इस समय का सबसे बड़ा पुण्य : ब्रह्मभोज

कहते हैं कि ध्यान के बिना जप और ब्राह्मण भोजन अर्थात् ब्रह्मभोज के बिना यज्ञ का लाभ सर्वांश में नहीं मिल पाता। जो मिलता है, वह आधे-अधूरे और अध-कचरे स्तर का एकांगी होता है। इसलिए ऐसे प्रसंगों में उत्तरार्द्ध पक्ष की पूर्णता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

एक जमाना था, जब हर प्रकार के धर्मानुष्ठानों के साथ ब्रह्मभोज अनिवार्य रूप से आवश्यक समझा जाता था, अस्तु वैसे सभी आयोजनों का उपसंहार इस पुण्य कृत्य के साथ किया जाता था। अन्त में ब्राह्मणों को भोजन एवं दूसरे द्रव्यादि दान में दिये जाते थे। इस प्रयोजन के लिए उनका चयन इसलिए किया जाता था कि वे अपना सम्पूर्ण जीवन लोकमंगल के कार्य हेतु समर्पित कर देते थे। समाज कल्याण के लिए जीना और उसी निमित्त मर जाना उनके जीवन का प्रधान लक्ष्य होता था। इसी कारण सर्वसामान्य के सम्मान और श्रद्धा के वे केन्द्र विन्दु बने रहते थे। ऐसे लोगों को भोजन कराने का अर्थ होता था, उक्त लोकसेवी परम्परा को समर्थन-प्रोत्साहन देना, इसीलिए वह कृत्य पुण्यफलदायी माना गया और हर पुनीति कार्य के साथ परम्परागत रूप से जुड़ता चला गया। मोटे अर्थों में यही ब्रह्मभोज था।

इन दिनों ऐसे ब्रह्मनिष्ठ सदाशयी लोगों का एक प्रकार से अकाल पड़ गया है। जो समाज को दिशा दे सकें, जन-जन का मार्गदर्शन कर सकें, उनकी गुत्थियों को सुलझा कर निर्द्वन्द्व जीवन जीने का उपयुक्त रास्ता सुझा सकें, ऐसे व्यक्ति आज नहीं के बराबर हैं। ऐसी स्थिति में ब्राह्मण-परम्परा का निर्वाह कैसे हो? क्या उपयुक्त व्यक्तित्वों के अभाव मात्र से किसी श्रेष्ठ परम्परा का लोप हो जाना चाहिए? समाज की प्रगति अवरुद्ध हो जानी चाहिए? नहीं ! समय और परिस्थिति के अनुरूप रीति-रिवाज बदलते रहे हैं और लम्बे समय से उन-उन कमियों की पूर्ति नये निर्धारणों से सदा की जाती रही है, जिनके बन पड़ने से विकास की गाड़ी पटरी पर लुढ़कती रह सके और उस रिक्तता की भरपाई कर सके, जिसका कि वर्तमान में अभाव है।

ऐसी दशा में दृष्टि अनायास सत्साहित्य की ओर जाती है। इसका सृजन-अभिवर्धन बड़े पैमाने पर समयानुरूप यदि किया जा सके, तो निस्सन्देह यह उस प्राचीन परम्परा का श्रेष्ठ और समर्थ अर्वाचीन विकल्प सिद्ध होगा, इसमें दो मत नहीं। इसी विश्वास के आधार पर युग निर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान के अन्तर्गत व्यक्ति, परिवार और समाज को दिशा देने वाले विभिन्न विषयों पर इतना साहित्य रचा गया है कि यदि वह समाज के सभी वर्ग और सभी लोगों तक पहुँच सके तो न सिर्फ पूर्वकाल की लोकसेवी परम्परा को पुनर्जीवित किया जा सकेगा, वरन् राष्ट्र और विश्व को अधिकाधिक शान्ति और समृद्धि की ओर ले जाने में भी समर्थता का परिचय दिया जा सकेगा।

इस शान्ति और समर्थता को अविलम्ब घसीट बुलाया जा सके, इस निमित्त महाकाल की प्रेरणा से एक दूसरा अभिनव प्रयोग इन्हीं दिनों आरम्भ किया गया है, वह है—आश्वमेधिक यज्ञ शृंखला। यों देखने में बाह्य दृष्टि से तो यह कुम्भ स्तर के मेले-ठेले जैसे प्रतीत होते हैं, पर इनकी आध्यात्मिक महत्ता कितनी गहरी है और वर्तमान समय में यह कितने अनिवार्य हैं, इसे कोई दिव्य दृष्टि सम्पन्न महापुरुष ही भली-भाँति जान-समझ सकता है। राम और कृष्ण के समय में भी ऐसे यज्ञायोजनों की आवश्यकता अनुभव की गई थी और तदनुसार सम्पन्न भी किए गये थे। असुरता तो समय-समय पर जन्मती और मरती ही रहती है। उनका दमन करने वाली दिव्य आत्माएँ अवतार प्रक्रिया के अन्तर्गत पदार्पण करती रहती हैं, पर इतने से ही उनका प्रयोजन पूरा नहीं हो जाता। यह पूर्वार्द्ध भाग है। इसे तो कदाचित् कोई भी पराक्रमी सम्पन्न करने में सफल हो सकता है। राम और कृष्ण जैसी अवतारी आत्माएँ न भी आतीं, तो भी रावण कुंभकरण, कंस, वृत्तासुर, बकासुर जैसे दुष्ट-दुर्जनों का विनाश होता ही, कभी न कभी वे अपनी मौत मरते ही। यह पंचभौतिक शरीर की मृत्यु हुई। यह मृत्यु गौण है। प्रमुख तो वह सूक्ष्म राक्षस हैं, जो अपनी स्थूल देह की समाप्ति के पश्चात् भी अमूर्त शरीर से अदृश्य जगत में विषाक्तता घोलते रहते हैं। श्रेष्ठ आत्माओं का उद्देश्य आध्यात्मिक उपचारों के माध्यम से उनकी उन्हीं सत्ताओं को सम्पूर्ण रूप से समाप्त कर उसकी जगह दिव्य सूक्ष्म तत्त्वों का अभिवर्धन करना है। यह एक गुह्य आध्यात्मिक प्रयोग है, जो अवतारी पुरुषों के सूक्ष्म संरक्षण और मार्गदर्शन के बिना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। सामान्य आत्माएँ यदि किसी विधि स्थूल दैत्य के विनाश में सफल हो भी जायँ, तो परोक्ष जगत में समायी सूक्ष्म प्रतिकूलता का विध्वंश उनके बूते का नहीं। इस कार्य को तो कोई अवतारी सत्ता ही सम्पन्न कर सकती है, अस्तु अवतार प्रक्रिया के साथ महत्त्वपूर्ण बात यह जुड़ी होती है कि वह स्थूल-सूक्ष्म दोनों स्तरों पर दनुजता का दमन करती और वातावरण को श्रेष्ठ-शालीन बनाती है।

अश्वमेध प्रक्रिया इन्हीं विशिष्टताओं से युक्त इस युग का एक अभूतपूर्व आयोजन है। इस महान अनुष्ठान में जो-जो सम्मिलित होंगे, वे निश्चय ही सौभाग्यशाली समझे जायेंगे और अक्षय पुण्य-लाभ अर्जित करने में सफल होंगे।

जैसा कि पूर्व में बताया गया कि धार्मिक कृत्यों का उत्तरार्द्ध ब्रह्मभोज है और कहा गया है कि इसके बिना अनुष्ठान पूर्ण नहीं होते। अश्वमेध शृंखला के साथ भी यह आवश्यक अनुबन्ध जुड़ा हुआ है। इतने विशाल स्तर के आयोजन में यदि ब्रह्मभोज सम्मिलित न हो, तो इससे उसकी गरिमा और महिमा दोनों प्रभावित होती हैं। इसी कारण उस पुण्यदायी परम्परा को इसके साथ शामिल रखा गया है।

जैसा की पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है, ब्रह्मभोज का तात्पर्य यहाँ अन्नाहार से नहीं है। ब्राह्मणों को भोजन कराना भी ब्रह्मभोज कहा जाता था, पर जो लोग उस कर्तव्य का निर्वाह तो नहीं करते, केवल जाति से ब्राह्मण हैं, उन्हें खिलाने-पिलाने मात्र से ब्रह्मभोज क्रिया मात्र है। मूल उद्देश्य तो ज्ञान का प्रसार है। सद्ज्ञान के प्रसार में जिसके द्वारा कोई सहायता न मिले, वह ब्रह्मभोज नहीं हो सकता। इन दिनों उस लक्ष्य की पूर्ति सत्साहित्य द्वारा ही हो सकती है। अतएव जन-जन को उससे जोड़ देना ही सहज-सुलभ ब्रह्मभोज हो सकता है, अस्तु आश्वमेधिक शृंखला में भाग लेने वाले प्रत्येक परिजन का कर्तव्य है कि वे इस परम पावन धर्मानुष्ठान के उपरान्त ब्रह्मभोज के रूप में ज्ञानदान अवश्य करें। इसके बाद ही सम्पूर्ण कृत्य पूरा हुआ माना जा सकेगा और तभी इसके फलितार्थ लौकिक जीवन में सम्पन्नता, सफलता, यशस्विता के रूप में एवं पारलौकिक जीवन में शान्ति-सद्गति के रूप में हस्तगत किए जा सकेंगे।

ज्ञान दान का यह ब्रह्मभोज सम्पन्न कैसे किया जाय? इसके लिए बहुत अधिक माथापच्ची करने की आवश्यकता नहीं है। शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार एवं गायत्री तपोभूमि, मथुरा में परमपूज्य गुरुदेव प्रणीत साहित्य के विभिन्न विषयों पर न्यूतम ५०-५० रुपये मूल्य के सेट तैयार किए गये हैं। ब्रह्मभोज के निमित्त उन्हें आधी कीमत पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। दानदाताओं के दान से १२/५० रुपये एवं १२/५० रुपये केन्द्र द्वारा कमीशन के तौर पर देने का प्रावधान है। इस प्रकार ५० रुपये मूल्य का एक सैट २५ रुपये जितनी किफायती दर पर खरीदा जा सकेगा। इस अभिनव आलोक वितरण प्रक्रिया के अन्तर्गत पुस्तकें बिना दाम भी मुफ्त में दी जा सकती थीं, किन्तु मानवी मस्तिष्क की बनावट कुछ ऐसी है कि वह मुफ्त के माल को बेकार और घटिया समझ कर उसे कचराघर में डाल देता है। इस प्रकार जिससे अनेकों को अनेक गुना लाभ और मार्गदर्शन मिल सकता था, वह बेकार बनकर यों ही सड़ता-गलता रहता अथवा अग्नि की भेंट चढ़ जाता है। इन्हीं कारणों से इन पुस्तकों को सर्वथा मूल्य रहित नहीं किया गया। जिस वस्तु के लिए गाँठ का पैसा खर्चना पड़ता है, रख-रखाव भी करना पड़ता है, उसके प्रति मोह बना रहता है, दुरुपयोग होने पर पीड़ा भी होती है। अतएव संजीवनी साहित्य को इस दायरे में रखने की विवशता आन पड़ी।

प्रत्येक प्राणवान परिजन, शाखाओं और शक्तिपीठ संचालकों से यह भाव-भरा अनुरोध है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में सम्पन्न होने वाले अश्वमेध यज्ञों के लिए ( जहाँ-जहाँ यह सम्पन्न हो चुके, वहाँ के परिजन दूसरे क्षेत्रों के लिए ) अधिकाधिक उदारता का परिचय देते हुए ब्रह्मभोज साहित्य को सस्ते दामों में अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाने में केन्द्र का सहयोग करें। आश्वमेधिक अनुष्ठान शृंखला के अन्तर्गत इस प्रक्रिया में अब तक अस्सी लाख रुपये से अधिक का साहित्य भावनाशील आत्माओं की सहायता से नये साधकों को आधे मूल्य पर दिया जा चुका है। आशा है उक्त राशि यज्ञ-शृंखला के साथ-साथ निरन्तर वृद्धि करती हुई परिजनों की मदद से अनेकों गुनी बढ़ती चलेगी। विश्वास तब और पुष्ट होता है, जब प्रथम अश्वमेध यज्ञ में कुछ हजार रुपये से प्रारम्भ होकर अब यह राशि लाखों तक पहुँच गई है। इस निमित्त परिजन जितना अनुदान निकालते हैं, उसे चार गुने मूल्य का साहित्य नये लोगों तक पहुँच जाता है, इस कारण इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। आगे इसे ( राशि को ) और विशाल बनाने में निष्ठावान स्वजन कोई कसर उठा न रखेंगे, ऐसी उम्मीद है।

अश्वमेध यज्ञों की ब्रह्मभोज परम्परा का निर्वाह यथावत् होता रहे, उसमें कोई अवरोध-अड़चन न आने पाये, इसके लिए आर्थिक दृष्टि से समर्थ लोग इस अभूतपूर्व योजना के आजीवन भागीदार बन सकते हैं। उक्त राशि सुरक्षित कोष (कार्पस) में जमा रहेगी तथा उसका लाभांश विद्या-विस्तार में खर्चा किया जाता रहेगा।

जो इतने समर्थ नहीं हैं, वे अपेक्षाकृत छोटी राशि का भी योगदान कर सकते हैं। अब तो यह प्रक्रिया व्यक्तिगत, शाखागत एवं आयोजन स्तर पर भी प्रारम्भ होनी शुरू हो गई है। परिजनों में ब्रह्मभोज प्रक्रिया एक स्वस्थ स्पर्धा के रूप में चल पड़ी है। उनके बीच प्रायः इसी बात की प्रतिद्वन्दिता छिड़ी रहती है कि कौन कितनी बड़ी रकम कितनी जल्दी इसके लिए जुटा सकता अथवा दे सकता है। उद्देश्य यदि पवित्र हो तो ऐसी प्रतिस्पर्धाएँ महान प्रयोजन सिद्ध करने में बड़ी समर्थ भूमिका निभाती देखी जाती हैं। जन-जन तक सत्साहित्य के प्रसार में भी यह ऐसी ही साबित होंगी, ऐसा माना जाना चाहिए।

ब्रह्मभोज हेतु जो साहित्य सैट तैयार किए गये हैं, उनकी विषय सूची निम्न प्रकार है— १. गायत्री महाविद्या—प्रथम, द्वितीय, तृतीय सैट २. व्यक्ति निर्माण सैट ३. परिवार निर्माण सैट ४. समाज निर्माण सैट ५. आध्यात्मिक विज्ञान सैट ६. बाल निर्माण सैट ७. क्रान्तिधर्मी सैट ८. श्रद्धाञ्जलि सैट ९. सैनिक शिक्षा सैट १०. विचार क्रान्ति सैट ११. यज्ञ संस्कार-कर्मकाण्ड १२. आत्म चिन्तन १३. स्वास्थ्य रक्षा १४. संगीत सैट १५. महिला जागरण १६. प्रज्ञा पुराण सैट १७. युग साहित्य सैट १८. युग निर्माण साहित्य सैट।

इस साहित्य से यदि एक-एक व्यक्ति का सम्पर्क सध सके, तो इससे जो प्रकाश-प्रेरणा और मार्ग दर्शन समाज को मिलेगा, वह हर प्रकार से अमूल्य और अनुपम होगा। इस दृष्टि से विचार किया जाय, तो प्राचीन साधु-ब्राह्मणों के द्वारा किया जाने वाला दायित्व इनसे भली प्रकार पूरा हो जाता है। ऐसे में इनका आदर-सम्मान, पोषण-प्रोत्साहन, ज्यादा से ज्यादा पठन-पाठन, प्रचार-प्रसार में समय, श्रम और साधन का नियोजन ही वास्तविक ब्रह्मभोज है। परम पुण्यदायी अश्वमेध में भागीदार रहने वाले प्रत्येक जागृत प्राणवान परिजन इस ब्रह्मभोज ( ज्ञान-यज्ञ ) को पूरा करने में किसी भी प्रकार की कोताही न बरतेंगे, ऐसा विश्वास है।