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ईश्वर के पास बैठना अर्थात् उपासना कैसे हो?...ा उपाय है उसके साथ अपने आप को जोड़ देना। इसमें अपनी हस्ती, अपनी इच्छा मिटा कर ईश्वर को समर्पित करनी ...
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किस लड़की का किस लड़के से विधि वर्ग मिला या नहीं?...बात परिवार वालों को देखनी है। दोनों पक्षों की उपयुक्तता मिलती हो, तो समझना चाहिए कि जोड़ी मिल गई। पर...
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जिस जाति के पास ऐसे कोई महापुरुष नहीं है वह बड़ी अभागी है और उन्नति के मार्ग पर उसका अग्रसर होना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि जब उसके सामने कोई उच्च आदर्श ही नहीं तो किस प्रकार अवनति के गड्ढे से निकलकर उन्नति के शिखर की तरफ अग्रसर हो सकती है?...िए समाजशास्त्र वेत्ताओं ने यहाँ तक कह दिया है कि जिस जाति के पास दुर्भाग्य से उच्च आदर्श के लायक को...
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देखना यह है कि क्या अनास्था उत्पन्न करने से व्यक्ति या समाज को कुछ लाभ मिलेगा?...दिशा में जितना अधिक चिन्तन किया जाए उतना ही स्पष्ट होता जायेगा कि उसमें इसकी तुलना में हानि अधिक है...
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देखा जाय कि धूमधाम वाली, दहेज ठहराव वाली शादियाँ क्या आवश्यक है?...सन्दर्भ में समस्त संसार पर दृष्टिपात करना होगा। कहीं भी ऐसा प्रचलन न मिलेगा, जहाँ इस प्रकार का आडम...
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नचिकेता के उदारचेता पिता वाजिश्रवा जब समस्त धन-धान्य लोक मंगल के लिए दान दे चुके तो उसने पूछा आप लोभ त्याग की परीक्षा में सफल हो चुके, फिर मोह-त्याग में क्यों असफल होते है, मुझे खिलौना बनाकर अपने पास क्यों रखना चाहते हैं, लोक मंगल के लिये मुझे भी दान क्यों नहीं दे देते?...िश्रवा ने पुत्र को अपने से बढ़कर आदर्शवादी देखा तो हर्षोल्लास से उनकी आँखें डबडबा आई। उन्होंने तत्का...
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भिन्नताओं के मध्य आज की परिस्थितियों के अनुरूप क्या है?...ाय और औचित्य की कसौटी पर कौन से तर्क, तथ्य और प्रमाण मानने योग्य हैं-यह देखा जाना चाहिए। हर उचित-...
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भूतकाल में हमारे पूर्वज समस्त विश्व का मार्गदर्शन करने में किस प्रकार सफल हो सके?...े लिए उन्होंने अपने में किस स्तर की क्षमता एवं आदर्शवादिता को विकसित किया? यही इस रचना का मूल उद्दे...
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मनुष्य मूलतः क्या है?...ी मूलभूत जन्मजात प्रवृत्तियाँ क्या हैं। इस सन्दर्भ में उसके उद्गम स्रोत पर ध्यान देना चाहिए। वह ईश्व...
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यह सब कैसे किया जाय?...ा एक ही उत्तर है कि प्रवासी भारतीय स्वयं देव संस्कृति का उत्तराधिकारी प्रतिनिधि अनुभव करें। सम्पर्क...
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सोचा यह जाना चाहिए कि गरीब वर्ग पर इस प्रथा के कारण कोल्हू में पिलने जैसा कितना संकट टूटता है?...ी लड़कियाँ माता-पिता की आँखों में से आँसू बरसते देखकर कितना सकुचाती हैं और अपने को अभागी मानती हैं। ...
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हमें इन पाश्चात्य प्रतिपादकों की मान्यताओं पर तनिक भी ध्यान नहीं देना चाहिए और पूछना चाहिए कि यदि सभी जानवर विकसित हो रहे हैं, तो मनुष्य शरीर का विकास कब से हुआ और भविष्य में क्या अन्तर पड़ेगा?...ों वर्षों से मनुष्य इसी स्तर के शरीरों में रह रहा है और उसकी प्रवृत्तियों एवं आदतों में भी कोई अन्त...
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अभीष्ट प्रयोजन के लिए समय निकालें कैसे?...मनोयोग जुड़े कैसे? श्रम संलग्नता बने कैसे? इन समस्याओं का समाधान एक ही है कि जिन ललक लिप्साओं में इतने...
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इतना जानते हुए भी यदि कोई जान बूझकर अपने पैरों कुल्हाड़ी मारे, काँटों पर चले, गड्ढे में गिरे और बर्र के छत्ते में हाथ डाले तो कोई क्या करे?...समझदारी का अभाव समझ में आता है। उसके लिए भाग्य-भगवान को दोष देकर भी जी हलका किया जा सकता है। किन्तु त...
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करना क्या चाहिए?...यदि इस प्रश्न का उत्तर गम्भीरता और दूरदर्शिता के सहारे उपलब्ध करना हो तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़...
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कौन कितना जिया?...इसका लेखा-जोखा वर्ष, महीने या दिनों को गिनकर नहीं करना चाहिए वरन् देखा यह जाना चाहिए कि जीने वाले ने ...
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जब कल्पना जगत में बेपर की उड़ाने ही उड़नी हैं तो फिर उन्हें विधेयात्मक स्तर की क्यों न गढ़ा जाय?...असफलता के स्थान पर सफलता का स्वप्न देखने में क्या हर्ज है? संकट के न आने और उसके स्थान पर सुखद सम्भाव...
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यदि गहरी न छानी हो और अपना अस्तित्व शरीर से भिन्न भी प्रतीत होता हो, तो फिर सोचना होगा कि सृष्टा ने जो सुविधाएँ किसी भी जीवधारी को नहीं दी है वे मात्र मनुष्य को ही क्यों प्रदान कर दी?...जबकि उसे समदर्शी न्यायकारी और परमपिता कहा जाता है। इन तीनों विशेषताओं का तब खण्डन हो जाता है, जब अन्य...
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यह चर्चा इसलिए हो रही है कि आहार पर पड़ने वाले प्रभाव के सम्बन्ध में यह जाना जा सके कि किस स्तर के व्यक्तियों के प्रभाव क्षेत्र में विनिर्मित हुआ आहार किन प्रभाव, विशेषताओं से सम्पन्न हो सकता है और उसका उपयोग करने वाले पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?...शारीरिक पोषण में जो प्रभाव खाद्य पदार्थों में पाये जाने वाले रसायनों का होता है, ठीक वैसा ही उदरस्थ क...
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सृष्टा ने मनुष्य स्तर तक पहुँचाने पर जीवधारियों की क्रमिक प्रगति और पात्रता को देखते हुए सोचा, कि क्यों न इसे सृष्टि की सुव्यवस्था में सहयोगी बनाकर अपना थोड़ा सा भार हल्का किया जाय?...इसी दृष्टि से उसे युवराज का पद प्रदान किया गया और तदनुरूप समर्थता से सम्पन्न किया गया कि सृष्टि की सु...
- आग में हाथ देने वाला बिना जले कैसे रहे?...िषपान करने वाले का प्राण कैसे बचे? घड़े भर मदिरा पी जाने पर सन्तुलन कैसे निभे? मनःस्थिति में विकृतिय...
- आत्मवत् सर्वभूतेषु का सिद्धान्त कहाँ पला?...सुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता कहाँ निभी?
यदि कलह और विद्वेष की आग में जलते मरते अपना अस्तित्व मिट...
- उनके सामने बेचारी दवा-दारु की क्या बिसात?...िस बलबूते पर वे विषाणुओं को मारें, वात, पित्त, कफ़ से निपटें और ग्रह नक्षत्रों के विरुद्ध किस प्रका...
- उनमें न चेतना है, न समझ, फिर अकारण इतने सारे मनुष्यों पर राशि फेर के कारण सदा कुपित रहे, हानि पहुँचाये, यह कैसे हो सकता है?...ह जंजाल उन्हीं के गले पड़ता है, जो इस अन्धविश्वास से ग्रसित हैं। जो इस झंझट से दूर हैं, जो फलित ज्योत...
- ऐसा समाज किसके लिए?...ितना? किस प्रकार सुविधाजनक होगा उसकी बहुत कुछ झाँकी इन दिनों की परिस्थितियों में भी जहाँ-तहाँ की जा...
- ऐसी दशा में दरबे के कबूतरों की तरह रहने से क्या लाभ?...ंयुक्त परिवार में रहने वालों को अलग घोंसले में मौज मजा दीखता है और अलग रहने वाले हाथ मलकर पश्चाताप ...
- किसी के हाथ अपने कारखाने की अर्थव्यवस्था क्यों कर सुपुर्द करेगा?...ादल सर्वत्र बरसते हैं पर उस पानी को जमा करना छोटे या बड़े बर्तन के हिसाब से ही सम्भव होता है। छोटे गड...
- क्यों नीचा दिखाये?...र क्यों अपनी मान्यता के गुण गायें? अगले दिनों साम्यवाद मात्र आर्थिक ही नहीं, भाषा, धर्म, संस्कृति द...
- घड़े भर मदिरा पी जाने पर सन्तुलन कैसे निभे?...नःस्थिति में विकृतियाँ भरी नहीं कि परिस्थितियाँ संकटापन्न हुई। नियत की क्रिया प्रतिक्रिया व्यवस्था ...
- जब आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं, मरणोत्तर जीवन की आशा नहीं और शरीर के साथ ही अपने अस्तित्व का अन्त होने वाला है तो भी थके हारे, बूढ़े, घिसे व्यक्ति की आँखों में आशा की चमक कहाँ से आ सकती है?...वानी में भी मनुष्य जो कुछ देखता है सब कुछ निरर्थक, निरुद्देश्य, नीरस पाता है। ऐसी दशा में वह निरर्थ...
- जो टूटा उसे फेंक दिया जाय, ऐसा कैसे हो सकता है?...ब कुछ नया ही नया हो यह कैसे सम्भव है? इसी प्रकार जो रूठ जाय उससे खुद भी रूठ बैठे तो घर परिवार का चल...
- देवताओं को प्रसन्न करने की एजेन्सी किस आधार पर इन पण्डितों को मिली हुई है, इनके द्वारा किये गये क्रिया-कृत्य ही क्यों इन देवताओं को सन्तोष देते हैं, अन्य कोई उसी पूजा प्रार्थना को स्वयं कर लें, तो उनका समाधान क्यों नहीं होता?...क्षत्रों की भी ऐसी ही विचित्र माया है। दो-दो नक्षत्रों के ऐसे जोड़े हर महीने आते हैं, जिन्हें मूल कह...
- फिर उसको सुविधाएँ पहुँचाने की जिम्मेदारी परिवार वालों पर कैसे रही?...दि रही भी तो एजेन्ट लोगों के घर में गया माल उन मृतात्माओं के पास कैसे पहुँच जायेगा?
हर मनुष्य अ...
- मनुष्यकृत दण्डविधान में इस प्रकार के अपराध करने वालों को प्रताड़ना देने का अनुबन्ध नहीं है तो क्या?...्रकृति के अपने कानून तो है। ऐसे कठोर, ऐसे सुनिश्चित जिनसे बच निकलना कठिन है। कल न सही परसों तो उनके...
- ऐसी दशा में युग अवतरण के लिए भागीरथी साहस कौन अपनाए?...सर्वत्र छाए हुए सन्नाटे में अपना मौन खोलने के लिए जाग्रत आत्माओं के अतिरिक्त और किसी से भी आशा नहीं ...
- फिर असफलता क्यों मिली?...इस प्रश्न के एक ही उत्तर में उसे संकल्प का अभाव ही कह सकते हैं। धर्मकृत्यों को पूर्ण करने में तो इस ...
- अँधेरे और कुहरे में उन्हें रास्ते का पता कैसे लगे?... उनमें लगे बैरीगेटर इसी पद्धति से नगर, नदी, पर्वत आदि को दिन की तरह देखते चलते हैं। पानी के जहाजों को...
- अँधेरे को प्रकाश में बदलने के लिए दीपक की तरह जले कौन?... भीरुता के असमंजस में खड़े हुए लोगों को मार्गदर्शन कराने के लिए अग्रिम पंक्ति में चले कौन? इन प्रश्नो...
- अँधेरे में न देखने का कारण यही है कि प्रकाश के अभाव में उसकी किरणें वस्तुओं पर पड़ती ही नहीं तो फिर वे परावर्तित होकर आँखों तक लौटेंगी ही कैसे?... आँखों में स्वयं तो इतनी शक्ति है नहीं कि वे किसी वस्तु को प्रकाशवान बना सकें।रेडार को जादुई आँख कह स...
- अज्ञातवास के दिनों जिस-जिस की नौकरी करके छिपते छिपाते दिन क्यों गुजारते रहे?... इन शंकाओं का कोई बुद्धि संगत समाधान मिलता नहीं।टिटहरी द्वारा समुद्र पाटने का प्रयत्न अगस्त ऋषि की सह...
- अज्ञातवास के दिनों जिस-तिस की नौकरी करके क्यों समय गुजारते?... शत्रुओं से वे तब क्यों न निपट लेते? यह भगवान की इच्छा में अपनी इच्छा मिलाने का ही प्रतिफल है, कि उपर...
- अज्ञानग्रस्त आँखें यदि उसे न देख सके तो उस क्षेत्र के लिए अन्य किसी प्राणी के शरीर में प्रवेश करके उसकी आँखों से यह परखा जा सकता है कि उसकी और मनुष्य की स्थिति में जमीन आसमान जैसा कितना बड़ा अन्तर है?... यह अन्तर न तो अकारण है और न पक्षपात युक्त। ईश्वर ने मनुष्य को प्राणि जगत में सबसे अधिक सज्जन और जिम्...
- अतः दानी और उदार बनने से पहले यह विचार करना चाहिए कि जो हम दे रहे है वह सार्थक हो रहा है क्या?... गम्भीरता पूर्वक विचार के बाद अधिक सम्भावना इसी निष्कर्ष पर पहुँचने की होगी कि निरर्थक ही नहीं अनर्थक...
- अथवा वह इससे आगे भी कुछ है?... इन प्रश्नों के सही उत्तर प्राप्त करने के लिए स्ट्रोम वर्ग ने तत्कालीन विज्ञान की दार्शनिक विवेचना कर...
- अदृश्य को कैसे देखा जाय?... अप्रत्यक्ष को कैसे पकड़ा जाय? सूक्ष्मदर्शी विवेक का माइक्रोस्कोप ही इन विषाणुओं का अता-पता बता सकता ह...
- अधार्मिक होने के पक्ष में यह दलील काफी है कि हम भ्रान्त धारणाओं में क्यों उलझें?... पर साथ ही यह भुला दिया जाता है कि धारणा रहित मनःस्थिति भ्रान्तियों में उलझने से भी अधिक बुरी है। मर्...
- अनुपयुक्त आहार करते रहने पर भी कोई किस प्रकार अपने स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रख सकेगा?... इस तथ्य को समझने में कोई बड़ी कठिनाई नहीं होनी चाहिए। फिर भी स्पष्ट है कि आहार के सम्बन्ध में वह ढर्र...
- अनेक तरह के सम्मिश्रण कर देने पर जाँच पड़ताल कैसे हो?... प्रत्येक प्राणी आहार को उसके असली रूप में ही ग्रहण करता है। जीवन एवं पोषण भी उसी स्थिति में रहता ह...
- अन्य प्राणियों की आकृति-प्रकृति में अन्तर हो सकता हो तो उनके स्वयं के लिए तथा विश्व व्यवस्था के लिए कितना उपयुक्त होगा?... उस प्रसंग को छोड़ दे तो भी मानवी प्रगति की जो आकुल-व्याकुल आवश्यकता समझी जा रही है, उसकी पूर्ति में प...
- अन्य प्राणियों को पराया समझकर उपेक्षा ही न करें, वरन् उसका माँस खाने तक के लिए उतारू हो चले, तो यह समता कहाँ रही?... आत्मवत् सर्वभूतेषु का सिद्धान्त कहाँ पला? वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता कहाँ निभी?
यदि कलह और व...
- अन्यथा औषधि मात्र से अस्वस्थता का स्थायी निराकरण कहाँ सम्भव है?... कपोत चरक ने बारी-बारी सभी चिकित्सकों के सम्मुख वही प्रश्न दुहराया ‘कोऽरुक’ अर्थात् कौन रोगी होता है?...
- अन्यान्यों की सेवा सहायता की बात सोचने से पहले देखना होगा कि इस अपने ऊपर सर्वथा आश्रित को सुखी समुन्नत बनाने का प्रयत्न हुआ या नहीं?... उत्तरदायित्व निभाया या नहीं? यहाँ यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए-साधन सम्पदा मात्र शरीर यात्रा के काम ...
- अपना स्वास्थ्य नष्ट होने दुर्बलता, रुग्णता और अधिक बढ़ने, अस्वस्थ सन्तानें जनने, गर्भपात आदि होते रहने, असह्य प्रसव पीड़ा न सह सकने, अकाल मृत्यु को गले न बाँधने जैसे विचार उसके मन में उठते रह सकते हैं, पर वह कह कुछ नहीं सकती, पराधीन की स्वेच्छा क्या?... उसकी अपनी मर्जी कहाँ? बन्दी को मालिकों की मर्जी पर ही चलना पड़ता है। उसे अपने स्वास्थ्य की बात सोचने ...
- अपनी चिन्ता, समस्याओं से फुरसत नहीं फिर कौन किसका दर्प देखे और किसलिए, किस-किस समय किसी को सराहें?... अपनी ओर ध्यान खींचने और चकाचौंध उत्पन्न करने की लिप्सा को बचकानी बालक्रीड़ा के अतिरिक्त और कुछ कहते ...
- अपनी लड़कियों की सादगी भरे विवाहों में अत्युत्साह एवं अपने लड़कों की शादी की चर्चा पर मुखौटा बदलने की नीति कहीं परिजन तो नहीं अपना रहे?... समाज की अन्यान्य समस्याएँ अपनी जगह है और विवाह अपव्यय दहेज की एक ओर। बीस लाख प्रज्ञा परिजन एवं उनके ...
- अपने आपके प्रति, स्वजन सम्बन्धियों के प्रति एवं सर्व साधारण के प्रति हमारी रीति-नीति, व्यवहार पद्धति क्या हो?... उसकी सही और शालीनता युक्त गतिविधि अपनाने को लोक व्यवहार एवं सद्ज्ञान कहा जाता है।अध्यात्म का योग पक्...
- अपने आपसे अपने और अपने शरीर के बीच का अन्तर, अपना स्वरूप, जीवन का उद्देश्य, परमेश्वर की मनुष्य से आकांक्षा, इस सुर दुर्लभ मनुष्य जन्म का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात पर प्रत्येक पहलू से विचार किया जाना चाहिए और समीक्षा की जानी चाहिए कि अपनी वर्तमान गतिविधियाँ आदर्श जीवन पद्धति से तालमेल खाती हैं या नहीं?... यदि अन्तर है तो वह कहाँ है कितना है? इस अन्तर को दूर रखने के लिये जो किया जाना चाहिए वह किया जा रहा ...
- अपने को ज्वलन्त दीपक की तरह प्रकाशवान बनाकर सबको प्रकाश देता और स्वयं प्रकाश पुञ्ज कहलाता, यह मार्ग तुझे क्यों नहीं सूझा?... विश्व भगवान की सेवा साधना के लिए भीतर से हुलस क्यों नहीं उठा, पत्थर के टुकड़ों पर सिर पटककर ईश्वर...
- अपने को, सम्बन्धियों को जलाते-कुढ़ाते जी लेने और अन्त में पाप की गठरी सिर पर लद कर अँधेरे भविष्य की ओर चल पड़ने में क्या कुछ हाथ लगा?... जिस सौभाग्य पर समस्त प्राणि जगत ईर्ष्या कर सकता है उसे भव सागर के नाम से जानी जाने वाली, सड़ी कीचड़ मे...
- अपने देशवासियों के प्रति हमारे अन्दर कितनी सहानुभूति है?... राष्ट्रीय सम्पत्ति के सदुपयोग का कितना ध्यान रखते हैं? राष्ट्र कल्याण के लिए अपने स्वार्थों के ऊपर क...
- अप्रत्यक्ष को कैसे पकड़ा जाय?... सूक्ष्मदर्शी विवेक का माइक्रोस्कोप ही इन विषाणुओं का अता-पता बता सकता है जो दुर्गुणों के रूप में विष...
- अब अपने पास बचा ही क्या है?... जो था बहुत बड़ा भाग खो चुके। जो है उसकी सुरक्षा का साधन तभी बनेगा जब हमारे भीतर मानवोचित शौर्य और साह...
- अब आवश्यकता तो हरिश्चन्द्र और भामाशाहों जैसी उदारता की है, पर उतना न बनने पर तीन प्रतिशत की बात तो सोचना ही चाहिए, अन्यथा नव सृजन की इतनी विशाल कार्य योजना जिसके साथ ४५० (अब ६ अरब से अधिक) करोड़ मनुष्यों का भाग्य और भविष्य जुड़ा हुआ है, किस प्रकार अपने लक्ष्य तक पहुँच सकेगी?... स्मरण रहे, ध्वंस से सृजन महँगा पड़ता है। सर्वतोमुखी नव निर्माण में भी तो आखिर कुछ न कुछ लगेगा ही। उ...
- अब इस क्षेत्र में चल रहें अनुसन्धानों ने एक नया मोड़ लिया है कि जिनको पर्याप्त मात्रा में पुष्टाई मिलती है वे कुपोषण ग्रस्तों से भी गई गुजरी स्थिति में क्यों पड़े रहते हैं?... उन्हें वे लाभ क्यों नहीं मिलते जो खाद्य रसायनों का गुणगान करते हुए आमतौर से बताये जाते हैं।
इस असम...
- अब कुछ दिनों से गान विश्राम ले लें और दूसरे रसों को भी जीवित रहने का अवसर मिल जाय तो क्या हर्ज है?... कुछ दिन तक घुँघरू न बजें, पायल न खनकें तो भी कला जीवित रहेगी। चित्रकार नव यौवना की शालीनता पर पर्दा ...
- अब देखना यह है कि आधि-व्याधियों के रूप में अशुभ कर्मों की काली छाया सिर पर घिर गई है तो उसके निवारण का कोई उपाय है क्या?... जो कर्मफल पर विश्वास न करते हों, उन्हें भी मानवी अन्तःकरण की संरचना पर ध्यान देना चाहिए और समझना चाह...
- अब प्रश्न यह उठता है कि यह किया किस प्रकार जाय?... इसके दो ही उपाय हैं-(१) आत्म-विश्लेषण के द्वारा स्व सत्ता की स्थिति तथा दशा का सही बोध कराने वाली आस...
- अब्राहम लिंकन दक्षिण अमेरिका में प्रचलित गुलाम प्रथा के पक्षधरों की कट्टरता और कठोरता को देखते हुए शंकाशील ही बने रहे कि इतना कठिन कार्य न जाने कितनी देर में, कितनी कठिनाई से पूरा हो सकेगा?... किन्तु प्रवाह कुछ इस प्रकार उल्टा कि दास प्रथा का अन्त ही हो गया और इसके लिए उतना बल प्रयोग नहीं करन...
- अभावग्रस्त स्थिति में पौष्टिक आहार, अनुकूल विहार कैसे मिलें?... ऐसी दशा में भी जिस महिला को बार-बार प्रजनन का भार वहन करना पड़ेगा वह अपनी स्वस्थ काया सम्पदा को क्रमश...
- अभिभावकों और पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का प्रदर्शन कौन करता है?... मात्र मनुष्य ही है जिसे कर्मठता-विचारणा जैसे प्रत्यक्ष दैवी वरदान मिले हैं, इसके लिए प्यार, करुणा उल...
- अर्जुन यदि अपने पराक्रम से महाभारत जीत सके होते, तो द्रौपदी का भरी सभा में अपमान क्यों देखते?... अज्ञातवास के दिनों जिस-तिस की नौकरी करके क्यों समय गुजारते? शत्रुओं से वे तब क्यों न निपट लेते? यह भ...
- अर्जुन यदि सचमुच ही महाबली थे तो द्रौपदी का भरी सभा में अपमान क्यों होने देते?... अज्ञातवास के दिनों जिस-जिस की नौकरी करके छिपते छिपाते दिन क्यों गुजारते रहे? इन शंकाओं का कोई बुद्धि...
- अर्थात् कौन रोगी होता है?... यह पूछने से उनका मन्तव्य यह था कि जो मूल कारण को जानता होगा वही उसकी रोकथाम के उपाय सोचेगा। चिकित्सा...
- असफलता के स्थान पर सफलता का स्वप्न देखने में क्या हर्ज है?... संकट के न आने और उसके स्थान पर सुखद सम्भावनाओं के आगमन की बात सोचने में भी कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए।...
- असमंजस इस बात का है कि यदि नैतिक और सामाजिक आदर्शवादिता न रहे तो फिर मनुष्य की पशु-प्रवृत्तियाँ कैसे रुकें?... उसकी सामर्थ्य का सृजन प्रयोजनों में नियोजन कैसे हो? बढ़ती हुई सम्पदा ही सब कुछ नहीं है।...
- अहं को विकृत अथवा परिष्कृत आधार पर पूरा करने के लिए जन साधारण को कितना कठिन प्रयास करना पड़ता है, इसे कौन नहीं जानता?... आत्म चेतना का स्वरूप निर्धारण करना और उसकी पूर्ति के नये आधार खड़े करना वस्तुतः प्रकृत प्रवृत्तियों क...
- आइए भारतीय संस्कृति की कुछ मान्यताओं का पर्यवेक्षण करें और देखें कि कोई कुशल माली उद्यान के पेड़-पौधों को सम्भाल, सुधारकर उन्हें सुरम्य उद्यान के रूप में जिस तरह विकसित करता है, उसी तरह मनुष्य को देवत्व की दिशा में अग्रसर करने के लिए, अपूर्णता से पूर्णता तक पहुँचाने के लिए यह दिव्य संस्कृति उपयोगी है या नहीं?... उसमें व्यक्ति को सुविकसित और समाज को समुन्नत बनाने की क्षमता विद्यमान है या नहीं? विश्व को अगले ...
- आखिर आत्मा और परमात्मा को मिलने की भूमिका तो चित्त को ही सम्पादित करनी है वह अन्य दिशा में उलझा रहेगा तो लक्ष्य प्राप्ति मार्ग पर बढ़ चलना किसके सहारे सम्भव होगा?... यदि चित्त की अस्त-व्यस्तता सुव्यवस्था में बदली जा सके तो समझना चाहिए वह प्रयोजन पूरा होने ही वाला है...
- आखिर इतना खर्च क्यों किया जाता है?... यह भी पता लगाया जाना चाहिए। प्रायः अधिकांश की दृष्टि यह रहती है कि दाँव पर लगाया गया पैसा कई गुना हो...
- आखिर भीतरी उद्वेग को दबाने के लिए नशे के अतिरिक्त और किसका सहारा लिया जाय?... ईश्वर से, धर्म से, बच्चों पर से, स्त्री से, अभिभावकों से, समाज से, अपने आप पर से विश्वास खोकर अनास...
- आखिर यह आकाश, पाताल जैसा अभ्यन्तर बना कैसे?... आया कहाँ से? लद पड़ा क्यों कर? इन अनबूझ पहेलियों को सुलझाते-सुलझाते, ओर छोर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ पहुँचन...
- आखिर शरीर ही तो व्यक्तित्व नहीं है?... आखिर सुविधाएँ मिल भर जाने से ही तो सब कुछ सध नहीं जाता? कुछ इससे आगे भी है। यदि न होता तो साधन सम्पन...
- आखिर सुविधाएँ मिल भर जाने से ही तो सब कुछ सध नहीं जाता?... कुछ इससे आगे भी है। यदि न होता तो साधन सम्पन्न ही सब कुछ बन गये होते। तब महामानवों की कहीं कोई पूछ न...
- आग पर गरम करने से सामान्य वस्तुओं की भी उपयोगिता बढ़ाई जा सकती है फिर व्यक्तित्व की प्रखरता उससे क्यों न बढ़ेंगी?... कच्चे अन्न को चूल्हे पर पकाकर मिष्ठान्न, पकवान बनाते हैं। ईंटों को भट्टे में लगाने से वे टिकाऊ बन जा...
- आज तो हमारा मुँह बन्द कर दिया जाता है कि जब आपकी संस्कृति इतनी महान है तो उनके अनुयायी होते हुए भी आप इस दुर्दशाग्रस्त स्थिति में क्यों पड़े हैं?... हो यह रहा है कि संस्कृति की चर्चा मात्र पर्याप्त मान ली गई है, उसके आवरणों को तो ओढ़े रखा गया है पर...
- आज के बोझिल जीवन की अपेक्षा भविष्य में अधिक कोमल हलका और प्रफुल्ल अवसर बालकपन के रूप में मिलेगा तो इसमें खिन्न होने की क्या बात है?... आज शरीर और परिवार की छोटी सी परिधि में कोल्हू के बैल की तरह चक्कर काटने की भारवाही स्थिति से आगे बढ़क...
- आज शरीर और परिवार की छोटी सी परिधि में कोल्हू के बैल की तरह चक्कर काटने की भारवाही स्थिति से आगे बढ़कर कुछ समय उन्मुक्त अन्तरिक्ष में विचरण करने का अवसर मिलेगा और ईश्वर की अदृश्य गतिविधियों के सम्पर्क में रहना पड़ेगा तो उस कौतूहल पूर्ण स्थिति में रस लेने में भय क्यों माना जाय?... यात्राओं का, प्रवास पर्यटन का आनन्द उठाने की इच्छा सभी को रहती है। उन दिनों घर छोड़ना पड़ता है और ढर्र...
- आजीविका न हो तो फिजूलखर्ची की रंगीली पतंगबाजी कितनी देर काम आती है?... श्रमपूर्वक उपार्जन और एक-एक पाई का सदुपयोग करने वाली दूरदर्शिता ही सम्पन्नता को जन्म देती है। इस राज...
- आटे की गोली के प्रलोभन में मछली और जाल के दानों पर टूट पड़ने वाली चिड़िया की अदूरदर्शिता हर किसी को अखरती है, पर उस व्यामोह को क्या कहा जाय?... जो दुर्मति के सहारे दुर्गति कराने वाले अभिशाप के रूप में जन-जन के ऊपर लदा पड़ा है। इस सुयोग का जो लाभ...
- आत्म विस्मृति की यह स्थिति कब तक रहेगी?...
--पं. श्रीराम शर्मा आचार्यस्वतन्त्रता प्राप्ति से पूर्व हमें अपने भविष्य का अधिकार प्राप्त नहीं ...
- आत्मा क्या है?... परमात्म सत्ता का एक छोटा सा अंश। अणु की अपनी स्वातंत्र्य सत्ता लगती है, पर जिस ऊर्जा आवेश के कारण उस...
- आत्मा क्या है?... परमात्म सत्ता का एक छोटा सा अंश। अणु की अपनी स्वतन्त्र सत्ता लगती भर है, पर जिस ऊर्जा आवेश के कारण उ...
- आदत क्या पड़ गई है?... प्रचलन क्या है? इन सब बातों को ताक में रख कर इतना ही सोचना होगा कि इन समस्त अड़ंगेबाजी की तुलना में...
- आदि अनेक प्रश्न उभर कर आते है और यह असमंजस उत्पन्न करते हैं कि यदि स्वर्ग-नरक का अस्तित्व था ही नहीं तो धर्म संस्थापकों ने इतना बड़ा कलेवर रचकर खड़ा क्यों कर दिया?... हमें जानना चाहिए कि स्वर्ग-नरक दोनों का अस्तित्व हैं और उनके माध्यम से शुभ-अशुभ कर्मों के फल मिलने क...
- आधुनिक मनःशास्त्री यह बता सकने में असमर्थ हैं कि मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास अथवा पतन के वास्तविक कारण कौन-कौन से हैं?... क्या मानवी चेतना ऋद्धि-सिद्धियों की अधिष्ठात्री भी हो सकती है? मनोविज्ञान इस पर कुछ भी प्रकाश नहीं ड...
- आया कहाँ से?... लद पड़ा क्यों कर? इन अनबूझ पहेलियों को सुलझाते-सुलझाते, ओर छोर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ पहुँचना पड़ता है, जह...
- आयुर्वेद के आधार पर जड़ी-बूटी चिकित्सा अपनाई जाय, तो एलोपैथी की मद्य-माँस मिली हुई औषधियों का सेवन क्यों करना पड़े?... फैन्सी डिजायनों का फैशन न अपनाया जाय और सीधे-सादे कुर्ता पायजामा, बनियान, जाकेट आदि पर्याप्त समझे ...
- आलसी प्रमादी लोग किस प्रकार उपयुक्त आजीविका कमा सकेंगे?... पिछड़ी मनोभूमि और हेय स्वभाव अभ्यास वाले लोग जब गम्भीरतापूर्वक इस समाधान के लिए कारगर उपाय नहीं सोचें...
- आस्तिकता का कलेवर ओढ़े फिरने वाले नास्तिक, बता तेरी इस बाल क्रीड़ा से ईश्वरीय अनुग्रह का एक भी कण कैसे मिल सकेगा?... भूलें बहुत हो चुकी। बहुत क्या, यो कहना चाहिए कि अब तक का सारा जीवन भूल-भुलैयों में भटकते हुए ही बी...
- आस्था क्षेत्र में ज्ञान गंगा की आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की त्रिवेणी संगम की प्रभावी भूमिका रहनी चाहिए, पर इसके लिए किसी चमत्कारी भागीरथ की प्रतीक्षा क्यों की जाय?... क्यों न अपने परिवार देवता की मनुहार करने और मनौती मनाने में जुटा जाय?क्रान्तिकारी कार्लमार्क्सों का ...
- आस्पेंस्की ने सोचा कि जब मरना ही है तो बिस्तर पर क्यों मरा जाय?... मृत्यु का साक्षात्कार क्यों न किया जाय? वह उठा और चल पड़ा। निरन्तर चलता रहा। मित्रों ने अस्वस्थता की ...
- आहार को सन्तुलित बनाने के लिये इससे अधिक स्वादिष्ट, सस्ता, सुपाच्य सम्मिश्रण और हो भी क्या सकता है?... अदरक क्षुधा वर्धक होने के साथ पाचक रसों को उत्तेजित करने वाली उपयुक्त औषधि भी है। सुण्ठी इसी को सु...
- इतना ही नहीं, यह सोचकर चुप भी न बैठें कि हमें दूसरों के झंझट में पड़ने से क्या लाभ?... जिस पर बीते वह भुगते। इस असामाजिक मनोवृत्ति के कारण ही हर भले मानुष को एक एक करके गुण्डा तत्वों का...
- इतने नौकरी चाहने वालों को आखिर नौकर रखेगा कौन?... समय रहते हमें सोचना चाहिए कि स्वास्थ्य की तरह ही शिक्षा है, उसमें व्यक्तित्व कौशल निखरता है, उसमें...
- इतने पर भी यह रहस्य ही बना रहता है कि अकारण अनियमित यह असंगत फिल्म क्यों चलती रही, और उस समय उसके मिथ्या भ्रान्ति होने का आभास क्यों नहीं हुआ?... स्वप्न रात्रि में ही नहीं देखे जाते। दिवस स्वप्न भी होते हैं और जब वे सिर पर चढ़ते हैं तो यथार्थ के स...
- इतने महान प्रयोजन के लिए लोभ और व्यामोह की क्षुद्रता पर थोड़ा अंकुश क्यों नहीं लगा सकती?... समय की समस्याओं के समाधान हेतु जन शक्ति जुटाने की भागीरथी साधना में हमें स्वयं ही संलग्न होना चाहिए।...
- इत्यादि प्रश्नों के उत्तर पर गहराई से विचार करते समय अपने आप समझ जायेंगे कि स्वतन्त्रता के उत्तरदायित्वों को कितना समझ पाये हैं, कितना निभा पायें है?... कहना न होगा कि स्वतन्त्र देश के कर्तव्यनिष्ठ जिम्मेदार नागरिक की कसौटी पर हम पूरी तरह खरे सिद्ध नहीं...
- इन तीनों प्रकार के मनुष्यों में क्या अन्तर है?... इसकी गहराई में उतरकर जाँच पड़ताल करने पर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि साधन, सहयोग, परिस्थिति ...
- इन परिस्थितियों में सन्तान की वृद्धि सौभाग्य एवं ईश्वरीय उपहार माना जाता हो तो आश्चर्य ही क्या?... सन्तानोत्पादन के सहारे परिवार का बढ़ना प्रसन्नता की बात समझी जाती थी। इसके लिए मनौतियाँ मनाई जाती थ...
- इन प्रचलनों में सहयोग क्यों देते रहते हैं?... उन्हें अपनाये हुए क्यों हैं? इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक है उनके कारण उत्पन्न होने वाले संकटों के प्...
- इन शर्तों को स्वीकार करने वाले रसोइये की माँग क्या है?... यह पूछताछ करने पर नारी की उपयोगिता के एक अत्यन्त तुच्छ अनुदान का मूल्यांकन करना चाहिए जो पाकशाला से ...
- इन स्थानों में पर्यटन केन्द्रों जैसा आकर्षण तो क्रमशः बढ़ता जाता है, पर चिन्ता की बात यह है कि धर्म धारणा को जीवन्त रखने के लिए तत्वदर्शियों ने जिस महान परम्परा को जन्म दिया था और उसे अपनाने के लिए जन-जन को सहमत किया था, उस लक्ष्य का क्या हुआ?... यदि उसकी पूर्ति नहीं होती तो इस बढ़े हुए कलेवर को, निष्प्राण विस्तार को ढकोसला ही कहा जायेगा। निरुद्द...
- इनका अस्तित्व यदि है तो कैसा है?... और उनका मनुष्य के साथ आदान-प्रदान चल पड़ने पर किस पक्ष का क्या हित-अहित हो सकता है? यह विषय भी शोध प्...
- इनका उद्गम या सूत्र संचालन होता कहाँ से है?... इस सम्बन्ध में अधिक जानने की जिज्ञासा स्वाभाविक है। समाधान न होने पर नई कठिनाई खड़ी होती है कि मनुष्य...
- इनकी आवश्यकता ही क्या है?... यह अनचाही विसंगतियाँ उपजती क्यों हैं? इनका उद्गम या सूत्र संचालन होता कहाँ से है? इस सम्बन्ध में अधि...
- इनमें से किसे पसन्द किया जाय?... दर्शन शास्त्र के मतभेद भी ऐसे ही हैं। हिन्दू दर्शनों में योग, सांख्य, न्याय, वेदान्त, वैशेषिक, मीम...
- इन्डियन कौंसिल ऑफ रिसर्च, इन्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ मेडीकल साइन्स, नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रीशन, पोस्ट ग्रेजुएट इन्स्टीट्यूट ऑफ मेडीकल एजूकेशन एण्ड रिसर्च जैसी भारत की शोध संस्थाएँ न केवल देश की आर्थिक परिस्थितियों में अधिक उपयोगी खाद्यान्नों की शिफारिशें कर रही है वरन् यह भी सोच रही है कि उपयोगी स्तर का आहार ग्रहण करने पर भी असंख्यों को क्यों उसका लाभ नहीं मिलता है?... यह समस्या उन सभी लोगों की है जो आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न और बौद्धिक दृष्टि से सुशिक्षित होते हुए शार...
- इन्हीं वर्ग समुदायों में से किसी में रहना जिन्हें भाया, सुहाया हो उनसे कोई क्या कहे?... किन्तु जिन्हें कुछ आगे की बात सोचनी आती है, उनसे तो कहने सुनने जैसी ढेरों बातें हैं। उनमें से कुछ तो...
- इस अन्तर को दूर रखने के लिये जो किया जाना चाहिए वह किया जा रहा है या नहीं?... यदि नहीं तो क्यों?यह प्रश्न ऐसे है जिन्हें अपने आप से गम्भीरता पूर्वक पूछा जाना चाहिए और जहाँ सुधार ...
- इस असमंजस का समाधान प्राप्त करने के लिए दर्द पीड़ित रोगी के लिए डॉक्टर द्वारा की गई आपरेशन व्यवस्था के साथ संगति बिठाते हुए यह सोचना पड़ेगा कि यह क्या हो रहा है?... क्यों हो रहा है? लम्बे अन्धकार युग में कचरा बहुत जमा हो गया है। हर क्षेत्र में गन्दगी चरम सीमा पर प...
- इस आरम्भिक शर्त से उन दिनों सभी परिचित थे, अस्तु, उसकी चर्चा विस्तार पूर्वक करने की आवश्यकता नहीं समझी गई और आदि तथा अन्त बताते हुए यह अनुमान लगा लिया गया कि मध्यवर्ती प्रक्रिया तो सर्वविदित है, उसे तो लोग सामान्य बुद्धि से ही समझ रहे होंगे, फिर किसी को पीसने से क्या लाभ?... बन्दूक का घोड़ा दबाने और लक्ष्य वेधने का आदेश ही कप्तान देते हैं। वे जानते हैं कि इस प्रयोजन के लिये ...
- इस इतिहास की शृंखला को समझना ही पड़ेगा भले ही वह कितना ही कष्टकर, अप्रिय एवं अरुचिकर क्यों न हो?... मवाद को निकालने के लिए जहाँ नश्तर लगाने की आवश्यकता है वहाँ घाव भरने के लिए तत्काल मरहम पट्टी की व्य...
- इस जगत् का प्रधान कारण ‘ब्रह्म’ कौन है?... हम सभी किससे उत्पन्न हुए हैं, किससे जी रहे हैं तथा किसमें प्रतिष्ठित हैं? साथ ही किसके अधीन रहकर हम ...
- इस जानकारी में कोई विवाद जैसी बात नहीं है, तो भी दृष्टव्य यह है कि क्या चिन्तन क्षेत्र की कल्पना, बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, नीतिमत्ता, मान्यता, आकांक्षा एवं प्रकृति जैसी विशेषताओं को भी आहार का स्तर कुछ प्रभावित करता है क्या?... स्तर से तात्पर्य है मानवी गरिमा से सम्बन्धित उत्थान और पतन। निकृष्टता एवं उत्कृष्टता को उत्तेजन देने...
- इस नक्कारखाने में तूती की क्या बिसात?... एक से एक प्रतापी, कठपुतली जैसा नाच दिखाकर बाजीगर के झोली में घुस गये। यहाँ कौन किसका बड़प्पन मानता है...
- इस परिस्थिति में देखना यह है कि तीर्थ स्थापना के जिस महान उद्देश्य को लेकर मनीषियों ने प्रबल प्रतिपादन और सफल प्रचलन के रूप में जो महान प्रयास किया था, उसकी पूर्ति हो रही है या नहीं?... पर्यवेक्षण करने पर निराशाजनक उत्तर ही सामने आता है। यह दुःख का विषय है। होना यह चाहिए था कि तीर्थों ...
- इस प्रकार का प्यार बच्चे के साथ दुश्मनी के सिवाय और क्या कहा जायेगा?... नीति यही होनी चाहिए, एक आँख दुलार की, एक सुधार की तभी बच्चे का सन्तुलित विकास सम्भव है।...
- इस प्रकार का प्रेम उसके स्वास्थ्य के पीछे लट्ठ लिए घूमने के सिवाय और क्या उपकार कर सकता है?... यदि स्कूल से आने में उसे किसी कारणवश पन्द्रह मिनट की भी देर हो गई तो बस दौड़े-दौड़े स्कूल पहुँचे और उस...
- इस प्रकार यदि रोगकाल में बच्चे को प्यार करने वाले अभिभावकों को क्रिया कलाप का पूरा-पूरा ब्योरा दिया जावे तो स्पष्ट पता चल जायेगा कि बच्चे के प्रति उनके प्यार का क्या अर्थ है?... बहुत से अभिभावक अपने बच्चों को बहुधा दूसरे बच्चों के साथ खेलने नहीं देते। उन्हें अपने बच्चों के सिवा...
- इस भक्ति का स्वरूप क्या हो?... इसके लिए ईश्वर के जीवित या मृतक प्रतिनिधियों के वचन अथवा लेखन ही प्रमाण होते थे। इस दृष्टि से भूतकाल...
- इस मान्यता का निष्कर्ष यही निकला कि जब शरीर के साथ ही अस्तित्व नष्ट होते हैं, तो परलोक का भय क्या करना?... जितना सुख जिस प्रकार भी सम्भव हो लूट लेना चाहिए, इसी में जीवन की सार्थकता है। नास्तिकवाद ने जन-साधार...
- इस मौलिक प्रवृत्ति को तृप्त करने के लिए कौन क्या रास्ता चुनता है, किस निर्णय पर पहुँचता है और किन प्रयासों का आश्रय लेता है?... यह उसकी अपनी सूझबूझ पर निर्भर करता है।यहाँ कहा यह जा रहा है कि प्रवृत्ति को ऐसे सत्प्रयोजनों के साथ ...
- इस सन्दर्भ सर्वप्रथम आहार की उपयुक्तता पर ध्यान देना होगा और यह देखना होगा कि वह पौष्टिक ही नहीं सात्विक स्तर का भी है क्या?... ***
—पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य, गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार
10. सादा जीवन उच...
- इसका सरंजाम कौन जुटायेगा?... इसका समाधान एक ही आधार पर होता है कि तूफान अपना रास्ता आप बनाता है। उसका साथ तिनके-पत्ते तक देते हैं...
- इसके अतिरिक्त मूर्धन्य समझे जाने वाले मनुष्य का भी क्या विवेचन विश्लेषण किया जाय?... औरों की तरह वह भी खाता, सोता और साँसें पूरी करके मौत के मुँह में चला जाता है। सामान्यतया मनुष्य की व...
- इसके उपरान्त चौथा चरण यह है कि जो उपलब्ध है, उसे किस प्रयोजन के लिए किस अनुपात में, कहाँ लगाया जाय?... उपलब्धियों का महत्त्व तभी है जब वे सत्प्रयोजन में लग सकें, अन्यथा दुरुपयोग अपव्यय ही चलता रहे तो सम्...
- इसके बाद भी एक अतिरिक्त आवश्यकता भी अपने स्थान पर यथावत बनी रहती है कि विशेष अभिरुचि आवश्यकता पूर्ति के लिए अभीष्ट ज्ञान सम्पादन किस प्रकार हो?... इसके लिए विशिष्ट स्तर के पाठ्यक्रम चलाने वाले विशिष्ट विद्यालयों की व्यवस्था होनी चाहिए।...
- इसके बिना जायका ही क्या?... यह बुरी आदत जान-बूझकर डाली गई है। संसार के अनेक क्षेत्र इन दिनों भी ऐसे हैं जहाँ खारी नमक का उपयोग प...
- इसके लिए कदाचित नया पाठ्यक्रम ही बनाना या छपाना पड़े?... नोट लिखकर भी ऐसी शिक्षा अनुभवी शिक्षक इन जानकारियों की दे सकते हैं। जिस-जिस पुस्तक के कुछ अध्याय भ...
- इसके लिए उन्होंने अपने में किस स्तर की क्षमता एवं आदर्शवादिता को विकसित किया?... यही इस रचना का मूल उद्देश्य है। विश्व सेवा की दिशा में किये गये पूर्वजों के महान प्रयास हमारे लिए ...
- इसके लिए क्या करना होगा?... उसे भी संक्षेप में कहा जा सकता है। इसके लिए तीन सिद्धान्त सूत्रों को समझने अपनाने भर से काम चल जायेग...
- इसलिए अपराधों के सामयिक दमन की आवश्यकता अनुभव करते हुए भी यह दृष्टि रखनी होगी कि वह आवेशग्रस्तता आखिर पैदा क्यों होती है?... उसकी जड़ कहाँ है और उसके मूलोच्छेदन के लिए क्या उपाय किये जाने चाहिए?पहला अपराध यही है कि हम अपराध और...
- इससे कोई मन हलका भले ही कर ले पर प्रगति का द्वार उससे कहाँ खुलता है?... साधन जुटाने के लिए निम्नलिखित आजीविका स्रोतों की ओर ध्यान देना चाहिए और जहाँ जिस उपाय के जिस सीमा ...
- इसी प्रकार प्रजाजन यदि दुष्टता पर उतारू हो चलें तो फिर उन्हें नियन्त्रित करने में पुलिस कचहरी की शक्ति क्या काम करेगी?... फिर वे लोग भी तो भ्रष्ट जनता में से ही निकल कर आये होंगे। उनका अन्तरंग नीति-भ्रष्टता के साथ साझीदारी...
- इसी में व्यक्ति की महानता है और इसी में समाज की समर्थता, इसे करे कौन?... इसके लिए दसों दिशाओं में दृष्टिपात करने के उपरान्त नजर एक ही केन्द्रबिन्दु पर रुकती है, वह है जागृतो...
- इसे स्वर्ग प्राप्ति न कहें तो और क्या कहें?... सम्मानास्पद, श्रद्धा पात्र, सज्जन और प्रामाणिक किसी व्यक्ति को माना जाय, इससे बढ़कर सौभाग्य और सन्तोष...
- उठना तो उसी को है, उस समुद्र में घुसे कौन?... और कौन गहरे गोते लगाकर मोतियों की तलाश करें?इन प्रश्नों का उत्तर वानप्रस्थ परम्परा के पुनर्जागरण पर ...
- उत्तरदायित्व निभाया या नहीं?... यहाँ यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए-साधन सम्पदा मात्र शरीर यात्रा के काम आती है। जीवन को सुसम्पन्न, सम...
- उत्थान का सम्बल कहाँ से मिले?... इन प्रश्नों का उत्तर एक ही निकाला गया-तीर्थ यात्रा का प्रचलन।व्यक्तिगत स्तर की साधनाओं में ही रुचि स...
- उदारता बरतने से अपने पास क्या रहेगा?... इसलिये निष्ठुर, विलासी, दुष्ट एवं अपराधी बनकर भी वैभव और विलास को अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करना चा...
- उन तक प्रकाश कैसे पहुँचे?... उनमें उत्कृष्टता का आलोक कौन जगाये? बिना उत्थान प्रयासों के कुसंस्कारी निकृष्टता कैसे घटे? उत्थान का...
- उन दिनों बाजे वालों, हलवाइयों, सवारियों की कितनी परेशानी होती है?... जिन दिनों नहीं होते, उन दिनों वे सभी खाली बैठे रहते हैं, जबकि होना यह चाहिए कि सुविधा का अवसर देखक...
- उनका सृजन यह ध्यान में रखते हुए किया गया हैं कि उनका उच्चारण किस स्तर का शक्ति कम्पन उत्पन्न करता है और उनका जपकर्ता, बाह्य वातावरण तथा अभीष्ट प्रयोजन पर क्या प्रभाव पड़ता है?... मानसिक, वाचिक एवं उपांशु जप में ध्वनियों के हलके भारी किये जाने की प्रक्रिया काम में लाई जाती है। वे...
- उनकी खामियाँ दूर नहीं की गयी अन्यथा अम्बर चरखा जैसे उपकरण फेल क्यों होते?... इस दिशा में अब नये सिरे से सोचा और सहकारिता के आधार पर कारगर कदम उठाया जाना चाहिए।
बड़े लोग इस ...
- उनके साथ वार्तालाप एवं आदान-प्रदान कैसे चलता रहा?... असमंजस इस बात का है कि अपना मस्तिष्क जो यथार्थ और असंगत के बीच भेद-भाव करना भली प्रकार जानता है। दिन...
- उनमें उत्कृष्टता का आलोक कौन जगाये?... बिना उत्थान प्रयासों के कुसंस्कारी निकृष्टता कैसे घटे? उत्थान का सम्बल कहाँ से मिले? इन प्रश्नों का ...
- उनमें सर्वश्रेष्ठ और सुरम्य यह पृथ्वी ही क्यों बनी?... इसके उत्तर में जहाँ प्रकृति संरचना को श्रेय दिया जायेगा, वहाँ मानवी कौशल को भी कम नहीं सराहा जायेगा।...
- उनसे कोई क्या कहे?... किन्तु जिन्हें कुछ आगे की बात सोचनी आती है, उनसे तो कहने सुनने जैसी ढेरों बातें हैं। उनमें से कुछ तो...
- उन्हें अपनाये हुए क्यों हैं?... इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक है उनके कारण उत्पन्न होने वाले संकटों के प्रति सम्वेदनशील न होना।...
- उन्हें कैसे इस असामान्य व्यवहार से रोका जा सकता है?... लम्बी माथापच्ची के बाद भी ये प्रश्न जैसे के तैसे बने हुए हैं तथा मानवी मस्तिष्क को चुनौती देते हैं। ...
- उन्हें तो इतना ही सोचना और करना है कि पारिवारिकता की उदार सद्भावना का अधिकाधिक विकास कैसे हो?... कुटुम्ब तो असंख्य है पर पारिवारिक सद्भावना का जिनमें दर्शन हो सके, वे कठिनाई से थोड़े ही ढूँढ़े जा सके...
- उन्हें सोचना चाहिए कि आजीविका उपार्जन के लिए क्या माध्यम अपनाये जाय?... सर्व विदित अर्थ साधनों में कृषि एवं पशु पालन, परम्परागत व्यवसाय हैं। कृषि में उद्यान भी आता है। पशु ...
- उस क्षेत्र में भरी पाप विषाक्तता का निष्कासन कैसे हो?... जब तक यह प्रयत्न नहीं किया जाय तब तक संचित कुसंस्कार बलिष्ठ ही बने रहते हैं। पत्तियाँ तोड़ लेने प...
- उस दशा में दहेज न लेने या देने के पक्ष में कोई तर्क भी नहीं प्रस्तुत किया जा सकता, क्योंकि जब लड़के की कीमत वसूल कर ली गई, तो बाद में उसी आधार पर अपना घर खाली करा लिये जाने पर पश्चाताप किस बात का?... अपराधी दुष्प्रवृत्तियाँ, नशेबाजी, व्यभिचार आदि तात्कालिक मौज-मजे की दृष्टि से आकर्षक एवं लाभदायक द...
- उसका परित्याग करके मात्र उदरपूर्ति तक ही सीमाबद्ध रहा जाय तो जड़ चेतन में क्या अन्तर रहा?... वृक्ष वनस्पति भी निर्वाह साधन उपलब्ध कर लेते हैं। कृमि कीटकों को भी उसकी कमी नहीं पड़ती। फिर आत्मा की...
- उसका लक्षण, स्वरूप, स्वभाव और लक्ष्य क्या है?... इस प्रश्न पर विज्ञान अपने बचपन में विरोधी था, वह कहता था जड़ तत्त्वों के, अमुक रसायनों के एक विशेष सं...
- उसकी अपनी मर्जी कहाँ?... बन्दी को मालिकों की मर्जी पर ही चलना पड़ता है। उसे अपने स्वास्थ्य की बात सोचने का अधिकार ही किसने दिय...
- उसकी गतिविधियाँ, योजनाएँ, आकाँक्षाएँ, विचारणाएँ एक ही केन्द्र के इर्द-गिर्द घूमती रहती थी कि वह अपनी आत्मीयता एवं ममता को अधिकाधिक व्यापक कैसे बनाये?... सच्चा ईश्वरभक्त, सच्चा अध्यात्मवादी, सच्चा मनुष्य कैसे कहलाये? और उस जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने क...
- उसकी जड़ कहाँ है और उसके मूलोच्छेदन के लिए क्या उपाय किये जाने चाहिए?... पहला अपराध यही है कि हम अपराध और अपराधी के बीच का अन्तर समझें और विश्वास करें कि मनुष्य पत्थर का न...
- उसकी रीति-नीति क्या हो?... दिशाधारा क्या रहे, इसका सूत्र संकेत अन्यत्र कहीं ढूँढ़ना न पड़ेगा। दूरदर्शी तत्त्वदर्शियों ने उसे गायत...
- उसकी विशेषता और क्या बताई जाय?... इन्द्रियगम्य उसका प्रत्यक्ष स्वरूप इतना ही तो है। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य की प्रत्यक्ष वि...
- उसकी सामर्थ्य का सृजन प्रयोजनों में नियोजन कैसे हो?... बढ़ती हुई सम्पदा ही सब कुछ नहीं है। राजतंत्र द्वारा समृद्धि कितनी ही क्यों न बढ़ा ली जाय, यदि भ्रष्टता...
- उसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूपरेखा क्यों न बने?... हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत की अनुभूति यदि की जा सके तो उससे उत्कृष्ट जीवन जीने की बहुत ही सुव्यव...
- उसके सहारे प्रधानतया सौरमण्डल के ग्रह उपग्रहों की यथार्थ स्थिति को जाना जाता है, ताकि उस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सके कि इस स्थिति का भूलोक के किस समुदाय पर कब, क्यों, क्या प्रभाव पड़ेगा?... इस प्रकार के पूर्वाभास मनुष्य की कितनी ही कठिनाइयों के निराकरण एवं सुविधा संवर्धन में काम आ सकते हैं...
- उसमें उचित अनुचित का विवेक लाभ हानि देखने की क्या आवश्यकता?... इसी प्रवृत्ति का सर्वव्यापी अनुकरण किया जा रहा था। परम्पराओं के प्रति अन्ध भक्ति आज भी मिटी नहीं है,...
- उसमें कहाँ खराबी पड़ी है और रुग्णता का दौर कितनी गहराई में किस क्षेत्र में किस स्तर का चल रहा है?... इसी प्रकार मनःशास्त्री यह सोचते हैं कि मनुष्य जिस प्रकार के चिन्तन या क्रिया-कलाप में व्यस्त रहता है...
- उसमें भेड़ियों जैसा परस्पर फाड़ खाने का प्रचलन क्यों बढ़े?... करने योग्य वह नहीं है जो किया जा रहा है, सोचने योग्य वह नहीं है जो सोचा जा रहा है। मानवी गरिमा का ...
- उसमें व्यक्ति को सुविकसित और समाज को समुन्नत बनाने की क्षमता विद्यमान है या नहीं?... विश्व को अगले ही दिनों एक सार्वभौम सर्वजनीन संस्कृति की आवश्यकता पड़ेगी, वह प्रयोजन इससे सधेगा या...
- उसमें सोचने का गुण तो है, पर क्या सोचना चाहिए?... यह निर्धारण करना अन्तःकरण का काम है। सज्जनों का चिन्तन एवं कर्तृत्व एक तरह का होता है और दुर्जनों का...
- उसे अपने स्वास्थ्य की बात सोचने का अधिकार ही किसने दिया है?... सोने उठने का कोई समय नहीं। मर्द रात को १२ बजे आयें तो उसी समय चूल्हा फूँकना चाहिए। सब लोग खा जायें उ...
- उसे किस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जाय?... निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किन मान्यताओं और गतिविधियों को अपनाया जाय? यही है वह आधारभूत निर्...
- उसे बनाने में क्या पदार्थ लिए जाएँ?... यह भी यज्ञीय विधान का एक अंग है। शक्कर, चीनी, मिश्री, मिठाई आदि का उपयोग सामान्य बात है। असामान्...
- उस्तरा न हो तो नाई किस प्रकार किसी की हजामत बनाए?... बीज की महत्ता सर्वविदित है। उसके बिना न खेती होती है और न बगीचा लगता है। इतने पर भी मात्र बीज को ही ...
- ऋण ग्रस्त को मोक्ष मिलना कैसा?... हमें अपने समय और धन के एक निश्चित अंश सर्वोत्तम माने जाने वाले ज्ञान यज्ञ के लिए, पिछड़ों को आगे बढ़...
- ऋषि परम्परा की तो चर्चा ही क्या की जाय?... सन्त और सुधारकों की पीढ़ी भी धीरे-धीरे बब्बर शेरों की तरह घटती विलुप्त होती चली जा रही है। राजतन्त्र ...
- ऋषियों और महामानवों की पुण्य परम्परा के पीछे भगवान का सूत्र संचालन देखा जा सकता है, अन्यथा लोभ मोह के पतनोन्मुख प्रवाह को चीरकर मछली की तरह उलटा चलने और प्रचलन से भिन्न स्तर की रीति नीति अपनाने की उमंग किसे उठे?... क्यों उठे? सरल सुविधा को छोड़कर झंझट में पड़ने और कष्ट सहने के लिए कोई क्यों दुस्साहस अपनाये।युग परि...
- एक निर्धारित राजमार्ग है, उस पर न चला जाय, अनिश्चित मनःस्थिति में बहकते और अनिर्णीत दिशाधारा में भटकते रहा जाय तो मंजिल तक पहुँचना कैसे सम्भव हो सकता है?... महत्त्वपूर्ण सफलता पाने के लिए वही रीति-नीति अपनानी पड़ती है जिसे बुद्धिमान किसान अपनाते और धन धान्...
- एक परशुराम धरती पर फैले हुए अवांछनीय तत्वों का इक्कीस बार सफाया करें, और कोई उनके मार्ग में आड़े न आये इसका क्या तुक?... ग्वाल बालों की सहायता से गोवर्धन उठाना और रीछ वानरों के कौशल से समुद्र का पुल बाँधना भी कुछ ऐसा ही ब...
- एक बौद्धिक प्राणी होने के नाते वह अपने उस उद्देश्य को बाह्य जीवन में पूरा भी कर पा रहा है या नहीं?... यदि नहीं तो उसे अब निश्चित ही आगे सोच समझ कर पग बढ़ाना चाहिए।
इस तरह 16 संस्कार जीवन के 16 मोड़...
- एक ही खाद्य पदार्थ का विभिन्न प्राणी विभिन्न प्रकार का स्वाद लेते हैं तो किसी पदार्थ का मूल स्वाद कैसे घोषित किया जाय?... जब एक ही दृश्य से अनेकों प्रकार के निष्कर्ष निकाले जाते हैं तो उनकी वास्तविकता किस आधार पर निरूपित क...
- ऐतिहासिक भूमिका निभा सकने में सर्व समर्थ प्रतिभाएँ क्यों पछताते रहने और पछताते रखने की स्थिति में संसार से विदा होती है?... इन अनेकों प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़े नहीं मिलता। सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं की विडम्बना हटती क्यों नह...
- ऐसा पक्षपात उसने क्यों किया?... इसका उत्तर मनुष्य जीवन के लक्ष्य को समझने पर स्पष्ट हो जाता है। यदि मनुष्य प्राप्त अतिरिक्त अनुदान क...
- ऐसी दशा में विचारणीय यह है कि बीमारियाँ मात्र मनुष्य पर ही हमला क्यों करती है, अन्य जीव-जन्तुओं को दबोचने में उनकी रुचि क्यों नहीं?... तथ्यों तक पहुँचना हो तो आज या हजार वर्ष बाद इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि प्रकृति अनुशासन के प्र...
- ऐसी दशा में व्यवहार व्यवस्थाओं की प्रधानता के आधार पर बनी हुई सभ्यताएँ सार्वदेशिक अथवा सर्वकालीन हो ही कैसे सकती हैं?... अँग्रेजी सभ्यता भारत के लिए उपयुक्त बैठ सकती है इसमें पूरा सन्देह है।
भारतीय संस्कृति महान ही ...
- ऐसी दशा में अपना निर्णय क्या हो?... इनमें से किसे पसन्द किया जाय?
दर्शन शास्त्र के मतभेद भी ऐसे ही हैं। हिन्दू दर्शनों में योग, सा...
- ऐसी दशा में नीति न्याय की बात कौन सुने?... सद्भाव अब आत्मिक उपादान नहीं रहा उसे शिष्टाचार की विडम्बना के रूप में ही स्वीकारा गया है। फलतः एक ...
- ऐसी दशा में प्रगतिशीलता के लिए बनाये गये निर्धारणों का क्रियान्वयन सम्भव है?... वर्ग भेद के कारण देश की बहुत बड़ी जनसंख्या अशक्त असमर्थ बन कर रह रही है। जनसंख्या में आधे नर और आधी न...
- ऐसी दशा में यदि कोई अनाचारी व्यक्ति अपने कुकर्म व्यवसाय को अधिक लाभदायक समझे तथा और भी अधिक साहस के साथ करने लगे तो आश्चर्य ही क्या है?... अनाचार को प्रोत्साहन और सदाचार को हताश करने में लोकमत की दुर्बलता एक बहुत बड़ा कारण है। उसमें सुधार प...
- ऐसी दशा में लोकशक्ति को जगाना, लोकमंगल का प्रयोजन पूरा कर सकना किस प्रकार सम्भव होगा?... जनता की स्थिति भी अब अजीब बन चली है। वक्ताओं और नेताओं की कथनी तथा करनी में जमीन-आसमान जितना अन्तर द...
- ऐसी दशा में वह निरर्थकतावादी बन जाए तो आश्चर्य ही क्या है?... हिप्पीवाद इसी नीरस निरर्थक जीवन की निरंकुश अभिव्यक्ति है। अभी इसका आरम्भ है। अनास्था जितनी ही प्रख...
- ऐसी दशा में शाकों के उपयोग से वंचित रहने वाले जन समुदाय को यदि कुपोषणजन्य दुर्बलता एवं रुग्णता का शिकार बनना पढ़ता हो तो इसमें आश्चर्य ही क्या?... घरेलू शाक वाटिकाएँ इस समस्या का सहज समाधान प्रस्तुत करती हैं। आँगनवाड़ी, छतवाड़ी, छप्परवाड़ी के रूप में...
- ऐसी दशा में संसार का वास्तविक रूप क्या हो सकता है?... यह निर्णय कर सकना सर्वथा असम्भव है।...
- ऐसी दशा में सामाजिक दृष्टि से अपना समाज दिन-दिन अधिक गई गुजरी स्थिति में गिरता चला जाय तो आश्चर्य ही क्या है?... लड़की वाला अपने समय पर सुधारवादी बनता है और देन दहेज को कोसता है, पर जब अपने लड़के का समय होता है तो व...
- ऐसी बड़ी उपलब्धि मनुष्य को किस ऊँचाई पर नहीं पहुँचा सकती?... किन्तु यहाँ पर भी एक सावधानी बरतने की आवश्यकता है। बहुत बार लोग प्रारम्भ में सामाजिक बने रहते हैं। स...
- ऐसी स्थिति में भूत की स्मृतियों और निरन्तर परिवर्तित अनिश्चित भविष्य की चिन्ताओं में वर्तमान को क्यों नष्ट किया जाय?... जान रास्कन अपनी मेज़ पर एक पत्थर का टुकड़ा रखते थे जिस पर आज शब्द लिखा हुआ था। एक मित्र को इसका रहस्य...
- ऐसे आदमियों पर कोई विश्वास नहीं करता, वास्ता नहीं रखता और आदान-प्रदान के झंझट में नहीं पड़ता, कारण कि जो दुर्व्यवहार अन्यों के साथ किया जा रहा है, वैसा ही बर्ताव अपने साथ न होगा, उसकी क्या गारण्टी है?... हेय आचरण वाले चरित्र की दृष्टि से छूत के रोगी बन जाते हैं। क्षय, कैंसर, कोढ़, दाद आदि को छूत का रोग...
- ऐसे जोड़े मिलते कहाँ है?... जब तक वैसी स्थिति प्राप्त न हो, केवल इन्द्रिय सुख के लिए काम सेवन एक क्षणिक आवेश और हानिकारक कार्य ह...
- ऐसे लोगों का किस पर क्या प्रभाव पड़ सकता है?... रचना, सभाएँ जमाना और लच्छेदार लैक्चरबाजी करना तथाकथित आत्म विज्ञापन बाजों का एक शुगल मात्र रह गया है...
- औचित्य को संरक्षण कहाँ मिलेगा?... यदि रिश्वत और चापलूसी भगवान को भी वशवर्ती कर सकती है; न्याय की, पात्रता की उपेक्षा करके यदि व्यक्तिग...
- और आखिर क्यों जी रहे हैं?... इस तथ्य पर आत्मवेत्ता महामनीषियों ने अपने गम्भीर चिन्तन से जो निष्कर्ष निकाले हैं वे बहुत ही महत्त्व...
- और उनका मनुष्य के साथ आदान-प्रदान चल पड़ने पर किस पक्ष का क्या हित-अहित हो सकता है?... यह विषय भी शोध प्रयोजन में सम्मिलित रखा गया है। तथ्यों का पता लगाने में वैज्ञानिक परीक्षण के साथ तर्...
- और कटौती में जो समय श्रम बचता है, उसे उच्चस्तरीय महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पुण्य परमार्थ में क्यों न लगाया जाय?... स्मरण रहे, औसत निर्वाह से अतिरिक्त सम्पदा संचय अगणित विग्रहों को जन्म देता है। दुर्गुण दुर्व्यसन उन्...
- और किस प्रकार हृदयंगम कर सकता है?... उसके लिये तो ज्ञान से भरी पुस्तक भी रद्दी कागज से अधिक कोई मूल्य न रखेगी।...
- और कौन गहरे गोते लगाकर मोतियों की तलाश करें?... इन प्रश्नों का उत्तर वानप्रस्थ परम्परा के पुनर्जागरण पर ही पूर्णतया अवलम्बित है। भारत न तो अमेरिका ह...
- और क्यों अपनी मान्यता के गुण गायें?... अगले दिनों साम्यवाद मात्र आर्थिक ही नहीं, भाषा, धर्म, संस्कृति देशों का भी विश्व स्तर पर एकीकरण ...
- और क्यों जी रहे हैं?... इस तथ्य पर आत्मवेत्ता ऋषियों ने गम्भीर चिन्तन एवं अनुसन्धान से जो निष्कर्ष निकाले थे, वे बहुत ही महत्...
- और निर्वाह न मिले तो ज्ञान-सम्पदा की बात कैसे सूझे?... दोनों ही तथ्य अपने-अपने स्थान पर सही हैं। उन्हें परस्पर पूरक, अन्योन्याश्रित कहा जा सकता है। मुर्गी ...
- कंकड़ पत्थरों और ठूँठ ठूँठों के रहते नये पौधों को जड़ जमाने का अवसर कैसे मिले?... अतएव अप्रिय और अनावश्यक लगने वाली प्रक्रिया भी उन्हें अपनानी पड़ रही है। यों हर कोई सृजन में प्रसन्न...
- कमाऊ हीरे मोतियों से लदें और बिना कमाऊ चीथड़े लपेटकर घूमें, तो यह संयुक्त परिवार कहाँ रहा?... यह समूचा समाज एक परिवार है। उसके वरिष्ठों को कनिष्ठों का अधिक ध्यान रखना चाहिए।
अभिभावक स्वयं दूध न...
- कर्मों के फल प्राप्त करने के लिए कोई माध्यम नहीं है क्या?... जिन कर्मों का फल इस जन्म में नहीं मिल सका, उनके लिए ईश्वर के दरबार में कोई व्यवस्था नहीं है क्या? सद...
- काम का दबाव ही अहर्निश छाया रहता है, फिर मनोरंजन की इच्छा उठे भी तो उसका क्या महत्त्व?... अवसर न मिलने से वह उमंग भी असमय में ही मर जाती है। नीरसता स्वभाव का अंग बन जाती है। न उत्साह, न उमंग...
- कितने लोग हैं, जो अपनी रुचि, प्रगति अथवा आजीविका से सम्बन्धित विषयों की अधिक जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं?... पर इसके लिए न तो स्कूलों कॉलेजों में काम छोड़कर भर्ती होने जैसी उनकी परिस्थिति है और न सुविधा के सम...
- किन्तु अन्यान्य सभी सम्प्रदायों को मिथ्या कैसे कहा जाय?... विडम्बना तो यह है कि सम्प्रदायों की परिभाषा ही बदल दी गयी है। जहाँ धर्म को समग्र रूप में माना जाना च...
- किन्तु तब क्या किया जाय, जब समझदारी उलटे रास्ते चले?... पैर ऊपर करके, हाथों के बल, धरती से सिर रगड़ते हुए चलने में विशिष्टता के अहंकार का प्रदर्शन करे।
मनुष...
- किन्तु विवशता का क्या किया जाय?... प्राचीन काल में भी गुरुकुलों के कुलपति उसे नर रत्नों की टकसाल बनाकर दिखाते थे और वही प्रक्रिया अनन्त...
- किरायेदार मकान को तोड़-फोड़ करने लगे, ऑफिसर सरकारी खजाने को अपने काम लाने लगे तो मुसीबत खड़ी होगी कि नहीं?... मोटर अपनी होने पर भी ड्राइवर निर्धारित विधि-व्यवस्था तोड़े तो दुर्घटना होनी निश्चित है। शरीर के सम्...
- किस प्रकार उसकी शिक्षाओं को समझ सकता है?... और किस प्रकार हृदयंगम कर सकता है? उसके लिये तो ज्ञान से भरी पुस्तक भी रद्दी कागज से अधिक कोई मूल्य न...
- किस प्रकार उसे प्रगति पथ पर अग्रसर होने का अवसर दिया जाय?... किस प्रकार उसे बलिष्ठ, प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय? इसी विद्या का नाम अध्यात्म है। वह विज्ञान से कनि...
- किस प्रकार उसे बलिष्ठ, प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय?... इसी विद्या का नाम अध्यात्म है। वह विज्ञान से कनिष्ठ नहीं वरिष्ठ है। विज्ञान ने मनुष्य को अगणित सुविध...
- किस में नफा, किस में नुकसान?... यह प्रश्न सर्वप्रथम हल होना चाहिए। सोचा जाना चाहिए कि तात्कालिक लाभ के लिए भविष्य को अन्धकारमय बनाने...
- किस स्तर का जीवन जिया जाय?... उसे किस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जाय? निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किन मान्यताओं और गतिविध...
- किसका गृह प्रबन्ध सरकार करती है?... किसकी दिनचर्या में उसका हस्तक्षेप होता है? विवाह शादियाँ सरकार थोड़े ही करती है? भली या बुरी राह अपना...
- किसकी दिनचर्या में उसका हस्तक्षेप होता है?... विवाह शादियाँ सरकार थोड़े ही करती है? भली या बुरी राह अपनाने के लिए सरकार किस-किस को कन्धे पर बिठाये फ...
- किसे छोड़ा जाय?... इसमें भीतर ही भीतर सतत् अन्तर्द्वन्द्व चलता है।धन उपार्जन में नीति-अनीति के, कर्म में श्रमशीलता और आ...
- कुत्ते-बिल्ली की, साँप-नेवले की दोस्ती कैसे निभे?... एक म्यान में दो तलवार ठूँसने पर म्यान फटेगी ही। शरीर में ज्वर या भूत घुस पड़े तो कैसी दुर्दशा होती है...
- केश-विन्यास बनाने जैसे अनेकों कामों मेंं कितना समय लगता है?... सजधज में कितना धन व्यय होता है? वाहनों, सेवकों द्वारा उसके लिए कितनी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। वि...
- कोई भी देख सकता है कि उदासी के रहते चेहरा कितना कुरूप दीखता है और अक्षमता का कितना विज्ञापन करता है?... इसके विपरीत खिले फूल सा चेहरा कितना सुन्दर लगता है और कितनी तितलियों और मधुमक्खियों पर अपना आश्रय ...
- कोई परिस्थितियों का रोना रोता रहे और मनःस्थिति को न सुधारे तो उस विडम्बना रचे बैठे प्रमाद ग्रस्त से कोई क्या कहे?... देवता अनेक हैं, पर तत्काल फलदायक अत्यन्त निकटवर्ती और अनुदान देने के लिए आतुर-आत्मदेव से बढ़कर और कोई...
- कोई सिपाही कारतूस भरे बिना ही घोड़ा दबा दे और निशाने पर गोली न लगने पर लक्ष्य, बन्दूक, कप्तान आदि को दोष देने लगे, तो उसका आक्रोश निरर्थक माना जाएगा और कहा जाएगा कि नली में कारतूस डालने का सामान्य ज्ञान क्यों भुला दिया जाय?... औषधि खाने और रोग अच्छा होने की ही आमतौर से चर्चा होती रहती है; निदान, पथ्य, परिचर्या, मात्रा, अनुपान...
- कौतुक-कौतूहल से विनोद मनोरंजन हो सकता है, पर उस आधार पर समस्याओं के समाधान कहाँ निकलते हैं?... जिनने अपना दृष्टिकोण सही कर लिया है और औसत भारतीय स्तर के औचित्य के साथ जोड़ लिया है, उनके सामने ही इ...
- कौन उसकी बात सुनेगा?... कौन उसके कहने पर चलेगा? व्यक्तित्व की प्रामाणिकता इसी कसौटी पर कसी जाती है कि वह अनगढ़ मन के इशारे पर...
- कौन उसके कहने पर चलेगा?... व्यक्तित्व की प्रामाणिकता इसी कसौटी पर कसी जाती है कि वह अनगढ़ मन के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचता है...
- कौन किस स्तर का चयन करे?... किसके पैर किस राह पर चलें, यह उसका अपना फैसला है। दूसरे तो हर बुरे-भले काम में साथ देते और रोक-टोक क...
- क्या इस दुर्भाग्य से बचा नहीं जा सकता?... थोड़ी दूरदर्शिता और थोड़ी साहसिकता अपनाने पर उन तथाकथित परिस्थितियों का स्वरूप ही बदल सकता है जो लक्ष्...
- क्या उनके सहारे उस सुख सुविधा का रसास्वादन किया जा सकता है, जिनकी कल्पना भ्रान्त धारणाओं के आधार पर सँजोई गई है?... मनुष्य का निर्वाह अत्यधिक स्वल्प साधनों से हो सकता है। उतना उपार्जन कुछ ही घण्टे में सामान्य श्रम से...
- क्या कारण है कि इस उत्कृष्ट प्रवृत्ति को अधोगामी मोड़ मिला और स्थिति कहाँ की कहाँ जा पहुँची?... उन दिनों तो धर्म शब्द के अन्तर्गत ही नीति, सदाचार, लोक व्यवहार, स्वास्थ्य, परिवार, अनुशासन, मनोविज...
- क्या जामाता क्या पुत्रवधू?... निकले तो उसी शिक्षा संस्था से हैं, जहाँ उच्छृंखलता का निरन्तर बोलबाला रहता है। यह बच्चे जिस प्रकार क...
- क्या तृतीय विश्वयुद्ध होकर ही रहेगा?...
--पं. श्रीराम शर्मा आचार्यसमग्र मानवता पर इन दिनों ऐसे संकट के बादल छाये हैं जिन्होंने उस सम्भावन...
- क्या प्रयत्न हो?... इसके लिए लोक नायकों की संख्या ही नहीं, स्तर भी इतना ऊँचा उठाया जाना चाहिए कि लोक मानस उसका अनुगमन ...
- क्या मनुष्य जन्म से खराब और कुसंस्कारी होता है?... नहीं, अधिकतर संस्कार निर्माण में उसके वातावरण का हाथ भी रहता है। बाल्यकाल में उसे जो कुछ खिलाया पिला...
- क्या मानव जीवन वस्तुतः लक्ष्य विहीन हलचलों के बनने-बिगड़ने वाले संयोगों की परिधि तक ही सीमित है?... अथवा वह इससे आगे भी कुछ है?इन प्रश्नों के सही उत्तर प्राप्त करने के लिए स्ट्रोम वर्ग ने तत्कालीन विज...
- क्या मानवी चेतना ऋद्धि-सिद्धियों की अधिष्ठात्री भी हो सकती है?... मनोविज्ञान इस पर कुछ भी प्रकाश नहीं डालता। जबकि समय-समय पर इसकी पुष्टि में प्रमाण अतीन्द्रिय सामर्थ्...
- क्या यह आदर्श हम सुधारवादियों के लिए उपयोगी नहीं हो सकता?... जटिल रोगियों के लिए अस्पताल की उपयोगिता हो सकती है और अत्यन्त बिगड़े हुए लोगों को सुधारगृहों में भी...
- क्या वस्तुतः मरणोत्तर जीवन में आत्मा ऐसे किसी लोक, नगर, ग्राम, या देश में परिभ्रमण करती है?... ये सारी जिज्ञासाएँ सहज ही मन में उठती हैं। विज्ञान की प्रगति ने मनुष्य को बुद्धि की दृष्टि से उन ऊँच...
- क्या वह प्रकृति की किसी अनिच्छित क्रिया के अवशेष उच्छिष्ट से बना खिलौना मात्र है?... क्या मानव जीवन वस्तुतः लक्ष्य विहीन हलचलों के बनने-बिगड़ने वाले संयोगों की परिधि तक ही सीमित है? अथवा...
- क्या विनाश के अतिरिक्त और कोई मार्ग ही नहीं?... इस प्रकार जब निराशा जनक चिन्तन जीवनक्रम को घेरने लगे, तो आशा की किरण एक ही रह जाती है कि मानवी अन्तर...
- क्या समाज का इसमें कोई अनुदान नहीं?... यह बात नहीं मानी जा सकती कि यह केवल उस व्यक्ति का ही दोष है जिसने चोरी की है।मानवी दृष्टि से देखा जा...
- क्या समूह व्यवस्था?... दोनों ही क्षेत्रों में हमें विशालता, उदारता एवं एकता का परिचय देना चाहिए। संयुक्त परिवार जैसी सहकारि...
- क्या हमने कभी सोचा है कि हमारे मरने के बाद पत्नी, बेटी जो कभी घर से बाहर नहीं निकली उनकी क्या दशा होगी?... सम्पत्ति दो दिन की मेहमान है, कल चली जायेगी। पुरुषार्थी का ही संसार में रहना योग्य है। अस्तु नारी वर...
- क्यों अपना सामान्य क्रम छोड़ बैठती हैं?... उन्हें कैसे इस असामान्य व्यवहार से रोका जा सकता है? लम्बी माथापच्ची के बाद भी ये प्रश्न जैसे के तैसे...
- क्यों उस मूर्खता को दुत्कार नहीं देता?... रात्रि स्वप्नों को ही आमतौर से चर्चा का विषय बनाया जाता है। सोकर उठने के उपरान्त उन्हें याद किया और ...
- क्यों उसे मिथ्या नहीं बताता?... क्यों उस मूर्खता को दुत्कार नहीं देता?रात्रि स्वप्नों को ही आमतौर से चर्चा का विषय बनाया जाता है। सो...
- क्यों न अपने परिवार देवता की मनुहार करने और मनौती मनाने में जुटा जाय?... क्रान्तिकारी कार्लमार्क्सों का उदय होने में देर लगती दीखे तो घरेलू प्रज्ञा पुस्तकालयों के सहारे विचा...
- क्यों न उस विशिष्टता के आधार पर लोकमंगल की सामयिक एवं महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा किया जाय?... पुरातन काल की ऋषि परम्परा यही थी। आत्मबल के धनी एक-एक महामानव ने अपने उपार्जन को सत्प्रवृत्ति सम्वर्...
- क्यों न जन सम्पर्क में उतरा जाय?... क्यों न पुरातन काल जैसी घर-घर अलख जगाने वाली प्रक्रिया को पुनर्जीवित किया जाय? यह हो सकता है। यही हो...
- क्यों न पुरातन काल जैसी घर-घर अलख जगाने वाली प्रक्रिया को पुनर्जीवित किया जाय?... यह हो सकता है। यही होना भी चाहिए। प्रश्न एक ही रह जाता है कि इसे करे कौन? इसका उत्तर पाने के लिए भी ...
- क्यों हिंसावृत्ति इतनी उग्र होती जा रही है?... इस पर विभिन्न दृष्टियों से विचार और कई परीक्षण करने के बाद यही सिद्ध हुआ कि जनसंख्या का दबाव मनुष्य ...
- क्यों हो रहा है?... लम्बे अन्धकार युग में कचरा बहुत जमा हो गया है। हर क्षेत्र में गन्दगी चरम सीमा पर पहुँच गयी है। उसे ...
- क्योंकि उन्हें पता ही होगा कि कब कहाँ से कितना पैसा मिलने वाला है?... जो मिलना भाग्यानुसार निश्चित है, वह तो घर बैठे भी आ जायेगा फिर भविष्य कथन के झंझट में पड़ने से भी क्य...
- क्योंकि वे हमारी इन्द्रिय क्षमता के अनुपान में अति सूक्ष्मातिसूक्ष्म होती हैं, तब परम चेतन तत्व ही लोगों की अनुभूति में अनायास कैसे आ जाये?... उस हेतु पहले वैसी सामर्थ्य विकसित करनी होगी। नेत्रहीन को सामने का रूप नहीं दिखाई पड़ता, जबकि वहीं पास...
- क्षणिक चटोरेपन के पीछे समर्थता की सम्पत्ति को गँवाने और दिन-दिन दुर्बल होते जाने से क्या लाभ?... बता मन तू कोयलों के ऊपर मुहरें निछावर करने में क्या बुद्धिमत्ता अनुभव कर रहा है?आत्मा रोती बिलखती ...
- खीज़, क्षीणता, जलन और पछतावे के सिवाय इस भूल भरे मार्ग पर और मिलना ही क्या था?... सब कुछ गवाँ बैठने पर भी तृष्णा और वासना के शूल अभी भी वैसा ही दर्द करते रहते हैं और चैन नहीं मिल...
- गाँव-गाँव में, नगर-नगर में रामायण की चौपाइयों के माध्यम से जन क्रान्ति का बीजारोपण करने वाले राघवदास अब कहाँ दिखायी पड़ते हैं?... युग धर्म को समझने वाले आनन्द मठ जैसे संन्यासी कहाँ मिलते हैं? गरीबों, पिछड़ों का दुःख दर्द समझने तथा ...
- गुड़िया बने रहने में उसने क्या खोया और क्या पाया?... पति को प्रसन्न करने के लिए उसे कामुकता की मनमानी छूट देना न तो पतिभक्ति है और न भाव समर्पण है। जिसमे...
- घर में नारी होती तो यह विपत्ति क्यों आती?... निरन्तर चोरी की आशंका से जो परेशानी रहती है और जल्दी लौटने की मजबूरी रहती है, उसे देखते हुए चौकीदार ...
- घरों में सुसंस्कारिता कैसे पनपे, फले फूले?...
--पं. श्रीराम शर्मा आचार्यपरिवार में सुसंस्कारिता का प्रशिक्षण कराना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। ...
- चमत्कार दिखाने और निहाल बनाने की जादूगरी का अध्यात्म से कोई सम्बन्ध है या नहीं?... इसका निर्णय हर विज्ञ जन को अपने विवेक से करना चाहिए। किन्तु इस तथ्य को निश्चित रूप से गिरह बाँध लेना...
- चर्चा समझदारी की है, प्रगति की बात सोचने के साथ-साथ यह भी देखना होता है कि कहीं भूल तो नहीं हो रही है?... किसी छेद में से पानी तो नहीं रिस रहा है। ऐसे लोग भूल सुधारने के लिए तत्पर रहते हैं। जो होता रहा है व...
- चारों ओर आग लगे तो अपना घर भी कहाँ बचेगा?... इसलिए दूरदर्शिता इसी में है कि न केवल अपना शरीर परिवार सँभाला जाय, वरन् संव्याप्त वातावरण के सम्बन्ध...
- चित्रकार जब उसके मर्मस्थलों को निर्लज्ज, निर्वसन बनाने के लिए दुःशासन की तरह अड़े बैठे हैं, कवि जब वासना भड़काने वाले ही छन्द लिखें, गायक जब नख-सिख का उत्तेजक उभार और लम्पटता के हाव-भावों भरे क्रिया कलापों को अलापें, साहित्यकार कुत्सा ही कुत्सा सृजन करते चले जाये और प्रेस तथा फिल्म जैसे वैज्ञानिक माध्यमों से उन दुष्प्रवृत्तियों को उभारने में पूरा-पूरा योगदान मिले तो जन मानस को विकृत और भ्रमित कर देना क्या कुछ कठिन हो सकता हैं?... हमें इस विकृति के मूल स्रोत कला के अनाचार को रोकना बदलना होगा। स्नेह और सद्भाव की देवी सरस्वती के सा...
- चेतना को किस प्रकार मल आवरण, विक्षेपों से बचाया जाय?... किस प्रकार उसे प्रगति पथ पर अग्रसर होने का अवसर दिया जाय? किस प्रकार उसे बलिष्ठ, प्रखर और परिष्कृत ब...
- चेतना समुद्र की बूँदें समुद्र की अलग से अनुभूति सरलता से कैसे कर पाये?... यह अति दुष्कर कार्य है। मनुष्य की अनुभूतियाँ इसी परम चेतना के प्रकाश की उपस्थिति में सम्भव होती है। व...
- चेहरे पर, होठों पर जाकिट कसे हुए किसे देखा जाता है?... यह अवयव खुले ही रहते हैं। उन पर मौसम का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यही बात समस्त शरीर पर भी लागू होती है।...
- चोरी और अनैतिकता की प्रवृत्ति क्या उस व्यक्ति की है?... क्या समाज का इसमें कोई अनुदान नहीं? यह बात नहीं मानी जा सकती कि यह केवल उस व्यक्ति का ही दोष है जिसन...
- चोरी और अनैतिकता के अपराध में पकड़ा एक व्यक्ति जाता है और सजा का भागीदार भी वही होता है, परन्तु क्या आप इसमें उस व्यक्ति का ही एकमात्र दोष मानते हैं?... चोरी और अनैतिकता की प्रवृत्ति क्या उस व्यक्ति की है? क्या समाज का इसमें कोई अनुदान नहीं? यह बात नहीं...
- चोरी की आदत के कारण लोक सम्मान चला जाना, जेल भुगतना और सहयोग से वंचित हो जाना कितना कष्टकारक और कितना प्रगति बाधक होता है?... इसे भुक्तभोगी भली प्रकार जानते हैं। सामान्य कामों में पग-पग पर असफलता मिलना अस्थिर चित्त का ही प्रति...
- छींक आना, आँख के पलक आदि में फड़कन होना, यह शरीर की साधारण क्रियाएँ हैं, इनके साथ शुभ-अशुभ की संगति बिठाने का क्या तुक हो सकता है?... मरने के बाद प्राणी दूसरे शरीर में चला जाता है, अन्यत्र जन्म धारण कर लेता है। फिर उसको सुविधाएँ पहु...
- जनता अपनी रोटी, कपड़ा, दवा, मनोरंजन आदि का खर्च स्वयं उठाती है, इसके लिए सरकार से अनुदान नहीं माँगती, तो फिर भावनात्मक नव-निर्माण की शिक्षा के लिए सरकार का मुँह ताका जाय, इसकी क्या आवश्यकता है?... साहित्यकारों से इसी दिशा में लेखनी उठाने के लिए कहा जा रहा है। कवियों से मूर्छना को जागृति में परिणि...
- जनता भी इस झंझट में नहीं पड़ती थी कि इन दिनों किन सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन को प्राथमिकता दी जाय?... यह निर्णय साधु ब्राह्मणों की परिषद ही करती थी।
धार्मिक जनता साधु ब्राह्मणों को, तीर्थ, देवालयो...
- जब अपना उपार्जन श्रम, सहयोग किसी को देना ही है तो उन्हें देवताओं, ऋषियों एवं सदुद्देश्यों के लिए ही क्यों न दिया जाय?... इस उदार नीति को अपनाने वाले बैंक में जमा की गई पूँजी की तरह ब्याज समेत लम्बा लाभ पाते हैं, जबकि मोह ...
- जब इतनी अधिक और इतनी सामयिक समस्याएँ उलझी पड़ी हैं ,, तो हमें उन्हीं पर अपना ध्यान क्यों नहीं केन्द्रित करना चाहिए?... दर्शन का एक निश्चित लक्ष्य होना चाहिए। अन्तःकरण की सौन्दर्यानुभूति की कलाकारिता को जगाना सत्य के प्रत...
- जब उगाना ही अभीष्ट है तो उखाड़ने का क्या काम?... सरकार के द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, उत्पादन, सिंचाई आदि के अनेकों उपयोगी कार्य हाथ में लिए ज...
- जब एक ही दृश्य से अनेकों प्रकार के निष्कर्ष निकाले जाते हैं तो उनकी वास्तविकता किस आधार पर निरूपित की जाय?... इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए वेदान्त में इस संसार को माया-मिथ्या आदि नामों से पुकारा है।ब्रह्म को ...
- जब किसान, दुकानदार, शिल्पी अपने उपार्जन भर निर्वाह करते है तो कोई भजनानन्दी ही भिक्षा पर निर्भर क्यों रहे?... प्राचीन काल के साधु, ब्राह्मणों की परम्परा अलग थी वे भजन भी करते थे, पर साथ ही लोक मंगल के लिए इतना ...
- जब खेल ही खेलना है तो हर स्थिति में विनोद ही विनोद की मनःस्थिति क्यों न रखी जाय?... योगी की प्रकृति इसी तरह की होती है।***—पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य, गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्...
- जब गढ़ना ही रहा तो भूत क्यों गढ़ा जाय?... देवता की संरचना करने में भी तो उतनी ही शक्ति लगेगी। डर वास्तविक नहीं होते। जितने संकट अनगढ़ मस्तिष्क ...
- जब घर-घर में नर रत्नों और महामानवों का उत्पादन होता था, और उन चन्दन वृक्षों से सारा वातावरण ही महक रहा था तो गणना किस-किस की की जाय?... वर्षा होती है तो सर्वत्र हरियाली उगी दीखती है। भारतीय संस्कृति की तुलना अमृत वर्षा से की जाती है, ...
- जब जानने-मानने का मूड नहीं, तो फिर व्यर्थ की सिरफोड़ी से मतलब भी क्या निकलता है?... चर्चा समझदारी की है, प्रगति की बात सोचने के साथ-साथ यह भी देखना होता है कि कहीं भूल तो नहीं हो रही ह...
- जब निदान ही सम्भव नहीं हो पा रहा तो उपचार कैसे सम्भव होगा?... अमेरिका के रोचेस्टर विश्वविद्यालय द्वारा किये गये अध्ययन से यह ज्ञान हुआ है कि किसी व्यक्ति का जीवन ...
- जब मत्स्य न्याय के आधार पर ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का सिद्धान्त ही प्रत्यक्षवाद ने सही ठहराया तो फिर नीति, धर्म, सदाचार अपनाने का प्रश्न ही कहाँ रहा?... इन परिस्थितियों में धर्मतंत्र को अपने सही उद्देश्य को पूरा कर सकना अत्यधिक कठिन पड़ गया। असमंजस इस बा...
- जब साधन सम्पन्न क्षेत्रों में ही उनकी बहुत माँग है और उन्हीं से फुरसत नहीं मिलती, तो फिर पिछड़े क्षेत्रों में अनेकानेक असुविधाओं का सामना करने के लिए क्यों जाया जाय?... यही व्यवधान है, जो पिछड़ेपन को प्रगतिशीलता में परिवर्तित करने वाले प्राणवान सत्संग सम्पर्क का सुयोग न...
- जब सामान्य प्राणी अपनी सन्तान को समान स्नेह सहयोग देते हैं, तो फिर ईश्वर ने इतना अन्तर किसलिए रखा?... इस विभेद को समझने में प्रत्येक विवेक सम्पन्न व्यक्ति को भारी उलझन का सामना करना पड़ता है। तत्त्वदर्शी...
- जब हर छोटा बड़ा काम सफलता के स्तर तक पहुँचने के लिए आवश्यक सूझबूझ, श्रमशीलता और साधन सामग्री की अपेक्षा करता है तो उसका अपवाद कैसे हो सकता है?... परिवार निर्माण का प्रत्यक्ष पक्ष इतना ही है, कि उस परिधि में रहने वाले प्रत्येक परिजन का वर्तमान सुख...
- जब हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, भाग्य लेख के अनुसार ही मिलता है तो प्रयत्न पुरुषार्थ की माथापच्ची करने से क्या लाभ?... जो होना है वह तो होगा ही। फिर रोग की चिकित्सा, शत्रुओं से सुरक्षा, उपार्जन के लिए दौड़-धूप, पढ़ने में ...
- जबकि चाल दोनों की एक जैसी, साधन, ड्राइवर आदि एक जैसे, फिर यह दूरी का अन्तर क्यों पड़ गया?... साथ-साथ क्यों नहीं चलती रहीं? इसका एक ही उत्तर है उनकी दिशा बदल गयी। जीवन की दिशाधारा बदलने का आधार ...
- जमीन में उर्वरता और नमी न हो तो जड़ें खुराक कहाँ से खींचें, इसी प्रकार पोषक तत्वों का जमीन में बाहुल्य होते हुए भी जड़े सड़ी गली हो तो पौधों को आहार पाने और बढ़ने का अवसर कैसे मिले?... एकांगी स्थिति अपर्याप्त है। दिन-रात, नर-नारी, ताना-बाना, ऋण-धन मिलकर जिस तरह एक संयुक्त शक्ति बनते औ...
- जहाँ पाप वृत्ति न हो वहाँ शरीर का स्पर्श दूषित कैसे होगा?... हम अपनी युवा पुत्री के शिर और पीठ पर स्नेह का हाथ फिराते है तो पाप कहाँ लगता है। सान्निध्य पाप नहीं ...
- जिन कर्मों का फल इस जन्म में नहीं मिल सका, उनके लिए ईश्वर के दरबार में कोई व्यवस्था नहीं है क्या?... सद्गति और दुर्गति का कोई माध्यम न हो तो फिर शुभ कर्म और अशुभ कर्म करने वालों को तदनुरूप प्रतिफल कैसे...
- जिन चींटियों के बिलों पर आटा डाला गया था उन्हें दूसरे ही क्षण कुत्ता उदरस्थ कर गया होगा तो वे बेचारी क्या कहती होंगी?... उन्हें पुण्य प्रदर्शन के ढिंढोरचियों को शादी में दौलत उड़ाने वालों का ससुर और जमाता भविष्य में इन धन ...
- जिस आधार पर यह प्रचलन चला था?... तीर्थों को सुन्दर एवं आकर्षक बनाने में उन लोगों ने अधिक उत्साह दिखाया है जिन्हें पुण्यफल, देव अनुग्र...
- जिस नारी का शील बिगड़ा उसे फिर से शुद्ध कैसे किया जाय?... जिस आदमी की जेब कटी, उसे कहाँ तलाश किया जाय। जो मर गया या दूर है उसे वह राशि किस प्रकार लौटाई जाय। त...
- जिस बात की आवश्यकता ही नहीं समझी जाती उसकी व्यवस्था कैसे बनेगी?... वह भूल है जिसके कारण यह अमूल्य अवसर हाथ से निकलता चला जाता है। गलती का आभास तब होता है तब जीवन सम्...
- जिस सौभाग्य पर समस्त प्राणि जगत ईर्ष्या कर सकता है उसे भव सागर के नाम से जानी जाने वाली, सड़ी कीचड़ में धँसे-फँसे रहकर उजाड़ देने को क्या कहा जाय?... दुर्भाग्य इसलिए कहते नहीं बन पड़ता कि जीवन ईश्वर का सर्वोपरि उपहार है। ऐसा उपहार जिसके लिए प्राणि जगत...
- जिसकी हानि ही न समझी जाय उससे बचने का प्रयत्न भी कोई क्यों करेगा?... अनेकों दुष्प्रवृत्तियाँ अपना व्यवसाय इसी रूप में चलाती हैं। वे मनुष्य के विचार, स्वभाव और व्यवहार मे...
- जिसे अपने ऊपर भरोसा नहीं ,, उसकी ओर कौन भरोसा करेगा?... जो अपनी सहायता आप करता है ईश्वर भी उसी की सहायता करता है, इस तथ्य को हमें गिरह बाँध कर रखना चाहिए।...
- जीभ से होने वाली बक-झक से कहाँ काम चलने वाला है?... अनुदान के लिए मनुष्य के पास दो ही सम्पदायें हैं एक समय-श्रम, दूसरा साधन वैभव। यह दोनों ही आमतौर से प...
- जीवन का स्वरूप एवं लक्ष्य क्या है?... जीवन के साथ जुड़ी हुई विभूतियों का सही उपयोग क्या है? इन प्रश्नों को उपेक्षा के गर्त में डाल देने से ...
- जीवन का स्वरूप एवं लक्ष्य क्या है?... जीवन के साथ जुड़े संसार एवं प्राप्त विभूतियों का सही उपयोग क्या है? इन प्रश्नों को उपेक्षा के गर्त मे...
- जीवन के साथ जुड़ी हुई विभूतियों का सही उपयोग क्या है?... इन प्रश्नों को उपेक्षा के गर्त में डाल देने से एक प्रकार की आत्म-विस्मृति छाई रहती है। अन्तःकरण मूर्...
- जीवन के साथ जुड़े संसार एवं प्राप्त विभूतियों का सही उपयोग क्या है?... इन प्रश्नों को उपेक्षा के गर्त में डाल देने से एक प्रकार की आत्म-विस्मृति छाई रहती है। अन्तःकरण के म...
- जीवन क्या है, क्यों है उसका लक्ष्य एवं उपयोग क्या है?... इन प्रश्नों का समाधान मात्र आस्तिकता के साथ जुड़ी हुई दिव्य दूरदर्शिता के आधार पर ही मिलता है।...
- जीवन-मुक्ति का आनन्द कैसे लिया जाय?... साधना याचना नहीं होती और न उस कारण कहीं आसमान से वरदान उपहार बरसते हैं। आत्मशोधन और आत्म-परिष्कार के...
- जो अन्ध परम्पराएँ पीड़ा, पतन की कुण्डली मारकर बैठी हैं वे मिटें कैसे?... इस प्रश्न का उत्तर एक ही है कि धर्मतंत्र के सहारे कुप्रचलनों का उन्मूलन किया जाय। साथ ही उस क्षेत्र ...
- जो अशिक्षित है, पढ़ा लिखा नहीं है, वह किसी भी जीवन अथवा कर्म-दर्शन सम्बन्धी पुस्तक का अध्ययन किस प्रकार कर सकता है?... किस प्रकार उसकी शिक्षाओं को समझ सकता है? और किस प्रकार हृदयंगम कर सकता है? उसके लिये तो ज्ञान से भरी...
- जो आदमी सबको कुरूप और गन्दा लगता है, वह एक स्त्री को इतना प्रिय क्यों लगता है?... इसका कारण है-प्रेम। प्रेम एक प्रकार का प्रकाश है, अँधियारी रात में आप अपनी बैटरी की बत्ती से किसी वस...
- जो काम एक कर सका उसे दूसरा क्यों नहीं कर सकता?... इस प्रकार के विधेयक विचारों का सिलसिला यदि मनःक्षेत्र में चल पड़े, तो न केवल वैसा विश्वास बँधेगा वरन्...
- जो मिलना भाग्यानुसार निश्चित है, वह तो घर बैठे भी आ जायेगा फिर भविष्य कथन के झंझट में पड़ने से भी क्या लाभ?... मनुष्य की सम्भाषण और गायन विशेषता दूसरे प्राणियों की दृष्टि से एक देवोपम सिद्धि हो सकती है। दो पैरों...
- ज्ञान के बिना निर्वाह साधन कैसे जुटें?... और निर्वाह न मिले तो ज्ञान-सम्पदा की बात कैसे सूझे? दोनों ही तथ्य अपने-अपने स्थान पर सही हैं। उन्हें...
- जड़ यथावत जमी रहे तो मात्र पत्ते तोड़ने से क्या बने?... विषैले रक्त के कारण उत्पन्न होने वाले फोड़े फुन्सियों का निराकरण मात्र मरहम लगाने के ऊपरी उपचार से कै...
- तनिक कड़ा रहने के कारण उसे चबाने में मेहनत करनी पड़े तो वह बड़े आदमियों और नाजुक मिज़ाज वालों को बर्दाश्त कैसे हो?... दालें छिलका उतारकर पकाई जाती हैं। कोमल फलों तक के छिलके उतारे जाते हैं। केला, आम, नारियल जैसों की बा...
- तब काम और बेकाम के दृश्यों का इतना अन्धड़ सामने खड़ा होगा कि बेचारी आँखें हतप्रभ हो जायेंगी और मस्तिष्क के लिए उन दृश्यों को देखकर यह निष्कर्ष निकालना कठिन हो जायेगा कि सामने क्या हो रहा है?... यही बात कानों के सम्बन्ध में है, हमारे कान एक सीमित स्तर की थोड़ी सी ध्वनियाँ सुन पाते हैं किन्तु उनस...
- तब विविध-विधि दौड़-धूप करने की आवश्यकता क्या रहीं?... ऐसी दशा में मनुष्य मात्र भाग्य की कठपुतली बन जाता है और पुरुषार्थ का कोई मूल्य नहीं रहता। यह विचित्र...
- दयालु माली का यह निर्दय कृत्य क्यों?... विकास का लक्ष्य रखने वाले द्वारा अपनाई गई यह विनाश लीला क्यों है? जब उगाना ही अभीष्ट है तो उखाड़ने ...
- दुधारू और जराजीर्ण गाय के बीच जो अन्तर किया जाता है उसे देखते हुए यह अनुमान लगाने में किसी को कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि संसार में मान और महत्त्व दिये जाने का मापदण्ड क्या है?... नारी की वर्तमान दुर्गति के भी यही दो कारण है। उसे ससुराल की कृपा पर जीवित रहने एवं उनके अनुग्रह पर ग...
- दुर्गुणों को निरस्त करने और सद्गुणों को बढ़ाने में कितना प्रयास किया गया?... *** —पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य, गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार55. जीवन व्य...
- दुष्प्रवृत्तियों में संलग्न व्यक्ति क्या पाता, क्या कमाता है?... मोटे तौर से यही दीखता है, पर उनके प्रयोक्ता के अन्तराल को टटोला जाय तो प्रतीत होगा कि यह सब कुछ खोखल...
- देखे कि उसके लिए गूलर का भुनगा, कुएँ का मेढ़क बनकर संकीर्णता की चहारदीवारी में बैठा रहना ही पर्याप्त है या इससे आगे की भी कुछ बात हो सकती है?... विचार की आवश्यकता ही न समझी जाय तो बात दूसरी है, अन्यथा गहराई में उतरने पर हर सीढ़ी एक भाव भरी प्रे...
- देश की बागडोर सँभालने तथा उसके संचालन का दायित्व सौंपने से पूर्व यह आवश्यक हो जाता है कि यह भली-भाँति परख लिया जाये कि जिनके हाथों में देश की व्यवस्था की देख-रेख अरबों खरबों रुपये की सम्पत्ति की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है वे कैसे हैं?... ईमानदार चरित्र निष्ठ हैं अथवा नहीं। साढ़े अड़सठ करोड़ व्यक्तियों का भाग्य इस दूरदर्शी निर्णय पर निर्भर...
- दो चार लोग मान भी जायें तो उससे क्या होता है?... इस धन्धे में प्रवेश करने वाले नये लोग संख्या को पूरा कर देंगे। अतः दानी और उदार बनने से पहले यह विचा...
- दो शरीर के दो अवयवों का स्पर्श, इसमें क्या अनोखापन, क्या निरालापन, क्या उपलब्धि है?... फिर स्पर्श का कुछ प्रभाव हो भी तो उसकी कल्पना से किस प्रकार, क्यों, किसलिए चित्त को बेचैन करने वाली ...
- दोनों ही थाली में सामने रखे हैं, किसे ग्रहण किया जाय?... किसे छोड़ा जाय? इसमें भीतर ही भीतर सतत् अन्तर्द्वन्द्व चलता है।धन उपार्जन में नीति-अनीति के, कर्म में...
- धन-दौलत के खजाने किसके खेत-आँगन में गढ़े हुए हैं, जिन्हें उखाड़कर मौज मजे के दिन गुजारे जायें और गुलछर्रे उड़ाये जायें?... लॉटरी, जुआ, सट्टा के सामने भी शेखचिल्ली की तरह मनमोदक ही बने रहते हैं। चोर उचक्के भी काठ की हाँडी मे...
- धरती भाप बनकर हवा में उड़ गई तब तो कहना ही क्या?... इस प्रकार की सम्भावना और चिन्ता का कोई कारण ही न रहेगा, जिसकी चर्चा इन पंक्तियों में की जा रही है।
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- धर्म एवं संस्कृति के लिए मर मिटने वाले वैरागी जोरावर सिंह का उदारहण अब कहाँ मिलेगा?... पटेल, गाँधी, नेहरू, तिलक, अब्दुल कलाम आजाद जैसे निस्पृह, कैरियर पर लात मारकर स्वतन्त्रता संग्राम में...
- धर्म की आत्मा अपने स्थान से क्यों पदच्युत हुई और उसके स्थान पर अवांछनीयता कैसे आ विराजी?... लोगों ने धर्मश्रद्धा के आवेग में अधार्मिकता को कैसे गले बाँध लिया? इस इतिहास की शृंखला को समझना ही प...
- धर्मों का तो कहना ही क्या?... एक दूसरे को झूठा बताते और सच्चाई की ठेकेदारी अपनी मानते हैं। विधर्मी को अपने धर्म में लाने के लिये...
- धातु के सिक्के या कागज के टुकड़े भला आदमी के लिए प्रत्यक्ष क्यों आकर्षक हो सकते हैं?... पर चूँकि वर्तमान समाज व्यवस्था के अनुसार धन के द्वारा इन्द्रिय सुख के साधन प्राप्त होते हैं, मैत्री ...
- धूमधाम और देन दहेज के विवाह करने वालों को दूरगामी दुष्परिणामों का भान कहाँ होता है?... मानवी दुर्भाग्यों में यह विडम्बना सबसे निकृष्ट और दुःखद है कि उसे इर्द-गिर्द नजर पसार कर घटित होने...
- ध्यान इस बात का रखते हैं कि क्या बात है कि बच्चे ने आज ठीक से नहीं खाया, क्या कुछ पसन्द नहीं आया?... न हो तो कुछ अच्छी चीज बनवा दी जाये या बाजार से ही कुछ बढ़िया चीज ले दी जाये।ऐसा करने से बच्चे चटोरे औ...
- न इतना धैर्य है और न इतना अवकाश, अवसर कि वंश परम्परा के साथ जुड़ी हुई विशेषताओं में क्रमिक परिवर्तन की आशा लगाये बैठा रहा जाय और सुधार प्रयत्नों से होने वाले अत्यन्त धीमे परिवर्तन पर सन्तोष किया जाय?... विकासवाद के अनुसार प्राणियों को आदिम काल से लेकर अर्वाचीन परिणति तक पहुँचने में लाखों वर्ष लगे हैं औ...
- नशे पर नियन्त्रण कौन करें?... सपनों की सीमा कैसे बाँधे? प्रेमोन्माद भी लगभग ऐसा ही होता है। बेल मगरे तो चढ़ती नहीं, चढ़ती है तो एक ह...
- नाक पर कोई टोपा कहाँ लगाता है?... चेहरे पर, होठों पर जाकिट कसे हुए किसे देखा जाता है? यह अवयव खुले ही रहते हैं। उन पर मौसम का कोई प्रभ...
- नारी अशिक्षित है, आत्म-निर्भर नहीं है तो शादी करने वाला वर पक्ष दहेज माँगता है, यह कितनी शर्म की बात है?... हमें चाहिए कि नारी उत्थान के कदम बढ़ायें। प्रत्येक मनुष्य अपने घर के नारी वर्ग को सुशिक्षा प्रदान करे...
- नारी को अस्वस्थ बनाकर उसके मालिक, पालनहारे भी इस स्थिति में क्या सुख सन्तोष अनुभव कर रहे हैं?... रोते कराहते स्वर, आखिर उन्हें भी कुछ तो कष्ट देंगे ही। सहानुभूति समाप्त हो गई हो तो भी खीज़ और झुँझल...
- नारी को रमणी, कामिनी और वेश्या के रूप में प्रस्तुत करने की कुचेष्टा में जब कला के सारे साधन झोंक दिए गए तो जन मानस विकृत क्यों न होता?......
- निरोग कैसे होता है?... प्रश्न के उत्तर में सभी ने अपनी मान्यता व्यक्त की। रोग मुक्त होने के निमित्त सभी उपचार बताते चले गये...
- निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए किन मान्यताओं और गतिविधियों को अपनाया जाय?... यही है वह आधारभूत निर्धारण, जिसके सहारे भली या बुरी दिशाओं में जीवन प्रवाह बहता है और पतन के गर्त या...
- निर्वाह का तिल, लालच का पर्वत बन पड़े ऐसा भी क्या?... परिवार एक हँसता हँसाता उद्यान है, उसे भव बन्धन बनाकर क्यों रखा जाय? समाज के साथ जुड़कर उदात्त विशाल...
- निशाने पर तीर छोड़ने से पूर्व वे छात्रों से पूछते तुम्हें क्या दीखता है?... शिष्यगण मछली के आस-पास का क्षेत्र तथा उसका पूरा शरीर दीखने की बात कहते। द्रोणाचार्य उनकी असफलता पहले...
- नौकरी करने का लाभ ही क्या रहा?... इस मनोवृत्ति के रहते सरकार भी कुछ कर नहीं सकती। लोक निन्दा से बचने के लिए समाज कल्याण का खर्चीला आडम...
- पटेल, गाँधी, नेहरू, तिलक, अब्दुल कलाम आजाद जैसे निस्पृह, कैरियर पर लात मारकर स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी क्षमता एवं प्रतिभा की आहुति देने वाले अब कहाँ रहे?... गाँव-गाँव में, नगर-नगर में रामायण की चौपाइयों के माध्यम से जन क्रान्ति का बीजारोपण करने वाले राघवदास...
- पर अभी समग्र प्रयोजन पूरा कहाँ हुआ?... जो करना शेष है जितना कराना बाकी है, वह कहीं अधिक है। विगत की तुलना में आगत अधिक भारी है। उस जिम्...
- पर इसे मानता कौन है?... किसी भी तरीके से उचित अनुचित को ध्यान में रखे बिना अधिक से अधिक कमाया जाय और उससे अधिक से अधिक ठाट-ब...
- पर उस प्रयास का अभ्यास कहाँ हो?... सिद्धान्त को आदत में बदलने के लिए कहीं न कहीं अभ्यास तो करना ही होगा। बलिष्ठता के लिए व्यायामशाला, व...
- पर उस सूखी हँसी से बनता क्या है?... आजीविका न हो तो फिजूलखर्ची की रंगीली पतंगबाजी कितनी देर काम आती है? श्रमपूर्वक उपार्जन और एक-एक पाई ...
- पर उसने विद्या में रस लिया कब?... रूठा जो बैठा रहा।देवत्व के सारे उपकरण अपने भीतर विद्यमान थे। एक उँगली के सहारे यह सारा साज झंकृत ह...
- पर ऐसा होता कहाँ है?... ऐसे जोड़े मिलते कहाँ है? जब तक वैसी स्थिति प्राप्त न हो, केवल इन्द्रिय सुख के लिए काम सेवन एक क्षणिक ...
- पर जब तलक लोक मान्यता यही बनी रहेगी, तब तक उसका सही मूल्यांकन न हो सकेगा और जिसका कुछ मूल्य ही नहीं समझा गया उसे मान देना या ऊँचा उठाने की आवश्यकता भी कौन अनुभव करेगा?... पाकशाला का उत्तरदायित्व नारी संभालती है। कच्चे खाद्य पदार्थ को परोसी गई रसोई की स्थिति तक पहुँचाने म...
- पर प्रश्न यह है कि उनका प्रदर्शन कौतुक-कौतूहल प्रदर्शित करने के लिए क्यों हो?... क्यों न उस विशिष्टता के आधार पर लोकमंगल की सामयिक एवं महत्त्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा किया जाय? पुरा...
- पर यह हो कैसे?... इसका उत्तर एक ही है कि उच्चस्तरीय निर्धारणों को कार्यान्वित करने के लिए समय सम्पदा का नियोजन किया जा...
- परमात्मा ही जब ऐसी अनीति बरतेगा तो उसकी सृष्टि में न्याय नीति का अस्तित्व किस प्रकार बना रह सकेगा?... निश्चित ही मनुष्य को जो मिला है, वह उसकी पात्रता देखते हुए किसी विशेष प्रयोजन के लिए धरोहर रूप में द...
- परिवार एक हँसता हँसाता उद्यान है, उसे भव बन्धन बनाकर क्यों रखा जाय?... समाज के साथ जुड़कर उदात्त विशालता का अभ्यास किया जाता है। उसमें भेड़ियों जैसा परस्पर फाड़ खाने का प्र...
- पर्दे की प्रथा चलाकर हमने क्या पाया?... केवल इतना भर हुआ कि नवागन्तुक वधुएँ अपनी ससुराल का जो अविच्छिन्न स्नेह पा सकती थी, अनुभवी गुरुजनों क...
- पहले यह देखा जाना चाहिए कि अध्यात्म के नाम पर जो मान्यताएँ प्रचलित हैं, वे कहाँ तक सत्य और तथ्य पर आधारित हैं?... आज उस आत्म परिष्कार की पुनीत प्रक्रिया को पदच्युत करके बाजीगरी का, उठाईगीरी का सिद्धान्त मान्यता प्र...
- पिंजड़े की कैद में अनुभव बढ़ाने के अवसर ही कहाँ है?... काम का दबाव ही अहर्निश छाया रहता है, फिर मनोरंजन की इच्छा उठे भी तो उसका क्या महत्त्व? अवसर न मिलने ...
- पिछड़ी मनोभूमि और हेय स्वभाव अभ्यास वाले लोग जब गम्भीरतापूर्वक इस समाधान के लिए कारगर उपाय नहीं सोचेंगे तो उनके छप्पर पर सोने की वर्षा कहाँ आती है?... धन-दौलत के खजाने किसके खेत-आँगन में गढ़े हुए हैं, जिन्हें उखाड़कर मौज मजे के दिन गुजारे जायें और गुलछर...
- पुनः मैं तुम्हारे लिए केले लाया था खा लिये या नहीं?... और जाओ, माँ से अपनी मिठाई का हिस्सा तो ले लो जाकर, यानि उनका वे खाने पीने का कुछ ऐसा क्रम लगा देते ह...
- पुरुषार्थ की दौड़-धूप करने से क्या लाभ?... इस प्रकार की मान्यता वाले की प्रगति का क्रम समाप्त हो गया ही समझना चाहिए।देव शक्तियों से लोग अपने म...
- पुलिस, फौज, कचहरी, जेल, फाँसीघर जैसे संस्थानों में लगी हुई जनशक्ति तथा साधन शक्ति कोई अन्न-वस्त्र उत्पादन जैसा उपयोगी काम थोड़े ही करती है?... इसकी समस्त क्षमता उद्दण्डता से जूझने में ही समाप्त हो जाती है। मनुष्य में ईमान और भगवत् की ज्योति है...
- पूजा से ही ईश्वर प्रसन्न हो सकता है तो फिर उसका अनुग्रह प्राप्त करने के लिए कठोर कर्तव्यों का पालन कौन करे?... आत्मनियन्त्रण, व्यक्तित्व का परिष्कार, लोकमंगल के लिए त्याग, बलिदान, योग साधना एवं तपश्चर्या अपनाने ...
- पेट और प्रजनन की विडम्बनाओं के अतिरिक्त वे क्या आगे की और कुछ बात सोच या कर सकेंगे?... पर समय ही बतायेगा कि इसी जाल जंजाल में जकड़े हुए वर्गों में से कितनी प्रबुद्ध आत्माएँ उछल कर आगे आती ...
- पेट पर अनावश्यक भार क्यों लदता है?... इसका उत्तर एक है-चटोरेपन की ललक में तब तक ठूँस-ठाँस करते जाना, जब तक कि पेट तनने न लगे और फटने की ...
- प्रगति का मार्ग अवरुद्ध रहा तो हाथ पैर बँधे कैदी जैसी जिन्दगी जी लेने पर क्या मिला?... अन्न वस्त्र तो उसे भी मिल जाता है।अध्यात्म क्षेत्र की संकीर्णता से तात्पर्य है-अपनेपन का दायरा छोटी ...
- प्रचलन क्या है?... इन सब बातों को ताक में रख कर इतना ही सोचना होगा कि इन समस्त अड़ंगेबाजी की तुलना में प्रकृति का अन...
- प्रज्ञा परिजनों की जागृत आत्माएँ क्यों उस उत्तरदायित्व का वहन नहीं कर सकती?... इतने महान प्रयोजन के लिए लोभ और व्यामोह की क्षुद्रता पर थोड़ा अंकुश क्यों नहीं लगा सकती? समय की समस्य...
- प्रज्ञा युग के कर्णधारों में सम्मिलित होकर महामानवों जैसी भूमिका निभाने का यदि साहस उभरे, तो कुछ समय रुककर यह सोचना चाहिए कि प्रस्तुत विचारणा और गतिविधियों में कुछ हेर-फेर करना है क्या?... इस प्रश्न पर जितनी गम्भीरता पूर्वक पर्यवेक्षण किया जाय, उतना ही यह स्पष्ट होता जायेगा। भूल-भुलैयों क...
- प्रतिबन्धित नारी भी अपने संरक्षकों के लिए किस प्रकार उपयोगी और लाभदायक सिद्ध हो सकती है?... यदि नारी को उसके मौलिक मानवी अधिकार वापिस लौटा दिये जाय तो उसमें नर नहीं, अनाचार ही हारेगा। इस विजय ...
- प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या?... हाथी को गधे जैसा लदते और सिंह तथा बन्दर को समान रूप से नाचते देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि...
- प्रत्यक्ष व्यभिचार का तो कहना ही क्या?... मानसिक कामुकता की कुकल्पनाएँ जिन पर छाई रहती हैं, उनका मस्तिष्क किन्हीं महत्त्वपूर्ण विचारणाओं को ...
- प्रथा परम्पराओं में समानता हो, तो क्यों कोई किसी को अपने से पृथक माने?... क्यों चिढ़ाये? क्यों नीचा दिखाये? और क्यों अपनी मान्यता के गुण गायें? अगले दिनों साम्यवाद मात्र आ...
- प्रयोग न करने पर लाभ न मिले तो इसका दोष औषधि पर कहाँ आता है?... भारतीय संस्कृति में समाज व्यवस्था को चार भागों में बाँटा गया है और व्यक्तिगत जीवन के चार विभाजन कि...
- प्रश्न एक ही रह जाता है कि इसे करे कौन?... इसका उत्तर पाने के लिए भी जिस-तिस की मनुहार करने की आवश्यकता नहीं। कार्तिक अमावस्या की तमिस्रा दूर क...
- प्रश्न एक ही है कि प्रवाह को बदले कौन?... अँधेरे को प्रकाश में बदलने के लिए दीपक की तरह जले कौन? भीरुता के असमंजस में खड़े हुए लोगों को मार्ग...
- प्रश्न एक ही है कि वर्तमान अनास्था को उदात्त भाव श्रद्धा में पारित कैसे किया जाये?... इस सन्दर्भ में उत्तर तो कई दिये जा सकते हैं, पर प्रामाणिक प्रतिपादन आस्तिकता की भाव श्रद्धा का उन्नय...
- प्रसव सहायता और गर्भाशयों की शल्य क्रिया कैसे सम्भव होती?... संकोच वहाँ उचित है जहाँ कुत्साएँ भड़कने की आशंका हो। प्रतिबन्ध पशुता भड़काने वाली अश्लीलता, कामुकता, व...
- प्रस्तुत हलचलों में से यह ढूँढ निकालना कठिन है कि इससे पीछे आदर्शों के लिए भी कहीं कोई स्थान रहा है या नहीं?... जो हो रहा है उसे व्यर्थ ही नहीं अनर्थ भी कहा जा सकता है। सार्थक तो आदर्श भरा पुरुषार्थ ही हो सकत...
- प्राणियों का उत्पादक परमात्मा है, पर जीव को अपने ही समतुल्य नया जीव बनाते देखा जाता है तो जी चाहता है कि उसे भी सृष्टा कहा जाय?... अपने शरीर में से अपने जैसे नए नए शरीर बनाकर खड़े करते जाना अनोखे किस्म का जादू है। जादूगर अपनी झोली, ...
- प्रातःकाल पूरे दिन की दिनचर्या निर्धारित कर लेनी चाहिए और सोच लेना चाहिए कि उस दिन भर की क्रिया पद्धति में कहाँ कब कैसे अवांछनीय चिन्तन का अवांछनीय कृति का अवसर आ सकता है?... उस आशंका के स्थल का पहले ही उपाय सोच लिया जाय, रास्ता निकाल लिया जाय तो समय पर उस निर्णय की याद आ जा...
- फिर अन्य लोकवासी चैतन्य प्राणियों की रीति-नीति के बारे में तो कहा ही क्या जा सकता है?... समूचा ब्रह्म न तो हमारी समझा में आ सकता है और न उसे समझने की आवश्यकता है। मानवी चेतना के साथ ब्रह्म ...
- फिर आज उस प्रदर्शन की आवश्यकता क्यों पड़ गई?... यह तथ्य है कि किसी क्षेत्र में असाधारण पुरुषार्थ करने पर उसकी असाधारण उपलब्धियाँ भी हस्तगत होती हैं।...
- फिर आत्मा की गरिमा को पोषण कहाँ मिला?... आन्तरिक उल्लास का विकास कब सम्भव हुआ। महानता की अभिलाषा ही महत्त्वाकांक्षा कहलाती है। प्रगति का मार्ग...
- फिर इसे कोई क्यों अपनायेगा?... आत्मा का उल्लास, ईश्वरीय अनुग्रह जैसे लाभ ही उत्कृष्ट जीवन के मूलभूत प्रेरणा स्रोत हैं। भौतिक जगत मे...
- फिर उन सब कविताओं को गायत्री मन्त्र के समकक्ष क्यों नहीं रखा जाता और उनका उच्चारण क्यों उतना फलप्रद नहीं होता?... वस्तुतः मन्त्र दृष्टाओं की दृष्टि में शब्दों का गुंथन ही महत्त्वपूर्ण रहा हैं। कितने ही बीज मन्त्र ऐ...
- फिर ऐसा क्यों हुआ कि मनुष्य को ही इतना अधिक दिया गया और अन्य प्राणी उससे वंचित रखे गए?... यदि यह सब विभूतियाँ मात्र मौज करने के लिए ही मनुष्य को मिली होती तो निश्चय ही इसे अन्याय और पक्षपात ...
- फिर किसी बाहर वाले से माँगने जाँचने की दीनता दिखाकर आत्मसम्मान क्यों गँवाया जाय?... भीतरी विशिष्ट क्षमताओं को ही तत्त्वदर्शियों ने देवी-देवता माना है और बाह्योपचारों के माध्यम से अन्तः...
- फिर क्या कारण है कि घर के बाहर की बात सोचते ही उन मर्यादाओं का व्यतिक्रम होने लगे?... नैतिक अतिक्रमण की दिशा में उठने वाले चरण एक के बाद दूसरे का क्रम अपनाते हुए अन्ततः उस अनुशासन की जड़े...
- फिर क्यों उसी पिसे को पीसते रहा जाय?... क्यों न जन सम्पर्क में उतरा जाय? क्यों न पुरातन काल जैसी घर-घर अलख जगाने वाली प्रक्रिया को पुनर्जीवि...
- फिर जिन पर कानून पालने के लिए विवश करने की, दण्ड देने-दिलाने की जिम्मेदारी है, वे राज्य कर्मचारी ही कहाँ दूध के धुले हैं?... अपराधी से साँठ-गाँठ रखने की कला उन्हें भी आ गई है और उस दुर्बलता से ही भ्रष्टाचारी, हर सामाजिक मर्या...
- फिर जीवन का स्वरूप और रहस्य न समझने पर, उसकी साधना से विरत रहने पर कोई अभाव दारिद्र्य से, शोक-सन्ताप, पतन-पराभव से घिरा पड़ा रहे तो इसके लिए अन्य किसी को दोष कैसे दिया जाय?... जीवन की अवहेलना से बढ़कर पाप इस संसार में और कोई नहीं। अन्य पापी के कर्ता को तत्काल लाभ तो मिल ही जात...
- फिर जीवन व्यवसाय जिसकी तुलना संसार की और किसी उपलब्धि के साथ नहीं की जा सकती, उसे अँधेरे में क्यों रखा जाय?... उसके सम्बन्ध में स्पष्ट रूपरेखा क्यों न बने?हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत की अनुभूति यदि की जा सके ...
- फिर प्रेम, सदाचार, सेवा, न्याय-नीति, सौजन्य, सौहार्द, उदारता, सहानुभूति आदि आनन्ददायक प्रवृत्तियों की तो बात ही क्या?... एकाकी मनुष्य के लिए तो उनसे परिचित हो पाना भी सम्भव नहीं। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, औद्योगिक, वैज...
- फिर भी एक प्रश्न यथावत् रह जाता है क्या इससे उस उद्देश्य की पूर्ति हुई जो ऋषियों ने कभी विचारा था?... जिस आधार पर यह प्रचलन चला था?तीर्थों को सुन्दर एवं आकर्षक बनाने में उन लोगों ने अधिक उत्साह दिखाया ह...
- फिर विभूतियाँ पाने का लाभ क्या हुआ?... अपने को, सम्बन्धियों को जलाते-कुढ़ाते जी लेने और अन्त में पाप की गठरी सिर पर लद कर अँधेरे भविष्य की ओ...
- फिर वैसा ही प्रबन्ध २४०० प्रज्ञा संस्थानों, पंद्रह हजार स्वाध्याय मण्डलों एवं अगणित प्रज्ञा केन्द्रों में क्यों नहीं हो सकता?... लोक सेवा तो इसमें है ही, जन सम्पर्क सत्प्रवृत्ति संवर्धन और मिशन की विचारणा का विस्तार कार्यक्रम भी ...
- फिर स्पर्श का कुछ प्रभाव हो भी तो उसकी कल्पना से किस प्रकार, क्यों, किसलिए चित्त को बेचैन करने वाली ललक पैदा होनी चाहिए?... बात कुछ भी नहीं है। मात्र जननेन्द्रिय की बनावट में एक अजीब प्रकार की सरसता का समावेश मात्र है जो हमे...
- फ्रूट साल्ट खारे कहाँ होते हैं?... मनुष्य है जिसे खारी नमक के बिना एक ग्रास गले उतारना कठिन पड़ता है। दाल, शाक, चटनी, अचार कुछ क्यों न ह...
- बचकाने चिन्तन और उथले प्रयत्नों से अर्थ क्षेत्र में जादुई सफलता किसे मिली है?... किसी को राई रत्ती मिली होगी तो वह धूप-छाँव जैसी आँख मिचौनी का खेल, मटकते मचलते छोड़कर अपने घर चली गयी...
- बच्चे का शरीर आखिर माता का शरीर काटकर ही तो बनता है, उसका रक्त, माँस, हड्डी आदि जो कुछ है वह स्पष्टतः माता के पास जो शरीर सम्पत्ति थी, उसी का एक टुकड़ा अलग से टूट कर खड़ा हो गया है, जो दूध बच्चा पीता है, वह माता के रस रक्त के अतिरिक्त और क्या है?... उसे बच्चा पीता रहेगा तो माता के शरीर में उसकी कमी पड़ेगी ही। जो रक्त माँस लड़कियों के अपने स्वास्थ्य स...
- बच्चे की आवश्यकता को समय पर पूरा कर दिया जाता तो चुराने का साहस कैसे करता?... ऐसी माँगों के समय अभिभावक केवल दो ही बातों का ध्यान रखें कि यदि बच्चे की माँग हितकर एवं उपयोगी है तो...
- बता मन तू इसी चाल पर कब तक चलता रहेगा?... विश्व परिवार की ओर से कब तक आँखें बन्द कराये रहेगा?मन तू शरीर का मित्र बना और आत्मा का शत्रु। शरीर...
- बता मन तू कोयलों के ऊपर मुहरें निछावर करने में क्या बुद्धिमत्ता अनुभव कर रहा है?... आत्मा रोती बिलखती रही, उसके सन्तोष, उत्थान, कल्याण के लिए एक कदम नहीं बढ़ाया गया, एक प्रयत्न नहीं क...
- बन्दरों के समूह को कौन छेड़ता है?... बर्र के छत्ते में कौन हाथ डालता है? संगठित रहने के अनेक लाभों में से एक लाभ यह भी है कि उससे उद्दण्ड...
- बर्र के छत्ते में कौन हाथ डालता है?... संगठित रहने के अनेक लाभों में से एक लाभ यह भी है कि उससे उद्दण्डों को आक्रमण करने से पहले हजार बार व...
- बल इन उपकरणों में कहाँ होता है?... वह तो शरीर की माँसपेशियों से ही उभरता है। उस उभार में व्यायामशाला के साधन-प्रसाधन सहायता भर करते हैं...
- बाजीगर की उँगलियों से बँधे कठपुतली के सम्बन्ध सूत्र टूट जाय तो फिर वे लकड़ी के टुकड़े नाच किस प्रकार दिखा सकेंगे?... कनेक्शन तार टूट जाने पर बिजली के यन्त्र अपना काम करना बन्द कर देते हैं।ईश्वर और जीव का सम्बन्ध सनातन...
- बालकों से माता-पिता का व्यवहार कैसा हो?...
--पं. श्रीराम शर्मा आचार्यपीस इन द होम लीग नामक एक संगठन बना कर शिकागो में कुछ बच्चों ने निश्चय क...
- बालि से स्वयं ही क्यों न निपट लेते?... अर्जुन यदि अपने पराक्रम से महाभारत जीत सके होते, तो द्रौपदी का भरी सभा में अपमान क्यों देखते? अज्ञात...
- बिजली क्या है?... ताप का ही एक रूप है। शरीर में तभी तक जीवन है जब तक उसका तापमान नियत मात्रा में बना रहे, उसके गिरने प...
- बिना उत्थान प्रयासों के कुसंस्कारी निकृष्टता कैसे घटे?... उत्थान का सम्बल कहाँ से मिले? इन प्रश्नों का उत्तर एक ही निकाला गया-तीर्थ यात्रा का प्रचलन।व्यक्तिगत...
- बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है या वृक्ष से बीज?... इस विवाद का समाधान कठिन है। एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए रहकर ही समाधान मिल सकता है। श...
- बुद्धिमत्ता, चतुरता की तुलना में यह कसौटी उपयुक्त है कि दूरदर्शिता, न्याय और औचित्य कहाँ है?... कुछ कार्य ऐसे होते हैं, जो तात्कालिक लाभ की दृष्टि से, मित्र-कुटुम्बियों सम्बन्धियों की पसन्दगी की ...
- बुद्धिमानी से पर्यवेक्षण करना होगा कि भेड़ और रीछ द्वारा अपनाई गई भिन्न-भिन्न नीतियों को अपनाकर किसे क्या मिला?... रीछ बदनाम तो है ही, उसे स्नेह सहयोग कौन देगा? इतना ही नहीं प्रकृति ने उसके बाल बढ़ाए भी नहीं। जितने आ...
- भगवान ने ऐसा पक्षपात क्यों किया कि अन्य प्राणी जिन सुविधाओं से वंचित रहे उन्हें मात्र मनुष्य को दिया गया?... मोटी दृष्टि से यह अन्याय या पक्षपात समझा जा सकता है किन्तु वास्तविकता कुछ दूसरी ही है। जीवों में से ...
- भगवान भी यदि ऐसा करेंगे, सिद्ध पुरुष भी यदि इतने ओछे सिद्ध होंगे, तो फिर न्याय-नीति की रक्षा कौन करेगा?... औचित्य को संरक्षण कहाँ मिलेगा? यदि रिश्वत और चापलूसी भगवान को भी वशवर्ती कर सकती है; न्याय की, पात्र...
- भला अपनी बेटी को कोई किसी कुपात्र के हाथों कैसे सौंप देगा?... किसी के हाथ अपने कारखाने की अर्थव्यवस्था क्यों कर सुपुर्द करेगा?
बादल सर्वत्र बरसते हैं पर उस पा...
- भली या बुरी राह अपनाने के लिए सरकार किस-किस को कन्धे पर बिठाये फिरती है?... स्वच्छता, आजीविका, प्रजनन, रुझान, स्वभाव, अभ्यास मनुष्य की अपनी मर्जी पर निर्धारित रहते हैं। इन्हीं ...
- भले ही उसकी परिणति अन्ततः कितनी ही भयानक क्यों न हो?... सभी जानते हैं कि इन दिनों मँहगाई का समय है। ९९ प्रतिशत लोगों को रोज कुआँ खोदना और रोज पानी-पीना है। ...
- भव बन्धनों के कुचक्र से निवृत्ति, पूर्णता की प्राप्ति, स्वर्ग और मुक्ति की उपलब्धि, सिद्धियों की विभूति, आत्मा और परमात्मा की एकता, जैसी महान सफलताएँ इस एक ही तथ्य पर निर्भर हैं कि यथार्थता को हृदयंगम करना सम्भव हो सका या नहीं?... कहने सुनने को तो आदर्शवादी बकवास आये दिन चलती रहती है, पर वस्तुतः उसमें कुछ सार नहीं। अध्यात्म का ला...
- भारत से अंग्रेजों का चला जाना भी कुछ ऐसा ही चमत्कारी है, जिसके सम्बन्ध में न केवल सत्याग्रही वरन् क्रान्तिकारी भी समय आ धमकने से पूर्व यह नहीं सोच पाये कि इतनी जल्दी इतना महान् परिवर्तन कैसे होने जा रहा है?... अंग्रेजों की शक्ति और कूटनीति, स्वतन्त्रता सैनिकों की स्वल्प संख्या और शक्ति दोनों के बीच कोई ऐसी सं...
- भावी पीढ़ी समुन्नत स्तर की कैसे बने?...
--पं. श्रीराम शर्मा आचार्यसामान्यतया यह समझा जाता है कि मनुष्य के शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ होने म...
- भीरुता के असमंजस में खड़े हुए लोगों को मार्गदर्शन कराने के लिए अग्रिम पंक्ति में चले कौन?... इन प्रश्नों का उत्तर जाग्रत आत्माओं की प्रखरता के अतिरिक्त अन्य कहीं से मिलता नहीं है।...
- भीड़ में स्वतन्त्र चिन्तन और विवेक पूर्ण निर्धारण की क्षमता कहाँ?... यहाँ तो अन्धों के पीछे अन्धों के चलते रहने की परम्परा है। भ्रष्टाचार इसी आधार पर पनपा है। दुष्प्रवृत...
- मछलियों में पारे का अंश कहाँ से आया?... अधिक बारीकी से पता लगाया गया तो मालूम हुआ कि उस झील के किनारे लगे हुए कारखानों से जो औद्योगिक रसायन ...
- मथानी को गरदन तक भर दिया गया हो तो बिलोने पर जो उथल-पुथल होती है उसके लिए स्थान कैसे मिले?... पेट के खाली रहने पर ही पाचन की गुंजायश रहती है। सीमित रस-स्राव होने पर सीमित मात्रा का आहार ही पचता ...
- मनुष्य की बुद्धि उन मान्यताओं को अपनाकर किस सीमा तक अनाचरण पर उतर सकती है?... इसकी आज तो एक झाँकी भर मिल रही है। वह दिन दूर नहीं जब इस अभिनव प्रतिपादन के परिपूर्ण में रूप होने पर...
- मनोयोग जुड़े कैसे?... श्रम संलग्नता बने कैसे? इन समस्याओं का समाधान एक ही है कि जिन ललक लिप्साओं में इतने दिनों अपनी क्षमत...
- मरने से डरना क्या?......
- माँसाहार के पक्ष में यही दलील है कि स्वादिष्ट भोजन के अपने लाभ के लिए दूसरे को प्राण देने का भय सहना पड़ता है तो उसकी हम चिन्ता क्यों करें?... स्वार्थ प्रधान हो गया तो दूसरों की सुविधा-असुविधा अथवा न्याय-अन्याय की बात क्यों सोची जायेगी?
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- मानवी चेतना पर अवतरित होने वाली अद्भुत जानकारियों का स्रोत कहाँ है?... वे किस आधार पर घटित होती हैं? वे अनायास ही-व्यक्ति विशेष पर ही घटित होती हैं, या प्रयत्नपूर्वक वैसी ...
- मार्ग पर उत्साह, पुरुषार्थ सहित चला गया या नहीं?... इसी चयन, निर्धारण पर उत्थान-पतन की आधारशिला रखी जाती है। मनुष्य अपने भाग्य का स्वयं निर्माता है। अवा...
- मिष्ठान्न क्या लिया जाय?... उसे बनाने में क्या पदार्थ लिए जाएँ? यह भी यज्ञीय विधान का एक अंग है। शक्कर, चीनी, मिश्री, मिठाई आद...
- मुर्गी में से अण्डा, या अण्डे में से मुर्गी?... बीज में से वृक्ष अथवा वृक्ष में से बीज की तरह है। यह प्रश्न भी है कि व्यक्तियों से समाज अथवा समाज से...
- मुर्गी से अण्डा होता है या अण्डे से मुर्गी?... बीज से वृक्ष उत्पन्न होता है या वृक्ष से बीज? इस विवाद का समाधान कठिन है। एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न...
- मृतक के निर्जीव काय कलेवर से किसी को क्या कुछ मिल सकेगा?... इसी प्रकार भाव-श्रद्धा से रहित पूजा को परिश्रम से इतना ही लाभ हो सकता है कि वह समय किसी दुष्कर्म में...
- मृत्यु का साक्षात्कार क्यों न किया जाय?... वह उठा और चल पड़ा। निरन्तर चलता रहा। मित्रों ने अस्वस्थता की याद दिलायी तथा विश्राम के लिए सलाह दी। उ...
- यदि अन्तर है तो वह कहाँ है कितना है?... इस अन्तर को दूर रखने के लिये जो किया जाना चाहिए वह किया जा रहा है या नहीं? यदि नहीं तो क्यों?यह प्रश...
- यदि आत्मा और ईश्वर कोई है ही नहीं, कर्मफल देने की कोई अज्ञात व्यवस्था है ही नहीं, तो फिर पाप प्रवृत्तियों को अपनाकर शौक-मौज के साधन जुटाने से कोई चूके क्यों?... आज यही विचार बुद्धिजीवी पीढ़ी के मस्तिष्क में घूम रहे हैं और उसका नैतिक स्तर दिन-दिन दुर्बल होता चला ...
- यदि आरम्भ में ही दृष्टिकोण संभाल कर रखा जाय और उन्हें रोक-थाम कर बलिष्ठता अर्जित की जाती रहें, तो दुर्बलता और रुग्णता का अभिशाप क्यों सहना पड़े?... तृष्णा में लालच के वशीभूत होकर मन अधिकाधिक वैभव संचित करने के लिए ललचाता है, फलतः अनीति अपनाने, कु...
- यदि ऐसा न हो तो सैनिक समय पर युद्ध कौशल कैसे प्रकट कर सकें?... असली शत्रु हमारे दोष दुर्गुण हैं। यह छिपे हुए शत्रु अत्यधिक भयंकर और प्रबल है। उन्हें जीत लिया जाय त...
- यदि ऐसा न होता तो उज्ज्वल भविष्य की जो किरणें हर किसी को आश्वस्त कर रही हैं, उनका आलोक किस प्रकार दृष्टिगोचर होता?... पर अब खोजने के लिए पंचवटी से लेकर रामेश्वर की यात्रा पूरी हो चुकी। रास्ता नापने का, ठहरने और भोजन का...
- यदि ऐसा न होता तो भावना के खदान में से ही नर रत्न निकलने का तथ्य कैसे मूर्तिमान रहता?... ऐतिहासिक महापुरुषों में से प्रत्येक अनिवार्य रूप से भावनाशील रहा है। उसके अन्तःकरण में उच्चस्तरीय आक...
- यदि ऐसा न होता तो भावना के खदान में से ही नर रत्न महामानव उपलब्ध होने का तथ्य कैसे मूर्तिमान रहता?... ऐतिहासिक महापुरुषों में से प्रत्येक अनिवार्य रूप से भावनाशील रहा है। उसके अन्तःकरण में उच्चस्तरीय आक...
- यदि जन्म कुण्डली के आधार पर किसी का भविष्य निश्चित हुआ करे तो फिर कर्म का, पुरुषार्थ का क्या महत्त्व रहेगा?... यदि कुण्डली के ग्रह अच्छे हैं, तो आलसी, प्रमादी, दुर्गुणी रहने पर भी भविष्य उत्तम रहेगा और यदि ग्रह...
- यदि नहीं तो क्यों?... यह प्रश्न ऐसे है जिन्हें अपने आप से गम्भीरता पूर्वक पूछा जाना चाहिए और जहाँ सुधार की आवश्यकता हो उसक...
- यदि यह संकोचशीलता न तोड़ी जाती तो यौन रोगों के चिकित्सक कहाँ से आते?... प्रसव सहायता और गर्भाशयों की शल्य क्रिया कैसे सम्भव होती? संकोच वहाँ उचित है जहाँ कुत्साएँ भड़कने की ...
- यदि रही भी तो एजेन्ट लोगों के घर में गया माल उन मृतात्माओं के पास कैसे पहुँच जायेगा?... हर मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। अपना पराक्रम, पुरुषार्थ जिस भी दिशा में लगाता है, उसी दिशा...
- यदि रिश्वत और चापलूसी भगवान को भी वशवर्ती कर सकती है; न्याय की, पात्रता की उपेक्षा करके यदि व्यक्तिगत कृपा-अकृपा का सिलसिला चल पड़े, तो फिर सामान्य लोगों को रिश्वत, खुशामद, भाई-भतीजावाद, पक्षपात जैसे अमान्य आधारों से विरत करने की बात कैसे बनेगी?... सामान्य निर्धारण है-उचित मूल्य चुकाकर उचित उपलब्धियाँ प्राप्त करना। यदि आधार उच्चस्तरीय सत्ताओं ने ह...
- यदि वह अनाकर्षक, असुन्दर, अनुपयोगी रहा होता तो चेतन को उसके प्रति रुचि ही क्या होती और क्यों होती?... सत् और तम का संयोग यथावत रहे, इसी दृष्टि से नियति ने दोनों को परस्पर जोड़ दिया है। प्राणी का शरीर जड़ ...
- यदि वह मिली होती तो निश्चय ही औचित्य को प्रश्रय दिया गया होता और तथाकथित मित्र-परिचित क्या कहते है?... इसकी पूर्ण उपेक्षा करके विवेक के प्रकाश में कदम बढ़ाने का साहस संजोया होता। महामानव इसी सत्साहस के बल...
- यदि वे इतने ही समर्थ थे तो अपने स्वामी सुग्रीव को बालि के त्रास से क्यों न छुड़ा सके?... अर्जुन यदि सचमुच ही महाबली थे तो द्रौपदी का भरी सभा में अपमान क्यों होने देते? अज्ञातवास के दिनों जि...
- यदि सभी को सही या गलत माना जाय, तो फिर अपने एक वोट को किसके पक्ष में डाला जाय?... लोगों की अपनी-अपनी मान्यताएँ पूर्व प्रथा प्रचलनों के सम्पर्क में रहने से अथवा इन दिनों अपने पास-पड़...
- यदि साँस लेने से जीवन का सम्बन्ध नहीं है, तो उसे प्राण के अर्थ में क्यों प्रयुक्त किया जाता है और प्राण को जीवन का पर्यायवाची क्यों माना जाता है?... बात यह है कि हवा मोटे तौर से एक पदार्थ प्रतीत होती है पर उसकी भीतरी परतों में और भी महत्त्वपूर्ण वस्...
- यदि हांडी खचाखच भरी हो तो पकने की प्रक्रिया कैसे पूरी हो?... मथानी को गरदन तक भर दिया गया हो तो बिलोने पर जो उथल-पुथल होती है उसके लिए स्थान कैसे मिले?
पेट के ख...
- यह कैसा नव निर्माण?... यह कैसा प्रभु अवतरण? इस असमंजस का समाधान प्राप्त करने के लिए दर्द पीड़ित रोगी के लिए डॉक्टर द्वारा क...
- यह अनचाही विसंगतियाँ उपजती क्यों हैं?... इनका उद्गम या सूत्र संचालन होता कहाँ से है? इस सम्बन्ध में अधिक जानने की जिज्ञासा स्वाभाविक है। समाध...
- यह अलग बात है कि उसे उभारने वालों की अग्रिम पंक्ति में कौन था, नेतृत्व किसने किया और श्रेय किसे मिला?... यह आवश्यकता अनुभव हुई कि प्रतिगामी परिस्थितियों को बदला जाय। भारत के प्राचीन वर्चस्व और कर्तृत्व क...
- यह कहाँ से जुटे?... स्पष्ट है कि इसकी पूँजी जागृत आत्माओं द्वारा की गई बचत कटौती से ही बन पड़ेगी। शिक्षा, साहित्य, कला, स...
- यह कैसा प्रभु अवतरण?... इस असमंजस का समाधान प्राप्त करने के लिए दर्द पीड़ित रोगी के लिए डॉक्टर द्वारा की गई आपरेशन व्यवस्था ...
- यह क्योंकर बन गयी?... इसका उत्तर लीवर गिराकर पटरियाँ जोड़ने वाला प्वाइंटमैन हर किसी को आसानी से समझा सकता है कि एक समय के उ...
- यह खाई रावण, कंस, हिरण्यकश्यपु, सिकन्दर, नेपोलियन जैसे महाप्रतापियों से नहीं पटी तो बेचारे क्षुद्रजनों से उसे पूरा करना और व्यस्तता से छुटकारा पा सकना सम्भव ही कैसे हो सकता है?... निर्वाह की गुत्थी सुलझाने के ऐसे उपाय हैं। परिवार को सुसंस्कारी बनाने भर की आवश्यकता हो तो इसके ९९९ ...
- यह गुड़ गोबर किस कारण हुआ?... धर्म की आत्मा अपने स्थान से क्यों पदच्युत हुई और उसके स्थान पर अवांछनीयता कैसे आ विराजी? लोगों ने धर...
- यह घृणित जीवन नरक नहीं है तो और क्या है?... सेवाभावी, सद्गुणी, सन्त सज्जन धरती के देवता समझे जाते हैं और मरने के बाद भी वन्दनीय, श्रद्धास्पद ही ...
- यह दुखदाई दुर्भाग्य क्यों कर आँखों के सामने खड़ा रहता है?... यह हटाए क्यों नहीं हटता? श्रेय सौभाग्य से व्यक्ति, ईश्वर, समाज सबको क्यों वंचित रह जाना पड़ता है? ऐत...
- यह दुर्घटना क्यों होती है?... यह दुखदाई दुर्भाग्य क्यों कर आँखों के सामने खड़ा रहता है? यह हटाए क्यों नहीं हटता? श्रेय सौभाग्य से...
- यह नहीं बताया जाता कि अकारण क्यों तो यह ग्रह नक्षत्र उलटे सीधे पड़ते हैं?... और क्या कारण है कि पण्डितों को दक्षिणा देने पर वे शान्त हो जाते है। पण्डितों की और ग्रह-नक्षत्रों का...
- यह पता लग सकता है कि वह किस प्रवाह में बह रहा है, इस आधार पर उसका भविष्य क्या बन सकता है और अशुभ की रोकथाम तथा शुभ की सम्भावना को फलित करने के लिए क्या किया जा सकता है?... इतने पर भी यह नहीं मान बैठना चाहिए कि स्वप्नों में भूतकाल के संचय एवं वर्तमान के पर्यवेक्षण के अतिरि...
- यह प्रश्न भी है कि व्यक्तियों से समाज अथवा समाज से व्यक्ति?... वस्तुतः दोनों इतने अविच्छिन्न है कि उन्हें पृथक किया ही नहीं जा सकता है। अच्छे व्यक्तियों की आवश्यकत...
- यह बात देखने योग्य है कि परिवार पालने वाले इतना भी आखिर पाते क्या हैं?... उनके उस खेत से क्या फसल उगी और उससे किसका हित सधा यह विचारने ही योग्य है। इस तथ्य पर आरम्भ से अन्त त...
- यह सब क्या है?... निश्चित रूप से यह उस व्यक्ति की स्वसम्वेदना ही है जो विधेयक बनकर सामने आई और उत्साह प्रदान करके सरल स...
- यह सब क्या है?... उसकी व्याख्या पिछले दिनों तो नहीं हो सकी थी पर अब इस खोज से यह पता लगता है कि पाये जाने वाले रसायनों...
- यह सब यदि अंग्रेजी शासन काल में हुआ होता तो भी यह सोचकर सन्तोष किया जा सकता था कि मजबूरी है क्या किया जाय?... शोचनीय तो यह है कि आज जबकि अपने निर्माण का अधिकार हमें स्वयं ही मिला हुआ है तब भी हम स्वयं को हीन सम...
- यह सब होता कैसे है?... इसका इतिहास एक ही है-दुर्गुणों की उपेक्षा। उनकी हानि पर ध्यान न देना और विष-बेल के उगते ही उसके उन्म...
- यह स्रष्टा की क्षमता न सही, प्रतिद्वन्द्विता तो हो गई न?... मानवी गरिमा की प्रशंसा में एक और उदाहरण शासन तन्त्र खड़ा करने का है। अस्त-व्यस्तता को व्यवस्था में बद...
- यह हटाए क्यों नहीं हटता?... श्रेय सौभाग्य से व्यक्ति, ईश्वर, समाज सबको क्यों वंचित रह जाना पड़ता है? ऐतिहासिक भूमिका निभा सकने ...
- यहाँ कौन किसका बड़प्पन मानता है?... अपनी चिन्ता, समस्याओं से फुरसत नहीं फिर कौन किसका दर्प देखे और किसलिए, किस-किस समय किसी को सराहें? अ...
- यही बात मनुष्यों के सम्बन्ध में भी है, उनकी शारीरिक माँग और पाचन की स्थिति देखते हुए निर्णय करना पड़ता है कि कौन क्या खाये?... कितना खाये?
यहाँ विचारणीय विषय यह है कि मनुष्य के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तन्त्र मनःसंस्थान को प्रभाव...
- या दूसरे बच्चे जेब खर्च करेंगे तो वह क्या उनका मुँह ताकेगा?... इस प्रकार भविष्य भाव से वे उसे जेब खर्च के नाम पर कुछ फिजूल खर्च अवश्य देते हैं।इतने पर भी वह बहुत क...
- युग कैसा है?... कैसा होगा? इन प्रश्नों का उत्तर यह पर्यवेक्षण करके दिया जा सकता है कि लोग क्या कर रहे है और क्या कर...
- युग धर्म को समझने वाले आनन्द मठ जैसे संन्यासी कहाँ मिलते हैं?... गरीबों, पिछड़ों का दुःख दर्द समझने तथा घर-घर जाकर भूदान यज्ञ की ज्योति जलाने वाले विनोबा अब चिराग लेक...
- रक्त में विषाक्तता भरी रहे तो फुन्सियों पर मरहम लगाने भर से क्या बात बने?... एक सुधार पूरा होने से पूर्व ही सौ नये बिगाड़ उठे तो चिरस्थायी सुधार की सम्भावना नहीं रहेगी।अपने समय की...
- रात्रि के अन्धकार की व्यापकता कैसे मिटे?... चन्द्रमा के निकट चाँदनी माँगने निशा कैसे पहुँचे। चन्द्रमा स्वयं ही परिभ्रमण करते हुए रात्रि की तमिस्...
- राष्ट्र कल्याण के लिए अपने स्वार्थों के ऊपर कितना अंकुश लगाते हैं?... इत्यादि प्रश्नों के उत्तर पर गहराई से विचार करते समय अपने आप समझ जायेंगे कि स्वतन्त्रता के उत्तरदायि...
- राष्ट्रीय सम्पत्ति के सदुपयोग का कितना ध्यान रखते हैं?... राष्ट्र कल्याण के लिए अपने स्वार्थों के ऊपर कितना अंकुश लगाते हैं? इत्यादि प्रश्नों के उत्तर पर गहरा...
- रीछ बदनाम तो है ही, उसे स्नेह सहयोग कौन देगा?... इतना ही नहीं प्रकृति ने उसके बाल बढ़ाए भी नहीं। जितने आरम्भ में थे उतने ही अन्त तक बने रहे। जबकि भेड़ ...
- लकड़ी के शस्त्र कहाँ काम देते हैं, खोटे सिक्कों से व्यापार कहाँ होता है?... जिनसे महानता के रूप में परिणत होने वाली पात्रता के तत्व विद्यमान हैं, उन का संकलन संगठन युग-निर्माण ...
- लद पड़ा क्यों कर?... इन अनबूझ पहेलियों को सुलझाते-सुलझाते, ओर छोर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ पहुँचना पड़ता है, जहाँ विडम्बना के उद...
- लेकिन आज हम स्त्रियों को वेद मन्त्रों से दूर रखने की चेष्टा करते हैं यह कितनी विडम्बना है?... हमें भगवान के नियम का उल्लंघन नहीं करना है और नारी वर्ग को समान अधिकार प्रदान कर साथ-साथ चलने को बाध...
- लोगों ने धर्मश्रद्धा के आवेग में अधार्मिकता को कैसे गले बाँध लिया?... इस इतिहास की शृंखला को समझना ही पड़ेगा भले ही वह कितना ही कष्टकर, अप्रिय एवं अरुचिकर क्यों न हो?मवाद ...
- वरन् यह भी परखें कि किसने कहा?... गाँधी, विनोबा आदि के कथनों और मार्ग दर्शनों को लाखों ने सच्चे मन से अपनाया और उसके हेतु बढ़-चढ़कर त्...
- वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता कहाँ निभी?... यदि कलह और विद्वेष की आग में जलते मरते अपना अस्तित्व मिटाना है, तो बात दूसरी है, अन्यथा समता और एक...
- वह अपना भाई है उसके साथ राम-भरत जैसे मधुर सम्बन्ध बनाने चाहिए, रावण-विभीषण की तरह, सुन्द-उपसुन्द की तरह परस्पर द्रोही विद्रोही बनकर रहने में क्या आनन्द?... मन ने यदि साथ दिया होता तो शरीर की ऐसी दुर्गति न होती जैसी आज है। उसने काया को स्वस्थ और समर्थ रखन...
- वह न मिले तो अकेले अफसर ही सारा काम कहाँ कर सकेंगे?... बढ़ती हुई सामयिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए जागृत जनमानस को अपनी भूमिका निभानी चाहिए और जनशक्ति को उस ...
- विकास का लक्ष्य रखने वाले द्वारा अपनाई गई यह विनाश लीला क्यों है?... जब उगाना ही अभीष्ट है तो उखाड़ने का क्या काम? सरकार के द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, उत्पादन, सि...
- विचार कीजिए कि इसका कारण क्या है?... जो आदमी सबको कुरूप और गन्दा लगता है, वह एक स्त्री को इतना प्रिय क्यों लगता है? इसका कारण है-प्रेम।...
- विचारा जाय कि चौरासी चक्र से छूटने के, पूर्णता तक पहुँचने के, ईश्वर के साथ अनन्य होने के इस स्वर्ण सुयोग को आगे भी इसी तरह नष्ट करते रहना उचित है जैसा कि अब तक किया जाता रहा?... लोग क्या कहते और क्या करते हैं इसे देखने, सुनने और उन्हीं का अनुकरण करने से तो एक के पीछे एक-एक करके...
- विज्ञान ने जब मनुष्य को एक पेड़ पौधा मात्र बनाकर रख दिया और उसके भीतर किसी आत्मा को मानने से इनकार कर दिया, ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकृत किया, इस सृष्टि को सब कुछ अणुओं की स्वाभाविक गतिविधि के आधार पर स्वसंचालित बताया, तो स्वभावतः विज्ञान को प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर अति प्रामाणिक मानने वाली बुद्धिवादी नई पीढ़ी उसी मान्यता को शिरोधार्य क्यों न करेगी?... प्रत्यक्ष है कि विचारशील वर्ग अनास्थावान् होता चला जा रहा है और यह एक भयानक परिस्थिति है, क्योंकि बु...
- विधि का विधान, भाग्य का निर्धारण यदि पूर्व निश्चित ही है तो फिर उसी की प्रतीक्षा में बैठे रहना कोई बुद्धिमानी है?... तब विविध-विधि दौड़-धूप करने की आवश्यकता क्या रहीं? ऐसी दशा में मनुष्य मात्र भाग्य की कठपुतली बन जाता ...
- विनोद के कितने ही साधन जुटाये जाते हैं?... पौष्टिक आहार लेने का भी ध्यान रहता है। इन सब बातों को देखते हुए यह कैसे कहा जाय कि अपनी काया के प्रत...
- विलासिता में हानि और महानता में लाभ समझने की बात हाँ हाँ करने से कहाँ बनती है?... उसके लिए प्रत्यक्ष प्रमाण इसी रूप में प्रस्तुत करना होगा कि लोभ मोह पर किस सीमा तक अंकुश लगा और उस ब...
- विवाह शादियाँ सरकार थोड़े ही करती है?... भली या बुरी राह अपनाने के लिए सरकार किस-किस को कन्धे पर बिठाये फिरती है? स्वच्छता, आजीविका, प्रजनन, र...
- विशाल परिवार की आचार संहिता क्या हो, उसकी अर्थ व्यवस्था किस प्रकार चले, पारस्परिक सम्बन्धितों का निर्धारण किस रीति-नीति के आधार पर विनिर्मित हो?... यही चिन्तन उस स्थापना के पीछे काम करता रहा और योजनाएँ बनती रहीं। गली, मुहल्लों और गाँवों में उसका ...
- विशेषकर भू-मण्डल के लिए ही क्यों?... उत्तर एवं समाधान के लिए डेविड थामस जैसे अनेकों मूर्धन्य वैज्ञानिकों की भाँति सोचना होगा कि यह समूची ...
- विशेषतया मनुष्य क्या है?... इस प्रश्न पर प्रस्तुत वैज्ञानिक दृष्टिकोण की मार्मिक समीक्षा की है।...
- विश्व को अगले ही दिनों एक सार्वभौम सर्वजनीन संस्कृति की आवश्यकता पड़ेगी, वह प्रयोजन इससे सधेगा या नहीं?... मानवीय विकास अब एकता की आवश्यकता अनुभव कर रहा है। एक विश्व भाषा, एक विश्व धर्म, एक विश्व संस्कृति,...
- विश्व परिवार की ओर से कब तक आँखें बन्द कराये रहेगा?... मन तू शरीर का मित्र बना और आत्मा का शत्रु। शरीर को ठाठ-बाट जुटाने में, बड़प्पन दिलाने में, सत्ताधार...
- विषपान करने वाले का प्राण कैसे बचे?... घड़े भर मदिरा पी जाने पर सन्तुलन कैसे निभे? मनःस्थिति में विकृतियाँ भरी नहीं कि परिस्थितियाँ संकटाप...
- विषैले रक्त के कारण उत्पन्न होने वाले फोड़े फुन्सियों का निराकरण मात्र मरहम लगाने के ऊपरी उपचार से कैसे सम्भव हो?... उपाय गहराई में उतर कर करना होता है।इन दिनों अधिकांश शारीरिक मानसिक रोग अन्तःक्षेत्र में जमी हुई, कुक...
- वे अनायास ही-व्यक्ति विशेष पर ही घटित होती हैं, या प्रयत्नपूर्वक वैसी स्थिति पैदा की जा सकती है?... यह ऐसे ही अनेक प्रश्नों की शृंखलाएँ सामने प्रस्तुत हैं जिनके समाधान खोजने के लिए परा-मनोविज्ञान क्षे...
- वे उसका करते क्या हैं?... अपने और अपने परिवार के लिए स्वादिष्ट भोजनों की भरमार करके सबका पेट खराब करते हैं। श्रम से बचने और आर...
- वे किस आधार पर घटित होती हैं?... वे अनायास ही-व्यक्ति विशेष पर ही घटित होती हैं, या प्रयत्नपूर्वक वैसी स्थिति पैदा की जा सकती है? यह ...
- वे बच्चे के निराहार की कल्पना से त्रस्त हो उठेंगे और खाना न सही खाने की बातें करके ही अपना और सबका मन बहलायेंगे, क्या तुम्हें भूख तो नहीं लगी मुन्ने?... जरूर लगी होगी। कल डाक्टर साहब से जरूर खाने के लिए कहेंगे आज और धीरज रखो कल फिर खूब अच्छी अच्छी यह ची...
- वे बच्चों को स्वयं बाजार ले जाते हैं और अच्छे से अच्छे कपड़े खुद उनसे पसन्द करा कर खरीदते हैं, फिर वे चाहे कितनी ही कीमती, कमजोर और अनुपयोगी क्यों न हो?... अभिभावकों की इस दुर्बलता से दुकानदार खूब लाभ उठाते हैं। वे बच्चों की पसन्द के कपड़ों का अच्छा खासा मू...
- वे विज्ञान से पूछते हैं-क्या मनुष्य ब्रह्माण्ड की कुछ धूलि का ताप और रासायनिक घटकों की औंधी सीधी क्रिया-प्रक्रिया मात्र है?... क्या वह प्रकृति की किसी अनिच्छित क्रिया के अवशेष उच्छिष्ट से बना खिलौना मात्र है? क्या मानव जीवन वस्...
- वैसा अपने लिए क्यों नहीं हो सकता?... जो काम एक कर सका उसे दूसरा क्यों नहीं कर सकता? इस प्रकार के विधेयक विचारों का सिलसिला यदि मनःक्षेत्र...
- व्यक्तित्व को पवित्र प्रखर बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों को कैसे अपनाया जाय?... वर्तमान स्थिति को देखते हुए इस सन्दर्भ में नया कदम उठाया जाय। इसका निर्धारण ही नहीं, उसे अपनाने का त...
- व्यवहार का आश्रय पाये बिना भावना की बेल ऊँची कैसे चढ़े?... परिवार निर्माण में उस आचार संहिता को भी महत्त्व और प्रश्रय देना होगा जो भावनाओं के अनाचार को रोकती ह...
- व्यापक जानकारियों के सहारे बुद्धि को यह सोच सकने का अवसर मिलता है कि क्या सोचना, करना और बनना उचित है?... कूपमण्डूक और गूलर के भुनगे की दुनियाँ बहुत छोटी होती है। वे सोचते हैं, यह संसार इतना ही बड़ा है, ...
- शत्रुओं से वे तब क्यों न निपट लेते?... यह भगवान की इच्छा में अपनी इच्छा मिलाने का ही प्रतिफल है, कि उपरोक्त दोनों भक्तजनों को अपने-अपने समय...
- शरीर के बिना आत्मा का अस्तित्व कैसे प्रकट हो?... व्यवहार का आश्रय पाये बिना भावना की बेल ऊँची कैसे चढ़े?परिवार निर्माण में उस आचार संहिता को भी महत्त्...
- शरीर के साथ शत्रुता निबाही जाय, उसे तोड़-फोड़कर बर्बाद किया जाय ऐसा भी किसी का मन नहीं दीखता, यदि ऐसी बात रही होती तो उसे वस्त्र-आभूषणों से, श्रृंगार प्रसाधनों से क्यों सजाया जाता?... केश-विन्यास बनाने जैसे अनेकों कामों मेंं कितना समय लगता है? सजधज में कितना धन व्यय होता है? वाहनों, ...
- शरीर शास्त्रियों को वे सूत्र पकड़ में नहीं आ रहे हैं कि शरीर के किसी स्थान विशेष की कोशिकाएँ क्यों बागी हो जाती हैं?... क्यों अपना सामान्य क्रम छोड़ बैठती हैं? उन्हें कैसे इस असामान्य व्यवहार से रोका जा सकता है? लम्बी माथ...
- शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य साधने और इस संचय को कलात्मक एवं भावनात्मक दिव्य प्रयोजनों में लगाकर मनुष्य क्या नहीं बन सकता?... कामकेन्द्र का यह अद्भुत चमत्कार है कि वहाँ से नये मनुष्य जन्म का अवतरण सम्भव होता है। प्राणियों का उ...
- शास्त्रीय प्रतिपादनों के आधार पर यह खोजा जा रहा है-क्या अग्निहोत्र का उपयोग आधि व्याधियों का निवारण कर सकने वाली चिकित्सा पद्धति के रूप में हो सकता है?... आशा बँध चली है कि अग्निहोत्र चिकित्सा जब अपने समग्र रूप में प्रस्तुत होगी, तो उसका महत्त्व वर्तमान क...
- शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, संचार, शिल्प, विज्ञान कला जैसे प्रसंगों से नर वानरों का भला क्या सम्बन्ध रहा होगा?... यह मानवी सूझ-बूझ ही है कि उसने परिवार संस्थान, समाज और शासन का ढाँचा खड़ा कर दिया। नीति, दर्शन, आचर...
- शिक्षित होने के बाद भी कोई यदि संकीर्ण स्वार्थों की परिधि में रह जाता है, तो उसमें और किसी प्रकार मेहनत मजदूरी से पेट भरने वाले अशिक्षितों में क्या अन्तर रहा?... कहना न होगा उपरोक्त लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए प्रचलित शिक्षण प्रणाली में आवश्यक हेर-फेर अभीष्ट है।...
- शुद्ध लोहा गोदाम में भरा रह सकता है, पर उससे तलवार कैसे बने?... ढलाई से इन्कार किया जाय तो लोहा लगभग इसी स्तर पर किसी गोदाम में पड़ा रहेगा, जिस पर कि मिट्टी में मिली...
- शैव, शाक्त, वैष्णव, रामानन्द, कृष्ण उपासक आदि देवताओं के नाम पर, क्षेत्रों और परम्पराओं के नाम पर इनके इतने विभाजन हैं कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है कि इतने विभेदों से भरे समुदाय को एक कैसे कहा जाय?... न केवल हिन्दुओं में वरन् मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध आदि में भी कई-कई भेद-उपभेद वाले सम्प्रदायों की भरमार ह...
- श्रम संलग्नता बने कैसे?... इन समस्याओं का समाधान एक ही है कि जिन ललक लिप्साओं में इतने दिनों अपनी क्षमताएँ संलग्न रही हैं, उन्ह...
- श्रेय सौभाग्य से व्यक्ति, ईश्वर, समाज सबको क्यों वंचित रह जाना पड़ता है?... ऐतिहासिक भूमिका निभा सकने में सर्व समर्थ प्रतिभाएँ क्यों पछताते रहने और पछताते रखने की स्थिति में ...
- सच्चा ईश्वरभक्त, सच्चा अध्यात्मवादी, सच्चा मनुष्य कैसे कहलाये?... और उस जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए त्याग बलिदान की सेवा साधना में संलग्न होने के लिए कितना...
- सजधज में कितना धन व्यय होता है?... वाहनों, सेवकों द्वारा उसके लिए कितनी सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं। विनोद के कितने ही साधन जुटाये जाते...
- सद्गति और दुर्गति का कोई माध्यम न हो तो फिर शुभ कर्म और अशुभ कर्म करने वालों को तदनुरूप प्रतिफल कैसे मिलेगा?... आदि अनेक प्रश्न उभर कर आते है और यह असमंजस उत्पन्न करते हैं कि यदि स्वर्ग-नरक का अस्तित्व था ही नहीं...
- सपनों की सीमा कैसे बाँधे?... प्रेमोन्माद भी लगभग ऐसा ही होता है। बेल मगरे तो चढ़ती नहीं, चढ़ती है तो एक ही झोंके में लुढ़ककर छितराती...
- सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं की विडम्बना हटती क्यों नहीं, घटती क्यों नहीं, मिटती क्यों नहीं?... इस अनबूझ पहेली का उत्तर खोजने पर भी कोई दे नहीं पा रहा है। फुरसत न मिलने, व्यस्तता रहने, परिस्थितिया...
- सब कुछ नया ही नया हो यह कैसे सम्भव है?... इसी प्रकार जो रूठ जाय उससे खुद भी रूठ बैठे तो घर परिवार का चलाना कठिन है। कभी पत्नी से अनबन हो जात...
- समस्या किसी धर्म स्थापना का उन्मूलन, अवसाद होने या उसके उन्नयन उत्कर्ष की नहीं, वरन् यह है कि मानवी गरिमा के परिपोषक तीर्थ तन्त्र को जीवन्त रखा जाय अथवा उपेक्षा अवमानना के आघात सह सहकर अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिया जाय?... यदि तीर्थ तत्व की उपयोगिता समझी जा सके तो उसे रुग्ण, विकृत एवं अर्ध मूर्च्छित स्थिति से उबारना भी आव...
- समुन्नत और पतित व्यक्तियों में एक जैसे साधन रहते हुए भी अन्तर क्यों आया?... इसका कारण ढूँढना हो तो उनकी आस्थाओं में अन्तर रहना ही प्रधान निमित्त परिलक्षित होगा। धन-वैभव की दृष्...
- सरकारी नौकरी तो जागीर है, उसे पाकर भी पंखा और मेज कुर्सी छोड़नी पड़ी तो फिर बात ही क्या रही?... नौकरी करने का लाभ ही क्या रहा? इस मनोवृत्ति के रहते सरकार भी कुछ कर नहीं सकती। लोक निन्दा से बचने के...
- साथ-साथ क्यों नहीं चलती रहीं?... इसका एक ही उत्तर है उनकी दिशा बदल गयी। जीवन की दिशाधारा बदलने का आधार मात्र एक ही है-दृष्टिकोण।...
- साधकों को प्रारम्भ में ही निर्देश दे दिये जाते हैं कि सत्रकाल में निर्धारित दिनचर्या सम्पन्न करने के साथ ही चिन्तन को एक ही लक्ष्य पर केन्द्रित रखा जाय कि भूतकाल की कुसंस्कारिता, अनगढ़ता से, लोभ, मोह और अहंकार के भव बन्धनों से पीछा कैसे छुड़ाया जाय?... जीवन-मुक्ति का आनन्द कैसे लिया जाय? साधना याचना नहीं होती और न उस कारण कहीं आसमान से वरदान उपहार बरस...
- साधन सम्पन्न होने से क्या हुआ?... सामर्थ्यवान होने से क्या बना? उनके हृदय बहुत ही छोटे और कृपण हैं। संग्रह और उपभोग से आगे की बात सोचन...
- साबुन कितने का लगा और धुलाई कितने दाम की हुई?... यह हिसाब लगाते समय धुलाई के पैसे में से साबुन के पैसे काट दिये जाय तो प्रायः आधा पारिश्रमिक बैठता है...
- सामने उसके एक समस्या यह उत्पन्न हुई कि देवी से क्या वरदान माँगा जाय और क्या बना जाय?... मजदूर के मन में आया कि राजा बड़ा होता है। राजा बनने का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। इतने में कल्पना उ...
- सामर्थ्यवान होने से क्या बना?... उनके हृदय बहुत ही छोटे और कृपण हैं। संग्रह और उपभोग से आगे की बात सोचना उनकी कृपण चेतना के लिए सम्भव...
- सामान्य लोगों में भी इतनी बुद्धिमत्ता विकसित हो गई है कि वे इतने भर से सन्तुष्ट न हो कि क्या कहा गया?... वरन् यह भी परखें कि किसने कहा?
गाँधी, विनोबा आदि के कथनों और मार्ग दर्शनों को लाखों ने सच्चे मन ...
- सामान्य ज्ञान की बातों का बतंगड़ कौन बनाता है?... उपरोक्त उदाहरण इसलिए दिये गए हैं कि अध्यात्म क्षेत्र की साधनाओं का स्वरूप और उनका सिद्धि-प्रतिफल बता...
- सामान्यतया मनुष्य की व्याख्या और क्या की जाय?... उसकी विशेषता और क्या बताई जाय? इन्द्रियगम्य उसका प्रत्यक्ष स्वरूप इतना ही तो है। अन्य प्राणियों की त...
- सृष्टि में क्या है क्या नहीं, इस असीम अनन्त और अचिन्त्य को कौन जाने?... जो प्रकाश में, उपयोग में आया वही तो सब कुछ बना और गौरवान्वित हुआ। इस दृष्टि से न केवल प्रकृति वैभव क...
- सोचा जाना चाहिए कि औसत नागरिक की तरह निर्वाह साधनों को पर्याप्त मानकर सम्पन्नता की ललक से पीछा क्यों न छुड़ाया जाय?... और कटौती में जो समय श्रम बचता है, उसे उच्चस्तरीय महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए पुण्य परमार्थ मे...
- सोचा जाना चाहिए कि भूले या दुर्बलताएँ तो इस कठिनाई में कुछ कारण नहीं रही है?... यदि रही हो तो इस प्रमाद को अविलम्ब हटा देने में तत्परता बरतनी चाहिए, ताकि वैसी दुर्घटना की पुनरावृत्...
- सोचा जाय कि अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को जो विशेष मिला है वह शौक-मौज भर के लिए है?... विचारा जाय कि चौरासी चक्र से छूटने के, पूर्णता तक पहुँचने के, ईश्वर के साथ अनन्य होने के इस स्वर्ण स...
- सोम क्या है?... अमृतम् वै सोमः (शतपथ) अर्थात् अमृत ही सोम है। अमृत क्या है-ज्ञान और तप से उत्पन्न हुआ आनन्द। इस प्...
- सौन्दर्य की होने वाली अनुभूति को किस रूप में प्रत्यक्ष दिखाया जा सकता है?... फूल की सुगन्ध एवं सौन्दर्य की अनुभूति, घ्राण शक्ति एवं नेत्र ज्योति से रहित व्यक्ति नहीं कर सकता। ऐस...
- स्थानीय और थोड़ी सी समस्याओं को लेकर ही अब तक राजनैतिक, सामाजिक आन्दोलन होते और सृजन संघर्ष के उपक्रम भी चलते रहे हैं, पर ऐसा किसी भी मंच से कदम उठाना तो दूर, सोचा तक नहीं गया कि ५०० करोड़ मनुष्यों के चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने के लिए कारगर प्रयास कब और किस प्रकार किया जाय?... प्रज्ञा अभियान ही है जिसने इस सन्दर्भ में गम्भीरता पूर्वक सोचा, कदम उठाया और वह कर दिखाया, जिस पर सह...
- स्पष्ट है कि विरोध में सारा वातावरण और प्रयास में साधन रहित एकाकी, फिर सफलता कैसे मिली?... इस सन्दर्भ में परा दैवी शक्तियाँ सहायता करती और प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलती देखी गयी हैं। इन्ही...
- स्वच्छता जब अपने स्वभाव में ही नहीं है, फिर जिसका उपयोग दूसरों को करना है, उसे शुद्धता पूर्वक दुहने, स्वच्छ बरतन में रखने और देर तक रखे रहने पर उसकी उपयोगिता नष्ट हो जाने की बात कौन सोचे?... दूध की आवश्यकता यदि सचमुच ही अनुभव होती है, तो परिस्थितियों को देखते हुए एक कदम और आगे की बात सोचनी ...
- स्वभावतः वे फैलने-फूटने का, फूलने-फलने का अवसर चाहती है, पर इसके लिए अधिकार रहित नारी के लिए गुंजायश कहाँ?... चौबीसों घण्टे उसे मन को मारना पड़ता है और उस दुष्ट को देखो जो मरता तो है नहीं उल्टे विद्रोही बनकर नान...
- स्वर्ग और नरक कहाँ है?... क्या वस्तुतः मरणोत्तर जीवन में आत्मा ऐसे किसी लोक, नगर, ग्राम, या देश में परिभ्रमण करती है? ये सारी ...
- स्वार्थ प्रधान हो गया तो दूसरों की सुविधा-असुविधा अथवा न्याय-अन्याय की बात क्यों सोची जायेगी?... अनास्था का जितना विस्तार हो रहा है उसी अनुपात से आदर्शवादिता का सारा ढाँचा लड़खड़ाने लगा है। जब ईश्व...
- सड़ती लाशों, खतरनाक जीवाणु, विषाणुओं के कारण महामारी फैलने से कौन रोक पायेगा?... भावी प्रलय की सम्भवतः पूर्व तैयारी के हेतु ही दोनों ही महाशक्तियों ने डाई आक्सीन नापाम नामक रसायन आयु...
- सड़ी कीचड़ यथा स्थान बनी रहे तो मक्खी मच्छर पकड़ने, मारने, पीटने से क्या काम बने?... रक्त में विषाक्तता भरी रहे तो फुन्सियों पर मरहम लगाने भर से क्या बात बने? एक सुधार पूरा होने से पूर्...
- हथेली पर सरसों कहाँ जमती है?... इसके लिए किसान जैसी कर्मठता अपनानी पड़ती है। आजीविका की स्थिर और समुचित व्यवस्था के लिए मनुष्य को बुद...
- हथौड़ी के बिना लुहार, बाजे के बिना वादक अपने कौशल का परिचय कैसे देगा?... उस्तरा न हो तो नाई किस प्रकार किसी की हजामत बनाए?बीज की महत्ता सर्वविदित है। उसके बिना न खेती होती ह...
- हनुमान का पर्वत उखाड़ना, समुद्र लाँघना और लंका उजाड़ना उनकी निजी सामर्थ्य से सम्भव हो सकता था यह किस प्रकार माना जाय?... यदि वे इतने ही समर्थ थे तो अपने स्वामी सुग्रीव को बालि के त्रास से क्यों न छुड़ा सके? अर्जुन यदि सचमु...
- हम अपना ही तेज, ओजस, बल सर्वस्व जला, गला कर कुछ क्षण का घिनौना मनोरंजन करें इससे क्या बनेगा?... क्या मिलेगा? दूसरे से कुछ पाने में लाभ की बात सोची जा सकती है। चोरी, उठाईगीरी आदि से कुछ तो लाभ होता...
- हम अपने पास पड़ोस का कितना ध्यान रखते है?... अपने देशवासियों के प्रति हमारे अन्दर कितनी सहानुभूति है? राष्ट्रीय सम्पत्ति के सदुपयोग का कितना ध्या...
- हम में से एक राक्षस के सामने क्यों न चला जाय और ब्राह्मण बालक को क्यों न बचा लिया जाय?... उनके प्रबल आग्रह ने कुन्ती को बात मानने के लिए बाध्य कर दिया। अब इस सौभाग्य का लाभ कौन उठाये इस पर...
- हम सभी किससे उत्पन्न हुए हैं, किससे जी रहे हैं तथा किसमें प्रतिष्ठित हैं?... साथ ही किसके अधीन रहकर हम लोग सुख और दुःख का अनुभव करते है।...
- हमने नारी के प्रति क्या क्या अत्याचार नहीं किये है?... नारी को अबला की श्रेणी में रखकर उसका अपमान किया है। हम अपने शरीर का आधा अंग बेकार कर चुके हैं और मूर...
- हमें गहराई तक विचार करना होगा कि जिन तथाकथित समुन्नत देशों में विज्ञान, शिक्षा, धन और साधनों का बाहुल्य है वहाँ के प्रजाजन क्यों दुष्प्रवृत्तियों में अधिकाधिक ग्रसित होकर क्यों सर्वनाश की ओर जा रहे हैं, क्यों अपना और अपने राष्ट्र का भविष्य अन्धकारमय बना रहे हैं?... खोज हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाएगी कि वैयक्तिक चरित्र को राष्ट्रीय प्रगति का अंग मानकर भारी भूल की ग...
- हर भगवान और हर देवता के साथ उनकी पत्नियाँ विराजमान है फिर उनके मनों को अपने इष्ट देवों से भी आगे निकल जाने की बात क्यों सोचनी चाहिए?... सप्त ऋषियों में सातों के सातों विवाहित थे और उनके साधना काल की तपश्चर्या अवधि में भी पत्नियाँ उनके स...
- हर रोगी को उसकी स्थिति के अनुरूप दवा दी जाती है, उसी प्रकार रोग विशेष को ध्यान में रखते हुए, रोगी की स्थिति का गहन पर्यवेक्षण करते हुए यह निर्णय करना होता है कि किस स्तर की ऊर्जा उत्पन्न की जाय और उसके उत्पादन के लिए किन पदार्थों का यजन किया जाय?... इस दृष्टि से हर विशिष्ट रोगी के लिए विशिष्ट हविष्य का निर्धारण करना होता है। इसमें दोनों ही स्तर क...
- हवा में जब स्वयं ही जीवन नहीं पाया जाता, तो वह प्राणी को जीवन कहाँ दे सकती है?... यदि साँस लेने से जीवन का सम्बन्ध नहीं है, तो उसे प्राण के अर्थ में क्यों प्रयुक्त किया जाता है और प्...
- हिरण्याक्षों से लेकर सिकन्दरों जैसे प्रतापियों को वैभव की महत्त्वाकांक्षा पूरी करने का अवसर न मिला तो सामान्यजनों की बात ही क्या है?... सामान्यों में भी वे जो योग्यता, श्रमशीलता एवं मितव्ययता की उपेक्षा करते हैं, इतने पर भी धन कुबेर बनन...
- ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का, ‘सर्वाइवल आफ दी फिटेस्ट’ का सिद्धान्त सही और स्वाभाविक ठहराये जाने पर मानवी सभ्यता की कैसी दुर्दशा हो सकती है?... मनुष्य की बुद्धि उन मान्यताओं को अपनाकर किस सीमा तक अनाचरण पर उतर सकती है? इसकी आज तो एक झाँकी भर मि...
- (२) सतयुग फिर आयेगा कब?...? जन-जन जब चाहेगा तब॥(३) देव संस्कृति के निर्माता। यज्ञ पिता गायत्री माता॥(४) सादा जीवन-उच्च विचार।...
- ; सच्ची व सार्थक उपासना क्या और कैसे?...? --पं. श्रीराम शर्मा आचार्य आत्मशक्ति एक ऐसी दिव्य विभूति है, सामर्थ्यों का भाण्डागार है जो प्रसुप्त...
- ; मरने से डरना क्या?...? --पं. श्रीराम शर्मा आचार्यसुकरात को जहर दिए जाने की तैयारी चल रही थी। शिष्य, मित्र, सहयोगी, सम्बन्ध...
- अणिमा, महिमा, लघिमा आदि सिद्धियाँ सम्भव हैं या नहीं?...? चमत्कार दिखाने और निहाल बनाने की जादूगरी का अध्यात्म से कोई सम्बन्ध है या नहीं? इसका निर्णय हर विज्...
- अणु क्या है?...? सुविस्तृत पदार्थ वैभव का एक छोटा सा घटक। आत्मा क्या है? परमात्म सत्ता का एक छोटा सा अंश। अणु की अपन...
- अध्यात्म क्षेत्र के साधकों को जहाँ दूरदर्शी विवेकवान होना चाहिए था, तथ्य और सत्य की परख में रस लेना चाहिए था, संयमी और परोपकारी जैसी प्रवृत्ति से उन्हें विभूतिवान रहना चाहिए था, वहाँ मुफ्त की मनोकामनाएँ पूरी कराने और कौतूहल देखने की ललक से उनका मनःक्षेत्र किस कारण इतना दिग्भ्रान्त और कलुषित हो गया?...? पुरातन उदाहरणों में अध्यात्म क्षेत्र के साधक और प्रवक्ता ऋषि स्तर के ही दीख पड़ते हैं। उन्हें ऋषितुल...
- अनैतिकता का तो कहना ही क्या?...? समय का पालन, वचन का पालन, विश्वास का पालन घटता जा रहा है। व्यवसाय, आचरण, कर्तव्य, उत्तरदायित्व के क...
- अपना मन क्या कहता है?...? आदत क्या पड़ गई है? प्रचलन क्या है? इन सब बातों को ताक में रख कर इतना ही सोचना होगा कि इन समस्त अड़...
- अपने समय के मूर्धन्य खगोलवेत्ता डॉ गुस्ताफस्ट्रोम वर्ग की पुस्तक ‘दि सोल आफ यूनिवर्स’ में जीवन क्या है?...? विशेषतया मनुष्य क्या है? इस प्रश्न पर प्रस्तुत वैज्ञानिक दृष्टिकोण की मार्मिक समीक्षा की है।...
- अब इसका क्या किया जाय?...? इसके लिए उसे उपयोगी उपकरणों के साँचे में ढालने के लिए एक बार और तपाया जाता है। इतने से कम में मिला ...
- अभी यह निर्धारित करना शेष है कि तर्क और तथ्य पर आधारित मानवी धर्म का स्वरूप क्या हो?...? यो मोटे तौर से विश्व का उच्च स्तरीय चिन्तन एक ही दिशा में चल रहा है कि धर्म का स्वरूप सार्वभौम होना...
- आखिर यह सब है क्या?...? मनुष्य जीवन सृष्टा का सर्वोपरि उपहार है। उसे भव बन्धनों से मुक्त होने, आत्म कल्याण के चरम लक्ष्य तक...
- आत्म विस्मृति की यह स्थिति कब तक रहेगी?...?...
- आत्म-ज्ञान की आवश्यकता यदि अनुभव की जा सके तो सबसे पहले यह विचार करना होगा कि हम है क्या?...? और आखिर क्यों जी रहे हैं? इस तथ्य पर आत्मवेत्ता महामनीषियों ने अपने गम्भीर चिन्तन से जो निष्कर्ष नि...
- आने वाला समय बताएगा कि आप्त वचनों में वर्णित अध्यात्म दर्शन सम्बन्धी प्रतिपादन सत्य की कसौटी पर कितने खरे थे?...? विवेक या तर्क अगले दिनों श्रद्धा का पूरक बनेगा। विज्ञान स्वयं यह पाएगा कि उसकी मान्यताएँ भावना विही...
- इन कठिनाइयों का निराकरण कैसे हो?...? जो अन्ध परम्पराएँ पीड़ा, पतन की कुण्डली मारकर बैठी हैं वे मिटें कैसे? इस प्रश्न का उत्तर एक ही है कि ...
- इन दुष्प्रवृत्तियों के आँधी तूफान में कोई कैसे कब तक आदर्शवाद की चट्टान पर खड़ा रहे?...? मनस्वी और आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों की बात दूसरी है जो हर आँधी तूफान का मुकाबला कर सकते हैं और प्रल...
- इस प्रयास का शुभारम्भ कैसे हो?...? इसके लिए पट्टी पूजन की तरह छोटा श्रीगणेश भी किया जा सकता है और एकाकी बड़ा साहस न बन पड़ने पर बच्चे ...
- इस प्रश्न के उत्तर की अर्थात् आत्मज्ञान की आवश्यकता यदि अनुभव की जा सके, तो सर्वप्रथम यह विचार करना होगा कि हम कौन हैं?...? और क्यों जी रहे हैं? इस तथ्य पर आत्मवेत्ता ऋषियों ने गम्भीर चिन्तन एवं अनुसन्धान से जो निष्कर्ष निका...
- इस सुअवसर को ठुकरा कर जो तृष्णा वासना का, लोभ मोह का अनावश्यक भार सँजोते और ढोते हैं, उनकी समझदारी को किस तरह सराहा जाय?...? दलदल में घुसते जाना और उसकी सड़न से खीजते और जकड़न से चीखते जाना, किसी का लादा हुआ नहीं स्वयं का अपना...
- ईश्वर यदि है तो प्रत्यक्ष क्यों नहीं दीखता?...? यह तर्क लोग करते रहे हैं। विकसित बुद्धि के व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व के विषय में यदि शंकालु हुए भी,...
- उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का निर्माण कैसे हो?...? इसके लिए उस स्तर के साँचे चाहिए। टकसाल के साँचे जैसे होते हैं, वैसे ही सिक्के ढलते चले जाते हैं। बु...
- ऋतम्भरा प्रज्ञा और सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन का समन्वित स्वरूप क्या बन सकता है?...? इसके लिए नये सिरे से खोजबीन करने की आवश्यकता नहीं। पुराना राजमार्ग ही सुधार, सम्हाल लिया जाय तो पगड...
- ऐसा क्यों होता है?...? इसका प्रत्यक्ष कारण तो शिक्षा, व्यवस्था, परम्परा, शासन, साहित्य, कला आदि में घुसी अनुपयुक्तता को भी...
- कपोत चरक ने बारी-बारी सभी चिकित्सकों के सम्मुख वही प्रश्न दुहराया ‘कोऽरुक’ अर्थात् कौन रोगी होता है?...? निरोग कैसे होता है?प्रश्न के उत्तर में सभी ने अपनी मान्यता व्यक्त की। रोग मुक्त होने के निमित्त सभी...
- किस जीवधारी के लिए क्या आहार उपयुक्त या अनुपयुक्त है?...? इसकी जाँच पड़ताल के लिए भीतर प्रवेश करने से पूर्व पदार्थ की आवश्यक जाँच-पड़ताल के लिए एक सुयोग्य ...
- किसी भी प्रगति क्षेत्र में कदम बढ़ाने से पूर्व यह सोचा और देखा जाना चाहिए कि इस प्रयास की आरम्भिक उपलब्धियाँ आकर्षक होते हुए भी क्या उसकी अन्तिम परिणति भी श्रेयस्कर है?...? तात्कालिक लाभ के लिए भविष्य को गँवा देना अदूरदर्शिता है। अदूरदर्शिता भी एक अपराधी दुष्प्रवृत्ति है,...
- कौन क्या करे?...? यह निर्धारण अति सरल है। अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुसार नवसृजन की त्रिवेणी की किसी भी धारा ...
- क्या तृतीय विश्वयुद्ध होकर ही रहेगा?...?
152. नव सृजन के साथ जुड़ी ध्वंस की अनिवार्यता
153. सृजन म...
- क्या मनुष्य के लिए भी प्रकृति यही न्याय नीति बरतने वाली है?...? उसके विधान में किसी से भी पक्षपात करने या किसी को भी छूट देने की गुंजाइश नहीं है, सो इसमें जरा भी स...
- क्या यह सब भयावह स्वरूप वास्तव में घटित होगा, क्या मानवता के वर्तमान स्वरूप का अन्त इतना ही दुःखद होगा?...? इस सन्दर्भ में एक घटना ऐसी स्मरण की जा सकती है जो तीन वर्ष पूर्व एकाएक ही सबके रोंगटे खड़े कर गयी थी...
- क्वांटा अचेतन है या चेतन?...? इस प्रश्न का समाधान अब वैज्ञानिक क्षेत्र ही इस तरह करने जा रहे हैं जिस तरह अध्यात्म द्वारा प्रतिपाद...
- घरेलू उपयोग में आने वाले जानवर भी बिना सिखाए-सधाए अपना काम ठीक तरह कहाँ कर पाते हैं?...? बछड़ा युवा हो जाने पर भी अपनी मर्जी से हल गाड़ी आदि में चल नहीं पाता। घोड़े की पीठ पर सवारी करना, उसे ...
- घरों में सुसंस्कारिता कैसे पनपे, फले फूले?...?...
- चमत्कार की घुसपैठ इस क्षेत्र में कैसे हुई?...? इसका आधार तपश्चर्या के आधार पर उपलब्ध होने वाली अतीन्द्रिय क्षमता के साथ जुड़ता-सा दीखता है। अन्तराल...
- जिस व्यक्ति को बाल्यकाल से ही तीखे-चटपटे, बासी तथा गरिष्ठ खाद्य पदार्थ खाने को मिले हैं और परिणाम स्वरूप उसका स्वास्थ्य, उसका मन विकृत हो रहा हो तो इसमें व्यक्ति का क्या दोष?...? यह सारा दोष उसके निर्माण करने वाले समाज का ही है, जिसने अपनी प्रारम्भिक पाठशाला में उस बालक की शिक्...
- जीवात्मा आखिर है क्या?...? उसका लक्षण, स्वरूप, स्वभाव और लक्ष्य क्या है? इस प्रश्न पर विज्ञान अपने बचपन में विरोधी था, वह कहता...
- तब करना क्या?...? इसका उत्तर एक ही है कि हममें से हरेक मानवी गरिमा का स्मरण करे।...
- तब क्या स्वर्ग-नरक मात्र कल्पना भर है?...? कर्मों के फल प्राप्त करने के लिए कोई माध्यम नहीं है क्या? जिन कर्मों का फल इस जन्म में नहीं मिल सका...
- तब प्रश्न उत्पन्न होता हैं कि व्यक्तित्व को सच्चे अर्थों में सुसंस्कृत और समुन्नत बनाने के लिए क्या किया जाय?...? इसके उत्तर में एक ही तथ्य सामने आता है कि आस्थाओं के सहारे आस्थाओं को उभारा जाय। जंगली हाथी पकड़ने म...
- देश की परिस्थितियों एवं उनसे जुड़ी समस्याओं से कौन विज्ञ अपरिचित होगा?...? यह किसे नहीं मालूम कि देश की तीन चौथाई जनता आज भी अशिक्षा के अन्धकार में डूबी हुई है। पचास प्रतिशत ...
- पददलित नारी से किसने क्या पाया?...? वह अपने पालने वालों के लिए गले का पत्थर बनकर रह गई। कैदी भी जेल में कुछ करते हैं, पर जेलर से लेखा-ज...
- पुनर्जन्म कहाँ मिले, किस प्रकार के परिवार में अथवा कैसे वातावरण में जन्म मिले?...? इसकी व्यवस्था भी अपना ही स्वसंचालित चेतना संस्थान स्वयं ही कर लेता है। इसके लिए अन्य किसी बाहरी न्य...
- पृथ्वी का गुरुत्व बल प्रत्यक्ष कहाँ दीखता है?...? वस्तुओं के नीचे गिरने से यह अनुमान लगाया जाता है कि उसमें कोई ऐसी आकर्षण शक्ति है, जो वस्तुओं को अप...
- प्रकृति के प्रत्यक्ष स्वरूप को ही सब कुछ समझने वाले उसके पीछे छिपे परोक्ष रहस्यों का समझने में कहाँ सफल हो पाते हैं?...? पृथ्वी धुरी पर भी घूमती है और द्रुतगति से सूर्य की परिक्रमा भी करती है। यह बात प्रत्यक्ष देखने का ह...
- प्रश्न यहाँ भी यही उत्पन्न होता है कि ऐसा वातावरण किस प्रकार उत्पन्न हो, उसका सृजन कौन करें?...? इस ताले की कुंजी सुगृहिणी के हाथ में है। नर सुयोग्य और सुसम्पन्न होने पर इस सन्दर्भ में हाथ बँटा सक...
- फिर क्या किया जाय?...? क्या विनाश के अतिरिक्त और कोई मार्ग ही नहीं? इस प्रकार जब निराशा जनक चिन्तन जीवनक्रम को घेरने लगे, ...
- फिर यह स्वप्न या दिवा स्वप्न आते क्यों हैं?...? इनकी आवश्यकता ही क्या है? यह अनचाही विसंगतियाँ उपजती क्यों हैं? इनका उद्गम या सूत्र संचालन होता कहा...
- बालकों से माता-पिता का व्यवहार कैसा हो?...?...
- भावी पीढ़ी समुन्नत स्तर की कैसे बने?...?...
- मनुष्य के लिए खोज का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न कौन सा हो सकता है?...? श्वेताश्वेतरोपनिषद् का ऋषि स्पष्ट करता है-‘‘किं कारणं ब्रह्म कुतः स्मजाता जीवाम् केन क्वच सम्प्रतिष...
- मनुष्य क्या है?...? इसके उत्तर में एक ही शब्द कहा जा सकता है-विचारों का पुञ्ज। अपने दृष्टिकोण के आधार पर ही जीवन का बाह...
- मनुष्य क्या है?...? जीवन का स्वरूप एवं लक्ष्य क्या है? जीवन के साथ जुड़े संसार एवं प्राप्त विभूतियों का सही उपयोग क्या ह...
- मशीनों का आश्रय लेकर उपलब्धियों का उपार्जन करना और सुविधा साधन बढ़ाना अच्छी बात है, पर जब तक उतनी बड़ी व्यवस्था नहीं बन पाती तब तक साठ करोड़ मनुष्यों में से समर्थों के दो-दो हाथों का उपयोग करना क्या बुरा है?...? इनमें से आधे हाथ ही आधा अधूरा काम करते हैं। मस्तिष्कों के मनोयोग का तो इतना भी उपयोग नहीं बन पड़ता। ...
- मोटी बुद्धि यही सोच सकती थी कि प्रभात होते ही भोजन, शृंगार, उपार्जन जैसे साधन तत्काल जुटने चाहिए थे, पर अब देखा जाता है कि सब लोग प्रथम काम गन्दगी हटाने का ही समझ रहे हैं और घर की चीजें बाहर पटक रहे हैं तो लगता है इन लोगों पर कही विक्षिप्तता तो नहीं चढ़ दौड़ी?...? पेट का आहार मल रूप में विसर्जित करना, घर का कूड़ा घूरे पर फेंकना, बासी बचा भोजन कुत्तों को डालना, घ...
- यदि पति-पत्नी एक समझौता कर ले कि अपने बच्चों को पोषण, विकास और उन्हें सज्जन, उदार, सद्गुणी बनाने के लिए वे परस्पर अत्यधिक प्रेम, सौजन्यता, उदारता और आत्मीयता का जीवन जियेंगे और भोग-वासना आदि कलह बढ़ाने वाले, प्रेम श्रृंखलित करने वाले कारणों को जन्म नहीं देंगे तब तो बच्चों का यह सत्याग्रह भी सफल हो सकता है अन्यथा बालक तो बालक ही हैं, इससे अधिक बेचारे और क्या कर सकते हैं?...? यह बात सुनने में तो जरूर कुछ अटपटी सी लगेगी कि कुछ अभिभावक प्रेम के नाम पर बच्चों से दुश्मनी करते ह...
- यह कैसे हुआ?...? मात्र एक ही कारण है कि कारखानों में जो कुछ वेस्टेज कूड़ा-कबाड़ा निकलता है वह इन नदी, तालाबों में फेंक...
- यह पारस क्या है?...? यह है प्रेम। एक काला-कलूटा आदमी जिसे आप पूर्णतया कुरूप, गँवार या असभ्य कह सकते हैं, अपनी स्त्री के ...
- यह साझेदारी किसकी हो?...? मनुष्य को मिली विभूतियाँ, ईश्वर प्रदत्त क्षमताएँ इतनी गरिमामय हैं, जिन्हें देखकर उसे सृष्टि का राजक...
- रूस की राज क्रान्ति जब मुट्ठी भर श्रमिकों ने सम्पन्न कर ली और लेनिन को उसका नेतृत्व सौंपा गया तो वे स्वयं चकित रह गए कि इतना कठिन, इतना समय साध्य कार्य इतनी जल्दी, इतने स्वल्प प्रयासों से आखिर हो कैसे गया?...? अब्राहम लिंकन दक्षिण अमेरिका में प्रचलित गुलाम प्रथा के पक्षधरों की कट्टरता और कठोरता को देखते हुए ...
- वंश परम्परा की चर्चा यहाँ इसलिए की जा रही है कि अगले दिनों मानवी विकास के लिए किये जाने वाले प्रबल प्रयत्नों में यही कठिनाई सबसे अधिक आड़े आयेगी कि परम्परागत आकृति एवं प्रकृति में हेर-फेर कैसे किया जाय?...? धीमी गति से यत्किंचित सुधार होते चलने की प्रतीक्षा करते रहना अब इस प्रगति युग में सम्भव नहीं।...
- वस्तुस्थिति को वैज्ञानिक कसौटियों पर कसा जाना अभी शेष है, किन्तु कैंसर जैसे गम्भीर रोगों को पैदा करने में मनःस्थिति कहाँ तक जिम्मेदार है, तथा किस तरह की भूमिका सम्पादित करती है?...? पर जो तथ्य प्रकाशन में आ रहे हैं उनसे यह सम्भावना प्रबल होती जा रही है कि गम्भीर असाध्य रोगों को जन...
- विकसित नारी अपने व्यक्तित्व को समुन्नत बनाकर राष्ट्रीय समृद्धि के सम्वर्धन में कितना बड़ा योगदान दे सकती है?...? इसे उन देशों में जाकर आँखों से देखा या समाचारों से जाना जा सकता है, जहाँ नारी को मनुष्य मान लिया गय...
- विचारणीय यह है कि तीर्थों में पहुँचने वाली जनता क्या उनसे वैसा प्रतिफल प्राप्त करती है, जैसी कि अपेक्षा की जानी चाहिए?...? पर्यवेक्षण करने पर उत्तर निराशा जनक ही मिलता है। भिक्षा व्यवसायी वर्ग के लोग जिस प्रकार यात्रियों क...
- विचारणीय यह है कि संकल्प कृत्य को प्रमुखता और प्राथमिकता क्यों दी गई?...? खोजने पर यह मनोवैज्ञानिक तथ्य सामने आ खड़ा होता है जिसमें किसी प्रयास को सफलता के लक्ष्य तक पहुँचा...
- विचारणीय है कि क्या नारी वस्तुतः इतनी निरुपयोगी है जिसे अपनी माँसलता को बेचकर ही पालन कर्ताओं का अनुग्रह प्राप्त हो सके?...? स्थिति वस्तुतः वैसी है या नहीं यह दूसरी बात है। पर जब तलक लोक मान्यता यही बनी रहेगी, तब तक उसका सही...
- व्यक्ति स्वयं क्या है?...? जीवन का स्वरूप एवं लक्ष्य क्या है? जीवन के साथ जुड़ी हुई विभूतियों का सही उपयोग क्या है? इन प्रश्नों...
- व्यायामशाला में नित नये उत्साह के साथ जूझते रहने वाले पहलवान की मनःस्थिति और गतिविधि का यदि गम्भीरता पूर्वक अध्ययन किया जाय तो आत्म साधना के विद्यार्थी को विदित हो सकता है कि उसे आखिर करना क्या पड़ेगा?...? पहलवान मात्र कसरत करके ही निश्चिन्त नहीं हो जाता, वरन् पौष्टिक भोजन की, संयम, ब्रह्मचर्य की, तेल मा...
- सच्ची व सार्थक उपासना क्या और कैसे?...?...
- सर्व प्रथम क्या बदला जाय?...? इसका एक ही उत्तर है-चिन्तन, अभ्यास एवं निर्धारण। किस में नफा, किस में नुकसान? यह प्रश्न सर्वप्रथम ह...
- साधना को सिद्धि के रूप में परिणत होते देखने के इच्छुक प्रत्येक विचारशील को जहाँ निर्धारित पूजा-उपचार नियमित रूप से करने चाहिए, वहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इष्ट के, लक्ष्य के प्रति श्रद्धा का क्रमिक विकास हो रहा है या नहीं?...? प्राण विहीन शरीर को लाश कहते हैं और आस्था रहित पूजा उपक्रम को विडम्बना। दोनों का बाह्य स्वरूप तो सह...
- स्वच्छ जल का कितना बड़ा भाग कारखाने और फैक्ट्रियाँ झटक लेते हैं?...? यह कल्पना करने के लिए इन तथ्यों से अनुमान लगाना चाहिए कि एक लीटर पेट्रोल बनाने के लिए १० लीटर पानी...
- हनुमान यदि अपने बलबूते पहाड़ उठाने, समुद्र लाँघने, लंका उजाड़ने में समर्थ रहे होते, तो बालि के डर से छिपे हुए सुग्रीव के यहाँ नौकरी क्यों करते?...? बालि से स्वयं ही क्यों न निपट लेते? अर्जुन यदि अपने पराक्रम से महाभारत जीत सके होते, तो द्रौपदी का ...
- हम शताब्दियों से अपने खाने में नमक का प्रयोग करते आ रहे हैं, पर यह सोचने की कभी आवश्यकता अनुभव नहीं की कि भोजन में इसकी क्या उपयोगिता है?...? बायोकेमिस्ट बंगे ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर बताया है कि पूर्व काल में भूमि में पोटैशियम और सोडिय...
- हमारा उपास्य इष्टदेव परमेश्वर क्या है?...? इसकी विवेचना कई प्रकार से की जा सकती है। अन्तःकरण में उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाएँ उत्पन्न करने वाली व...
- ’’ इस युक्ति में बहुत कुछ सार है जिसका दबाव अपने स्वभाव तक को बदलने में सफल न हो सका उस असफल व्यक्ति को कौन मान्यता देगा?...? कौन उसकी बात सुनेगा? कौन उसके कहने पर चलेगा? व्यक्तित्व की प्रामाणिकता इसी कसौटी पर कसी जाती है कि ...