आज की युग साधना क्या है?

साधनाएँ समयानुकूल और पात्रता के अनुकूल हुआ करती हैं। एक सी साधना कभी नहीं होती। बहुत पुराने जमाने की साधनाओं (को) हम उपक्रम देखते हैं, तो कभी तप ही मुख्यतः पार्वती जी तप करती रहती थीं, कितने वर्ष तक वो हवा पे रहीं, पत्ते खा कर रहीं, पानी खा कर रहीं था। कभी तपश्चर्या की साधना होती थीं, कभी ज्ञान की साधनाएँ होती रहीं। सूत और शौनक से, नैमिष्यारण्य वगैरह क्षेत्रों में जा कर के कथा प्रसंग होते थे। अनेकानेक अनेकानेक भक्तजन आते थे, और कथा श्रवण करते थे, सत्संग की बात करते थे। कभी शिक्षण का चला, आरण्यकों और ब्राह्मणों का, आरण्यक कभी स्थापित हुए और उनमें जा करके लोग अपनी ज्ञानार्जन करने लगे। साधना उस समय उस तरह की थी। हजारों तरह की साधनाएँ। कभी तांत्रिक साधनाएँ कभी कौन, कभी कौन ऐसे समयानुसार होती रही हैं। काल के हिसाब से साधना का चयन करना गुरुजनों का काम है। और शिष्यों का काम - शिष्यों का काम ये है कि युगदृष्टा, समय (को) जानकारी प्राप्त करने वाले व्यक्ति, जिस तरह की साधना अपने लिए बता दें, उसी को ठीक मान कर के चलना चाहिए।

आजकल एक विशेष समय है - सामान्य समय नहीं है। युग-सन्धि का समय है। युग-सन्धि के समय को आप चाहें तो आपत्तिकालीन समय (कह) कह सकते हैं। कभी-कभी आपत्तिकालीन समय आते हैं। जैसे भूकम्प आ जाए कभी, तो उसको आपत्तिकालीन कहेंगे, मकान गिर पड़ेंगे, लोग भाग खड़े होंगे, कुछ मिट्टी के नीचे दब जाएँगे, हाहाकार हो जाएगा, बिजली चली जाएगी और नल पानी देना बन्द कर देंगे। ऐसे-ऐसे समय को आपत्तिकाल कहेंगे। दुर्भिक्षों को भी आपत्तिकाल कहते हैं, जब खाना नहीं मिलता और अनाज पैदा होना बन्द हो जाता है, कुएँ का पानी सूख जाता है, तब आदमी अपनी जान बचाने के लिए या तो भाग खड़े होते हैं या वहीं पर प्राण त्याग देते हैं। ये दुर्भिक्ष प्राचीन काल में बहुत थे। अब तो इतने नहीं रहे। अग्निकाण्ड हो जाए, छप्पर जलने लगे किसी का तब, तब फिर आपको उसको आपत्तिकाल कहेंगे। अपना जो नित्य का काम है आप बन्द कर दीजिए अग्नि को बुझाने के लिए दौड़िये। खाना खा रहे हैं, छोड़ दीजिए, पड़ोस में आग लग गई है वहाँ जाइये, नहा रहे हैं, नहाना बन्द कीजिए, कपड़े धोने हैं, है तो काम जरूरी पर कपड़े को बन्द कीजिए, और जाइए पड़ोस में आग लग रही है उसको आप देखिए। दुकान जाने को थे, न, मत जाइए दुकान, देखिये क्या दुर्घटना घटित हो गई। सामने वाले में बस का ऐक्सीडेन्ट हो गया, बस का ऐक्सीडेन्ट हो गया, बस टक्कर में आ गई है और कितने आदमी की टाँग टूट गई, कितने घायल हो गये, कितने मर गये, आप आज दुकान जाना बन्द कर दीजिए। सामान्य समय के क्रम को आप बन्द कर दीजिए और ये घायल जो पड़े हैं इनको पानी पिलाइए, ये इसकी पट्टी का इंतजाम कीजिए, अस्पताल भिजवाने की कोशिश कीजिए अथवा जो भी सहायता उनकी उस समय कर सकते वो करें। आज आप दुकान बन्द कर दीजिए, क्यों? दुकान का क्यों नुकसान कर दें, वो सामान्य समय की बात है।

असामान्य समय में आदमियों को असामान्य कार्य पद्धति का निर्धारण करना पड़ता है। महामारियाँ फैल जाती हैं, बाढ़ आ जाती है, कोई और बड़ी दु्र्घटना हो जाती है तब लोग जो भावनाशील लोग हैं, अपना सामान्य क्रम बदल देते हैं, बन्द कर देते हैं, और उन दुखी लोगों की सहायता करने के लिए दौड़ पड़ते हैं, दौड़ पड़ते हैं। (ये) इसे क्या कहेंगे? इसे आपत्ति-धर्म कहेंगे। (आपत्ति-धर्म) आज का समय ऐसा ही आपत्तिकाल है, जिसमें आपत्ति-धर्म निबाहने के लिए आप सबको तैयार बनना चाहिए। आज का समय आज का समय, आप देखते हैं युग सन्धि का समय है। एक ओर कौरवों की सेना खड़ी हुई है एक ओर पाण्डवों की सेना खड़ी हुई है। एक ओर विनाश मुँह बाए खड़ा हुआ है, असुरता मुँह बाए खड़ी हुई है, सर्वनाश की चुनौतियाँ एक ओर एक पार्टी में खड़ी हुई हैं। दूसरे पार्टी में, (नया) नया निर्माण करने के लिए युग-शिल्पी अपनी-अपनी तैयारी के साथ कमर बाँध के खड़े हुए हैं। ये कौरव-पाण्डव की लड़ाई है, यह महाभारत का समय है, इसको आप आपत्तिकाल समझिए।

आपत्तिकाल में सामान्य समय में जो बातें होती हैं वो इस समय नहीं हो सकतीं, आप इस समय के लिए विशेष धर्म अपनाना चाहिए। अर्जुन कोई लड़ने-झगड़ने का पेशा थोड़े ही करता था। जिन्दगी भर कोई और काम करता रहा, गीता में जब भगवान ने कहा लड़ तो भी वो आना-कानी करने लगा, उनने कहा अब लड़ने से क्या फायदा है। लेकिन वो तो आपत्तिकाल था न, अगर वहाँ लड़ाई नहीं लड़ी गई होती तब तब कंस, दुर्योधन और दुःशासन और शिशुपाल वगैरह ये मिल करके जाने कैसा हाहाकार कर देते और लाखों-करोड़ों आदमियों को तहस-नहस कर देते और सारे वातावरण को इस तरह का बना देते कि आदमी का जिन्दा रहना मुश्किल हो जाता। इसलिए भगवान ने महाभारत की तैयारी की। अर्जुन से कहा इस समय सामान्य बातों को छोड़ दे। कह भी रहा था ‘असीयम भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके’ मैं तो भीख माँग करके भी खा सकता हूँ, दुकान करके भी खा सकता हूँ, नौकरी करके भी खा सकता हूँ, पेट भर सकता हूँ - फिर मैं क्यों लड़ूँगा? नहीं, उन्होंने कहा - ये आपत्तिकाल है, आपत्तिकाल के धर्म विशेष होते हैं। आपत्तिकाल का धर्म निभाने के लिए अर्जुन को तैयार किया गया, और वो भगवान का कहना मान करके, अपनी मर्जी थी कि नहीं थी बात अलग है, लेकिन उन्होंने (अपनी मर्जी थी कि नहीं थी) भगवान की मर्जी में अपनी मर्जी मिला दी और मर्जी में मिलाने के बाद में लड़ाई के मैदान में चला गया और गाण्डीव चलाने लगा और सारे के सारे विरोधियों को मार गिराया, अन्ततः अपने राज्य का स्वामी भी हुआ और भगवान की भक्ति का भी अधिकारी हुआ।

ये आपद् धर्म कहता हूँ मैं। कोई पूजा-उपासना की, क्या पूजा उपासना की? अर्जुन की क्या बात थी आप बताइए। कोई अनुष्ठान, जप, तप, ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, समाधि, कुण्डलिनी, कुछ भी की, कुछ भी नहीं की थी। भगवान की आज्ञा, जैसा कि उन्होंने बताया, कि इस समय करने लायक सबसे बड़ी साधना महाभारत की है, तो उसी में लग गया। लग जाने की वजह से (बस) वो साधना, भगवान की बताई हुई साधना, मनुष्यों की कराई हुई साधना की अपेक्षा लाखों गुनी श्रेयस्कर सिद्ध हुई। ऐसे ही दूसरों ने भी उपासना की है। अच्छा बताइए हनुमान जी ने क्या उपासना की। हनुमान जी ने कोई अनुष्ठान किये थे, जप किये थे, तप किये थे, ध्यान-धारणा की थी, कुण्डलिनी जगाई थी, कुछ भी नहीं किया था, बस साहब बन्दर थे खाली। तब भगवान से जब मुलाकात हुई, भगवान से जब उनका मिलना-जुलना हुआ, तब उन्होंने पूछा, मैं आपकी शरण में आ गया, मुझे आज्ञा बताइए। आज्ञा उनको बता दी, सीताजी खोज के लाइए और लंका को तबाह करने की कोशिश कीजिए। अनुष्ठान नहीं भगवान ने बताया। जप, जप भी नहीं बताया। रामायण का पाठ, गीता का पाठ, हनुमान मंत्र का पाठ, नहीं कुछ नहीं। उन्होंने कहा - इस समय आपत्ति धर्म ये है सीताजी जिस मुसीबत में फँसी हुई हैं और और देश के ऊपर जिस दैत्य संस्कृति ने अनाचार के बादल (बादल) घटाटोप की तरीके से जमा कर दिए हैं, उससे लड़ना पड़ेगा, और उसको दूर करना पड़ेगा - आज के लिए साधना यही है। हनुमान जी ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने कोई आग्रह नहीं किया - कोई आग्रह नहीं किया कि हमको जप बताइए, ध्यान बताइए, पाठ बताइए - नहीं, कुछ भी नहीं किया। ये तो उन लोगों के आग्रह रहते हैं, जो कोई पुरुषार्थ नहीं कर सकते, जिन्हें कोई मेहनत करने से लगाव नहीं है, सेवा के प्रति जिनके अन्त:करण में कोई उत्साह और उमंग नहीं है। ऐसे आदमी (खाली) खाली बैठे रहें, तो कुछ तो बताइए, कुछ तो बताना ही पड़ेगा उनको - लकड़ी की माला ही घुमाते रहिए, कुछ तो कीजिए बाबा - ऐसी आलस्य में पड़े रहने की अपेक्षा तो माला घुमाना और राम का नाम लेना ही क्या बुरा है।

लेकिन आप ये मत फर्क कीजिए कि उपासना का मतलब उपासना का मतलब राम नाम लेना ही होता है, माला घुमाना ही होता है, हर काम में माला नहीं काम आती है - माला 'भी' कभी काम आती है, लेकिन माला 'ही' काम आती है ऐसी बात नहीं है। उपासना की दृष्टि से सामयिक कर्तव्यों, सामयिक जिम्मेदारियों का परिपालन करना बहुत जरूरी है। हनुमानजी ने वही किया था। जिस दिन से भगवान की शरण में आये उनकी आज्ञानुसार सारे जीवन भर साधना करते रहे। अपनी मर्जी की साधना की नहीं, अपनी मर्जी की साधना मालूम ही नहीं की। भगवान की साधना क्या थी, उन्होंने कहा पहले उनको ये हुकुम दिया था सीता को ढूँढ़ के लाइए। सीता को ढूँढ़ के हनुमानजी ले आए और उनको अँगूठी वापस कर दी और कहा देखिए हम पता लगा लाए और जमा किया। काम नम्बर एक। काम नम्बर दो, भगवान ने कहा फिर अब एक काम खतम हो गया अब दूसरा अध्याय साधना का सिखाएँ। अब चलें राक्षसों से लड़ने के लिए, युद्ध की तैयारी करें और युद्ध के लिए जो भी सरंजाम जुटाने हैं, वो जुटा करके लाएँ। हनुमानजी ने सारी तैयारियाँ कर दीं। अपने मौहल्ले में गये और सारे रीछ-बन्दरों को उत्साह दे करके साथ ले आए, कहा चलिए आप भी चलिए, हम तो जा ही रहे हैं आप भी चलिए। बहुत सारे बन्दर और रीछ उनके कहने के मुताबित तैयार हो गये और हनुमान जी ने दौड़ लगाई, नल-नील को पकड़ कर लाए, जो अच्छे-खासे इंजीनियर थे और बढ़िया वाला पुल बना सकते थे, कौन लाये थे हनुमानजी लाए थे। अपने आप आये थे नहीं अपने आप तो रीछ बन्दर भी नहीं आये थे, अपने आप तो नल-नील भी नहीं आये थे, कोई अपने आप क्यों आने लगा, हनुमान जी थे जिन्होंने इनके साधन इकट्ठा करने में, जुटाने में पूरी-पूरी मेहनत की और लंका को परास्त करने के लिए जिन साधनों की जरूरत थी सारे साधन ला करके जमा कर दिये और उन्होंने लड़ाई भी लड़ी और और जो कुछ भी उस समय लड़ाई के समय में हो सकता था पेड़ उखाड़ने से ले के और राक्षसों को तबाह करने तक वो सब करते रहे।

जब उनके भाई लक्ष्मणजी बीमार हो गये तो उनके लिए सुषेण वैद्य ने कहा - पहाड़ उखाड़ कर लाइए। पहाड़ उखाड़ के भी लाते रहे और जप जप आपका सिर्फ जप, जप, जप एक ही बात सीख ली, दूसरी बात ही नहीं सीखी अब कुछ, बस वो सबसे सुगम वाला, बैठे-बैठे लकड़ी हिलाने वाला, सिर हिलाने वाला, जीभ की नोंक हिलाने वाला, आपने इतना सस्ता उपासना समझ लिया, इतनी सस्ती उपासना होती है कहीं, जिसमें त्याग न करना पड़ता हो, कष्ट न उठाना पड़ता हो, पुरुषार्थ न करना पड़ता हो - साधना कहीं ऐसी भी होती है? ऐसी भी साधना होती है? इतनी सस्ती होती है? साधना इतनी सस्ती होती है? इतनी कीमती चीजें आप इतने डैम चीप (damn cheap) कीमत में (ख) खरीदने की कोशिश करेंगे? मत कीजिए। वास्तविकता के नजदीक आइए - भगवान को प्राप्त करना चाहते हैं तो भगवान का कहना भी मानिए - शरणागति इसी का नाम है, समर्पण इसी का नाम है। समर्पण और शरणागति इसी का नाम है, कि हम भगवान का कहना मानें न कि भगवान को अपने कहने पर मजबूर करें। हमारी मनोकामना कीजिए, मनोकामना पूरी कीजिए, आप आप अपनी मर्जी पर भगवान को चलाएँगे, आपकी मर्जी पर चलेंगे वो, आप कौन हैं जरा बताइए अपना नाम तो बताइए, आप कौन हैं जो आपको ये ज़ुर्रत और ये (हि जो) हिम्मत होती है कि आप भगवान के ऊपर ये हुकुम चलाएँ कि आप हमारी मनोकामना (अभी कर दीजिए) पूरी कर दीजिए। शरीर आपको मिल गया, मन आपको मिल गया, कुटुम्ब आपको मिल गया, अकल आपको मिल गई, साधन आपको मिल गई, फिर भी आपकी ये ज़ुर्रत और ये हिमाकत कि आप भगवान से कहें कि जो अपनी देने की जरूरत की चीजों को जो आप आसानी से पूरी कर सकते हैं वो न करेंगे और भगवान जी इसको भी करें। एक दिन कहिए न भगवानजी से टट्टी धोया कीजिए हमारी, कहिए न भगवानजी से कपड़े धोया कीजिए ये कहिए न भगवानजी से, मनोकामना में ये भी तो शामिल है। आप क्यों पुरुषार्थ करने लगे, आप क्यों योग्यता सम्पादित करेंगे, आप तो ये सब काम भगवान से करा लीजिए, खाना चबाने के लिए भगवानजी से कहिए, आप खाना चबा करके हमारे मुँह में डाल जाया कीजिए, ऐसी क्या बात करते हैं।

आपको अपना पुरुषार्थ जाग्रत करना पड़ेगा, भगवान का कहना मानना पड़ेगा। ग्वाल बालों की बात सुनी है न आपने, ग्वाल बाल भगवान के परम प्रिय मित्र थे, उनके सहयोगी थे, सहचर थे, सखा थे, लेकिन ग्वालबालों को बजाय उन्होंने रामायण पाठ, अखण्ड रामायण पाठ कराने की बजाए अखण्ड कीर्तन कराने की बजाए उनसे कहा, आओ दोस्तों गोवर्धन पहाड़ उखाड़ेंगे, गोवर्धन पहाड़ को उठाएँगे। ग्वालबालों ने उनका ही कहना माना। किसी ने भी ये नहीं कहा कि साहब रामायण का अखण्ड पाठ कराइए हमको तो, हमको तो सत्संग कराइए, और हमको भण्डारा कराइए, हमको तो अमुक कराइए, कुछ नहीं कहा। भगवान तो, भगवान जिसका समर्पण उसका समर्पण, जिसकी आज्ञा उसकी आज्ञा, बस उनको जो हुकुम दिया गया, पहाड़ उठाना चाहिए, बस उन्होंने पहाड़ में ठेका लगाना और पत्थरों को जमा करना, ऐसा ही कर्तव्य समझा, मानों कोई बड़ा भारी पुण्य कर रहे हों, दान कर रहे हों। हममें कहाँ अकल है कि हम ये बात का फैसला कर सकें कि हमको क्या करना चाहिए, क्या करने के लिए किसी महती शक्ति के (साथ में) साथ में आप सम्बन्ध जोड़िए, और कठपुतली की तरीके से उसका कहना मान के चलिए, उसके पीछे-पीछे चलिए - यही सही और यही मुनासिब तरीका है। सही भी ये है, मुनासिब भी ये ही है, लाभदायक भी यही है।

इसीलिए युग सन्धि के समय में आपको जो काम करना है, बड़ा महत्त्वपूर्ण काम करना है। (आज) आज जन-जन के, मन-मन को परिष्कृत करने की आवश्यकता है। आदमी का मन, आदमी का चिन्तन ऐसा भ्रष्ट हो गया है, चिन्तन ऐसा भ्रष्ट हो गया है कि उसके आचरणों को दुष्ट बनाने में कोई हया-शर्म नहीं आती। दुष्ट आचरण फौरन कर लेता है क्योंकि चिन्तन जिसका भ्रष्ट हो गया उसको उसको आचरण को दुष्ट बनाने में क्या देर लगनी चाहिए। विचार आदमी के हैं ही नहीं, विचार सब अस्त-व्यस्त हो गये। आज सबसे बड़ी आवश्यकता विचार क्रान्ति की है, जन-मानस के परिष्कार की है, लोक-मंगल के लिए जन-जागरण की है। आप उस काम को करते हैं, तब फिर आप ये समझिए आप इस युग-सन्धि के समय पे, युग-साधना के बारे में जानकारी प्राप्तकर लेते हैं। अगर वो जानकारी प्राप्त हो गई तो फिर आपके मन में यही काम करना पड़ेगा जो आपको करना चाहिए।

आप जिस परिवार के मैंबर हैं, ये परिवार बड़ी मुसीबत से, बड़ी मुश्किल से बड़ी देखभाल से बनाया जाता है। इसको हमने ढूँढ़-ढूँढ़ करके, मोतियों को ढूँढ़-ढूँढ़ करके, कितनी डुबकी लगा करके कहाँ-कहाँ से इकट्ठा किया है और आपको किसलिए इकट्ठा किया है, और आपको (कि) किसलिए कल्प साधना में बुलाया है? (ता) ताकि आप भगवान के ऊपर इतना एहसान करने में समर्थ हो सकें कि आपका एहसान भगवान कभी नहीं भूलें। भगवान एहसान भूले नहीं - किसका? हनुमान का - हनुमान को (उ) उसने अपना छठवाँ कुटुम्ब का सदस्य बना लिया। आपने राम पंचायतन के चित्र देखे हैं न, इसमें पाँच तो वो हैं, चार भाई हैं और सीताजी हैं, पाँच राम पंचायतन हो जाता है लेकिन आपने उसमें हर चित्र में हनुमान जी को शामिल देखा होगा। छठवें हनुमान जी थे। क्यों? क्या वजह थी? सिर्फ एक ही वजह थी कि उन्हें 'राम काज कीन्हें बिना मोहे कहाँ विश्राम'। अपनी इच्छा से नहीं - अपना मन है बैकुण्ठ को जाएँगे, अपनी मुक्ति कराएँगे, अपना फायदा कराएँगे, अपने चमत्कार देखेंगे, अपनी सिद्धि देखेंगे, अपना ये करेंगे - (अ) अपनापन ही जब हटा दिया तो अपनी मर्जी क्या रही? भगवान की मर्जी जो कुछ थी वही उन्होंने पूरी कर डाली। बस रामचन्द्र जी के कुटुम्बियों में शुमार हो गये।

आप ऐसा ही कीजिए, अपनी मर्जी से की बातें मत लाइए। इस बाबा के पास, इस पण्डाजी के पास, इस बाबाजी के पास, इस गुरुजी के पास कहीं झक मत मारिए। आपके भीतर बैठा हुआ, अन्त:करण में बैठा हुआ भगवान मार्गदर्शन कर सकता है, और वो ऐसा सही मार्गदर्शन होगा जैसे कि अर्जुन के घोड़ों को चलाने में भगवान कृष्ण ने किया था। गाण्डीव चलाता था अर्जुन लेकिन घोड़े को चलाने का, रास्ता सही बताने का मोर्चे की जानकारी कराने का काम कृष्ण भगवान का था। आप ऐसा ही कर सकते हैं। आप ज्यादा बहस में पड़ने की बजाए, कि हमको ये करना है, ये करना है, ये स्कीम, वो स्कीम, ये स्कीम, वो स्कीम, नौ सौ निन्यानबे तरह की मत स्कीम बनाइए। आप एक ही स्कीम बनाइए कि हम किसी महती (स) सत्ता की छाया में बैठेंगे, (का) कहना मानेंगे। बच्चे बड़ों का कहना मानते हैं उसी में लाभ है। बन्दर की कहानी सुनी है, बन्दर का बच्चा था बस वो बाप मने कर रहा था अरे बाबा ये बढ़ई लकड़ी छील रहे हैं तू इससे दूर रह। मानता ही नहीं, मानता ही नहीं, एक दिन दो लकड़ियों के चीरने के बीच में जो फाना लगा हुआ था बन्दर ने उसको उखाड़ डाला। उखाड़ डाला तो हाथ दब गया। हाथ दब गया बस दूसरे दिन तक चीं-चीं करता रहा जब तक की उसके घर वाले न आये और बड़ी मेहनत से उसको निकाला नहीं, हाथ एक घायल ही हो गया था, टूट ही गया था, बर्बाद ही हो गया था (हनुमानजी का) उसका बन्दर का।

आप भी इसी तरीके से करेंगें, अपनी मर्जी, अपनी मर्जी, अपनी मर्जी, अपनी मर्जी, अपनी मर्जी, अपनी मर्जी, कहाँ तक करेंगे। हमको ये साधना बताइए, हमको ये बीज मंत्र बताइए, आप मत पूछिए। हमने ऐसा नहीं पूछा है। हमारे जीवन की साधना के बारे में हमने कभी अपने बॉस से ये नहीं पूछा, आप हमको ये बता दीजिए, ये कर दीजिए, इसका मंत्र बताइए, इसका तंत्र बताइए, अपनी मर्जी खतम कर दी। उससे कहा बताइए, हुकुम दीजिए, उसने जो कुछ भी कहा हमने बिना आँखें मूँद करके उसी के रास्ते पर चलते रहे, हमको ये विश्वास था कि हमको रास्ता दिखाने वाली सत्ता सही है, और हमारी अकल से उसकी अकल ज्यादा है। बस, यही होता रहा चलते हुए हम कहाँ पहुँचे, आप देखते हैं न। आपके लिए भी यही रास्ता है, आपके लिए भी यही रास्ता है। आपको समय की माँग, समय की माँग आपके सामने भी है और वो समय की माँग इस तरीके से है जिसको आपको पूरा करना ही चाहिए।

रामचन्द्र जी ने जब जन्म लिया था, तब उनके साथ-साथ में देवता आए थे। देवताओं ने कहा मनुष्य बड़े चालाक होते हैं, मनुष्यों में त्याग का माद्दा कहाँ, परोपकार का माद्दा कहाँ, सेवा का माद्दा कहाँ, मनुष्य तो केवल स्वार्थ की बात सोचते रहते हैं। आप जो काम करने जा रहे हैं उसके लिए स्वार्थियों से सहयोग से थोड़े ही काम चलेगा, परमार्थियों के दल चाहिए। परमार्थियों के दल कहाँ से आएँगें, आज कल संसार में हैं भी नहीं, चलिए हम आपके साथ चलते हैं। बस सब लोग आये थे और (कोई हनुमानजी किसी के) शंकर जी हनुमानजी के रूप में, कौन किसके रूप में आ गया था, बन्दरों के रूप में देवता आ गये थे। उन्होंने देवताओं ने देवताओं की भूमिका निभाई। आज आप भी, भगवान जो अवतार ले रहे हैं, प्रज्ञावतार, उसके साथ-साथ में उन्हीं देवताओं की तरीके से, जिनको कि भगवान के काम में हाथ बँटाना (और) हिस्सा बँटाना है। और भगवान के श्रेय में भी हिस्सा बँटाना है, (आप) उनकी प्रसन्नता में भी हिस्सा बँटाना है, उनकी शक्तियों में भी हिस्सा बँटाना है - ये बँटाने के लिए जरूरी है कि आप इसकी कीमत चुका दें, और भगवान की मर्जी पर इस समय चलना स्वीकार कर लें।

समाज के नए निर्माण का युग है, समाज को नए ढाँचे में (ढा) ढाला जाना है। पुराना ढाँचा इतना गलीज हो गया है कि अब गलाने और ढालने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। इस गलाई में आप हिस्सा बँटाइए, इस ढलाई में आप हिस्सा बँटाइए। अपने समय को ले के आइए, शक्ति को ले के आइए, मन को ले के आइए, भावना और विचारों को ले करके आइए और उस काम में जुट जाइए (जो) जो आज का भगवान, इस युग का भगवान, जिसको हम प्रज्ञावतार कहते हैं, प्रज्ञावतार कहते हैं - उस प्रज्ञावतार की मर्जी क्या है, जरा आप आँख खोल के देखिए और कान खोल के सुनिए। अगर आप कान खोल कर देखेंगे और आँख खोलकर सुनेंगे तो आप कुछ ऐसी (बात) जानकारी मिलेगी, जैसे कि प्रज्ञा अभियान के अन्तर्गत आपको बार-बार बताई जा रही है। ये भगवान की प्रेरणा है, ये भगवान की दिशाधारा है।

देवताओं ने (देवताओं ने अर्जुन उनके) कृष्ण भगवान के साथ भी यही किया था। कृष्ण भगवान ने देखा कि जब जा रहे हैं इनका सहयोग कौन करेगा? अकेले कैसे क्या कर पाएँगे? देवताओं ने कहा कि भगवान हमको भी आज्ञा, चलने दीजिए, हम भी आपके साथ-साथ चलेंगे, आपके काम में हाथ बटाँएगे। भगवान ने हाँ कह दिया बस फिर सारे देवताओं ने जन्म ले करके उनके साथ-साथ सहयोग किया। पाण्डव कौन थे आपको मालूम है, कथा पढ़ी है नहीं पढ़ी है। अच्छा पाण्डव जो थे पाँच देवताओं के बेटे थे। कर्ण जो था वो भी देवता का बेटा था, कुन्ती के गर्भ से देवता पैदा हुए थे और देवता सिर्फ इसीलिए पैदा हुए थे कि भगवान श्री कृष्ण के काम आएँ। और क्या किया बताइए, धर्म राज ने क्या किया, अर्जुन ने कौन सा बड़ा काम कर लिया, भीम ने क्या-क्या किया, नकुल-सहदेव किस काम में लगे रहे? सब सबने मिलजुल करके सिर्फ एक ही काम किया - भगवान का गोवर्धन उठाए हैं और भगवान के काम आएँ। ये कैसे उत्पन्न हो गया? क्योंकि वे देवता थे पहले जन्मों के, देवताओं की भावनाएँ इसी तरीके की होती हैं।

स्वार्थियों की भावना, चालाकों की भावना, मोहग्रस्तों की भावना, पाप की कीचड़ में डूबे हुए लोगों की भावना तो ये हो सकती हैं उनको ज्यादा पैसा मिलना चाहिए, ज्यादा इज्जत मिलनी चाहिए, हमारी औलाद को बड़ा सम्पन्न होना चाहिए, बस-बस इससे आगे कुछ है ही नहीं। लेकिन भावनाएँ उनकी वही होती हैं - देवताओं की - कि हमको परोपकार करना चाहिए, भगवान की आवश्यकताओं को समझ करके (उसमें) योगदान देना चाहिए। अर्जुन ने उस समय सब पाण्डवों ने यही किया सारी जिन्दगी भर। देवता थे न, आप भी ठीक उसी तरह के हैं - आप अपने आप को देवता मानें तो (को) कोई हर्ज़ नहीं है।

(आप) ये प्रज्ञावतार का युग है। भगवान की नई शक्तियों ने जन्म लिया है, ज्ञान की गंगा के रूप में, ज्ञान की गंगा के रूप में। इसी समय उनका जन्म हुआ है, और वो बराबर ये कोशिश कर रही हैं कि लोगों के खयालात बदल दें, और नए विचारों की स्थापना हो। ये प्रज्ञा अभियान उसी का है। ये योजना भगवान की है, और भगवान ही वास्तव में इसका संचालनकर्त्ता है। व्यक्ति विशेष करता हो उससे क्या हुआ। हवाई जहाज तो पेट्रोल से उड़ता है। ठीक है ड्राईवर कोई उड़ाता थोड़े ही है, मशीन घुमा देता है। ठीक है हम हैं दूसरे और लोग हैं ये तो कोई मशीन घुमा देते होंगे, ताकत कहाँ से आई इतनी? हवाई जहाज तो करोड़ों रुपये का आता है। ये करोड़ों रुपये का हवाई जहाज पैदा करने की शक्ति किसी और में है।

आप उसी तरीके से कीजिए। आप इस समय अपने (सारी) विचारों को और सारी इच्छाओं को सिर्फ इस काम में लगा दीजिए कि हमको समय की माँग पूरी करनी है, युग की भूमिका निभानी है। युग की भूमिका निभाने के लिए आप आगे-आगे बढ़ें, आपको पूरा श्रेय मिलेगा। जाग्रत आत्माएँ हमेशा आगे-आगे बढ़ी हैं। उन्होंने इंतज़ार नहीं देखा है, कि (दू) दूसरे करेंगे तो हम करेंगे। हिमालय पे सबसे पहले, जो ऊँचा शिखर होता है, उस पे धूप चमकती है। आप भी अपने ऊपर धूप चमकाइए सबसे पहले। झण्डा आगे-आगे चलता है, दूर से दिखाई पड़ता है, आप आगे-आगे चलिए और दूसरों को रास्ता बताइए। लड़ाई में बैण्ड-बाजे, बिगुल-बाजे आगे-आगे चलते हैं। आप बैण्ड-बाजे वाले बनिए और बिगुल बजाइए ताकि सारी सेना में हिम्मत पैदा हो सके। आपको कुछ ऐसे ही शानदार काम करने हैं, इस समय में। आप जाग्रत आत्मा हैं - जाग्रत (आ) आत्माओं को, युग प्रहरियों को, युग को देखना पड़ेगा, युग की ज़रूरतें क्या हैं? युग की ज़रूरतें क्या हैं? आपकी इच्छा क्या है? अरे बाबा एक कोने में रखिए, आपकी इच्छा क्या है? हम कहते हैं अपनी इच्छा को (ए) एक कोने में रखिए। भगवान की इच्छा क्या है? समय की माँग क्या है? प्रज्ञावतार की माँग क्या है? आप कान खोल के उसी को सुनिए, और सुनने के बाद में पूरी हिम्मत के साथ में, पूरी वफादारी और जिम्मेदारी के साथ में, भगवान के काम करने के लिए कटिबद्ध हो जाइए। आज की युग साधना, युग साधना यही बताती है - हमको लोक मानस का परिष्कार करना है, जन-जागरण करना है - इन उद्देश्यों के लिए अगर आप अपने आप को समर्पित कर दें, इनकी पूर्ति के लिए जीवन भर लगे रहें - समझना चाहिए आपको सही रास्ता मिल गया। तीर्थ आपको बहुत कुछ देगा लेकिन कुछ आप को भी करना है, आप भी कीजिए। आप भी युग चेतना की सहायता करेंगे तो आप धन्य हो करके रहेंगे जैसे कि प्राचीन काल के भगवान के सहयोगी धन्य बन करके रहे। समाप्त ॥

॥ॐ शान्तिः॥