1. आध्यात्मिक काम-विज्ञान
2. सृष्टि में संचरण और उल्लास की प्रवृत्ति
3. काम क्रीड़ा की उपयोगिता ही नहीं विभीषिका का भी ध्यान रहे
4. नर-नारी का मिलन एक असामान्य प्रक्रिया
5. काम-प्रवृत्तियों का नियन्त्रण परिष्कृत अन्तःचेतना से
6. काम की उत्पत्ति—उद्भव
7. अखंड आनंद की प्राप्ति
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नर और नारी के बीच पाये जाने वाले प्राण और रयि, अग्नि और सोम, स्वाहा और स्वधा
तत्वों का महत्व सामान्य नहीं, असामान्य है। सृजन और उद्भव की, उत्कर्ष और आहलाद
की असीम सम्भावनाएं उसमें भरी पड़ी हैं, प्रजा उत्पादन तो उस मिलन का बहुत ही
सूक्ष्म सा स्थूल और अति तुच्छ परिणाम है। इस सृष्टि के मूल कारण और चेतना के
आदि स्रोत इन द्विधा संस्करण और संचरण का ठीक तरह मूल्यांकन किया जाना चाहिए
और इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि इनका सदुपयोग किस प्रकार विश्व-कल्याण
की सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक हो सकता है और उनका दुरुपयोग मानव जाति के शारीरिक,
मानसिक स्वास्थ्य को किस प्रकार क्षीण विकृत करके विनाश के गर्त में धकेलने के
लिए दुर्दान्त दैत्य की तरह सर्वग्रासी संकट उत्पन्न कर सकता है, कर रहा है।
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आध्यात्मिक काम-विज्ञान
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सृष्टि का संचरण किस क्रिया से होता है, इस सम्बन्ध में पदार्थ विज्ञान अणु को
प्रथम इकाई मानता है। उनका कहना है कि अणु के अन्तर्गत नाभिक तथा दूसरे उपअणु
अपना क्रिया-कलाप जिस निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार संचरित करते हैं, उसी में
विविध हलचलें उत्पन्न होती हैं और वस्तुओं के उद्भव से लेकर शक्ति उप-शक्तियों
की विद्या विभिन्न क्रम विक्रमों के आधार पर चल पड़ती हैं। यह तीस वर्ष पुरानी
मान्यता है। अब विज्ञान की आधुनिकतम शोधों ने बताया है कि अणु आरम्भ नहीं परिणिति
है। सृष्टि का मूल एक चेतना है, जिसे पदार्थ और विचार की द्विधा से सुसम्पन्न
कहा जा सकता है। इस चेतना को वे प्रकृति कहते हैं। प्रकृति के स्फुल्लिंग ही
परमाणु माने लाते हैं और कहा जाता है कि उन्हीं की गतिविधियों पर सृष्टि का उद्भव
विकास और विनाश अवलम्बित है।
अध्यात्म विज्ञान इसकी बहुत अधिक गहराई तक जाता है और वह सृष्टि का आरम्भ प्रकृति
और पुरुष के सम्मिश्रण से मानता है। वैज्ञानिक शब्दों में प्रकृति को रयि और
पुरुष को प्राण भी कहा जाता है। इसी को शक्ति और शिव कहते हैं। वेदों में इसे
सोम और अग्नि कहा गया है। और भी अधिक स्पष्ट समझना हो तो ऋण (निगेटिव) और धन
(पाजेटिव) विद्युत धारायें कह सकते हैं। विद्युत विज्ञान के ज्ञाता जानते हैं
कि प्रवाह (करेन्ट) के अन्तराल में उपरोक्त दोनों धाराओं का मिलन बिछुड़न होता
रहता है। यह मिलन बिछुड़न की क्रिया न हो तो बिजली का उद्भव ही सम्भव न हो सकेगा।
प्रकृति और पुरुष के बारे में सांख्यकार की उक्ति है कि वह निरंतर मिलन-बिछुड़न
के संघर्ष अपकर्ष की प्रक्रिया संचरित करते हैं। फलस्वरूप परा और अपरा प्रकृति
के नाम से पुकारा जाने वाला वह सृष्टि वैभव आरम्भ हो जाता है, जिसका प्रथम परिचय
हम अणु प्रक्रिया द्वारा प्राप्त करते हैं। क्लौक घड़ियों में पेण्डुलम लगा रहता
है और गतिचक्र के नियमानुसार एक बार हिला देने पर वह स्वयमेव हिलते रहने की क्रिया
करने लगता है और घड़ी की मशीन चलने लगती है। प्रकृति और पुरुष निरन्तर उसी प्रकार
का मिलन बिछुड़न क्रम संचरित करते हैं और सृष्टि का क्रिया-कलाप दीवार घड़ी की
पेण्डुलम प्रक्रिया की तरह चल पड़ता है।
इस सूक्ष्म तत्व ज्ञान—एक अन्तर विज्ञान को और भी अधिक स्पष्ट समझना हो तो उसे
नर-नारी का रूपक दिया जा सकता है। ब्रह्म को नर और प्रकृति को नारी का प्रतीक
प्रतिनिधि माना जा सकता है। सृष्टि का उद्भव विकास और विगठन करने वाली शक्ति
त्रिवेणी को ब्रह्मा, विष्णु, महेश के नाम से पुकारते हैं। यों तत्व एक ही है,
पर उसके क्रिया-कलाप की भिन्नता को अधिक स्पष्टता के साथ समझने-समझाने के लिए
तीन देवताओं का नाम दिया गया है। वे तीनों ही सपत्नीक हैं। ब्रह्मा की पत्नी
का नाम सावित्री, विष्णु की लक्ष्मी और शिव की उमा प्रख्यात हैं। इस अलंकार के
पीछे इसी तथ्य का प्रतिपादन है कि सृष्टि का उद्भव अकेले ब्रह्म से नहीं वरन्
प्रकृति के संयोग से होता है। नर और नारी दोनों मिलकर ही एक व्यवस्थित शक्ति
का रूप धारण करते हैं, जब तक यह मिलन न हो गति एवं चेतना उत्पन्न ही न होगी और
सब कुछ शून्य निष्प्राण की तरह पड़ा रहेगा। नृतत्व विज्ञान की दृष्टि से पति-पत्नी
का मिलना सृष्टि का स्थूल कारण है। संयोग या संभाग से प्रजा उत्पन्न होती है।
प्रजनन प्रक्रिया में मिलन बिछुड़न क्रम की एक रगड़ संघर्ष जैसी हलचल चलती है।
इससे सृष्टि के अति सूक्ष्म क्रिया-कलाप का अनुमान लगाया जा सकता है। शरीर का
जीवन इसी क्रिया-कलाप पर जीवित है। मांस-पेशियां सिकुड़ती फैलती हैं। और जीवन
शुरू हो जाता है। सांस का संचरण, दिल की धड़कन, नाड़ियों का रक्त संचार, कोशिकाओं
का क्रिया-कलाप इस मिलन बिछुड़न की—आकुंचन प्रकुंचन की क्रिया पर ही निर्भर है।
जिस क्षण यह क्रम टूटा उसी क्षण मृत्यु की विभीषिका सामने आ खड़ी होती है। यही
तथ्य मात्र देह के जीवन का नहीं—सम्पूर्ण सृष्टि का है। समुद्र में उठने वाले
ज्वार-भाटे की तरह यहां सब कुछ उस संयोग वियोग पर हो रहा है, जिसे अध्यात्म की
भाषा में प्रकृति और पुरुष अथवा रयि और प्राण कहते हैं।
मानव जीवन इसी सर्व व्यापी क्रिया-कलाप पर निर्भर है। नर और नारी मिलकर स्थूल
जीवन को पुरुष और प्रकृति के संयोग से चलने वाले सूक्ष्म जीवन क्रम की तरह विनिर्मित
करते हैं। इसलिये सामाजिक जीवन में नर और नारी का मिलन एक अनिवार्य आवश्यकता
बन गया है। अपवाद की बात अलग है। विवशता और अति उच्चस्तरीय आदर्शवादिता नर-नारी
के मिलन को वर्जित भी रख सकती है, पर वह मात्र अपवाद है। उनमें स्वाभाविक नहीं
और न सरल विकास क्रम की क्रम-व्यवस्था का ही समावेश है। स्वाभाविक जीवन नर नारी
के सुयोग संयोग से विकसित होता है इस तथ्य को स्वीकार करने में किसी को कोई आपत्ति
नहीं होनी चाहिए।
यह संयोग मात्र प्रजनन के लिए नहीं है और न इन्द्रिय तृप्ति के लिये। वंश वृद्धि
और आह्लाद की आवश्यकता इन क्रियाओं को अपनाने के लिये भी प्रेरणा कर सकती है,
पर नर-नारी के मिलन के आधार पर बनने वाला संयोग मूलतः दोनों की प्रसुप्त चेतनाओं
को जगाने के लिए, जन्म से लेकर मरण पर्यन्त यह आवश्यकता समान रूप से बनी रहती
है। बचपन में माता का स्तन पीना, गोदी में खेलना लाड़-दुलार एक आवश्यकता है।
मातृ विहीन लड़के और पितृ विहीन लड़कियां मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बहुत हद तक
अविकसित रह जाते हैं। बहिन-भाइयों का साथ खेलना परिवार की शोभा है। जिन घरों
में केवल लड़के ही लड़के हैं या लड़कियां ही लड़कियां हैं, उनमें सर्वतोमुखी
प्रतिभा का विकास बहुत कुछ रुका रहता है और मानसिक अपूर्णता को वहां सहज ही देखा
जा सकता है। यौवन के आंगन में प्रवेश करते ही दाम्पत्य-जीवन की व्यवस्था जुटानी
पड़ती है। ढलती आयु में यह जरूरत पुत्र और पुत्रियों को गोदी में खिलाते हुए
पूरी होती है। इस प्रकार प्रकारान्तर से नर-नारी आपस में प्रायः गुथे ही रहते
हैं और अपनी-अपनी विशेषताओं के कारण एक दूसरे की प्रतिभा की—प्रसुप्त शक्तियों
को जगाने की महत्वपूर्ण भूमिका स्थापित करते रहते हैं।
मनोविज्ञान शास्त्री डा. फ्रायड ने मानव जीवन के विकास की सबसे महती आवश्यकता
‘काम’ मानी है। जिसे वह नर और नारी के मिलन से विकसित होने वाली मानता है। चूंकि
अपने देश में ‘काम’ शब्द प्रजनन क्रिया एवं संयोग के अर्थ में प्रयुक्त होने
लगा है, इसलिए वह अश्लील जैसा बन गया है और उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है।
इसलिये फ्रायड की उपरोक्त मान्यता अपने गले नहीं उतरती और न रुचती है। पर यदि
उसे वैज्ञानिक परिभाषा के आधार पर सोचें और शब्दों के प्रचलित अर्थों को कुछ
समय के लिये उठाकर एक ओर रख दें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ेगा कि सृष्टि
के मूल कारण प्रकृति पुरुष के मिलन से लेकर दाम्पत्य जीवन बसाने तक चली आ रही
काम प्रक्रिया विश्व की एक ऐसी आवश्यकता है जिसे अस्वीकार करने में केवल आत्म
वंचना ही हो सकती है।
दुरुपयोग हर वस्तु का निषेध है। अति को सर्वत्र वर्जित किया गया है। अविवेकी
मनुष्य ने हर इन्द्रिय का दुरुपयोग करने में कोई कसर नहीं रखी है। जिह्वा को
ही लें तो कटु और असत्य भाषण से लेकर अभक्ष भोजन तक की दुष्प्रवृत्ति अपनाकर
अपना शारीरिक मानसिक, नैतिक आर्थिक सब प्रकार अहित ही किया गया है। यह दोष जिह्वा
की स्वाद एवं संभाषण क्षमता का नहीं। इनका सदुपयोग किया जाय तो जिह्वा हमारे
जीवन में विकास क्रम की महती भूमिका सम्पादित कर सकती है। इसी प्रकार जननेन्द्रिय
को सीमित और सोद्देश्य प्रयोग के लिए प्रतिबन्धित कर दिया जाय। संयम और ब्रह्मचर्य
के महत्व को समझते हुए मर्यादाओं के अन्तर्गत रहते हुए तत्सम्बन्धित कामोल्लास
का लाभ लिया जाय तो उससे हानि नहीं, लाभ ही होगा। हानि तो दुरुपयोग से है। सो
दुरुपयोग अमृत का करके भी हानि उठाई जा सकती है और सदुपयोग विष का भी किया जाय
तो उससे भी आश्चर्यजनक लाभ उठाया जा सकता है। हेय काम प्रवृत्ति नहीं—भर्त्सना
उसके दुरुपयोग की, की जानी चाहिए।
नर-नारी का मिलना जितना ही प्रतिबन्धित किया जायगा उतनी विकृतियां उत्पन्न होंगी।
सच तो यह है कि अनावश्यक प्रतिबन्धों ने ही हेय काम प्रवृत्ति को भड़काया है।
बच्चा मां का दूध पीता है, उसके स्तन स्पर्श से कुछ भी अश्लीलता प्रतीत नहीं
होती है और न लज्जा जैसी कोई बुराई दीखती है। आदिवासी क्षेत्रों में, पिछड़े
कबीलों में, स्त्रियां प्रायः छाती नहीं ढकती। वहां किसी को इसमें अश्लीलता और
काम विकार भड़काने वाली कोई बात ही प्रतीत नहीं होती। यह मानसिक कुत्सायें और
मूढ़ मान्यतायें ही हैं, जिन्होंने नारी के स्तन जैसे परम पवित्र और अभिवन्दनीय
अंग को विकारों का प्रतीक बनाकर रख दिया। यह विचार विकृति का दोष ही है कि अति
स्वाभाविक और अति सामान्य नारी के—एक कुत्सा गढ़ कर खड़ी कर दी है। काम का विकृत
स्वरूप जिसने मनुष्य की एक प्रकृति प्रदत्त दिव्य सामर्थ्य को कुत्सित बनाकर
रख दिया वस्तुतः हमारी बौद्धिक भ्रष्टता ही है। पशु-पक्षी नग्न रहते हैं। उनकी
जननेन्द्रिय बिना ढकी रहती है। सभी साथ-साथ खाते, सोते हैं, पर बिना अवसर की
मांग हुये दोनों पक्षों में से कोई किसी की ओर ध्यान तक नहीं देता, आकर्षित होना
तो दूर। मनुष्य कृत गर्हित कामशास्त्र को यदि जला दिया जाय और प्रकृति की स्वाभाविक
प्रेरणा और जीवन विकास के पुण्य प्रयोजन के लिए उस संजीवनी शक्ति का सदुपयोग
किया जाय तो काम क्रीड़ा गर्हित न हर कर जीवनोत्कर्ष की एक महती आवश्यकता पूर्ण
कर सकने में समर्थ बनाई जा सकती है।
बेटी, भगिनी और माता का पिता, भाई और पुत्र के साथ विनोद और उल्लास भरा सम्पर्क
अहितकर नहीं, हितकारक ही हो सकता है, उसी प्रकार नर-नारी के बीच खड़ी कर दी गई
एक अवांछनीय विभेद की दीवार यदि गिरा दी जाय तो इससे अहित क्यों होगा? दाम्पत्य-जीवन
की बात ही लें, उसमें से कुत्सायें हटा दी जायें और परस्पर सहयोग एवं उल्लास
अभिवर्धन वाले अंश को प्रखर बना दिया जाये तो विवाह उभय पक्ष की अपूर्णता दूर
करके एक अभिनव पूर्णता का ही सृजन करेगा। इस दिशा में भगवान कृष्ण ने एक क्रान्तिकारी
शुभारम्भ किया था। उन दिनों अबोध बालकों और बालिकाओं का सहचरत्व भी प्रतिबन्धित
था। लोगों ने एक काल्पनिक विभीषिका गढ़कर खड़ी करली थी कि नर-नारी चाहे वे किसी
भी आयु के, किसी भी मनःस्थिति के क्यों न हों, मिलेंगे तो केवल अनर्थ ही होगा।
इस मान्यता ने जन साधारण की मनोभूमि तमसाछिन्न कर रखी थी और छोटे बच्चे भी परस्पर
इसलिए हंस-बोल नहीं सकते थे, खेल कूद नहीं सकते थे क्योंकि वे लड़के और लड़की
के भेद से प्रतिबन्धित थे। कृष्ण भगवान ने इस कुण्ठा को अवांछनीय बनाया और उन्होंने
लड़के लड़कियों को साथ हंसने, खेलने के लिए आमन्त्रित करते हुए रासलीला जैसे
विनोद आयोजन खड़े कर दिये। उन्हें अवांछनीय लगा कि मनुष्य—मनुष्य के बीच इसलिए
दीवार खड़ी करदी जाये कि एक वर्ग को नारी कहा जाता है और उसके मूंछें नहीं आती।
दूसरे वर्ग को इसलिए अस्पर्श्य घोषित किया जाय कि वह पुरुष है और उसकी मूंदे
आती है। प्रजनन अवयवों की बनावट में प्रकृति प्रदत्त अन्तर सृष्टि की शोभा विशेषता
है इतने नन्हे से कारण को लेकर मनुष्य जाति के दो परस्पर पूरक पक्षों को यह मान
कर अलग कर दिया जाय कि वे जब मिलेंगे तब केवल अनर्थ ही सोचेंगे, अनर्थ ही करेंगे।
यह मनुष्य की मनुष्य के प्रति अविश्वसनीयता की अति है। प्रतिबन्धित करके किसी
को भी सदाचरण के लिए विवश नहीं किया जा सकता। जेल में कैदी हथकड़ी, बेड़ी पहने
हुए भी बड़े-बड़े अनर्थ करते हैं। घूंघट और पर्दे के कठोर प्रतिबन्ध रहते हुए
भी दुनिया में न जाने क्या-क्या हो रहा है, सगे भाई-बहिन, पिता, पुत्र जैसे बाह्याचार
के भीतर ही भीतर न जाने क्या-क्या बनता बिगड़ता है, उन कुत्सित कथा-गाथाओं को
कहने सुनने में कुछ लाभ नहीं। बात सोचने की यह है कि यदि मनुष्य की सज्जनता—ईमानदारी
और प्रामाणिकता को विकसित न किया गया हो तो कड़े से कड़े प्रतिबन्ध आदमी की बुद्धि
चातुरी को चुनौती नहीं दें सकते। वह हर कानून और हर प्रतिबन्ध के रहते हुए भी
चाहे जो कर गुजर सकता है। मानवीय चरित्र निष्ठा उनकी श्रद्धा, विवेकशीलता और
दूरदर्शिता तथा आदर्शवादिता को विकसित करके ही परिपक्व करनी होगी। अन्यथा प्रतिबन्ध
कड़े करते जाने में परस्पर सहयोग से उपलब्ध हो सकने वाली अगणित भौतिक लाभों और
असीम आत्मिक उत्कर्षों से वंचित रह कर अपार हानि का ही सामना करना पड़ेगा और
हम निरन्तर पिछड़ते ही चले जायेंगे। भगवान कृष्ण के हास परिहास आन्दोलन के पीछे
यही क्रान्तिकारी भावना काम कर रही थी।
आध्यात्मिक काम शास्त्र की जानकारी हमें सर्व साधारण तक पहुंचानी ही चाहिए। भले
ही उस प्रशिक्षण को अवांछनीय या अश्लील कहा जाय। सृष्टि के इतने महत्वपूर्ण विषय
को जिसकी जानकारी प्रकृति जीव-जन्तुओं तक को करा देती है उसे गोपनीय नहीं रखा
जाना चाहिए। खासतौर से तब जबकि इस महत्वपूर्ण विज्ञान का स्वरूप लगभग पूरी तरह
से विकृत और उलटा हो गया हो। जो मान्यतायें चल रही हैं, वे ही चलने दी जायें।
सुलझे हुए समाधान और सुरुचिपूर्ण प्राविधान यदि प्रस्तुत न किये गये तो विकृतियां
ही बढ़ती, पनपती चली जायेंगी और उससे मानव जाति एक महती शक्ति का दुरुपयोग करके
अपना सर्वनाश ही करती रहेगी।
आध्यात्मिक काम विज्ञान नर-नारी के निर्मल सामीप्य का समर्थन करता है। दाम्पत्य
जीवन में उसे इन्द्रिय तृप्ति और काम-क्रीड़ा द्वारा उत्पन्न होने वाले हर्षोल्लास
की परिधि तक बढ़ाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त वह सौम्य सामीप्य अप्रतिबन्धित
रहना चाहिए। जिस प्रकार दो नर या दो नारी चाहे वे किसी वय के हों निर्वाध रूप
से हंस-बोल सकते हैं और स्नेह सामीप्य बढ़ा सकते हैं और उससे कुछ भी अनुचित आशंका
नहीं की जाती, इसी प्रकार नर-नारी का परस्पर व्यवहार भी निर्मल और निष्कलंक रखा
जा सकना अति सरल है। इस सौम्य सरलता को प्रतिबन्धित नहीं किया जाना चाहिए। प्रतिबन्ध
परक प्रयोग पिछले बहुत दिनों से चले आ रहे हैं और उनके निष्कर्षों ने उस मान्यता
की निरर्थकता ही सिद्ध की है। पर्दे की प्रथा चलाकर हमने क्या पाया? केवल इतना
भर हुआ कि नवागन्तुक वधुयें अपनी ससुराल का जो अविच्छिन्न स्नेह पा सकती थीं,
अनुभवी गुरुजनों का परामर्श प्राप्त कर सकती थीं, अपनी कठिनाइयों की चर्चा करके
समाधान पा सकती थीं, उससे वंचित रह गईं। उन्हें ससुराल का वातावरण पितृ ग्रह
से उतना भिन्न और विपरीत लगा जितना स्वच्छन्द विचरण करने वाले पक्षी की आंखें
बन्द करके चारों ओर से पर्दा लगाकर रखे गये पिंजड़े में बन्द किये जाने की स्थिति
में हो सकता है। कई भावुक लड़कियां तो इस जमीन आसमान जैसे परिवर्तन से बुरी तरह
घबरा जाती हैं और उन्हें हिस्टीरिया सरीखे—भय, भूत-प्रेत, घबराहट जैसी अनेकों
मानसिक बीमारियां उठ खड़ी होती हैं। ऐसी स्थिति में हीनता की भावना बढ़ना नितान्त
स्वाभाविक है। सब लोग हंसी-खुशी से घर-बाहर घूमें और हंसें-बोलें पर उस वयस्क
नारी की, जिसकी भावुकता नये वातावरण में बहुत ही उभरती है और नई परिस्थितियों
में ढलने, बदलने के लिए उस परिवार के भारी मानसिक सहयोग की आवश्यकता पड़ती है—यदि
मुंह ढककर एक कौने में बैठे हुए प्रतिबन्धित कैदी की स्थिति में पटक दिया जाये
तो निस्सन्देह उसका मानसिक प्रभाव घुटन, कुण्ठा, अरुचि, विवशता, ज्यादिती के
रूप में ही होगा। या तो विद्रोह भड़केगा या अन्तःकरण अपना अहं खोकर सर्वथा दीन-हीन,
पराधीन हो जायेगा। दोनों ही मनःस्थितियां अवांछनीय हैं। इससे नारी की भाव सम्पदाओं
का—सृजनात्मक विभूतियों का नाश हो सकता है। हुआ भी है। पर्दा प्रथा ने नव वधुओं
के साथ सचमुच बहुत अनीति बरती और ज्यादती की है और उसका परिणाम समस्त समाज को
भोगना पड़ा है।
यह अस्वाभाविक प्रक्रिया एक कदम भी जीवित न रह सकी। पर्दे का उद्देश्य रत्तीभर
भी सफल न हुआ। उसका उद्देश्य नर और नारी के बीच पारस्परिक आकर्षण को रोकना था।
वह कहां पूरा हुआ। नव वधू केवल ससुराल में सास-ससुर, जेठ आदि गुरुजनों से पर्दा
करती हैं। जो वस्तुतः उसे बेटी जैसी ही समझ सकते हैं। जिनसे खतरा है, उनके तईं
तो पर्दा फिर भी खुला रह सकता है। यदि व्यभिचार की रोक-थाम की समस्या है तो उसकी
सबसे अधिक गुंजाइश पितृगृह के स्वच्छन्द वातावरण में रहती है। ससुराल में भी
बाहर के लोगों से हाट बाजार में—मेले-ठेले में किसी से भी मुंह खोलकर बातें की
जा सकती हैं। ससुराल में भी यदि उस आकर्षण की गुंजाइश है तो देवर से है, जो पति
की अपेक्षा अधिक मृदुल लग सकता है। उससे पर्दा नहीं, बुजुर्गों से पर्दा—इस मूर्खता
की किसी भी तथ्य के आधार पर समर्थित नहीं किया जा सकता, जो आज-कल चल रही है।
पर्दे की प्रथा उन विदेशी शासकों की देन है जो दूसरों की बहिन-बेटियों को केवल
पाप अनाचार की दृष्टि से ही देखते और उनका अपहरण करने में नहीं चूकते थे। उन
दिनों पर्दे का कुछ सामयिक उपयोग हो भी सकता था। अरब के रेगिस्तानों में जहां
रेतीली आंधियां चलती रहती थीं। आंख, नाक, कान, मुंह आदि को कूड़े-कचरे से बचाने
के लिए पर्दे का प्रचलन कुछ समझ में भी आता है। पर भारत की वर्तमान परिस्थिति
में कहीं घूंघट, पर्दे की गुंजाइश है, इसका कोई कारण समझ में नहीं आता। यौवन
कोई अभिशाप नहीं—नारी का शरीर मिलना कोई पाप नहीं है। इस ईश्वरीय अनुदान को निष्ठुरता
पूर्वक प्रतिबन्धित किया जायगा तो उसकी प्रतिक्रिया अवांछनीय और अनुपयुक्त ही
होगी। पर्दे ने नारी का मनोबल गिराया और उसकी अगणित क्षमताओं को कुचल कर फेंक
दिया। उससे इसकी उपयोगिता में कमी आई और स्थिति यहां तक जा पहुंची कि लड़कियों
का विवाह करना हो तो लड़के वाले रिश्वत के रूप में दहेज, नकदी, जेवर, और गुलामी
जैसी दीनता मांगते हैं। यह स्थिति तभी बनी जब नारी का मूल्य बेहिसाब गिर गया।
यदि उसका उचित मूल्य स्थिर रखा गया होता तो बिना कीमत अपना शरीर मन और सहयोग
देने के लिये महान आत्मिक अनुदान देने वाली वधू के ससुराल वाले उसके चरण धो धो
कर पीते। पशु भी कीमत देकर खरीदा जाता है। अनेक गुणों से विभूषित वधू घर में
आवे तो उसे लेने के लिये उपेक्षा दिखाई जाये और रिश्वत मांगी जाय इस दयनीय स्थिति
के पीछे नारी का वह अवमूल्यन झांक रहा है, जो पर्दे जैसे प्रतिबन्धों ने अवांछनीय
और अनुचित रूप से प्रस्तुत कर दिया।
अध्यात्म तत्व ज्ञान की मान्यतायें नर-नारी के बीच की उन अवांछनीय दीवारों को
तोड़ना चाहती हैं जो मनुष्य को मनुष्य से पृथक करती है और एक दूसरे का सहयोग
करने में अस्वाभाविक, अप्राकृतिक प्रतिबन्ध उत्पन्न करती है। यौन विकृतियों और
व्यभिचार के खतरों को रोकने के दूसरे तरीके हैं। एक दूसरे से सर्वथा प्रथक रखने
वाली प्रक्रिया इस प्रयोजन को पूरा नहीं करती। आधी जनसंख्या को इन प्रतिबन्धों
के नाम पर अपंग बनाकर हम अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मार रहे हैं। सारी समस्या
का एक मात्र कारण वह बौद्धिक भ्रष्टाचार है, जिसने नारी को कामिनी और रमणी का
अतिरंजित चित्रण करके उसे एक भयावह चुड़ैल के रूप में प्रस्तुत कर दिया। तथाकथित
कलाकारों—चित्रकारों, मूर्तिकारों, कवियों, गायकों, साहित्यकारों, अभिनेताओं
ने नारी का कुत्सित अंश ही उभारा—उसे यौन आकर्षण का प्रतीक मात्र बनाया और उस
भ्रान्ति को अधिकाधिक सघन करने में अपनी सारी कलाकारिता का अन्त कर दिया।
नर और नारी के बीच पाये जाने वाले प्राण और रयि—अग्नि और सोम स्वाहा और स्वधा
तत्वों का महत्व सामान्य नहीं असामान्य है। सृजन और उद्भव की—उत्कर्ष और आह्लाद
की असीम सम्भावनायें उसमें भरी पड़ी हैं, प्रजा उत्पादन तो उस मिलन का बहुत ही
सूक्ष्म सा स्थूल और अति तुच्छ परिणाम है। इस सृष्टि के मूल कारण और चेतना के
आदि स्रोत इन द्विधा संस्करण और संचरण का ठीक तरह मूल्यांकन किया जाना चाहिए
और इस तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि इनका सदुपयोग किस प्रकार विश्व कल्याण
की सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक हो सकता है और उनका दुरुपयोग मानव जाति के शारीरिक
मानसिक स्वास्थ्य को किस प्रकार क्षीण विकृत करके विनाश के गर्त में धकेलने के
लिए दुर्दान्त दैत्य की तरह सर्वग्रासी संकट उत्पन्न कर सकता है।
अश्लील अवांछनीय और गोपनीय संयोग कर्म हो सकता है। विकारोत्तेजक शैली में उसका
वर्णन अहितकर हो सकता है। पर सृष्टि संस्करण के आदि उद्गम प्रकृति पुरुष के संयोग
से किस प्रकार यह द्विधा किस प्रकार काम कर रही है यह जानना न तो अनुचित है और
न अनावश्यक। सच तो यह है कि इस पंचाग्नि विधा की अवहेलना अवमानना से हमने अपना
ही अहित किया है। नर-नारी के बीच प्रकृति प्रदत्त विद्युतधारा से किस सीमा तक,
किस दिशा में कितनी और कैसे श्रेयस्कर प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है और उसकी विकृति
विनाश का निमित्त कैसे बनती है। इस जानकारी को आध्यात्मिक काम विज्ञान कह सकते
हैं। इसे मात्र शारीरिक सुख को अधिकाधिक बनाने का प्रयोजन नहीं कहना चाहिए।
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सृष्टि में संचरण और उल्लास की प्रवृत्ति
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ब्रह्मा की दो पत्नियां होने की चर्चा पुराणों में आती है। एक का नाम सावित्री
दूसरी का गायत्री है। एक को परा प्रकृति दूसरी को अपरा प्रकृति कहते हैं। दूसरे
शब्दों में इन्हें जड़ और चेतन सृष्टि कह सकते हैं। जड़-शक्ति वह है जो अणु शक्ति
के पीछे काम करने वाली प्रेरक सत्ता से आरम्भ होती है। नाभिक न्यूक्लियस के अन्तराल
में भरी हुई अगणित और अद्भुत गति-विधियों और दिशा विदिशाओं के रूप में जिसका
परिचय प्राप्त किया जाता है। भौतिक जगत इसी का पसारा है। इन्द्रियों से जिनका
स्वरूप देखा समझा जाता है एवं इन्द्रियातीत वे शक्तियां जिनको उपकरणों से पकड़ा
जा सकता है वे सभी दृश्य अदृश्य शक्तियां यों हलचल से शून्य नहीं है। पर उनमें
चिन्तन क्षमता न होने से जड़ कहते हैं। जड़ प्रकृति का अर्थ गतिहीन नहीं। शक्ति
में गति न हो तो फिर वह शक्ति कैसी। बोलचाल की भाषा में उसे जड़—दार्शनिक चर्चा
में उसे परा पौराणिक अलंकारों में उसे सावित्री कहते हैं। जितना कुछ यह जगत देखा
समझा जा सकता है उसे सावित्री कहना चाहिये। जो कुछ विचार की, भावना की उत्साह
की शक्ति है उसे गायत्री कहते हैं। पुराणों का उपरोक्त अलंकारिक उपाख्यान—यही
प्रतिपादित करता है कि ब्रह्म-परमेश्वर अपनी परा और अपरा प्रकृति के—जड़ और चेतन
विभूतियों के माध्यम से समस्त सृष्टि का उद्भव, पोषण और प्रत्यावर्तन करता है।
मनुष्य इन परा और अपरा प्रकृतियों का सजीव सम्मिश्रण है। शरीर पंच तत्वों का
बना होने से जड़ है। आत्मा विचारशील और भाव सम्पन्न होने से चेतन है। जड़ और
चेतन का यह संयोग ही मनुष्य की अद्भुत प्रतिभा का स्रोत है, जिन निम्न वर्ग वाले
जीव-जन्तुओं का चेतन जितना निर्बल है वे उतने ही पिछड़े हुए हैं। हम इसलिए अगणित
सम्पदाओं और विभूतियों के अधिपति बन सके कि इस काया में उत्कृष्ट स्तर की परा
और अपरा प्रकृति को कर्ता ने भली प्रकार नियोजित कर दिया है।
काया में दो केन्द्र इन शक्तियों के हैं। सावित्री-जड़ परा प्रकृति का केन्द्र
है। मूलाधार चक्र यहां कुण्डलिनी महाशक्ति अत्यन्त प्रचण्ड स्तर की क्षमतायें
दबाये बैठी है। पुराणों में इसे महाकाली के नाम से पुकारा गया है। मोटे शब्दों
में इसे काम-शक्ति कह सकते हैं। काम शक्ति का अनुपयोग, सदुपयोग दुरुपयोग किस
प्रकार मनुष्य के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है उसे आध्यात्मिक कामविज्ञान
कहना चाहिए। इस शक्ति का बहुत सूझ-बूझ के साथ प्रयोग किया जाना चाहिए, यही ब्रह्मचर्य
का तत्व-ज्ञान है। बिजली की शक्ति से अगणित प्रयोजन पूरे किये जाते हैं और लाभ
उठाये जाते हैं पर यह होता तभी है जब उसका ठीक तरह प्रयोग करना आये, अन्यथा चूक
करने वाले के लिये तो वही बिजली प्राण घातक सिद्ध होती है।
काम-शक्ति को गोपनीय तो माना गया है, जिस प्रकार धन कितना है, कहां है, आदि बातों
को आमतौर से लोग गोपनीय रखते हैं। उसकी अनावश्यक चर्चा करने से अहित होने की
आशंका रहती है। इसी प्रकार काम-तत्व को गोपनीय ही रखा गया है। पर इसकी महत्ता,
सत्ता और पवित्रता से कभी किसी ने इनकार नहीं किया। यह घृणित नहीं, पवित्र तम
है। यह हेय नहीं अभिवंदनीय है। भारतीय अध्यात्म शास्त्र के अन्तर्गत शिव और शक्ति
का प्रत्यक्ष समन्वय जिस पूजा प्रतीक में प्रस्तुत किया गया है उसमें इस रहस्य
का सहज ही उद्घाटन हो जाता है। शिव को पुरुष की जनेन्द्रिय और पार्वती को नारी
की जनेन्द्रिय का स्वरूप दिया गया है। इनका सम्मिलित विग्रह ही अपने देव मन्दिरों
में स्थापित है। यह अश्लील नहीं है। तत्वतः यह सृष्टि में संचरण और उल्लास उत्पन्न
करने वाले प्राण और रयि, अग्नि और सोम के संयोग से उत्पन्न होने वाले महानतम
शक्ति प्रवाह की ओर संकेत है। इस तत्व-ज्ञान को समझना न तो अश्लील है और न घृणित
वरन् शक्ति के उद्भव विकास एवं विनियोग का उच्चस्तरीय वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारभूत
एक दिव्य संकेत है। यदि ऐसा न होता अपने त्रिकालदर्शी और ईश्वर समकक्ष स्तर पर
पहुंचे हुए तपःपूत ग्रन्थि भगवान् शिव और उनकी स्फुरण शक्ति का समन्वय मन्दिरों
में स्थापित न करते। हेय तो हर वस्तु का दुरुपयोग ही होता है। अमृत भी दुरुपयोग
से विष बन सकता है। काम-शक्ति स्वयं घृणित नहीं। घृणित तो वह विडम्बना है जिसके
द्वारा इतनी बहुमूल्य ज्योति धारा को शरीर को जर्जर और मन को अधःपतित करने के
लिए अविवेक पूर्वक प्रयुक्त किया जाता है। सावित्री का-कुंडलिनी का प्राण-काम
पतित कैसे हो सकता है। वह तो देवता की पंक्ति में अति सम्मान पूर्वक विराजमान
होता रहा है। जो जितना उत्कृष्ट है विकृत होने पर वह उतना ही निकृष्ट बन जाता
है यह एक तथ्य है। काम-तत्व के बारे में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। जब वह
विद्रोही और उच्छृंखल हो उठा और अवांछनीय चेष्टायें करने लगा तभी उसके शमन का
प्रयोग करना पड़ा। भगवान् शिव ने तीसरा नेत्र खोल कर उसकी कुचेष्टाओं को जलाया
था। उसके अस्तित्व को छोड़ा नहीं। वरन् उसे वरदान देकर अजर अमर बना दिया। यदि
वह वस्तुतः अनुपयुक्त होता तो शिवजी त्रिपुर असुर की तरह उसे भी समूल नष्ट कर
सकते थे। पर ऐसा किया नहीं गया। ऐसा हो गया होता तो यह संसार की महानतम दुर्घटना
होती। फिर प्राणी अशक्त और अवसर ग्रस्त नीरस, निराश और निरीह जीवन-जीकर किसी
प्रकार मौत के दिन पूरे करते भर दिखाई देते। यहां आनन्द और उल्लास जैसी—उमंग
और उत्साह जैसी शक्ति प्रगति श्री समृद्धि उत्पन्न करने वाली कोई परिस्थिति देखने
को न मिलती।
ब्रह्मा की दूसरी पत्नी-शक्ति-गायत्री जिसे विचारणा एवं भावना कहते हैं अपने
स्थान पर अति महत्व पूर्ण है। मानवीय चिन्तन का उचित निर्देशन उसी के द्वारा
होता है। ऋतम्भरा प्रज्ञा ही नर-पशु को नर-नारायण बनाती है। समस्त धर्म-शास्त्र,
तत्व-ज्ञान स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन, उसी की क्षेत्र परिधि में आता है।
उसके प्रकाश विस्तार पर कोई प्रतिबन्ध न होने से अतीत से लेकर अद्यावधि पर्यन्त
बहुत कुछ कहा सुना जाता रहा है उसी की चर्चा की जाती रही है सावित्री की चर्चा
अधिक हो न सकी। कुण्डिलिनी शक्ति की गोपनीयता का उद्घाटन करने से कतराने की ही
परम्परा चली आई है। गोपनीयता की मर्यादा जहां तक रही वहां तक उसे तन्त्र विद्या
के माध्यम से किसी न किसी रूप में कहा, बताया जाता रहा। पर जब दुरुपयोग का विग्रह-उग्र
से उग्रतर होने लगा और बात अश्लीलता तक पहुंच गई। उसके प्रयोक्ता असुर दुष्टता
को अपनाने लगे तो उसकी चर्चा और भी अधिक अस्पर्श हो गई। तन्त्र काल जब तक रहा
तब तक स्नायु मण्डल में थिरकती हुई इस महाकाली की विवेचना और साधना सम्मानित
बनी रही। दश महाविद्यायें जिनकी साधना से भौतिक जीवन में ऋद्धि-सिद्धियों का
अद्भुत संचरण होता है तन्त्र-विज्ञान की आधार स्तम्भ है। इन दश देवियों की पूजा
प्रकरण हमने अपने तन्त्र-विज्ञान ग्रन्थ में लिखी भी है, पर गहन क्षेत्र में
प्रवेश करने पर स्पष्ट हो जाता है कि वस्तु स्थिति पूजा उपासना तक सीमित नहीं।
उन्हें जीवन की ज्योतिमयी शक्ति पीठ ही कहना चाहिए। दस विद्यायें मात्र पूजा
साधना में प्रयुक्त होने वाली देवियां नहीं हैं। वरन् मानवीय चेतना की समस्त
क्रिया प्रक्रियाओं में व्याप्त शक्ति निर्झरणी है जिनमें स्नान अवगाहन करने
पर मनुष्य सामान्य न रह कर असामान्य बनता है और तुच्छता का कलेवर उतार कर महानता
की भूमिका में प्रवेश करता है।
समय आ गया कि काम-विद्या के तत्व-ज्ञान का संयत और विज्ञान सम्मत प्रतिपादन करने
का साहस किया जाय और संकोच का यह पर्दा उठा दिया जाय कि इस महान् विद्या की विवेचना
हर स्तर पर अश्लील ही मानी जायगी—उसे हर स्थिति में गोपनीय ही रखा जाना चाहिए।
यह संकोच मानव-जाति को एक महान् लाभ से वंचित ही रखे रहेगा। चर्चा करने वाले
को लोग हलके स्तर का समझेंगे उसकी गरिमा घटेगी यह अपराध ही है। शरीर शक्ति का
शिक्षण करने वाले उपाध्याय जननेन्द्रियों का स्वरूप समझाने में झिझक कर अपने
छात्रों को उस महत्वपूर्ण ज्ञान से वंचित नहीं करते। यदि यह संकोच शीलता न तोड़ी
जाती तो यौन रोगों के चिकित्सक कहां से आते? प्रसव सहायता और गर्भाशयों की शल्य-क्रिया
कैसे सम्भव होती? संकोच वहां उचित है जहां कुत्साएं भड़कने की आशंका हो। प्रतिबन्ध
पशुता भड़काने वाले अश्लीलता कामुकता, वासना की आत्मघाती प्रवृति के प्रसारण
पर होना चाहिए। सृष्टि की संचरण प्रक्रिया और मानव-जीवन की अतिशय महत्वपूर्ण
एवं प्रेरक प्रवृति की दिशा-विदिशा जानने से वंचित रहना, वस्तुतः अपने ही पैरों
कुल्हाड़ी मारना है। उचित ज्ञान के अभाव में ही प्रक्षिप्त ज्ञान को विस्तार
मिलता है। काम-वासना मनुष्य जीवन की एक अति प्रबल प्रवृत्ति है। उस की हलचल मस्तिष्क
को उद्वेलित करती ही रहती है। फलतः व्यक्ति उस सम्बन्ध में कुछ न कुछ कहने-सुनने
के पूछने-बताने के—पढ़ने-जानने के लिये भी खोजबीन करता रहता है। उच्चस्तरीय जानकारी
न होने से उसे घटिया, विकृत और अवांछनीय सामग्री हाथ लगती है। जिससे आत्मघात
करने का ही पथ प्रशस्त होता है। इस स्थिति से बचने की दृष्टि से भी यह आवश्यक
है। काम प्रवृति की तथ्य पूर्ण जानकारी सर्व साधारण को उपलब्ध रहे और उसके आधार
पर उसे अपने व्यक्ति-विकास एवं शक्ति संतुलन में सहायता मिलती रह सके। आध्यात्मिक
काम-विज्ञान का प्रथम पाठ आज की स्थिति में भारतीयों को यह पढ़ाना चाहिए कि वे
प्रकृति और पुरुष की समीपता एवं एकता को तात्विक दृष्टि से देखें और उनका समन्वय
वैसे ही करें जैसे कि एक ही शरीर में रहने वाले इन दो तत्वों का सहज भाव से बना
चला आता है मस्तिष्क प्राण का-अग्नि का-ब्रह्म का प्रतीक है। मूलाधार काम संस्थान-रयि
का-सोम का-प्रकृति का-प्रतीक है। दोनों एक ही शरीर में घुले−मिले पास-पास रहते
हैं। दोनों की यह स्थिति कोई उपद्रव उत्पन्न नहीं करती वरन् एक अपूर्णता को पूर्णता
में विकसित करती है। दो पृथक अंगों की सीमा में विकसित होकर यही प्रक्रिया में
एक से दो में और दो से बहुत में विकसित होती है। नर और नारियां दोनों ही मनुष्य
हैं और दोनों के अस्तित्व में प्रत्यक्षतः कोई बड़ा अन्तर नहीं है दोनों की योग्यता
मर्यादा और क्षमता लगभग एक ही माननी चाहिए। पर यदि सूक्ष्मता की गहराई में जाया
जाय तो उनकी मूल प्रकृति में पाया जायगा-नर जहां प्राण का-पौरुष का अग्नि का
बाहुल्य रख रहा होगा वहां नारी सोम की-सोचनीय की भावना का प्रतिनिधित्व कर रही
होगी। दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएं हैं और उनका महत्व समान रूप से मूल्यवान
है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। समीपता से दोनों एक दूसरे को बहुत कुछ देते
हैं और दें सकते हैं। एक दूसरे के विरोधी नहीं पूरक हैं। इसलिये उन्हें परस्पर
अछूत की तरह नहीं रहना चाहिए। पिछले दिनों सामन्तवादी युग में नारी का बहुत ही
दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण चित्रण कर दिया गया। उसे स्वर्ग की देवी के उच्च स्थान
से घसीट कर वैश्या जैसे नारकीय स्तर का चित्रित किया गया। कामिनी और रमणी मात्र
उसे रहने दिया गया। कला के नाम पर केवल घृणित वासना की प्रतिमूर्ति नारी को संजोया
गया। गीत, काव्य, चित्र, मूर्ति, अभिनय, नृत्य, साहित्य आदि कला के जितने भी
स्वर थे सब ने मिल कर नारी को यौन लिप्सा की पूर्ति में प्रयुक्त होने वाली भोग
सामग्री के रूप में प्रतिपादित किया। मस्तिष्क उसी सांचे में ढलते चले गये। और
नारी का स्वाभाविक वेष विन्यास ऐसा अभ्यस्त करा दिया गया। जिससे वासना भड़काना
ही उसका एक मात्र लक्ष्य दीखने लगे। नारी को जिस कुरुचि पूर्ण साज-सज्जा में
अलंकृत आज सर्वत्र देखा जाता है उसके पीछे सामन्तवादी युग की बनी दुरभिसंधि काम
कर रही है। यों तत्वतः नारी का यह घोर अपमान है कि वह नर की वासना भड़काने वाली
साज-सज्जा को स्वीकार करले। कोई दिन ऐसा जरूर आवेगा जब वह अपने ऊपर चढ़ाये गये
इन आवरणों के प्रति विद्रोह करेगी और नर-नारी की समान वेष-भूषा का साज-सज्जा
का प्रचलन होगा। जब नर, नारी को प्रलोभित करने की दृष्टि से सज-धज नहीं बनाव,
शृंगार साधन नहीं जुटाता तो नारी ही भड़कीली सज्जा अपना कर अपनी हीनता का परिचय
क्यों दे? भोग्या होने का प्रदर्शन वह क्यों न अपने व्यक्तित्व का अपमान समझे?
एक दिन यह भाव जागेंगे ही-और या तो नर स्वयं समझेगा या फिर जागृत नारी उन समस्त
बौद्धिक दुरभि संधियों को-कला के नाम पर बुने गये मकड़ी के जाले को तोड़ कर रख
देगी जो उसे हेय, हीन, घृणित, भोग्या, रमणी, कामिनी जैसे लांछनों से तिरस्कृत
करते हैं।
नारी का जो स्वाभाविक स्थान है वह उसे मिलना ही चाहिए। समाज में उसे पुरुष का
पूरक बन कर रहना चाहिए, नारी की अछूत अस्पर्श की स्थिति जो इन दिनों बनी हुई
है उसका एक मात्र कारण वह रुग्ण मनोवृत्ति है जिसके अनुसार नारी का अस्तित्व
काम-सेवन भर मान लिया गया है। यदि उसे बहिन, बेटी, मां, सखा और पूरक मान लिया
जाय, तो जिस प्रकार दो पुरुषों के सान्निध्य से काम-प्रवृत्ति भड़कने का कोई
डर नहीं रहता उसी प्रकार नर-नारी के बीच भी अकारण कलुष कषाय उत्पन्न न हो। वासना
या विकार के लिए न नर का अस्तित्व दोषी है न नारी का। केवल मनोवृत्ति दोषी है
जो अवांछनीय तत्वों में मौजूद भ्रम-जंजाल के रूप में कागज के रावण की तरह बनाकर
खड़ी कर दी गई है।
आज अपने समाज में नारी को नर से सर्वथा दूर रखा जाता है। दोनों कभी कहीं मिल
रहे हों बात कर रहे हों, हंस रहे हों तो उसे मात्र व्यभिचार का प्रयोजन सोचा
जायगा चाहे प्रसंग कितना ही पवित्र क्यों न चल रहा हो। यह हमारी तुच्छता का घृणित
तम स्वरूप है। नारी बिना हेय प्रयोजन के नर से अन्य किसी प्रसंग पर बात ही नहीं
कर सकती, उसके मन में कुत्सा के अतिरिक्त और कुछ रहता ही नहीं, यह सोच कर पर्दे
जैसे कठोर प्रतिबन्ध की जंजीरों में कसना निस्संदेह अति घृणित और अति ओछी मनोवृत्ति
का परिचय देना है। हम इसी दुर्बुद्धि में फंस गये हैं। भारतीय समाज में पर्दा
प्रथा का अभी तक बने रहना अपने चारित्रिक पिछड़े पन को ही प्रदर्शित करता है।
इससे लाभ रत्ती भर नहीं हानि अपार है। नारी में हीनता की भावना जम गई, उसका साहस
चला गया, परावलम्बी बन गई, पग-पग पर झिझक सवार है, प्रगति की दिशा में साहस नहीं
कर पाती, स्वावलम्बन की बात सोचते डरती है। इस स्थिति ने उसके व्यक्तित्व को
इतना दुर्बल बना दिया कि पग-पग पर पददलित होती है। उच्च वर्ण के हिन्दू लड़की
का विवाह तब करते हैं जब लड़की के साथ मोटी रकम भी दहेज में दी जाय। बिना मूल्य
नारी की उपलब्धि नर का असामान्य-सौभाग्य है। इस सौभाग्य का कुछ भी मूल्य न समझा
जाय और उसे अति तुच्छ समझ कर दहेज मिलने पर ही स्वीकार किया जाय यह नारी का दयनीय
और हृदय विदारक दुर्दशा का दुर्भाग्य पूर्ण चित्र है। इसका दोष उस मनोवृत्ति
को है जिसने नारी को भोग्या समझा और अन्य भोग सामग्रियों की तरह अपने लिए संग्रह
करने की दृष्टि से प्रतिबंधित किया। इस बन्धन ने नारी को इतनी दुर्बल बना दिया
कि वह समाज के लिए—परिवार के लिए—अपने लिए केवल भार भूत बनकर रह रही है।
इस स्थिति का अन्त किया जाना चाहिए और सर्व साधारण को यह समझाया जाना चाहिए कि
नारी न भोग्या है न रमणी न कामिनी। यह भी मनुष्य ही है, अगणित विभूतियों की धनी
है। नर की पूरक है। दोनों हिल-मिल कर सहयोगी सहचर की तरह रहें यही स्वाभाविक,
उचित और न्याय संगत है। प्रतिबन्धों के पीछे जिस व्यभिचार पर नियन्त्रण की बात
सोची जाती है, वह सर्वथा निरर्थक है। व्यभिचार मात्र क्रिया नहीं है वस्तुतः
वह दूषित दृष्टि ही है, जिसमें दृष्टि दोष भरा पड़ा है वह अविवाहित भी व्यभिचार
का दण्ड भुगतेगा और जिसकी भावनाएं पवित्र हैं वह विवाहित रहते हुए भी ब्रह्मचारी
है। हमें इसी प्रवृत्ति का विकास करना चाहिए और रमणी कामिनी की भाषा में सोचना
बन्द कर देना चाहिए। कला के नाम पर जिन दुष्ट दुरात्माओं ने नारी को वैश्या का
स्थान देने की ठान-ठानी है, उन्हें अपराधियों की पंक्ति में खड़ा करना चाहिए।
नारी भी नर की भांति मात्र मनुष्य है और मनुष्य को मनुष्य से सहयोग सम्पर्क रखने
की छूट होनी ही चाहिए। यह मानवीय और सामाजिक न्याय की मांग है जिसे अधिक दिन
तक बेरहमी के साथ दबाया नहीं जाना चाहिए। परस्पर पूरक रह कर सहयोग और सद्भाव
की स्नेह और सौजन्य की—भावनाओं का विकास करते हुए ही हम वांछनीय एवं स्वाभाविक
स्थिति का समाज विनिर्मित कर सकते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से तो यह नितान्त आवश्यक
है। प्राण और रयि की समीपता बिना आन्तरिक-उल्लास के उद्भव ही न हो सकेगा। माना
कि बिना पत्नी के सरसता, बहिन के बिना सौहार्द्र, पुत्री के बिना स्नेह की धाराएं
सूखी ही पड़ी रहेंगी और नारी को अछूत मानने वाला नर मरघट में रहने वाले प्रेत
पिशाच की तरह एकाकीपन की आग में जलता रहेगा। इसी प्रकार प्रति बंधित नारी भी
मणि-विहीन सर्प की तरह खोई-खोई भूली भटकी सी अशांत उद्विग्न और अविकसित बनी रहेगी।
इस अवांछनीय स्थिति को जिस गर्हित काम-विज्ञान ने उत्पन्न किया है उसे बहिष्कृत
परिष्कृत करना ही होगा। अन्यथा ब्रह्म भी प्रकृति के सान्निध्य की तरह नर-नारी
का स्नेह सद्भाव बढ़ने से सृष्टि का मानव-समाज का-सौन्दर्य और प्रकाश बढ़ेगा
ही घटेगा नहीं।
यौन सम्पर्क एक विशेष प्रक्रिया है। उसके पीछे अग्नि और सोम के मिलन से उत्पन्न
एक विद्युत संचार की विशेष प्रक्रिया सन्निहित है इसलिए इसकी उपयुक्तता और पवित्रता
पर अधिकतम ध्यान रखा जा सकता है। पर वह प्रयोजन अनावश्यक प्रतिबन्धों से न हो
सकेगा। यह प्रतिबन्ध तो उस दुष्ट मान्यता को ही बल देंगे जिसके अनुसार व्यभिचार
के अतिरिक्त और किसी प्रयोजन के लिए नर-नारी चर्चा ही नहीं कर सकते। वर्तमान
प्रतिबन्धों की वांछनीयता समझी जानी चाहिए और उन्हें इस दृष्टि से शिथिल एवं
समाप्त किया जाना चाहिए कि नर और नारी स्वेच्छा से सद्भाव की महत्ता स्वीकार
कर सकें और अधिकतम पवित्रता के साथ सहयोग और सौजन्य के साथ रह सकें और प्रगति
की दिशा में एक दूसरे के पूरक बन कर साहस पूर्ण कदम बढ़ा सके।
नारी को कामिनी और रमणी न बनाया जाय
दो पहिये बिना गाड़ी नहीं चल सकती। नर और नारी के घनिष्ठ सहयोग बिना सृष्टि
का व्यवस्था क्रम नहीं चल सकता। दोनों का मिलन काम-तृप्ति एवं प्रजनन जैसे पशु
प्रयोजन के लिए नहीं होता वरन् घर बसाने से लेकर व्यक्तित्वों के विकास और सामाजिक
प्रगति तक समस्त सत्प्रवृत्तियों का ढांचा दोनों के सहयोग से ही संभव होता है।
यह घनिष्ठता जितनी प्रगाढ़ होगी विकास और उल्लास की प्रक्रिया उतनी ही सघन होती
चली जायगी।
कुछ समय से नर-नारी के सान्निध्य का प्रश्न अतिवाद के दो अन्तिम सिरों के साथ
जोड़ दिया गया है। एक ओर तो नारी को इतनी आकर्षण चित्रित किया गया कि उसकी मांसलता
को ही सृष्टि की सबसे बड़ी विभूति सिद्ध कर दिया गया। कला ने नारी के अंग-प्रत्यंग
की सुडौलता को इतना सराहा कि सामान्य भावुक व्यक्ति यह सोचने के लिए विवश हो
गया कि ऐसी सुन्दरता को काम-तृप्ति के लिए प्राप्त कर लेना जीवन की सबसे बड़ी
उपलब्धि है। गीत, काव्य, संगीत, नृत्य, अभिनय, चित्र, मूर्ति आदि कला के समस्त
अंग जब नारी की मांसलता और कामुकता को ही आकाश तक पहुंचाने में जुट जायें तो
बेचारी लोक-वृत्ति को उधर मुड़ना ही पड़ेगा। इस कुचेष्टा का घातक दुष्परिणाम
सामने आया। यौन प्रवृत्तियां भड़की, नर-नारी के बीच का सौजन्य चला गया और एक
दूसरे के लिए अहितकर बन गये। यौन रोगों की बाढ़ आई, शरीर और मन जर्जर हो गया,
पीढ़ियां दुर्बल से दुर्बलतर होती चली गईं, मनःस्थिति उस कुचेष्टा के चिन्तन
में तल्लीन होने के कारण कुछ महत्वपूर्ण चिन्तन कर सकने में असमर्थ हो गयी। तेज
ओज—व्यक्तित्व, प्रतिभा, मेधा शौर्य और वर्चस्व—जो कुछ महान् था वह सब कुछ इसी
कुचेष्टा की वेदी पर बलि हो गया। दुर्बल काया और मनःस्थिति को लेकर मनुष्य दीन-हीन
और पतित, पापी ही बन सकता था सो बनता चला गया। नारी को रमणी सिद्ध करके तुच्छ
सा मनोरंजन भले पाया हो पर उससे जो हानि हुई उसकी कल्पना कर सकना भी कठिन है।
जितने भी मानवीय प्रवृत्तियों को इस पतनोन्मुख दिशा में मोड़ने के लिये प्रयत्न
किया है वस्तुतः एक दिन वे मानवीय विवेक और ईश्वरीय न्याय की अदालत में अपराधियों
की तरह खड़े किये जायेंगे।
जो लोग फ्रायड जैसे मनो वैज्ञानिकों का नाम लेकर इस कुत्सा को भड़काने के लिये
आज कला प्रयोजनों को पूरी तरह इस स्वच्छन्दता के पैरों में डाल दिया है वे भले
ही कहने को बुद्धि जीवी और विचारशील क्यों न हों उन्हें मानवीय सभ्यता पर कलंक
लगाने वाला ही कहा जायेगा। न तो मनोविज्ञान की दृष्टि से और न ही विज्ञान की
दृष्टि से काम वासना मनुष्य के लिये नितान्त आवश्यक नहीं है उसकी अति तो सर्वथा
संकट भारी परिणाम ही प्रस्तुत कर सकती है कर रही है इस आत्म प्रवंचना से बचा
जाना चाहिए।
लन्दन के एक अन्य मनोविज्ञान शास्त्री ने तो इस सिद्धान्त की नींव ही हिला कर
रखदी। लिसैस्टर विश्व विद्यालय के मनोविज्ञान के प्राध्यापक श्री डैविड राइट
ने अनेक बन्दी-शिविरों, फौजी संस्थानों, खेल-कूद और पर्वतारोहण जैसी सामाजिक
सामुदायिक और राष्ट्रीय सन्धि के कार्यों में भाग लेने वालों के जीवन विस्तृत
अध्ययन करने के बाद पाया कि उनमें से अधिकांश सामान्य परिस्थितियों में ही सम्भोग
का आनन्द लेते रहे। उन्हें अपने अभियान अथवा उसके बाद विषय-भोग की कभी भी इच्छा
नहीं होती जब तक कि वे या तो स्वयं भूतकालीन सम्भोग का स्मरण नहीं करते या उनके
सामने इस तरह की चर्चा के विषय नहीं आते। यदि वे इच्छा न करें अथवा उनके सामने
कामुकता भड़काने वाली प्रवृत्तियां न आयें तो वे काम-वासना के लिये कभी परेशान
नहीं होंगे वरन् उनमें मनो-विनोद आह्लाद के स्वभाव का विकास ही होने लगता है।
श्री डैविड राइट ने द्वितीय महायुद्ध के दौरान बन्दी बनाये गये जापानियों, साइबेरिया
शिविर में बन्दी लोगों तथा अस्पतालों के उन लोगों से जाकर भेंट की जो लम्बे समय
से किसी बीमारी से आक्रान्त पड़े थे। उनसे बात-चीत करते समय उन्होंने पाया कि
उनमें काम-वासना की कोई इच्छा नहीं रह गई थी तो भी वे न तो अशान्त थे न उद्विग्न
वरन् उनके अन्तःकरण से एक प्रकार की शान्ति और आत्म-विश्वास की झलक देखने को
मिलती थी। यह आत्म-विश्वास अच्छे अर्थों में था—कि यदि इन परिस्थितियों से मुक्ति
मिले तो अमुक-अमुक अच्छे काम करें।’’
श्री डैविड राइट के इस कथन की और भी पुष्टि वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मिल जाती
है और इस तरह के सिद्धान्त का लगभग अन्त ही हो जाता है। आने वाले समय में लोग
फ्रायड के सिद्धान्त को तूल देकर अपना न तो मस्तिष्क खराब करेंगे और न शरीर की
शक्तियां बरबाद करेंगे वरन् शक्तियों के संचय से जीवन की अनेक ऐसी धाराओं का
विकास करने में समर्थ होंगे, जिनका सम्बन्ध आध्यात्मिक तत्वों से है और जो यथार्थ
में मनुष्य के लक्ष्य हैं। ईश्वर, आत्मा, परलोक, पुनर्जन्म जैसे आध्यात्मिक सत्यों
की शोध में ब्रह्मचर्य सबसे अधिक सहायक है आगे की पीढ़ी का ध्यान ब्रह्मचर्य
द्वारा शक्ति संयम और उससे जीवन की प्रसन्नता के लिये नई-नई विधाओं की खोज की
ओर कहीं अधिक होगा।
मेरीलैण्ड (अमरीका) के नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ चाइल्ड हेल्थ एण्ड ह्यूमन डेवलपमेन्ट
(अमरीका की एक राष्ट्रीय संस्था जो बच्चों के स्वास्थ्य और मानव-विकास की आवश्यकताओं
की शोध और शिक्षण करती है।) ने एक खोज में बताया कि मनुष्य शरीर की कोशिकाओं
में गुणसूत्रों (क्रोमोसोम्स-अर्थात् व्यक्ति के शरीर स्वभाव आदि का निर्धारण
करने वाले तत्व) के तेईस जोड़े रहते हैं। प्रत्येक जोड़े में 1 गुणसूत्र पिता
का एक माता का होता है। 22 जोड़े ऐसे होते हैं जिनका काम वासना सम्बन्धी गुणों
व विकास से कोई सम्बन्ध नहीं होता। अधिकतम 1 ही जोड़ा काम-वासना का रहता है इसी
से काम वासना की प्रवृत्ति का व्यक्ति में निर्धारण होता है किन्तु कुछ मामलों
में यह भी देखा गया कि उस एक जोड़े में भी एक गुणसूत्र या तो माता की ओर का या
पिता की ओर का था ही नहीं सारे 23 समूहों में केवल एक ही गुणसूत्र था ऐसे व्यक्तियों
में सेक्स अंगों का विकास तो असामान्य होता है किन्तु उनके स्वभाव में काम-वासना
सम्बन्धी कोई विशेष रुचि नहीं होती वरन् कई बातों में वे असाधारण प्रतिभा वाले
सिद्ध हुये। बेशक! कुछ एक ऐसे भी उदाहरण आये जबकि बाईस जोड़े अलिंगी गुणसूत्रों
(आटोसपल क्रोमोसोम) की जगह 21 जोड़े ही रह गये शेष दो में से 1 तो पूरा ही जोड़ा
काम-सम्बन्धी गुणसूत्र का था जबकि दूसरे में भी एक गुणसूत्र काम-वासना वाला था।
वैज्ञानिकों ने पाया कि इस अतिरिक्त काम-वासना के गुणसूत्र वाले सभी व्यक्ति
लम्पट क्रोधी असामाजिक और खूंखार थे। तात्पर्य यह कि काम-वासना पर नियन्त्रण
न होना व्यक्ति के लिये सुविधा का नहीं पतन का ही कारण हो सकता है।
अतिवाद का एक सिरा यह है कि कामिनी, रमणी, वैश्या आदि बना कर उसे आकर्षण का केन्द्र
बनाया गया। अतिवाद का दूसरा सिरा यह है कि उसे पर्दे घूंघट की कठोर जंजीरों में
जकड़ कर अपंग सदृश बना दिया गया। उस पर इतने प्रतिबन्ध लगाये गये जितने बन्दी
और पशु भी सहन नहीं कर सकते। जेल के कैदियों को थोड़ी घूमने फिरने की—हंसने बोलने
की आजादी रहती है। पर घर की छोटी-सी कोठरी में कैद नव वधू के लिए परिवार के छोटी
आयु वालों के सामने ही बोलने की छूट है। बड़ी आयु वालों से तो उसे पर्दा ही करना
चाहिए। न उनके सामने मुंह खोला जा सकता है और न उनसे बात की जा सकती है। पर्दा
सो पर्दा—प्रथा सो प्रथा—प्रतिबन्ध सो प्रतिबन्ध इससे न्याय औचित्य और विवेक
के लिए क्यों गुंजाइश छोड़ी जाय? पशु को मुंह पर नकाब लगाकर नहीं रहना पड़ता।
वे दूसरों के चेहरे देख सकते हैं और अपने दिखा सकते हैं। जब मर्जी हो चाहे जिसके
सामने अपनी टूटी-फूटी वाणी बोल सकते हैं। पर नारी को इतने अधिकार से भी वंचित
कर दिया गया।
इस अमानवीय प्रतिबन्ध की प्रतिक्रिया बुरी हुई। नारी शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि
से बहुत पिछड़ गई। भारत में नर की अपेक्षा नारी की मृत्यु दर बहुत अधिक है। मानसिक
दृष्टि से वह आत्महीनता की ग्रन्थियों में जकड़ी पड़ी है। सहमी, झिझकी, डरी,
घबराई, दीन-हीन अपराधिन की तरह वह यहां वहां लुढ़कती छिपती देखी जा सकती है अन्याय
अत्याचार और अपमान पग-पग पर सहते सहते—क्रमशः अपनी सभी मौलिक विशेषताएं खोती
चली गई। आज औसत नारी उस नीबू की तरह है जिसका रस निचोड़ कर उसे कूड़े में फेंक
दिया जाता है। नव-यौवन के दो चार वर्ष ही उनकी उपयोगिता प्रेमी पतिदेव की आंखों
में रहती है। अनाचार की वेदी पर जैसे ही उस सौन्दर्य की बलि चढ़ी कि वह दासी
मात्र शेष रह जाती है। आकर्षण की तलाश में भौंरे फिर नये-नये फूलों की खोज में
निकलते और इधर-उधर मंडराते दीखते हैं। जीवन की लाश का भार ढोती हुई—गोदी के बच्चों
के लिए वह किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करती है। जो था वह दो-चार वर्ष में जुट
गया अब बेचारी को कठोर परिश्रम के बदले पेट भरने के लिए रोटी और पहनने को कपड़े
भर पाने का अधिकार है। बन्दिनी का अन्तःकरण इस स्थिति के विरुद्ध भीतर ही भीतर
कितना ही विद्रोही बना बैठा रहे प्रत्यक्षतः वह कुछ न कर सकने की परिस्थितियों
में ही जकड़ी होती है सो गर्म खाने और आंसू पीने के अतिरिक्त उसके पास कुछ चारा
नहीं रह जाता।
ऐसी विषय स्थिति में पड़ी हुई नारी का व्यक्तित्व उसके अपने लिए—परिवार के लिए—बच्चों
के लिए—कुछ अधिक उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकता। जो खुद ही मर रहा है वह दूसरों को
जीवन क्या देगा? समाज की कैसी विडम्बना है कि एक ओर जहां नारी को आकर्षण केन्द्र
मानकर उसके गुणानुवाद गाने में सारी भावुकता जुटा दी। दूसरी ओर उसे इतना पद-दलित,
पीड़ित प्रतिबन्धित करने की नृशंसता अपनाई। यह दोनों अतिवादी सिरे ऐसे हैं जिनका
समन्वय कर सकना कठिन है।
तीसरा एक और अतिवाद पनपा। अध्यात्म के मंच से एक और बेसुरा राग अलापा गया कि
नारी ही दोष दुर्गुणों की पाप पतन की जड़ है इसलिए उससे सर्वथा दूर रहकर ही स्वर्ग
मुक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है। इस सनक के प्रतिपादन में न जाने क्या-क्या
गढ़ंत गढ़कर खड़ी कर दी गईं। लोग घर छोड़कर भागने में—स्त्री, बच्चों को बिलखता
छोड़कर भीख मांगने और दर-दर भटकने के लिये निकट पड़े। समझ गया इसी तरह योग साधना
होती होगी इसी तरह स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि मिलती होगी। पर देखा ठीक उलटा गया।
आन्तरिक अतृप्ति ने उनकी मनोभूमि को सर्वथा विकृत कर दिया और वे तथाकथित संत
महात्मा सामान्य नागरिकों की अपेक्षा भी गई गुजरी मनःस्थिति के दलदल में फंस
गये। विरक्ति का जितना ही ढोंग उनने बनाया अनुरक्ति की प्रतिक्रिया उतनी ही उग्र
होती चली गई। उनका अन्तरंग यदि कोई पढ़ सकता हो तो प्रतीत होगा कि मनोविकारों
ने उन्हें कितना जर्जर कर रखा है। स्वाभाविक की उपेक्षा करके अस्वाभाविक के जाल
जंजाल में बुरी तरह जकड़ गये हैं। ऐसे कम ही विरक्त मिलेंगे जिनने बाह्य जीवन
में जैसे नारी के प्रति घृणा व्यक्त की है वैसे ही अन्तरंग में भी उसे विस्मृत
करने में सफल हो पाये हों। सच्चाई यह है कि विरक्ति का दम्भ अनुरक्ति को हजार
गुना बढ़ा देता है। ‘बन्दर का चिन्तन न करेंगे’ ऐसी प्रतिज्ञा करते ही बरवश बन्दर
स्मृति पटल पर आकर उछल कूद मचाने लगता है। यों स्वाभाविक रूप में बन्दर के बारे
में कुछ न सोचा जाता तो शायद वर्षों उसका स्मरण न आता पर अब जब कि बन्दर का स्मरण
ही नरक में गिराने वाला बता दिया गया तो उसका स्मरण करने से मन को रोक पाना असम्भव
है। इस तथाकथित वैराग्य में नारी को पतन का कारण बताकर कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं
किया गया। पर्दे के पीछे जो होता रहता है वह दयनीय है। अतिवाद कभी भी उपयोगी
नहीं रहा। काम तो मध्यम मार्ग से चलता है उसी को अपनाकर कोई श्रेयाधिकारी बन
सकता है।
आध्यात्मिक काम विज्ञान का प्रतिपादन यह है कि अतिवाद की भारी दीवारें गिरा दी
जायं और नारी को नर की ही भांति सामान्य और स्वाभाविक स्थिति पर रहने दिया जाय।
इससे एक बड़ी अनीति का अन्त हो जायगा। अतिवाद के दोनों ही पक्ष नारी के वर्चस्व
पर भारी चोट पहुंचाते हैं और उसे दुर्बल जर्जर एवं अनुपयोग बनाते हैं। इसलिए
इन जाल-जंजालों से उसे मुक्त करने के लिए उग्र और समर्थ प्रयत्न किये जायं।
प्रयत्न होना चाहिए कि नारी की मांसलता की अवांछनीय अभिव्यक्तियां उभारने वालों
से अनुरोध किया जाय कि वे अपने विष बुझे तीर कृपाकर तरकस में बन्द करलें। फिल्म
वाले इस दिशा में बहुत आगे बढ़ गये हैं। उनने बन्दर के हाथ तलवार लगने पर जैसी
कुचेष्टा की आशंका की वैसी ही करतूतें आरम्भ कर दी हैं। आग लगा देना सरल है बुझाना
कठिन। मनुष्य की पशु प्रवृत्तियों को यौन उद्वेग और काम विकारों को भड़का देना
सरल है पर उस उभार से जो सर्वनाश हो सकता है उससे बचाव की तरकीब ढूंढ़ना कठिन
है। ना-समझ लड़के लड़कियों पर आज का सिनेमा क्या प्रभाव डाल रहा है और उनकी मनोदिशा
को किधर घसीटे लिये जा रहा है इस पर बारीकी से दृष्टि डालने वाला दुःखी हुए बिना
न रहेगा। कला के अन्य क्षेत्रों में काम करने वाले विभूतिवानों से करबद्ध प्रार्थना
की जाय कि वे नारी को पददलित करने के पाप पूर्ण अभियान में जितना कुछ कर चुके
उतना ही पर्याप्त मान लें आगे की ओर निशाने न साधें। कवि लोग ऐसे गीत न लिखें
जिनसे विकारोत्तेजक प्रवृत्तियां भड़के। साहित्यकार—उपन्यासकार—कलम से नारी के
गोपनीय सन्दर्भों पर भड़काने वाली चर्चा छोड़कर सरस्वती की साधना को अगणित धाराओं
में प्रयुक्त कर अपनी प्रतिभा का परिचय दें। गायक विकारोत्तेजना और श्रृंगार
रस को कुछ दिन तक विश्राम कर लेने दें। सामन्तवादी अन्धकार युग के दिनों उसे
ही तो एक छत्र राज्य मिला है। गायन का अर्थ ही पिछले दिनों कामेन्द्रिय रहा है।
राज्य दरबारों से लेकर मनचले आवारा हिप्पियों तक उसी को मांगा जाता रहा है। अब
कुछ दिन से गान विश्राम ले लें और दूसरे रसों को भी जीवित रहने का अवसर मिल जाय
तो क्या हर्ज है? कुछ दिन तक घुंघरू न बजे, पायल न खनकें तो भी कला जीवित रहेगी।
चित्रकार नव यौवन की शालीनता पर पर्दा पड़ा रहने दें, पतित दुःशासन द्वारा द्रौपदी
को नंगी करने की कुचेष्टा न करें तो भी उनकी चित्रकारिता सराही जा सकती है। चित्रकला
के दूसरे पक्ष भी हैं क्यों न कुशल चित्रकार सुरुचि उत्पन्न करने वाले चित्र
बनायें। मूर्तिकार क्यों न मानवीय अन्तर्वेदना को उभारने वाली प्रतिमायें बनायें।
इन महारथी कलाकारों से कहा जाय कि सौजन्य का बालक अभिमन्यु इस बुरी तरह न मारा
जाय। महाभारत का बहु कुकृत्य महारथियों के माथे पर कलंक का टीका ही लगा गया।
अब फिर कलाकार महारथियों के चक्रव्यूह में फंसा शालीनता का अभिमन्यु उसी तरह
फिर मारा गया तो यह भारत—महाभारत—समस्त संसार की दृष्टि में आदर्शवादिता और आध्यात्मिकता
का ढिंढोरा पीटने वाला दम्भी ही माना जायेगा। जिस देश के कलाकार तक अपना उत्तरदायित्व
न समझें—न निवाहें उस देश के सामान्य नागरिकों से कोई क्या आशा करेगा? यदि उनके
विष बुझे तीर इसी क्रम से चलते रहे तो संसार भर में भारत से जिस नव युग निर्माण
के प्रकाश की आशा की जाती है उसका दीपक बुझ ही जायेगा। कलाकारों को कहा जाना
चाहिए कि वे कृपाकर अपने कदम पीछे हटालें। उनके इस अनुग्रह के बिना नारी की शालीनता,
पवित्रता, उत्कृष्टता और समर्थता को बचाया न जा सकेगा।
नारी के प्रति हमारा चिन्तन सखा, सहचर और मित्र जैसा सरल स्वाभाविक होना चाहिए।
उसे सामान्य मनुष्य से न अधिक माना जाय न कम। पुरुष और पुरुष स्त्रियां और स्त्रियां
जब मिलते हैं तो उनके असंख्य प्रयोजन होते हैं, काम सेवन जैसी बात वे सोचते भी
नहीं। ऐसे ही नर-नारी का मिलन भी स्वाभाविक सरल और सौम्य बनाया जाना चाहिए। यह
स्थिति निश्चित रूप से आ सकती है क्योंकि वही प्राकृतिक है। इसी प्रकार रूढ़ि
वादियों से कहा जाना चाहिए कि प्रतिबन्धों से व्यभिचार रुकेगा नहीं-बढ़ेगा। जिस
स्त्री का मुंह ढका होता है उसे देखने को मन चलेगा पर मुंह खोले सड़क पर हजारों
लाखों स्त्रियों में से किसी की ओर नजर गढ़ाने की इच्छा नहीं होती चाहे वे रूपवान
हों या कुरूप। पर्दा यह मान्यता मजबूत करता है कि नारी-नर का सम्पर्क वासना के
अतिरिक्त और किसी प्रयोजन के लिए हो ही नहीं सकता। यह विचारणा बहुत ही कलुषित,
हेय और निकृष्ट स्तर की है। हमें अपनी बहिन, बेटी, माता और पत्नी पर इतना विश्वास
करना ही चाहिए कि वे बिना किसी प्रतिबन्ध के स्वेच्छा पूर्वक अपनी शालीनता अक्षुण्ण
रख सकने में समर्थ हैं। जब शासक, सामान्य निरीह प्रजा की बहिन बेटियों की इज्जत
लूटने के लिए भेड़ियों की तरह गली कूचों में फिरते रहते थे वह जमाना बहुत पीछे
रह गया। अब हम आत्म रक्षा के लिए उपयुक्त परिस्थितियों के बीच जी रहे हैं। इसलिए
आक्रांता और आततायियों के डर से नारी को प्रतिबन्धित करने की भी कोई आवश्यकता
नहीं रही। फिर क्यों हम घूंघट, पर्दा, प्रतिबन्ध के बन्धनों में उसे जकड़े और
क्यों उसके स्वाभाविक जीवन का ईश्वर प्रदत्त सुविधा को छीनने का पाप कमायें?
इसी प्रकार अध्यात्मवाद के नाम पर नारी तिरस्कार और बहिष्कार की बेवक्त शहनाई
बन्द कर देनी चाहिए। जिन भगवान की हम उपासना करते हैं और जिनसे स्वर्ग मुक्ति
सिद्धि मांगते हैं वे स्वयं सपत्नीक हैं। एकाकी भगवान एक भी नहीं। राम, कृष्ण,
शिव, विष्णु आदि किसी भी देवता को लें सभी विवाहित हैं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली
जैसी देवियों तक को दाम्पत्य जीवन स्वीकार रहा है। हर भगवान और हर देवता के साथ
उनकी पत्नियां विराजमान हैं फिर उनके मनों को अपने इष्ट देवों से भी आगे निकल
जाने की बात क्यों सोचनी चाहिए?
सप्त ऋषियों में सातों के सातों विवाहित थे और उनके साधना काल की तपश्चर्या अवधि
में भी पत्नियां उनके साथ रहीं। इससे उनके कार्य में बाधा रत्ती भर नहीं पहुंची
वरन् सहायता ही मिली। प्राचीन काल में जब विवेकपूर्ण अध्यात्म जीवित था तब कोई
सोच भी नहीं सकता था कि आत्मिक प्रगति में नारी के कारण कोई बाधा उत्पन्न होगी।
राम कृष्ण परमहंस को विवाह की आवश्यकता अनुभव हुई और उनने उस व्यवस्था को तब
जुटाया, जब वे आत्मिक प्रगति के ऊंचे स्तर पर पहुंच चुके थे। काम-सेवन और नारी
सान्निध्य एक बात नहीं है। इसके अन्तर को भली-भांति समझा जाना चाहिए। योगी अरविन्द
घोष की साधना का स्तर कितना ऊंचा था उनमें सन्देह करने की कोई गुंजाइश नहीं है।
उनके एकाकी जीवन की पूरी पूरी साज संभाल ‘‘माताजी’’ करती रहीं। इस सम्पर्क से
दोनों की आत्मिक महत्ता बढ़ी ही घटी नहीं। प्रातःस्मरणीय माताजी ने अरविन्द के
सम्पर्क से भारी प्रकाश पाया और योगिराज को यह सान्निध्य गंगा के समान पुण्य
फलदायक सिद्ध हुआ। प्राचीन काल का ऋषि इतिहास तो आदि से अन्त तक इस सरल स्वाभाविकता
की सिद्धि करता चला आया है। तपस्वी ऋषि सपत्नीक स्थिति में रहते थे। जब जरूरत
पड़ती प्रजनन की व्यवस्था बनाते अन्यथा आजीवन ब्रह्मचारी रहकर भी नारी सान्निध्य
की व्यवस्था बनाये रखते। यह उनके विवेक पर निर्भर रहता था प्रतिबन्ध ऐसा कुछ
नहीं था। यह स्थिति आज भी उपयोगी रह सकती है। सन्त लोग अपना व्यक्तिगत जीवन विवाहित
या अविवाहित जैसा भी चाहे बितायें, पर कम से कम उन्हें इस अतिवाद का ढिंढोरा
पीटना तो बन्द ही कर देना चाहिए जिसके अनुसार नारी को नरक की खान कहा जाता है।
यदि ऐसा वस्तुतः होता तो गांधी जी जैसे संत नारी त्याग की बात सोचते। कोई अधिक
सेवा सुविधा की दृष्टि से या उत्तरदायित्व हलके रखने की दृष्टि से अविवाहित रहे
तो यह उसका व्यक्तिगत निर्णय है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि ये भी कोई प्रतिबन्ध
हो सकता है या होना चाहिए। सच तो यह है कि सन्त लोग यदि सपत्नीक सेवा कार्य में
जुटें तो वे अपना आदर्श लोगों के सामने प्रस्तुत करके उच्चस्तरीय गृहस्थ जीवन
की सम्भावना प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह प्रस्तुत कर सकते हैं।
काम अर्थ विनोद, उल्लास और आनन्द है। मैथुन को ही काम नहीं कहते। काम क्षेत्र
की परिधि में वह भी एक बहुत ही छोटा और नगण्य या माध्यम हो सकता है पर वह कोई
निरन्तर की वस्तु तो है नहीं। यदाकदा ही उसकी उपयोगिता होती है। इसलिए मैथुन
को एक कोने पर रखकर—उपेक्षणीय मानकर भी काम लाभ किया जाता है। स्नेह, सद्भाव,
विनोद, उल्लास की उच्च स्तरीय अभिव्यक्तियां जिस परिधि में आती हैं उसे ‘आध्यात्मिक
काम’ कह सकते हैं। यह छोटे बालकों से लेकर वृद्धों तक एक समान प्रयुक्त हो सकता
है। नारी और नर को भी इस भाव प्रवाह से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। घर में बहिन,
बेटी, माता, भावज, चाची, दादी, बुआ, भतीजी आदि के साथ रहकर उनके साथ प्यार दुलार
के पवित्र सम्बन्धों सहित आनन्दित जीवन जिया जा सकता है तो घर से बाहर की परिधि
में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? हम पड़ौसी के परिवार में भी अपने ही घर परिवार की
तरह बिना नर नारी का भेदभाव किये प्यार दुलार क्यों नहीं बिखेर सकते?
नर नारी के बीच व्यापक सद्भाव—सहयोग की—सम्पर्क की स्थिति में व्यक्ति और समाज
का विकास ही सम्भव है। उससे हानि रत्ती भर भी नहीं। स्मरण रखा जाय पाप या व्यभिचार
का सृजन सम्पर्क से नहीं दुर्बुद्धि से होता है। पुरुष डॉक्टर नारी के प्रजनन
अवयवों तक का आवश्यकतानुसार आपरेशन करते हैं। उसमें न पाप है, न अश्लील न अनर्थ।
रेलगाड़ी की भीड़ में नर-नारियों के शरीर भिंचे रहते हैं। जहां पाप वृत्ति न
हो वहां शरीर का स्पर्श दूषित कैसे होगा? हम अपनी युवा पुत्री के शिर और पीठ
पर स्नेह का हाथ फिराते हैं तो पाप कहां लगता है। सान्निध्य पाप नहीं है। पाप
तो एक अलग ही छूत की बीमारी है जो तस्वीरें देखकर भी चित्त को उद्विग्न कर सकने
में समर्थ हैं। इलाज इस बीमारी का किया जाना चाहिए। हमारी कुत्सा का दण्ड बेचारी
नारी को भुगतना पड़े यह सरासर अन्याय है। इस अनीति को जब तक बरता जाता रहेगा,
नारी की स्थिति दयनीय ही बनी रहेगी और इस पाप का फल व्यक्ति और समाज को असंख्य
अभिशापों के रूप में बराबर भुगतना पड़ेगा।
भगवान वह शुभ दिन जल्दी ही लाये जब नर-नारी स्नेही सहयोगी की तरह—मित्र और सखा
की तरह—एक दूसरे के पूरक बनकर सरल स्वाभाविक नागरिकता का आनन्द लेते हुए जीवनयापन
कर सकने की मनःस्थिति प्राप्त कर लें। हम विकारों को रोकें—सान्निध्य को नहीं।
सान्निध्य रोककर विकारों पर नियन्त्रण पा सकना सम्भव नहीं है। इसलिए हमें उन
स्रोतों को बन्द करना पड़ेगा जो विकार और व्यभिचार भड़काने में उत्तरदायी हैं।
अग्नि और सोम, प्राण और रयि, ऋण और धन विद्युत प्रवाहों का समन्वय इस सृष्टि
के संचरण और उल्लास को अग्रगामी बनाता चला आ रहा है। नर-नारी का सौम्य सम्पर्क
बढ़ा कर हमें खोना कुछ नहीं—पाना अपार है।
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काम क्रीड़ा की उपयोगिता ही नहीं विभीषिका का भी ध्यान रहे
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पिछले दिनों अग्नि तत्व को बहुत महत्व मिला और सोम एक कोने में उपेक्षित पड़ा
रहा। फलतः सृष्टि का—समाज का—सारा सन्तुलन गड़बड़ा गया। हवन कुण्ड के चारों ओर
एक पानी की नाली भरी रखी जाती है। कर्मकाण्ड के ज्ञाता जानते हैं कि यज्ञ कुण्ड
में अग्नि कितनी ही प्रदीप्त क्यों न रहे उसके चारों ओर घेरा सोम का जल का ही
रहना चाहिए। अग्नि को उतने समारोह पूर्वक यज्ञ आयोजनों में स्थापित नहीं किया
जाता जितनी धूमधाम के साथ कि जल यात्रा की जाती है और जल देवता को स्थापित किया
जाता है। अग्नि का—ग्रीष्म ऋतु का उत्ताप तीव्र होते ही वर्षा ऋतु दौड़ आती है
और उन तपन का समाधान प्रस्तुत करती है।
नर की अग्नि ऊष्मा और नारी की सोम, जल कहा गया है। नर की प्राण शक्ति का पुरुषार्थ
क्षमता और कठोरता का बौद्धिक प्रखरता का अपना स्थान है और उसका उपयोग किया जाना
चाहिए पर यदि उसे उच्छृंखल छोड़ दिया गया—नारी का नियंत्रण उस पर न हुआ तो सृष्टि
में क्रूरता और दुष्टता का उत्ताप ही बढ़ता चला जायगा। परम्परा यह रही है कि
नर के श्रम साहस का उपयोग क्रम चलता रहा है, पर नारी ने अपनी मृदुल भावनाओं से
उसे मर्यादाओं में रहने के लिए नियन्त्रित और बाध्य किया है। उसकी मृदुल और स्नेह
सिक्त भावनाओं ने क्रूरता को कोमलता में बदलने की अद्भुत सफलता पाई है। यह क्रम
ठीक तरह चलता रहता पुरुष का शौर्य, ओजस् अपनी प्रखरता से सम्पदायें उपार्जित
करता और नारी अपनी मृदुलता से उसे सौम्य सहृदय बनाती रहती तो दोनों सही पहियों
की गाड़ी से प्रगति की दिशा में सृष्टि व्यवस्था की यात्रा ठीक प्रकार सम्पन्न
होती रहती। चिरकाल तक वही क्रम चला। उपार्जन नर ने किया और उसका उपयोग नारी ने।
अब वह क्रम नहीं रहा। अब उच्छृंखल नर हर क्षेत्र में सर्व सत्ता सम्पन्न हुआ
दैत्य, दानव की तरह निरंकुश सत्ता का उद्धत उपयोग कर रहा है। नारी तो मात्र भोग्या,
रमणी, कामिनी बनकर विषय विकारों की तृप्ति के लिए साधन सामग्री मात्र रह गई है।
उसके हाथ से वे सब अधिकार छीन लिये गये जो अनादिकाल से उसे सृष्टि कर्ता ने सौंपे
थे।
वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हर क्षेत्र में दिशा निर्धारण
के सूत्र नारी के हाथ में रहने चाहिए। तभी उपलब्ध सम्पदाओं का सौम्य सदुपयोग
सम्भव हो सकेगा। आज हर क्षेत्र में विकृतियों की विभीषिकाएं नग्न, नृत्य कर रही
हैं इसके स्थूल कारण कुछ भी हों सूक्ष्म कारण यह है कि नारी का वर्चस्व नेतृत्व
कहीं भी नहीं रहा, सर्वत्र नर की ही मनमानी, घरजानी चल रही है। उसकी प्रकृति
में जो कठोरता का भला या बुरा तत्व अधिक है उसी के द्वारा सब कुछ संचालित हो
रहा है फलस्वरूप हर क्षेत्र में उद्धतता का बोलबाला दीख पड़ता है। जल के अभाव
में अग्नि-सर्वनाशी दावानल का विकराल रूप धारण कर लेती है इन दिनों नारी को उपेक्षित,
तिरस्कृत करने के उपरान्त जो विद्रूप अपनाया है उसका परिणाम व्यापक हाहाकार के
रूप में सामने प्रस्तुत है।
स्थिति को बदलने और सुधारने के लिए भूल को फिर सुधारना होगा और वस्तुस्थिति उपलब्ध
करने के लिये पीछे लौटना होगा। नारी का वर्चस्व पुनः स्थापित किया जाय और उसके
हाथ में नेतृत्व सौंपा जाय, यह समय की पुकार और परिस्थितियों की मांग है, उसे
पूरा करना ही होगा। नवयुग-निर्माण के लिए जन मानस में जिन कोमल भावनाओं का परिष्कार
किया जाना है वह नारी सूत्रों से ही उद्भूत होगा। युद्ध, संघर्ष, कठोरता, चातुर्य,
बुद्धि कौशल के चमत्कार देख लिये गये। उनने सम्पदाएं तो कमाई पर उसकी एकांकी
उद्धत प्रकृति उसका सदुपयोग न कर सकी। स्नेह, सौजन्य, सद्भाव सफलता की प्रतीक
तो नारी है। उसी का वर्चस्व मृदुलता का संचार कर सकने में समर्थ है। उसे उपेक्षित
पड़ा रहने दिया जाय तो उपार्जन कितना भी—किसी देश में क्यों न होता रहे—सदुपयोग
के अभाव में वह विश्व घातक ही सिद्ध होता रहेगा। सन्तुलन तभी रहेगा जब नारी को
पुनः उसके पद पर प्रतिष्ठापित किया जाय और शक्ति के उन्मत्त हाथी पर स्नेह का
अंकुश नियोजित किया जाय। भावनात्मक नव निर्माण का यह अति महत्वपूर्ण सूत्र है।
नारी का पिछड़ापन दूर किये बिना—उसे आगे लाये बिना—कोई गति नहीं—इस कदम को उठाये
बिना हमारी धरती पर स्वर्ग अवतरण करने और मनुष्य में देवत्व का उद्भव करने के
हमारे स्वप्न साकार न हो सकेंगे।
प्रतिबन्धित नारी को स्वतन्त्रता के स्वाभाविक वातावरण में सांस ले सकने की स्थिति
तक ले चलने में प्रधान बाधा उस रूढ़िवादी मान्यता की है जिसके अनुसार उसे या
तो अछूत, बन्दी, अविश्वस्त घोषित कर दिया गया है या फिर उसे कामिनी की लांछना
से कलंकित कर दिया है इन मूढ़ मान्यताओं पर प्रहार किये बिना उनका उन्मूलन किये
बिना यह सम्भव न हो सकेगा कि अन्ध परम्परा के खूनी शिकंजे ढीले किये जा सकें
और नारी को कुछ कर सकने के लिए अपनी क्षमता का उपयोग कर सकना सम्भव हो सके। यह
लेख माला इसी प्रयोजन के लिए लिखी जा रही है और यह प्रतिपादित किया जा रहा है
कि नारी न तो कामिनी है—न अविश्वस्त न नरक में धकेलने वाली न बन्दी बना कर रखी
जाने योग्य, भूखी अथवा दासी। वह मनुष्य जाती की आधी इकाई है—और उसका व्यक्तित्व
वर्चस्व नर के समान ही नहीं वरन् अधिक उपयोगी भी है। उसे सरल स्वाभाविक स्थिति
में जीवन यापन करने की छूट दी जा सके तो विश्व की वर्तमान विषम परिस्थितियों
में आश्चर्यजनक मोड़ लाया जा सकता है और अन्धकार से घिरा दीखने वाला मानव जाति
का भविष्य आशा के आलोक से प्रकाशवान होता हुआ दृष्टिगोचर हो सकता है।
सर्व साधारण को यह समझाया जाना चाहिए कि जिस प्रकार पुरुष-पुरुष मिल कर कुछ काम
करें या स्त्रियां-स्त्रियां मिलकर सहयोग सान्निध्य जगावें तो व्यभिचार अनाचार
की आशंका नहीं की जा सकती। उसी प्रकार नर और नारी मिलजुल कर रहें तो उसमें प्रकृतितः
कोई जोखिम या कुकल्पना की ऐसी आशंका नहीं है जिससे भयभीत होकर आधे मनुष्य समाज
पर-नारी पर अवांछनीय प्रतिबंध आरोपित किये जाये। नर नारी का प्राकृतिक मिलना
कितना उपयोगी आवश्यक एवं उल्लासपूर्ण है इसका परिचय हम भरे-पूरे परिवार में—जिसमें
सभी वर्ग के नर-नारी अति पवित्रता के साथ रहते हैं—आसानी से प्राप्त कर सकते
हैं। घर परिवार में पति-पत्नी के जोड़ों के अतिरिक्त कौन किसे कुदृष्टि से देखता
है या कुचेष्टा करता है यह स्थिति विश्व परिवार में भी लाई जा सकती है और सर्वत्र
नर-नारी समान रूप से अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए स्नेह सद्भाव का संवर्धन
करते हुए आत्मिक और भौतिक विकास में परस्पर अति महत्वपूर्ण योगदान दें सकते हैं।
यह स्थिति लाई ही जानी चाहिए—बुलाई ही जानी चाहिए।
अवरोध केवल गर्हित दृष्टिकोण ने प्रस्तुत किया है। इसके लिए अधिक दोषी कलाकार
वर्ग है जिसने समाज के सोचने की दिशा ही अति भ्रमित करके रख दी, नारी को रमणी,
कामिनी और वैश्या के रूप में प्रस्तुत करने की कुचेष्टा में जब कला के सारे साधन
झोंक दिये गये तो जन मानस विकृत क्यों न होता? चित्रकार जब उसके मर्म-स्थलों
को निर्लज्ज निर्वसना बनाने के लिए दुशासन की तरह अड़े बैठे हैं कवि जब वासना
भड़काने वाले ही छन्द लिखें, गायक जब नख शिख का उत्तेजक उभार और लम्पटता के हाव-भावों
भरे क्रिया-कलापों को अलापें—साहित्यकार कुत्सा ही कुत्सा सृजन करते चले जायें—और
प्रेस तथा फिल्म जैसे वैज्ञानिक माध्यमों से उन दुष्प्रवृत्तियों को उभारने में
पूरा-पूरा योगदान मिले तो जनमानस को विकृत और भ्रमित कर देना क्या कुछ कठिन हो
सकता है? हमें इस विकृति के मूल स्रोत कला के अनाचार को रोकना बदलना होगा। स्नेह
और सद्भाव की—देवी सरस्वती के साथ किया जाने वाला यह बर्बर व्यवहार यदि उल्टा
जा सकता हो तो लोक मानस में नारी के प्रति स्वाभाविक सौजन्य फिर पुनः जीवित किया
जा सकता है।
रूढ़िवादियों से कहा जाय कि वे दिन में आंखें मलकर न बैठे रहें। विवेक का युग
उभरता चला आ रहा है। औचित्य की प्रतिष्ठा करने के लिये बुद्धिवाद की प्रखरता
प्रातःकालीन ऊषा की तरह उदय होती चली आ रही है। उसे रोका न जा सकेगा। कथा पुराणों
की दुहाई देकर—प्रथा परम्परा का पल्ला पकड़ कर-अब देर तक वे प्रतिबन्ध जीवित
न रखे जा सकेंगे जो नारी को व्यभिचारिणी और अविश्वस्त समझ कर उसे अगणित बन्धनों
में जकड़े हुए हैं। विवेक और न्याय की आत्मा तड़प रही है, वह इस बात के लिये
मचल पड़ी है कि नारी के साथ बरती जाने वाली बर्बरता का अन्त किया जाय। सो वह
सब होकर रहेगा। उसे कोई भी अवरोध देर तक रोक न सकेगा। अगले दिनों निश्चित रूप
से नर और नारी परस्पर सहयोगी बनकर स्नेह सद्भाव के साथ स्वाभाविक जीवन जियेंगे
और एक दूसरे को आशंका या यौन आकर्षण की दृष्ट से न देखकर पुण्य सौजन्य के आधार
पर निर्माण और निर्वाह के क्षेत्रों में प्रगतिशील कदम बढ़ाते चलेंगे। रूढ़िवाद
के लिये उचित यही है कि समय रहते बदलें अन्यथा समय उनकी अवज्ञा ही नहीं दुर्गति
भी करेगा। उदीयमान सूर्य रुकेगा नहीं, उल्लू, चमगादड़ और वनबिलाव ही चाहे तो
मुंह छिपाकर किसी कोने में विश्राम लेने के लिए अवकाश प्राप्त कर सकते हैं।
इसी प्रकार तथाकथित सन्त महात्माओं को कहा जाना चाहिये कि वे अपने मन की संकीर्णता,
क्षुद्रता, और कलुषिता से डरें उसे ही भवबन्धन मानें। नरक की खान वही है। नारी
को उस लांछना से लांछित कर उस मानव जाति की भर्त्सना न करे जिसके पेट से वे स्वयं
पैदा हुए हैं और जिसका दूध पीकर इतने बड़े हुए हैं। अच्छा हो हमारी जीभ पुत्री
को न कोसे—भगिनी को लांछित न करे—नारी नरक की खान हो सकती है यह कुकल्पना अध्यात्म
के किसी आदर्श या सिद्धान्त से तालमेल न खाती। यदि बात वैसी ही होती तो अपने
इष्टदेव राम, कृष्ण, शिव आदि नारी को पास न आने देते। ऋषि आश्रमों में ऋषिकाएं
न रहतीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली आदि देवियों का मुख देखने से पाप लग गया होता।
निरर्थक की डींगे न हांके तो ही अच्छा है। अन्तरात्मा प्रज्ञा, भक्ति, साधना,
मुक्ति, सिद्धि या सभी स्त्रीलिंग हैं। यदि नारी नरक की खान है और स्त्रीलिंग,
इस शब्दों के साथ जुड़ी हुई विभूतियों को भी बहिष्कृत किया जाना चाहिए। अच्छा
है अध्यात्मवाद के नाम पर भौंड़ा भ्रम जंजाल अपने और दूसरों को दिग्भ्रान्त करने
की अपेक्षा उसे समेट कर अजायब घर की कोठरी में बन्द कर दिया जाय।
सर्वसाधारण को इस तथ्य से परिचित कराया जाना ही चाहिए कि नर-नारी को सघन सहयोग
यदि पवित्र पृष्ठभूमि पर विकसित किया जाय तो उससे किसी को कुछ भी हानि पहुंचने
वाली नहीं है वरन् सबका सब प्रकार से लाभ ही होगा। नारी कोई बिजली या आग नहीं
है जिसे छूते ही या देखते ही कोई अनर्थ हो जाय। उसे अलग-अलग रखने की कुछ भी आवश्यकता
नहीं है मनुष्य को मनुष्य के अधिकार मिलने ही चाहिए। विश्व में राजनैतिक स्वतन्त्रता
की मांग पिछले दिनों बहुत प्रबल होती चली आई है और उसने परम्परागत ताज, तख्तों
को जड़ मूल से उखाड़ कर फेंक दिया। यह प्रवाह परिवर्तन राजनीति तक ही सीमित न
रहेगा। मनुष्य के समान स्वाधीनता दिला कर ही वह गति रुकेगी। गुलाम प्रथा का अन्त
हो गया अब दास-दासी खरीदे व बेचे नहीं जाते। वर्ग भेद और रंग भेद के नाम पर बरती
जाने वाली असमानता के विरुद्ध आरम्भ हुआ विद्रोह प्रबल से प्रबलतर होता चला जा
रहा है और दिन दूर नहीं जब कि मानवीय सम्मान और अधिकार से वंचित कोई व्यक्ति
कहीं न रहेगा। जन्म-जाति, वंश, वर्ण, रंग आदि के नाम पर बरती जाने वाली असमानता
अब देर तक जिन्दा रहने वाली नहीं है। वह अपनी मौत के दिन गिन रही है। इसी संदर्भ
में यह भी गिरह बांध लेनी चाहिए कि नर और नारी के बीच बरता जाने वाला भेद भाव
भी उसी अन्याय की परिधि में आता है। नारी की पराधीनता मनुष्य के आधे भाग की—आधी
जनसंख्या की पराधीनता है। यह कैसे सम्भव है वह आगे भी आज की ही तरह बनी रहे।
स्वतन्त्रता का प्रवाह नारी को भी इन अनीति मूलक बन्धनों से मुक्ति दिलाकर रहेगा।
दिन दूर नहीं कि गाड़ी के दो पहियों की तरह-शरीर की दो भुजाओं की तरह नर-नारी
सौम्य सहयोग करते दिखाई पड़ेंगे। समय का प्रवाह आज नहीं तो कल इस स्थिति को उत्पन्न
करके रहेगा। अच्छा हो वक्त रहते हम बदल जायें तो अमिट भावनाओं से लड़ मरने की
अपेक्षा उसके लिये रास्ता खुला छोड़ दें—अच्छा तो यह है कि न्याय और विवेक की
दिव्य किरणों के साथ उदय होने वाली इस ऊषा की अभ्यर्थना—करने अपनी सद्भाव सम्पन्नता
का परिचय देने के लिए आगे बढ़ चलें।
नव निर्माण की प्रक्रिया इस दिशा में अधिक उत्सुक इसलिए है कि भावी विश्व का
समग्र नेतृत्व नारी को ही सौंपा जाने वाला है। राज सत्ता का उपयोग पिछले दिनों
आक्रमण, आतंक, शोषण और युद्ध लिप्सा के लिए होता रहा है पुरुष के नेतृत्व के
दुष्परिणाम इतिहास का पन्ना-पन्ना बता रहा है। अब राज सत्ता नारी के हाथ सौंपी
जायेगी ताकि वह अपनी करुणा और मृदुलता के अनुरूप राज सत्ता के अंचल में कराहती
हुई मानवता के आंसू पोंछ सके। शिक्षा से लेकर न्याय तक—वाणिज्य से लेकर धर्म
धारणा तक हर क्षेत्र का नेतृत्व जब नारी करेगी तब सचमुच दुनिया तेजी से बदलती
चली जायेगी। कला के सारे सूत्र जब नारी के हाथ सौंप दिये जायेंगे तब उस देव मंच
से केवल शालीनता की दिव्य धाराएं ही प्रवाहित होंगी और उस पुण्य जाह्नवी में
स्नान करके जन मानस अपने समस्त कषाय कल्मष धोकर निर्मल निष्पाप होता दिखाई देगा।
नर का नेतृत्व मुद्दतों से चला आ रहा है उसकी करतूत करामात भली प्रकार देखी परखी
जा चुकी। अच्छा है वह ससम्मान पीछे हट जाय और पेन्शन लेकर कम से कम नेतृत्व की
लालसा से विदा हो ही जाय। करने के लिये बहुत काम पड़े हैं। पुरुष को उनसे रोकता
कौन है? बात केवल नेतृत्व की है। बदलाव का तकाजा है कि ग्रीष्म का आतप बहुत दिन
तप लिया अब वर्षा की शांति और शीतलता की फुहारें झरनी चाहिए। सर्वनाश की किस
विषम विभीषिका में मनुष्य जाति फंसी पड़ी है उससे परित्राण नेतृत्व बदले बिना
सम्भव नहीं। नारी की करुणा से ही नर की निरन्तर क्रूरता का परिमार्जन हो सकेगा।
उसे सशक्त और समर्थ बनाने के लिए वह सब बौद्धिक प्रक्रिया सजीव करनी पड़ेगी जो
इस लेख माला के अन्तर्गत प्रस्तुत की जा रही है।
नर-नारी के सम्मिलन से खतरा केवल एक ही है कि यह वर्तमान विकृत वासना का ताण्डव
रोका नहीं गया तो पाश्चात्य देशों की तरह स्वच्छन्द के वातावरण में बढ़ चला यौन
अनाचार बिखर पड़ेगा और वह भी कम विघातक न होगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए
जहां नारी स्वातन्त्र्य के लिए हमें प्रयत्न करना है वहां यह चेष्टा भी करनी
है कि कामुकता की ओर बहती हुई मनोवृत्तियों को परिष्कृत करने में कुछ उठा न रखा
जाय। नारी का सौम्य और स्वाभाविक चित्रण इस सन्दर्भ में अति महान है। कला के
विद्रूप को कोसने से काम न चलेगा, उसे गन्दे हाथों से छीन लेना शासन सत्ता के
लिए तो सम्भव है पर हम लोग जन स्तर पर इस प्रजातन्त्र पद्धति के रहते कुछ बहुत
बड़ा प्रतिरोध नहीं कर सकते हम यही कर सकते हैं कि दूसरा कला मंच खड़ा करें और
उसके माध्यम से नारी की पवित्रता प्रतिपादित करते हुए लोक मानस की यह मान्यता
बनायें कि नारी वासना के लिए नहीं पवित्रता का पुण्य स्फुरण करने के लिए है।
कला मंच यह सब आसानी से कर सकता है। साहित्य का सृजन इसी दिशा में हो, कविताएं
ऐसी ही लिखी जायें, चित्र इसी प्रयोजन के लिए बनें, गायक यही गायें, प्रेस यही
छापें, फिल्म यही बनायें तो कोई कारण नहीं कि नारी का स्वाभाविक एवं सरल सौम्य
स्वरूप पुनः जन मानस में प्रतिष्ठापित न किया जा सके ऐसी दशा में वह जोखिम न
रहेगा जिसे पाश्चात्य लोग भुगत रहे हैं। उनने नारी स्वतन्त्रता तो प्रस्तुत की
पर विकारोन्मूलन के लिए कुछ करना तो दूर उलटे उसे भड़काने में लग गये और दुष्परिणाम
भुगत रहे हैं। हमें यह भूल नहीं करनी चाहिए। हम दृष्टिकोण के परिष्कार के प्रयत्नों
को भी नारी स्वातन्त्र्य आंदोलन के साथ मोड़कर रखें तो निश्चय ही वैसी आशंका
न रहेगी जिससे विकृतियों के भड़क पड़ने का विद्रूप उठकर खड़ा हो जाय।
साथ ही हमें आध्यात्मिक काम विज्ञान के उन तथ्यों को सामने लाना होगा जिनके आधार
पर यौन सम्बन्ध की—काम क्रीड़ा की उपयोगिता और विभीषिका को समझा जा सके और उसके
दुरुपयोग के खतरे से बचने एवं सदुपयोग से लाभान्वित होने के बारे में समुचित
ज्ञान सर्व साधारण को मिल सके।
प्रकृति की प्रेरणा सदाचार भरी आत्मीयता
आजकल पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यता से प्रभावित लोग यौन सदाचार का पालन करते हिचकिचाते
हैं और तर्क प्रस्तुत करते हैं कि मनुष्य ने प्रकृति से प्रेरणायें ली हैं। प्रकृति
में, पशुओं में, कामाचार की कोई मर्यादायें नहीं रहती अतएव मनुष्य भी यदि उनका
पालन नहीं करे तो कुछ हर्ज नहीं। वस्तुतः ऐसा कहने वालों ने प्रकृति का गहराई
तक अध्ययन नहीं किया थोड़े से तुच्छ और नगण्य किस्म की मक्खियों, मच्छरों, कुत्ते,
बिल्लियों की बात अलग है अन्यथा सृष्टि में जितने भी शक्तिशाली और प्रसन्नता
प्रिय जीव हैं उन सबके दाम्पत्य जीवन बहुत ही आत्मीयता, घनिष्ठता और सदाचार पूर्ण
होते हैं।
मनुष्य को छोड़कर अन्य प्राणियों में उतनी काम, कला नहीं होती। वे काम वासना
का उपयोग मात्र वंशवृद्धि के लिए ही करते हैं। उतना ही नहीं वे वंश वृद्धि के
बाद के अपने उत्तरदायित्वों को भी समझते हैं और उसके बाद उन्हें निभाने के लिए
पहले से ही व्यवस्था करने लगते हैं।
संयम और सुखी परिवार
‘स्टिकल-बैक’ नाम की एक मछली होती है, जो समुद्र में ही पाई जाती है। डा. लार्ड
ने इस मछली की विभिन्न आदतों और क्रियाओं का बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन किया।
बैकोवर आइरलैण्ड में महीनों रह-रहकर आपने इस मछली की जीवन पद्धति का अध्ययन किया
और बताया कि मनुष्य चाहे तो इससे अपने पारिवारिक जीवन को सुखी और सुदृढ़ बनाने
की महत्त्वपूर्ण शिक्षायें ले सकता है।
नर स्टिकल बैक अपना घर बसाने के लिये बहुत पहले से तैयारी प्रारम्भ कर देता है।
सबसे पहले सारे समुद्र में घूम-घूमकर वह कोई ऐसा स्थान ढूंढ़ निकालता है, जहां
पर पानी न बहुत तेजी से बह रहा हो न बहुत धीरे। जगह शांत एकान्त हो और वहां हर
किसी का पहुंचना भी सम्भव न हो।
प्राचीनकाल की जीवन-प्रणाली और शिक्षा पद्धति पर दृष्टि दौड़ाकर देखते हैं तो
पता चलता है कि तत्कालीन ऋषियों-मुनियों एवं सामाजिक मार्ग-दर्शक आचार्यों ने
भी यह भलीभांति अनुभव किया था कि दाम्पत्य और गृहस्थ-जीवन एक महत्वपूर्ण योग
साधना है, उसके लिये आवश्यक तैयारियां न की जायें तो लोगों के वैयक्तिक जीवन
ही नहीं पारिवारिक और सामाजिक व्यवस्थायें भी लड़खड़ा सकती हैं। जीवन के प्रथम
25 वर्ष ब्रह्मचर्यपूर्वक रहकर विद्याध्ययन करने और पाठ्य-क्रम में धार्मिक,
आध्यात्मिक, नैतिक, सांस्कृतिक विषयों के समावेश के पीछे एक मात्र उद्देश्य और
रहस्य यही था कि आने वाले जीवन और जिम्मेदारियों को वहन करने के लिये शारीरिक,
मानसिक, बौद्धिक, चारित्रिक त्रुटि न रह जाये। पूर्ण तैयारी कर लेने के फलस्वरूप
ही उन दिनों के दाम्पत्य जीवन, पारिवारिक और सामाजिक संगठन, प्रेम-मैत्री करुणा,
दया, क्षमा, उदारता आदि सुख-सन्तोष और स्वर्गीय परिस्थितियों से भरे-पूरे रहते
थे। आनंद छलकता था उन दिनों, पर आज जब कि शिक्षा के ढंग ढांचे में, हमारी रीति-नीति
और जीवन पद्धति में उस तैयारी के लिये कोई स्थान नहीं रहा, तब हमारे पारिवारिक
जीवन में कोई उल्लास नहीं रह गया। दाम्पत्य जीवन असन्तोष और अस्त-व्यस्तता के
पर्याय बन गये हैं।
मनुष्य भूलकर सकता है पर सृष्टि के सैकड़ों जीव−जंतुओं की तरह स्टिकल बैक मछली
यह भूल कभी नहीं करती। जैसे उसे प्रकृति से यह प्रेरणा मिली हो कि वह अपनी जीवन
पद्धति द्वारा मनुष्य को सिखाये और समझाये कि जो आनन्द पहले से तैयारी किये हुए
दाम्पत्य जीवन में है, वह चाहे जैसे गृहस्थ बसा लेने में नहीं है। यह सारा उत्तरदायित्व
पति का है कि वह समुचित व्यवस्थायें स्वयं जुटाये। अपनी तैयारी में कोई त्रुटि
न हो तो पत्नियों की और से पूर्ण सहयोग और समर्थन न मिले ऐसा कभी हो ही नहीं
सकता। इस मछली की तरह तैयारी किये हुये नर दाम्पत्य जीवन का ऐसा आनन्द पाते हैं
कि उन्हें न तो स्वर्ग की कल्पना होती है और न मुक्ति की ही। वे इसी जीवन में
स्वर्ग-भोग का सौभाग्य प्राप्त करते हैं।
तत्परतापूर्वक ढूंढ़-खोज के बाद जब उपयुक्त स्थान मिल जाता है, तब स्टिकल बैक
पत्नी के लिये सुन्दर घर बनाने की तैयारी करता है। इसके लिये उस बेचारे को कितना
परिश्रम करना पड़ता है, यह बात अपने माता-पिता की पीठ पर चढ़े, विवाह की कामना
करने वाले युवक भला क्या समझेंगे? स्टिकल बैक पानी में तैरती हुई छोटे-छोटे पौधों
की नरम-नरम लकड़ियां, तैरते हुये पौधों की जड़े इकट्ठी करता है और उन्हें चुने
हुये स्थान पर ले जाता है। विवाह के शौकीन स्टिकल को पहले खूब परिश्रम और मजदूरी
करनी पड़ती है। अपने शरीर से वह एक प्रकार का लस्लसा पदार्थ निकालता है और एकत्रित
सारी वस्तुओं को उसी में चिपका लेता है ताकि उसका इतना परिश्रम व्यर्थ न चला
जाये। उसने जो लकड़ियां एकत्रित की हैं, वह अपने स्थान तक पहुंच जायें।
स्टिकल बैक पूरे आत्म-विश्वास के साथ काम करता है। सारा एकत्रित सामान मजबूती
से चिपक गया है, इसका विश्वास करने के लिये वह अपने शरीर को फड़फड़ाता हुआ नाचता
है, जैसे उसे परिश्रम में आनन्द लेने की आदत हो। जब एक बार विश्वास हो गया कि
सामान गिरेगा नहीं, तब आगे बढ़ता है और पूर्व निर्धारित स्थान पर इस सामान से
मकान बनाता है। शरीर का लसलसा पदार्थ यहां सीमेन्ट का काम करता है और लाई हुई
लकड़ियां ईंट-पत्थरों का। आगन्तुक वधू के लिये महल बना कर एक बार वह उसे घूम-घूमकर
देखता है। लगता है अभी वैभव में कुछ कमी रह गई। फिर वह रेत के बारीक टुकड़े मुख
में भर कर लाता है और मकान के फर्श पर बिछाता है। कोठरी में कहीं टूट-फूट की
गुंजाइश हो तो उसे ठीक करता है। सारा मकान वार्निस किया हुआ—सा हो जाने के बाद
ही उसे सन्तोष होता है। जब यह तैयारियां पूर्ण हुईं, तब वह स्वयं मादा की खोज
में निकलता है। उसे दहेज और लेन-देन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि वह जानता है,
नारी-नर की अपनी आवश्यकता भी है, इसलिये प्रिय वस्तु को भरपूर स्वागत और सम्मान
अपनी ओर से ही क्यों न दिया जाये। वह मनुष्यों की तरह का दम्भ और पाखण्ड प्रदर्शित
नहीं करता।
उपयुक्त पत्नी मिल जाने पर वह उसे घर लाता है। पत्नी कुछ दिन में गर्भावस्था
में आती है, तब ये उसे घूमने को भेजता रहता है, घर और अण्डों की देख-भाल तब वह
स्वयं ही करता है। यह उनके भोजन आदि का ही प्रबन्ध नहीं करता वरन् सुरक्षा के
लिये दरवाजे पर कड़ा पहरा भी रखता। मि. फ्रैंक बकलैण्ड ने इसकी कर्मठता का वर्णन
करते हुये, लिखा है कि मकान में थोड़ी-सी भी गड़बड़ी हो तो यह उसे तुरन्त ठीक
करता है।
स्टिकल बैक अपने बच्चों और पत्नी के पालन का उत्तरदायित्व पूरी सूझ समझ के साथ
निबाहता है। वह उन्हें पर्दे में नहीं रखता। पर्याप्त ऑक्सीजन मिलती रहे, इसके
लिये वह अपने मकान में दो दरवाजे रखता है। इससे वहां के पानी में बहाव बना रहता
है और ताजी ऑक्सीजन मिलती रहती है, यदि बहाव रुक जाये तो वह तुरन्त शरीर फड़-फड़ाकर
बहाव पैदा कर देता है, जिससे रुके हुये पानी की गन्दगी प्रभावित न कर पाये।
स्टिकल बैक का जीवन कितना कलात्मक और सुरुचिपूर्ण है। इधर बच्चे निकलने लगे,
उधर उसने मकान के ऊपरी भाग छत को अलग करके एक बढ़िया झूला तैयार किया। मनुष्यों
की तरह गुम-सुम का जीवन उसे पसन्द नहीं। झूला बनाकर उसमें बच्चों को भी झुलाता
है और पत्नी को भी। स्वयं उस क्षेत्र में परेड करता रहता है, जिससे उसके आनन्द
और खुशहाली की अभिव्यक्ति होती है पर दूसरे दुश्मन और बुरे तत्व डरकर भाग जाते
हैं, जैसे कला प्रिय और सुरुचि पूर्ण सद्गृहस्थ से अवगुण दूर रहने से अशांति
पास नहीं आती। बच्चे झूला छोड़कर इधर-उधर भागते हैं तो यह उन्हें बार-बार झूले
में डाल देता है, जब तक बच्चे स्वयं समर्थ न हो जायें, यह उन्हें आवारा-गर्दी
और कुसंगति में नहीं बैठने देता। अपनी रक्षा करने में जब वे समर्थ हो जाते हैं,
तभी उन्हें जाने और नया संसार बनाने की अनुमति देता है।
स्टिकल बैक की तरह मनुष्य का पारिवारिक जीवन भी तैयारी उद्देश्य और सुरुचिपूर्ण
होता, पतिव्रत ही नहीं पत्नीव्रत का भी ध्यान रखा गया होता तो सामाजिक जीवन हंसता
खिलखिलाता हुआ होता।
शेरनी 108 दिन में प्रसव करती है। इसके बाद वह प्रायः 2 वर्ष तक, जब तक कि बच्चे
बड़े न हो जायें और समर्थ न बन जायें उन्हीं के पोषण व प्रशिक्षण में व्यस्त
रहती है। सहवास की इच्छा होने पर भी वह उसे टालती रहती है और बच्चों के बड़े
हो जाने पर ही पुनः गर्भ धारण करती है। इस तरह के उदाहरण से भावनाओं की गम्भीरता
का पता चलता है। इसके विपरीत आचरण स्वभाव का हल्कापन है, भावनाओं का अर्थ केवल
मात्र झुकना नहीं अपितु अपनी समीक्षा बुद्धि को जागृत रखते हुए, जो पवित्र रसमय
और मर्यादा जन्य है उसे पूरा करने में अपनी संपूर्ण निष्ठा का परिचय देना है।
कीवी, कैसोवरी, रही, मौआ, एमू, शुतुरमुर्ग और पेन्गुइन आदि पक्षियों के जीवन
का विस्तृत अध्ययन करने के बाद चार्ल्स डारविन ने लिखा है—इन पक्षियों का गृहस्थ
और पारिवारिक जीवन बड़ा सन्तुलित; समर्पित और चुस्त होता है। नर-मादा आपस में
ही नहीं बच्चों के लालन-पालन में भी बड़ी सतर्कता, स्नेह और बुद्धि-कौशल से काम
लेते हैं। मनुष्य-जाति की तरह इनमें भी परिवार के पालन-पोषण का अधिकांश उत्तरदायित्व
नर पर रहता है। मादा से शरीर में छोटा होने पर भी वह घोंसला बनाना, अण्डे सेहना
और जिन दिनों मादा अण्डे सेह रही हो उन दिनों उसके आहार की व्यवस्था करना, सद्यः
प्रसूत बच्चों को संभालने से लेकर उन्हें उड़ना सिखा कर एक स्वतन्त्र कुटुम्ब
बसा कर रहे की प्रेरणा देने तक का अधिकांश कार्य नर ही करता है। वह इनकी दुश्मनों
से रक्षा भी करता है।
गृहस्थी बसाने में सम्भवतः मनुष्य को इतनी आपा-धापी नहीं करनी पड़ती होगी जितनी
बेचारे पेन्गुइन पक्षी को। उसके लिये पेन्गुइन दो महीने सितम्बर और फरवरी में
दक्षिणी ध्रुव की यात्रा करता है। पेन्गुइन जाते हैं अपने अभिभावक अपने मार्गदर्शक
के अनुशासन में रहना कितना लाभदायक होता है। उसके अनुभवों का पूरा-पूरा लाभ उठाने
के लिये पेन्गुइन अपने मुखिया के चरण-चिन्हों पर ही चलता है।
ध्रुवों पर पहुंचने के बाद पुराने पेन्गुइन तो अपने पहले वर्षों के छोड़े हुए
घरों में आकर रहने लगते हैं किन्तु नव-युवक पेन्गुइन अपने माता-पिता की आज्ञा
लेकर नया परिवार बसाने के लिये चल देता है। उसकी सबसे पहली आवश्यकता एक योग्य
पत्नी की होती है। वह ऐसी किसी मादा को ढूंढ़ता है जिसका विवाह न हुआ हो। अपनी
विचित्र भाव-भंगिमा और भाषा में वह मादा से सम्बन्ध मांगता है। मनुष्य ही है
जो जीवन साथी का चुनाव करते समय गुणों का ध्यान न देकर केवल धन और रूप-लावण्य
को अधिक महत्त्व देता है। पर पेन्गुइन यह देखता है कि उसका जीवन साथी क्या उसे
सुदृढ़ साहचर्य प्रदान कर सकता है।
सम्बन्ध की याचना वह स्वयं करता है। ऐसे नहीं, उसे मालूम है जीवन में धर्मपत्नी
का क्या महत्त्व है, इसलिये पत्नी को खुश करके।पत्नी की प्रसन्नता भी सुन्दर
चिकने पत्थर होते हैं। नर चोंच में दबा कर एक सुन्दर-सा कंकड़ लेकर मादा के पास
जाता है। मादा कंकड़ देखकर उसके गुणी, पुरुषार्थी एवं श्रमजीवी होने का पता लगाती
है। यदि उसे नर पसन्द आ गया तो वह अपनी स्वीकृति दें देगी अन्यथा चोंच मारकर
उसे भगा देगी। चोट खाया हुआ नर एक बार पुनः प्रयत्न करता है। थोड़ी दूर पर उदास
सा बैठकर इस बात की प्रतीक्षा करता है कि मादा सम्भव है तरस खाये और स्वीकृति
दे दे। यदि मादा ने ठीक न समझा तो नर बेचारा कहीं और जाकर सम्बन्ध ढूंढ़ने लगता
है।
मादा की स्वीकृति मिल जाये तो पेन्गुइन की प्रसन्नता देखते ही बनती है। नाच-नाच
कर आसमान सिर पर उठा लेता है। पर मादा को पता होता है। गृहस्थ परिश्रम से चलते
हैं इसलिये वह नर को संकेत देकर घर बनाने में जुट जाती है। नर तब दूर-दूर तक
जाकर कंकड़ ढूंढ़कर लाता है। मादा महल बनाती है। इस समय बेचारा नर डांट-फटकार
भी पाता है पर उसे यह पता है कि पत्नी के स्नेह और सद्भाव के सुख के आगे मीठी
फटकार का कोई मूल्य नहीं। दोनों मकान बना लेते हैं तब फिर स्नान के लिये निकलते
हैं और जल की निर्मल लहरों में देर तक स्नान करते हैं। स्नान करके लौटने पर कई
बार उनके बने-बनाये मकान पर कोई अन्य पेन्गुइन अधिकार जमा लेता है। दोनों पक्षों
में युद्ध होता है जो विजयी होता है वही उस मकान में रहता है। पर युद्ध के बाद
भी स्नान करने जाना आवश्यक है इस बार वे पहले जैसी भूल नहीं करते। बारी-बारी
से स्नान करने जाते हैं और लौट कर फिर गृहस्थ कार्य में संलग्न होते हैं। मादा
अण्डे देती है पर बच्चों की पालन प्रक्रिया नर ही पूर्ण करते हैं। पेन्गुइन की
इस तरह की घटनायें देख कर मनुष्य की उससे तुलना करने को जी करता है। मनुष्य भी
उनकी तरह लूट-पाट और स्वार्थ पूर्ण प्रवंचना में कितना अशान्त और संघर्षरत रहता
है। पर वह सुखी गृहस्थ के सब लक्षण भी इन पक्षियों से नहीं सीख सकता और परस्पर
घर में ही लड़ता-झगड़ता रहता है। पेन्गुइन-सी सहिष्णुता भी उसमें नहीं है।
कछुये को नृत्य करते देखने की बात तो दूर की है, किसी ने उसे तेज चाल से चलते
हुये भी नहीं देखा होगा पर दाम्पत्य जीवन में आबद्ध होते समय उसकी प्रसन्नता
और थिरकन देखते ही बनती है। कछुआ जल में तेजी से नृत्य भी करता है और तरह-तरह
के ऐसे हाव-भाव भी जिन्हें देख कर मादा भी भाव विभोर हो उठती है। यही स्थिति
है मगरमच्छ की। मगर भी प्रणय बेला में विलक्षण नृत्य करता है।
मछलियों में सील मछली की दुनिया और भी विचित्र है। नर अच्छा महल बनाकर रहता है।
और उसमें कई-कई मादायें रखता है। नर अन्य नरों की मादाओं को हड़पने का भी प्रयत्न
करते रहते हैं और इसी कारण उन्हें कई बार तेज संघर्ष भी करना पड़ता है। कामुकता
और बहु विवाह की यह दुष्प्रवृत्ति मछलियों में ही नहीं शुतुरमुर्ग और रही नामक
पक्षियों में भी होती है। यह 7-8 मादायें तक रखते हैं फिर भी नर इतना धैर्यवान्
और परिश्रमी होता है कि एक-एक मादा आठ-आठ दस-दस अण्डे देती है और नर उन सबको
भली प्रकार संभाल लेता है। लगता है इनकी दुनिया ही पत्नी जुटाने और बच्चे पैदा
करने के लिये होती है इस दृष्टि से मनुष्य की कामुकता और दोष-दृष्टि को तोला
जा सकता है। यदि मनुष्य भी इन दो प्रवृत्तियों तक ही अपने जीवन क्रम को सीमित
रखता है तो इसका यह अर्थ हुआ कि वह रही और सील मछलियों की ही जाति का कोई जीव
है।
कई बार तो अश्लीलता में मनुष्य सामाजिक मर्यादाओं का भी उल्लंघन कर जाता है किन्तु
इन पक्षियों और प्राणियों ने अपने लिये जो विधान बना लिया होता है उससे जरा भी
विचलित नहीं होते। चींटी राजवंशी जन्तु है। उसमें रानी सर्व प्रभुता सम्पन्न
होती है वही अण्डे देती है और बच्चे पैदा करती है। अपने लिये मधुमक्खी की तरह
वह एक ही नर का चुनाव करती है शेष चींटियां मजदूरी, चौकीदारी और मेहतर आदि का
काम करती हैं। अपनी-जिम्मेदारी प्रत्येक चींटी इस ईमानदारी से पूरी करती है कि
किसी दूसरी को रत्ती भर भी शिकायत करने का अवसर न मिले जब कि उन बेचारियों को
अपने हिस्से से एक कण भी अधिक नहीं मिलता। लगता है सामाजिक व्यवस्था में ईमानदारी
को भी श्रम और निष्ठा यह आदर्श मनुष्य ने चींटी से सीख लिया होता तो वह आज की
अपेक्षा कहीं अधिक सुखी और सन्तुष्ट रहा होता, पर यहां तो अपने स्वार्थ, अपनी
गरज के लिये मनुष्य अपने भाई-भतीजों को भी नहीं छोड़ता। कम तौलकर, मिलावट करके
कम परिश्रम में अधिक सुख की इच्छा करने वाला मनुष्य इन चींटियों से भी गया गुजरा
लगता है।
एक बार अफ्रीका में वन्य पशु खोजियों का एक दल हाथियों की सामाजिकता का अध्ययन
करने आया। संयोग से उन्हें एक ऐसा सुरक्षित स्थान मिल गया जहां से वे बड़ी आसानी
से हाथियों के करतब देख करते थे। एक दिन उन्होंने देखा हाथियों का एक झुण्ड सवेरे
से ही विलक्षण व्यूह रचना कर रहा है। कई मस्त हाथियों ने घेरा डाल रखा है। झुण्ड
में जो सबसे मोटा और बलवान् हाथी था वही चारों तरफ आ जा सकता था शेष सब अपने-अपने
पहरे पर तैनात थे। लगता था वह बड़ा हाथी उन सबका पितामह या मुखिया था उसी के
इशारे पर सब व्यवस्था चल रही थी और एक मनुष्य है जो थोड़ा ज्ञान पा जाने या प्रभुता
सम्पन्न हो जाने पर भाई-भतीजों की कौन कहे परिवार के अत्यन्त संवेदनशील और उपयोगी
अंग बाबा, माता-पिता को भी अकेला या दीन-हीन स्थिति में छोड़कर चल देता है।
मुखिया के आदेश से 5-6 हथिनियां उस घेरे में दाखिल हुईं। बीच में गर्भवती हथिनी
लेटी थी। सम्भवतः उसकी प्रसव पीड़ा देखकर ही हमलावरों से रक्षा के लिये हाथियों
ने वह व्यूह रचना की थी। परस्पर प्रेम, आत्मीयता और निष्ठा का यह दृश्य सचमुच
मनुष्य को लाभदायक प्रेरणायें दे सकता है यदि मनुष्य स्वयं भी उनका परिपालन कर
सकता होता।
बच्चा हुआ, कुछ हथनियों ने जच्चा को संभाला कुछ ने बच्चे को। ढाई-तीन घण्टे तक
जब तक प्रसव होने के बाद से बच्चा धीरे-धीरे चलने न लगा हाथी उसी सुरक्षा स्थिति
में खड़े रहे। हथनियां दाई का काम करती रहीं। बच्चे और मादा के शरीर की सफाई
से लेकर उन्हें खाना खिलाने तक का सारा काम कितने सहयोग और संकुचित ढंग से हाथी
करते हैं यह मनुष्य को देखने, सोचने, समझने और अपने जीवन में भी धारण करने के
लिये अनुकरणीय है।
पेन्गुइन पक्षी बच्चों पर कठोर नियन्त्रण रखते हैं। बड़े-बूढ़ों के नियन्त्रण
के कारण बच्चे थोड़ा भी इधर-उधर नहीं जा सकते। जब शरीर और दुनियादारी में वे
चुस्त और योग्य हो जाते हैं तो फिर स्वच्छन्द विचरण की आज्ञा भी मिल जाती है
जब कि मनुष्य ने बच्चे पैदा करना तो सीखा पर उनमें से आधे भी ऐसे नहीं होते जो
सन्तान के प्रति अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह इतनी कड़ाई से करते हों। अधिकांश
तो यह समझना भी नहीं चाहते कि बच्चों को किस तरह योग्य नागरिक बनाया जाता है।
थोड़ी भी परेशानी आये तो मनुष्य अपने उत्तरदायित्वों से कतराने लगता है किन्तु
अन्य जीव अपने गृहस्थ कर्त्तव्यों का पालन कितनी निष्ठा के साथ करते हैं यह देखना
हो तो अफ्रीका चलना चाहिये। यहां कीवी नाम का एक पक्षी पाया जाता है। कामाचार
को वह अत्यन्त सावधानी से बर्तता है ताकि उसे कोई देख न ले। काम सम्बन्धी मर्यादाओं
को ढीला छोड़ने का ही प्रतिफल है कि आज सामाजिक जीवन में अश्लीलता और फूहड़पन
का सर्वत्र जोर है। कीवी को यह बात ज्ञात है और वह अपने वंश को सदैव सदाचारी
देखना चाहता है इसीलिये सहवास भी वह बिलकुल एकान्त में और उस विश्वास के साथ
करता है कि वहां उसे कोई देखेगा नहीं। मादा जब अण्डे देने लगती है तो नर उनकी
रक्षा करता है और सेहता भी है। उसे लगातार 80 दिन तक अण्डे की देखभाल करनी होती
है। बच्चा पैदा होने के साथ वह जहां पुत्रवान् होने पर गर्व अनुभव करता है वहां
यह प्रसन्नता भी कि अब उसे विश्राम मिलेगा पर होता यह है कि इसी बीच मादा ने
दूसरा अण्डा रख दिया होता है बेचारे नर को फिर 80 दिन का अनुष्ठान करना पड़ जाता
है। इस तरह वह कई-कई पुरश्चरण एक ही क्रम में पूरे करके अपनी निष्ठा का परिचय
देता है। मनुष्य क्या उतना नैतिक हो सकता है? इस पर विचार करें तो उत्तर निराशाजनक
ही होगा।
वासना के दुष्परिणाम
प्राणि जगत में जहां एक ओर यौन सदाचार अधिकाधिक ब्रह्मचर्य और पारिवारिक जीवन
में स्नेह भरी घनिष्ठता के दर्शन होते हैं वहीं काम का वह विद्रूप भी स्पष्ट
दिखाई दें जाता है जो नारी को कामिनी और रमणी रूप में देखने के कारण मनुष्य जाति
को भुगतना पड़ता है संयम और दाम्पत्य जीवन की मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले
जीवों का जीवनकाल इतना त्रास दायक पाया गया है कि उसे देखकर रोयें खड़े हो जाते
हैं कम से कम मनुष्य जैसे विचारशील प्राणी को तो वैसी स्थिति नहीं आने देनी चाहिये।
प्रजनन-ऋतु आने पर नर-सील मादाओं के लिए लड़ने लगते हैं। एक सशक्त नर-सील 40-50
तक मादाओं का मालिक होता है। पर उसकी विक्षुब्ध वासना अपरिमित होती है। नई मादाएं
देखकर वह मचल उठता है तथा पड़ौसी सील-समूह पर आक्रमण कर बैठता है। उस समूह के
नर से उसे प्रचण्ड संघर्ष करना पड़ता है। मान लें, कि वह इस संघर्ष में विजयी
ही हो जाता है और अपनी पसन्द की मादा को लेकर थका, आहत, गर्वोद्धत अपने समूह
में लौटता है, तो उसे प्रायः यही दृश्य दीखेगा कि उसके समूह की एक याकि दो-चार
मादाएं, कोई दूसरा नर-सील खींचे लिए जा रहा है। अब या तो मन मारकर, अपहरण का
यह आघात झेलें अथवा उसी थकी मंदी दशा में द्वन्द्व-युद्ध के लिए ललकारे और तब
परिणाम पता नहीं क्या हो?
इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप अधिकांश नर-सील तीन माह की यह प्रजनन-ऋतु बीतने
तक श्लथ, क्षत-विक्षत हो चुकते हैं और आहार जुटा पाने योग्य शक्ति भी उनमें शेष
नहीं रहती। इसका कारण मादा के प्रति नर-पशु की निरन्तर यौन-जागरूकता की प्रवृत्ति
है। इससे विपरीत सामूहिक सह-जीवन की प्रवृत्ति वाले पशुओं में तो मादा के प्रति
कोई अनावश्यक आकर्षण नर रखते ही नहीं मात्र प्रजनन-ऋतु में ही मादा विशेष के
प्रति आकर्षित होते हैं। शेष समय वे मानो लिंगातीत साहचर्य ही स्थिति में रहते
हैं।
हाथी की शक्ति एवं बुद्धिमत्ता सुविदित है। किन्तु इस विषमता वादी प्रकृति से
हाथियों के मुखिया को भी अपनी शक्ति व समय का अधिकांश भाग अनावश्यक संघर्षों
में खर्च करना होता है।
हाथी समूह में रहते हैं। समूह-नायक ही अपने समूह की सभी हथनियों का स्वामी होता
है। समूह के अन्य किसी सदस्य द्वारा किसी भी हथिनी से तनिक-सी भी काम चेष्टा
या प्रेम-प्रदर्शन करने पर, मुखिया यह देखते ही उस पर आक्रमण कर या तो भगा देता
है या परास्त कर प्रताड़ित, अपमानित करता है।
कोई युवा, शक्तिशाली हाथी कभी भी ऐसी उद्धत चेष्टा कर मुखिया को उत्तेजित कर
देता है और युद्ध में उसे यदि परास्त कर देता है, तो फिर वही टोली की सभी हथनियों
का स्वामी तथा टोली नायक बनता है। पराजित नायक बहुधा विक्षिप्त हो जाता है और
खतरनाक भी हो उठता है।
‘‘मरण बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दु धारणम्’’ सूत्र में कामुकता के अमर्यादित चरणों
को मरण का प्रतीक माना गया है। उसमें सर्वनाश ही सन्निहित है। यह विचार सर्वथा
असत्य है कि अति कामुकता बरतने वालों से उनकी सहधर्मिणी प्रभावित होती है, वरन्
सच तो यह है कि वह उलटी घृणा करने लगती है। ऐसी घृणा जहां पनपेगी वहां सद्भाव
कहां रहेगा? जब मादा देखती है कि नर अपनी तृप्ति के लिए उसके शरीर का अनावश्यक
दुरुपयोग किये जा रहा है तो वह पति-भक्ति अपनाने के स्थान पर उलटे आक्रमण कर
बैठती है। ऐसे आक्रमणों से नर की दुर्गति ही होती है और ‘मरण बिन्दुपातेन’ सूत्र
के अनुसार उद्धत कामविकार मृत्यु का दूत बनकर सामने आ खड़ा होता है।
नर-बिच्छू अपनी प्रेयसी के साथ-साथ नृत्य करता है—घण्टों। कभी तेजी से दोनों
आगे बढ़ते हैं, कभी पीछे हटते हैं। थककर शिथिल होने पर दोनों साथ-साथ ही विश्राम
करते हैं। लेकिन मादा बिच्छू कई बार उत्तेजना में नर को खा भी जाती है।
‘‘फ्राग-फिश’’ का यौनाचरण भी ऐसा ही प्राणान्तक है। मादा फ्राग-फिश घूमती रहती
है, श्रीमान नर अधिकांश पुरुषों की ही तरह लम्पट और अधीर होते हैं। मादा के पास
पहुंचते ही वे उत्तेजित हो उठते हैं, जब कि मादा को ऐसा कुछ भी नहीं होता। उत्तेजित
नर मादा के मादक दिख रहे शरीर-मांस में तेजी से दांत गढ़ाता है। बस, फिर यह दांत
गढ़ा ही रह जाता है। क्योंकि उस मांस से यह दांत कभी निकल नहीं पाता। किसी तरह
केलि करते हैं। नशा उतर जाने के बाद दांत छुड़ाने की पूरी कोशिश करते हैं—बार-बार।
पर विफल मनोरथ ही रहते हैं। खाना-पीना बन्द। कितने दिन जीयेंगे? अन्त में दम
टूट जाता है।
बिल्लियों का गम्भीर रुदन उनकी शारीरिक पीड़ा का नहीं वरन् उत्तेजित मनोव्यथा
का परिचालक होता है। बन्दरों की कर्ण कटु किलकारियों में भी यह आभास होता है
कि उनके भीतर कुछ असाधारण हलचल हो रही है।
साही का प्रणयकाल उसके उछलने कूदने की व्यस्तता से जाना जा सकता है उन दिनों
वह खाना, पीना, सोना, तक भूल जाती है और बावली सी होकर लकड़ी के टुकड़ों को मुंह
में देकर उन्हें उछालती हुई ऐसी दौड़ती है मानो उसे फुटबाल मैच में व्यस्त रहना
पड़ रहा हो।
सर्प की प्रणयकेलि उनकी आलिंगन आबद्धता के रूप में दीख जाता है उन क्षणों वह
अत्यंत भावुक और आवेशग्रस्त होता है। सर्प नहीं चाहता कि इस एकान्त सेवन में
कोई भागीदार हस्तक्षेप करे। यदि उसे पता चल जाय कि कोई लुक-छिप कर उसे देख रहा
है तो सर्प क्रोधोन्मत्त होकर प्राणघातक आक्रमण कर बैठता है।
कितने ही नर-पशु इस आवेग में ग्रसित होकर एक दूसरे के प्राणघातक बन जाते हैं।
उस आवेश में वे अपने प्राण तक गंवा बैठते हैं।
हिरनों में ऋतुकाल स्वयंवर के लिए मल्लयुद्ध का रूप धारण करता है। इससे उनके
सींग टूटते हैं, घाव लगते हैं और कई बार तो वे प्राण तक गंवाते हैं। हिरनियां
इस मल्ल युद्ध को निरपेक्ष भाव से देखती रहती हैं और पराजित से सम्बन्ध तोड़ने
और विजयी की अनुचरी बनने के लिए बिना किसी खेद के सहज स्वभाव प्रस्तुत रहती हैं।
यही दुर्गति अगणित पशुओं की होती है। उनमें से आधे तो प्रायः इसी कुचक्र में
क्षत-विक्षत होकर मरते हैं।
केवल नर ही इस स्वयंवर युद्ध में लड़-मरकर कष्ट उठाते हों सो बात नहीं। कई बार
तो मादाएं भी नरों की अविवेकशीलता के लिए उन्हें भरपूर दण्ड देतीं और नाच नचाती
हैं।
नर गरुड़ को प्रणयकेलि की तभी स्वीकृति मिलती है जब वह मल्लयुद्ध में अपनी प्रेयसी
को परास्त करने में समर्थ हो जाता है। ऋतुमती गरुड़ मादा नर को आमन्त्रण तो देती
है पर साथ ही यह चुनौती भी प्रस्तुत करती है कि यदि वह पिता बनने योग्य हैं तो
ही उस पद की लालसा करें। समर्थता को परखने के लिए मादा मल्ल-युद्ध करती है और
इस भयानक संघर्ष में नर के पंख नुच जाते हैं, घायल होने पर खून से लथपथ हो जाता
है इतने पर भी यदि वह मैदान छोड़कर भाग खड़ा न हो तो ही उसके गले में स्वयम्वर
की माला पहनाई जाती है। तब न केवल विवाह होता है वरन् नर को घर परिवार के साथ
जुड़े हुए उत्तरदायित्वों को सम्भलने में मादा की भरपूर मदद करने के लिए भी तत्पर
होना पड़ता है।
सन् 1950 आज से कुल 20 वर्ष पूर्व की बात है, कुछ वैज्ञानिकों ने एन्जिलर मछली
के बारे में विस्तृत खोज प्रारम्भ की। मध्य-सागर में रहने वाली इस एन्जिलर के
बारे में अब तक लोगों को वैसे ही स्वल्प-सी जानकारी थी जैसे शरीरस्थ अनेक चक्रों,
ग्रन्थियों, गुच्छाओं, एवं उपत्यिकाओं के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों को थोड़ी-सी
जानकारी प्राप्त है।
अध्ययन के लिये जितनी भी एन्जिलर पकड़ी गईं, नर उनमें से एक भी न निकला। एक दिन
एक मछली विशेषज्ञ ने निश्चय किया कि इस मछली के अंग-प्रत्यंगों की जानकारी प्राप्त
करनी चाहिये। विशेष और महत्वपूर्ण जानकारी तब मिली जब इन विशेषज्ञ महोदय ने देखा
एन्जिलर मादा के सिर के ऊपर सीधी आंख पर एक बहुत ही छोटा-सा मछली जैसा जीव चिपका
हुआ है। इस जीव का अध्ययन करने से पता चला यही वह सज्जन हैं, जिनकी वैज्ञानिकों
को तलाश थी। नर एन्जिलर, यही था बेचारी मादा के सिर पर चिपका उसी के रक्त को
चूसने वाला।
मादा का आकार 40 इन्च, भगवान् ने अच्छा किया कि पति-देव को कुल चार इन्च का बनाकर
यह दिखाया कि नारी को मात्र प्रजनन और शोषण की सामग्री बनाने वालों का बौना होना
ही ठीक है। मनुष्य के इतिहास में भी यही पाया जाता है। संसार के जो भी देश आज
प्रगति के शिखर पर पहुंचे हैं, उन सबमें नारी के उत्थान के लिये बड़े कदम उठाये
गये हैं। हम भारतवासी हैं, जिन्होंने नारी को दासी, पर्दे में रहने वाली, शिक्षा-शून्य
बनाया, उसका रमणी के रूप में उपभोग किया। तभी तो प्रगति में एन्जिलर नर की तरह
बौने के बौने रह गये।
हम में यह दोष कहां से आया इसका उत्तर भी एन्जिलर मछली के अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों
ने दिया। उन्होंने नर के स्वभाव का अध्ययन करके बताया कि उसकी यह शोषण प्रियता
उसकी आलसी और वासनापूर्ण प्रकृति के कारण है। जीवन में मधुरता के लिये कोई स्थान
न होने के कारण वह अपनी ही पत्नी का खून पिया करता है।
देखने में एन्जिलर नर पापी और अपराधी कहा जा सकता है पर जिन लोगों ने नारी का
मूल्यांकन वासना के रूप में दासी और सम्पत्ति के रूप में किया, उन्हें क्या माना
और क्या कहा जाय इसका निर्णय तो हमें अपने भीतर मुख डालकर करना पड़ेगा?
कामुकता का बाह्य स्वरूप कितना ही आकर्षक क्यों न हो उसके कलेवर में विष और विनाश
के अतिरिक्त कुछ नहीं। अफ्रीका में एक बहुत सुन्दर फूल पाया जाता है पक्षी इन
फूलों पर आसक्त होकर उनपर जा बैठते हैं बैठते ही फूल धीरे-धीरे सिकुड़ना प्रारम्भ
कर देता है। और फिर उसे इस तरह जकड़ कर उसे अपने पैने कांटे चुभो देता है कि
लगातार प्रयत्न करने पर भी वह निकल नहीं पाता, खून पूरी तरह चूस लेने के बाद
ही पौधा उसे छोड़ता है। कामुक उच्छृंखल ऐसी ही विनाशकारी प्रवृत्ति है। प्रकृति
में पग पग पर उसके दर्शन होते हैं?
चीन में पैराडाइज नाम की एक ऐसी मछली पाई जाती है जो अपने मुंह से एक विशेष प्रकार
के लस-लसे रसायन के बुलबुले छोड़ती है। थोड़ी देर में बड़ी संख्या में एकत्र
हुए इन बबूलों में एक सिरे से छेद कर वह भीतर-भीतर ऐसी सुन्दर छंटाई करती है
जिससे बबूलों का समुदाय अनेक मकानों वाला नगर दिखाई देने लगता है। अब मादा अण्डे
देने प्रारम्भ करती है। और उन्हें इसी बबूल-नगर में पहुंचायी जाती है। स्वयं
उस नगर की पहरेदारी करती रहती है। दुर्ग के किसी भी द्वार से बच्चे निकल न भागने
पावें वह इसकी बराबर देख रेख रखती है इसी तरह उसकी वंशवृद्धि होती रहती है।
माया ने उसी तरह अपना विस्तार अनेक प्रकार के शरीर बना कर किया। ऐसे शरीर जहां
जीव के अस्तित्व को किसी प्रकार संकट न पावे। पीछे वह ऐसी व्यवस्था और उपक्रम
जुटाती रहती है जिससे जीव उसी मायावी नगर में फंसा रहे उससे बाहर न निकलने पावे।
माया के इस घेरे को बिरले ही तोड़ पाते हैं।
अमेरिका के दक्षिणी भागों में पानी में पाया जाने वाला कछुये की सी शक्ल का एलीगेटर
स्नैपर बड़ा चतुर जीव है। वह अपनी जीभ को बाहर निकाल कर इस तरह दायें-बायें,
आगे-पीछे लपलपाता है कि देखने वाले को यह जीभ किसी स्वतन्त्र जीभ-सी लगती है
उसे देख कर कई मछलियां उसे खाने के लिये दौड़ पड़ती हैं जैसे ही वह उसके पास
पहुंचती हैं। एलीगेटर स्नैपर उन्हें दबोच कर खा जाता है।
यही स्थिति शरीर में—इन्द्रियों में बसे विषयों की लपलपाहट से भ्रमित जीभ उनकी
तृप्ति के लिए भाग-भाग कर आता है और बार-बार काल के द्वारा दबोच लिया जाता है।
थोड़े से बुद्धिमान भी होते हैं जो इन्द्रियों की इस आसक्ति को आत्मा का नहीं
शरीर का विषय मानते हैं और उनसे दूर रह कर ही अपनी रक्षा कर पाते हैं।
नदियों में पाया जाने वाला घड़ियाल जितना क्रूर होता है उतना ही चतुर भी। शिकार
के लिए वह नदियों के किनारे आकर इस तरह निश्चेष्ट पड़ा रहता है। मानो वह कोई
चट्टान या निष्प्राण वस्तु हो जैसे ही कोई मूर्ख मछली पास पहुंची कि उसने पकड़ा
और उदरस्थ किया।
मनुष्य की इन्द्रियां भी उतनी धूर्त और चालाक होती हैं सामान्यतः वे निर्जीव
दिखाई देती हैं। इसलिए मनुष्य आहार-विहार और परिस्थितियों की सतर्कता नहीं रख
पाता। जैसे ही खान-पान और मर्यादाजन्य भूलें हुईं कि इन्हीं निष्प्राण लगने वाली
इन्द्रियों की उत्तेजना ने धर पकड़ा फिर तो उनके चंगुल से निकल पाना कठिन ही
होता है। ज्ञानी और विचारशील लोग पहले से ही सतर्क रहते और संयमित तथा मर्यादित
जीवन जीते हैं तभी उनसे बचते और अपनी शक्ति, शान्ति और सम्मान सुरक्षित रख पाते
हैं।
योरोप में एक चिड़िया पाई जाती है ‘‘स्पैरो’’। उसका मूल आहार है टिड्डा, पर वह
मिले कैसे। स्पैरो एक कौने में दुबक कर बैठती है और ठीक टिड्डे की आवाज में बोलना
शुरू करती है। टिड्डे यह आवाज सुनकर उसके पास आ जाते हैं और स्पैरो पक्षी के
आहार बन कर मौत के मुंह में चले जाते हैं।
इन्द्रियजन्य सुखों की स्थिति भी ऐसी ही है जब वे कुलबुलाते हैं तो मनुष्य यह
नहीं समझ पाता कि उनका शरीर से सम्बन्ध है। आत्मा से नहीं। वह उन्हें अपना ही
स्वजन सहायक समझकर उनकी तृष्णा बुझाने में लगा रहता है और इस तरह आत्मा को अवनति
के गर्त में धकेलता रहता है।
माया के इन खेलों को समझने वाला और उनसे दूर रहने वाला व्यक्ति ही बुद्धिमान,
विचारशील और आत्म-निष्ठ होता है। उसी का जीवन सफल और सार्थक कहलाता है।
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नर-नारी का मिलन एक असामान्य प्रक्रिया
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नर-नारी को सामान्य सामाजिक स्तर पर अलग रहने की जरूरत नहीं है। जरूरत यौन सम्पर्क
के सम्बन्ध में अति सतर्कता बरतने की है। मस्तिष्क के बाद जननेन्द्रिय का दूसरा
स्थान है। इन दोनों केन्द्रों को शक्ति संस्थान कहना चाहिये। पृथ्वी के दो सिरे
दो ध्रुव कहलाते हैं, इन ध्रुवों में अति रहस्यमय प्रकृति की शक्ति धाराओं के
स्रोत बीज दबे पड़े हैं। इन्हीं के कारण यह धरती अपनी धुरी पर घूमने, सूर्य की
परिक्रमा करने, लहराती चाल से चलने, महा सूर्य को अपने सौर मण्डल के साथ भ्रमण
कराने में समर्थ है। ऋतु परिवर्तन से लेकर, वनस्पति उत्पादन और खनिज द्रव्यों
के निर्माण तथा सारी प्रक्रियाएं उन्हीं उभय ध्रुवों में सन्निहित शक्ति बीजों
के कारण सम्भव होती है। मनुष्य पिण्ड में भी पृथ्वी की ही तरह मस्तिष्क उत्तरी
ध्रुव और मूलाधार दक्षिणी ध्रुव है। जीवन की चेतनात्मक, बौद्धिक एवं भावनात्मक
हलचलों का केन्द्र मस्तिष्क है और शरीर में जो कुछ उत्तम, आकर्षक दीखता है उसका
केन्द्र जननेन्द्रिय के अन्तराल में दबा पड़ा है। यदि मस्तिष्क में विकृति आ
जाय तो बुद्धिहीन व्यक्ति पागल की तरह अपने और दूसरे के लिए निरर्थक हो जायगा।
इसी प्रकार यदि मूलाधार के कामबीज विकृत हो जायें तो स्नायु मंडल से लेकर पाचन
तन्त्र तक सारा कार्य-कलाप लड़खड़ा जायगा। इसलिए इन दोनों शक्ति-संस्थानों का
बहुत ही समझ-बूझ कर अति दूरदर्शिता पूर्वक उपयोग किया जाता है। इस उपयोग में
बरती गई भूलें बहुत ही विघातक सिद्ध होती हैं।
प्रकृति ने मस्तिष्क का वाह्य कलेवर हड्डियों के मजबूत किले के भीतर सुरक्षित
रखा है। ताकि बाहरी कोई विघातक तत्व-शीत, ग्रीष्म का प्रभाव उसे प्रभावित न कर
सके, भीतरी प्रभावों को ग्रहण करे और छोड़ने की गुंजाइश ही रखी गई। मनुष्य अपने
चिन्तन मनन, स्वाध्याय सत्संग से उसे प्रभावित कर सकता है और दिशा दे सकता है।
मस्तिष्क की दिशा जिधर चल पड़ती है जीवन का स्वरूप वैसा ही बन जाता है और उसी
आधार पर मनुष्य उन्नति अवनति सुख-दुःख के परिणाम उपलब्ध करता है। मस्तिष्क मर्म
स्थल कहा गया है—उसके ब्रह्म रन्ध्र में क्षीर सागर निवासी विष्णु भगवान् विराजमान
हैं इस पौराणिक अलंकार में यही रहस्य छिपा पड़ा है कि समस्त दिव्य शक्तियों सिद्धियों
और विभूतियों का केन्द्र इस मस्तिष्क को ही कहा जाता है। इसे स्वस्थ एवं समुन्नत
रखने के लिए विद्याध्ययन से लेकर विचार विनिमय तक हमें बहुत कुछ करना होता है।
तभी इस मस्तिष्क से समुचित लाभ मिल पाता है। यदि उसे कुसंग, दुर्बुद्धि, अशुभ-चिंतन
आदि से विकृत कर लिया जाय तो समझना चाहिये कि उत्कर्ष की संभावनाएं समाप्त हो
गईं और भविष्य को अन्धकारमय बना लिया गया।
ठीक इसी प्रकार जननेन्द्रिय का महत्व है। उसे मात्र मूत्र त्याग अथवा घिनौने
मनोरंजन के लिए नहीं बनाया गया उसमें स्वास्थ्य संरक्षण से लेकर दीर्घ जीवन तक
के सारे सूत्र बीज रूप में विद्यमान हैं। इसलिए इसे भी ऐसी जंघाओं की मांसल किन्तु
अति कोमल परिधि के दायरे में प्रकृति ने प्रतिष्ठापित किया है। इस सुरक्षात्मक
व्यवस्था के पीछे प्रकृति का यही निर्देश सन्निहित है कि इस मर्म स्थान का उपयोग
अति सतर्कता और दूर-दर्शिता के साथ ही किया जाना चाहिये। उसे निम्न स्तर के क्रीड़ा-कलाप
का खिलौना बना कर अपनी शारीरिक क्षमताओं पर कुठाराघात नहीं किया जाना चाहिये।
नर-नारी का सामान्य मिलन जितना उपयोगी है उतना ही वासनात्मक सम्पर्क से खतरा
भी है। दोनों का स्वरूप और महत्व अलग-अलग है। प्रतिबंधित, व्यक्ति सान्निध्य
नहीं, यौन मिलन किया जाना चाहिये। यह ध्यान रखा जाय वासनाओं का उभार एक अलग चीज
है जिसका सामाजिक नर-नारी सम्पर्क से कोई विशेष संबंध नहीं। पुरुष दुकानदारों
के यहां सामान खरीदने दिन भर औरतें जातीं और बात करती हैं। कोई विकार उत्पन्न
नहीं होता न कोई किसी की ओर आकर्षित होता है। आकर्षण उस विशेष मनःस्थिति में
उत्पन्न होता है जिसमें यौन-सम्पर्क की अभिलाषा भी रहती है। यदि इस भावस्थल को
पहले से ही निर्मल बना लिया जाय तो बात भले ही नवयौवन की हो, सामने वाले रूपवान
पक्ष के लिए भी आकर्षण पैदा न होगा।
यह बचाव इसलिए आवश्यक है कि यौन संस्थानों में अद्भुत विद्युत धाराएं प्रवाहित
करने वाला शक्ति केन्द्र विराजमान है जिसे मूलाधार चक्र कहते हैं। वस्तुतः यह
नाम करण बहुत ही समझ-बूझकर किया गया है। यही शरीर के अन्तर्गत काम करने वाले
सारे क्रिया-कलाप, उत्साह, स्फूर्ति, कोमलता, आकर्षण, आरोग्य, दीर्घ-जीवन आदि
का मूलभूत आधार है। इसकी अवांछनीय छेड़खानी करने से हम काम-क्षमता को एक प्रकार
से नष्ट-भ्रष्ट ही कर डालते हैं।
‘नर में प्राण और नारी में रयि शक्ति की प्रधानता है। उन्हें आध्यात्मिक भाषा
में अग्नि और सोम कहते हैं। विज्ञान के शब्दों में इन्हें धन और ऋण विद्युत-धारा
पुकारते हैं, इनमें स्वभावतः आकर्षण है। एक दूसरे के समीप आकर अपनी अपूर्णता
पूर्व करना चाहते हैं। जहां तक सामान्य सम्पर्क का संबंध है वहां तक यह विनिमय
उपयोगी है। सभी जानते हैं कि बिना बाप या भाई की लड़की और बिना मां या बहिन का
लड़का मानसिक दृष्टि से अपूर्ण अविकसित पाया जाता है। प्रतिपक्षी वर्ग का सम्पर्क
व्यक्तित्व में विकास के अनेक द्वार खेलता है। एकांकी अलग-थलग पड़ा जीवन-क्रम
कुंठित और मूर्छित होता चला जाता है। विधवा और विधुरों की मृत्यु संख्या, रोग
ग्रस्तता एवं शारीरिक दुर्बलता—विवाहितों की अपेक्षा कहीं अधिक पायी जाती है।
पर्दे में रहने वाली महिलाएं हर दृष्टि से पिछड़ती चली जाती हैं। यह सामान्य
प्रतिपक्षी सम्पर्क से वंचित होने का ही दुष्परिणाम है। यदि जन-सम्पर्क में नर-नारी
जैसी बाधा उपस्थित की जाय तो इससे व्यक्तित्वों के विकास में बाधा उत्पन्न नहीं
होगी वरन् सहायता ही मिलेगी।
यदि मन में काम-विकार जाग पड़े तो प्रतिपक्षी वर्ग के साथ सामान्य सम्पर्क की
मर्यादा तोड़कर यौन सम्बन्ध स्थापित करने की अभिलाषा होती है। दोनों विद्युत-धारायें
समीप आने के लिए मचल उठती हैं और उससे सामाजिक काम-विकृति तो प्रत्यक्ष ही फैलती
है। शारीरिक मानसिक गड़बड़ी भी कम नहीं उभरती। व्यभिचार के पीछे एक तथ्य तो स्पष्ट
है कि सामान्य स्तर के व्यक्ति अपने दाम्पत्य जीवन तथा परिवार के प्रति निष्ठावान्
नहीं रहते दूसरी जगह आकर्षण चला जाने से अपना परिवार उस स्नेह सौजन्य के लाभ
से वंचित होने लगता है जो सामान्यतया किसी सद्ग्रहस्थ के लिए आवश्यक है। परिवार
व्यवस्थाएं गड़बड़ाने न लगें, ग्रहस्थ अपनी-अपनी धुरी पर टिके रहें; इस दृष्टि
से व्यभिचार को हेय माना गया पर यह कोई अविच्छिन्न मर्यादा नहीं है। आवश्यकतानुसार
इसमें हेर-फेर भी होते रहते हैं। जर्मनी में जब पिछले महायुद्ध के समय पुरुष
बहुत मारे गये और नारियों की संख्या अधिक रह गई तो तत्कालीन स्थिति को देखते
हुए एक पुरुष कई पत्नियां रख सके, कानून में ऐसे सुधार किये गये। सामान्य तथा
इसाई देशों में एक पत्नी-एक पति का ही कानून रहता है। इसी प्रकार देहरादून-जिले
के जौनसार वावर क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में यह आम रिवाज है कि भाइयों में से
एक बड़े भाई का विवाह होता है जो पत्नी आती है वह सब छोटे भाइयों की भी उपपत्नी
होती है। बच्चे उन जन्म दाताओं को बड़े पिताजी, मंझले पिताजी, छोटे पिताजी आदि
कह कर संबोधित करते हैं। वहां इस विवाह पद्धति को कोई न व्यभिचार कहता है—न बुरा
मानता है। उनका कहना है कि हम उन पाण्डवों की सन्तान हैं, जिनने एक द्रौपदी से
ही पांचों ने अपना दाम्पत्य-जीवन निभा लिया था। जहां तक उथले स्तर पर बहुपतियों
बहुपत्नियों का संबंध है वहां तक उसे सामाजिक स्तर का परिवार जीवन में विकृति
उत्पन्न करने वाला पाप ही कहा जा सकता है। यदि कहीं ऐसी गड़बड़ न होती हो और
गृहस्थ सद्भावतः यथावत् बना रहता हो तो उस दोष का परिमार्जन हो जाता है जिसके
कारण एक से अनेक का दाम्पत्य जीवन गर्हित या वर्जित घोषित किया गया है। कृष्ण
ने बहुपत्नी और द्रोपदी ने बहुपति का सफल प्रयोग करके यह सिद्ध किया था कि पारिवारिक
जीवन में विकृति उत्पन्न किये बिना यौन-सम्पर्क को विस्तृत किया जा सकता है पर
यह हर किसी के बस की बात नहीं। इस प्रयोग में बहुत ऊंचे या बहुत नीचे व्यक्ति
ही सफल हो सकते हैं। अस्तु सामान्य समाज व्यवस्था में एक पत्नी या एक पति प्रथा
का ही प्रचलन है जो उचित भी है और आवश्यक है।
प्राचीन काल में नियोग प्रथा प्रचलित थी। सुयोग्य सन्तान उत्पन्न कर सकने की
क्षमता से सम्पन्न न होने पर पति अपनी पत्नी के लिए अन्य उपयुक्त व्यक्ति से
यौन-सम्पर्क करने की आज्ञा देते थे और उस आधार पर जो बच्चे होते थे उन्हें सम्मानित
नागरिक ही माना जाता था। विचित्र वीर्य ने अपनी पत्नियों की व्यास जी द्वारा
ऐसे ही नियोग की व्यवस्था की थी और उत्पन्न हुए तीनों बालक पाण्डु, धृतराष्ट्र
तथा विदुर वैध सन्तान के सम्मान से वंचित नहीं हुए थे। आज के लोगों की मनःस्थिति
दूसरी है इस लिए प्रतिबन्ध लगाने की जरूरत पड़ी, उन दिनों व्यक्ति अधिक उदार
और उत्तरदायी होते थे, नियोग की प्रथा रहने पर भी कोई अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों
में गड़बड़ाता न था, उन दिनों की बात दूसरी थी, पर अब जब कि छोटी तवियत के लोग
तनिक से आकर्षण में अपने घर बिगाड़ने लगे तो एक पत्नी या एक पति की मर्यादा ही
उचित है।
नर-नारी सम्पर्क की अभिवृद्धि में जो खतरा है उसे समझने के लिए हमें अधिक गहराई
तक विचार करना होगा। सामाजिक मान के रूप में जहां तक परिवार विग्रह के कारण उत्पन्न
अव्यवस्था का सवाल है वहां यदि उच्चस्तरीय सम्पर्क हो तो उस संबन्ध में थोड़ी
उपेक्षा भी की जा सकती है। पर इस संदर्भ में अधिक कड़ाई बरतने का अधिक महत्वपूर्ण
कारण यह है कि यौन सम्पर्क नर-नारी की अति महत्वपूर्ण विद्युत-शक्ति की एक दूसरे
में अति तीव्रता पूर्वक प्रवाहित होती है। यदि वह प्रवाह उपयुक्त न हुआ तो आन्तरिक
क्षमता का भयानक ह्रास और विद्रूप प्रस्तुत होता है। शक्ति का नियम यह है कि
अधिक स्वल्प समर्थता की ओर भागती है, दो तालाबों को यदि एक नाली खोद कर परस्पर
मिला दिया जाय तो ऊंचे लेविल का पानी नीचे लेविल के तालाब की ओर बहना आरम्भ कर
देगा और वह प्रवाह तब तक चलता रहेगा जब तक कि दोनों का पानी एक लेविल पर नहीं
आ जाता। एक रोगी और दूसरा निरोग व्यक्ति यदि यौन-सम्पर्क करेंगे तो प्रत्यक्षतः
रोगी को लाभ और निरोग को हानि होगी। एक की सामर्थ्य दूसरे में प्रवाहित होगी
और नर या नारी जो भी दुर्बल होगा लाभ में रहेगा और सबल को घाटा उठाना पड़ेगा।
यह बात शरीर सम्बन्धी स्थिति पर जितनी लागू होती है उससे हजार गुनी अधिक मनःस्थिति
पर लागू होती है। ओछे स्तर के दुष्ट, दुराचारी, व्यसनी और अनाचारी व्यक्तियों
से यौन सम्पर्क बनाने वाला दूसरा पक्ष अपनी आत्मिक विशेषताओं को खोता चला जायगा
इसी प्रकार मंद बुद्धि और प्रतिभा सम्पन्नों के बीच इस प्रकार का प्रत्यावर्तन
निश्चित रूप से समर्थ पक्ष के लिए हानि-कारक सिद्ध होगा।
उच्च स्तरीय प्रतिभाओं से सम्पन्न व्यक्तियों में स्वभावतः कितने ही महत्वपूर्ण
चेतन तत्व भरे पड़े होते हैं उन्हीं के आधार पर उन्हें आश्चर्यजनक सफलतायें मिलती
हैं। यदि उस शक्ति स्रोत को वे काम-क्रीड़ा में खर्च करने लगे तो धीरे-धीरे अपना
कोष समाप्त करते चले जायेंगे। इस लिए प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों को-उच्चस्तरीय
बौद्धिक अथवा आत्मिक गुण सम्पन्नों को ऐसे विनियोग करने से रोका गया। ब्रह्मचर्य
ऐसे लोगों के लिए अधिक आवश्यक है। घटिया शरीर स्थिति और मनःस्थिति का व्यभिचार
करे तो उसे उतना घाटा नहीं है जितना मनोबल और आत्मबल सम्पन्न लोगों को इस शरीर
बल की तुलना में मनोबल का मूल्य अत्यधिक है। पुष्ट शरीर और दुर्बल शरीर का यौन
सम्पर्क स्वस्थ पक्ष को थोड़ी-सी ही शारीरिक क्षति पहुंचाता है पर मनोबल और बुद्धिबल
तो प्रत्यक्ष प्राण है वह तनिक अवसर पाते ही प्रचण्ड प्रवाह की तरह विद्युत गति
से दौड़ पड़ता है और निम्न स्तर के पक्ष में स्थिर कर अपनी भारी हानि कर लेता
है। दुर्बल मनोबल वाला पक्ष थोड़ा लाभ उठाले यह ठीक है पर उससे प्राण शक्ति सम्पन्न
पक्ष अपनी प्रतिभा खोकर उस प्रयोजन को पूरा कर सकने में असमर्थ हो जाता है जो
अनेक दृष्टियों से अति महत्वपूर्ण होते हैं।
विवाह वस्तुतः व्यक्ति विनियोग की दृष्टि से अतीव सतर्कता के साथ ही किये जाने
चाहिये। जोड़ा ठीक हो तो ही उसकी सार्थकता है अन्यथा उससे लाभ से भी अधिक हानि
की सम्भावना रहती है। भोजन पका देने या बच्चे पैदा करने का लाभ उतना महत्व का
नहीं जितना कि प्राणों के प्रत्यावर्तन का। जिसका व्यक्तित्व जितना घटिया होगा
गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से जिसका स्तर जितना नीचा है उसमें आन्तरिक क्षमता
उतनी ही स्वल्प होगी। कई व्यक्ति शरीर से सुन्दर और पुष्ट दीखते हुए भी आन्तरिक
दुर्बलताओं के कारण बहुत ही दीन-हीन होते हैं। इसके विपरीत शरीर से क्षीण दीखने
वालों का प्राण बल भी आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण बहुत प्रबल रहता है। यौन सम्पर्क
से प्रत्यावर्तन शरीरों का नहीं प्राण का होता है। शक्ति का सूक्ष्म स्वरूप प्राण
है, शरीर या कलेवर नहीं। प्राण की पुष्टि परिपक्वता केवल उत्कृष्ट व्यक्तित्वों
और श्रेष्ठ प्रतिभा सम्पन्नों में ही सम्भव है, ऐसे व्यक्ति अपनी उस विभूति को
क्रीड़ा-कल्लोल में खर्च करके छूंछ न बन जायं और विश्व की महती सेवा कर सकने
के पुण्य से वंचित न हो जायें इसलिए उन्हें अधिक सतर्कता और कठोरता के साथ ब्रह्मचर्य
पालन, करने के लिए प्रतिबन्धित किया गया है।
काम-विकार आंधी, तूफान की तरह आते हैं और बिना पात्र कुपात्र का भेद किये बादलों
की तरह चाहे जहां बरस पड़ते हैं। यदि यह सम्पर्क वैध अथवा उपयुक्त नहीं है तो
इससे बहुत प्रकार की विकृतियां उत्पन्न होंगी। विवाह हो या व्यभिचार प्राण शक्ति
का विनियोग समान रूप से अपना वैज्ञानिक प्रभाव उत्पन्न करेगा। घटिया, स्तरहीन
प्राण और ओछे व्यक्तियों के साथ सम्पर्क बना कर न पत्नी को लाभ मिलेगा न प्रेयसी
को। न पति का कल्याण है न प्रेमी का। यौन-सम्पर्क एक प्रकार से अपनी शारीरिक,
मानसिक और आत्मिक पूंजी का आत्म-समर्पण है। अविवेक पूर्वक चाहे जहां, चाहे जिसके
साथ बिना उसकी आन्तरिक स्थिति को परखे, यदि शरीर आकर्षण अथवा इन्द्रिय प्रेरणा
से प्रेरित होकर ये किये जायेंगे तो उसमें समर्थ पक्ष को बहुत तरह की बहुत गहरी
क्षति उठानी पड़ेगी। तनिक भी क्रीड़ा उसे बहुत महंगी पड़ेगी।
नर-नारी का समाज सम्पर्क यदि व्यभिचार तक बढ़ चले तो निस्संदेह वह बहुत हानिकारक
है इससे मनोबल उन्नत न होगा। बहुत घाटे में रहेंगे, प्रतिभाएं कुंठित होती चली
जायेंगी और उच्च व्यक्तित्वों के दुर्बल होने से समाज की भारी क्षति होगी। यों
शरीर सम्पर्क की मर्यादा का व्यक्ति-क्रम भी कम हानिकारक नहीं है। सामान्य व्यक्तियों
को भी बहुत दिन बाद—यदा कदा ही काम-सेवन की बात सोचनी चाहिये; यदि वे आये दिन
इसी मखौल में उलझे रहे और अपने ओजस= को गन्दी नालियों में बहाते रहे तो उन्हें
शारीरिक रुग्णता और दुर्बलता का शिकार ही नहीं बनना पड़ेगा, बल्कि मनोबल, आत्मबल,
और प्राण शक्ति की पूंजी से भी हाथ धोना पड़ेगा। काम-सेवन में जिनकी अति प्रवृत्ति
है वे अपनी ही पूंजी नहीं चुकाते वरन् साथी का भी सर्वनाश करते हैं। अपने समाज
में नारी की शारीरिक और मानसिक दुर्गति का एक बहुत बड़ा कारण उनके प्रतियों द्वारा
बरती जा रही अत्याचारी रीत-नीति है जिसके कारण उन्हें विवश होकर अपने अच्छे खासे
स्वास्थ्य की बर्बादी सहन करनी पड़ी, यदि संयम से गृहस्थ जीवन चलाया गया होता
तो न कोई नारी बन्ध्या होती न किसी को प्रदर जैसे रोगों को शिकार बनना पड़ता।
जितनी संतान भली प्रकार पालित नहीं की जा सकती उतनी पैदा करके गृहस्थ-जीवन का
उद्देश्य और आनन्द नष्ट कर लेना भी यौन-सम्पर्क की मर्यादाओं का अतिक्रमण ही
है। ऐसे अविवेकी साथी को पाकर किस गृहस्थ को विवाह का आनन्द मिलेगा। यौन-सम्पर्क
की जिसमें खुली छूट है उस विवाह के करने से पूर्व ही हजार बार सोचना चाहिए, कि
साथी का प्राण तत्व किस स्तर का है, उसकी विचारणा भावना, गुण, कर्म-स्वभाव, चरित्र,
मनोबल, आत्मबल जैसे उच्च तत्वों की स्थिति क्या है। यदि ऐसा नहीं ढूंढ़ा गया
और यों ही किसी नर तनुधारी से विवाह कर लिया गया तो उससे शरीर को क्षीण करने
के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा।
जननेन्द्रियों का सम्पर्क ही काम उल्लास नहीं। वरन् उच्च भावना सम्पन्न व्यक्तित्वों
का परस्पर आन्तरिक आदान प्रदान ही वह आनन्द प्रदान कर सकता है जिसे भौतिक जगत
का सर्वोपरि सुख माना गया है और जिसकी तुलना ब्रह्मानन्द से की गई है। प्रकृति
और पुरुष का संयोग ही इस सृष्टि में आनन्द और उल्लास की तरंगें प्रवाहित कर रहा
है केवल उच्च स्तरीय भावनाओं से सम्पन्न नर-नारी ही एकान्त मिलन का वह आनन्द
ले सकते हैं जो शक्ति को किसी तरह नष्ट नहीं करता वरन् असंख्य गुनी बढ़ा देता
है, काम-सेवन आम तौर से हानिकारक ही माना गया है पर उन अपवादों से लाभदायक शक्ति
संवर्धक और उत्कर्ष में सहायक भी सिद्ध हो सकता है। नहीं तो उन आत्माओं का शारीरिक
ही नहीं आत्मिक मिलन भी संभव होता है। पर ऐसा होता कहां है? ऐसे जोड़े मिलते
कहां है? जब तब वैसी स्थिति प्राप्त न हो केवल इन्द्रिय सुख के लिये काम-सेवन
एक क्षणिक आवेश और हानिकारक कार्य ही सिद्ध होता है। इसलिये यौन-सम्पर्क में
बहुत ही सावधानी बरतने और जहां तक सम्भव हो ब्रह्मचर्य पालन करने की मर्यादा
नियन्त्रित की गई है। वही सर्वोपयोगी भी है।
काम को मरण मात्र नहीं अमृत बनायें
शरीर शास्त्री और मनोविज्ञान वेत्ता यह बताते हैं कि नर-नर का सान्निध्य—नारी,
नारी का सान्निध्य मानवीय प्रसुप्त शक्तियों के विकास की दृष्टि से इतना उपयोगी
नहीं जितना भिन्न वर्ग का सान्निध्य। विवाहों के पीछे सहचरत्व की भावना ही प्रधान
रूप से उपयोगी है, सच्चे सखा सहचर की दृष्टि से परस्पर हंसते, खेलते जीवन बिताने
वाले पति-पत्नी यदि आजीवन काम सेवन न करें तो भी एक दूसरे की मानसिक एवं आत्मिक
अपूर्णता को बहुत हद तक पूरा कर सकते हैं। मनुष्य में न जाने क्या ऐसी रहस्यमय
अपूर्णता है कि वह भिन्न वर्ग के सहचरत्व से अकारण ही बड़ी तृप्ति और शान्ति
अनुभव करता है। अविवाहित जीवन में सब प्रकार की सुविधायें होते हुए भी एक उद्विग्नता,
अतृप्ति और अशांति बनी रहती है। विवाह के बाद एक निश्चिंतता सी अनुभव होती है।
साथी की प्रगाढ़ मैत्री का विश्वास करके व्यक्ति अपनी समर्थता दूनी ही नहीं दस
गुनी अनुभव करता है। एकांकी जीवन में शून्यता थी उसकी पूर्ति तब होती है जब यह
विश्वास बन जाता है कि हम अकेले नहीं दूसरे साथी को लेकर चल रहे हैं, जो हर मुसीबत
में सहायता करेगा और प्रगति के हर स्वप्न में रंग भरेगा। यह विश्वास मन में उतरते
ही मनोबल चौगुना बढ़ जाता है और उत्साह भरी कर्मठता और आशा भरी चमक से जीवन-क्रम
में एक अभिनव उल्लास दृष्टिगोचर होता है। विवाह का मूल लाभ भिन्न वर्ग के सान्निध्य
से होने वाले उभयपक्षी सूक्ष्म शक्ति प्रक्रिया का अति महत्वपूर्ण प्रत्यावर्तन
तो है ही, एक मनोवैज्ञानिक लाभ अन्तरंग का एकाकीपन दूर करना और समर्थता को द्विगुणित
हुई अनुभव करना भी उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना का आशापूर्ण भविष्य की दृष्टि
से बहुत उपयोगी है।
काम-सेवन विवाहित जीवन में आवश्यकतानुसार—मर्यादाओं के अन्तर्गत—उपयुक्त होता
रहे तो उसमें कोई बड़ा अनर्थ नहीं है। पर उसे आवश्यक या अनिवार्य न माना जाय।
मोटेतौर से पति-पत्नी की परस्पर मनःस्थिति वैसी ही होनी चाहिए जैसे दो पुरुष
या दो नारियों की सघन मित्रता होने पर होती है। सखा, साथी, मित्र, स्नेही का
रिश्ता पर्याप्त है कामुक और कामिनी को दृष्टि में रखकर किये गये विवाह घृणित
हैं। रूप, रंग, शोभा, सौन्दर्य के आधार पर उत्पन्न हुआ आकर्षण एक आवेश मात्र
है। उस आधार पर जो जोड़े बनेंगे वे सफल न हो सकेंगे। रूप, यौवन की सारी चमक एक
छोटा-सा रोग बात की बात में नष्ट करके रख सकता है। फिर कोई दूसरा अधिक सुन्दर
आकर्षण सामने आ जाय तो मन उधर ढुलक सकता है। रूपवान में दोष, दुर्गुण भरे पड़े
हों तो भी निवाह देर तक नहीं हो सकेगा। शारीरिक आकर्षण की खोज आज की विवाह सफलता
का प्रधान अंग बनती जा रही है। रूपवान लड़के लड़कियों की ही मांग है। कुरूपों
की बाजार दर दिन-दिन गिरती जाती है। यह प्रवृत्ति बहुत ही विघातक है। चमड़ी की
चमक ही यदि अच्छे साथी की कसौटी बन जायेगी तो फिर आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता
का क्या मूल्य रह जायगा? फिर भावनाओं की सद्गुणों की, स्नेह सौजन्य की कीमत कौन
आंकेगा?
चमड़ी का रंग या नखशिख की बनावट की शोभा, सौन्दर्य की दृष्टि से सराहा जा सकता
है। नृत्य अभिनय में उसको प्रमुखता मिल सकती है। नयनाभिराम मनमोहक आकर्षण भी
उसमें देखा जा सकता है। ईश्वर की कृति की इस विभूति से प्रसन्न हुआ जा सकता है।
दाम्पत्य-जीवन में उसकी कोई बहुत उपयोगिता नहीं है। मिलन चमड़ी का—आंख, नाक,
का नहीं वरन् अन्तरंग का होता है और उसकी उत्कृष्टता, निकृष्टता चेहरे पर अवयवों
की बनावट से तनिक भी सम्बन्ध नहीं रखता। हो सकता है कोई काला कुरूप व्यक्ति योगी
अष्टावक्र नीतिज्ञ चाणक्य अथवा पांचाली द्रौपदी की तरह उच्च मनःस्थिति धारण किये
हो। रूपवती नर्तकियों अभिनेत्रियां नट-नायक कोई उच्च भावनाशील ही थोड़े होते
हैं। बन्दीगृह में क्रूर कर्म करने के दण्ड में अगणित नर-नारी आते रहते हैं उनके
कुकर्मों का विवरण सुनकर रोमांच खड़े हो जाते हैं। रूप रंग के आवरण में उनके
भीतर प्रेत पिशाच का वीभत्स नृत्य देखकर दिल दहल जाता है। विवाह का वास्तविक
आनन्द और लाभ जिन्हें लेना हो उन्हें साथी का चुनाव करने में रंग रूप की बात
उठाकर ताक में रख देनी चाहिये। केवल सद्भावना निष्ठा, सौजन्य, व्यवस्था, उदारता,
दूरदर्शिता, उत्साही और हंसमुख प्रकृति जैसे सद्गुणों पर ही ध्यान देना चाहिये।
सज्जनों के बीच ही चिरस्थायी मैत्री का निर्वाह होता है। दुर्जन तो क्षण भर में
मित्र बनते हैं और पल भर में शत्रु बनते देर नहीं लगती। अभी बहकावे की मीठी-मीठी
बात कर रहे थे और चापलूसी की अति कर रहे थे, अभी तनिक सी बात पर खून के प्यासे
बन सकते हैं। प्रेम के जाल में ऐसे ही लोग दूसरों को फंसाते फिरते बहुत देखे
जाते हैं। इसलिये विवाह की सोचने से पहले—साथी के चुनाव की कसौटी निश्चित करनी
चाहिए और वह यह होनी चाहिए कि रंग रूप कैसा ही क्यों न हो साथी की आन्तरिक स्थिति
में स्नेह सौजन्य की समुचित पुट होना ही चाहिए। जिन्हें ऐसा साथी मिल जाय समझना
चाहिए कि उसका विवाह करना सार्थक हो गया।
काम-सेवन के सम्बन्ध में उपेक्षा वृत्ति बरती जानी चाहिए। इस प्रयोग का स्वास्थ्य
पर असर पड़ता है। कम ही लोग ऐसे होते हैं जिनके पास अपनी शारीरिक, मानसिक आवश्यकता
की पूर्ति के अतिरिक्त इतना ओजस् संचित रहे जिसे क्रीड़ा कल्लोल में व्यय कर
सके। आमतौर से—वर्तमान परिस्थितियों में लोग इतनी ही शक्ति उपार्जित कर पाते
हैं जिसके आधार पर किसी प्रकार काम चलता रहे और गाड़ी लुढ़कती रहे। इस स्वल्प
उत्पादन में से यौन सम्पर्क में अपव्यय किया जायगा तो उसका सीधा प्रभाव समग्र
स्वास्थ्य और जीवन यात्रा पर पड़ेगा। विषयी मनुष्य अपनी श्रमशीलता, तेजस्विता,
स्फूर्ति, निरोगता, प्रतिभा, स्मरण शक्ति, साहसिकता, स्थिरता, सन्तुलन आदि सभी
शारीरिक मानसिक विशेषतायें खोते चले जाते हैं। यह अपव्यय जितना बढ़ता है उतना
ही खोखलापन बढ़ता चला जाता है, आसक्ति का शिकंजा अपने गले में कसा जाना हर कामुक
व्यक्ति निरन्तर अनुभव करता रहा है। यह एक प्रकार से स्वेच्छा पूर्वक, हंसते-खेलते
की जाने वाली मन्दगति से की जाने वाली आत्मा हत्या ही है।
प्रजनन जब उचित और आवश्यक हो तो उचित मर्यादाओं के अन्तर्गत काम-सेवन में ढील
छोड़ी जा सकती है। यदि अपनी या साथी की तन्दुरुस्ती या मनःस्थिति ठीक न हो तो
इस प्रकार के छेड़छाड़ का कोई तुक नहीं रह जाता। पति-पत्नी के बीच इस प्रकार
का धैर्य, संतुलन रहना ही चाहिये कि जब तक अति आवश्यक न हो दोनों की पूर्ण सहमति
न हो तब तक इस प्रसंग को उपेक्षित ही किया जाय। साथी की अनिच्छा रहने पर उसे
विवश करना एक प्रकार से बलात्कार जैसा अपराध ही है भले ही वह विवाहित साथी के
साथ किया गया हो। कानून उसे भले ही दण्डनीय न माने पर नैतिक दृष्टि से उसे निर्लज्ज
बलात्कार ही कहा जायगा। ऐसा प्रसंग जिससे साथी का मन रोष या क्षोभ से भर जाय
निश्चित रूप से कामुक पक्ष के लिए हर दृष्टि से हानिकारक सिद्ध होगा। क्षणिक
उद्वेग शान्त करके जितनी प्रसन्नता पाई गई थी, कालान्तर में उसकी प्रतिक्रिया
अनेक गुणी अप्रसन्नता की परिस्थिति लेकर सामने आवेगी। अस्तु हर समझदार पति-पत्नी
की आदि से अन्त तक ऐसी मनःस्थिति विनिर्मित करनी चाहिए कि कोई किसी को कठिनाई,
क्षति या असमंजस में न डाले। दाम्पत्य-जीवन के बीच ब्रह्मचर्य की निष्ठा का जितना
प्रभाव होगा उतना ही पारस्परिक सद्भाव प्रगाढ़ होता जायगा और वह लाभ मिलेगा जिसे
प्राप्त करना विवाह का मूल प्रयोजन है।
जननेन्द्रिय का अमर्यादित उपयोग यौन रोग उत्पन्न करता है। विशेषतया नारी को तो
इससे अत्यधिक हानि उठानी पड़ती है। औसत नारी महीने में एकाध बार से अधिक काम-क्रीड़ा
का दबाव सहन नहीं कर सकती। प्रजनन की दृष्टि से हर बच्चे के बीच कम से कम पांच
वर्ष का अन्तर होना चाहिए। जल्दी-जल्दी बच्चे उत्पन्न करने और काम-क्रीड़ा का
अधिक दबाव पड़ने पर नारी अपना शारीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य भी खो बैठती
है। दैनिक काम-क्रीड़ा का स्वरूप हंसी, विनोद, मनोरंजन, चुहल, छेड़-छाड़ तक सीमित
रहे तभी ठीक है। हर्षोल्लास बढ़ाने वाले छुटपुट क्रिया-कलाप चलते रहें तो चित्त
प्रसन्न रहता है, परस्पर घनिष्ठता बढ़ती है और सान्निध्य का मनोवैज्ञानिक ही
नहीं काम प्रयोजन भी पूरा हो जाता है। यौन-संपर्क को यदा कदा के लिए ही सीमित
रखना चाहिए। आये दिन की इस विडम्बना में फंस कर मनुष्य अपना स्वास्थ्य ही नष्ट
नहीं करता, प्रतिक्रिया के आनन्द से भी वंचित हो जाता है। कामुक व्यक्ति बहुत
घटिया और उथला आनन्द ले पाते हैं। उसमें जो ऊंचे स्तर का उल्लास है उसे प्राप्त
करने के लिए देर तक की संग्रहीत शक्ति होनी चाहिए। जिन्हें यौन रोगों से बचना
हो उन्हें इस प्रकार की सतर्कता रखना ही चाहिए।
इस संदर्भ में यह समझ ही लिया जाय कि जननेन्द्रिय का सीधा संबंध मस्तिष्क से
है। वहां जो कुछ गड़बड़ होगी उसका सीधा प्रभाव मस्तिष्क पर पड़ेगा। मनोविज्ञान
वेत्ताओं के अनुसार उचित समय पर उचित काम-सेवन को अवसर न मिलने से जहां अपस्मार
मूर्छा, भूत-प्रेत, अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, स्मरणशक्ति की कमी, शिर दर्द, हृदयरोग,
नाड़ी विकृति आदि रोग उत्पन्न होते हैं वहां अति काम-सेवन भी ऐसे ही उद्वेग उत्पन्न
करता है। लम्पटों का शरीर जितना क्षीण होता है मन उससे भी अधिक विक्षिप्त, असंतुलित,
रहने लगता है। अनेकों मानसिक रोगों से त्रस्त उन्हें पाया जायगा जिन्होंने काम-सेवन
की दिशा में अति बरती। इस प्रकार का दुरुपयोग यों दोनों के लिए ही हानिकारक है
पर नारी को तो उसकी क्षति असाधारण रूप से उठानी पड़ती है। अतएव विवाहित जीवन
को काम-क्रीड़ा के उच्छृंखल उपयोगी की खुली छूट नहीं मान लेनी चाहिए और उस संदर्भ
में लगभग वैसी ही सतर्कता उपेक्षा बरतनी चाहिए जैसी कि अविवाहित-जीवन में बरती
जाती है। इस शक्ति संग्रह का सर्वतोमुखी प्रतिभा और व्यक्तित्व के विकास पर सीधा
असर पड़ता है। सुहागिनों की अपेक्षा विधवायें अथवा कुमारियां अधिक तेज तर्रार
और स्फूर्तिवान पाई जाती हैं। इसका कारण उनकी अन्तःशक्ति का अनावश्यक क्षरण न
होना ही प्रधान कारण है। इस लाभ से विवाहितों को भी वंचित नहीं होना चाहिए।
काम-सेवन का वैज्ञानिक स्वरूप यह है कि शरीरों की विद्युत शक्ति का इस प्रयोग
द्वारा अति द्रुत-गति से प्रत्यावर्तन होता है। मानवीय विद्युत की मात्रा शरीर
में भी पाई जाती है पर उसका भण्डार-चेतन संस्थान में ही देखा पाया जाता है। यौन
संस्थान की नींव में यह बिजली अकूत मात्रा में भरी पड़ी है। जैसे ही जननेन्द्रिय
निकट आती है वैसे ही वह प्रसुप्त शक्ति सजग और प्रबल हो उठती है और तत्काल दोनों
पक्ष अपनी विद्युत-शक्ति का विनिमय करने लग जाते हैं। ऋण विद्युतधारा धन की ओर
और धन धारा ऋण की ओर दौड़ने लग जाती है। नर-नारी को और नारी नर को अपना शक्ति
प्रवाह प्रस्तुत करते हैं। इस सम्मिलन एवं प्रत्यावर्तन का ही वह परिणाम है जो
काम-सेवन के आनन्द के रूप में उस क्षण अनुभव किया जाता है। यह विशुद्ध रूप से
प्राण और रयि शक्ति के—अग्नि और सोम के परस्पर प्रत्यावर्तन की अनुभूति है। यह
प्रयोग अति महत्वपूर्ण है उससे जहां व्यक्तित्वों का विकास हो सकता है वहां विनाश
भी संभव है। प्रबल विद्युतधारा वाला पक्ष निर्बल पक्ष को अपना अनुदान देकर उसे
ऊंचा उठने और परिपुष्ट बनने में सहायता कर सकता है, पर जिसके शरीर में क्षीण
प्राण है वह साथी को क्षति ही पहुंचा सकता है। इसका परिणाम यह भी हो सकता है
कि दोनों शारीरिक दृष्ट से न सही प्राण-शक्ति की दृष्टि से समान स्तर पर आ जावें।
वेश्या शरीर का क्षरण करते रहने पर भी अपना रूप सौन्दर्य बनाये रहती है। इसके
कारण शरीर शास्त्री नहीं बता सकते। इसका उत्तर प्राण विद्या के ज्ञाताओं के पास
है। वे मनस्वी कामुकों की शक्ति चूसती रहती हैं और जिस स्थिति में सामान्य गृहस्थ
नारी मृत्यु के मुख में जा सकती थी उस स्थिति में भी अपने चेहरे पर चमक और शरीर
में स्फूर्ति बनाये रहती हैं। यदि उनके प्रेमी घटिया स्तर के रोगी या मूर्ख स्तर
के हों तो फिर उनका स्वास्थ्य और तेज कभी भी स्थिर न रहेगा। यों शरीर की दृष्टि
से युवाकाल में नर-नारियों के बिजली अधिक रहती है इसी से उसका आकर्षण युवा वर्ग
के साथ काम-सेवन की लालसा संजोये रहता है। शरीर में विद्युत-शक्ति है तो पर थोड़ी
और घटिया स्तर की ही पाई जाती है। असली शक्ति भण्डार मस्तिष्क और हृदय में भरा
रहता है। स्वस्थ और सुन्दर व्यक्ति भी यदि मनोबल की दृष्टि से घटिया है तो उसे
इस सन्दर्भ में अशक्त ही माना जायगा। कुरूप और ढलती आयु का व्यक्ति भी उसके आन्तरिक
स्तर के अनुरूप प्रबल प्राण रह सकता है असलियत यह है कि शरीर की स्थिति से प्राण
क्षमता का संबंध बहुत ही कम है। किसी भी आयु में मनःस्थिति के अनुरूप प्राण की
प्रबलता या न्यूनता हो सकती है और उसका लाभ-हानि साथी को भोगना पड़ सकता है।
यों ब्रह्मचर्य सभी के लिये उचित है पर उन प्राण सम्पन्न उच्च व्यक्तित्वों के
लिए तो बहुत ही आवश्यक है। वे इस प्रकार का व्यतिक्रम करके अपनी प्रगति को ही
रोक देंगे। साथी को उतना लाभ न मिलेगा जितनी स्वयं क्षति उठा लेंगे। इसलिये ब्रह्मचर्य
की महत्ता असंदिग्ध है। प्राण को संचित करते रहा जाय और यदा-कदा उसका उपयोग काम-क्रीड़ा
में कर लिया जाय तो साथी की सहायता की दृष्टि से भी समर्थ पक्ष की यही बुद्धिमत्ता
होगी। कामुक व्यक्ति बाहर से ही चमक-दमक के भले दीखें भीतर से खोखले होते हैं
और वे जिससे भी सम्पर्क बनाते हैं उसी की शक्ति चूसने लगते हैं। लम्पट व्यक्ति
के साथ दाम्पत्य-जीवन बना कर उसका साथी शारीरिक और मानसिक क्षति ही उठा सकता
है। क्षीण प्राण वाला व्यक्ति समर्थ पक्ष की कुछ सहायता नहीं कर सकता। ब्रह्मचारी
और ब्रह्मचारिणी ही अपनी विशेष विद्युत धाराओं से एक-दूसरे को लाभान्वित कर सकते
हैं। प्रशंसनीय केवल इसी स्तर का काम-सेवन कहा जा सकता है जिससे प्रबल शक्ति
प्रवाह का लाभ दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी आवश्यकता की पूर्ति और अतृप्ति निवारण
के लिए कर सकें।
संतान उत्पादन के सत्परिणाम संयम शीलता पर निर्भर हैं। कामुकता की दशा में अति
करने वाले दम्पत्ति कुछ ही दिनों में अपनी जननेंद्रियों की मूल सत्ता खो बैठते
हैं। ऐसे पुरुष को नपुंसक और नारी को बंध्या होते देखा जाता है। गर्भ रहे भी
तो गर्भपात होने, दुर्बल या मृत सन्तान होने का खतरा बना रहता है। ऐसे माता पिता
मूर्ख दुर्गुणी रोगी, अविकसित सन्तान ही उत्पन्न कर सकते हैं। समर्थ सन्तान के
लिए जिसे परिपक्व एवं शुक्र की आवश्यकता है उसका निर्माण ब्रह्मचारी जीवन से
ही संभव है, पुष्ट शरीर वाले युवक युवती मिलकर पुष्ट शरीर वाले बालक को तो जन्म
दे सकते हैं पर उसकी मनःशक्ति-बुद्धिमत्ता एवं तेजस्विता अपूर्ण ही रह जायगी।
आन्तरिक समस्त विशेषतायें और विभूतियां प्राण-शक्ति से सम्बन्धित हैं। प्राण
का परिपाक ब्रह्मचर्य ही कर सकता है। इसलिए जिन्हें आंतरिक दृष्टि से मेधावी
प्रतिभावान और दूरदर्शी सन्तान अपेक्षित हो उन्हें अपनी अन्तःक्षमता की सुरक्षा
एवं परिपुष्टि का ध्यान रखना चाहिये। यह उपलब्धि अधिक संयम से ही प्राप्त कर
सकना सम्भव है। इसलिए गृहस्थ रहते हुए भी ब्रह्मचारी की स्थिति बनाये रहकर अपना-अपने
साथी का और भावी संतान का भविष्य उज्ज्वल बनाने की बात सोचनी चाहिये। काम-सेवन
क्षुद्र मनोरंजन के लिए इन्द्रिय तृप्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिये उसका सदुपयोग
तो प्राण प्रत्यावर्तन द्वारा एक दूसरे के अभावों को पूर्ण करने में ही किया
जाना चाहिये। यह प्रयोजन केवल प्राणवान और प्रबुद्ध पति-पत्नी मिलकर ही कर सकते
हैं। अपने देश और समाज और वंश का मुख उज्ज्वल कर सकने वाली सन्तान उत्पन्न करना
हर किसी के वश की बात नहीं है। इसके लिए इन्द्रिय संयम की साधना करनी पड़ती है
और प्राण को परिपुष्ट करने वाली सत्प्रवृत्तियों से भरा पूरा व्यक्तित्व बनाना
पड़ता है। वस्तुतः सुयोग्य सन्तानोत्पादन भी एक साधना है जिसके लिए संयमी ही
नहीं मनस्वी भी बनना पड़ता है।
दो वस्तुयें मिलने से तीसरी बनने की प्रक्रिया ‘रसायन’ कहलाती है। केमिस्ट्री
इस विज्ञान का नाम है। रज और वीर्य मिलने से भ्रूण की उत्पत्ति होती है और नौ
महीने की अवधि पूरी करके भ्रूण बालक के रूप में प्रसव होता है। यह स्थूल गर्भ
धारण या प्रजनन हुआ। इसके अतिरिक्त भी एक प्राण प्रत्यावर्तन होता है जिसे अनेक
अवसरों पर अनेक रूपों में देखा जा सकता है। शिष्य के प्राण में गुरु अपना प्राण
प्रतिष्ठापित करके उसकी प्रतिभा, मेधा और विद्या को प्रखर बनाता है। यह कार्य
स्कूली मास्टर नहीं कर सकते, वे तो बेचारे मात्र जानकारी दे सकने वाले पाठ भर
पढ़ा सकते हैं। वह विद्या जो शिष्य को गुरु के समान ही प्रखर बना दे केवल तपस्वी
गुरुओं द्वारा ही उपलब्ध हो सकती है। योगी अपने साधकों को शक्तिपात करते हैं,
वे अपनी तपःशक्ति शिष्य को देकर बात की बात में उच्च भूमिका तक पहुंचा देते हैं।
मरणासन्न रोगी को रक्तदान देकर पुनर्जीवन प्रदान किया जा सकता है इसी प्रकार
दुर्बल प्राण को सबल प्राण बनाने का कार्य शक्ति प्रत्यावर्तन जैसी प्रक्रिया
से सम्पन्न करती है। काम-सेवन का ऊंचा स्तर यही है। वह बच्चे पैदा करने के लिए
नहीं दो प्राणों के समन्वय से एक नवीन प्रतिभा विकसित करने के लिए किया जा सकता
है। सतोगुणी और सौम्य दम्पत्ति एक प्राण साधना के रूप में यदि काम-सेवन करते
भी हैं, तो इसका प्रयोजन एक अद्भुत प्रतिभा को जन्म देना होता है जो आवश्यकतानुसार
एक या दो शरीरों में पैदा की जा सकती है। यह उच्चस्तरीय शिशु जन्म है। ऐसा काम-सेवन
अभिशाप न होकर वरदान भी हो सकता है। विष को भी यदि संशोधन करके भेषज बना लिया
जाय तो वह विधातक न रहकर संजीवन मूरि बन सकता है। काम-प्रक्रिया को विष बनाकर
अपने मरण का साज न संजोयें बल्कि उसे अमृत बनाकर दो व्यक्तित्वों के असाधारण
उत्कर्ष एवं विश्व-कल्याण के कर सकने में समर्थ एवं प्राण प्रयोजन सिद्ध करे
यह पूर्णतया अपने बस की बात है और अपनी बुद्धिमत्ता दूर-दर्शिता पर निर्भर है।
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काम-प्रवृत्तियों का नियन्त्रण परिष्कृत अन्तःचेतना से
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भारतीय तत्व वेत्ताओं ने कामोत्तेजना को मनोज-मनसिज आदि नाम देकर बहुत पहले ही
यह स्वीकार कर लिया था कि यह उद्वेग शारीरिक हलचल नहीं मानसिक उभार है। यदि मन
पर नियन्त्रण किया जा सके—उसे ईश्वर-भक्ति, कला, साधना एवं आदर्श, निष्ठा में
नियोजित किया जा सके तो युवावस्था में भी शरीर और मन से ब्रह्मचारी रहा जा सकता
है। इसके विपरीत यदि शारीरिक नियन्त्रण तो निभाया जाय पर मानसिक उत्तेजना उभरती
रहे तो ब्रह्मचर्य का वह लाभ न मिल सकेगा जैसा कि साधना ग्रन्थों में उसका माहात्म्य
बताया गया है। दृष्टिकोण में परिवर्तन ही इन्द्रिय-निग्रह का प्रधान आधार है।
आहार-विहार के संयम से तो उसमें थोड़ी सी सहायता भर मिलती है।
आमतौर से यह समझा जाता है कि सुन्दरता या परिपुष्ट स्थिति के नर-नारी अधिक काम
तृप्ति करते होंगे एवं अच्छा प्रजनन करने में सफल रहते होंगे पर यह बात वैज्ञानिक
तथ्यों के विपरीत है। मनुष्य की चेतनात्मक विद्युत शक्ति ही कामोत्तेजना उत्पन्न
करती है और उसी की प्रबलता से यौन-तृप्ति एवं उत्कृष्ट प्रजनन का सम्बन्ध रहता
है। यह भ्रम अब दूर होता चला जा रहा है कि शरीर गठन का कामोल्लास से सीधा सम्बन्ध
है। वस्तुतः कामोत्तेजना विशुद्ध मानसिक प्रक्रिया है। वह जिस आयु में भी—जिस
मात्रा में उल्लसित रहेगी उसी स्थिति में कामोद्वेग उठते रहेंगे और तृप्ति तथा
प्रजनन की सफलता भी उसी अनुपात से सामने आती रहेगी।
भ्रूमध्य भाग में अवस्थित पिट्यूटरी ग्रन्थि एक विशेष प्रकार के हारमोन उत्पन्न
करती है, जो कामोत्तेजना की वृद्धि तथा यौन अवयवों को परिपुष्ट करते हैं। विशेषज्ञ
हर्मन्शन का कथन है, कामुकता को भावुकता का ऐसा आवेश कह सकते हैं जिसे प्रजनन
हारमोनों की प्रबलता उत्पन्न करती है। इसी आधार पर लोगों में न्यूनाधिक कामोत्तेजना
पाई जाती है। हो सकता है कि कोई पूर्ण स्वस्थ पूर्ण नपुंसक भी हो, इसके विपरीत
दुर्बल शरीर में वही आवेश अनियन्त्रित स्थिति में उभर रहा हो।
शिकागो मनोविश्लेषण संस्थान के डा. थेरेसी वेनेडेव तथा जीव रसायन शास्त्री डा.
रुवेन स्टीन ने मासिक धर्म का जल्दी तथा देरी का, न्यूनता तथा अधिकता से होना
हारमोन स्रावों के साथ अति घनिष्ठता के साथ जुड़ा हुआ बताया है। रजोदर्शन के
कुछ पहले से लेकर कुछ दिन पश्चात तक नारी प्रवृत्ति में आमतौर से भावुकता और
उत्तेजना बढ़ जाती है। इन दिनों वे अधिक चंचल होती हैं। या तो यौन उत्तेजना की
बात सोचती हैं या फिर खीज, झुंझलाहट अथवा आक्रोश प्रकट करती हैं। गृह कलह प्रायः
इन्हीं दिनों अधिक होता है। महिलाओं द्वारा किये जाने वाले अपराधों में तीन चौथाई
इन्हीं दिनों होते हैं।
मेडिकल न्यूज ट्रिव्यून नामक लन्दन से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक पत्र में
डा. एन.एन. जोफरी का एक अन्वेषण लेख छपा है जिसमें उन्होंने प्रकाश और उष्णता
के प्रभाव से जल्दी यौवन उभार आने का उल्लेख किया है। कई जीवों को गरम और प्रकाश
के वातावरण में रखने पर उनमें युवावस्था जल्दी उभरी।
ब्रिटेन के एक दूसरे साप्ताहिक पत्र ‘लान्सेट’ में यह विवरण प्रकाशित हुआ कि
इंग्लैंड का तापमान क्रमशः बढ़ रहा है। अब वहां पहले जितनी ठण्ड नहीं पड़ती।
फलस्वरूप लड़कियां जल्दी रजस्वला होने लगी हैं। औसत लड़की हर 10 वर्ष में चार
मास पहले रजस्वला होने लगी हैं। इसी प्रकार सन्तानोत्पादन समर्थता भी पहले की
अपेक्षा अब कम आयु में परिपुष्ट होने लगी है।
आहार-विहार और वातावरण की गर्मी बढ़ जाने से नर-नारियों में काम प्रवृति तीव्र
होने की मान्यता पुरानी हो गई। अब शरीर शास्त्री इस नये निष्कर्ष पर पहुंचे हैं
कि उत्तेजनात्मक चिन्तन से जो मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाह उमड़ते हैं वे ही यौन
लिप्सा में मनुष्य को बलात् प्रवृत्त करते हैं। यह विद्युत धारा घटाई भी जा सकती
है और बढ़ाई भी। तदनुसार संयम के लिए पृष्ठभूमि अपने ही प्रयास से बन सकती है।
इसके लिए सोचने का तरीका बदलने भर से काम नहीं चलता वरन् हारमोन प्रवाह की रोक
थाम कर सकने वाली अन्तःचेतना का बलिष्ठ होना भी आवश्यक है। जो योगाभ्यास जैसे
उपायों से ही सम्भव है।
मनोविज्ञानवेत्ता क्रुशन्स का कथन है—काम तृप्ति में इन्द्रिय समाधान ही नहीं
आवेश की तृप्ति भी आवश्यक होती है और वह चेतना में भावुकता भरी उमंगें उठने से
ही सम्भव है। यह उमंगें श्रृंगार रस का वातावरण बनाने से भी उठती हैं किन्तु
मुख्यतया वे उस अन्तःचेतना पर निर्भर हैं, जिन्हें हारमोन स्रावों का जन्मदाता
कहा जा सकता है।
पुत्र या पुत्री के उत्पन्न होने में भी उस आवेश विद्युत का ही प्रधान हाथ रहता
है। सामान्यतया शुक्र कीटाणुओं और रज अण्ड की स्थिति को गर्भ धारण के लिए उत्तरदायी
माना जाता है ओर यह कहा जाता है कि पुत्र जन्म के लिए और कन्या जन्म के लिए अलग-अलग
कीटाणुओं का हाथ रहता है।
शरीर शास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि नर के शुक्राणुओं में मादा और नर जाति
के जीवाणु पाये जाते हैं जबकि नारी रज में केवल एक ही प्रकार के—नारी जाती के
जीवाणु रहते हैं। इन दोनों के मिलने से गर्भ स्थापना होती है। इस मिलन में यदि
नर शुक्राणु का नारी बीज सफल हुआ तो लड़की की और यदि उसका नर बीज सफल हुआ तो
लड़के की उत्पत्ति होती है। मोटा सिद्धान्त सभी प्राणियों में यही लागू होता
है। इसलिए कन्या या पुत्र की उत्पत्ति के लिए नर शरीर को ही उत्तरदायी माना जाता
है। इस संदर्भ में नारी सर्वथा निष्पक्ष निर्दोष है।
शुक्र में उभयपक्षी जीवाणुओं में से एक वर्ग को यदि निष्क्रिय बनाया जा सके तो
संतान अभीष्ट लिंग की उत्पन्न हो सकती है। इस सिद्धान्त को ध्यान में रखकर ऐसी
औषधियों की खोज बहुत दिन तक चली जिनके आधार पर एक पक्ष के जीवाणु मूर्छित बनाये
जा सके। इन प्रयोगों में सफलता न मिलने से उन्हें बन्द कर दिया गया। जर्मन वैज्ञानिकों
ने रतिक्रिया के समय प्रयुक्त हो सकने वाले ऐसे रसायन तैयार किये जो एक वर्ग
के जीवाणुओं को मूर्छित कर सकें, पर यह प्रयोग भी असफल ही रहा।
रूसी महिला वैज्ञानिक बी.एन. श्रोडर ने अपनी साथी एन.के. कोलस्तोव की सहायता
से यह अन्वेषण किया कि वीर्य बीज बिजली की ऋण और धन धाराओं से प्रभावित होते
हैं। शरीर में यदि एक वर्ग को ही बिजली कहें तो एक वर्ग के शुक्रबीज विशेष रूप
से उत्तेजित होंगे और दूसरे वर्ग के मन्द स्थिति में पड़े रहेंगे। धन विद्युत
नर बीजों को और ऋण धारा नारी बीजों को उत्तेजित करती है। उन्होंने ‘एलेक्ट्री
फोटेसिस’ की सहायता से बीजाणुओं का पृथक्करण करके खरगोशों से सन्तानोत्पादन कराया,
परिणाम आशाजनक रहा।
इंग्लैंड के शैरीलेवीन और अमेरिका के मेनुयल गेडिन ने भी इस दिशा में प्रयोग
किये। वे पूर्ण सफलता तक तो नहीं पहुंचे पर यह प्रतिपादन पूर्ण विश्वास के साथ
व्यक्त कर सके कि निकट भविष्य में अभीष्ट लिंग की सन्तान उत्पन्न कर सकना सम्भव
हो जाय, ऐसे आधार हाथ लग गये हैं।
उपरोक्त प्रतिपादन यह सिद्ध करते हैं कि शुक्राणुओं में से किस वर्ग के कीटक
प्रबल होंगे और किस लिंग का बालक जन्म देंगे इसकी बागडोर उन कीटाणुओं की संरचना
में रहने वाली रासायनिक विशेषता पर निर्भर नहीं है वरन् उस विद्युत प्रवाह पर
निर्भर है जो अमुक वर्ग के कीटाणुओं को उत्तेजित करती है। अब औषधि सेवन करा के
नपुंसकों को पौरुषवान बनाने की बात व्यर्थ मानी जाती है इसी प्रकार उन औषधियों
को झुठला दिया गया है जो पुत्र या कन्या उत्पन्न कराने का दावा करती हैं। आधुनिकतम
मान्यता यह है कि मानव शरीर के अन्तःक्षेत्र में प्रवाहित रहने वाली विद्युत
शक्ति का स्तर ही नर के शुक्र एवं नारी के रज को न केवल गर्भाधान की स्थिति में
लाता है वरन् उसी पर पुत्र या कन्या का जन्म भी निर्भर है।
कोलम्बिया विश्व विद्यालय के प्रसूति शास्त्र के अध्यापक डा. लंड्रम शेटल्स ने
एक हजार मनुष्यों के शुक्राणु संग्रह करके उन पर विभिन्न प्रकार के परीक्षण किये।
वे भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे कि क्रोमोसोम कणों को विद्युत धारा द्वारा इस स्तर
तक प्रभावित किया जा सकता है कि उसने इच्छित लिंग की सन्तान पैदा कराई जा सके।
फ्लैडलफिया मेडीकल सेन्टर ने यह निष्कर्ष निकाला है कि अधिक मात्रा में और अधिक
समक्ष जीवाणुओं की उत्पत्ति कामोत्तेजना की मन्द अथवा तीव्र स्थिति पर निर्भर
है। अन्यमनस्क मनःस्थिति में हुए संयोग से उत्पादन जीवाणु भी निष्क्रिय और निस्तेज
ही पाये गये हैं। ऐसे निस्तेज निराश गर्भाधान से मनस्वी और प्रतिभाशाली बालक
उत्पन्न नहीं हो सकते।
अधिक संख्या में सन्तानोत्पादन शरीर की रासायनिक स्थिति पर निर्भर नहीं है वरन्
हारमोन उत्तेजना से सम्बन्धित है। रासायनिक दृष्टि से जिस स्थिति का एक शरीर
बन्ध्यत्व ग्रस्त होगा उसी स्थिति का दूसरा शरीर बहु प्रजनन की अति भी कर सकता
है। ऐसे शरीरों का विश्लेषण करने पर उनके आन्तरिक विद्युत प्रवाह को ही उस भिन्नता
के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।
रूस की एक महिला ने 27 बार गर्भवती होकर 23 शिशुओं को जन्म दिया। यह महिला अपने
समय में बहुत प्रख्यात हुई थी और सम्राट जारद्वितीय ने उसे सम्मानित किया था।
फ्रांस की एक ग्रामीण नारी ने 21 सन्तानों की मां बनकर इस समय में सर्वाग्रणी
जननी का पद प्राप्त किया है। इण्डोनेशिया की एक महिला गत 28 वर्षों से हर साल
एक सन्तान को अनवरत रूप से जन्म देती चली आ रही है। मांटीमिलेटो (इटली) की एक
महिला श्रीमती रोसा अब तक 26 बच्चों को जन्म दें चुकी है।
केवल कन्याओं को जन्म देने वाली महिलाओं में प्रथम है इण्डियाना पोलिश की श्रीमती
सिसिल जिन्होंने लगातार 14 कन्याओं को जन्म दिया है। इसके बाद दूसरे नम्बर पर
आती है—श्रीमती लाइड ब्रुक्स उनके 13 कन्याएं ही हैं। इन दोनों महिलाओं ने कभी
भी पुत्र प्रसव नहीं किया।
आयु के न्यून या अधिक होने पर भी प्रजनन अवयव इस स्थिति में हो सकते हैं कि वे
सन्तानोत्पादन कर सकें—
गुआर्रांटगुएट (ब्राजील) में 23 बच्चों के पिता जोसे पारफरियो डी. एराओ ने 109
वर्ष की आयु में 48 वर्षीय महिला के साथ चौथा विवाह किया है। पूछने वालों को
उसने बताया कि यदि मेरे और सन्तान होती है तो उसे पूर्णतया स्वाभाविक समझूंगा।
नव-वधू का यह प्रथम विवाह है। वह बहुत समय से उसकी प्रेयसी रही है। लोगों ने
इस वृद्ध विवाह का मखौल उड़ाया तो वधू ने इससे असहमति प्रकट की और उसने कहा—मेरा
पति शारीरिक दृष्टि से पूर्ण समक्ष है और मैं उससे सन्तुष्ट हूं।
दक्षिण पेरू के आरिक्विया अस्पताल में एक 11 वर्षीय बालिका ने 1.8 किलोग्राम
वजन के बच्चे को जन्म दिया। जच्चा और बच्चा दोनों ही स्वस्थ रहे।
इससे पूर्व कम उम्र की लड़की द्वारा प्रजनन का पहला रिकार्ड यह है कि 1938 में
एक सात वर्षीय बालिका लिण्डा मैडिना ने कैस्ट्रोविरीना के अस्पताल में पुत्र
को जन्म दिया था।
यह प्रमाण बताते हैं कि शरीर की स्थिति पर प्रजनन निर्भर नहीं वरन् उसका सीधा
सम्बन्ध ऐसी चेतना से है जो कायगत रासायनिक पदार्थों से कहीं ऊंचा है।
इन तथ्यों पर विचार करने से काम प्रवृत्ति को नियंत्रित परिष्कृत, परिपुष्ट,
प्रबल और शिथिल बनाने को ही नहीं अभीष्ट सन्तानोत्पादन के लिए उस विशिष्ट चेतना
के साथ सम्पर्क बनाना पड़ेगा जो अस्थि मांस से नहीं वरन् अन्तःचेतना से सम्बन्धित
है। चेतना का यह स्तर योगाभ्यास की कुण्डलिनी उत्थान जैसी साधना पद्धतियों से
सम्बन्धित है। ब्रह्मचर्य का परिपूर्ण पालन और उस ओजस् शक्ति का प्रखर व्यक्तित्व
के रूप में परिवर्तन भी इसी स्तर की साधनाओं द्वारा सम्भव हो सकता है।
काम बीज का परिष्कार
शरीर की उत्पत्ति काम बीज से है। फ्राइड के अनुसार वह बालक पन में दुग्ध-पान
से लेकर साथियों की छेड़छाड़ के अनेक रूप में विकसित होता है। किशोरावस्था में
वह जोश बनकर उभरता है। होश को पीछे छोड़कर जोश की जो तूफानी लहरें उठती हैं उनमें
मनोविज्ञानी काम तत्व की प्रबलता देखते हैं। लड़कों में नये स्थानों पर नये केश
उत्पन्न होने-जननेंद्रिय में प्रौढ़ता बढ़ने के रूप में उसकी अभिवृद्धि प्रकट
होती है। लड़कियों में रजो-दर्शन तथा वक्षस्थल का उभार इसी का प्रमाण है कल्पना
क्षेत्र में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षक कल्पनाओं के आंधी-तूफान उठने लगते हैं।
आगे चलकर इस की परिणिति प्रणय में होती है। दाम्पत्य सूत्र जुड़ते हैं, आदान-प्रदान
के भावभरे रसास्वादन मिलते हैं और सन्तानोत्पत्ति का क्रम चल पड़ता है। एक नये
गृहस्थ का-नये परिवार का श्रीगणेश होता है और पति-पत्नी को उसी की विविध-व्यवस्थाएं
जुटाने में अपनी लगभग पूरी शक्ति झोंकनी पड़ती है। यह ‘काम बीज’ से उत्पन्न वट-वृक्ष
है, जिसका विस्तार भली या बुरी व्यस्त क्रिया-प्रक्रियाओं में होता है। जीवन
सम्पदा का उत्सर्ग इसी वेदी पर होता देखा गया है। बीच-बीच में उच्छृंखल यौनाचार
की कल्पनायें अथवा क्रियायें अपने अलग ही कुहराम मचाती रहती हैं। उन पर सामाजिक
नियन्त्रण न हो तो उस स्वेच्छाचार की प्रतिक्रिया से सामाजिकता का, पारिवारिकता
का, सभ्यता का, मानवी प्रगति का अन्त हुआ ही समझना चाहिये। अपराधों के घटना-क्रम
में काम-विग्रह का—उसकी विकृति प्रतिक्रिया का जितना हाथ रहता है उतना सब अनाचारों
से मिलकर भी नहीं होता है। नीति मर्यादाओं का उल्लंघन इसी प्रबल प्रेरणा से आये
दिन होता रहता है।
इतने प्रेरक तत्व को तुच्छ मानकर नहीं चलना चाहिए। उसकी सामर्थ्य असीम है। एक
शरीर से दूसरे का उत्पन्न होना इस सृष्टि का अभ्यस्त किन्तु अद्भुत आश्चर्य है।
मानव तत्व की भावना, विचारणा एवं क्रिया को अपने जाल-जंजाल में समेट बटोर कर
बैठ जाना इसी आकर्षण का काम है। भव-बन्धनों की चर्चा जब-तब होती रहती है। प्रकारान्तर
से वह संकेत काम-विग्रह के लिए ही किया गया होता है। गीता के कर्मयोग में ‘निष्काम’
होने पर जोर दिया गया है। यों उसका मोटा अर्थ कामनाओं से पीछा छुड़ाकर कर्त्तव्य-परायण
होना है, पर गहराई में उतरने पर उसमें ‘काम’ रहित होने पर उच्चस्तरीय आत्मिक
प्रगति होने—आत्म-कल्याण एवं ईश्वर दर्शन का लाभ मिलने-का तथ्य सामने आ खड़ा
होता है।
ब्रह्मचर्य का महत्व सनातन धर्म के रूप में सभी सम्प्रदाओं ने समान रूप से बताया
है। उसके कई प्रकार के लाभ सत्परिणाम बताये हैं। ब्रह्मचर्य का मोटा अर्थ संयोग
से बचना बताया गया है। यह शारीरिक मर्यादा है। पर इसका लाभ भी तभी होता है जब
उसे मानसिक रूप से भी निवाहा जाय। सच तो यह है कि यह प्रसंग शारीरिक कम और मानसिक
अधिक है। मन पर कामुकता छाई रहे तो शरीर संयम निरर्थक ही नहीं कई बार तो हानिकारक
ही होता है। शरीर शास्त्री काम निरोध को हानिकारक भी बताते हैं। यह बात उस स्थिति
में सही भी है जब मानसिक असंयम तो बनाये रहा जाय किन्तु शरीर को हठपूर्वक नियन्त्रित
किया जाय। ऐसी दशा में स्वप्न दोष होने लगेंगे अथवा गुप्त कुकृत्यों का सिलसिला
चल पड़ेगा। इसमें प्रत्यक्ष मैथुन से कम नहीं अधिक ही हानि है। इसके विपरीत यदि
धर्म-पत्नी के साथ, मित्र, सहचर, सहोदर के भाव से रहा जाय और आवश्यकतानुसार मर्यादित
कामसेवन क्रम भी चलता रहे तो उसकी कोई बुरी प्रतिक्रिया न होगी। सच तो यह है
कि उससे कुकल्पनाओं और कुचेष्टाओं को निरस्त करने में सहायता भी मिलेगी। देवताओं,
ऋषियों और महामानवों को भी जब विवाहित जीवन-क्रम अपनाते देखते हैं तो लगता है
यह कोई गर्हित कृत्य नहीं है। यदि ऐसा होता तो वे इस मार्ग पर क्यों चलते?
यहां विवाहित रहने या अविवाहित रहने की उपयोगिता के पक्ष-विपक्ष में कुछ नहीं
कहा जा रहा है। व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति, परिस्थिति एवं कार्य-पद्धति को देखते
हुए दोनों ही मार्ग उपयोगी हैं जिन्हें उच्च आदर्शों में निरत रहना है उन्हें
अपनी शक्तियां बचाकर लक्ष्य के लिए अधिक कुछ कर सकना तभी हो सकता है जब गृहस्थ
का भार ढोने से अवकाश मिले, प्राचीन काल से साधु परम्परा यह रास्ता अपनाती रही
है। परिव्राजक कार्य-पद्धति में, न्यूनतम निर्वाह में, चिन्ता मुक्त रहने में
उन्हें सुविधाएं अविवाहित रहकर ही मिलती थीं। इसके विपरीत जिन्हें आश्रम चलाने
पड़ते थे वे ब्राह्मण गृह-व्यवस्था के लिए पत्नी के सहयोग की सुविधा देखते थे।
जो हो यह प्रसंग यहां नहीं उठना है। चर्चा काम प्रक्रिया की हो रही थी। वह शरीर
क्षेत्र से कम और मनःक्षेत्र से अधिक सम्बन्धित है। शरीर का ब्रह्मचारी मन से
व्यभिचारी रहे तो उसे इस प्रति बन्धन की विडम्बना का कोई लाभ न मिल सकेगा। इसके
विपरीत यदि मन पवित्र रहे तो गृहस्थ भी एक योगी बन सकता है। तब घर में तपोवन
का वातावरण बना देना कुछ कठिन न होगा। वासना और विलासिता का स्थान यदि स्वच्छ
सहकार और बालकोपम हास्य-विनोद ग्रहण करले तो उसे वंधित ब्रह्मचर्य से कम नहीं
अधिक लाभदायक ही कहा जायगा।
समस्या यहां आकर अटक जाती है कि यदि काम बीज जीव चेतना की इतनी गहराई में घुसा
बैठा है—उसकी शक्ति इतनी प्रबल और जड़ इतनी गहरी है तो फिर उससे बच सकना कैसे
हो सकता है? तब ब्रह्मचर्य के लाभों से लाभान्वित कैसे हुआ जा सकता है? यदि संयम
न बरता जाय तो ओजस् की क्षति होती है। यदि बरता जाय तो दमित मानस विकृत ग्रंथियों
का हानिकारक संग्रह करता है। इधर खाई उधर कुआं। आखिर किया जाय तो क्या किया जाय?
मनीषियों ने इसका उत्तर कुण्डलिनी जागरण की साधना के रूप में दिया है। इसका कर्मकाण्ड
और विधि-विधान जितना चमत्कारी है उससे अधिक महत्वपूर्ण है उसका तत्व दर्शन। कुण्डलिनी
विधान जानने से पहले उसका दर्शन जानना आवश्यक है। प्रतिपादन यह है कि काम-कला
को ब्रह्म विद्या के रूप में परिवर्तित किया जाय। इसे विज्ञान की भाषा में—ट्रांसफार्मेशन-रूपान्तरण
कहते हैं। काम को कला में परिणत, परिष्कृत किया जा सकता है। भक्ति भावना उसी
प्रयास का उत्कृष्ट रूप है, ललित कलाओं में, उद्देश्य पूर्ण शौर्य, साहस में,
पारमार्थिक सेवा साधना में जो उच्चस्तरीय उल्लास उपलब्ध होता है उसे ‘काम’ तत्व
की परिष्कृत भाव भूमिका कह सकते हैं। चिन्तन की दिशा धारा मोड़ देने से यह परिवर्तन
सम्भव हो सकता है। वर्षा का जल यदि अनियन्त्रित फैले तो खेतों, घरों को डुबाकर
हानिकारक सिद्ध होगा। पर यदि नदी नाले के माध्यम से बांध बनाकर संग्रह किया जाय
और नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए खेतों तक पहुंचाया जाय तो इससे हर प्रकार
लाभ ही लाभ है। अनियन्त्रित काम प्रवृत्ति का निरोध इसी प्रकार उचित है उसे हठ
पूर्वक नष्ट कर देने की बात न सोची जाय, वरन् ऐसे प्रयोजन में लगा दिया जाय जिसमें
उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति हो।
पौराणिक कथा में कामदेव भगवान शंकर पर प्रकोप करता है, उन्हें अपनी उंगली के
इशारे पर नचाना चाहता है। शिवजी अपने दूरदर्शी विवेक से—तृतीय नेत्र से इसके
दुष्परिणामों को समझने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुस्थिति समझ में आते ही, तृतीय
नेत्र खुलते ही सम्भावना समाप्त हो जाती है। कामदेव जलकर भस्म हो जाता है। वह
विवेकशीलता की—पशु प्रवृत्ति पर प्रत्यक्ष विजय है। कुविचारों को सद्विचारों
से ही निरस्त किया जाता है। लोहे से लोहा कटता है। कामुकता के दुष्परिणामों और
संयम के सत्परिणामों पर विस्तारपूर्वक विचार किया जाय तो विवेक का निर्णय औचित्य
के पक्ष में होगा। चोर की घात तो तब लगती है जब घर मालिक सोये हुए हों जब उनमें
से कोई बच्चा रोने लगे—बुड्ढा खांसने लगे तो बलिष्ठ चोर की भी हिम्मत टूट जायेगी
और उसे उलटे पैरों भागना ही पड़ेगा। कामुकता, सम्मत समस्त कुविचारों के सम्बन्ध
में यही बात लागू होती है। यदि आदर्शवाद के समर्थक तर्कों, तथ्यों, प्रमाण और
उदाहरणों की सेना सजा ली जाय और जब भी शत्रु शिर उठाये तभी वह सेना लड़ा दी जाय
तो समझना चाहिए कि औचित्य ही जीतेगा। कल्मषों के उन्मूलन का यही एकमात्र मार्ग
है। महाभारत युद्ध की घटना को लेकर जीव रूपी अर्जुन को—दुरित दुर्जनों को परास्त
करने के लिए जिस सैन्य सज्जा के लिए कहा गया है उसे अन्तःसधर्म की समझना चाहिए।
शिवजी का काम दहन भी इसी तथ्य के समर्थन में एक प्रेरणाप्रद प्रसंग है।
पीछे काम पत्नी-रति; सरसता विलाप करती है। विधवा के दुःख को—भगवान आशुतोष सहन
नहीं कर पाते, वे द्रवित होते हैं और वरदान देते हैं कि भस्मसात कामदेव शरीर
समेत तो जीवित नहीं हो सकते, पर वे सूक्ष्म रूप में फिर सजीव हो जायेंगे और उच्च
आत्माओं पर भी अपना अस्त्र छोड़ने की अपनी कामना पूरी करेंगे।
इस वरदान का अभिप्राय यही है कि पशु-प्रवृत्तियों को भड़काने वाली और जीवन सम्पदा
को कुमार्गगामी बनाने वाली कामुकता को परिष्कृत किया जा सकता है। उसे भावनात्मक
श्रेष्ठ सम्वेदनाओं से लगा कर स्थूल-यौनाचार के आकर्षण से विरत किया जा सकता
है।
कुण्डलिनी के स्वरूप निर्धारण में यह तथ्य और भी स्पष्ट है। काम केन्द्र मूलाधार
चक्र को बताया गया है। यह जननेन्द्रिय के मूल में है। इसे अग्नि कुण्ड, अग्नि
समुद्र, शक्ति समुद्र भी कहा गया है। उमंगें और उत्साह भरने की क्षमता वहां केन्द्रित
है। इस स्थिति में उसकी संज्ञा सर्पिणी की है। सर्प दंश और सर्प विष की भयानकता
सर्वविदित है। सामान्य स्थिति में अधोगामी और बहिर्मुखी रहती है। उसके क्षरण-स्राव-जननेन्द्रिय
मार्ग से नीचे की ओर टपकते हैं। उसका प्रत्यक्ष रूप त्वचा तल से ऊपर उभरा होता
है। नर और नारी की जननेन्द्रियों की स्थिति इस दृष्टि से लगभग एक जैसी ही है।
इसे कुण्डलिनी की गर्हित, मूर्छित, अधःपतित स्थिति समझा जाना चाहिए।
कुण्डलिनी जागरण साधना में समुद्र मंथन जैसे प्रयत्न करने पड़ते हैं। फलतः प्रसुप्ति
जागृति में बदलती है। तप की उष्णता पाकर अन्तःऊर्जा उभरती है और ऊपर की ओर चलने
का प्रयत्न करती है। गर्मी से वायु, जल आदि सभी का विस्तार होता है। वे ऊपर की
ओर उठते हैं। ग्रीष्म में चक्रवात गरम हवा के द्वारा ही उठते हैं। पानी से भाप
गर्मी ही ऊपर की ओर उठाती है। मूलाधार से जगी हुई व्यक्ति ऊर्जा, प्राण-शक्ति
कुण्डलिनी ऊपर को उठती है। मेरुदण्ड मार्ग से सर्पिणी की तरह लहराती हुई ब्रह्मरंध्र
की ओर चलाती है, बिजली की यही चाल है। यह ऊर्जा मस्तिष्क में पहुंचती है। सहस्रार
कमल से सम्बन्ध बनाती है और उसी में लय हो जाती है। कमल सात्विकता का, कला का,
दिव्य सौन्दर्य का केन्द्र माना गया है। भगवान के अंगों का-अवयवों का-वर्णन कमल
उपमा के साथ किया जाता रहा है। लक्ष्मी कमलासन पर विराजमान हैं। गजेन्द्र ने
ग्राह से मुक्ति पाने के लिए कमल पुष्प सूंड़ में लेकर भगवान की अभ्यर्थना की
थी। कमला लक्ष्मी का दूसरा नाम है। विष्णु के चार हाथों में चार उपकरण हैं। शंख,
चक्र, गदा के उपरान्त चौथा ‘पद्म’ ही आता है। इस प्रकार पौराणिक संगतियों में
कमल को दिव्यता का प्रतीक माना गया है। मस्तिष्क के मध्य क्षेत्र में-ब्रह्मरन्ध्र
में-सहस्रार कमल अवस्थित है। उस पर कहीं विष्णु की कहीं, शिव की, कहीं सद्गुरु
की स्थापना और ध्यान का उल्लेख है। यह प्रतिपादन यही इंगित करता है कि कामुकता
में संलग्न अन्तःऊर्जा को उस पतन के गर्त से निकाल कर ब्रह्मचेतना में-उत्कृष्ट
उल्लास प्रधान करने वाली ब्रह्म विद्या में नियोजित किया जाना चाहिए।
इसी परिवर्तन परिष्कार को—उत्कर्ष उन्नयन की कुण्डलिनी जागरण कहा गया है। ब्रह्मचर्य
की तात्विक साधना यही है। इसी में अध्यात्म तत्व ज्ञान के समस्त सूत्र संजोये
हुए हैं। इस ट्रान्सफार्मेशन का—रूपान्तर का सत्परिणाम, महान् जागरण, महान् परिवर्तन
दिव्य जीवन के पक्ष में सामने आता है। काम बीज का यह ब्रह्म समर्पण कितना श्रेयस्कर
होता है इसे कुण्डलिनी महाविज्ञान की जागरण साधना एवं तत्व भावना को अपना कर
ही जाना जा सकता है।
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काम की उत्पत्ति उद्भव
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कुण्डलिनी महाशक्ति को ‘काम कला’ कहा गया है। उसका वर्णन कतिपय स्थलों में ऐसा
प्रतीत होता है मानो यह कोई सामान्य काम सेवन की चर्चा की जा रही हो। कुण्डलिनी
का स्थान जननेन्द्रिय मूल में रहने से भी उसकी परिणिति काम शक्ति के उभार के
लिये प्रयुक्त होती प्रतीत होती है।
इस तत्व को समझने के लिये हमें अधिक गहराई में प्रवेश करना पड़ेगा और अधिक सूक्ष्म
दृष्टि से देखना पड़ेगा। नर-नारी के बीच चलने वाली ‘काम क्रीड़ा’ और कुण्डलिनी
साधना में सन्निहित ‘काम कला’ में भारी अन्तर है। मानवीय अन्तराल में उभयलिंग
विद्यामान हैं। हर व्यक्ति अपने आप में आधा नर और आधा नारी है। अर्ध नारी नटेश्वर
भगवान् शंकर को चित्रित किया गया है। कृष्ण और राधा का भी ऐसा ही एक समन्वित
रूप चित्रों में दृष्टिगोचर होता है। पति-पत्नी दो शरीर एक प्राण होते हैं। यह
इस चित्रण का स्थूल वर्णन है। सूक्ष्म संकेत यह है कि हर व्यक्ति के भीतर उभय
लिंग सत्ता विद्यमान है। जिसमें जो अंश अधिक होता है उसकी रुझान उसी ओर ढुलकने
लगती है। उसकी चेष्टायें उसी तरह की बन जाती हैं। कितने ही पुरुषों में नारी
जैसा स्वभाव पाया जाता है और कई नारियों में पुरुषों जैसी प्रवृत्ति, मनोवृत्ति
होती है। यह प्रवृत्ति बढ़ चले तो इसी जन्म में शारीरिक दृष्टि से भी लिंग परिवर्तन
हो सकता है। अगले जन्म में लिंग बदल सकता है अथवा मध्य सन्तुलन होने से नपुंसक
जैसी स्थिति बन सकती है।
नारी लिंग का सूक्ष्म स्थल जननेन्द्रिय मूल है। इसे ‘योनि’ कहते हैं। मस्तिष्क
का मध्य बिन्दु ब्रह्मरंध्र-‘लिंग’ है। इसका प्रतीक प्रतिनिधि सुमेरु-मूलाधार
चक्र के योनि गह्वर में ही काम बीज के रूप में अवस्थित है।’ अर्थात् एक ही स्थान
पर वे दोनों विद्यमान है। पर प्रसुप्त पड़े हैं। उनके जागरण को ही कुण्डलिनी
जागरण कहते हैं। इन दोनों के संयोग की साधना ‘काम-कला’ कही जाती है। इसी को कुण्डलिनी
जागरण की भूमिका कह सकते हैं। शारीरिक काम सेवन-इसी आध्यात्मिक संयोग प्रयास
की छाया है।
आन्तरिक काम शक्ति को दूसरे शब्दों में महाशक्ति—महाकाली कह सकते हैं। एकाकी
नर या नारी भौतिक जीवन में अस्त-व्यस्त रहते हैं। आन्तरिक जीवन में उभयपक्षी
विद्युत शक्ति का समन्वय न होने से सर्वत्र नीरस नीरवता दिखाई पड़ती है। इसे
दूर करके समग्र समर्थता एवं प्रफुल्लता उत्पन्न करने के लिये कुण्डलिनी साधना
की जाती है। इसी संदर्भ में शास्त्रों में साधना विज्ञान का जहां उल्लेख किया
है वहां काम क्रीड़ा जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। वस्तुतः यह आध्यात्मिक
काम कला की ही चर्चा है। योनि-लिंग, काम बीज, रज, वीर्य, संयोग आदि शब्दों में
उसी अन्तःशक्ति के जागरण की विधि व्यवस्था सन्निहित है—
स्वयंभु लिंग तन्मध्ये सरन्ध्रं यश्चिमावलम् ।
ध्यायेञ्च परमेशानि शिवं श्यामल सुन्दरम् ।।
—शाक्तानन्द तरंगिणी
उसके मध्य रन्ध्र सहित महालिंग है। वह स्वयंभु और अधोमुख, श्यामल और सुन्दर है।
उसका ध्यान करे।
तत्रस्थितो महालिंग स्वयंभुः सर्वदा सुखी ।
अधोमुखः क्रियावांक्ष्य काम वीजे न चालितः ।।
—काली कुलामृत
वहां ब्रह्मरंध्र में—वह महालिंग अवस्थित है। वह स्वयंभु और सुख स्वरूप है। इसका
मुख नीचे की ओर है। यह निरन्तर क्रियाशील है। काम बीज द्वारा चालित है।
आत्मसंस्थं शिवं त्यक्त्वा बहिःस्थं यः समर्चयेत् ।
हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य भ्रमते जीविताशया ।।
आत्मलिंगार्चनं कुर्यादनालस्यं दिने दिने ।
तस्य स्यात्सकला सिद्धिर्नात्र कार्या विचरणा ।।
—शिव संहिता
अपने शरीर में अवस्थित शिव को त्याग कर जो बाहर-बाहर पूजते फिरते हैं। वे हाथ
के भोजन को छोड़कर इधर-उधर से प्राप्त करने के लिये भटकने वाले लोगों में से
हैं।
आलस्य त्यागकर ‘आत्म-लिंग’—शिव—की पूजा करे। इसी से समस्त सफलताएं मिलती हैं।
नमो महाविन्दुमुखी चन्द्र सूर्य स्तन द्वया ।
सुमेरुद्दार्घ कलया शोभमाना मही पदा ।।
काम राज कला रूपा जागर्ति स चराचरा ।
एतत कामकला व्याप्तं गुह्याद गुह्यतरं महत् ।।
—रुद्रयामल तंत्र
महाविन्दु उसका मुख है। सूर्य चन्द्र दोनों स्तन हैं, सुमेरु उसकी अर्ध कला है,
पृथ्वी उसकी शोभा है। चर-अचर सब में काम कला के रूप में जगती है। सबमें काम कला
होकर व्याप्त है। यह गुह्य से भी गुह्य है।
जननेन्द्रिय मूल—मूलाधार चक्र में योनि स्थान बताया गया है।
मूलाधारे हि यत् पद्मं चतुष्पत्रं व्यवस्थितम् ।
तत्र कन्देऽस्ति या योनिस्तस्यां सूर्यो व्यवस्थितः ।।
—शिव संहिता
चार पंखुरियों वाले मूलाधार चक्र के कन्द भाग में जो प्रकाशवान् योनि है।
तस्मिन्नाधार पद्मे च कर्णिकायां सुशोभना ।
त्रिकोणा वर्तते योनिः सर्वतमेषु गोपिका ।।
—शिव संहिता
उस आधार पद्म की कर्णिका में अर्थात् दण्डी में त्रिकोण योनि है। यह योनि सब
तन्त्रों करके गोपित है।
यत्तद्गुह्यमिति प्रोक्त देवयोनिस्तु सोच्यते ।
अस्यां यो जायते वह्निः स कल्याणप्रदुच्यते ।।
—कात्यायन स्मृति
यह गुह्य नामक स्थान देव योनि है। उसी में जो वह्नि उत्पन्न होती है वह परम कल्याणकारिणी
है।
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्टानं द्वितीयकम्,
योनि स्थानं द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यहे ।।
—गोरक्ष पद्धति
पहले मूलाधार एवं दूसरे स्वाधिष्ठान चक्र के बीच में योनि स्थान है, यही काम
रूप पीठ है।
आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं च चतुर्दलम् ।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्ध वंदिता ।।
—गोरक्ष पद्धति
गुदा स्थान में जो चतुर्दल कमल विख्यात है उसके मध्य में त्रिकोणाकार योनि है
जिसकी वन्दना समस्त सिद्धजन करते हैं, पंचाशत वर्ण से बनी हुई कामाख्या पीठ कहलाती
है।
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतो मुखम् ।
तिसमन दृष्टे महायोगे याता यातात्र विन्दते ।।
—गोरक्ष पद्धति
गुदा स्थान में जो चतुर्दल कमल विख्यात है उसके मध्य में त्रिकोणाकार योनि है
जिसकी वन्दना समस्त सिद्धजन करते हैं, पंचाशत वर्ण से बनी हुई कामाख्या पीठ कहलाती
है।
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतो मुखम् ।
तिस्मन दृष्टे महायोगे याता यातात्र विन्दते ।।
—गोरक्ष पद्धति
इसी त्रिकोण विषय समाधि में अनन्त विश्व में व्याप्त होने वाली परम ज्योति प्रकट
होती है वही कालाग्नि रूप है जब योगी ध्यान, धारण, समाधि—द्वारा उक्त ज्योति
देखने लगता है तब उसका जन्म मरण नहीं होता।
इन दोनों का परस्पर अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह सम्बन्ध जब मिला रहता है तो आत्म-बल
समुन्नत होता चला जाता है और आत्मशक्ति सिद्धियों के रूप में विकसित होती चलती
है। जब उनका सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो मनुष्य दीन-दुर्बल, असहाय-असफल जीवन
जीता है। कुंडलिनी रूपी योनि और सहस्रार रूपी लिंग का संयोग मनुष्य की आन्तरिक
अपूर्णता को पूर्ण करता है। साधना का उद्देश्य इसी महान प्रयोजन की पूर्ति करता
है। इसी को शिव शक्ति का संयोग एवं आत्मा से परमात्मा का मिलन कहते हैं। इस संयोग
का वर्णन साधना क्षेत्र में इस प्रकार किया गया है।
भगः शक्तिर्भगवान् काम ईश उया दातार विह सौभमानाम् ।
सम प्रधानौ समसत्वौ समोजौ तयोः शक्तिरजरा विश्व योनिः ।।
—त्रिपुरीपनिषद
भग शक्ति है। काम रूप ईश्वर भगवान है। दोनों सौभाग्य देने वाले हैं। दोनों की
प्रधानता समान है। दोनों की सत्ता समान है। दोनों समान ओजस्वी हैं। उनकी अजरा
शक्ति विश्व का निमित्त कारण है।
शिव और शक्ति के सम्मिश्रण को शक्ति का उद्भव आधार माना गया है। इन्हें बिजली
के ‘धन’ और ‘ऋण’ भाग माना जाना चाहिये। बिजली इन दोनों वर्गों के सम्मिश्रण से
उत्पन्न होती है। अध्यात्म विद्युत् के उत्पन्न होने का आधार भी इन दोनों शक्ति
केन्द्रों का संयोग ही है। शिव पूजा में इसी आध्यात्मिक योनि लिंग का संयोग प्रतीक
रूप से लिया गया है।
लिंगवेदी उमा देवी लिंग साक्षान्महेश्वरः ।
—लिंग पुराण
‘लिंग वेदी’ [योनी] देवी उमा है और लिंग साक्षात् महेश्वर हैं।
सा भगाख्या जगद्धात्री लिंगमूर्तेस्त्रिवेदिका ।
लिंगस्तु भगवान्द्वाभ्यां जगत्सृाष्टर्द्विजोत्तमाः ।।
लिंगमूर्तिः शिवो ज्योतिस्तमसश्चोपरि स्थितः ।
—लिंग पुराण
वह महादेवी भग संज्ञा वाली और इस जगत् की धात्री हैं तथा लिंग रूप वाले शिव की
त्रिगुणा प्रकृति रूप वाली है। हे द्विजोत्तमो! लिंग रूप वाले भगवान् शिद नित्य
ही भग से युक्त रहा करते हैं और इन्हीं दोनों से इस जगत् की सृष्टि होती है।
लिंग स्वरूप शिव स्वतः प्रकाश रूप वाले, हैं और यह माया के तिमिर से ऊपर विद्यमान
रहा करते हैं
ध्यायेत् कुण्डलिनी देवी स्वयंभु लिंग वेष्टिनीम् ।
श्यामां सूक्ष्मां सृष्टि रूपां सृष्टि स्थिति लयात्मिकम् ।
विश्वातीतां ज्ञान रूपां चिन्तयेद ऊर्ध्ववाहिनीम् ।
—षटचक्र निरूपणम्
स्वयंभू लिंग से लिपटी हुई कुण्डलिनी महाशक्ति का ध्यान श्यामा सूक्ष्मा सृष्टि
रूपा, विश्व को उत्पन्न और लय करने वाली, विश्वातीत, ज्ञान रूप ऊर्ध्ववाहिनी
के रूप में करें।
यह उभय लिंग एक कही स्थान पर प्रतिष्ठापित है। जननेन्द्रिय मूल—मूलाधार चक्र
में सूक्ष्म योनि गह्वर है। उसे ऋण विद्युत कह सकते हैं। उसी के बीचों बीच सहस्रार
चक्र का प्रतिनिधि एक छोटा सा उभार है जिसे ‘सुमेरु’ कहा जाता है। देवताओं का
निवास सुमेरु पर्वत पर माना गया है। समुद्र मंथन में इसी पर्वत का वर्णन आता
है। साड़े तीन चक्र लपटा हुआ शेष नाग इसी स्थान पर है। इस उभार केन्द्र को ‘काम
बीज’ भी कहा गया है। एक ही स्थान पर दोनों का संयोग होने से साधक का ‘आत्मरति’
प्रयोजन सहज ही पूरा हो जाता है। कुण्डलिनी साधना इस प्रकार आत्मा के उभय पक्षी
लिंगों का समन्वय सम्मिश्रण ही है। इसकी जब जागृति होती है तो रोम-रोम में अन्तःक्षेत्र
के प्रत्येक प्रसुप्त केन्द्र में हलचल मचती है और आनन्द उल्लास का प्रवाह बहने
लगता है। इस समन्वय केन्द्र—काम बीज का वर्णन इस प्रकार मिलता है—
योनि मध्ये महालिंगं पश्चिमा भिमुखस्थितम् ।
मस्तके मणिबद्बिम्बं यो जानाति स योगवित् ।।
—गोरक्ष पद्धति
त्रिकोणाकार योनि में सुषुम्ना द्वार के सम्मुख स्वयंभू नायक महालिंग है उसके
सिर में मणि के समान देदीप्यमान बिम्ब है यही कुण्डलिनी जीवाधार मोक्षद्धार है
इसे जो सम्यक् प्रकार से जानता है उसे योगविद् कहते हैं।
तप्तचामी कराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ।
त्रिकोणं तत्परं वह्नरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम् ।।
—गोरक्ष पद्धति
मेढ्र (लिंग स्थान) से नीचे मूलाधार कर्णिका में तपे हुए स्वर्ण के वर्ण के समान
वाला एवं बिजली के समान चमक-दमक वाला जो त्रिकोण है वही कालाग्नि का स्थान है।
पूर्वाक्ता डाकिनी तत्र कर्णिकायां त्रिकोणकम् ।
यन्मध्ये विवरं सूक्ष्मं रक्ताभं काम बीजकम् ।
तत्र स्वयंभु लिंग स्नाधो मुखारक्तक प्रभुमू ।
—शक्ति तंत्र
वहीं ब्रह्म डाकिनी शक्ति है। कर्णिका में त्रिकोण है। इसके मध्य में एक सूक्ष्म
विवर है। रक्त आभा वाला काम बीज स्वयंभू अधोमुख महालिंग यहीं है।
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ।
योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते ।।
आधाराख्ये गुदस्थाने पंकजं च चतुर्दलम् ।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनि; कामाख्या सिद्धवंदिता ।।
योनिमध्ये महालिंग पश्चिमाभि मुखस्थितम् ।
मस्तके मणिवद्बिम्बं यो जानाति स योगवित् ।।
तप्तचामीकराभासं तङिल्लेखेव विस्फुरत् ।
त्रिकोणं तत्पुरं वह्नरधो मेढ्रात्प्रतिष्ठितम् ।।
यत्समांधौ परं ज्योतिरनन्त विश्वतोमुखम् ।
तिस्मन् दृष्टे महायोगे यातानायान्न विन्दते ।।
—गोरक्ष पद्धति
मूलाधार और स्वाधियान इन दो चक्रों के बीच जो योनि स्थान है वही ‘काम रूप’ पीठ
है।
चौदह पंखुरियों वाले मूलाधार चक्र के मध्य में त्रिकोणाकार योनि है इसे ‘कामाख्या’
पीठ कहते हैं। यह सिद्धों द्वारा अभिवंदित है।
उस योनि के मध्य पश्चिम की ओर अभिमुख ‘महालिंग’ है। उसके मस्तक में मणि की तरह
प्रकाशवान बिम्ब है। जो इस तथ्य को जानता है वही योगविद् है।
लिंग स्थान से नीचे, मूलाधार कर्णिका में अवस्थित तपे सोने के समान आभा वाला
विद्युत जैसी चमक से युक्त जो त्रिकोण है उसी को ‘कालाग्नि’ कहते हैं।
इसी विश्वव्यापी परम ज्योति में तन्मय होने में महायोग की समाधि प्राप्त होती
है और जन्म-मरण से छुटकारा मिलता है।
तत्र बन्धूक पुष्पाभं कामबीजं प्रकीर्तितम् ।
कलहेमसमं योगे प्रयुक्ताक्षररूपिणम् ।।
सुषुम्णापि च संश्लिष्टो बीजं तत्र वरं स्थितम् ।
शरच्चंद्रनिभं तेजस्स्वयमेतत्स्फुरत्स्थितम् ।।
सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटि सुशीतलम् ।
एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी ।
बीजसंज्ञ पर तेजस्तदेव परिकीर्तितम् ।।
क्रियाविज्ञानशक्तिभ्यां युतं यत्परितो भ्रमत् ।
उत्तिष्टद्विशतस्त्वम्भ; सूक्ष्मं शोणशिखायुतम् ।
योनिस्थं तत्परं तेजः स्वमम्भूलिंगसंज्ञितम् ।।
—शिव संहिता
जिस स्थान पर कुण्डलिनी है उसी स्थान पर पुष्प के समान स्वर्ण आभा जैसा चमकता
हुआ रक्त वर्ण कामबीज है।
कुण्डलिनी, सुषुम्ना और काम बीज यह सूर्य चन्द्रमा की तरह प्रकाशवान हैं। इन
तीनों के मिलन को त्रिपुर भैरवी कहते हैं। इस तेजस्वी तत्व की ‘बीज’ संज्ञा है।
यह ‘बीज’ ज्ञान और क्रिया शक्ति से संयुक्त होकर शरीर में भ्रमण करता है और ऊर्ध्वगामी
होता है। इस परम तेजस्वी अग्नि का योनि स्थान है और उसे ‘स्वयंभू लिंग’ कहते
हैं।
क्रिया विज्ञान शक्त्भ्यिां युतं यत्परितो भ्रमत् ।
उक्तिष्ठ द्विशतस्त्वम्भ; सूक्ष्मं शोणशिखायुतम् ।
योनिस्थं तत्परं तेज; स्वयम्भू लिंग संज्ञितम् ।
—शिव संहिता
अर्थ—वह बीज क्रिया शक्ति एवं ज्ञान शक्ति से युक्त होकर शरीर में भ्रमण करता
है और कभी ऊर्ध्वगामी होता है और कभी जल में प्रवेश करता है और सूक्ष्म प्रज्वलित
अग्नि के समान शिखा युत परम तेज वीर्य की स्थिति योनि स्थान में है स्वयम्भू
लिंग संज्ञा है।
तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकीर्तितम् ।
कलहेम समं योगे प्रयुक्ताक्षर रूपिणम् ।
—शिव संहिता
अर्थ—जिस स्थान में कुण्डलिनी है उसी स्थान में बन्धूक पुष्प के समान रक्त वर्ण
काम बीज की स्थिति कही गई है। वह काम बीज तप्त स्वर्ण के समान स्वरूप योग युक्त
द्वारा चिन्तनीय है।
सुषुम्णापि च संश्लिष्टो वीजं तत्र परं स्थितम् ।
शरच्चंद्र तेजस्स्वयमेतत्स्फुरत्स्थितम् ।।
सूर्य कोटि प्रतीकाशं चंद्रकोटि सुशीतलम् ।
—शिव संहिता
अर्थ—जिस स्थान में कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्ना उसी स्थान में काम बीज के साथ
स्थित है और वह बीज शरच्चन्द्र के समान प्रकाशमान तेज है और वह आप ही कोटि सूर्य
के समान प्रकाश और कोटि चन्द्र के समान शीतल है।
स्थूल शरीर में नारी का प्रजनन द्रव ‘रज’ कहलाता है। नर का उत्पादक रस ‘वीर्य’
है। सूक्ष्म शरीर में इन दोनों की प्रचुर मात्रा एक ही शरीर में विद्यमान है।
उनके स्थान निर्धारित हैं। इन दोनों के पृथक रहने के कारण जीवन में कोई बड़ी
उपलब्धि नहीं होती, पर जब इनका संयोग होता है तो जीवन पुष्प का पराग मकरन्द परस्पर
मिलकर फलित होने लगता है और सफल जीवन की अगणित सम्भावनाएं प्रस्फुटित होती हैं।
एक ही शरीर में विद्यमान इन ‘उभय’ रसों का वर्णन साधना विज्ञानियों ने इस प्रकार
किया है—
योनिस्थाने महाक्षेत्रे जपा बन्धूकसन्निभम् ।।
रजो वर्सात जंतूनां देवीतत्वं समाहितम् ।।
रजसो रेतसो योगाद्राजयोग इति स्मृतः ।
—योग शिखोपविषद
योनि स्थान रूपी मूलाधार महाक्षेत्र में, जवा कुसुम के वर्ण का रज हर एक जीवधारी
के शरीर में रहता है। उसको ‘देवी तत्व’ कहते हैं। उस रज और वीर्य के योग से राजयोग
की प्राप्त होती है अर्थात् इन दोनों के योग का फल राजयोग है।
गुदा और उपस्थ के मध्य में सीवनी के ऊपर त्रिकोणाकृति गृह्य-गह्वर है, जिसको
‘योनि-स्थान’ कहते हैं।
गलितोपि यदा विन्दु; संप्रप्ति योनिमण्डले ।
ज्वलितोपि तथा विन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम् ।।
व्रजत्पूर्ध्व दृढ़ाच्छक्त्या निंबद्धो योनिभुद्रयो ।
स एव द्विविधो बिन्दु; पाण्डुरो लोहितस्तथा ।।
पाण्डुरं शुक्रभित्याहु र्लोहितारथं महाराजः ।
विद्रुमद्रुम संकारां योनिस्थाने स्थितं रजः ।।
शीशस्थाने बसेद्बिदुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम् ।
—ध्यान बिन्दु उपनिषद्
सहस्रार से क्षरित गलित होने पर जब वीर्य योनि स्थान पर ले जाया जाता है तो वहां
कुण्डलिनी अग्नि कुण्ड में गिरकर जलता हुआ वह वीर्य योनि मुद्रा के अभ्यास से
हठात् ऊपर चढ़ा लिया जाता है और प्रचण्ड तेज के रूप में परिणत होता है यही आध्यात्मिक
काम सेवन एवं गर्भ धारण है।
स पुनर्द्बिविधो बिन्दुः पाण्डुरो लोहितस्तथा ।
माण्डुरः शुक्रमित्या हुर्लोहिताख्यो महाराजः ।।
—गोरक्ष पद्धति
बिन्दु दो प्रकार का होता है—एक तो पाण्डु वर्ग जिसे शुक्र कहते हैं और दूसरा
(लोहित) रक्त वर्ण जिसे महारज कहते हैं।
सिन्दूरद्रव सकाश नाभिस्थाने स्थित रजः ।
शशिस्थाने स्थितो बिन्दुस्तयोरैक्यं सुदुर्लभम् ।।
—गोरक्ष पद्धति
तैलमिले सिन्दूर के द्रव (रस) के समान रज सूर्य स्थान नाभि मण्डल में रहता है
तथा बिन्दु (वीर्य) चन्द्रमा के स्थान कण्ठ देश षोडशाधर चक्र में स्थिर रहता
है। इन दोनों का ऐक्य अत्यन्त दुर्लभ है।
बिन्दः शिवो रंजः शक्तिश्चन्दो बिन्दु रजो रविः ।
अनयोः संगमादेव प्राप्यते परमं पद्म् ।।
—गोरक्ष पद्धति
विन्दु शिव रज शक्ति है। इनके एक होने से योग सिद्ध एवं परम पद प्राप्त होता
है। चन्द्रमा सूर्य का ऐक्य करना ही योग है।
वायुना शक्ति चारेण प्रेरित तु यदा रजः ।
याति बिन्दोः सहंकत्वं भावेद्दिव्यं वपुस्ततः ।।
—गोरक्ष पद्धति
शक्ति चालीनी विधि से वायु द्वारा जब रज-बिन्दु के साथ ऐक्य को प्राप्त होता
है तब शरीर दिव्य हो जाता है।
अपने शरीरस्था रज-वीर्य एकता सिद्धिदायक;
स बिन्दुस्त दजश्चैव एकीभूत स्वदेहगौ ।
वज्रोल्पभ्यास योगेन सर्वसिद्धि प्रयच्छतः ।।
—ह. योग प्रदीपिका
अपने देह स्थित रज व वीर्य वज्रोली के अभ्यास के योग से सब सिद्धियों को देने
वाले हो जाते हैं।
शारीरिक काम सेवन की तुलना में आत्मिक काम सेवन असंख्य आनन्ददायक है। शारीरिक
काम-क्रीड़ा को विषयानन्द और आत्मरति को ब्रह्मानन्द कहा गया है। विषयानन्द से
ब्रह्मानन्द का आनन्द और प्रतिफल कोटि गुना है। शारीरिक संयोग से शरीर धारी सन्तान
उत्पन्न होती है। आत्मिक संयोग प्रचण्ड आत्मबल और विशुद्ध विवेक को उत्पन्न करता
है। उमा, महेश विवाह के उपरांत दो पुत्र प्राप्त हुए थे। एक स्कन्द (आत्मबल)
दूसरा गणेश (प्रज्ञा प्रकाश) कुण्डलिनी साधक इन्हीं दोनों को अपने आत्म लोग में
जन्मा बढ़ा और परिपुष्ट हुआ देखता है।
स्थूल काम सेवन की ओर से विमुख होकर यह आत्म रति अधिक सफलतापूर्वक सम्पन्न हो
सकती है। इसलिये इस साधना में शारीरिक ब्रह्मचर्य की आवश्यकता प्रतिपादित की
गई है। और वासनात्मक मनोविचारों से बचने का निर्देश दिया गया है। शिवजी द्वारा
तृतीय नेत्र तत्व विवेक द्वारा स्थूल काम सेवन को भस्म करना—उसके सूक्ष्म शरीर
को अजर-अमर बनाना इसी तथ्य का अलंकारिक वर्णन है कि शारीरिक काम सेवन से विरत
होने की और आत्म रति में संलग्न होने की प्रेरणा है। काम दहन के पश्चात् उसकी
पत्नी रति की प्रार्थना पर शिवजी ने काम को अशरीरी रूप से जीवित रहने का वरदान
दिया था और रति को विधवा नहीं होने दिया था उसे आत्म रति बना दिया था। वासनात्मक
अग्नि का आह्य अग्नि-कालाग्नि के रूप में परिणत होने का प्रयोजन भी यही है—
भस्मीभूते स्मरे शंभुतृतीयनयनाग्निा ।
तस्मिन्प्रविष्टे जलधौ वद त्वं किमभूत्ततः ।।
—शिव पुराण
शिवजी के तृतीय नेत्र की प्रदीप्त अग्नि की ज्वाला से जब कामदेव भस्म हो गया
और वह अग्नि समुद्र में प्रवेश कर गई इसके पश्चात क्या हुआ?
तां च ज्ञात्वा तथाभूतां तृतीयेनेक्षणेन वै ।
ससर्ज कालीं कामारिः कालकंठी कपर्दिनाम् ।।
—लिंग पुराण
उस देवी को उस स्थिति में जानकर काम के गर्दन करने वाले शिव ने काल कण्ठी कपर्दिनी
का सृजन किया था।
कुण्डलिनी और काम विज्ञान
कुण्डलिनी विज्ञान में मूलाधार को यानि और सहस्रार को लिंग कहा गया है। यह सूक्ष्म
तत्वों की गहन चर्चा है। इस वर्णन में काम क्रीड़ा एवं शृंगारिकता का काव्यमय
वर्णन तो किया गया है, पर क्रिया प्रसंग में वैसा कुछ नहीं है। तन्त्र ग्रंथों
में उलट मांसियों की तरह मद्य, मांस, मीन, मुद्रा और पांचवा, ‘मैथुन’ भी साधना
प्रयोजनों में सम्मिलित किया गया है। यह दो मूल सत्ताओं के संभोग का संकेत है।
शारीरिक रति कर्म से इसका सम्बन्ध नहीं जोड़ा गया है। यों यह सूक्ष्म अध्यात्म
सिद्धान्त रति कर्म पर भी प्रयुक्त होते, दाम्पत्य स्थिति पर भी लागू होते हैं।
दोनों के मध्य समता की, आदान-प्रदान की स्थिति जितनी ही संतुलित होगी उतना ही
युग्म को अधिक सुखी, सन्तुष्ट समुन्नत पाया जायगा।
मूलाधार में कुण्डलिनी शक्ति शिव लिंग के साथ लिपटी हुई प्रसुप्त सर्पिणी की
तरह पड़ी रहती है। समुन्नत स्थिति में इसी मूल स्थिति का विकास हो जाता है। मूलाधार
मल मूत्र स्थानों के निष्कृष्ट स्थान से ऊंचा उठकर मस्तिष्क के सर्वोच्च स्थान
पर जा विराजता है। छोटा सा शिव लिंग मस्तिष्क में कैलाश पर्वत बन जाता है। छोटे
से कुण्ड को मान सरोवर रूप धारण करने का अवसर मिलता है। प्रसुप्त सर्पिणी जागृत
होकर शिव कंठ से जा लिपटती है और शेषनाग के पराक्रमी रूप में दृष्टिगोचर होती
है। मुंह बन्द कैली खिलती है और खिले हुए शतदल कमल के सहस्रार के रूप में उसका
विकास होता है। मूलाधार में तनिक सा स्थान था, पर ब्रह्मरंध्र का विस्तार तो
उससे सौ गुना अधिक है।
सहस्रार को स्वर्ग लोक का कल्पवृक्ष—प्रलय काल में बचा रहने वाला अक्षय वट—गीता
का ऊर्ध्व मूल अधःशाखा वाला अश्वत्य—भगवान् बुद्ध को महान बनाने वाला बोधि वृक्ष
कहा जा सकता है। यह समस्त उपमाएं ब्रह्मरंध्र में निवास करने वाले ब्रह्म बीज
की ही हैं। वह अविकसित स्थिति में मन बुद्धि के छोटे मोटे प्रयोजन पूरे करता
है, पर जब जागृत स्थिति में जा पहुंचता है तो सूर्य के समान दिव्य सत्ता सम्पन्न
बनता है। उसके प्रभाव से व्यक्ति और उसका सम्पर्क क्षेत्र दिव्य आलोक से भरा
पूरा बन जाता है।
ऊपर उठना पदार्थ और प्राणियों का धर्म है। ऊर्जा का ऊष्मा का स्वभाव ऊपर उठना
और आगे बढ़ना है। प्रगति का द्वार बन्द रहे तो कुण्डलिनी शक्ति कामुकता के छिद्रों
से रास्ता बनाती और पतनोन्मुख रहती है। किन्तु यदि ऊर्ध्वगमन का मार्ग मिल सके
तो उसका प्रभाव परिणाम प्रयत्न कर्त्ता को परम तेजस्वी बनने और अंधकार में प्रकाश
उत्पन्न कर सकने की क्षमता के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
कुण्डलिनी की प्रचण्ड क्षमता स्थूल शरीर में ओजस्-सूक्ष्म शरीर में तेजस और कारण
शरीर में वर्चस् के रूप में प्रकट एवं परिलक्षित होती है। समग्र तेजस्विता को
इन तीन भागों में दृष्टिगोचर होते देखा जा सकता इस अन्तःक्षमता का एक भोंड़ा
सा उभार और कार्य काम-वासना के रूप में देखा जा सकता है। कामुकता अपने सहयोगी
के प्रति कितना आकर्षण आत्म, भाव उत्पन्न करती है। संभोग कर्म में सरसता अनुभव
होती है। सन्तानोत्पादन जैसी आश्चर्यजनक उपलब्धि सामने आती है। यह एक छोटी-सी
इन्द्रिय पर इस अन्तःक्षमता का आवेश छा जाने पर उसका प्रभाव कितना अद्भुत होता
है यह आंख पसारकर हर दिशा में देखा जा सकता है। मनुष्य का चित्त, श्रम समय एवं
उपार्जन का अधिकांश भाग इसी उभार को तृप्त करने का ताना बाना बुनने में बीतता
है। उपभोग की प्रतिक्रिया सन्तानोत्पादन के उत्तरदायित्व निभाने के रूप में कितनी
महंगी और भारी पड़ती है यह प्रकट तथ्य किसी से छिपा नहीं है। यदि इसी सामर्थ्य
को ऊर्ध्वगामी बनाया जा सके तो उसका प्रभाव देवोपम परिस्थितियां सामने लाकर खड़ी
कर सकता है।
भौतिक दृष्टि से जननेन्द्रियों को काम वासना एवं रति प्रवृत्ति के लिए उत्तरदायी
माना जाता है। पर वैज्ञानिक गहन अन्वेषण से यह तथ्य सामने आता है कि नर-नारी
के प्रजनन केन्द्रों का सूत्र संचालन मेरुदण्ड के सुषुम्ना केन्द्र से होता है।
यह केन्द्र नाभि की सीध में है। हैनरी आस्ले कृत नोट्स आन फिजियोलॉजी, ग्रन्थ
में इस सन्दर्भ में विस्तृत प्रकाश डाला गया है। उसमें उल्लेख है कि—नर नारियों
के प्रजनन अंगों के संकोच एवं उत्तेजना का नियन्त्रण मेरुदंड के ‘लम्बर रीजन’
(निचले क्षेत्र) में स्थित केन्द्रों से होता है। इस दृष्टि से कामोत्तेजना के
प्रकटीकरण का उपकरण मात्र जननेन्द्रिय रह जाती है। उसका उद्गम तथा उद्भव केन्द्र
सुषुम्ना संस्थान में होने से वह कुन्डलिनी की ही एक लहर सिद्ध होती है। यह प्रवाह
जननेन्द्रिय की ओर उच्च केन्द्रों को मोड़ देने की प्रक्रिया ही इस महा शक्ति
की साधना के रूप में प्रयुक्त होती है।
नैपोलियन हिल ने अपनी पुस्तक ‘थिंक एन्ड ग्रो रिच’ में काम शक्ति के संबंध में
महत्व पूर्ण प्रकाश डाला है। वे सैक्स एनर्जी को मस्तिष्क और शरीर दोनों को समान
रूप से प्रभावित करने वाली एक विशेष शक्ति मानते हैं यह मनुष्य को प्रगति की
दिशा में बढ़ चलने के लिए प्रेरणा देती है।
सामान्यतया उसका उभार इन्द्रिय मनोरंजन मात्र बनकर समाप्त होता रहता है। जमीन
पर फैले हुए पानी की भाप भी ऐसे ही उड़ती और बिखरती भटकती रहती है, पर यदि उसका
विवेकपूर्ण उपयोग किया जा सके तो भाप द्वारा भोजन पकाने से लेकर रेल इंजन चलाने
जैसे असंख्यों उपयोगी काम लिये जा सकते हैं। काम शक्ति के उच्चस्तरीय सृजनात्मक
प्रयोजन अनेकों हैं। कलात्मक गतिविधियों में—काव्य जैसी कल्पना संवेदनाओं में—दया,
करुणा एवं उदार आत्मीयता को साकार बनाने वाली सेवा साधना में—एकाग्र तन्मयता
से सम्भव होने वाले शोध प्रयत्नों में प्रचंड पराक्रम के रूप में प्रकट होने
वाले शौर्य साहस में गहन आध्यात्मिक क्षेत्र से उद्भूत श्रद्धा भक्ति में उसे
नियोजित किया जा सकता है।
कामेच्छा एक आध्यात्मिक भूख है। वह मिटाई नहीं जा सकती। निरोध करने पर वह और
भी उग्र होती है। बहते हुए पानी को रोकने से वह धक्का मारने की नई सामर्थ्य उत्पन्न
करता है। आकाश में उड़ती हुई बन्दूक की गोली स्वयमेव शान्त होने की स्थिति तक
पहुंचने से पहले जहां भी रोगी जायगी वहीं आघात लगावेगी और छेद कर देगी। काम शक्ति
को बलपूर्वक रोकने से कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक उपद्रव खड़े होते हैं इस
तथ्य पर फ्रायड से लेकर आधुनिक मनोविज्ञानियों तक ने अपने-अपने ढंग से प्रकाश
डाला है और उसे सृजनात्मक प्रयोजनों में नियोजित करने का परामर्श दिया है। एक
ओर से मन हटकर दूसरी ओर चला जाय। एक का महत्व गिरा कर दूसरे की गरिमा पर विश्वास
कर लिया जाय, आकांक्षा एवं अभिरुचि का प्रवाह मोड़ने में विशेष कठिनाई उत्पन्न
नहीं होती। ब्रह्मचर्य का वैज्ञानिक स्वरूप यही है। अतृप्ति-जन्य अशान्ति से
बचने तथा क्षमता का सदुपयोग करके सत्परिणामों का लाभ लेने का एक ही उपाय है कि
कामेच्छा प्रवृत्ति को सृजनात्मक दिशा में मोड़ा जाय।
कलात्मक प्रयोजनों में संलग्न होने से उसके भौतिक लाभ मिल सकते हैं। अध्यात्म
क्षेत्र में उसे भाव संवेदना के लिए भक्ति भावना के रूप में तथा प्रबल पुरुषार्थ
की तरह तपोमयी योग साधना में लगाया जा सकता है। दोनों का समन्वय कुण्डलिनी जागरण
प्रक्रिया में समन्वित पद्धति के रूप में किया जा सकता है। सहस्रार चक्र भक्ति
भावना का और मूलाधार चक्र प्राण संधान का केन्द्र है। दोनों की प्रसुप्त स्थिति
को समाप्त कर साहसिक संवेदना उभारना कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया अपनाने से सहज
सम्भव हो सकता है।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह जीवन के चार परम प्रयोजन हैं।काम का अर्थ सामान्यतया
रति कर्म समझा जाता है, पर परम प्रयोजनों में उसका अर्थ विनोद, उल्लास, आनन्द
माना जाता है। यह रसानुभूति दो पूरक तत्त्वों के मिलन द्वारा उपलब्ध होती है।
ऋण और धन विद्युत प्रवाह मिलने से गति उत्पन्न होती है। रयि और प्राण तत्व के
मिलन से सृष्टि के प्राणि उत्पादनों की सृष्टि होती है। प्रकृति पुरुष की तरह
नर और नारी को भी परस्पर पूरक माना गया है। मानवी सत्ता में भी दो पूरक सत्ताएं
काम करती है इन्हें नर और नारी का प्रतिनिधि मानते हैं। नारी सत्ता मूलाधार में
अवस्थित कुण्डलिनी है और नर तत्व सहस्रार परब्रह्म है। इन्हीं को शक्ति और शिव
भी कहते हैं। इनका मिलन ही कुण्डलिनी जागरण का लक्ष्य है। इस संयोग से उत्पन्न
दिव्य धारा को भौतिक क्षेत्र में ऋद्धि-सिद्धि और आत्मिक क्षेत्र में स्वर्ग
मुक्ति कहते हैं। आत्म साक्षात्कार एवं ब्रह्म निर्माण का लक्ष्य भी यही है।
अथर्व वेद में भगवान के काम रूप से जीवन में अवतरित होने की प्रार्थना की गई
है।
यास्ते शिवास्तन्वः काम भद्रायाभिः सत्यं भवति यद्वृणीषे ताभिष्ट्वमस्मां अभि
संविशस्वान्यत्रपापी रपवेशया धियः ।
—अथर्व
हे परमेश्वर तेरा काम रूप भी श्रेष्ठ और कल्याण कारक है उसका चयन असत्य नहीं
है। आप काम रूप से हमारे भीतर प्रवेश करें और पाप बुद्धि से छुड़ाकर हमें निष्पाप
उल्लास की ओर ले चलें।
कुण्डलिनी महा शक्ति की प्रकृति का निरूपण करते हुए शास्त्रकारों ने उसे ‘काम
बीज’ एवं ‘काम-कला’ दोनों शब्दों का प्रयोग किया है। इन शब्दों का अर्थ कामुकता
काम-क्रीड़ा या काम शास्त्र जैसा तुच्छ अर्थ यहां नहीं लिया गया है। इस शक्ति
को प्रकृति उत्साह एवं उल्लास उत्पन्न करना है। यह शरीर और मन की उभय-पक्षीय
अग्रगामी स्फुरणाएं है। यह एक मूल प्रकृति हुई। दूसरी पूरक प्रकृति। मूलाधार
को काम बीज कहा गया है और सहस्रार को ‘ज्ञान बीज’। दोनों के समन्वय से विवेक
युक्त क्रिया बनती है। इसी पर जीवन का सर्वतोमुखी विकास निर्भर है। कुण्डलिनी
साधना से इसी सुयोग संयोग की व्यवस्था बनाई जाती है।
प्रत्येक शरीर में नर और मादा दोनों ही तत्व विद्यमान हैं। शरीर शास्त्रियों
के अनुसार प्रत्येक प्राणी में उभय-पक्षीय सत्ताएं मौजूद हैं। इनमें से जो उभरी
रहती हैं उसी के अनुसार लिंग प्रकृति बनती है। संकल्प पूर्वक इस प्रकृति को बदला
भी जा सकता है। छोटे प्राणियों में उभय लिंगी क्षमता रहती है। वह एक ही शरीर
से समयानुसार दोनों प्रकार की आवश्यकताएं पूरी कर लेते हैं।
मनुष्यों में ऐसे कितने ही पाये जाते हैं जिनकी आकृति जिस वर्ग की है, प्रकृति
उससे भिन्न वर्ग की होती है। नर को नारी की और नारी को नर की भूमिका निवाहते
हुए बहुत बार देखा जाता है। इसके अतिरिक्त लिंग परिवर्तन की घटनाएं भी होती रहती
हैं। शल्य क्रिया के विकास के साथ-साथ अब इस प्रकार के उलट-पुलट होने के समाचार
संसार के कोने-कोने से मिलते रहते हैं। अमुक नर नारी बन गया और अमुक नारी ने
नर के रूप में अपना गृहस्थ नये ढंग से चलाना आरम्भ कर दिया।
दोनों में एक तत्व प्रधान रहने से ढर्रा तो चलता रहता है, पर एकांगी पन बना रहता
है। नारी कोमलता, सहृदयता, कलाकारिता जैसे भावनात्मक तत्व का नर में जितना अभाव
होगा उतना ही वह कठोर, निष्ठुर, रहेगा और अपनी बलिष्ठता, मनस्विता के पक्ष के
सहारे क्रूर, कर्कश बन कर अपने और दूसरों के लिए अशान्ति ही उत्पन्न करता रहेगा।
नारी में पौरुष का अभाव रहा तो वह आत्म हीनता से ग्रसित अनावश्यक संकोच में डूबी,
कठ-पुतली या गुड़िया बनकर रह जायगी। आवश्यकता इस बात की है कि दोनों ही पक्षों
में सन्तुलित मात्रा में रयि और प्राण के तत्व-बने रहें। कोई पूर्णतः एकांगी
बनकर न रह जाय। जिस प्रकार बाह्य जीवन में नर-नारी सहयोग की आवश्यकता रहती है
उसी प्रकार अन्तःक्षेत्र में भी दोनों तत्वों का समुचित विकास होना चाहिए। तभी
एक पूर्ण व्यक्तित्व का विकास सम्भव हो सकेगा। कुण्डलिनी जागरण से उभयपक्षीय
विकास की पृष्ठभूमि बनती है।
मूलाधार चक्र में काम शक्ति को स्फूर्ति, उमंग एवं सरसता का स्थान माना गया है।
इसलिये उसे काम संस्थान कहते हैं। जहां-तहां उसे योनि संज्ञा भी दी गई है। नामकरण
जननेंद्रिय के आधार के आधार पर नहीं उस केन्द्र में सन्निहित ‘रयि’ शक्ति को
ध्यान में रखकर किया गया है।
आधाराख्ये गुदास्थाने पंकजं च चतुर्दलम् ।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवंदिता ।।
—गोरक्ष पद्धति
गुदा के समीप मूलाधार कमल के मध्य ‘योनि’ है। उसे कामाख्या पीठ कहते हैं। सिद्ध
योगी इसकी उपासना करते हैं।
अपाने मूल कन्दाख्यं काम रूपं च तज्जगुः ।
तदेव वह्नि कुण्डंस्यात् तत्व कुण्डलिनी तथा ।।
—योग राजोपनिषद्
मूलाधार चक्र में कछन हैं। उसे काम रूप—काम बीज—अग्नि कुण्ड कहते हैं। यही कुण्डलिनी
का स्थान है।
देवी ह्येकाऽग्रासीत् । सैव जगदण्डमसृजत ।
कामकलेति विज्ञायते श्रृंङ्गारकलेति विज्ञायते ।
—बृहवृचोपनिषद् 1
उसी दिव्य शक्ति से यह जगत् मंडल सृजा। वह उस सृजन से पूर्व भी थी वही काम कला
है। सौन्दर्य कला भी उसी को कहते हैं।
यत्तद्गुह्यमिति प्रोक्तं देवयोनिस्तु सोच्यते ।
अस्यां यो जायते वह्निः स कल्याण प्रदुच्यते ।।
—कात्यायन स्मृति
गुह्य स्थान में देव यानि है। उससे जो अग्नि उत्पन्न होती है उसे परम कल्याणकारिणी
समझना चाहिए।
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ।
योनि स्थानं द्वयोर्मध्ये काम रूप निगद्यते ।।
—गोरथ पद्धति
पहला चक्र मूलाधार है दूसरा स्वाधिष्ठान। दोनों के मध्य योनि स्थान है। उसे काम
रूप भी कहते हैं।
कामी कलां काम रूपां चिक्रित्वा नरो जायते काम रूपश्चकामः ।
—त्रिपुरोप निषद्
यह महाशक्ति काम रूप है। उसे काम कला भी कहते हैं। जो उसकी उपासना करता है सो
काम रूप हो जाता है। उसकी कामनाएं फलवती होती हैं।
सहस्रार को कुण्डलिनी विज्ञान में महालिंग की संज्ञा दी गई है। यहां भी जननेन्द्रिय
आकार की नहीं, वरन् उसे केन्द्र में सन्निहित प्राण पौरुष का ही संकेत है।
तत्रस्थितो महालिंग स्वयं भुः सर्वदा सुखी
अधोमुखः क्रियावांक्ष्य कामं बीजो न चलितः
—काली कुलामृत
ब्रह्मरंध्र में वह महालिंग अवस्थित है। वह स्वयंभू और सुख स्वरूप है। इसका मुख
नीचे की ओर है। वह निरन्तर क्रियाशील है। काम बीज द्वारा उत्तेजित होता है।
स्वयंभु लिंग तन्मध्ये संरंध्र पश्चिमावलम् ।
ध्यायेश्च परमेशक्ति शिवं श्यामल सुन्दरम् ।।
—शाक्तानन्द तरंगिणी
ब्रह्म रंध्र के मध्य स्वयंभु महालिंग है। इसका मुख नीचे की ओर है। वह श्यामल
और सुन्दर है। उसका ध्यान करें।
काम बीज और ज्ञान बीज के मिलने से जो आनन्दमयी परम कल्याणकारी भूमिका बनती है
उसमें मूलाधार और सहस्रार का मिलन संयोग ही आधार माना गया है। इसी मिलाप को साधना
की सिद्धि कहा गया है। इस स्थिति को दिव्य मैथुन की संज्ञा भी दी गई है।
सहस्रारो परिविन्दौ कुण्डल्या मेलनं शिवे ।
मैथुनं शयनं दिव्यं यतीनां परिकीर्तितम् ।।
—योगिनी तन्त्र
पार्वती, सपस्रार में जो कुल और कुण्डलिनी का मिलन होता है, उसी को यतियों ने
दिव्य मैथुन कहा है।
पर शक्त्यात्म मिथुन संयोगानंद निर्गराः ।
मुक्तात्म मिथुनंतत् स्त्यादितर स्त्री निवेषकाः ।
—तन्त्र सार
आत्मा को—परमात्मा को प्रगाढ़ आलिंगन में आबद्ध करके परम रस का आस्वादन करना
यही यतियों का मैथुन है।
सुषम्नाशक्ति सुदृष्टा जीवोऽयं तु परः शिवः ।
तयोस्तु संगमें देवैः सुरतं नाम कीर्तितम् ।।
—तन्त्र सार
सुषुम्ना शक्ति और ब्रह्मरंध्र शिव है। दोनों के समागम को मैथुन कहते हैं।
यह संयोग आत्मा और परमात्मा के मिलन एकाकार की स्थिति भी उत्पन्न करता है। जीव
को योनि और ब्रह्म को वीर्य संज्ञा देकर उनका संयोग भी परमानन्ददायक कहा गया
है—
एष वीजी भवान् बीज महं योनिः सनातनः ।
—वायु पुराण
जीव ने ब्रह्म से कहा—आप बीज हैं। मैं योनि हूं। यही क्रम सनातन से चला आ रहा
है।
शिव और शक्ति के संयोग का रूपक भी इस सन्दर्भ में दिया जाता है। शक्ति को रज
और शिव को बिन्दु की उपमा दी गई है। दोनों के मिलन के महत्वपूर्ण सत्परिणाम बनाये
गये हैं।
विन्दुः शिवौ रजः शक्ति श्चन्द्रोविन्दु रजोरविः ।
अनयोः संगमा देव प्राप्यते परमं पद्म् ।।
—गोरक्ष पद्धति
बिन्दु शिव और रज शक्ति। यही सूर्य, चन्द्र हैं। इनका संयोग होने पर परम पद प्राप्त
होता है।
बिन्दुः शिवो रजः शक्तिरुभयोर्मिलनात् स्वयम् ।
—शिव संहिता 1।100
बिन्दु शिव रूप और रज शक्ति रूप है। दोनों का मिलन स्वयं महाशक्ति का सृजन है।
योनि वेदी उमादेवी लिंग पीठ महेशवर ।
—लिंग पुराण
योनि वेदी उमा है और लिंग पीठ महेश्वर।
जातवेदाः स्वयं रुद्रः स्वाहा शर्वार्धकायिनी ।
पुरुषाख्यो मनुः शंभुः शतरूपा शिवप्रिया ।।
—लिंग पुराण
जातवेदा अग्नि स्वयं रुद्र है और स्वाहा अग्नि वे महाशक्ति हैं। उत्पादक परम
पुरुष शिव है और श्रेष्ठ उत्पादनकर्त्री शतरूपा एवं शिवा है।
अहं बिन्दु रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा ।
शिव संहिता 4।87
शिव रूपी बिन्दु, शक्ति रूपी रज इन दोनों का मिलन होने से योग साधक को दिव्यता
प्राप्त होती है।
ब्रह्म का प्रत्यक्ष रूप प्रकृति और अप्रत्यक्ष भाग पुरुष है। दोनों के मिलने
से ही द्वैत का अद्वैत में विलय होता है। शरीरगत दो चेतन धाराएं रयि और प्राण
कहलाती है। इनके मिलन संयोग से सामान्य प्राणियों को उस विषयानन्द की प्राप्ति
होती है जिसे प्रत्यक्ष जगत की सर्वोपरि सुखद अनुभूति कहा जाता है। ऋण और धन
विद्युत घटकों के मिलन से चिनगारियां निकलती और शक्ति धारा बहती है। पूरक घटकों
की दूरी समाप्त होने पर सरसता और सशक्तता की अनुभूति प्रायः होती रहती है। चेतना
के उच्चस्तरीय घटक मूलाधार और सहस्रार के रूप में विलग पड़े रहें तभी तक अन्धकार
की—नीरस गति हीनता की स्थिति रहेगी। मिलन का प्रतिफल सम्पदाओं और विभूतियों के—ऋद्धि
और सिद्धि के रूप में सहज ही देखा जा सकता है। इन उपलब्धियों की अनुभूति में
आत्मा-परमात्मा का मिलन होता है और उसकी सम्वेदना ब्रह्मानन्द के रूप में होती
है, इस आनन्द को विषयानन्द से असंख्य गुने उच्चस्तर का माना गया है।
शिव पार्वती विवाह का प्रतिफल दो पुत्रों के रूप में उपस्थित हुआ था। एक का नाम
गणेश, दूसरे का कार्तिकेय। गणेश को ‘प्रज्ञा’ का देवता माना गया है और स्कन्द
को शक्ति का। दुर्दान्त, दस्यु, असुरों को निरस्त करने के लिए कार्तिकेय का अवतरण
हुआ था। उनके इस पराक्रम ने संत्रस्त देव समाज का परित्राण किया। गणेश ने मांस
पिंड मनुष्य को सद्ज्ञान, अनुदान देकर उसे सृष्टि का मुकट-मणि बनाया। दोनों ब्रह्मकुमार
शिव शक्ति के—समन्वय के प्रतिफल हैं। शक्ति कुण्डलिनी—शिव सहस्रार दोनों का संयोग
कुण्डलिनी जागरण कहलाता है। यह पुण्य-प्रक्रिया सम्पन्न होने पर अन्तरंग ऋतम्भरा
प्रज्ञा से और बहिरंग प्रखरता से भर जाता है। प्रगति के पथ पर इन्हीं दो चरणों
के सहारे जीवन यात्रा पूरी होती है और चरम लक्ष्य की पूर्ति सम्भव बनती है।
गणेश जन्म के समय शिवजी ने उनका परिचय पार्वती को कराया और उसे उन्हीं हाथों
में सौंप दिया। इसका विवरण वामन पुराण में इस प्रकार आया है—
यस्माज्जातंस्ततो नाम्ना भविष्यति विनायकः ।
एषं विघ्नसहस्राणि देवादीनां हनिष्यति ।।
पूजयिष्यन्ति देवाश्च देवि लोकाश्चराचराः ।
इत्येवमुक्त्वा देव्यास्तु दत्तवास्तनयं स हि ।।
—वामन पुराण
इस पुत्र ज्ञान पुत्र का नाम विनायक गणेश ही होगा यह देवों के सहस्रों विघ्नों
का हनन करेगा। हे देवि? सब चर-अचर लोग और देवगण इसकी पूजा करेंगे। इतना कह कर
शिव ने वह पुत्र देवी को दें दिया था।
स्कन्दोऽथवदनाद्वह्रनेः शुभ्रात्षड्वदनोऽरिहा ।
निश्चक्रामोद्भुतो बालो रोग शोक विनाशनः ।।
—पद्म पुराण
तब छह मुख वाले कुमार स्कन्द उत्पन्न हुए। वे अद्भुत और शोक-सन्ताप विनाशक थे।
आद्य शङ्कराचार्य कृत ‘सौन्दर्य लहरी’ में षट्चक्रों एवं सातवें सहस्रार का वर्णन
है और उस परिकर को कुंडलिनी क्षेत्र बताया है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर,
अनाहत और विशुद्ध चक्रों को पांच तत्वों का प्रतीक माना है और आज्ञाचक्र तथा
सहस्रार को ब्रह्म चेतना का प्रतिनिधि बताया है। पांच तत्वों का वेधन करने पर
किस प्रकार कुण्डलिनी शक्ति का पहुंच ब्रह्मलोक तक होती है और परब्रह्म के साथ
‘विहार’ करती है इसका वर्णन 9 वें श्लोक में इस प्रकार है—
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं,
स्थितं स्वधिष्ठाने हृदि मरुत माकाशमुपरि ।
मनोअपि भ्रू मध्ये सकलमपिभित्वा कुल पथं,
सहस्रारे पद्ये सहरहसि पत्या विहरसि ।।
अर्थात्—हे कुण्डलिनी, तुम मूलाधार में पृथ्वी को, स्वाधिष्ठान में अग्नि को,
मणिपूर में जल को, अनाहत में वायु को, विशुद्ध में आकाश को वेधन करती हुई आज्ञाचक्र
में मन को प्रकाश देती हो, तदुपरान्त सहस्रार कमल में परब्रह्म के साथ विहार
करती हो।
अवाप्य स्वां भूमि, भुजगनिभमध्युष्ट वलयं ।
स्वमात्मानं कृत्वा, स्वपिषि कुल कुण्डे कुहरिणि ।
—सौन्दर्य लहरी 10
सर्पिणी की तरह कुण्डली मार कर तुम्हीं मूलाधार चक्र के ‘कुल कुण्ड’ में शयन
करती हो।
अविद्या नामत्त, स्तिमिरमिहिरोद्दीपन करी ।
जडानां चैतन्य, स्तवक मकरन्द स्रुति शिरा ।।
दरिद्राणां चिन्ता, मणि गुणनिका जन्य जलधौ ।
निम्नग्नां दष्ट्रा, मुररि पुवराहस्य भवती ।।
—सौन्दर्य लहरी
अज्ञानियों के अन्धकार का नाश करने के लिए तुम सूर्य रूप हो, तुम्हीं बुद्धि
हीनों में चैतन्यता का अमृत बहाने वाली निर्झरिणी हो, तुम दरिद्री के लिए चिन्तामणि
माला और भव-सागर में डूबने वालों का सहारा देने वाली नाव हो, दुष्टों के संहार
करने में तुम वाराह भगवान् के पैने दांतों जैसी हो।
सौन्दर्य लहरी के 36 से 41 वें श्लोकों में षट्चक्रों के जागरण और कुण्डलिनी
उत्थान की प्रतिक्रिया का वर्णन है। इन श्लोकों में कहा गया है कि मूलाधार में
‘विश्व वैभव-स्वाधिष्ठान में ‘शान्ति शीतलता’ मणिपूर में ‘अमृत वर्षा’—अनाहत
में ‘ऋतम्भरा प्रज्ञा और अठारहों विद्या’—विशुद्ध में ‘आनन्ददायिनी दिव्य-ज्योति’
की सिद्धियां भरी हैं। आज्ञाचक्र में शिवत्व और सहस्रार में महामिलन का संकेत
है। इन उपलब्धियों का समन्वय इतना महान् है। जिसे ऋषित्व एवं देवत्व भी कहा जा
सकता है। अपूर्णता से आगे चलकर पूर्णता प्राप्त कर सकना इसी मार्ग का आश्रय लेने
से सम्भव होने की बात इन श्लोकों में कही गई है।
कुण्डलिनी महाशक्ति के अनुग्रह से स्वयं आद्य शंकराचार्य किस प्रकार सामान्य
द्रविड़ बालक से महामानव बन सके इसका उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वानुभूति इस
प्रकार व्यक्त की है—
तवस्तन्यं मन्ये धरणि धरन्ये हृदयतः ।
पथः पारावारः परिवहतिं सारस्वतमिव ।
दयावत्या दत्तं द्रविड शिशुरास्वाद्यं तवयत् ।
कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ।।
—सौन्दर्य लहरी
तेरे स्तनों से बहने वाले ज्ञानामृत रूपी पय-पान करके यह द्रविण शिशु (शंकराचार्य)
प्रौढ़ कवियों जैसी कमनीय काव्य रचना में समर्थ हो गया।
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अखंड आनंद की प्राप्ति
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सांसारिक भोगों में एक विचित्र आकर्षण होता है। यही कारण है वे मनुष्य को सहज
ही अपनी ओर खींच लेते हैं। किन्तु इससे भी अद्भुत बात यह है कि यह जितनी ही अधिक
मात्रा में प्राप्त होते जाते हैं, मनुष्य का आकर्षण उतना ही उनकी ओर बढ़ता जाता
है और शीघ्र ही वह दिन आ जाता है, जब मनुष्य इनमें आकण्ठ डूबकर नष्ट हो जाता
है। सांसारिक भोगों की ओर अशक्त की भांति विवश होकर खिंचते रहना ठीक नहीं। मनुष्य
को अपना स्वामी होना चाहिये, इस प्रकार यन्त्रवत् प्रवृत्तियों के संकेत पर परिचालित
होते रहना चाहिये। संयम मनुष्य की शोभा ही नहीं शक्ति भी है। अपनी इस शक्ति को
काम में लाकर, विनाशकारी भोगों के चंगुल से उसे अपनी रक्षा करनी ही चाहिये। मनुष्य
जीवन अनुपम उपलब्धि है। इस प्रकार सस्ते रूप में उसका ह्रास कर डालना न उचित
है और न कल्याणकारी।
यह निर्विवाद सत्य है कि भोगों की अधिकता मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक
तीनों प्रकार की शक्तियों का ह्रास कर देती है। भोग जिनमें भ्रमवश मनुष्य आनन्द
की कल्पना करता है, वास्तव में विष रूपी ही होते हैं। यह रोग युवावस्था में ही
अधिक लगता है। यद्यपि उठती आयु में शारीरिक शक्तियों का बाहुल्य होता है, साथ
ही कुछ न कुछ जीवन-तत्व का नव निर्माण होता रहता है इसलिये उस समय उसका कुप्रभाव
शीघ्र दृष्टिगोचर नहीं होता। किन्तु अवस्था का उत्थान रुकते ही इसके कुपरिणाम
सामने आने लगते हैं। लोग अकाल में वृद्ध हो जाते हैं। नाना प्रकार की कमजोरियों
और व्याधियों के शिकार बन जाते हैं। चालीस तक पहुंचते-पहुंचते सहारा खोजने लगते
हैं, इन्द्रियां शिथिल हो जाती हैं और जीवन एक भार बन जाता है। शरीर का तत्व
वीर्य, जो कि मनुष्य की शक्ति और वास्तविक जीवन कहा गया है, अपव्यय हो जाता है।
जिससे सारा शरीर एकदम खोखला हो जाता है।
ईसामसीह जीवन भर ब्रह्मचारी रहे। साथ ही वहां भी अच्छे-अच्छे तथा बुद्धिजीवी
लोग अधिकतर संयमी जीवन ही बिताने की चेष्टा किया करते हैं। वैज्ञानिक, दार्शनिक,
विचारक, सुधारक तथा ऐसी ही उच्च चेतना वाले लोग संयम का ही जीवन जीते दृष्टिगोचर
होते हैं।
गृहस्थ आश्रम में सन्तानोत्पादन का बहाना लेकर भोगपूर्ण जीवन बिताने वाले गृहस्थाश्रम
का सही मन्तव्य नहीं समझते। सृष्टि क्रम को स्थिर रखने के लिये दाम्पत्य जीवन
की अनिवार्यता स्वीकार अवश्य की गई है। तथापि उसमें भी संयम का महत्व कम नहीं
किया गया है। धर्म कर्त्तव्य के रूप में सन्तान-सृजन और बात है और कामुकता के
वशीभूत होकर दाम्पत्य जीवन को भोग का माध्यम बना डालना भिन्न बात है। उस प्रकार
के आचरण को संसार के सभी विद्वान् तथा विवेकशील व्यक्तियों ने अनुचित तथा मानव-जीवन
को नष्ट करने वाला बतलाया है। वेद भगवान् ने तो यहां तक कहा है कि ‘ब्रह्मचर्येण
तपसा देवा म मुमुपाध्रंत’ ब्रह्मचर्य के प्रभाव से मनुष्य बलवान तथा शक्तिवान
ही नहीं बनता वरन् मृत्यु तक को जीत सकता है।
ब्रह्मचर्य की महिमा बतलाते हुए छान्दोग्योपनिषद् में तो यहां तक कहा गया है—‘‘एक
तरफ चारों वेदों का उपदेश और दूसरी तरफ ब्रह्मचर्य—यदि दोनों को तोला जाये तो
ब्रह्मचर्य का पलड़ा वेदों के उपदेश के पलड़े के बराबर रहता है’’
विषयों का निषेध करते हुये भगवान् ने गीता में स्पष्ट कहा है—
‘‘ये हि सं स्पर्शजा भोगा दुःखयोनय; एव ते ।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ।।’’
जो इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब सुख हैं, यद्यपि वे
विषयी पुरुष को सुख रूप प्रतीत होते हैं, किन्तु, वास्तव में होते वे दुःख के
ही हेतु हैं और नाशवान भी। इसलिये हे कुन्ती पुत्र अर्जुन? बुद्धिमान् व्यक्ति
उनमें आसक्त और लिप्त नहीं होते।
न केवल धर्म-शास्त्रों में ही, अपितु लौकिक शास्त्रों में भी ब्रह्मचर्य की महिमा
का बखान किया गया है। आयुर्वेद सम्बन्धी ग्रन्थ चरक संहिता में कहा गया है
‘‘सतामुपासनं सम्यगसतां परिवर्जनम् ।
ब्रह्मचर्योपवासश्च नियमाश्च पृथग्विधाः’’
सज्जनों की सेवा, दुर्जनों का त्याग, ब्रह्मचर्य, उपवास, धर्म शास्त्र के नियमों
का ज्ञान और अभ्यास आत्म-कल्याण का मार्ग है।
यही नहीं कि भारतीय मनीषियों ने ही जीवन में ब्रह्मचर्य संयम का गुण गाया हो,
विदेशी विचारकों ने भी इसकी कम प्रशंसा नहीं की है प्रसिद्ध जीवशास्त्री डा.
क्राउन एम.डी. ने लिखा है
‘‘ब्रह्मचारी यह नहीं जानता कि व्याधि-ग्रस्त दिन कैसा होता है। उसकी पाचन-शक्ति
सदा नियंत्रित रहती है और उसको वृद्धावस्था में भी बाल्यावस्था जैसा आनंद आता
है।’’
‘‘अमेरिका के प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक डा. बेनीडिक्ट लूस्टा का कथन है ‘‘जितने
अंशों तक जो मनुष्य ब्रह्मचर्य की विशेष रूप से रक्षा करता है, उतने आंशों तक
वह विशेष महत्व का कार्य कर सकता है।’’
‘‘सिद्ध सन्त स्वामी रामतीर्थ और योगी अरविन्द ने वीर्य का वैज्ञानिक महत्व प्रकट
करते हुये, अपने अनुभव इस प्रकार व्यक्त किये हैं ‘‘जैसे दीपक का तेल बत्ती के
द्वारा ऊपर चढ़कर प्रकाश के रूप में परिणित होता है, वैसे ही ब्रह्मचारी के अन्दर
का वीर्य सुषुम्ना नाड़ी द्वारा प्राण बनकर ऊपर चढ़ता हुआ ज्ञान दीप्ति में परिणित
हो जाता है रेनस (वीर्य) का जो तत्व रति करने के समय काम में लगता है, जितेन्द्रिय
होने से वह तत्व, प्राण, मन और शरीर की शक्तियों को पोषण देने वाले एक महत्व
के दूसरे तत्व में बदल जाता है। इस तरह आयों का आदर्श रेतस का ओजस में रूपान्तर
होने के फलस्वरूप उसकी ऊर्ध्वगति करने का आदर्श सर्वोच्च है।’’
अपने पिता आशुतोष शिवजी को प्रसन्न चित जानकर कुमार सम्भव ने उनके पास जाकर पूछा
तात? आपने जिस प्रकार दुर्लभ साधनायें की वैसा साहस किसी में हो और वह सिद्धियों
का स्वामित्व तथा ब्रह्म को प्राप्त करना चाहता हो तो उसे क्या करना चाहिए वह
सरल उपाय आप हमें बताने की कृपा करें। लोक कल्याण की इच्छा रखने वाले भगवान्
शंकर ने बताया—
सिद्धे बिन्दु महायत्ने किं न सिद्धयति भूतले ।
यस्य प्रसादान्महिमा, ममाप्येतादृशो भवेत ।।
वत्स? उसका एक उपाय है अखण्ड ब्रह्मचर्य अर्थात् ‘‘जिसने यत्न पूर्वक अपने वीर्य
को सिद्ध कर लिया है उसके लिये इस पृथ्वी में कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता सिद्ध
वीर्य पुरुष तो मेरे समान समर्थ हो सकता है।
वीर्य तत्व के बारे में इन पंक्तियों में जो कुछ कहा गया है उसकी यथार्थता का
अनुमान तो ब्रह्मचर्य-व्रती जीवन बिताकर ही किया जा सकता है पर अब उसकी यथार्थता
वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं और कहते हैं कि वीर्य-कीट जिस सुरक्षित घोल में रखे
जाते हैं उसी से अनुमान किया जा सकता है कि सृष्टि का कितना महत्वपूर्ण तत्व
है। वीर्य एक प्रकार का रसायन है। वीर्य कीट उसमें रहने वाले जीवाणु होते हैं।
तरल पदार्थ 75 प्रतिशत जल 5 प्रतिशत फास्फेट आफ लाइम, 4 प्रतिशत चिनाई, 3 प्रतिशत
प्रोटीन ऑक्साइड शेष भाग फास्फेट, फास्फोरस, सोडियम क्लोराइड आदि पदार्थ होते
हैं। पुरुष के शुक्र कीट (पर्म) तथा स्त्री के डिम्ब (ओवम) का उत्पादन पुरुष
के अण्ड तथा स्त्री के अण्डाशय में होता है। यहां से एक प्रकार का रस जो कि वीर्य
रसायन का एक प्रकार का ‘‘प्लाज्मा’’ होता है जो सारी शरीर में ओज और तेजस की
भांति छाया रहता है। यह तेजस ही परसार आकर्षण का कारण होता है। जिस शरीर में
वीर्य की प्रचुर मात्रा होती है वह काले कुबड़े होने पर भी आकर्षक लगते हैं।
कहते हैं अष्टावक्र जो शरीर में आठ स्थानों से टेढ़ा था ने अपनी संयम शक्ति द्वारा
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पेज मिसिंग - 31, 32
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सुरक्षा पर ध्यान रखा जाता था इससे उसकी विचार क्षमता ऊर्ध्वमुखी बनी रहती थी।
ऊर्ध्वरेता चिन्तन ही जीवन के यथार्थ लक्ष्य और ब्रह्म की विराटता की अनुभूति
कर सकता है।
11 से 16 वर्ष तक की आयु में वीर्य मेरुदण्ड से होता हुआ उपस्थ की ओर बढ़ता है
और धीरे-धीरे मूलाधार चक्र में अपना स्थान बना लेता है। काम विकार पहले मन में
आता है उसके बाद तुरन्त ही मूलाधार चक्र उत्तेजित हो उठता है उसके उत्तेजित होने
से वह सारा ही क्षेत्र जिसमें कि कामेन्द्रिय भी सम्मिलित होती है उत्तेजित हो
उठती है ऐसी स्थिति में ब्रह्मचर्य को सम्भालना कठिन हो जाता है 24 वर्ष तक की
आयु में यह वीर्य मूलाधार चक्र में से सारे शरीर में इस प्रकार व्याप्त हो जाता
है जैसे—
यथा पयसि सर्पिस्तु, गूढश्चेक्षौ रसो यथा ।
एवं हि सकले काले शुक्र तिष्ठति देहिनाम ।।
अर्थात् जिस प्रकार दुग्ध में घी, तिल में तेल ईख में मीठापन तथा काष्ठ में अग्नि
तत्व विद्यमान रहता है उसी प्रकार वीर्य सारे शरीर में व्याप्त हो जाता है।
यदि 25 वर्ष की आयु तक आहार-विहार को दूषित नहीं होने दिया गया और ब्रह्मचर्य
खंडित न हुआ तो इस आयु में शक्ति की मस्ती और विचारों की प्रफुल्लता देखते ही
बनती है। ऐसे बच्चे प्रायः जीवन भर स्वस्थ रहते हैं। काम-विकार से घिरे बच्चों
को दमित वासना का संकट हो सकता है जिस बालक के मस्तिष्क में मातृभाव रहा काम-वासना
प्रदीप्त नहीं होने पाई उसे दमित वासना की तो कल्पना भी नहीं आयेगी वरन् ऐसा
सोचने वाले उसके सम्मुख कीट-तत्व जैसे हीन बुद्धि लगेंगे। प्रफुल्लता, मानसिक
उन्मुक्तता, साहस, निर्भयता, वाक् विनोद अपने आप में उतना आनन्द है जितना संभोग
में। सम्भोग का आनन्द तो थोड़ी देर का है पर यदि वीर्य अच्छी तरह शरीर में पच
गया है तो वह आनन्द जीवन के हर क्षेत्र में उत्साह और सफलता के रूप में सर्वत्र
लिया जा सकता है।
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*समाप्त*