शान्तिकुञ्ज — एक श्रेष्ठ गायत्री तीर्थ

कुछ काम ऐसे हैं जो बाहर के लोग कर सकते हैं, और कुछ काम ऐसे हैं जो स्वयं करने चाहिए। दोनों मिल करके ही एक पूर्णता बनती है। अकेले बाहर के अनुदानों से आज तक किसी का काम नहीं चला, और केवल अकेले पुरुषार्थ से (ये) आदमी कोई सम्पन्न आज तक बना नहीं है। दोनों के सहयोग से होता है। बाहर के अनुदान और अपना पुरुषार्थ, दोनों को मिला दें तो एक बात पूरी बन जाती है। अनुदान, बाहर से। खाना पका कर के किसी ने दिया। बहुत सुन्दर भोजन, पौष्टिक भोजन, लेकिन आपको हजम तो आपको ही करना पड़ेगा न। मुँह से तो आप ही चबाएँगे। नहीं चबाया तब, बाहर वाला ही चबा के आपके मुँह में डाल जाए, नहीं ये मुश्किल है। और फिर आपके पेट में बैठ करके कोई आदमी हजम करके खून में शामिल कर दे ये और भी मुश्किल है। ये काम तो हर हालत में आपको ही करने चाहिए। बाहर का आदमी अधिक से अधिक ये कर सकता है कि आपको बहुमूल्य भोजन बिना कीमत के भी पका के दे दे और आपको सम्मान पूर्वक खिलाए। उसका काम था वो पूरा हो गया, आपका काम है इसको समझना।

आपकी शादी हुई थी न, शादी हुई थी तो आपको अच्छी-खासी धर्म पत्नी मिली थी न, ये किनने दी थी? उस लड़की के माता-पिता ने बड़ी मेहनत से बड़ी सुयोग्य लड़की बना करके, पाल-पोष करके, शिक्षित बना करके आपके हवाले की थी। एक काम पूरा हो गया न, हाँ हो गया। लेकिन, लेकिन एक काम बाकी रह गया है। आपके घर में धर्म पत्नी के आने के बाद में आपका देखभाल आपको ही करनी पड़ेगी, निर्वाह आपको ही करना पड़ेगा, उसकी जिम्मेदारियाँ आपको ही वहन करनी पड़ेगी। अगर आप उनकी जिम्मेदारियाँ वहन नहीं कर सकते और आप उनकी खान-पान का और रहन-सहन का प्रबन्ध नहीं कर सकते और आप उसको इज्जत दे करके सहयोग प्राप्त नहीं कर सकते, तो उनके माता-पिता का दिया हुआ अनुदान आपके लिए निरर्थक चला जाएगा। वो आपको धर्म पत्नी मिली है, आपके कोई खास काम न आ सकेगी, आपके लिए भार बन के रहेगी। आप भी कुछ कीजिए, दूसरे भी कुछ करेंगे, दोनों को मिला देने से एक बड़ी बात बन जाती है।

यहाँ हमने जो कुछ बना है आपके लिए बना करके रखा है, बहुत सुन्दर और बहुत कुछ बना के रखा है। लेकिन आपको, हजम तो आपको ही करना चाहिए, महसूस तो आपको ही करना चाहिए। हमारे करने (से का) जो सीमा थी, वो हमने पूरी तरीके से कर दिया। क्या कर दिया? आपके लिए एक वातावरण बना कर के हमने रखा है। शान्तिकुञ्ज में क्यों बुलाया? वातावरण के लिए बुलाया है। जो आपको क्रिया-कृत्य कराये जा रहे हैं वो तो आप अपने घर पर भी कर सकते थे। घर पे आप न कर सकते हों, कौन सी चीज ऐसी है जो आप घर पे नहीं कर सकते थे। खान-पान का जो आपको नियम-बन्धन बताये गये हैं क्या आप घर पर नहीं कर सकते थे, क्यों नहीं कर सकते थे? क्या वजह है जो नहीं कर सकते थे। जप-अनुष्ठान जो आप से कराया जा रहा है क्या आप घर नहीं कर सकते थे? जरूर कर सकते थे। जो पुस्तकें पढ़ने का जो नियम-मर्यादा पालन करने के लिए यहाँ कहा गया है आप घर पर भी कर सकते थे, लेकिन फिर यहाँ क्यों आना पड़ा? यहाँ का वातावरण है। वातावरण बनाने के लिए हमने बहुत मेहनत की है, और वातावरण (का) आप कीमत समझिए - वातावरण (का) आप कीमत समझेंगे नहीं तो आप भूल करते रहेंगे।

गुरु वशिष्ठ ने (रामचन्द्र को) रामचन्द्र जी से कहा - अब बुढ़ापे का समय आ गया, अब भगवान की भक्ति में और जीवन को ऊँचा उठाने में कुछ प्रयत्न करना चाहिए। रामचन्द्रजी ने कहा, तो बताइए फिर, उनने कहा यहाँ कहाँ बताएँ, वातावरण में चलना पड़ेगा। यहाँ का वातावरण कहाँ है? अयोध्या के वातावरण में आप रहते हैं, लेकिन यहाँ वातावरण की कोई गुंजाइश नहीं है। आपके सम्बन्धी रहते हैं, कुटुम्बी रहते हैं, राजपाठ के लोग आते रहते हैं, कितने आप विचार करते रहते हैं, कितनी आपको खीज पैदा होती है, कितना आपको सहयोग-समर्थन मिलता रह सकता है मिलता है, कितनों से आपका लगाव है, कितनो से आपको नाखुशी है। यहाँ के वातावरण में आध्यात्मिकता के पनप जाने की कोई सम्भावना नहीं है। आपको अयोध्या छोड़नी चाहिए, अयोध्या के साथ में जो आपके जुड़े हुए मोह बन्धन हैं, वो जब तक जकड़े हुए रहेंगे, मन भगवान की तरफ चलेगा ही नहीं, भक्ति आप कर ही नहीं सकेंगे, आध्यात्मिक उन्नति का कोई रास्ता खुल ही नहीं सकेगा। इसलिए आपको यहाँ से चलना पड़ेगा।

कहाँ चलना पड़ेगा? गुरु वशिष्ठ ने कहा - तो हमारे नजदीक चलिए, जहाँ हम रहते हैं। गुरु वशिष्ठ की गुफा वहीं थी, हिमालय पे; उसके पास उन्होंने चारों भाइयों को बुला लिया। रामचन्द्र जी देवप्रयाग रहने लगे, लक्ष्मण जी लक्ष्मण झूला पे रहने लगे, भरत जी ॠषिकेश में आ के (अपने) जम गए, और शत्रुघ्न ने मुनि की रेती पर अपना स्थान और अपनी जगह बना ली, और चारों अलग-अलग रह कर के गुरु वशिष्ठ के सान्निध्य में शिक्षण प्राप्त करने लगे। क्यों, अयोध्या में क्या कमी थी? अयोध्या में वातावरण नहीं था।

हिमालय का वातावरण है, संस्कारी वातावरण, जिसमें कि हजारों वर्षों से लोगों ने तप किए हैं, साधनाएँ की हैं। वो कहाँ था अयोध्या में बताइए, अयोध्या में तो राजपाठ होता था, लड़ाई-झगड़े होते थे, मुकदमे होते थे, दूसरी बातें होती थीं पर वहाँ तप का वातावरण कहाँ था? हजारों वर्षों से तप जिन ऋषियों ने किया है उससे हिमालय का वातावरण बन गया इसीलिए रामचन्द्रजी को गुरु वशिष्ठ की आज्ञा मान करके देवप्रयाग आना पड़ा, योगवशिष्ठ उन्होंने वहीं पढ़ाई। अयोध्या में, अयोध्या में नहीं पढ़ा सकते थे, राजपाठ की सलाह देते थे आप ऐसे कीजिए, गद्दी ऐसे चलाइए लेकिन आध्यात्मिक विषयों के लिए उन्होंने देवप्रयाग मुनासिब समझा, और वहीं उनसे साधना कराई - चारों भाइयों समेत भगवान वहीं रहे, क्योंकि वातावरण की बहुत अपेक्षा होती है, आध्यात्मिक जीवन में। आध्यात्मिक जीवन में ही नहीं, सांसारिक जीवन में भी।

आप सांसारिक जीवन की बात जानते हैं न। सांसारिक जीवन में भी अगर वातावरण न मिले तब, तब फिर बहुत मुश्किल हो जाएगा। चन्दन खुशबूदार चन्दन मैसूर, बैंगलोर, किरात में पाया जाता है। उसी चन्दन के पेड़ अगर आप वहाँ से ले आवें और दूसरी जगह लगा दें तो उसमें सुगन्ध ही नहीं आएगी, सुगन्ध ही नहीं आएगी। चन्दन तो पैदा हो जाएगा, चन्दन न हो तब ऐसी क्या बात है, जो सुगन्धि होती है। वहाँ के वातावरण, वहाँ की जलवायु पर टिकी हुई है। नागपुर के सन्तरों के बारे में सुना है न आपने। नागपुर के सन्तरे, बम्बइया केले आप सुनते है न। क्यों साहब कोई सन्तरे यहाँ ले आइए, ले आइए आप, अपने यहाँ लगवा के देखिए, देखिए वैसे जैसे मीठे नागपुर में होते हैं आपके यहाँ नहीं हो सकेंगे। बम्बइया आम जैसा मीठा होता है वैसा नहीं हो सकता, कलकत्तिया केला जैसा मीठा होता है वैसा आपके यहाँ नहीं हो सकता। कारण, कारण तो कुछ भी नहीं, कारण तो एक ही है कि वहाँ का वातावरण, उनकी अपनी विशेषता है।

आपने बंगाल निवासियों के स्वास्थ्य देखे हैं न। दुबले वाले, छोटे-छोटे, ठिगने। और सीमा प्रान्त के लोग देखे हैं न आपने, सीमा प्रान्त के लोग कितने बड़े-बड़े कितने मोटे मजबूत होते हैं। क्या खाते हैं वो ही दाल-रोटी वो खाते हैं, वो ही ये खाते हैं। क्या बात है? वो इतने मोटे कैसे हो जाते हैं, मजबूत कैसे हो जाते हैं और बंगाल वाले कैसे कमजोर रह जाते हैं? वातावरण का सवाल है। संसार का वातावरण भी एक असर रखता है। बीमारों को वहाँ सेनीटोरियम में ले जाते हैं न, सेनीटोरियम में क्या बात है। वो ये इलाज यहाँ करा ले। वहाँ की जलवायु अलग तरह की होती है। जलवायु में अच्छी जलवायु में रह करके मरीज का इलाज कराने से बात बहुत जल्दी बन जाती है और अपने घर रह करके आप करें तो वो इलाज इतना करगर नहीं हो सकता।

महाभारत का युद्ध हुआ था, तब भगवान ने कोई ऐसा स्थान तलाश करवाया था जहाँ दोनों में लड़ाई-झगड़ा होने में सहायता मिले। नहीं तो दोंनों भाई-भाई हैं लड़ेंगे नहीं, आपस में सुलह-मशवरा कर लेंगे। भगवान ने आदमियों को - नौकरों को भेजा और ये कहा ऐसी जमीन (ले) दो जहाँ लड़ाई-झगड़े का वातावरण बना हुआ हो। दूत गये, उन्होंने दो भाइयों को लड़ते हुए देखा और एक भाई ने दूसरे भाई को मार डाला। खबर ला के दी। बस उन्होंने कहा - वो ही जगह ऐसी है खून-खच्चर की, वहीं कुरुक्षेत्र कराना चाहिए। भगवान ने महाभारत के लिए जो स्थान चुना, वो कुरुक्षेत्र चुना। कुरुक्षेत्र का वातावरण ऐसे ही था। ऐसे वातावरण में ही लड़ाई-झगड़ा होना सम्भव था।

एक और भी पुरानी बात है, श्रवण कुमार अपने माता-पिता को कन्धे पर बैठा करके ले जा रहे थे तीर्थ यात्रा कराने के लिए। मेरठ के पास, यूपी में एक मेरठ नाम की जगह है वहाँ मेरठ के पास उस लड़के ने कहा क्योंजी माता-पिता से आप से कहा आँखें तो खराब है टाँगें तो खराब नहीं हैं, हम आपकी लकड़ी पकड़ लेंगे आप चलिए पीछे-पीछे, हमारे कन्धे पे सवार क्यों होते हैं? श्रवण कुमार के पिता अचम्भे में रह गये, अचम्भे में रह गये। उनका मतलब ये था कि हमारा लड़का सारे संसार में अजर-अमर हो कर रहे, सारी दुनिया उसका नाम लिया करे, उसके बच्चों को इतिहास देने के लिए उसकी जीवन की गाथा ऐसी बन जाए, ये मतलब था। सवारी का और कोई मतलब थोड़े ही था। उन्होंने कहा अच्छा बेटे जैसा तुम कहोगे वैसा ही करेंगे पर एक काम करो आज रात को हम ठहरेंगे नहीं, यहाँ से बहुत दूर चलना चाहिए और इस इलाके को पार कर लेना चाहिए। श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता का कहना माना और उस इलाके से बहुत दूर चला गया। जैसे ही इलाका खतम हुआ वैसे ही श्रवण कुमार को बहुत आश्चर्य हुआ अपने ऊपर और वो फूट-फूट कर रोने लगा। उसने कहा पिताजी मैंने क्या कह दिया आपको, मैंने कहा था आप अपने पैरों पर चलिए, मेरे लिये कितना बड़ा श्रेय और सौभाग्य, जो मिला था उसको मैं छोड़ना चाहता था। (उन्होंने) उनके पिता ने कहा - बेटे डरने की कोई बात नहीं है, जहाँ तुम्हारे मन में वो विचार आये थे वो स्थान ऐसा था जहाँ मय नाम का एक दानव हुआ है उसने अपने माता-पिता को मार डाला था, बस उसी स्थान पर होकर चल रहे थे। उसके संस्कार उस भूमि में पड़े हुए थे, भूमि के संस्कारों की वजह से तुम्हारे ऐसे मन में विचार आ गये।

समझे न आप, क्या समझे? वातावरण का बहुत भारी असर होता है, इसीलिए आपको हमने यहाँ वातावरण में बुलाया है। हिमालय के नजदीक बुलाया है; हिमालय जहाँ से शुरू होता है, जहाँ ॠषियों (ने सब का) सप्त ॠषियों का स्थान था। जहाँ स्वर्ग था - स्वर्ग कहाँ था? स्वर्ग हिमालय के उस इलाके में है जिसको नन्दनवन कहते हैं - गोमुख से आगे। स्वर्ग जमीन पे था। सुमेरु पर्वत वहीं है। देवता भी इसी इलाके में रहते थे, हिमालय वाले में। सारे के सारे महत्त्वपूर्ण ॠषि, (जि) जिसमें सप्त ॠषियों से ले करके सनक-सनन्दन तक, और नारद से ले कर के आदि गुरु शंकराचार्य तक, जितने भी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हुए हैं, उनकी साधनाएँ इसी स्थान में हुई हैं। इसीलिए हिमालय का अपना वातावरण है।

गंगा की महत्ता तो आप सुनते है न, गंगा की कितनी बड़ी महत्ता है। गंगा को सारा संसार जाने क्या-क्या मानता है, भौतिक दृष्टि से, आध्यात्मिक दृष्टि से भी। यहाँ गंगा भी प्रभावित होती है। जिस स्थान पर ये हमने शान्तिकुञ्ज बनाया है, इसमें हमारे गुरुदेव ने इस स्थान का महत्त्व बताया था कि सात ॠषियों का यहाँ (त) तप हुआ था। पाँच गंगाएँ, जो अभी तो दिखाई पड़ती हैं, यहाँ सात ॠषियों की सात गंगाएँ थीं - दो गंगाएँ गायब हो गई हैं। वो कहाँ गईं? उसी स्थान पे थीं जहाँ शान्तिकुञ्ज बना हुआ है। एक धारा यहाँ बहा करती थी, बन्धा लगा करके यहाँ से उस धारा को रुकवा दिया है लेकिन तो भी गंगा का पानी उछलता रहता है जमीन में से। शान्तिकुञ्ज के पीछे एक नाला बहता है वो जमीन में से उछल के निकलता है और कहाँ है? आप जरा सा गड्ढा खोदिए गंगा जल तैयार है। गंगाजी का लेवल उसका देखिए ये गंगा का तट है, गंगा जी का तट नहीं है, (ये) बीच गंगा है, और ये हिमालय का द्वार है, और, और यहाँ आपको ऐसा प्राणवान सान्निध्य है जैसे कि शेर और गाय (दोनों) दोनों मिलकर के जहाँ पानी पीते थे - ऐसे ही वातावरण है यहाँ।

ऋषियों के आश्रम में जहाँ बहुत शानदार यहाँ सान्निध्य यहाँ ऐसे लोगों का सान्निध्य आपको मिला है इसके लिए आप सारे हिन्दुतार भर में अगर घूमें और ये तलाश करें कि ऐसे प्राणवान सान्निध्य कहीं मिलेंगे क्या, न, ऐसे प्राणवान सान्निध्य, प्राचीन काल में ऋषियों के रहे होगें, मैं ये तो नहीं कहता कि कभी नहीं थे, आज आपको आध्यात्मिकता का सही वातावरण अन्यत्र मिलेगा नहीं। ऐसे, शान्तिकुञ्ज में आपको हमने साधना करने के लिए बुलाया है। तब बात पूरी हो जाएगी? ना, बात (प) पूरी नहीं हो सकती; आपको इसके साथ में अपनी श्रद्धा सँजो कर के रखनी पड़ेगी। श्रद्धा को सँजो करके अगर आप नहीं रखेंगे तब, तब फिर ये भी जमीन वैसी है, मछली पकड़ने वाले भी गंगा में घूमते रहते हैं, श्रद्धा नहीं है। श्रद्धा नहीं है तो क्या फायदा कर सकती है, श्रद्धा के अभाव में। श्रद्धा के भाव में ये ही गंगा तरण तारिणी हो जाती है मृतकों का उद्धार कर देती है, और श्रद्धा के अभाव में ये ही केवल लहर रह जाती है पानी रह जाती है। आपकी श्रद्धा का अपना समन्वय करना पड़ेगा। आप यहाँ निवास करते हैं तो कृपा कर के (इस) अपनी श्रद्धा को जीवन्त कीजिए, और आप अपने आपको ये अनुभव करना शुरू कीजिए (कि) आप किसी ऐसे स्थान पर निवास करते हैं, जहाँ (के) वातावरण आपके साधना को सफल बनाने में समर्थ है। सफल यहाँ बना सकते हैं।

ये सप्तऋषियों की तपस्थली है। गायत्री के ॠषि - (विश्वामित्र) विश्वामित्र - जिन्होंने गायत्री मंत्र का साक्षात्कार किया है, ठीक इसी स्थान पे तप करते थे। सात ऋषि है न उसमें एक विश्वामित्र भी हैं। विश्वामित्र कहाँ रहते थे? कुटिया कहाँ थी, यहीं थी जहाँ शान्तिकुञ्ज है। ये विश्वामित्र का स्थान है। वातावरण का कितना असर पड़ता है ये आपने देखा है न। टिड्डा बरसात के दिनों में हरा होता है और गरमी के दिनों में पीला हो जाता है। क्यों, पीला क्यों हो जाता है? इसलिए हो जाता है कि चारों ओर सूखी हुई घास पीला हुआ रेत दिखाई पड़ता है, उसको देखते-देखते वो पीले रंग का हो जाता है। बरसात में हरा रंग चारों ओर छाया रहता है, हरा हो जाता है। भट्टी के नजदीक बैठे है न आप, भट्टी जब गरम होती है तो उसके नजदीक बैठने वाले भी गरम हो जाते हैं। बर्फ की फैक्ट्री में कभी आप घुसे हैं, बर्फ के भीतर उसमें ठण्डक पड़ती रहती है जो घुसता है वो भी ठण्डा हो जाता है। ये ठण्डा है, ये भट्टी है, ये बरफ की फैक्ट्री है। आपका यहाँ अनुभव, यहाँ अनुभव, आप ये करेंगे एक चीज है लेकिन लेकिन एक बात फिर रह जाती है यहाँ का वातावरण आपसे पूरा लाभ मिल जाए वो मिल न सकेगा, आपकी श्रद्धा बहुत जरूरी है। श्रद्धा अगर आपके अन्दर न हो, आप केवल इसको इमारत देखते हो कोई आश्रम देखते हों और कोई क्वार्टर देखते हों, कोई होटल-धर्मशाला देखते हों तो आपके लिए ठीक वही है, जो आप देखते हैं।

आपकी (श्रद्धा) श्रद्धा अगर जगी तो ये तीर्थ है। ये गायत्री का हमने तीर्थ बनाया है। इसमें तीर्थों की जो विशेषताएँ होती हैं, वो सब विशेषताएँ पैदा की हैं हमने, कोई कमी नहीं छोड़ी है। जो एक शानदार, श्रेष्ठ और समर्थ तीर्थ बनाने के लिए, किसी स्थान के लिए जो प्रयत्न किए जाने चाहिए, वो सारे प्रयत्न किए गए हैं। रामचन्द्र जी ने दस अश्वमेध किये थे इसीलिए दशाश्वमेध घाट तीर्थ हो गया। और, और बड़ी-बड़ी बातें दुनिया में जहाँ होंगी, ये तीर्थ हमेशा से थोड़ी थे, प्रकृति के सभी स्थान हैं, ऐसे ये भी थे। लेकिन जब कोई महान घटनाएँ घटित हो गईं और कोई महान कार्य सम्पन्न हो गए तो वो ही स्थान बन गये तीर्थ। तीर्थ के लिए (इसकी) भूमि को संस्कारवान बनाना पड़ता है। (संस्कारवान) (प्र)

प्राचीनकाल में ॠषियों ने गुरुकुल बनाए थे, आरण्यक बनाए थे, साधना के बड़े-बड़े अनुष्ठान सम्पन्न होते थे - हम भी तो यही कर रहे हैं। यहाँ (कि) कितने चौबीस लक्ष के पुरश्चरण हो चुके हैं - आप जानते हैं? हर साल नवरात्रियों में चौबीस करोड़ का यहाँ पुरश्चरण हो जाता है। हर दिन यहाँ नौ कुण्ड के हवन में हजारों आहुतियाँ दी जाती हैं। यहाँ अखण्ड दीपक जलता रहता है। यहाँ हमारी और माताजी की नियमित रूप से कठोर तपश्चर्या अभी भी चलती रहती है। इससे वातावरण नहीं बनेगा? वातावरण बनता है, और हमारे गुरुदेव परोक्ष रूप से यहाँ छाए रहते हैं। गायत्री माता का प्रकाश और आलोक, आप चाहें, अगर आपके अन्दर श्रद्धा हो, तो अनुभव कर सकते हैं। यहाँ गायत्री माता का आलोक छाया रहता है। यहाँ हमारे गुरुदेव का संरक्षण छाया रहता है। यहाँ हमारा प्राण फैला रहता है। यहाँ, आपको कहा था न एक दिन, कि अपने आप को अनुभव कीजिए कि आप माताजी के गर्भ में निवास करते हैं। आप सही अनुभव करते हैं, मुर्गी अपने अण्डे को छाती के नीचे लगा कर के बैठी रहती है, और अण्डा पकते रहते हैं। (हम भी) हम लोग भी आपको छाती से लगा के बैठे रहते हैं, और आपको पकाते रहते हैं।

इतना होते हुए भी जिस बात के लिए आज आपको निवेदन किया जा रहा है, वो ये है कि आपकी स्वयं की श्रद्धा जीवन्त रहनी चाहिए। अगर आपने अपनी श्रद्धा को परित्याग कर दिया, तो इस वातावरण से आपको कतई, कोई लाभ नहीं मिलेगा और जैसे दूसरे लोग भी आते हैं, कोई चोर साँप भी आते होंगे, कोई उचक्के, उठाईगीरी भी आते होंगे, कोई और मेहनत-मजदूरी करने वाले लोग भी आते होंगे, आप भी उसी तरीके से यहाँ से चले जाया कीजिए। यहाँ रिक्शेवाले आते हैं, मोटर ड्राईवर आते हैं, स्कूटर लेकर आते हैं, बस बीड़ी पीते हैं और बाहर चले जाते हैं, भाग जाते हैं, उनके लिए इस आश्रम का कोई महत्त्व है, कोई महत्त्व नहीं है क्योंकि उनकी श्रद्धा नहीं है। श्रद्धा के अभाव में कोई बाहरी चीजें कोई ज्यादा लाभ नहीं दे सकतीं।

आपको आज मैं भाव श्रद्धा के ऊपर बहुत जोर देना चाहता हूँ। अगर आप यहाँ से लाभ उठाना चाहते हों, तो आप श्रद्धा को (मज) मत छोड़ना। चमत्कार मत देखना। चमत्कार दिखाइए, चमत्कार दिखाइए, क्या चमत्कार दिखाएँ, कुछ ऐसा दिखाइए, कोई अचम्भा दिखाइए, कोई घोड़ा-बन्दर दिखाइए, कुछ लक्ष्मी-गणेश दिखाइए, बेकार बात मत कहिए आप। आप श्रद्धा जगाइए, और (आप यहाँ) आप यहाँ के कण-कण में से अमृत बरसता हुआ, और आलोक उछलता और उभरता हुआ देखिए श्रद्धा अगर कहीं है तो, नहीं है तो मिट्टी है और दूसरी इमारत होती हैं ये भी इमारत है। मीरा को एक पत्थर का टुकड़ा दे दिया गया था, उस पत्थर के टुकड़े को ले करके मीरा ने ये मान लिया कि हमारे पति हैं और ये भगवान हैं। उनकी श्रद्धा ने उस पत्थर को, उस पत्थर को साक्षात् भगवान बना दिया। ये उसने गिरधर गोपाल ने मीरा का जहर पी लिया था, जहर का प्याला पी लिया था और मीरा बचे हुए पानी को पी करके ज्यों की त्यों बनी हुई थी। साँप का पिटारा आया था, गिरधर गोपाल पत्थर से - उन साँपों से खेलते रहे, मीरा को आखिर में पिटारा बन्द कर दिया और रख दिया। मीरा को किसी ने नहीं काटा, कोई नुकसान नहीं हुआ। कैसी ये कैसे हो गया? अरे गिरधर गोपाल की बात, गिरधर गोपाल कौन? पत्थर का टुकड़ा - नहीं, पत्थर का टुकड़ा नहीं सशक्त और जीवन्त। कैसे? मीरा ने अपनी श्रद्धा को समर्पित किया था; श्रद्धा (को) मिल जाने से ही पत्थर गिरधर गोपाल बन सका।

और अब वो पत्थर जहाँ-तहाँ पड़ा हुआ है, आप जा के देख सकते हैं उसमें कोई चमत्कार नहीं है। पत्थरों में क्या चमत्कार हो सकता था। क्या हुआ, केवल श्रद्धा से पत्थर, पत्थर भी भगवान बन सकते हैं। एकलव्य की बात सुनी है न आपने। एकलव्य भील का लड़का था। भील के लड़के ने एक मिट्टी के गुरु बना लिए द्रोणाचार्य, मिट्टी के द्रोणाचार्य इतने समर्थ सिद्ध हुए कि कौरवों और पाण्डवों को जो बाण विद्या असली द्रोणाचार्य ने सिखाई थी उससे कहीं ज्यादा इनको आ गई। किनको आ गई, एकलव्य को। रामकृष्ण परमहंस थे न, रामकृष्ण परमहंस थे काली के अनन्य उपासक थे। लोगों ने शिकायत कर दी (ये अन्न खा) इसमें से छूठन फैला देते हैं और जो भोग है स्वयं खा जाते हैं। रानी रासमणि ऊपर छत पर गई और वहाँ से छिप करके देखती रहीं। सही बात ये हुई काली से कहने लगे माँ आप भोजन कीजिए, उन्होंने कहा वो तो चुप रहीं, क्या कहतीं। रामकृष्ण ने कहा अच्छा तो हम पहले खा लें, पहले बेटा खा लेगा तब माँ खाएगी। ऐसे ही किया, उन्होंने आधा भोजन स्वयं कर लिया और जब उससे कहा तो माता अब आपको करना पड़ेगा। बस रानी रासमणि ने देखा पत्थर की मूर्ति के हाथ हिलने लगे, उन्होंने उसमें जो थाली में भोजन था उठाया और निगल लिया। सारा खा गईं, थाली धोने के लिए, खाली थाली धोने के लिए रामकृष्ण परमहंस मन्दिर से बाहर निकल रहे थे तो रानी रासमणि आई और उनके चरणों पे गिरी। उन्होंने कहा देव आप ही साक्षात् काली हैं। साक्षात काली, हाँ सही बात है, गलत बात भी नहीं है। रामकृष्ण परमहंस साक्षात काली थे। क्यों, उस काली को उन्होंने श्रद्धा से - अपनी श्रद्धा से साक्षात काली बना दिया था। रामकृष्ण परमहंस ने जब विवेकानन्द से कहा काली के पास जा नौकरी माँगने तो विशालकाय काली जमीन से आसमान तक चूम रही थी, उन्होंने काली को देखा विवेकानन्द ने और काँप गये। ये काली कहाँ से थी, उसी पत्थर में से पैदा कर दी थी रामकृष्ण परमहंस ने और वो श्रद्धा से बनी थी। अब, अब वो मूर्ति हाँ बिल्कुल है, अब उसमें कोई दम है, कोई दम नहीं। चोर एक बार सोने की जीभ चुरा ले गये उसकी। अब ये पत्थर तो पत्थर ही था, पत्थर को साक्षात् काली बना देने का श्रेय रामकृष्ण परमहंस को है।

कबीर का भी ऐसे ही था। कबीर को दीक्षा देने के लिए स्वामी रामानन्द तैयार नहीं थे। उन्होंने सीढ़ियों पर जा कर सो गये। रामानन्द जब उधर से निकले उनका पैर पड़ गया अन्धेरे में, दीखता थोड़े ही था उनको। राम-राम कह करके पीछे हट गये। कबीर ने कहना शुरू कर दिया मेरे गुरु स्वामी रामानन्द हैं, उन्होंने मुझे मंत्र दे दिया है, दीक्षा दे दी। स्वामी जी ने पूछा - अरे भई ये क्या कहता है तू, गलत-सलत बात क्यों कहता है? नहीं, आपने मेरी (पीठ) सीने पर पैर रख दिया था रात को सीढ़ियों पे और फिर राम नाम कह दिया था बस मेरे लिये तो आप गुरु हो गये, ये ही बात हो गई। ऐसे होता है। आप यहाँ की श्रद्धा कम मत करिए, अगर श्रद्धा का अभाव रह गया तो आप बिल्कुल खाली हाथ चले जाएँगे और जैसे और दूसरे आदमी मेहनत-मजदूरी करने वाले, दूसरे किसी काम से आने-जाने वाले आते रहते हैं आप भी उसी तरीके से आने-जाने वाले में शुमार होंगे और हमारा परिश्रम बेकार चला जाएगा और आपका सौभाग्य बेकार चला जाएगा। श्रद्धा जगाइए। कृपा कर के श्रद्धा जगाइए, कृपा कर के श्रद्धा जगाइए। आपको अन्ध-श्रद्धा के लिए नहीं कुछ कहा जा रहा है - यहाँ श्रद्धा का परिपूर्ण वातावरण है। आप चाहें तो सच्चाई के साथ में और अपनी सूक्ष्म दृष्टि के साथ में उसको परख भी सकते हैं। परखने के अलावा आप अपनी श्रद्धा से अगर परखने लायक स्थान न हो, तो भी उसको श्रद्धा से अपने लायक बना सकते हैं। श्रद्धा उत्पन्न कीजिए। आपके हिस्से का काम बाकी पड़ा है। हमने अपने हिस्से का काम पूरा कर दिया। आप और हम दोनों अपने-अपने हिस्से का काम पूरा लें, तो आपका ये कल्प साधना का शिविर आपके लिए सौभाग्य से भरा-पूरा होगा - ऐसा विश्वास है।……….समाप्त।

॥ॐ शान्तिः॥