आज मेरा मन तुम्हारे गीत गाना चाहता है।
शुष्क जीवन में पुनः नव-रस बहाना चाहता है॥
चाहती हूँ मैं तुम्हारी, दृष्टि का केवल इशारा।
डूबते को बहुत होता, एक तिनके का सहारा॥
अब हृदय में प्यार का, तूफान आना चाहता है॥
शुष्क जीवन में पुनः नव-रस बहाना चाहता है॥
आज मेरा मन . . . . .
एक योगी चाहता है, बाँधना गतिविधि समय की।
एक संयोगी भुलाना, चाहता चिन्ता अनय की॥
पर वियोगी आग पानी में लगाना चाहता है॥
शुष्क जीवन में पुनः नव-रस बहाना चाहता है॥
आज मेरा मन . . . . . . .
व्यंग करता है मनुज की श्रेष्ठता पर क्षुद्र जीवन।
हँस रहा जग की जवानी की उमंगों पर लड़कपन॥
किन्तु कोई साथ सबके, मुस्कुराना चाहता है॥
शुष्क जीवन में पुनः नव-रस बहाना चाहता है॥
आज मेरा मन . . . . . .
नर्क लज्जित हो रहा है, स्वर्ग की लखकर विषमता।
आज सुख भी रो रहा है, देखकर दुःख की विवशता॥
इन्द्र का आसन तभी तो, डगमगाना चाहता है॥
शुष्क जीवन में पुनः नव-रस बहाना चाहता है॥
आज मेरा मन . . . . . .