-पूँजी के ब्याज से अपना खर्च चलाते व मिशन की सेवा करते हैं।

प्रेस, प्रकाशन, प्रचार में संलग्न जीप गाड़ियाँ तथा अन्यान्य खर्चें ऐसे हैं, जो समयानुसार बिना किसी कठिनाई के पूरे होते रहते हैं। यह वह फसल है जो अपने पास की एक-एक पाई को भगवान के खेत में बो देने के उपरान्त हमें मिली है। इस फसल पर हमें गर्व है। जमींदारी समाप्त होने पर जो धनराशि मिली, वह गायत्री तपोभूमि निर्माण में दे दी। पूर्वजों की छोड़ी जमीन किसी कुटुम्बी को न देकर जन्मभूमि में हाईस्कूल और अस्पताल बनाने में लगा दी। हम व्यक्तिगत रूप से खाली हाथ हैं पर योजनाएँ ऐसी चलाते हैं जैसी लखपति करोड़पतियों के लिए भी सम्भव नहीं हैं। यह सब हमारे मार्गदर्शक के उस सूत्र के कारण सम्भव हो पाया है, जिसमें उन्होंने कहा था- ‘‘जमा मत करो, बिखेर दो। बोओ और काटो।” सत्प्रवृत्तियों का उद्यान जो प्रज्ञा परिवार के रूप में लहलहाता दृश्यमान होता है, उसकी पृष्ठभूमि इसी सूत्र संकेत के आधार पर बनी है।




Quotation - Akhandjyoti April 1985

महर्षि रमण से एक दिन पूछा गया कि जानवरों में सबसे ज्यादा खतरनाक कौन होते हैं? तो उन्होंने मनुष्यों की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘‘जंगलियों में निन्दक और घरेलुओं में चापलूस।”




चौथा और अन्तिम निर्देशन - Akhandjyoti April 1985

चौथी बार गत वर्ष पुनः हमें एक सप्ताह के लिए हिमालय बुलाया गया। संदेश पूर्ववत् सन्देश रूप में आया। आज्ञा के परिपालन में विलम्ब कहाँ होना था। हमारा शरीर सौंपे हुए कार्यक्रमों में खटता रहा है, किन्तु मन सदैव दुर्गम हिमालय अपने गुरु के पास रहा है। कहने में संकोच होता है पर प्रतीत ऐसा भी होता है कि गुरुदेव का शरीर हिमालय रहता है और मन हमारे इर्द-गर्द मँडराता रहता है। उनकी वाणी अन्तराल में प्रेरणा बनकर गूँजती रहती है। उसी चाबी के कसे जाने पर हृदय और मस्तिष्क का पेण्डुलम धड़कता और उछलता रहता है।

यात्रा पहली तीनों बार की ही तरह कठिन रही। इस बार साधक की परिपक्वता के कारण सूक्ष्म शरीर को आने का निर्देश मिला था। उसी काया को एक साथ तीन परीक्षाओं को पुनः देना था। साधना क्षेत्र में एक बार उत्तीर्ण हो जाने पर पिसे को पीसना भर रह जाता है। मार्ग देखा-भाला था। दिनचर्या बनी बनाई थी। गोमुख से साथ मिल जाना और तपोवन तक सह जा पहुँचना यही क्रम पुनः चला। उनका सूक्ष्म शरीर कहाँ रहता है, क्या करता है यह हमने कभी नहीं पूछा। हमें तो भेंट का स्थान मालूम है- मखमली गलीचा। ब्रह्मकमल की पहचान हो गई थी। उसी को ढूंढ़ लेते और उसी को प्रथम मिलन पर गुरुदेव के चरणों पर चढ़ा देते। अभिवन्दन-आशीर्वाद के शिष्टाचार में तनिक भी देर न लगती और काम की बात तुरन्त आरम्भ हो जाती। यही प्रकरण इस बार भी दुहराया गया। रास्ते में मन सोचता आया कि जब भी जितनी बार भी बुलाया गया है, तभी पुराना स्थान छोड़कर अन्यत्र जाना पड़ा है। इस बार भी सम्वत् वैसा ही होगा। शांतिकुंज छोड़ने के उपरान्त सम्भवतः अब इसी ऋषि प्रदेश में आने का आदेश मिलेगा और इस बार कोई काम पिछले अन्य कामों की तुलना में बड़े कदम के रूप में उठाना होगा। यह रास्ते के संकल्प विकल्प थे। अब तो प्रत्यक्ष भेंट हो रही थी।

अब तक के कार्यों पर उनने अपना प्रसन्नता व्यक्त की। हमने इतना ही कहा- ‘‘काम आप करते हैं और श्रेय मुझ जैसे वानर को देते हैं। समग्र समर्पण कर देने के उपरान्त यह शरीर और मन दिखने भर के लिए ही अलग है वस्तुतः यह सब कुछ आपकी ही सम्पदा है। जब जैसा चाहते हैं, तब वैसा तोड़ मरोड़कर आप ही उपयोग कर लेते हैं।”

गुरुदेव ने कहा- ‘‘अब तक जो बताया और कराया गया है, वह नितान्त स्थानीय था और सामान्य भी। ऐसा जिसे वरिष्ठ मानव कर सकते हैं, भूतकाल में करते भी रहे हैं। तुम अगला काम सम्भालोगे तो यह सारे कार्यं दूसरे तुम्हारे अनुवर्ती लोग आसानी से करते रहेंगे। जो प्रथम कदम बढ़ाता है, उसे अग्रणी होने का श्रेय मिलता है। पीछे तो ग्रह नक्षत्र भी- सौर मण्डल के सदस्य भी अपनी-अपनी कक्षा पर किसी कठिनाई के ढर्रा चला ही रहे हैं।

अगला काम इससे भी बड़ा है। स्थूल वायु मण्डल और सूक्ष्म वातावरण, इन दिनों इतने विषाक्त हो गये हैं, जिससे मानवी गरिमा ही नहीं, सत्ता भी संकट में पड़ गयी है। भविष्य बहुत भयानक दिखता है। इससे परोक्षतः लड़ने के लिए हमें-तुम्हें वह सब कुछ करना पड़ेगा जिसे अद्भुत एवं अलौकिक कहा जा सके।

धरती का घेरा- वायु-जल और जमीन तीनों ही विषाक्त हो रहे हैं। वैज्ञानिक कुशलता के साथ अर्थ लोलुपता के मिल जाने से चल पड़े यन्त्रीकरण ने सर्वत्र विष बिखेर दिया है और ऐसी स्थिति पैदा करती है, जिसमें दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु का जोखिम हर किसी के शिर पर मँडराते लगा है। अणु आयुधों के अनाड़ियों के हाथों प्रयोगों का खतरा इतना बड़ा है कि उसके तनिक से व्यतिक्रम पर सब कुछ भस्मसात् हो सकता है। प्रज्ञा की उत्पत्ति बरसाती घास-पात की तरह हो रही है। यह खायेंगे क्या? रहेंगे कहाँ?, इन सब विपत्तियों विभीषिकाओं से विषाक्त वायुमण्डल धरती को नरक बना देगा।

जिस हवा में लोग साँस ले रहे हैं वह ऐसी है, जिसमें जो भी साँस लेता है, वह अचिन्त्य चिन्तन अपनाता और दुष्कर्म करता है। दुर्मति−जन्य दुर्गति हाथों-हाथ सामने आती जाती है। यह अदृश्य लोक में भर गए विकृत वातावरण का प्रतिफल है। इस स्थिति में जो भी रहेगा, नर पशु और नर पिशाच जैसे क्रिया-कृत्य करेगा। भगवान की इस सर्वोत्तम कृति धरती और सत्ता को इस प्रकार नरक बनते देखने में व्यथा होती है। महाविनाश की सम्भावना से कष्ट होता है। इस स्थिति को बदलने, इस समस्या का समाधान करने के लिए भारी गोवर्धन पर्वत उठाना पड़ेगा, लम्बा समुद्र छलाँगना पड़ेगा। इसके लिए वामन जैसे बड़े कदम उठाने के लिए तुम्हें बुलाया गया है।

इसके लिए तुम्हें एक से पाँच बनकर पाँच मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा। कुन्ती के समान अपनी एकाकी सत्ता को निचोड़कर पाँच देवपुत्रों को जन्म देना होगा जिन्हें भिन्न-भिन्न मोर्चों पर भिन्न भूमिका प्रस्तुत करनी पड़ेगी।

मैंने बात के बीच विक्षेप करते हुए कहा- ‘‘यह तो आपने परिस्थितियों की बात कही। इतना सोचना और समस्या का समाधान खोजना आप बड़ों का काम है। मुझ बालक को तो काम बता दीजिए और सदा की तरह कठपुतली के तारों को अपनी उँगलियों में बाँधकर नाच नचाते रहिए। परामर्श मत कीजिए। समर्पित को तो केवल आदेश चाहिए। पहले भी आपने जब कोई मूक आदेश स्थूलतः या सूक्ष्म सन्देश के रूप में भेजा है, उसमें हमने अपनी ओर से कोई ननुनच नहीं की। चौबीस गायत्री के महापुरश्चरणों के सम्पादन से लेकर स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने तक, लेखनी पकड़ने से लेकर विराट् यज्ञायोजन तक एवं विशाल संगठन खड़ा करने से लेकर करोड़ों की स्थापनाएं करने तक आपकी आज्ञा, संरक्षण एवं मार्गदर्शन ने ही सारी भूमिका निभाई है। दृश्य रूप में हम भले ही सबके समक्ष रहे हों, हमारा अन्तःकरण जानता है कि यह सब कराने वाली सत्ता कौन है? फिर इसमें हमारा सुझाव कैसा, सलाह कैसी? परिस्थितियों के संदर्भ में आपका जो भी निर्देश होगा, वह करेंगे। इस शरीर का एक-एक कण, रक्त की एक-एक बूँद, चिन्तन-अन्तःकरण आपको-विश्व मानवता को समर्पित है।” उनने प्रसन्न वदन स्वीकारोक्त प्रकट की एवं परावाणी से निर्देश व्यक्त करने का उन्होंने संकेत किया।

बात जो विवेचना स्तर की चल रही थी सो समाप्त हो गई और सार संकेत के रूप में जो करना था सो कहा जाने लगा।

“तुम्हें एक से पाँच बनना है। पाँच रामदूतों की तरह, पाँच पाण्डवों की तरह काम पाँच तरह से करने हैं इसलिए इसी शरीर को पाँच बनाना है। एक पेड़ पर पाँच पक्षी रह सकते हैं। तुम अपने को पाँच बनालो। इसे “सूक्ष्मीकरण” कहते हैं। पाँच शरीर सूक्ष्म रहेंगे क्योंकि व्यापक क्षेत्र को सम्भालना सूक्ष्म सत्ता से ही बन पड़ता है। जब तक वे पाँचों परिपक्व होकर अपने स्वतन्त्र काम न सम्भाल सकें, तब तक इसी शरीर से उनका परिपोषण करते रहो। इसमें एक वर्ष भी लग सकता है एवं अधिक समय भी। जब वे समर्थ हो जायें तो उन्हें अपना काम करने हेतु मुक्त कर देना। समय आने पर तुम्हारे दृश्यमान स्थूल शरीर की छुट्टी हो जाएगी।”

यह दिशा निर्देशन हो गया। करना क्या है? कैसे करना है? इसका प्रसंग उन्होंने अपनी वाणी में समझा दिया। इसका विवरण बताने का आदेश नहीं है। जो कहा गया है, उसे कर रहे हैं। संक्षेप में इसे इतना ही समझना पर्याप्त होगा। (1) वायुमण्डल का संशोधन। (2) वातावरण का परिष्कार। (3) नवयुग का निर्माण। (4) महाविनाश का विस्तृतीकरण समापन। (5) देवमानवों का उत्पादन-अभिवर्धन।

“यह पाँचों काम किस प्रकार करने होंगे, इसके लिए अपनी सत्ता को पाँच भागों में कैसे विभाजित करना होगा, भागीरथ और दधीचि की भूमिका किस प्रकार निभानी होगी, इसके लिए लौकिक क्रिया-कलापों से विराम लेना होगा। बिखराव को समेटना पड़ेगा। यही है-सूक्ष्मीकरण।”

“इसके लिए जो करना होगा, समय-समय पर बताते रहेंगे। योजना को असफल बनाने के लिए, इस शरीर को समाप्त करने के लिए जो दानवी प्रहार होंगे उससे बचाते चलेंगे। पूर्व में हुए आसुरी आक्रमण की पुनरावृत्ति कभी भी किसी भी क्रम में सज्जनों-परिजनों पर प्रहार आदि के रूप में हो सकती है। पहले की तरह सबमें हमारा संरक्षण साथ रहेगा। अब तक जो काम तुम्हारे जिम्मे दिया है, उन्हें अपने समर्थ सुयोग्य परिजनों के सुपुर्द करते चलना, ताकि मिशन के किसी काम की चिन्ता या जिम्मेदारी तुम्हारे ऊपर न रहे। जिस महा परिवर्तन का ढाँचा हमारे मन है उसे पूरा तो नहीं बताते पर समयानुसार प्रकट करते रहेंगे। ऐसे विषम समय में उस रणनीति को समय से पूर्व प्रकट करने से उद्देश्य की हानि होगी।”

इस बार हमें अधिक समय रोका नहीं गया। बैटरी चार्ज करके बहुत दिनों तक काम चलाने वाली बात नहीं बनी। उन्होंने कहा कि “हमारी ऊर्जा अब तुम्हारे पीछे अदृश्य रूप में चलती रहेगी। अब हमें एवं जिनकी आवश्यकता होगी, उन ऋषियों को तुम्हारे साथ सदैव रहना और हाथ बँटाते रहना पड़ेगा। तुम्हें किसी अभाव का, आत्मिक ऊर्जा की कमी अनुभव नहीं होगी। वस्तुतः यह 5 गुनी और बढ़ जाएगी।”

हमें विदाई दी गई और शान्तिकुँज लौट आए। अपना कार्यक्रम घोषित करने की तो आज्ञा नहीं मिली है पर पंचकोशों को विकसित करके पाँच वीरभद्र कैसे परिपक्व किए जा सकते हैं और उनसे किस प्रकार क्या काम लिया जा सकता है, उसके विज्ञान को हम प्रकट कर रहे हैं और करते रहेंगे। इन दिनों हमारा एकान्त सेवन चल रहा है, ताकि बिखराव को रोक कर एक केन्द्र पर पूरी शक्ति का संचय किया जा सके।

इन दिनों हम कभी शान्तिकुंज, कभी मोर्चों पर, कभी हिमालय रहेंगे। स्थान, प्रवास समय सम्बन्धी घोषणा अप्रासंगिक है और रणनीति के सिद्धान्तों के प्रतिकूल भी, अतः हमने उसे पर्दे के पीछे ही रहने दिया है।

अभी भी मोहवश अनेकों परिजन हमारे स्थूल शरीर की बाबत पूछ बैठते हैं। इस शरीर ने गत एक वर्ष में अपने भिन्न-भिन्न रूपों में क्या किया हम अभी बताने की स्थिति में नहीं हैं क्रमशः जैसे समय आएगा, सच्ची वास्तविकता को जानेंगे। स्थूल शरीर से क्या बनता बिगड़ता है। वह तो यहाँ सामान्यावस्था में रहकर भी सूक्ष्म रूप में कहीं और अवस्थित हो सकता है। मोटी दृष्टि यह भेद नहीं कर सकती और है भी यह बात सही कि यह विज्ञान सम्मत एवं शक्य नहीं है। यही कारण है कि मौन एकाकी साधना के नाते हमने जान-बूझकर, हृदय पर पत्थर रखकर परिजनों व अपने बीच एक रहस्य भरा पर्दा डाल लिया है। हमारा लौकिक-दृश्य रूप जिन्होंने देखा है, वे भली-भाँति समझते हैं कि एकाकी, अपने परिजनों से स्थूल दृष्टि से दूर रहकर हमें कैसा लगता होगा? हम भी मनुष्य हैं, हमारी भी भाव सम्वेदनाएँ हैं, दिल हमारा भी धड़कता है। परन्तु मानव होने से बड़ा धर्म वह है जो हमें अपने गुरुदेव ने सौंपा है।

इतना स्पष्ट करने व पूर्व में बिताए एक वर्ष का प्रारूप बताकर हम परिजनों से यह कह देना चाहते हैं कि किसी भी स्थिति में हम किसी से भी दूर नहीं हैं। सूक्ष्म होकर तो हम उनके और भी निकट हैं। अभी तो यह देह है। गुरुदेव का यह आश्वासन भी कि हमें अपना यह स्वरूप पाँच वीरभद्रों सहित बनाए रखना है। ऐसे में उन्हें अपने अन्तः में, साधना काल की अवधि में, दिन-रात सोते-जागते, पर हितार्थाय कार्यरत रहते, अपनी जिम्मेदारी निबाहते हुए सतत् अपने समीप हमारी-आदर्शों की समुच्चय परम सत्ता के प्रतिनिधि की उपस्थिति एवं संरक्षण का अनुभव करना चाहिए। दर्शन न मिले इसलिए निराश नहीं होना चाहिए।




Kahaniचन्द्रमा ने डाँटकर कहा (kahani) - Akhandjyoti April 1985

चन्द्रमा ने डाँटकर कहा- ‘‘सिन्धुराज! तुम्हें सारा जल अपने उदर में समेटते लाज नहीं आई। सारी नदियों का जल पीकर भी तुम्हें सन्तोष नहीं।”

समुद्र ने गम्भीर होकर कहा- ‘‘ऐसा न कहें देव! यदि अनावश्यकों से लेकर संसार में जल-वृष्टि का उत्तरदायित्व पूरा न करें तो सृष्टि कैसे चले। शशि को अपने कथन पर बड़ा पश्चात्ताप हुआ। उसने सिर झुका लिया।”




वीरभद्र यह करने में जुटेंगे - Akhandjyoti April 1985

हमारी जिज्ञासाओं एवं उत्सुकताओं का समाधान गुरुदेव प्रायः हमारे अन्तराल में बैठकर ही किया करते हैं। उनकी आत्मा हमें अपने समीप ही दृष्टिगोचर होती रहती है। आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद से लेकर प्रज्ञा पुराण की संरचना तक जिस प्रकार लेखन प्रयोजन में उनका मार्गदर्शन अध्यापक और विद्यार्थी जैसा रहा है, हमारी वाणी भी उन्हीं की सिखावन को दुहराती रही है। घोड़ा जिस प्रकार सवार के संकेतों पर दिशा और चाल बदलता रहता है, वही प्रक्रिया हमारे साथ भी कार्यान्वित होती रही है।

बैटरी चार्ज करने के लिए जब हिमालय बुलाते हैं, तब भी वे कुछ विशेष कहते नहीं। सेनीटोरियम में जिस प्रकार किसी दुर्बल का स्वास्थ्य सुधर जाता है, वही उपलब्धियां हमें हिमालय जाने पर हस्तगत होती हैं। वार्तालाप का प्रयोग अनेकों प्रसंगों में होता रहता है।

इस बार सूक्ष्मीकरण की प्रक्रिया और साधना विधि तो ठीक तरह समझ में आ गई और जिस प्रकार कुंती ने अपने शरीर में से देव सन्तानें जन्मी थीं ठीक उसी प्रकार अपनी काया में विद्यमान पाँच कोशों, अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय और आनन्दमय कोशों को पाँच वीर भद्रों के रूप में विकसित करना पड़ेगा, इसकी साधना विधि भी समझ में आ गई। जब तक वे पाँचों पूर्ण समर्थ न हो जाय, तब तक वर्तमान स्थूल शरीर को उनके घोंसले की तरह बनाये रहने का भी आदेश है और अपनी दृश्य स्थूल जिम्मेदारियाँ दूसरों को हस्तांतरित करने की दृष्टि से अभी शान्तिकुँज ही रहने का निर्देश है।

यह सब स्पष्ट हो गया। साधना विधान भी उनका निर्देश मिलते ही आरम्भ की दिया।

अब प्रश्न यह रहा कि पाँच वीरभद्रों को काम क्या सौंपना पड़ेगा और किस प्रकार वे क्या करेंगे। उसका उत्तर भी अधिक जिज्ञासा रहने के कारण अब मिल गया। इससे निश्चिन्तता भी हुई और प्रसन्नता भी।

इस संसार में आज भी ऐसी कितनी ही प्रतिभाएं हैं जो दिशा पलट जाने पर अभी जो कर रही हैं, उसकी तुलना में अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य करने लगेंगी। उलटे को उलटकर सीधा करने के लिए जिस प्रचण्ड शक्ति की आवश्यकता होती है। उसी को हमारे अंग, अंश वीरभद्र करने लगेंगे। प्रतिभाओं की सोचने की यदि दिशा बदली जा सके तो उनका परिवर्तन चमत्कारी जैसा हो सकता है।

नारद ने पार्वती, ध्रुव, प्रहलाद, वाल्मीकि, सावित्री आदि की जीवन दिशा बदली, तो वे जिन परिस्थितियों में रह रहे थे, उसे लात मार कर दूसरी दिशा में चल पड़े और संसार के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण बन गये। भगवान बुद्ध ने आनन्द, कुमार जीव, अंगुलिमाल, अम्बपाली, अशोक, हर्षवर्धन संघ मित्रा आदि का मन बदल दिया तो वे जो कुछ कर रहे थे, उसके ठीक उल्टा करने लगे और विश्व विख्यात हो गये। विश्वामित्र ने हरिश्चन्द्र को एक मामूली राजा नहीं रहने दिया वरन् इतना वरेण्य बना दिया कि उनकी लीला अभिनय देखने मात्र से गाँधी जी विश्व बंध हो गए। महाकृपण भामाशाह को सन्त बिनोवा ने अन्तःप्रेरणा दी और उनका सारा धन महाराणा प्रताप के लिए उगलवा लिया। आद्य शंकराचार्य की प्रेरणा से मान्धाता ने चारों धामों के मठ बना दिये। अहिल्याबाई को एक सन्त ने प्रेरणा देकर कितने ही मन्दिरों घाटों का जीर्णोद्धार करा लिया और दुर्गम स्थानों पर नये देवालय बनाने के संकल्प को पूर्ण कर दिखाने के लिए सहमत कर लिया। समर्थ गुरु रामदास जी ने शिवाजी को वह काम करने की अन्तःप्रेरणा दी जिसे वे अपनी इच्छा से कदाचित ही कर पाते। रामकृष्ण परमहंस थे, जिन्होंने नरेन्द्र के पीछे पड़कर उसे विवेकानन्द बना दिया। राजा गोपीचन्द का मन वैराग्य में लगा देने का श्रेय सन्त भर्तृहरि का था।

ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है, जिसमें कितनी ही प्रतिभाओं को किन्हीं मनस्वी आत्म वेत्ताओं ने बदलकर कुछ से कुछ बना दिया। उनकी अनुकम्पा न हुई होती तो वे जीवन भर अपने उसी पुराने ढर्रे पर लुढ़कते रहते, जिस पर कि उनका परिवार चल रहा था।

हमारी अपनी बात भी ठीक ऐसी ही है। यदि गुरुदेव ने उलट न दिया होता तो हम अपने पारिवारिक जनों की तरह पौरोहित्य का धन्धा कर रहे होते या किसी और काम में लगे रहते। उस स्थान पर पहुँच ही न पाते, जिस पर कि हम अब पहुँच गये हैं।

इन दिनों युग परिवर्तन के लिए कई प्रकार की प्रतिभाएँ चाहिए। विद्वानों की आवश्यकता है, जो लोगों को अपने तर्क प्रमाणों से सोचने की नई पद्धति प्रदान कर सके। कलाकारों की आवश्यकता है, जो चैतन्य महाप्रभु, मीरा, सूर, कबीर की भावनाओं को इस प्रकार लहरा सकें, जैसे सपेरा साँप को लहराता रहता है। धनवानों की जरूरत है, जो अपने पैसे को विलास में खर्च करने की अपेक्षा सम्राट अशोक की तरह अपना सर्वस्व समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए लुटा सकें। राजनीतिज्ञों की जरूरत है जो गाँधी, रूसो और कार्लमार्क्स, लेनिन की तरह अपने संपर्क के प्रजाजनों को ऐसे मार्ग पर चला सकें, जिसकी पहले कभी भी आशा नहीं की गई थी।

भावनाशीलों का क्या कहना? सन्त सज्जनों न न जाने कितनों को अपने संपर्क से लोहे जैसे लोगों को पारस की भूमिका निभाते हुए कुछ से कुछ बना दिया।

हमारे वीरभद्र अब यही करेंगे। हमने भी यही किया है। लाखों लोगों की विचारणा और क्रिया पद्धति में आमूल-चूल परिवर्तन किया है और उन्हें गाँधी के सत्याग्रहियों की तरह, विनोबा के भूदानियों की तरह, बुद्ध के परिव्राजकों की तरह अपना सर्वस्व लुटा देने के लिए तैयार कर दिया। प्रज्ञापुत्रों की इतनी बड़ी सेना हनुमान के अनुयायी वानरों की भूमिका निभाती है। इस छोटे से जीवन में अपनी प्रत्यक्ष क्रियाओं के द्वारा जहाँ भी रहे, वहीं चमत्कार खड़े कर दिये तो कोई कारण नहीं कि हमारी ही आत्मा के टुकड़े जिसके पीछे लगे, उसे भूत−पलीत की तरह तोड़ मरोड़ कर न रख दें।

अगले दिनों अनेकों दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन की आवश्यकता पड़ेगी। उसके लिए ऐसे गाण्डीव धारियों की, जो अर्जुन की तरह कौरवों की अक्षौहिणी सेनाओं करे धराशायी कर दे आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे हनुमानों की जरूरत होगी जो एक लाख पूत-सवा लाख नाती वाली लंका को पूँछ से जलाकर खाक कर दे। ऐसे परिवर्तन अन्तराल बदलने भर से हो सकते हैं। अमेरिका के अब्राहमलिंकन और जार्ज वाशिंगटन बहुत गई-गुजरी हैसियत के परिवारों में जन्मे थे, पर वे अपने जीवन प्रवाह को पलट कर अमेरिका के राष्ट्रपति बन गये।

प्रतिभा हीनों की बात जाने दीजिए, वे तो अपनी क्षमता और बुद्धिमता की चोरी, डकैती, ठगी जैसे नीच कर्मों में भी लगा सकते हैं, पर जिनमें भावना भर हो वे अपने साधारण पराक्रम से समय को उलटकर कहीं से कहीं ले जा सकते हैं। स्वामी दयानन्द, श्रद्धानन्द, रामतीर्थ जैसों के कितने ही उदाहरण सामने हैं, जिनकी दिशाधारा बदली तो वे असंख्यों को बदलने में समर्थ हो गये।

इन दिनों प्रतिभाएँ विलासिता में, संग्रह में, अहंकार की पूर्ति में निरत हैं। इसी निमित्त वे अपनी क्षमता और सम्पन्नता को विसर्जित करती रहती हैं। यदि इनमें से थोड़ी-सी भी अपना ढर्रा बदल दे तो गीता प्रेस वाले जय दयाल गोयन्दका की तरह ऐसे साधन खड़े कर सकती हैं जिन्हें अद्भुत और अनुपम कहा जा सके।

कौन प्रतिभा किस प्रकार बदली जानी है और उससे क्या काम लिया जाना है, यही निर्धारण उच्च भूमिका से होता रहेगा। अभी जो लोग विश्व युद्ध छेड़ने और संसार को तहस-नहस कर देने की बात सोचते हैं, उनके दिमाग बदलेंगे तो विनाश प्रयोजनों में लगने वाली बुद्धि, शक्ति और सम्पदा को विकास प्रयोजनों की दिशा में मोड़ देंगे। इतने भर से परिस्थितियाँ बदल कर कहीं से कहीं चली जायेंगी। प्रवृत्तियाँ एवं दिशाएँ बदल जाने से मनुष्य के कर्तव्य कुछ से कुछ हो जाते हैं और जो श्रेय मार्ग पर कदम बढ़ाते हैं उनके पीछे भगवान की शक्ति सहायता के लिए निश्चित रूप से विद्यमान रहती है। बाबा साहब आमटे की तरह वे अपंगों का विश्व विद्यालय कुष्ठ औषधालय बना सकते हैं। हीरालाल शास्त्री की तरह वनस्थली बालिका विद्यालय खड़े कर सकती है। लक्ष्मीबाई की तरह कन्या गुरुकुल खड़े कर सकती है।

मानवी बुद्धि की भ्रष्टता ने उसकी गतिविधियों को भ्रष्ट, पापी, अपराधी स्तर की बना दिया है। जो कमाते हैं, वे हाथोंहाथ अवाँछनीय कार्यों में नष्ट हो जाता है। सिर पर बदनामी और पाप का टोकरा ही फूटता है। इस समुदाय के विचारों को कोई पलट सके, रीति-नीति और दिशाधारा में बदल सकें, तो यही लोग इतने महान बन सकते हैं। ऐसे महान कार्य कर सकते हैं कि उनका अनुकरण करते हुए लाखों धन्य हो सकें और जमाना बदलता हुआ देख सकें।

इन दिनों हमारी जो सूक्ष्मीकरण साधना चल रही है, उसके माध्यम से जो अदृश्य महाबली उत्पन्न किये जा रहे हैं, वे चुपके-चुपके असंख्य अंतःकरणों में घुसेंगे, उनकी अनीति को छुड़ाकर मानेंगे और ऐसे मणि-माणिक्य छोड़कर आवेंगे जिससे वे स्वयं धन्य बना सकें और ‘‘समय परिवर्तन’’ जो अभी कठिन दिखता है, कल सरल बना सकें




Quotation - Akhandjyoti April 1985

अच्छी योजना बनना, जो करना है उसी पर अच्छी तरह विचार करना, अभीष्ट के अनुरूप साधना जुटाना जितना आवश्यक है, उतना ही यह भी है कि जो किया जाना है, उसे ऊँचे मन और पूरे परिश्रम के साथ सम्पन्न किया जाय।




हजरत मूसा सिनाई (kahani) - Akhandjyoti April 1985

हजरत मूसा सिनाई पर्वत पर खड़े थे तो उनने समीप वाली झाड़ी पर एक प्रकाश पुँज घिरा देखा। वे सकपका गये और बोले- तुम कौन हो। बोलो तो। प्रकाश में से आवाज आई- मैं वहीं हूँ-जो मैं हूँ।

रहस्य को न समझ पाने के कारण मूसा बेतरह घबराये- सन्न रह गये। गला सूख गया।

अजूबा एक और भी हुआ कि देखते-देखते एक भयंकर सर्प, आग जैसी फुसकारें मारता हुआ सामने आ खड़ा हुआ। अब डर और भी बढ़ गया। नसों का खून जमने लगा।

इतने में किसी ने कड़क कर कहा- ‘‘मूसा डरो मत, हिम्मत करो, आगे बढ़ो और उस सर्प को कसकर पकड़ लो।”

उनने हिम्मत दिखाई और सचमुच ही साँप को कसकर पकड़ लिया। पकड़ने में देर नहीं हुई कि साँप लकड़ी का डंडा भर बनकर रह गया।

डंडा बने साँप की जाँच परख करने के लिए हजरत ने उससे एक चट्टान खटखटाई। इतने भर से एक निर्मल झरना उसमें से फूट पड़ा और ठण्डे पानी की धार बहने लगी।

हिम्मत बढ़ी तो उनने डंडे को लाल समुद्र पर पटका। देखते-देखते समुद्र दो हिस्से में बंट गया और बीच में से सूखी जमीन निकल आई। जिस पर आबादी बसी और खुशहाली फूटी।

“टेन कमाण्डमेण्ट्स” की इस कथा में कठिनाई के सर्प को पकड़ने के लिए हिम्मत दिखाने का निर्देशन है। जो कर सकते हैं वे ही झरने बहाने और आबादी के लिए जमीन निकालने जैसी सफलताएँ प्राप्त करते हैं।




यह भयावह घटाटोप तिरोहित होगा। - Akhandjyoti April 1985

अगला समय संकटों से भरा-परा है, इस बात को विभिन्न मूर्धन्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण के अनुसार विभिन्न प्रकार से जोरदार शब्दों में कहा है।

ईसाई धर्म ग्रन्थ बाइबिल में जिस “सैविन टाइम्स” में प्रलय काल जैसी विपत्ति आने का उल्लेख किया है, उसका ठीक समय यही है। इसलाम धर्मों में चौदहवीं सदी के महान संकट का उल्लेख है। भविष्य पुराण में इन्हीं दिनों महत्ती विपत्ति टूट पड़ने का संकेत है। सिक्खों के गुरु ग्रन्थ साहब में भी ऐसी ही अनेकों भविष्यवाणियाँ हैं। कवि सूरदास ने इन्हीं दिनों विपत्ति आने का इशारा किया है मिश्र के पिरामिडों में भी ऐसे ही शिलालेख पाये गये हैं।

अनेकों भारतीय भविष्य वक्ताओं ने इन दिनों भयंकर उथल-पुथल के कारण अध्यात्म आधार पर और दृश्य गणित ज्योतिष के सहारे ऐसी ही सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं।

पाश्चात्य देशों में जिन भविष्य वक्ताओं की धाक है और जिनकी भविष्य वाणियों 99 प्रतिशत सही निकलती रही हैं, उनमें जीन डिक्सन, प्रो0 हरार, एण्डरसन, जॉन बावेरी, कीरो, आर्थर क्लार्क, नोस्ट्राडेमस, मदर शिप्टन आनन्दचार्य आदि ने इस सम्बन्ध में जो सम्भावनाएँ व्यक्त की हैं, वे भयावह हैं। कोरिया में पिछले दिनों समस्त संसार के दैवज्ञों का एक सम्मेलन हुआ था, उसमें भी डरावनी सम्भावनाओं की ही तबाही व्यक्त की गयी थी। टोरोन्टो कनाडा में- संसार भर के भविष्य विज्ञान विशेषज्ञों (फयूचरॉण्टालाजीस्टो) का एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें वर्तमान परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करते हुए कहा था कि बुरे दिन अति समीप आ गये। ग्रह नक्षत्रों से पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव को समझने वालों ने इन दिनों सूर्य पर बढ़ते धब्बों और लगातार पड़ने वाले सूर्य ग्रहणों धरती निवासियों के लिए हानिकारक बताया है। इन दिनों सन् 85 में उदय होने वाला “हैली” धूमकेतु की विषैली गैसों का परिणाम पृथ्वी वासियों के लिए हानिकारक बताया गया है।

सामान्य बुद्धि के लोग भी जानते हैं कि अन्धा-धुन्ध बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए अगले दिनों अन्न जल तो क्या सड़कों पर चलने को रास्ता तक न मिलेगा। औद्योगीकरण की भरमार से मशीनें हवा और पानी भी कम पड़ रहा है और विषाक्त हो चला है। खनिज तेल और धातुएँ, कोयला, पचास वर्ष तक के लिए नहीं है। अणु परीक्षणों से उत्पन्न विकिरण से अगली पीढ़ी और वर्तमान जन समुदान को कैंसर जैसे भयानक रोगों की भरमार होने का भय है। कहीं अणु युद्ध हो गया तो इससे ने केवल मनुष्य वरन् अन्य प्राणियों और वनस्पतियों का भी सफाया हो जायेगा। असन्तुलित हुए तापमान से ध्रुवों की बर्फ पिघल पड़ने, समुद्र में तूफान आने और हिमयुग के लौट पड़ने की सम्भावना बताई जा रही है। और भी अनेक प्रकार के संकटों के अनेकानेक कारण विद्यमान हैं। इस संदर्भ का साहित्य इकट्ठा करना हो तो उनसे ऐसी सम्भावनाएँ सुनिश्चित दिखाई पड़ती हैं, जिनके कारण इन वर्षों में भयानक उथल−पुथल हो। सन् 2000 में युग परिवर्तन की जो घोषणा है, ऐसे समय में भी विकास से पूर्व विनाश की-ढलाई से पूर्व गलाई की सम्भावना का अनुमान लगाया जाता है। किसी भी पहलू से विचार किया जाय, प्रत्यक्षदर्शी और भावनाशील मनीषी-भविष्यवक्ता इन दिनों विश्व संकट को अधिकाधिक बहरा होता देखते हैं।

पत्रकारों और राजनैतिज्ञों के क्षेत्र में इस बार एक अत्यधिक चिन्ता यह संव्याप्त है कि इन दिनों जैसा संकट मनुष्य जाति के सामने है, वैसा मानवी उत्पत्ति के समय में कभी भी नहीं आया। शान्ति परिषद आदि अनेक संस्थाएँ इस बात के लिए प्रयत्नशील हैं कि महाविनाश का जो संकट शिर पर छाया हुआ है, वह किसी प्रकार टले। छुटपुट लड़ाइयाँ तो विभिन्न क्षेत्रों में होती ही रहती हैं। शीत युद्ध किसी भी दिन महाविनाश के रूप में विकसित हो सकता है, यह अनुमान कोई भी लगा सकता है।

भूतकाल में भी देवासुर संग्राम होते रहे हैं, पर जन जीवन के सर्वनाश की प्रत्यक्ष सम्भावना का, सर्वसम्मत ऐसा अवसर इससे पूर्व कभी भी नहीं आया।

इन संकटों को ऋषि-कल्प सूक्ष्मधारी आत्माएँ भली प्रकार देख और समझ रही हैं। ऐसे अवसर में वे मौन नहीं बैठी रह सकतीं। ऋषियों के तप स्वर्ग, मुक्ति एवं सिद्धि प्राप्त करने के लिए नहीं होते। यह उपलब्धियाँ तो आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने वाले शरीरधारी भी प्राप्त कर लेते हैं। यह महामानवों को प्राप्त होने वाली विभूतियाँ हैं। ऋषियों को भगवान का कार्य सम्भावना पड़ता है और वे उसी प्रयास को लक्ष्य मानकर संलग्न रहते हैं।

हमारे ऊपर जिन ऋषि का-दैवी सत्ता का अनुग्रह है, उनने सभी कार्य लोक मंगल के निमित्त कराये हैं। आरम्भिक 24 महापुरश्चरण भी इसी निर्मित कराये हैं कि आत्मिक समर्थता इस स्तर की प्राप्त हो सके, जिसके सहारे लोक-कल्याण के अति महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने में कठिनाई न पड़े।

विश्व के ऊपर छाये हुए महान संकटों को टालने के लिए उन्हें चिन्ता है। चिन्ता ही नहीं प्रयास भी किये हैं। इन्हीं प्रयासों में एक हमारे व्यक्तित्व को पवित्रता और प्रखरता से भर देना भी है। आध्यात्मिक सामर्थ्य इसी आधार पर विकसित होती है।

उपासना का वर्तमान चरण सूक्ष्मीकरण के रूप में चल रहा है। इस प्रक्रिया के पीछे किसी व्यक्ति विशेष की ख्याति, सम्पदा, वरिष्ठता या विभूति नहीं है। एकमात्र प्रयोजन यही है कि मानवी सत्ता और गरिमा के लड़खड़ाते हुए पैर स्थिर हो सकें। पाँच वीरभद्रों के कन्धों पर वे अपना उद्देश्य लादकर उसे सम्पन्न भी कर सकते हैं। हनुमान के कन्धों पर राम और लक्ष्मण दोनों बैठे फिरते थे। यह श्रेष्ठता प्रदान करना भर है। इसे माध्यम का चयन कह सकते हैं। एक गाण्डीव धनुष के आधार पर किस प्रकार इतना विशालकाय महाभारत लड़ा जा सकता था। इसे सामान्य बुद्धि से असम्भव ही कहा जा सकता है। पर भगवान की जो इच्छा होती है, वह तो किसी न किसी प्रकार पूरी होकर रहती है। महाबली हिरण्याक्ष को शूकर भगवान ने फाड़-चीरकर रख दिया था, उसमें भी भगवान की ही इच्छा थी।

इस बार भी हमारी निज की अनुभूति है कि असुरता द्वारा उत्पन्न हुई-विभीषिकाओं को सफल नहीं होने दिया जायेगा। परिवर्तन इस प्रकार होगा कि जो लोग इस महाविनाश में संलग्न हैं, इसकी संरचना कर रहे हैं वे उलट जायेंगे या उनके उलट देने वाले नए पैदा हो जायेंगे। विश्व-शांति में भारत की निश्चित ही कोई बड़ी भूमिका हो सकती है।

समस्त संसार के मूर्धन्यों शक्तिवानों और विचारवानों की आशंका एक ही है कि विनाश होने जा रहा है। हमारा अकेले का कथन यह है कि उलटे को उलटकर सीधा किया जायेगा। हमारे भविष्य कथन को अभी ही बड़ी गम्भीरता पूर्वक समझ लिया जाय। विनाश की घटाओं को प्रचण्ड वायु का तूफानी प्रवाह अगले दिनों उड़ाकर कहीं से कहीं ले जायेगा और अन्धेरा चीरते हुए प्रकाश से भरा वातावरण दृष्टिगोचर होगा। यह ऋषियों के पराक्रम से ही सम्भावित है और इसमें कुछ दृश्यमान एवं कुछ परोक्ष भूमिका हमारी भी हो सकती है।




Quotation - Akhandjyoti April 1985

एकान्त सेवन का उद्देश्य है, जन समुदाय के साथ उपयोगी आदान-प्रदान की क्षमता का अर्जन।




नवयुग का आगमन अतिनिकट है। - Akhandjyoti April 1985

जो संकट इन दिनों सामने खड़े दृष्टिगोचर हो रहे हैं, विज्ञजनों ने जिन सम्भावनाओं का अनुमान लगाया है, वे काल्पनिक नहीं हैं। विभीषिकाएँ वास्तविक हैं, इतने पर भी विश्वासियों को यह विश्वास करना चाहिए कि समय चक्र को बदला जायेगा और जो संकट सामने खड़े दीखते हैं, उन्हें उलटा जायेगा।

सामान्य स्तर के लोगों की इच्छा शक्ति भी काम करती है। जनमत का भी दबाव पड़ता है। जिन लोगों के हाथ में इन दिनों विश्व की परिस्थितियाँ बिगाड़ने की क्षमता है, उन्हें जागृत लोकमत के सामने झुकना ही पड़ेगा। लोकमत को जागृत करने का अभियान “प्रज्ञा आन्दोलन” द्वारा चल रहा है। यह क्रमशः बढ़ता और सशक्त होता जायेगा। इसका दबाव हर प्रभावशाली क्षेत्र के समर्थ व्यक्तियों पर पड़ेगा और उनका मन बदलेगा कि अपने कौशल, चातुर्य को विनाश की योजनाएं बनाने की अपेक्षा विकास के निमित्त लगाना चाहिए। प्रतिभा एक महान शक्ति है। वह जिधर भी अग्रसर होती है, उधर ही चमत्कार प्रस्तुत करती जाती है।

वर्तमान समस्याएँ एक दूसरे से गुँथी हुई हैं। एक से दूसरी का घनिष्ठ सम्बन्ध है, चाहे वह पर्यावरण हो अथवा युद्ध सामग्री का जमाव, बढ़ती अनीति-दुराचार हो अथवा अकाल-महामारी जैसी दैवी आपदाएं। एक को सुलझा लिया जाय और बाकी सब उलझी पड़ी रहें, ऐसा नहीं हो सकता। समाधान एक मुश्त खोजने पड़ेंगे और यदि इच्छा सच्ची है तो उनके हल निकल कर ही रहेंगे। शक्तियों में दो ही प्रमुख हैं। इन्हीं के माध्यम से कुछ बनता या बिगड़ता है। एक शस्त्र बल-धन-बल। दूसरा बुद्धि बल संगठन बल। पिछले बहुत समय से शस्त्र बल और धन बल के आधार पर मनुष्य को गिराया और अनुचित रीति से दबाया और जो मन आया, सो कराया जाता रहा है। यही दानवी शक्ति है। अगले दिनों दैवी शक्ति को आगे आना है और बुद्धिबल तथा संगठन बल का प्रभाव अनुभव कराना है। सही दिशा में चलने पर यह दैवी सामर्थ्य क्या कुछ कर दिखा सकती हैं, इसकी अनुभूति सबको करानी है। न्याय की प्रतिष्ठा हो, नीति को सब ओर से मान्यता मिले, सब लोग हिलमिल कर रहें और मिल बांटकर खायें, इस सिद्धांत को जन भावना द्वारा सच्चे मन से स्वीकारा जायेगा, तो दिशा मिलेगी, उपाय सूझेंगे, नयी योजनाएं बनेंगी, प्रयास चलेंगे और अंततः लक्ष्य तक पहुंचने का उपाय बन ही जायेगा। ‘‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’’ और ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ यह दो ही सिद्धांत ऐसे हैं जिन्हें अपना लिये जाने के उपरांत तत्काल यह सूझ पड़ेगा कि इन दिनों किस अवांछनीयताओं को अपनाया गया है और उन्हें छोड़ने के लिए क्या साहस अपनाना पड़ेगा, किस स्तर का संघर्ष करना पड़ेगा। मनुष्य की सामर्थ्य अपार है। वह जिसे करने की यदि ठान ले और उसे औचित्य के आधार पर अपना ले तो कोई कठिन कार्य ऐसा नहीं है, जिसे पूरा न किया जा सके। नव निर्माण का प्रश्न भी ऐसा ही है। मनुष्य कुछ बनाने पर उतारू हो तो वह क्या नहीं बना सकता? मिश्र के पिरामिड, चीन के दीवार, ताजमहल, स्वेज तथा पनामा की नहर, पीसा की मीनार उसी के प्रयासों से ही तो बन पड़े हैं। जलयान, थलयान, नभयान के रूप में उसी की सूझ-बूझ दौड़ती है। नवयुग निर्माण के लिए प्रतिभाशाली लोगों को लोकमत के दबाव से विवश यदि किया जाय तो कोई कारण नहीं कि “मनुष्य में देवत्व” के उदय और “धरती पर स्वर्ग” के अवतरण की प्रक्रिया कुछ ही समय में सरलतापूर्वक सम्पन्न न की जा सके।

अगले दिनों एक विश्व, एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति का प्रावधान बनने जा रहा है। जाति, लिंग, वर्ण और धन के आधार पर बरती जाने वाली विषमता का अन्त समय अब निकट आ गया। इसके लिए जो कुछ करना आवश्यक है, वह सूझेगा भी और विचारशील लोगों के द्वारा पराक्रम पूर्वक किया भी जायेगा। यह समय निकट है। इसकी हम सब उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा कर सकते हैं।




दीप के स्वर - Akhandjyoti April 1985




दीप के स्वर (kahani) - Akhandjyoti April 1985

इतना हलका बनूं, मृत्यु को ले जाना भारी हो जाये। ऐसा फूल खिले डाली पर माली देखे तोड़ न पाये॥

इतनी गंध उड़े जीवन से गंध मिले चंदन के वन को। अपना मन इतना मथने दो ईर्ष्या हो सागर मंथन को॥

मेरी तृप्ति प्यास बन बैठी मेरा जीवन हुआ पराया। इतना दर्द दिया दुखियों ने अपने जैसा दुखी न पाया॥

इतनी भक्ति मुझे दो शंकर दुनियां तुमको भजना भूले। इतनी शक्ति मिले पीड़ा का आंसू आसमान को छू ले॥

जो जीवन से ऊब चुके हैं उन हारों को हार चाहिए। तलवारें धड़कन बन जायें मुझको इतना प्यार चाहिए॥

मुझको उनके पग छूने दो जो अंगारों पर चलते हैं। मिले धूलि में फूल बने कुछ, कुछ दीपक बनकर जलते हैं॥

मुझसे मेरे दुख न छीनो जीवन भारी हो जायेगा। मिट्टी में यदि मिला न मैं तो फूल कहां से खिल पायेगा॥

दीपों को यदि स्वर मिल जाता, सबके गीत व्यर्थ हो जाते। ऐसा दाता बने न कोई जिससे में याचक बन जाऊं॥

इतना मेरा बने न कोई अपने आंसू रोक न पाऊं। इतनी दया न करना कोई भिक्षा में सीता को हर लूं॥

उनको जगा रहा गीतों से जो मिट्टी में मिले पड़े हैं। फूलों के दुश्मन हम तुम हैं कांटे पथ में व्यर्थ खड़े हैं॥

आंसू तू भी छोड़ चला क्यों मेरा तू है और कौन है। जाग न पाये सुख से सोये इसीलिए मेदिनी मौन है॥

जो मिट्टी मे सुख से सोये मुझको उनसे बहुत प्यार है। मुझको उनसे उनको मुझसे बहुत प्यार है किंतु हार है॥

वे अपने कैसे पहचानूं जो अब रूप बदल मिलते हैं। उन फूलों से बात करा दो जो मिट्टी में मिल खिलते हैं॥ -अज्ञात

*समाप्त*