संकल्प बल का महत्त्व

प्रकृति का कुछ ऐसा विलक्षण नियम है कि पतन स्वाभाविक है और उत्थान कष्ट साध्य बनाया गया है। पानी को आप छोड़ दीजिए, नीचे बहता हुआ चला जाएगा। (अनुमान की ओर) आपको कुछ नहीं करना पड़ेगा। ऊपर से आप ढेला जमीन पर फेंक दीजिए तेजी के साथ गिरता हुआ चला आएगा और आपको कुछ नहीं करना पड़ेगा, नीचे गिरेगा। नीचे गिरने में कोई मेहनत नहीं करना पड़ती है और कोई प्रयास नहीं करना पड़ता है। ऐसे ही इस संसार का कुछ ऐसा विलक्षण नियम है कि पतन के लिए, बुरे कर्मों के लिए आपको ढेरों के ढेरों साधन मिल जाएँगे, सहकारी मिल जाएँगे, किताबें मिल जाएँगी, और कोई न मिलेगा तो आपके पिछले जन्म-जन्मान्तरों के संग्रह किये हुए कुसंस्कार ही इस मामले में आपकी बहुत मदद करेंगे, वो आपको गिराने के लिए बराबर प्रोत्साहन करते रहेंगे। पाप पंक में घसीटने के लिए बराबर आपका मन चलता रहेगा। इसके लिए न किसी अध्यापक की जरूरत है, न किसी को सहायता की जरूरत है, ये तो अपनी नेचर जैसी हो गई है। ग्रैविटी पृथ्वी में है न - ग्रैविटी क्या करती है? ऊपर की चीज़ों को नीचे घसीटती है। घसीट लेती है। सेब का पेड़, सेब का फल न्यूटन ने देखा, जमीन पे ऊपर से गिरा। क्यों? गिरने की क्या बात है? जमीन में एक विशेषता है, कशिश है वो खींच लेती है। नीचे की तरफ गिराने वाली कशिश इस संसार में इतनी भरी हुई पड़ी है उससे बचाव अगर आप न करें, उसका विरोध आप न करें, उसका मुकाबला आप न करें तो आप विश्वास रखिए आप निरन्तर गिरेंगे, पतन की ओर गिरेंगे। सारा समाज इसी तरफ चल रहा है आप निगाह उठा कर देखिए। आपको कहाँ ऐसे आदमी मिलेंगे, जो सिद्धान्तों को ग्रहण करते हों, और आदर्शों को अपनाते हों। आप जिन्हें भी देखिए अधिकांश लोगों में से बुराई की ओर चलते हुए दिखाई पड़ेंगे आपको, और पाप और पतन के रास्ते पर उनका चिन्तन और मनन काम कर रहा होगा। उनका चरित्र भी गिरावट की ओर, और उनका चिन्तन भी गिरावट की ओर। ऐसी और सारे के सारे जमाने में यही भरा हुआ पड़ा है।

फिर आपको क्या करना चाहिए। आपको ये काम करना चाहिए, कि अब आपको ऊँचा उठना है, तो आपको एक नई भीतर से हिम्मत इकट्ठी करनी चाहिए। क्या हिम्मत करें? ये हिम्मत करें कि ऊँचे उठने वाले जिस तरीके से संकल्पबल का सहारा लेते रहे हैं, और हिम्मत से काम लेते रहे हैं, व्रतशील बनते रहे हैं, आपको उस तरीके से व्रतशील बनना चाहिए। देखा है न आपने, जब जमीन पर से ऊपर उठना होता है तो जीने का इंतजाम करते हैं, सीढ़ी का भी इंतजाम करते हैं तब मुश्किल से धीरे-धीरे चढ़ते हैं। गिरने में क्या देर लगती है। आपको कोई ढेला ऊपर फेंकना हो तब, देखिए न कितनी ताकत लगानी पड़ती है और गिरा दें तब, गिराने में क्या देर लगे। अन्तरिक्ष से उल्काएँ, उल्काएँ अपने आप गिरती रहती हैं। जमीन की ओर और राकेट अगर फेंकने पड़ते हैं तब, तो आपने देखा है न, करोड़ों-अरबों रुपया खर्च करते हैं, तब एक राकेट का ऊपर अन्तरिक्ष में उछालना सम्भव होता है। गिरावट में, गिरावट में तो पत्थर के टुकड़े और उल्काएँ अपने आप जमीन पर आ जाती हैं, बिना किसी के बुलाए, बिना कुछ खर्च किये बिना। पानी को कुएँ में से निकालने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है और कुएँ में डालना हो तो, डाल दीजिए।

आपको यही करना पड़ेगा, चौरासी लाख योनियों में भटकते हुए जो कुसंस्कार ढेरों-के-ढेरों इकट्ठे कर लिए हैं, अब इन कुसंस्कारों के खिलाफ बगावत शुरू कर दीजिए। कैसे करें? अपने को मजबूत बनाइए। अगर मजबूत नहीं बनाएँगे तब, तब फिर आपके पुराने कुसंस्कार फिर आ जाएँगे। मन को समझायें, बस जरासी देर को समझ जाएगा फिर उसी रास्ते पर आ जाएगा। तो क्या करना चाहिए? उसके लिए अपना मनोबल मजबूत करने के लिए आपको कोई संकल्प लेना चाहिए, संकल्प-शक्ति का विकास करना चाहिए। संकल्प-शक्ति किसे कहते हैं? संकल्प-शक्ति उसे कहते हैं जिसमें कि ये फैसला कर लिया जाता है कि हमें ये तो करना ही है। ये तो हर हालत में करना है। करेंगे या मरेंगे। इस तरीके से संकल्प अगर आप किसी बात का कर लें, तो आप विश्वास रखिए, फिर आपका जो मानसिक निश्चय है, (नि) निश्चय, वो आपको आगे बढ़ा देगा। और आपका मनोबल नहीं है और, निश्चय बल नहीं है ऐसे ही ख्वाब देखते रहते हैं ये करेंगे, ये करेंगे, विद्या पढ़ेंगें, व्यायाम करना शुरू करेंगे, फलाना काम करेंगे, ये करेंगे। आप कल्पना करते रहिए, कभी कुछ नहीं कर सकते। कल्पनाएँ आज तक किसी की सफल नहीं हुईं, और संकल्प किसी के असफल नहीं हुए।

इसीलिए आपको संकल्प-शक्ति का सहारा लेने के लिए व्रतशील बनना चाहिए। आप व्रतशील बनिए। ये करेंगे, बस ये निश्चय कर लीजिए। अच्छा काम करेंगे जो भी छोटा हो या बड़ा हो आप ये काम करेंगे। जैसे छोड़ने के लिए, बुराइयों को छोड़ने के लिए संकल्प करने पड़ते हैं, बीड़ी नहीं ही पियेंगे, नहीं साहब हमको टट्टी नहीं होगी, टट्टी नहीं होगी तो हम दूसरा जुलाब की दवा ले लेंगे, बीड़ी नहीं पीयेंगे। बस ये निश्चय हो गया तो बीड़ी गई। और आपका मन कच्चा, कच्चा, कच्चा, कच्चा, छोड़े कि न छोड़ें, पीयें कि न पीयें, कल पी ली, फिर आज और पी लें, कल ही छोड़ देंगे, आज पीते हैं आज ये देखा जाएगा, आप कभी नहीं छोड़ सकते। ठीक इसी तरीके से श्रेष्ठ काम करने के लिए, श्रेष्ठ काम करने के लिए, उन्नति की दिशा में आगे बढ़ने के लिए, आपको (कोई न कोई) कोई न कोई संकल्प मन में लेने चाहिए। ये काम करेंगे, ये काम करने तक के लिए कई आदमी ऐसा कर देते हैं - ये अच्छा काम जब तक पूरा न कर लेंगे, ये काम नहीं करेंगे - जैसे नमक नहीं खाएँगे, घी नहीं खाएँगे, वगैरह, वगैरह, शक्कर वगैरह नहीं खाएँगे। ये क्या है? इसको देखने में तो कोई खास बात नहीं है - आपको अमुक काम करने से नमक का क्या ताल्लुक है? और आप शक्कर नहीं खाएँगे तो (क्या) क्या बात बन जाएगी? और आपने घी खाना बन्द कर दिया है तो (कौन) कौन (जब तक) ऐसी बड़ी बात हो गई है, जिसकी वजह से आपको काम में सफलता मिलेगी? इन चीज़ों में तो नहीं है दम, लेकिन दम उस बात में है, कि आपने इतना कठोर निश्चय कर लिया है, और आपने एक सुनिश्चित योजना बना ली है, कि हमको करना ही करना है, करना ही करना है। तब फिर आप विश्वास रखिए (आपको) काम पूरा हो करके ही रहेगा। चाणक्य की बात आपको नहीं मालूम, औरों की बात चाणक्य ने निश्चय कर लिया था, ये बाल बिखेर दिये थे। जब तक ये काम नंद वंश का नाश नहीं कर लूँगा तब तक बाल नहीं बाँधूगा। ये अपना व्रत, प्रतिज्ञा को याद रखने का एक प्रतीक है, एक सिम्बल (symbol) है। प्रतिज्ञाएँ तो भूल जाते हैं, लेकिन अगर कोई ऐसा बहिरंग अनुशासन भीतर लगा लें, तो आदमी भूलता नहीं है। इसीलिए कोई न कोई (अनु) अनुशासन लगा लें तो अच्छा है।

जैसे एक बार ऐसा हुआ भगवान महावीर के पास एक बहेलिया गया। उसने कहा हमको दीक्षा लेनी है आध्यात्म की। तो भगवान ने कहा था, आपको गुरु दक्षिणा में अहिंसा का पालन करना पड़ेगा, और माँस खाना छोड़ना पड़ेगा। तो उसने कहा हम बहेलिये हैं ये तो हम नहीं कर पायेंगे, तो हम बच्चों को कहाँ से खिलाएँगे, जानवर नहीं मारें। फिर समझदार लोगों ने सलाह उसको दी कम से कम एक चीज का आज किसी काे छोड़ दो, कम से कम एक प्राणी को न मारने का आज संकल्प ले ले तो भी तेरी अहिंसा का प्रारम्भ मान लिया जाएगा। बहुत विचार करता रहा बहेलिया पर उसने एक जानवर को पाया जिसके ऊपर वो दया करने को तैयार हो गया और उसको न मारने के लिए कसम खाने को तैयार हो गया, उस जानवर का नाम था कौआ। कौए को मैं नहीं मरूँगा, कभी नहीं मारूँगा, कौए पर दया करूँगा। बस ये इसने संकल्प ले लिया और दीक्षा ले ली। बस रोज विचार करना, कौए पर दया करनी चाहिए, कौआ बिचारा कितना निर्जीव होता है, क्यों कष्ट दें किसी को, उसके भी तो बाल बच्चे होएंगे, उसको भी तो भगवान ने चाहा है। हम अपने छोटे से लोभ के लिए कौए को क्यों मार डालें। बस, ये विचार जब जड़ जमाता हुआ चला गया, तो धीरे-धीरे, धीरे-धीरे ऐसा हो गया, कि फिर वो सब प्राणियों पे दया करने लगा और अन्ततः ज्ञानधर्म का एक बड़ा तीर्थंकर हुआ है, कैसे? दिशा तो मिल गई, छोड़ेंगे करेंगे इसके लिए मन कच्चा न होने पावे, भूल भुलैये में न पड़ने पावें। इसलिए कोई न कोई संकल्प लेना बहुत जरूरी है। अनुष्ठान में ये होता है। अनुष्ठान में जप की संख्या तो उतनी ही होती है, पर उसके साथ-साथ में व्रत और संकल्प लेने पड़ते हैं। काहे का? उपवास का एक, ब्रह्मचर्य का दो, मौन का तीन, जमीन पे सोने का चार, अपनी सेवाएँ अपने आप करने का पाँच - ये क्या बात है? ये मनोबल (के) बढ़ाने की प्रक्रियाएँ हैं। आदमी का संकल्प मजबूत होना चाहिए। अध्यात्म का प्राण ही वह संकल्प है। संकल्प अगर (प्राण में से) आप निकाल दें तो फिर क्या काम बनेगा? राणा प्रताप ने आपको ध्यान है राणा प्रताप ने ये निश्चय किया था कि वो थाली में भोजन नहीं करेंगे। जब तक अपनी आजादी प्राप्त न कर लेंगे, तब तक वो पत्तल में रख कर भोजन करेंगे। आपने कभी गाड़ी वाले लोहार देखे हैं, गाड़ी वाले लोहार अभी भी पत्तल में भोजन करते हैं, थाली में नहीं करते। अपने आपको राणा प्रताप का वंशज बताते हैं और ये कहते हैं कि जब राणा ने प्रतिज्ञा ली थी कि हम घर में नहीं घुसेंगे, और बाहर जंगल में घूमेंगे और पत्तल में भोजन करेंगे, ये उनका था व्रत। गाड़ी वाले लोहार ये ही कहते पाये गये हैं, हम तो घर में अब नहीं रहेंगे, बाहर ही घूमते रहेंगे, आजादी नहीं मिली तो हम क्यों करेंगे। इस तरीके से संकल्प कर लेना, व्रत धारण कर लेना, कई बार बड़ा उपयोगी और बड़ा अच्छा होता है।

नमक को त्याग करने वाली बात, शक्कर को त्याग कर देने वाली बात, हजामत न बनाने वाली बात, चप्पल न पहनने वाली बात, ऐसी बहुत सी बातें ऐसी हैं जो आदमी के संकल्प बल को मजबूत करती हैं। संकल्प आपको मजबूत बनाने चाहिए। संकल्प के लिए कई बातें हैं। कठिनाइयाँ सामने आती हैं तो आदमी को संकल्प बल मजबूत बना देता है। संकल्प बल न हो तब, हिम्मत न हो तब, तब फिर आदमी बेपैंदे वाले, बेपैंदे लोटे के तरीके से उधर भटकता रहता है, भटकता रहता है। मनोबल बढ़ाने के लिए कोई न कोई संकल्प और अनुशासन जीवन में रखना बहुत जरूरी है। गाँधी जी ने तैंतीस वर्ष की उमर में ब्रह्मचर्य का प्रतिज्ञा ली थी और ये कहा था कि हम तो ये निभाएँगे, निभाएँगे। उस निभाने से उस मनोबल, मनोबल में कच्चाइयाँ जरूर रही होंगी दूसरों की तरीके से उनमें भी, शायद उनका मन भी भीतर-भीतर कभी डगमग करता हो, लेकिन उनके संकल्प बल ने कहा नहीं, हमने निश्चय कर लिया है - ‘‘गुरुकुल रीत सदा चली आई, प्राण जाये पर वचन ना जाई’’, इस तरीके से संकल्प जब उनका चला तो फिर वो निभाई। भीतर की कमजोरियाँ उठीं, उनसे लड़ा गया। अगर संकल्प न हुआ होता तब, व्रत नहीं लिया होता तब, निश्चय न किया होता तब, तब फिर सम्भव नहीं था। संकल्प कर लेने के बाद तो आदमी की आधी मंजिल पूरी हो जाती है। आपको भी अपने मनोबल की वृद्धि के लिए आत्मानुशासन स्थापित करनी चाहिए। आत्मानुशासन वो है जिसमें फिसलने वाली लाठी बरसात में पहाड़ पर चढ़ते समय लाठी ले के लोग चलते हैं और उससे जहाँ फिसलन होती है अपने आप को बचा लेते हैं, उसका सहारा मिल जाता है। संकल्पबल उस लाठी की तरीके से है जो आपको गिरने से बचा लेता है, और आपको ऊँचा चलने के लिए, आगे बढ़ने के लिए हिम्मत प्रदान करता है।

शीरी फरहाद की बात सुनी है आपने। फरहाद ने, फरहाद को ये कहा गया था अगर वो शीरी से शादी करना चाहता है तो यहाँ से बत्तीस मील लम्बी दूरी को काट करके एक नहर बना करके लाए। पहाड़ पर एक तालाब तो था ऊँचे पे, पर वो शहर से इतनी दूर था, जिससे पानी के लिए बड़ी किल्लत रहती थी। राजा ने ये कहा फरहाद से, अगर आप बत्तीस मील लम्बी नहर खोद करके यहाँ तक ला सकें तो शादी हो सकती है शीरी की आपके साथ। उसने ये ही कहा, संकल्प लिया कि हम करेंगे या मरेंगे, करेंगे या मरेंगे। ये निश्चय करके जब उसने तय कर लिया कि हमको नहर खोदनी है तब वो कुल्हाड़ी और हथौड़े ले करके चल पड़ा। उसने पहाड़ काटना शुरू कर दिया। बाहर के आदमी आये, कुछ दिन मजाक होती रही, कुछ मखौल उड़ाते रहे, कोई पागल कहता रहा, कोई बेवकूफ कहता रहा, लेकिन जब देखा उस आदमी ने अपना ये निश्चय कर लिया है कि हम हर कीमत पर करके रहेंगे, लोगों की सहानुभूति भी पैदा हुई। संकल्पवानों के प्रति सहानुभूति भी होती है, संकल्पवान सहानुभूति के अधिकारी भी होते हैं। जिनके पीछे संकल्प शक्ति नहीं होती है वो मजाक के कारण बनते हैं, व्यंग और उपहास के कारण बनते हैं। इसलिए फरहाद की लोगों ने मदद की। लोग आये और स्वयं भी उसके साथ बैठ करके कुल्हाड़ी से, हथौड़ा से चलाने लगे और और नहर खोदने में मदद करने लगे। टाइम तो थोड़ा लग गया लेकिन फरहाद ने नहर खोद करके वहाँ तक ला कर रख दिया और उसकी शादी हो गई।

ये संकल्प बल की बात मैं कहता हूँ। संकल्प बल (बल) आपको प्रत्येक काम में उपयोग करने की जरूरत है। ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में, खान-पान के सम्बन्ध में, समयदान और अंशदान के सम्बन्ध में - आपको कोई न कोई, कोई न कोई काम ऐसे जरूर करने चाहिए जिसमें कि ये प्रतीत होता हो कि आपने छोटा सा संकल्प लिया और उसको पूरा करने में लग रहे। ये मनोबल बढ़ाने का तरीका है। मनोबल से बढ़कर के और आदमी के पास कोई शक्ति नहीं है। पैसे का ताकत अपने आप में ठीक, बुद्धि की ताकत अपने आप में ठीक, लेकिन ऊँचा उठने का जहाँ तक ताल्लुक है, वहाँ तक मनोबल और संकल्पबल को ही सबसे बड़ा माना गया है। संकल्प और मनोबल से ज्यादा बढ़कर के आदमी के व्यक्तित्व को उभारने वाली, प्रतिभा को उभारने वाली, (उसके) उसके चरित्र को उभारने वाली और कोई वस्तु है ही नहीं। और ये संकल्प बल की वृद्धि के लिए ये आवश्यक है कि आप छोटे-छोटे, छोटे-छोटे ऐसे कुछ नियम लिया कीजिये थोड़े समय के लिए, ये काम न कर लेंगे जब तक हम ये नहीं करेंगे। मसलन शाम को इतना हम किताब के पन्ने न पढ़ लेंगे सोएगें नहीं, मसलन हम सवेरे का भजन जब तक पूरा न कर लेंगे खाएगें नहीं। ये क्या है? ये व्रतशीलता के साथ में जुड़ा हुआ अनुशासन है। अनुशासन उन संकल्पों का नाम है, जिसमें किसी सिद्धान्त का तो समावेश होता ही होता है, लेकिन उस सिद्धान्त (के) के साथ-साथ में, उस कार्य को पूरा होने के साथ-साथ में, ऐसा भी कुछ फैसला किया जाता है, जिसमें कि अपने आप को स्मरण बना रहे। ये काम नहीं करेंगे, चप्पल नहीं पहनेंगे, जब तक हमको ये मैट्रिक पास नहीं कर लेंगे, चप्पल नहीं पहनेंगे। तो क्या है? बराबर ये दबाव रहता है ये काम करना था जो हम नहीं कर पा रहे हैं, चप्पल इसीलिए तो नहीं पहनते। चप्पल बार-बार याद दिलाती रहेगी आपको मैट्रिक करना है, अच्छे नम्बर से पास करना है, दिनभर पढ़ना है। चप्पल-चप्पल जब भी ध्यान गया करे, अरे भई चप्पल कैसे पहन सकते हैं, हमने तो संकल्प किया हुआ है, व्रत लिया हुआ है।

व्रत और संकल्प आदमी की जिन्दगी के लिए बहुत बड़ी कीमती वस्तुएँ हैं। आप ऐसे ही किया कीजिए। आप को यहाँ से जाने के बाद में कई काम करने हैं। बड़े मजेदार करने हैं, बहुत अच्छे काम करने हैं लेकिन वो चलेंगे नहीं। बस आपका मन बराबर ढीला होता चला जाएगा। मन को काट करने के लिए आप एक विचारों की सेना, विचारों की शृंखला बनाकर के तैयार रखिए। विचार - विचारों से विचारों (को) को काटते हैं। लाठी को लाठी से काटते हैं, मारते हैं, जहर को जहर से मारते हैं, काँटे को काँटे से निकालते हैं। कुविचार जो आपके मन में हर बार तंग करते रहते हैं, उसके मुकाबले (पे) एक ऐसी सेना खड़ी कर लीजिए जो आपके बुरे विचारों से लड़ सकने में समर्थ हों। अच्छे विचारों की भी तो (तो एक) एक सेना है। बुरे विचार आते हैं, कामवासना के विचार आते हैं, व्यभिचार के विचार आते हैं। आप फिर ऐसा किया कीजिए, उसके मुकाबले की एक और सेना खड़ी कर लीजिए - अच्छे विचारों वाली सेना। जिसमें आपको ये विचार करना पड़े हनुमान कितने सामर्थ्यवान हो गये ब्रह्मचर्य की वजह से, भीष्म पितामह कितने समर्थ हो गये ब्रह्मचर्य के कारण, आप शंकराचार्य से लेकर के और अनेक व्यक्तियों, सन्तों की बात याद कर सकते हैं महापुरुषों की जिन्होंने जिन्होंने अपने कुविचारों से लोहा लिया है। कुविचारों से लोहा नहीं लिया होता तो बिचारे संकल्पों की क्या बिसात थी चलते ही नहीं, टूट जाते। कुसंस्कार हावी हो जाते और जो विचार किया गया था वो एक कोने में रखा रह जाता। सदाचार क्या? खाली विचार करें कैसे बने? आप उनकी विचारों की एक बड़ी सामर्थ बना लीजिए, एक सेना बना लीजिए। जो भी बुरा विचार आये उसे काटने के लिए, लोभ के विचार आएँ, लालच के और बेईमानी के विचार आएँ - आप ईमानदारों के समर्थन के लिए उनके इतिहास और उदाहरण, और शास्त्र और आप्त-पुरुषों के वचन, सब मिला करके रखिए - ईमानदारी की ही कमाई खाएँगे, बेईमानी की कमाई हम नहीं खाएँगे। ये ऐसे आपके मन में विचारों की एक सेना तैयार कर ली है तो आपके लिए स्वर्ग होगा। जब बेइमानी के विचार आयें, कामवासना के विचार आयें, ईर्ष्या के विचार आयें, अधःपतन के विचार आयें तो इनके रोकथाम करने के लिए आप अपनी सेना को तैयार कर दें और उसके सामने सिरे से लड़ा दें। लड़े बिना कैसे चलेगा बताइए। रावण से लड़े बिना कहीं काम चला, दुर्योधन से काम लड़े बिना कहीं काम चला, कंस को लड़े बिना कहीं काम चला। लड़ाई मोहब्बत की है अथवा कैसी है, हिंसा की है अहिंसा की है, ये मैं इस वक्त आपको कोई बात नहीं कह रहा हूँ, मैं तो ये कह रहा हूँ आपको अपनी बुराइयों और कमजोरियों (को) (को) (मुकाबले) मुकाबला करने के लिए भी, और समाज में फैले हुए अनाचार से लोहा लेने के लिए भी हर हालत में आपको (आपको) ऐसे ऊँचे विचारों की (सेणा) सेना बनानी चाहिए जो आपको भी हिम्मत देने में समर्थ हो सके, और आपके समीपवर्ती वातावरण में भी नया माहौल पैदा करने में समर्थ हो सके।

ये संकल्प भरे विचार होते हैं, संकल्प भरे विचार होते हैं। हजारी किसान ने बिहार में ये फैसला किया था कि मुझे हजार आम के बगीचे लगाने हैं बस घर से निकल पड़ा। जमीन पर ही सोऊँगा, नंगे पैर रहूँगा। बस इस गाँव में गया, भई नंगे पैर मुझे रहना है, इस गाँव में एक आम का बगीचा जरूर लगाना है। लीजिए मैं कहीं से पौध ले आता हूँ, लीजिए मैं गड्ढे खोद देता हूँ, आप लगा लीजिए, आप रखवाली का इंतजाम कर दीजिए, पानी लगाने का आप अपनी जिम्मेदारी उठा लीजिए, पौधा हमने लगाया है। इस तरीके से हर एक आदमी को समझाता रहा तो उसकी बात लोगों ने मान ली, क्यों मान ली? वो संकल्पवान था। संकल्पवान नहीं होता तब, ऐसी ही व्याख्यान करता फिरता, साहब हरे पेड़ लगाइये, हरियाली उगाइये, हरे पेड़ लगाइये हरियाली उगाइये तब, तब फिर कोई लगाता क्या? सरकार कितना प्रचार करती है कोई सुनता है क्या? सुनने के लिए ये बहुत जरूरी है कि जो आदमी उस बात को कहने के लिये आया है, संकल्पवान हो। संकल्पवान का अर्थ फिर एक बार समझ लीजिए - ऊँचे सिद्धान्तों (का) को अपनाने का निश्चय, और उस निश्चय (को) में कोई रास्ता में व्यवधान न आवे, इसलिए थोड़े-थोड़े समय के लिए ऐसे अनुशासन, जिससे कि स्मरण बना रहे, मनोबल बढ़ता रहे, मनोबल गिरने न पाये, संकल्प की याद कर के आदमी अपनी गौरव, गरिमा को बनाए रह पाए - इसीलिए आपको व्रतशील होना जरूरी है।

व्रतशील आप रहा कीजिए, पीले कपड़े पहनने का आपको कहा गया है - ये व्रतशील होने की निशानी है। दूसरे लोग पीले कपड़े नहीं पहनते, आपको पहनने चाहिए। इसका मतलब ये है कि (आपको आप) दुनिया का कोई दबाव आपके ऊपर नहीं है, और दुनिया की नकल करने में और अनुकरण करने में आपको कोई (मजा) मजा नहीं है। ये क्या है? ये व्रतशील की निशानी है, व्रतशील की निशानी है।

इसी तरीके से यहाँ जो आप इस शिविर में रह रहे हैं तो आपको खान-पान के लिए दबाया गया है, और ये कहा गया है - केवल अमृताशन ही भोजन किया कीजिए, केवल दाल, दलिया, खिचड़ी पे ही रहा कीजिए। तरह-तरह के व्यंजन और तरह-तरह के स्वादिष्ट भोजन (की मन) मन मत चलाया कीजिए। इससे क्या होगा? खान-पान का तो जो लाभ होगा सो होगा ही, खान-पान के लाभों (की) उतना मैं महत्त्व नहीं देता, जितना कि इस बात को महत्त्व देता हूँ कि आपने अपने मन को कुचल डालने का, मन से लोहा लेने को, मन को बदल डालने के लिए आपने वो हथियार उठा लिया जिससे आपका दुश्मन आपका दोस्त बन सकता है। आपका दुश्मन नम्बर एक - आपका मन; और आपका दोस्त नम्बर एक - आपका मन। दुश्मन को दोस्त के रूप में बदलने के लिए जिस दबाव की जरूरत है, जिस (आग में) आग की भट्टी में सड़े-गले लोहे को (को) गला कर के नया औज़ार ढालने की जरूरत है, उस भट्टी का नाम है संकल्प, आत्मानुशासन। अपने आपको अनुशासन स्थापित करने के लिए आपको व्रतशील होना चाहिए। संकल्पवान होना चाहिए। संकल्पों में व्यवधान उत्पन्न न हो इसिलिए आपको कोई न कोई ऐसे नियम और व्रत समय-समय पर लेते रहने चाहिए इसका अर्थ ये होता है कि जबतक अमुक काम न हो जाएगा तब तक हम अमुक काम न करेंगे। ऐसा ही होता रहता है, माघ के महीने में त्रिवेणी के किनारे एक महीने के लिए लोग व्रतशील होकर जाते हैं, कल्प साधना करते हैं बस वो निश्चय कर लेते हैं नहीं करेंगे। आप भी इस कल्प साधना शिविर में आये हैं तो व्रतशील हो करके रहिए, निश्चय को पालन करते रहिए। हमने ये नियम बनाया है इसी को पालन करेंगे। भोजन जैसा भी हो, खराब है तो खराब से क्या करें, खराब से ही काम चलाएँ। लेकिन नहीं साहब जायका अच्छा नहीं लगता, वहाँ कचौड़ी खाएँगे। मत कीजिए ऐसा। संकल्पवान बनिए।

संकल्पवान ही महापुरुष बने हैं, संकल्पवान ही उन्नतिशील बने हैं, संकल्पवान ही सफल हुए हैं, और संकल्पवानों ने ही संसार की नाव को पार लगाया है। आपको संकल्पवान और (व्रतसा) व्रतशील होना चाहिए। नेकी आपकी नीति होनी चाहिए, उदारता आपका फर्ज़ होना चाहिए। आपने अगर ऐसा कर लिया हो तो फिर आप दूसरा कदम ये उठाना है कि हम ये काम नहीं किया करेंगे। समय-समय पर आप छोटे-छोटे व्रत लिया कीजिए। यहाँ अपने गायत्री परिवार में लोगों को रिवाज है कि गुरुवार के दिन, गुरुवार के दिन नमक न खाने की बात, ब्रह्मचर्य से रहने की बात, दो घण्टे मौन रहने की बात, ये सबको नियम पालन करने पड़ते हैं। आप भी ऐसे व्रतशील हो कर के कुछ नियम पालन करते रहेंगे, और उनके साथ-साथ में किसी श्रेष्ठ कर्तव्य और उत्तरदायित्व (का) का ताना-बाना जोड़ के रखा करेंगे, तो आपके विचार सफल होंगे, आपका व्यक्तित्व पैना होगा, और आपकी प्रतिभा तीव्र होगी और आप (एक) अच्छे व्यक्तियों में शुमार होंगे, अगर आप आत्मानुशासन और अपनी व्रतशीलता का महत्त्व समझें, और उसे अपनाने की हिम्मत बढ़ायें। समाप्त॥

॥ॐ शान्तिः॥