उपासना — सच्चा समर्पण

मनुष्य की सामान्य शक्ति सीमित है। प्रत्येक प्राणी को भगवान् ने इतना ही सामान दिया है कि वो अपने जीवन का गुजारा कर ले। कीड़ों को—मकोड़ों को, पशु और पक्षियों को सिर्फ इतना ही ज्ञान और साधन और शक्ति व इन्द्रियाँ मिली हैं ताकि अपना पेट भर लें और प्रकृति की इच्छा को पूरा करने के लिए (अपने औलाद को भी) औलाद पैदा करता रहे, बस और ज्यादा है नहीं। लेकिन अगर आपको कुछ इससे और ज्यादा जानना हो, इससे कुछ प्राप्त करना हो, तो आपको कहाँ जाना पड़ेगा? तब आपको वहाँ जाना पड़ेगा, जहाँ शक्तियों के भाण्डागार भरे पड़े हैं। एक जगह ऐसी भी है जहाँ बहुत शक्ति भरी पड़ी है। जहाँ सम्पत्तियों का कोई ठिकाना नहीं है। जहाँ समस्त विश्व कि अनन्त शक्ति है।

इस सारे विश्व का मालिक कौन है? भगवान है। ये उसी का तो सामान है जिससे उन्होंने दुनिया को बना दिया। यहाँ जो कुछ भी देखते हैं वैभव, ये भगवान के भण्डार का एक छोटा सा चमत्कार है। प्रकृति के अलावा और भी देश हैं। और भी जो हैं उन सब को भी भगवान का भण्डार भरा हुआ पड़ा है। बड़ा सम्पत्तिवान है भगवान। आपको अगर सम्पत्तियों कि जरूरत है, सफलताओं कि जरूरत है, विभूतियों की जरूरत है अपना पुरुषार्थ इस काम में खर्च कीजिए कि उस भगवान के साथ में आप हिस्सा बना सकें। उसके साथ में अपने आप को जोड़ने में समर्थ हो सकें। ये सबसे बड़ा पुरुषार्थ है।

आप किसी मालदार आदमी के साथ में अपना हिस्सा मिला लें, तब मजा आ जाए। लाल बहादुर शास्त्री का नाम सुना है? लाल बहादुर शास्त्री बिलकुल छोटे से आदमी थे। लेकिन पण्डित नेहरू के साथ में उन्होंने घने सम्बन्ध बना लिए उनकी वजह से एम. एल. ए. भी हो गए, उनकी सहायता से वो यू. पी. के मिनिस्टर भी हो गए, वे सेंट्रल गवर्मेंट के मिनिस्टर भी हो गए, इस तरह उनके मरने पश्चात उनके उत्तराधिकारी भी हो गए। बहुत शानदार थे लाल बहादुर शास्त्री। ये उनके अपने पुरुषार्थ का उतना फल नहीं था। जितना कि नेहरू जी के सहयोग का। उनके ------उन्होंने ये देख लिया था कि ये आदमी बड़ा उपयोगी है, इसकी सहायता करनी चाहिए। इसकी सहायता से उन्होंने भी लाभ उठाया, इसलिए उनकी सहायता भरपूर की पण्डित नेहरू ने। ठीक यही बात हर जगह साबित होती है।

एक सर्वशक्तिमान सत्ता है भगवान, उसके साथ में अगर आप जोड़ लें तब, तब आपकी मालदारी का कोई ठिकाना न रहे। आप इतने सम्पन्न, इतने सम्पन्न, इतने सम्पन्न हो जाँय कि क्या कहूँ आपसे। आप बापा जलाराम के तरीके से सम्पन्न हो सकते हैं। आप सुदामा के तरीके से मालदार भी हो सकते हैं। आप विभीषण के तरीके से मालदार भी हो सकते हैं। आप सुग्रीव के तरीके से मुसीबतों से बच करके फिर अपना खोया हुआ राज-पाट (प्राप्त) पा सकते हैं। आपको नरसी मेहता के तरीके से हुण्डी भी आप पर बरस सकती है उसके यहाँ कुछ कमी है क्या? नहीं कोई कमी नहीं है। इसलिए यहाँ जो आपको बुलाया गया है, उसका एक कारण ये भी है कि आपसे ये कहा जाएगा कि आप भगवान के साथ अपना रिश्ता जोड़ लें।

आप जो पूजा करते हैं, उपासना करते हैं, भजन करते हैं, (का) उसका मतलब ये है कि आप (इन) इन उपायों के माध्यम से अपना (रिश्ता) भगवान के साथ में जोड़ लें। और उनके साथ में आप जोड़ लें तो मजा आ जाय। एक गरीब स्त्री, गरीब घर कि लड़की किसी मालदार, मालदार पति के साथ में शादी हो जाय तब। तब वो दूसरे दिन उसकी मालकिन हो जाती है। क्यों? उसने रिश्ता मिला लिया न। रिश्ता मिलाने में क्या करना पड़ता है? बस यही मुझे कहना था आपसे। रिश्ता मिलाने में आप जो ख्याल करते हैं रिश्वत देनी पड़ती है और चापलूसी करनी पड़ती है। न, इस ख्याल को आप हटा दीजिये। रिश्वत दे करके भगवान को अपना मित्र बना सकते हैं, उसका अनुग्रह प्राप्त कर सकते हैं, ऐसा मत कीजिये। मत विचार कीजिये।

आप ये मत विचार कीजिए कि जीभ की नोंक से कुछ मीठी बातें, और चापलूसी कि (बातें), स्तोत्र पाठ करने के बाद में भगवान को आप अपना बना सकते हैं। आप भगवान की समझदारी (पर) यकीन कीजिए, और ये समझिए कि भगवान आपकी जबान को नहीं, आपकी नीयत को देखता है, दृष्टिकोण को देखता है, चरित्र को देखता है, चिन्तन को देखता है, और आपकी भावनाओं को देखता है। अगर इस क्षेत्र में आप सूने हैं, (तो) आपके कर्मकाण्ड बहुत ज्यादा कारगर नहीं हो सकते। आपने देखा है न कितने पण्डित लोग हैं। जो तरह-तरह के विधि-विधान और कर्मकाण्ड जानते हैं, पर सब खाली हाथ रहते हैं। आपने देखा है न कितने साधू-महात्मा तरह-तरह के जप करते हैं, तिलक लगाते हैं और पाठ-पूजा करते हैं, तीर्थ यात्रा करते हैं, स्नान-पूजन करते हैं, लेकिन उनकी नीयत और उनकी भावना और उनका दृष्टिकोण ऊँचा न होगा तब, उनका व्यक्तित्व ऊँचा न होगा तब, उनका अन्तःकरण ऊँचा न होगा तब। तब उनके लाल-पीले कपड़े पहन लेना और तरह-तरह के आडम्बर बना लेना और तरह-तरह के क्रिया-कृत्य कर लेना बिलकुल बेकार चला जाता है और सामान्य नागरिकों से भी गयी गुजरी स्तर कि जिन्दगी जीते हैं। भगवान कि कृपा कहाँ मिलती है उनको।

भगवान की कृपा प्राप्त करने का जो असली रहस्य है, उसको आपको जानना ही चाहिए। क्या करना होगा? (आपको) उसके साथ में जुड़ जाना होगा। जुड़ जाने को ही उपासना कहते हैं। उपासना का मतलब है—जुड़ जाना। पास बैठना। जुड़ जाना। किस तरीके से जुड़ें। मैं आपको कुछ थोड़े से उदाहरण बताऊँगा, जुड़ना कैसे है?

आपने आग में लकड़ी को जलते हुए देखा। लकड़ी की क्या कीमत है? दो कौड़ी की। लकड़ी को आप पैर के नीचे पलट दीजिये, तोड़-मोड़ कर फेंक दीजिये, छू लीजिये, इधर से उधर करते रहिये। लकड़ी कि क्या कीमत हो सकती है। लेकिन आग के साथ में अगर उसको मिला दिया जाय तो आप देखेंगे कि थोड़ी ही देर में लकड़ी गरम होने लगती है और आग हो जाती है। फिर आप छू भी नहीं सकते और जो गुण आग के हैं, अग्नि भगवान के हैं, देवता के हैं, फिर आप देखेंगे कि उस नाचीज अग्नि के भी हो जाते हैं।

बस ठीक यही तरीका व्यक्ति को और जीवात्मा को परमात्मा के साथ मिलाने का है। क्या करें? नजदीक आ जाएँ? बस वही तो मैं कह रहा हूँ। नजदीक आने का एक तरीका है। वो तरीका है अपने आप को सौंप देना और होम देना। उसकी इच्छानुसार चलना। लकड़ियाँ अपने आपको होम देती हैं और सौंप देती हैं। आग उसको जलाती है तो जलने से रजामन्द है। उसी के साथ तो घुलेगी जो घुल गई तो उसके साथ हो जाती है। हमारी और आपकी नीयत ये हो कि हम भगवान के साथ घुल जाँय। घुलने का मतलब सौंप देना। उनको अपने में नहीं मिला लेना, उनको अपनी मर्जी के ऊपर चलाएँगे नहीं, बल्कि हम अपनी मर्जी से उनकी मर्जी के मुताबिक चलेंगे। इसी का नाम समर्पण है, इसी का नाम विलय है, इसी का नाम विसर्जन है, इसी का नाम शरणागति है। बहुत से नाम इसके दिए गए हैं। उपासना का तत्त्वज्ञान इसी पे जुड़ा हुआ है।

आप भगवान के अनुयायी होते हैं कि नहीं? आप भगवान का अनुशासन मानते हैं कि नहीं? आप भगवान की इच्छानुसार चलते हैं कि नहीं? आप भगवान के बताए हुए इशारे और संकेत पर अपने कदम बढ़ाते हैं कि नहीं? एक ही प्रश्न है बस, और कोई प्रश्न नहीं है। आपका, आपका वो ख्याल ठीक नहीं है कि हम अपनी, भगवान को हम अपनी मन मर्जी पर चला सकते हैं। आप और भगवान को मर्जी पर चलाएँगे। क्यों, आप अपनी मर्जी पर क्यों चलाएँगे? आपकी मर्जी पर क्यों चलने लगे भगवान? भगवान के अपने कुछ नीति और नियम हैं। कुछ मर्यादा और कायदे हैं। आप, आपकी खुशामद की वजह से आपकी मनोकामना पूरी करने के लिए अब भगवान अपनी नीति को छोड़ देंगे, नियम को छोड़ देंगे, मर्यादाओं को छोड़ देंगे, कायदे-कानून को छोड़ देंगे और अपने आप को पक्षपाती, पक्षपाती और इल्जाम लगायेंगे, पक्षपाती होने का कलंक लेंगे। न, ऐसा भगवान कर नहीं सकेंगे। आपके मन में ये ख़याल हो, हम मिन्नतों और खुशामदों से भगवान को अपने नजदीक ले आ सकते हैं और उपासना कर सकते हैं। आप ख़याल छोड़ दीजिये।

तब क्या करना पड़ेगा? एक ही करना पड़ेगा, आप उसको सौंप दीजिये, अपने आप को उसके हाथ की कठपुतली बना लीजिये, तब देखिये भगवान क्या से क्या काम करते हैं। पानी दूध में मिल जाता है, उसका भाव दूध के बराबर हो जाता है, कीमत। एक छोटी सी बूँद नाचीज बूँद समुद्र में गिरती है और अपनी हस्ती को नाबूद कर देती है। फिर छोटी सी बूँद, छोटी सी बूँद समुद्र की कीमत की हो जाती है। समुद्र बन जाती है। उसकी हैसियत फिर समुद्र के बराबर हो जाती है। पानी दो कौड़ी का लेकिन जब दूध में शामिल हो जाय तो उसकी हैसियत पानी की दूध के बराबर। नाला नदी में शामिल हो जाता है। नाला दो कौड़ी का, गन्दा, गलीच, कीचड़ से भरा हुआ। लेकिन जब वो नदी में शामिल हो गया तब नदी में शामिल हो गया तब वो नदी हो जाता है। पानी उसका नदी की तरह से पूजा जाता है। गंगा में गिरे हुए नाले गन्दा पानी भी गंगा जल कहलाता है। कैसे हो गया? नाले ने अपने आपको समर्पित कर दिया। किसको? नदी को। अगर समर्पित न करता तब? अगर आपके जैसी मनः स्थिति का होता तब वो नाला क्या कहता? गंगा जी से कहता आप नाला बन जाइए और हमारी मर्जी पूरी कीजिये। हमारे साथ-साथ रहिये। न, ऐसा नहीं हो सकता।

भगवान को आप (अपने साथ) अपने जैसा नहीं बना सकते। और अपनी, अपनी मर्जियाँ पूरी कराने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। आपको ही ईश्वर के पीछे चलना पड़ेगा। पारस के बारे में सुना है न आपने। पारस को छू करके लोहा सोना हो जाता है। लेकिन लोहा बदल जाता है। लोहा वैसे ही पड़ा रहे, पारस कहे आप लोहा बन जाइए नहीं, लोहा पारस नहीं बन सकता। पारस को बदलना पड़ेगा। चन्दन के पास आपने देखा है न। चन्दन के पास उगे हुए पौधे, चन्दन के पास उगे हुए पौधे चन्दन की खुशबू देते हैं। और चन्दन बन जाते हैं। आप तो ये चाहते हैं चन्दन को, चन्दन ये, चन्दन को हम जैसा बन जाना चाहिए। चन्दन आप जैसा नहीं बन सकता। छोटी झाड़ियों को चन्दन जैसा खुशबूदार बनना चाहिए। चन्दन बदबूदार झाड़ी नहीं बन सकता।

भगवान पर दबाव मत डालिए। क्या करना पड़ेगा? आप उसके साथ में घुल जाइए। लिपट जाइए। देखा है न, देखा है न बेल एक पेड़ के साथ में लिपट जाती है। बेल जितना ऊँचा है, पेड़ जितना ऊँचा है उतनी ऊँची होती चली जाती है बेल। अगर वो बेल अपने मन मर्जी से फैलती तो सिर्फ जमीन में फ़ैल सकती थी। और कैसे ऊँचा उठती उठना सम्भव न था, मुमकिन नहीं था। लेकिन इतनी ऊँची कैसे हो गयी क्योंकि उसमें गुँथ गयी। लिपट गयी। आप भी उसमें गुँथ जाइए न, लिपट जाइए न। फिर देखिये कि आपकी ऊँचाई बेल के बराबर—पेड़ के बराबर होती है कि नहीं? पेड़ कितना ऊँचा है? बहुत ऊँचा है। और भगवान कितना ऊँचा है। बहुत ऊँचा है आप जरा गुँथ के देखिये न, उसके अनुशासन को पालिए न, उसके इच्छा के हिसाब से चलिए न, फिर देखिये आप भगवान के बराबर बनते हैं कि नहीं। आप भगवान के बराबर बन जाते हैं।

पतंग आपने बच्चों के हाथ में लगी हुयी देखी है न। बच्चे के हाथ में सिरा होता है, पतंग को झटका देते रहते हैं और पतंग ऊपर आसमान में जा पहुँचती है। और पतंग अपनी डोरी को बच्चे को सुपुर्द न करे तब, उड़ाने वाले को सुपुर्द न करे तब, तब उसको जमीन पे पड़ा रहना पड़ेगा। आप अपने जीवन की बागडोर, और जीवन का आधार भगवान के हाथ में नहीं सौंपें, और उसकी मर्जी के अनुसार नहीं चलें, तो आप पतंग की तरीके से आसमान में उड़ने की अपेक्षा मत कीजिए।

आपने देखा है न दर्पण, दर्पण में जो चीज सामने आती है वो दर्पण वैसा ही दिखाई पड़ने लगता है। आपके जीवन में चारों ओर से कई दैत्य छाया हुआ है इसलिए आपका, आपका दर्पण भी आपका मानसिक स्तर भी दैत्य जैसा बन जाएगा। लेकिन अगर आप भगवान को सामने रखें उसके नजदीक जाँय तो आप देखेंगे आपके जीवन में भगवान की छवि और भगवान की आभा और भगवान की शक्ति उसी तरीके से बन जाती है जैसे कि दर्पण के सामने खड़े हुए आदमी की बन जाती है। आप, आपने बंसी देखी है न। बंसी अपने आपको पोली कर देती है और खाली कर देती है। पोली और खाली करने के बाद में वहाँ जा पहुँचती है और उससे कहती है आप बजाइए। जो आप कहेंगे, वही मैं गाऊँगी। बस वो फूँक मारता जाता है बजाने वाला और बंसी बजती जाती है। भगवान को फूँक मारने दीजिये और आप बजने के लिए तैयार होइए।

कठपुतली को आपने देखा है न कठपुतली के धागे, बाजीगर के हाथ में लगे होते हैं। बाजीगर इशारा करता जाता है कठपुतली बिना कुछ किये बिना नाचना शुरू कर देती है। दुनिया को दिखाई पड़ता है कठपुतली का नाच कैसा शानदार हुआ। कठपुतली का नाच नहीं है। बाजीगर का है। बाजीगर का है, नहीं बाजीगर का नहीं है। तो किसका है धागों का है, नहीं धागों का भी नहीं है। किसका है, कठपुतली के समर्पण का है। कठपुतली ने अपने हर शरीर के हिस्से में धागे बँधवाए और उसको बाजीगर के हाथ में सौंप दिया। बस यही आपको करना पड़ेगा। कठपुतली की तरीके से अगर आप बाजीगर के हाथ में (अपने) जिन्दगी की नाव सौंप सकते हों, अपने विचार और चिन्तन सौंप सकते हों, और अपनी इच्छा और आकांक्षाएँ सौंप सकते हों, तब आप जरा देखिए न, कैसा मजा आता है।

आप उस सब कुछ जनरेटर से सम्बद्ध हो जाइए जिसको, जिसके साथ में जुड़ने पर ही बल्ब जलते हैं। पंखे तभी चलते हैं जब उसके बिजली घर से जुड़ जाता है। और आप जुड़ेंगे नहीं तब, तब आप बल्ब हैं तो मुबारक आप रखे रहिए। आपकी ढाई रूपये कीमत है। आप प्रकाश नहीं दे सकते आप हीटर नहीं हो सकते, आप कूलर नहीं हो सकते, आप पंखे की हवा नहीं चला सकते, जेनरेटर के साथ में जुड़ेंगे तब। आपकी हैसियत है तो ठीक है। आपकी हैसियत आपके लिए मुबारक। लेकिन जब परम शक्ति के साथ आप जुड़ेंगे तब देखिये आप कितने कमाल कर सकते हैं।

इसलिए आदमी की सबसे बड़ी समझदारी ये है अपने आप को भगवान के साथ में जोड़ ले। शक्तियों के साथ में अपना हिस्सा मिलाइये। ये कठिन है, जरा भी कठिन नहीं है। बहुत सरल है। आपने देखा है न। नल टंकी के साथ जुड़ जाता है। टंकी में पानी भरा हुआ पड़ा है। नल को आप खोल दीजिये। नल में क्या है, कुछ भी नहीं है। टंकी में सब है। लेकिन टंकी में भरे हुए पानी के साथ में अपना रिश्ता मिला लिया। जब तक टंकी में पानी भरा हुआ है तब तक बराबर नल से आपको पानी मिलता रहेगा। नल छोटा हो तो क्या? नल नाचीज हो तो क्या? अगर आपने सच्चे मन से भगवान के साथ में अपने आप को जोड़ के रखा है तो भगवान कि सम्पदाएँ और जो उसकी विभूतियाँ हैं, साधक की अपनी हो जाती हैं और बराबर उसकी बनती चली जाती हैं।

तो करना क्या पड़ेगा? सौंपना पड़ेगा और क्या करना पड़ेगा। उनको बहकाना-फुसलाना और मर्जी पर चलाना पड़ेगा। नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। आपको ही सब करना पड़ेगा और आपको ही कहना मानना पड़ेगा, आपको ही समर्पित करना पड़ेगा। बीज आपको ही बनना पड़ेगा। आप अपने आप को बोइए न। आप बीज बोइए फिर देखिये कैसी फसल आती है। मक्का का एक दाना खेत में बो देते हैं। मक्का का पौधा खड़ा हो जाता है। उसमें से छह भुट्टे आते हैं। एक-एक भुट्टे में एक-एक हजार दाने होते हैं। छह हजार दाने, छह हजार दाने हो गए, न किसके हो गए? एक बीज के।

आप भगवान के खेत में अपने आपको बोइए। गला दीजिये न, गलाने मन नहीं है? गलाइए। आप गलाने कि हिम्मत नहीं करेंगे, बीज को अपनी पोटली में रख के बैठे रहेंगे जिन्दगी में और ये अपेक्षा करते रहेंगे, जमीन हमारे खेत पैदा कर दे, हमको नहीं गलना पड़े। ऐसा कभी हुआ है क्या? ऐसा नहीं होता, आपको गलना पड़ेगा। अगर आप नहीं गलेंगे तब, तब फिर आप भगवान से क्या उम्मीद करेंगे। आपने सुना है न भगवान कि आदत कुछ ऐसी है कि बराबर माँगते रहते हैं। पहले हाथ पसारते हैं, बाद में वो देने की बात करते हैं। अगर आप उसके हाथ पर अपना कुछ रख नहीं सकते तो फिर क्या पायेंगे? आप चावलों से नहीं खरीद सकते, आप धूप बत्ती से नहीं खरीद सकते और आप, आप आरती करके पा नहीं सकते और जीभ के नोंक से स्त्रोत पाठ करके छोटे-छोटे कर्मकाण्ड करके भगवान के अनुग्रह के आप अधिकारी नहीं हो पायेंगे।

क्या करना पड़ेगा? आपको अपना दृष्टिकोण, चिन्तन और चरित्र, भावना और लक्ष्य सबको भगवान के साथ में जोड़ देना पड़ेगा। इसके बाद ये करने को तैयार हो जाइए, फिर आप देखिये क्या-क्या होता है? फिर आप देखिये कैसा मजा आता है? भगवान की मर्जी तो पूरी कीजिये, फिर देखिये आपको कुछ मिलता है क्या? अभी मैंने सुदामा का नाम लिया न आपसे। सुदामा ने अपनी पोटली दे दी थी। पोटली देने के बाद में भगवान ने जो दिया था वो दिया था। भगवान तो माँगते ही आते हैं। आपके पास कभी भगवान आये तब। देते हुए नहीं आयेंगे, माँगते हुए आयेंगे। शबरी के पास गए थे, माँगते हुए गए थे। अरे हम बहुत भूखे हैं, कुछ खाना खिलाइये। भगवान उनके लिये कुछ सोना-चाँदी लेकर गए? हीरा-मोती लेकर गए? कुछ भी नहीं ले गए भगवान।

कहीं भी जाते हैं, तो (उस) मनुष्य की पात्रता को परखने के लिए, (उसकी) महानता को विकसित करने के लिए। एक ही दबाव डालते हैं—आपके पास क्या है, हमारे सुपुर्द कीजिए। सुपुर्द कीजिए। शबरी ने जूठे बेर थे, जो कुछ भी था उसको सुपुर्द कर दिया। सुदामा के पास जो कुछ था, सुपुर्द कर दिया। गोपियों के पास भी गए थे। गोपियों को भगवान प्यार करते थे। उनसे ये पूछते थे, लाइए आप कुछ दीजिये। छाछ-दही माँगते थे। कर्ण से भी माँगने गए थे। बलि से भी माँगने गए थे। हर जगह भगवान माँगने के लिए आते हैं। भगवान की आदत को आप जानेंगे नहीं, तो मुश्किल पड़ेगा। और आप अपने आप को सौंपने के लिए आमादा न होंगे तो आप भगवान को अपना नहीं बना सकेंगे।

लैला मजनू कि कहानी सुनी है कि नहीं सुनी है। अच्छा सुनिए। एक था, एक मजनू था। लैला को प्यार करता था। वो चाहता था लैला कि शादी उससे हो जाय लेकिन उसका बाप तैयार नहीं था। बाप ने कहा नहीं, हम भिखारी के साथ क्यों शादी करेंगे। तब फिर, लैला ने कहा अपनी मर्जी से भी शादी कर लूँ लेकिन पहले देखूँ तो सही ये ऐसे ही अपनी खुद गरजी के लिए—मतलब के लिए ही मुझे अपनी शिकंजे में कसना चाहता है या वास्तव में मुझे प्यार करता है। प्यार करने का मतलब होता है देना, प्यार का मतलब देना, प्यार का मतलब देना, प्यार का मतलब देना। अगर प्यार का मतलब देना आप नहीं समझते हैं, प्यार का मतलब आप ये समझते हैं कि भगवान की भक्ति करें, और उनको कठपुतली के तरीके से चलाएँ, और उचित और अनुचित जो कुछ भी फायदे उठा लें — इसको भक्ति कहते हैं? तब आप अपनी भक्ति की परिभाषा बदल दें, और इस भक्ति से आप बाज़ आएँ, और ये भक्ति को आप भक्ति कहना बन्द कर दें।

भक्ति कैसी होती है? मजनू कि बात कह रहा था। एक बार लैला ने उसका परीक्षण लेना चाहा और ये देखा कि देखें हम मजनू कैसा है। पहले तो उसने ऐसा इंतजाम कर दिया कि मजनू को खाने को कुछ कहीं से मिल जाया करे। दुकानों, दुकानदारों से खाना मिलने लगा। फिर उसने ये देखा कि ऐसा तो नहीं है ये हरामखोर हो और ऐसे ही फ़ोकट का खा रहा हो। उसका इंतजाम करें। उन्होंने अपने बाँदी को भेजा। उस बाँदी ने मजनू से ये कहा—लैला बहुत बीमार है। तो मजनू बड़ा दुखी हुआ। उसने कहा दुखी होने से क्या फायदा, आप कुछ मदद कीजिये न उसकी। दुखी होते हैं। दुखी क्या होते हैं। लैला को हम बहुत प्यार करते हैं। प्यार क्या करते हैं? प्यार करते हैं, तो मूल्य दीजिये न। मजनू ने कहा मैं क्या दूँ? उन्होंने कहा डाक्टरों ने ये कहा है लैला के नसों में खून का एक प्याला चढ़ाया जाएगा। आप अपना खून देंगे क्या? जिससे लैला कि जिन्दगी बचायी जा सके। मजनू फ़ौरन तैयार हो गया। उसने कटोरा जो बाँदी लेकर आई थी, लबालब अपने खून से भर दिया। खून को लेकर के जब गयी बाँदी (जाने लगी) तब फिर उसने बाँदी से एक और बात कही। बाँदी जल्दी आना (और आना)। अभी और कई कटोरे खून मेरे शरीर में है, वो सब उसको सुपुर्द करूँगा। लैला को मैं मोहब्बत करता हूँ। मोहब्बत का मतलब देना, मोहब्बत का मतलब देना। इसलिए मैं तो देना ही देने वाला हूँ। एक कटोरा खून लेकर गयी। नकली जो मजनू थे, वो सब भगा दिए गए। और लैला ने अपने बाप से कह दिया, मुझसे इतनी मोहब्बत करता है। और जो मोहब्बत की कीमत को समझता है, उसके तो मैं साथ ही रहूँगी। लैला और मजनू कि शादी हो गयी।

आपकी भी शादी भगवान के साथ में हो सकती है। आप जरूर भगवान के साथ में शादी कर सकते हैं। लेकिन करना क्या चाहिए? कुछ नहीं करना चाहिए, एक बात करनी चाहिए। भगवान कि मर्जी पर आप चलने के लिए आमादा हो जाँय। जो कुछ आप से चाहते हैं आप उसको दीजिए। आप चाहते हैं, ठीक है। आप क्या चाहते हैं। लेकिन जो आप चाहते हैं उसके पहले बहुत कुछ दे दिया है भगवान ने। आप को इंसान की जिन्दगी दी है, और ऐसी बेहतरीन और ऐसी समझ दी हुई है जिसके आधार पर आप अपनी मन-मर्जी पूरी कर सकते हैं। मन-मर्जी के लिए कोई कमी नहीं है। आपके हाथ कितने बड़े हैं, आपकी अकल कितनी बड़ी है, आपकी जबान और आँखें कैसी शानदार हैं। आप अपनी दैनिक जरूरतों की, जिनको आप भगवान से अपेक्षा करते हैं, उसके लिए मत कीजिए अपेक्षा। आप अपने पुरुषार्थ से कमा सकते हैं, अथवा सन्तोष कर सकते हैं, अथवा कम में काम चला सकते हैं। आप अपनी हविस और अपनी ख्वाहिशें और अपनी तमन्नाएँ और अपनी इच्छाएँ, अपनी महत्त्वाकांच्छाओं को पूरा करने के लिए भगवान को दोष देंगे। भगवान को मजबूर करेंगे कि वो कर्तव्य की बात को छोड़ दे, और आपको पक्षपात करने लगे, और कर्मफल की महत्ता को परित्याग कर दे—आप ऐसा मत कीजिए। उनको न्यायाधीश रहने दीजिये। आप भगवान को बेइज्जत मत कीजिये। आप अपनी मर्जी के लिए उसको पक्षपाती मत बनाइये। ऐसा वो करेंगे भी नहीं, (आप बढ़ाना चाहेंगे तब करेंगे।) इसलिए तरीका एक ही है आप उस शक्ति के भंडार के साथ में अपने आप को मिला दीजिए, जोड़ लें, और मिलाने-जोड़ने का तरीका फिर वही है—फिर समझ लीजिए, फिर समझ लीजिए, फिर समझ लीजिए—आपको उनकी मर्जी पे चलना पड़ेगा। आप कि मर्जियाँ ख़तम। आप अपनी आकांक्षाएँ खत्म कीजिए, आप अपनी इच्छाएँ खत्म कर दीजिए, आप उन्हीं के हो जाइए और उन्हीं के साथ रहिये। जब उनके साथ आप हो जाते है, तब वो आप के हो जाएगें। आप उनके हो जाइए और आप उनके साथ उनको बना लीजिये। राजा हरिश्चन्द्र बिके थे एक बार। और भंगी उनको खरीद ले गया था।

भगवान भी बीच चौराहे पर बिकने के लिए खड़े हैं और वो आवाज लगाते हैं, हम बिकने के लिए खड़े हैं कोई हमको खरीद ले जाय। जो हमको खरीद लेगा उसी कि सेवा करेंगे और उसी के साथ-साथ रहेंगे। आप चाहें तो उनको खरीद सकते हैं। क्या कीमत है? अपने आप को बेच दीजिये उनके हाथों। उन्हें अपने हाथों खरीद लीजिये। स्त्री अपने हाथों अपने आपको अपने पति के हाथों सौंप देती है और वो अपने आप को बेच देती है उनके हाथों, उसकी कीमत पर पति को खरीद लेती है। बस यही एक रास्ता है। यही भगवान कि भक्ति का हिस्सा है। आपको अपने जीवन में हेर-फेर करना ही पड़ेगा और करना ही चाहिए। आप अपने घिनौने चिन्तन को बदलिए, आप आप अपने छोटे वाले दृष्टिकोण को बदलिए, आप अपने लोभ और लालच से बाज आइए और भगवान की सुन्दर दुनिया को ऊँचा बनाने के लिए, सुन्दर बनाने के लिए, शानदार बनाने के लिए उनके राजकुमार की तरीके से उनकी सम्पदा और उनकी धरती को ऊँचा और अच्छा बनाने के लिए कमर बाँध के खड़े हो जाइए। आप समर्पित होइए, शरणागति में आइए, विलय कीजिये, विसर्जन कीजिये फिर देखिये आप क्या पाते हैं? बीज की तरीके से जुड़ जाइए और पेड़ के तरीके से उगने की तैयारी कीजिये। आप कुछ त्याग नहीं करेंगे तो पा कैसे लेंगे? और जो त्याग करना है उसमें जप करना काफी नहीं है। जरूरी तो है, पर काफी नहीं है। आपका चावल चढ़ा देना, धूप-बत्ती उतार देना, आरती उतार देना जरूरी तो है पर काफी नहीं है। और ज्यादा करना है तो ज्यादा करने के लिए आपको अपना कलेजा चौड़ा कीजिये और तैयारी कीजिये। आज मुझे यही निवेदन करना था आप सब लोगों से।

॥ॐ शान्तिः॥