संस्मरण - आ० डॉ. अमल कुमार दत्ता जी - 1

एक दिन में बहुत रोया अमल कुमार तेरी जिन्दगी बेकार है। तुझमें अकल नाम की कोई चीज नहीं है। गुरुजी के चरण पकड़े तो छोड़े क्यों। गुरुजी ६ दिन तेरे घर रहे। इतना साथ रहा अच्छा माताजी भी कितने समय और गुरुजी का समय तूने बातों में बरबाद किया। ५ मिनिट तो क्या एक मिनिट भी माताजी के चरण पकड़कर बैठा नहीं। क्या बैठ नहीं सकता था? माताजी मैं क्यों नहीं बैठा और अगर नहीं बैठा तो आप ही कृपा कर देती। मेरे अन्दर से किसी ने कहा। अमलकुमार तूं झूठ बोलता है। तूँ कभी चरण पकड़कर नहीं बैठा। मैंने कहा माताजी शायद मैं झूठ नहीं बोलता। आधे मिनिट भी मैंने कभी आपके चरण नहीं पकड़े होंगे। माताजी बोली तंू झूठ बोलता है। मैंने कहा मैं क्यों झूठ बोलूंगा। माताजी हँसी और बोली अच्छा तूँ सच बोलता है तो सुन। मेरा जब बाँयी ऑंख का केटैरेक्ट आपरेशन हुआ जब सतीश प्रणव और तूँ था औेर जब मुझे तखत से टेबल पर लिया गया तब मैंने तुझे याद किया था और तेनें कहा कि मैं यहॉं हूँ माताजी तेरे हाथ मेरे दोनों चरणों पर रहे औेर आपरेशन के बाद तक रहे याद आया। मैंने कहा हाँ माताजी याद आया। क्या मैं माताजी के इस प्यार को अपने जीवन की पूर्ण सफलता मानूं।

प्यार और आशीर्वाद हमेशा बढ़ता रहेगा

सन् १९७१ में माताजी बीमार थीं और गुरुजी अज्ञातवास में। मुझे खरगौन में तार मिला बलराम भाई साहब ने लिखा था माताजी सख्त बीमार हैं गुरुजी ने तुमको आने के लिये निर्देश दिया है शीाघ्र चले आओ। मैं चल दिया मोटर ट्रेन जो भी मिली और हरिद्वार पहुॅंच गया। माताजी ने कहा मुझे कोई दिल का दौरा नहीं है। मैंने साधना मैं गुरुजी को देखा वे ठंड में सिकुड़ रहे थे। उनका कुरता फटा था उनका कष्ट देखकर मैं चीख उठी। मैंने कहा माताजी आप हमारी गुरुमाता है आपके सारे शब्द मेरे शिरोधार्य हैं पर एक डाक्टर के नाते आप ईसीजी से चेक करा लें। उन दिनों हरिद्वार में कोई ईसीजी नहीं था। माताजी ने कहा आज रात सतीश आयेगा। तुम दोनों देहरादून चले जाना। दूसरे दिन डाक्टर एवं ईसीजी मशीन दोनों को लाये चेक किया सब ठीक निकला। माताजी के लिये मैं बहुत सी दवायें तथा इंजेक्शन पैथीडीन भी लाया था। रक्तचाप के उपकरण का कफ माताजी के हाथ में छोटा पड़ गया माताजी कुछ ठीक हुई मैं जाने लगा तो माताजी ने कहा एक दिन और रुक जा मैंने कहा जी माताजी दूसरे दिन जाते समय माताजी उठीं मैंने बहुत कहा पर वह रुकी नहीं और ऑंखों में आंसू भरकर बोली बेटे मैं तुझे क्या दूं स्वयं उठकर भस्मी देने लगीं। मैंने कहा माताजी यदि देना ही है तो मुझे दीजिये आपका निरन्तर बढ़ता प्यार। माताजी ने कहा मेरा और गुरुजी का प्यार निरन्तर बढ़ता रहेगा। माताजी बीच-बीच में मुझे याद दिलाती रहीं कि मेरा प्यार बढ़ रहा है न मैंने कहा जी माताजी यदि मैं आज माताजी से पूंछ सकूँ तो शायद जवाब तो वही होगा चाहे मैं सुन सकूँ या नहीं।

गुरुजी मथुरा छोड़ने के पहले अपना सब कुछ बॉंट गये। अपने बेटे सतीश के लिये कहा। कि उसे पढ़ा लिखा दिया और २ प्रिंटिंग मशीन उसकी होंगी। बेटी शैला की शादी कर दी। चार आत्मदानियों को यानी शंभूसिंह चमनलाल गिरजासहायऔर एक और को वेद प्रिंटिंग आदि बराबर का भागीदार बनाया। ऑंवलखेड़ा में कालेज अपनी मॉँ कुंवरबाई के नाम से खोला गया माता जी के गहने पण्डित लीलापति शर्मा जी ने किसी भी स्थिति में बेचने नहीं दिये और आज भी तपोभूमि में ही हैं। जमीन और पैतृक सम्पत्ति तपोभूमि में ही लग गयी। गुरुजी की माताजी जिन्हें हम ताईजी कहते थे बहुत नाराज हुई। बोली श्रीराम अभी मैं जिन्दा हूं तूने सब बॉंट कैसे दिया। गुरुजी बोले तुम्हारे हिस्से में दो चीज हैं एक मैं और दूसरा २०० रुपया प्रतिमाह केवल अपने ऊपरी खर्चे के लिये। गुरुजी ने केवल धन सम्पत्ति ही नहीं बाँटी लेकिन अपना शरीर मन बुद्घि प्रतिभा भगवान के काम में लगाये। जब तक गुरुजी हरिद्वार में रहे सतीश ढाई सौ से ५०० रुपया प्रतिमाह भेजता था वे २५० रुपये वाले रिक्शे में तब बैठे जब पेमेंट सतीश ने कर दिया। गुरुजी कहते थे कि बेटा अपने बाप को पैसा नहीं देगा सेवा नहीं करेगा तो अगले जन्म में बैल बनेगा। डॉ० प्रणव का जब एक्सीडेंट हुआ था बीएचईएल में तो दिल्ली भेजने में केवल देर इसलिये हुई कि सतीश को रात में पैसे लेकर मथुरा आना था किसी भी स्थिति में गुरुजी ने पोस्टआफिस या बुक स्टाल से पैसे लेना स्वीकार नहीं किया।

एक गोष्टी में गुरुजी ने कहा कि किसी सामाजिक संस्था को केवल तब तक चलना चाहिए जब तक उसे जनसामान्य का सहयोग मिलता रहे जनता का विश्वास अर्जित होते रहना चाहिए यदि तुम्हें वह सहयोग न मिले तो संस्था बन्द कर देना क्योंकि बिना दिये आध्यात्म नहीं उपजता मैं इन बिल्डिंगों को सरकार, स्कूल व अस्पताल को दे देना पसन्द करूंगा। यदि शक्तिपीठ जनजागरण के केन्द्र न बनें और लड़ाई झगड़े हों तो गायत्री मॉँ की मूर्तियॉँ यहॉं उठा लाना। और वेदमाता गायत्री ट्रस्ट उनकी पूजा आरती नियमित करता रहेगा। बिल्डिंग स्थान को सार्वजनिक उपयोग का स्थान बना देना। समर्पण का अर्थ किसी के अधीन होकर नहीं अपने सद्गुण व योग्यता का आदर्श के लिये उपयोग करना है। श्रद्घा किसी व्यक्ति के प्रति नहीं आदर्श के प्रति असीम प्यार को कहते हंै।

गुरुजी ने कहा बच्चो जो तुम लोग शान्तिकुॅंज के स्थाई सदस्य हो हमारे बच्चे हो और हम किसी से बिछुड़ने के लिये कभी मिलते ही नहीं है और यदि प्यार करते हैं तो फिर पूरा ही प्यार करते हैं। हम तुम लोगों को समाज के काम के लिये लाये हैं तुम्हारे संस्कार अच्छे बने इसलिये हम तुम्हें बाहर का अन्न नहीं खिलायेगे। उसकी व्यवस्था तुम्हारे गुरु तुम्हारे पिता ने कर रखी है यह तुम्हारा हक है जब तक यहॉँ रहोगे मोटा अन्न मोटा वस्त्र हमारा उत्तरदायित्व रहेगा क्योंकि तुम कमाओगे नहीं। हमारे जीवन भर बच्चे रहोगे। यहॉँ गुरुजी के ही शब्दों को उच्चारित कर रहा हूॅं।

आँटे का घाटा नहीं घी के नहीं दर्शन ऐसे ही जीना है तुमको बर्सन।

वीरेश्वर उपाध्याय जी का पुत्र गुरुजी के पास आया। मै भी वहीं बैठा था। वह गुरुजी से कहने लगा गुरुजी मुझे मृत्यु का डर लगता है। गुरुजी ने कहा मृत्यु का डर का कोई कारण नहीं सिर्फ जीवन की उपयोगिता की कमी है। और मुझसे कहा कि अमलकुमार इसको तू एक गीता लाकर के दे। उसे पढ़ तेरा डर दूर हो जायेगा। पर डर उसको जरूर होगा जिसे अपने कर्म और विचारों पर नियंत्रण नहीं है। मैंने तभी गीता लाकर दी।

सन् १९६२-६३ की बात होगी गायत्री तपोभूमि के दाँई ओर वाले कक्ष में गुरुजी का प्रवचन हो रहा था। मैं भी सुन रहा था पीछे से किसी ने एक चिट आगे बढ़ाई और सबसे आगे वाले ने गुरुजी को दी। प्रवचन बन्द हो गया। गुरुजी ने सूचना दी कि रेडियो न्यूज आयी है कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का दिल के दौरे में स्वर्गवास हो गया। जो बच्चे उपवास करना चाहें सूचना दे दें। बाहर निकलते ही मैंने गुरुजी से पूँछा गुरुजी क्या सुभाषचंद्र बोस प्रकट हो जायेंगे और प्रधानमंत्री बनेगे। गुरुजी ने कहा प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री बनेगे। उस समय तक ऐसी कोई सूचना न थी।

जुगलकिशोर बिड़ला गुरुजी के पास आया करते थे जब भी उन्हें बिड़ला मन्दिर आना होता अपने मैंनेजर से पता लगाते कि यदि आचार्य जी होंगे तो ही मैं आऊँगा। जब चीन जीतता जा रहा था घनश्यामदास बिड़ला ने गुरुजी से पूँछा गुरुजी अब क्या करें मैं अपना पैसा विदेश बैंक में स्थानान्तरित कर दूँ क्या? चीन आगे बढ़ रहा है भारत का क्या होगा। गुरुजी ने कहा युद्घ ७ दिन में बन्द हो जायेगा। एक बार जुगलकिशोर बिड़ला जी ने गायत्री तपोभूमि गुरुजी के साथ घूमकर बड़ी प्रशंसा की और प्रार्थना की कि भारतीय संस्कृति के इस कार्य में क्या मैं थोड़ा सहयोग कर सकता हूॅं गुरुजी ने कहा अवश्य पूरा सहयोग करिये। पर हमारे और आप के बीच में पैसे को मत आने दीजिये। नहीं तो यह तपोभूमि बिड़ला मन्दिर बन जायेगी। जुगलकिशोर बिड़ला जी बोले तो फिर मेरी एक प्रार्थना स्वीकार करेंगे गुरुजी ने कहा अवश्य। वे वोले मेरी प्रार्थना है कि मेरी मृत्यु के समय आप मेरे सामने बैठे। गुरुजी ने कहा यही होगा और उनके अन्त समय उनका टेलीग्राम आया था और गुरुजी दिल्ली पहुॅंचे उनकी मौन भाषा न तो किसी ने सुनी और न ही गुरुजी ने मुझे बताई।

चेतन्य बड़ेरिया जी पण्डित लीलापति शर्मा जी को सर्वप्रथम मिशन में लाये। डबरा स्टेशन पर उनसे मिलना हुआ। काफी दिनों बाद जब चेतन्य जी मथुरा आ गये तब उन्होंने गुरुजी से पूछा कि गुरुजी अब तो हम नौकरी छोड़का आ गये पर आप यह बतलाइये कि युग निर्माण होगा कैसे दूर दूर तक कोई आसार नहीं। गुरुजी ने कहा अच्छा तो सुन मेरे गुरु ने मुझसे कहा कि तू मुर्गे की तरह बाँग लगा तूने कभी मुर्गा देखा है बाँग लगाते हुये किस अकड़ के साथ गरदन टेड़ी करके बांग लगाता है ऐसे ही मुझको कहा तू बांग लगा युग निर्माण होकर रहेगा। मेरे दिल में भी एक ऐसा ही मुर्गा बैठा है जिससे मुर्गे की तरह यह मालुम पड़ जाता है कि सबेरा होगा और वह अकड़कर बांग लगाता है इसलिये मैं तुझसे कहता हूैं कि तूं बांग लगा युग निर्माण होकर रहेगा। सबेरा मुर्गा नहीं करता सबेरा करने वाला कोई और है। तू मेरा छोटा मुर्गा है तू मेरा कहना मान मुझे तो पूर्व सूचना है ही तू थोड़ा सहयोग और उत्तरदायित्व निभा युग निर्माण हो जायेगा।

इस संस्था से मेरा पहला परिचय मैं अपने बड़े भाई डॉ० धीरेन्द्रनाथ दत्त से मिलने मरदानपुर गया। हम लोग नॉंव में नरबदा पर जा रहे थे और वे वेद- द्वैत अद्वैत की बात सुनाने लगे। मैंने कहा इतना ज्ञान कहां से आया। उन्होंने कहा कि एक मास्टर साब ने एक किताब दी है उसमें सब कुछ है। मैंने कहा यह किताब मंगा दो कितने पन्ने की है मैं पढ़ ढालूगां। उस दिन नॉंव नहीं ढोगी में हम लोग ढूबते-ढूबते बचे और उसके बाद हमारे बड़े भाई तो कभी नॉंव में बैठे ही नहीं। इंदौर आकर मैंने किताबें मंगाई गुरुजी को सम्पादक जी लिखकर और किताब पढ़कर मानो कनेक्शन ही जुड़ गया और उस दिन से जब तक आ नहीं गया यहॉँ यानि सन् १९८३ तब तक नियमित लगभग ३०० पत्र में लिख चुका हाऊंगा। मैंने अपनी सारी कमियॉं और बुराईयॉं गुरुजी को लिख दी। पत्र का उत्तर मिला जीवन पर्यन्त हमारा मार्गदर्शन मिलेगा।

माताजी के पास शायद बिना कुछ सोचे और जाने समर्पण होगा। पहला पत्र मैं किस तरह से अच्छा लिखूं यह सोचने लगा फिर मैंने तुलसी दास जी की विनय पत्रिका निकाली और उसी की नकल के आधार पर पत्र लिख दिया और सर्वप्रथम अपने पिता डॉ० नगेन्द्रनाथ दत्त के साथ माताजी से मिला। मेरे पिताजी ने कहा था आज केवल दो व्यक्ति के पास अध्यात्म है एक हैं हनुमान प्रसाद पोद्यार (तब वे थे) और दूसरे पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य। उन्होंने सैंट्रल लायब्रेरी में गुरुजी की बहुत किताबें पढ़ी थी। पिताजी ने ही मुझे ३ रुपया प्रतिवर्ष सदस्यता पर अखण्ड ज्योति का पाठक बनाया।

पहली बार पिताजी के साथ मथुरा सन् १९५९ में गया था। तपोभूमि में ठहरा था। उस समय मैंनेजर द्वारका प्रसाद जी थे। प्रातः तॉंगे में हम दोनों तपोभूमि से घियामंडी जाने लगे। बस हम तॉंगे में बैठे ही थे कि ऐसा लगा कि मुझे माताजी में जाने क्या मिलने वाला है मेरी कौन सी खोई हुई बहुमूल्य चीज मिल रही है। मेरे पूर्व जन्म की कौन सी असफलता सफलता में बदलने वाली है। कोई बहुत बड़ी चीज के पास मैं आता जा रहा हूॅं। एक अपार खुशी मालुम नहीं क्यों अनुभव कर रहाथा। माताजी के चरण स्पर्श करूंगा पर छोड़ूगा नहीं जब तक वे मुझे अपना न ले। क्या चरण पकड़े रहना अच्छा होगा क्या सभ्यता होगी क्या करूं क्या न करूं मुॅँह से जोर से आवाज निकली जैसे की माताजी के पास पहुॅंच गया- माताजी पिताजी बोले क्या हुआ। मैंने कहा कुछ नहीं बाबा। मैं संभला और पहुॅंचा चरण स्पर्श किये मैंने पूछा गुरुजी कैसे लिखते हैं। माताजी बोली बहुत तेज लिखते हैँ और कलम उठाते नहीं। मैंने कहा क्या वे मुझको आप की ही तरह प्यार करेंगे। माताजी ने कहा मुझसे भी अधिक। मैंने पूछा माताजी आप मुझे गायत्री मंत्र सुनाये, अखण्ड दीप दिखायें और कहा कि गुरुजी तुमसे ५ जून १९६१ में आकर अवश्य मिलेंगे। खाना खाओं। पिताजी ने कहा हमारे यहॉँ रिश्तेदार हैं वहॉँ खायेंगे। माताजी ने बड़े अधिकार के साथ कहा खाना रिश्तेदार के घर नहीं अपने घर खाना चाहिए। चुपचाप हम लोगों ने खाना खाया और माताजी के हाथ का खाना सन् १९७१ तक खाते रहे। घी चुपड़ी रोटी और अचार अवश्य होता था। बर्तन हमेशा माताजी ही मांॅजती थी कभी छीने नहीं देती थीं। इसके बाद तो आना जाना बना ही रहा। हमारे छोटे भाई यतीन बहुत अधिक जाताा था। हमारा पूरा परिवार औरशादी के बाद श्रीपर्णा नियमित जाते थे। श्रीपर्णा को गुरुजी बहुत प्यार करते थे। सतीश गुरुजी के पुत्र तथा चंद्रशेखर शर्मा गुरुजी के बहन के लड़के हमारे बहुत अच्छे दोस्त रहे हमारे साथ साथ रहते थे और आज भी है। गुरुजी की माताजी ताई जी हमको बहुत प्यार करती थी और हमारीऔर चंद्रशेखर की खाने पर प्रतीक्षा करती रहती थी। हम कभी चूकते तो दूसरे दिन पूंछती क्यों नहीं आये हम दोनों हॅंसते क्योंकि हम दोनों बाहर खाना खा लेते थे।

प्रो० रामचरण महेन्द्र जी कोटा में प्राध्यापक थे एवं अखण्ड ज्योति के सह सम्पादक। गुरुजी के मित्र एवं शिष्य भी। उन्होंने कई किताबें लिखी। एक दिन हम और चंदा उनको स्टेशन पहुॅंचाने की जिद करने लगे। तो उन्होंने गुरुजी से मना करने के लिये कहा। गुरुजी बोले ये ओकट फोकट हैं इनको जाने दो। रास्ते में तॉंगा पलट गया और कोई चोट नहीं आयी। हम लोगों को चाय पीने की आदत थी ज्यादा रात मेंमथुरा में कहीं चाय नहीं मिली तो हम लोग दूध ले आये और सतीश से कहा कि कहीं सेस्टाव्ह, चाय की पत्ती और शक्कर का इंतजाम करो। हम लोग तलघर में ठहरे थे सतीश पं० लीलापत शर्मा जी के पास गये और बोले कि डाक्टर साब के चोट आ गई है इसलिये सेक करना है और रसोई में जाकर के स्टोव्ह के साथ शक्कर और पत्ती भी ले आये। पण्डित जी हमको देखने चले आये फिर तो बड़ी मुसीबत थी सतीश जी बोले डाक्टर अभी-अभी सोया है उनको मत जगाओ। पण्डित जी को पता लग गया और सबेरे गुरुजी से शिकायत की। गुरुजी ने कहा लीलापत रोज इनके चाय पीने का इंतजाम कर दो।

गुरुजी से पहली बार १४ जून १९६० को मिला। गायत्री जयंती का दिन और यही दिन उनके अन्तिम दर्शन का भी था। मैं घियामंडी पहुॅंचा नीचे बैठा रहा और फिर किसी से पूंछा। गुरुजी यहॉँ आयेंगे क्या। एक कर्मचारी ने कहा सामने जो जाली में घूम रहे हैं वह गुरुजी हैं। चले जाओ। मैं सीढ़ियों से चढ़ा प्रणाम किया। गुरुजी ने पूंछा अकेले आये। मैंने कहा जी। तभी मैंने माताजी को प्रणाम किया। १०, १२ व्यक्ति गायत्री जयंती के दिनखाना खा रहे थे उनके साथ बैठ गया। मैंने देखा कि माताजी ने गुरुजी के कान में कुछ कहा।माताजी को मैँ विनयपत्रिका की नकल करके भावनापूर्ण पत्र लिखा करता था। माताजी की बात सुनकर गुरुजी जहॉँ हम खाने बैठे थे आये। और बोले अमलकुमार कौन है। मैँ घबराकर खड़ा हो गया। गुरुजी बोले बैठो-बैठो खाना खाओ। खाना खाकर तपोभूमि मेरी प्रतीक्षा करना मैँ पूजा करके आता हूॅं तुमसे बहुत बातें करनी हैं। मुझे खुशी, आश्चर्य और उत्कंठा सब एक साथ होने लगी। तपोभूमि गया और प्रतीक्षा में सो गया। गुरुजी सामने आकर खड़े हो गये मैँ उठ गया और यज्ञशाला के सामने खड़े होकर परिक्रमा मेंबहुत लम्बी बातचीत हुई। उन्हीं बातों में मुझे विश्वास हो गया कि गुरुजी ने मुझे अपना लिया और मैँ उनका हो गया। ऐसा मैं क्यों कह रहा हूॅं क्योकि वे मेरे दिल और दिमाग में छा गये। समय लगभग २ बजे का होगा बिना किसी परिचय के या गुण के इतनी लम्बी प्रेमभरी बातें जैसे माना अज्ञात तालों की कितनी ही चाबियॉं वे मुझे देते जा रहे थे। उन्होंने कहा तुम गायत्री मंत्र से साधना शुरू करों पर मूल वस्तु साधना की सफलता है और वह है तुम एक अच्छे इंसान बनो। बिना उसके पूजा में कुछ नहीं मिलेगा। और यदि तुम एक अच्छे व्यक्ति एक अच्छे डाक्टर बन सके तो तुम्हारी २, ३ माला लौकिक और पारलौकिक सुख से भर देंगी। तुम एक बहुत बड़े अस्पताल के एक शानदार डाक्टर बनोगे। मैँ यह सारी बातें ऐसे ही नहीं कहता मैँ जानता हूॅं मैँ तुम्हारे साथ हमेशा मदद के लिये रहूॅंगा। वेसाथ-साथ घूमते कभी रुकते और कभी चलते और मैं सुनता। उस समय गुरुजी के अलावा न मैँ था और न ये दुनिया। मेरे गुरु तो वह २७ जुलाई १९६१ यानि १३ दिन बाद गुरुपूर्णिमा पर बने। गुरुजी ने स्वयं अकेले मुझे गायत्री तपोभूमि यज्ञशाला में दीक्षा दी मैंने जो दक्षिणा दी उन्होंने कहा इसकी रसीद कटाओ। गुरुजी कहते थे उलझे को सुलझाना और रूठे को मनाने की कला ही जीवन की सफलता का एक मत्र है।

गुरुजी सन् १९६१ में हिमालय की यात्रा से लौटे ही थे और मैँ दूसरी तीसरी बार ही मिला था कि तपोभूमि गेट के दायी ओर हाल में २०, २५ लोगों की गोष्ठी ले रहे थे। वार्ता उद्बोधन के बाद गुरुजी ने ऊंगली से दिखायाा एक दो तीन चार पाच ये व्यक्ति घियामंडी पहुॅंचे। विशेष बात करनी है। बाद में उठकर मुझसेकहा इन पॉंच में तुम भी एक हो। मैं बिल्कुल नया गायत्री से जुड़ा था। पिताजी मेरे राम के भक्त थे। उन्होंने कई बार रामायण पढ़ी और गोस्वामी तुलसीदास जी को अपना गुरु मानते थे साधु सन्तो का नाम सुनते ही मिलने जाते थे। बहुत धार्मिक और दयावान आदमी थे। कष्ट में हरएक को मदद भी करते थे और रामनामबहुत लिखते थे। और जिसको प्यार करते थे उसके नाम से भी रामनाम लिखते थे। मैँ भी रामनाम और हनुमान चालीसा बहुत पढ़ता था। उस दिन गुरुजी ने अखण्ड दीपक साधना कक्ष के सामने बैठकर हम पॉंच व्यक्तियों को जो चटाई पर बैठे थे शक्ति संचार साधना की प्रथम दीक्षा दी। ये व्यक्ति थे १. जानकीवल्लभ जोषी, पुलिस अधीक्षक, जिनको ईमानदारी का पद प्राप्त हुआ था। कलकत्ते का परिवार एक और कोई था, और मैं गुरुजी ने कहा मैं और मेरे गुरु रविवार और बृहस्पितिवार को सूर्याेदय के एक घण्टे पूर्व से सूर्याेदय के एक घण्टे बाद तक तथा रात को ९ से साढ़े ९ बजे तक शक्ति का संचार करेंगे। किसी एक समय तुम लोग सिर्फ चुप बैठना। यदि इस शक्ति का सही उपयोग करोगे तो यह निरन्तर मिलती रहेगी। मैँ करता रहा और आज भी लगभग नियमित ही करता हूॅं। और मैंने एक दिन पूंछा गुरुजी मुझे तो कुछ भी नहीं मालुम पड़ता लगभग २५ वर्ष तो हो गये। गुरुजी बोले बेटा बिटामिन सी खाने से कुछ फायदा होता है। मैंने कहा गुरुजी यदि कमी होती है तो जरूर फायता होता है। वे बोले फायता मालुम पड़ता है मैंने कहॉं गोली क्या कर रही है यह तो मालुम नहीं पड़ता लेकिन तकलीफ दूर हो जाती है। गुरुजी ने कहा बेटा यह अच्छा है कि तुझे कुछ नहीं मालुम पड़ता जिस दिन मालुम पड़ने लगेगा उस दिन पगला जायेगा। ऐसे ही ठीक है।

गुरुजी सुनाते हैं कि आध्यात्म की खोज में मैं बहुत घूमा और कई प्रकार के ढोंगी व्यक्तियों सेभी मिला जिसका वर्णन मैंने योग के नाम पर मायाचार किताब मेंलिखा है। गुरुजी ने एक अखण्ड ज्योति में कुछ जादू भी सिखाये। उनमें से कुछ मुझे अभी भी याद हैं। इसके अतिरिक्त गुरुजी शान्ति निकेतन अरविंद आश्रम बिनोबा भावे तथा गॉंधीजी के आश्रम में भी रहे। मालुम नहीं क्यों गुरुजी कभी कलकत्ते नहीं गये। मालुम नहीं क्यों। गॉंधीजी के आश्रम में २, ३ महीने रहने के बाद जब उनको कोई आध्यात्म नहीं दिखा तो एक दिन वहॉं के व्यवस्थापक ने गॉंधीजी के साथ गुरुजी को घूमने भेज दिया। यह व्यक्ति थे मनुभाई देशाई। उन्होंने कहा तुम अपना प्रश्न गॉंधीजी से ही कर लेना। गुरुजी ने अपना प्रश्न रख दिया। साफ शब्दों में। गॉंधीजी बोले तुमसे जो छोटे काम यहॉं कराये और अच्छी तरह से किये बस एक बात का ख्याल करना कि काम इतना इच्छा करना कि उससे अच्छा हो ही न सके। यही है अध्यात्म का दर्शन। पाखाने की सफाई इतने अच्छे से होनी चाहिए कि वहॉँ बैठकर खाना खाया जा सके। दातून काा उतना हिस्सा कैची से काटकर फैक देना चाहिए। जिसका उपयोग कर लिया गया हो पूरा नहीं। और एक बात याद रखना। स्वतंत्रता के बाद तुम राजनीति में न रहना। रााजनीति में मैंने जिस चरित्र चिन्तन और आध्यात्म का उपयोग किया उसका समयानुसार प्रयोग तुमको समझाना होगा। बिना चरित्र के और आदर्श के कोई देश समृद्घिशाली नहीं हो सकता। यह काम तुम सम्भालना।

यदि कोई व्यक्ति जरा भी अच्छा काम करता तो गुरुजी बहुत प्रशंसा करते। गुरुजी का कार्यक्रम गोरखी में था। गोरखी ग्वालियर में था जिसमें महाराजा विजयाराजे सिंधिया, मुख्यमंत्री एवं हाईकोर्ट जज शिवदयाल शर्मा जी भी थे। मैँ बुक स्टाल पर काम कर रहाथा। इन किताबों में क्या है और क्यों उपयोगी है बताबताकर बेच रहा था साराी किताबें मथुरा से आयी थी। यह घटना ६० के दशक की होगी उस समय लगभग दो ढाई हजार रुपये की किताबे तीन दिन में बिक गयी। गुरुजी को पता लगा उन्होंने बड़ी प्रशंसा की। गुरुजी ने कहा बेचने वाले के साथ उसका दिमाग, दिल पुरुषार्थ एवं मनोयोगछाया रहे तब किताबे बिकती हैँ। ज्ञानदान बड़ा दान है लेकिन उसकी उपयोगिता केवल तब है जब वह अपना प्रभाव चरित्र, चिन्तन और व्यवहार में दिखाये और तब यह छोटा काम तप बन जाता है और जैसे पदार्थ जगत में पैसे से कुछ भी खरीदा जा सकता है वैसे ही इस तप की पूंजी से प्रारब्ध कट सकते हैं। आध्यात्म शक्ति अर्जित की जा सकती है और चेतना का विकास किसी भी हद तक किया जा सकता है।

गुरुजी कहते थे जिसे व्यवस्था नहीं आती वह ब्रह्मराक्षस है और व्यवस्था का मतलब है किसी भी अच्छे और बुरे व्यक्ति से उसके गुण के अनुसार काम ले लेना। मुझे चोर पसन्द है पर पैसे का ठीक हिसाब रखना नहीं। प्रमाणिकता ही मनुष्यता का सम्मान है।

सतीश की शादी थी। शादी जब पक्की हुई तब गुरुजी ने अपने परिवार के बड़े बुजुर्गाे के लिए एक-एक रुपया लिया था मुझे और अपर्णा को एक-एक नोट लिफाफे में भेजा। शादी में मैँ गया। गायत्री तपोभूमि में यज्ञशाला की दीवाल से टिककर फर्श पर बैठे थे। हम लोग सामने बैठ गये। गायत्री मन्दिर के आगे मैंने कहा गुरुजी एक प्रार्थना है गुरुजी ने कहा पहले मेरी सुन। ८, १० व्यक्ति जो शादी में आये थे उनके साथ मैं भी बैठ गया। गुरुजी बोले कि जो कोई व्यक्ति शादी के लिये कोई उपहार लाया हो उसे वह अपने बक्स में ही रखे रहे नहीं तो उनका उपहार मैं नाले में फेंक दूंगा। सारे जीवन का एक ढंग मैं अपने लड़के की शादी में नहीं तोड़ूगाठीक से याद रखना। इससे पहले कि गुरुजी मुझे ढ़ूढ़ते कि मैँ भाग गया। मेरी बात बिना कहे ही ना हो गई।

गुरुजी बड़े मस्त थे। सतीश की शादी हो रही थी, हम लोग बस से मथुरा से आगरा गये थे शादी के समय हम लोग लिहाफ में बैठे थे गुरुजी के साथ। बुलाने आये गुरुजी बोले मेरी शादी थोड़े ही है सतीश की शादी है तो उसे ले जाओ। गुरुजी मुझसेबोले कि अमलकुमार तूं यहीं बैठ और अपना आधा लिहाफ मेरे पैरो पर ढक दिया। गुरुजी का कोई भतीजा जिनका नाम कुछ सतीश जैसा ही था अपने जीजीजी की बहुत तारीफ कर रहा था। गुरुजी सुनते रहे और फिर बोले तुमने अपने जीजा जी की बहुत तारीफ करी बस एक बात की कमी रही की तुमने यह नहीं कहा कि हमारे जीजीजी को गायत्री मॉँ चाय पिलाती थी। तभी एक बैंक में काम करने वाला रिश्तेदार बोला कि गुरुजी हमारे यहॉँ एक लेडी डाक्टर है सरकारी अस्पताल में डॉ० कुट्टी वे झूठे बिल दस्तखत करती है चाहे जितने बिल दस्तखसत करा लो २५ प्रतिशत उनका १० प्रतिशत दुकान वाले का बाकी कर्मचाराी का। जब कोई पूंछता कि यह नया जूता कहॉं से लिया तो कर्मचारी कहते यह कुट्टीमार का जूता है। बात समझ में आ जाती। मौका देखकर मैं भी बोल उठा गुरुजी मैंने अभी अभी एमएस कहाा है और हमारे सिविल सर्जन डाक्टर शुक्ला बड़े अजीब आदमी हैं। एक बार स्टेशन पर अपनी पत्नी को ही चॉंटा मार दिया सबको परेशान करते हैँ। मैंने जैसे ही अशोक नगर में ज्वाइन किया और एक पत्र भेजा तोउन्होंने उस पत्र पर लिख दिया डाक्टर दत्ता एमएस अटेन्शन प्लीज गुरुजी बोले उनका तबादला कहीं क्या कहतेहैं जो मेडीकल किताब बनाते हैँ। मैंने कहा मेडीकल मैनुअल। वहॉँ क्यों नहीं कर देते मैंने कहा गुरुजी यह तो बड़ा कमाल होगा और बहुत अच्छा भी मेरी जान बचेगी। लौटकर आया तो सर्जन शुक्ला जी का तबादला डिप्टीडायरेक्टर मेडीकल मेनुअल भोपाल हो गया।

गुरुजी देवास आये सन् ६६-६७ में जहॉं हम और हमारा छोटा भाई दिलीप सपरिवार रहते थे वहीं ठहरे। अरविंद और विवेक यानी बच्चेंा के संस्कार वहीं हुये। गुरुजीर बोले दिलीप हम तुम्हारे घर ठहरे हम कुछ देकर जा रहे हैं मालुम है क्या? दिलीप बोला गुरुजी आप बतलायें। गुरुजी बोले तेरे ये दो बच्चे जो जुड़वा हुये है इनमें एक का ही जीवन था अब ये दोनों पूरा जीवन जियेंगे। खाना खाते खाते मैंने कहा गुरुजी आप अज्ञातवास जायेगे तो ताई जी यानी गुरुजी की मॉं का क्या होगा। गुरुजी बोले मैँ उनके लिये स्थान ढ़ूढ़ रहा हूं वे किसी की गोद में खेलेगी। मैंने कहां वह स्थान कहॉं है गुरुजी बोले बम्बई। मैंने कहा किस घर में गुरुजी बोले तू क्या करेगा जानकर। मैँ चुप हो गया।

देवास में गुरुजी कही जाने की तैयारी में थे। कार से मुझे बुलाया दत्ता एक बात सुन जी गुरुजी देख जो व्यक्ति चार आदमियों को मेरे साथ खाना खाने बुलाये उसके यहॉँ तीन जायेंगे और जो तीन को बुलाये उसके यहॉं दो और दो को बुलाये उसके यहा मैँ ऐसा ही हो इसकी जिम्मेवारी तेरी है।

गुरुजी जीवन के सूत्र बड़ी सरलता से समझा देने थे कहते थे यदि तुम्हें कोई बड़ी चीज खरीदना हो तो उसमें प्रेम जोड़ देना जैसे रेडियो, घड़ी, फर्नीचर तो पत्नी के जन्मदिन याा विवाहदिवस पर जोड़कर आगे पीछे खरीदना जैसे बच्चों के जन्मदिन पर यदि किसी के घर ठहरो या उपकार लो तो शालीनता का पूरा ध्यान रखना। मिठाई का डिब्बा ले आये या पिक्चर दिखा दिया यह काफी नहीं है या तो सीधे पैसे दो या यह पता लगाकर कि उनकी आवश्यकता की चीज क्या है वह दो।

गुरुजी माताजी जीवन भर खादी पहनते रहे और वह भी गिने चुने कपड़े। लेकिन साफ और क्रीजदार। गुरुजी माताजी के जन्मदिन और विवाह दिवस पर स्वयं जाकर साड़ी खरीदकर लातेथे। एक बार कोई दूसरा व्यक्ति माताजी के लिये साड़ी लाया तो गुरुजी बहुत दुखी हो गये। गुरुजी बोले माताजी की साड़ी तू लाया तो मुझे दुखी कर दिया तू अपनी साड़ी वापिस सले जा माताजी की हर साड़ी पर मेरी जिम्मेवारी साड़ी नहीं स्नेह की भी है।

तीस वर्ष में सन् १९६० से ९० के बीच यह दूसरा समय था जबगुरुजी मुझपर नाराज हुए। एक नया लड़काथा केशरवानी उसको स्टाल पर हम लोगों ने काम दिया। अब वह सबेरे सेशाम तक बुक स्टाल खुला रखता। अखण्ड ज्योति के सदस्य बहुत बड़ी संख्या में बनाता। हमने उसको सारी जिम्मेदारी सौंप दी और वह जो सदस्य बनाता था वह ऊपरी रसीद पर तो ३५० रुपया लिखता था यानी आजीवन और कार्बन के नीचे ४० रुपया। काफी पैसे लेकरभाग गया। ब्रह्मवर्चस के बुद्घिजीवी कहलाने वाले सवों की गुरुजी के सामने पेशी हुई। गुरुजी बोले किसी आदमी का ऊपरी दिखावा या कार्य नहीं देखा जाता गहराई से जिम्मेदारी देने के पहले व्यक्तित्व परखना चाहिए दत्ता। इतनी ही खैर है कि यह केशरवानी तुझे अपना चेला बना कर नहीं ले गया। मैं सिर नीचा करके सुनतारहा हम लोग केशरवानी पर जरा ज्यादा ही विश्वास करने लगे थे।

सन् १९६७ में घियामंडी में गुरुजी ने कहा दत्ता तुझपर एक पॉंच कुण्डीय यज्ञ उधार है। मैंने कहा गुरुजी कब पटा दूं। गुरुजी बोले जून-जुलाई में कोई तारीख ले ले। मैं आऊंगा। मेरा मकान अस्पताल के साथ ही था औरगुरुजी वहॉं ६ दिन ठहरे। प्रातः चाय पीते में एक दिन बोले दत्ता में तुझे बहुत बड़ा आदमीबना सकता हूॅं। पर फिर तू एक अच्छा आदमी नहीं रहेगा। मैंने कहा गुरुजी मैं एक अच्छा इन्सान बनना चाहता हूॅं पैसे वाला नहीं। बड़ी प्रसन्न मुद्रा में गुरुजी ने कहा तो सुन तू अपने सारे जीवन में अगर पैसे फैकेगा तो भी तेरे पास मोटा खाने पहनने के लिये कभी कमी नहीं रहेगी यह मेरा आशीर्वाद है।

गुरुजी जाबरा सन् १९७१ में आये। बहुत अच्छा कार्यक्रम हुआ। कहते हैं इतनी बड़ी भीड़ जाबरा(म०प्र०)कइतिहासकभी नहीं हुई विजय सिंह एसडीओ पुलिस में तथा मेरे सहायक ५, ६ चिकित्सक तथा मेट्रन के साथ गुरुजी को अस्पताल का राऊंड लगवा रहे थे डॉ० माथुर ने बताया कि इस वार्ड के सारे मरीज डाक्टर दत्ता के आपरेशन किये हुये हैं और इनमें ३ व्यक्तियों को डाक्टर साब ने ही रक्त दिया है। गुरुजी बहुत प्रसन्न हुयेऔर बोले कि मै जप वाले नहीं ऐसे ही व्यक्ति गायत्री परिवार में चाहता हूॅं।

गुरुजी ग्वालियर गोरखी कार्यक्रम में आये थे। मैंने बुक स्टाल में काम किया २, ३ दिन में लगभग ढाई हजार रुपये की किताबें सन् ६८, ६९ में बेची। मैं गुरुजी के साथ ग्वालियर से मथुरा गया तो वेबहुत प्रसन्न होकर बोले कि मेरा सही स्वरूप मेरा साहित्य है और इस ज्ञान प्रसार का काम तूने मन से किया इससे मुझे बहुत अच्दा लगा और एक बात याद कर कि यदि मैं किसी को प्यार करता हूॅं तो वह छोटी बात नहीं है बड़ी बात है। गुरुजी जब गोरखी में स्नान करके बैठे ही थे कि हम ४, ५ व्यक्ति उनके सामने बैठ गये एक दम गुरुजी ने बोलना आरम्भ किया कि मैं इस डाक्टर को क्यों नहीं मदद करूंगा। मैं इसके काम से सूझबूझ से प्रसन्न हूॅं। और वे बोलते ही रहे बिना किसी रिफरेन्स के।

सन् ७२-७३ में गुरुजी अशोक नगर आये। तब मैं वहॉँ नहीं था। तायड़े साहब केयहॉं ठहरे थे। डॉ० प्रणव और जयपुर की मम्मी जी भी वहॉं आयी थीं। गुरुजी बोले अमलकुमार तू श्रीपर्णा के गहने वापस लेले मेरे ऊपर यह भारी वजन मत डाल। उनके ऑंखों में आंसू भर आये बोले मैं उन्हें कैसे अपनेर पास रखूं मैँ नहीं रख सकता। मैंने कहा गुरुजी मैं बहुत शरमिंदा हो रहा हूं। यह तो आपके चरणों में प्रणाम है क्या आप उसे लौटायेगे। आप कुछ भी करे किसी को भी दे बस ऐसा फिर कभी न कहें। मैं भी रोने लगा।

सन् १९७१ में गुरुजी अज्ञातवास जाने वाले थे। बिदाई में बहुत भीड़ थी वे मेरे पास आये और बड़ी प्रसन्न मुद्रा में बोले देख कितने डाक्टर हैं। मै रोने लगा। आगे कौन मुझे कौन इस नाम से बुलायेगा। गुरुजी सब कुछ समझ गये बोले मैं तुझे बिना सिविल सर्जन बनाये मरूंगा नहीं। अज्ञातवास से वापस आकर हरिद्वार में मुझे बहुत आशीर्वाद दिया कि तू माताजी की बीमारी में आया था मुझे एक एक बात की सूचना है। मैंने माताजी से कहा कि आपने बंगलादेश बनने की सारी सूचना गुरुजी को दे दी क्या। माता जी बोली अमलकुमार इस बंगलादेश की स्थापना में गुरुजी प्रथम पंक्ति के दर्शक ही नहीं भाग लेने वाले व्यक्तियों में बहुत क्रियाशील रहे हैं।

मैं एक बार बहुत परेशानी में फंस गया। एक मुसलमान ने मेरे ऊपर एक कोर्ट केस कर दिया गुरुजी ने कहा अमलकुमार मैँ अपनी अप शक्ति देकर भी कुछ नहीं होने दूंगा। यानि तुझसे कोई कुछ पूछ ही नहीं पायेगा और सचमुच कुछ ऐसा हुआ कि मेरे विरोध में न गवर्मेन्ट के सचिव आये न कोई विभाग का अफसर न कोई पुलिस और कोर्ट ने गवर्मेन्ट को एक कड़ी लताड़ दी और तत्पश्चात ही मेरा प्रमोशन भी हो गया यह एक आश्चर्यजनक घटना हुई। शान्तिकुञ्ज बनने में एक दिन गुरुजी ने मुझसे कहा कि अमलकुमार मैंने अपनी अप शक्ति का एक अंश तेरे लिये रखा है।

गुरुजी के साथ में ट्रेन में मथुरा सेग्वालियर जा रहा था। उन दिनों रेल में इंटरक्लास भी होता था हम दोनों उसी में थे। गुरुजी के बगल में एक मिलिट्री का सिपाही बैठा था चेकर आया और टिकिट देखे सिपाही के पास थर्ड क्लास का वारंट था टिकिट चेकर ने उसका परिचय पत्र माँगा और रख लिया और कहा कि टिकिट और फाईन के पैसे दो तब मिलेगा। सिपाही बोला मैं अगले स्टेशन पर उतर जाऊंगा मेरा परिचय पत्र दे दो। पर दो बार प्रार्थना पर भी उसने नहीं माना हम लोग देख और सुन रहे थे गुरुजी सिपाही को समझाने लगे बेटा तूने ऐसा क्यों किया मिलिट्री वालों से हम लोग नियम की अधिक आशा रखते हैं मैं सोचने लगा कि मैं पैसे दे दूं पर गुरुजी के सामने हिम्मत नहीं हुई। गुरुजी ने कहा जा अपना परिचय पत्र माँग ले और उतरकर तीसरे दर्जे मेंबैठ जा वह बोला वह देता ही नहीं गुरुजी बोले जातो वह उठा माँगा और उसने दिया और वह शीघ्र उतर भी गया।

गुरुजी बोले अमलकुमार मेरे झोले में से एक छोटी शीशी है निकाल और बता यह क्या दवा है। कम्पाउण्ड इस दस बीस बूँद दवा के लिये २ रुपये ले लेता है दॉंत के दर्द की दवाा है। मैं घबराया कैसे पहचानूंगा। शीशी निकाली सूंघा गुरुजी यह तो लोंग का तेल है सर्वथा पहचाना। इसे क्रोटनआईल कहते हैं। गुरुजी बोले अब हर बार २ रुपये नहीं देने पड़ेगे।

गुरुजी बोले तू सामने बैठ अच्छा बता पैट्रन टैंक कैसे चलता है। मैंने कहा गुरुजी मुझे नहीं मालुम। गुरुजी ने कहा उसमें सारा फायरिंग सिस्टम कम्प्यूटर का है। हिन्दुस्तान पाकिस्तान युद्घ में पाकिस्तानियों का गणित लड़खड़ा गया इसलिये इस कारण लाहौर से अमृतसर यानी स्वर्णमन्दिर में एक भी बम नहीं गिरा पाये। इनका गणित हमेशा कमजोर होगा। इसी प्रकार चीन युद्घ में भी हिमालय के ऋषियों ने भारत को मदद की।

जुलाई अगसस्त ६७ में गुरुजी अशोक नगर आये। कार्यक्रम के बाद हम लोग पास के अमाई डेम घूमने गये। वहॉं शीघ्र उतरकर मैंने एक सुंदर सा गुलाब का फूल गुरुजी को दिया और कहा गुरुजी आपसे इतना प्यार हो गया है तो जब कभी चले जायेंगे तो हमारा जीवन कैसा होगा यह सोचकर घबराहट होती है। गुरुजी ने कहा बेटे प्यार बड़ी चीज है पर कर्तव्य उससे भी बड़ा है।

मैंने एक कविता लिखी और मैंने सोचा इसे माताजी को सुनाना चाहिए। इसके लिये मैंने अरुण पण्ड्या को पकड़ा और कहा कि यह तू माताजी को सुनाना। कविता का शीर्षक था जब तुम नहीं होगे। बहुत मार्मिक शब्द थे कुछ ऐसे कि किसी स्त्री से पूंछा जाये कि जब तुम्हारे पति नहीं होंगे तो क्या होगा। किसी बेटे से पूंछा जाये कि तुम्हारे पिता नहीं होंगे तो क्याहोगा। तो माताजी जब आप और गुरुजी नहीं होंगे तो शान्तिकुञ्ज का क्या होगा। माताजी बोली चुप बन्द कर और अरुण को भगा दिया।

अमाई रेस्ट हाऊस में हम लोगों ने चाय पी निर्मला राय ने एक गाना भी गाया और हम चाय पीकर जाने लगे गुरुजी बोले तूने उसके चाय के पैसे नहीं दिये। मैंने कहा गुरुजी कोई आवश्यकता नहीं है। शायद गुरुजी समझ गये। गुरुजी डांटते हुये बोले पैसे दे। मैंने ५, १० रुपये दिये यह रेस्ट हाऊस वाला हम लोगों से पैसे नहीं लेता था क्योंकि वहॉँ के दूध का पाउडर हमारे अस्पताल से ही जाता था।

गुरुजी विनोद भी बहुत करते थे। हमसे बोले तुझे कार चलाना नहीं आता। मैंने कहा गुरुजी मैं सीख रहा हूॅं और मेरा मन रहा कि जब तक आप रहे कार मैं ही चलाऊं पर अभी ठीक से नहीं सीख पाया गुरुजी बोले तू चला मैंने ड्रायवर को पीछे भेज दिया गुरुजी बतलाते रहे कार कैसे बचा बचा कर चलायें और हम अमई पहुॅंच गये। गुरुजी बोले अब मत चलाना नहीं तो ठोक देगा।

हम और गुरुजी सामने बैठे थे ड्रायवर बोला गुरुजी इस दायी तरफ बिल्डिंग में भूत रहता है गुरुजी ने कहा निम्मो यह ड्रायवर कह रहा है यहॉँ भूत रहता है संभलकर बैठ नहीं तुझे उठा ले जायेगा वह बोली गुरुजी आप बैठे है तो डर क्या। गुरुजी बोले गुरुजी तो सामने बैठे है पीछे से तुझे उठा ले गया तो मैं क्या करूंगा। सब हँस पड़े।

गुरुजी ग्वालियर आये। हम लोग स्टेशन पर पहुँचे। बड़े सेठ कई लोग थे। बड़े सेठ हरीशंकर गोयल जिनके मिल में पं०लीलापत शर्मा जी डबरा में काम करते थे वे अपनी चमचमाती हुई कार लेकर के आये थे। सब चाहते थे गुरुजी हमारे यहॉं चलें। मैं चुप था इतने बड़े लोगों में मैं क्या बोलता। प्रणाम कर खड़ा हो गया। गुरुजी बोले मैं अमलकुमार के यहॉँ जाऊंगा। चल काहे से चलेगा। मैं क्या बोलता गुरुजी चल रिक् शे से हम लोग तांगे से इंगले साब की कोठी पर अपने निवास पर आये। गुरुजी को टिमटिमाटी हुई टेबिल वॉच बड़ी अच्छी लगी। मैंगोशेक बहुत पसन्द किया। तथा बंगाली बेगुनभाजा चम्मच ने निकाल-निकालकर खाया।गुरुजी बोले अमलकुमार तुझे एक मजेदार बात बतलाता हूॅं। मैंने कहा गुरुजी मजेदार बात जरूर बतलाईये। वे बोले लोग अब अपने घरों से सोना निकालेंगे और सोना पहनना समाज में सभ्यता का द्योतक नहीं रहेगा। उन दिनों यदि शादी ब्याह में यदि कोई महिला सोना नहीं पहनती तो उसके लिये समझा जाता कि किसी गरीब केघर ब्याह गई है पर आगेवही हुआ जो गुरुजी ने कहा। चीन ने हमला किया और काफी मात्रा में सोना बाहर हो गया और उसके बाद से सोना पहनना रहीसी तो हो सकता है पर आधुनिकर सभ्यता नहीं।

गुरुजी कही से आकरग्वालियर से मथुरा रेल से जाने वाले थे। मुझे प्रोग्राम मालुम था। मुझे देखकर गुरुजी प्रसन्न हुये तूने ठीक अन्दाजा लगाया साधारणतया मैं कोई प्रोग्राम बदलता नहीं हूं। प्रातः 3, ४ बजे का समय था कुछ लोग आ गये। प्लेटफार्म पर गुरुजी कुर्सी डालकर बैठ गये और पॉंच छै आदमी गुरुजी के लिये चाय लाये। गरम चाय केतली में। गुरुजी बोले तुम में से कोई दो कप लाया है कोई नहीं लाया है। सब गुरुजी के लिये एक कप लाये हैं। गुरुजी ने कहा स्टाल से कप ले आओ और तुम सबो की केतली से थोड़ी-थोड़ी सब केतली से पिऊंगा। चाय लाने वाले न लाने वालों सेज्यादा शर्मिन्दा हो गये।

गुरुजी से मिलने के पहले तुम्हारी क्या कल्पना थी ऐसा क्याथा कि मिले और जुड़के रह गये।

गुरुजी की मुझे कोई कल्पना न थी। गायत्री महाविज्ञान पढ़कर बहुत अच्छा लगा पर फिर भी मन में यह सोचताथा कि सब गड़बड़ होगा। ऐसा हल्का सा विचार मन मेंआता रहा। सन् १९५९ में जब अपने बड़े भाई डॉ० धीारेन्द्रनाथ दत्त से मिलने मरदानपुर सीहोर गया तो नर्मदा नॉव पर गायत्री ज्ञान की चर्चा हुई। उस दिनडोंगी में डूबतेडूबतेबचा मैं नहीं जानता था कि वे एक साधक ज्ञानी या वेद अनुवादक हैं। माताजी ने कह दियाथा कि वहबहुत साधारण व्यक्ति है और तुमसे असाधारण प्यार करेंगे। मैं क्या जुड़ा उन्होंने जोड़ लिया मेरा तो बस प्यार का अधिकार था। कुछ ऐसा सोचलें कि जैसे अचानक ही किसी लड़की या लड़के को प्यार हो जाता है उनका अपनापन प्यारी बातें प्रेम से खाना खिलाना ने ही मुझे जोड़ लिया। गुरुजी जब शाम को घूमने मथुरा में जमुना किनारे ले जाते थे तो रेत पर अपना तोलियॉ बिछाकर कहते थे कि बैठो और स्वयं रेत पर बैठ जाते थे यह तो पागल बनाने वाला उनका प्यार था। मैँ उनके साहित्य और अखण्ड ज्योति का भक्त बन गया।

मैं मंदसौर कार्यक्रम में गया हुआ था।गायत्री परिवार के साथियों ने कहा कि आप यहॉं सरकारीअस्पताल में एमएस डाक्टररहे है तो यहॉँ के कलेक्टर से मिल लजिये। हम मिलने गयेऔर हमने पूंछा कि आप आचार्य श्रीराम शर्मा जी को जानते होंगे।उन्होंने कहा नहीं मैंने कहा मॉं भगवतीदेवी शर्मा जी को बोले नहीं मैंने कहा गायत्री परिवार या युग निर्माण योजना कोबोलेउसे भी नहीं मैंने पूंछा गायत्रीतपोभूमि शान्तिकुञ्ज को बोले नहीं। मैं सोचने लगा ये लोग मुझे कहॉं ले आये।मैंने फिर पूंछा आपने कभी अखण्ड ज्योति पत्रिका देखी है। वेबड़ेअचम्भे से बोले आप इसे कैसे जानते हैं। मैंने कहा मैं वहीं से आया हूॅं उसी का प्रतिनिधि हूॅं जहॉँ से यह पत्रिका निकलती है। वे बोले आप अखण्ड ज्येाति जानते हैं मैन कहॉं हॉं बोले आप सही में अखण्डज्योति जानते हैं मैं मन में सोचने लगा कि एक आईएएस कलेक्टर एक छोटी सी बात क्यो नहीं समझ रहा।फिर वे बोले मैं अखण्ड ज्योति पत्रिका का कायल हूॅं। डॉ० दत्ता आप जानते हो कि कलेक्टर कभी किसी को बुलाता नहीं दूसरों का ही डिनर खाता है लेकिन यदि आप अखण्ड ज्योति के विषय में बोले तो मैं मंदसौर के सारे डिस्ट्रिक्ट आफीसर सपत्नीक आज शाम को हमारे यहॉँ चाय पर बुलाते है। और तभी उन्होंने अपने एडमिनिस्ट्रेशन आफीसर को बुलाया और कहा कि सिविल सर्जन डिस्ट्रिक्ट जज और एस पी और सब डिस्ट्रिक्ट हेड को टेलीफोन और मेसेज भेजकर मेरे बंगले पर सपत्नीक चाय पर बुलाओं। डॉक्टर दत्ता आप अखण्ड ज्योति के विषय में बताना।

गुरुजी की पुस्तक गायत्री महाविज्ञान प्रथम भाग पढ़कर बहुत प्रभावित हुआ। इसे पढ़कर लगा कि इसके लेखक का चेतना का अनुभव ठीक वैसा ही है जैसा किसी एनाटामिस्ट का शराीर के अंग अवयवों का या फिजियोलाजिस्ट का उसकी एक एक कोष का ज्ञान होना बस मिलने की हूक उठती रही जिन्होंने कि मुझे पहली किताब का परिचय कराया था मास्टर साब कहते थे कि आप आचार्य जी से मिल नहीं सकते। क्योकि इतने बड़े सन्त से मिलना भी पूर्व जन्म की विशेष सम्पत्ति के बिना सम्भव नहीं है। मैं तीन बार असफल हो चुका हूॅं। मैंने निश्चय किया कि धरती पर यदि यह व्यक्ति है तो मुझे मिलने से कोई नहीं रोक सकता और मैं मिल लिया। मिलने पर तो वे मेरे मन पर छाये ही रहते थे। मुझे लगने लगा कि गुरुदेव सब कुछ जानते हैँ वे सब कुछ कर सकते हैं।

गुरुजी का पहला भाषण यानी गोष्ठी गायत्री तपोभूमि के हाल में १४ जून १९६१ में सुनी। उन्होंने कहा कि जोअगले तीस वर्ष तक मुझसे जुड़ा रहेगा उसके पूर्व जन्म में कुछ भी हो लेकिन फिर उसे किसी और चीज की आवश्यकताा नहीं होगी।मैं जिस किसी के लिये जो कुछ कहता हूॅं उसको सच होना ही होगा।

मेरे एक मित्र है रामसुंदर चतुर्वैदी। चेतनपुरग्वालियर ये मिडिल स्कूल में एक गॉंव में पढ़ाते थे। वे गायत्री परिवार में मेरे मित्र बन गये। उनकी शादी को काफी समय हो गया था पर उनका कोई बच्चा नहीं था। मुझसे बोले डाक्टर साब मेरी पत्नी की आपजॉंच करा दें। मैंने उनको लेडी डाक्टर को दिखा दिया और उन्होंने डायग्नोस किया इन्फेन्टाइलयूटेरस यानाी छोटी बच्चादानी बच्चे की कोई सम्भावना नहीं। हम लोग गुरुजीके पास गये। गुरुजी नेकहा रामसुंदर यदि तू बच्चे का मोह छोड़ दे तो मैं तुझसेबड़े काम कराऊंगा तू कर सकेगा। वे बोले गुरुजी पत्नी से बात करूंगा यानी टाल गये। अब उनके तीन चार बच्चे हैं।पर शायद कोई विशेष नहीं कर पाये।

गुरुजी का सार्वजनिक भाषण पहली बार ग्वालियर में सुना १९६२ में। और कहा कि धर्म संप्रदाय नहीं है एक अच्छेइंसान बनने का ज्ञानहै विज्ञान है कला है।

सन् १९६५-६६ में गुरुजी को मथुरा आनाथा लखनऊ छोटे स्टेशन पर दोपहर में हम लोग प्लेटफार्म पर इधर से उधर घूमते रहे। गुरुजी पूछते रहे एमएस के बाद तू क्या बनना चाहेगा। प्रोफेसर या सिविल सर्जन। मैंने कहा सिविल सर्जन। मैं बोला गुरुजी इस जन्म में तो मैं आपको छोड़ूंगा नहीं यदि पागल ही नहीं हो गया पर आगे मैं आपको पहचानूगॉं या नही अखण्ड ज्योति का सदस्य बनूॅंगा या नहीं नहीं कह सकता। गुरुजी ने कहा तू कभी पागल नहीं होगा। और जहॉँ तक मेरा साथ है मैं हमेशा तेरे साथ हूॅं। किसी न किसी रूप में रहूॅंगा। कभी तेरा अभिभावक तो कभी मित्र तो कभी अचानक। मैंने कहा गुरुजी कब तक। बोले जब तक तू पूर्णता की स्थिति प्राप्त नहीं करलेगा। मैंने मन ही मन प्रणाम किया क्योकि स्टेशन पर भीड़ थी।

सन् १९९० कुछ ही दिन पूर्व मैं माताजी से कहकर हम दोनो गुरुजी के पास गये और माताजी सेकह गये कि जबतक हम पूरी तरह बात नहीं कर लें हमको कोई टोके नहीं। माताजी ने कहा बिल्कुल ठीक है जा हम १९६० से उनके लिखे पत्रों में से कुछ चुनकर ले गयेथे। मेरे पहला प्रश्न था गुरुजी आपने इस पत्र में लिखा है कि मेरे बच्चों को मुझे सौंप देना ये मेरा काम करेंगे। अब एक अमेरिका में है और एक दिल्ली में इंजीनियर। मैं आपको कैसे सौंपूं। गुरुजी ने कहा ठीक है इसकी चिन्तातू छोड़दे। गुरुजी बोले तुम दोनों का मैं ध्यान रखूंगा।

सन् १९९४ में मैं अमेरिका स्थाई नागरिक यानीग्रीन कार्ड पर गया था। गुरुजी जाते समय बोले तू अमेरिका में क्या करना चाहता है। मैंने कहा किसी बड़े अस्पताल में काम करना चाहता हूॅं। बोले अच्छा तुझे काम मिल जायेगा। पर जम नौकरी मत करना। मैंने सोचो यह सम्भव कैसे होगा पर वही होगा। मेरे भाई ने मेरा इंटरव्यू हियूस्टन में विश्वप्रसिद्घ हृदय शल्य चिकित्सक डॉ० कुली के साथ रखवा दिया। मैं जीवन भर हर परीक्षा में पास होता रहा लेकिन ईसीएफएमजी में एक नंबर से फेल हो गया। मै अपने बेटे को छोड़ आया और मैं वापस आ गया।क्योकि मैँ यहॉं सिविल सर्जन था। गुरुजी मिलते ही बोले मुझे बड़ी चिन्ता थी जब तक अमेरिकाा में था अब ठीक है वापस आ गया। गुरुजी बोले बेटे अब तू सिविल सर्जन हो गया है टोलिया को बहुत मदद कर सकता है कार्यक्रम रख सकता है और यहॉँ भी आ सकताहै जैसा तेरा मन हो। हम और श्रीपर्णा साथ थे और मैंने कहा गुरुजी आप निर्देश दें मुझे क्या करना है मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है थोड़ा बहुत पैसा भी है पेन्शन भी मिल जायेगी हमें सिर्फ आपका निर्देश चाहिए। गुरुजी बोले तू आ जा। मैंने कहा जी। मैंने कहा मैं छुट्टी ले लूं पहले मैं २ साल सवेतन छुट्टी ले सकता हूॅं। गुरुजी फिर बोले जब तूने सोच ही लिया है तो बच्चों की सारी व्यवस्था मैँ करूंगा। मैं ऐसे ही नहीं कह रहा मैँ कर सकता हूॅं और मैं तू सिविल सर्जन से अच्छी करूंगा।

मथुरा में सड़क पर गायत्री तपोभूमि से घियामंडी हम गुरुजी के साथ पैदल चल रहे थे गुरुजी बोले जब कभी तुम सपने में अपने माता-पिता या मुझको देखो तो उसके तीन कारण होंगे। नं०-१ किसी विपत्ति को टालने कुछ निर्देश देने या आशीर्वाद देने। तभी सामने से एकर शवयात्रा आई। गुरुजी बोले शव कभी देखने पर उसके साथ २, ४ कदम चलना चाहिए। हम दोनों मुड़े और फिर घियामंडी की ओर। घियामंडी से फिर हम दोनों रिक्शे से स्टेशन गये। गुरुजी बोले मैं चाहता हूॅं कि मेरे बाद मेरे जैसा ही कोई प्यार देने वाला व्यक्ति मेरा स्थान ले तेरे दिमाग में है किसी का नाम। मैंने कहा हॉं गुरुजी बोल किसका मैंने कहा माताजी का। कहने लगे ठीक कहता है। पर माताजी एक तो घूम नहीं सकेंगी और दूसरा ज्ञान पक्ष। बाद में मैंने माताजी से कहा माताजी आपने तो इतना काम किया कि गुरुजी की बात भी झूठी कर दी आपबहुत घूम ली।

अशोक नगर की सड़क पर गुरुजी के साथ चल रहा था। वे बोले दत्ता मेरी ऑंख में कुछ हो गया। मैंने अपनी डाक्टरी को याद किया पूंछा गुरुजी क्या हो गया। बोले कुछ ऐसा है ऑंख मलते हुये कि मेरी ऑंखों में बुरा आदमी भी अच्छा दिखता है। यह रामावतार है न भोपाल वाला यह मेरे साथ चलता है और दूसरी संस्था की किताब बेचता है। पर जब सामने आता है तो मुझे अपना बच्चा लगता है। मैंने कहा गुरुजी ऐसी बीमारी थोड़ी सी मुझे भी दे दीजिये।

माताजी ने सुनाया घियामंडी में कि एक बार गुरुजी बाहर गये। अखण्ड दीपक की आग पूजा स्थल पर लग गई। मैं घबरा गई गुरुजी कोकुछ हो तो नहीं गया। बहुत घबराई। मैं अपने भगवान से बोली कि जब तक मुझे गुरुजी की सूचना नहीं मिलेगी मैं कुछ ग्रहण नहीं करूंगी। मैं बराबर चिन्ता में डूबी रही। शाम को किसी ने दरवाजाखटखटाया मैंने खोला। गुरुजी सामने थे बोले शेलो तुझे क्या हो गया मैंने कहा मैं ठीक हूॅं। माताजी बोली तुम कैसे हो फिर माताजी ने सब सुनाया। शेलो तू क्यों चिन्ता करती है कोई खास बात नहीं। खिड़की से मेरी ऊंगली कट गई एक लेकिन चोट के बाद तुम्हारी घबराहट ने मुझे परेशान कर दिया और मैं वापिस आ गया गुरुजी बोले तुम खाना खाओ और पानी पियो। गुरुजी सर पर पट्टी बांधे और हाथ में पट्टी वाली कहानी सुनाते हैं वही यहॉ सच हुई।

एम्बेसडर कार में गुरुजी के साथ पीछे हम और श्रीपर्णा बैठे थे। सामने लीलापत जी अशोक नगर से ग्वालियर जा रहे थे। दोपहर के खाने के बाद गुरुजी को नींद सी आ रही थी। पण्डित जी बोले गुरुजी यह ड्रायवर कुछ इतने में मैं बोल बैठा गुरुजी ड्रायवर साब ने थोड़ा सा आपका भाषण सुन लिया तो यह कुछ प्रार्थना करना चाहता है। वे बोले हॉँ ड्रायवर साब बोल बेटा क्या बात है। वह कार चलाता जा रहा था और बोला गुरुजी मेरी तीन बेटियॉं हैं ८०० रुपया महीना वेतन मिलता है। १००, १५० रुपया कभी खाली कार में सवारी बैठा लेता हूॅं। मैँ बच्चियों की शादी कैसे करूंगा। गुरुजी बोले चिन्ता मत कर तेरे पास पैसा जमीन तोड़ कर आये या आसमान फोड़कर आये बच्चियों की शादी के लिये पैसा मिल जायेगा यह मेरा आशीर्वाद है।

गुरुजी कुम्भराज जाने वाले थे। मुझसे कहा चलो मेरे साथ गाड़ी में। मैंने कहा गुरुजी मैं पीछे मोटर साईकिल पर आता हूॅं बोले नहीं मेरे साथ चलो। फिर थोड़े आगे बढ़कर बोले मुझे नींद आ रही है कुछ इंतजाम हो सकता है। मैंने कहा जी गुरुजी बस २, ३ किलोमीटर पर रेस्टहाऊस है वहॉँ विश्राम कर ले। बोले ये कैसे होगा। मैंने कहा एक तो गुरुजी मैं गुना में डाक्टर हूॅं दूसरे जो भी होगा उसे १०, २० रुपये दे देंगे। गुरुजी बोले तो ऐसा कर लेना।गुरुजी ने थोड़ा विश्राम किया और फिर रास्ते में एक छोटी सी दुकान जहॉँ पर एलम्यूनियम की पतीली में चाय बन रही थी बोले चाय पियेंगे। और पण्डित जीसे बोले वो जरा मिठाई वाला डिब्बा निकालो अमलकुमार ने खाना नहीं खाया। गुरुजी को दी हुई मिठाई जरा ज्यादा ही अच्छी थी गुरुजी बोले मेरे साथ रहोगे तो ऐसे ही आनन्दनकरोगे।

गुना से हम तीन भाई डाक्टर धीरेन्द्रनाथ, अभयकुमार और मैं कुम्भराज पहुॅंचे। हम लोग भोजनकरके खाली बदन बैठे थे कि राघवगढ़ से ६, ७ व्यक्ति आये। जो २० मील पैदल चलकर आये थे। उनको हमारे पास भेजा कि येगुरुजी से मिला देंगे। वे पूंछने लगे कि ये तीन मूर्तियॉं कहॉँ से आई है। हमारे बड़े दिन भर हॅंसते रहे कि तुम्हारे साथा थोड़ी देर रहने पर हमें भगवान की मूर्ति बना दिया इतने मेंगुरुजी का संदश्ेा आया कि जो राघवगढ़ से पैदल आये है उन्हें मेरे पास भेज दो।

माताजी को मैं बहुत भावनापूर्ण पत्र लिखा करता था। क्या लिखूं कैसे लिखूं जब समझ में नहीं आता तो विनयपत्रिकाकीभाषा का उपयोग करता था। औरयही कारण है कि मैं माताजी का बहुत स्नेह पात्र बना। पूर्वजन्म को तो मैं क्या जानूं।

हम तीनभाई मोटर साईकिल पर कुम्भराज जा रहे थे। सड़क पर हर फीट पर बड़े-बड़े पत्थर रखे थे। मालुम नहींमोटर साईकिल २०० गज तक बिना किसी पत्थर को स्पर्श किये चलती रही जब तक वह रुक नहींगयी। हर क्षण वह तेज मोटरसाईकिल पलटने की स्थिति में थी।

गुरुजी आये ही थे और फ्रेस हो रहे थे तब तक पण्डित जी ने सबों को रोक दिया। जो स्वयंसेवक खड़ा था उसेमैंने कहा कि पण्डित जी से कहो कि डाक्टर दत्ता आये हैं। गुरुजी ने सुन लिया और कहा आओ बच्चो आओ और कपड़े बदलते-बदलते बातचीत करते रहे। हम दोनों भाई से मिले हम दोनों भाई से बोले क्यो तुम्हारा प्रमोशन हो गया। मैंने कहा नहीं। बोले तो अच्छा इस साल तुम दोनों की फाईल निकलवाता हूॅं। और उसी वर्ष हम दोनों की प्रथम श्रेणी के पद पर पदोन्नति हो गई। तीसरे से बोले तुझे डाक्टर तोा नहीं बना सकता लेकिन तू डाक्टर के समकक्ष रहेगा। परिवार नियोजन मेरा काम है वह करना और गायत्री प्रचार भी। और वेतन सरकार वेतन टीए सरकार की लेते रहना।

मैंने मिलिट्री में एप्लाई किया चीन के युद्घ में। गुरुजी को पत्र लिखा। गुरुजी ने उत्तरदिया तू मिलिट्री में नहीं जायेगा। म०प्र० गवर्मेन्ट ने मेरी एप्लीकेशन वापिस कर दी और कहा तुम नौकरी छोड़कर मिलिट्री में जाओ।

एक दिन गुरुजी बोले देख बेटे प्रारब्ध तो नहीं बदला जा सकता कष्ट तो राम कृष्ण शंकराचार्य बुद्घ रामकृष्ण परमहंस सबको हुआ पर मैं अभिभावक की भूमिका जरूर निभाऊंगा।चोट लगेगी तो सबसे पहले पहुॅंचूगा अच्छे से अच्छा इलाज कराऊंगा। मेरे पास जो तप की पूंजी है समय पर उसका भी उपयोग करूंगा पर याद रखना हम बदला नहीं चाहते पर भगवान भी न्याय नहीं छोड़ता। अगर तुम अपने कष्ट दुख और हानी की कीमत पर किसी का चरित्र चिन्तन और व्यवहार नहीं उभारोगे तब तक मेरे उस तप का पटाना नहीं होगा और आगे तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा।

गुरुजी साधारण नहीं अतिसाधारण व्यक्ति थे। तीस वर्ष के मेरे उनके साथा रहने पर ऐसे कोई पॉंच मिनिट नहीं हुये जब मुझे प्रतीक्षा करनी पड़ी। मैंने उनको कभी पूजा में व्यस्त नहीं देखा जबकि वे नियमित ६ घण्टे पूजा करते थे। एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि गुरुजी तपोभूमि की यज्ञशाला में पूर्णाहुति पर न पहुॅंचे हों। चाहे जितने व्यक्ति आयें कोई भी ऐसा नहीं होता था जो न केवल उनसे मिल लेता था बात कर लेता था पर यह भी सुनता था कि और कुछ।

एक बार यतीन्द्र अमेरिका से आया। लगभग ५ बजे होंगे। मिलना चाहा तो किसी स्वयं सेवक ने मना कर दिया। उसने कहा ऊपर जाकरकहो की मैं यतीन्द्र अमेरिका से आया हूॅं। अमलकुमार का भाई हूॅं। थोड़ी सी बात करके लौट आये उनको एक कमरे मेंठहरा दिया यह सन् १९७१-७२ की बात होगी। उसके पास लगभग २ लाख व्यक्ति थे शान्तिकुञ्ज बिल्कुल सुनसान रहा करता था वह बहुत घबराया कि रात को कोई आ गया तो क्या करूंगा। अचानक रात को १० बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया यतीन्द्र कहता है कि मैँ बहुत घबराकर अपने बैग को बगल में रखकर यह सोचकर आ ही गया मैँ हिम्मत के साथ बोला तुम कौन हो। उसने जवाब दिया मैँ स्वयंसेवक हूॅं गुरुजी नेऊपर याद किया है। मैं गया गुरुजी ने कहा बेग माताजी के पास रखदे और चैन से सो। मैं आश्चर्य में पड़गया गुरुजी को कैसे पता चला।

सन् १९७१-७२ श्री ऊँ नारायण पंड्या जी याने श्री प्रणव जी के काका मेरे मित्र हैं हम लोगों ने तय किया कि गुरुजी से आत्मशक्ति पाने का रहस्य जानेंगे। पंड्या जी ने कहा कि हम गुरुजी को चाय पर बुलायेंगे हमारे तो वह अब रिश्तेदार भी होने वाले हैं। पर प्रश्न तुम पूॅंछना मैंने कहा ठीक है बात जम गई। मैंने गुरुजी से कहा हम दोनों ने तय किया है कि आप जो कहेंगे करेंगे। नौकरी छोड़ देंगे उपवास करेंगे। जप ध्यान जो कहेंगे करेंगे। पर हमें आत्मशक्ति चाहिए। आपने कई बार कहा कि मेरा सारा वैभव व क्षमता जो दिख रही है घासफूंस है। असली माल जो मेरे पास है आत्मशक्ति का प्रभाव वह तो निकाला ही नहीं है। हमें वह आत्मशक्ति चाहिए। गुरुजी आपसे हमारी यह प्रार्थना है। गुरुजी ने कहा बेटे आत्मशक्ति केवल उपवास, शीर्षाषन जप ध्यान से नहीं मिलती उसके लिये चाहिए प्रबल पुरुषार्थ। पूर्ण समर्पण तथा स्वार्थ अहंकार का पूरी तरह नाश। जो देश समाज और मानवता के कल्याण के लिये सब कुछ यहॉँ तक कि अपने प्राण भी दे देते हैं ऐसे भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद जब दूसरे जन्म में पैदा होते हैं तब वे आत्मशक्ति सम्पन्न होते हैं।

मैंने पूँछा। गुरुजी श्रद्घा क्या है। गुरुजी ने कहा। श्रद्घा आदमी के प्रति नहीं होती। आदर्श के प्रति असीम त्याग को कहते हं। निष्ठा क्या है। आदर्श को कर गुजरने का साहस। प्रेम क्या है। जो कुछ अच्छा है उसे चरित्र चिन्तन और व्यवहार के निर्माण में लगा देना। दुख क्या है। मन की अनुभूति। आनन्द क्या है। आत्मा का परमात्मा से स्पर्शबोध। अवतार क्या है। दुस्साहसपूर्ण आदर्शवादिता निभाना। उसका काम है टूटफूंट को ठीक करना नवसृजन करना तथा लाइन से हटी गाड़ी को फिर से लाईन पर लाना।

१९६७ में अशोक नगर में वहॉँ के स्टेशन मास्टर मिलने आये और पूंछा कि गुरुजी मुझे नींद नहीं आती क्या करूं। गुरुजी ने कहा नंबर-१ रात को दही खाना नं० २- शाम को खाने के बाद घूमना थोड़ा थकना ३- कोई एक अच्छा विचार करते रहना या भाषण टेप सुनना या किताब पढ़ना। जब वे चले गये तो मुझसे बोले दत्ता तुझे मालुम है इसे नींद क्यों नहीं आती। मैंने कहा नई गुरुजी बोले यह स्टेशन मास्टर है इसके नीचे काम करने वाला पार्सल क्लर्क व टिकिट चेकर खूंब पैसा कमाते हैं इसमें पैसा कमाने की यानी बेईमानी करने का साहस नहीं ईमानदार रहने का दम नहीं इस कारण मानसिक तनाव के मारण नींद नहीं आती।

गुरुजी अशोक नगर में ५ कुण्डीय यज्ञ में आयेथे। तीन दिन यज्ञ समाप्ति पर गुरुजी से मैं प्रार्थना करने गया कि वे दो दिन ठहर जायें लेकिन इससे पहले वे स्वयं बोले कि मैं दो तीन दिन ठहरूंगा कोई प्रचार न करना मुझे यहॉं से पास एक आनन्दपुर नाम का स्थान है उसका गहराई से अध्ययन करना है। मैं बिना प्रार्थना के प्रसन्न हो गया। गुरुजी बोले मेरा ठीक से देखने का इंतजाम कर देगा। मैंने कहा जी गुरुजी। बोले कैसे। मैंने कहा गुरुजी ये आनन्दपुर वाले महात्माा दो जनों से डरते हैं एक पुलिस एक कोर्ट। यहॉँ के जज विनोद कुमार सक्सेना मेरे मित्र है तथा पुलिस के एसडीओ पी भी। इन दोनों को आप के साथ कर दूंगा। ठीक है। श्रीपर्णा भी साथ गई पर गुरुजी ने मुझे जाने से रोक दिया और कहा इस समय हैजा फैल रहा है तुझे छुट्टी लेने का अधिकार नहीं है कोई बड़ा अफसर आ सकता है हुआ भी वही। आश्रम के बड़े स्वामी ने बड़े सन्मान के साथ आश्रम के सारे क्रियाकलाप व विशेषतायें दिखाई व आवभगत की। अन्त में गुरुजी ने एक प्रश्न किया कि आपने जो कुछ भी सब यह किया केवल अपने और अपनों के लिये पर क्या गॉंव के गरीब बच्चों के स्कूल अपाहिज या समाज के निचले वर्ग के लिये आपका आश्रम कुछ करता है। स्वामी को प्रश्न का उत्तर कठिन पड़ा।

मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी आप शरीर छोड़ने के बाद कहॉं जायेगे। क्या करेंगे। यह सन् १९६३-६४ की बात होगी। वे बोले कि मैं अपने गुरु का स्थान हिमालय में ले लूॅंगा। उनका क्या होगा। वे अपने गुरु का स्थान ले लेंगे। उनका क्या होगा। तो वे बोले विश्राम करेंगे। मैंने पूंछा विश्राम क्या होता है क्या सोयेगें, कितना सोयेंगे, क्या सोते रहेंगे। उन्होंने कहा नहीं विश्राम का मतलब होता है सूक्ष्म जगत में तप। वे सूक्ष्म शरीर से कारण शरीर में अपनी तप शक्ति से ही पहुॅंचते हैं और जब जब ईश्वरीय विधान को आवश्यकता होती है इनका उपयोग एक ऋषि या अवतारी के रूप में सृष्टि सन्तुलन का उत्तरदायित्व सौंपते हैं।

एक बार सन ्१९६२-६३ में मैंने पूंछा कि गुरुजी जब आप हिमालय चले जायेगे तो हमसे मिलेगे नहीं। बोले नहीं। मैँ सिर्फ माताजी से मिलूॅंगा। हिमालय के नीचे एक स्थान होगा। जहॉँ छत पर एक कमरा होगा।उसके आगे एक बराण्डा होगा। माताजी वहीं रहेगी मै माता जी से मिलने आऊंगा मैंने कहा मुझसे क्यों नहीं मिलेगे। आपको न खर्च लगेगा न महनत सूक्ष्म मैं जब चाहे केवल आपको इच्दा करना है तो वे बोले अच्छा बता मैं आकर क्या करूंगा। मैंने कहा कुछ नहीं हमें अच्छा लगेगा। तो वे बोले अच्छा अगर मैं किसी से भी मिलूॅंगा तो तुझसे से भी मिलूॅंगा और मुझे चुप कर दिया। यह भी कहा कि वैसे तो माताजी के पास डाक्टर प्रणव रहेंगे पर जब वे नहीं रहेगे तो तू रहना तू भी माताजी के पास रहेगा।

मैंने पूंछा गुरुजीहिमालय में क्या है। कौन सा भाग सबसे अच्छा है। गुरुजी बोले सन् १९६७ अशोकनगर गुना- तुझे हिमालय की तैयारी बताता हूॅं

हिमालय का सबसे अच्छा स्थान हिमालय का हृदय है। हमारे गुरुजी उससे भी बहुत ऊपर रहते हैं। वे सूक्ष्म शरीर में है स्थूल धारण कर सकते हैं उनसे कोई प्रयास से नहीं मिल सकता। मैं भी अपने प्रयास से नहीं मिला। उनकी कृपा इच्छा और काम का उद्देश्य ही उनसे मिलाता है। हिमालय का हृदय एक छोटा स्थान है यह १०-१२ किलोमीटर लंबा और कुछ किलोमीटर चौड़ाा है। यहॉँ कोई नहीं पहुॅंच सकता। लोग हेलीकाप्टर से भी सारी कोशिशे करकेदेख चुके यहॉं हमेशा सिद्घपुरुष ऋषि रहते हैं। सीधा रास्ता कठिन है। घूमकर जाना पड़ता है। जज साब ने मुझे बतलाया था कि यहॉं बैठे ऋषियों की ऊंचाई गुरुजी की ऊंचाई से अधिक थी। बर्फ पर रोशनी से ऑंख पर बहुत जोर पड़ता है इस कारण गहरा काला चस्मा साथ होना चाहिए। आसपास केवल चाय और बीड़ी मिलती है चाय पी लेना ठंड बहुत होती है इस कारण कुछ दवा की गोलिया उपयोगी है। सल्फाडायजिन जैसीमैंने कहा गुरुजी इसका तो मैं डब्बा ले जाऊंगा। अपने लिये और दूसरों के लिये भी। वहॉँ एक जड़ी-बूटी भी मिलती है जो चाय जैसी बनती है।

गुरुजी हमेशा मथुरा में प्रातः दो बजे उठते थे। पूूंजा वे रात को ही ढाई से छह बजे तक कर लेते थे। फिर लेखन। पर जब वे बाहर जाते हैं तो देर से उठते हैं। गुरुजी कहते यदि मैं जल्दी उठ जाऊं तो गृहस्थ वालों को परेशानी होगी। वे पत्नी पर च्चल्लायेगे गुरुजी उठ गये चाय बनाओ गरम पानी दो इस कारण मैं उठकर भी पलंग पर लेटा या बैठ जाता हूॅं। तू अपने कुछ मित्रो को बुला लेना। आध्यात्मिक चर्चा करेगे। ऐसी पहिली चर्चा १९६७ में अशोकनगर में आरम्भ हुई जिसमें निर्मला राय मैं और दो तीन व्यक्ति थे। श्रीपर्णा तो काम में लगी थी। गुरुजी बड़े प्रेम से ज्ञान की चर्चा करते और जब घर के लोग उठ जाते तब वे नित्य कर्मके लिये जाते चाय पीते और लोगों से मिलना चलता रहता। मेरे एक मित्र है राणा परिवार ये जयपुरमहारानी के सम्बन्धी हैं। मिसिस राणा का एक पुत्र पाकिस्तान बार में लापता हो गया। वे बड़े चिन्तित थे और मनुस्मृतियों में देखकर आये कि वो लम्बी बेहोशी के बाद उठेगा। उन्होंने मुझसे गुरुजी से पूंछने कहा। मैं उनको गुरुजी के पास ले गया और मैंने कहा कि गुरुजी आपने जो स्टेशन पर एक लेख पर फूल चढ़ाये थे वह इन्हीं का बेटा पाकिस्तान बार का एक खोया फौजी का था। गुरुजी उनसे बोले माताजी यदि आपकाबेटा कहीं भी होता तो मैं उसको आपकेसामने ला देता पर वह तो देश के लिये शहीद हो गया। और कुछ माँगलो। वे बोली मेरे पति बहुत शराब पीते हैं गुरुजी ने कहा वे शराब नहीं छोड़ेगे कुछ ही दिनोंबाद उनकी मृत्यु हो गयी। वे फिर बोली मेरा बड़ा लड़का रवि राणा वह भी बहुत शराब पीता है गुरुजी ने कहा वह भी नहीं छोड़ेगा। और कुछ माँगो। गुरुजी फिर हमारी बेटियों का क्या होगा।गुरुजी ने कहा उनकी शानदार पढ़ाई और शानदार शादी होगी यह मेरा आशीर्वाद है। और ऐसा ही हुआ क्योकि आज तक मेरा इस परिवार से सम्बन्ध है।

मैंने कहा गुरुजी हमारे जो आफीसर साथी हैं वह धार्मिक आयोजनों में आने से कतराते हैं और आते भी हैं तो जल्दी भागते हैं यदि आपकी अनुमति हो तो मैं इन सबको बुफे डिनर पर आमंत्रित कर लूं यह सब आ जायेगे आपसे मिल भी लेंगे। गुरुजी ने कहा यह बहुत ठीक रहेगा। इस डिनर में एक-एक व्यक्ति ने गुरुजी से बात की जिसमें कई सचिव और आईजी स्तर के बन गये। वे आज भी उस बुफे डिनर को याद करते हैं।

सन् १९८० श्रीपर्णा दत्ता शान्तिकुॅंज आयी थी। गुरुजी का कुम्भराज जाने का प्रोग्राम बना। उनने कहा किगुरुजी आप गुना से जायेंगे औरसड़क पर ही शक्तिपीठ है आप केवल १५ मिनिट का समय दे दे और माइक पर उद्बोधन देकर आगेबढ़ जायें। हम विश्वास दिलाते हैं कि आपके १६ मिनिट नहीं लेंगे। पण्डित लीलापत भी वहीं थे गुरुजी बोले देखो यह छोरी क्या बोलती है पागल की तरह मुझे १६ मिनिट में छोड़ देगी पण्डित जी कुछ बोलते कि श्रीपर्णा बोली हॉं गुरुजी १५ मिनिट १६ मिनिट नहीं। अच्छा तो वायदा रहा। शिवपुरी से आगरा बाम्बे रोड पर गुरुजी के चलने की एक-एक मिनिट की सूचना वा जानकारी हमको मिलती रही। सबको बतला दिया गया कि कोई प्रणाम नहींकरेगा। केवल ओन माईक पर गुरुजी केवल १५ मिनिट बोलेगे और फिर कार के अन्दर। जैसे ही गाड़ी खड़ी हुई कि मैंने दरवाजा खोला। शक्तिपीठ गेट पर ही था। वहॉँ के डीएफओ चरण स्पर्श को छुके ही थे कि मैंने हाथ पकड़कर ऊपर उठा लिया क्योंकिन मैंने चरण स्पर्श किये थे और न किसी औरको करना था। गुरुजी स्टेज पर बैठ गये औरबोले कि यह व्यक्ति जोजूता स्टेण्ड पर बैठा है उससे कहो कि मुझे एक गिलास पानी पिलाये ये श्रीमान हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्रिंसपल थे और मुझसे विशेष प्रार्थना करके जूता स्टेण्ड की रखवाली कर रहे थे किसी तरह भी उनने दूसरी डियुटी लेना उनने स्वीकार नहीं किया बोले डाक्टर साब आप ही पिलाओ मैंने कहा मैँ कैसे पिलाऊं गुरुजी का आज्ञा सिर्फ आपके लिये है उन्होंने पानी पिलाया और अभी कुछ दिनों पहले जब वे शान्तिकुञ्ज आये तो मैंने घटना याद दिलायी तो बोले वह घटना तो मेरे जीवन की पूंजी है कैसे भुलाऊॅंगा। पानी पीकर गुरुजी बोले सबको प्रणाम करने दे। मैंने कहा जी गुरुजी। पण्डितजी बोले खाना नहीं खिलायेगा। मैंने कहा पण्डितजी सब कुछ तैयार है। गुरुजी साढ़े तीनघण्टे रुके लौटते वक्त फिर प्रिंसपल साब से मिले और बोले कि यह किताबें जो है यही मेरा सही स्वरूप है आज भी और आगे भी।

जब से मै जुड़ा हूॅं यानी सन् १९६० तभी से हमारे परिवार के सारे सदस्य तथा सास-ससुर आदि भी जुड़ गये। मेरा छोटा भाई यतीन्द्र दत्ता तो बस मिलता ही रहता था। एक दिन हम दोनों घिया मंडी गुरुजी के पास गये। उसने तीन प्रश्न पूंछे १- मैं विदेश जाना चाहता हूॅं। २-बीसा और पैसे का इंतजाम कैसे हो ३- वहॉँ भी आप मेरी रक्षा करना। गुरुजी बोले। मैं जवाब देता हूूॅं पहले तू अपना चौथा प्रश्न भी बोल दे। यतीन्द्र ने पाकिट से चिट निकालकर दिखलाई हॉँ गुरुजी यह चौथा प्रश्न भी है। फिर बोले तू जल्दी विदेश जायेगा। अच्छा बता तेरे पास कितने पैसे हैं। बोले डेढ़ दो हजार रुपये। गुरुजी एक कहानी सुनाने लगे। एक जाट मेले में खाट बेचने आया। गुरुजी खाट पर ही बैठे थे और हाथ से दिखाकर बोले आजू नहीं है बाजू नहीं है (लम्बाई चौड़ाई)बीच की नहीं है झंगड़ झोड़ा और तीन नहीं है पाये और एक पहिया ऊंचा करके बोला कि खटियॉ लेलो भाई। सो १५०० रुपये में अमेरिका जायेगा। गुरुजी इसीलिये तो आपके पास आया हूॅं अच्छा बेटा। मैं सब ठीक कर लूूंगा। तेरे जाने का टिकिट बीसा स्कालर शिप और अच्छी नौकरी सब कर दूंगा। अब तू एक काम कर माताजी के पास जाकर खाना खा। क

यतीन्द्र की शादी मम्मीजी की लड़की यानी चंद्रमुखी रस्तोगी इला से मथुरा में गुरुजी के तत्वावधान में हुई। मुझे सुभाष, यतीन्द्र, मम्मी व इला को गायत्री तपोभूमि तार से बुलाया। शादी पक्की हो गई। बाद में पश्चिमी हवा ने इला को जरा ज्यादा ही प्रभावित कर दिया। यतीन्द्र लगभग २५ वर्ष अकेला रहा। इला के भाई शरद ने भी उसे नागरिकता मिलने के सम्बन्ध में बहुत परेशानी पैदा की। यतीन्द्र कहता है किमैं जैसे कांच के हजार टुकड़े हो जाते हैं ऐसा टूट गया लेकिन जो ३चीज मैंने नहीं छोड़ी वह ही है चरित्र, चिन्तन और गुरुजीऔर इसने न मुझे पूरी तरह से उबार दिया बल्कि गुरुजी ने ही मेरा सम्बन्ध गायत्रीपरिवार के एक कर्मठ सदस्य से कर दिया। और अब हम दोनों लगभग ढाई लाख रुपये प्रतिमाह का वेतन ही नहीं पाते बहुत सुखी है। गुरुजी ने मुझे एक लौकिट दिया जो मेरी हमेशा मदद करता रहा। एक रात वह होटल में सो गया बहुत ढूढ़ने पर नहीं मिला मैंने गुरुजी से कोई अनिष्ठ न होने की बहुत प्रार्थना की और रात १२ बजे नहाकर गुरुजी का ध्यान करने का विचार किया। लेकिन जैसे ही मैंने सावर खोला कि वह लाकेट मय चैन के मेरे सिर पर गिरा। मुझेआश्चर्य है कि यह जादू था या गुरुजी का प्यार।

सन् १९८३-८४ में मैं लगभग एक वर्ष यूस्टन अमेरिका में परमानेंट इमीग्रेशन पर रहा।रोज आफिस से लौटने के बाद यतीन्द्र नई नई घटनायें सुनाया करता था। एक दिन उसने बताया कि मेरे बौस ने बुलाया और कहा कि अपन एक नई कंपनी खरीद रहे हैं उसका बाहरी डिजाइन बदलना चाहते हैं तुम कितनी जल्दी बनाकर दे सकते हो। यतीन्द्र नेकहा जितनी जल्दी आप कहें। वे बोले एकदिन में दे दोगे। अच्छा तो बना लाओ। यतीन्द्र ने कहा। डिजाइन का आइडिया तो दें। वे वोले ये तो मैंने अभी सोचा नहीं है फिर मैं क्या बनाकर दूं। बौस ने कहा तुमतो एक दिन में बनाकर देने वाले थे न। मेरी पिछली २५ साल की साधना ने मुझे गुरुजी से इतना जोड़ दिया कि मैं अपने बड़े भाई गुरुजी के साथ है उनसे अधिक निकट हूॅं। मैंने बोस से कहा मैं दे दूंगा। और अपनी सीट पर आकर मैंने गुरुजी को याद किया। गुरुजीने मेरे मन में कहा तूं कार उठा और दांयी तरफ लेन में तब तक चलता रह जब तक कि किनारे की आलीसान बिल्ंिडग न मिल जाये। गुरुजी मुझे बिल्कुल छोटा बच्चा मानते हैं और उसका डिजाइन बनाकर जब दिया तो बौस ने कहा यही डिजाइन मेरे दिमाग में उतर रहा था।

यतीन्द्र ने एक दिन बतलाया कि हमारी कंपनी एक एक्सटेन्शन ब्रांच खोलने वाली थी। मुझको इसके निर्माण की योजना बनाने का कार्य सौंपा। मेरी टेलीफोन पर मेने कान्ट्रेक्टर से बात होती रही और जब फाइनल कागज पर दस्तखत होने थे वह आया यतीन्द्र मिला और बोला कि आपसे यह दूसरी मुलाकात में लगता है काम पूरा हो जायेगा। उसने कहा मैं कभी आपसे मिला ही नहीं। यतीन्द्र ने वे कागज दिखाये जिसपर एक्सटेन्शन का प्लान बना था उस पर उसके कुछ अक्षर भी थे पर सच में वह कभी नहीं आता था मालुम नहीं कौन आया था और यह उसी दिन की घटना है जिस दिन में अमेरिका में ही घर पर ही था।

यतीन्द्र कीपढ़ाई यानी एम एस एवं पी ई अमेरिका की डिगरी हो गई थी पर नौकरी नहीं थी। एक कंपनी के बाहरी पाइप से बहुत धुंआ निकल रहा था। यतीन्द्र ने चपरासी से पूंछा यहॉँ कोई नौकरी मिलेगी। वह बोला नहीं। तुम्हारे साहब से बात कर सकते हैं। यतीन्द्र मिला और उनसे बोला किमैं छोटी से छोटी नौकरी करने को तैयार हूॅं। जीएम ने कहा तुमचपरासी की नौकरी करोगे। तो बोला हॉं। तो दरखास्त दे दो। बोस बोला तुमको तो भारत और अमेरिका की दो-दो डिगरी प्राप्त हैं और बड़ा मेरिट केरियर है हमारी कंपनी का धुंआ का पलूशन दूर कर सकते हो। मैंने कहा कि मैंने केवल पढ़ाई की है। लेकिन मुझमें एक खास बात है कि दुनिया का ऐसा कोई काम नहीं है जो मैं नहीं कर सकता। उसने कहा यह क्या बात है। मैंने जवाब दिया कि यह मेरा व्यक्तिगत विषय है। गुरुजी अगर तुम करने का साहस करते हो तो मैं अभी मैँ तुम्हें प्रोफेशनल इंजीनियर एपाइंट करता हूॅं। मैँ केवल दो काम करता लायब्रेरी में पड़ता और गुरुजी काध्यान और मैंने पलूशन दूर करने का सारा सिस्टम बिठाल दिया और स्विच ऑन करने को ही था कि कंपनी के बड़े-बड़े इंजीनियरों ने कहा कि यह सिस्टम भस्ट हो जायेगा। मैंने कहा नहीं और मैँ फिर बैठा और गुरुजी का ध्यान किया गुरुजी ने बताया कि इस सिस्टम में ३ स्थान पर डिफेक्ट है उसे ठीक करो और स्विच आन करते ही ७०प्रतिशत पलूसन दूर हो गया। मुझे विश्व की प्रसिद्घ ल्यूमस कंपनी में एमाइन्मेंट मिल गया और इस पलूसन कंट्रोल का पेटेन्ट भी मेरे नाम से मिल गया।

यतीन्द्र कहतााहै कि मेरा गुरुजी से सतत सम्बन्ध है ठीक वैसा ही जैसा तुम्हारा गुरुजी के स्थूल शरीर से था। मैं उस माध्यम से प्रश्न भी पूंछता हूॅं और मेरा सम्बन्ध भी है। मैँने कहा मुझे विश्वास नहीं होता। अच्छा मेरे प्रश्नों का जवाब दो। मैंने कुछ प्रश्न महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों से पूछे हैं जैसे प्रेसीडेण्ट रामकृष्ण मिशन लोकेश्वरानंद जी। एवं सेक्रेट्री आर०के० मिशन भूतेश्वरानंद जी पर मुझे जवाब नहीं मिला। मेरा प्रश्न था आध्यात्म प्रगति के माइल स्टोन क्या हैं। जिस प्रकार बच्चे के शारीरिक प्रगति के माइलस्टोन होते हैं। छै महीने में बठता है एक साल में खड़ा होता है डेढ़ साल में दौड़ता है। उसने कहा अच्छा में गुरुजी से पूंछकर जवाब दूंगा। और दूसरे दिन उसका जवाब इस प्रकार था।

१- जब तक आप अपने घर की गली से मुख्य राजमार्ग पर नहीं आते आपको कोई माइल का पत्थर या बोर्ड नहीं मिलेगा। पहले अपना चरित्र, चिन्तन व्यवहार तथा प्रारब्ध की मॉंग प्रायश्चित से शमन नहीं कर लोगे माइल स्टोन नहीं मिलेंगे। चिन्ह तो केवल राजमार्ग पर पूंछने पर ही मिलते हैँ और राजमार्ग पर पहुॅंचनेकेबाद सतत चिन्ह मिलने रहेंगे। वे चिन्ह हैं १- अभय - यानी आदर्श और ईमान से प्रेम, सेवाका वह भाव जो किसी भी हानि दुख या कष्ट सहकर भी दूसरे का चरित्रचिन्तन और व्यवहार सुधारे। उसे भय उठता ही नहीं।

२-जबतक दूसरे का दुख दर्द अपने में अनुभव न होने लगे यानी करुणा न उपजे जो बिना सहयोग के रह ही नहीं सकती आध्यात्म पनपा ही नहीं।

३-उसकी समझदारी कोरी नहीं होती। जिम्मेदारी निभाकर ही रहेगी। उसका चरित्रचिन्तन और व्यवहार व जीवन क्रम ही उसकी आध्यात्मिकता का नाम होगा।

घनश्याम पाराशर जी वर्तमान में गायत्री तपोभूमि मेरे घनिष्ठ मित्रों में से है एक दिन मेरे पास आये। लक्ष्मी हाल १९८३। बोले मेरी लड़की की शादी में बहुत परेशानी है। अपने ही गायत्री परिवार के लोग बहुत दहेज माँगते हैं। मैंने कहा तुम्हारी लड़की की तो शादी बहुत अच्छी हो जायेगी पर मुझे यह बतलाओं कि गायत्री परिवार का कौन व्यक्ति दहेज माँगता है मुझे नाम बतलाओ। थोड़ा उनको भी ठीक कराया जाये।और हम दोनों माताजी के पास गये और माताजी को ठीक करने के लिये उनके नाम नोट कराये। माताजी बोली यह काम तो मैं कर दूंगी पर शादी के लिये तुम ऊपर चले जाओ। गुरुजी के पास पहुॅंचे और सारा हाल कह सुनाया। गुरुजी बोले घनश्याम तेरी लड़की की शादी किससे कराऊं। डाक्टर इंजीनियर अच्छा व्यापारी जिससे तू कह। पाराशर जी ने कहा जो आप ठीक समझे। बोले अच्छा बता तेरे पास पैसे कितने हैं। मैंने कहा ३००० रुपये। गुरुजी बोले ये पैसे तू अपने पास ही रखना और जा मैं जल्दी बहुत अच्छी शादी करा दूंगा। यद्यपि पराशर जी की लड़की की हाइट कुल चार फीट दो इंच है लेकिन उनको बहुत अच्छा लड़का ओएनजीसी इंजीनियर मिल गया जो हेलीकाप्टर से आइल एक्सट्रेशन साइट पर जाता है और ओएनजीसी की सारी सुविधाएँ साथ में काजू किसमिस गरम कपड़े खूब मिलते हैँ और बहुत सुखी भी हैं।

मेरा छोटा भाई दिलीपकुमार दत्त गुरुजी के पास गया और बोला गुरुजी मेरी इज्जत का सवाल है। क्या हो गया तेरी इज्जत को। बोला मेरे सब भाई डाक्टर इंजीनियर हो गये हैं मैं क्या करूं। गुरुजी जी बोले तू क्या पढ़ा है। एम ए सोसलाजी। बेटा तुझे डाक्टर तो बना नहीं सकते। अच्छा डाक्टर के बराबर बना दूं तो चलेगा। वह बोला हॉं गुरुजी बना दो लेकिन डाक्टर से कम नहीं होना चाहिए। अचानक क्या हुआ कि पीएससी से एक वान्ट निकली क्लास टू फेमिली प्लानिंग आफीसर की जिसमें स्नातक के साथ ३ वर्ष का परिवार नियोजन अनुभव चाहिए था। यह भाई मेरे साथ ही रहता था मैंने कहा तू एप्लाई कर दे ३ वर्ष का अनुभव का सर्टीफि केट मैं दे दूंगा और परिवार नियोजन के सम्बन्ध में इतना सिखा दूंगा कि वे तुझसे पूंछे या न पूंछे अपने परचे के बाद बोल ही देना कि परिवार नियोजन का मेरा अनुभव एक्स्ट्रा आर्डनरी है। मैंने उसे सब रटा दिया यहॉँ तक कि आपरेशन क्रिया तक और इंटरव्यू के दरवाजे तक उसके साथ गया। सबकुछ उसने वैसा ही किया पर फिर भी पीएससी का रिजल्ट आया रिग्रेट यू आर नाट सलेक्टेड। गुरुजी के पास गया बोला गुरुजी मेरा केन्सिल हो गया। गुरुजी बोले हो जायेगा। मैंने कहा गुरुजी आपको अंग्रेजी नहीं आती इसमें रिग्रेट लिखा है। गुरुजी ने कहा तू जा हो जायेगा। १५ दिन बाद दूसरा आर्डर आया यू आर सलेक्टेड एण्ड पोस्टेड एट रायगढ़। उन दिनों गुरुजी इंदौरर आयेहुये थे। रायगढ़ जाने के पहले उसे पता लगा कि गुरुजी यहीं है तो थ्री व्हीलर लेकर पहले तीन रूपराम नगर कालोनी पहुॅंचा और प्रणाम किया गुरुजी मेरा सलेक्षन हो गया। गुरुजी बोले तू तो कह रहा था गुरुजीआपको अंग्रेजी नहीं हाती। गुरुजी ने कहा तू जा ट्रेन तेरा इंतजार करेगी। सचमुचट्र्रेन लेट थी और मैं डाक्टर के समकक्ष मध्यप्रदेश स्वास्थ्य सेवा में नियुक्त हो गया।

गुरुजी ने मेरीशादी के पहले ही बतादिया था किमैं तेरे यहॉं दो अच्छी आत्मा भेजूंगा जिसका तुझे विशेष ध्यान रखना होगा। यदि नहीं रखा तो वे चलींजायेंगी। उन्होंने यह भी कहा समय आने पर मैं इनको कुछ विशेष काम सौंपूंगा। सन् ९० में कुछ दिन पूर्व ही मैंने गुरुजी को पत्र दिखाकर कहा कि यह बच्चे आपकी आज्ञा में हैं आप इन्हें जैसा कहेंगे यह तैयार हैं।

मैं शादी के पहले बहुत पूजा करता था। करीब तीन घण्टे। क्योंकि गायत्री का नया नया रचाव शुरु हुआ था। शादी होने पर श्रीपर्णा घबराती थी किअभी यह हाल है तो आगे क्या होगा। जब पता लगा कि इनके गुरु भी हैं तो घबराहट और बढ़ गई। मैं बड़ी मुश्किल से ताजमहल दिखाने ले गया और फिर मथुरा होटल में रहा पिक्चर देखी औरकहा कि आचार्य जी से मिल आये नास्ता बहुत अच्छा कराते हैँ और जब हम लोग मिले तो वह सारा विरोध भूल गयी क्योंकि कि गुरुजी ने बहुत सारे आशीर्वाद स्वास्थ्यर से लेकर समृद्घि तक पद से लेकर प्रतिष्ठा तक परिवार से लेकर भावना तक सारे आशीर्वाद एक साथ दे दिये और उसके बाद से वह गुरुजी का चित्र ले गई और पूजा करने लगीं।

एकदिन मेराछोटा भाई दिलीप गुरुजी से बोला मुझे हाथ देखने का बहुत शोक है मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैँ जो कुछ बोलू सच हो जाये। गुरुजी अपना हाथ दिखाकर बोले बेटा यहहाथ की लाइने तो हाथ के मोड़ने से आ जाती है लेकिन तू किसी के बाल छीकर भी जो बोल देगा वहसच हो जायेगा। और अबकुछ ऐसा हो गया कि मेरी बातें जो मैं नहीं चाहता और बोल भी देता हूं तो भी सच हो जाती हैं। कभी कभी मेरे मुंह बुरी घटना होने का निकल जाता है तो वह ठीक वैसी ही हो जाती है इसलिये हाथ देखता तो हूं पर डर लगा रहता है।

मैं अपनी बड़ी बहिन गीता सेनी को गुरजी से मिलाने के लिये ले गया। मैंने कहा यह मेरी बड़ी बहिन है पर इन्होंने मुझे हम लोगों को मॉं की तरह देखरेख ही नहीं की लेकिन मेडीकल कालेज मेंपढ़ाया भी क्योंकि हमारे पिताजी मेरे एडमीशन पर रिटायर हो गये थे। गुरुजी बोले बेटी मॉँग तू क्या मॉँगती है। बहिन बोली गुरुजी आपकी कृपा। तू तो बहुत होशियार है। मेरे बच्चे कितने हैं। बोली एक लड़का उसकी दो लड़कियॉं। गुरुजी ने कहा अच्छा अब उसके एक लड़का होगा। उसके लड़केका नाम अरुण है।

सिद्घार्थ की पीठ में बहुत दर्द था महीनों से चल रहा था। अपनी सर्विस से आकर के बोला कि मैं अब ठीक होकर के ही जाऊंगा मैंने लिटाकर देखा कि उसकी रीढ़ की हड्डी में कही फोड़ा है गुरुजी से कहा मेरे बेटे को मेडीकल कालेज ले जाकर आपरेशन कराना है। गुरुजी नेकहा अभी जाओ कार ले जाओ ड्रायवर एक जने को साथ और फिर डाक्टर प्रणव को ब्रह्मवर्चस तीन हजार रुपये लेकर भेजा मैंने कहा डाक्टर साब मेरे पास पैसे हैं और सिद्घार्थको पूरी तनखा मिलेगी बीएचईएल हर महीने पैसा भेजता है। डाक्टर प्रणव ने कहा कि गुरुजी ने कहा है कियह पैसा नहीं मेरा आशीर्वाद है। मैंने रख लिया बाद में सिद्घार्थ ने वापिस किये लेकिन एकदस रुपयेका नोट गुरुजी के प्यार आशीर्वाद के रूप में रखा जो आज भी साथ है यह दस का नोट मैंने शादी के बाद सिद्घार्थ की पत्नी प्रिया को दे दिया। आपरेशन हो गया सिद्घार्थ वापिस आया और तीन मंजिल चढ़ते ही गुरुजी का सन्देश आया कि सिद्घार्थ को लेकर आओ नीचे कार लगाना कार खड़ी रखना मुझसे मिलकर फिर वापिस ले जाना। बड़े कष्ट में ऊपर चढ़ा क्योंकि मेरठ से यहॉँ तक की यात्रा भी बड़ी ऊबड़खाबड़ सड़क पर थी पर गुरुजी का निर्देश मुश्किल से झुककर कठिनाई से प्रणाम कया गुरुजी ने कुछ नहीं पूंछा और बोले १- तू एक माह में बिल्कुल ठीक हो जायेगा। डाक्टर हैरान हो गये कि पाट्सस्पाइन का केस का एक्सरे में निशान भी नहीं रहा। डाक्टर ने प्लास्टर जेकेट लगाने केलिये कहाथा गुरुजी ने मना करदिया। २- तेरी नौकरीअच्छीचलेगीऔर जल्दीही पदोन्नति होगी। ३-तू आईएएस में तो मत बैठना उसमें नहीं आयेगा पर इंजीनियर की हर परीक्षा हर इंटरव्यूमें उत्तीर्ण होगा तेरी अच्छी शादी होगी खुश रहेगा जा।

एक बार सन् १९७७ में मेरा एक मुसलमान से झगड़ाहो गया मेरीउससे जान पहचान थी क्योंकि वह मरीज दिखाता रहता था उसके ट्रक ड्रायवर से एक एक्सीडेंट हो गया था आदमी मर गयाथा मैंने उसका पोस्ट मार्ट किया मैं फोन पर बात कर रहा था कि खिड़की के बाहर से वह बोला कि डाक्टर तुम लिख देना कि मृतक शराब पिये था। मैंने कहा मैँ नहीं लिख सकता हॉं मैँ पेट को रसायन परीक्षण के लिये भेज दूॅंगा। यदि उसमें कोई भी नशीली पदार्थ निकली तो ठीक है। वह बोला तो अच्छा मैं तुम्हें दंख लूंगा। उसने मेरे पास एक पुराने हड्डी टूटे मरीज को भेज दिया और कहा कि फीस मैं शाम को दे जाऊंगा दूसरी तरफ वह मिनिस्टर और कलेक्टर के पास गया और कहा कि डाक्टर दत्ता सर्टीफिकेट देने के लिये ५० रुपये माँगतेहैं। जिस एसओ स ेरिपोर्ट लिखाई एक दिन पहले ही मैंने उसकी पत्नी को सिजेरियन में ३०० सीसी रक्त दिया था। हम और श्रीपर्णा गुरुजी के पास गये और सब कह सुनाया गुरुजी ने कहा कि मैं अपने अपने तप का अंश देकर भी कुछ नहीं होने दूंगा कोई तुझसे घटना भी नहीं पूंछेगा जो असम्भव था पर हुआ वही। केश में न पुलिस एसडीओ आये न ही मध्यभारत सरकार का सचिवन ही कोई दूसरे गवाह कोर्ट ने सरकार को लताड़ दी कि बिना सोचे समझे प्रथम श्रेणी के अफसर पर कोर्ट में केस क्यों भेजा और मेरी पदोन्नति भी हो गई।

मेरी मॉँ को चोट लगी तार आया। हम दोनों को बुलाया शाम ७बजे गुरुजी ने ऊपर बुलाया। साधना कक्ष के सामने माताजी और गुरुजी अपनी खाट के सामने बैठे थे और कहा तेरीमॉँ का तार आया है जाना चाहे तो जा पर कुछ खास चोट नहीं है मैं कल तुझे डाक्टर प्रणव के साथ देहरादून भेजना चाहता था मैंने कहा तो नहीं जाता गुरुजी माताजी बोली नहीं तू जा। मैं गया बहुत साधारण चोट थी फिर कुछ दिनों बाद तार आया दोनों को बुलाया था गुरुजी ने मुझे बुलाया और कहा तू अभी शान्तिकुॅंज से ही चला जा श्रीपर्णा से अपना सामान सूटकेश मंगा ले। यह तेरी मॉँ का अन्तिम समय है। जितनी सेवा कर लेगा उतना ही शुभ होगा। मैं चला गया हमारी मॉं एक महीने सेरेब्रल हेमरेज में बेहोश रहीं हम दोनों को सेवा का मौका मिला और उनकी मृत्यु पर जब मैंने रोते हुए गुरुजी से कहा गुरुजी हमारी मॉँ को सद्गति प्रदान करें तो गुरुजी ने कहा तुम लोगों को जिस कष्ट के साथ उन्होंने तुम लोगों को समर्थ बनाया उससे उनकी सद्गति हुई है तुम समर्थ हो खुद जाओ लक्ष्मण झूला के पास कुछ झोपणियॉं है जहॉँ कोढ़ी लोग रहते हैं उनको तुम स्वयं जाकर गरम कपड़े बॉंट आना। हमने वैसा ही किया। तर्पण आदि की सारी व्यवस्था गुरुजी ने करा ही दी थी।

यतीन्द्र की पुत्री अंजला की शादी थी। इला व उसके भाई शरद काफी परेशानी करें ऐसी सम्भावना थी। मुझको यतीन्द्र ने कहा कि उस दिन गुरुजी को याद दिलाना कि आज अंजली की शादी है ध्यान रखें। इला अपने नये पति के साथ शराब में धुत आयी पर वह शीघ्र आ गई थी इसलिये लेट आयी तब तक शादी निपट चुकी थी अरविंद और यतीन्द्र दोनों ने व्यवस्था की और उन्होंने फोन पर बताया कि मुझे ऐसा लगा कि सारी व्यवस्था गुरुजी ने की। अब दोनों सुखी हैं।

अमेरिका में एक कमाल

मेरे छोटे भाई यतीन्द्र का जन्मदिन था २६ दिसम्बर मुझको कहा कि गुरुजी माताजी से मेरे जन्मदिन पर आशीर्वाद सन्देश रिकार्ड क रके भिजवा देना। मैंने डाक्टर प्रणव से कहकर दोनों के सन्देश १०, १५ लाइन में भिजवा दिये। यह सन्देश यतीन्द्र पर भी पहुॅंचा दिया और कापीमेरे पास है। सन्देश कुछ इस प्रकार का था।

यतीन्द्र तुम मेरे बेटे हो पास सरहो या दूर भारत या अमेरिका हमारे लिये तुम पास ही रहोगे बिल्कुल आमने सामने हम हमेशा तुम्हारे हर कष्ट दुख में पास रहेंगे और जो भी मदद हमारे लिये सम्भव होगी करेंगे। हमारा आशीर्वाद। माताजी का सन्देश था तुम एक अच्छे बेटे और शिष्य की तरह मिशन का काम करना अच्छे बेटे बनना हमारी आशीर्वाद जन्मदिन पर। जब

जब यतीन्द्र को बताया कि तुम्हारे हृदय की धमनियों में तीन जगह रुकावट है और आपरेशन करना होगा। मुझे अमेरिका आने के लिए फोन किया और व्यवस्था के पहले ही आपरेशन हो गया था। जब वह कार में जा रहा था तो उसने वही केसेट जिसमें गुरुजी माताजी का जन्मदिवस सन्देश बार-बार दोहराया जा रहा था सुनता जा रहा था। आपरेशन की टेबिल पर लेटते ही उसने देखा कि गुरुजी और माताजी दोनों उसके सामने आ गये और कहा कि यतीन्द्र यह आपरेशन तेरा नहीं हमारा होगा। तू बिल्कुल चिन्ता मत करना। आपरेशन हो गया लेकिन आपरेशन के बाद यतीन्द्र कहता है कि जब मैं होश में आया कि इस ६ घण्टे चलने वाले आपरेशन के बाद मैंने प्रेम का हाथ उसी ताकत से दबाया जितनी मेरे स्वस्थ्यता में थी। यद्यपि एक बार ब्लीडिंग भी खुल गया था फिर भी मैं चोथे दिन इतना स्वस्थ हो गया कि एक मील घूमकर आया। डाक्टर ने कहा कि ऐसा आपरेशन न आज तक हमने किया न हुआ। हड्डी को काटकर दिल तक पहुॅंचा जाता है लेकिन पाँचवे दिन हम तीन मील तक घूम सके और उसके बाद ऐसा कभी लगा ही नहीं कि मेरा आपरेशन हुआ है। अमेरिका से पाँचवे दिन उसने फोन पर बात की आवाज पूर्णतया पूर्ण स्वस्थ्यता की थी। कुछ दिन बाद जब मै अमेरिका पहुॅंचा तो मेरे बड़े बड़े बेग उसने उठा लिये कमरे तक ले गया और कहा कि मैं पूर्ण स्वस्थ से किसी प्रकार भी कम नहीं हूॅं।

माता जी के दूसरी ऑंख का आपरेशन होंना था। सारी तैयारी हो गयी। माताजी को कई बार पहले भी देख लिया गया था। आपरेशन के पहले फिर जॉंच की गई ऑंख में कोई केटरेक्ट नहीं था। मैंने कहा माताजी आपकी ऑँख का आपरेशन नहीं होगा। माताजी ने कहा यह सारी जिम्मेदारी गुरुजी की है आपरेशन कराये या कार्य कराये। मैं तो उनकी एक उपकरण मात्र हूॅं।

माताजी को अमेरिका जानाथा। बीसा के लिये अमेरिकन एम्बेसी जाना आवश्यक होता है लेकिन माताजी ने कहा कि यदि गुरुजी की अटकी हो अमेरिका भेजने के लिये तो वे लाइन में खड़े हो मैं कहीं नहीं जाती (गुरुजी शरीर छोड़ चुकेथे)। अशोक रावल चेयरमेन एमआईएस तथा जेसी पंत सचिव भारत सरकार के प्रयास से अमेरिकन एम्बैसी का अफसर यहीं आकर बीसा की व्यवस्था कर गया।

एक दिन हम और श्रीपर्णा माताजी के पास गये (८६-८७) हम और श्रीपर्णा माताजी के पास गये और बोले यतीन्द्र की नौकरी छूट गयी है और अरविंद हमारा बेटा उसके पास पढ़ रहा है उसको परेशानी हो रही होगी। चार वर्ष हो गये वह भारत आया भी नहीं है। माताजी हम लोगों को बहुत याद आती है परेशानी है और अमेरिका में और कोई दूसरा सहारा भी नहीं है। माताजी ने कहा देख अरविंद छै वर्ष में आयेगा यानी दो वर्ष बाद। दूसरी बात परेशानी और कष्ट होंने दे। जितना कष्ट होगा उतना ही अच्छा होगा। जहॉँ तक खाने रहने या आवश्यकता होगी मैं सारा प्रबन्ध कर दूंगी। तुझे परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है कोई चिन्ता मत कर हम सब ठीक कर देंगे और ठीक वही हुआ।

अभी जब मैं बाजपेई यज्ञ में जून ९८ में न्यूजर्सी था। एक दिन मैंने अरुण से पूंछा तुझे ध्यान में कैसा लगता है। गुरुजी कहते थे तू एक बड़ी आत्मा है। वह बोला पिताजी ऐसा तो मुझे कुछ नहीं लगता लेकिन जब पूजा करने बैठता हूॅं तब लगता है किसी जन्म में में ऋषि था। हॉँ एक बात जरूर होतीहै कि जब कभी आप किसी बड़े आदमी से परिचय कराते हैं तो मैं मिल तो लेता हूॅं आपके कहने पर, पर मुझे कोई काम के नहीं लगते। क्योंकि जब कभी मैं थोड़ी नहीं बड़ी मुसीबत में होता हूॅं तो गुरुजी मेरी मदद कर देते हैं। एक बार ऐसा हुआ कि मेरी नौकरी छूट गई और मेरे पास केवल ५० डालर थे मैं चाचा से भी पैसा माँगना नहीं चाहता था और अमेरिका में तो बिना पैसे के तो दिन भी नहीं कट सकता। मैंने गुरुजी को याद किया और उसी दिन मुझे नौकरी मिल गयी। नौकरी मिलते ही काफी एडवांस मिल जाता है। छोटी छोटी बात में न केवल गुरुजी याद आ जाते हैं लेकिन वह काम भी आ जाते हैं।

ममता हाईवे पर कार चला रही थी। अभी उसका अस्थाई लायसेंस था। अरविंद पास बैठे सो रहा था। कार एक खंबे से टकरा गयी और पीछे हमारी कार से ३, ४ गाड़ी टकरा गयी। अरविंद ने माताजी को फोन किया माताजी एक कार का नुकसान और दूसरा कोर्ट केस होगा। कार का स्टेयरिंग तो अरविंद ने संभाल लिया था पर कार बुरी तरह डेमेज हो गई थी। माताजी ने कहा कुछ नहीं सब ठीक हो जायेगा। ममता को सिर पर थोड़ी चोट आयी थी तब मैं लाईन में प्रणाम कर रहा था। माताजी ने हमसे और श्रीपर्णा से अरविंद की बात भी कराई बाद में बुलाकर कहा कि अरविंद का एक्सीडेंट हो गया पर तू चिन्ता मत करना मैं सब ठीक कर दूंगी। कोई केस नहीं चला और इंश्योरेंस ने दूसरी गाड़ी भी दे दी। पहली वाली तो पुरानी थी।

सन् १९७० में कृष्णकांत मिडिल में फैल हो गया। पिताजी ने कहा एक स्वामी आये है मेला आशीार्वाद देंगे। मैं गया और मिल आया। गुरुजी ने बिना कुछ कहे ही कहा तूं चिन्ता मत कर मैं तुझे पढ़ाऊंगा। दूसरी बार फिर मैंने एक पेपर ही नहीं दिया इसलिये फैल होने की पूरी आशा थी। मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी ने कहा ठीक है और मुझे पहले पेपर में ही इतने नंबर मिल गये कि मैं पास हो गया। ४० में से ३८ दूसरे में अनुपस्थित। मेरा रोल नंबर ७३६१ था। जब मैं गुरुजी से मिला तो उन्होंने खुद ही कहा आगे परीक्षा ढंग से देना अबकी तो पास करा दिया।

सन् १९८३ हम लोगों ने शान्तिकुॅंज में स्थाई रूप से आने का मन बना लिया था। इस कारण लम्बी छुट्टियों पर रहे। इस बीच स्टेडी लीव पर मैं अमेरिका भी गया। मेरा छोटा बेटा इंजीनियरिंग में आ गया था। अरविंद अमेरिका जाना चाहता था। बोला कि आप गुरुजी से कहदें। मैंने कहा मैं नहीं कहूॅंगा। तो बोला कि मैं कह दूं। मैंने कहा कह सकते हो। गुरुजी के पास गया और बोला गुरुजी मेरा छोटा भाई इंजीनियर हो गया। अब अमेरिका जाये बिना मेरी बात बनेगी नहीं। गुरुजी ने कहा तो चला जा। तेरा सारा इंतजाम करा देता हूॅं। तू अपने चाचा यतीन्द्र से अधिक पैसा कमायेगा। जब मैं गुरुजी से मिला तो बोले तेरा बेटा अमेरिका जाना चाहता है। मैंने जाने को कह दिया यहॉँ भी उसको अच्छी नौकरी दिला देते। मैंने कहा तो रोक लेते हैं बोले नहीं जाने दे। सचमुच व्यवस्था गुरुजी ने बना दी। मैं कई बार अमेरिकन एम्बैसी दिल्ली जा चुका था। यतीन्द्र बार-बार फोन करता था कि इमीग्रेशन के कागज भिजवा दिये हैं पर मिले नहीं अचानक प्रेरणा हुई कि बम्बई एम्बैसी में पता लगाते है वहॉं कागज मिल गये। यदि और २, ३ महीने देर हो जाती तो अरविंद मेरे साथ १८ वर्ष से ऊपर होने के कारण मेरे साथ ग्रीनकार्ड पर नहीं जा सकता था। पर सब काम हो गया हम दोनों का टिकट भी आ गया। अमेरिका पहुॅंच गये। लगभग ३ वर्ष वो पढ़ता रहा। उसके बाद हमारे छोटे भाई यतीन्द्र को अमेरिका में ही एक अच्छी नौकरी मिल गयी इसलिये वह जाने लगा। उसके बौस ने कहा यतीन्द्र मैँ तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता। पर तुम भी अच्छी नौकरी नहीं छोड़ सकते। मैं दुखी हूॅं। यतीन्द्र ने कहा सर आप चाहे तो मुझे नहीं भी छोड़ सकते। कैसे बोले मेरे भतीजे को आप नौकरी दे दे। उनने कहा ठीक है भेज दो। १५ दिन इन्टरव्यू की तैयारी की और वह पहुॅंच गया। बोला पूछियें बोले केवल एक प्रश्न। तुम यतीन्द्र के भतीजे हो उसने कहा हॉं। तो ३६००० डालर प्रतिवर्ष की नौकरी ठीक रहेगी। यह काफी अच्छा वेतन था। उसने कहा हॉं। जिस पर यतीन्द्र अमेरिका की डिगरी लेकर इंजीनियर था। वही पद अमेरिकन फेडरल सर्विस में बोर्ड आफ एजूकेशन में अरविंद को केवल एमएससी होने पर मिल गया। ५, ६ वर्ष यतीन्द्र ने उसकी पूरी देखभाल की और अब १६ वर्ष से वह अमेरिका में सेट है।

गुरुजी बहुत छोटी-छोटी बातें भी बड़े प्यार से समझा दिया करते थे जैसे घर पर कोई चीज खरीदना हो जैसे बाल क्लाक, फर्नीचर, रेडियो तो उसे दशहरा दीवाली, जन्मदिवस, विवाह दिवस गायत्री जयंती, गुरुपूर्णिमा को उपहार या बच्चों के दिन पर खरीदने पर प्रेम भाव भी बढ़ता है और यह याद भी रहता है।

गुरुजी के बड़े लड़के ओमप्रकाश भाई साहब सन् १९६०-६१ से मेरे मित्र हैं। गुरुजी की बहुत पुरानी बातें सुनाते हैं। एक घटना उनने सुनाई। गुरुजी लड़के ही थे। जमना में बाढ़ आई। बहुत पानी भर गया जानवर मर गये। घरवार बह गये। बहुत हानि हुई। गुरुजी रोज बाढ़ का पानी देखने जाते थे। एक दिन रेखा कि एक छोटे से टापू जैसे जमीन के टुकड़े पर एक कुत्ता घिरा हुआ है। तीन दिन से उसने कुछ नहीं खाया। पर उसे कौन बचाये। गुरुजी ने बड़ी मुश्किल से तीन रुपये में एक डोंगी वाले को तैयार कराया। कौन जाता वह भी कुत्ते को बचाने। कोई आदमी तो है नहीं जो सीधी तरह से नाव पर बैठ जाये। डोंगी उसके चारों तरफ चक्कर लगाती रही पर कुत्ता ऐसा डरा कि वह कैसे भी नॉंव पर आने तैयार नहीं था गुरुजी रोटी दिखाते रहे पर वह नहीं आया २, ३ चक्कर लगाने के बाद डोगी वाला बोला चलो भाई मरने दो कुत्ते को श्रीराम बोले एक चक्कर और जैसे ही उसके पास पहुॅंचे कि युवक श्रीराम नॉव से कूद पड़े जमीन पर टुकड़ पर और सउठा उस कुत्ते को और कूद पड़े उसी क्षण ढोगी पर ढोगी डगमगाई पर श्रीराम कुत्ते के साथ ढोगी पर थे। ढोगी वाले ने बेहिसाब गाली दी युवक श्रीराम को बोला खुद मरे तो मरे मुझको भी मारेगा। वह गाली देता ही रहा जब तक किनारे पर नहीं आ गया। गुरुजी ने उसको ५ रुपये दिये और ढोगी वाले ने एक जोर की लात मारी कुत्ते को कुत्ता काय काय करके दौड़ गया जमीन पर। यह था गुरुजी का बचपन।

गुरुजी ने शरीर छोड़ दियाथा। ओमप्रकाश भाई साहब पुरानी बाते याद कर करके रोज लिख रहे थे। मै प्रतिदिन त्रिपदा ५ में उनके पास जाता। वे सबसे पहले मुझे सुनाते वे नियमित मेरी प्रतीक्षा करते हम चाय भी साथ ही पीते। एक दिन बोले मेरे पास कल एक महिला आई। और बोली आप गुरुजी के बड़े पुत्र है मैंने कहा हॉं। मैं आपको कुछ कहना चाहती हूॅं। आप मेरी बात सुने। मैं आपका अहसान नहीं भूलूंगी। बहन बोलो। हम दोनों प्रज्ञा ५ में कुर्सी डालकर बराण्डे में बैठ गये। उसने सुनाना शुरु किया। आज से करीब २५ वर्ष पहले की बात कि मैं रेल के थर्ड क्लास के डिब्बे में जा रही थी। मैं गेट के पास नीचे बैठी थी। मेरी ऑंख से आंसू बह रहे थे। एक बूढ़ा सा आदमी खिड़की के पास सिंगल सीट पर बैठा था। वह बोला बहन यहॉँ बैठ जाओ। तुम्हें हवा लगेगी। पास में स्थान है मैं वहॉँ चला जाऊंगा। मैं बैठ गयी। अगले स्टेशन पर वे पानी ले आये बोले मुॅंह धोलो बहन पानी पीलो। मैं बोली मुझे कुछ नहीं चाहिए। वह चुप बैठ गया। फिर अगले स्टेशन पर पानी ले आया। बोला बहन पानी पीने से कोई हानि नहीं होगी। बड़ी नम्रता से खड़ा रहा। गिलास लिये। फिर बोला बहन पानी पी लो। मैंने पी लिया। फिर थोड़ी देर में वह बोला बहन कहॉँ जा रही हो। शायद राजस्थान का कोई स्थान था जेसलमेर जैसा। उसने पूंछा क्यों। बोली वहॉँ कोई बड़े सन्त आ रहे हैं उनसे मिलने। अच्छा तो क्या मागोगी। बोली मौत। बोले मौत वो नहीं देंगे और कुछ नहीं माँग सकती मैं चुप हो गयी। वह भी बैठ गया। मैं एक वर्ष पहले ही विधवा हो गई थी। स्टेशन आ गया। और भीड़ घुस गयी। पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य जी की जय। परम पूज्य गुरुदेव की जय। शोरगुल माला फूल। पर वह बूढ़ा आदमी उठते उठते कह गया। कल तू मुझसे मिलना।

दूसरे दिन बड़ी भीड़ थी प्रणाम करने वालों की लम्बी लाईन गुरुजी ने महिला को देख लिया और कार्यकर्ता भेजा उस बेटी को मेरे पास ले आओ। ट्रेन ने उसको बतलाया था कि मेरा कोई पुत्र भी नहीं है मेरा भविष्य अन्धकारमय है मौत नहीं माँगू तो क्या माँगू। आज गुरुजी ने कहा बेटी मैं तेरा पिता हूॅं तू मेरी बेटी है इसको अच्छी तरह समझ ले और प्रमुख कार्यकर्ता को बुलाकर कहा तुम अपना काम किसी और को सम्भलवा दो और कहीं से कोई नवशिशु लेकर ही तुम मेरे पास आना। मैं तीन दिन यहॉँ पर हूॅं बस यही काम तुम्हें करना है। गुरुजी की आज्ञा कोई चारा नहीं मेटरनिटी होम गया एक महिला की प्रथम डिलेवरी हुई थी डिलेवरी में मॉँ मर गई। पिता ने बच्चे को देने से मना कर दिया। उसके ससुराल वालों ने भी बहू को ले जाने से मना कर दिया। दूसरे दिन लेडी डाक्टर स्वयं बच्चे के साथ खुद आई यह देखने कि हाल के बच्चे को कौन लेने वाला है और कैसे पालेगा। प्रातः यज्ञस्थल पर पहुॅंची तो अपार भीड़ और सरंजाम देखकर गुरुजी से बहुत प्रभावित हुई और गुरुजी से बोली और बोली लगता है बच्चे को सच्चे मॉं बाप यहॉँ मिलेगें पर मैं बच्चे को लेने में थोड़ा संकोच कर रही थी। मालुम नहीं किस जात का होगा। मातापिता कैसे होंगे। घरवाले क्या कहेंगे। गुरुजी समझ गये। गुरुजी ने बच्चे को गोद में ले लिया और बोले बस अब यह ब्राह्मण हो गया। बेटी तुझे याद है न मैं तेरा पिता हूॅं। तुझसे कोई कुछ नहीं कहेगा। लोग तेरी सेवा करेंगे। तू बस बच्चे को पाल और सारी व्यवस्था होती चली जायेगी। यह पिता हर क्षण तेरे साथ रहेगा। यह तेरा शानदार बेटा होगा। तेरी इतनी सेवा करेगा कि क्या कोई बेटा मॉँ की करेगा। मैंने उसका नाम रख दिया पियूष शर्मा आज वह इंजीनियर है मातृभक्त है और जाने क्या जादू हुआ कि उस दिन से सब मेरा कुछ ज्यादा ही ख्याल रखने लगे मेरा हृदय भी रोने की अपेक्षा बच्चे की देखभाल में लग गया। कहते कहते वह महिला रोती रही लेकिन बोलती रही। तुम्हारे पिता श्रीराम शर्मा मेरे भाई हैं वह कभी नहीं मर सकते। वह तो मेरे साथ जायेगा। मेरे लाल कफन में। भाई साब आपको सुनाकर मैं हल्की हो गई। मेरा शान्तिकुञ्ज आना सफल हो गया। मेरा भाई है पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य और मैं उसकी बहिन।

मेरे स्वसुर डॉ० के०के०गुहा को हार्टअटेक हो गया। बनारस मेडीकल कालेज में भरती हो गये। मुझको टेलीग्राम मिला मैं एमएस पढ़ रहा था। मैंने सोचा मैं जाकर क्या भला कर सकता हूॅं। गुरुजी के पास चलते हैं। मैं मथरा पहुॅंचा गुरुजी को सबकुछ सुनाया। गुरुजी बोले तू बनारस जा सब ठीक हो जायेगा और आज के बाद उन्हें दिल में कभी दर्द नहीं होगा। मुझे आश्चर्य हुआ कि दिल का मरीज और फिर कभी दर्द न हो यह कैसे सम्भव है पर मैं साक्षी हूॅं कि उन्हें कभी दर्द नहीं हुआ। सन् १९६६ में उनके जीवन के अन्त समय में लखनऊ में मैं उनके पास था। मृत्यु तो हुई पर दर्द नहीं हुआ।

एक दिन मथुरा में गुरुजी मुझसे बोले दत्ता में तेरा ध्यान रखता हूॅं तेरे लिये बहुत कुछ करता भी हूॅं पर बताता नहीं हूॅं और बताना उचित भी नहीं है पर तू विश्वास कर वह क्या कहना चाहते थे मेरी समझ में नहीं आया पर अच्छा अवश्य लगा।

हमारी छोटी बहिन गीता ग्वालियर में रहती है। हमारा छोटा भाई विजय उनके पास रहता था। उसे मानसिक कष्ट था। डाक्टर भटकेरिया वहीं पास में रहते हैं। मदद करते रहते हैं। बहुत अच्छे गायत्री परिवार के व्यक्ति हैं। ग्वालियर में कुछ लोगों ने मेडीकल टेस्ट के पेपर निकाल लिये और पैसे लेकर उसकी कापियॉं बेच दी। वे पकड़े गये गिरफ्तारियॉं हुई। ऐसे एकआध परचे डॉ० भटकेरिया की लड़की ने भी खरीदे थे और सम्भावना थी कि पुलिस पकड़ेगी। लगभग पक्का था पुलिस अब आई तब आई हमारी बहिन ने एक सपना देखा कि माताजी आई और ब्रह्मदण्ड लेकर और बोली मैं तेखती हूॅं हमारी बच्ची को कौन परेशान करता है सब हड्डी पसली एक कर दूंगी। सबेरे होते ही हमारी बहिन डाक्टर भटकेरिया जी के पास गई और बोली तुम बिल्कुल चिन्ता मत करो कुछ नहीं होगा। फिर भी डाक्टर भटकेरिया माधवगंज कोतवाली में पता लगाने गये कोई गड़बड़ की सम्भावना तो नहीं है। थानेदार की टेबिल में कांच के नीचे गुरुजी का फोटो लगा था थोड़ा पुराना और फट भी गया था। डाक्टर साहब ने अपने पाकेट से दर्शन पाकेट निकाला और थानेदार को कहा इसको ले लीजिये। थानेदार बोल उठा अब आपकी बच्ची हमारी बच्ची है आप बिल्कुल चिन्ता न करे और फिर कोई पूंछने नहीं आया।

हमारी बहिन गीता सेनी के लड़के योगेश का पहला जन्मदिन था। यज्ञ कराया। पार्टी भी दी। बड़ा डर था कि हमारा छोटा भाई जो बहिन के पास ही रहता है। कोई चिल्लाचाटी नहीं करे। वह चाहे जहॉँ चला जाता है कुछ उठाता है कुछ बोलता है हमेशा खाना माँगता रहता है नहीं दें तो चिल्लाता है। बाहर के काफी आदमी आये हुये थे हमारी बहिन ने देखा कि विजय के अगल बगल में गुरुजी और माताजी घूंम रहे हैं गीता ने डाक्टर भटकेरिया जी को दिखाया उन्होंने भी ऐसा देखा और किसी ने नहीं। वह नकेवल शान्त रहा बल्कि थोड़ा बहुत काम भी करता रहा।

हमारे बड़े भाई डाक्टर धीरेन्द्र नाथा दत्त एमएस हैं। ग्वालियर से इंदौर जा रहे थे रास्ते में गुना में उनको बहुत पेट दर्द हुआ मैं कहीं बाहर गया था। पेट बहुत फूल गया था। डाक्टरों को भी दिखाया कष्ट दूर नहीं हुआ। मेरा बेटा अरविंद घर पर ही था और उसने गुरुजी की दी भस्मी गायत्री मंत्र के साथ पेट पर लगाई और दर्द १० मिनिट में ही पूरी तरह दूर हो गया।

सन् १९९४ में मैंने माताजी से बिल्कुल अकेले मेंकहा कि माताजी मेरा मन है कि मैं गुरुजी को अपने जीवन में दो बार प्रणाम करूं एक अभी कभी और एक मत्यु के पहले हम दोनों प्रणाम करें। माताजी की ऑंखों मेंआंसू भर आये बोली तू गुरुजी को ही प्रणाम कर रहा है। मेरा प्रणाम गुरुजी को प्रणाम हैमाताजी के ऑंसू देखकर मैं रुक न सका और प्रणाम कर भाग गया।

एक दिन मैंने माताजी से कहा आप तो मॉँ शारदामणी हैं। उन्होंने अपने आश्रमवासियों से कहा था कि उनके मृत्यु के समय हम दोनों मौजूद रहेंगे और यदि अपना विकास कर सको पवित्र बन सको तो जब कभी हम दोनों को अपने पास अनुभव कर सकते हो। माताजी आपका यह वायदा हम लोगों के लिये आज भी है न। माताजी ने सुन लिया आगे क्या हुआ मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया।

मैंने कहा माताजी कभी हम आपके परिवार के निकट सदस्य थे पर अब दूर क्यों हो गये। कहॉँ हम बंगाली कहॉँ आप। पिछले जन्म में कोई भूल हो गई या कोई पाप हो गया आप नाराज होंगी। माताजी ने कहा नहीं बेटा परिवार के सदस्य होना निकटता नहीं है तुम हमारे निकट हो हम तुम लोगों को बहुत प्यार करते हैं बस यही निकटता है आत्मीयता है परिवार के सदस्य बनना नहीं।

गुरुजी से मेरी कभी-कभी इस लोक और उस लोक की बात हुआ करती थी शान्तिकुॅंज में आकर कम तो हो गई पर होतीथीं। जैसे एक दिन मैंने पूंछा गुरुजी दिव्यानंद जी का क्या हुआ। गुरुजी ने कहा मैं मरा नहीं हूॅं मैं कैसे बतलाऊॅं क्या हुआ। ब्रह्मवर्चस के कुछ साथी भी मेरे साथ थे मैंने कहा आप तो चेतना से सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं तो गुरुजी बोले उनके मन में सुखी जीवन की थोड़ी इच्छा रह गयी थी इस कारण एका समृद्घशाली और एक अच्छे परिवार में उनका जन्म हुआ है। अगले जन्म में यह बहुत अच्छी स्थिति पर पहुॅंच जायेंगे। जब से जितेन्द्र तिवारी जी का आना हुआ। तबसे यह बातें मुझसे कम हो गयी। क्योंकि ऐसी बातें उनसे बहुत अधिक होने लगीं थीं। मुझको गुरुजी ने एक दिन इशारा किया कि जब कभी तुझे जरूरत पड़े इससे पूंछ लेना। उन्होंने कहा मैं शरीर छोड़ने पर कुछ ऐसा करूंगा जैसे कोई कुरता उतारता है। पर तीन स्थान पर मैं रहूूंगा एक माताजी के पास। दूसरा सजलश्रृद्घा प्रखर प्रज्ञा तीसरा अखण्ड दीपक। किसी ने कहा गुरुजी ये तीनों स्थान शान्तिकुॅंज में है और हम लोग बहुत दूर है हम लोग भी आपके बच्चे है तो चौथा स्थान ऊँ गता हुआ सूर्य होगा।

एक दिन हम और डाक्टर प्रणव गुरुजी के पास बैठे थे। गुरुजी बहुत प्रसन्न थे बोले तुम दोनों आशीर्वाद दे दिया करो। डरना नहीं मैं तुम्हारे पीछे हूॅं। मेरी तो आज तक हिम्मत नहीं हुई आशीर्वाद देने की।

मैं २१, २२ वर्ष की उम्र तक पढ़ाई के अलावा कुछ नहीं जानता था। धर्म के नाम पर राम नाम हनुमान चालीसा और मन्दिर दर्शन। भगवान को इतना ही समझताथा कि वह अच्छे नम्बर से पास करने में मदद करता है। गुरुजी को देखा तो ऐसा लगा कि कोई जादूगर किस्म का आदमी है। उनसे मुझे प्यार हो गया। उनका प्यार औरमाता जी का भोजन मेरे जीवन में सबसे अधिक रुचिकर रहने लगा।

जादूगर इतने कि १५ रुपये किराये पर रहने वाला व्यक्ति माताजी सतीश शैला और अपनी मॉं के साथ दिन में कम से कम १०, १५ व्यक्तियों को अपने हाथ से खाना खिलाना बर्तन धोना क्योंकि वह प्रयास करने पर कहती थीं मैं मॉं हू बच्चे बर्तन नहीं धोते। गुरुजी कहते मैं तेरे घर आऊॅंगा और वे अशोकनगर, ग्वालियर लखनऊ कानपुर जाबरा मंदसौर जबलपुर देवास और इंदौर आये। अशोकनगर तो हमारे घर ६ दिन रहे। बाद में गुरुजी ने पत्र लिखा मेरा पिछले जन्म काा वायदा था इसलिये इतने लम्बे समय तेरे घर रहा। वायदा पूरा किया तुमने भी प्रसन्नता अनुभव की होगी जो मुझे पटानी ही थी।

सन् १९५८ के यज्ञ में मैं नहीं था पर वह यज्ञ मुझे ऐसा लगता था जैसे मैंने देखा है। क्योंकि उसकी पूरी कामेंट्री गुरुजी ने मुझे स्वयं सुनाई। उन्होंने वे पक्ष भी बताये जो शायद यज्ञ में आने वालों को भी न मालुम पड़ सके होंगे। जैसे गुरुजी ने कहा कि हिमालय की कुछ दिव्य आत्माओं ने मुझसे वायदा किया है कि वे इस यज्ञ में आयेंगी। मैंने भी कुछ लोगों को कह दिया था कि वे आयेंगी पर मैं परिचय नहींकरा सकता। जान सको तो जान लेंना क्योंकि मेरा उनसे ऐसा ही वायदा है। इतने बड़े यज्ञ में बिना कोई सरकारी सहायता के बिना पुलिस या स्वयं के धन के इतना अच्छा अनुशासन व्यवस्था तथा प्यार एक इंसान नहीं कर सकता। सारा कार्यक्रम गुरुदेव माताजी ने जल उपवास पर किया पर हमेशा वह केवल हॅंसते और मिलते ही रहते थे। पण्डित लीलापत शर्मा जी बताते हैं कि हमसे गुरुजी न ेकहा कि रसीद काटने का काम बड़े आराम से करना। चाय पीना बीच में आराम करना जितना आवश्यक हो अपने आप आ जायेगा। पंडे लोग पैसे उठा ले जायें तो ले जाने देना। जमा करने वालों की इतनी भीड़ होतीथी कि वे रसीद की प्रतीक्षा नहीं करते थे। जय गायत्री माता कहकर ऊपर फेंक जाते थे। किसी की कोई चीज खोई नहीं। खोई तो मिल गयी। औरन मिली तो घर जाकर मिल गई। कोई दुर्घटना या मौत नहीं हुई। बीसियों वर्ष बाद भी रिक् शे और दूकान वाले उस यज्ञ को याद करते हैं। सफाई, उपचार एवं स्वयंसेवक कार्य आगन्तुकों ने ही किये। व्यवस्था मनुष्य ने की होगी पर वह दिव्य थी। कहते हैं उसमें दस लाख व्यक्ति तीन दिन रहे। भोजन किया।

कुछ मुसलमान गुरुजी से मिलने शान्तिकुॅंज आये। थोड़ी बातचीत के बाद एक दूसरे को वह घड़ी देखने लगे और बोले गुरुजी चले। नमाज का समय हो गया। ऊपर के हाल में ही गुरुजी बोले। यहीं नवाज पढ़लो। वे हाथ धोकर नवाज पढ़ने लगे। आज नवाज में उनको कुछ विशेष ही आनन्द आया और उनका नेता बोले खुदा के नूर और आप में कोई अन्तर नहीं है हमें खुदा के नूर में आप और आप में खुदा का नूर दिखता रहा। हमारी यहॉं की नमाज धन्य हो गई।

जयपुर के सेठ तुलजाराम सुनाते हैं। कि शान्तिकुञ्ज के पास एक महिला विद्योत्मा रहती है। कुछ योग केन्द्र चलाती हैं। ऐसे तो वे शान्तिकुॅंज से बहुत चिढ़ती है पर कहती है कि उन्हें कुण्डलिनी जागरण की विद्या आती है। सेठ उनके पास चले गये। और बातचीत की किसी को नहीं बताया। और गुरुजी के पास जाते ही गुरुजी पूछने लगे तूं कहॉँ गया था। वे बोले बगल में। क्यों भगवान देखने। चल मैं तुझे भगवान दिखाता हूॅं कितने भगवान देखेगा। मालुम नहीं वे सच बोल रहे थे या नहीं पर वे बोले कि गुरुजी ने मुझे देवताओं की लाइन दिखाई।

मुझे यह घटना डॉ० प्रणव के पिताजी ने कही। एक देवकन्या ने फॉंसी लगाली। गुरुजी को सूचना दी कि एक लड़की ने फॉंसी लगा ली और मर गई। गुरुजी पहुॅंचे और सबों को अलग जाने को कहा। बोले अभी मरी नहीं है जाकरथोड़ा मंत्र सा पढ़ने लगे पानी वानी छिड़का होश में आ गई। काफी समय बाद जब एक दिन गुरुजी ने प्रातः ५ बजे मुझे और बी०डी०पाण्डे बीएचईएल डिप्टी मैंनेजर से बातचीत के बाद कहा कि दत्ता तुम महेन्द्र के पास जाओ और मुझको लिखित कुछ पत्र और पेपर की कटिंग पढ़ों और उसके बाद तुम दोनों गंगा किनारे जाकर बैठो। इन पत्रों में एक पत्र उस लड़की के पिता का भी था जिसमें उसके पिता ने उसकी प्राणरक्षा की बात लिखी थी और कुछ वर्ष बाद उसस लड़की की मृत्यु हो गई। पेपर कटिंग में एक घटना मैंने यह भी पढ़ी कि गुरुजी राजस्थान गये हुये थे और वहॉँ गवर्मेन्ट आफ इंडिया के एक केन्द्रीय मंत्री ने गुरुजी को लाइट आफ इंडिया से सम्मानित किया। लाइट आफ एशिया गौतम बुद्घ को दिया गया था।

मैं जब नया नया जुड़ा था और उनको बड़ी बारीकी से देखता था। उनका साहित्य खूब पढ़ता था। और जॉंचता रहता था कि जो कुछ वो लिखते हैं सचमुच अपनाते भी है। वे कभी चमड़ा उपयोग नहीं करते थे केवल जूते में ही नहीं होलडाल के बेल्ट में भी नहीं। रेल मेंकभी धक्का देकर नहीं जाते थे। और सबसे बड़ी बात हर व्यक्ति यह सोचता रहा कि मुझे ही सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। वे कहते भी रहे मैं अधूरा प्यार नहीं जानता। मेरा हर प्यार पूरा ही रहताा है। वे प्रश्नों का उत्तर विद्वता से नहीं बड़े प्यार से तथा उपयोगिता तथा आदर्श की दिशा में धकेलते हुये देते थे।

मथुरा में गुजरात के एक सेठ आये। दीक्षा ली। सन् १९५९-६० की बात होगी और दक्षिणा में एक १०० का नोट दिया गुरुजी ने कहा कि चलो मेरे साथ और उस समय दो दो रुपये की बंडी ५० खरीदी और २५ अपने सिर पर और २५ उस सेठ के सिर पर रखी और वह गरीबों में बॉंट आये।

शक्तिपीठों की स्थापना के लिये संकल्प के समय में कई स्थानों में गुरुजी के साथ रहा वे पहला पैसा जो कुछ मिलता था वह वहीं अपने आशीर्वाद के रूप में दे देते थे। गुना के शक्तिपीठ के उद्घाटन संकल्प में जो भी पैसे मिले वह मुझे दे दिये जो वहॉं के कार्यवाहक श्रवण कुमार सोनी को दे दिये गये।

गुरुजी माताजी का कमरा गायत्री तपोभूमि मेंकुए के पास था और बाद में ऊपर। शान्तिकुॅँज में भी इसी प्रकार गुरुजी ऊपर के कमरे में रहते और जब हम लोग यानी डॉ० प्रणव, एमडी, डॉ० जितेन्द्र गुप्ता एमडी और मैं एमएस आयुर्वेद का काम करते तो कहते कि १० से ४ तक मेरी दुकान चलेगी और बीच-बीच में बात कर जाते। कितने ही लोग बाग ऑँसू लेकरआते और प्रसन्न होकर जाते। आज वही आशा हम अखण्ड दीपक और सजल श्रद्घा प्रखर प्रज्ञा से रखते हैं। जो गुरुजी के पास जाता उनका आत्मीय बन जाता और माताजी के पास जो रो दिया बस उसी की बात सही हो जाती थी। यदि कभी गुरुजी किसी पर नाराज होजाते तो हम देखते जल्दी से वह साधना कक्ष में जहॉँ हम लोग बैठते आते और माताजी को फोन कर देते कि जरा देख लेना मैंने बच्चे को डॉंट दिया है।

शान्तिकुॅंज में आर्यसमाज के प्रमुख महात्मा आनन्द स्वामी अपने आर्यसमाज अनुयायियों के साथ आये। सप्तऋषि स्थान पर पुरुष और महिलायें आर्यसमाज की तथा शान्तिकुॅंज के बैठ गये। गुरुजी आनन्द स्वामी को प्रणाम करतेथे और आनन्दस्वामी गुरुजी को। गुरुजी इसलिये कि वे बड़े थे सन्यासी थे। और आनन्द स्वामी कहते थे कि मैं इसलिये प्रणाम करता हूॅं कि इसमें मुझसे अधिक अध्यात्म है। प्रज्ञागीत सुनते ही वे बोले। सुन्दरं सुन्दरं। दोनों को संक्षिप्त भाषण हुये और लौटते हुये हम लोगों को बड़े जोर देकर बोले सोचो, सोचो सोचो।

गुरुजी ने जब १९६१ में मुझसे कहा था कि तुम दो व्यक्तियों से मिलना एक सत्यनारायण पण्ड्या और दूसरे लीलापत शर्मा। उसके बाद हम लोगों के पारिवारिक सम्बन्ध हो गये और मैं मोटरसाईकिल में जज साहब को बिठालकर ढबरा ले जाया करता था पण्डित जी बहुत प्रेम से बात करते और बहुत अच्छा खाना खिलाते।

एक दिन अरुणा ने गुरुजी से कहा गुरुजी प्रणव तो मेडीकल में आ गया मैं भी आपका रिश्तेदार हूॅं मैं मेडीकल में नहीं आया। गुरुजी बोले तेरा नाम कहॉँ है। बोले मालुम नहीं। मैं सलेक्ट नहीं हुआ। पता लगा कहॉं है। पिताजी जज थे कहीं से पता लगा उसका नाम वेटिंग लिस्ट में ग्यारहवॉँ था। ग्यारह लड़के छोड़ गये और उनका एडमीशन हो गया।

सन् १९८३ में हम लोग नियमित साधना कक्ष में बैठकर तीनों डाक्टर आयुर्वेद की तुलना एलोपैथिक से करकर विज्ञानसम्मत पक्ष बना रहे थे। वहॉँपर वीरेश्वर उपाध्याय जी भी थे। अचानक गुरुजी ने वीरेश्वर जी से पूंछा देहरादून गाड़ी किसने भेजी। वे बोले डाक्टर प्रणव ने। गुरुजी बोले क्यो प्रणव गाड़ी तूने भेजी। जी गुरुजी। क्यों। कुछ पेड़ पौधे के कुण्डे लाने थे। कितने कुण्डे लाने थे। डॉक्टर प्रणव घबराये। बोले दस बारह तो दस बारह केलिये गाड़ी भेजनी थी। डाक्टर प्रणव बोले गुरुजी गलती हो गई अब नहीं भिजवायेंगे। बोले सवाल गलती का नहीं है मैं यह पूंछ रहा हूॅं कि तुमने क्या सोचकर भेजा। डाक्टर प्रणव चुप। फिर बोले बोला नहीं क्या सोचकर भिजवाई। मैं सिर्फ जानना चाहता हूॅं ऐसी कोई बात नहीं मैं यह जानना चाहता हूॅं कि तुमने क्या सोचकर भिजवाई एक बजे से चार बजे ते थोड़ी-थोड़ी देर में फिर पूंछते। डाक्टर प्रणव न रुक पा रहे थे न भाग पा रहे थे ऑंखों में आंसू छलछला आये। हम लोग भी बीच-बीच में ऑंख उठाकर देख लेते और फिर पढ़ने लगते। आखिर चार बजे गुरुजी बोले लोग अपने बच्चे के दूध का पैसा काटकर शान्तिकुॅंज भेजते हैं उसका ध्यान रखना प्रणव।

गुरुजी के हर शिविर में हर प्रोग्राम में आसपास के भाषण में हमारा जाना अब लगभग नियमित हो गया था। श्रीपर्णा का पूरा सहयोग मिलता था। गुरुजी के धर्म से अब उनको कोई डर नहीं था। वे बिना कारण मुझे बड़ा डाक्टर बतलाती। कोई बीमार होता तो कहते मेरा डाक्टर आ रहा है शीघ्र ठीक कर देगा। करते वे स्वयंथे प्रशंसा मुझे देते। रामसुंदर चतुर्वेदी हमारे साथ शिविर में थे अचानक बोले तूं अपनी पत्नी को नहीं लाया। अभी तार देकर बुला। वे आ गईं और आते ही उनको बहुतगहरा पीलिया हो गया मुझसेबोले तू दवा दे दे। मैं नया नया एमबीबीएस था दवाओं के नाम भी याद नहीं थे। बस ग्लुकोस और कोई टानिक दिया तीसरे दिन वे ठीक हो गई। इतना मुझे स्पष्ट था कि मेरी दवा का इसमें कोई खास रोल नहीं था।

गुरुजी की नियमितता कमाल की थी। पेतीस वर्षाें में कभी भी गुरुजी माताजी से मिलने में मुझे कभी पॉंच निमिट से अधिक देर नहीं लगी। गायत्री तपोभूमि वे कभी भी घियामंडी से चलकर पूर्णाहुति पहुॅंचने से नहीं चूके। ऐसा कभी नहीं हुआ कि मेरे पत्र का उत्तर नहीं आया हो। गुरुजी के पत्र लिखने का एक विशेष अंदाज था। माताजी पत्र पढ़ती और पत्र पढ़ते पढ़तेमें ही गुरुजी पत्र लिखते रहते और जो विशेष बात पूंछी जाती वह अन्तिम दो चार लाईन में लिखकर यहॉँ माताजी का पत्र पढ़ना समाप्त होता वहॉं गुरुजी का पत्र लिखना। मैं अखण्ड ज्योति मंगाता और कभी देन होती तो तार द्वारा मंगा लेता। मुझे नहीं याद कि एक भी महीने की अखण्ड ज्योति चूकी हो।

एक दिन मैं घियामंडी पहुॅंचा पूंछा माताजी कहॉं है एक बच्चे ने बताया सतीश के लिये कोट का कपड़ा खरीदने नीचे गयी हैं। बच्चा दौड़ा माताजी अमलकुमार आया है। लौटते में मेरे लिये कचौड़ी समोसा ले आयी। मैंने कहा माताजी गुरुजी किताब मेंलिखते हैं कि यह नहीं खाना चाहिए। तो वे बोली मैं तो नहीं लिखती। खाना मेरा विषय है और यह प्यार ही है जिससे आदमी बहुत कुछ कर गुजरता है।

गुरुजी एक दिनमें ६०-७० पत्र लिखते थे मैंने पूछा गुरुजी हमने सुना है आप पत्र रख देते हैँ गायत्री माता लिख देती हैं गुरुजी बोले लिखती तो नहीं लेकिन लिखाती हैं। फिर गुरुजी ने एक मजेदार कहानी सुनाई बोले। एक दिन एक स्टेनो मेरे पास आया बोलागुरुजी आप बहुत लिखते हैं जब आराम करते हैं तो बोल दिया करिये।मैँ लिख दूंगा। मैंने तीन विषय में एम ए किया है। गुरुजी ने कहा बहुत अच्छा बेटा। लेकिन मेरी एक मुसीबत है। गुरुजी आपकी क्या मुसीबत है। बोले कुछ दिनों पहले एक और स्टेनो आया था वह तीन विषय में एम ए भी था और पीएचडी भी वो भी यही कह रहा था। पर मेरी मुसीबत ये हैं कि मैँ भी किसी का स्टेनो हूॅं अब स्टेनो स्टेनो कैसे रखे।

स्वामी केशवानंद जी माताजी के पास आये और लड़ने लगे। कि माताजी आपने आचार्य जी को जाने क्यों दिया। बोले आप हम बच्चों की तरफ से गुरुजी से क्यों नहीं बोली। माताजी बोलीं कि अब तो गुरुजी चले गये अब उनकी तरफ से मैं तुम्हारी सुन लेती हूॅं।

गुरुजी नौ दिन के उपवास के बाद घियामंडी में दावत देते और कहते यह दावत है बाकी जो अभी तक खाये होंगे वह सब अदावत है क्योंकि वे शरीर औरमन को नुकसान पहुॅंचाते हैं। जिस दिन गुरुजी का विदाई गीत होता और वीणापाणी जयपुर की उनका गाना सुनकर ही लोगबाग रोने लगते क्योंकि उन्हें मालुम था कि गाने के बाद बिदाई भाषण होंगा।

एक दिन चिन्मय ने माताजी से पूंछा यानी अपनी नानी से कि आप कहती हैं कि नारी युग आयेगा यह कैसे होगा। आज की नारी तो बहुत पिछड़ी है। माताजी बोली बेटे सवाल पिछड़ेपन का नहीं है अच्छा काम सब कर सकते हैं। और युग पढ़ाई से नहीं अच्छाई से आता है। नारियों में ईर्ष्या और द्वेष चला जायेगा और वही उनकी योग्यता और प्रखरता होगी।

मुझे गुरुजी के साहित्य ने बहुत प्रभावित किया और मुझे अब भी बुक स्टाल का काम बहुत अच्छा लगता है। जहॉँ कही भी मेले में बुक स्टाल लगाया ऐसा कभी नहीं हुआ कि तीन चार दिन में सारी किताबे समाप्त न हो गई हों। मैं यह स्पष्ट रूप से कहता हूॅं कि आप कितने भी पढ़े लिखे हों और आपने भी किताबे पढ़ी हों पर गुरुजी की यह किताब पढ़ेंगे तो आपको लगेगा कि आपने जीवन में एक महत्त्वपूर्ण किताब पढ़ी।

३० सितम्बर १९८९ को गुरुजी ने कहा कि मैंने कितनी ही मुक्त आत्माओं से गायत्री परिवार में आने का अनुरोध किया है पर कोई तैयार ही नहीं होता।

नरसिंहगढ़ में हम गुना से गुरुजी के साथ उन्हीं की कार में पहुॅंचे। जहॉं का कार्यक्रम होता उससे थोड़ी देर पहले ही गुरुजी फ्रेस हो लेते थे क्योंकि पहुॅंचने के बाद प्रणाम माला जै में कोई ध्यान ही नहीं रख पाताथा। वहॉं पहुॅंचते ही एक स्वयंसेवक झण्डा लेकर आगे आगे चलता रहा और एक मकान पर जाकर गाड़ी खड़ी हो गई। वहॉं एक भी कार्यकर्ता नहीं था महिलायें रसोई में चाय नाश्ताबना रहीं थीं। और वहीं जाकर गुरुजी को बिठाल दिया। गुरुजी खड़े रहे और कोई कार्यकर्ता नहीं। उन्होंने पण्डितजी को कहा किसी को बुलाकर लाओ। पर वे भी कहीं रुक गये मुझसे बोले दत्ता तू जा और किसी जिम्मदार स्थानीय कार्यकर्ता को बुलाकर तो ला। मैं जल्दी जाकर जल्दी ही लौटा और गुरुजी से कहा गुरुजी मन्दिर पर चढ़ने के चढ़ाई के रास्ते पर एक ट्रक पलट गया और एक आदमी मर गया इसीलिये सारे गायत्री परिवार के लोग उसके परिवार के साथ हैं। तो एक कुर्सी बुला मैं उस पर बैठूंगा और सबो को लाइन से खड़ा कर दे और वे प्रणाम करते रहें और उनसे कह कि वह अपनी समस्या सीधे मुझसे कहदें मैं बात करता रहूॅंगा। तू यह देखना कि मेरे रहने की व्यवस्था चाहे जितनी साधारण हो और मैं परदे वरदे पसन्द नहीं करता हवा रोशनी आये। सारी भीड़ नियंत्रित हो गई।

जब सन् १९६७ में पॉंचकुण्डीय यज्ञ में गुरुजी अशोकनगर आये तो हमारे यहॉँ ठहरे। सरकारी मकान अस्पताल के सामने उसको तीन बार पुतवाया और बगीचे के सारे पिलर्स पर प्रकाश के गोले लगवाये पूजा का कमरा सदवाक्य से सजाया गया मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मैं बिल्कुल अंजान हूॅँ आपके लिये क्या करूं। आप थोड़ा बता दें छोटी भूलें तो होंगी पर बड़ी भूल न हों आपकी कृपा चाहिए। गुरुजी बोले तू अपना काम देख मेरी देखरेख सब श्रीपर्णा कर लेगी। मैं तो घर का आदमी हूॅं बाहर क्या करना यह देख। मैंने कहा फिर भी कुछ तो कहें गुरुजीगुरुजी ने कहा देख सोने का स्थान ऐसा हो जिससे खिड़की के सामने आसमान दिखे क्योंकि यह साधक के लिये आवश्यक है। दूसरी बार मैं जल्दीउठता हूॅं लेकिन किसी को उठने को न कहना। मैं विस्तर पर ही रहूॅंगा पर दो चार अपने मित्रों को ले आना आध्यात्म्कि बात करेंगे। श्रीपर्णा से गुरुजी ने कहा कि जब मैँ पूजा करूं तो कोई देखे नहीं। श्रीपर्णा बोली गुरुजी बिल्कुल नहीं देख सकते। क्यों दू देखने वाली थी। जी गुरुजी। आप नहीं कहते तो जरूर देखती। क्या आप भगवान से बात करते हैं। गुरुजी हँस दिये। श्रीपर्णा ने कहा एक प्रश्न पूछंू पूूंछ बैटी गुरुजी जो झूठ बोलते हैँ बेईमानी चोरीकरते हैँ यदि पता लग जाये तो सारे पापनष्ट हो जाये। गुरुजी बोली तू बड़ी होशियार है। अब जब मैं भगवान के पास जाऊॅंगा और तेरी बात कहूॅंगा जब कोई झूठ बोले तो उसके मुॅंह से धुआ निकले और हम सबको हॅंसा दिया।

सन् १९६७ मे मैँ एमएस पास करके देवास आया। उन दिनों मध्यप्रदेश में कोई एमएस आर्थाेडिक्स नहीं था। हमारा छोटा भाई दिलीप कुमार दत्त एक्सटेंशन आफीसर था वह संस्कृत जानता था हम दोनों मिलकर गुरुजी की सत्यनारायण की कथा करते थे और गुरुजी वाली व्याख्या करते थे। किसी से भी जाकर कहते थे कि तुमकथा कराओ अगर प्रसाद का खर्चा न उठाना चाहो तो हम वह भी साथ ले आयेगे। पर तुम ऐसी कथा सुनोगे जो बड़ी सच्ची है। गुरुजी ने बतलाया कि लकड़हारा इसलिये बड़ा आदमी नहीं बन गया कि कान में कथा के कुछ शब्द पहुॅंच गये थे लेकिन इसलिये बड़ा आदमी बन गया कि वह अपनी लकड़ी का गट्ठा एक ही ही कीमत पर बेचता था। नॉंव सत्यनारायण भगवान ने ढुबाई नहीं मन की हीनता कि पैसे होते हुये भी सत्कार्य के लिये न देना उसे नॉंव उठी-उठी दिखने लगी। हम लोग बड़े दावे के साथ कहते थे और सत्य को धारण करने का साहस कर सकोगे तो यह सचमुच तुमको भी ऐसा ही ऊॅंचा उठायेगी।

गुरुजी एक दिन बोली चाहे मैं जप की बात करू या ध्यान की सलाहकी या प्यार की खाना खिलाऊं या भगवान की बात करूं मेरा उद्देश्य एक ही होता है चाहे मेरे सामने का आदमी अच्छा हो या बुरा आज की अपेक्षा कल और अच्छा व्यक्ति बने।

गुरुजी को एक आनन्दमार्गी संप्रदाय का एक शिष्य जो व्यावसायिक हत्यारा था तथा एक रजिस्ट्रार, एक एसडीओ और एक और व्यक्ति की हत्या कर चुका था गुरुजी को सर पर बांयी ओर पीठ पर दिल के नीचे तथा जिगर के नीचे चाकू मार गया देशी कट्टा उसने चलाया पर चला नहीं मारने का उद्देश्य यह कहा जाता है कि उसके गुरुजी का कहना था कि गायत्री परिवार के सदस्यों की शक्ति उनके गुरु की है और ये लोग मेरे खिलाफ गवाह देते हैं। वह चाकू मारता रहा गुरुजी बचाते रहे और उससे कहते रहे कि तू भाग जा नहीं तो लोग मार डालेंगे। गुरुजी ने कोई पुलिस रिपोर्ट नहीं की। मैं कुछ ही दिन पूर्व अमेरिका से आया था और शान्तिकुॅंज होकर ही गया था। मैं फिर लौटकर गुरुजी की ड्रेसिंग देख रहा था मैंने कहा गुरुजी मेरी एक बात समझ में नहीं आयी। गुरुजी बोले क्या समझ मैं नहीं आयी। मैंने कहा गुरुजी यह बात समझ में नहीं आयी कि आप दांये हाथ से लिखते हैं दांये हाथ से काम करते हैं और चाकू के ये चार पाँच समानान्तर बचाने वाले घाव आपकी बांयी हथेली में क्यों हैं। गुरुजी गम्भीर हो गये बोले बेटा तूने बहुत ठीक सोचा। मुझे तो सब प्रणाम करने ही आते थे जब वह व्यक्ति चाकू पर चाकू मार रहे थे तो मैंने चाहिए इसलिये मैँ बचाव केवल बांये हाथ से कर रहा था मेरा कहने का साहस नहीं हुआ लेकिन मैंने मन में सोचा कि मैं बस इसी गुरु की पूजा करता हूं यह हमारे पूर्व जन्म के कर्म नहीं उनकी अहैतुकी कृपा है कि वे गुरुजीके रूप में मिले कोटि कोटि प्रणाम अखण्ड ज्योति के पाठको का।

पहले मैं बुक स्टाल पर ही खड़ा होता था ब्रह्मवर्चस में। कुम्भ के समय बहुत भीड़ थी। और बहुत सदस्य बनाये। मैँ जब साहित्य और गुरुजी के परिचय के साथ सदस्य बनाने का प्रयास करता तो बीच-बीच में स्टाल में गुरुजी माताजी के चित्र देख देख कर बात करता मालुम नहीं क्या प्रभाव पड़ता कि वह सदस्य अवश्य बन जाता। मैं कहता ये विश्व की सर्वश्रेष्ठ ६ पत्रिकाओं मेंसेएक है यदि यह घर में रखी भी रहेगी और कुछ लाईन भी कोई पढ़ेगा तो उसके दिमाग पर प्रभाव पड़ेगा इसमें कोई प्रचार नहीं और कोई लाभ भी नहीं लिया जाता। मेरी अंग्रेजी बहुत काम आती। कोई थोड़ी अंग्रेजी बोलता तो फिर मैं अंग्रेजी में ही सारी बात करता तो जल्दी से सदस्य बनकर भाग जाता। मैं ऊपर चाय पीने गया तो मैंने श्रीपर्णा से कहा कि यदि इस समय गायत्री माता भी आ जायें और अपना परिचय न दे तो मैँ उनको अखण्ड ज्योति का सदस्य बना दूंगा। नीचे उतरने के बाद करीब दो घण्टे हो गये मैं लोगों को गाइड करके लेकर आता और कोई सदस्य नहीं बनता। मुझे लगा कि शायद यह मेरा घमंड था इस कारण कोई सदस्य नहीं बन रहा है। मैंने मन ही मन अपनी गलती मानी और पश्चाताप किया। अचानक एक आदमी आया और बोला सदस्य बनाओ। वह नाम पते बोलता रहा मैं लिखता रहा। करीबन आठ दस पते लिखा दिये उसमें किसी शहर का नाम तक मैं नहीं जानता था। मैंने कहा किसी को बुलाऊं कोई अजूबा बात है शायद यह पैसे नहीं देगा। उसने १००, १०० के नोट निकाले और पैसे दे दिये। मैंने कहा एक एक पत्रिका ले जाइये वे बोले नहीं मैं हिमालय जा रहा हूॅं वहीं भेज देना मैंने फिर प्रार्थना की आप पॉंच मिनिट गुरुजी की प्रयोगशाला देखेंगे उन्होंने कहा पॉंच मिनिट। मैंने नीचे खड़े होकर ही यज्ञशाला और ब्रह्मवर्चस प्रयोगशाला की कार्यशैली बतलाई पॉंच मिनिट समाप्त होते ही वे बोले आचार्य जी का बहुत बड़ा काम है बस तुम उन्हें छोड़ना नहीं मैं ककिसी को कहता इसके पहले बो कहीं चले गये। हम लोगों ने माइक में कुम्भ के मेरे में कई भाषाओं में यह एनाउन्स कराते रहते थे जिसके बोल थे ऋषि मुनि सन्त सुधारक हिमालय निवासी एवं हमारे आत्मीय भाई बहन हम आप सबको वैज्ञानिक प्रयोगशाला देखने के लिये आतंत्रित करते हैँ हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं हम आपके जूतों की रखवाली करेंगे गुरुजी ने जब सुना तो वे बहुत प्रसन्न हुये।

एक बार गुरुजी ने ऊपर कमरे में गोष्ठी ली। हम १५, १६ कार्यकर्ता थे बोले सब आ गये। किसी ने कहा वीरेश्वर भाई साहब नहीं आये। वह हमेशा देर से आता है। एक दो बारा इनके दो मिनिट यानी २४ मिनिट खराब करेगा और जब आयेगा तो मुझे फिर शुरू से बोलना पड़ेगा। इतने में भाईसाहब आ गये। गुरुजी कुर्सी से उठे और बोले आइये बैठिये और गोष्ठी चालू कर दी हम लोग सब किसी तरह अपनी हॅंसी रोक सके। उपाध्याय जी सिर खुजाने लगे बाद में हम लोगों ने बताया क्या कारण था।

सन् १९९० में एक गम्भीर गोष्ठी में ऊपर के कमरे में गुरुजी बैठे थे। माताजी बायी तरफ हम १०, १२ कार्यकर्ता होगें। गुरुजी बोले इन यज्ञों में मैँ जाऊॅंगा। गुरुजी के जाने की कोई आशा नहीं थी। कार्यक्रम भोपाल में भी था मैंने अपने भाई को लिखा देखना आज गुरुजी ने कहा है कि वे इन यज्ञों में आयेगे मालुम नहीं ये स्थूल या सूक्ष्म रूप में पहुॅंचेगे तुम ध्यान रखना क्योकि निकलने की कोई सम्भावना नहीं है पर होगा जरूर जब गुरुजी ने कहा है।

किसको मालुम था कि गुरुजी नही गुरुजी की अस्थियॉं गई। उस गोष्ठी में गुरुजी बहुत नाराज हुये। बोले तुम लोग मेरा कहना नहीं मानते। तुम सुधरते ही नहीं। मैं २००० तक जीना चाहता था पर अब नहीं जीऊंगा। क्योंकि मेरे ये शब्द मेरा सारा प्रयास शरीर में कम पड़ रहा है। माताजी रोती जा रही थीं थोड़ा इशारा करती थी गुरुजी को रुकने के लिये पर गुरुजी न रुके न चुप हुये। बोले अब में नहीं रुकूंगा जाऊंगा।

सिद्घार्थ तीन चार वर्ष का था। गुरुजी अशोक नगरआये थे। एक स्थान पर बैठे थे वहॉं से वेसउठ गये। बच्चे ने सारी मालायें पहन लीं। इतने में पण्डित लीलापत शर्मा निकले बच्चे ने उनको बुलाया और कहा मुझे प्रणाम करो। मैं गुरुजी हूॅं। पण्डितजी बच्चे को ले गये गुरुजी के पास उठाकर और बोले यह कहता है मैं गुरुजी हूॅं गुरुजी बोले ठीक तो कहता है यह अमलकुमार का बेटा। शेर का बच्चा शेर, बकरी का बच्चा बकरी, गुरुजी का बच्चा गुरुजी

सिद्घार्थ एक वर्ष का भी नहीं था उसको निमोनिया हो गया। कोई खास बात नहीं पर श्रीपर्णा घबराई और गुरुजी को पत्र लिख दिया गुरुजी ने जवाब दिया कि मैं कल तेरे घर आ रहा हूॅं मुझको भी तार भेजा कि लखनऊं पहुॅंचों और सचमुच गुरुजी पहुॅंच गये वह जल्दी ठीक हो गया।

गुरुजी कहते कि धर्म, अध्यात्म सीखने के पहले उसकी एबीसीडी जरूर सीखना और एबीसीडी है अपना अच्छा स्वास्थ्य योग्यता सदगुण और सीमित परिवार। गुरुजी हमेशा परिवार नियोजन की बात करते। कितने ही व्यक्ति मेरे पास गुरुजी का पत्र लेकर आते कि उन्होंने परिवार नियोजन का निर्देश दिया है। मैंने भी तीस वर्ष के पहले ही आपरेशन करा लिया था जबकि कोई सिविल सर्जन आपरेशन के लिये तैयार न था मैंने सहायक चिकित्सक से ही आपरेशन कराया।

सन् १९६० में हिमालय से लौटने के बाद गुरुजी ने एक कहानी सुनायी कि मैं जिस स्थान पर रहता था वहॉँ कोई चीज नहीं ऊगती थी। दूध छै छे महीने तक खराब नहीं होता था तीन महीने में कुछ साग भाजी के पेड़ ऊग जाते थे। एक दिन सुबह मैँ घूमने निकला तो वहॉँ दो महात्मा थे एक का नाम था रामानंद और दूसरे का कृष्णानंद। दोनों निर्वस्त्र रहते थे। मौन थे। बड़े महात्मा दिखते थे। कुटिया के आगे थोड़ी जमीन पर बैगन सब्जी बो लेते थे जो तीन महीने में ऊगकर ही फसल दे देते थे फिर फसल समाप्त। गुरुजी ने उनको लड़ते देखा। झगड़ा था मेरी जमीन पर तुमने बो दिया। यद्यपि सारी जमीन सरकार की ही थी। वे मौन थे इसलिये बोल नहीं रहे थे। लाल लाल ऑँखे और हाथ पैर हिलाना। एक दूसरे से गुथ गये। यएक ने दाड़ी के बाल नोच दिये और वह खूनाखून हो गया। मेरा दिमाग चकराने लगा क्या यही धर्म अध्यात्म है तो मैँने बड़ी गलती की जो गृहस्थ छोड़कर धर्म में जुटाने की शिक्षा दे रहा हूॅं। मैंने एक बार पुलिस की गोली चलते देखी थी जिसमें पॉंच छै लाशे बिछी थी। यदि गोली मुझे लग जाती तो शायद मैं तुम्हारे बीच नहीं होता पर तब भी मैं इतना प्रभावित नहीं हुआ जितना इसघटना को देखकर सात रोज में मेरा १२ पौण्ड वजन कम हो गया फिर एक दिन मैँने ध्यान में अपने गुरुजी की बात सुनी तेरा धर्म तेराअध्यात्म यह नहीं है। तू सही रास्ते पर है। मेरा समाधान हो गया।

मथुरा में गुरुजी को एक दिन विचार आया। कि सबको संगीत सीखना चाहिए। सूचना हो गई। माताजी भी सीखें। माताजी ने हारमोनियम पर शब्द लिख लिये। और रीड दबादबाकर सीखने लगीं। गुरुजी बोले मैं भी सीखूंगा। उन्होंने एक मास्टर भी रख लिया नियमित समय गुरुजी कीक्लास चली। गुरुजी बड़ी गहराई से सीखने लगे। ऐसा क्यों ऐसा क्यों नहीं इससे क्या होगा ऊंचा क्यों नीचा क्यो नहीं मास्टर साब सिखाते रहे। सात दिन बाद आना बन्द। गुरुजी ने कहा पता लगाओ मास्टर साहब बीमार तो नहीं हो गये। घर भेजा पत्नी ने कहा मास्टर साहब बाहर गये हैं। एक दिन बाजार में गुरुजी को मास्टर साहब मिल गये प्रणाम किया बोले मास्टर साहब आपका स्वास्थ्य कैसा है आप बाहर गये लौटे तो क्यों नहीं आये। मास्टर जी ने हाथ जोड़े बोले गुरुजी आपके पास बहुत कलायें हैं मेरे पास एक ही कला है थोडी सी आप मेरे पीछे क्यों पड़ गये। मुझे दाल रोटी खाने दीजिये आपको सिखाऊंगा तो मैं भूल जाऊंगा। मुझको आप कृपा करके माफ कर दीजिये। यही हाल ब्रह्मवर्चस में जितेन्द्र तिवारी अशोक तिवारी और मेरा। हम लोगों ने बड़ी ईमानदारी से ढपली सीखना शुरू किया क्योंकि गुरुजी ने कहा था कि तुम एक साल तक नियमित ढपनी सीखो औरे इसके बाद भी तुम्हें न आये तो तुम्हारा कोई दोष नहीं मेरी ही किस्मत खराब है। हम लोग सचमुच सीखते रहे। पहली लाईन में बैठते लोगों का बिगड़ने लगा। शास्त्री जी ने बीच की लाईन में बिठा दिया आगे पीछे और पीछे दोनों का बिगड़ने लगा फिर पीछे बिठाल दिया बाद में हाथ जोड़कर बोले आप लोग वैज्ञानिक का ही काम कीजिये। औरों ने भी कोशिश की सुरेश गंगवाल, भाष्कर तिवारी, पाटीदार सब असफल हो गये।

माताजी ब्रह्मवर्चस कीएक गोष्ठी में सुनाती है कि जब मैं पैदा हुई तो हमारी दादी बोलीं लड़की हुई है। हमारे ससुर ज्योतिषी थे बोले लड़की नहीं यह देवी है। से सैकड़ों को खाना खिलायेगी हजारों को आशीार्वाद देगी। तो अच्छा यह तुम्हाारी देवी होगी। इसी बात पर हमारे दादा ने मेरा नाम भगवती देवी रख दिया। यह कहकर माताजी खूब जोर से हॅंसी। बात सच हुई माता जी के मामाजी सुनाते है। कि माताजी भी बचपन में गुड़ियों से खेला करती थीं। लेकिन उनका खेल अजीब था। उनकी गुड़िया हमेशा बीमार पड़ जाती थी और एक गुड्डा वैद्य दवा देने आता था माताजी गुड़िया की सेवा करती दूध पिलाती दवा पिलाती और आगे जीवन में यही हुआ। यह विश्व की सेवा में संलग्न हो गईं।

गायत्री तपोभूमि में एक रसोईया था। मैंनेजर ने शिकायत की। कि हमारे यहॉँ घी बहत ज्यादा खर्च होता है। कोई चोरी करता है। गुरुजी ने कहा पता लगाओ। कुछ पता नहीं लगा। एक दिन गुरुजी ने देखा रसोईया खाना बनाने के बाद एक लोटा लेकर कान में जनेऊ चढ़ाकर दीर्घशंका को जाता है। गुरुजी ने एक को भेजा जरा इसको देखो। थोड़ी दूर जाकर उसने लोटा अपने बेटे को दे दिया और बेटे का लोटा लेकर चल दिया। उसने पकड़ लिया। गुरुजी ने उससे कहा ऐसा करो यह लोटा तो ले जाओ तुम और अब यहॉं से जाओ। तुम्हारा मन करे तो एक साल बाद फिर आ जाना। हम रख लेंगे।

गुरुजी स्वास्थ्य के लिये महिलाओं को चक्की चलाना अवश्य बतलाते। समानान्तर घूमने वाला व्यायाम आंतों और बच्चेदानी के लिये स्वास्थ्यवर्धक होता है। और वर्टीकल घूमना हानिकारक जैसे कपड़े की मशीन चलाना। मैंने कहा गुरुजी से यह तो चिकित्सा विज्ञान की सलाह है आप कैसे जानते हैं। मैं नहीं जानता था कि वे ज्ञानमूर्ति है वेदमूर्ति हैं और क्या नहीं हैं।

सन् १९६३ गुरुजी साधना कक्ष के सामने घियामंडी में तख्तपर बैठे थे। श्रीपर्णा और मैं नीचे चटाई पर खाना खा रहे थे। गुरुजी ने मुझे अंग्रेजी का एक पत्र दिया। पढ़ों लंदन की एक लड़की का था। मैंने पढ़ा और कहा गुरुजी यह लड़की आपको कैसे जानती है। गुरुजी ने कहा मेरा बहुतों से परिचय है जो न मुझे जानते हैं न भाषा न साहित्य और फिर इस लड़की की घटना सुनाने लगे। यह लड़की अपने कमरे में बहुत दुखी थी घूम रही थी उसका कालेज में एडमीशन नहीं हुआ था रो रही थी। उसने अन्दर से मेरी आवाज सुनी बेटी रो मत फिर से दरखास्त दे। तेरा एडमीशन हो जायेगा। भर्ती हो गई। बहुत दिनों बाद भारत का एक आदमी उसी होस्टल में पहुॅंचा और मिशन की बात करने लगा गुरुजी का केसेट भी सुनाया लड़की बोली कि ऐसी बातें और इसी आवाज में मैं कभी कभी अपने अन्दर से सुनती हूॅं उस व्यक्ति ने मिशन का और मेरा परिचय दे दिया तभी से वह मुझे पत्र लिखती है।

गुरुजी ने कहा मैं जो लिखता हूॅं। उसमें बहुत कुछ मेरा पढ़ा नहीं है। मैं अन्तरिक्ष से भी बहुत कुछ जान लेता हूॅं तुम देखना मेरे जाने के बाद बहुत कुछ ऐसा मिलेगा जिसका श्रोत कही दूर बिल्कुल अपरिचित स्थान का होगा।

एक दिन शान्तिकुॅंज परिसर में सप्तऋषि वराण्डे में मैँने गुरुजी का एक भाषण सुना जिसमें उन्होंने कहा कि शान्तिकुॅंज में जो पैसा आता है वह केवल मनीषियों का नहीं है कहीं और स्थान से भी बड़े स्थान से भी मेरे पास आता है। ऐसा ही जब हम लोग साधना क क्ष में साधना करते थे तो गुरुजी ने कहा कल से नवदुर्गा है तुम लोग टीन शेड मैं बैठना पर्दे लगवा देंगे कुछ बड़े लोग मेरे पास आयेंगे। मैँने मन में सोचा कोई मिनिस्टर आयेंगे। उपाध्याय जी से मैंने पूंछा बोले हो सकता है कोई आत्मायें आती हों। दूसरे दिन गुरुजी स्वयं मेरे पास आये कि कल मैंने कहा था न की व्हीआईपी आयेगें। मेरा मतलब मिनिस्टरों से नहीं ऋषियों से हैं।

गुरुजी का प्यार बड़ा अनूंठाथा यतीन्द्र ने गुरुजी से कहा मैं किसी की पूजा नहीं करता केवल आपका ध्यान करता हूॅं। मेरे भगवान आप ही हैं। जितनी देर मैँ जपता हूॅं एक मन आप में लगा रहता है। और चाहे जिस काम में लगा रहूं आप छाये रहते हैं। और एक बात जब मैं आपकी बात करता हूॅं तो थोड़ी देर के बाद मेरी आखॅं के सामने से सब गायब हो जाता है केवल वही आदमी सामने रह जाता है जिससे मैँ बात करता हूॅं।

गुरुजी आप सब कुछ कर सकते हैँ केवल एक काम नहीं कर सकते। अच्छा बता मैं क्या नहीं कर सकता। आप आपके प्रति मेरे प्रेम को नहीं तोड़ सकते बेटा ऐसा मैं क्यों करूंगा। प्रेम करने से मैं जुड़ता हूॅं टूटता नहीं। और जोर से हॅंसने लगे।

लोकेश नाम का एक परिवार का सदस्य जिसको गुरुजी ने देश विदेश के कई स्थानों पर भेजा उसे अहंकार हो गया। वह गुरुजी का उत्तराधिकारी बनना चाहता था। शिकायतें भी कुछ अधिक आने लगीं। उसे १९८६ में निकाला जाना घोषित कर दिया गया। उसने जबलपुर कोर्ट में केस चलाया। गुरुजी बोले मैं तो कहीं जाता नहीं लेकिन यदि जाना ही पड़ा तो जबलपुर में मैं अपने बेटे लोकेश के घर ही ठहरूंगा उसने कई वर्षाे तक मेरी बहुत प्रशंसा की थोड़ी बुराई कर दी तो क्या हर्ज है।

गुरुजी जब अज्ञातवास में थे एक बिल्ली अपने बच्चों को गुरुजी के पास छोड़ जाती थी औरघूम घाम कर लौटती थी मालुम नहीं उसे क्यों विश्वास हो गया कि इनके पास मेरे बच्चे सुरक्षित रहेंगे।

गुरुजी आसाम गये थे वहॉं से लौटकर भोपाल आये और वकील रामचंद्रराय के यहॉँ गोष्ठी ली। मैं भी था। गुरुजी ने ऑंखों में ऑंसू भरकर कहा कि आसाम में धर्म का सवाल नहीं है मानवता और राष्ट्रीयता का ह्रास हो रहा है मैँ चाहता हूॅं कि हमारे कोई बच्चे वहॉं जायें रहें भाषा सीखे घुलें मिले और उन्हें मन्यु जगाने की प्रेरणा दें।

मैं कानपुर में कमरा नं०१६ में पोस्ट ग्रेजुएट होस्टल में रहकर एमएस कर रहा था। हम ६ विद्यार्थी थे। जिसमें एक मद्रास यूनिवर्सिटी का गोल्डमेडलिस्ट, एक कलकत्ते का टापर, एक तीन वर्ष से फैल हो रहा था और कोई दो थे। वहॉँ कोई पढ़ने ही नहीं आता था क्योंकि प्रोफेसर सिन्हा विगत तीन वर्षाे से किसी को पास ही नहीं कर रहे थे। परीक्षा के पहले मैं बहुत घबराया था अधिकतर विद्यार्थी कार में जाते थे सूट पहनते थे मेरे पास मेरे ससुर की दी एक पुरानी साईकिल थी जो छूं-छूं करती थी। मेरे मौजे भी फट गये थे। पढ़ाई में उनका मुकाबला कर सकूॅंगा ऐसी मुझे आशा नहीं थी। मैं गुरुजी को याद करता रहा और अकेले कमरे में रोने लगा। अचानक एक लड़का आया दरवाजा खटखटाया और बोला मैं सूटरगंज से आया हूॅं जहॉँ आपके छोटे भाई की ससुराल है आपको मैं पुरानी साईकिल पर जाते देखता हूॅं। मैं बगल के होस्टल में प्रथम वर्ष में एमबीबीएस में पढ़ रहा हूॅं मेरी साईकिल सीनियर ले जाते हैं आप रखलो। मैंने बहुत मना किया पर वह लगभग दो साल के लिये छोड़ गया। मैंने सोचा उर्सुला अस्पताल चलता हूॅं। जूते के पास एक नया जोड़ा मोजा कागज चिपका रखा मिला। मेरे कमरे में कोई नहीं था। इतने में एक और लड़का आया बोला मुझे पहचानते हो मैंने कहा नहीं। मैं डॉ० रेलन हूॅं। वह एमएस कर चुके थे और एक स्वार्थी किस्म के प्रसिद्घ व्यक्ति थे। कहने लगे मुझे प्रोफेसर गुप्ता ने तुम्हें गाइड के लिये भेजा है। डाँ० रेलन ने मुझे बहुत मदद की। अपने नोट्स दिये पढ़ाया और परीक्षा के पहले जब गरुजीआये तो मैंने सोचा इस बार कुछ मागूॅंगा नहीं। रेल पर जाने लगे। गुरुजी ने कहा पेपर लेआ मैं ले आया गाड़ी चलने लगी प्रणाम किया गुरुजी बोले तू पास हो जायेगा। उस वर्ष केवल दो पास हुये एक मद्रास यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडलिस्ट और एक मैं। और जबकि मेरा डायग्नोसिस गलत था पर मैँ उसी पर अड़ा रहा। शाम को जब बोस से मिलने गया तो बहुत नाराज हुये बोले गलत बोलता है और फिर अकड़ता है वे चुप रहे ताकि एक्सटरनल मेरी बात ही सही मानें मैंने कहा सोरी बोले अब क्या होता है अब तो तूं एमएस हो गया।

मैं सन् १९८१ में गुना में आर्थाेपीडिक्स सर्जन था। गायत्री परिवार के श्रवण कुमार सोनी मेरे मित्र थे। एक दिन किसी ने शिकायत की कि सोनी जी आपका बेटा दुकान बन्द होने के बाद आपकीदुकान में मित्रों के साथ जुआ खेलता है। श्रवण कुमार जी केवल गुना जिले ही नहीं आसपास के ४ जिलों में सबसे ईमानदार स्वर्णकार माने जाते थे। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं हुआ। पर उस व्यक्ति ने उन्हें दिखा दिया। वे बहुत नाराज हुये और स्वयं जाकर पुलिस कोतवाल को ले आये। पुलिस बच्चे को पकड़कर ले गई। उन्होने जमानत भी नहीं कराई। घर पर पत्नी ने खाना खाना और बनानादोंनो बन्द कर दिया। आस पड़ौस के कहते थे तुम पिता हो या जल्लाद। दुखी तो वे भी थे वे भागकर शान्तिकुॅंज आये गुरुजी से सब कुछ कहा गुरुजी ने कहा तू वापिस जा जमानत करा। ये तेरा बेटा बहुत शानदार निकलेगा। सारे घर की जिम्मेदारी बहनों की शादी यही करेगा। बच्चों की छोटी मोटी गल्ती पर ऐसा पागलपन नहीं करना चाहिए। आज श्रवणकुमार सोनी जी शान्तिकुॅंज के स्थाई सदस्य है और सचमुच ही उनका यह बेटा बहुत ही जिम्मेदार और अच्छा इंसान बन गया है।

गुरुजी हृदय से मॉं थे और मन से एक अवतारी पुरुष। लेकिन स्थूल रूप में भी उनके सिर के बीच के बाल सामने खड़े ही रहते थे। उनकी ऑंखें यानी स्केलरा नीले रंग की थी। पुतली बहुत गहरी दिखती थी। मस्तक के बीच में हर किसी को एक गोल चंद्रमा सा प्रकाश दिखता था। कई बार फोटोग्राप्स में जिस प्रकार झुकाव सिर का रहता था उसी गहराई का आभामंडल कभी कभी फोटोग्राफ में भी आ जाता था ऐसा फोटाग्राफ मेरे पास भी है जो माताजी ने मुझे दिया। माताजी कहती है कि सन् १९६० के अज्ञातवास में इसी चित्र के माध्यम से साधनाकाल में मेरा सम्बन्ध गुरुजी से हो जाता था।

हजारों व्यक्ति शान्तिकुॅंज में आते थे बाहर मिलते थे लेकिन मेरा सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि कभी कोई व्यक्ति यह नहीं कह पाता था कि मैँ गुरुजी से नहीं मिला। इसका भेद क्या है इसका जवाब मेरे कोई मित्र नहीं दे पाये। सन् १९७१ में प्राणप्रत्यार्वन शिविर में मैंने कमरे मैँ गुरुजी को गहरा काला चस्मा लगाये देखा। मैंने पूंछा गुरुजी आपकी ऑंखें ठीक है तो वे बोले हॉँ। मैंने पूंछा फिर यह चस्मा। उन्होंने कहा मेरे लिये नहीं दूसरों के लिये। मैँ समझ गया। बाहर भी हजारों आदमी प्रणाम करते और अपनी सीधी बात कहते जवाब पाते।

एक दिन मैं गुरुजी के पास गया लगभग २ बजे शान्तिकुॅंज में ऊपर। गुरुजी अकेले थे मैँने कहॉं गुरुजी आपकी तबियत ठीक है गुरुजी ने कहा हॉं। मैंने कहॉं नहीं गुरुजी मै डाक्टर हूॅं आपकी ऑंखें लाल हैं। गुरुजी बोले हॉँ बेटा। मैं कुछ दिन से सो नहीं रहा हूॅं और तुम लोग सुधर नहीं रहे हो। इसी से मैं बहुत चिन्तित हूॅं। लेकिन मैंने भी सोच लिया है कि कितने ही जन्म क्यों नहीं लगें पर मैं भी तुम लोगों को छोडूंगा नहीं बस इस होड़ में ही ऑँखें लाल हैं। मेरे पास कृतज्ञता के लिये कुछ नहीं था केवल घटना का एक न मिटने वाला हृदय पर सन्देश।

बलराम सिंह परिहार जी ने मुझे सुनाया कि उनके एक मित्र हैं जे०पी०मल्होत्रा। एक बड़े व्यापारी एवं पत्रकार। एक दिन वे गुरुजी से बोले गुरुजी आप यज्ञ में एक बुराई छुड़वाते हैं। एक बुराई छोड़ भी दी तो उससे क्या तो इंसान सुधरेगा और क्या दुनिया। मेरे में बहुत बुराई हैं। शराब पीता हूॅं, आदि। पर गुस्सा बहुत आता है। गुरुजी बोले एक छोड़के तो देखो फिर पूॅंछना। वे एक दिन किसी काम से कमिश्नर के आफिस गये। चपरासी आया कमिश्नर साहब कोई छोटी सी बात पर बहुत जोरों से नाराज। और नाराज होते ही चले गये। अचानक उनको दिल का दौरा पड़ा और उन्हीें के सामने उनकाशरीर छूट गया। अब जब कभी भी वे गुस्सा होते थे तो वह दृश्य याद आ जाता था। वे कहते है गुस्सा तो छूटा शराब भी छूटी शायद गुरुजी का आशीर्वाद मेरा और मेरे परिवार का जीवन सुधर गया।

अगमवीर सिंह शान्तिकुॅंज के एक स्थाई कार्यकर्ता है मैंने उनका इन्टरव्यू १२ नवम्बर ९८ को लिया। उन्होंने कहा मैं एक जागीरदार परिवार से आया। मेरे पिताजी आईएफएस अफसर रहे और जाट परिवार में होंने के कारण बिना कोई बात के लड़ाई झगड़ा और हत्या एक साधारण बात। मैं किसी धर्म या महात्मा में बिल्कुल विश्वास नहीं करता था पर पिताजी के कहने पर शान्तिकुँज चला आया। यहॉँ का खाना मुझे पसन्द नहीं आया तो फल दूध पीकर ही रह गया। गुरुजी की बातचीत सुनी कुछ अच्छी लगी पर सोचा अच्छी के पीछे ही गड़बड़ होती है। लेकिन जब वापिस लौटा तो वे कहते हैं कि मुझे बस के आदमियों में और महिलाओं में गुरुजी माताजी दिखने लगे। मुझको विश्वास हो गया कि मुझको कोई टोटका कर दिया। मेरी पत्नी ने दीक्षा ली मैंने नहीं ली। पर हर बार शान्तिकुॅंज आया और बदलता चला गया। मेरे बच्चे संस्कारित हो गये और अब मैं स्थाई सदस्य हूॅं।

गोविन्द भाई पाटीदार शान्तिकुॅंज के प्रमुख संगीतज्ञों में हैं। विदेशों में भी इनके प्रोग्राम एवं सीडी बने। ये स्वयं कहते हैं कि मुझे नहीं मालुम कि अंगुलिमाल और आम्रपाली बदले होंगे। पर मैं उनसे कुछ कम नहीं था। और अनुभव करता हूॅं काफी कुछ सुधरा हूॅं। मैं सारी सारी रात हारमोनियम बजाता था। नोटंकी में एवं एक दिन मैं चार बण्डल बीड़ी पी ही जाता था। मैं शान्तिकुॅंज आ गया। एक दिन मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मेरा एक कष्ट है। बोल बेटा। मेरा एक भाई पागल है। मकान के बाहर उसे चेन से बॉंधकर रखते हैं। गुरुजी ने कहा तूं मेरा काम कर मैं तेरा करूॅंगा। ऑंखों में ऑँसू भरकर गोविन्द पाटीदार कहते है कि एक दिन मेरा यह भाई सारी सॉंकले तोड़कर घर में आ गया कहने लगा कोई धोती कुरता पहनकर बूढ़ा आदमी आया था उसने घड़ों से बरफ मेरे सिर पर डाली। सॉंकले तोड़ दी और अब मैँ पागल नहीं हूॅं। और आज वे साधारण ठीक सा ही जीवन जी रहे हैं।

अशोकदास राऊरकेला के बहुत अच्छे इंजीनियरों में थे। इनको कोई नेशनल अवार्ड भी रिकमंड हुआ था। हम दोंनो साथ स्थाई रूप से शान्तिकुॅँज आये। और ब्रह्मवर्चस में रहने लगे। उनका कमरा मेरे कमरे के पास ही था। एक दिन वे सपत्नीक आये और बोले बातचीत करने लगे। उन्होंने कहा कि मैं शान्तिकुॅंज आया गुरुजी से बातचीत की और लौटने के बाद मेरी नींद ही उड़ गई। गुरुजी ने कहा था तू यहॉँ आ जा। हम दोनों बहुत परेशान।बड़ी बहन बोलीं कि अशोक दास जी पागल हो जायें इससे तो अच्छा है कि हम लोग शान्तिकुॅंज चले जाये। कम्पनी के डायरेक्टर के प्रमोशन और प्रलोभन के बाद भी वे नहीं रुके। और अब यहॉँ एक बड़ी जिम्मेवारी सम्भाले हैं।

सन् १९७७ में मैं गुरुजी के पास आया और बोला। गुरुजी मेरी तीन बहनें हैं। दोनों बड़ी बहनों की शादी बड़ी असफल रही वे बहुत दुखी हैं। यह तीसरी छोटी बहन भारती मेरे पास ही रही और पढ़ी इसकी शादी होंनी है। लड़के देखे है किससे करें। गुरुजी ने कहा तू किससे करना चाहता है। मैंने कहा एक लड़का है स्टेट बैंक आफ इंडिया में। सुरेश नागर। मुझे ठीक लगता है। गुरुजी बोले तू बेहिचक शादी करदे वे बहुत सुखी रहेंगे इसकी सारी जिम्मेदारी मेरी है। आज वे दोंनो अपनी अच्छी नौकरी छोड़कर शान्तिकुॅंज में विगत १२ वर्ष से स्थाई कार्यकर्ता हैं।

गिरधारीलाल शर्मा ७३ केनाल स्ट्रीट श्रीभूमि कलकत्ता ४८ फोन नं० ५२१७५३९ वे कहते हैं कि मैं यह घटना आपको सुना रहा हूॅं। जनवरी ८५ में ९ कुण्डीय यज्ञ में वैद्य जी रावत जी और दिलीप शान्तिकुॅंज से कार्यक्रम में आये। हम पति पत्नी १५ मिनिट सुनकर लौट गये। दूसरे दिन फिर मन किया अचानक गोपाल वैद्य जी ने कार्यक्रम समाप्ती के बाद भीड़ को चीरते हुये मेरे पास आये और सीने से लगा लिया। तब से गायत्री परिवार के लोग हमारे यहॉँ आने लगे। एक दिन पूजा में मैंने देखा। गुरुजी आ गये और मेरी उनसे एक घण्टे बातचीत हुई। जिनको मैंने एक डायरी के ४६ पन्नों में लिखा है। मैंने पूंछा आपने पहले देखा था? नहीं मैंने गुरुजी को ४ वर्ष बाद देखा था वे वैसे ही थे। इसके बाद ही कोई व्यक्ति कैसा है मुझे आभास होने लगता है। शायद मैं पिछले जन्म में बंगाल में रामकृष्ण परमहंस के साथ था क्योंकि उस आश्रम के कई मकानों का दृश्य मुझे अक्सर सपने मेंआता है।

८ जून १९९० चुरू के राम सिंह सुनाते हैं कि मैं जब गुरुजी का अस्थीकलश हाथ में लिया था तो मेरे इस स्वस्थ्य शरीर के पैर कॉंपने लगे। ऑंखों से ऑंसू बहने लगे। अन्दर से गुरुजी ने एक फटकार दी रामसिंह मैँने तुझे एक जिम्मेदारी सौंपी है मेरा काम कर ऑंसू मत बहा।

मुझे ३० मई १९९० को गुरुजी ने ऊपर बुलाया ऐसा माताजी ने कहा। मै ऊपर गया डाक्टर प्रणव और जीजी उनके पास थे। डाक्टर साहब ने पूरी मेडीकल रिपोर्ट दी और दिखाई। गुरुजी का शरीर ठीक से काम कर रहा था यानी टट्टी पेशाब स्वॉंस और दिल की धड़कने हॉँ बेहोशी जरूर थी। मुझसे कहा डाक्टर साहब आप चरण स्पर्श कर लें। मेरा साहस नहीं हुआ क्योंकि मैं डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था इसीलिये चरण के पास ही प्रणाम कर लिया मालुम नहीं मेरे लिये क्या उचित था पर यदि स्पर्श करना था तो मेरा यह चरण स्पर्श गुरुजी पर उधार है क्योंकि मै उन्हें डिस्डर्ब नहीं करना चाहता था। गुरुजी केशरीर छोड़ने के बाद मैंने अमेरिका यतीन्द्र को और अरविंद को फोन किया। यतीन्द्र रोता रहा और बोला मौनदा मेरा एक काम करदो मेरी तरफ से कुछ फूल गुरुजी के चरणों पर चढ़ा दो। मैँने कहॉँ ठीक है मैं फिर जाता हूॅँ और तुम्हारे फूल अवश्य चढ़ेंगे। न्यूयार्क में सुनते ही अरविंद मानो उसके सारे सहारे छूट गये हों क्योंकि अरविंद और सिद्घार्थ दोंनों बच्चों को गुरुजी ने एक एक महीने का गोद में लिया और वे सतत सम्पर्क में रहे। यतीन्द्र ने विश्वास दिलाया कि मेरा तुमसे वायदा है अरविंद गुरुजी हमेशा हमारे साथ रहेंगे। गुरुजी की अर्थी पर कंधा लगाने के लिये सतीश अशोक रावल पण्डित जी डॉ० प्रणव और कइयों में होड़थी मैँ भी सोचता था कि एक सेकेण्ड मेरे कन्धे पर भी थोड़ा सा भार आये। ऐसे मेरी उॅंचाई पॉंच फिट चार इंच है पर फिर भी तीनों बार के प्रयास में एक भी सेकेण्ड ऐसा नहीं था जबकि भार मेरे कन्धे पर आया हो क्योंकि या तो वे सैकड़ों हाथ जो दूर से ही अर्थी को उठा रहे थे या और कुछ जो कुछ भी हो मैं नहीं जानता।

सन् १९८६ के बसन्त पंचमी पर गुरुजी सूक्ष्मीकरण साधना से बाहर निकले पर उसके तीन दिन पहले मुझे ऊपर बुलाया और कहा कि तू गुजरात जा रहा है। मैं बसन्त पंचमी पर बाहर निकलूॅंगा और भाषण भी दूंगा तू अपने खास दोस्तों से आने को कह सकता है। पर स्टेज से मत कहना नहीं तो तेरा भाषण सुनने केलिये कोई रुकेगा ही नहीं। करीबन दो वर्ष बाद गुरुजी को देखकर मैं रोता रहा मेरा चस्मा ऑँसू से धुंधला हो गया पर मै उतार नहीं रहा था क्योंकि उतनी देर गुरुजी को साफ नहीं देख पाऊंगा। गुरुजी बोले मै तुम दोनों का ध्यान रखूंगा और जो कुछ भी कहना हो माताजी डॉ० प्रणव से कह देना मुझ तक पहुॅंच जायेगा। तू तो रिलीवर का ही काम करते रहना।

पं० लीलापत शर्मा जी जो गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक हैं मथुरा पहुॅंच गये थे। गुरुजी ने उनको एक नेष्ठिक साधक की बेटी जो स्वयं भी गायत्री की अच्छी उपासक थी की शादी में भेजा। माताजी ने टिफिन भी भर दिया। शादी होने के पहले जैसे ही दूल्हा मंडप में घुसा कि बेहोश हो गया। घटनाग्वालियर की है। डाक्टर को दिखाया हालत गम्भीर बतलाई नाड़ी बहुत धीमीथी बारात वापस चली गई। लड़कीरोती रही और उसने सारे गहने जो पहन रखे थे पूजा स्थान पर रख दिये। उसने प्रतिज्ञा की कि मैं शादी करूंगी तो इसी लड़की से। पण्डित जी गुरुजी पर बहुत नाराज हुये लौटकर। आप सब जानते हैं और मुझे पिटवाने के लिये भेज दिया। मैँ खाना नहीं खाऊंगा। घरवालों का लड़की का दुख आप तो देखने गये नहीं। गुरुजी ने कहा देख तू खाना खा और मेरी बात सुन। मैं जानता हूॅं यह नैष्ठिक परिवार था पर लड़की के भाग्य में वैधव्य था। आज से तीन महीने बाद वही लड़का आयेगा और शादी करेगा वे सुखी भी रहेंगे। तीन महीने बाद जब लड़का ठीक हो गया तो एक पण्डित जीउसके पास आये और बोले कि इस महीने तुम्हारी शादी होगी पर अच्छा दिन तो केवल परसों है जबकि शादी हो ही नहीं सकती। लड़के के मन में भी उस लड़की की याद बनी थी। लड़के के पिता बाहर काम सेगये थे। लड़का अपनी मॉं और बहन को लेकर आया और लड़की के पिता का दरवाजा खटखटाया और कहा शादी परसों होनी है। ताबड़तोड़ सारी व्यवस्था हो गई। पूजा पर रखे गहने भी काम आ गये।

मेरठ के एक गॉंव में लगभग ९० प्रतिशत जवान और बुजुर्ग शराब पीते थे। गायत्री परिवार के कई कार्यक्रम हुये। पर परिवर्तन बहुत थोड़ा ही होता था। कारण यह था कि उस गॉंव का जो सरपंच था वह शराब पीताथा और बाकी उसके साथी खुद पीते थे और दूसरों को पीने की आदत डालते थे। हमारी टोली एक पॉंच कुण्डीय छोटे से कार्यक्रम में गई और फिर वही प्रेरणा देने का प्रयास किया। पर ऐसी कोई आशा नहीं थी कि कोई विशेष प्रभाव पड़ेगा। ज्ञान विज्ञान भावनात्मक व्याख्या तो की पर अचानक एक लड़की खड़ी हुई। १५, १६ वर्ष की होगी उसके मामा ही पटैल सरपंच थे। वे बाहर खड़े देख रहे थे वह लड़की यज्ञ कर रही थी और अचानक खड़ी हो गई और बोली कि यदि मेरे मामा आज शराब नहीं छोड़ेगे तो मैं उनका भात नहीं लूंगी। वातावरण गम्भीर हो गया उसके मामा को आना पड़ा संकल्प के साथ शराब छोड़ दी और कहते है पूरे गॉंव ने शराब छोड़ दी चोरी छिपे पीते हों तो मालुम नहीं।

श्री शिवप्रसाद मिश्रा जी ने बताया कि मैं देवघर बंगाल में एक छोटा सा व्यापारी था। पिताजी पुरोहित का काम करते थे। मेरा काम कोई खास नहीं चलता था। मैं गुरुजी के पास आया और अपनी कहानी सुनाई। गुरुजी ने मेरे कन्धे पर हाथ रखा और धीरे से कहा युग निर्माण योजना भगवान का काम है जो भी थोड़ी आमदनी हो उसमें थोड़ा सा शान्तिकुॅंज नियमित भेजा कर। तुझे ज्यादा फायदा होता रहेगा। मैंने किया और यह सलाह मैं हरएक को देता भी हूॅं।

श्री गोपाल प्रसाद रजक जो कलेक्टर कार्यालय जबलपुर में काम करते थे बतलाते हैं कि मैं सन् १९७६ मैं कलेक्टर कार्यालय में लिपिक के पद पर काम करता था मैं शिविर में आया था गुरुजी से कहा गुरुजी में पूर्ण रूप से यहीं आना चाहता हूॅं गुरुजी ने पारिवारिक जानकारी ली और कहा अभी नहीं जब समय आयेगा में बुला लूॅंगा। पंूछा तुझे कितना वेतन मिलता है मैंने कहा ५०० रुपये गुरुजी ने ईश्वर चंद विद्यासागर का उदाहरण दिया कि वे ५० रुपये में अपना काम चलाते थे तू ४५० रुपये में अपना काम चलाया कर और ५० रुपये यहॉँ भेज दिया कर। मैंने ५० रुपये प्रतिमाह भेजना शुरु कर दिया। इसके कुछ दिनों बाद में स्टेनोटायपिस्ट हो गया उसके बाद मैं स्टेनोग्राफर हो गया जो अस्थाई छै महीने के लिये था। दूसरी बार जब शान्तिकुॅंज आया तो गुरुजी ने पूंछा क्या करता है मैंने बताया स्टोनोटाईपिस्ट था अब अस्थाई रूप से स्टेनोग्राफर हो गया हूॅं इस पर गुरुदेव ने कहा कि मैं तुझे स्थाई करा दूंगा और वह पद छै वर्ष तक चलता रहा इसके बाद पद समाप्त हुआ तो शासन से नया पद आ गया और मैं वास्तव में स्थाई हो गया जिसकी कोई सम्भावना नहीं थी और अब मैं स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्थाई रूप से शान्तिकुॅंज आ गया हूॅं।

जिनके पति की मृत्यु हो जाती है कितने ही स्वार्थी रिश्तेदार श्मशान बन्धु के नाम पर विधवा को ठगा करते हैं। जो कुछ घर पर पैसा बचा होता है या मिलता है अपने को अति हितकारी बतलाकर ठगते हैं। महिलाओं को श्मशान नहीं जाने देते। माताजी ने एक गलत परम्परा का नियम तोड़ा कि महिला शवयात्रा में नहीं जा सकती। वे गयी और पूरी अन्त्येष्ठी क्रिया में सामने बैठे देखती रहीं। मरणोत्तर संस्कार चिताा दहन क्या सोचती रहीं क्या करती रहीं यह तो वे ही जानें पर ने केवल वे अन्त तक रहीं लेकिन उन्होंने निर्देश दिया कि नांदयोग थोड़ा लेट सही लेकिन नियम के अनुसार आज भी होगा जो लगभग ७ से ७.१५ तक हुआ डाक्टर प्रणव ने ममुझे विशेषकर वहीं डाक्टर टीम के साथ विशेष तैयार रहने के लिये कहा था क्योंकि माताजी एवं अन्य कई व्यक्ति बेहोश हो सकते हैं। मैँ माताजी के बांयी ओर खड़ा रहा वे एक टक देखतीरहीं कुछ हल्की फुल्की एक्का दुक्का सिसकी तो सुनाई पड़ती थी पर ऐसा स्पष्ट बोध होता था कि कोई शक्ति इस व्यथा में आश्वासन व शक्ति दे रही थी। अग्नि शिखायें बार-बार सजल श्रद्घा प्रखरप्रज्ञा की ओर मुड़ जाया करती थीं। उस स्थान पर न केवल लोग प्रणाम करते है बल्कि देर रात तक बैठे भी रहते हैं डर के स्थान एक भाव भरा प्यार ही मिलता है। मुझे ओम प्रकाश भाई साहब याने गुरुजी के बड़े पुत्र बतला रहे थे कि एक रात मैं वहॉं सो ही गया कि देखें मुझे कुछ पिताजी का अनुभव होता है वे बोले कि वे मुझे दिखे तो नहीं लेकिन ऐसा जरूर अनुभव हुआ कि ये मेरे वे ही पिताजी है जिनके साथ मैं बड़ा हो जाने के बाद भी सोया करता था।

उत्तम गायकवाड़ बैतूल निवासी एक समयदानी हैं उन्होंने बताया कि भवानी कश्यप जो एक गायत्री परिवार इंदौर के कर्मठ सदस्य हैं कुछ ही वर्षाे पहले इंदौर के दादा माने जाते थे और सेठों से हफ्ता वसूल किया करते थे एक स्वयंसेवक ज्ञानरथ चला रहा था कि सामने जाकर खड़े हो गये और रोक दिया। बच्चे ने सोचा ये पॉंच सात किताबें उठा लेंगे दो चार थप्पड़ मारेंगे चलो देखा जायें लेकिन भवानी कश्यप कहते हैँ मैंने उस दिन कुछ स्टीकर उठाये। जिसमें एक था कुकर्म करने वाले से अधिक अभागा और कोई नहीं होता क्योंकि विपत्ति में उसके साथ कोई खड़ा नहीं होता। इस वाक्य ने मुझे बदल दिया। उत्तम जी कहते हैं कि मैंने इंदौर में इनके साथ काम किया और इंदौर अश्वमेध यज्ञ में इन्होंने दो दो लाख रुपये की रसीद कटवाई। भवानी दादा जो हफ्ता वसूल किया करते थे उनसे केवल यही पूंछकर बचत है कि रसीद में कितना लिख दें।

रुढ़की यूनिवर्सिटी में एम्पलायमेंट आफीसर श्री डी०के०वर्मा ने मुझे बतलाया कि यह उनकी दूसरी पीढ़ी है जो शान्तिकुॅंज से जुड़ी है वे अल्मोड़ा से पिथौरागढ़ जा रहे थे। एक पहाड़ी रास्ते पर गाड़ी चढ़ रही थी उन्हें अनुभव हुआ कि किसी ने उनका गला पकड़ा और गाड़ी के बाहर फेंक दिया। वे बेहोश हो गये। शायद पंद्रह बीस मिनिट बेहोश रहे होंग। ऑंख खुली उसके बाद देखते हैं कि गाड़ी पहाड़ी रास्ते से लुड़कती लुड़कती नीचे घाटी में आ रही है। यह दृश्य वह अपनी ऑंखों से देख रहे थे यद्यपि उनके एंकल की दोनों हड्डियॉं टूट गयी और इतना रक्त बहा कि उनका रक्त हेमोग्लोबिन पॉंच परसेंट हो गया जो बहुत गम्भीर है। पत्नी अत्यधिक चिन्तित थी। डाक्टरों को भी आशा कम थी पर वर्माजी ने कहा अपनी पत्नी से तुम बाहर जाओ जिसको मेरे साथ रहना है उसे कोई निकाल नहीं सकता। सारे समय में गायत्री जप रहा था मैं दो महीने में पूरी तरह ठीक हो गया।

रुड़की में यूनिवर्सिटी कैम्पस में एक गोष्ठी का आयोजन किया। गायत्री मंत्र के आध्यात्मिक स्वरूप के विवेचन तथा प्रश्नोत्तर किसी प्रोफेसर की लड़की ने एक ऐसा प्रश्न पूंछा जो मुझे कठिन पड़ने लगा। उसका प्रश्न था

क्या मरने के बाद आत्मा का शव शरीर से कोई सम्बन्धा रहता है। मैंने कहा नहीं जैसे यदि दॉंत टूट जाता है तो फिर उसको कचरे में फैंकने में आपको कोई संकोच नहीं होता यदि आपकी कोई ऊंगली कट जाती है। अलग हो जाती है गैंगरीन हो जाती है तो उसे फैंकने में संकोच नहीं होता। तो फिर वह बोली फिर मनुष्य मृत्योतरान्त अपने शरीर अवयम डोनेट करने से क्यों घबराता है। अचानक मुझे ख्याल आया कारण है अज्ञान और मोह।

कृष्णकांत तिवारी ब्रह्मवर्चस में स्थाई सदस्य है। बताते है कि गुरुजी बांदा आये थे। मैं मिडिल में फैल हो गया था। पिताजी ने कहा सन्त आये हैं मिल आओ। मुझे कोई श्रद्घा नहीं थी फिर भी गया। प्रणाम किया। बिना कुछ सुने जाने गुरुजी बोले मैं तुझे पढ़ाऊंगा। और जब मैं फिर परीक्षा में बैठा तो एक पेपर देने ही नहीं गया और फिर भी मैं पास हो गया। क्योंकि पहले पेपर में ही आशा से अधिक ५० में से ३८ नंबर आ गये थे। गुरुजी से मिलने पर उन्होंने कहा आइंदा पेपर देने में चूकना नहीं और फिर पढ़ते पढ़ते में पीएचडी तक पहुॅंच गया। कृष्णकांत बतलाते हैं में ििश्विर में आया था हमारे साथ एक विटनरी डाक्टर भी ठहरे थे। मैँने सोचा कि यह लड़का मेरी बहन के लिये उपयुक्त होगा। मैंने बातचीत की उससे कि शादी तो नहीं हुई।कपिल जी से और शिव प्रसाद मिश्रा जी से भी बात की उन्होंने लड़के से सारी जानकारी ली लेकिन जब हम लोग गुरुजी के पास पहुॅंचे तो यह लड़का बिल्कुल गुरुजी के सामने बैठा था और मैं बिल्कुल बांयी और आखिरी में। गुरुजी ने उस लड़के से पूंछा तुम्हारे बच्चे ठीक हैं उसने जवाब दिया हॉं। गुरुजी ने निगाह उठाकर मेरी तरफ देखा और फिर उसकी तरफ देखकर पूंछा तुम पत्नी को नहीं लाये। बात वहीं समाप्त हो गई। शायद एक बड़ी दुर्घटना से बच गया।

कृष्णकांत जी फिर बतलाते हैं कि हमारा परिवार गायत्री का भक्त है। हमारी बहिन के पति और सास ससुर बहुत परेशान करते थे। एक दिन वह पूजा में बैठी तो उसे एक सपना सा दिखा कि जब तू ससुराल जायेगी तो ये तेरा पति तुझे ढकेल कर मार डालेगा। पर तू फिर भी जा मैं मेरी रक्षा करूंगा। जब वहॉं पहुॅंची तो उसके पति और सास ससुर को दरवाजे के बाहर और घर में दो काले नाग दिखते जो उन्हें डरा देते। जब मेरी बहिन गुरुजी से मिली तो उन्होंने कहा कि अब तो तुझे विश्वास हो गया कि मैं तेरी रक्षा करूंगा और कहा कि अब तू अपने मायके आ जा तेरी व्यवस्था हो जायेगी मैं केवल मिडिल पास थी लेकिन अचानक सीएमओ ने उनको चुन लिया और अब वह अपने पेरों पर खड़ी है। वे यह भी कहते है कि बीच बीच में मुझे माताजी दिखती हैं।

प्रेरणा बाजपेई माताजी के अन्तिम दिनों में अंजू के साथ उन्हीं के पास रहीं। क्योंकि दोनों को नरसिंह की सेवा का अच्छा ज्ञान था समर्पण भी। मैंने जब उनसे पूंछा कि कोई चमत्कारी तुमने देखी तो वे बोली चमत्कारतो नहीं लेकिन उनमें मानवता का भान हमेशा ही स्पष्ट रहता था। एक दिन क्या हुआ कि अंजू कहकर गयी कि मैं थोड़ी देर से आऊंगी तब तक तुम रुकना मुझे देर तक रुका देख माताजीबोली तू जा खाना जा भूंख लगी होगी। मैंने कहा खा लूंगी माता जी अंजू अभी आती होगी। वे बोली जा क्यों चिन्ता करती है मैं तो हूॅं। जबकि स्वयं ही अत्यधिक बीमार थीं। प्रेरणा औरशैल जीजी जी दोनों जोर से हॅंस पड़ी। किसी भी स्थिति में उनका अपना मॉँ का भान गया नहीं।

मेजर राजवीर सिंह ने बतलाया यद्यपि में मथुरा का रहने वाला हूॅं फिर भी गायत्री या गुरुजी के विषय में मैँ कुछ नहीं जानता था लेकिन जब मैं गुरुजी से मिला तो उनने कहा कि तू यहॉं आ जा। मैँने कहा गुरुजी मैं भगवा कपड़े नहीं पहनूंगा। गुरुजी बोले मैँ कहां पहने हूॅं। मुझे तुझसे काम लेनाा है कपड़े नहीं दिखाना है। मैँ थोड़ी बहुत पूजा करता था सन् १९८६ का बसन्तपंचमी का भाषण गुरुजी का सुना और सोचा कि यह प्रयोग करके देखूॅं कि क्या गुरुजी से बात हो सकती है। वही १० प्राणायम गायत्री मंत्र और सिर पर हाथ फेरना अचानक मुझे नींद सी आ गई और अन्दर से एक जवाब सा उठा कि क्या मैँ अपनी छाती फाड़कर बताऊं कि जो तू सोच रहा है वह सही है मैंने पूंछा क्या सोच रहे थे मैं सोच रहा था कि सर्विस छोड़कर शान्तिकुॅँज आ जाऊं।

कैलाश शर्मा जो कलकत्ते के बंगाली अखण्ड ज्योति के सम्पादक हैं कहते है कि यदि मैं अपने शरीर के चमड़े के जूते बनाकर भी मैं गुरुजी को पहनाऊं तो मैं उऋण नहीं हो सकता। जो घटना मेरे साथ घटी वह मैँने माताजी को सुनाई और उनकी आखों में आंसू आ गये।

मेरे एक साथी व्यापारी जो मद्रास में थे उन्होंने तार द्वारा मुझे हवाई जहाज से अस्सी हजार लेकर किसी सौदे के लिये आने के लिये कहा। मैं पहुॅंचा उसका लड़का मुझे लेकर स्कूटर पर चला जंगल के रास्ते में उसने स्कूटर रोकी बोला लघुशंका जा रहा हूॅं और एक बहुत बड़े लोहे के राड से मेरे सिर पर मारा मैँ चक्कर खाने लगा। एक क्षण मैंने गुरुजी को याद किया कि आप तो कहते थे मुझे तेरा उपयोग एक शेर की तरह करना है और मैं अब एक कुत्ते की तरह मर रहा हूॅं। मुझमें अचानक न जाने कहॉँ से ताकत आ गयी कि मैँने एक घूंसा मारा तो वह जवान लड़का और मैँ लगभग ५० वर्ष का वयस्क। पर वह दो गुलांट खाकर एक गड्डे में गिरा। जल्दी से वह स्कूटर लेकर भाग गया। मैं और मेरा पैसा दोनों बच गये। एक ट्रक मिल गया जिसने मुझे अपने आड़त के यहॉँ पहुॅंचा दिया। मेरी पत्नी हवाई जहाज से आ गई। मैँ स्वस्थ हो गया।

जब मैं पहली बार सन् १९६० में माताजी से मिला तो उनका स्वरूप एक साधारण गृहस्थ महिला जैसा था। मैँ कहता था मैं परीक्षा में पास हो जाऊं माताजीकहतीथी मैं तेरी सिफारिश गुरुजी से कर दूंगी। तू भी गुरुजी से बोल देना माताजी ने अपना चित्र मुझे दिया जो आज भी लगभग ३५ वर्ष से मेरे साथ है। गुरुजी का एक चित्र पं० लीलापत जी ने मुझे दिया जिसकी कापी माताजी अपने पूजा कक्ष में रखती और वेकहती है कि आरम्भिक स्थिति में गुरुजी जब अज्ञातवास में होते हैं तो मैँ इस चित्र से उनसे सम्बन्ध स्थापित कर लेती हूॅं। और गायत्री परिवार की समस्याओं का हल भी पूॅंछ लेती हूॅं। स्वयं गुरुजी ने १९६५ में दादागुरु का एक चित्र लाकर मुझे दिया जो आज भी मेरे पास है। मैँने उस चित्र का पाते ही प्रणाम कर वायदा किया कि मैं आपसे कभी कुछ माँगूगा नहीं और मैंने ऐसा ही किया। विचारों में भी नहीं।

मैंने पूंछा गुरुजी से कि आपने यह चित्र कैसे सउतारा क्या आपके पास कैमराथा गुरुजी ने कहा नहीं जिसस गुरुपूर्णिमा में मुझे गुरुजी के दर्शन करने थे सन् १९६० में उस समय उनके हम सात शिष्य वहॉँ पहुॅंचे। मैंने पूंछा यह कौन हैं उन्होंने कहा कि भारत के दो थे। यएक दक्षिण भारत में हैं। उन्हीें ने कैमरा से ये चित्र लिये थे जिनकी कापी मुझको भेजे। मैंने कहॉँ बाकी पॉंच कहॉं है। गुरुजी ने कहा ये पॉंचों विदेश में है और अपने अपने ढंग से काम कर रहे है एवं दादागुरु के शिष्य हैं। मैंने पूछा किदादा गुरु का नाम आपने कैसे जाना। आपकी बातचीत हुई बोले वे सब जगह पहुॅंच सकते हैं इसलिये मैंने उनका नाम सर्वेश्वरानंद रख दिया वे स्थूल भी बन सकते हैं पर है सूक्ष्म।

जगदीश वर्मा जी सावित्री एक में स्थाई कार्यकर्ता हैं। ये राऊरकेला में अच्छे पद परथे वे कहते हैँ। मैं न केवल भगवान और पण्डितों में अविश्वास करता था पर विरोध भी सन् १९७१ में हमारे यहॉँ यज्ञ हुआ। फैक्टरी के रास्तें में यज्ञ स्थली थी। स्कूटर पर जाता था। और उपेक्षा से निकल जाता था। एक दिन साईकिल सेगया तो एक पोस्टर पढ़ा हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। सोचा मेरे अकेले से सुधरने से कैसे दुनिया सुधरेगी। पर फिर सोचता रहा तो लगा कि ठीक तो है। यदि दुनियॉं बदलेगी तो विचार परिवर्तन से बदलेगी। हम मतलब बहुत सारे लोग मैंने कुछ छोटी किताबें भी खरीद लीं। किताबें अच्छी लगी। एक कार्यकर्ता ने बताया कि आप ही के आफीसर राऊरकेला में गायत्री भक्त हैं तथा उनके यहॉँ मोटी किताबें भी हैं। मैं रात को ही उनके यहॉं पहुॅंच गया दरवाजा खटखटाया उन्होंने बड़े प्रेम से बातचीत की किताबें दी और मैं उनका मित्र हो गया। उनका नाम था के०के०भाटिया वे प्राणप्रत्यावर्तन शिविर में आये और जब मेरे विषय में थोड़ी जानकारी दी और मेरा एक कष्ट भी बतलाया कि मुझे सांस की बड़ी बीमारी है और हर दो तीन महीने में अस्पताल में भरती होना पड़ता है गुरुजी ने कहा कि यह भस्मी ले जाओ आचमनी के साथ रोज गाये पॉंच माला गायत्री जपे आज के बाद वह कभी अस्पताल में भरती नहीं होगा। और नहीं हुये। डाक्टर डिल्लन ने राऊरकेवला में आपरेशन बतलाया था। गुरुजी ने यह भी कहा था कि यह लड़का कुछ दिनों बात शान्तिकुॅंज आ जायेगा और मैं आ गया। हम पति पत्नि जब गुरुजी से मिलने आये तो हमारे दोनों बच्चों को गोद में लेकर गुरुजी ने कहा कि यह बच्चे अब हमारे है तुम देखरेख करना हम अच्छा इंसान बनायेंगे। गुरुजी ने एक बात और कही जब मैं शान्तिकुॅंज आ गया। गुरुजी ने एक बात और कही जो मैं कभी भूलता नहीं। कि तू सिर्फ मुझे और माताजी को देखना आस पड़ौस को बिल्कुल मत देखना तू मेरा काम करना मैं तेरा।

सन् १९७८-७९ में मैं अरुण पंड्या के साथ आया और मैंने कहा माताजी यह भी आना चाहते हैं। माताजी ने कहा ये नहीं आयेगा। तू आ जायेगा।

गुरुजी ने कहा मेरे पास शक्तियॉं है सिद्घियॉँ हैं लेकिन मुझे निर्देश एक लोकसेवी ब्राह्मण का ही जीने का है।

गुरुजी ने कहा मुझे चले जाने दो उसके बाद मुझे नापने के सारे पैमाने छोटे पड़ जायेगे

गुरुजी ने कहा कि यदि कोई कहे कि तुम्हारे गुरुजी से बड़ा विद्वान कोई है गुरुजी से बड़ा तपस्वी कोई है और गुरुजी से बड़ा कोई प्रवचनकर्ता है कोई समाजसेवी है तो एक बार मान लेना पर बेटे याद रखो तुम्हारे गुरुजी से बड़ा प्रेम करने वालार और कोई नहीं होगा।

गुरुजी ने कहा सन् १९७१ के बिदाई भाषण में कि कोई भी मुक्त आत्मा इस धरती पर नहीं आना चाहती मुझे ढकेल दिया गया ऐसे समय में जब धर्म एक आडम्बर बना हुआ था और पूजा एक मखौल।

गुरुजी ने कहा मेरी मार्गदर्शक सत्ता ने पॉंच वर्ष का एक्सटेंशन दियाा है तत्पश्चात् हम सन् २००० तक सूक्ष्म शरीर में रहेंगे और उसके बाद कारण शरीर में तब हम घनीभूत प्राणऊर्जा के रूप में होंगे और केवल पात्रता ही हमारे प्रेम का आधार होगा। चर्मचक्षु हमें न देख सकेंगे।

इन दिनों जब मैं संस्मरण लिख रहा हूॅं पिछले हफ्ते मैंने दो स्वप्न देखें। गुरुजी ने कहा था जब कभी मुझे सपने में देखों कुछ उद्येश्यपूर्ण होंगे। मैंने देखा कि गुरुजी एक कमरे में हैं जाने के लिये रुकावट लगी हुई है। पर स्वयंसेवक ने कहा कि आप जा सकते हैँ सबों को जाना मना है। मैं गया और प्रणाम किया गुरुजी काफी दुबले थे और शरीर छोड़ने की तैयारी में थे बड़े शान्त भाव से कहा कि अब मैं कारण शरीर में जाने वाले हैं। मैंने कहा आप इतने प्रसन्न और स्वस्थ दिख रहे हैं पर दुबले क्योंहै वे बोले मेरा यह शरीर तुम लोगों के चरित्र चिन्तन और व्यवहार से बना है और तुम लोग इन मामले में दुबले पड़ रहे हो आगे देखता हूॅं। मैंने सोचा गुरुजी आपने पति व्रत और पत्नीव्रत को बराबर बतलाया है। हर मनुष्य किसी का तो पति है और महिला किसी की पत्नी है तो क्या किसी की भी सेवा करने से पूर्णता प्राप्त होगी। गुरुजी ने विचारों में ही उत्तर दिया पति व्रत और पत्नीव्रत धर्म केवल एक व्यक्ति की सेवा से पूर्णता नहीं देता लेकिन इस कर्मकाण्ड के माध्यम से श्रेष्ठता और आदर्श के उच्चतर स्तर पर पहुॅंचकर ही वह पतिव्रत या पत्नीव्रत धर्म बनता है केवल सीमाबद्घ होने से नहीं।

दामोदर के मामाजी अपने पत्नी के साथ गुरुजी के पास गये और बोले कि इन्हें हमेशा बीमारी रहती है। यह यदि शरीर छोड़ दें तो ज्यादा ठीक हैं कष्ट सहा नहीं जाता। गुरुजी बोले इसके कष्ट प्रारब्ध हैं और यदि यहॉँ नहीं भोगा तो अगले जन्म में भी भोगना पड़ेगा अच्छा है कुछ समय और कष्ट भोग ले।

श्री मूलसिंह ठाकुर जी ब्रह्मवर्चस के स्थाई सदस्य है उन्होंने बताया कि जब वे गुरुजी से मिले तो उनके सामने उन्होंने बपनी एक बड़ी समस्या रखी। उनकी जमीन पर एक समृद्घ और शक्तिशाली परिवार के सदस्य ने कब्जा कर रखा था जिसका केस कोर्ट में चल रहा था हमारे जीतने की आशा कम थी गुरुजी ने आश्वस्त किया कि मैँ तुम्हारी मदद करूंगा और कुछ ऐसा हुआ कि विरोधी वकील और गवाह आये ही नहीं और मुझे जमीन मिल गयी यदि ऐसी नहीं होता तो अपील में हमारे वे रिश्तेदार अपना अधिकार जमा लेते।

आज दिनॉंक ३०-११-९८ को कालीचरण जी का मैंने इंटरव्यू लिया। यह एक मैकेनिकल इंजीनियर बीई आईआरटी कानपुर के हैं। इन्होंने सन् १९७४ से ८६ तक राऊरकेला में अपनी सेवायें दीं। शान्तिकुॅंज में इन्होंने समयदान पत्राचार, कार्यक्रम विभाग, टोली को सामान यिशु करना तथा बदल बदल कर तीन बार निर्माण विभाग में कार्यरत हैं। ये सबसे पहले एक प्रमुख कार्यकर्ता दधीची जो इंस्पेक्टर स्कूल थे से मिले उनका हॅंसमुख स्वभाव तथा धर्म की व्याख्या बहुत पसन्द आयी। ऐसे हरिजनों को मन्दिर न जाने देना कुयें में पानी न भरने देना मुझे बहुत बुरा लगता था। यद्यपि ब्राह्मण परिवार में होने के कारण दूसरी कक्षा से ही मैं पूजा विशेष कर कृष्ण जी की करता था। सन् १९७३ में शादी के बाद मैं सपत्नीक गुरुजी से मिला। मुझे एक विश्वास हो गया कि यह एक बहुत सच्चे आदमी हैं। दिसम्बर सन् १९७५ में मैंने ९ दिन का शिविर किया। मैं समझ गया कि प्रवचन गुरुजी की आत्मा है। और इनका दिल बहुत बड़ा है। विदाई भाषण में मैं बहुत रोया और मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि गुरुजी के दर्द कीएक चिंगारी मुझमें बस गई। जब मैँ गुरुजी से मिला तो गुरुजी कम्बल ओढ़े लेटे हुये थे। मैंने पूंछा आपकी तबियत तो ठीक है। बोले मेरी तो ठीक है तू मॉँग क्या चाहिए। मैंने कहा मैंने कुछ काम तो किया नहीं फिर मॉंगू कैंसे। उन्होंने कहा बच्चे काम थोड़े करते हैँ पर पिता पर उनका हक होता है। तभी से उनका दर्द उनका दर्द मुझमें समा गया। उनकी बातें पिता से भी ज्यादा मुझे प्रभावित करने लगी। हमारे यहॉँ यज्ञ में गुरुजी आने वाले हैं इन शब्दों से ही हमारी ऑंखों में आसूं आ जाते थे। मुझे लगने लगा कि उनमें प्यार ही प्यार भरा है। वे बहुत अनुशासन प्रिय थे और स्नेही भी। टोली में जाने के पहले मैँ उनके पास गया वे लिख रहे थे। मैं बिल्कुल पास बैठ गया। उन्होंने ऊंगली उठाई इशारा किया दूर बैठ। मैं घबराया पर जैसे ही लिखना समाप्त हुआ वे अनुशासित व्यक्ति प्रेम से भर गये। पास बुलाया तिलक किया और एक शब्द कहा बेटा अच्छे रहना। सन् ८६ में उन्होंने मुझसे आने को कहा और कहा अच्छे लोग आयेंगे तो यहॉँ काम बहुत बढ़ेगा। कबीर को नहीं मिले काम नहीं बढ़ा। मेरे बेटे बेटी साथ थे तो चुटकी बजाकर कहा लड़की की शादी ऐसे कर दूंगा। लड़के के लिये कहा एम०ए०बी०ए० कर लेगा। लड़का एमबीए कर रहा है। गुरुजी ने कहा मुझे सन्त ऋषि अवतार न भी मानो लेकिन एक भला आदमी मैं हूॅं। तूं सोच मत अच्छे काम सोचकर नहीं किये जाते। अपने साथ जियेंगे साथ मरेंगे। एक कार्यकर्ता ने कहा इनको शक्तिपीठ की चिन्ता है। बोले शक्तिपीठ तूने बनाई है। ये सब मैं देखूंगा। मैं शिवप्रसाद मिश्रा जी पर बहुत नाराज हुआ कि क्या तुम ऐसे ही सबको पकड़ते हो गुरुजी ने तुमसे कहा है। उन्होंने कहा हॉं गुरुजी ने कहा है कि जिसे कोई न छोड़े जो बहुत व्यस्त हो जो बाहर बहुत काम कर रहा हो उसी को छुड़ाकर यहॉं ले आना। एक दिन टोली पर जब हम गये तो गुरुजी ने कहा कि टोली के भाषण में तुम यह कहना कि गुरुजी शरीर से तो मर गये पर मन से हमारे लिये जिन्दा है। तुम लोगों के लिये मैंने अपने शरीर को पूरी तरह निचोड़ लिया है तपा लिया है गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को माताजी ने अपने हृदय में बसा लिया है तुम माताजी को अपने हृदय में बसा लो। तुम अपनी नॉंव खुद नहीं खे सकते पर माताजी की नॉंव में दो पैसे यानी श्रमदान समयदान देकर बैठकर पार हो सकते हो। मैँने कहा मेरे बेटे सिद्घार्थ की आपके लिये भक्ति बनाये रखिये। बोले मेरे लिये क्यों भगवान के लिये। तू भक्ति बनाये रखेगा तो उसकी भक्ति हो जायेगी। जब कोई नौकरी निकलती है तो पिता सोचता है मेरे बेटे को मिल जाये। ऐसे ही आने वाले उज्जवल भविष्य में तुम्हारा हिस्सा हो यह मैं चाहता हूॅं ऐसा कहते कहते उनके ऑंसू आ गये। यह घटना मार्च १९९० की है पर वे बोले आलस्य और प्रमाद न करना। मेरी अन्तिम गुरुजी से भेंट में हम पॉंच व्यक्तियों को बुलाया और एक एक लाईन बोले।

१- अशोक दास- क्यों रे दास लाखों रुपये खर्च करके बीडियो बनाया तूने क्या काम किया। फिल्म क्यों नहीं बनाता। मैं कहता हूँ तू बना और किसी की मत सुन।

२- मुझसे अर्थात काली चरण जी से। तू आलस्य छोड़

३-महेन्द्र जी से बोले- तू काम चाहे कम कर पर बीठा बोल।

४-शिवप्रसाद मिश्रा जी से बोले माताजी से मिलाने के तीन घण्टे उसके बाद तू करता क्या। बोले मुझे और कोई काम नहीं मिला है। तो काम ढूढ़। मुझे कौन काम बताता है।

५-रामसहाय शुक्ला से बोले तू क्या करता है स्वागत में। जो शान्तिकुॅंज के गेट में घुसा उन्हें कमरे में ढकेल देता है। कुछ पुण्य परमार्थ का काम किया कर।

हरीशंकर तिवारी ब्रह्मवर्चस ने बताया कि कालीचरण जी पत्नी ने अपने सारे आभूषण शक्तिपीठ निर्माण में गुरुजी को डोनेट किये।

हमारे एक साथी यमुना प्रसाद उपाध्याय वेदाचार्य थे। प्रतापगढ़ उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे। वे कहते हैं गुरुजी सबको प्रेम से जोड़ते थे। मैं जब उनके यहॉं ठहरा तो स्नान कराने वो जमुना ले गये। उन्होंने पूंछा कि मैं एक असिस्टेण्ड ब्लाक डव्हलपमेंट आफीसर हूॅं। ५०० मील दूर रहता हूॅं आपने मुझको ही क्यों चुना। गुरुजी ने कहा मैं बीन बीन कर चुनता हूॅं। एक बार वे गुरुजी की एक छोटी सी गोष्ठी में बैठे थे। कालीचरण जी भी थे। गुरुजी बोले यहॉँ मेरी सुनने वाला कोई नहीं है लेकिन यमुना प्रसाद जी ने देखा कि गुरुजी कालीचरण जी के बगल में बैठे है इससे प्रभावित होकर वे कालीचरण जी के साथ सायकिल टोली में निकले। एक बार एक झूठे गबन केस में यमुना प्रसाद जी फंस गये। बारह साल सस्पेंड रहे। वकील जज सब विरोध में थे। मैंने गुरुजी को कहा गुरुजी ने कहा मैं ठीक कर दूंगा। मैं जीत गया बारह साल का वेतन मिला और प्रमोशन भी।

अगाध महापात्र एक सक्रिय कार्यकर्ता राऊरकेला के थे। उन्होंने उनकी पत्नी बच्चों के साथ एक छोटी सी शक्तिपीठ बनाई। वे चाहते थे कि गुरुजी आयें। इस शक्तिपीठ के आसपास के दो स्थानों पर गये पर गुरुजी के अगल बगल में इतनी बड़ी भीड़ और सरंजाम देखकर उनसे प्रार्थना करने की भी हिम्मत नहीं हुई। बहुत दुखी होकर घर लौट आये। पूरा परिवार मायूस हो गया। प्रातः ४ बजे उठते थे पर दूसरे दिन ७ बजे उठे। जब वे कुल्ला कर रहे थे तो एक स्वयंसेवक आया उसने कहा गुरुजी ने मुझे भेजा है वे तुम्हारे शक्तिपीठ का उद्घाटन करेंगे। हमारे पास कुछ भी तैयारी नहीं थी। अचानक गुरुजी आ गये तख्त पर बिठाया बोले खाना नहीं खिलायेगा। खाना था ही नहीं गुरुजी बोले देख दही होगा। सचमुच हमारी मॉं ने दही औरखीर बना रखी थी। बड़े कटोरे में गुरुजी खीर खाने लगे। हमारी मॉँ बोली आप सब खा जाओगे हमारे लिये प्रसाद नहीं छोड़ेगे। गुरुजी वहीं रुक गये।

दन्तेवाला एक घटना सुनाते है कि वे गुरुजी के पीछे पीछे घूमते रहे पर प्रणाम नहीं मिला। नाराज होकर स्टेशन चल दिये। गाड़ी बस कुछ भी नहीं मिली पॉंच घण्टे बाद थी। लौटकर फिर सोचा जहॉं गुरुजी यज्ञ करा रहे थे वहॉं पहुॅंचे तो वहॉँ ध्यान चल रहा था। मैँ भी बैठ गया। ध्यान के बाद शान्ति शान्ति नहीं की बोले जिसको जो पूंछना हो अपने स्थान पर पूंछकर पूंछो मन ही मन सबको मैँ उसके मन में ही जवाब दे दूंगा। मुझे मेरे प्रश्न का जवाब मिल गया। मुझे यह शक हुआ कि जवाब गुरुजी का था या मेरे मन का। बारह साल बाद जब मैं गुरुजी से मिला गुरुजी ने वहीं से आरम्भ किया जो मुझे उस ध्यान में बिलासपुर में कहा था।

श्री गोपाल प्रसाद रजक शान्तिकुॅंज के कार्यकर्ता बताते है कि एक बार में शान्तिकुॅंज चांद्रायण व्रत में आयाथा। साहित्य स्टाल से कुछ लोग खड़ाऊॅं खरीद रहे थे। मैंने पूंछा इनका क्या करोगे। उन्होंने बताया कि गुरुजी के पैरों से छुलाकर ले जायेगें और पूजा के स्थान पर रखेंगे। मैंने भी खड़ाऊॅं खरीद लीं पर मन में विचार आया कि पैर छुला देने बस से क्या फायदा गुरुजी पहनकर चले हों तब तो कहा जाये कि ये गुरुजी की खड़ाऊॅं हैं। मैंने खड़ाऊॅं ले जाकर अपने कमरे में रख लीं।

जिस दिन बिदाई थी मैं प्रणाम की लाईन में लगा था याद आया कि खड़ाऊॅं तो मैँ लाया नहीं। मेरे पीछे थोड़े से लोग थे। उन दिनों केवल शान्तिकुॅंज परिसार था। मैं सप्तऋषि के पास स्टेज के ऊपर वाले कमरे में रुका था। जब तक खड़ाऊॅं लेने जाता लाईन समाप्त हो जाती फिर भी मैं प्रणाम करके खड़ाऊॅं लेने कमरे की तरफ दौड़कर भागा। जब लौटकर आया तो प्रणाम की लाईन समाप्त हो गई थी माताजी उठकर जा चुकीं थीं केवल गुरुदेव बैठे थे। मुझे लगा गुरुदेव मेरा ही इंतजार कर रहे थे। खड़ाऊॅं मैंने सामने रख दीं। गुरुदेव बोले अच्छा बेटे खड़ाऊॅं लाया है और गुरुदेव ने उठकर खड़ाऊॅं पहनी और कमरे में एक चक्कर लगाकर खड़ाऊॅं उतार दीं। मेरा मन प्रसन्नता और कृतज्ञता से भर उठा। मेरे मन में विचार आया गुरुदेव सचमुच बिना कहे शान्तिकुॅंज आये हर व्यक्ति के मन की बात जान लेते हैं और छोटे छोटे लोगों की भावनाओं का भी इतना ध्यान रखते हैं।

जिनके पति की मृत्यु हो जाती है कितने ही स्वार्थी रिश्तेदार श्मशान बन्धु के नाम पर विधवा को ठगा करते हैं। जो कुछ घर पर पैसा बचा होता है या मिलता है अपने को अति हितकारी बतलाकर ठगते हैं। महिलाओं को श्मशान नहीं जाने देते। माताजी ने एक गलत परम्परा का नियम तोड़ा कि महिला शवयात्रा में नहीं जा सकती। वे गयी और पूरी अन्त्येष्ठी क्रिया में सामने बैठे देखती रहीं। मरणोत्तर संस्कार चिताा दहन क्या सोचती रहीं क्या करती रहीं यह तो वे ही जानें पर ने केवल वे अन्त तक रहीं लेकिन उन्होंने निर्देश दिया कि नांदयोग थोड़ा लेट सही लेकिन नियम के अनुसार आज भी होगा जो लगभग ७ से ७.१५ तक हुआ डाक्टर प्रणव ने ममुझे विशेषकर वहीं डाक्टर टीम के साथ विशेष तैयार रहने के लिये कहा था क्योंकि माताजी एवं अन्य कई व्यक्ति बेहोश हो सकते हैं। मैँ माताजी के बांयी ओर खड़ा रहा वे एक टक देखतीरहीं कुछ हल्की फुल्की एक्का दुक्का सिसकी तो सुनाई पड़ती थी पर ऐसा स्पष्ट बोध होता था कि कोई शक्ति इस व्यथा में आश्वासन व शक्ति दे रही थी। अग्नि शिखायें बार-बार सजल श्रद्घा प्रखरप्रज्ञा की ओर मुड़ जाया करती थीं। उस स्थान पर न केवल लोग प्रणाम करते है बल्कि देर रात तक बैठे भी रहते हैं डर के स्थान एक भाव भरा प्यार ही मिलता है। मुझे ओम प्रकाश भाई साहब याने गुरुजी के बड़े पुत्र बतला रहे थे कि एक रात मैं वहॉं सो ही गया कि देखें मुझे कुछ पिताजी का अनुभव होता है वे बोले कि वे मुझे दिखे तो नहीं लेकिन ऐसा जरूर अनुभव हुआ कि ये मेरे वे ही पिताजी है जिनके साथ मैं बड़ा हो जाने के बाद भी सोया करता था।

उत्तम गायकवाड़ बैतूल निवासी एक समयदानी हैं उन्होंने बताया कि भवानी कश्यप जो एक गायत्री परिवार इंदौर के कर्मठ सदस्य हैं कुछ ही वर्षाे पहले इंदौर के दादा माने जाते थे और सेठों से हफ्ता वसूल किया करते थे एक स्वयंसेवक ज्ञानरथ चला रहा था कि सामने जाकर खड़े हो गये और रोक दिया। बच्चे ने सोचा ये पॉंच सात किताबें उठा लेंगे दो चार थप्पड़ मारेंगे चलो देखा जायें लेकिन भवानी कश्यप कहते हैँ मैंने उस दिन कुछ स्टीकर उठाये। जिसमें एक था कुकर्म करने वाले से अधिक अभागा और कोई नहीं होता क्योंकि विपत्ति में उसके साथ कोई खड़ा नहीं होता। इस वाक्य ने मुझे बदल दिया। उत्तम जी कहते हैं कि मैंने इंदौर में इनके साथ काम किया और इंदौर अश्वमेध यज्ञ में इन्होंने दो दो लाख रुपये की रसीद कटवाई। भवानी दादा जो हफ्ता वसूल किया करते थे उनसे केवल यही पूंछकर बचत है कि रसीद में कितना लिख दें।

रुढ़की यूनिवर्सिटी में एम्पलायमेंट आफीसर श्री डी०के०वर्मा ने मुझे बतलाया कि यह उनकी दूसरी पीढ़ी है जो शान्तिकुॅंज से जुड़ी है वे अल्मोड़ा से पिथौरागढ़ जा रहे थे। एक पहाड़ी रास्ते पर गाड़ी चढ़ रही थी उन्हें अनुभव हुआ कि किसी ने उनका गला पकड़ा और गाड़ी के बाहर फेंक दिया। वे बेहोश हो गये। शायद पंद्रह बीस मिनिट बेहोश रहे होंग। ऑंख खुली उसके बाद देखते हैं कि गाड़ी पहाड़ी रास्ते से लुड़कती लुड़कती नीचे घाटी में आ रही है। यह दृश्य वह अपनी ऑंखों से देख रहे थे यद्यपि उनके एंकल की दोनों हड्डियॉं टूट गयी और इतना रक्त बहा कि उनका रक्त हेमोग्लोबिन पॉंच परसेंट हो गया जो बहुत गम्भीर है। पत्नी अत्यधिक चिन्तित थी। डाक्टरों को भी आशा कम थी पर वर्माजी ने कहा अपनी पत्नी से तुम बाहर जाओ जिसको मेरे साथ रहना है उसे कोई निकाल नहीं सकता। सारे समय में गायत्री जप रहा था मैं दो महीने में पूरी तरह ठीक हो गया।

रुड़की में यूनिवर्सिटी कैम्पस में एक गोष्ठी का आयोजन किया। गायत्री मंत्र के आध्यात्मिक स्वरूप के विवेचन तथा प्रश्नोत्तर किसी प्रोफेसर की लड़की ने एक ऐसा प्रश्न पूंछा जो मुझे कठिन पड़ने लगा। उसका प्रश्न था

क्या मरने के बाद आत्मा का शव शरीर से कोई सम्बन्धा रहता है। मैंने कहा नहीं जैसे यदि दॉंत टूट जाता है तो फिर उसको कचरे में फैंकने में आपको कोई संकोच नहीं होता यदि आपकी कोई ऊंगली कट जाती है। अलग हो जाती है गैंगरीन हो जाती है तो उसे फैंकने में संकोच नहीं होता। तो फिर वह बोली फिर मनुष्य मृत्योतरान्त अपने शरीर अवयम डोनेट करने से क्यों घबराता है। अचानक मुझे ख्याल आया कारण है अज्ञान और मोह।

कृष्णकांत तिवारी ब्रह्मवर्चस में स्थाई सदस्य है। बताते है कि गुरुजी बांदा आये थे। मैं मिडिल में फैल हो गया था। पिताजी ने कहा सन्त आये हैं मिल आओ। मुझे कोई श्रद्घा नहीं थी फिर भी गया। प्रणाम किया। बिना कुछ सुने जाने गुरुजी बोले मैं तुझे पढ़ाऊंगा। और जब मैं फिर परीक्षा में बैठा तो एक पेपर देने ही नहीं गया और फिर भी मैं पास हो गया। क्योंकि पहले पेपर में ही आशा से अधिक ५० में से ३८ नंबर आ गये थे। गुरुजी से मिलने पर उन्होंने कहा आइंदा पेपर देने में चूकना नहीं और फिर पढ़ते पढ़ते में पीएचडी तक पहुॅंच गया। कृष्णकांत बतलाते हैं में ििश्विर में आया था हमारे साथ एक विटनरी डाक्टर भी ठहरे थे। मैँने सोचा कि यह लड़का मेरी बहन के लिये उपयुक्त होगा। मैंने बातचीत की उससे कि शादी तो नहीं हुई।कपिल जी से और शिव प्रसाद मिश्रा जी से भी बात की उन्होंने लड़के से सारी जानकारी ली लेकिन जब हम लोग गुरुजी के पास पहुॅंचे तो यह लड़का बिल्कुल गुरुजी के सामने बैठा था और मैं बिल्कुल बांयी और आखिरी में। गुरुजी ने उस लड़के से पूंछा तुम्हारे बच्चे ठीक हैं उसने जवाब दिया हॉं। गुरुजी ने निगाह उठाकर मेरी तरफ देखा और फिर उसकी तरफ देखकर पूंछा तुम पत्नी को नहीं लाये। बात वहीं समाप्त हो गई। शायद एक बड़ी दुर्घटना से बच गया।

कृष्णकांत जी फिर बतलाते हैं कि हमारा परिवार गायत्री का भक्त है। हमारी बहिन के पति और सास ससुर बहुत परेशान करते थे। एक दिन वह पूजा में बैठी तो उसे एक सपना सा दिखा कि जब तू ससुराल जायेगी तो ये तेरा पति तुझे ढकेल कर मार डालेगा। पर तू फिर भी जा मैं मेरी रक्षा करूंगा। जब वहॉं पहुॅंची तो उसके पति और सास ससुर को दरवाजे के बाहर और घर में दो काले नाग दिखते जो उन्हें डरा देते। जब मेरी बहिन गुरुजी से मिली तो उन्होंने कहा कि अब तो तुझे विश्वास हो गया कि मैं तेरी रक्षा करूंगा और कहा कि अब तू अपने मायके आ जा तेरी व्यवस्था हो जायेगी मैं केवल मिडिल पास थी लेकिन अचानक सीएमओ ने उनको चुन लिया और अब वह अपने पेरों पर खड़ी है। वे यह भी कहते है कि बीच बीच में मुझे माताजी दिखती हैं।

प्रेरणा बाजपेई माताजी के अन्तिम दिनों में अंजू के साथ उन्हीं के पास रहीं। क्योंकि दोनों को नरसिंह की सेवा का अच्छा ज्ञान था समर्पण भी। मैंने जब उनसे पूंछा कि कोई चमत्कारी तुमने देखी तो वे बोली चमत्कारतो नहीं लेकिन उनमें मानवता का भान हमेशा ही स्पष्ट रहता था। एक दिन क्या हुआ कि अंजू कहकर गयी कि मैं थोड़ी देर से आऊंगी तब तक तुम रुकना मुझे देर तक रुका देख माताजीबोली तू जा खाना जा भूंख लगी होगी। मैंने कहा खा लूंगी माता जी अंजू अभी आती होगी। वे बोली जा क्यों चिन्ता करती है मैं तो हूॅं। जबकि स्वयं ही अत्यधिक बीमार थीं। प्रेरणा औरशैल जीजी जी दोनों जोर से हॅंस पड़ी। किसी भी स्थिति में उनका अपना मॉँ का भान गया नहीं।

मेजर राजवीर सिंह ने बतलाया यद्यपि में मथुरा का रहने वाला हूॅं फिर भी गायत्री या गुरुजी के विषय में मैँ कुछ नहीं जानता था लेकिन जब मैं गुरुजी से मिला तो उनने कहा कि तू यहॉं आ जा। मैँने कहा गुरुजी मैं भगवा कपड़े नहीं पहनूंगा। गुरुजी बोले मैँ कहां पहने हूॅं। मुझे तुझसे काम लेनाा है कपड़े नहीं दिखाना है। मैँ थोड़ी बहुत पूजा करता था सन् १९८६ का बसन्तपंचमी का भाषण गुरुजी का सुना और सोचा कि यह प्रयोग करके देखूॅं कि क्या गुरुजी से बात हो सकती है। वही १० प्राणायम गायत्री मंत्र और सिर पर हाथ फेरना अचानक मुझे नींद सी आ गई और अन्दर से एक जवाब सा उठा कि क्या मैँ अपनी छाती फाड़कर बताऊं कि जो तू सोच रहा है वह सही है मैंने पूंछा क्या सोच रहे थे मैं सोच रहा था कि सर्विस छोड़कर शान्तिकुॅँज आ जाऊं।

कैलाश शर्मा जो कलकत्ते के बंगाली अखण्ड ज्योति के सम्पादक हैं कहते है कि यदि मैं अपने शरीर के चमड़े के जूते बनाकर भी मैं गुरुजी को पहनाऊं तो मैं उऋण नहीं हो सकता। जो घटना मेरे साथ घटी वह मैँने माताजी को सुनाई और उनकी आखों में आंसू आ गये।

मेरे एक साथी व्यापारी जो मद्रास में थे उन्होंने तार द्वारा मुझे हवाई जहाज से अस्सी हजार लेकर किसी सौदे के लिये आने के लिये कहा। मैं पहुॅंचा उसका लड़का मुझे लेकर स्कूटर पर चला जंगल के रास्ते में उसने स्कूटर रोकी बोला लघुशंका जा रहा हूॅं और एक बहुत बड़े लोहे के राड से मेरे सिर पर मारा मैँ चक्कर खाने लगा। एक क्षण मैंने गुरुजी को याद किया कि आप तो कहते थे मुझे तेरा उपयोग एक शेर की तरह करना है और मैं अब एक कुत्ते की तरह मर रहा हूॅं। मुझमें अचानक न जाने कहॉँ से ताकत आ गयी कि मैँने एक घूंसा मारा तो वह जवान लड़का और मैँ लगभग ५० वर्ष का वयस्क। पर वह दो गुलांट खाकर एक गड्डे में गिरा। जल्दी से वह स्कूटर लेकर भाग गया। मैं और मेरा पैसा दोनों बच गये। एक ट्रक मिल गया जिसने मुझे अपने आड़त के यहॉँ पहुॅंचा दिया। मेरी पत्नी हवाई जहाज से आ गई। मैँ स्वस्थ हो गया।

जब मैं पहली बार सन् १९६० में माताजी से मिला तो उनका स्वरूप एक साधारण गृहस्थ महिला जैसा था। मैँ कहता था मैं परीक्षा में पास हो जाऊं माताजीकहतीथी मैं तेरी सिफारिश गुरुजी से कर दूंगी। तू भी गुरुजी से बोल देना माताजी ने अपना चित्र मुझे दिया जो आज भी लगभग ३५ वर्ष से मेरे साथ है। गुरुजी का एक चित्र पं० लीलापत जी ने मुझे दिया जिसकी कापी माताजी अपने पूजा कक्ष में रखती और वेकहती है कि आरम्भिक स्थिति में गुरुजी जब अज्ञातवास में होते हैं तो मैँ इस चित्र से उनसे सम्बन्ध स्थापित कर लेती हूॅं। और गायत्री परिवार की समस्याओं का हल भी पूॅंछ लेती हूॅं। स्वयं गुरुजी ने १९६५ में दादागुरु का एक चित्र लाकर मुझे दिया जो आज भी मेरे पास है। मैँने उस चित्र का पाते ही प्रणाम कर वायदा किया कि मैं आपसे कभी कुछ माँगूगा नहीं और मैंने ऐसा ही किया। विचारों में भी नहीं।

मैंने पूंछा गुरुजी से कि आपने यह चित्र कैसे सउतारा क्या आपके पास कैमराथा गुरुजी ने कहा नहीं जिसस गुरुपूर्णिमा में मुझे गुरुजी के दर्शन करने थे सन् १९६० में उस समय उनके हम सात शिष्य वहॉँ पहुॅंचे। मैंने पूंछा यह कौन हैं उन्होंने कहा कि भारत के दो थे। यएक दक्षिण भारत में हैं। उन्हीें ने कैमरा से ये चित्र लिये थे जिनकी कापी मुझको भेजे। मैंने कहॉँ बाकी पॉंच कहॉं है। गुरुजी ने कहा ये पॉंचों विदेश में है और अपने अपने ढंग से काम कर रहे है एवं दादागुरु के शिष्य हैं। मैंने पूछा किदादा गुरु का नाम आपने कैसे जाना। आपकी बातचीत हुई बोले वे सब जगह पहुॅंच सकते हैं इसलिये मैंने उनका नाम सर्वेश्वरानंद रख दिया वे स्थूल भी बन सकते हैं पर है सूक्ष्म।

जगदीश वर्मा जी सावित्री एक में स्थाई कार्यकर्ता हैं। ये राऊरकेला में अच्छे पद परथे वे कहते हैँ। मैं न केवल भगवान और पण्डितों में अविश्वास करता था पर विरोध भी सन् १९७१ में हमारे यहॉँ यज्ञ हुआ। फैक्टरी के रास्तें में यज्ञ स्थली थी। स्कूटर पर जाता था। और उपेक्षा से निकल जाता था। एक दिन साईकिल सेगया तो एक पोस्टर पढ़ा हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। सोचा मेरे अकेले से सुधरने से कैसे दुनिया सुधरेगी। पर फिर सोचता रहा तो लगा कि ठीक तो है। यदि दुनियॉं बदलेगी तो विचार परिवर्तन से बदलेगी। हम मतलब बहुत सारे लोग मैंने कुछ छोटी किताबें भी खरीद लीं। किताबें अच्छी लगी। एक कार्यकर्ता ने बताया कि आप ही के आफीसर राऊरकेला में गायत्री भक्त हैं तथा उनके यहॉँ मोटी किताबें भी हैं। मैं रात को ही उनके यहॉं पहुॅंच गया दरवाजा खटखटाया उन्होंने बड़े प्रेम से बातचीत की किताबें दी और मैं उनका मित्र हो गया। उनका नाम था के०के०भाटिया वे प्राणप्रत्यावर्तन शिविर में आये और जब मेरे विषय में थोड़ी जानकारी दी और मेरा एक कष्ट भी बतलाया कि मुझे सांस की बड़ी बीमारी है और हर दो तीन महीने में अस्पताल में भरती होना पड़ता है गुरुजी ने कहा कि यह भस्मी ले जाओ आचमनी के साथ रोज गाये पॉंच माला गायत्री जपे आज के बाद वह कभी अस्पताल में भरती नहीं होगा। और नहीं हुये। डाक्टर डिल्लन ने राऊरकेवला में आपरेशन बतलाया था। गुरुजी ने यह भी कहा था कि यह लड़का कुछ दिनों बात शान्तिकुॅंज आ जायेगा और मैं आ गया। हम पति पत्नि जब गुरुजी से मिलने आये तो हमारे दोनों बच्चों को गोद में लेकर गुरुजी ने कहा कि यह बच्चे अब हमारे है तुम देखरेख करना हम अच्छा इंसान बनायेंगे। गुरुजी ने एक बात और कही जब मैं शान्तिकुॅंज आ गया। गुरुजी ने एक बात और कही जो मैं कभी भूलता नहीं। कि तू सिर्फ मुझे और माताजी को देखना आस पड़ौस को बिल्कुल मत देखना तू मेरा काम करना मैं तेरा।

सन् १९७८-७९ में मैं अरुण पंड्या के साथ आया और मैंने कहा माताजी यह भी आना चाहते हैं। माताजी ने कहा ये नहीं आयेगा। तू आ जायेगा।

गुरुजी ने कहा मेरे पास शक्तियॉं है सिद्घियॉँ हैं लेकिन मुझे निर्देश एक लोकसेवी ब्राह्मण का ही जीने का है।

गुरुजी ने कहा मुझे चले जाने दो उसके बाद मुझे नापने के सारे पैमाने छोटे पड़ जायेगे

गुरुजी ने कहा कि यदि कोई कहे कि तुम्हारे गुरुजी से बड़ा विद्वान कोई है गुरुजी से बड़ा तपस्वी कोई है और गुरुजी से बड़ा कोई प्रवचनकर्ता है कोई समाजसेवी है तो एक बार मान लेना पर बेटे याद रखो तुम्हारे गुरुजी से बड़ा प्रेम करने वालार और कोई नहीं होगा।

गुरुजी ने कहा सन् १९७१ के बिदाई भाषण में कि कोई भी मुक्त आत्मा इस धरती पर नहीं आना चाहती मुझे ढकेल दिया गया ऐसे समय में जब धर्म एक आडम्बर बना हुआ था और पूजा एक मखौल।

गुरुजी ने कहा मेरी मार्गदर्शक सत्ता ने पॉंच वर्ष का एक्सटेंशन दियाा है तत्पश्चात् हम सन् २००० तक सूक्ष्म शरीर में रहेंगे और उसके बाद कारण शरीर में तब हम घनीभूत प्राणऊर्जा के रूप में होंगे और केवल पात्रता ही हमारे प्रेम का आधार होगा। चर्मचक्षु हमें न देख सकेंगे।

इन दिनों जब मैं संस्मरण लिख रहा हूॅं पिछले हफ्ते मैंने दो स्वप्न देखें। गुरुजी ने कहा था जब कभी मुझे सपने में देखों कुछ उद्येश्यपूर्ण होंगे। मैंने देखा कि गुरुजी एक कमरे में हैं जाने के लिये रुकावट लगी हुई है। पर स्वयंसेवक ने कहा कि आप जा सकते हैँ सबों को जाना मना है। मैं गया और प्रणाम किया गुरुजी काफी दुबले थे और शरीर छोड़ने की तैयारी में थे बड़े शान्त भाव से कहा कि अब मैं कारण शरीर में जाने वाले हैं। मैंने कहा आप इतने प्रसन्न और स्वस्थ दिख रहे हैं पर दुबले क्योंहै वे बोले मेरा यह शरीर तुम लोगों के चरित्र चिन्तन और व्यवहार से बना है और तुम लोग इन मामले में दुबले पड़ रहे हो आगे देखता हूॅं। मैंने सोचा गुरुजी आपने पति व्रत और पत्नीव्रत को बराबर बतलाया है। हर मनुष्य किसी का तो पति है और महिला किसी की पत्नी है तो क्या किसी की भी सेवा करने से पूर्णता प्राप्त होगी। गुरुजी ने विचारों में ही उत्तर दिया पति व्रत और पत्नीव्रत धर्म केवल एक व्यक्ति की सेवा से पूर्णता नहीं देता लेकिन इस कर्मकाण्ड के माध्यम से श्रेष्ठता और आदर्श के उच्चतर स्तर पर पहुॅंचकर ही वह पतिव्रत या पत्नीव्रत धर्म बनता है केवल सीमाबद्घ होने से नहीं।

दामोदर के मामाजी अपने पत्नी के साथ गुरुजी के पास गये और बोले कि इन्हें हमेशा बीमारी रहती है। यह यदि शरीर छोड़ दें तो ज्यादा ठीक हैं कष्ट सहा नहीं जाता। गुरुजी बोले इसके कष्ट प्रारब्ध हैं और यदि यहॉँ नहीं भोगा तो अगले जन्म में भी भोगना पड़ेगा अच्छा है कुछ समय और कष्ट भोग ले।

श्री मूलसिंह ठाकुर जी ब्रह्मवर्चस के स्थाई सदस्य है उन्होंने बताया कि जब वे गुरुजी से मिले तो उनके सामने उन्होंने बपनी एक बड़ी समस्या रखी। उनकी जमीन पर एक समृद्घ और शक्तिशाली परिवार के सदस्य ने कब्जा कर रखा था जिसका केस कोर्ट में चल रहा था हमारे जीतने की आशा कम थी गुरुजी ने आश्वस्त किया कि मैँ तुम्हारी मदद करूंगा और कुछ ऐसा हुआ कि विरोधी वकील और गवाह आये ही नहीं और मुझे जमीन मिल गयी यदि ऐसी नहीं होता तो अपील में हमारे वे रिश्तेदार अपना अधिकार जमा लेते

सन् १९६४ में मैंने प्रथम सिविल हास्पिटिल भवर कुॅंआ इंदौर में सहायक चिकित्सक के पद पर ज्वाइन किया वहॉं मेरे एक मित्र अर्जुनदास मूलचंदानी ने कहा कि मेरी तीन लड़कियॉँ हैं। आप कुछ सहायता कर सकते हैं अपने डाक्टरी ज्ञान से। मैंने कहा नहीं डाक्टरी ज्ञान से नहीं पर तुम्हारा काम अवश्य हो सकता है मैंने गुरुजी को पत्र लिखा गुरुजी का आशीर्वाद आया और उनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई। बीस साल बाद वे एक बार मथुरा गये। उनको याद आया कि हमारे मित्र डाक्टर दत्ता के गुरुजी गायत्री वाले यहीं रहते हैं। वे मिलने गये प्रणाम किया। जैसे ही उनके बीस साल वाले लम्बे चौड़े सिंधी परिवार के पुत्र ने प्रणाम किया कि गुरुजी ने कहा कि ये बेटा तो मेरा दिया हुआ है। माता पिता को मेरी याद आयी कि मैंने कहा था कि गुरुजी ने तुमको आशीर्वाद लिख भेजा यह घटना अर्जुनदास जी ने मुझको शान्तिकुॅंज में लगभग २५ वर्ष बाद जब वे यहॉं आये थे सुनाई।

गुरुजी के अपने विचार सत्य के विषय में बहुत अनूठे थे कभी कभी तो वो सत्य पर बहुत नाराज होते थे कहते थे लोग मेरे पास आते हैं खूब बुराई करते हैं और कहते हैं मैं तो सत्य बोलता हूॅं। गुरुजी बोले तू सत्य तो बोलता है पर तेरे सम्य में मिट्टी के तेल की बदबू आ रही है। सत्य को शिवम् सुन्दरम होना भी आवश्यक है यानी कल्याणकारी। कुछ मजेदार कहानियॉँ वे सुनाते थे ठीक से तो याद नहीं पर कुछ ऐसी।

१- बीरबल बातचीत में हमेशा राजा अकबर से जीत जाते थे। एक दिन अकबर ने सोचा बीरबल को हराना चाहिए। उन्होंने एक छोटी चिड़ियॉं ली और उसको खूब कम्बल से लपेट दिया और बीरबल से पूंछा बताओं चिड़ियॉं जिन्दा है कि मरी। अब तो बीरबल परेशान। अगर जिंदी कहते है तो राजा वहीं गला दबाकर मार डालेंगे। और यदि मरी कहते हैं तो कम्बल हटाकर उड़ाकर दिखा देंगे। बीरबल ने सत्य के दूसरे स्वरूप को भी सोचा और कहा बादशाह चिड़ियॉ मरी है बादशाह ने कम्बल हटाये और चिड़ियॉँ उड़ा दी। बीरबल बोला मुझे मालुम था कि चिड़ियॉं जिंदी है पर यदि मैँ कहता तो आप मार डालते सत्य की अपेक्षा चिड़ियॉ की जान बचाना आवश्यक था। ऐसे थे हमारे गुरुजी

लखनऊ में ए०के०तिवारी जी ने बताया कि एक मनीषी ज्योतिषी जिन्होंने गुरुजी के विषय में बहुत कुछ सुन रखा था मिलने आये पर अपने बच्चों में, गायत्री परिवार में गुरुजी इतने व्यस्त और घिरे कि वह एक क्षण भी न मिल सके। बहुत खीजे बोले ऐसे क्या गुरुजी जो मेरे से एक छोटे प्रश्न का जवाब देने के लिये भी उपलब्ध न हो पायें। उनका प्रश्न था गायत्री के मंत्र का सही तोड़ गुरुजी चल दिये। उन्होंने गुरुजी की पीठ की तरफ देखा उन्होंने हथेली पीछे की और वे देखते हैं कि गायत्री मंत्र का सही तोड़ सुनहरे अक्षरों में उनकी हथेली में उभर आया। उन्होंने वहीं सिर झुकाया और मान लिया कि गायत्री मंत्र के सिद्घ साधक पण्डित श्रीरामशर्मा आचार्य तुम्हें मेरा कोटि कोटि प्रणाम।

एक दिन बहुत पानी बरसा। ब्रह्मवर्चस मन्दिर में पानी भर गया। सारे विभाग वालों ने अपनी अपनी रिपोर्ट माताजी को दी। एक रिपोर्ट थी कि दाल और चॉंवल के बहुत थेले आधे आधे डूब गये। माताजी ने बिना कुछ नुकसान के मुझसे कहा अमल कुमार ब्रह्मवर्चस में कोई खाना नहीं पकाये। तीन दिन तक सबेरे शाम सब लोग सामूहिक खिचड़ी खायें घी हम भिजवाते है।

डॉ० प्रणव के पिताजी श्री सत्यनारायण पंड्या जी जो कि हाईकोर्ट जज रहे हैँ उन्होंने मुझे बताया कि जबलपुर के दानाभाई राठोर ने बताया कि उनको गायत्री परिवार में लाने वाले श्री रणछोड़दास जी थे। वे उनको बड़ी श्रद्घा की दृष्टि से देखते थे। जब उन्होंने उनकी मृत्यु की सूचना गुरुजी को दी पत्र पहुॅंचने के पहले ही गुरुजी का पत्र आ चुका था जिसमें लिखा था कि मैंने यानी गुरुजी ने उनकी मृत्यु होते ही उनकी चेतना गुरुजी के पास पहुॅंची। गुरुजी ने पूंछा तुम अपने शरीर में लौटना चाहतो हो तो मैं तुम्हें भेज देता हूॅं। उन्होंने कहाा नहीं। तो ठीक है गुरुजी ने कहा मैँ तुम्हारे आगे का रास्ता साफ कर देता हूॅं तुम्हारी अन्त्येष्ठी तो जबलपुर में ही हुई होगी पर मैँ हरिद्वार गंगा में स्वयं तुम्हारा तर्पण करूंगा।

पॉंच, छः साल पहले की बात है। श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी हमारे टोली नायक थे। हम लोग भुवनेश्वर गये। शहर के बड़े आदमियों से मिलने का क्रम वहॉँ के गायत्री परिवार ने बना रखा था। हम लोग चीफ जस्टिस सुप्रीम कोट्र रंगनाथन जी से मिलने गये। अब वे चेयरमेन ह्यूमन राइट कमीशन पर स्थित हैं। उन्होंने बड़ा सम्मान किया। गुरुजी के शिष्य के नाते। और उन्होंने एक घटना सुनाई। वे बोले मैं गुरुजी से मिला। मैंने पूंछा कब। बोले इसी साल। मैंने कहा उनका शरीर तो सन् १९९० में छूट गया। वे बोले कि वे मुझसे शरीर छोड़ने के बाद ही मिले। मैंने कहा विचार में या सपने में। बोले नहीं प्रत्यक्ष। जैसे तुम बैठे हो। मैंने पूंछा कैसे विश्वास किया जाये। बोले मैं कहता हूॅं। मैंने कहा आप भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं इसलिये कह तो ठीक ही रहे होंगे लेकिन एक वैज्ञानिक इसको मान्यता नहीं देगा। क्या आप विस्तृत जानकारी देंगे। बोले हॉँ। मैंने फिर पूंछा क्या आपकी बात मैँ अपने माइक्रोकैसिट रिकार्डर में रिकार्ड कर सकता हूॅं। बोले हॉँ। मैँने रिकार्डर टेबिल पर रख दिया। वे बोले मैँ बहुत परेशान था। सन् १९८४ में इन्द्रागॉंधी हत्याकाण्ड के बाद सिक्खों को जो हानि हुई उसके कम्पन्शेसन के सारे मामले राष्ट्रपति ने मुझे सौंपे थे। मैं जब अपने कोर्ट आर्डर में ३०, ३०-४०, ४० लाख रुपये का कम्पन्शेसन देने का निर्णय देता था तो सरकार बजट न होने का कारण देकर असमर्थता व्यक्त करती थी। एक जज को ऐसी कठिनाई कि निर्णय लागू न हो एक अजीब घटना थी। इस चिन्तित हालत में मैंने गुरुजी को याद किया और सशरीर गुरुजी मेरे सामने आकर बैठ गये। मेरे तीन प्रश्न थे। इन प्रश्नों के जवाब जो गुरुजी ने दिये वे न कभी भी न मेरी कल्पना में थे और न मैँ कभी ऐसा सोच सकता था। गुरुजी ने कहा तुम प्रधानमंत्री राजीव गॉंधी से कह दो कि इस स्थिति में मैं काम नहीं कर सकता। राजीव गॉंधी ने निर्देशित कर दिया कि इनके निर्णय की राशि इनके चेक द्वारा सीधी ट्रेजरी से पेमेन्ट की जाये। ऐसा ही एक प्रश्न बृन्दावन से गाय कटने के लिए बाहर न जाये इसका क्या उपाया है। कलेक्टर एस पी तथा कुछ और ऐसे सदस्य ऐसे कानून बना ले ताकि सरकारी अफसरों के तबादले के बाद भी यह नियम बदले नहीं। और प्रश्न मुझे याद नहीं रहे।

मेरे एक मित्र मेहता जी डायरेक्टर एग्रीकल्चर रतलाम में थे। उनके पुत्र नरेश मेहता एक दिन गुरुजी से बोले गुरुजी मैंने एक दक्षिण भारतीय लड़की से शादी की है। बहुत अच्छे स्वभाव की है। मेरे साथ पढ़ती थी। पिताजी उसे स्वीकार नहीं करते। गुरुजी बोले तेरे पिताजी क्यों स्वीकार नहीं करते। तू जाकर बोल कि यदि तुम दक्षिण भारत की लड़की स्वीकार नहीं करते तो फिर मॉँ को दक्षिण भारतीय साड़ी क्यों पहनने देते हो। फिर वहॉं के चॉंवल और लोंग इलायची भी खाना बन्द करो। बहू को स्वीकृति मिल गई।

गुरुजी का एक लिखा गाना तुम न घबराओ न ऑंसू ही बहाओ तुम पोंछ दूंगा ऑंसू तुम्हारे अश्रुगीतों से। घाव धोकर मरहल लगाऊॅंगा और कुछ मॉँगो हॅंसी मॉंगों खुशी मॉंगो। खो गये हो दे रहा हूॅं तुमको मैँ जीने की कला सिखाऊंगा न केवल उनके ये भाव था बल्कि उनका जीवन था।

गुरुजी के अन्तिम समय के शब्दों को सुनने के लिये जब माताजी पर अधिक जोर दिया तो फिर उन्होंने कहा कि वे बहुत पहले से ही कहने लगे थे कि मैं गायत्री जयन्ती के दिन यह शरीर छोड़ दूॅंगा। उस दिन साढ़े चार बजे मैं गुरुजी को प्रणाम कर साढ़े छः बजे स्टेज पर पहुॅंच गयी। भाषण भी दिया चार शादियॉं थी आशीर्वाद मिलक माला बच्चों को खाना खिलाया। प्रणाम में केवल पॉंच व्यक्तितों को मैंने फूल दिये और आगे मैँ फूल न दे सकी कारण मेरा शरीर तो प्रणाम करा रहा था पर मुझे मालुम था कि गुरुजी ने अपने शरीर से बिदाई ले ली है। गुरुजी ने मेरा हाथ पकड़कर अन्तिम बार कहा था कि मैं गायत्री परिवार के बच्चों की जिम्मेदारी केवल तुम पर और तुम पर छोड़ जा रहा हूॅं। मैँने भी वायदा निभाने की सौगन्ध खाई।

श्री ओमप्रकाश शर्मा जी गुरुजी के ज्येष्ठ पुत्र मेरे घनिष्ठ मित्रों में हैं। और वे गुरुजी के अन्तिम दिनों में यहीं त्रिपदा ५ में रहे। मेरे अनुरोध पर जो कुछ वे याद कर सके सब मुझे न केवल सुनाये बल्कि टेप रिकार्डिंग भी कराया जो मेरे पास सुरक्षित है। वे कहते हैँ। मुझे गुरुजी के साथ रहने के लिये ५८ बसन्त का सानिध्य मिला।

डॉ० मिस रजनी जोशी पी०एच०डी० प्रोफेसर आफ मेटामेटिक्स एण्ड बायोइंजीनियरिग आई०आई०टी० बाम्बे फोन नं० ५७६८४८५, ५७८२५४५ एक्सटेंशन ७४८५ फेक्स ०९१२२५७८३४८० ई०मेल रजनी जोशी, आई०आई०टी०बाम्बे० आर आर जे एट मेथ ़ आई आई टी बी , ई आर एन ई टी, इन आज दिनॉंक १६-१२-९८ को मैंने इनका इंटरव्यू लिया उन्होंने कहा मेरा अखण्ड ज्योति से परिचय १९७९ में हुआ। पर मैं गुरुजी से अपने जन्मदिन पर १९८३ में मिली मैं फ्रांस गई थी वहॉं पहुॅंचते ही चौथे दिन मुझे पत्र मिला कि मैं तेरे साथ रहूॅंगा। गायत्री महाविज्ञान के तीनों भाग मैं ले गयी थी। जब मैं मिली तो मैंने गुरुजी से कहॉं कि मैंने फ्रेंच सीख ली है और फ्रेंच में थीसिस भी लिखी है इसलिये मैं गायत्री के तीनों भाग फ्रेंच में अनुवाद करना चाहती हूॅं। गुरुजी ने कहा कि फ्रांस एक छोटा सा देश है उसमें १२ कालोनियॉं हैं जिनके एक एक नाम उन्होंने गिनवा दिये सबकी जनसंख्या गिनवाई और उनके मुख्य शहर भी बतलाये इतनी बारीकीजानकारी न मुझे थी न साधारणतः किसी को हो सकती है गुरुजी ने आगे कहा कि मैं आगे चलकर तुझसे अंग्रेजी में अनुवाद कराऊॅंगा। रजनी जोशी ने दो वांगमय तथा चार पॉंच किताबें अनुवाद कर ली हैं। भारत और अमेरिका दोनों के ही प्रथम दृष्टा ने उनकी बड़ी प्रशंसा की है। रजनी जोशी कहती हैं कि मेरे जीवन की गुरुजी के साथ बहुत अनुभूतियॉं हैं। जिनको मैं बतलाना नहीं चाहूॅंगी और न ही मुझे बताना चाहिए फिर भी शायद आपको बताने की आगे सम्भावना है। सन् १९८६ में मैं अपनी चचेरी बहन के साथ गुरुजी के पास गई बिना कुछ पूछे और जाने गुरुजी ने वंदना से कहा कि तेरी शादी जल्दी करा दूॅंगा और मुझसे कहा कि तू गुलामी मत करना। शादी नहीं करना तुझसे बड़े काम कराऊॅंगा। तेरा मुझसे सम्बन्ध पिछले तीन जन्म से है और यही बात माताजी ने नीचेआने पर कही।

मैं जब फ्रांस में थी मेरे पिता जी को केंसर रेक्टम हो गया। आफरेशन ठीक होने की सूचना मिली। पर मेरे पत्र के उत्तर में गुरुजी ने लिखा कि प्रारब्ध का जाल बड़ा विकट होता है बहुत पहले से ताना बाना बुने बिना कटता नहीं और वे न जी सके।

रामकृष्ण रघुनाथ जोशी जो सात- आठ बार हिमालय जा चुके हैं काठमांडू से वापस आ रहे थे बस पलट गयी। बस के सारे यात्री मर गये केवल वे ही बचे। और जब वे माताजी से मिले तो पहला ही वाक्य माताजी ने कहा तू कहॉं गिरता पड़ता है तेरी मृत्यु थी अब भगवान का काम कर।

वीरेश्वर उपाध्याय भाई साहब का मैंने इंटरव्यू लिया। भाई साहब ने बताया सन् १९५५-५६ में झांसी में पढ़ता था और लक्ष्मीनारायण व्यायाम मन्दिर में सदस्य था। जहॉं बालकृष्ण अग्रवाल प्रमुख व्यक्ति थे। मैं एक एक माला करता था तथा पुराने ढंग से यज्ञोपवीत संस्कार भी कराया था। गुरुजी जब यज्ञ में आये तो मैं स्टेशन भी गया लेक्चर सुना कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा और इंजीनियरिंग डिप्लोमा कर चुका था गुरुजी के पास पत्र लेकर गया। सन् १९५८ यज्ञ में। सन् १९५९ मार्च अप्रैल में याज्ञवल्क्य नगर में मैं ठहरा जहॉं बालकृष्ण अग्रवाल जीवनदानी थे। गुरुजी ने कहा कि भाषण जवान से नहीं किये जाते अपने जीवन से किये जाते हैं आगे सारी दुनिया गायत्री करेंगी मुझे वे एक ईमानदार अभिव्यक्ता लगे। मुझे उनमें एक दिव्यता का अहसास होने लगा और साथ में एक गहरा अपनत्व। मैंने अनुभव किया कि असली मन्दिर तो गुरुजी का ही है। सन् १९६५ में इलाहाबाद में विश्वहिन्दू परिषद की स्थापना हुई नवम्बर दिसम्बर में गतिविधियॉं चालू हो गयी। सारे दुनिया के हिन्दू देश विदेश से संस्कार देने वाले आये थे। सन् १९६६ में गुरुजी ने अभिनव संस्कार पद्धति और धर्मशिक्षण से लोकसेवा प्रगतिशील शैली में निकाली फिर एजूकेशन लीव लेकर मैं मथुरा गया। जहॉं गुरुजी ने कहा कि हमें देश विदेश में संस्कार सिखाना ही नहीं सिखाने वाले बनाना है। गुरुजी ने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद आगे एक राजनैतिक संस्था बन जायेगी उसमें अध्यात्म कम रहेगा। फिर गुरुजी फरवरी में इंदौर यज्ञ में मिले। मैं रूपराम नगर कालोनी में पहुॅंचा गुरुजी ने मुझे वहीं ठहरा लिया कहा यही सो जाना गुरुजी के पलंग के पास ही मैं जमीन पर सो गया। गुरुजी ने सारे घर की बातचीत पूछी और पूछा तेरा पैसा बढ़ाने की या व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा या कोई जिम्मेदारी बड़ी है। यदि ऋषि जैसा जीना चाहता है तो युग निर्माण विद्यालय के लिए तू आ जा। कुटीर उद्योग, वा लोकसेवी उद्योगों के लिये स्वयंसेवक जरूर मिलेगें। फिर टुकड़ों-टुकड़ों में बात होती रही। रविवार को वापस आना था मुझे गुरुजी बोले मुझे डर लगता है कि तेरी टेक्रोलाजी का क्या होगा। मैंने कहा गुरुजी मेरे हाथ जिन्दा हैं यदि आपने मुझे हटा भी दिया तो फिर मैं कमा खा लूॅंगा। गुरुजी ने कहा तेरा स्वागत है तू आ जा। एक साल के लिए स्थाई या अस्थाई तू मथुरा आ जा। राजगढ़ में मेरे बड़े भाई थे सारी बातें हुई। उन दिनों जीवनदानी लड़भिड़कर अलग हो चुके थे। हम दोनों भाइयों ने बहश के बाद यह निश्चय किया एक भाई घर रहे परिवार के लिये और एक गुरुजी को समर्पित हो। जून सन्१९६६ में गुरुजी ने कहा हमारा दरवाजा खुला है गायत्री तपोभूमि के गेट के पास गुरुजी ने मेरा पीठ सहलाया और मैंने एक स्पष्ट झनझनाहट पूरे मेरूदण्ड में पहसूस की जैसे कोई प्राणप्रवाह हो। मैंने पूछा हम दो भाई में से किसको आना चाहिए। गुरुजी ने कहा राम के साथ तो लक्ष्मण ही जंगल गये थे तू ही आ जा। मेरा शेसन पूरा हो गया था जुलाई से विद्यालय का काम मैंने मथुरा में सम्भाल लिया। गुरुजी ने कहा कि ऋषियों जैसा जीवन जीना पर जैसा मैंने तेरे लिये किया ऐसा रिस्क आगे नहीं लूॅंगा। मुझे नयी सृष्टि में नया नेतृत्व खड़ा करना पड़ेगा। हमको ऐसा विश्वमानस बनाना है जो समस्याएँ सुलझाये। गुरुजी के सामने योजनायें स्पष्ट रहती थीं। फेमिली प्लानिंग पर वे बहुत जोर देते थे और कहते थे कि मेरी दूरबीन बहुत दूर तक देखती है। व्यक्ति बनाने के प्रति उनका बड़ा आग्रह रहता था। जो बड़ा काम और सम्मान की बात सोचेगें वे अटक जायेंगे। मुझसे कहा ऑंख चमकाते हुये कि तुम्हारी कलम में भावना है लेखक बनना। जब वे नाराज होते थे तो हमारी ही कच्चाई प्रकट करते थे ताकि वह छूट जायें जवान से नाराज और पेट से आशीश निकलता था।

ज्योति प्रसाद रावत जो मिनिस्टर स्तर के थे उनके पास १०० टन सीमेंट लेने मुझे भेजा। मैंने जैसा कि सतना के खंडेलवाल जी ने कहा मैंने १२० टन की मंजूरी ले ली। गुरुजी ने मुझे डॉंट लगाई और बाद में बोले मैं तेरी गरमी उतार रहा था मैंने कहा गुरुजी ऐसा कुछ नहीं सोच रहा था। गुरुजी जब नाराज मूड में होते और मैं कुछ काम की पूंछता तो ठीक से जवाब देते और फिर नाराज होना शुरू कर देते और कहते मैं तुझसे काम नहीं साधना कराना चाहता हूॅं। उनका दिया काम मैं तत्काल करने में लग जाता और वे मुझे डॉंटते और कहते कि यह काम तो मैंने अभ्यास के लिये दिया था तू अभ्यास कम करता है और काम पूरा करने की ज्यादा कोशिश करता है। गुरुजी क्या सोचते थे तो मैं उनके सिग्रल समझ जाता था और जवाब देने लगता था और गुरुजी डॉंटते थे कि तू बोल तो ठीक रहा है लेकिन उस काम की मेचुअरिटी का समय नहीं आया है। मैं सोचता था कि मेरी सही बात पर क्यों डॉंट लगती है। एक बार गायत्री तपोभूमि में मेरी चोरी हो गई बैंक सर्टिफिकेट भी चले गये लेकिन गुरुजी ने कहा ठीक सब पूरा हो जायेगा। सो अचानक किसी ओर की लाकर की चाबी बनना थी मेरी भी बन गयी एक आफीसर मिल गये तो सर्टीफिकेट जो खोये थे डुप्लीकेट बन गये। उन दिनों शंकरदयाल शर्मा पोस्टल मिनिस्टर थे मुझे याद आया कि रावण को जो बड़े तप में मिला था विभीषण को छोटी मित्रता से मिल गया। मैंने गुरुजी से कुछ मॉंगा तो नहीं पर जो विचार किया वो पूरा हो गया। गुरुजी का कहा कि विश्व गायत्रीमय हो जायेगा मुझे आभाष हो गया जब एडिनगार्डन और नेल्शन मंडेला ने सारे विश्व में गायत्री मंत्र सुनाया। गुरुजी ने कहा था कि मैं बड़ी ताकतों को टक्कर दूॅंगा। उपाध्याय भाई साहब ने बताया कि मेरी मॉं जिनकी ३०० ग्राम सोने की करधनी जो शायद किसी कीमत पर नहीं छोड़ती निस्संकोच मुझे बेचने को दे दी जिसकी कीमत उस समय ३६००० रुपये थी और ब्याज उस समय तीन सौ रुपया महिना मिलता रहा।

नवसारी के मगनभाई गॉंधी का शरीर छूट गया था और फिर उन्हें १० साल का जीवन मिला और ठीक दस वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हुई। एक बार उन्होंने गुरुजी से कहा कि मैं हिमालय किसी बड़े सन्त के दर्शन करना चाहता हूॅं। गुरुजी ने बताया कि अमुक जगह काली कमली वाले के भंडारा में एक सफेद दाड़ी वाला ठीक १२ बजे आयेगा मैंने देखा एक कोने में वह बैठा रहा और सबसे बाद में गया। मैं उनके पीछे-पीछे हो गया और दूर चलकर जब मैंने प्रणाम किया तो बोले क्या खायेगा भूख हमें लगी थी (मगन भाई) वे बोले उस पेड़ के नीचे की पत्तल उठा लो वहॉं ताजा भात दाल रखी थी। उन साधू ने कहा क्यों तेरे बड़े सन्त के दर्शन वहॉं काफी नहीं थे। मैंने गुरुजी से कहा कि मैंने उनको बिल्कुल आप जैसा ही देखा गुरुजी हसें और बोले तू ऐसा मत कहते फिरना।

सोनीपथ के मित्तल जी ने कहॉं कि गुरुजी आपको कई विद्यायें आती हैं हमको कुछ दिखाये यह मेरा कोई परीक्षा भाव नहीं है प्रार्थना है तो गुरुजी ने आइने में देवदर्शन कराये।

मुझको मोंट्रियल अश्वमेध के पश्चात् गायत्री परिवार के साथी एयरपोर्ट पर सारी व्यवस्था कर नो एंट्री एरिया तक छोड़ गये मेरा एक्साइज क्लीयरेंस कार्ड पासपोर्ट चेक पर ही रह गया और मुझे बोर्डिंग नहींकरने दिया और जब तक मैं बनवा कर लाया तब तक फ्लाट छूट गयी। स्टाफ छूट रहाा था कि अचानक एक फ्रेंच महिला आयी और मुझे साथ ले जाकर न केवल न्यू टिकिट इशू कराया लेकिन प्लेन का सामान भी रीलोडिंग कराकर दूसरी एक आधे घण्टे बाद की फ्लाट पर व्यवस्थित रूप से पहुॅंचा दिया।

१९ दिसम्बर १९९८ को मैंने अपने छोटे भाई दिलीप कुमार दत्त जो कि डब्ल्यू एचओ के एक ब्रांच के डायरेक्टर रहे हैं का इंटरव्यू लिया जो इस प्रकार है।

सन् १९६० में मैं अपने बड़े भाई अमल कुमार दत्ता के साथ गुरुजी से मिलने मथुरा गया। घियामंडी में गुरुजी एक खटोले पर बैठे हुये थे उन्होंने पता लगाया तो लोटे में थोड़ा सा दूध था गुरुजी ने कहा आधा दूध आधा पानी मिलाकर दिलीप को चाय पिलवाओं। तभी मैंने सोच लिया कि चाय पिलाने वाला व्यक्ति मेरा गुरु बनना चाहिए। उससे पूछा तू क्या करता है। मैंने कहा गुरुजी मैं बहुत ऊधमी विद्यार्थी रहा मैंने बी०काम की परीक्षा तो दे दी पर बुक कीपिंग के पेपर में सही जवाब लिखकर काट दिया गुरुजी ने कहा मैं सही कर दूंगा और मैं सच में पास हो गया। पास किया और प्रिंसपल की पिटाई के विषय में मुझे कालेज से निकाल दिया। वह कहते हैं कि अन्य कालेज में भी तुझे एडमीशन नहीं मिलेगा गुरुजी ने कहा जहाँ-जहाँ तूने ऊधम किया है वहाँ माफी माँग तेरा एडमीशन करा दूँगा। मेरे बड़े भाई के साथ मैं इंदौर रहने लगा और उसी समय मेरा क्रिश्चन कालेज में एडमीशन हो गया।

मैं नियमित रूप से क्षेत्रों में जाता रहा। एक बार मेरे पास बिल्कुल पैसे नहीं थे और मुझे मथुरा जाना था मैंने अपनी साईकिल बेच दी पर गया। मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मुझे कुछ भी नहीं आता। गुरुजी ने कहा प्रायमरी स्कूल के शिक्षक को कुछ आना थोड़े चाहिए। थोड़ा सीख ले थोड़ा बता दे। दो चार श£ोक याद कर लें। बस मैं यही करता था सामने ब्रह्मदण्ड रख देता था और जो जैसा गुरुजी से सुना बोल देता था।

एक बार टोली में मुझे हनुमान जी के मन्दिर की प्राणप्रतिष्ठा के लिये कहा गया। टोली में कोई कर्मकाण्ड नहीं जानता था मैंने सोचा गायत्री मंत्र से प्राणप्रतिष्ठा करा दूं पर लोग क्या कहेंगे। बिना हनुमान जी के मंत्र के हनुमान जी की प्रतिष्ठा कैसे बहुत परेशान था इतने में गॉंव वाला आया हाथ जोड़कर बोला पण्डित जी प्राण प्रतिष्ठा नहीं करा पायेंगे क्योंकि मन्दिर की छत गिर गई।

एक बार हमको फूलन देवी के इलाके में भेज दिया। डर लग रहा था कि कोई पूंछ न ले कि तुम ब्राह्मण हो कि ठाकुर पर मैंने ज्ञान विज्ञान कीबात कही लोगों को प्रवचन बहुत अच्छा लगा और मेरा जीवन बदलने लगा।

मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मुझे हाथ देखना आता है जीवन में मैं कभी पैसे नहीं लूॅंगा आप मुझे आशीर्वाद दे दो कि जो बोलूँ सही हो जाये। गुरुजी ने अपना हाथ दिखाकर कहा देख हाथ मुड़ने से रेखाये बनतीहैं इसमे कोई सार नहीं है हाँ ये ठीक है तू बाल देखकर भी कुछ बोल देगा तो सही हो जायेगा। मैं रायगढ़ में परिवार नियोजन अफसर था डाक्टर पी०सी०अग्रवाल जी ने पूछा दिलीप बता मेरे लड़का होगा कि लड़की अचानक मेरे मुँह से निकला डाक्टर साहब न आपके लड़का होगा न लड़की। बस तभी उसका छोटा भाई दौड़ता आया भावी सीढ़ियों से गिर गई और एवार्सन हो गया। उसकेबाद मैंने दो साल तक कोई हाथ नहीं देखा। डर लग गया मुँह से कुछ भी निकल जाता है गुरुजी सही कर देगे बात कठिन हो जायेगी।

सन् १९६१ में रीवा बस से आ रहा था ड्रायवर के पीछे की सीट पर बैठा था मैं पालथी मारकर बैठ गया और गायत्री मंत्र जपने लगा मैंने देखा गुरुजी माताजी बैठे हैं ओर माताजी कह रही हैं यह बेटा गया गुरुजी ने कहा नहीं अचानक बस एक पेड़ से टकरा गई ड्रायवर और मेरे अगल-बगल के कई व्यक्ति मर गये और मुझे कोई खास चोट नहीं आयी। जब गुरुजी ने मिला तो उन्होंने कहा यह तेरा नया जीवन है।

मेरी पत्नी पुष्पा ने गुरुजी से कहा गुरुजी इनका तबादला भोपाल से न हो बच्चों कीपढ़ाई करानी है गुरुजी ने कहा इसको जाने दे जहाँ तबादला हो पर तू कभी भोपाल से बाहर नहीं जायेगी। और वही हुआ लगभग तीस वर्ष से परिवार भोपाल ही है।

मेरा बड़ा लड़का विभू ने एम०एस०सी० किया और गुरुजी के पास आकर बोला कि मुझे बिजनिस करना है। उसने कहा मेरे पास कोई पैसा नहीं है। तुझे कुछ आता है गुरुजी अभी पढ़कर निकला हूँ पर मेरे पास हिम्मत बहुत है। गुरुजी ने कहा अच्छा हिम्मत तेरी बाकी सब मेरा। माताजी से एक रुपया ले ले और आज वह भोपाल में क्लास वन गवर्मेन्ट कान्ट्रेक्टर बनने के पास काफी पैसा कमाया और अब रसिया में यूक्रेन प्रांत में एक बड़ा विजनेस होटल चला रहा है वह हमेशा अपने वालिट में गुरुजी का एक रुपया रखता है और कहता है मुझे पैसे की कभी कमी नहीं पड़ती और कोई बड़ा मददगार मिल जाता है।

दिलीप कहता है कि मैं बिहार में एक बार एक अघोरी बाबा से मिला वह लाश के टुकड़े खाते थे मुझसे बोले बिटवा दूधवा मियेगा। मैं डरा बोला चाय पी लूँगा फिर पूँछा तू क्या करता है मैंने कहाँ मैं पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य का शिष्य हूॅं और हाथ जोड़कर बोले वे तो बहुत बड़े हैं मुझे तो उनके दर्शन करने में भी अभी तीन जन्म लगेगे।

जातक भृगुसंहिता में मैंने ५०० रुपये देकर अपनी कुण्डली दिखाई वे बोले तुम्हारे दो बेटों मेंसे एक का ही जीवन है पर गुरुजी हमें देवास में कह गये थे कि तेरे घर ठहरकर मैं तेरे बच्चों को पूरा जीवन दे जा रहा हूॅं। भृगु संहिता में यह भी बताया कि तुम्हारे बड़े लड़के का शादी के छै महीने बाद डायवोर्स हो जायेगा। पर शायद मेरा जप तप तो कम पर गुरुजी की कृपा आड़े आयी और मेरे लड़के का आशीर्वाद हो गया शादी पक्की हो गई अचानक लड़कीके पिता ने कहा कि शादी अक्टूबर में ही होनी चाहिए। जब कि मेरा लड़का रशिया से सितम्बर में आकर ली लौटा था इसलिये मैंने कहा कि मैं कोशिश करता हूँ पर उसको इतनी जल्दीआना कठिन होगा पर लड़की ने सीधा यूक्रेन एक फेक्स किया और टेलफोन पर बात भी की और तीन शर्ते रखी। १- शादी में सारी शर्ते हमारी माननी होंगी २- शादी के बाद तुम्हारे माता-पिता से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं ३- शादी के बाद में सीधे यूक्रेन जाऊँगी। विवाह केन्सिल हो गया।

दिनॉंक २०-१२-९८ को मैं देहरादून गया जहाँ सुभाष नागपाल तेगबहादुर रोड पंजाब नेशनल बैंक शाखा के पास उनके मकान पर मैंने इंटरव्यू लिया जो इस प्रकार हैः-

सुभाष- मुझे धर्म और महात्माओं पर न केवल अविश्वास था बल्कि घृणा भी। मैं उन्हें धोखेबाज समझताथा। मेरे एक मित्र चंदोला जी ने शान्तिकुञ्ज वा आचार्य जी की बहुत प्रशंसा की और कहा एक बार मिल तो लो उन्होंने ही मेरा हरिद्वार का टिकट भी कटाया मैं मिला तो ऐसा लगा कि मेरा इनसे कई जन्मों का सम्बन्ध है क्यों नहीं बता सकता। मुझे आचार्य जी का कामकाज बहुत अच्छा लगा। गुरुजी ने कहा तू अपनी बुराई गिना। मैंने कहा मेरे अन्दर सारी बुराईयाँ हैं मैंने शायद सारी गिना दी। पत्नी से लड़ने से लेकर बेईमानी, झगड़ा आदि सब। गुरुजी ने कहा तूने खून कितने किये। मेरे पैर से जमीन खिसक गयी गुरुजी ने कहा तूने खून कितने किये। गुरुजी ने कहा तूने खून कितने किये गुरुजी ने कहा तो तूने कुछ नहीं किया। गुरुजी ने कहा तू हमारा काम करेगा। मैंने कहा यदि उपयोगिता होगी तो मैं समर्पण भी करूंूगा। गुरुजी बोले आज से तुझसे कोई बुरा काम नहीं होगा। हमारे वे दोस्त जो सारे गलत कामों में मेरे साथ थे बोलते थे सुभाष सातवे रोज शराब पीने आ ही जायेगा। वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि मैं उनकी संगति छोड़ सकता हूॅं मेरे पिता जिनको बाबूजी कहता था बोले कि मैंने गुरुजी को देखा नहीं पर यदि सुभाष सुधर गया तो अवश्य ही मैं उनका कमाल का इंसान मानूगा। सुभाष को कोई बदल नहीं सकता।

मैंने नौ कुण्डीय यज्ञ कराया बहुत शानदार सारे फैक्ट्री के लोग आये बस उसके बाद तोमानो गुरुजी ने मेरे अन्दर काम करने की आग लगा दी।

गुरुजी के पास मैं कम से कम एक हजार आदमी उनकी समस्या सुल्झाने ले गया होऊँगा और मुझे याद नहीं आता कि किसी की भी समस्याा न सुलझी हो और मैंने निश्चय कर लिया कि मैं बस गुरुजी का काम करूूंगा। आर्डिनेस फेक्टरी जबलपुर में सिक्योरिटी आफीसर के पद पर था सोचा अपने को सस्पेण्ड करा लेता हूॅं पर फिर ख्याल आया कि निकाल दिया इसलिये काम कर रहा हूॅं। फिर निश्चय किया कि बीस साल के बाद एक दिन भी काम नहीं करूूंगा और मैंने बिना गुरुजी से कहे नौकरी छोड़दी साथियों ने कहा बीबी और दो बच्चे है तेरे चालीस दिन बाद कटोरा लेकर भीख मागेगा मेरी पत्नी के गहने बिक गये भैस पाली उसी से खर्चा चलाया जब मैं गुजरात और अन्य स्थान पर टोली में जाता रहा हूँ। सन् ८२ से ८७ तक टोली नायक बनकर टोली में गया। मैंने १२०० अखण्ड ज्योति के सदस्य और ३५० युगनिर्माण सदस्य बनाये। मेरी छोटी बहन प्रेम पाँचवे में पढ़तीथी मैंने ४० हजार में मकान बेच दिया मैंने दोस्तों से कहा तुम नहीं जानते मेरे गुरु कौन हैं। पत्नी रोती पिताजी समझाते फिर ये तय हुआ कि चलो गुरुजी से बात करते हैं जैसा वेकहेंगे। गुरुजी ने कहा तुझे वापस नौकरी पर भेज दूं मैंने कहा नहीं मैं आपका ही काम करूँगा फिर पत्नी से बोले तुझको ये मायके भेजता बोली हाँ खाना कपड़ा देता बोली हाँ अब परेशान तो नहीं करता नहीं इसे मेरा काम करने दे तू दखल मत दे मैं सब देख लूँगा और मुझसे बोले ते एक काम कर जमीन खरीद और मकान बनाकर बेच। मैंने काफी पैसा कमाया कई मकान बनाये और बेचे और जब पैसा बढ़ गया तो मैं शेयर भी खरीदने लगा पत्नी ने बहुत कहा कि गुरुजी ने आपको शेयर खरीदने के लिये आशीर्वाद नहीं दिया मैंने नहीं माना मेरा एक साथी ४० हजार रुपया लेकर भाग गया मुझे २० लाख रुपये का नुकसान हो गया। सुरेश नागर ने जब मेरे स्थिति बतलाई तो माताजी ने कहा जो लेकर भाग गया वह तो गया। पर मैं उसके पैसे का अच्छा इंतजाम कर दूंगी मेरी पत्नी ने एक साल में २४ लाख का अनुष्ठान किया और पूर्णाहुति में उधार लेकर चालीस हजार रुपया खर्च किये अब मेरी स्थिति बहुत अच्छी है लगभग ९० प्रतिशन उधार पट गया गेहने मकान एफडी काफी अच्छा है।

मेरे साड़ूभाई जो दुबई में रहते हैं उनके लड़के को ब्रेन ट्यूमर हो गया और माताजी के आशीार्वाद से ८ साल हो गये अभी ठीक है जबकि सारे इलाज व डाक्टर असफल हो चुके थे।

मेरे मित्र भोला सूरजपुर के उनको तेंदूपत्ते का ठेका मिला पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ने दस लाख रुपये लेकर लिया हुआ ठेका केंसिल करा दिया। हाईकोर्ट में भोला हार गया। मैं गुरुजी के पास गया वे सूक्ष्मीकरण साधना में थे। और जब लौटकर आया तो भोला सामने खड़ा था मैंने उसकी फाईल ली और फिर गुरुजी के पास जाने लगा तो मैंने कहा गुरुजी ने कागज मगाये हैं। गुरुजी से दो लाइन बात की गुरुजी ने कहा ठीक कर दूंगा। सुप्रीम कोर्ट में वह जीत गया और जब मुझे मिला तो साष्टांग प्रणाम करने लगा।

एक लड़की दुबली पतली मिडिल पास। गुरुजी के पास ले गया बोला गुरुजी इसे नौकरी दिला दो। और उसे एएनएम की नौकरी कुछ ही दिनों में मिल गयी।

२३-१२-९८ को मैंने प्रहलाद जी शर्मा बल्गेरिया टैक्समेको का इंटरव्यू लिया फोन नं० ५३९१७५३ उन्होंने बताया सन् १९७३ में एक दिन मैं पूजा कर रहा था अचानक मैंने एक जाग्रत स्वप्र देखा कि गुरुजी और माताजी बिल्कुल सुनहले रूप में आये और मुझे दीक्षा दी। जब मेरी आँखें खुली तो एक विशेषता मैंने देखी कि मेरे अँगूठे में अत्यन्त मनभावन सात्विक सुगन्ध आने लगी। जो सात दिन तक बनी रही। किसी भी तरह वह कम नहीं हुई और उन दिनों मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था केवल सुगन्ध का आनन्द लेता रहा। गुरुजी से मैं सन् १९७६ में मिला। मेरे छोटे बच्चों को गोद में लेकर गुरुजी ने कहा यह बेटा मुझे दे दे और तू मेरा काम कर। मैंने एक यज्ञ किया जिसका खर्चा सोलह हजार पाँच सौ अंठावन रुपये हुआ और मेरे पास केवल १५५५८ रुपये थे। मेरे आफिस का एक आदमी सबेरे पॉंच बजे दरवाजा खटखटाया और कहा एक बुड्डा आदमी धोती पहने मुझसे बार-बार कह रहा है कि प्रहलाद शर्मा को एक हजार रुपया देकर आओ और वह जबरदस्ती दे गया।

मैं एक जगह यज्ञ कराने गया तो जैसे ही मैं एक डब्बा उठाने के लिये खड़ा हुआ कि ऊपर का टाड़ पूरा का पूरा गिर पड़ा जिसमें लोहा लक्कड़ और आदमी की खोपड़ियाँ थीं। वह कोई तांत्रिक व्यक्ति रहा होगा। सबने सोचा कि मैं पूरी तरह तब गया होऊगा पर मैं कुछ सेकेण्ड पहले ही उस स्थान से हट गया था।

एक दिन यज्ञ में मूसलाधार वर्षा हो रही थी मैं ढपली लेकर खड़ा हो गया और एक गाना गाया एक तुम्ही आधार सदगुरु कार्यक्रम में लगभग २५० महिलायें और पुरुष थे अचानक पाँच मिनट के अन्दर न केवल पानी पूरी तरह रुका बल्कि धूप छा गयी।

सन् १९६६ में गुरुजी लखनऊ आये और ५९सी मसानीनगर सुन्दरबाग हमारे मकान में दो दिन रहे उस समय हमारी काकी सास कलकत्ते से आयी थीं उनके पति हमेशा से पेप्टिक अल्सर के बीमार थे और बहुत दर्द होता रहता था गुरुजी ने कहा आज के बाद कभी दर्द नहीं होगा। २७-१२-९८ को श्रीमती पल्ली गुहा ने बताया कि उनके पति को २० साल तक जीवन के अन्त तक कभी दर्द नहीं हुआ।

बानो बहन जे भट्ट १२ बी ब्लाक ५ रूम २ कलकत्ता-७ सन् ७२ में शान्तिकुञ्ज आयी थीं। गुरुजी का भाषण सुनने पीछे बैठी थीं जब गुरुजी आये तो उन्होंने उनको सामने बैठने के लिये कहा ताकि ठीक सुन भी सकें और देख भी सकें। भाषण पश्चात् बानो बहन ने गुरुजी से अपनी साधना के कुछ अनुभव बताये। तो गुरुजी ने कहा कि २० वर्ष तक यही साधना अपने अखण्ड दीपक पर करती रहो तुमको वाकसिद्धि प्राप्त होगी। और अब वह इस शक्ति से सम्पन्न हैं। अभी-अभी पुनीत भाई संचानी से जयराम बाटी एक के पहले कहा कि इस यज्ञ में तुमको गायत्री माँ के दर्शन होंगे दिनॉंक २५-१२- ९८ को इस १०८ कुण्डीय यज्ञ की भीड़ में पुनीत मुझसे बोले चलिये डाक्टर साहब चाय पीते हैं मैंने कहा अच्छा और हम लोग साथ तीन कदम चले होंगे कि कही वह छूट गये। और चाय की दूकान पर पहुॅंचे एक पंद्रह सोलह साल की लड़की पुनीत भाई बतलाते हैं जिसके चेहरे पर एक अपूर्व सात्विकता ओर आँखों मेंतेज था मेरे पास आयी और बोली मुझे चाय पिलाओ उसने चाय पी और कहीं दूर चली गयी। दिखी नहीं। पुनीत जी कहते हैं मेरे अन्दर ऐसा अनुभव हुआ कि वह गायत्री या काली माँ का ही रूप था।

दिनेश कुम्हरा और उनकी पत्नी गुरुजी से मिलने गये। तो सुप्रीम कोर्ट के वकील आसरे जी से बोले कि तूने शेर देखा है। यह मेरा शेर है आगे क्या काम करता है देखना। और कुम्हरा जी व उनकी पत्नि से बोले कि अभी मैं तुझे निचोड़ूगा। बात आयी गयी और हो गई और एक दिन वह अधिक ही निचोड़े गये। एक बड़े एकसीडेंट में उनकी बेटी की मृत्यु तथा उनकी दो तीन हड्डिया टूट गयी।

हँसमुख रावल जो चेयरमेन मसूरी नेशनल स्कूल के हैं उनने मुझे बतलाया कि एक रात मैं अपने बँगले से निकलकर करीब एक दो बजे में घूम रहा था बिल्डिंग बन रही थी अचानक गुरुजी सामने आकर खड़े हो गये। मैं सोचने लगा कहाँ बिठाऊं क्या सत्कार करूं पर गुरुजी बोले देख मैं तुझे ये बिल्डिंग का बनाने का प्लान समझाने आया हूँ। वे कहते हैं कि वह न मेरा कोई सपना था और न कल्पना। मैंने साक्षात् गुरुजी को देखा जब मैं गुरुजी से मिला तो उन्होंने कहा कि तेरे इस स्कूल को बननवाने मैं पूरी तरहतेरे साथ रहा ऐसा बताते हैं कि हँसमुख रावल जिनकी पत्नी नेरोवी में एडवोकेट जनरल हैं गुरुजी को एक करोड़ रुपया देना चाहती थी पर गुरुजी ने कहा तुम प्रवासी भारतीय हो लंदन के नागरिक हो तुम भारतीय संस्कृति आधारित एक शानदार लड़कियों का स्कूल बनवाओ।

हँसमुख रावल जी ने एक दिन मुझे बताया कि मैं अफ्रीका में था मेरा एक्सीडेंट हो गया। घुटने की हड्डी टूट गई (पटेला) बिना किसी सूचना या टेलीफोन के तीसरे दिन मेरे पास गुरुजी का पत्र आया कि तुम बिल्कुल चिन्ता नहीं करना तुम पूरी तरह से ठीक हो जाओंगे अपना काम करते रहो।

गुरुजी न केवल साधारण व्यक्ति थे लेकिन अतिसाधारण व्यक्ति थे। एक दिन वो मुझसे कह रहे थे कि मैं उज्जेन में अपने दोस्त के घर गया। मुझे पढ़ने में दिक्कत हो रही थी मेरे दोस्त ने मुझे एक चस्मा दिया कहने लगा मेरे पास यह अतिरिक्त पड़ा है उपयोग करके देखो। मुझे उससे काफी अच्छा दिखने लगा कई साल तक मैंने उसी चस्मे का उपयोग किया।

श्री अरविंद दत्ता और सिद्धार्थ ये दोनों नियमित एक हजार और पाँच सौ रुपये डोनेट करते हैं और मुझे भी एक हजार रुपया भेजते हैं जबकि मैंने कहा कि मेरे पास अपने खर्च सेकाफी अधिक पैसा है। अरविंद ने बतलाया पिताजी मैं आपको पैसे नहीं देता बल्कि गुरुजी ने मुझसे कहा था कि जो अपने पिताजी को मदद नहीं करता वह अगले जनम में बैल बनता है इसलिये सिर्फ अपने को बैल बनाने से बचना चाहता हूॅं।

सन् १९६६-६७ में अरविंद ८ साल और सिद्धार्थ चार साल का था गायत्री तपोभूमि में फूल तोड़ने की कोशिश कर रहे थे पर टूट नहीं रहे थे उधर से माताजी आयी अरविंद माताजी से बोला माताजी आप पेड़ पर चढ़कर फूल तोड़ दो माताजी बोली फूल तो कैसे तोड़ू कल इसी समय यही पर तुम दोनों मिलना मैं बहुत फूल दूंगी। दूसरे दिन बहुत सबेरे नहा धोकर पहले से ही खड़े हो गये। माताजी आयी याद से माला लायी थीं दोनों को माला पहला दी और अकड़ते हुये दोनों बेटे बोले माताजी ने माला पहनाई है यह कहानी लगभग २५ वर्ष बाद माताजी को शान्तिकुञ्ज में सुनाई। उसी समय मैंने पास खड़ी गुड़िया को दिखाकर अरविंद से कहा इन्हें पहचानते हो चुप रहा। मैंने कहा यह सतीश की लड़की है बोले अच्छा यह साधना सर पटकती रहे जन्म भर सिद्धि ऐसी नहीं भी कहीं पायेगी क्योंकि मैं केसिट भेजता रहता हूॅं।

जूनागढ़ के पथिक जी नेअपने सारे गहने बर्तन बेचकर प्रसिद्ध शक्तिपीठ संगमरमर की बनवाई। जब गुरुजी वहाँ पहुॅंचे तो कुछ थोड़ा सान से कहने लगे कि गुरुजी यह शक्तिपीठ मैंने बनवाई है। यद्यपि गुरुजी उनके शक्तिपीठ की कई जगह खूब-खूब प्रशंसा करते थे पर उस दिन बोले पथिक ये दीवाल ठीक कराले और कई साल तक वह दीवाल ठीक नहीं हुई।

अभी जयराम बाटी यज्ञ में गोवर्धन भाई के यहाँ पुनीत भाई और रमेश भाई मुझे ले गये। ये एक हजार करोड़ रुपये के मालिक आज भी हैं तथा ब्रिटिश काल में राइस किंग कहलाते थे। साधना सम्बन्धी उनसे चर्चा हुई। उनकी उम्र लगभग ८०, ९० वर्ष होगी। मैंने पूछा भौतिक उन्नति तो आपने की लेकिन आप यह बताये कि इतने लम्बे समय से आपकी साधना से आपके जीवन में क्या अन्तर आया और क्या अन्तर आता है। उन्होंने कहा कि जब कभी मेरे सामने लोभ स्वार्थ या गलत फायदे की इच्छा उठती थी तो अन्दर से जैसे ट्रेफिक लाइट चमकती है वैसे पहले पीली और फिर लाल लाइट आ जाती यानी हर समय सावधान करती संभल जाओ आगे तुम जैसा चाहो। और मेरा विश्वास है यह केवल साधना का फल है। इन्होंने दो लाख रुपये जैराम बाटी में दिये १०८ कुण्डीय यज्ञ में दिये।

सन् १९९० में मैंने एक इंटरव्यू ओमप्रकाश भाई साहब याने गुरुजी के बड़े पुत्र जिनकी उम्र उस समय ५७ वर्ष थी श्री जितेन्द्र तिवारी जो कि रामकृष्ण मिशन बैलूर के साधक रहे हैं उम्र ३२ वर्ष और एक अच्छे साधक माने जाते हैं और चार वर्ष से चंद्रायण व्रत व तपस्वी स्तर के ज्ञानी वेदान्ती हैं। १३ वर्ष से रह रहे हैं की बातचीत रिकार्ड की।

जितेन्द्र- गुरुजी को आपने पिता के अलावा उनमें अध्यात्म क्या देखा?

ओमप्रकाश जी- मैं एक साधारण व्यक्ति हायर सेकेण्डरी स्कूल का टीचर पोलिटिकल साइंस पढ़ाता हूॅं यदि आप मुझसे एक ऋषिपुत्र की तरह पूछेंगे तो मैं कुछ नहीं जानता। मैं अध्यात्म समझता नहीं इसलिये पिताजी के अध्यात्म को मैं क्या जानू। मैं यह जानता हूॅं कि पिताजी मेरे उठने के बहुत-बहुत पहले उठ जाते थे कहते हैं दो बजे और मेरे सोने के बाद ९ बजे के पहले नहीं सोते थे। पिताजी जप भी बहुत करते थे ओर पढ़ने का उन्हें शोक था।

जब मैं सन् १९३१ में पैदा हुआ तब पिताजी को स्वतंत्रता सेनानी की वजह से डेढ़ माह पूर्व ही जेल हो गई थी। उस समय श्रीभगतसिंह को फांसी लगी थी और नरम दल के काफी सदस्य गरम दल में आ गये थे।

जितेन्द्र- पिताजी की तपस्या के विषय में कुछ कहें।

ओमप्रकाश जी- देखिये एक बात मैं साफ कहना चाहता हूॅं कि मैं चार चीज में विश्वास नहीं करता।

१-आत्मा

२-परमात्मा

३-भाग्य और

४-पुनर्जन्म

१-यदि मनुष्य के सद्गुणों को आत्मा कहते है तो ठीक है पर कोई सर्वशक्तिमान नियम से परे कुछ है मैं नहीं मानता।

२-परमात्मा यदि नियम है तो मुझे विरोध नहीं पर यदि कोई शक्तिशाली व्यक्ति है तो मैं नहीं मानता। भाग्य यदि कोई लिखता है तो मुझे विश्वास नहीं। पर यदि वह परिश्रम का फल है तो मुझे स्वीकार है। पुर्नजन्म को मैं नहीं मानता पर जन्म तो सबो के सामने साफ ही है। जहाँ तक तपस्या का सवाल है मैं कमरतोड़ परिश्रम को तपस्या कहता हूँ और इस प्रकार की तपस्या पिताजी हर काम में करते थे। चाहे वह बातचीत करना हो पूजा हो सलाह हो देश सेवा हो व्यवहार हो या योजना। यदि नैतिकता ओर शालीनता अध्यात्म है तो वह उनमें थी। घर पर खाने की कमी हो तब भी एक-एक पैसे मूल्य की किताब का प्रकाशन उन्होंने किया मैं उसे तपस्या मान सकता हूँ।

समाज आज जिसे धर्म कहता है मेरा उससे कड़ा विरोध है स्टेलिन की पुत्री स्वेतलाना अमेरिका चली गयी। वहाँ उसका एक इंटरव्यू लिया गया कि तुम विश्व की महानतम नेता की पुत्री हो अपने पिता के विषय में क्या कहना है। श्वेतलाना बोली कि स्टेलिन विश्व के क्रूरतम व्यक्ति हैं। मैं जब चार वर्ष की थी तब उनसे परेशान होकर मेरी माँ ने आत्महत्या कर ली। पिता यदि अपने बच्चे को सीने से चिपटाकर कम्युनिज्म के विषय में कुछ विरोध दिखाता है तो माँ का यह कर्तव्य है कि वह सूचना दे और पति को कड़ी सजा दिलाये। ये कम्युनिज्म है। लगभग १० हजार व्यक्तियों को मेरे पिता ने इसलिये कत्ल करा दिया कि वे कम्युनिज्म विरोधी थे या कहीं दूर दराज विरोध करने की सम्भावना थी। दुनियाँ उन्हें सर्वहारा कहे मैं नहीं। न मैं ऐसा पार्टी को मानता हूॅं न मैं ऐसे धर्म को जो अपनापन और प्यार खो दे।

मैं अपने में अध्यात्म में लेश मात्र भी नहीं मानता पर जब कभी मैंने लड़के-लड़की, बुड्डे-बुड्डी को घर पर पढ़ाया है तो न कभी मैंने ट्यूशन ली और शब्दों के बीच में जो पढ़ाया है वह केवल वही है जिसको मैँने अपने जीवन में आचरण में उतार लिया है। ओमप्रकाश भाई साहब ने जब देखा कि उनके पढ़ाये बच्चों को नौकरी नहीं मिलती तो स्वयं रेडियो ट्राजिंस्टर रिपेयर करना सीखा और अपने स्कूल के बच्चों को फ्री रिपेयर करना सिखाया ताकि अपने पेरों पर खड़े हो सकें।

एक प्रश्र मैंने भी पूछा क्या हमारी तरह आप अपने पिताजी से कष्ट दुख दूर करने सफलता प्रमोशन पाने की बात करते हैं। उन्हेांने कहा मैंने जब कभी प्रमोशन की बात की तो गुरुजी ने कहा योग्यता बढ़ाओ डिवीजन सुधारो हाँ अपने सारे कष्ट दुख माताजी से जरूर कह देता था। और उन्होंने मुझे माँ का ही प्यार दिया। मेरी गलतियों पर भी वो केवल प्यार ही देती रही। मेरी माताजी की मृत्यु तो बहुत कम उम्र में ही हो गयी थी।

सन् १९८९-९० में मैंने एक इंटरव्यू श्री पहाड़िया जी का लिया जो इस प्रकार है यह मेरे पास कैसेट में रिकार्ड भी है।

वे कहते हैं कि गुरुजी ने मुझे बतलाया कि किसी पिछले जन्म में उनका बड़ा भाई रहा हूॅं ओर मैं बेईमान था उनके हिस्से की जमीन व पैसा मैंने ही हड़प लिया इसलिये वैश्य परिवार में पैदा हुआ हूॅं। यह बात उन्होंने तब बतलाई जब सन् १९४० में अचानक मेरे पास अखण्ड ज्योति आई कि हम चार भाई थे ओर अब मैंने फिर तुमको ढूढ़ लिया है। उस समय अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य एक रुपया पचास पैसा था। उसमें यह अपील भी थी कि इसमें क्या विषय और होना चाहिए सुधार या कमी की सलाह दें। मैंने लिखा मेरे पास पैसे नहीं है जवाब आया पहाड़िया जी यह व्यावसायिक पत्रिका नहीं मैँ तो परिवार बनाना चाहता हूॅं जिसमें प्रेम हो सहयोग हो। पत्रिका आती रही।

जनवरी सन् १९४० में फ्रीगंज आकरा के विश्राम घाट के पास १० रुपये माह किराये का एक मकान लेकर गुरुजी रहने लगे। एक व्यक्ति सारे पते सामान पैसे लेकर भाग गया और उसने अपनी पत्रिका गायत्री नाम से निकाली। फिर गुरुजी ने मकान बदलकर १५ कमरों वाला १५ रुपया महीना का घियामंडी में मकान लिया। जो एक विधवा ब्राह्मणी का था। उसने पहले बता दिया था कि इसमें कोई रहता नहीं क्योंकि भूत रहता है।

९ जून १९४३ में मैँ गुरुजी से मिलने गया। कारण यह था कि किसी पण्डित जी ने मुझे कहा कि तुमको साढ़े सात साल का शनि लगा है। और तुम जल्दी मर जाओगे। मैंने दीक्षा भी नहीं ली थी तो मेरी माँ भी पीछे लगा करती थी। मैं एक साथी के साथ बिना कुछ सूचना दिये मथुरा गया। किराया ५ रुपये था गुरुजी की परकाया प्रवेश मैस्मेरेजिम के अभूतपूर्व उपाय पढ़कर मैँ उन्हें कोई तांत्रिक समझता था। स्टेशन से दो आने किराये का ताँगा और १० पैसे में खाना खाकर हम पहुँचे। उन दिनों घियामंडी में केवल घी और भूसे की दूकान हुआ करती थी। बड़ी मुश्किल से गली मैं दरवाजा मिला। कुण्डी खटखटायी आचार्य जी लालटेन लेकर नीचे उतरे बोले पहाड़िया जी आ गये। हमारे हाथ से थेले गिर पड़े साथी बोले यह तो बड़ा जादूगर है। अपने ने तो कोई सूचना दी नहीं। गेट में घुसते ही एक काली गाय देखी उसी को जौ खिलाकर अपच जौ के कण व दूध की छाछ पर गुरुजी ने २४ साल २४ लाख का अनुष्ठान किया था। गुरुजी ने माताजी से कहा तुम्हारे दो बच्चे आ गये इनका इंतजाम करो। खाना रहना वहीं हुआ। गुरुजी ने मुझे पूंछा जन्मपत्री लाये हो मैंने दिखाई। गुरुजी बोले शनि ग्रह करोढ़ो मील दूर है और इन करोढ़ों की आबादी वाले विश्व में तुम दो कोढ़ी के आदमी पर शनि की क्यों कर निगाह होगी। उन्होंने जन्म पत्री फाड़ दी कि आज से मैंने शनि हटाकर ब्रहस्पति बैठाल दिया है। अब मेरी बात समाप्त। तुम मेरा राई भर काम करना और मैँ तुम्हारा पहाड़ भर काम करूॅंगा। मैंने कहा यह तो बहुत अच्छा आप पहाड़ भर काम करो। पहले मेरा राई भर काम बतादो। गुरुजी बोले नं०-१ यह पेटन शर्त पहनना छोड़ दो धोतीकुर्ता पहलो २- कोई बुरी आदत जुआ शराब इधर उधर जाना बन्द करो।नहीं तो लोग क्या कहेंगे यह गायत्री परिवार का गुरुजी का चेला है। ३- हमेशा अखण्ड ज्योति पास रखो पढ़ो और सदस्य बनाओ। मैं तुम्हारे तीन जन्म की जिम्मेदारी लेता हूॅं। लड़के लड़कियों की शादी कामधंधा प्रगति आदि। तब मुझे सिविल कोट्र में ५ रुपया १३ आने महीना मिलती थी। गुरुजी बोले कोर्ट कचहरी थाना यह रिश्वत के स्थान है तुम फंस जाओगे आटे दाल की दुकान खोल लो। मुझे आठ दस रुपये माह फायदा होने लगा। नगर पालिका सदस्य के लिये मैं खड़ा हो गया। वकील बलवीर सिंह के कहने पर। जिनके पुत्र लखनऊ में मिनिस्टर हैं। मैँने गुरुजी को कोई खबर नहीं की। रिजल्ट निकलने के पहले जब मैंने खबर दी तो उत्तर आया कि तुमने बहुत गलत काम किया तुम पंद्रह बीस बोट से ससम्मान हार जाओगे। मैं तेईस बोट से हार गया। लेकिन चेयरमैन कांग्रेस का था और अधिक सदस्य दूसरे पार्टी के। इलेक्शन केंसिल हो गया। अब कि मैंने गुरुजी को पहले ही पत्र लिख दिया पत्र का जवाब आया तुम ऐसे ही जीत जाओगे। हमारे विरोध में जो खड़ा हुआ था उसने नाम वापिस ले लिया मैं सदस्य बन गया और छै महीने नगरपालिका प्रेसीडेंट रहा हूॅं।

गुरुजी का पत्र आया तुम्हारी मौत नब्बे दिन में है। मैँ इस पत्र के साथ आ रहा हूॅं। तुम संभलकर चलाना और खासकर संभलकर चलना और खासकर ट्रक आये तो सीधे फुटपाथ पर चढ़ जाना। आठ जूर को एक शादी में जाना था मैं साईकिल में गया ट्रक के दो पहियो के बीच में आ गया। ट्रक मालिक व साथियों ने खेचकर निकाला सोचा था शायद मर गया पर मुझे कोई चोट नहीं लगी एकाध स्थान पर टिंचर लगाकर मुसलमान ड्रायवर ने वही नमाज अदा की और साईकिल ठीक करा दी। मैंने घर आकर पत्र देखा वह नव्वेवा दिन था गुरुजी को पत्र लिखा। उत्तर आया मैं वापिस आ रहा हूॅं पूरी उम्र जियोगे।

मेरे और गुरुजी की उम्र लगभग बराबर थी। दो लड़के एक लड़की दोनों के दोनों की पत्नी का देहान्त हुआ पर गुरुजी ने मुझसे कहा कि मुझको तो गाड़ी चलाने के लिये शादी करनी होगी पर तुम मत करना।

बाँदा में गुरुजी का पत्र आया कि गायत्री माँ की प्राणप्रतिष्ठा करना है जिसमें २४०० तीर्थाे का जल रज तथा बारह बाल ब्रह्मचारणियों की पदरज लानी है।

राजापुर गाँव जहाँ तुलसीदास जी रहते थे बीस किलोमीटर दूर पर बाल्मीकि आश्रम तथा मनवाड़ा चरवाहा एक सिद्ध रहते थे जिनके पास चीते और साँप भी आते थे तथा झाँसी से बाँदा जो २०० किलोमीटर दूर था वहाँ पालिया का जल कहते हैँ कि जब प्रलय होगी तक यही से जल उभरेगा। उस स्थान जहाँ भरत जी रामचंद्रजी से मिले थे एक कुये में १२०० तीर्थाे का जल एकत्रित था। वहाँ का जल आदि सारी व्यवस्था करने के गुरुजी के निर्देश हुये। एक बाबूलाल जैन थे उनकी लड़की का नाम था विमला देवी। बाँदा में मैं वहीं जन्मा उन्हें नहीं जानता था पर गुरुजी ने मुझे निर्देश दिये कि उनकी इस लड़की पदरज लाना है। मैँ उनके पिता के पास गया तो बोले उसकी बात न करना। मैँ शादी की बात करता हूॅं तो मुझसे बोलती ही नहीं। मैंने कहा मुझे केवल मिलादें रविवार को मैं गया यह लड़की सूर्य प्रणाम कर रही थी बोली कौन मैंने कहाँ एक आध्यात्मिक काम है उसने बैठाया पूंछा मैंने कहा ग्यारह बालब्रह्मचारिणियों की पदरज आ गई है यदि तुम नही दोगी तो तुम्हें भी पाप होगा और सारा प्राणप्रतिष्ठा का काम रह जायेगा। एक बहुत बड़े ऋषि ने यह माँग की है पह दाहिने पैर के अंगूठे का धोवन देने को तैयार हो गई पर पैर तो पहाड़िया जी के हाथ में था। गुरुजी के माँग पर १५० से २०० पार्सल रोज आते थे अधिकांश नदियों का जल १२४ करोड़ मंत्रलेखन तथा हर दूसरे तीसरे दिन गंगोत्री का जल गुरुजी के लिये २४०० तीर्थाे के जल की व्यवस्था की गयी हम लोगों ने भी पाँच दिन का उपवास किया। दूध मेवा ओर फल की व्यवस्था थी। बनारस के पण्डित मंत्र जपते-जपते पसीना हो गये पर अरणिमन्थन सफल नहीं हुआ। पर जब गुरुजी ने नारियल की जटा लेकर दो चन्दन के काष्ठ रेशम की डोरी से मथे तो अग्रि प्रकट हो गयी। गुरुजी ने बताया था मुझे कि अग्रि src='प्रज्वलित गुरुजी के गुरुजी के संरक्षण में हुआ और यही अग्रि सारे अश्वमेध यज्ञ में स्थापित की गई।

कार्यक्रम में रोज चार टीन दूध आता था एक दिन २ टीन ही आया। मेरे साथी ने कहा आधा दूध आधा पानी मिलाकर काम चलाया जाये। मैं गुरुजी के पास गया। गुरुजी ने कहा जाओ व्यवस्था हो जायेगी। रात ८ बजे चार आदमी आये गुरुजी ने कहा था उनसे बात न करना केवल प्रसाद देना। और वे चार टीन दे गये। सन् १९५६ में नरमेध यज्ञ हुआ जिसमें विधान सभा स्पीकर आयंगर जी आये थे ओर राधेश्याम तर्ज वाले रामायण पढ़ने गुरुजी ने मुझे एक चिट लिखकर सूचित किया कि तीन हिमालय से महात्मा आयेंगे उनसे बात नहीं करना भोजन कराना। हमारे एक साथी ने उनका पीछा भी किया पर वे गायब हो गये।

यह बात मुझे पहाड़िया जी ने बतलाई जो मेरे पास केसेट में रिकार्डिड भी है वे कहते हैं कि गुरुजी ने आँख की शक्ति पर एक लेख लिखा जिसे दिखाने वो वैज्ञानिक समाज में अमेरिका गये और एक लोहे के छड़ को लाल करते ही वैज्ञानिको ने शक्ति को स्वीकारा और रोक दिया। उन्होंने एक टन वजन के पत्थर को भी हिलाकर दिखाया ऐसा वे कहते हैं।

लालता प्रसाद जी थे उनसे कहा आज नहीं कल जाना। और सचमुच उस दिन वाली बस पलट गयी। एक दिन में भी शान्तिकुञ्ज गेट पर सप्तऋषि आश्रम से आने वाली बस की प्रतीक्षा कर रहा था कि गुरुजी ने ऊपर से बुलाया और कहा कोई भी जरूरी काम हो पर आज नहीं जाओ मैंने पता लगाया आगे जाकर वह बस पलट गयी थी।

बाँदा में पहाड़ी पर आये जो बहुत चमत्कार दिखाते थे और बहुत सारे सेठ उनको घेरे रहते थे। वे अखण्डज्योति पढ़ते थे मेरा पता जानने पर सउन्हेांने कहा कि यदि पहाड़िया जी खाना बनाकर खिलायेंगे तो ही चातुर्मास यहाँ करूंगा। मै राजी हो गया। मुझसे एक दिन कहा सोलह सितम्बर को कचहरी से अपने कमरे से बाहर नहीं निकलना ओर उस दिन कलेक्टर के यहाँ आयप्रोसेशन के आन्दोलन में पत्थर फेकना लाठी चलना ओर गोलियाँ भी चली मैँ उस दिन भी खाना देने पहुॅंचा। मुझसे साधूजी ने कहा कि तुम जो चाहो असम्भव से असम्भव चीज माँग लो। मैंने कहा यदि माँगना ही होगा तो अपने गुरुजी से माँग लूंगा वे वोले प्रसाद तो लोगे मैंने स्वीकारा। उन्होंने कहा इसमें पानी पीना आँख धोना हमेशा स्वस्थ रहोगे।

मैं अपनी लड़की की शादी के लिये परेशान थाा गुरुजी को पत्र लिखा तुम्हारे मकान के पीछे ही लड़का है जो नवरात्रि में आयेगा। फोफेसर है उससे शादी हो जायेगी और यह शादी मैँ करूंगा। शादी में मैंने पाँच सात हजार रुपया खर्च किया होंगे पर बाद में मेरे पास लगभग उतने ही रुपये बच गये। मैं बहुत परेशान था मैं एक एक डेड़ डेड़ घण्टे टायलेट में बैठा रहता था कि क्या गड़बड़ी हो गई कहीं हमारे जवाई लोगों ने पैसे तो नहीं रख दियो परन्तु जब गुरुजी को पत्र लिखा मैंने तेरी लड़की की शादी की है तू चिन्ता मत कर।

श्री जे०सी० पंत सेक्रेट्री गवर्मेट आफ इंडिया इन्होंने मुझे ब्रह्मवर्चस में बतलाया कि गुरुजी ने मेरी रक्षा की मैं गुरुजी के पास आया ओर बतलाया कि गवर्मेट मुझे सरकारी काम से लंदन भेज रही है गुरुजी बोले अपनी पत्नी को ले जा। गुरुजी उसका खर्चा सरकार नहीं देगी। तू नहीं ले जा सकता क्या। ले जा सकता हूॅं तो ले जा। मुझे रस्ते में हार्टअटैक हो गया पत्नी मेरे साथा थी सारा खर्चा सरकार ने उठाया और मेरे दिल की धमनी का ब्लाक ९८ प्रतिशत था इसलिये बिना आपरेशन के बेलूनीग से मेैं ठीक हो गया। यह सब गुरुजी के आशीर्वाद की योजना थी जे०सी०पंत वो व्यक्ति है जिन्होंने मिशन का बहुत बड़ा काम किया विभिन्न विभाग के अफसरों को सरकारी खर्च में मारल ट्रेनिग के लिये शान्तिकुॅंज में भेजा।

सवाई माधोसिंह राजपुरोहित बंबई कोठी। चिराला अपने रिकार्डिड इंटरव्यू में कहते हैं कि मैं चमरसा जालौन राजस्थान का निवासी हूॅं। सन् १९८४ में आश्विन की नवरात्रि में शान्तिकुञ्ज गया। उन दिनों गुरुजी सूक्ष्मीकरण में थे। और ९ दिन में एक दिन मिला करते थे। मैं सबेरे नहीं पहुँच पाया। माताजी से मिलने की प्रार्थना की तो माताजी ने कहा चूक गये तो गये मैं बहुत दुखी होकर नीचे आया पर माताजी ने मुझे बुलवा लिया। और गुरुजी के पास भेज दिया। यद्यपि शिवप्रसाद मिश्रा जी ने कहा था कि केवल दर्शन करके लौटना मैं पत्नी एवं बच्चे समेत जब पहुँचा तो अवर्णनीय आनन्द एवं कल्पनाओं में डूब गया मैं पागल सा हो रहा था जैसे कोई बछड़ा माँ से मिलकर अनुभव करता है। मिश्रा जी ने मेरी माँ का हाथ पकड़कर लौटने को कहाँ तो गुरुजी नेखूब डाँट लगाई और कहा बैठने दो इनको। बड़े प्रेम से गुरुजी ने स्वास्थ्य, बाल बच्चों का कामकाज सब हाल पूछा ओर कहा कुछ भी माँगो मैंने कहा श्रद्धा भक्ति देना गुरुजी गुरुजी बोले कोई तकलीफ बोलो मैंने कहा पण्डित लोग विरोध करते हैं गुरुजी बोले दीपयज्ञ करना विरोध समाप्त हो जायेगा। गुरुजी ने कहा कोई कष्ट बतलाओं मैंने कहा गुरुजी मेरा एक सवा साल का बच्चा है उसको मद्रास डाक्टर विक्टर सालोमन को दिखाया और उन्होंने जवानी एवं लिखकर कहा कि इस बच्चे पर कुछ खर्चा दवाई या जाँच पर मत करना यह पाँच साल की उम्र से ज्यादाा नहीं बचेगा। गुरुजी ने कहा कोई चिन्ता नहींकरो और मेरा बच्चा बिल्कुल ठीक है बहुत अच्छा पढ़ता है खूब दौड़ता है यद्यपि उसके छाती पर कान रखने से खाली मसीन सी आवाज आती है उसके एक बाल्व नहीं है पर गुरुजी के आशीर्वाद के बाद मैंने दो रुपये भी खर्च नहीं किये जबकि उसके पहले हमारों रुपये खर्च करने के बाद पूरी निराशा मिली। बच्चा अब बारह तेरह वर्ष का है।

मैं अपनी माँ पत्नी को लेकर शान्तिकुँज पहुँचा और मैंने प्रतिज्ञा की थी कि हमारा प्रिय खाना गुड़ आटा घी तब तक नहीं खाऊँगा जब तक गुरुजी से नहीं मिल लूँगा।गुरुजी ने बुलवाया। मैंने बताया कि मेरी मातीजी सारी तीर्थाे की यात्रा करना चाहती है गुरुजी ने कहा शान्तिकुञ्ज आकर सारे तीर्थाे की यात्रा हो गई और सचमुच माताजी के अन्तिम समय के सात दिन मैं पहुँच गया और मैंने गुरुजी की किताब धर्मतंत्र से लोकशिक्षण और मेरी नोटिंग से ही पूरे संस्कार कराये। माताजी अनुभव करती रहीं शान्तिकुँज में मुझे सारे तीर्थाे के दर्शन का आनन्द ओर फल प्राप्त हुआ है।

मनीष राम साहू ने बताया जो मेरे पास रिकार्डिड है कि डाक्टर राजाबल जी अपनी पत्नी और बेटी के साथ गाड़ी में जा रहे थे। उनका एकसीडेंट हो गया ओर डाक्टर ने उनको मृत घोषित कर दिया। उन्हें पीले कपड़े से ढक दिया गया और वे जनप्रिय होने के कारण दर्शन की भीड़ का लाईन लग गयी। इतने में एक साधू आया और उसने कपड़ा उठाकर बोला कि चिन्ता मत करना और चला गया। थोड़ी देर में उनकी सांस चलने लगी और वे स्वयं अपने ही उपचार की दवाई बताने लगे बाद में गुरुजी का फोटो देखकर उन्होंने कहा कि यही व्यक्ति मुझे बचाने आये थे उसके बाद से गायत्री परिवार के कर्मठ कार्यकर्ता बन गये और अश्वमेध यज्ञ में ३ हजार बोरी गेहॅंू उन्होंने इकट्ठे किये थे। इसी प्रकार हेमनाथ शर्मा को मृत घोषित किया भोषा जयपुर में उनकी पत्नी किसी तरह न मानते हुये गुरुजी से टेलीफोन पर सम्पर्क साधा। गुरुजी ने कहाँ कोई चिन्ता की बात नहीं। वे बोली गुरुजी चिन्ता की बात क्यों नहीं उनको तो मृत घोषित कर दिया है। गुरुजी ने फोन पर कहाँ तुम जाओ सब ठीक हो जायेगा। और वे धीरे-धीरे पूर्ण स्वस्थ हो गये।

डॉ० फूलसिंह यादव मेडीकल स्पेशलिस्ट बारा जिला कोटा कहते हैं कि मुझे बड़ा करने का पूरा श्रेय मेरे दादा को है। मुझे गुरुजी और अपने दादा की शक्ल बिल्कुल एक जैसी मालुम पड़ती रही। हमारे दादा की आँखें भी योगी जैसी थी वह केला देवी की पूजा करते थे मैं जब जनवरी १९७६ में मिला तब ब्रह्मवर्चस शिविर चल रहा था अक्षय तृतीया का दिन था मुझे श्रद्धा जमानी नहीं पड़ी अपने आप जम गयी। मेरे एक साथी शिवदयाल जी को १३ साल से कोई बच्चा नहीं था उनके एक मित्र को गुरुजी ने डिब्बी में एक दवा दी और अपनी पत्नी को देने को कहा। पर वे बहुत बुद्धिवादी थे इसलिये आधी दवा उन्होंने शिवदयाल जी को दी और आधी अपनी पत्नी को। पर गुरुजी को यह सब कुछ लिख दिया गुरुजी नाराज तो हुये पर फिर उन्होंने कहा कि आगे ऐसा मत करना और दोनों को ही यथा समय पुत्र की प्राप्ती हुई। मैं गायत्री परिवार का काम दिलोजान से करता हूँ और मुझे अपने जीवन का सबसे अच्छा काम लगता है। जब मैंने पूंछा कि आपको अतीन्द्रिय क्या लाभ हुआ तो उन्होंने बताया कि मैं अपने अपने सारे रिश्तेदार ओर किसी के विषय में भी सारी जानकारियाँ प्राप्त कर लेता हूँ और जानता हूँ मेरा पीछे जन्म क्या था आगे क्या होगा मेरे बच्चों की शादी कहाँ होगी कैसे होगी। क्या कठिनाई आयेगी इसके अतिरिक्त किसी के विषय में भी मैं जानकारी प्राप्त कर लेता हूँ और अभी तक कोई जानकारी गलत नहीं निकली।

सन् १९९१ दक्षिण भारत में हमारी टोली जिसमें ईश्वरी यादव और मनीष राम साहू थे महबूब नगर में पहुॅंची। मैंने एक इंटरव्यू ईश्वरी यादव का इस प्रकार रिकार्ड कियाः-

उन्होंने बताया कि उनकी दूकान में एक बड़ी चोरी हो गई सारा पैसा ओर अधिकतर सामान चुरा लिया गया। मैँ बहुत दुखी हुआ और पिताजाी के नाम एक पत्र छोड़कर भाग गया। पत्र में मैंने लिखा पिताजी इस चोरी से मैं शरमिंदा हूॅं पर आपको विश्वास दिलाता हूॅं कि मैं जीवन भर कभी आपकी प्रतिष्ठा को धब्बा नहीं लगने दूँगा। मैं बिना टिकिट दिल्ली पहुँचा। वहाँ मुझे मथुरा के शरन जी मिले उन्होंने बतलाया कि आज ही माताजी यहाँ हैं और गुरुजी का डाक विमोचन समारोह तालकटोरा स्टेडियम में है। मुझे वहाँ माताजी के दर्शन कराये। तथा मैंने शान्तिकुॅंज के ड्रायवर दयाशंकर से प्रार्थना की कि मुझे कही जगह मिल जाये और आप शान्तिकुँज ले चले पर उन्होंने स्वीकृति नहीं दी। मैं अन्तर्राष्ट्रीय बस अड्डा पहुँचा और वहाँ बस कंडक्टर से बात की वह मुझे बड़े प्रेम से अपना स्टाफ मेम्बर बनाकर शान्तिकुँज तक छोड़ गया। शान्तिकुँज में बाजपेई जी एवं शुक्ला जी ने कहा कि तुम तीन दिन रह सकते हो पर हम भागे हुये किसी व्यक्ति को अधिक नहीं रख सकते। पर अचानक दूसरे दिन मुझे शुक्लाजी माताजी के पास ले गये जहाँ मेरा तिलक कर दिया गया। इसी बीच मेरे एकमात्र बड़े भाई भी भागकर पहले ही शान्तिकुँज आ गये थे। हम दोनों भाई का माताजी ने तिलक किया और उसके पहले बतला दिया था कि हमारे पास दो लक्ष्मी हैं यदि तुम लोग चाहो तो घर जा सकते हो जहाँ तुम्हारी तुकान अच्छी चलेगी और पैसे वाले भी बन जाओगे पर अच्छे व्यक्ति नहीं बन सकोगे हमारे पास दूसरी लक्ष्मी तुम दोनों भाइयों के लिये हमारे यहाँ रसोई में काम करने वाली दोदेवकन्यायें हैं बड़ी गौरी और छोटी इन्दू यदि तुम इन्हें सवीकारों तो हम तुम्हारी व्यवस्था भी कर देंगे और तुम एक अच्छे इंसान भी बन सकोंगे। हमने इसीलिये तुम्हें प्रयास पूर्वक यहाँ बुलवाया है। हम पहले घबराये पर माताजी ने हर तरह का आश्वासन दिया तो राजी हो गये। माताजी ने कपड़ें गहने सब चीज की व्यवस्था की पर यह कहा कि दुपट्टा और एक सिंदूर की डिबियाँ तुम्हें अपने पैसे से लानी होगी क्योंकि यह व्यवस्था एवं आश्वासन तो तुम्हें जीवन भर के लिये देना है हमारा कुल खर्चा दोनों भाई का १५, १५ रुपये हुआ।

जब हमारी शादी यज्ञ स्थल पर हो रही थी तभी पिताजी भी ढूढ़ते हुये स्वागत कक्ष आ गये जहाँ उन्हें सूचना मिली कि तुम्हारे दोनों लड़के यहाँ पर है और उनकी शादी हो रही है। माताजी के पास आशीर्वाद लेने गये पिताजी ने कहा बच्चे मिलने की हमें बहुत खुशी है पर हम अपने घर रिश्तेदारों को क्या कहेंगे जो कोई भी नहीं है किसी ने शादी देखी नहीं है माताजी ने कहा हम उसकी भी व्यवस्था कर देंगे। शादी के बाद हम सहारनपुर से रेल पकड़ने गये तो कंडक्टर गार्ड ने कहा कि हम आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे स्लीपर की यह पाँच सीट आपके लिये ही खाली है इस प्रकार सारी व्यवस्था हो गई इसके बाद जब भिलाई अपने घर पहुँचे तो हमारी माँ और बहन दोनों ने कहा कल रात हमने तुम दोनों की शादी विस्तृत रूप से सपने में देखी जिसका हमें अभी तक आभास हो रहा है। माताजी ने यह भी कहा कि तुम दो भाई में से एक भाई घर रहना और ईश्वरी तुम्हारी शादी इन्दू से हुई है जो हमारे चौके में आठ वर्ष से काम करती है इसलिये हम उसे नहीं छोड़ना चाहते इसलिये तुम यहीं मानवता की सेवा का काम यहीं शान्तिकुञ्ज रहकर संभालों।

ईश्वरी प्रसाद जी ने यह भी बताया कि उत्तरप्रदेश के बाँदा जिले से १५ कि०मी०दूर एक व्यक्ति की दो कन्यायें १५ और १७ वर्ष की अचानक मृत्यु को प्राप्त हुई। जब गुरुजी को पऋ लिखा तो गुरुजी ने कहा मैं उन दोनों आत्माओं को एक बेटे के रूप में वापस दिलवा दूँगा अगले वर्ष ही उनको पुत्र की प्राप्ती हुई। जो तीन चार वर्ष की उम्र में गायत्री मंत्र बोलता था ओर कहता था मैं गुरुजीके काम के लिये ही आया हूॅं।द्घ

ईश्वरी प्रसाद बताते हैं कि मैंने माताजी से प्रार्थना की कि मैं ४० दिन का अनुष्ठान करना चाहता हूॅं। माताजी ने तिलक किया रक्षासूत्र बाँधा पर यह कहा कि तू जप नहीं कर पायेगा। और हुआ भी यही मुझे कोई न कोई काम सौप दिया जाता था और मैं जप नहीं कर पाया। माताजी ने कहा मिशन का काम जैसे तेरे बड़े भाई कर रहे हैं तू भी कर वही तेरा अनुष्ठान होगा।

जब एक दिन मैं टोली में जा रहा था। ओर गाड़ी मैं ही चला रहा था काफी तेज स्पीड पर और गाड़ी पलट गयी माताजी ने तभी इन्दु को बताया कि छोरा गाड़ीसे गिर गया वह बहुत रोयी तो माताजी ने कहा कि कोई चोट नहीं आयी। मैँ जब वापस पहुँचा तो बिना कुछ सुने पूछे माताजी ने जोर से डाँट लगाई कि इतनी तेज गाड़ी क्यों चलाता है। ओर सब हालचाल पूछे मैं चोट छिपाता रहा माताजी ने मेरे सिर पर हाथ फेरकर कहा कोई खास चोट नहीं है डाक्टर रामप्रकाश पाण्डे जी को दिखा देना।

हमारे दूसरे साथी मनीषराम साहू ने कहा जो कि सारंगगढ़ जिला रायगढ़ ग्राम गौड़ा पोस्ट सालर के रहने वाले हैं ने अपने इंटरव्यू में रिकार्ड कराया कि हम २६ जनवरी १९८४ को हरिद्वार में आये और संगीत विभाग में काम करने लगे। चार फरवरी को माताजी ने बुलाया ओरकहा तुम टोलाी में चले जाओ मैं न कभी रेल में बैठा था न अकेला गया था इसलिये बहुत घबराया। मेरा पेट खराब हो गया। गोविन्द पाटीदार और शास्त्री जी ने बहुत समझाया। माताजी ने कहा था कि तू चिन्ता न कर मेरा आशीार्वाद तेरे साथ है। पर मैं आशीर्वाद आदि कुछ नहीं जानता थाा मैं घर भाग गया। एक महीने बाद मैंने साक्षात रूप से स्पष्ट रूप से माताजी और गुरुजी को सामने खड़ा देखा मेरी तो जमीन खिसक गयी बोलती बन्द हो गयी। हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। माताजी ने डाट लगाई कि तुझे घर आये एक महीना हो गया तू गीदड़ की तरह क्यों भाग आयै मेरा मनोबल बड़ा जब गुरुजी माताजी लोटे तो मुझे ऐसा लगा कि वे शंकर जी और पारवती है यह दृश्य मैंने स्पष्ट देखा। फिर मेरा मनोबल बहुत बड़ा और मैं अन्य साथी श्री शिवचरण एवं सन्तराम साहू को लेकर शान्तिकुँज स्थाई रूप से आ गया।

मुझे तीन माह के लिये टोली में भेज दिया गया। और जब एक दिन मेरी पत्नी जिनको साढ़े नौ महीने गर्भ था माताजी को प्रणाम करने गई माताजी ने तभी मेरा पता लगाया टेलाीग्राम भेजकर जबकि तीन महीने में दो दिन कम थे रिलीवर देकर बुला लिया। मैँ ठीक उसी दिन पहुँचा जिस दिन माताजी अश्वमेध यज्ञ से लौटी थी तथा मेरी पत्नी अस्पताल में भर्ती थी उनका सिवेरियन आपरेशन हुआ और स्वस्थ बालक को बिना किसी कष्ट के जन्म दिया।

डॉ०शिवराम कृष्ण रेड्डी तुमरी गुंठूरका एक इंटरव्यू मैंने रिकार्ड किया जो इस प्रकार है। उन्होंने कहा सन् १९८५ में जब मैं गुंठूर में था गायत्री परिवार से मेरा सम्पर्क हुआ। अखण्ड ज्योति देखकर मुझे ऐसा लगा कि इसके लेखक ही मेरे आदर्श के शिखर हैं। और मैेने हिन्दी साहित्य को तेलगू भाषा में अनुवाद करना शुरू कर दिया। मुझे ऐसा लगने लगा कि गुरुजी का काम ही मेरा काम है। मैंने एक सौ आठ दीपयज्ञ किये एवं पहली पत्रिका आठ पेज की केवल ५०० रुपये की पूॅंजी से तेलगू भाषा में गुरुजी के लेखों का अनुवाद कर निकाली। पहली बार एक हजार प्रतियाँ छपवाई। सन् १९९० में मैंने जीवनदान का संकल्प लिया। और अपने क्षेत्र तथा दूर-दूर गुरुजी के कार्यक्रम यज्ञ कराने जाने लगा। सन् १९९२ की गुरुपूर्णिमा में मैंने पीले कपड़े पहनने का संकल्प् लिया और क्लीनिक भी इन्हीं कपड़ों में जाता था फिर नाराकूडू में एक शक्तिपीठ स्थापना के लिये मेरी पत्नी नं कंगन दिये जिसकी कीमत उस समय १० हजार रुपये से अधिक थी दान दे दिये। सन् १९९४ के एक यज्ञ में तेलगू भाषी महिलाओं ने अपनी अंगूठियाँ हार और पाँच से दस हजार रुपया दान दिये जिससे एक लाख रुपये की जमीन नाराकूडू में खराीदी जहाँ आज स्वावलम्बन विद्यालय विद्यामन्दिर हवन का स्थान शक्तिपीठ और मेरा स्थाई निवास भी है। नियमित अखण्ड ज्योति निकलती है। पेड़ लगवाये और किसी प्रकार की फीस नही ली जाती। आसपास के गाँव के लोग नियमित हवन करने आते है। सितम्बर १९९४ में गुरुजी के भाषणों का तेलगू अनुवाद के ओडियो और बीडियो बनाये जिसकी हजारों कापियाँ बिक चुकी हैं।

डॉ० जी०काशीनाथ गौड़ मेडागिडा महबूब नगर ४१११६ पी०पी० आन्ध्रप्रदेश मेरा सम्बन्ध माताजी को लिखे एक पत्र के उत्तर पाकर सन् १९९१ में हुआ। माताजी का पत्र पाकर मैं क्लीनिक में ही रो पड़ा मैंने एक ११ कुण्डीय यज्ञ का कार्यक्रम रख शान्तिकुञ्ज से टोली बुलवायी पर डाक्टर प्रणव ने टोली भेजने में मजबूरी दिखाई तो मैंने उन्हें पत्र लिखा इफ यू केंसिल माई प्रोग्राम आई विल कमिट सोसाइट डाक्टर साहब ने टोली भेज दी। मैं तीन टाईम खाने वाला व्यक्ति खाना तो क्या टाइम से घर पर चाय भी नहीं पीता था मुझे बहुत सोने की आदत थी पर मुश्किल से तीन चार घण्टे सोता था। नौ बजे सोने वाला व्रूक्ति बारह एक बजे सोता था। कार्यक्रम बहुत प्रभावशाली रहा। कार्यक्रम समाप्ति के बाद महबूब नगर के एक दूकानदार ने बतलाया कि मैं तो सड़क से जा रहा था ओर धर्म, महात्मा कुछ नहीं मानता था पर जब मैंने कार्यक्रम स्थान की तरफ देखा तो जहाँ महात्माओं की टोली बैठी थी वहाँ एक प्रकाश छाया हुआ था। और उसको देखकर ही मैं सब कुछ भूल गया और मैंने दीक्षा ले ली और उसके बाद से वो नियमित रूप से गायद्घत्री परिवार के कार्यक्रम में आने लगा।द्घ एक और व्यक्ति जो कि रास्ते से जा रहा था गायद्घत्री मंत्र की व्याख्या से मुग्ध होकर हमारा एक बड़ा सहयोगी बन गया उसने भी कहा कि मैंने एक विशेष प्रकार का प्रकाश का प्रभाव यज्ञ स्थल के आसपास देखा वह भी हमारा सहयोगी बन गया है।

हमारे मामाजी जो कि रोडवेज के मैंनेजर महबूब नगर में है वे तीन चार रोज से बिना छुट्टी लिये यज्ञ में पूरा सहयोग देते रहे उसी समय उनके विभाग के चीफ इंस्पेक्शन के लिये आये और उन्होंने सारे अफसरों की फाईल देखी और रिमार्क लगाये पर मामाजी की फाइल नहीं देखी। वे कहते है ये तुम्हारे गुरुजी के कार्यक्रम का ही प्रभाव था नहीं तो मैं बड़ी मुशीबत में पड़ जाता।

श्री हीरसिंह राजपुरोहित जो २५ वर्ष से हैदराबाद में रह रहे हैं कुटीर साधना के लिये शान्तिकुञ्ज आये और जब अखण्ड ज्योति में सूर्य उपासना का लेख निकला तब से नियमित वे उपवास ओर ग्यारह माला रोज करने लगे। दो साल में उनको एक विचित्र अनुभव नियमित रूप से होने लगा और वह यह था कि प्रतिदिन जब सूर्य भगवान को जल चढ़ाकर वह लालचन्दन घिसते हैं तो प्रत्यक्ष रूप से गुरुजी और माताजी को एक हवाईनुमा सिंहासन में आते देखते हैं। जिनको वे प्रणाम करते हैं तो माताजी के चरण का तो स्पर्श अनुभव करते हैं पर गुरुजी का नहीं। वे उनके चरण दूर से भी धोते हैं उनके साथ अन्य शान्तिकुँज के विशिष्ट कार्यकर्ता डा० प्रणव और शैलजीजी के साथ रोज दर्शन करते हैं।एक अपूर्व फूलों की सजावट तथा भोजन का कार्यक्रम भी वह स्पष्ट देखते हैं। हीरसिंह जी ने यह बतलाया कि सन् १९९० में जब चेतराम रहबर जो कि हरियाड़ा हिसार में डिप्टी डायरेक्टर एजूकेशन रह चुके हैं। हैदराबाद कार्यक्रम में आये तो वे उनका भाषण सुन रहे थे और पाँच मिनिट तक उन्होंने रहवर जी के स्थान पर गुरुजी की आवाज उन्हीं के शब्द और उन्हीं का उच्चारण सुना बाद में वह फिर वह रहवर जी की आवाज बन गयी। उपरोक्त सारे इंटरव्यू के वक्तव्य मेरे पास रिकार्डिड हैं।

श्री शिवप्रसाद मिश्रा जी ने बतलाया कि एक दिन मैं एक परिवार को गुरुजी से मिलाने ऊपर ले गया। मातापिता उनका बेटा और नवविवाहित पुत्रबधु। पिताजी ने अपनी दुकान की समस्या माताजी ने स्वास्थ्य की और लड़के ने अपनी नौकरी की बात कही और गुरुजी उनको समाधान और आशीर्वाद देते रहे। बहुत ने भी कुछ ऐसी आकृति बनाई कि गुरुजी पूछने लगे बोल बेटी तुझे भी कुछ कहना है संकोच में बोली गुरुजी कोई खास नहीं गुरुजी एकदम बोल उठे अच्छा आप लोग उठिये मैं अपनी बेटी से बात करूँगा। अब माता-पिता और पति को उठना ही था कि बहू बोली गुरुजी मेरी सास परेशान करती है गुरुजी बोले मेरे पास एक मंत्र है तेरी सास बिल्ली हो जायेगी। बेटी ने अपने कान लगभग गुरुजी के पास लगा दिये ओर गुरुजी जोर से चिल्लाकर बोलते हैं तू अपनी सास की हाँ में हाँ मिलाया कर। वह एक बार प्रणाम चाहती है तू तीन बार किया कर एक कप चाय की जगह तीन कप पिला तुझको डाँट भी लगाये तो बाहर पड़ौस में तू बोला कर कि मेरी सास देवी है उनको गायत्री सिद्ध है तू तो पढ़ी लिखी है नाटक भी अच्छा कर लेती होगी अपने जीवन में छै महीने एक साल नाटक नहीं कर सकती। और एक बात सुन जिसने तेरे पति को पैदा किया है उसकी झूटी सच्ची सेवा करने में तेरा कुछ नहीं घटेगा। एक और बड़ी बात तेरी सास तुझसे २५ साल बड़ी होगी और २५ साल पहले मर जायेगी।

एक दिन शान्तिकुँज में मैंने गुरुजी से पूछा कि गुरुजी लगभग पूरी नियमितता के साथ मैं शक्तिसंचार साधना सन् १९६० से जो आपने स्वयं हिमालय से लौटकर हम पाँच व्यक्तियों को बतलाई थी कर रहा हूॅं यह ठीक है कि मन नहीं लगता या कम लगता है पर मुझमें कोई राई रत्ती प्रभाव हुआ मैं नहीं समझता। गुरुजी बोले अच्छा तू बता विटामिन खाने से कुछ फायदा होता है। मैंने कहा हाँ गुरुजी यदि विटामिन की कमी हो और वही विटामिन दिया जाये तो अवश्य फायदा होता है। जैसे यदि विटामिन ए डी की कमी हो जिसकी वजह से रात को कम दिखता है रतौंध या ०६ तो दिखने लगता है। गुरुजी बोले मालुम पड़ता है क्या कि फायदा हो रहा है मैंने कहा नहीं। गुरुजी ने कहा देख उपासना साधना भी ऐसी ही है। और एक बात जब तक तुझे मालुम नहीं पड़ता तब तक ही ठीक है जिस दिन मालुम पड़ने लगेगा उस दिन पगला जायेगा। अधिकतर लोगों को ऐसी ही होता है तू बेटा इससे बचे रहना। लोभ, मोह, घमंड न आये यही साधना की फलश्रुति है न संख्या न मात्रा न समय बात मेरी समझ में आयी।

यतीन्द्र दत्ता का सन् १९७४ में एक बहुत बड़ा कार एक्सीडेंट हुआ जिसमें एक अमेरिकन बुढ़िया के लगभग ६ फ्रेक्चर हो गये तथा कार तो पूरी तरह नष्ट हो गई। कोर्ट में केस चला और यतीन्द्र का वकील बहुत घबराया था कि कम से कम सजा डीपोर्टेशन तो ही जायेगी। तथा इंश्योरेंस तथा जो भी बैंक बेलेस है कम्पनशेसन में देना होगा। किसी भी तरह की बचने का आशा नहीं थी। और कोर्ट का डिसीजन चौथे दिन होने को था। यतीन्द्र ने पत्र लिखा पर उसको गुरुजी को पोस्ट भी नहीं कर पाया और वही गया। यतीन्द्र से जब एक्सीडेंट का कारण और स्थिति पूंछी तो उसने कहा मेरी गाड़ी टकराने के पहले ही मैं सब भूल गया और मुझे कुछ भी नहीं मालुम। वकील इसको एक स्पष्ट बहाना मान रहा था। पर जब डिसीजन हुआ तो जज ने पुलिस प्रासीकूटर से पूंछा कि इस केस में कोई दम नहीं है। तुमको कोई आब्जेक्शन। वकील ने पूछा कि आपने ये कैसे कहा जज साहब बोले कि जिस दिन मेरे कोर्ट में फाइल आयी थी मैं वह स्थान देखने गया जहाँ एक्सीडें हुआ वहाँ पर पहले से ही कुछ तेल फैला हुआ था इस कारण गाड़ी का डिस्बेलेन्स ड्रायविंग गलती नहीं है रोड फाल्ट है इस कारण म्युनिस्प्ल कार्पाेरेशन को इंश्योरेंस की सारी रकम पे करनी होगी औरयतीन्द्र दत्ता को बिल्कुल बेकसूर माना जाता है। इस प्रकार गुरुजी की यह अप्रत्यक्ष सहायता मिली।

कानपुर के साधना शिविर प्रज्ञापुराण में मैं और श्रीपर्णा गये वहाँ कानपुर के कार्यकर्ता सेंगर जी ने बताया कि मैं पिछले शिविर में मैं शान्तिकुँज गया था। मैं एक अच्छा तैराक भी हूँ और कई पारितोषिक पा चुका हूँ। शान्तिकुँज मंच से कई बार मना करने पर भी मेरे मन में बार-बार गंगाजी जाने का मन होने लगा। और मैं अपने दो साथियों के साथ गंगाजी स्नान करने गया और वहाँ गंगा में कूंदने पर बहुत देर बाहर नहीं आया। साथियों ने परेशान होकर शान्तिकुञ्ज खबर की गुरुजीके निर्देश पर बलराम भाईसाहब वीरेश्वर जी शान्तिकुँज की टीम को लेकर पहुँचे और करीबन ४५ मिनिट तक तलाश करने पर कुछ पता नहीं लगा अन्त में हर की पेढ़ी पर जालन लगाने की व्यवस्था की गई और मेरे जीवित रहने की किसी को आशा न थी पर एक घण्टे बाद करीबन दो किलोमीटर दूर में नदी से बाहर निकल आया ओर पैदल चलकर गीले कपड़े में शान्तिकुँज पहुँचा। जब मैं डूब रहा था तो मुझे ऐसा लगा कि मेरे गुरुजी मेरी पीठ पर बैठे है और कह रहे है सेंगर तू हिम्मत न हारना बचा तो मैं लूगा ही और मैं लगभग न जाने कितने समय तक उस भवर से जूझता रहा और आगे गंगा के बाहर निकल आया। आगे वे कहते है कि मेरा एक एक क्षण और एक एक अंग मिशन के प्रति समर्पित है।

मैंने बलराम भाई साहब से एक इंटरव्यू देने की प्रार्थना की जिसको उन्होंने आज दिसम्बर २५, २६ को स्वीकार किया जो इस प्रकार है।

वे कहते हैं कि आज मुझसे शान्तिकुञ्ज जब पूछे जा रहे हैँ मैं एक बड़ी कठिन स्थिति में अपना दायित्व निभा रहा हूँ एक तरफ मेरी व्यक्तिगत जिम्मेदारी दूसरी तरफ कठिनाइयों ओर चुनौतियों का सामना और मेरे प्रयास कहीं असफल तो कहीं घाटे में गिरते नजर आ रहे हैं। जब तक गुरुजी माताजी थी मेरा काम तो उनके मार्गदर्शन में चलना था आज मैं जब अपनी पुरानी बीतें दिनों को जो मथुरा शान्तिकुँज में बीते उनको बस पूज्य गुरुजी के आशीष का इतिहास ही कह सकता हूँ।

मेरी लम्बी कहानी ४४ वर्ष पूर्व आरम्भ होती है जब में इंटरमीटियट का छात्र था चंदेरी के आसपास मुझे एक कागज का टुकड़ा मिला जो पुराना फटा सा था मैंने उसको उठा लिया और उसको पढ़ने लगा उसमें गायत्री मंत्र के विषय में लिखा था उस छोटे से कागज के टुकड़े पर इतना कुछ लिखा कि कि मुझे लगा कि हमारे प्राचीन ऋषियों ने जो कुछ गायत्री के विषय में जाना पाया है वह सब कुछ उस कागज में अंकित है कोई भी उसको पढ़ता बिना आकर्षित हुये नहीं रह सकता था। और मैं भी नहीं रहा। मुझे अपने आप आभास हुआ कि गायत्री उपासना कोई बड़ी साधना है। इंटरमीडियट के बाद मध्यप्रदेश में मैंने खादी बोर्ड में नौकरी कर ली। वहाँ मुझे जब भी परेशानी होती तो मुझे महामंत्र याद आता क्योंकि उसमें लिखा था कि समस्या चाहे शाराीरिक हो चाहे पारिवारिक या सांसारिक गायत्री मंत्र से सब कुछ सम्भव है। मैंने अखण्ड ज्योति सम्पादक के नाम एक पत्र लिखा तथा गायत्री महाविज्ञान मंगाया। उस दिन के बाद से हमारा गुरुजी से नियमित पत्रों का आदान प्रदान होता रहा। सन् १९५८ में सहस्रकुण्डीय गायत्री यज्ञ की आयोजन की सूचना मुझे मिली और मैंने जाने का मानस बनाया। पर उसमें यज्ञ भाग लेने की कुछ शर्ते थीं जैसे साधक स्तर का जीवन सवा लाख गायत्री जप और २४०० मंत्र लेखन। मैंने संकल्प भर दिया। इसी बीच सर्विस छोड़कर मैंने भारतीय सेना में भर्ती हो गया और मुझे प्रशिक्षण के लिये नासिक भेज दिया गया। मेरे जीवन का पहला चमत्कार यह हुआ कि एक दिन मैं शाम को मंत्रलेखन कर रहा था और मिलिट्री परेड में पहुँचने में मुझे थोड़ी देर हो गई। मेरे प्रशिक्षक ने मुझे न केवल डाँट लगाई लेकिन सबों के सामने बहुत अपमानित भी किया और साफ शब्दों में कहा कि मिलिट्री में धरम-करम के लिये कोई स्थान नहीं है मैं चुप रहा और मुझे जो दण्ड दिया वह भुगता लेकिन मेरी आकुलता बनी रही और दूसरे ही दिन किसी मामले में वे प्रशिक्षक न केवल हमारी यूनिट से बाहर गये लेकिन टर्मिनेट भी हो गये। दूसरा प्रशिक्षक एक सरदार जी आये जिसको उस जाने वाले प्रशिक्षक को कहा कि आपकी यूनिट में एक खतरनाक व्यक्ति है जिसके अभिशाप के कारण मेरी यह दशा हुई आप उससे बचना सरदार जी ने मुझे बुलाया और कहा कि बताओ तुम क्या करते हो मैंने कहा गायत्री जप। उन्होंने कहा तुम जो चाहो सो करो बस अपनी डियुटी बनाये रखना हम कोई विघ्र नहीं डालेंगे और हमारी शुभ कामना है। मिलिट्री में छुट्टी मिलना सबसे बड़ी समस्या होती है और मैं हजार कुण्डीय यज्ञ मं मथुरा जाना चाहता था। और दूसरा चमत्कार यह हुआ कि मेरी बेसिक ट्रेनिंग समाप्त हुई और एडवांस ट्रेनिग के लिये चुन लिया गया। और दोनों के बीच २८ दिन का फासला था और यह ठीक वही समय था जब यज्ञ होने वाला था यानी छुट्टी की समस्या हल हो गई। सन् ५८ के इस यज्ञ में मैंने गुरुजी का दर्शन किया मालुम नहीं में गुरुजी के चरण स्पर्श कर पाया कि नहीं पर विराट कार्यक्रम देखकर मेरी निष्ठा दृढ़ हुई। सन् १९६१ में मेरा पोस्टिंग कश्मीर हो गया। उस समय सैनिक जीवन के जो भी अवगुण होते हैं मुझमें मौजूद थे लेकिन कि जैसा गुरुजी ने अखण्ड ज्योति में लिखा उच्चस्तररीय साधना के लिये पात्रता की जरूरत होती है मैंने एकान्त में एक संकल्प लिया और उस संकल्प को आज तक निभा रहा हूँ यह गुरुजी का आशीर्वाद ही है। यह गुरुजी का ही आशीर्वाद रहा कि मुझे मिलिट्री में भी अफसरों का सहयोग मिलता रहा। गुरुजी ने मुझे शक्ति संचार साधना के लिये बुलाया और बताया कि बिना किसी शक्तिवान से जुड़े अध्यात्म फलित नहीं होता। मुझे व्यवस्था का काम सौपा गया सही में मैं केवल गुरुजी के निर्देश पालन करता था उसको चाहे आप व्यवस्था कहें या कुछ भी कहें। मैंने अपने भव और निष्ठा एक किताब में लिखी जिसका नाम है देवदूत आया और हम पहचान न सके। आगे की बातचीत आगे करेंगे।

तारकेश्वर श्रीवास्तव निर्माण विभाग। उन्होंने अपने इंटरव्यू में बतलया कि मेरे पिताजी ही मुझको गायत्री परिवार से जोड़ा। सन् १९५६-५७ में मेरा परिचय हुआ और मुझे आभास हुआ कि यह मेरे गुरु भी है और ईश्वर भी। मेरा एक जटिल हार्निया था डाक्टर भी जिसको आपरेशन करने में घबरा रहे थे पर बड़ी सरलता से हो गया। मेरा एक कार एक्सीडेन्ट हो गया और मुझे शरीर के कई स्थानों पर चोट आयी और सारा शरीर पट्टी से बँध गया। गुरु जी इन दिनों वहाँ आये थे और मुझको देखने अस्पताल आये और बोले क्या बेकार पड़ा रहता है उठ पट्टी वट्टी बाँध रखा है और मैं सचमुच उठ गया यह काम करने लगा यह मेरे जीवन का एक अद्भुत आश्चर्य है। सन् १९८८ में मुझे एक बड़ा हार्टअटैक हुआ मैंने स्वप्र जैसी स्थिति में देखा कि मेरा सिर माताजी की गोदी में रखा है और मैं कह रहा हूँ माताजी हम चले जाये माताजी ने कहा तू कहाँ जायेगा तुझे बहुत काम करना है। फिर अभी कुछ दिनों पहले मैं ब्रह्मवर्चस गया। लगभग सबेरे के छै साड़े छै बजे होगे कि में पशीने से लथपथ वही गेट पर गिर गया। ऊपर से डाक्टर अशोक तिवारी आ रहे थे और थोड़ी देर में गंगाजी से डाँ० ए०के०दत्ता आ गये और तभी हार्ट की दवा देकर मैं थोड़ा स्वस्थ हुआ तो शान्तिकुँज से गाड़ी बुलाकर मुझे अस्पताल भेज दिया। माताजी की कृपा से ही मैँ पूर्ण स्वस्थ हो गया। मैं अनुभव कर रहा था कि माताजी ने मेरा पीठ सहलाया और मैं स्वस्थ होता गया। तारकेश्वर जी कहते हैँ कि शान्तिकुँज के कण-कण में अध्यात्म का अपूर्व स्पंदन है। नीलधारा के पास पायलट बाबा ने बतलाया कि गुरुजी के गरुजी सर्वेश्वरानंद जी अक्सर कर शान्तिकुँज आते हैं वे कहते हैं कि मैंने कई बार सजल श्रद्घा और प्रखर प्रज्ञा पर गुरुदेव माताजी को देखा और वे हमेशा ही यहाँ रहते हैं। इन दोनों के बीच दादागुरु को भी मैंने देखा। उन्होंने यह भी कहा कि गुरुजी के पाँच वीरभद्र तथा हिमालय की कुछ सत्तायें यहाँ आती रहती है जिसमें मथुरादास जी भी है पर गुरुजी हमेशा ही यहाँ रहते हैं। गुरुजी केवल २००० तक नहीं सदियों तक यहाँ रहेंगे ऐसा उन्होंने हमें बतलाया। मेरे लड़के की शादी भी गुरुजी के आशीार्वाद से असम्भव को सम्भव करते हुये हो गयी। गुरुजी माताजी पूर्णिमा अमावश्या को दीपयज्ञ में आते है और महावतार बाबा और दादागुरु अक्सर आते रहते हैं। मुझे जब नौकरी नहीं मिली थी तब गुरुजी ने मुझसे कहा कि तू पेपर देख और मैंने एक जगह प्रतिवेदनभेजा मुझे नौकरी मिल गयी।

एक दिन एक व्यक्ति धोती कुरता पहनकर गुरुजी के पास आया और मिशन की प्रशंसा करते हुये बात करने लगा। गुरुजी ने कहा कि तू अपने काम से आया था वो काम तो तेने कर लिया अब तू और क्या जानना चाहता है। वह आदमी घबराया डाक्टर प्रणव कहते है कि वह मेरे पास आया और बोला यह गुरुजी मेरे मन की बात कैसे जान लेते हैं मुझे कोई नहीं जानता सही में मैं सीआईडी हूँ।

एक दिन सन् १९६३-६४ में मैँ घियामंडी गया और नीचे आफिस में मैंने एक सौ रुपये का नोट बलराम सिंह परिहार सिंह जी को दिया और फिर बाद में ऊपर चला गया। गुरुजी मुझे खाना खिला रहे थे और मेरे मन में बार-बार यह उठाता था कि यह सौ का नोट गुरुजी के पास पहुँचेगा या नहीं। यह सारे विचार मेरे मन में थे अचानक खाते-खाते गुरुजी ने बलराम भाई साहब को बुलाया कि दत्ता को १०० रुपये की रसीद दे दो। उस दिन मुझे अपने ऊपर बहुत शर्मिन्दा होना पड़ा और आगे ऐसा न सोचने का मानस बनाया।

डाक्टर प्रणव सुनाते हैं कि एमबीबीएस पास करने के बाद गुरुजी ने कहा कि देख तू विदेश तो जा सकता है पर तेरे जीवन की धारा भौतिक बनकर रह जायेगी और एक बड़ी बात २६ वर्ष की उम्र में तेरी अल्पआयु मृत्यु है अगर तू यहाँ आ गया तो तुझसे बड़े काम होने की सम्भावना भी है और तेरे जीवन की रक्षा हो जायेगी।

एक दिन एक व्यक्ति केन्टीन में चाय पी रहा था मैं अपने बेटे सिद्धार्थ के साथ भी वहीं खड़ा था। वह व्यक्ति आया और बोला आप कहाँ से आये हैं मैंने कहाँ मैं यहाँ स्थाई सदस्य हूँ मेरा नाम डाँ० अमल कुमार दत्ता है और मेरा यह बेटा सिद्धार्थ एमटेक एमई इंजीनियर है। वह बोला मैं भी इंडस्ट्रियल इंजीनियर हूँ और पिछले एक साल से मेरा मन आत्महत्या करने का बना रहा। मेरी पत्नी हमेशा कहती रही कि तुम एक बार शान्तिकुँज हो आओ मैं उसकी सुनता नहीं था। पर अभी-अभी मैंने निश्चय कर लिया कि मैं आत्महत्या करूंगा तो सोचा कि पहले शान्तिकुँज हो आऊ फिर बोले डाक्टर साहब मेरे दिमाग में बहुत प्रश्र उठते हैं क्या आप बतायेंगे कि माइण्ड क्या है। मैंने कहा आपरेशन आफ ब्रेन। दृष्टि क्या है। मैंने कहा आपरेशन आफ आई और शक्ति है आपरेशन आफ मशल्स वे बोले जिस प्रश्र के लिये मैं इतना परेशान था आपने एक सेकेण्ड में जवाब दे दिया। वे बोले मेरा एक प्रश्र और मैंने कहा पूछिये ऐसे तो मैं डाक्टर हूँ लेकिन मैं गुरुजी के साथ और मिशन से लगभग ३५ वर्षाे से हूँ इसलिये मैं उन्हीं को याद करके उत्तर देने का प्रयास करता हूॅ तो बोले कि यहाँ आकर मैंने अब निश्चय कर लिया है कि मैं अब आत्महत्या नहीं करूँगा मैंने कहा क्या यह वातावरण का प्रभाव है मैंने कहा कुछ हद तक यह भी है और बड़ा कारण यह है जो मैं अभी आपसे कहने वाला हूँ बोले कहिये मैंने कहा आप जो जाब कर रहे हैँ उसमें आप ऊपरी आमदनी कितनी करते हैं बोले बहुत ज्यादा क्योंकि इंडस्ट्रीज की पोलूशन आदि का सर्टीफिकेट व्हेरीफिकेशन मैँ करता हूँ मैंने कहा आपका हत्या न करने का कारण यह है कि एक अच्छा विचार आपको मिला लेकिन यदि आपने गलत चीज को दूर करने का साहस नहीं जुटाया तो आपका अचेतन आपको अवश्य परेशान करेगा। उन्हें बहुत अच्छा लगा और बहुत देर तक हम लोग बात करते रहे।

दिनॉंक १२-१-९९ को मेजर विजय कुमार खरे जी का इंटरव्यू ब्रह्मवर्चस में लिया गया उन्होंने बताया कि मेरे बड़े भाई को स्ट्रेंगुलेटिड हार्निया हुआ जो फट गया। और उनकी मृत्यु हो गई। उनके तीन बच्चे थे। हमारे पिताजी अत्यधिक शोकाकुल थे तो किसी ने बताया कि आप मथुरा चले जाइये। मेरे पिताजीमुझको लेकर मथुरा आये। हम लोग गुरुजी से मिले मेरे पिताजी ट्रेजरी में हेडक्लर्क थे। गुरुजी ने पूछा यह लड़का क्या करता है। पिताजीनेकहा इंटरमीडियट में पड़ता है। यज्ञोपवीत हो गया क्या। पिताजी ने कहा हमारे यहाँ शादी में होता है। गुरुजी बोले नहीं मैं कल इसका यज्ञोपवीत करूंगा। मैंने बीएससी किया औरफिर रुड़कीसे इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में बीई जब मैं पहली बार गुरुजीसे मिला तो काफी लम्बे समय तक गुरुजी मेरीतरफ बिना कुछ बोले देखते रहे इसके बाद मैंने आर्मी ज्वाइनकर ली और दिल्ली में मेरा पोस्टिंग हो गया। मैंने शिविर के लिये छुट्टीमाँगी तो कमाण्डिंग आफीसर ने मना कर दिया उसी समय ब्रिग्रडियर इंस्पेक्शन के लिये आये और मेरे क्रियाकलाप से बहुत प्रसन्न हुये और पूछने लगे तुमकोकोई तकलीफ तो नही ंक्या चाहते हो मैंने कहा मुझे १० दिन की छुट्टी चाहिए तभी उन्होंने मेरी छुट्टी की व्यवस्था कर दीओर मैं शिविर मेंचला गया। सन् १९७१ में मैंने मिलिट्री से डिस्चार्ज ले लिया मथुरा में गुरुजी के भाषण के बाद में गया ओरमैंने कहा कि गुरुजीमैंने मिलिट्री की नौकरी छोड़ दी है मेरे साथ मगन भाई भी थे अब मैं बिजनेस करना चाहता हूँ गुरुजीबोले बिजनेस तो तेरी किस्मत में ही नहीं है तूने नौकरी छोड़कर बड़ीगल्तीकी। मैं बहुत घबराया पर गुरुजी ने कहा अच्छा जा सन् १९७१ से सन्१९८६ तक मेरी फेक्टरी इंडियन केमीकल इंडस्ट्री बिल्कुलबीमार चली और मेरे १२ लाख रुपये का कर्ज ३२ लाख रुपये हो गया। एक दिन मैंने पेपर में देखा लिखा था कि इंडियन केमिकल इंडस्ट्री फार सेल याने मेरी कंपनी सरकार द्वारा बेची जाने का ऐलान। मैं पेपर लेकर गुरुजी के पास गया और बोला गुरुजी इसमें तो मेरीबड़ी बदनामी है। गुरुजी इधर से उधरठहल रहे थे बोले खरे मैं तेरे दरवाजे पर हाथी बाँध दूँगा इस नीलामी के लिये जो कुछ तुझे करना पड़े कर ओर मैं नीलाम न होने की सरी व्यवस्था कर दूंगा। ७ मार्च १९८६ को मैं श्री अरविंद सिन्हा जो मेरे क्लास फ्रेन्ड थे उनके पास गया ओर कहा कि अरनावार से मैं जो खाद बनाता हूँ ऐसा कोई अच्छी खाद बनाने का उपाया बताओ उन्होंने कहा कि सुगर मिल का एक प्रोडक्ट है उससे बहुतअच्छीकवालिटी की खाद बन सकती है। मैं बाराबंकीगया सुगर मिलके मैंनेजर से मिला उन्होंने कहा किचार पाँच टन खाद बेच सकते हैं वो बहुत अच्छी तरह से मुझसे मिले और कहने लगे कि तुम मुझे नहीं पहचानते मेंने कहा नहीं बोले एक दिन शान्तिकुञ्ज में तुम सीढ़ियों से उतर रहे थे ओर मुझे किसीने ऊपर जाने से मना कर दिया था पर तुम मुझे गुरुजी के पास ले गये ओर मेरी समस्या सुलझ गयी। फिर तो उन्होंने मेरा सम्मान किया औरये कहा कि बुडवल की सुगर फेक्टरी में आग लग गयी है और वहाँ ढेरो से ये मेटेरियल पड़ा है। वहाँ मुझे २५०० टन वुडवलमिल और उसकाखाद यानी आसनार से आक्जेलिक ऐसिड बनाने का काम उसी स्तर पर करता था। डी०एफ०ओ० मिस्टर नेगी ने १०० टन खाद का आर्डर दिया। ६५० रुपया प्रति टन के हिसाब से खरीदा। मैंने सोचा कि मार्च तक ६५ हजार रुपया मिलेगा और तभी उनका एक आदमी आया और बोला साहब का तबादला हो गया आप अभी पेमेन्ट ले जाओ। १०० टन खाद का आर्डर और मिला। मैंने वह सारा पैसा और एक साठ हजार का पोस्ट डटेड चेक गवर्मेन्ट लोन में दे दिया इसके बाद एक के बाद एक आर्डर मिलते गये और तीस जुलाई तक मुझे १७ लाख रुपये का फायदा हो गया। मैं जब भी दिल्ली आया करता था तो हतरद्वार जरूर आता था गुरुजी मुझे शान्तिकुँज का क्षेत्र दिखाते थे कहते थे यहाँ ट्यूबवेल लगना है मैंने कहा मैं लगा दू गुरुजी गुरुजी ने कहा लगादे। साइकिले लानी है मैंने कहाँ सौ साइकिले मेरीओर से। जब भी आता था पचास हजार से एक लाख रुपये मैं गुरुजी के चरणों मेंअर्पित करता था। सन् १९८० में हमारे घर पर रामकृष्ण परमहंस मां शारदामणि का चित्र है एक दिन मैं देख रहा था कि अचानक कभी वह गुरुजी माताजी का चित्र बन जाये और कभी वापिस रामकृष्ण देव का। मैं बहुत घबराया कि मुझे कोई दिमाग की खराबीतो नहीं हो गई मैं भागा भागा गुरुजीके पास गुरुजी बोले शाम को तीन बजे आना। बड़ी मुश्किल से वह समय आया गुरुजी ने अपनी ऊगली से छातीदिखाते हुये कहा यह जो है राममकृष्ण परमहंस और नीचे जो बैठी है वह है शारदामणि। मैंने पूछा मेरा आपसे क्या सम्बन्ध है। गुरुजी ने कहा कई जन्मों से सम्बन्ध है और मुझे पिछला जन्म बतलाया। मैंने पूछा आपका पिछला जन्म क्या था मेजर खरे बोले मैं यह नही बताऊगा। गुरुजी बोले अबमैं शरीर छोड़कर जा रहा हूँ जिसमें यह शरीर बाधक है। ऐसा बोलते बोलते खरे जी की आँखों मेंआंसू आ गये उन्होंने रोते-रोते कहा गुरुजी मैं भी आपके साथ चलूँगा गुरुजी बोले मेरी उमर तक पहुँचने पर आना। मुझे लगा कि ८० वर्ष जीवन का मेरा बीमा हो गया। मेरी एक महत्त्वपूर्ण घटना यह हुई गुरुजी बोले माँग क्या माँगता है। मैंने कहा जो माँगेगे देंगे आप। उन्होंने कहा हाँ वे बहुत प्रसन्न मुद्रा में थे मैंने कहा मुझे आप पर श्रद्धा बनी रहे और अपने काम में सफल होता रहूँ। गुरुजी ने कहा जब तक तू रचनात्मक काम करेगा तेरे संकल्प पूरे होंगे। गुरुजी बोले खरे तू तो मेरा जमनाप्रसाद बजाज है मैंने अपनी तरफ से गुरुजी से और कुछ नहीं माँगा। दूसरी घटना गुरुजी ने अपने अहमदाबाद कार्यक्रम में बुलाया बड़ा विशाल कार्यक्रम था मैं प्लेन से पहुँचा बलवंत भाई कोठी पर अपार भीड़ थी गुरुजी से मिलना चाहा पर डाँट कर भगा दिया। फिर मैंने दूसरे से पूंछा कि गुरुजी ने मुझे बुलाया है गुरुजी ने सुन लिया वे स्वयं सीढ़ी से नीचे उतरने लगे और मैं ऊपर चढ़ने लगा आधे रस्तें में मिले और मुझे लीलापत जी के साथ ठहरा दिया। जब गुरुजी कही बाहर जा रहे थे चार पाँच व्यक्ति थे इसलिये मैं रुक गया पर गुरुजी ने गाड़ी में बैठते ही जोर से चिल्लाया कहाँ भाग गया खरे मैं जल्दी जल्दी सामने आया और गुरुजी ने मुझे बैठाल लिया गुरुजी पर फूलों की वर्षा हो रही थी उसमें से बहुत से फूल मेरे ऊपर भी गिर गये ऐसा कहते कहते उनकी आँखों मेआँसू आ गये। अहमदाबाद कार्यक्रम में बहुत सारे लोग काम कर रहे थे। गुरुजी मुझसे बोले ये तो स्वयंसेवक का काम है जो तू देख रहा है मैं तुझसे बड़े काम कराऊंगा। शिमला में माताजी जब अश्वमेध में गई और मैं मिलने पहुँचा तो माताजी ने मेरा तिलक कर दिया और कहा कि लखनऊ का अश्वमेध यज्ञ तुझे करना है कलावा बाँधा मैं सोच भी नहीं सकता था कि इतना बड़ा काम मैं कैसे करूंगा। पर माताजी नेकहा मेरा आशीार्वाद तेरे साथ रहेगा। योगेन्द्र सिंह प्रिसपल सेक्रेट्री गवर्मेन्ट को मैंने भूमि पूजन के लिये बुलाया। और उस समय गवर्नर रूल्स था उन्होंने मुझे दो फोन नंबर दिये कि सात और साढ़े सात के बीच में इस फोन पर मुझसे सीधे बात कर सकते हो और मैं तुम्हारी सब कठिनाइयाँ दूर करने का वायदा करता हूँ। जमीन का बहुत बड़ा झगड़ा हुआ डीएम कमिश्रर किसी तरह नहीं देना चाहते थे पर जब मैंने योगेन्द्रसिंह जी से कहा यदि आपको कोई कठिनाई हो तो मुझे गवर्नर से मिला दे पर उन्होंने स्वयं सारा समाधान खोज लिया। उसके बाद गवर्नर बोरा माताजी को लेने स्वयं ने स्टेट हवाईजहाज भेजा। जब भी मैं गुरुजी से मिलता था तो दो तीन मिनट उनके पैर सहलाता था सन् १९९० में एक दिन मुझे बहुत बेचेनी हुई मैं जानता था गुरुजी किसी से नहीं मिल रहे है फिर भी शान्तिकुञ्ज पहुँच गया माताजी से मिला तो माताजी ने कहा कि गुरुजी तीन चार बार पूछ चुके हैं कि क्या लखनऊ की गाड़ी लेट है खरे को मेरे पास भेजना। मुझे ऊपर भेज दिया। लगभग ४५ मिनिट तक गुरुजी मेरी ओर मैं गुरुजी की ओर देखता रहा। फिर बोले कुछ चाहिए। मैंने कहा मुझे कभी आप अलग न करना। गुरुजी के लिये वे बोले आई सी हिम एज ए लिविंग गाड। उन्होंने कहा मैं मदद करूंगा अब जब कभी भी मुझे कोई दुख कष्ट होता है तो मुझे ऐसा लगता है कि मेरे शरीर और मन पर लगे हुये एक एक तीर निकाल देते हैं।

सुरेश भदौरिया स्थाई चालक शान्तिकुञ्ज सन् १९८८ में मैं शान्तिकुँज से परिचित हुआ इन दिनों मेरी इंडिया इलेक्ट्रोनिक रेडियों के नाम से रिपेयर की दुकान चलती थी तभी मैं श्री घनश्याम यादव कृषि विस्तार अफसर से मिला जिन्होंने मुझे अखण्ड ज्योति और शान्तिकुञ्ज का परिचय शनैः शनैः बातचीत में देते रहे मुझे गायत्री महाविज्ञान एवं वसीयत एवं विरासत पुस्तक ने बहुत प्रभावित किया और मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरे जीवन का यही लक्ष्य है। मैंने एक महीने का शिविर में आने की अनुमति प्राप्त कर ली गुरुजी के इस आवाहन पर कि जाग्रत आत्माओं को काम करना है मुझे अपने लिये ही लगा। मेरी माँ ने मुझे बताया था कि तुम्हारा पिछला जन्म एक सन्त का था और इस जन्म में भी तुम्हें वही काम करना होगा। जब सन् १९८९ में मैँ घर जा रहा था तब मेरे एक मित्र सुबोध जो साहित्य स्टाल में काम करते थे अचानक उनके मुँह से निकला कि जल्दी लौटना तुम्हें महाकाल का रथ चलाना है क्यों ऐसा कहा नही मालुम पर शायद कोई दिव्य प्रेरणा ही होगी। मैं १० दिन बाद हीलौट आया दुकान का सारा सामान जो लगभग २५००० का होगा थोड़ा बहुत बेचकर स्थाई रूप से शान्तिकुँज आ गया। जब १९८९ में ५ वर्ष और १२ वर्ष के लिये संकल्प कराया गया तब मैं पहली टोली में ही १२ वर्ष का संकल्प करने वालों में था मुझे स्पष्ट लगता था कि मेरे जीवन को धन्य बनाने का यही रास्ता है।

सन् १९८९ में गर्मियों के दिन थे मैं प्रवचन हाल में जहाँ कई भाई सो रहे थे सो गया दो बजे रात मैंने देखा कि गुरुजी सोने वालों के बीच में घूम रहे हैं खादी का धोती कुर्ता जैकेट पहने हैं और हरएक के मुँह की तरफ दोनों हाथ पीछे करके झुकझुक कर देख रहे हैं मैंने सपने में ही उनको प्रणाम किया और प्रणाम करते ही मुझे लगा कि एक करेण्ट का प्रवाह मेरे अन्दर जाने लगा। मैं घबराकर उठा और बहुत देर तक वैसा ही अनुभव करने लगा मुझे विश्वास हो गया कि गुरुजी शान्तिकुँज के कण-कण में विद्यमान है मैंने स्वयं अपने परिवार को धन्य माना। मैं कई बार ऊपर गुरुजी की गोष्ठी में गया पर कभी कुछ बोल न सका उनकी आँखों के तेज को कभ्ज्ञी देख न सका। मेरे तो बस जितनी देर बैठता आँसू बहते रहते और मुझे ऐसा लगाता कि गुरुजी कह रहे हैं कि तुम्हें मेरा ही काम करना है इसीलिये तुम्हारा जन्म हुआ है भटकना मत। मैं ऐसा अनुभव करता कि कोई दिव्य लोक से परमात्मा या दिव्य पुरुष बैठा है कोई मनुष्य नहीं। मैं मन ही मन एक हीप प्रार्थना करता कि मुझे अहंकार न हो और आपके ही रास्ते में ही चलू चाहे मुझे कोई भगाये भी पर मैं २००० तक शान्तिकुँज की ही सेवा करूंगा।

मेरी माँ बताती है कि मेरा जन्म ९ महीने में नहीं ७ महीने में ही हुआ तथा मेरे साथ एक कन्या का जन्म भी हुआ जिसका वजन ७ पौण्ड था पर वह जीवित न रही और मैं एक गोल बहुत कड़े छोटे से कवचनुमा घेरे में था। जब उसे तोड़ने के लिये हसियाँ से मारा गया तो वह इतना कड़ा था कि छटक कर दूर गिर गया तब गाँव की महिलाओं ने कहा कि इसको ऐसे नहीं एक-एक तह काटनी चाहिए सम्भव हो इसके अन्दर कोई जीव हो। ७, ८ परत के बाद एक बहुत छोटा सा बच्चा निकला जो मैं था। मेरी माँ और मेरी बड़ी बहन ने कपड़ों में लपेटकर गरम रखकर रुई से दूध पिलाकर सालो तक देखभाल कर बड़ा किया। माँ कहती थी कोई मुझ पर बैठ न जाये क्योंकि मैं बहुत छोटा था मेरे दोनों हाथ हाथ जोड़ने की मुद्रा में जुड़े हुये थे। जब मैं दो साल का हो गया तो मेरी माँ मुझे एक साधू के पास ले गई और मेरे जन्म की सारी घटना सुनाई तो उन्होंने कहा तुम्हारा यह बच्चा पिछले जन्म में सन्त था और जन्म नहीं लेना चाहता था उसका कहना था कि मैं बार-बार जन्म लेकर माँ का ऋणी नहीं होना चाहता। भगवान ने कहा कि जन्म तो तुम्हें लेना पड़ेगा क्योंकि आगे तुम्हें भगवान का कुछ काम करना है पर तुम माँ के ऋणी नहीं होगे इसलिये कवच के अन्दर माँ से पोषण न लेकर सूक्ष्म पोषण से मेरे शरीर में प्राण प्रवाह होते रहे। जब मैं गुरुजी से मिला तो मुझे लगा यही मेरा लक्ष्य है। मैं फकीर साधू तो नहीं बना पर गुरुजी की गाड़ियों का चालक बन गया मेरी माँ ने कहा तेरा जन्म इसलिये हुआ और उन्होंने खुशी-खुशी मुझे तिलक लगाकर बिदा किया।

शिव प्रसाद मिश्रा जी के साथ मैं गुजरात राजस्थान उज्जैन एक एक दिन के संस्कार महोत्सव में गया था। भारी बरसात हो रही थी। लगभग हजार ट्रकों का जाम लगा था और उज्जैन में सबेरे ही कार्यक्रम देनाथा लगभग रात के २ बजे थे सब लोग गाड़ी में सो रहे थे। अचानक मैंने गाड़ी के लुकिंगग्लास मे देखा पीछे ट्रक वाला गाड़ी को आगे बढ़ाते ला रहा था और मुझे गाड़ी में टक्कर देने ही वाला था किस्मत से मेरी गाड़ी गैर में थी मैंने तेजी से गाड़ी मोड़ी सड़क से नीचे खेत में उतारी और वह पीछे वाला ट्रक मेरे सामने वाले ट्रक से इतनी जोर से टकराया कि उसमें रखा ट्रेक्टर नीचे लुड़क गया और न केवल एक्सीडेंट बचा जाने मुझेमें कहाँ से इतना साहस आया कि गाड़ी को खेत में कुदाता हुआ सारे जाम को पार करता हुआ आगे निकल गया और कार्यक्रम में समय पर टोली को उज्जैन पहुँचा दिया मुझे लगा कदम कदम पर गुरुजी साथ रहते हैं। ऐसी ही एक घटना जब घटी जब मैं देहरादून से ऋषिकेश जा रहा था ५०, ५५ कि०मी० की स्प्ीड पर ब्रेक फैल हो गया। आगे पीछे गाड़ियाँ थीं मैंने किसी तरह दो गाड़ी के बीच में से गाड़ी निकालकर देहरादून रास्ते पर गाड़ी चला दी जो खाली था और एक्सीडेंट बच गया।

मेरे पिताजी वृद्ध हो गये थे मेरे बड़े भाई शादी के बाद कोई जिम्मेदारी नहीं संभालते थे और मेरी छोटी बहन की शादी का उत्तरदायित्व मेरे पिताजी ने मुझको सौपा जबकि मेरी सामर्थ्य शान्तिकुँज के एक स्वयंसेवक की होने पर बहुत ही कम है। मैंने आदरणीय शैल जीजी से जाकर अपनी पूरी कहानी सुनाई तो वे बोली भाई साहब आप थोड़ा प्रयास करना माँ की गुरुजी की कृपा से सब हो जायेगा। और अचानक मेरे छोटे जीजाजी के भाई जो ग्रेजुएट भी है बातचीत में शादी ठीक भी हो गई और मेरी बहन बहुत सुखी है।

१६-१-५१ को मैं ओमप्रकाश भाई साहब यानी गुरुजी के बड़े लड़के के साथ आँवलखेड़ा गया। वहाँ उन्होंने अपने पुराने बचपन के मित्र दरोगा जी से मिलाया उन्होंने बतलाया कि मैं पुलिस में कान्सटेबिल और हेड कान्सटेबिल था मुझे पता लगा कि मथुरा में आचार्य जी से मिलने तत्क लीन मंत्री लालबहादुर शास्त्री आये थे जो बाद में प्रधानमंत्री बन गये। मैंने आचार्य जी से कहा कि आप मेरी सिफारिश कर दो। गुरुजी ने कहा मैं कोई सिफारिश नहीं करता। तो मैं बोला आचार्य जी से तो फिर मैं सिपाही बना रहूँ। जैसा आप चाहो। गुरुजी ने मेरी तरफ देखा और मेरे सिर पर तीन बार चाँटा लगाते हुये बोले तू थानेदार बनेगा, थानेदार बनेगा, थानेदार बनेगा। ऐसा कहते कहते दरोगा जी की आँखों में आँसू आ गये और उन्होंने उस चित्र की ओर इशारा किया जो उनका दरोगा की ड्रेस में था।

सन् १९८४-८५ में माताजी ने ओमप्रकाश भाई साहब को २ पीले कुरते औरधोती भिजवाये और कहा ओमप्रकाश से कहना कि यह मेरा आशीर्वाद है और जब कभी भी वह कार्यक्रम में जाये इन्हीं को पहने।

ओमप्रकाश भाई साहब सुनाते हैं कि १९७१ में गुरुजी मथुरा से हरिद्वार आ गये दूसरे दिन उन्हें अज्ञातवास को जाना था २०, २१ जनों की उन्होंने गोष्ठी ली और कहा कि कल रात किसी समय भी मैं चला जाऊँगा जो लेटा है वह लेटा रहे जो बैठा है वह बैठा रहे कोई भी प्रणाम करने नहीं उठना। कोई लाइट नहीं जलाना मैं दरवाजे के कोने पर सारी रात खड़ा रहा देखता रहा पिताजीकब जाते हैं। रात २ बजे पिताजी उठे नहाधोकर शान्तिकुँज के अखण्ड दीपक की ५, ७ मिनट पूजा की। एक झोला लटकाया और जैसे ही जाने लगे मैंने देखा वे बोले ओमप्रकाश मैंने प्रणाम किया पिताजी बोले चलेगा। मैंने कहा चलूँगा। और उन्होंने थैला मुझे पकड़ा दिया। मोतीचूर के रास्ते पिछले गेट से हम लोग चल दिये नीचे कुछ लोग जगे थे पर सब खड़े रहे पगडंडी के रास्ते चार किलोमीटर गये कोई बातचीत नहीं हुई सूरज निकलने से पहले बोले अब तू जा। और बताया कि यह पगड़डी रायबेला की सड़क से जुड़ जायेगी वहाँ से शान्तिकुँज लौट जाना पिताजी ने अपने पाकेट से एक चवन्नी निकालकर मुझे दी। जैसे ही मैं गेट से घुसा कि दानाभाई जबलपुर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे बोले ओमप्रकाश गुरुजी ने तुझे क्या दिया। मैंने कहा एक चवन्नी बोले ये तू मुझे दे दे। मैंने चवन्नी दे दी।

सन् १९५८ में जब गुरुजी अज्ञातवास गये थे। तब भी मैं गुरुजी के साथ उत्तरकाशी में गया। पिताजी ने खाना बनाकर खिलाया। १५-१-९९ शाम तीन बजे ओमप्रकाश भाई साहब ने बतलाया। कि जिस दिन माताजीकी मृत्यु हुई उनकी चिता चल रही थी माताजी की बहन यानी मेरी मौसी ने मुझसे कहा ओमप्रकाश मेरे कमरे में चल। मुझे वे ले गयी। कमरे में ले जाकर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपने सिर पर रखकरकहा ओमप्रकाश तू मेरी कसम खा मेरे एक प्रश्र का जवाब दे मैंने कहा मौसी जी कसम खाकर तो आदमी केवल झूठ ही बोलता है निरा झूठ जितने लोग अदालत में गंगा गीता रामायण कुरान की कसम खाते हैं वह झूठ के अलावा कुछ नहीं बोलते। मैंने कहा मौसी माताजी की चिता चलरही है लौ उठ रही है तुम उसकीतरफ देखो मैं उसकी तरफ देखता हूँ। और मौसी आपको नहीं उन्हीं माताजी को साक्षी मानकर कहता हूँ आप पूछिये मैं जवाब दूँगा। मौसी बोली तेरी ये माँ भगवती देवी शर्मा मेरी छोटी बहन थी। तू ये बता कि इनने मेरे साथ क्या दूसरी माँ जैसा व्यवहार किया। मैंने कहा मौसी मुझमें पहले क्लास के बच्चे की तरह सारी बुराइयाँ थी पर इन्होंने मेरे साथ सिर्फ केवल माँ और माँ का ही व्यवहार किया। पिताजी से भी अधिक मुझे इनसे अपनी माँ का ही व्यवहार मिला।

सन् १९३९-४० में पिताजी फ्रीगंज आगरा में थे। मैं प्रायमरी में पढ़ता था। मैं पिताजी के ध्यान के केन्द्रित करने की क्षमता की एक घटना सुना रहा हूँ। हम लोग एक शादी में गये। चबूतरे पर फर्श बिछा था। पिताजी एक किताब पढ़ रहे थे। पढ़ते-पढ़ते उनको नींद सी आ गई। और जहाँ पढ़ना खतमकिया था यानीउसी शब्द पर ऊँगली रखकर उन्होंने एक झपकी ले ली। पिताजी के भतीजे रघुनाथ प्रसाद शर्मा जो पिताजी से ९ माह छोटे थे को मजाक सूझा और उन्होंने धीरे सेधकेलकर ऊगली को कुछ ऊपर उठा दिया। और चुप बैठ गये। पिताजीकी झपकी टूटी पीछे देखा उनका भतीजा बोला क्यों रघुनाथ तैने यह किताब हटाईक्या। बोले नहीं मैं कुछ नहीं जानता। पिताजी बोले जिस लाइन पर मेरी ऊँगलीरखी है यह लाइन तो मैं पहले पढ़ृ चुका हूँ और हँस दिये ऐसे आत्मसात होते थे पिताजी पढ़ाई में। वे दूसरी घटना सुनाते है कि यदि कोई छोटा व्यक्ति भी किसी बात पर अकड़ जाये तो भी पिताजी विरोध की भाषा उपयोग नहीं करते थे बल्कि चुप हो जाते हैं। एक बार क्या हुआ कि मैं माताजी से क्रोध में कुछ कहने लगा जो शायद पिताजी को बर्दाश्त नहीं हो रहा था और वे उसी क्रोध में बोले नीचे जा। मैंने भी जवाब दे दिया। मैं आपके पास नहीं आया मेरी ताई जी मेरी ताई नहीं ताजमहल है। पिताजी ने क्रोध के शब्द बदले औरबोले ओमप्रकाश मैं ये नहीं कह रहा मैं कह रहा हूँ कि रात बहुत हो गई है तू सो जा और आगे बात कल कर लेना उनके स्वर बड़े शान्त भाव के थे मुझे सुनना पड़ा।

एक दिन में बहुत रोया अमल कुमार तेरी जिन्दगी बेकार है। तुझमें अकल नाम की कोई चीज नहीं है। गुरुजी के चरण पकड़े तो छोड़े क्यों। गुरुजी ६ दिन तेरे घर रहे। इतना साथ रहा अच्छा माताजी भी कितने समय और गुरुजी का समय तूने बातों में बरबाद किया। ५ मिनिट तो क्या एक मिनिट भी माताजी के चरण पकड़कर बैठा नहीं। क्या बैठ नहीं सकता था? माताजी मैं क्यों नहीं बैठा और अगर नहीं बैठा तो आप ही कृपा कर देती। मेरे अन्दर से किसी ने कहा। अमलकुमार तूं झूठ बोलता है। तूँ कभी चरण पकड़कर नहीं बैठा। मैंने कहा माताजी शायद मैं झूठ नहीं बोलता। आधे मिनिट भी मैंने कभी आपके चरण नहीं पकड़े होंगे। माताजी बोली तंू झूठ बोलता है। मैंने कहा मैं क्यों झूठ बोलूंगा। माताजी हँसी और बोली अच्छा तूँ सच बोलता है तो सुन। मेरा जब बाँयी ऑंख का केटैरेक्ट आपरेशन हुआ जब सतीश प्रणव और तूँ था औेर जब मुझे तखत से टेबल पर लिया गया तब मैंने तुझे याद किया था और तेनें कहा कि मैं यहॉं हूँ माताजी तेरे हाथ मेरे दोनों चरणों पर रहे औेर आपरेशन के बाद तक रहे याद आया। मैंने कहा हाँ माताजी याद आया। क्या मैं माताजी के इस प्यार को अपने जीवन की पूर्ण सफलता मानूं।

प्यार और आशीर्वाद हमेशा बढ़ता रहेगा

सन् १९७१ में माताजी बीमार थीं और गुरुजी अज्ञातवास में। मुझे खरगौन में तार मिला बलराम भाई साहब ने लिखा था माताजी सख्त बीमार हैं गुरुजी ने तुमको आने के लिये निर्देश दिया है शीाघ्र चले आओ। मैं चल दिया मोटर ट्रेन जो भी मिली और हरिद्वार पहुॅंच गया। माताजी ने कहा मुझे कोई दिल का दौरा नहीं है। मैंने साधना मैं गुरुजी को देखा वे ठंड में सिकुड़ रहे थे। उनका कुरता फटा था उनका कष्ट देखकर मैं चीख उठी। मैंने कहा माताजी आप हमारी गुरुमाता है आपके सारे शब्द मेरे शिरोधार्य हैं पर एक डाक्टर के नाते आप ईसीजी से चेक करा लें। उन दिनों हरिद्वार में कोई ईसीजी नहीं था। माताजी ने कहा आज रात सतीश आयेगा। तुम दोनों देहरादून चले जाना। दूसरे दिन डाक्टर एवं ईसीजी मशीन दोनों को लाये चेक किया सब ठीक निकला। माताजी के लिये मैं बहुत सी दवायें तथा इंजेक्शन पैथीडीन भी लाया था। रक्तचाप के उपकरण का कफ माताजी के हाथ में छोटा पड़ गया माताजी कुछ ठीक हुई मैं जाने लगा तो माताजी ने कहा एक दिन और रुक जा मैंने कहा जी माताजी दूसरे दिन जाते समय माताजी उठीं मैंने बहुत कहा पर वह रुकी नहीं और ऑंखों में आंसू भरकर बोली बेटे मैं तुझे क्या दूं स्वयं उठकर भस्मी देने लगीं। मैंने कहा माताजी यदि देना ही है तो मुझे दीजिये आपका निरन्तर बढ़ता प्यार। माताजी ने कहा मेरा और गुरुजी का प्यार निरन्तर बढ़ता रहेगा। माताजी बीच-बीच में मुझे याद दिलाती रहीं कि मेरा प्यार बढ़ रहा है न मैंने कहा जी माताजी यदि मैं आज माताजी से पूंछ सकूँ तो शायद जवाब तो वही होगा चाहे मैं सुन सकूँ या नहीं।

गुरुजी मथुरा छोड़ने के पहले अपना सब कुछ बॉंट गये। अपने बेटे सतीश के लिये कहा। कि उसे पढ़ा लिखा दिया और २ प्रिंटिंग मशीन उसकी होंगी। बेटी शैला की शादी कर दी। चार आत्मदानियों को यानी शंभूसिंह चमनलाल गिरजासहायऔर एक और को वेद प्रिंटिंग आदि बराबर का भागीदार बनाया। ऑंवलखेड़ा में कालेज अपनी मॉँ कुंवरबाई के नाम से खोला गया माता जी के गहने पण्डित लीलापति शर्मा जी ने किसी भी स्थिति में बेचने नहीं दिये और आज भी तपोभूमि में ही हैं। जमीन और पैतृक सम्पत्ति तपोभूमि में ही लग गयी। गुरुजी की माताजी जिन्हें हम ताईजी कहते थे बहुत नाराज हुई। बोली श्रीराम अभी मैं जिन्दा हूं तूने सब बॉंट कैसे दिया। गुरुजी बोले तुम्हारे हिस्से में दो चीज हैं एक मैं और दूसरा २०० रुपया प्रतिमाह केवल अपने ऊपरी खर्चे के लिये। गुरुजी ने केवल धन सम्पत्ति ही नहीं बाँटी लेकिन अपना शरीर मन बुद्घि प्रतिभा भगवान के काम में लगाये। जब तक गुरुजी हरिद्वार में रहे सतीश ढाई सौ से ५०० रुपया प्रतिमाह भेजता था वे २५० रुपये वाले रिक्शे में तब बैठे जब पेमेंट सतीश ने कर दिया। गुरुजी कहते थे कि बेटा अपने बाप को पैसा नहीं देगा सेवा नहीं करेगा तो अगले जन्म में बैल बनेगा। डॉ० प्रणव का जब एक्सीडेंट हुआ था बीएचईएल में तो दिल्ली भेजने में केवल देर इसलिये हुई कि सतीश को रात में पैसे लेकर मथुरा आना था किसी भी स्थिति में गुरुजी ने पोस्टआफिस या बुक स्टाल से पैसे लेना स्वीकार नहीं किया।

एक गोष्टी में गुरुजी ने कहा कि किसी सामाजिक संस्था को केवल तब तक चलना चाहिए जब तक उसे जनसामान्य का सहयोग मिलता रहे जनता का विश्वास अर्जित होते रहना चाहिए यदि तुम्हें वह सहयोग न मिले तो संस्था बन्द कर देना क्योंकि बिना दिये आध्यात्म नहीं उपजता मैं इन बिल्डिंगों को सरकार, स्कूल व अस्पताल को दे देना पसन्द करूंगा। यदि शक्तिपीठ जनजागरण के केन्द्र न बनें और लड़ाई झगड़े हों तो गायत्री मॉँ की मूर्तियॉँ यहॉं उठा लाना। और वेदमाता गायत्री ट्रस्ट उनकी पूजा आरती नियमित करता रहेगा। बिल्डिंग स्थान को सार्वजनिक उपयोग का स्थान बना देना। समर्पण का अर्थ किसी के अधीन होकर नहीं अपने सद्गुण व योग्यता का आदर्श के लिये उपयोग करना है। श्रद्घा किसी व्यक्ति के प्रति नहीं आदर्श के प्रति असीम प्यार को कहते हैं।

गुरुजी ने कहा बच्चो जो तुम लोग शान्तिकुॅंज के स्थाई सदस्य हो हमारे बच्चे हो और हम किसी से बिछुड़ने के लिये कभी मिलते ही नहीं है और यदि प्यार करते हैं तो फिर पूरा ही प्यार करते हैं। हम तुम लोगों को समाज के काम के लिये लाये हैं तुम्हारे संस्कार अच्छे बने इसलिये हम तुम्हें बाहर का अन्न नहीं खिलायेगे। उसकी व्यवस्था तुम्हारे गुरु तुम्हारे पिता ने कर रखी है यह तुम्हारा हक है जब तक यहॉँ रहोगे मोटा अन्न मोटा वस्त्र हमारा उत्तरदायित्व रहेगा क्योंकि तुम कमाओगे नहीं। हमारे जीवन भर बच्चे रहोगे। यहॉँ गुरुजी के ही शब्दों को उच्चारित कर रहा हूॅं।

आँटे का घाटा नहीं घी के नहीं दर्शन ऐसे ही जीना है तुमको बर्सन।

वीरेश्वर उपाध्याय जी का पुत्र गुरुजी के पास आया। मै भी वहीं बैठा था। वह गुरुजी से कहने लगा गुरुजी मुझे मृत्यु का डर लगता है। गुरुजी ने कहा मृत्यु का डर का कोई कारण नहीं सिर्फ जीवन की उपयोगिता की कमी है। और मुझसे कहा कि अमलकुमार इसको तू एक गीता लाकर के दे। उसे पढ़ तेरा डर दूर हो जायेगा। पर डर उसको जरूर होगा जिसे अपने कर्म और विचारों पर नियंत्रण नहीं है। मैंने तभी गीता लाकर दी।

सन् १९६२-६३ की बात होगी गायत्री तपोभूमि के दाँई ओर वाले कक्ष में गुरुजी का प्रवचन हो रहा था। मैं भी सुन रहा था पीछे से किसी ने एक चिट आगे बढ़ाई और सबसे आगे वाले ने गुरुजी को दी। प्रवचन बन्द हो गया। गुरुजी ने सूचना दी कि रेडियो न्यूज आयी है कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का दिल के दौरे में स्वर्गवास हो गया। जो बच्चे उपवास करना चाहें सूचना दे दें। बाहर निकलते ही मैंने गुरुजी से पूँछा गुरुजी क्या सुभाषचंद्र बोस प्रकट हो जायेंगे और प्रधानमंत्री बनेगे। गुरुजी ने कहा प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री बनेगे। उस समय तक ऐसी कोई सूचना न थी।

जुगलकिशोर बिड़ला गुरुजी के पास आया करते थे जब भी उन्हें बिड़ला मन्दिर आना होता अपने मैंनेजर से पता लगाते कि यदि आचार्य जी होंगे तो ही मैं आऊँगा। जब चीन जीतता जा रहा था घनश्यामदास बिड़ला ने गुरुजी से पूँछा गुरुजी अब क्या करें मैं अपना पैसा विदेश बैंक में स्थानान्तरित कर दूँ क्या? चीन आगे बढ़ रहा है भारत का क्या होगा। गुरुजी ने कहा युद्घ ७ दिन में बन्द हो जायेगा। एक बार जुगलकिशोर बिड़ला जी ने गायत्री तपोभूमि गुरुजी के साथ घूमकर बड़ी प्रशंसा की और प्रार्थना की कि भारतीय संस्कृति के इस कार्य में क्या मैं थोड़ा सहयोग कर सकता हूॅं गुरुजी ने कहा अवश्य पूरा सहयोग करिये। पर हमारे और आप के बीच में पैसे को मत आने दीजिये। नहीं तो यह तपोभूमि बिड़ला मन्दिर बन जायेगी। जुगलकिशोर बिड़ला जी बोले तो फिर मेरी एक प्रार्थना स्वीकार करेंगे गुरुजी ने कहा अवश्य। वे वोले मेरी प्रार्थना है कि मेरी मृत्यु के समय आप मेरे सामने बैठे। गुरुजी ने कहा यही होगा और उनके अन्त समय उनका टेलीग्राम आया था और गुरुजी दिल्ली पहुॅंचे उनकी मौन भाषा न तो किसी ने सुनी और न ही गुरुजी ने मुझे बताई।

चेतन्य बड़ेरिया जी पण्डित लीलापति शर्मा जी को सर्वप्रथम मिशन में लाये। डबरा स्टेशन पर उनसे मिलना हुआ। काफी दिनों बाद जब चेतन्य जी मथुरा आ गये तब उन्होंने गुरुजी से पूछा कि गुरुजी अब तो हम नौकरी छोड़का आ गये पर आप यह बतलाइये कि युग निर्माण होगा कैसे दूर दूर तक कोई आसार नहीं। गुरुजी ने कहा अच्छा तो सुन मेरे गुरु ने मुझसे कहा कि तू मुर्गे की तरह बाँग लगा तूने कभी मुर्गा देखा है बाँग लगाते हुये किस अकड़ के साथ गरदन टेड़ी करके बांग लगाता है ऐसे ही मुझको कहा तू बांग लगा युग निर्माण होकर रहेगा। मेरे दिल में भी एक ऐसा ही मुर्गा बैठा है जिससे मुर्गे की तरह यह मालुम पड़ जाता है कि सबेरा होगा और वह अकड़कर बांग लगाता है इसलिये मैं तुझसे कहता हूैं कि तूं बांग लगा युग निर्माण होकर रहेगा। सबेरा मुर्गा नहीं करता सबेरा करने वाला कोई और है। तू मेरा छोटा मुर्गा है तू मेरा कहना मान मुझे तो पूर्व सूचना है ही तू थोड़ा सहयोग और उत्तरदायित्व निभा युग निर्माण हो जायेगा।

इस संस्था से मेरा पहला परिचय मैं अपने बड़े भाई डॉ० धीरेन्द्रनाथ दत्त से मिलने मरदानपुर गया। हम लोग नॉंव में नरबदा पर जा रहे थे और वे वेद- द्वैत अद्वैत की बात सुनाने लगे। मैंने कहा इतना ज्ञान कहां से आया। उन्होंने कहा कि एक मास्टर साब ने एक किताब दी है उसमें सब कुछ है। मैंने कहा यह किताब मंगा दो कितने पन्ने की है मैं पढ़ ढालूगां। उस दिन नॉंव नहीं ढोगी में हम लोग ढूबते-ढूबते बचे और उसके बाद हमारे बड़े भाई तो कभी नॉंव में बैठे ही नहीं। इंदौर आकर मैंने किताबें मंगाई गुरुजी को सम्पादक जी लिखकर और किताब पढ़कर मानो कनेक्शन ही जुड़ गया और उस दिन से जब तक आ नहीं गया यहॉँ यानि सन् १९८३ तब तक नियमित लगभग ३०० पत्र में लिख चुका हाऊंगा। मैंने अपनी सारी कमियॉं और बुराईयॉं गुरुजी को लिख दी। पत्र का उत्तर मिला जीवन पर्यन्त हमारा मार्गदर्शन मिलेगा।

माताजी के पास शायद बिना कुछ सोचे और जाने समर्पण होगा। पहला पत्र मैं किस तरह से अच्छा लिखूं यह सोचने लगा फिर मैंने तुलसी दास जी की विनय पत्रिका निकाली और उसी की नकल के आधार पर पत्र लिख दिया और सर्वप्रथम अपने पिता डॉ० नगेन्द्रनाथ दत्त के साथ माताजी से मिला। मेरे पिताजी ने कहा था आज केवल दो व्यक्ति के पास अध्यात्म है एक हैं हनुमान प्रसाद पोद्यार (तब वे थे) और दूसरे पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य। उन्होंने सैंट्रल लायब्रेरी में गुरुजी की बहुत किताबें पढ़ी थी। पिताजी ने ही मुझे ३ रुपया प्रतिवर्ष सदस्यता पर अखण्ड ज्योति का पाठक बनाया।

पहली बार पिताजी के साथ मथुरा सन् १९५९ में गया था। तपोभूमि में ठहरा था। उस समय मैंनेजर द्वारका प्रसाद जी थे। प्रातः तॉंगे में हम दोनों तपोभूमि से घियामंडी जाने लगे। बस हम तॉंगे में बैठे ही थे कि ऐसा लगा कि मुझे माताजी में जाने क्या मिलने वाला है मेरी कौन सी खोई हुई बहुमूल्य चीज मिल रही है। मेरे पूर्व जन्म की कौन सी असफलता सफलता में बदलने वाली है। कोई बहुत बड़ी चीज के पास मैं आता जा रहा हूॅं। एक अपार खुशी मालुम नहीं क्यों अनुभव कर रहाथा। माताजी के चरण स्पर्श करूंगा पर छोड़ूगा नहीं जब तक वे मुझे अपना न ले। क्या चरण पकड़े रहना अच्छा होगा क्या सभ्यता होगी क्या करूं क्या न करूं मुॅँह से जोर से आवाज निकली जैसे की माताजी के पास पहुॅंच गया- माताजी पिताजी बोले क्या हुआ। मैंने कहा कुछ नहीं बाबा। मैं संभला और पहुॅंचा चरण स्पर्श किये मैंने पूछा गुरुजी कैसे लिखते हैं। माताजी बोली बहुत तेज लिखते हैँ और कलम उठाते नहीं। मैंने कहा क्या वे मुझको आप की ही तरह प्यार करेंगे। माताजी ने कहा मुझसे भी अधिक। मैंने पूछा माताजी आप मुझे गायत्री मंत्र सुनाये, अखण्ड दीप दिखायें और कहा कि गुरुजी तुमसे ५ जून १९६१ में आकर अवश्य मिलेंगे। खाना खाओं। पिताजी ने कहा हमारे यहॉँ रिश्तेदार हैं वहॉँ खायेंगे। माताजी ने बड़े अधिकार के साथ कहा खाना रिश्तेदार के घर नहीं अपने घर खाना चाहिए। चुपचाप हम लोगों ने खाना खाया और माताजी के हाथ का खाना सन् १९७१ तक खाते रहे। घी चुपड़ी रोटी और अचार अवश्य होता था। बर्तन हमेशा माताजी ही मांॅजती थी कभी छीने नहीं देती थीं। इसके बाद तो आना जाना बना ही रहा। हमारे छोटे भाई यतीन बहुत अधिक जाताा था। हमारा पूरा परिवार औरशादी के बाद श्रीपर्णा नियमित जाते थे। श्रीपर्णा को गुरुजी बहुत प्यार करते थे। सतीश गुरुजी के पुत्र तथा चंद्रशेखर शर्मा गुरुजी के बहन के लड़के हमारे बहुत अच्छे दोस्त रहे हमारे साथ साथ रहते थे और आज भी है। गुरुजी की माताजी ताई जी हमको बहुत प्यार करती थी और हमारीऔर चंद्रशेखर की खाने पर प्रतीक्षा करती रहती थी। हम कभी चूकते तो दूसरे दिन पूंछती क्यों नहीं आये हम दोनों हॅंसते क्योंकि हम दोनों बाहर खाना खा लेते थे।

प्रो० रामचरण महेन्द्र जी कोटा में प्राध्यापक थे एवं अखण्ड ज्योति के सह सम्पादक। गुरुजी के मित्र एवं शिष्य भी। उन्होंने कई किताबें लिखी। एक दिन हम और चंदा उनको स्टेशन पहुॅंचाने की जिद करने लगे। तो उन्होंने गुरुजी से मना करने के लिये कहा। गुरुजी बोले ये ओकट फोकट हैं इनको जाने दो। रास्ते में तॉंगा पलट गया और कोई चोट नहीं आयी। हम लोगों को चाय पीने की आदत थी ज्यादा रात मेंमथुरा में कहीं चाय नहीं मिली तो हम लोग दूध ले आये और सतीश से कहा कि कहीं सेस्टाव्ह, चाय की पत्ती और शक्कर का इंतजाम करो। हम लोग तलघर में ठहरे थे सतीश पं० लीलापत शर्मा जी के पास गये और बोले कि डाक्टर साब के चोट आ गई है इसलिये सेक करना है और रसोई में जाकर के स्टोव्ह के साथ शक्कर और पत्ती भी ले आये। पण्डित जी हमको देखने चले आये फिर तो बड़ी मुसीबत थी सतीश जी बोले डाक्टर अभी-अभी सोया है उनको मत जगाओ। पण्डित जी को पता लग गया और सबेरे गुरुजी से शिकायत की। गुरुजी ने कहा लीलापत रोज इनके चाय पीने का इंतजाम कर दो।

गुरुजी से पहली बार १४ जून १९६० को मिला। गायत्री जयंती का दिन और यही दिन उनके अन्तिम दर्शन का भी था। मैं घियामंडी पहुॅंचा नीचे बैठा रहा और फिर किसी से पूंछा। गुरुजी यहॉँ आयेंगे क्या। एक कर्मचारी ने कहा सामने जो जाली में घूम रहे हैं वह गुरुजी हैं। चले जाओ। मैं सीढ़ियों से चढ़ा प्रणाम किया। गुरुजी ने पूंछा अकेले आये। मैंने कहा जी। तभी मैंने माताजी को प्रणाम किया। १०, १२ व्यक्ति गायत्री जयंती के दिनखाना खा रहे थे उनके साथ बैठ गया। मैंने देखा कि माताजी ने गुरुजी के कान में कुछ कहा।माताजी को मैँ विनयपत्रिका की नकल करके भावनापूर्ण पत्र लिखा करता था। माताजी की बात सुनकर गुरुजी जहॉँ हम खाने बैठे थे आये। और बोले अमलकुमार कौन है। मैँ घबराकर खड़ा हो गया। गुरुजी बोले बैठो-बैठो खाना खाओ। खाना खाकर तपोभूमि मेरी प्रतीक्षा करना मैँ पूजा करके आता हूॅं तुमसे बहुत बातें करनी हैं। मुझे खुशी, आश्चर्य और उत्कंठा सब एक साथ होने लगी। तपोभूमि गया और प्रतीक्षा में सो गया। गुरुजी सामने आकर खड़े हो गये मैँ उठ गया और यज्ञशाला के सामने खड़े होकर परिक्रमा मेंबहुत लम्बी बातचीत हुई। उन्हीं बातों में मुझे विश्वास हो गया कि गुरुजी ने मुझे अपना लिया और मैँ उनका हो गया। ऐसा मैं क्यों कह रहा हूॅं क्योकि वे मेरे दिल और दिमाग में छा गये। समय लगभग २ बजे का होगा बिना किसी परिचय के या गुण के इतनी लम्बी प्रेमभरी बातें जैसे माना अज्ञात तालों की कितनी ही चाबियॉं वे मुझे देते जा रहे थे। उन्होंने कहा तुम गायत्री मंत्र से साधना शुरू करों पर मूल वस्तु साधना की सफलता है और वह है तुम एक अच्छे इंसान बनो। बिना उसके पूजा में कुछ नहीं मिलेगा। और यदि तुम एक अच्छे व्यक्ति एक अच्छे डाक्टर बन सके तो तुम्हारी २, ३ माला लौकिक और पारलौकिक सुख से भर देंगी। तुम एक बहुत बड़े अस्पताल के एक शानदार डाक्टर बनोगे। मैँ यह सारी बातें ऐसे ही नहीं कहता मैँ जानता हूॅं मैँ तुम्हारे साथ हमेशा मदद के लिये रहूॅंगा। वेसाथ-साथ घूमते कभी रुकते और कभी चलते और मैं सुनता। उस समय गुरुजी के अलावा न मैँ था और न ये दुनिया। मेरे गुरु तो वह २७ जुलाई १९६१ यानि १३ दिन बाद गुरुपूर्णिमा पर बने। गुरुजी ने स्वयं अकेले मुझे गायत्री तपोभूमि यज्ञशाला में दीक्षा दी मैंने जो दक्षिणा दी उन्होंने कहा इसकी रसीद कटाओ। गुरुजी कहते थे उलझे को सुलझाना और रूठे को मनाने की कला ही जीवन की सफलता का एक मत्र है।

गुरुजी सन् १९६१ में हिमालय की यात्रा से लौटे ही थे और मैँ दूसरी तीसरी बार ही मिला था कि तपोभूमि गेट के दायी ओर हाल में २०, २५ लोगों की गोष्ठी ले रहे थे। वार्ता उद्बोधन के बाद गुरुजी ने ऊंगली से दिखायाा एक दो तीन चार पाच ये व्यक्ति घियामंडी पहुॅंचे। विशेष बात करनी है। बाद में उठकर मुझसेकहा इन पॉंच में तुम भी एक हो। मैं बिल्कुल नया गायत्री से जुड़ा था। पिताजी मेरे राम के भक्त थे। उन्होंने कई बार रामायण पढ़ी और गोस्वामी तुलसीदास जी को अपना गुरु मानते थे साधु सन्तो का नाम सुनते ही मिलने जाते थे। बहुत धार्मिक और दयावान आदमी थे। कष्ट में हरएक को मदद भी करते थे और रामनामबहुत लिखते थे। और जिसको प्यार करते थे उसके नाम से भी रामनाम लिखते थे। मैँ भी रामनाम और हनुमान चालीसा बहुत पढ़ता था। उस दिन गुरुजी ने अखण्ड दीपक साधना कक्ष के सामने बैठकर हम पॉंच व्यक्तियों को जो चटाई पर बैठे थे शक्ति संचार साधना की प्रथम दीक्षा दी। ये व्यक्ति थे १. जानकीवल्लभ जोषी, पुलिस अधीक्षक, जिनको ईमानदारी का पद प्राप्त हुआ था। कलकत्ते का परिवार एक और कोई था, और मैं गुरुजी ने कहा मैं और मेरे गुरु रविवार और बृहस्पितिवार को सूर्याेदय के एक घण्टे पूर्व से सूर्याेदय के एक घण्टे बाद तक तथा रात को ९ से साढ़े ९ बजे तक शक्ति का संचार करेंगे। किसी एक समय तुम लोग सिर्फ चुप बैठना। यदि इस शक्ति का सही उपयोग करोगे तो यह निरन्तर मिलती रहेगी। मैँ करता रहा और आज भी लगभग नियमित ही करता हूॅं। और मैंने एक दिन पूंछा गुरुजी मुझे तो कुछ भी नहीं मालुम पड़ता लगभग २५ वर्ष तो हो गये। गुरुजी बोले बेटा बिटामिन सी खाने से कुछ फायदा होता है। मैंने कहा गुरुजी यदि कमी होती है तो जरूर फायता होता है। वे बोले फायता मालुम पड़ता है मैंने कहॉं गोली क्या कर रही है यह तो मालुम नहीं पड़ता लेकिन तकलीफ दूर हो जाती है। गुरुजी ने कहा बेटा यह अच्छा है कि तुझे कुछ नहीं मालुम पड़ता जिस दिन मालुम पड़ने लगेगा उस दिन पगला जायेगा। ऐसे ही ठीक है।

गुरुजी सुनाते हैं कि आध्यात्म की खोज में मैं बहुत घूमा और कई प्रकार के ढोंगी व्यक्तियों सेभी मिला जिसका वर्णन मैंने योग के नाम पर मायाचार किताब मेंलिखा है। गुरुजी ने एक अखण्ड ज्योति में कुछ जादू भी सिखाये। उनमें से कुछ मुझे अभी भी याद हैं। इसके अतिरिक्त गुरुजी शान्ति निकेतन अरविंद आश्रम बिनोबा भावे तथा गॉंधीजी के आश्रम में भी रहे। मालुम नहीं क्यों गुरुजी कभी कलकत्ते नहीं गये। मालुम नहीं क्यों। गॉंधीजी के आश्रम में २, ३ महीने रहने के बाद जब उनको कोई आध्यात्म नहीं दिखा तो एक दिन वहॉं के व्यवस्थापक ने गॉंधीजी के साथ गुरुजी को घूमने भेज दिया। यह व्यक्ति थे मनुभाई देशाई। उन्होंने कहा तुम अपना प्रश्न गॉंधीजी से ही कर लेना। गुरुजी ने अपना प्रश्न रख दिया। साफ शब्दों में। गॉंधीजी बोले तुमसे जो छोटे काम यहॉं कराये और अच्छी तरह से किये बस एक बात का ख्याल करना कि काम इतना इच्छा करना कि उससे अच्छा हो ही न सके। यही है अध्यात्म का दर्शन। पाखाने की सफाई इतने अच्छे से होनी चाहिए कि वहॉँ बैठकर खाना खाया जा सके। दातून काा उतना हिस्सा कैची से काटकर फैक देना चाहिए। जिसका उपयोग कर लिया गया हो पूरा नहीं। और एक बात याद रखना। स्वतंत्रता के बाद तुम राजनीति में न रहना। रााजनीति में मैंने जिस चरित्र चिन्तन और आध्यात्म का उपयोग किया उसका समयानुसार प्रयोग तुमको समझाना होगा। बिना चरित्र के और आदर्श के कोई देश समृद्घिशाली नहीं हो सकता। यह काम तुम सम्भालना।

यदि कोई व्यक्ति जरा भी अच्छा काम करता तो गुरुजी बहुत प्रशंसा करते। गुरुजी का कार्यक्रम गोरखी में था। गोरखी ग्वालियर में था जिसमें महाराजा विजयाराजे सिंधिया, मुख्यमंत्री एवं हाईकोर्ट जज शिवदयाल शर्मा जी भी थे। मैँ बुक स्टाल पर काम कर रहाथा। इन किताबों में क्या है और क्यों उपयोगी है बताबताकर बेच रहा था साराी किताबें मथुरा से आयी थी। यह घटना ६० के दशक की होगी उस समय लगभग दो ढाई हजार रुपये की किताबे तीन दिन में बिक गयी। गुरुजी को पता लगा उन्होंने बड़ी प्रशंसा की। गुरुजी ने कहा बेचने वाले के साथ उसका दिमाग, दिल पुरुषार्थ एवं मनोयोगछाया रहे तब किताबे बिकती हैँ। ज्ञानदान बड़ा दान है लेकिन उसकी उपयोगिता केवल तब है जब वह अपना प्रभाव चरित्र, चिन्तन और व्यवहार में दिखाये और तब यह छोटा काम तप बन जाता है और जैसे पदार्थ जगत में पैसे से कुछ भी खरीदा जा सकता है वैसे ही इस तप की पूंजी से प्रारब्ध कट सकते हैं। आध्यात्म शक्ति अर्जित की जा सकती है और चेतना का विकास किसी भी हद तक किया जा सकता है।

गुरुजी कहते थे जिसे व्यवस्था नहीं आती वह ब्रह्मराक्षस है और व्यवस्था का मतलब है किसी भी अच्छे और बुरे व्यक्ति से उसके गुण के अनुसार काम ले लेना। मुझे चोर पसन्द है पर पैसे का ठीक हिसाब रखना नहीं। प्रमाणिकता ही मनुष्यता का सम्मान है।

सतीश की शादी थी। शादी जब पक्की हुई तब गुरुजी ने अपने परिवार के बड़े बुजुर्गाे के लिए एक-एक रुपया लिया था मुझे और अपर्णा को एक-एक नोट लिफाफे में भेजा। शादी में मैँ गया। गायत्री तपोभूमि में यज्ञशाला की दीवाल से टिककर फर्श पर बैठे थे। हम लोग सामने बैठ गये। गायत्री मन्दिर के आगे मैंने कहा गुरुजी एक प्रार्थना है गुरुजी ने कहा पहले मेरी सुन। ८, १० व्यक्ति जो शादी में आये थे उनके साथ मैं भी बैठ गया। गुरुजी बोले कि जो कोई व्यक्ति शादी के लिये कोई उपहार लाया हो उसे वह अपने बक्स में ही रखे रहे नहीं तो उनका उपहार मैं नाले में फेंक दूंगा। सारे जीवन का एक ढंग मैं अपने लड़के की शादी में नहीं तोड़ूगाठीक से याद रखना। इससे पहले कि गुरुजी मुझे ढ़ूढ़ते कि मैँ भाग गया। मेरी बात बिना कहे ही ना हो गई।

गुरुजी बड़े मस्त थे। सतीश की शादी हो रही थी, हम लोग बस से मथुरा से आगरा गये थे शादी के समय हम लोग लिहाफ में बैठे थे गुरुजी के साथ। बुलाने आये गुरुजी बोले मेरी शादी थोड़े ही है सतीश की शादी है तो उसे ले जाओ। गुरुजी मुझसेबोले कि अमलकुमार तूं यहीं बैठ और अपना आधा लिहाफ मेरे पैरो पर ढक दिया। गुरुजी का कोई भतीजा जिनका नाम कुछ सतीश जैसा ही था अपने जीजीजी की बहुत तारीफ कर रहा था। गुरुजी सुनते रहे और फिर बोले तुमने अपने जीजा जी की बहुत तारीफ करी बस एक बात की कमी रही की तुमने यह नहीं कहा कि हमारे जीजीजी को गायत्री मॉँ चाय पिलाती थी। तभी एक बैंक में काम करने वाला रिश्तेदार बोला कि गुरुजी हमारे यहॉँ एक लेडी डाक्टर है सरकारी अस्पताल में डॉ० कुट्टी वे झूठे बिल दस्तखत करती है चाहे जितने बिल दस्तखसत करा लो २५ प्रतिशत उनका १० प्रतिशत दुकान वाले का बाकी कर्मचाराी का। जब कोई पूंछता कि यह नया जूता कहॉं से लिया तो कर्मचारी कहते यह कुट्टीमार का जूता है। बात समझ में आ जाती। मौका देखकर मैं भी बोल उठा गुरुजी मैंने अभी अभी एमएस कहाा है और हमारे सिविल सर्जन डाक्टर शुक्ला बड़े अजीब आदमी हैं। एक बार स्टेशन पर अपनी पत्नी को ही चॉंटा मार दिया सबको परेशान करते हैँ। मैंने जैसे ही अशोक नगर में ज्वाइन किया और एक पत्र भेजा तोउन्होंने उस पत्र पर लिख दिया डाक्टर दत्ता एमएस अटेन्शन प्लीज गुरुजी बोले उनका तबादला कहीं क्या कहतेहैं जो मेडीकल किताब बनाते हैँ। मैंने कहा मेडीकल मैनुअल। वहॉँ क्यों नहीं कर देते मैंने कहा गुरुजी यह तो बड़ा कमाल होगा और बहुत अच्छा भी मेरी जान बचेगी। लौटकर आया तो सर्जन शुक्ला जी का तबादला डिप्टीडायरेक्टर मेडीकल मेनुअल भोपाल हो गया।

गुरुजी देवास आये सन् ६६-६७ में जहॉं हम और हमारा छोटा भाई दिलीप सपरिवार रहते थे वहीं ठहरे। अरविंद और विवेक यानी बच्चेंा के संस्कार वहीं हुये। गुरुजीर बोले दिलीप हम तुम्हारे घर ठहरे हम कुछ देकर जा रहे हैं मालुम है क्या? दिलीप बोला गुरुजी आप बतलायें। गुरुजी बोले तेरे ये दो बच्चे जो जुड़वा हुये है इनमें एक का ही जीवन था अब ये दोनों पूरा जीवन जियेंगे। खाना खाते खाते मैंने कहा गुरुजी आप अज्ञातवास जायेगे तो ताई जी यानी गुरुजी की मॉं का क्या होगा। गुरुजी बोले मैँ उनके लिये स्थान ढ़ूढ़ रहा हूं वे किसी की गोद में खेलेगी। मैंने कहां वह स्थान कहॉं है गुरुजी बोले बम्बई। मैंने कहा किस घर में गुरुजी बोले तू क्या करेगा जानकर। मैँ चुप हो गया।

देवास में गुरुजी कही जाने की तैयारी में थे। कार से मुझे बुलाया दत्ता एक बात सुन जी गुरुजी देख जो व्यक्ति चार आदमियों को मेरे साथ खाना खाने बुलाये उसके यहॉँ तीन जायेंगे और जो तीन को बुलाये उसके यहॉं दो और दो को बुलाये उसके यहा मैँ ऐसा ही हो इसकी जिम्मेवारी तेरी है।

गुरुजी जीवन के सूत्र बड़ी सरलता से समझा देने थे कहते थे यदि तुम्हें कोई बड़ी चीज खरीदना हो तो उसमें प्रेम जोड़ देना जैसे रेडियो, घड़ी, फर्नीचर तो पत्नी के जन्मदिन याा विवाहदिवस पर जोड़कर आगे पीछे खरीदना जैसे बच्चों के जन्मदिन पर यदि किसी के घर ठहरो या उपकार लो तो शालीनता का पूरा ध्यान रखना। मिठाई का डिब्बा ले आये या पिक्चर दिखा दिया यह काफी नहीं है या तो सीधे पैसे दो या यह पता लगाकर कि उनकी आवश्यकता की चीज क्या है वह दो।

गुरुजी माताजी जीवन भर खादी पहनते रहे और वह भी गिने चुने कपड़े। लेकिन साफ और क्रीजदार। गुरुजी माताजी के जन्मदिन और विवाह दिवस पर स्वयं जाकर साड़ी खरीदकर लातेथे। एक बार कोई दूसरा व्यक्ति माताजी के लिये साड़ी लाया तो गुरुजी बहुत दुखी हो गये। गुरुजी बोले माताजी की साड़ी तू लाया तो मुझे दुखी कर दिया तू अपनी साड़ी वापिस सले जा माताजी की हर साड़ी पर मेरी जिम्मेवारी साड़ी नहीं स्नेह की भी है।

तीस वर्ष में सन् १९६० से ९० के बीच यह दूसरा समय था जबगुरुजी मुझपर नाराज हुए। एक नया लड़काथा केशरवानी उसको स्टाल पर हम लोगों ने काम दिया। अब वह सबेरे सेशाम तक बुक स्टाल खुला रखता। अखण्ड ज्योति के सदस्य बहुत बड़ी संख्या में बनाता। हमने उसको सारी जिम्मेदारी सौंप दी और वह जो सदस्य बनाता था वह ऊपरी रसीद पर तो ३५० रुपया लिखता था यानी आजीवन और कार्बन के नीचे ४० रुपया। काफी पैसे लेकरभाग गया। ब्रह्मवर्चस के बुद्घिजीवी कहलाने वाले सवों की गुरुजी के सामने पेशी हुई। गुरुजी बोले किसी आदमी का ऊपरी दिखावा या कार्य नहीं देखा जाता गहराई से जिम्मेदारी देने के पहले व्यक्तित्व परखना चाहिए दत्ता। इतनी ही खैर है कि यह केशरवानी तुझे अपना चेला बना कर नहीं ले गया। मैं सिर नीचा करके सुनतारहा हम लोग केशरवानी पर जरा ज्यादा ही विश्वास करने लगे थे।

सन् १९६७ में घियामंडी में गुरुजी ने कहा दत्ता तुझपर एक पॉंच कुण्डीय यज्ञ उधार है। मैंने कहा गुरुजी कब पटा दूं। गुरुजी बोले जून-जुलाई में कोई तारीख ले ले। मैं आऊंगा। मेरा मकान अस्पताल के साथ ही था औरगुरुजी वहॉं ६ दिन ठहरे। प्रातः चाय पीते में एक दिन बोले दत्ता में तुझे बहुत बड़ा आदमीबना सकता हूॅं। पर फिर तू एक अच्छा आदमी नहीं रहेगा। मैंने कहा गुरुजी मैं एक अच्छा इन्सान बनना चाहता हूॅं पैसे वाला नहीं। बड़ी प्रसन्न मुद्रा में गुरुजी ने कहा तो सुन तू अपने सारे जीवन में अगर पैसे फैकेगा तो भी तेरे पास मोटा खाने पहनने के लिये कभी कमी नहीं रहेगी यह मेरा आशीर्वाद है।

गुरुजी जाबरा सन् १९७१ में आये। बहुत अच्छा कार्यक्रम हुआ। कहते हैं इतनी बड़ी भीड़ जाबरा(म०प्र०)कइतिहासकभी नहीं हुई विजय सिंह एसडीओ पुलिस में तथा मेरे सहायक ५, ६ चिकित्सक तथा मेट्रन के साथ गुरुजी को अस्पताल का राऊंड लगवा रहे थे डॉ० माथुर ने बताया कि इस वार्ड के सारे मरीज डाक्टर दत्ता के आपरेशन किये हुये हैं और इनमें ३ व्यक्तियों को डाक्टर साब ने ही रक्त दिया है। गुरुजी बहुत प्रसन्न हुयेऔर बोले कि मै जप वाले नहीं ऐसे ही व्यक्ति गायत्री परिवार में चाहता हूॅं।

गुरुजी ग्वालियर गोरखी कार्यक्रम में आये थे। मैंने बुक स्टाल में काम किया २, ३ दिन में लगभग ढाई हजार रुपये की किताबें सन् ६८, ६९ में बेची। मैं गुरुजी के साथ ग्वालियर से मथुरा गया तो वेबहुत प्रसन्न होकर बोले कि मेरा सही स्वरूप मेरा साहित्य है और इस ज्ञान प्रसार का काम तूने मन से किया इससे मुझे बहुत अच्दा लगा और एक बात याद कर कि यदि मैं किसी को प्यार करता हूॅं तो वह छोटी बात नहीं है बड़ी बात है। गुरुजी जब गोरखी में स्नान करके बैठे ही थे कि हम ४, ५ व्यक्ति उनके सामने बैठ गये एक दम गुरुजी ने बोलना आरम्भ किया कि मैं इस डाक्टर को क्यों नहीं मदद करूंगा। मैं इसके काम से सूझबूझ से प्रसन्न हूॅं। और वे बोलते ही रहे बिना किसी रिफरेन्स के।

सन् ७२-७३ में गुरुजी अशोक नगर आये। तब मैं वहॉँ नहीं था। तायड़े साहब केयहॉं ठहरे थे। डॉ० प्रणव और जयपुर की मम्मी जी भी वहॉं आयी थीं। गुरुजी बोले अमलकुमार तू श्रीपर्णा के गहने वापस लेले मेरे ऊपर यह भारी वजन मत डाल। उनके ऑंखों में आंसू भर आये बोले मैं उन्हें कैसे अपनेर पास रखूं मैँ नहीं रख सकता। मैंने कहा गुरुजी मैं बहुत शरमिंदा हो रहा हूं। यह तो आपके चरणों में प्रणाम है क्या आप उसे लौटायेगे। आप कुछ भी करे किसी को भी दे बस ऐसा फिर कभी न कहें। मैं भी रोने लगा।

सन् १९७१ में गुरुजी अज्ञातवास जाने वाले थे। बिदाई में बहुत भीड़ थी वे मेरे पास आये और बड़ी प्रसन्न मुद्रा में बोले देख कितने डाक्टर हैं। मै रोने लगा। आगे कौन मुझे कौन इस नाम से बुलायेगा। गुरुजी सब कुछ समझ गये बोले मैं तुझे बिना सिविल सर्जन बनाये मरूंगा नहीं। अज्ञातवास से वापस आकर हरिद्वार में मुझे बहुत आशीर्वाद दिया कि तू माताजी की बीमारी में आया था मुझे एक एक बात की सूचना है। मैंने माताजी से कहा कि आपने बंगलादेश बनने की सारी सूचना गुरुजी को दे दी क्या। माता जी बोली अमलकुमार इस बंगलादेश की स्थापना में गुरुजी प्रथम पंक्ति के दर्शक ही नहीं भाग लेने वाले व्यक्तियों में बहुत क्रियाशील रहे हैं।

मैं एक बार बहुत परेशानी में फंस गया। एक मुसलमान ने मेरे ऊपर एक कोर्ट केस कर दिया गुरुजी ने कहा अमलकुमार मैँ अपनी अप शक्ति देकर भी कुछ नहीं होने दूंगा। यानि तुझसे कोई कुछ पूछ ही नहीं पायेगा और सचमुच कुछ ऐसा हुआ कि मेरे विरोध में न गवर्मेन्ट के सचिव आये न कोई विभाग का अफसर न कोई पुलिस और कोर्ट ने गवर्मेन्ट को एक कड़ी लताड़ दी और तत्पश्चात ही मेरा प्रमोशन भी हो गया यह एक आश्चर्यजनक घटना हुई। शान्तिकुञ्ज बनने में एक दिन गुरुजी ने मुझसे कहा कि अमलकुमार मैंने अपनी अप शक्ति का एक अंश तेरे लिये रखा है।

गुरुजी के साथ में ट्रेन में मथुरा सेग्वालियर जा रहा था। उन दिनों रेल में इंटरक्लास भी होता था हम दोनों उसी में थे। गुरुजी के बगल में एक मिलिट्री का सिपाही बैठा था चेकर आया और टिकिट देखे सिपाही के पास थर्ड क्लास का वारंट था टिकिट चेकर ने उसका परिचय पत्र माँगा और रख लिया और कहा कि टिकिट और फाईन के पैसे दो तब मिलेगा। सिपाही बोला मैं अगले स्टेशन पर उतर जाऊंगा मेरा परिचय पत्र दे दो। पर दो बार प्रार्थना पर भी उसने नहीं माना हम लोग देख और सुन रहे थे गुरुजी सिपाही को समझाने लगे बेटा तूने ऐसा क्यों किया मिलिट्री वालों से हम लोग नियम की अधिक आशा रखते हैं मैं सोचने लगा कि मैं पैसे दे दूं पर गुरुजी के सामने हिम्मत नहीं हुई। गुरुजी ने कहा जा अपना परिचय पत्र माँग ले और उतरकर तीसरे दर्जे मेंबैठ जा वह बोला वह देता ही नहीं गुरुजी बोले जातो वह उठा माँगा और उसने दिया और वह शीघ्र उतर भी गया।

गुरुजी बोले अमलकुमार मेरे झोले में से एक छोटी शीशी है निकाल और बता यह क्या दवा है। कम्पाउण्ड इस दस बीस बूँद दवा के लिये २ रुपये ले लेता है दॉंत के दर्द की दवाा है। मैं घबराया कैसे पहचानूंगा। शीशी निकाली सूंघा गुरुजी यह तो लोंग का तेल है सर्वथा पहचाना। इसे क्रोटनआईल कहते हैं। गुरुजी बोले अब हर बार २ रुपये नहीं देने पड़ेगे।

गुरुजी बोले तू सामने बैठ अच्छा बता पैट्रन टैंक कैसे चलता है। मैंने कहा गुरुजी मुझे नहीं मालुम। गुरुजी ने कहा उसमें सारा फायरिंग सिस्टम कम्प्यूटर का है। हिन्दुस्तान पाकिस्तान युद्घ में पाकिस्तानियों का गणित लड़खड़ा गया इसलिये इस कारण लाहौर से अमृतसर यानी स्वर्णमन्दिर में एक भी बम नहीं गिरा पाये। इनका गणित हमेशा कमजोर होगा। इसी प्रकार चीन युद्घ में भी हिमालय के ऋषियों ने भारत को मदद की।

जुलाई अगसस्त ६७ में गुरुजी अशोक नगर आये। कार्यक्रम के बाद हम लोग पास के अमाई डेम घूमने गये। वहॉं शीघ्र उतरकर मैंने एक सुंदर सा गुलाब का फूल गुरुजी को दिया और कहा गुरुजी आपसे इतना प्यार हो गया है तो जब कभी चले जायेंगे तो हमारा जीवन कैसा होगा यह सोचकर घबराहट होती है। गुरुजी ने कहा बेटे प्यार बड़ी चीज है पर कर्तव्य उससे भी बड़ा है।

मैंने एक कविता लिखी और मैंने सोचा इसे माताजी को सुनाना चाहिए। इसके लिये मैंने अरुण पण्ड्या को पकड़ा और कहा कि यह तू माताजी को सुनाना। कविता का शीर्षक था जब तुम नहीं होगे। बहुत मार्मिक शब्द थे कुछ ऐसे कि किसी स्त्री से पूंछा जाये कि जब तुम्हारे पति नहीं होंगे तो क्या होगा। किसी बेटे से पूंछा जाये कि तुम्हारे पिता नहीं होंगे तो क्याहोगा। तो माताजी जब आप और गुरुजी नहीं होंगे तो शान्तिकुञ्ज का क्या होगा। माताजी बोली चुप बन्द कर और अरुण को भगा दिया।

अमाई रेस्ट हाऊस में हम लोगों ने चाय पी निर्मला राय ने एक गाना भी गाया और हम चाय पीकर जाने लगे गुरुजी बोले तूने उसके चाय के पैसे नहीं दिये। मैंने कहा गुरुजी कोई आवश्यकता नहीं है। शायद गुरुजी समझ गये। गुरुजी डांटते हुये बोले पैसे दे। मैंने ५, १० रुपये दिये यह रेस्ट हाऊस वाला हम लोगों से पैसे नहीं लेता था क्योंकि वहॉँ के दूध का पाउडर हमारे अस्पताल से ही जाता था।

गुरुजी विनोद भी बहुत करते थे। हमसे बोले तुझे कार चलाना नहीं आता। मैंने कहा गुरुजी मैं सीख रहा हूॅं और मेरा मन रहा कि जब तक आप रहे कार मैं ही चलाऊं पर अभी ठीक से नहीं सीख पाया गुरुजी बोले तू चला मैंने ड्रायवर को पीछे भेज दिया गुरुजी बतलाते रहे कार कैसे बचा बचा कर चलायें और हम अमई पहुॅंच गये। गुरुजी बोले अब मत चलाना नहीं तो ठोक देगा।

हम और गुरुजी सामने बैठे थे ड्रायवर बोला गुरुजी इस दायी तरफ बिल्डिंग में भूत रहता है गुरुजी ने कहा निम्मो यह ड्रायवर कह रहा है यहॉँ भूत रहता है संभलकर बैठ नहीं तुझे उठा ले जायेगा वह बोली गुरुजी आप बैठे है तो डर क्या। गुरुजी बोले गुरुजी तो सामने बैठे है पीछे से तुझे उठा ले गया तो मैं क्या करूंगा। सब हँस पड़े।

गुरुजी ग्वालियर आये। हम लोग स्टेशन पर पहुँचे। बड़े सेठ कई लोग थे। बड़े सेठ हरीशंकर गोयल जिनके मिल में पं०लीलापत शर्मा जी डबरा में काम करते थे वे अपनी चमचमाती हुई कार लेकर के आये थे। सब चाहते थे गुरुजी हमारे यहॉं चलें। मैं चुप था इतने बड़े लोगों में मैं क्या बोलता। प्रणाम कर खड़ा हो गया। गुरुजी बोले मैं अमलकुमार के यहॉँ जाऊंगा। चल काहे से चलेगा। मैं क्या बोलता गुरुजी चल रिक् शे से हम लोग तांगे से इंगले साब की कोठी पर अपने निवास पर आये। गुरुजी को टिमटिमाटी हुई टेबिल वॉच बड़ी अच्छी लगी। मैंगोशेक बहुत पसन्द किया। तथा बंगाली बेगुनभाजा चम्मच ने निकाल-निकालकर खाया।गुरुजी बोले अमलकुमार तुझे एक मजेदार बात बतलाता हूॅं। मैंने कहा गुरुजी मजेदार बात जरूर बतलाईये। वे बोले लोग अब अपने घरों से सोना निकालेंगे और सोना पहनना समाज में सभ्यता का द्योतक नहीं रहेगा। उन दिनों यदि शादी ब्याह में यदि कोई महिला सोना नहीं पहनती तो उसके लिये समझा जाता कि किसी गरीब केघर ब्याह गई है पर आगेवही हुआ जो गुरुजी ने कहा। चीन ने हमला किया और काफी मात्रा में सोना बाहर हो गया और उसके बाद से सोना पहनना रहीसी तो हो सकता है पर आधुनिकर सभ्यता नहीं।

गुरुजी कही से आकरग्वालियर से मथुरा रेल से जाने वाले थे। मुझे प्रोग्राम मालुम था। मुझे देखकर गुरुजी प्रसन्न हुये तूने ठीक अन्दाजा लगाया साधारणतया मैं कोई प्रोग्राम बदलता नहीं हूं। प्रातः 3, ४ बजे का समय था कुछ लोग आ गये। प्लेटफार्म पर गुरुजी कुर्सी डालकर बैठ गये और पॉंच छै आदमी गुरुजी के लिये चाय लाये। गरम चाय केतली में। गुरुजी बोले तुम में से कोई दो कप लाया है कोई नहीं लाया है। सब गुरुजी के लिये एक कप लाये हैं। गुरुजी ने कहा स्टाल से कप ले आओ और तुम सबो की केतली से थोड़ी-थोड़ी सब केतली से पिऊंगा। चाय लाने वाले न लाने वालों सेज्यादा शर्मिन्दा हो गये।

गुरुजी से मिलने के पहले तुम्हारी क्या कल्पना थी ऐसा क्याथा कि मिले और जुड़के रह गये।

गुरुजी की मुझे कोई कल्पना न थी। गायत्री महाविज्ञान पढ़कर बहुत अच्छा लगा पर फिर भी मन में यह सोचताथा कि सब गड़बड़ होगा। ऐसा हल्का सा विचार मन मेंआता रहा। सन् १९५९ में जब अपने बड़े भाई डॉ० धीारेन्द्रनाथ दत्त से मिलने मरदानपुर सीहोर गया तो नर्मदा नॉव पर गायत्री ज्ञान की चर्चा हुई। उस दिनडोंगी में डूबतेडूबतेबचा मैं नहीं जानता था कि वे एक साधक ज्ञानी या वेद अनुवादक हैं। माताजी ने कह दियाथा कि वहबहुत साधारण व्यक्ति है और तुमसे असाधारण प्यार करेंगे। मैं क्या जुड़ा उन्होंने जोड़ लिया मेरा तो बस प्यार का अधिकार था। कुछ ऐसा सोचलें कि जैसे अचानक ही किसी लड़की या लड़के को प्यार हो जाता है उनका अपनापन प्यारी बातें प्रेम से खाना खिलाना ने ही मुझे जोड़ लिया। गुरुजी जब शाम को घूमने मथुरा में जमुना किनारे ले जाते थे तो रेत पर अपना तोलियॉ बिछाकर कहते थे कि बैठो और स्वयं रेत पर बैठ जाते थे यह तो पागल बनाने वाला उनका प्यार था। मैँ उनके साहित्य और अखण्ड ज्योति का भक्त बन गया।

मैं मंदसौर कार्यक्रम में गया हुआ था।गायत्री परिवार के साथियों ने कहा कि आप यहॉं सरकारीअस्पताल में एमएस डाक्टररहे है तो यहॉँ के कलेक्टर से मिल लजिये। हम मिलने गयेऔर हमने पूंछा कि आप आचार्य श्रीराम शर्मा जी को जानते होंगे।उन्होंने कहा नहीं मैंने कहा मॉं भगवतीदेवी शर्मा जी को बोले नहीं मैंने कहा गायत्री परिवार या युग निर्माण योजना कोबोलेउसे भी नहीं मैंने पूंछा गायत्रीतपोभूमि शान्तिकुञ्ज को बोले नहीं। मैं सोचने लगा ये लोग मुझे कहॉं ले आये।मैंने फिर पूंछा आपने कभी अखण्ड ज्योति पत्रिका देखी है। वेबड़ेअचम्भे से बोले आप इसे कैसे जानते हैं। मैंने कहा मैं वहीं से आया हूॅं उसी का प्रतिनिधि हूॅं जहॉँ से यह पत्रिका निकलती है। वे बोले आप अखण्ड ज्येाति जानते हैं मैंने कहा हॉं बोले आप सही में अखण्डज्योति जानते हैं मैं मन में सोचने लगा कि एक आईएएस कलेक्टर एक छोटी सी बात क्यो नहीं समझ रहा।फिर वे बोले मैं अखण्ड ज्योति पत्रिका का कायल हूॅं। डॉ० दत्ता आप जानते हो कि कलेक्टर कभी किसी को बुलाता नहीं दूसरों का ही डिनर खाता है लेकिन यदि आप अखण्ड ज्योति के विषय में बोले तो मैं मंदसौर के सारे डिस्ट्रिक्ट आफीसर सपत्नीक आज शाम को हमारे यहॉँ चाय पर बुलाते है। और तभी उन्होंने अपने एडमिनिस्ट्रेशन आफीसर को बुलाया और कहा कि सिविल सर्जन डिस्ट्रिक्ट जज और एस पी और सब डिस्ट्रिक्ट हेड को टेलीफोन और मेसेज भेजकर मेरे बंगले पर सपत्नीक चाय पर बुलाओं। डॉक्टर दत्ता आप अखण्ड ज्योति के विषय में बताना।

गुरुजी की पुस्तक गायत्री महाविज्ञान प्रथम भाग पढ़कर बहुत प्रभावित हुआ। इसे पढ़कर लगा कि इसके लेखक का चेतना का अनुभव ठीक वैसा ही है जैसा किसी एनाटामिस्ट का शराीर के अंग अवयवों का या फिजियोलाजिस्ट का उसकी एक एक कोष का ज्ञान होना बस मिलने की हूक उठती रही जिन्होंने कि मुझे पहली किताब का परिचय कराया था मास्टर साब कहते थे कि आप आचार्य जी से मिल नहीं सकते। क्योकि इतने बड़े सन्त से मिलना भी पूर्व जन्म की विशेष सम्पत्ति के बिना सम्भव नहीं है। मैं तीन बार असफल हो चुका हूॅं। मैंने निश्चय किया कि धरती पर यदि यह व्यक्ति है तो मुझे मिलने से कोई नहीं रोक सकता और मैं मिल लिया। मिलने पर तो वे मेरे मन पर छाये ही रहते थे। मुझे लगने लगा कि गुरुदेव सब कुछ जानते हैँ वे सब कुछ कर सकते हैं।

गुरुजी का पहला भाषण यानी गोष्ठी गायत्री तपोभूमि के हाल में १४ जून १९६१ में सुनी। उन्होंने कहा कि जोअगले तीस वर्ष तक मुझसे जुड़ा रहेगा उसके पूर्व जन्म में कुछ भी हो लेकिन फिर उसे किसी और चीज की आवश्यकताा नहीं होगी।मैं जिस किसी के लिये जो कुछ कहता हूॅं उसको सच होना ही होगा।

मेरे एक मित्र है रामसुंदर चतुर्वैदी। चेतनपुरग्वालियर ये मिडिल स्कूल में एक गॉंव में पढ़ाते थे। वे गायत्री परिवार में मेरे मित्र बन गये। उनकी शादी को काफी समय हो गया था पर उनका कोई बच्चा नहीं था। मुझसे बोले डाक्टर साब मेरी पत्नी की आपजॉंच करा दें। मैंने उनको लेडी डाक्टर को दिखा दिया और उन्होंने डायग्नोस किया इन्फेन्टाइलयूटेरस यानाी छोटी बच्चादानी बच्चे की कोई सम्भावना नहीं। हम लोग गुरुजीके पास गये। गुरुजी नेकहा रामसुंदर यदि तू बच्चे का मोह छोड़ दे तो मैं तुझसेबड़े काम कराऊंगा तू कर सकेगा। वे बोले गुरुजी पत्नी से बात करूंगा यानी टाल गये। अब उनके तीन चार बच्चे हैं।पर शायद कोई विशेष नहीं कर पाये।

गुरुजी का सार्वजनिक भाषण पहली बार ग्वालियर में सुना १९६२ में। और कहा कि धर्म संप्रदाय नहीं है एक अच्छेइंसान बनने का ज्ञानहै विज्ञान है कला है।

सन् १९६५-६६ में गुरुजी को मथुरा आनाथा लखनऊ छोटे स्टेशन पर दोपहर में हम लोग प्लेटफार्म पर इधर से उधर घूमते रहे। गुरुजी पूछते रहे एमएस के बाद तू क्या बनना चाहेगा। प्रोफेसर या सिविल सर्जन। मैंने कहा सिविल सर्जन। मैं बोला गुरुजी इस जन्म में तो मैं आपको छोड़ूंगा नहीं यदि पागल ही नहीं हो गया पर आगे मैं आपको पहचानूगॉं या नही अखण्ड ज्योति का सदस्य बनूॅंगा या नहीं नहीं कह सकता। गुरुजी ने कहा तू कभी पागल नहीं होगा। और जहॉँ तक मेरा साथ है मैं हमेशा तेरे साथ हूॅं। किसी न किसी रूप में रहूॅंगा। कभी तेरा अभिभावक तो कभी मित्र तो कभी अचानक। मैंने कहा गुरुजी कब तक। बोले जब तक तू पूर्णता की स्थिति प्राप्त नहीं करलेगा। मैंने मन ही मन प्रणाम किया क्योकि स्टेशन पर भीड़ थी।

सन् १९९० कुछ ही दिन पूर्व मैं माताजी से कहकर हम दोनो गुरुजी के पास गये और माताजी सेकह गये कि जबतक हम पूरी तरह बात नहीं कर लें हमको कोई टोके नहीं। माताजी ने कहा बिल्कुल ठीक है जा हम १९६० से उनके लिखे पत्रों में से कुछ चुनकर ले गयेथे। मेरे पहला प्रश्न था गुरुजी आपने इस पत्र में लिखा है कि मेरे बच्चों को मुझे सौंप देना ये मेरा काम करेंगे। अब एक अमेरिका में है और एक दिल्ली में इंजीनियर। मैं आपको कैसे सौंपूं। गुरुजी ने कहा ठीक है इसकी चिन्तातू छोड़दे। गुरुजी बोले तुम दोनों का मैं ध्यान रखूंगा।

सन् १९९४ में मैं अमेरिका स्थाई नागरिक यानीग्रीन कार्ड पर गया था। गुरुजी जाते समय बोले तू अमेरिका में क्या करना चाहता है। मैंने कहा किसी बड़े अस्पताल में काम करना चाहता हूॅं। बोले अच्छा तुझे काम मिल जायेगा। पर जम नौकरी मत करना। मैंने सोचो यह सम्भव कैसे होगा पर वही होगा। मेरे भाई ने मेरा इंटरव्यू हियूस्टन में विश्वप्रसिद्घ हृदय शल्य चिकित्सक डॉ० कुली के साथ रखवा दिया। मैं जीवन भर हर परीक्षा में पास होता रहा लेकिन ईसीएफएमजी में एक नंबर से फेल हो गया। मै अपने बेटे को छोड़ आया और मैं वापस आ गया।क्योकि मैँ यहॉं सिविल सर्जन था। गुरुजी मिलते ही बोले मुझे बड़ी चिन्ता थी जब तक अमेरिकाा में था अब ठीक है वापस आ गया। गुरुजी बोले बेटे अब तू सिविल सर्जन हो गया है टोलिया को बहुत मदद कर सकता है कार्यक्रम रख सकता है और यहॉँ भी आ सकताहै जैसा तेरा मन हो। हम और श्रीपर्णा साथ थे और मैंने कहा गुरुजी आप निर्देश दें मुझे क्या करना है मेरे ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है थोड़ा बहुत पैसा भी है पेन्शन भी मिल जायेगी हमें सिर्फ आपका निर्देश चाहिए। गुरुजी बोले तू आ जा। मैंने कहा जी। मैंने कहा मैं छुट्टी ले लूं पहले मैं २ साल सवेतन छुट्टी ले सकता हूॅं। गुरुजी फिर बोले जब तूने सोच ही लिया है तो बच्चों की सारी व्यवस्था मैँ करूंगा। मैं ऐसे ही नहीं कह रहा मैँ कर सकता हूॅं और मैं तू सिविल सर्जन से अच्छी करूंगा।

मथुरा में सड़क पर गायत्री तपोभूमि से घियामंडी हम गुरुजी के साथ पैदल चल रहे थे गुरुजी बोले जब कभी तुम सपने में अपने माता-पिता या मुझको देखो तो उसके तीन कारण होंगे। नं०-१ किसी विपत्ति को टालने कुछ निर्देश देने या आशीर्वाद देने। तभी सामने से एकर शवयात्रा आई। गुरुजी बोले शव कभी देखने पर उसके साथ २, ४ कदम चलना चाहिए। हम दोनों मुड़े और फिर घियामंडी की ओर। घियामंडी से फिर हम दोनों रिक्शे से स्टेशन गये। गुरुजी बोले मैं चाहता हूॅं कि मेरे बाद मेरे जैसा ही कोई प्यार देने वाला व्यक्ति मेरा स्थान ले तेरे दिमाग में है किसी का नाम। मैंने कहा हॉं गुरुजी बोल किसका मैंने कहा माताजी का। कहने लगे ठीक कहता है। पर माताजी एक तो घूम नहीं सकेंगी और दूसरा ज्ञान पक्ष। बाद में मैंने माताजी से कहा माताजी आपने तो इतना काम किया कि गुरुजी की बात भी झूठी कर दी आपबहुत घूम ली।

अशोक नगर की सड़क पर गुरुजी के साथ चल रहा था। वे बोले दत्ता मेरी ऑंख में कुछ हो गया। मैंने अपनी डाक्टरी को याद किया पूंछा गुरुजी क्या हो गया। बोले कुछ ऐसा है ऑंख मलते हुये कि मेरी ऑंखों में बुरा आदमी भी अच्छा दिखता है। यह रामावतार है न भोपाल वाला यह मेरे साथ चलता है और दूसरी संस्था की किताब बेचता है। पर जब सामने आता है तो मुझे अपना बच्चा लगता है। मैंने कहा गुरुजी ऐसी बीमारी थोड़ी सी मुझे भी दे दीजिये।

माताजी ने सुनाया घियामंडी में कि एक बार गुरुजी बाहर गये। अखण्ड दीपक की आग पूजा स्थल पर लग गई। मैं घबरा गई गुरुजी कोकुछ हो तो नहीं गया। बहुत घबराई। मैं अपने भगवान से बोली कि जब तक मुझे गुरुजी की सूचना नहीं मिलेगी मैं कुछ ग्रहण नहीं करूंगी। मैं बराबर चिन्ता में डूबी रही। शाम को किसी ने दरवाजाखटखटाया मैंने खोला। गुरुजी सामने थे बोले शेलो तुझे क्या हो गया मैंने कहा मैं ठीक हूॅं। माताजी बोली तुम कैसे हो फिर माताजी ने सब सुनाया। शेलो तू क्यों चिन्ता करती है कोई खास बात नहीं। खिड़की से मेरी ऊंगली कट गई एक लेकिन चोट के बाद तुम्हारी घबराहट ने मुझे परेशान कर दिया और मैं वापिस आ गया गुरुजी बोले तुम खाना खाओ और पानी पियो। गुरुजी सर पर पट्टी बांधे और हाथ में पट्टी वाली कहानी सुनाते हैं वही यहॉ सच हुई।

एम्बेसडर कार में गुरुजी के साथ पीछे हम और श्रीपर्णा बैठे थे। सामने लीलापत जी अशोक नगर से ग्वालियर जा रहे थे। दोपहर के खाने के बाद गुरुजी को नींद सी आ रही थी। पण्डित जी बोले गुरुजी यह ड्रायवर कुछ इतने में मैं बोल बैठा गुरुजी ड्रायवर साब ने थोड़ा सा आपका भाषण सुन लिया तो यह कुछ प्रार्थना करना चाहता है। वे बोले हॉँ ड्रायवर साब बोल बेटा क्या बात है। वह कार चलाता जा रहा था और बोला गुरुजी मेरी तीन बेटियॉं हैं ८०० रुपया महीना वेतन मिलता है। १००, १५० रुपया कभी खाली कार में सवारी बैठा लेता हूॅं। मैँ बच्चियों की शादी कैसे करूंगा। गुरुजी बोले चिन्ता मत कर तेरे पास पैसा जमीन तोड़ कर आये या आसमान फोड़कर आये बच्चियों की शादी के लिये पैसा मिल जायेगा यह मेरा आशीर्वाद है।

गुरुजी कुम्भराज जाने वाले थे। मुझसे कहा चलो मेरे साथ गाड़ी में। मैंने कहा गुरुजी मैं पीछे मोटर साईकिल पर आता हूॅं बोले नहीं मेरे साथ चलो। फिर थोड़े आगे बढ़कर बोले मुझे नींद आ रही है कुछ इंतजाम हो सकता है। मैंने कहा जी गुरुजी बस २, ३ किलोमीटर पर रेस्टहाऊस है वहॉँ विश्राम कर ले। बोले ये कैसे होगा। मैंने कहा एक तो गुरुजी मैं गुना में डाक्टर हूॅं दूसरे जो भी होगा उसे १०, २० रुपये दे देंगे। गुरुजी बोले तो ऐसा कर लेना।गुरुजी ने थोड़ा विश्राम किया और फिर रास्ते में एक छोटी सी दुकान जहॉँ पर एलम्यूनियम की पतीली में चाय बन रही थी बोले चाय पियेंगे। और पण्डित जीसे बोले वो जरा मिठाई वाला डिब्बा निकालो अमलकुमार ने खाना नहीं खाया। गुरुजी को दी हुई मिठाई जरा ज्यादा ही अच्छी थी गुरुजी बोले मेरे साथ रहोगे तो ऐसे ही आनन्दनकरोगे।

गुना से हम तीन भाई डाक्टर धीरेन्द्रनाथ, अभयकुमार और मैं कुम्भराज पहुॅंचे। हम लोग भोजनकरके खाली बदन बैठे थे कि राघवगढ़ से ६, ७ व्यक्ति आये। जो २० मील पैदल चलकर आये थे। उनको हमारे पास भेजा कि येगुरुजी से मिला देंगे। वे पूंछने लगे कि ये तीन मूर्तियॉं कहॉँ से आई है। हमारे बड़े दिन भर हॅंसते रहे कि तुम्हारे साथा थोड़ी देर रहने पर हमें भगवान की मूर्ति बना दिया इतने मेंगुरुजी का संदश्ेा आया कि जो राघवगढ़ से पैदल आये है उन्हें मेरे पास भेज दो।

माताजी को मैं बहुत भावनापूर्ण पत्र लिखा करता था। क्या लिखूं कैसे लिखूं जब समझ में नहीं आता तो विनयपत्रिकाकीभाषा का उपयोग करता था। औरयही कारण है कि मैं माताजी का बहुत स्नेह पात्र बना। पूर्वजन्म को तो मैं क्या जानूं।

हम तीनभाई मोटर साईकिल पर कुम्भराज जा रहे थे। सड़क पर हर फीट पर बड़े-बड़े पत्थर रखे थे। मालुम नहींमोटर साईकिल २०० गज तक बिना किसी पत्थर को स्पर्श किये चलती रही जब तक वह रुक नहींगयी। हर क्षण वह तेज मोटरसाईकिल पलटने की स्थिति में थी।

गुरुजी आये ही थे और फ्रेस हो रहे थे तब तक पण्डित जी ने सबों को रोक दिया। जो स्वयंसेवक खड़ा था उसेमैंने कहा कि पण्डित जी से कहो कि डाक्टर दत्ता आये हैं। गुरुजी ने सुन लिया और कहा आओ बच्चो आओ और कपड़े बदलते-बदलते बातचीत करते रहे। हम दोनों भाई से मिले हम दोनों भाई से बोले क्यो तुम्हारा प्रमोशन हो गया। मैंने कहा नहीं। बोले तो अच्छा इस साल तुम दोनों की फाईल निकलवाता हूॅं। और उसी वर्ष हम दोनों की प्रथम श्रेणी के पद पर पदोन्नति हो गई। तीसरे से बोले तुझे डाक्टर तोा नहीं बना सकता लेकिन तू डाक्टर के समकक्ष रहेगा। परिवार नियोजन मेरा काम है वह करना और गायत्री प्रचार भी। और वेतन सरकार वेतन टीए सरकार की लेते रहना।

मैंने मिलिट्री में एप्लाई किया चीन के युद्घ में। गुरुजी को पत्र लिखा। गुरुजी ने उत्तरदिया तू मिलिट्री में नहीं जायेगा। म०प्र० गवर्मेन्ट ने मेरी एप्लीकेशन वापिस कर दी और कहा तुम नौकरी छोड़कर मिलिट्री में जाओ।

एक दिन गुरुजी बोले देख बेटे प्रारब्ध तो नहीं बदला जा सकता कष्ट तो राम कृष्ण शंकराचार्य बुद्घ रामकृष्ण परमहंस सबको हुआ पर मैं अभिभावक की भूमिका जरूर निभाऊंगा।चोट लगेगी तो सबसे पहले पहुॅंचूगा अच्छे से अच्छा इलाज कराऊंगा। मेरे पास जो तप की पूंजी है समय पर उसका भी उपयोग करूंगा पर याद रखना हम बदला नहीं चाहते पर भगवान भी न्याय नहीं छोड़ता। अगर तुम अपने कष्ट दुख और हानी की कीमत पर किसी का चरित्र चिन्तन और व्यवहार नहीं उभारोगे तब तक मेरे उस तप का पटाना नहीं होगा और आगे तुम्हें भुगतना ही पड़ेगा।

गुरुजी साधारण नहीं अतिसाधारण व्यक्ति थे। तीस वर्ष के मेरे उनके साथा रहने पर ऐसे कोई पॉंच मिनिट नहीं हुये जब मुझे प्रतीक्षा करनी पड़ी। मैंने उनको कभी पूजा में व्यस्त नहीं देखा जबकि वे नियमित ६ घण्टे पूजा करते थे। एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि गुरुजी तपोभूमि की यज्ञशाला में पूर्णाहुति पर न पहुॅंचे हों। चाहे जितने व्यक्ति आयें कोई भी ऐसा नहीं होता था जो न केवल उनसे मिल लेता था बात कर लेता था पर यह भी सुनता था कि और कुछ।

एक बार यतीन्द्र अमेरिका से आया। लगभग ५ बजे होंगे। मिलना चाहा तो किसी स्वयं सेवक ने मना कर दिया। उसने कहा ऊपर जाकरकहो की मैं यतीन्द्र अमेरिका से आया हूॅं। अमलकुमार का भाई हूॅं। थोड़ी सी बात करके लौट आये उनको एक कमरे मेंठहरा दिया यह सन् १९७१-७२ की बात होगी। उसके पास लगभग २ लाख व्यक्ति थे शान्तिकुञ्ज बिल्कुल सुनसान रहा करता था वह बहुत घबराया कि रात को कोई आ गया तो क्या करूंगा। अचानक रात को १० बजे किसी ने दरवाजा खटखटाया यतीन्द्र कहता है कि मैँ बहुत घबराकर अपने बैग को बगल में रखकर यह सोचकर आ ही गया मैँ हिम्मत के साथ बोला तुम कौन हो। उसने जवाब दिया मैँ स्वयंसेवक हूॅं गुरुजी नेऊपर याद किया है। मैं गया गुरुजी ने कहा बेग माताजी के पास रखदे और चैन से सो। मैं आश्चर्य में पड़गया गुरुजी को कैसे पता चला।

सन् १९७१-७२ श्री ऊँ नारायण पंड्या जी याने श्री प्रणव जी के काका मेरे मित्र हैं हम लोगों ने तय किया कि गुरुजी से आत्मशक्ति पाने का रहस्य जानेंगे। पंड्या जी ने कहा कि हम गुरुजी को चाय पर बुलायेंगे हमारे तो वह अब रिश्तेदार भी होने वाले हैं। पर प्रश्न तुम पूॅंछना मैंने कहा ठीक है बात जम गई। मैंने गुरुजी से कहा हम दोनों ने तय किया है कि आप जो कहेंगे करेंगे। नौकरी छोड़ देंगे उपवास करेंगे। जप ध्यान जो कहेंगे करेंगे। पर हमें आत्मशक्ति चाहिए। आपने कई बार कहा कि मेरा सारा वैभव व क्षमता जो दिख रही है घासफूंस है। असली माल जो मेरे पास है आत्मशक्ति का प्रभाव वह तो निकाला ही नहीं है। हमें वह आत्मशक्ति चाहिए। गुरुजी आपसे हमारी यह प्रार्थना है। गुरुजी ने कहा बेटे आत्मशक्ति केवल उपवास, शीर्षाषन जप ध्यान से नहीं मिलती उसके लिये चाहिए प्रबल पुरुषार्थ। पूर्ण समर्पण तथा स्वार्थ अहंकार का पूरी तरह नाश। जो देश समाज और मानवता के कल्याण के लिये सब कुछ यहॉँ तक कि अपने प्राण भी दे देते हैं ऐसे भगत सिंह चंद्रशेखर आजाद जब दूसरे जन्म में पैदा होते हैं तब वे आत्मशक्ति सम्पन्न होते हैं।

मैंने पूँछा। गुरुजी श्रद्घा क्या है। गुरुजी ने कहा। श्रद्घा आदमी के प्रति नहीं होती। आदर्श के प्रति असीम त्याग को कहते हं। निष्ठा क्या है। आदर्श को कर गुजरने का साहस। प्रेम क्या है। जो कुछ अच्छा है उसे चरित्र चिन्तन और व्यवहार के निर्माण में लगा देना। दुख क्या है। मन की अनुभूति। आनन्द क्या है। आत्मा का परमात्मा से स्पर्शबोध। अवतार क्या है। दुस्साहसपूर्ण आदर्शवादिता निभाना। उसका काम है टूटफूंट को ठीक करना नवसृजन करना तथा लाइन से हटी गाड़ी को फिर से लाईन पर लाना।

१९६७ में अशोक नगर में वहॉँ के स्टेशन मास्टर मिलने आये और पूंछा कि गुरुजी मुझे नींद नहीं आती क्या करूं। गुरुजी ने कहा नंबर-१ रात को दही खाना नं० २- शाम को खाने के बाद घूमना थोड़ा थकना ३- कोई एक अच्छा विचार करते रहना या भाषण टेप सुनना या किताब पढ़ना। जब वे चले गये तो मुझसे बोले दत्ता तुझे मालुम है इसे नींद क्यों नहीं आती। मैंने कहा नई गुरुजी बोले यह स्टेशन मास्टर है इसके नीचे काम करने वाला पार्सल क्लर्क व टिकिट चेकर खूंब पैसा कमाते हैं इसमें पैसा कमाने की यानी बेईमानी करने का साहस नहीं ईमानदार रहने का दम नहीं इस कारण मानसिक तनाव के मारण नींद नहीं आती।

गुरुजी अशोक नगर में ५ कुण्डीय यज्ञ में आयेथे। तीन दिन यज्ञ समाप्ति पर गुरुजी से मैं प्रार्थना करने गया कि वे दो दिन ठहर जायें लेकिन इससे पहले वे स्वयं बोले कि मैं दो तीन दिन ठहरूंगा कोई प्रचार न करना मुझे यहॉं से पास एक आनन्दपुर नाम का स्थान है उसका गहराई से अध्ययन करना है। मैं बिना प्रार्थना के प्रसन्न हो गया। गुरुजी बोले मेरा ठीक से देखने का इंतजाम कर देगा। मैंने कहा जी गुरुजी। बोले कैसे। मैंने कहा गुरुजी ये आनन्दपुर वाले महात्माा दो जनों से डरते हैं एक पुलिस एक कोर्ट। यहॉँ के जज विनोद कुमार सक्सेना मेरे मित्र है तथा पुलिस के एसडीओ पी भी। इन दोनों को आप के साथ कर दूंगा। ठीक है। श्रीपर्णा भी साथ गई पर गुरुजी ने मुझे जाने से रोक दिया और कहा इस समय हैजा फैल रहा है तुझे छुट्टी लेने का अधिकार नहीं है कोई बड़ा अफसर आ सकता है हुआ भी वही। आश्रम के बड़े स्वामी ने बड़े सन्मान के साथ आश्रम के सारे क्रियाकलाप व विशेषतायें दिखाई व आवभगत की। अन्त में गुरुजी ने एक प्रश्न किया कि आपने जो कुछ भी सब यह किया केवल अपने और अपनों के लिये पर क्या गॉंव के गरीब बच्चों के स्कूल अपाहिज या समाज के निचले वर्ग के लिये आपका आश्रम कुछ करता है। स्वामी को प्रश्न का उत्तर कठिन पड़ा।

मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी आप शरीर छोड़ने के बाद कहॉं जायेगे। क्या करेंगे। यह सन् १९६३-६४ की बात होगी। वे बोले कि मैं अपने गुरु का स्थान हिमालय में ले लूॅंगा। उनका क्या होगा। वे अपने गुरु का स्थान ले लेंगे। उनका क्या होगा। तो वे बोले विश्राम करेंगे। मैंने पूंछा विश्राम क्या होता है क्या सोयेगें, कितना सोयेंगे, क्या सोते रहेंगे। उन्होंने कहा नहीं विश्राम का मतलब होता है सूक्ष्म जगत में तप। वे सूक्ष्म शरीर से कारण शरीर में अपनी तप शक्ति से ही पहुॅंचते हैं और जब जब ईश्वरीय विधान को आवश्यकता होती है इनका उपयोग एक ऋषि या अवतारी के रूप में सृष्टि सन्तुलन का उत्तरदायित्व सौंपते हैं।

एक बार सन् १९६२-६३ में मैंने पूंछा कि गुरुजी जब आप हिमालय चले जायेगे तो हमसे मिलेगे नहीं। बोले नहीं। मैँ सिर्फ माताजी से मिलूॅंगा। हिमालय के नीचे एक स्थान होगा। जहॉँ छत पर एक कमरा होगा।उसके आगे एक बराण्डा होगा। माताजी वहीं रहेगी मै माता जी से मिलने आऊंगा मैंने कहा मुझसे क्यों नहीं मिलेगे। आपको न खर्च लगेगा न महनत सूक्ष्म मैं जब चाहे केवल आपको इच्दा करना है तो वे बोले अच्छा बता मैं आकर क्या करूंगा। मैंने कहा कुछ नहीं हमें अच्छा लगेगा। तो वे बोले अच्छा अगर मैं किसी से भी मिलूॅंगा तो तुझसे से भी मिलूॅंगा और मुझे चुप कर दिया। यह भी कहा कि वैसे तो माताजी के पास डाक्टर प्रणव रहेंगे पर जब वे नहीं रहेगे तो तू रहना तू भी माताजी के पास रहेगा।

मैंने पूंछा गुरुजीहिमालय में क्या है। कौन सा भाग सबसे अच्छा है। गुरुजी बोले सन् १९६७ अशोकनगर गुना- तुझे हिमालय की तैयारी बताता हूॅं

हिमालय का सबसे अच्छा स्थान हिमालय का हृदय है। हमारे गुरुजी उससे भी बहुत ऊपर रहते हैं। वे सूक्ष्म शरीर में है स्थूल धारण कर सकते हैं उनसे कोई प्रयास से नहीं मिल सकता। मैं भी अपने प्रयास से नहीं मिला। उनकी कृपा इच्छा और काम का उद्देश्य ही उनसे मिलाता है। हिमालय का हृदय एक छोटा स्थान है यह १०-१२ किलोमीटर लंबा और कुछ किलोमीटर चौड़ाा है। यहॉँ कोई नहीं पहुॅंच सकता। लोग हेलीकाप्टर से भी सारी कोशिशे करकेदेख चुके यहॉं हमेशा सिद्घपुरुष ऋषि रहते हैं। सीधा रास्ता कठिन है। घूमकर जाना पड़ता है। जज साब ने मुझे बतलाया था कि यहॉं बैठे ऋषियों की ऊंचाई गुरुजी की ऊंचाई से अधिक थी। बर्फ पर रोशनी से ऑंख पर बहुत जोर पड़ता है इस कारण गहरा काला चस्मा साथ होना चाहिए। आसपास केवल चाय और बीड़ी मिलती है चाय पी लेना ठंड बहुत होती है इस कारण कुछ दवा की गोलिया उपयोगी है। सल्फाडायजिन जैसीमैंने कहा गुरुजी इसका तो मैं डब्बा ले जाऊंगा। अपने लिये और दूसरों के लिये भी। वहॉँ एक जड़ी-बूटी भी मिलती है जो चाय जैसी बनती है।

गुरुजी हमेशा मथुरा में प्रातः दो बजे उठते थे। पूूंजा वे रात को ही ढाई से छह बजे तक कर लेते थे। फिर लेखन। पर जब वे बाहर जाते हैं तो देर से उठते हैं। गुरुजी कहते यदि मैं जल्दी उठ जाऊं तो गृहस्थ वालों को परेशानी होगी। वे पत्नी पर च्चल्लायेगे गुरुजी उठ गये चाय बनाओ गरम पानी दो इस कारण मैं उठकर भी पलंग पर लेटा या बैठ जाता हूॅं। तू अपने कुछ मित्रो को बुला लेना। आध्यात्मिक चर्चा करेगे। ऐसी पहिली चर्चा १९६७ में अशोकनगर में आरम्भ हुई जिसमें निर्मला राय मैं और दो तीन व्यक्ति थे। श्रीपर्णा तो काम में लगी थी। गुरुजी बड़े प्रेम से ज्ञान की चर्चा करते और जब घर के लोग उठ जाते तब वे नित्य कर्मके लिये जाते चाय पीते और लोगों से मिलना चलता रहता। मेरे एक मित्र है राणा परिवार ये जयपुरमहारानी के सम्बन्धी हैं। मिसिस राणा का एक पुत्र पाकिस्तान बार में लापता हो गया। वे बड़े चिन्तित थे और मनुस्मृतियों में देखकर आये कि वो लम्बी बेहोशी के बाद उठेगा। उन्होंने मुझसे गुरुजी से पूंछने कहा। मैं उनको गुरुजी के पास ले गया और मैंने कहा कि गुरुजी आपने जो स्टेशन पर एक लेख पर फूल चढ़ाये थे वह इन्हीं का बेटा पाकिस्तान बार का एक खोया फौजी का था। गुरुजी उनसे बोले माताजी यदि आपकाबेटा कहीं भी होता तो मैं उसको आपकेसामने ला देता पर वह तो देश के लिये शहीद हो गया। और कुछ माँगलो। वे बोली मेरे पति बहुत शराब पीते हैं गुरुजी ने कहा वे शराब नहीं छोड़ेगे कुछ ही दिनोंबाद उनकी मृत्यु हो गयी। वे फिर बोली मेरा बड़ा लड़का रवि राणा वह भी बहुत शराब पीता है गुरुजी ने कहा वह भी नहीं छोड़ेगा। और कुछ माँगो। गुरुजी फिर हमारी बेटियों का क्या होगा।गुरुजी ने कहा उनकी शानदार पढ़ाई और शानदार शादी होगी यह मेरा आशीर्वाद है। और ऐसा ही हुआ क्योकि आज तक मेरा इस परिवार से सम्बन्ध है।

मैंने कहा गुरुजी हमारे जो आफीसर साथी हैं वह धार्मिक आयोजनों में आने से कतराते हैं और आते भी हैं तो जल्दी भागते हैं यदि आपकी अनुमति हो तो मैं इन सबको बुफे डिनर पर आमंत्रित कर लूं यह सब आ जायेगे आपसे मिल भी लेंगे। गुरुजी ने कहा यह बहुत ठीक रहेगा। इस डिनर में एक-एक व्यक्ति ने गुरुजी से बात की जिसमें कई सचिव और आईजी स्तर के बन गये। वे आज भी उस बुफे डिनर को याद करते हैं।

सन् १९८० श्रीपर्णा दत्ता शान्तिकुॅंज आयी थी। गुरुजी का कुम्भराज जाने का प्रोग्राम बना। उनने कहा किगुरुजी आप गुना से जायेंगे औरसड़क पर ही शक्तिपीठ है आप केवल १५ मिनिट का समय दे दे और माइक पर उद्बोधन देकर आगेबढ़ जायें। हम विश्वास दिलाते हैं कि आपके १६ मिनिट नहीं लेंगे। पण्डित लीलापत भी वहीं थे गुरुजी बोले देखो यह छोरी क्या बोलती है पागल की तरह मुझे १६ मिनिट में छोड़ देगी पण्डित जी कुछ बोलते कि श्रीपर्णा बोली हॉं गुरुजी १५ मिनिट १६ मिनिट नहीं। अच्छा तो वायदा रहा। शिवपुरी से आगरा बाम्बे रोड पर गुरुजी के चलने की एक-एक मिनिट की सूचना वा जानकारी हमको मिलती रही। सबको बतला दिया गया कि कोई प्रणाम नहींकरेगा। केवल ओन माईक पर गुरुजी केवल १५ मिनिट बोलेगे और फिर कार के अन्दर। जैसे ही गाड़ी खड़ी हुई कि मैंने दरवाजा खोला। शक्तिपीठ गेट पर ही था। वहॉँ के डीएफओ चरण स्पर्श को छुके ही थे कि मैंने हाथ पकड़कर ऊपर उठा लिया क्योंकिन मैंने चरण स्पर्श किये थे और न किसी औरको करना था। गुरुजी स्टेज पर बैठ गये औरबोले कि यह व्यक्ति जोजूता स्टेण्ड पर बैठा है उससे कहो कि मुझे एक गिलास पानी पिलाये ये श्रीमान हायर सेकेण्डरी स्कूल के प्रिंसपल थे और मुझसे विशेष प्रार्थना करके जूता स्टेण्ड की रखवाली कर रहे थे किसी तरह भी उनने दूसरी डियुटी लेना उनने स्वीकार नहीं किया बोले डाक्टर साब आप ही पिलाओ मैंने कहा मैँ कैसे पिलाऊं गुरुजी का आज्ञा सिर्फ आपके लिये है उन्होंने पानी पिलाया और अभी कुछ दिनों पहले जब वे शान्तिकुञ्ज आये तो मैंने घटना याद दिलायी तो बोले वह घटना तो मेरे जीवन की पूंजी है कैसे भुलाऊॅंगा। पानी पीकर गुरुजी बोले सबको प्रणाम करने दे। मैंने कहा जी गुरुजी। पण्डितजी बोले खाना नहीं खिलायेगा। मैंने कहा पण्डितजी सब कुछ तैयार है। गुरुजी साढ़े तीनघण्टे रुके लौटते वक्त फिर प्रिंसपल साब से मिले और बोले कि यह किताबें जो है यही मेरा सही स्वरूप है आज भी और आगे भी।

जब से मै जुड़ा हूॅं यानी सन् १९६० तभी से हमारे परिवार के सारे सदस्य तथा सास-ससुर आदि भी जुड़ गये। मेरा छोटा भाई यतीन्द्र दत्ता तो बस मिलता ही रहता था। एक दिन हम दोनों घिया मंडी गुरुजी के पास गये। उसने तीन प्रश्न पूंछे १- मैं विदेश जाना चाहता हूॅं। २-बीसा और पैसे का इंतजाम कैसे हो ३- वहॉँ भी आप मेरी रक्षा करना। गुरुजी बोले। मैं जवाब देता हूूॅं पहले तू अपना चौथा प्रश्न भी बोल दे। यतीन्द्र ने पाकिट से चिट निकालकर दिखलाई हॉँ गुरुजी यह चौथा प्रश्न भी है। फिर बोले तू जल्दी विदेश जायेगा। अच्छा बता तेरे पास कितने पैसे हैं। बोले डेढ़ दो हजार रुपये। गुरुजी एक कहानी सुनाने लगे। एक जाट मेले में खाट बेचने आया। गुरुजी खाट पर ही बैठे थे और हाथ से दिखाकर बोले आजू नहीं है बाजू नहीं है (लम्बाई चौड़ाई)बीच की नहीं है झंगड़ झोड़ा और तीन नहीं है पाये और एक पहिया ऊंचा करके बोला कि खटियॉ लेलो भाई। सो १५०० रुपये में अमेरिका जायेगा। गुरुजी इसीलिये तो आपके पास आया हूॅं अच्छा बेटा। मैं सब ठीक कर लूूंगा। तेरे जाने का टिकिट बीसा स्कालर शिप और अच्छी नौकरी सब कर दूंगा। अब तू एक काम कर माताजी के पास जाकर खाना खा। क

यतीन्द्र की शादी मम्मीजी की लड़की यानी चंद्रमुखी रस्तोगी इला से मथुरा में गुरुजी के तत्वावधान में हुई। मुझे सुभाष, यतीन्द्र, मम्मी व इला को गायत्री तपोभूमि तार से बुलाया। शादी पक्की हो गई। बाद में पश्चिमी हवा ने इला को जरा ज्यादा ही प्रभावित कर दिया। यतीन्द्र लगभग २५ वर्ष अकेला रहा। इला के भाई शरद ने भी उसे नागरिकता मिलने के सम्बन्ध में बहुत परेशानी पैदा की। यतीन्द्र कहता है किमैं जैसे कांच के हजार टुकड़े हो जाते हैं ऐसा टूट गया लेकिन जो ३चीज मैंने नहीं छोड़ी वह ही है चरित्र, चिन्तन और गुरुजीऔर इसने न मुझे पूरी तरह से उबार दिया बल्कि गुरुजी ने ही मेरा सम्बन्ध गायत्रीपरिवार के एक कर्मठ सदस्य से कर दिया। और अब हम दोनों लगभग ढाई लाख रुपये प्रतिमाह का वेतन ही नहीं पाते बहुत सुखी है। गुरुजी ने मुझे एक लौकिट दिया जो मेरी हमेशा मदद करता रहा। एक रात वह होटल में सो गया बहुत ढूढ़ने पर नहीं मिला मैंने गुरुजी से कोई अनिष्ठ न होने की बहुत प्रार्थना की और रात १२ बजे नहाकर गुरुजी का ध्यान करने का विचार किया। लेकिन जैसे ही मैंने सावर खोला कि वह लाकेट मय चैन के मेरे सिर पर गिरा। मुझेआश्चर्य है कि यह जादू था या गुरुजी का प्यार।

सन् १९८३-८४ में मैं लगभग एक वर्ष यूस्टन अमेरिका में परमानेंट इमीग्रेशन पर रहा।रोज आफिस से लौटने के बाद यतीन्द्र नई नई घटनायें सुनाया करता था। एक दिन उसने बताया कि मेरे बौस ने बुलाया और कहा कि अपन एक नई कंपनी खरीद रहे हैं उसका बाहरी डिजाइन बदलना चाहते हैं तुम कितनी जल्दी बनाकर दे सकते हो। यतीन्द्र नेकहा जितनी जल्दी आप कहें। वे बोले एकदिन में दे दोगे। अच्छा तो बना लाओ। यतीन्द्र ने कहा। डिजाइन का आइडिया तो दें। वे वोले ये तो मैंने अभी सोचा नहीं है फिर मैं क्या बनाकर दूं। बौस ने कहा तुमतो एक दिन में बनाकर देने वाले थे न। मेरी पिछली २५ साल की साधना ने मुझे गुरुजी से इतना जोड़ दिया कि मैं अपने बड़े भाई गुरुजी के साथ है उनसे अधिक निकट हूॅं। मैंने बोस से कहा मैं दे दूंगा। और अपनी सीट पर आकर मैंने गुरुजी को याद किया। गुरुजीने मेरे मन में कहा तूं कार उठा और दांयी तरफ लेन में तब तक चलता रह जब तक कि किनारे की आलीसान बिल्ंिडग न मिल जाये। गुरुजी मुझे बिल्कुल छोटा बच्चा मानते हैं और उसका डिजाइन बनाकर जब दिया तो बौस ने कहा यही डिजाइन मेरे दिमाग में उतर रहा था।

यतीन्द्र ने एक दिन बतलाया कि हमारी कंपनी एक एक्सटेन्शन ब्रांच खोलने वाली थी। मुझको इसके निर्माण की योजना बनाने का कार्य सौंपा। मेरी टेलीफोन पर मेने कान्ट्रेक्टर से बात होती रही और जब फाइनल कागज पर दस्तखत होने थे वह आया यतीन्द्र मिला और बोला कि आपसे यह दूसरी मुलाकात में लगता है काम पूरा हो जायेगा। उसने कहा मैं कभी आपसे मिला ही नहीं। यतीन्द्र ने वे कागज दिखाये जिसपर एक्सटेन्शन का प्लान बना था उस पर उसके कुछ अक्षर भी थे पर सच में वह कभी नहीं आता था मालुम नहीं कौन आया था और यह उसी दिन की घटना है जिस दिन में अमेरिका में ही घर पर ही था।

यतीन्द्र कीपढ़ाई यानी एम एस एवं पी ई अमेरिका की डिगरी हो गई थी पर नौकरी नहीं थी। एक कंपनी के बाहरी पाइप से बहुत धुंआ निकल रहा था। यतीन्द्र ने चपरासी से पूंछा यहॉँ कोई नौकरी मिलेगी। वह बोला नहीं। तुम्हारे साहब से बात कर सकते हैं। यतीन्द्र मिला और उनसे बोला किमैं छोटी से छोटी नौकरी करने को तैयार हूॅं। जीएम ने कहा तुमचपरासी की नौकरी करोगे। तो बोला हॉं। तो दरखास्त दे दो। बोस बोला तुमको तो भारत और अमेरिका की दो-दो डिगरी प्राप्त हैं और बड़ा मेरिट केरियर है हमारी कंपनी का धुंआ का पलूशन दूर कर सकते हो। मैंने कहा कि मैंने केवल पढ़ाई की है। लेकिन मुझमें एक खास बात है कि दुनिया का ऐसा कोई काम नहीं है जो मैं नहीं कर सकता। उसने कहा यह क्या बात है। मैंने जवाब दिया कि यह मेरा व्यक्तिगत विषय है। गुरुजी अगर तुम करने का साहस करते हो तो मैं अभी मैँ तुम्हें प्रोफेशनल इंजीनियर एपाइंट करता हूॅं। मैँ केवल दो काम करता लायब्रेरी में पड़ता और गुरुजी काध्यान और मैंने पलूशन दूर करने का सारा सिस्टम बिठाल दिया और स्विच ऑन करने को ही था कि कंपनी के बड़े-बड़े इंजीनियरों ने कहा कि यह सिस्टम भस्ट हो जायेगा। मैंने कहा नहीं और मैँ फिर बैठा और गुरुजी का ध्यान किया गुरुजी ने बताया कि इस सिस्टम में ३ स्थान पर डिफेक्ट है उसे ठीक करो और स्विच आन करते ही ७०प्रतिशत पलूसन दूर हो गया। मुझे विश्व की प्रसिद्घ ल्यूमस कंपनी में एमाइन्मेंट मिल गया और इस पलूसन कंट्रोल का पेटेन्ट भी मेरे नाम से मिल गया।

यतीन्द्र कहतााहै कि मेरा गुरुजी से सतत सम्बन्ध है ठीक वैसा ही जैसा तुम्हारा गुरुजी के स्थूल शरीर से था। मैं उस माध्यम से प्रश्न भी पूंछता हूॅं और मेरा सम्बन्ध भी है। मैँने कहा मुझे विश्वास नहीं होता। अच्छा मेरे प्रश्नों का जवाब दो। मैंने कुछ प्रश्न महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों से पूछे हैं जैसे प्रेसीडेण्ट रामकृष्ण मिशन लोकेश्वरानंद जी। एवं सेक्रेट्री आर०के० मिशन भूतेश्वरानंद जी पर मुझे जवाब नहीं मिला। मेरा प्रश्न था आध्यात्म प्रगति के माइल स्टोन क्या हैं। जिस प्रकार बच्चे के शारीरिक प्रगति के माइलस्टोन होते हैं। छै महीने में बठता है एक साल में खड़ा होता है डेढ़ साल में दौड़ता है। उसने कहा अच्छा में गुरुजी से पूंछकर जवाब दूंगा। और दूसरे दिन उसका जवाब इस प्रकार था।

१- जब तक आप अपने घर की गली से मुख्य राजमार्ग पर नहीं आते आपको कोई माइल का पत्थर या बोर्ड नहीं मिलेगा। पहले अपना चरित्र, चिन्तन व्यवहार तथा प्रारब्ध की मॉंग प्रायश्चित से शमन नहीं कर लोगे माइल स्टोन नहीं मिलेंगे। चिन्ह तो केवल राजमार्ग पर पूंछने पर ही मिलते हैँ और राजमार्ग पर पहुॅंचनेकेबाद सतत चिन्ह मिलने रहेंगे। वे चिन्ह हैं १- अभय - यानी आदर्श और ईमान से प्रेम, सेवाका वह भाव जो किसी भी हानि दुख या कष्ट सहकर भी दूसरे का चरित्रचिन्तन और व्यवहार सुधारे। उसे भय उठता ही नहीं।

२-जबतक दूसरे का दुख दर्द अपने में अनुभव न होने लगे यानी करुणा न उपजे जो बिना सहयोग के रह ही नहीं सकती आध्यात्म पनपा ही नहीं।

३-उसकी समझदारी कोरी नहीं होती। जिम्मेदारी निभाकर ही रहेगी। उसका चरित्रचिन्तन और व्यवहार व जीवन क्रम ही उसकी आध्यात्मिकता का नाम होगा।

घनश्याम पाराशर जी वर्तमान में गायत्री तपोभूमि मेरे घनिष्ठ मित्रों में से है एक दिन मेरे पास आये। लक्ष्मी हाल १९८३। बोले मेरी लड़की की शादी में बहुत परेशानी है। अपने ही गायत्री परिवार के लोग बहुत दहेज माँगते हैं। मैंने कहा तुम्हारी लड़की की तो शादी बहुत अच्छी हो जायेगी पर मुझे यह बतलाओं कि गायत्री परिवार का कौन व्यक्ति दहेज माँगता है मुझे नाम बतलाओ। थोड़ा उनको भी ठीक कराया जाये।और हम दोनों माताजी के पास गये और माताजी को ठीक करने के लिये उनके नाम नोट कराये। माताजी बोली यह काम तो मैं कर दूंगी पर शादी के लिये तुम ऊपर चले जाओ। गुरुजी के पास पहुॅंचे और सारा हाल कह सुनाया। गुरुजी बोले घनश्याम तेरी लड़की की शादी किससे कराऊं। डाक्टर इंजीनियर अच्छा व्यापारी जिससे तू कह। पाराशर जी ने कहा जो आप ठीक समझे। बोले अच्छा बता तेरे पास पैसे कितने हैं। मैंने कहा ३००० रुपये। गुरुजी बोले ये पैसे तू अपने पास ही रखना और जा मैं जल्दी बहुत अच्छी शादी करा दूंगा। यद्यपि पराशर जी की लड़की की हाइट कुल चार फीट दो इंच है लेकिन उनको बहुत अच्छा लड़का ओएनजीसी इंजीनियर मिल गया जो हेलीकाप्टर से आइल एक्सट्रेशन साइट पर जाता है और ओएनजीसी की सारी सुविधाएँ साथ में काजू किसमिस गरम कपड़े खूब मिलते हैँ और बहुत सुखी भी हैं।

मेरा छोटा भाई दिलीपकुमार दत्त गुरुजी के पास गया और बोला गुरुजी मेरी इज्जत का सवाल है। क्या हो गया तेरी इज्जत को। बोला मेरे सब भाई डाक्टर इंजीनियर हो गये हैं मैं क्या करूं। गुरुजी जी बोले तू क्या पढ़ा है। एम ए सोसलाजी। बेटा तुझे डाक्टर तो बना नहीं सकते। अच्छा डाक्टर के बराबर बना दूं तो चलेगा। वह बोला हॉं गुरुजी बना दो लेकिन डाक्टर से कम नहीं होना चाहिए। अचानक क्या हुआ कि पीएससी से एक वान्ट निकली क्लास टू फेमिली प्लानिंग आफीसर की जिसमें स्नातक के साथ ३ वर्ष का परिवार नियोजन अनुभव चाहिए था। यह भाई मेरे साथ ही रहता था मैंने कहा तू एप्लाई कर दे ३ वर्ष का अनुभव का सर्टीफि केट मैं दे दूंगा और परिवार नियोजन के सम्बन्ध में इतना सिखा दूंगा कि वे तुझसे पूंछे या न पूंछे अपने परचे के बाद बोल ही देना कि परिवार नियोजन का मेरा अनुभव एक्स्ट्रा आर्डनरी है। मैंने उसे सब रटा दिया यहॉँ तक कि आपरेशन क्रिया तक और इंटरव्यू के दरवाजे तक उसके साथ गया। सबकुछ उसने वैसा ही किया पर फिर भी पीएससी का रिजल्ट आया रिग्रेट यू आर नाट सलेक्टेड। गुरुजी के पास गया बोला गुरुजी मेरा केन्सिल हो गया। गुरुजी बोले हो जायेगा। मैंने कहा गुरुजी आपको अंग्रेजी नहीं आती इसमें रिग्रेट लिखा है। गुरुजी ने कहा तू जा हो जायेगा। १५ दिन बाद दूसरा आर्डर आया यू आर सलेक्टेड एण्ड पोस्टेड एट रायगढ़। उन दिनों गुरुजी इंदौरर आयेहुये थे। रायगढ़ जाने के पहले उसे पता लगा कि गुरुजी यहीं है तो थ्री व्हीलर लेकर पहले तीन रूपराम नगर कालोनी पहुॅंचा और प्रणाम किया गुरुजी मेरा सलेक्षन हो गया। गुरुजी बोले तू तो कह रहा था गुरुजीआपको अंग्रेजी नहीं हाती। गुरुजी ने कहा तू जा ट्रेन तेरा इंतजार करेगी। सचमुचट्र्रेन लेट थी और मैं डाक्टर के समकक्ष मध्यप्रदेश स्वास्थ्य सेवा में नियुक्त हो गया।

गुरुजी ने मेरीशादी के पहले ही बतादिया था किमैं तेरे यहॉं दो अच्छी आत्मा भेजूंगा जिसका तुझे विशेष ध्यान रखना होगा। यदि नहीं रखा तो वे चलींजायेंगी। उन्होंने यह भी कहा समय आने पर मैं इनको कुछ विशेष काम सौंपूंगा। सन् ९० में कुछ दिन पूर्व ही मैंने गुरुजी को पत्र दिखाकर कहा कि यह बच्चे आपकी आज्ञा में हैं आप इन्हें जैसा कहेंगे यह तैयार हैं।

मैं शादी के पहले बहुत पूजा करता था। करीब तीन घण्टे। क्योंकि गायत्री का नया नया रचाव शुरु हुआ था। शादी होने पर श्रीपर्णा घबराती थी किअभी यह हाल है तो आगे क्या होगा। जब पता लगा कि इनके गुरु भी हैं तो घबराहट और बढ़ गई। मैं बड़ी मुश्किल से ताजमहल दिखाने ले गया और फिर मथुरा होटल में रहा पिक्चर देखी औरकहा कि आचार्य जी से मिल आये नास्ता बहुत अच्छा कराते हैँ और जब हम लोग मिले तो वह सारा विरोध भूल गयी क्योंकि कि गुरुजी ने बहुत सारे आशीर्वाद स्वास्थ्यर से लेकर समृद्घि तक पद से लेकर प्रतिष्ठा तक परिवार से लेकर भावना तक सारे आशीर्वाद एक साथ दे दिये और उसके बाद से वह गुरुजी का चित्र ले गई और पूजा करने लगीं।

एकदिन मेराछोटा भाई दिलीप गुरुजी से बोला मुझे हाथ देखने का बहुत शोक है मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैँ जो कुछ बोलू सच हो जाये। गुरुजी अपना हाथ दिखाकर बोले बेटा यहहाथ की लाइने तो हाथ के मोड़ने से आ जाती है लेकिन तू किसी के बाल छीकर भी जो बोल देगा वहसच हो जायेगा। और अबकुछ ऐसा हो गया कि मेरी बातें जो मैं नहीं चाहता और बोल भी देता हूं तो भी सच हो जाती हैं। कभी कभी मेरे मुंह बुरी घटना होने का निकल जाता है तो वह ठीक वैसी ही हो जाती है इसलिये हाथ देखता तो हूं पर डर लगा रहता है।

मैं अपनी बड़ी बहिन गीता सेनी को गुरजी से मिलाने के लिये ले गया। मैंने कहा यह मेरी बड़ी बहिन है पर इन्होंने मुझे हम लोगों को मॉं की तरह देखरेख ही नहीं की लेकिन मेडीकल कालेज मेंपढ़ाया भी क्योंकि हमारे पिताजी मेरे एडमीशन पर रिटायर हो गये थे। गुरुजी बोले बेटी मॉँग तू क्या मॉँगती है। बहिन बोली गुरुजी आपकी कृपा। तू तो बहुत होशियार है। मेरे बच्चे कितने हैं। बोली एक लड़का उसकी दो लड़कियॉं। गुरुजी ने कहा अच्छा अब उसके एक लड़का होगा। उसके लड़केका नाम अरुण है।

सिद्घार्थ की पीठ में बहुत दर्द था महीनों से चल रहा था। अपनी सर्विस से आकर के बोला कि मैं अब ठीक होकर के ही जाऊंगा मैंने लिटाकर देखा कि उसकी रीढ़ की हड्डी में कही फोड़ा है गुरुजी से कहा मेरे बेटे को मेडीकल कालेज ले जाकर आपरेशन कराना है। गुरुजी नेकहा अभी जाओ कार ले जाओ ड्रायवर एक जने को साथ और फिर डाक्टर प्रणव को ब्रह्मवर्चस तीन हजार रुपये लेकर भेजा मैंने कहा डाक्टर साब मेरे पास पैसे हैं और सिद्घार्थको पूरी तनखा मिलेगी बीएचईएल हर महीने पैसा भेजता है। डाक्टर प्रणव ने कहा कि गुरुजी ने कहा है कियह पैसा नहीं मेरा आशीर्वाद है। मैंने रख लिया बाद में सिद्घार्थ ने वापिस किये लेकिन एकदस रुपयेका नोट गुरुजी के प्यार आशीर्वाद के रूप में रखा जो आज भी साथ है यह दस का नोट मैंने शादी के बाद सिद्घार्थ की पत्नी प्रिया को दे दिया। आपरेशन हो गया सिद्घार्थ वापिस आया और तीन मंजिल चढ़ते ही गुरुजी का सन्देश आया कि सिद्घार्थ को लेकर आओ नीचे कार लगाना कार खड़ी रखना मुझसे मिलकर फिर वापिस ले जाना। बड़े कष्ट में ऊपर चढ़ा क्योंकि मेरठ से यहॉँ तक की यात्रा भी बड़ी ऊबड़खाबड़ सड़क पर थी पर गुरुजी का निर्देश मुश्किल से झुककर कठिनाई से प्रणाम कया गुरुजी ने कुछ नहीं पूंछा और बोले १- तू एक माह में बिल्कुल ठीक हो जायेगा। डाक्टर हैरान हो गये कि पाट्सस्पाइन का केस का एक्सरे में निशान भी नहीं रहा। डाक्टर ने प्लास्टर जेकेट लगाने केलिये कहाथा गुरुजी ने मना करदिया। २- तेरी नौकरीअच्छीचलेगीऔर जल्दीही पदोन्नति होगी। ३-तू आईएएस में तो मत बैठना उसमें नहीं आयेगा पर इंजीनियर की हर परीक्षा हर इंटरव्यूमें उत्तीर्ण होगा तेरी अच्छी शादी होगी खुश रहेगा जा।

एक बार सन् १९७७ में मेरा एक मुसलमान से झगड़ाहो गया मेरीउससे जान पहचान थी क्योंकि वह मरीज दिखाता रहता था उसके ट्रक ड्रायवर से एक एक्सीडेंट हो गया था आदमी मर गयाथा मैंने उसका पोस्ट मार्ट किया मैं फोन पर बात कर रहा था कि खिड़की के बाहर से वह बोला कि डाक्टर तुम लिख देना कि मृतक शराब पिये था। मैंने कहा मैँ नहीं लिख सकता हॉं मैँ पेट को रसायन परीक्षण के लिये भेज दूॅंगा। यदि उसमें कोई भी नशीली पदार्थ निकली तो ठीक है। वह बोला तो अच्छा मैं तुम्हें दंख लूंगा। उसने मेरे पास एक पुराने हड्डी टूटे मरीज को भेज दिया और कहा कि फीस मैं शाम को दे जाऊंगा दूसरी तरफ वह मिनिस्टर और कलेक्टर के पास गया और कहा कि डाक्टर दत्ता सर्टीफिकेट देने के लिये ५० रुपये माँगतेहैं। जिस एसओ स ेरिपोर्ट लिखाई एक दिन पहले ही मैंने उसकी पत्नी को सिजेरियन में ३०० सीसी रक्त दिया था। हम और श्रीपर्णा गुरुजी के पास गये और सब कह सुनाया गुरुजी ने कहा कि मैं अपने अपने तप का अंश देकर भी कुछ नहीं होने दूंगा कोई तुझसे घटना भी नहीं पूंछेगा जो असम्भव था पर हुआ वही। केश में न पुलिस एसडीओ आये न ही मध्यभारत सरकार का सचिवन ही कोई दूसरे गवाह कोर्ट ने सरकार को लताड़ दी कि बिना सोचे समझे प्रथम श्रेणी के अफसर पर कोर्ट में केस क्यों भेजा और मेरी पदोन्नति भी हो गई।

मेरी मॉँ को चोट लगी तार आया। हम दोनों को बुलाया शाम ७बजे गुरुजी ने ऊपर बुलाया। साधना कक्ष के सामने माताजी और गुरुजी अपनी खाट के सामने बैठे थे और कहा तेरीमॉँ का तार आया है जाना चाहे तो जा पर कुछ खास चोट नहीं है मैं कल तुझे डाक्टर प्रणव के साथ देहरादून भेजना चाहता था मैंने कहा तो नहीं जाता गुरुजी माताजी बोली नहीं तू जा। मैं गया बहुत साधारण चोट थी फिर कुछ दिनों बाद तार आया दोनों को बुलाया था गुरुजी ने मुझे बुलाया और कहा तू अभी शान्तिकुॅंज से ही चला जा श्रीपर्णा से अपना सामान सूटकेश मंगा ले। यह तेरी मॉँ का अन्तिम समय है। जितनी सेवा कर लेगा उतना ही शुभ होगा। मैं चला गया हमारी मॉं एक महीने सेरेब्रल हेमरेज में बेहोश रहीं हम दोनों को सेवा का मौका मिला और उनकी मृत्यु पर जब मैंने रोते हुए गुरुजी से कहा गुरुजी हमारी मॉँ को सद्गति प्रदान करें तो गुरुजी ने कहा तुम लोगों को जिस कष्ट के साथ उन्होंने तुम लोगों को समर्थ बनाया उससे उनकी सद्गति हुई है तुम समर्थ हो खुद जाओ लक्ष्मण झूला के पास कुछ झोपणियॉं है जहॉँ कोढ़ी लोग रहते हैं उनको तुम स्वयं जाकर गरम कपड़े बॉंट आना। हमने वैसा ही किया। तर्पण आदि की सारी व्यवस्था गुरुजी ने करा ही दी थी।

यतीन्द्र की पुत्री अंजला की शादी थी। इला व उसके भाई शरद काफी परेशानी करें ऐसी सम्भावना थी। मुझको यतीन्द्र ने कहा कि उस दिन गुरुजी को याद दिलाना कि आज अंजली की शादी है ध्यान रखें। इला अपने नये पति के साथ शराब में धुत आयी पर वह शीघ्र आ गई थी इसलिये लेट आयी तब तक शादी निपट चुकी थी अरविंद और यतीन्द्र दोनों ने व्यवस्था की और उन्होंने फोन पर बताया कि मुझे ऐसा लगा कि सारी व्यवस्था गुरुजी ने की। अब दोनों सुखी हैं।

अमेरिका में एक कमाल

मेरे छोटे भाई यतीन्द्र का जन्मदिन था २६ दिसम्बर मुझको कहा कि गुरुजी माताजी से मेरे जन्मदिन पर आशीर्वाद सन्देश रिकार्ड क रके भिजवा देना। मैंने डाक्टर प्रणव से कहकर दोनों के सन्देश १०, १५ लाइन में भिजवा दिये। यह सन्देश यतीन्द्र पर भी पहुॅंचा दिया और कापीमेरे पास है। सन्देश कुछ इस प्रकार का था।

यतीन्द्र तुम मेरे बेटे हो पास सरहो या दूर भारत या अमेरिका हमारे लिये तुम पास ही रहोगे बिल्कुल आमने सामने हम हमेशा तुम्हारे हर कष्ट दुख में पास रहेंगे और जो भी मदद हमारे लिये सम्भव होगी करेंगे। हमारा आशीर्वाद। माताजी का सन्देश था तुम एक अच्छे बेटे और शिष्य की तरह मिशन का काम करना अच्छे बेटे बनना हमारी आशीर्वाद जन्मदिन पर। जब

जब यतीन्द्र को बताया कि तुम्हारे हृदय की धमनियों में तीन जगह रुकावट है और आपरेशन करना होगा। मुझे अमेरिका आने के लिए फोन किया और व्यवस्था के पहले ही आपरेशन हो गया था। जब वह कार में जा रहा था तो उसने वही केसेट जिसमें गुरुजी माताजी का जन्मदिवस सन्देश बार-बार दोहराया जा रहा था सुनता जा रहा था। आपरेशन की टेबिल पर लेटते ही उसने देखा कि गुरुजी और माताजी दोनों उसके सामने आ गये और कहा कि यतीन्द्र यह आपरेशन तेरा नहीं हमारा होगा। तू बिल्कुल चिन्ता मत करना। आपरेशन हो गया लेकिन आपरेशन के बाद यतीन्द्र कहता है कि जब मैं होश में आया कि इस ६ घण्टे चलने वाले आपरेशन के बाद मैंने प्रेम का हाथ उसी ताकत से दबाया जितनी मेरे स्वस्थ्यता में थी। यद्यपि एक बार ब्लीडिंग भी खुल गया था फिर भी मैं चोथे दिन इतना स्वस्थ हो गया कि एक मील घूमकर आया। डाक्टर ने कहा कि ऐसा आपरेशन न आज तक हमने किया न हुआ। हड्डी को काटकर दिल तक पहुॅंचा जाता है लेकिन पाँचवे दिन हम तीन मील तक घूम सके और उसके बाद ऐसा कभी लगा ही नहीं कि मेरा आपरेशन हुआ है। अमेरिका से पाँचवे दिन उसने फोन पर बात की आवाज पूर्णतया पूर्ण स्वस्थ्यता की थी। कुछ दिन बाद जब मै अमेरिका पहुॅंचा तो मेरे बड़े बड़े बेग उसने उठा लिये कमरे तक ले गया और कहा कि मैं पूर्ण स्वस्थ से किसी प्रकार भी कम नहीं हूॅं।

माता जी के दूसरी ऑंख का आपरेशन होंना था। सारी तैयारी हो गयी। माताजी को कई बार पहले भी देख लिया गया था। आपरेशन के पहले फिर जॉंच की गई ऑंख में कोई केटरेक्ट नहीं था। मैंने कहा माताजी आपकी ऑँख का आपरेशन नहीं होगा। माताजी ने कहा यह सारी जिम्मेदारी गुरुजी की है आपरेशन कराये या कार्य कराये। मैं तो उनकी एक उपकरण मात्र हूॅं।

माताजी को अमेरिका जानाथा। बीसा के लिये अमेरिकन एम्बेसी जाना आवश्यक होता है लेकिन माताजी ने कहा कि यदि गुरुजी की अटकी हो अमेरिका भेजने के लिये तो वे लाइन में खड़े हो मैं कहीं नहीं जाती (गुरुजी शरीर छोड़ चुकेथे)। अशोक रावल चेयरमेन एमआईएस तथा जेसी पंत सचिव भारत सरकार के प्रयास से अमेरिकन एम्बैसी का अफसर यहीं आकर बीसा की व्यवस्था कर गया।

एक दिन हम और श्रीपर्णा माताजी के पास गये (८६-८७) हम और श्रीपर्णा माताजी के पास गये और बोले यतीन्द्र की नौकरी छूट गयी है और अरविंद हमारा बेटा उसके पास पढ़ रहा है उसको परेशानी हो रही होगी। चार वर्ष हो गये वह भारत आया भी नहीं है। माताजी हम लोगों को बहुत याद आती है परेशानी है और अमेरिका में और कोई दूसरा सहारा भी नहीं है। माताजी ने कहा देख अरविंद छै वर्ष में आयेगा यानी दो वर्ष बाद। दूसरी बात परेशानी और कष्ट होंने दे। जितना कष्ट होगा उतना ही अच्छा होगा। जहॉँ तक खाने रहने या आवश्यकता होगी मैं सारा प्रबन्ध कर दूंगी। तुझे परेशान होने की कोई जरूरत नहीं है कोई चिन्ता मत कर हम सब ठीक कर देंगे और ठीक वही हुआ।

अभी जब मैं बाजपेई यज्ञ में जून ९८ में न्यूजर्सी था। एक दिन मैंने अरुण से पूंछा तुझे ध्यान में कैसा लगता है। गुरुजी कहते थे तू एक बड़ी आत्मा है। वह बोला पिताजी ऐसा तो मुझे कुछ नहीं लगता लेकिन जब पूजा करने बैठता हूॅं तब लगता है किसी जन्म में में ऋषि था। हॉँ एक बात जरूर होतीहै कि जब कभी आप किसी बड़े आदमी से परिचय कराते हैं तो मैं मिल तो लेता हूॅं आपके कहने पर, पर मुझे कोई काम के नहीं लगते। क्योंकि जब कभी मैं थोड़ी नहीं बड़ी मुसीबत में होता हूॅं तो गुरुजी मेरी मदद कर देते हैं। एक बार ऐसा हुआ कि मेरी नौकरी छूट गई और मेरे पास केवल ५० डालर थे मैं चाचा से भी पैसा माँगना नहीं चाहता था और अमेरिका में तो बिना पैसे के तो दिन भी नहीं कट सकता। मैंने गुरुजी को याद किया और उसी दिन मुझे नौकरी मिल गयी। नौकरी मिलते ही काफी एडवांस मिल जाता है। छोटी छोटी बात में न केवल गुरुजी याद आ जाते हैं लेकिन वह काम भी आ जाते हैं।

ममता हाईवे पर कार चला रही थी। अभी उसका अस्थाई लायसेंस था। अरविंद पास बैठे सो रहा था। कार एक खंबे से टकरा गयी और पीछे हमारी कार से ३, ४ गाड़ी टकरा गयी। अरविंद ने माताजी को फोन किया माताजी एक कार का नुकसान और दूसरा कोर्ट केस होगा। कार का स्टेयरिंग तो अरविंद ने संभाल लिया था पर कार बुरी तरह डेमेज हो गई थी। माताजी ने कहा कुछ नहीं सब ठीक हो जायेगा। ममता को सिर पर थोड़ी चोट आयी थी तब मैं लाईन में प्रणाम कर रहा था। माताजी ने हमसे और श्रीपर्णा से अरविंद की बात भी कराई बाद में बुलाकर कहा कि अरविंद का एक्सीडेंट हो गया पर तू चिन्ता मत करना मैं सब ठीक कर दूंगी। कोई केस नहीं चला और इंश्योरेंस ने दूसरी गाड़ी भी दे दी। पहली वाली तो पुरानी थी।

सन् १९७० में कृष्णकांत मिडिल में फैल हो गया। पिताजी ने कहा एक स्वामी आये है मेला आशीार्वाद देंगे। मैं गया और मिल आया। गुरुजी ने बिना कुछ कहे ही कहा तूं चिन्ता मत कर मैं तुझे पढ़ाऊंगा। दूसरी बार फिर मैंने एक पेपर ही नहीं दिया इसलिये फैल होने की पूरी आशा थी। मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी ने कहा ठीक है और मुझे पहले पेपर में ही इतने नंबर मिल गये कि मैं पास हो गया। ४० में से ३८ दूसरे में अनुपस्थित। मेरा रोल नंबर ७३६१ था। जब मैं गुरुजी से मिला तो उन्होंने खुद ही कहा आगे परीक्षा ढंग से देना अबकी तो पास करा दिया।

सन् १९८३ हम लोगों ने शान्तिकुॅंज में स्थाई रूप से आने का मन बना लिया था। इस कारण लम्बी छुट्टियों पर रहे। इस बीच स्टेडी लीव पर मैं अमेरिका भी गया। मेरा छोटा बेटा इंजीनियरिंग में आ गया था। अरविंद अमेरिका जाना चाहता था। बोला कि आप गुरुजी से कहदें। मैंने कहा मैं नहीं कहूॅंगा। तो बोला कि मैं कह दूं। मैंने कहा कह सकते हो। गुरुजी के पास गया और बोला गुरुजी मेरा छोटा भाई इंजीनियर हो गया। अब अमेरिका जाये बिना मेरी बात बनेगी नहीं। गुरुजी ने कहा तो चला जा। तेरा सारा इंतजाम करा देता हूॅं। तू अपने चाचा यतीन्द्र से अधिक पैसा कमायेगा। जब मैं गुरुजी से मिला तो बोले तेरा बेटा अमेरिका जाना चाहता है। मैंने जाने को कह दिया यहॉँ भी उसको अच्छी नौकरी दिला देते। मैंने कहा तो रोक लेते हैं बोले नहीं जाने दे। सचमुच व्यवस्था गुरुजी ने बना दी। मैं कई बार अमेरिकन एम्बैसी दिल्ली जा चुका था। यतीन्द्र बार-बार फोन करता था कि इमीग्रेशन के कागज भिजवा दिये हैं पर मिले नहीं अचानक प्रेरणा हुई कि बम्बई एम्बैसी में पता लगाते है वहॉं कागज मिल गये। यदि और २, ३ महीने देर हो जाती तो अरविंद मेरे साथ १८ वर्ष से ऊपर होने के कारण मेरे साथ ग्रीनकार्ड पर नहीं जा सकता था। पर सब काम हो गया हम दोनों का टिकट भी आ गया। अमेरिका पहुॅंच गये। लगभग ३ वर्ष वो पढ़ता रहा। उसके बाद हमारे छोटे भाई यतीन्द्र को अमेरिका में ही एक अच्छी नौकरी मिल गयी इसलिये वह जाने लगा। उसके बौस ने कहा यतीन्द्र मैँ तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता। पर तुम भी अच्छी नौकरी नहीं छोड़ सकते। मैं दुखी हूॅं। यतीन्द्र ने कहा सर आप चाहे तो मुझे नहीं भी छोड़ सकते। कैसे बोले मेरे भतीजे को आप नौकरी दे दे। उनने कहा ठीक है भेज दो। १५ दिन इन्टरव्यू की तैयारी की और वह पहुॅंच गया। बोला पूछियें बोले केवल एक प्रश्न। तुम यतीन्द्र के भतीजे हो उसने कहा हॉं। तो ३६००० डालर प्रतिवर्ष की नौकरी ठीक रहेगी। यह काफी अच्छा वेतन था। उसने कहा हॉं। जिस पर यतीन्द्र अमेरिका की डिगरी लेकर इंजीनियर था। वही पद अमेरिकन फेडरल सर्विस में बोर्ड आफ एजूकेशन में अरविंद को केवल एमएससी होने पर मिल गया। ५, ६ वर्ष यतीन्द्र ने उसकी पूरी देखभाल की और अब १६ वर्ष से वह अमेरिका में सेट है।

गुरुजी बहुत छोटी-छोटी बातें भी बड़े प्यार से समझा दिया करते थे जैसे घर पर कोई चीज खरीदना हो जैसे बाल क्लाक, फर्नीचर, रेडियो तो उसे दशहरा दीवाली, जन्मदिवस, विवाह दिवस गायत्री जयंती, गुरुपूर्णिमा को उपहार या बच्चों के दिन पर खरीदने पर प्रेम भाव भी बढ़ता है और यह याद भी रहता है।

गुरुजी के बड़े लड़के ओमप्रकाश भाई साहब सन् १९६०-६१ से मेरे मित्र हैं। गुरुजी की बहुत पुरानी बातें सुनाते हैं। एक घटना उनने सुनाई। गुरुजी लड़के ही थे। जमना में बाढ़ आई। बहुत पानी भर गया जानवर मर गये। घरवार बह गये। बहुत हानि हुई। गुरुजी रोज बाढ़ का पानी देखने जाते थे। एक दिन रेखा कि एक छोटे से टापू जैसे जमीन के टुकड़े पर एक कुत्ता घिरा हुआ है। तीन दिन से उसने कुछ नहीं खाया। पर उसे कौन बचाये। गुरुजी ने बड़ी मुश्किल से तीन रुपये में एक डोंगी वाले को तैयार कराया। कौन जाता वह भी कुत्ते को बचाने। कोई आदमी तो है नहीं जो सीधी तरह से नाव पर बैठ जाये। डोंगी उसके चारों तरफ चक्कर लगाती रही पर कुत्ता ऐसा डरा कि वह कैसे भी नॉंव पर आने तैयार नहीं था गुरुजी रोटी दिखाते रहे पर वह नहीं आया २, ३ चक्कर लगाने के बाद डोगी वाला बोला चलो भाई मरने दो कुत्ते को श्रीराम बोले एक चक्कर और जैसे ही उसके पास पहुॅंचे कि युवक श्रीराम नॉव से कूद पड़े जमीन पर टुकड़ पर और सउठा उस कुत्ते को और कूद पड़े उसी क्षण ढोगी पर ढोगी डगमगाई पर श्रीराम कुत्ते के साथ ढोगी पर थे। ढोगी वाले ने बेहिसाब गाली दी युवक श्रीराम को बोला खुद मरे तो मरे मुझको भी मारेगा। वह गाली देता ही रहा जब तक किनारे पर नहीं आ गया। गुरुजी ने उसको ५ रुपये दिये और ढोगी वाले ने एक जोर की लात मारी कुत्ते को कुत्ता काय काय करके दौड़ गया जमीन पर। यह था गुरुजी का बचपन।

गुरुजी ने शरीर छोड़ दियाथा। ओमप्रकाश भाई साहब पुरानी बाते याद कर करके रोज लिख रहे थे। मै प्रतिदिन त्रिपदा ५ में उनके पास जाता। वे सबसे पहले मुझे सुनाते वे नियमित मेरी प्रतीक्षा करते हम चाय भी साथ ही पीते। एक दिन बोले मेरे पास कल एक महिला आई। और बोली आप गुरुजी के बड़े पुत्र है मैंने कहा हॉं। मैं आपको कुछ कहना चाहती हूॅं। आप मेरी बात सुने। मैं आपका अहसान नहीं भूलूंगी। बहन बोलो। हम दोनों प्रज्ञा ५ में कुर्सी डालकर बराण्डे में बैठ गये। उसने सुनाना शुरु किया। आज से करीब २५ वर्ष पहले की बात कि मैं रेल के थर्ड क्लास के डिब्बे में जा रही थी। मैं गेट के पास नीचे बैठी थी। मेरी ऑंख से आंसू बह रहे थे। एक बूढ़ा सा आदमी खिड़की के पास सिंगल सीट पर बैठा था। वह बोला बहन यहॉँ बैठ जाओ। तुम्हें हवा लगेगी। पास में स्थान है मैं वहॉँ चला जाऊंगा। मैं बैठ गयी। अगले स्टेशन पर वे पानी ले आये बोले मुॅंह धोलो बहन पानी पीलो। मैं बोली मुझे कुछ नहीं चाहिए। वह चुप बैठ गया। फिर अगले स्टेशन पर पानी ले आया। बोला बहन पानी पीने से कोई हानि नहीं होगी। बड़ी नम्रता से खड़ा रहा। गिलास लिये। फिर बोला बहन पानी पी लो। मैंने पी लिया। फिर थोड़ी देर में वह बोला बहन कहॉँ जा रही हो। शायद राजस्थान का कोई स्थान था जेसलमेर जैसा। उसने पूंछा क्यों। बोली वहॉँ कोई बड़े सन्त आ रहे हैं उनसे मिलने। अच्छा तो क्या मागोगी। बोली मौत। बोले मौत वो नहीं देंगे और कुछ नहीं माँग सकती मैं चुप हो गयी। वह भी बैठ गया। मैं एक वर्ष पहले ही विधवा हो गई थी। स्टेशन आ गया। और भीड़ घुस गयी। पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य जी की जय। परम पूज्य गुरुदेव की जय। शोरगुल माला फूल। पर वह बूढ़ा आदमी उठते उठते कह गया। कल तू मुझसे मिलना।

दूसरे दिन बड़ी भीड़ थी प्रणाम करने वालों की लम्बी लाईन गुरुजी ने महिला को देख लिया और कार्यकर्ता भेजा उस बेटी को मेरे पास ले आओ। ट्रेन ने उसको बतलाया था कि मेरा कोई पुत्र भी नहीं है मेरा भविष्य अन्धकारमय है मौत नहीं माँगू तो क्या माँगू। आज गुरुजी ने कहा बेटी मैं तेरा पिता हूॅं तू मेरी बेटी है इसको अच्छी तरह समझ ले और प्रमुख कार्यकर्ता को बुलाकर कहा तुम अपना काम किसी और को सम्भलवा दो और कहीं से कोई नवशिशु लेकर ही तुम मेरे पास आना। मैं तीन दिन यहॉँ पर हूॅं बस यही काम तुम्हें करना है। गुरुजी की आज्ञा कोई चारा नहीं मेटरनिटी होम गया एक महिला की प्रथम डिलेवरी हुई थी डिलेवरी में मॉँ मर गई। पिता ने बच्चे को देने से मना कर दिया। उसके ससुराल वालों ने भी बहू को ले जाने से मना कर दिया। दूसरे दिन लेडी डाक्टर स्वयं बच्चे के साथ खुद आई यह देखने कि हाल के बच्चे को कौन लेने वाला है और कैसे पालेगा। प्रातः यज्ञस्थल पर पहुॅंची तो अपार भीड़ और सरंजाम देखकर गुरुजी से बहुत प्रभावित हुई और गुरुजी से बोली और बोली लगता है बच्चे को सच्चे मॉं बाप यहॉँ मिलेगें पर मैं बच्चे को लेने में थोड़ा संकोच कर रही थी। मालुम नहीं किस जात का होगा। मातापिता कैसे होंगे। घरवाले क्या कहेंगे। गुरुजी समझ गये। गुरुजी ने बच्चे को गोद में ले लिया और बोले बस अब यह ब्राह्मण हो गया। बेटी तुझे याद है न मैं तेरा पिता हूॅं। तुझसे कोई कुछ नहीं कहेगा। लोग तेरी सेवा करेंगे। तू बस बच्चे को पाल और सारी व्यवस्था होती चली जायेगी। यह पिता हर क्षण तेरे साथ रहेगा। यह तेरा शानदार बेटा होगा। तेरी इतनी सेवा करेगा कि क्या कोई बेटा मॉँ की करेगा। मैंने उसका नाम रख दिया पियूष शर्मा आज वह इंजीनियर है मातृभक्त है और जाने क्या जादू हुआ कि उस दिन से सब मेरा कुछ ज्यादा ही ख्याल रखने लगे मेरा हृदय भी रोने की अपेक्षा बच्चे की देखभाल में लग गया। कहते कहते वह महिला रोती रही लेकिन बोलती रही। तुम्हारे पिता श्रीराम शर्मा मेरे भाई हैं वह कभी नहीं मर सकते। वह तो मेरे साथ जायेगा। मेरे लाल कफन में। भाई साब आपको सुनाकर मैं हल्की हो गई। मेरा शान्तिकुञ्ज आना सफल हो गया। मेरा भाई है पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य और मैं उसकी बहिन।

मेरे स्वसुर डॉ० के०के०गुहा को हार्टअटेक हो गया। बनारस मेडीकल कालेज में भरती हो गये। मुझको टेलीग्राम मिला मैं एमएस पढ़ रहा था। मैंने सोचा मैं जाकर क्या भला कर सकता हूॅं। गुरुजी के पास चलते हैं। मैं मथरा पहुॅंचा गुरुजी को सबकुछ सुनाया। गुरुजी बोले तू बनारस जा सब ठीक हो जायेगा और आज के बाद उन्हें दिल में कभी दर्द नहीं होगा। मुझे आश्चर्य हुआ कि दिल का मरीज और फिर कभी दर्द न हो यह कैसे सम्भव है पर मैं साक्षी हूॅं कि उन्हें कभी दर्द नहीं हुआ। सन् १९६६ में उनके जीवन के अन्त समय में लखनऊ में मैं उनके पास था। मृत्यु तो हुई पर दर्द नहीं हुआ।

एक दिन मथुरा में गुरुजी मुझसे बोले दत्ता में तेरा ध्यान रखता हूॅं तेरे लिये बहुत कुछ करता भी हूॅं पर बताता नहीं हूॅं और बताना उचित भी नहीं है पर तू विश्वास कर वह क्या कहना चाहते थे मेरी समझ में नहीं आया पर अच्छा अवश्य लगा।

हमारी छोटी बहिन गीता ग्वालियर में रहती है। हमारा छोटा भाई विजय उनके पास रहता था। उसे मानसिक कष्ट था। डाक्टर भटकेरिया वहीं पास में रहते हैं। मदद करते रहते हैं। बहुत अच्छे गायत्री परिवार के व्यक्ति हैं। ग्वालियर में कुछ लोगों ने मेडीकल टेस्ट के पेपर निकाल लिये और पैसे लेकर उसकी कापियॉं बेच दी। वे पकड़े गये गिरफ्तारियॉं हुई। ऐसे एकआध परचे डॉ० भटकेरिया की लड़की ने भी खरीदे थे और सम्भावना थी कि पुलिस पकड़ेगी। लगभग पक्का था पुलिस अब आई तब आई हमारी बहिन ने एक सपना देखा कि माताजी आई और ब्रह्मदण्ड लेकर और बोली मैं तेखती हूॅं हमारी बच्ची को कौन परेशान करता है सब हड्डी पसली एक कर दूंगी। सबेरे होते ही हमारी बहिन डाक्टर भटकेरिया जी के पास गई और बोली तुम बिल्कुल चिन्ता मत करो कुछ नहीं होगा। फिर भी डाक्टर भटकेरिया माधवगंज कोतवाली में पता लगाने गये कोई गड़बड़ की सम्भावना तो नहीं है। थानेदार की टेबिल में कांच के नीचे गुरुजी का फोटो लगा था थोड़ा पुराना और फट भी गया था। डाक्टर साहब ने अपने पाकेट से दर्शन पाकेट निकाला और थानेदार को कहा इसको ले लीजिये। थानेदार बोल उठा अब आपकी बच्ची हमारी बच्ची है आप बिल्कुल चिन्ता न करे और फिर कोई पूंछने नहीं आया।

हमारी बहिन गीता सेनी के लड़के योगेश का पहला जन्मदिन था। यज्ञ कराया। पार्टी भी दी। बड़ा डर था कि हमारा छोटा भाई जो बहिन के पास ही रहता है। कोई चिल्लाचाटी नहीं करे। वह चाहे जहॉँ चला जाता है कुछ उठाता है कुछ बोलता है हमेशा खाना माँगता रहता है नहीं दें तो चिल्लाता है। बाहर के काफी आदमी आये हुये थे हमारी बहिन ने देखा कि विजय के अगल बगल में गुरुजी और माताजी घूंम रहे हैं गीता ने डाक्टर भटकेरिया जी को दिखाया उन्होंने भी ऐसा देखा और किसी ने नहीं। वह नकेवल शान्त रहा बल्कि थोड़ा बहुत काम भी करता रहा।

हमारे बड़े भाई डाक्टर धीरेन्द्र नाथा दत्त एमएस हैं। ग्वालियर से इंदौर जा रहे थे रास्ते में गुना में उनको बहुत पेट दर्द हुआ मैं कहीं बाहर गया था। पेट बहुत फूल गया था। डाक्टरों को भी दिखाया कष्ट दूर नहीं हुआ। मेरा बेटा अरविंद घर पर ही था और उसने गुरुजी की दी भस्मी गायत्री मंत्र के साथ पेट पर लगाई और दर्द १० मिनिट में ही पूरी तरह दूर हो गया।

सन् १९९४ में मैंने माताजी से बिल्कुल अकेले मेंकहा कि माताजी मेरा मन है कि मैं गुरुजी को अपने जीवन में दो बार प्रणाम करूं एक अभी कभी और एक मत्यु के पहले हम दोनों प्रणाम करें। माताजी की ऑंखों मेंआंसू भर आये बोली तू गुरुजी को ही प्रणाम कर रहा है। मेरा प्रणाम गुरुजी को प्रणाम हैमाताजी के ऑंसू देखकर मैं रुक न सका और प्रणाम कर भाग गया।

एक दिन मैंने माताजी से कहा आप तो मॉँ शारदामणी हैं। उन्होंने अपने आश्रमवासियों से कहा था कि उनके मृत्यु के समय हम दोनों मौजूद रहेंगे और यदि अपना विकास कर सको पवित्र बन सको तो जब कभी हम दोनों को अपने पास अनुभव कर सकते हो। माताजी आपका यह वायदा हम लोगों के लिये आज भी है न। माताजी ने सुन लिया आगे क्या हुआ मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया।

मैंने कहा माताजी कभी हम आपके परिवार के निकट सदस्य थे पर अब दूर क्यों हो गये। कहॉँ हम बंगाली कहॉँ आप। पिछले जन्म में कोई भूल हो गई या कोई पाप हो गया आप नाराज होंगी। माताजी ने कहा नहीं बेटा परिवार के सदस्य होना निकटता नहीं है तुम हमारे निकट हो हम तुम लोगों को बहुत प्यार करते हैं बस यही निकटता है आत्मीयता है परिवार के सदस्य बनना नहीं।

गुरुजी से मेरी कभी-कभी इस लोक और उस लोक की बात हुआ करती थी शान्तिकुॅंज में आकर कम तो हो गई पर होतीथीं। जैसे एक दिन मैंने पूंछा गुरुजी दिव्यानंद जी का क्या हुआ। गुरुजी ने कहा मैं मरा नहीं हूॅं मैं कैसे बतलाऊॅं क्या हुआ। ब्रह्मवर्चस के कुछ साथी भी मेरे साथ थे मैंने कहा आप तो चेतना से सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं तो गुरुजी बोले उनके मन में सुखी जीवन की थोड़ी इच्छा रह गयी थी इस कारण एका समृद्घशाली और एक अच्छे परिवार में उनका जन्म हुआ है। अगले जन्म में यह बहुत अच्छी स्थिति पर पहुॅंच जायेंगे। जब से जितेन्द्र तिवारी जी का आना हुआ। तबसे यह बातें मुझसे कम हो गयी। क्योंकि ऐसी बातें उनसे बहुत अधिक होने लगीं थीं। मुझको गुरुजी ने एक दिन इशारा किया कि जब कभी तुझे जरूरत पड़े इससे पूंछ लेना। उन्होंने कहा मैं शरीर छोड़ने पर कुछ ऐसा करूंगा जैसे कोई कुरता उतारता है। पर तीन स्थान पर मैं रहूूंगा एक माताजी के पास। दूसरा सजलश्रृद्घा प्रखर प्रज्ञा तीसरा अखण्ड दीपक। किसी ने कहा गुरुजी ये तीनों स्थान शान्तिकुॅंज में है और हम लोग बहुत दूर है हम लोग भी आपके बच्चे है तो चौथा स्थान ऊँ गता हुआ सूर्य होगा।

एक दिन हम और डाक्टर प्रणव गुरुजी के पास बैठे थे। गुरुजी बहुत प्रसन्न थे बोले तुम दोनों आशीर्वाद दे दिया करो। डरना नहीं मैं तुम्हारे पीछे हूॅं। मेरी तो आज तक हिम्मत नहीं हुई आशीर्वाद देने की।

मैं २१, २२ वर्ष की उम्र तक पढ़ाई के अलावा कुछ नहीं जानता था। धर्म के नाम पर राम नाम हनुमान चालीसा और मन्दिर दर्शन। भगवान को इतना ही समझताथा कि वह अच्छे नम्बर से पास करने में मदद करता है। गुरुजी को देखा तो ऐसा लगा कि कोई जादूगर किस्म का आदमी है। उनसे मुझे प्यार हो गया। उनका प्यार औरमाता जी का भोजन मेरे जीवन में सबसे अधिक रुचिकर रहने लगा।

जादूगर इतने कि १५ रुपये किराये पर रहने वाला व्यक्ति माताजी सतीश शैला और अपनी मॉं के साथ दिन में कम से कम १०, १५ व्यक्तियों को अपने हाथ से खाना खिलाना बर्तन धोना क्योंकि वह प्रयास करने पर कहती थीं मैं मॉं हू बच्चे बर्तन नहीं धोते। गुरुजी कहते मैं तेरे घर आऊॅंगा और वे अशोकनगर, ग्वालियर लखनऊ कानपुर जाबरा मंदसौर जबलपुर देवास और इंदौर आये। अशोकनगर तो हमारे घर ६ दिन रहे। बाद में गुरुजी ने पत्र लिखा मेरा पिछले जन्म काा वायदा था इसलिये इतने लम्बे समय तेरे घर रहा। वायदा पूरा किया तुमने भी प्रसन्नता अनुभव की होगी जो मुझे पटानी ही थी।

सन् १९५८ के यज्ञ में मैं नहीं था पर वह यज्ञ मुझे ऐसा लगता था जैसे मैंने देखा है। क्योंकि उसकी पूरी कामेंट्री गुरुजी ने मुझे स्वयं सुनाई। उन्होंने वे पक्ष भी बताये जो शायद यज्ञ में आने वालों को भी न मालुम पड़ सके होंगे। जैसे गुरुजी ने कहा कि हिमालय की कुछ दिव्य आत्माओं ने मुझसे वायदा किया है कि वे इस यज्ञ में आयेंगी। मैंने भी कुछ लोगों को कह दिया था कि वे आयेंगी पर मैं परिचय नहींकरा सकता। जान सको तो जान लेंना क्योंकि मेरा उनसे ऐसा ही वायदा है। इतने बड़े यज्ञ में बिना कोई सरकारी सहायता के बिना पुलिस या स्वयं के धन के इतना अच्छा अनुशासन व्यवस्था तथा प्यार एक इंसान नहीं कर सकता। सारा कार्यक्रम गुरुदेव माताजी ने जल उपवास पर किया पर हमेशा वह केवल हॅंसते और मिलते ही रहते थे। पण्डित लीलापत शर्मा जी बताते हैं कि हमसे गुरुजी न ेकहा कि रसीद काटने का काम बड़े आराम से करना। चाय पीना बीच में आराम करना जितना आवश्यक हो अपने आप आ जायेगा। पंडे लोग पैसे उठा ले जायें तो ले जाने देना। जमा करने वालों की इतनी भीड़ होतीथी कि वे रसीद की प्रतीक्षा नहीं करते थे। जय गायत्री माता कहकर ऊपर फेंक जाते थे। किसी की कोई चीज खोई नहीं। खोई तो मिल गयी। औरन मिली तो घर जाकर मिल गई। कोई दुर्घटना या मौत नहीं हुई। बीसियों वर्ष बाद भी रिक् शे और दूकान वाले उस यज्ञ को याद करते हैं। सफाई, उपचार एवं स्वयंसेवक कार्य आगन्तुकों ने ही किये। व्यवस्था मनुष्य ने की होगी पर वह दिव्य थी। कहते हैं उसमें दस लाख व्यक्ति तीन दिन रहे। भोजन किया।

कुछ मुसलमान गुरुजी से मिलने शान्तिकुॅंज आये। थोड़ी बातचीत के बाद एक दूसरे को वह घड़ी देखने लगे और बोले गुरुजी चले। नमाज का समय हो गया। ऊपर के हाल में ही गुरुजी बोले। यहीं नवाज पढ़लो। वे हाथ धोकर नवाज पढ़ने लगे। आज नवाज में उनको कुछ विशेष ही आनन्द आया और उनका नेता बोले खुदा के नूर और आप में कोई अन्तर नहीं है हमें खुदा के नूर में आप और आप में खुदा का नूर दिखता रहा। हमारी यहॉं की नमाज धन्य हो गई।

जयपुर के सेठ तुलजाराम सुनाते हैं। कि शान्तिकुञ्ज के पास एक महिला विद्योत्मा रहती है। कुछ योग केन्द्र चलाती हैं। ऐसे तो वे शान्तिकुॅंज से बहुत चिढ़ती है पर कहती है कि उन्हें कुण्डलिनी जागरण की विद्या आती है। सेठ उनके पास चले गये। और बातचीत की किसी को नहीं बताया। और गुरुजी के पास जाते ही गुरुजी पूछने लगे तूं कहॉँ गया था। वे बोले बगल में। क्यों भगवान देखने। चल मैं तुझे भगवान दिखाता हूॅं कितने भगवान देखेगा। मालुम नहीं वे सच बोल रहे थे या नहीं पर वे बोले कि गुरुजी ने मुझे देवताओं की लाइन दिखाई।

मुझे यह घटना डॉ० प्रणव के पिताजी ने कही। एक देवकन्या ने फॉंसी लगाली। गुरुजी को सूचना दी कि एक लड़की ने फॉंसी लगा ली और मर गई। गुरुजी पहुॅंचे और सबों को अलग जाने को कहा। बोले अभी मरी नहीं है जाकरथोड़ा मंत्र सा पढ़ने लगे पानी वानी छिड़का होश में आ गई। काफी समय बाद जब एक दिन गुरुजी ने प्रातः ५ बजे मुझे और बी०डी०पाण्डे बीएचईएल डिप्टी मैंनेजर से बातचीत के बाद कहा कि दत्ता तुम महेन्द्र के पास जाओ और मुझको लिखित कुछ पत्र और पेपर की कटिंग पढ़ों और उसके बाद तुम दोनों गंगा किनारे जाकर बैठो। इन पत्रों में एक पत्र उस लड़की के पिता का भी था जिसमें उसके पिता ने उसकी प्राणरक्षा की बात लिखी थी और कुछ वर्ष बाद उसस लड़की की मृत्यु हो गई। पेपर कटिंग में एक घटना मैंने यह भी पढ़ी कि गुरुजी राजस्थान गये हुये थे और वहॉँ गवर्मेन्ट आफ इंडिया के एक केन्द्रीय मंत्री ने गुरुजी को लाइट आफ इंडिया से सम्मानित किया। लाइट आफ एशिया गौतम बुद्घ को दिया गया था।

मैं जब नया नया जुड़ा था और उनको बड़ी बारीकी से देखता था। उनका साहित्य खूब पढ़ता था। और जॉंचता रहता था कि जो कुछ वो लिखते हैं सचमुच अपनाते भी है। वे कभी चमड़ा उपयोग नहीं करते थे केवल जूते में ही नहीं होलडाल के बेल्ट में भी नहीं। रेल मेंकभी धक्का देकर नहीं जाते थे। और सबसे बड़ी बात हर व्यक्ति यह सोचता रहा कि मुझे ही सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। वे कहते भी रहे मैं अधूरा प्यार नहीं जानता। मेरा हर प्यार पूरा ही रहताा है। वे प्रश्नों का उत्तर विद्वता से नहीं बड़े प्यार से तथा उपयोगिता तथा आदर्श की दिशा में धकेलते हुये देते थे।

मथुरा में गुजरात के एक सेठ आये। दीक्षा ली। सन् १९५९-६० की बात होगी और दक्षिणा में एक १०० का नोट दिया गुरुजी ने कहा कि चलो मेरे साथ और उस समय दो दो रुपये की बंडी ५० खरीदी और २५ अपने सिर पर और २५ उस सेठ के सिर पर रखी और वह गरीबों में बॉंट आये।

शक्तिपीठों की स्थापना के लिये संकल्प के समय में कई स्थानों में गुरुजी के साथ रहा वे पहला पैसा जो कुछ मिलता था वह वहीं अपने आशीर्वाद के रूप में दे देते थे। गुना के शक्तिपीठ के उद्घाटन संकल्प में जो भी पैसे मिले वह मुझे दे दिये जो वहॉं के कार्यवाहक श्रवण कुमार सोनी को दे दिये गये।

गुरुजी माताजी का कमरा गायत्री तपोभूमि मेंकुए के पास था और बाद में ऊपर। शान्तिकुॅँज में भी इसी प्रकार गुरुजी ऊपर के कमरे में रहते और जब हम लोग यानी डॉ० प्रणव, एमडी, डॉ० जितेन्द्र गुप्ता एमडी और मैं एमएस आयुर्वेद का काम करते तो कहते कि १० से ४ तक मेरी दुकान चलेगी और बीच-बीच में बात कर जाते। कितने ही लोग बाग ऑँसू लेकरआते और प्रसन्न होकर जाते। आज वही आशा हम अखण्ड दीपक और सजल श्रद्घा प्रखर प्रज्ञा से रखते हैं। जो गुरुजी के पास जाता उनका आत्मीय बन जाता और माताजी के पास जो रो दिया बस उसी की बात सही हो जाती थी। यदि कभी गुरुजी किसी पर नाराज होजाते तो हम देखते जल्दी से वह साधना कक्ष में जहॉँ हम लोग बैठते आते और माताजी को फोन कर देते कि जरा देख लेना मैंने बच्चे को डॉंट दिया है।

शान्तिकुॅंज में आर्यसमाज के प्रमुख महात्मा आनन्द स्वामी अपने आर्यसमाज अनुयायियों के साथ आये। सप्तऋषि स्थान पर पुरुष और महिलायें आर्यसमाज की तथा शान्तिकुॅंज के बैठ गये। गुरुजी आनन्द स्वामी को प्रणाम करतेथे और आनन्दस्वामी गुरुजी को। गुरुजी इसलिये कि वे बड़े थे सन्यासी थे। और आनन्द स्वामी कहते थे कि मैं इसलिये प्रणाम करता हूॅं कि इसमें मुझसे अधिक अध्यात्म है। प्रज्ञागीत सुनते ही वे बोले। सुन्दरं सुन्दरं। दोनों को संक्षिप्त भाषण हुये और लौटते हुये हम लोगों को बड़े जोर देकर बोले सोचो, सोचो सोचो।

गुरुजी ने जब १९६१ में मुझसे कहा था कि तुम दो व्यक्तियों से मिलना एक सत्यनारायण पण्ड्या और दूसरे लीलापत शर्मा। उसके बाद हम लोगों के पारिवारिक सम्बन्ध हो गये और मैं मोटरसाईकिल में जज साहब को बिठालकर ढबरा ले जाया करता था पण्डित जी बहुत प्रेम से बात करते और बहुत अच्छा खाना खिलाते।

एक दिन अरुणा ने गुरुजी से कहा गुरुजी प्रणव तो मेडीकल में आ गया मैं भी आपका रिश्तेदार हूॅं मैं मेडीकल में नहीं आया। गुरुजी बोले तेरा नाम कहॉँ है। बोले मालुम नहीं। मैं सलेक्ट नहीं हुआ। पता लगा कहॉं है। पिताजी जज थे कहीं से पता लगा उसका नाम वेटिंग लिस्ट में ग्यारहवॉँ था। ग्यारह लड़के छोड़ गये और उनका एडमीशन हो गया।

सन् १९८३ में हम लोग नियमित साधना कक्ष में बैठकर तीनों डाक्टर आयुर्वेद की तुलना एलोपैथिक से करकर विज्ञानसम्मत पक्ष बना रहे थे। वहॉँपर वीरेश्वर उपाध्याय जी भी थे। अचानक गुरुजी ने वीरेश्वर जी से पूंछा देहरादून गाड़ी किसने भेजी। वे बोले डाक्टर प्रणव ने। गुरुजी बोले क्यो प्रणव गाड़ी तूने भेजी। जी गुरुजी। क्यों। कुछ पेड़ पौधे के कुण्डे लाने थे। कितने कुण्डे लाने थे। डॉक्टर प्रणव घबराये। बोले दस बारह तो दस बारह केलिये गाड़ी भेजनी थी। डाक्टर प्रणव बोले गुरुजी गलती हो गई अब नहीं भिजवायेंगे। बोले सवाल गलती का नहीं है मैं यह पूंछ रहा हूॅं कि तुमने क्या सोचकर भेजा। डाक्टर प्रणव चुप। फिर बोले बोला नहीं क्या सोचकर भिजवाई। मैं सिर्फ जानना चाहता हूॅं ऐसी कोई बात नहीं मैं यह जानना चाहता हूॅं कि तुमने क्या सोचकर भिजवाई एक बजे से चार बजे ते थोड़ी-थोड़ी देर में फिर पूंछते। डाक्टर प्रणव न रुक पा रहे थे न भाग पा रहे थे ऑंखों में आंसू छलछला आये। हम लोग भी बीच-बीच में ऑंख उठाकर देख लेते और फिर पढ़ने लगते। आखिर चार बजे गुरुजी बोले लोग अपने बच्चे के दूध का पैसा काटकर शान्तिकुॅंज भेजते हैं उसका ध्यान रखना प्रणव।

गुरुजी के हर शिविर में हर प्रोग्राम में आसपास के भाषण में हमारा जाना अब लगभग नियमित हो गया था। श्रीपर्णा का पूरा सहयोग मिलता था। गुरुजी के धर्म से अब उनको कोई डर नहीं था। वे बिना कारण मुझे बड़ा डाक्टर बतलाती। कोई बीमार होता तो कहते मेरा डाक्टर आ रहा है शीघ्र ठीक कर देगा। करते वे स्वयंथे प्रशंसा मुझे देते। रामसुंदर चतुर्वेदी हमारे साथ शिविर में थे अचानक बोले तूं अपनी पत्नी को नहीं लाया। अभी तार देकर बुला। वे आ गईं और आते ही उनको बहुतगहरा पीलिया हो गया मुझसेबोले तू दवा दे दे। मैं नया नया एमबीबीएस था दवाओं के नाम भी याद नहीं थे। बस ग्लुकोस और कोई टानिक दिया तीसरे दिन वे ठीक हो गई। इतना मुझे स्पष्ट था कि मेरी दवा का इसमें कोई खास रोल नहीं था।

गुरुजी की नियमितता कमाल की थी। पेतीस वर्षाें में कभी भी गुरुजी माताजी से मिलने में मुझे कभी पॉंच निमिट से अधिक देर नहीं लगी। गायत्री तपोभूमि वे कभी भी घियामंडी से चलकर पूर्णाहुति पहुॅंचने से नहीं चूके। ऐसा कभी नहीं हुआ कि मेरे पत्र का उत्तर नहीं आया हो। गुरुजी के पत्र लिखने का एक विशेष अंदाज था। माताजी पत्र पढ़ती और पत्र पढ़ते पढ़तेमें ही गुरुजी पत्र लिखते रहते और जो विशेष बात पूंछी जाती वह अन्तिम दो चार लाईन में लिखकर यहॉँ माताजी का पत्र पढ़ना समाप्त होता वहॉं गुरुजी का पत्र लिखना। मैं अखण्ड ज्योति मंगाता और कभी देन होती तो तार द्वारा मंगा लेता। मुझे नहीं याद कि एक भी महीने की अखण्ड ज्योति चूकी हो।

एक दिन मैं घियामंडी पहुॅंचा पूंछा माताजी कहॉं है एक बच्चे ने बताया सतीश के लिये कोट का कपड़ा खरीदने नीचे गयी हैं। बच्चा दौड़ा माताजी अमलकुमार आया है। लौटते में मेरे लिये कचौड़ी समोसा ले आयी। मैंने कहा माताजी गुरुजी किताब मेंलिखते हैं कि यह नहीं खाना चाहिए। तो वे बोली मैं तो नहीं लिखती। खाना मेरा विषय है और यह प्यार ही है जिससे आदमी बहुत कुछ कर गुजरता है।

गुरुजी एक दिनमें ६०-७० पत्र लिखते थे मैंने पूछा गुरुजी हमने सुना है आप पत्र रख देते हैँ गायत्री माता लिख देती हैं गुरुजी बोले लिखती तो नहीं लेकिन लिखाती हैं। फिर गुरुजी ने एक मजेदार कहानी सुनाई बोले। एक दिन एक स्टेनो मेरे पास आया बोलागुरुजी आप बहुत लिखते हैं जब आराम करते हैं तो बोल दिया करिये।मैँ लिख दूंगा। मैंने तीन विषय में एम ए किया है। गुरुजी ने कहा बहुत अच्छा बेटा। लेकिन मेरी एक मुसीबत है। गुरुजी आपकी क्या मुसीबत है। बोले कुछ दिनों पहले एक और स्टेनो आया था वह तीन विषय में एम ए भी था और पीएचडी भी वो भी यही कह रहा था। पर मेरी मुसीबत ये हैं कि मैँ भी किसी का स्टेनो हूॅं अब स्टेनो स्टेनो कैसे रखे।

स्वामी केशवानंद जी माताजी के पास आये और लड़ने लगे। कि माताजी आपने आचार्य जी को जाने क्यों दिया। बोले आप हम बच्चों की तरफ से गुरुजी से क्यों नहीं बोली। माताजी बोलीं कि अब तो गुरुजी चले गये अब उनकी तरफ से मैं तुम्हारी सुन लेती हूॅं।

गुरुजी नौ दिन के उपवास के बाद घियामंडी में दावत देते और कहते यह दावत है बाकी जो अभी तक खाये होंगे वह सब अदावत है क्योंकि वे शरीर औरमन को नुकसान पहुॅंचाते हैं। जिस दिन गुरुजी का विदाई गीत होता और वीणापाणी जयपुर की उनका गाना सुनकर ही लोगबाग रोने लगते क्योंकि उन्हें मालुम था कि गाने के बाद बिदाई भाषण होंगा।

एक दिन चिन्मय ने माताजी से पूंछा यानी अपनी नानी से कि आप कहती हैं कि नारी युग आयेगा यह कैसे होगा। आज की नारी तो बहुत पिछड़ी है। माताजी बोली बेटे सवाल पिछड़ेपन का नहीं है अच्छा काम सब कर सकते हैं। और युग पढ़ाई से नहीं अच्छाई से आता है। नारियों में ईर्ष्या और द्वेष चला जायेगा और वही उनकी योग्यता और प्रखरता होगी।

मुझे गुरुजी के साहित्य ने बहुत प्रभावित किया और मुझे अब भी बुक स्टाल का काम बहुत अच्छा लगता है। जहॉँ कही भी मेले में बुक स्टाल लगाया ऐसा कभी नहीं हुआ कि तीन चार दिन में सारी किताबे समाप्त न हो गई हों। मैं यह स्पष्ट रूप से कहता हूॅं कि आप कितने भी पढ़े लिखे हों और आपने भी किताबे पढ़ी हों पर गुरुजी की यह किताब पढ़ेंगे तो आपको लगेगा कि आपने जीवन में एक महत्त्वपूर्ण किताब पढ़ी।

३० सितम्बर १९८९ को गुरुजी ने कहा कि मैंने कितनी ही मुक्त आत्माओं से गायत्री परिवार में आने का अनुरोध किया है पर कोई तैयार ही नहीं होता।

नरसिंहगढ़ में हम गुना से गुरुजी के साथ उन्हीं की कार में पहुॅंचे। जहॉं का कार्यक्रम होता उससे थोड़ी देर पहले ही गुरुजी फ्रेस हो लेते थे क्योंकि पहुॅंचने के बाद प्रणाम माला जै में कोई ध्यान ही नहीं रख पाताथा। वहॉं पहुॅंचते ही एक स्वयंसेवक झण्डा लेकर आगे आगे चलता रहा और एक मकान पर जाकर गाड़ी खड़ी हो गई। वहॉं एक भी कार्यकर्ता नहीं था महिलायें रसोई में चाय नाश्ताबना रहीं थीं। और वहीं जाकर गुरुजी को बिठाल दिया। गुरुजी खड़े रहे और कोई कार्यकर्ता नहीं। उन्होंने पण्डितजी को कहा किसी को बुलाकर लाओ। पर वे भी कहीं रुक गये मुझसे बोले दत्ता तू जा और किसी जिम्मदार स्थानीय कार्यकर्ता को बुलाकर तो ला। मैं जल्दी जाकर जल्दी ही लौटा और गुरुजी से कहा गुरुजी मन्दिर पर चढ़ने के चढ़ाई के रास्ते पर एक ट्रक पलट गया और एक आदमी मर गया इसीलिये सारे गायत्री परिवार के लोग उसके परिवार के साथ हैं। तो एक कुर्सी बुला मैं उस पर बैठूंगा और सबो को लाइन से खड़ा कर दे और वे प्रणाम करते रहें और उनसे कह कि वह अपनी समस्या सीधे मुझसे कहदें मैं बात करता रहूॅंगा। तू यह देखना कि मेरे रहने की व्यवस्था चाहे जितनी साधारण हो और मैं परदे वरदे पसन्द नहीं करता हवा रोशनी आये। सारी भीड़ नियंत्रित हो गई।

जब सन् १९६७ में पॉंचकुण्डीय यज्ञ में गुरुजी अशोकनगर आये तो हमारे यहॉँ ठहरे। सरकारी मकान अस्पताल के सामने उसको तीन बार पुतवाया और बगीचे के सारे पिलर्स पर प्रकाश के गोले लगवाये पूजा का कमरा सदवाक्य से सजाया गया मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मैं बिल्कुल अंजान हूॅँ आपके लिये क्या करूं। आप थोड़ा बता दें छोटी भूलें तो होंगी पर बड़ी भूल न हों आपकी कृपा चाहिए। गुरुजी बोले तू अपना काम देख मेरी देखरेख सब श्रीपर्णा कर लेगी। मैं तो घर का आदमी हूॅं बाहर क्या करना यह देख। मैंने कहा फिर भी कुछ तो कहें गुरुजीगुरुजी ने कहा देख सोने का स्थान ऐसा हो जिससे खिड़की के सामने आसमान दिखे क्योंकि यह साधक के लिये आवश्यक है। दूसरी बार मैं जल्दीउठता हूॅं लेकिन किसी को उठने को न कहना। मैं विस्तर पर ही रहूॅंगा पर दो चार अपने मित्रों को ले आना आध्यात्म्कि बात करेंगे। श्रीपर्णा से गुरुजी ने कहा कि जब मैँ पूजा करूं तो कोई देखे नहीं। श्रीपर्णा बोली गुरुजी बिल्कुल नहीं देख सकते। क्यों दू देखने वाली थी। जी गुरुजी। आप नहीं कहते तो जरूर देखती। क्या आप भगवान से बात करते हैं। गुरुजी हँस दिये। श्रीपर्णा ने कहा एक प्रश्न पूछंू पूूंछ बैटी गुरुजी जो झूठ बोलते हैँ बेईमानी चोरीकरते हैँ यदि पता लग जाये तो सारे पापनष्ट हो जाये। गुरुजी बोली तू बड़ी होशियार है। अब जब मैं भगवान के पास जाऊॅंगा और तेरी बात कहूॅंगा जब कोई झूठ बोले तो उसके मुॅंह से धुआ निकले और हम सबको हॅंसा दिया।

सन् १९६७ मे मैँ एमएस पास करके देवास आया। उन दिनों मध्यप्रदेश में कोई एमएस आर्थाेडिक्स नहीं था। हमारा छोटा भाई दिलीप कुमार दत्त एक्सटेंशन आफीसर था वह संस्कृत जानता था हम दोनों मिलकर गुरुजी की सत्यनारायण की कथा करते थे और गुरुजी वाली व्याख्या करते थे। किसी से भी जाकर कहते थे कि तुमकथा कराओ अगर प्रसाद का खर्चा न उठाना चाहो तो हम वह भी साथ ले आयेगे। पर तुम ऐसी कथा सुनोगे जो बड़ी सच्ची है। गुरुजी ने बतलाया कि लकड़हारा इसलिये बड़ा आदमी नहीं बन गया कि कान में कथा के कुछ शब्द पहुॅंच गये थे लेकिन इसलिये बड़ा आदमी बन गया कि वह अपनी लकड़ी का गट्ठा एक ही ही कीमत पर बेचता था। नॉंव सत्यनारायण भगवान ने ढुबाई नहीं मन की हीनता कि पैसे होते हुये भी सत्कार्य के लिये न देना उसे नॉंव उठी-उठी दिखने लगी। हम लोग बड़े दावे के साथ कहते थे और सत्य को धारण करने का साहस कर सकोगे तो यह सचमुच तुमको भी ऐसा ही ऊॅंचा उठायेगी।

गुरुजी एक दिन बोली चाहे मैं जप की बात करू या ध्यान की सलाहकी या प्यार की खाना खिलाऊं या भगवान की बात करूं मेरा उद्देश्य एक ही होता है चाहे मेरे सामने का आदमी अच्छा हो या बुरा आज की अपेक्षा कल और अच्छा व्यक्ति बने।

गुरुजी को एक आनन्दमार्गी संप्रदाय का एक शिष्य जो व्यावसायिक हत्यारा था तथा एक रजिस्ट्रार, एक एसडीओ और एक और व्यक्ति की हत्या कर चुका था गुरुजी को सर पर बांयी ओर पीठ पर दिल के नीचे तथा जिगर के नीचे चाकू मार गया देशी कट्टा उसने चलाया पर चला नहीं मारने का उद्देश्य यह कहा जाता है कि उसके गुरुजी का कहना था कि गायत्री परिवार के सदस्यों की शक्ति उनके गुरु की है और ये लोग मेरे खिलाफ गवाह देते हैं। वह चाकू मारता रहा गुरुजी बचाते रहे और उससे कहते रहे कि तू भाग जा नहीं तो लोग मार डालेंगे। गुरुजी ने कोई पुलिस रिपोर्ट नहीं की। मैं कुछ ही दिन पूर्व अमेरिका से आया था और शान्तिकुॅंज होकर ही गया था। मैं फिर लौटकर गुरुजी की ड्रेसिंग देख रहा था मैंने कहा गुरुजी मेरी एक बात समझ में नहीं आयी। गुरुजी बोले क्या समझ मैं नहीं आयी। मैंने कहा गुरुजी यह बात समझ में नहीं आयी कि आप दांये हाथ से लिखते हैं दांये हाथ से काम करते हैं और चाकू के ये चार पाँच समानान्तर बचाने वाले घाव आपकी बांयी हथेली में क्यों हैं। गुरुजी गम्भीर हो गये बोले बेटा तूने बहुत ठीक सोचा। मुझे तो सब प्रणाम करने ही आते थे जब वह व्यक्ति चाकू पर चाकू मार रहे थे तो मैंने चाहिए इसलिये मैँ बचाव केवल बांये हाथ से कर रहा था मेरा कहने का साहस नहीं हुआ लेकिन मैंने मन में सोचा कि मैं बस इसी गुरु की पूजा करता हूं यह हमारे पूर्व जन्म के कर्म नहीं उनकी अहैतुकी कृपा है कि वे गुरुजीके रूप में मिले कोटि कोटि प्रणाम अखण्ड ज्योति के पाठको का।

पहले मैं बुक स्टाल पर ही खड़ा होता था ब्रह्मवर्चस में। कुम्भ के समय बहुत भीड़ थी। और बहुत सदस्य बनाये। मैँ जब साहित्य और गुरुजी के परिचय के साथ सदस्य बनाने का प्रयास करता तो बीच-बीच में स्टाल में गुरुजी माताजी के चित्र देख देख कर बात करता मालुम नहीं क्या प्रभाव पड़ता कि वह सदस्य अवश्य बन जाता। मैं कहता ये विश्व की सर्वश्रेष्ठ ६ पत्रिकाओं मेंसेएक है यदि यह घर में रखी भी रहेगी और कुछ लाईन भी कोई पढ़ेगा तो उसके दिमाग पर प्रभाव पड़ेगा इसमें कोई प्रचार नहीं और कोई लाभ भी नहीं लिया जाता। मेरी अंग्रेजी बहुत काम आती। कोई थोड़ी अंग्रेजी बोलता तो फिर मैं अंग्रेजी में ही सारी बात करता तो जल्दी से सदस्य बनकर भाग जाता। मैं ऊपर चाय पीने गया तो मैंने श्रीपर्णा से कहा कि यदि इस समय गायत्री माता भी आ जायें और अपना परिचय न दे तो मैँ उनको अखण्ड ज्योति का सदस्य बना दूंगा। नीचे उतरने के बाद करीब दो घण्टे हो गये मैं लोगों को गाइड करके लेकर आता और कोई सदस्य नहीं बनता। मुझे लगा कि शायद यह मेरा घमंड था इस कारण कोई सदस्य नहीं बन रहा है। मैंने मन ही मन अपनी गलती मानी और पश्चाताप किया। अचानक एक आदमी आया और बोला सदस्य बनाओ। वह नाम पते बोलता रहा मैं लिखता रहा। करीबन आठ दस पते लिखा दिये उसमें किसी शहर का नाम तक मैं नहीं जानता था। मैंने कहा किसी को बुलाऊं कोई अजूबा बात है शायद यह पैसे नहीं देगा। उसने १००, १०० के नोट निकाले और पैसे दे दिये। मैंने कहा एक एक पत्रिका ले जाइये वे बोले नहीं मैं हिमालय जा रहा हूॅं वहीं भेज देना मैंने फिर प्रार्थना की आप पॉंच मिनिट गुरुजी की प्रयोगशाला देखेंगे उन्होंने कहा पॉंच मिनिट। मैंने नीचे खड़े होकर ही यज्ञशाला और ब्रह्मवर्चस प्रयोगशाला की कार्यशैली बतलाई पॉंच मिनिट समाप्त होते ही वे बोले आचार्य जी का बहुत बड़ा काम है बस तुम उन्हें छोड़ना नहीं मैं ककिसी को कहता इसके पहले बो कहीं चले गये। हम लोगों ने माइक में कुम्भ के मेरे में कई भाषाओं में यह एनाउन्स कराते रहते थे जिसके बोल थे ऋषि मुनि सन्त सुधारक हिमालय निवासी एवं हमारे आत्मीय भाई बहन हम आप सबको वैज्ञानिक प्रयोगशाला देखने के लिये आतंत्रित करते हैँ हम आपकी क्या सेवा कर सकते हैं हम आपके जूतों की रखवाली करेंगे गुरुजी ने जब सुना तो वे बहुत प्रसन्न हुये।

एक बार गुरुजी ने ऊपर कमरे में गोष्ठी ली। हम १५, १६ कार्यकर्ता थे बोले सब आ गये। किसी ने कहा वीरेश्वर भाई साहब नहीं आये। वह हमेशा देर से आता है। एक दो बारा इनके दो मिनिट यानी २४ मिनिट खराब करेगा और जब आयेगा तो मुझे फिर शुरू से बोलना पड़ेगा। इतने में भाईसाहब आ गये। गुरुजी कुर्सी से उठे और बोले आइये बैठिये और गोष्ठी चालू कर दी हम लोग सब किसी तरह अपनी हॅंसी रोक सके। उपाध्याय जी सिर खुजाने लगे बाद में हम लोगों ने बताया क्या कारण था।

सन् १९९० में एक गम्भीर गोष्ठी में ऊपर के कमरे में गुरुजी बैठे थे। माताजी बायी तरफ हम १०, १२ कार्यकर्ता होगें। गुरुजी बोले इन यज्ञों में मैँ जाऊॅंगा। गुरुजी के जाने की कोई आशा नहीं थी। कार्यक्रम भोपाल में भी था मैंने अपने भाई को लिखा देखना आज गुरुजी ने कहा है कि वे इन यज्ञों में आयेगे मालुम नहीं ये स्थूल या सूक्ष्म रूप में पहुॅंचेगे तुम ध्यान रखना क्योकि निकलने की कोई सम्भावना नहीं है पर होगा जरूर जब गुरुजी ने कहा है।

किसको मालुम था कि गुरुजी नही गुरुजी की अस्थियॉं गई। उस गोष्ठी में गुरुजी बहुत नाराज हुये। बोले तुम लोग मेरा कहना नहीं मानते। तुम सुधरते ही नहीं। मैं २००० तक जीना चाहता था पर अब नहीं जीऊंगा। क्योंकि मेरे ये शब्द मेरा सारा प्रयास शरीर में कम पड़ रहा है। माताजी रोती जा रही थीं थोड़ा इशारा करती थी गुरुजी को रुकने के लिये पर गुरुजी न रुके न चुप हुये। बोले अब में नहीं रुकूंगा जाऊंगा।

सिद्घार्थ तीन चार वर्ष का था। गुरुजी अशोक नगरआये थे। एक स्थान पर बैठे थे वहॉं से वेसउठ गये। बच्चे ने सारी मालायें पहन लीं। इतने में पण्डित लीलापत शर्मा निकले बच्चे ने उनको बुलाया और कहा मुझे प्रणाम करो। मैं गुरुजी हूॅं। पण्डितजी बच्चे को ले गये गुरुजी के पास उठाकर और बोले यह कहता है मैं गुरुजी हूॅं गुरुजी बोले ठीक तो कहता है यह अमलकुमार का बेटा। शेर का बच्चा शेर, बकरी का बच्चा बकरी, गुरुजी का बच्चा गुरुजी

सिद्घार्थ एक वर्ष का भी नहीं था उसको निमोनिया हो गया। कोई खास बात नहीं पर श्रीपर्णा घबराई और गुरुजी को पत्र लिख दिया गुरुजी ने जवाब दिया कि मैं कल तेरे घर आ रहा हूॅं मुझको भी तार भेजा कि लखनऊं पहुॅंचों और सचमुच गुरुजी पहुॅंच गये वह जल्दी ठीक हो गया।

गुरुजी कहते कि धर्म, अध्यात्म सीखने के पहले उसकी एबीसीडी जरूर सीखना और एबीसीडी है अपना अच्छा स्वास्थ्य योग्यता सदगुण और सीमित परिवार। गुरुजी हमेशा परिवार नियोजन की बात करते। कितने ही व्यक्ति मेरे पास गुरुजी का पत्र लेकर आते कि उन्होंने परिवार नियोजन का निर्देश दिया है। मैंने भी तीस वर्ष के पहले ही आपरेशन करा लिया था जबकि कोई सिविल सर्जन आपरेशन के लिये तैयार न था मैंने सहायक चिकित्सक से ही आपरेशन कराया।

सन् १९६० में हिमालय से लौटने के बाद गुरुजी ने एक कहानी सुनायी कि मैं जिस स्थान पर रहता था वहॉँ कोई चीज नहीं ऊगती थी। दूध छै छे महीने तक खराब नहीं होता था तीन महीने में कुछ साग भाजी के पेड़ ऊग जाते थे। एक दिन सुबह मैँ घूमने निकला तो वहॉँ दो महात्मा थे एक का नाम था रामानंद और दूसरे का कृष्णानंद। दोनों निर्वस्त्र रहते थे। मौन थे। बड़े महात्मा दिखते थे। कुटिया के आगे थोड़ी जमीन पर बैगन सब्जी बो लेते थे जो तीन महीने में ऊगकर ही फसल दे देते थे फिर फसल समाप्त। गुरुजी ने उनको लड़ते देखा। झगड़ा था मेरी जमीन पर तुमने बो दिया। यद्यपि सारी जमीन सरकार की ही थी। वे मौन थे इसलिये बोल नहीं रहे थे। लाल लाल ऑँखे और हाथ पैर हिलाना। एक दूसरे से गुथ गये। यएक ने दाड़ी के बाल नोच दिये और वह खूनाखून हो गया। मेरा दिमाग चकराने लगा क्या यही धर्म अध्यात्म है तो मैँने बड़ी गलती की जो गृहस्थ छोड़कर धर्म में जुटाने की शिक्षा दे रहा हूॅं। मैंने एक बार पुलिस की गोली चलते देखी थी जिसमें पॉंच छै लाशे बिछी थी। यदि गोली मुझे लग जाती तो शायद मैं तुम्हारे बीच नहीं होता पर तब भी मैं इतना प्रभावित नहीं हुआ जितना इसघटना को देखकर सात रोज में मेरा १२ पौण्ड वजन कम हो गया फिर एक दिन मैँने ध्यान में अपने गुरुजी की बात सुनी तेरा धर्म तेराअध्यात्म यह नहीं है। तू सही रास्ते पर है। मेरा समाधान हो गया।

मथुरा में गुरुजी को एक दिन विचार आया। कि सबको संगीत सीखना चाहिए। सूचना हो गई। माताजी भी सीखें। माताजी ने हारमोनियम पर शब्द लिख लिये। और रीड दबादबाकर सीखने लगीं। गुरुजी बोले मैं भी सीखूंगा। उन्होंने एक मास्टर भी रख लिया नियमित समय गुरुजी कीक्लास चली। गुरुजी बड़ी गहराई से सीखने लगे। ऐसा क्यों ऐसा क्यों नहीं इससे क्या होगा ऊंचा क्यों नीचा क्यो नहीं मास्टर साब सिखाते रहे। सात दिन बाद आना बन्द। गुरुजी ने कहा पता लगाओ मास्टर साहब बीमार तो नहीं हो गये। घर भेजा पत्नी ने कहा मास्टर साहब बाहर गये हैं। एक दिन बाजार में गुरुजी को मास्टर साहब मिल गये प्रणाम किया बोले मास्टर साहब आपका स्वास्थ्य कैसा है आप बाहर गये लौटे तो क्यों नहीं आये। मास्टर जी ने हाथ जोड़े बोले गुरुजी आपके पास बहुत कलायें हैं मेरे पास एक ही कला है थोडी सी आप मेरे पीछे क्यों पड़ गये। मुझे दाल रोटी खाने दीजिये आपको सिखाऊंगा तो मैं भूल जाऊंगा। मुझको आप कृपा करके माफ कर दीजिये। यही हाल ब्रह्मवर्चस में जितेन्द्र तिवारी अशोक तिवारी और मेरा। हम लोगों ने बड़ी ईमानदारी से ढपली सीखना शुरू किया क्योंकि गुरुजी ने कहा था कि तुम एक साल तक नियमित ढपनी सीखो औरे इसके बाद भी तुम्हें न आये तो तुम्हारा कोई दोष नहीं मेरी ही किस्मत खराब है। हम लोग सचमुच सीखते रहे। पहली लाईन में बैठते लोगों का बिगड़ने लगा। शास्त्री जी ने बीच की लाईन में बिठा दिया आगे पीछे और पीछे दोनों का बिगड़ने लगा फिर पीछे बिठाल दिया बाद में हाथ जोड़कर बोले आप लोग वैज्ञानिक का ही काम कीजिये। औरों ने भी कोशिश की सुरेश गंगवाल, भाष्कर तिवारी, पाटीदार सब असफल हो गये।

माताजी ब्रह्मवर्चस कीएक गोष्ठी में सुनाती है कि जब मैं पैदा हुई तो हमारी दादी बोलीं लड़की हुई है। हमारे ससुर ज्योतिषी थे बोले लड़की नहीं यह देवी है। से सैकड़ों को खाना खिलायेगी हजारों को आशीार्वाद देगी। तो अच्छा यह तुम्हाारी देवी होगी। इसी बात पर हमारे दादा ने मेरा नाम भगवती देवी रख दिया। यह कहकर माताजी खूब जोर से हॅंसी। बात सच हुई माता जी के मामाजी सुनाते है। कि माताजी भी बचपन में गुड़ियों से खेला करती थीं। लेकिन उनका खेल अजीब था। उनकी गुड़िया हमेशा बीमार पड़ जाती थी और एक गुड्डा वैद्य दवा देने आता था माताजी गुड़िया की सेवा करती दूध पिलाती दवा पिलाती और आगे जीवन में यही हुआ। यह विश्व की सेवा में संलग्न हो गईं।

गायत्री तपोभूमि में एक रसोईया था। मैंनेजर ने शिकायत की। कि हमारे यहॉँ घी बहत ज्यादा खर्च होता है। कोई चोरी करता है। गुरुजी ने कहा पता लगाओ। कुछ पता नहीं लगा। एक दिन गुरुजी ने देखा रसोईया खाना बनाने के बाद एक लोटा लेकर कान में जनेऊ चढ़ाकर दीर्घशंका को जाता है। गुरुजी ने एक को भेजा जरा इसको देखो। थोड़ी दूर जाकर उसने लोटा अपने बेटे को दे दिया और बेटे का लोटा लेकर चल दिया। उसने पकड़ लिया। गुरुजी ने उससे कहा ऐसा करो यह लोटा तो ले जाओ तुम और अब यहॉं से जाओ। तुम्हारा मन करे तो एक साल बाद फिर आ जाना। हम रख लेंगे।

गुरुजी स्वास्थ्य के लिये महिलाओं को चक्की चलाना अवश्य बतलाते। समानान्तर घूमने वाला व्यायाम आंतों और बच्चेदानी के लिये स्वास्थ्यवर्धक होता है। और वर्टीकल घूमना हानिकारक जैसे कपड़े की मशीन चलाना। मैंने कहा गुरुजी से यह तो चिकित्सा विज्ञान की सलाह है आप कैसे जानते हैं। मैं नहीं जानता था कि वे ज्ञानमूर्ति है वेदमूर्ति हैं और क्या नहीं हैं।

सन् १९६३ गुरुजी साधना कक्ष के सामने घियामंडी में तख्तपर बैठे थे। श्रीपर्णा और मैं नीचे चटाई पर खाना खा रहे थे। गुरुजी ने मुझे अंग्रेजी का एक पत्र दिया। पढ़ों लंदन की एक लड़की का था। मैंने पढ़ा और कहा गुरुजी यह लड़की आपको कैसे जानती है। गुरुजी ने कहा मेरा बहुतों से परिचय है जो न मुझे जानते हैं न भाषा न साहित्य और फिर इस लड़की की घटना सुनाने लगे। यह लड़की अपने कमरे में बहुत दुखी थी घूम रही थी उसका कालेज में एडमीशन नहीं हुआ था रो रही थी। उसने अन्दर से मेरी आवाज सुनी बेटी रो मत फिर से दरखास्त दे। तेरा एडमीशन हो जायेगा। भर्ती हो गई। बहुत दिनों बाद भारत का एक आदमी उसी होस्टल में पहुॅंचा और मिशन की बात करने लगा गुरुजी का केसेट भी सुनाया लड़की बोली कि ऐसी बातें और इसी आवाज में मैं कभी कभी अपने अन्दर से सुनती हूॅं उस व्यक्ति ने मिशन का और मेरा परिचय दे दिया तभी से वह मुझे पत्र लिखती है।

गुरुजी ने कहा मैं जो लिखता हूॅं। उसमें बहुत कुछ मेरा पढ़ा नहीं है। मैं अन्तरिक्ष से भी बहुत कुछ जान लेता हूॅं तुम देखना मेरे जाने के बाद बहुत कुछ ऐसा मिलेगा जिसका श्रोत कही दूर बिल्कुल अपरिचित स्थान का होगा।

एक दिन शान्तिकुॅंज परिसर में सप्तऋषि वराण्डे में मैँने गुरुजी का एक भाषण सुना जिसमें उन्होंने कहा कि शान्तिकुॅंज में जो पैसा आता है वह केवल मनीषियों का नहीं है कहीं और स्थान से भी बड़े स्थान से भी मेरे पास आता है। ऐसा ही जब हम लोग साधना क क्ष में साधना करते थे तो गुरुजी ने कहा कल से नवदुर्गा है तुम लोग टीन शेड मैं बैठना पर्दे लगवा देंगे कुछ बड़े लोग मेरे पास आयेंगे। मैँने मन में सोचा कोई मिनिस्टर आयेंगे। उपाध्याय जी से मैंने पूंछा बोले हो सकता है कोई आत्मायें आती हों। दूसरे दिन गुरुजी स्वयं मेरे पास आये कि कल मैंने कहा था न की व्हीआईपी आयेगें। मेरा मतलब मिनिस्टरों से नहीं ऋषियों से हैं।

गुरुजी का प्यार बड़ा अनूंठाथा यतीन्द्र ने गुरुजी से कहा मैं किसी की पूजा नहीं करता केवल आपका ध्यान करता हूॅं। मेरे भगवान आप ही हैं। जितनी देर मैँ जपता हूॅं एक मन आप में लगा रहता है। और चाहे जिस काम में लगा रहूं आप छाये रहते हैं। और एक बात जब मैं आपकी बात करता हूॅं तो थोड़ी देर के बाद मेरी आखॅं के सामने से सब गायब हो जाता है केवल वही आदमी सामने रह जाता है जिससे मैँ बात करता हूॅं।

गुरुजी आप सब कुछ कर सकते हैँ केवल एक काम नहीं कर सकते। अच्छा बता मैं क्या नहीं कर सकता। आप आपके प्रति मेरे प्रेम को नहीं तोड़ सकते बेटा ऐसा मैं क्यों करूंगा। प्रेम करने से मैं जुड़ता हूॅं टूटता नहीं। और जोर से हॅंसने लगे।

लोकेश नाम का एक परिवार का सदस्य जिसको गुरुजी ने देश विदेश के कई स्थानों पर भेजा उसे अहंकार हो गया। वह गुरुजी का उत्तराधिकारी बनना चाहता था। शिकायतें भी कुछ अधिक आने लगीं। उसे १९८६ में निकाला जाना घोषित कर दिया गया। उसने जबलपुर कोर्ट में केस चलाया। गुरुजी बोले मैं तो कहीं जाता नहीं लेकिन यदि जाना ही पड़ा तो जबलपुर में मैं अपने बेटे लोकेश के घर ही ठहरूंगा उसने कई वर्षाे तक मेरी बहुत प्रशंसा की थोड़ी बुराई कर दी तो क्या हर्ज है।

गुरुजी जब अज्ञातवास में थे एक बिल्ली अपने बच्चों को गुरुजी के पास छोड़ जाती थी औरघूम घाम कर लौटती थी मालुम नहीं उसे क्यों विश्वास हो गया कि इनके पास मेरे बच्चे सुरक्षित रहेंगे।

गुरुजी आसाम गये थे वहॉं से लौटकर भोपाल आये और वकील रामचंद्रराय के यहॉँ गोष्ठी ली। मैं भी था। गुरुजी ने ऑंखों में ऑंसू भरकर कहा कि आसाम में धर्म का सवाल नहीं है मानवता और राष्ट्रीयता का ह्रास हो रहा है मैँ चाहता हूॅं कि हमारे कोई बच्चे वहॉं जायें रहें भाषा सीखे घुलें मिले और उन्हें मन्यु जगाने की प्रेरणा दें।

मैं कानपुर में कमरा नं०१६ में पोस्ट ग्रेजुएट होस्टल में रहकर एमएस कर रहा था। हम ६ विद्यार्थी थे। जिसमें एक मद्रास यूनिवर्सिटी का गोल्डमेडलिस्ट, एक कलकत्ते का टापर, एक तीन वर्ष से फैल हो रहा था और कोई दो थे। वहॉँ कोई पढ़ने ही नहीं आता था क्योंकि प्रोफेसर सिन्हा विगत तीन वर्षाे से किसी को पास ही नहीं कर रहे थे। परीक्षा के पहले मैं बहुत घबराया था अधिकतर विद्यार्थी कार में जाते थे सूट पहनते थे मेरे पास मेरे ससुर की दी एक पुरानी साईकिल थी जो छूं-छूं करती थी। मेरे मौजे भी फट गये थे। पढ़ाई में उनका मुकाबला कर सकूॅंगा ऐसी मुझे आशा नहीं थी। मैं गुरुजी को याद करता रहा और अकेले कमरे में रोने लगा। अचानक एक लड़का आया दरवाजा खटखटाया और बोला मैं सूटरगंज से आया हूॅं जहॉँ आपके छोटे भाई की ससुराल है आपको मैं पुरानी साईकिल पर जाते देखता हूॅं। मैं बगल के होस्टल में प्रथम वर्ष में एमबीबीएस में पढ़ रहा हूॅं मेरी साईकिल सीनियर ले जाते हैं आप रखलो। मैंने बहुत मना किया पर वह लगभग दो साल के लिये छोड़ गया। मैंने सोचा उर्सुला अस्पताल चलता हूॅं। जूते के पास एक नया जोड़ा मोजा कागज चिपका रखा मिला। मेरे कमरे में कोई नहीं था। इतने में एक और लड़का आया बोला मुझे पहचानते हो मैंने कहा नहीं। मैं डॉ० रेलन हूॅं। वह एमएस कर चुके थे और एक स्वार्थी किस्म के प्रसिद्घ व्यक्ति थे। कहने लगे मुझे प्रोफेसर गुप्ता ने तुम्हें गाइड के लिये भेजा है। डाँ० रेलन ने मुझे बहुत मदद की। अपने नोट्स दिये पढ़ाया और परीक्षा के पहले जब गरुजीआये तो मैंने सोचा इस बार कुछ मागूॅंगा नहीं। रेल पर जाने लगे। गुरुजी ने कहा पेपर लेआ मैं ले आया गाड़ी चलने लगी प्रणाम किया गुरुजी बोले तू पास हो जायेगा। उस वर्ष केवल दो पास हुये एक मद्रास यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडलिस्ट और एक मैं। और जबकि मेरा डायग्नोसिस गलत था पर मैँ उसी पर अड़ा रहा। शाम को जब बोस से मिलने गया तो बहुत नाराज हुये बोले गलत बोलता है और फिर अकड़ता है वे चुप रहे ताकि एक्सटरनल मेरी बात ही सही मानें मैंने कहा सोरी बोले अब क्या होता है अब तो तूं एमएस हो गया।

मैं सन् १९८१ में गुना में आर्थाेपीडिक्स सर्जन था। गायत्री परिवार के श्रवण कुमार सोनी मेरे मित्र थे। एक दिन किसी ने शिकायत की कि सोनी जी आपका बेटा दुकान बन्द होने के बाद आपकीदुकान में मित्रों के साथ जुआ खेलता है। श्रवण कुमार जी केवल गुना जिले ही नहीं आसपास के ४ जिलों में सबसे ईमानदार स्वर्णकार माने जाते थे। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं हुआ। पर उस व्यक्ति ने उन्हें दिखा दिया। वे बहुत नाराज हुये और स्वयं जाकर पुलिस कोतवाल को ले आये। पुलिस बच्चे को पकड़कर ले गई। उन्होने जमानत भी नहीं कराई। घर पर पत्नी ने खाना खाना और बनानादोंनो बन्द कर दिया। आस पड़ौस के कहते थे तुम पिता हो या जल्लाद। दुखी तो वे भी थे वे भागकर शान्तिकुॅंज आये गुरुजी से सब कुछ कहा गुरुजी ने कहा तू वापिस जा जमानत करा। ये तेरा बेटा बहुत शानदार निकलेगा। सारे घर की जिम्मेदारी बहनों की शादी यही करेगा। बच्चों की छोटी मोटी गल्ती पर ऐसा पागलपन नहीं करना चाहिए। आज श्रवणकुमार सोनी जी शान्तिकुॅंज के स्थाई सदस्य है और सचमुच ही उनका यह बेटा बहुत ही जिम्मेदार और अच्छा इंसान बन गया है।

गुरुजी हृदय से मॉं थे और मन से एक अवतारी पुरुष। लेकिन स्थूल रूप में भी उनके सिर के बीच के बाल सामने खड़े ही रहते थे। उनकी ऑंखें यानी स्केलरा नीले रंग की थी। पुतली बहुत गहरी दिखती थी। मस्तक के बीच में हर किसी को एक गोल चंद्रमा सा प्रकाश दिखता था। कई बार फोटोग्राप्स में जिस प्रकार झुकाव सिर का रहता था उसी गहराई का आभामंडल कभी कभी फोटोग्राफ में भी आ जाता था ऐसा फोटाग्राफ मेरे पास भी है जो माताजी ने मुझे दिया। माताजी कहती है कि सन् १९६० के अज्ञातवास में इसी चित्र के माध्यम से साधनाकाल में मेरा सम्बन्ध गुरुजी से हो जाता था।

हजारों व्यक्ति शान्तिकुॅंज में आते थे बाहर मिलते थे लेकिन मेरा सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि कभी कोई व्यक्ति यह नहीं कह पाता था कि मैँ गुरुजी से नहीं मिला। इसका भेद क्या है इसका जवाब मेरे कोई मित्र नहीं दे पाये। सन् १९७१ में प्राणप्रत्यार्वन शिविर में मैंने कमरे मैँ गुरुजी को गहरा काला चस्मा लगाये देखा। मैंने पूंछा गुरुजी आपकी ऑंखें ठीक है तो वे बोले हॉँ। मैंने पूंछा फिर यह चस्मा। उन्होंने कहा मेरे लिये नहीं दूसरों के लिये। मैँ समझ गया। बाहर भी हजारों आदमी प्रणाम करते और अपनी सीधी बात कहते जवाब पाते।

एक दिन मैं गुरुजी के पास गया लगभग २ बजे शान्तिकुॅंज में ऊपर। गुरुजी अकेले थे मैँने कहॉं गुरुजी आपकी तबियत ठीक है गुरुजी ने कहा हॉं। मैंने कहॉं नहीं गुरुजी मै डाक्टर हूॅं आपकी ऑंखें लाल हैं। गुरुजी बोले हॉँ बेटा। मैं कुछ दिन से सो नहीं रहा हूॅं और तुम लोग सुधर नहीं रहे हो। इसी से मैं बहुत चिन्तित हूॅं। लेकिन मैंने भी सोच लिया है कि कितने ही जन्म क्यों नहीं लगें पर मैं भी तुम लोगों को छोडूंगा नहीं बस इस होड़ में ही ऑँखें लाल हैं। मेरे पास कृतज्ञता के लिये कुछ नहीं था केवल घटना का एक न मिटने वाला हृदय पर सन्देश।

बलराम सिंह परिहार जी ने मुझे सुनाया कि उनके एक मित्र हैं जे०पी०मल्होत्रा। एक बड़े व्यापारी एवं पत्रकार। एक दिन वे गुरुजी से बोले गुरुजी आप यज्ञ में एक बुराई छुड़वाते हैं। एक बुराई छोड़ भी दी तो उससे क्या तो इंसान सुधरेगा और क्या दुनिया। मेरे में बहुत बुराई हैं। शराब पीता हूॅं, आदि। पर गुस्सा बहुत आता है। गुरुजी बोले एक छोड़के तो देखो फिर पूॅंछना। वे एक दिन किसी काम से कमिश्नर के आफिस गये। चपरासी आया कमिश्नर साहब कोई छोटी सी बात पर बहुत जोरों से नाराज। और नाराज होते ही चले गये। अचानक उनको दिल का दौरा पड़ा और उन्हीें के सामने उनकाशरीर छूट गया। अब जब कभी भी वे गुस्सा होते थे तो वह दृश्य याद आ जाता था। वे कहते है गुस्सा तो छूटा शराब भी छूटी शायद गुरुजी का आशीर्वाद मेरा और मेरे परिवार का जीवन सुधर गया।

अगमवीर सिंह शान्तिकुॅंज के एक स्थाई कार्यकर्ता है मैंने उनका इन्टरव्यू १२ नवम्बर ९८ को लिया। उन्होंने कहा मैं एक जागीरदार परिवार से आया। मेरे पिताजी आईएफएस अफसर रहे और जाट परिवार में होंने के कारण बिना कोई बात के लड़ाई झगड़ा और हत्या एक साधारण बात। मैं किसी धर्म या महात्मा में बिल्कुल विश्वास नहीं करता था पर पिताजी के कहने पर शान्तिकुँज चला आया। यहॉँ का खाना मुझे पसन्द नहीं आया तो फल दूध पीकर ही रह गया। गुरुजी की बातचीत सुनी कुछ अच्छी लगी पर सोचा अच्छी के पीछे ही गड़बड़ होती है। लेकिन जब वापिस लौटा तो वे कहते हैं कि मुझे बस के आदमियों में और महिलाओं में गुरुजी माताजी दिखने लगे। मुझको विश्वास हो गया कि मुझको कोई टोटका कर दिया। मेरी पत्नी ने दीक्षा ली मैंने नहीं ली। पर हर बार शान्तिकुॅंज आया और बदलता चला गया। मेरे बच्चे संस्कारित हो गये और अब मैं स्थाई सदस्य हूॅं।

गोविन्द भाई पाटीदार शान्तिकुॅंज के प्रमुख संगीतज्ञों में हैं। विदेशों में भी इनके प्रोग्राम एवं सीडी बने। ये स्वयं कहते हैं कि मुझे नहीं मालुम कि अंगुलिमाल और आम्रपाली बदले होंगे। पर मैं उनसे कुछ कम नहीं था। और अनुभव करता हूॅं काफी कुछ सुधरा हूॅं। मैं सारी सारी रात हारमोनियम बजाता था। नोटंकी में एवं एक दिन मैं चार बण्डल बीड़ी पी ही जाता था। मैं शान्तिकुॅंज आ गया। एक दिन मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मेरा एक कष्ट है। बोल बेटा। मेरा एक भाई पागल है। मकान के बाहर उसे चेन से बॉंधकर रखते हैं। गुरुजी ने कहा तूं मेरा काम कर मैं तेरा करूॅंगा। ऑंखों में ऑँसू भरकर गोविन्द पाटीदार कहते है कि एक दिन मेरा यह भाई सारी सॉंकले तोड़कर घर में आ गया कहने लगा कोई धोती कुरता पहनकर बूढ़ा आदमी आया था उसने घड़ों से बरफ मेरे सिर पर डाली। सॉंकले तोड़ दी और अब मैँ पागल नहीं हूॅं। और आज वे साधारण ठीक सा ही जीवन जी रहे हैं।

अशोकदास राऊरकेला के बहुत अच्छे इंजीनियरों में थे। इनको कोई नेशनल अवार्ड भी रिकमंड हुआ था। हम दोंनो साथ स्थाई रूप से शान्तिकुॅँज आये। और ब्रह्मवर्चस में रहने लगे। उनका कमरा मेरे कमरे के पास ही था। एक दिन वे सपत्नीक आये और बोले बातचीत करने लगे। उन्होंने कहा कि मैं शान्तिकुॅंज आया गुरुजी से बातचीत की और लौटने के बाद मेरी नींद ही उड़ गई। गुरुजी ने कहा था तू यहॉँ आ जा। हम दोनों बहुत परेशान।बड़ी बहन बोलीं कि अशोक दास जी पागल हो जायें इससे तो अच्छा है कि हम लोग शान्तिकुॅंज चले जाये। कम्पनी के डायरेक्टर के प्रमोशन और प्रलोभन के बाद भी वे नहीं रुके। और अब यहॉँ एक बड़ी जिम्मेवारी सम्भाले हैं।

सन् १९७७ में मैं गुरुजी के पास आया और बोला। गुरुजी मेरी तीन बहनें हैं। दोनों बड़ी बहनों की शादी बड़ी असफल रही वे बहुत दुखी हैं। यह तीसरी छोटी बहन भारती मेरे पास ही रही और पढ़ी इसकी शादी होंनी है। लड़के देखे है किससे करें। गुरुजी ने कहा तू किससे करना चाहता है। मैंने कहा एक लड़का है स्टेट बैंक आफ इंडिया में। सुरेश नागर। मुझे ठीक लगता है। गुरुजी बोले तू बेहिचक शादी करदे वे बहुत सुखी रहेंगे इसकी सारी जिम्मेदारी मेरी है। आज वे दोंनो अपनी अच्छी नौकरी छोड़कर शान्तिकुॅंज में विगत १२ वर्ष से स्थाई कार्यकर्ता हैं।

गिरधारीलाल शर्मा ७३ केनाल स्ट्रीट श्रीभूमि कलकत्ता ४८ फोन नं० ५२१७५३९ वे कहते हैं कि मैं यह घटना आपको सुना रहा हूॅं। जनवरी ८५ में ९ कुण्डीय यज्ञ में वैद्य जी रावत जी और दिलीप शान्तिकुॅंज से कार्यक्रम में आये। हम पति पत्नी १५ मिनिट सुनकर लौट गये। दूसरे दिन फिर मन किया अचानक गोपाल वैद्य जी ने कार्यक्रम समाप्ती के बाद भीड़ को चीरते हुये मेरे पास आये और सीने से लगा लिया। तब से गायत्री परिवार के लोग हमारे यहॉँ आने लगे। एक दिन पूजा में मैंने देखा। गुरुजी आ गये और मेरी उनसे एक घण्टे बातचीत हुई। जिनको मैंने एक डायरी के ४६ पन्नों में लिखा है। मैंने पूंछा आपने पहले देखा था? नहीं मैंने गुरुजी को ४ वर्ष बाद देखा था वे वैसे ही थे। इसके बाद ही कोई व्यक्ति कैसा है मुझे आभास होने लगता है। शायद मैं पिछले जन्म में बंगाल में रामकृष्ण परमहंस के साथ था क्योंकि उस आश्रम के कई मकानों का दृश्य मुझे अक्सर सपने मेंआता है।

८ जून १९९० चुरू के राम सिंह सुनाते हैं कि मैं जब गुरुजी का अस्थीकलश हाथ में लिया था तो मेरे इस स्वस्थ्य शरीर के पैर कॉंपने लगे। ऑंखों से ऑंसू बहने लगे। अन्दर से गुरुजी ने एक फटकार दी रामसिंह मैँने तुझे एक जिम्मेदारी सौंपी है मेरा काम कर ऑंसू मत बहा।

मुझे ३० मई १९९० को गुरुजी ने ऊपर बुलाया ऐसा माताजी ने कहा। मै ऊपर गया डाक्टर प्रणव और जीजी उनके पास थे। डाक्टर साहब ने पूरी मेडीकल रिपोर्ट दी और दिखाई। गुरुजी का शरीर ठीक से काम कर रहा था यानी टट्टी पेशाब स्वॉंस और दिल की धड़कने हॉँ बेहोशी जरूर थी। मुझसे कहा डाक्टर साहब आप चरण स्पर्श कर लें। मेरा साहस नहीं हुआ क्योंकि मैं डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था इसीलिये चरण के पास ही प्रणाम कर लिया मालुम नहीं मेरे लिये क्या उचित था पर यदि स्पर्श करना था तो मेरा यह चरण स्पर्श गुरुजी पर उधार है क्योंकि मै उन्हें डिस्डर्ब नहीं करना चाहता था। गुरुजी केशरीर छोड़ने के बाद मैंने अमेरिका यतीन्द्र को और अरविंद को फोन किया। यतीन्द्र रोता रहा और बोला मौनदा मेरा एक काम करदो मेरी तरफ से कुछ फूल गुरुजी के चरणों पर चढ़ा दो। मैँने कहॉँ ठीक है मैं फिर जाता हूॅँ और तुम्हारे फूल अवश्य चढ़ेंगे। न्यूयार्क में सुनते ही अरविंद मानो उसके सारे सहारे छूट गये हों क्योंकि अरविंद और सिद्घार्थ दोंनों बच्चों को गुरुजी ने एक एक महीने का गोद में लिया और वे सतत सम्पर्क में रहे। यतीन्द्र ने विश्वास दिलाया कि मेरा तुमसे वायदा है अरविंद गुरुजी हमेशा हमारे साथ रहेंगे। गुरुजी की अर्थी पर कंधा लगाने के लिये सतीश अशोक रावल पण्डित जी डॉ० प्रणव और कइयों में होड़थी मैँ भी सोचता था कि एक सेकेण्ड मेरे कन्धे पर भी थोड़ा सा भार आये। ऐसे मेरी उॅंचाई पॉंच फिट चार इंच है पर फिर भी तीनों बार के प्रयास में एक भी सेकेण्ड ऐसा नहीं था जबकि भार मेरे कन्धे पर आया हो क्योंकि या तो वे सैकड़ों हाथ जो दूर से ही अर्थी को उठा रहे थे या और कुछ जो कुछ भी हो मैं नहीं जानता।

सन् १९८६ के बसन्त पंचमी पर गुरुजी सूक्ष्मीकरण साधना से बाहर निकले पर उसके तीन दिन पहले मुझे ऊपर बुलाया और कहा कि तू गुजरात जा रहा है। मैं बसन्त पंचमी पर बाहर निकलूॅंगा और भाषण भी दूंगा तू अपने खास दोस्तों से आने को कह सकता है। पर स्टेज से मत कहना नहीं तो तेरा भाषण सुनने केलिये कोई रुकेगा ही नहीं। करीबन दो वर्ष बाद गुरुजी को देखकर मैं रोता रहा मेरा चस्मा ऑँसू से धुंधला हो गया पर मै उतार नहीं रहा था क्योंकि उतनी देर गुरुजी को साफ नहीं देख पाऊंगा। गुरुजी बोले मै तुम दोनों का ध्यान रखूंगा और जो कुछ भी कहना हो माताजी डॉ० प्रणव से कह देना मुझ तक पहुॅंच जायेगा। तू तो रिलीवर का ही काम करते रहना।

पं० लीलापत शर्मा जी जो गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक हैं मथुरा पहुॅंच गये थे। गुरुजी ने उनको एक नेष्ठिक साधक की बेटी जो स्वयं भी गायत्री की अच्छी उपासक थी की शादी में भेजा। माताजी ने टिफिन भी भर दिया। शादी होने के पहले जैसे ही दूल्हा मंडप में घुसा कि बेहोश हो गया। घटनाग्वालियर की है। डाक्टर को दिखाया हालत गम्भीर बतलाई नाड़ी बहुत धीमीथी बारात वापस चली गई। लड़कीरोती रही और उसने सारे गहने जो पहन रखे थे पूजा स्थान पर रख दिये। उसने प्रतिज्ञा की कि मैं शादी करूंगी तो इसी लड़की से। पण्डित जी गुरुजी पर बहुत नाराज हुये लौटकर। आप सब जानते हैं और मुझे पिटवाने के लिये भेज दिया। मैँ खाना नहीं खाऊंगा। घरवालों का लड़की का दुख आप तो देखने गये नहीं। गुरुजी ने कहा देख तू खाना खा और मेरी बात सुन। मैं जानता हूॅं यह नैष्ठिक परिवार था पर लड़की के भाग्य में वैधव्य था। आज से तीन महीने बाद वही लड़का आयेगा और शादी करेगा वे सुखी भी रहेंगे। तीन महीने बाद जब लड़का ठीक हो गया तो एक पण्डित जीउसके पास आये और बोले कि इस महीने तुम्हारी शादी होगी पर अच्छा दिन तो केवल परसों है जबकि शादी हो ही नहीं सकती। लड़के के मन में भी उस लड़की की याद बनी थी। लड़के के पिता बाहर काम सेगये थे। लड़का अपनी मॉं और बहन को लेकर आया और लड़की के पिता का दरवाजा खटखटाया और कहा शादी परसों होनी है। ताबड़तोड़ सारी व्यवस्था हो गई। पूजा पर रखे गहने भी काम आ गये।

मेरठ के एक गॉंव में लगभग ९० प्रतिशत जवान और बुजुर्ग शराब पीते थे। गायत्री परिवार के कई कार्यक्रम हुये। पर परिवर्तन बहुत थोड़ा ही होता था। कारण यह था कि उस गॉंव का जो सरपंच था वह शराब पीताथा और बाकी उसके साथी खुद पीते थे और दूसरों को पीने की आदत डालते थे। हमारी टोली एक पॉंच कुण्डीय छोटे से कार्यक्रम में गई और फिर वही प्रेरणा देने का प्रयास किया। पर ऐसी कोई आशा नहीं थी कि कोई विशेष प्रभाव पड़ेगा। ज्ञान विज्ञान भावनात्मक व्याख्या तो की पर अचानक एक लड़की खड़ी हुई। १५, १६ वर्ष की होगी उसके मामा ही पटैल सरपंच थे। वे बाहर खड़े देख रहे थे वह लड़की यज्ञ कर रही थी और अचानक खड़ी हो गई और बोली कि यदि मेरे मामा आज शराब नहीं छोड़ेगे तो मैं उनका भात नहीं लूंगी। वातावरण गम्भीर हो गया उसके मामा को आना पड़ा संकल्प के साथ शराब छोड़ दी और कहते है पूरे गॉंव ने शराब छोड़ दी चोरी छिपे पीते हों तो मालुम नहीं।

श्री शिवप्रसाद मिश्रा जी ने बताया कि मैं देवघर बंगाल में एक छोटा सा व्यापारी था। पिताजी पुरोहित का काम करते थे। मेरा काम कोई खास नहीं चलता था। मैं गुरुजी के पास आया और अपनी कहानी सुनाई। गुरुजी ने मेरे कन्धे पर हाथ रखा और धीरे से कहा युग निर्माण योजना भगवान का काम है जो भी थोड़ी आमदनी हो उसमें थोड़ा सा शान्तिकुॅंज नियमित भेजा कर। तुझे ज्यादा फायदा होता रहेगा। मैंने किया और यह सलाह मैं हरएक को देता भी हूॅं।

श्री गोपाल प्रसाद रजक जो कलेक्टर कार्यालय जबलपुर में काम करते थे बतलाते हैं कि मैं सन् १९७६ मैं कलेक्टर कार्यालय में लिपिक के पद पर काम करता था मैं शिविर में आया था गुरुजी से कहा गुरुजी में पूर्ण रूप से यहीं आना चाहता हूॅं गुरुजी ने पारिवारिक जानकारी ली और कहा अभी नहीं जब समय आयेगा में बुला लूॅंगा। पंूछा तुझे कितना वेतन मिलता है मैंने कहा ५०० रुपये गुरुजी ने ईश्वर चंद विद्यासागर का उदाहरण दिया कि वे ५० रुपये में अपना काम चलाते थे तू ४५० रुपये में अपना काम चलाया कर और ५० रुपये यहॉँ भेज दिया कर। मैंने ५० रुपये प्रतिमाह भेजना शुरु कर दिया। इसके कुछ दिनों बाद में स्टेनोटायपिस्ट हो गया उसके बाद मैं स्टेनोग्राफर हो गया जो अस्थाई छै महीने के लिये था। दूसरी बार जब शान्तिकुॅंज आया तो गुरुजी ने पूंछा क्या करता है मैंने बताया स्टोनोटाईपिस्ट था अब अस्थाई रूप से स्टेनोग्राफर हो गया हूॅं इस पर गुरुदेव ने कहा कि मैं तुझे स्थाई करा दूंगा और वह पद छै वर्ष तक चलता रहा इसके बाद पद समाप्त हुआ तो शासन से नया पद आ गया और मैं वास्तव में स्थाई हो गया जिसकी कोई सम्भावना नहीं थी और अब मैं स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर स्थाई रूप से शान्तिकुॅंज आ गया हूॅं।

जिनके पति की मृत्यु हो जाती है कितने ही स्वार्थी रिश्तेदार श्मशान बन्धु के नाम पर विधवा को ठगा करते हैं। जो कुछ घर पर पैसा बचा होता है या मिलता है अपने को अति हितकारी बतलाकर ठगते हैं। महिलाओं को श्मशान नहीं जाने देते। माताजी ने एक गलत परम्परा का नियम तोड़ा कि महिला शवयात्रा में नहीं जा सकती। वे गयी और पूरी अन्त्येष्ठी क्रिया में सामने बैठे देखती रहीं। मरणोत्तर संस्कार चिताा दहन क्या सोचती रहीं क्या करती रहीं यह तो वे ही जानें पर ने केवल वे अन्त तक रहीं लेकिन उन्होंने निर्देश दिया कि नांदयोग थोड़ा लेट सही लेकिन नियम के अनुसार आज भी होगा जो लगभग ७ से ७.१५ तक हुआ डाक्टर प्रणव ने ममुझे विशेषकर वहीं डाक्टर टीम के साथ विशेष तैयार रहने के लिये कहा था क्योंकि माताजी एवं अन्य कई व्यक्ति बेहोश हो सकते हैं। मैँ माताजी के बांयी ओर खड़ा रहा वे एक टक देखतीरहीं कुछ हल्की फुल्की एक्का दुक्का सिसकी तो सुनाई पड़ती थी पर ऐसा स्पष्ट बोध होता था कि कोई शक्ति इस व्यथा में आश्वासन व शक्ति दे रही थी। अग्नि शिखायें बार-बार सजल श्रद्घा प्रखरप्रज्ञा की ओर मुड़ जाया करती थीं। उस स्थान पर न केवल लोग प्रणाम करते है बल्कि देर रात तक बैठे भी रहते हैं डर के स्थान एक भाव भरा प्यार ही मिलता है। मुझे ओम प्रकाश भाई साहब याने गुरुजी के बड़े पुत्र बतला रहे थे कि एक रात मैं वहॉं सो ही गया कि देखें मुझे कुछ पिताजी का अनुभव होता है वे बोले कि वे मुझे दिखे तो नहीं लेकिन ऐसा जरूर अनुभव हुआ कि ये मेरे वे ही पिताजी है जिनके साथ मैं बड़ा हो जाने के बाद भी सोया करता था।

उत्तम गायकवाड़ बैतूल निवासी एक समयदानी हैं उन्होंने बताया कि भवानी कश्यप जो एक गायत्री परिवार इंदौर के कर्मठ सदस्य हैं कुछ ही वर्षाे पहले इंदौर के दादा माने जाते थे और सेठों से हफ्ता वसूल किया करते थे एक स्वयंसेवक ज्ञानरथ चला रहा था कि सामने जाकर खड़े हो गये और रोक दिया। बच्चे ने सोचा ये पॉंच सात किताबें उठा लेंगे दो चार थप्पड़ मारेंगे चलो देखा जायें लेकिन भवानी कश्यप कहते हैँ मैंने उस दिन कुछ स्टीकर उठाये। जिसमें एक था कुकर्म करने वाले से अधिक अभागा और कोई नहीं होता क्योंकि विपत्ति में उसके साथ कोई खड़ा नहीं होता। इस वाक्य ने मुझे बदल दिया। उत्तम जी कहते हैं कि मैंने इंदौर में इनके साथ काम किया और इंदौर अश्वमेध यज्ञ में इन्होंने दो दो लाख रुपये की रसीद कटवाई। भवानी दादा जो हफ्ता वसूल किया करते थे उनसे केवल यही पूंछकर बचत है कि रसीद में कितना लिख दें।

रुढ़की यूनिवर्सिटी में एम्पलायमेंट आफीसर श्री डी०के०वर्मा ने मुझे बतलाया कि यह उनकी दूसरी पीढ़ी है जो शान्तिकुॅंज से जुड़ी है वे अल्मोड़ा से पिथौरागढ़ जा रहे थे। एक पहाड़ी रास्ते पर गाड़ी चढ़ रही थी उन्हें अनुभव हुआ कि किसी ने उनका गला पकड़ा और गाड़ी के बाहर फेंक दिया। वे बेहोश हो गये। शायद पंद्रह बीस मिनिट बेहोश रहे होंग। ऑंख खुली उसके बाद देखते हैं कि गाड़ी पहाड़ी रास्ते से लुड़कती लुड़कती नीचे घाटी में आ रही है। यह दृश्य वह अपनी ऑंखों से देख रहे थे यद्यपि उनके एंकल की दोनों हड्डियॉं टूट गयी और इतना रक्त बहा कि उनका रक्त हेमोग्लोबिन पॉंच परसेंट हो गया जो बहुत गम्भीर है। पत्नी अत्यधिक चिन्तित थी। डाक्टरों को भी आशा कम थी पर वर्माजी ने कहा अपनी पत्नी से तुम बाहर जाओ जिसको मेरे साथ रहना है उसे कोई निकाल नहीं सकता। सारे समय में गायत्री जप रहा था मैं दो महीने में पूरी तरह ठीक हो गया।

रुड़की में यूनिवर्सिटी कैम्पस में एक गोष्ठी का आयोजन किया। गायत्री मंत्र के आध्यात्मिक स्वरूप के विवेचन तथा प्रश्नोत्तर किसी प्रोफेसर की लड़की ने एक ऐसा प्रश्न पूंछा जो मुझे कठिन पड़ने लगा। उसका प्रश्न था

क्या मरने के बाद आत्मा का शव शरीर से कोई सम्बन्धा रहता है। मैंने कहा नहीं जैसे यदि दॉंत टूट जाता है तो फिर उसको कचरे में फैंकने में आपको कोई संकोच नहीं होता यदि आपकी कोई ऊंगली कट जाती है। अलग हो जाती है गैंगरीन हो जाती है तो उसे फैंकने में संकोच नहीं होता। तो फिर वह बोली फिर मनुष्य मृत्योतरान्त अपने शरीर अवयम डोनेट करने से क्यों घबराता है। अचानक मुझे ख्याल आया कारण है अज्ञान और मोह।

कृष्णकांत तिवारी ब्रह्मवर्चस में स्थाई सदस्य है। बताते है कि गुरुजी बांदा आये थे। मैं मिडिल में फैल हो गया था। पिताजी ने कहा सन्त आये हैं मिल आओ। मुझे कोई श्रद्घा नहीं थी फिर भी गया। प्रणाम किया। बिना कुछ सुने जाने गुरुजी बोले मैं तुझे पढ़ाऊंगा। और जब मैं फिर परीक्षा में बैठा तो एक पेपर देने ही नहीं गया और फिर भी मैं पास हो गया। क्योंकि पहले पेपर में ही आशा से अधिक ५० में से ३८ नंबर आ गये थे। गुरुजी से मिलने पर उन्होंने कहा आइंदा पेपर देने में चूकना नहीं और फिर पढ़ते पढ़ते में पीएचडी तक पहुॅंच गया। कृष्णकांत बतलाते हैं में ििश्विर में आया था हमारे साथ एक विटनरी डाक्टर भी ठहरे थे। मैँने सोचा कि यह लड़का मेरी बहन के लिये उपयुक्त होगा। मैंने बातचीत की उससे कि शादी तो नहीं हुई।कपिल जी से और शिव प्रसाद मिश्रा जी से भी बात की उन्होंने लड़के से सारी जानकारी ली लेकिन जब हम लोग गुरुजी के पास पहुॅंचे तो यह लड़का बिल्कुल गुरुजी के सामने बैठा था और मैं बिल्कुल बांयी और आखिरी में। गुरुजी ने उस लड़के से पूंछा तुम्हारे बच्चे ठीक हैं उसने जवाब दिया हॉं। गुरुजी ने निगाह उठाकर मेरी तरफ देखा और फिर उसकी तरफ देखकर पूंछा तुम पत्नी को नहीं लाये। बात वहीं समाप्त हो गई। शायद एक बड़ी दुर्घटना से बच गया।

कृष्णकांत जी फिर बतलाते हैं कि हमारा परिवार गायत्री का भक्त है। हमारी बहिन के पति और सास ससुर बहुत परेशान करते थे। एक दिन वह पूजा में बैठी तो उसे एक सपना सा दिखा कि जब तू ससुराल जायेगी तो ये तेरा पति तुझे ढकेल कर मार डालेगा। पर तू फिर भी जा मैं मेरी रक्षा करूंगा। जब वहॉं पहुॅंची तो उसके पति और सास ससुर को दरवाजे के बाहर और घर में दो काले नाग दिखते जो उन्हें डरा देते। जब मेरी बहिन गुरुजी से मिली तो उन्होंने कहा कि अब तो तुझे विश्वास हो गया कि मैं तेरी रक्षा करूंगा और कहा कि अब तू अपने मायके आ जा तेरी व्यवस्था हो जायेगी मैं केवल मिडिल पास थी लेकिन अचानक सीएमओ ने उनको चुन लिया और अब वह अपने पेरों पर खड़ी है। वे यह भी कहते है कि बीच बीच में मुझे माताजी दिखती हैं।

प्रेरणा बाजपेई माताजी के अन्तिम दिनों में अंजू के साथ उन्हीं के पास रहीं। क्योंकि दोनों को नरसिंह की सेवा का अच्छा ज्ञान था समर्पण भी। मैंने जब उनसे पूंछा कि कोई चमत्कारी तुमने देखी तो वे बोली चमत्कारतो नहीं लेकिन उनमें मानवता का भान हमेशा ही स्पष्ट रहता था। एक दिन क्या हुआ कि अंजू कहकर गयी कि मैं थोड़ी देर से आऊंगी तब तक तुम रुकना मुझे देर तक रुका देख माताजीबोली तू जा खाना जा भूंख लगी होगी। मैंने कहा खा लूंगी माता जी अंजू अभी आती होगी। वे बोली जा क्यों चिन्ता करती है मैं तो हूॅं। जबकि स्वयं ही अत्यधिक बीमार थीं। प्रेरणा औरशैल जीजी जी दोनों जोर से हॅंस पड़ी। किसी भी स्थिति में उनका अपना मॉँ का भान गया नहीं।

मेजर राजवीर सिंह ने बतलाया यद्यपि में मथुरा का रहने वाला हूॅं फिर भी गायत्री या गुरुजी के विषय में मैँ कुछ नहीं जानता था लेकिन जब मैं गुरुजी से मिला तो उनने कहा कि तू यहॉं आ जा। मैँने कहा गुरुजी मैं भगवा कपड़े नहीं पहनूंगा। गुरुजी बोले मैँ कहां पहने हूॅं। मुझे तुझसे काम लेनाा है कपड़े नहीं दिखाना है। मैँ थोड़ी बहुत पूजा करता था सन् १९८६ का बसन्तपंचमी का भाषण गुरुजी का सुना और सोचा कि यह प्रयोग करके देखूॅं कि क्या गुरुजी से बात हो सकती है। वही १० प्राणायम गायत्री मंत्र और सिर पर हाथ फेरना अचानक मुझे नींद सी आ गई और अन्दर से एक जवाब सा उठा कि क्या मैँ अपनी छाती फाड़कर बताऊं कि जो तू सोच रहा है वह सही है मैंने पूंछा क्या सोच रहे थे मैं सोच रहा था कि सर्विस छोड़कर शान्तिकुॅँज आ जाऊं।

कैलाश शर्मा जो कलकत्ते के बंगाली अखण्ड ज्योति के सम्पादक हैं कहते है कि यदि मैं अपने शरीर के चमड़े के जूते बनाकर भी मैं गुरुजी को पहनाऊं तो मैं उऋण नहीं हो सकता। जो घटना मेरे साथ घटी वह मैँने माताजी को सुनाई और उनकी आखों में आंसू आ गये।

मेरे एक साथी व्यापारी जो मद्रास में थे उन्होंने तार द्वारा मुझे हवाई जहाज से अस्सी हजार लेकर किसी सौदे के लिये आने के लिये कहा। मैं पहुॅंचा उसका लड़का मुझे लेकर स्कूटर पर चला जंगल के रास्ते में उसने स्कूटर रोकी बोला लघुशंका जा रहा हूॅं और एक बहुत बड़े लोहे के राड से मेरे सिर पर मारा मैँ चक्कर खाने लगा। एक क्षण मैंने गुरुजी को याद किया कि आप तो कहते थे मुझे तेरा उपयोग एक शेर की तरह करना है और मैं अब एक कुत्ते की तरह मर रहा हूॅं। मुझमें अचानक न जाने कहॉँ से ताकत आ गयी कि मैँने एक घूंसा मारा तो वह जवान लड़का और मैँ लगभग ५० वर्ष का वयस्क। पर वह दो गुलांट खाकर एक गड्डे में गिरा। जल्दी से वह स्कूटर लेकर भाग गया। मैं और मेरा पैसा दोनों बच गये। एक ट्रक मिल गया जिसने मुझे अपने आड़त के यहॉँ पहुॅंचा दिया। मेरी पत्नी हवाई जहाज से आ गई। मैँ स्वस्थ हो गया।

जब मैं पहली बार सन् १९६० में माताजी से मिला तो उनका स्वरूप एक साधारण गृहस्थ महिला जैसा था। मैँ कहता था मैं परीक्षा में पास हो जाऊं माताजीकहतीथी मैं तेरी सिफारिश गुरुजी से कर दूंगी। तू भी गुरुजी से बोल देना माताजी ने अपना चित्र मुझे दिया जो आज भी लगभग ३५ वर्ष से मेरे साथ है। गुरुजी का एक चित्र पं० लीलापत जी ने मुझे दिया जिसकी कापी माताजी अपने पूजा कक्ष में रखती और वेकहती है कि आरम्भिक स्थिति में गुरुजी जब अज्ञातवास में होते हैं तो मैँ इस चित्र से उनसे सम्बन्ध स्थापित कर लेती हूॅं। और गायत्री परिवार की समस्याओं का हल भी पूॅंछ लेती हूॅं। स्वयं गुरुजी ने १९६५ में दादागुरु का एक चित्र लाकर मुझे दिया जो आज भी मेरे पास है। मैँने उस चित्र का पाते ही प्रणाम कर वायदा किया कि मैं आपसे कभी कुछ माँगूगा नहीं और मैंने ऐसा ही किया। विचारों में भी नहीं।

मैंने पूंछा गुरुजी से कि आपने यह चित्र कैसे सउतारा क्या आपके पास कैमराथा गुरुजी ने कहा नहीं जिसस गुरुपूर्णिमा में मुझे गुरुजी के दर्शन करने थे सन् १९६० में उस समय उनके हम सात शिष्य वहॉँ पहुॅंचे। मैंने पूंछा यह कौन हैं उन्होंने कहा कि भारत के दो थे। यएक दक्षिण भारत में हैं। उन्हीें ने कैमरा से ये चित्र लिये थे जिनकी कापी मुझको भेजे। मैंने कहॉँ बाकी पॉंच कहॉं है। गुरुजी ने कहा ये पॉंचों विदेश में है और अपने अपने ढंग से काम कर रहे है एवं दादागुरु के शिष्य हैं। मैंने पूछा किदादा गुरु का नाम आपने कैसे जाना। आपकी बातचीत हुई बोले वे सब जगह पहुॅंच सकते हैं इसलिये मैंने उनका नाम सर्वेश्वरानंद रख दिया वे स्थूल भी बन सकते हैं पर है सूक्ष्म।

जगदीश वर्मा जी सावित्री एक में स्थाई कार्यकर्ता हैं। ये राऊरकेला में अच्छे पद परथे वे कहते हैँ। मैं न केवल भगवान और पण्डितों में अविश्वास करता था पर विरोध भी सन् १९७१ में हमारे यहॉँ यज्ञ हुआ। फैक्टरी के रास्तें में यज्ञ स्थली थी। स्कूटर पर जाता था। और उपेक्षा से निकल जाता था। एक दिन साईकिल सेगया तो एक पोस्टर पढ़ा हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। सोचा मेरे अकेले से सुधरने से कैसे दुनिया सुधरेगी। पर फिर सोचता रहा तो लगा कि ठीक तो है। यदि दुनियॉं बदलेगी तो विचार परिवर्तन से बदलेगी। हम मतलब बहुत सारे लोग मैंने कुछ छोटी किताबें भी खरीद लीं। किताबें अच्छी लगी। एक कार्यकर्ता ने बताया कि आप ही के आफीसर राऊरकेला में गायत्री भक्त हैं तथा उनके यहॉँ मोटी किताबें भी हैं। मैं रात को ही उनके यहॉं पहुॅंच गया दरवाजा खटखटाया उन्होंने बड़े प्रेम से बातचीत की किताबें दी और मैं उनका मित्र हो गया। उनका नाम था के०के०भाटिया वे प्राणप्रत्यावर्तन शिविर में आये और जब मेरे विषय में थोड़ी जानकारी दी और मेरा एक कष्ट भी बतलाया कि मुझे सांस की बड़ी बीमारी है और हर दो तीन महीने में अस्पताल में भरती होना पड़ता है गुरुजी ने कहा कि यह भस्मी ले जाओ आचमनी के साथ रोज गाये पॉंच माला गायत्री जपे आज के बाद वह कभी अस्पताल में भरती नहीं होगा। और नहीं हुये। डाक्टर डिल्लन ने राऊरकेवला में आपरेशन बतलाया था। गुरुजी ने यह भी कहा था कि यह लड़का कुछ दिनों बात शान्तिकुॅंज आ जायेगा और मैं आ गया। हम पति पत्नि जब गुरुजी से मिलने आये तो हमारे दोनों बच्चों को गोद में लेकर गुरुजी ने कहा कि यह बच्चे अब हमारे है तुम देखरेख करना हम अच्छा इंसान बनायेंगे। गुरुजी ने एक बात और कही जब मैं शान्तिकुॅंज आ गया। गुरुजी ने एक बात और कही जो मैं कभी भूलता नहीं। कि तू सिर्फ मुझे और माताजी को देखना आस पड़ौस को बिल्कुल मत देखना तू मेरा काम करना मैं तेरा।

सन् १९७८-७९ में मैं अरुण पंड्या के साथ आया और मैंने कहा माताजी यह भी आना चाहते हैं। माताजी ने कहा ये नहीं आयेगा। तू आ जायेगा।

गुरुजी ने कहा मेरे पास शक्तियॉं है सिद्घियॉँ हैं लेकिन मुझे निर्देश एक लोकसेवी ब्राह्मण का ही जीने का है।

गुरुजी ने कहा मुझे चले जाने दो उसके बाद मुझे नापने के सारे पैमाने छोटे पड़ जायेगे

गुरुजी ने कहा कि यदि कोई कहे कि तुम्हारे गुरुजी से बड़ा विद्वान कोई है गुरुजी से बड़ा तपस्वी कोई है और गुरुजी से बड़ा कोई प्रवचनकर्ता है कोई समाजसेवी है तो एक बार मान लेना पर बेटे याद रखो तुम्हारे गुरुजी से बड़ा प्रेम करने वालार और कोई नहीं होगा।

गुरुजी ने कहा सन् १९७१ के बिदाई भाषण में कि कोई भी मुक्त आत्मा इस धरती पर नहीं आना चाहती मुझे ढकेल दिया गया ऐसे समय में जब धर्म एक आडम्बर बना हुआ था और पूजा एक मखौल।

गुरुजी ने कहा मेरी मार्गदर्शक सत्ता ने पॉंच वर्ष का एक्सटेंशन दियाा है तत्पश्चात् हम सन् २००० तक सूक्ष्म शरीर में रहेंगे और उसके बाद कारण शरीर में तब हम घनीभूत प्राणऊर्जा के रूप में होंगे और केवल पात्रता ही हमारे प्रेम का आधार होगा। चर्मचक्षु हमें न देख सकेंगे।

इन दिनों जब मैं संस्मरण लिख रहा हूॅं पिछले हफ्ते मैंने दो स्वप्न देखें। गुरुजी ने कहा था जब कभी मुझे सपने में देखों कुछ उद्येश्यपूर्ण होंगे। मैंने देखा कि गुरुजी एक कमरे में हैं जाने के लिये रुकावट लगी हुई है। पर स्वयंसेवक ने कहा कि आप जा सकते हैँ सबों को जाना मना है। मैं गया और प्रणाम किया गुरुजी काफी दुबले थे और शरीर छोड़ने की तैयारी में थे बड़े शान्त भाव से कहा कि अब मैं कारण शरीर में जाने वाले हैं। मैंने कहा आप इतने प्रसन्न और स्वस्थ दिख रहे हैं पर दुबले क्योंहै वे बोले मेरा यह शरीर तुम लोगों के चरित्र चिन्तन और व्यवहार से बना है और तुम लोग इन मामले में दुबले पड़ रहे हो आगे देखता हूॅं। मैंने सोचा गुरुजी आपने पति व्रत और पत्नीव्रत को बराबर बतलाया है। हर मनुष्य किसी का तो पति है और महिला किसी की पत्नी है तो क्या किसी की भी सेवा करने से पूर्णता प्राप्त होगी। गुरुजी ने विचारों में ही उत्तर दिया पति व्रत और पत्नीव्रत धर्म केवल एक व्यक्ति की सेवा से पूर्णता नहीं देता लेकिन इस कर्मकाण्ड के माध्यम से श्रेष्ठता और आदर्श के उच्चतर स्तर पर पहुॅंचकर ही वह पतिव्रत या पत्नीव्रत धर्म बनता है केवल सीमाबद्घ होने से नहीं।

दामोदर के मामाजी अपने पत्नी के साथ गुरुजी के पास गये और बोले कि इन्हें हमेशा बीमारी रहती है। यह यदि शरीर छोड़ दें तो ज्यादा ठीक हैं कष्ट सहा नहीं जाता। गुरुजी बोले इसके कष्ट प्रारब्ध हैं और यदि यहॉँ नहीं भोगा तो अगले जन्म में भी भोगना पड़ेगा अच्छा है कुछ समय और कष्ट भोग ले।

श्री मूलसिंह ठाकुर जी ब्रह्मवर्चस के स्थाई सदस्य है उन्होंने बताया कि जब वे गुरुजी से मिले तो उनके सामने उन्होंने बपनी एक बड़ी समस्या रखी। उनकी जमीन पर एक समृद्घ और शक्तिशाली परिवार के सदस्य ने कब्जा कर रखा था जिसका केस कोर्ट में चल रहा था हमारे जीतने की आशा कम थी गुरुजी ने आश्वस्त किया कि मैँ तुम्हारी मदद करूंगा और कुछ ऐसा हुआ कि विरोधी वकील और गवाह आये ही नहीं और मुझे जमीन मिल गयी यदि ऐसी नहीं होता तो अपील में हमारे वे रिश्तेदार अपना अधिकार जमा लेते।

आज दिनॉंक ३०-११-९८ को कालीचरण जी का मैंने इंटरव्यू लिया। यह एक मैकेनिकल इंजीनियर बीई आईआरटी कानपुर के हैं। इन्होंने सन् १९७४ से ८६ तक राऊरकेला में अपनी सेवायें दीं। शान्तिकुॅंज में इन्होंने समयदान पत्राचार, कार्यक्रम विभाग, टोली को सामान यिशु करना तथा बदल बदल कर तीन बार निर्माण विभाग में कार्यरत हैं। ये सबसे पहले एक प्रमुख कार्यकर्ता दधीची जो इंस्पेक्टर स्कूल थे से मिले उनका हॅंसमुख स्वभाव तथा धर्म की व्याख्या बहुत पसन्द आयी। ऐसे हरिजनों को मन्दिर न जाने देना कुयें में पानी न भरने देना मुझे बहुत बुरा लगता था। यद्यपि ब्राह्मण परिवार में होने के कारण दूसरी कक्षा से ही मैं पूजा विशेष कर कृष्ण जी की करता था। सन् १९७३ में शादी के बाद मैं सपत्नीक गुरुजी से मिला। मुझे एक विश्वास हो गया कि यह एक बहुत सच्चे आदमी हैं। दिसम्बर सन् १९७५ में मैंने ९ दिन का शिविर किया। मैं समझ गया कि प्रवचन गुरुजी की आत्मा है। और इनका दिल बहुत बड़ा है। विदाई भाषण में मैं बहुत रोया और मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि गुरुजी के दर्द कीएक चिंगारी मुझमें बस गई। जब मैँ गुरुजी से मिला तो गुरुजी कम्बल ओढ़े लेटे हुये थे। मैंने पूंछा आपकी तबियत तो ठीक है। बोले मेरी तो ठीक है तू मॉँग क्या चाहिए। मैंने कहा मैंने कुछ काम तो किया नहीं फिर मॉंगू कैंसे। उन्होंने कहा बच्चे काम थोड़े करते हैँ पर पिता पर उनका हक होता है। तभी से उनका दर्द उनका दर्द मुझमें समा गया। उनकी बातें पिता से भी ज्यादा मुझे प्रभावित करने लगी। हमारे यहॉँ यज्ञ में गुरुजी आने वाले हैं इन शब्दों से ही हमारी ऑंखों में आसूं आ जाते थे। मुझे लगने लगा कि उनमें प्यार ही प्यार भरा है। वे बहुत अनुशासन प्रिय थे और स्नेही भी। टोली में जाने के पहले मैँ उनके पास गया वे लिख रहे थे। मैं बिल्कुल पास बैठ गया। उन्होंने ऊंगली उठाई इशारा किया दूर बैठ। मैं घबराया पर जैसे ही लिखना समाप्त हुआ वे अनुशासित व्यक्ति प्रेम से भर गये। पास बुलाया तिलक किया और एक शब्द कहा बेटा अच्छे रहना। सन् ८६ में उन्होंने मुझसे आने को कहा और कहा अच्छे लोग आयेंगे तो यहॉँ काम बहुत बढ़ेगा। कबीर को नहीं मिले काम नहीं बढ़ा। मेरे बेटे बेटी साथ थे तो चुटकी बजाकर कहा लड़की की शादी ऐसे कर दूंगा। लड़के के लिये कहा एम०ए०बी०ए० कर लेगा। लड़का एमबीए कर रहा है। गुरुजी ने कहा मुझे सन्त ऋषि अवतार न भी मानो लेकिन एक भला आदमी मैं हूॅं। तूं सोच मत अच्छे काम सोचकर नहीं किये जाते। अपने साथ जियेंगे साथ मरेंगे। एक कार्यकर्ता ने कहा इनको शक्तिपीठ की चिन्ता है। बोले शक्तिपीठ तूने बनाई है। ये सब मैं देखूंगा। मैं शिवप्रसाद मिश्रा जी पर बहुत नाराज हुआ कि क्या तुम ऐसे ही सबको पकड़ते हो गुरुजी ने तुमसे कहा है। उन्होंने कहा हॉं गुरुजी ने कहा है कि जिसे कोई न छोड़े जो बहुत व्यस्त हो जो बाहर बहुत काम कर रहा हो उसी को छुड़ाकर यहॉं ले आना। एक दिन टोली पर जब हम गये तो गुरुजी ने कहा कि टोली के भाषण में तुम यह कहना कि गुरुजी शरीर से तो मर गये पर मन से हमारे लिये जिन्दा है। तुम लोगों के लिये मैंने अपने शरीर को पूरी तरह निचोड़ लिया है तपा लिया है गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को माताजी ने अपने हृदय में बसा लिया है तुम माताजी को अपने हृदय में बसा लो। तुम अपनी नॉंव खुद नहीं खे सकते पर माताजी की नॉंव में दो पैसे यानी श्रमदान समयदान देकर बैठकर पार हो सकते हो। मैँने कहा मेरे बेटे सिद्घार्थ की आपके लिये भक्ति बनाये रखिये। बोले मेरे लिये क्यों भगवान के लिये। तू भक्ति बनाये रखेगा तो उसकी भक्ति हो जायेगी। जब कोई नौकरी निकलती है तो पिता सोचता है मेरे बेटे को मिल जाये। ऐसे ही आने वाले उज्जवल भविष्य में तुम्हारा हिस्सा हो यह मैं चाहता हूॅं ऐसा कहते कहते उनके ऑंसू आ गये। यह घटना मार्च १९९० की है पर वे बोले आलस्य और प्रमाद न करना। मेरी अन्तिम गुरुजी से भेंट में हम पॉंच व्यक्तियों को बुलाया और एक एक लाईन बोले।

१- अशोक दास- क्यों रे दास लाखों रुपये खर्च करके बीडियो बनाया तूने क्या काम किया। फिल्म क्यों नहीं बनाता। मैं ुुकहता हूँ तू बना और किसी की मत सुन।

२- मुझसे अर्थात काली चरण जी से। तू आलस्य छोड़

३-महेन्द्र जी से बोले- तू काम चाहे कम कर पर बीठा बोल।

४-शिवप्रसाद मिश्रा जी से बोले माताजी से मिलाने के तीन घण्टे उसके बाद तू करता क्या। बोले मुझे और कोई काम नहीं मिला है। तो काम ढूढ़। मुझे कौन काम बताता है।

५-रामसहाय शुक्ला से बोले तू क्या करता है स्वागत में। जो शान्तिकुॅंज के गेट में घुसा उन्हें कमरे में ढकेल देता है। कुछ पुण्य परमार्थ का काम किया कर।

हरीशंकर तिवारी ब्रह्मवर्चस ने बताया कि कालीचरण जी पत्नी ने अपने सारे आभूषण शक्तिपीठ निर्माण में गुरुजी को डोनेट किये।

हमारे एक साथी यमुना प्रसाद उपाध्याय वेदाचार्य थे। प्रतापगढ़ उत्तरप्रदेश के रहने वाले थे। वे कहते हैं गुरुजी सबको प्रेम से जोड़ते थे। मैं जब उनके यहॉं ठहरा तो स्नान कराने वो जमुना ले गये। उन्होंने पूंछा कि मैं एक असिस्टेण्ड ब्लाक डव्हलपमेंट आफीसर हूॅं। ५०० मील दूर रहता हूॅं आपने मुझको ही क्यों चुना। गुरुजी ने कहा मैं बीन बीन कर चुनता हूॅं। एक बार वे गुरुजी की एक छोटी सी गोष्ठी में बैठे थे। कालीचरण जी भी थे। गुरुजी बोले यहॉँ मेरी सुनने वाला कोई नहीं है लेकिन यमुना प्रसाद जी ने देखा कि गुरुजी कालीचरण जी के बगल में बैठे है इससे प्रभावित होकर वे कालीचरण जी के साथ सायकिल टोली में निकले। एक बार एक झूठे गबन केस में यमुना प्रसाद जी फंस गये। बारह साल सस्पेंड रहे। वकील जज सब विरोध में थे। मैंने गुरुजी को कहा गुरुजी ने कहा मैं ठीक कर दूंगा। मैं जीत गया बारह साल का वेतन मिला और प्रमोशन भी।

अगाध महापात्र एक सक्रिय कार्यकर्ता राऊरकेला के थे। उन्होंने उनकी पत्नी बच्चों के साथ एक छोटी सी शक्तिपीठ बनाई। वे चाहते थे कि गुरुजी आयें। इस शक्तिपीठ के आसपास के दो स्थानों पर गये पर गुरुजी के अगल बगल में इतनी बड़ी भीड़ और सरंजाम देखकर उनसे प्रार्थना करने की भी हिम्मत नहीं हुई। बहुत दुखी होकर घर लौट आये। पूरा परिवार मायूस हो गया। प्रातः ४ बजे उठते थे पर दूसरे दिन ७ बजे उठे। जब वे कुल्ला कर रहे थे तो एक स्वयंसेवक आया उसने कहा गुरुजी ने मुझे भेजा है वे तुम्हारे शक्तिपीठ का उद्घाटन करेंगे। हमारे पास कुछ भी तैयारी नहीं थी। अचानक गुरुजी आ गये तख्त पर बिठाया बोले खाना नहीं खिलायेगा। खाना था ही नहीं गुरुजी बोले देख दही होगा। सचमुच हमारी मॉं ने दही औरखीर बना रखी थी। बड़े कटोरे में गुरुजी खीर खाने लगे। हमारी मॉँ बोली आप सब खा जाओगे हमारे लिये प्रसाद नहीं छोड़ेगे। गुरुजी वहीं रुक गये।

दन्तेवाला एक घटना सुनाते है कि वे गुरुजी के पीछे पीछे घूमते रहे पर प्रणाम नहीं मिला। नाराज होकर स्टेशन चल दिये। गाड़ी बस कुछ भी नहीं मिली पॉंच घण्टे बाद थी। लौटकर फिर सोचा जहॉं गुरुजी यज्ञ करा रहे थे वहॉं पहुॅंचे तो वहॉँ ध्यान चल रहा था। मैँ भी बैठ गया। ध्यान के बाद शान्ति शान्ति नहीं की बोले जिसको जो पूंछना हो अपने स्थान पर पूंछकर पूंछो मन ही मन सबको मैँ उसके मन में ही जवाब दे दूंगा। मुझे मेरे प्रश्न का जवाब मिल गया। मुझे यह शक हुआ कि जवाब गुरुजी का था या मेरे मन का। बारह साल बाद जब मैं गुरुजी से मिला गुरुजी ने वहीं से आरम्भ किया जो मुझे उस ध्यान में बिलासपुर में कहा था।

श्री गोपाल प्रसाद रजक शान्तिकुॅंज के कार्यकर्ता बताते है कि एक बार में शान्तिकुॅंज चांद्रायण व्रत में आयाथा। साहित्य स्टाल से कुछ लोग खड़ाऊॅं खरीद रहे थे। मैंने पूंछा इनका क्या करोगे। उन्होंने बताया कि गुरुजी के पैरों से छुलाकर ले जायेगें और पूजा के स्थान पर रखेंगे। मैंने भी खड़ाऊॅं खरीद लीं पर मन में विचार आया कि पैर छुला देने बस से क्या फायदा गुरुजी पहनकर चले हों तब तो कहा जाये कि ये गुरुजी की खड़ाउ

ऊॅं हैं। मैंने खड़ाऊॅं ले जाकर अपने कमरे में रख लीं।

जिस दिन बिदाई थी मैं प्रणाम की लाईन में लगा था याद आया कि खड़ाऊॅं तो मैँ लाया नहीं। मेरे पीछे थोड़े से लोग थे। उन दिनों केवल शान्तिकुॅंज परिसार था। मैं सप्तऋषि के पास स्टेज के ऊपर वाले कमरे में रुका था। जब तक खड़ाऊॅं लेने जाता लाईन समाप्त हो जाती फिर भी मैं प्रणाम करके खड़ाऊॅं लेने कमरे की तरफ दौड़कर भागा। जब लौटकर आया तो प्रणाम की लाईन समाप्त हो गई थी माताजी उठकर जा चुकीं थीं केवल गुरुदेव बैठे थे। मुझे लगा गुरुदेव मेरा ही इंतजार कर रहे थे। खड़ाऊॅं मैंने सामने रख दीं। गुरुदेव बोले अच्छा बेटे खड़ाऊॅं लाया है और गुरुदेव ने उठकर खड़ाऊॅं पहनी और कमरे में एक चक्कर लगाकर खड़ाऊॅं उतार दीं। मेरा मन प्रसन्नता और कृतज्ञता से भर उठा। मेरे मन में विचार आया गुरुदेव सचमुच बिना कहे शान्तिकुॅंज आये हर व्यक्ति के मन की बात जान लेते हैं और छोटे छोटे लोगों की भावनाओं का भी इतना ध्यान रखते हैं।

जिनके पति की मृत्यु हो जाती है कितने ही स्वार्थी रिश्तेदार श्मशान बन्धु के नाम पर विधवा को ठगा करते हैं। जो कुछ घर पर पैसा बचा होता है या मिलता है अपने को अति हितकारी बतलाकर ठगते हैं। महिलाओं को श्मशान नहीं जाने देते। माताजी ने एक गलत परम्परा का नियम तोड़ा कि महिला शवयात्रा में नहीं जा सकती। वे गयी और पूरी अन्त्येष्ठी क्रिया में सामने बैठे देखती रहीं। मरणोत्तर संस्कार चिताा दहन क्या सोचती रहीं क्या करती रहीं यह तो वे ही जानें पर ने केवल वे अन्त तक रहीं लेकिन उन्होंने निर्देश दिया कि नांदयोग थोड़ा लेट सही लेकिन नियम के अनुसार आज भी होगा जो लगभग ७ से ७.१५ तक हुआ डाक्टर प्रणव ने ममुझे विशेषकर वहीं डाक्टर टीम के साथ विशेष तैयार रहने के लिये कहा था क्योंकि माताजी एवं अन्य कई व्यक्ति बेहोश हो सकते हैं। मैँ माताजी के बांयी ओर खड़ा रहा वे एक टक देखतीरहीं कुछ हल्की फुल्की एक्का दुक्का सिसकी तो सुनाई पड़ती थी पर ऐसा स्पष्ट बोध होता था कि कोई शक्ति इस व्यथा में आश्वासन व शक्ति दे रही थी। अग्नि शिखायें बार-बार सजल श्रद्घा प्रखरप्रज्ञा की ओर मुड़ जाया करती थीं। उस स्थान पर न केवल लोग प्रणाम करते है बल्कि देर रात तक बैठे भी रहते हैं डर के स्थान एक भाव भरा प्यार ही मिलता है। मुझे ओम प्रकाश भाई साहब याने गुरुजी के बड़े पुत्र बतला रहे थे कि एक रात मैं वहॉं सो ही गया कि देखें मुझे कुछ पिताजी का अनुभव होता है वे बोले कि वे मुझे दिखे तो नहीं लेकिन ऐसा जरूर अनुभव हुआ कि ये मेरे वे ही पिताजी है जिनके साथ मैं बड़ा हो जाने के बाद भी सोया करता था।

उत्तम गायकवाड़ बैतूल निवासी एक समयदानी हैं उन्होंने बताया कि भवानी कश्यप जो एक गायत्री परिवार इंदौर के कर्मठ सदस्य हैं कुछ ही वर्षाे पहले इंदौर के दादा माने जाते थे और सेठों से हफ्ता वसूल किया करते थे एक स्वयंसेवक ज्ञानरथ चला रहा था कि सामने जाकर खड़े हो गये और रोक दिया। बच्चे ने सोचा ये पॉंच सात किताबें उठा लेंगे दो चार थप्पड़ मारेंगे चलो देखा जायें लेकिन भवानी कश्यप कहते हैँ मैंने उस दिन कुछ स्टीकर उठाये। जिसमें एक था कुकर्म करने वाले से अधिक अभागा और कोई नहीं होता क्योंकि विपत्ति में उसके साथ कोई खड़ा नहीं होता। इस वाक्य ने मुझे बदल दिया। उत्तम जी कहते हैं कि मैंने इंदौर में इनके साथ काम किया और इंदौर अश्वमेध यज्ञ में इन्होंने दो दो लाख रुपये की रसीद कटवाई। भवानी दादा जो हफ्ता वसूल किया करते थे उनसे केवल यही पूंछकर बचत है कि रसीद में कितना लिख दें।

रुढ़की यूनिवर्सिटी में एम्पलायमेंट आफीसर श्री डी०के०वर्मा ने मुझे बतलाया कि यह उनकी दूसरी पीढ़ी है जो शान्तिकुॅंज से जुड़ी है वे अल्मोड़ा से पिथौरागढ़ जा रहे थे। एक पहाड़ी रास्ते पर गाड़ी चढ़ रही थी उन्हें अनुभव हुआ कि किसी ने उनका गला पकड़ा और गाड़ी के बाहर फेंक दिया। वे बेहोश हो गये। शायद पंद्रह बीस मिनिट बेहोश रहे होंग। ऑंख खुली उसके बाद देखते हैं कि गाड़ी पहाड़ी रास्ते से लुड़कती लुड़कती नीचे घाटी में आ रही है। यह दृश्य वह अपनी ऑंखों से देख रहे थे यद्यपि उनके एंकल की दोनों हड्डियॉं टूट गयी और इतना रक्त बहा कि उनका रक्त हेमोग्लोबिन पॉंच परसेंट हो गया जो बहुत गम्भीर है। पत्नी अत्यधिक चिन्तित थी। डाक्टरों को भी आशा कम थी पर वर्माजी ने कहा अपनी पत्नी से तुम बाहर जाओ जिसको मेरे साथ रहना है उसे कोई निकाल नहीं सकता। सारे समय में गायत्री जप रहा था मैं दो महीने में पूरी तरह ठीक हो गया।

रुड़की में यूनिवर्सिटी कैम्पस में एक गोष्ठी का आयोजन किया। गायत्री मंत्र के आध्यात्मिक स्वरूप के विवेचन तथा प्रश्नोत्तर किसी प्रोफेसर की लड़की ने एक ऐसा प्रश्न पूंछा जो मुझे कठिन पड़ने लगा। उसका प्रश्न था

क्या मरने के बाद आत्मा का शव शरीर से कोई सम्बन्धा रहता है। मैंने कहा नहीं जैसे यदि दॉंत टूट जाता है तो फिर उसको कचरे में फैंकने में आपको कोई संकोच नहीं होता यदि आपकी कोई ऊंगली कट जाती है। अलग हो जाती है गैंगरीन हो जाती है तो उसे फैंकने में संकोच नहीं होता। तो फिर वह बोली फिर मनुष्य मृत्योतरान्त अपने शरीर अवयम डोनेट करने से क्यों घबराता है। अचानक मुझे ख्याल आया कारण है अज्ञान और मोह।

कृष्णकांत तिवारी ब्रह्मवर्चस में स्थाई सदस्य है। बताते है कि गुरुजी बांदा आये थे। मैं मिडिल में फैल हो गया था। पिताजी ने कहा सन्त आये हैं मिल आओ। मुझे कोई श्रद्घा नहीं थी फिर भी गया। प्रणाम किया। बिना कुछ सुने जाने गुरुजी बोले मैं तुझे पढ़ाऊंगा। और जब मैं फिर परीक्षा में बैठा तो एक पेपर देने ही नहीं गया और फिर भी मैं पास हो गया। क्योंकि पहले पेपर में ही आशा से अधिक ५० में से ३८ नंबर आ गये थे। गुरुजी से मिलने पर उन्होंने कहा आइंदा पेपर देने में चूकना नहीं और फिर पढ़ते पढ़ते में पीएचडी तक पहुॅंच गया। कृष्णकांत बतलाते हैं में ििश्विर में आया था हमारे साथ एक विटनरी डाक्टर भी ठहरे थे। मैँने सोचा कि यह लड़का मेरी बहन के लिये उपयुक्त होगा। मैंने बातचीत की उससे कि शादी तो नहीं हुई।कपिल जी से और शिव प्रसाद मिश्रा जी से भी बात की उन्होंने लड़के से सारी जानकारी ली लेकिन जब हम लोग गुरुजी के पास पहुॅंचे तो यह लड़का बिल्कुल गुरुजी के सामने बैठा था और मैं बिल्कुल बांयी और आखिरी में। गुरुजी ने उस लड़के से पूंछा तुम्हारे बच्चे ठीक हैं उसने जवाब दिया हॉं। गुरुजी ने निगाह उठाकर मेरी तरफ देखा और फिर उसकी तरफ देखकर पूंछा तुम पत्नी को नहीं लाये। बात वहीं समाप्त हो गई। शायद एक बड़ी दुर्घटना से बच गया।

कृष्णकांत जी फिर बतलाते हैं कि हमारा परिवार गायत्री का भक्त है। हमारी बहिन के पति और सास ससुर बहुत परेशान करते थे। एक दिन वह पूजा में बैठी तो उसे एक सपना सा दिखा कि जब तू ससुराल जायेगी तो ये तेरा पति तुझे ढकेल कर मार डालेगा। पर तू फिर भी जा मैं मेरी रक्षा करूंगा। जब वहॉं पहुॅंची तो उसके पति और सास ससुर को दरवाजे के बाहर और घर में दो काले नाग दिखते जो उन्हें डरा देते। जब मेरी बहिन गुरुजी से मिली तो उन्होंने कहा कि अब तो तुझे विश्वास हो गया कि मैं तेरी रक्षा करूंगा और कहा कि अब तू अपने मायके आ जा तेरी व्यवस्था हो जायेगी मैं केवल मिडिल पास थी लेकिन अचानक सीएमओ ने उनको चुन लिया और अब वह अपने पेरों पर खड़ी है। वे यह भी कहते है कि बीच बीच में मुझे माताजी दिखती हैं।

प्रेरणा बाजपेई माताजी के अन्तिम दिनों में अंजू के साथ उन्हीं के पास रहीं। क्योंकि दोनों को नरसिंह की सेवा का अच्छा ज्ञान था समर्पण भी। मैंने जब उनसे पूंछा कि कोई चमत्कारी तुमने देखी तो वे बोली चमत्कारतो नहीं लेकिन उनमें मानवता का भान हमेशा ही स्पष्ट रहता था। एक दिन क्या हुआ कि अंजू कहकर गयी कि मैं थोड़ी देर से आऊंगी तब तक तुम रुकना मुझे देर तक रुका देख माताजीबोली तू जा खाना जा भूंख लगी होगी। मैंने कहा खा लूंगी माता जी अंजू अभी आती होगी। वे बोली जा क्यों चिन्ता करती है मैं तो हूॅं। जबकि स्वयं ही अत्यधिक बीमार थीं। प्रेरणा औरशैल जीजी जी दोनों जोर से हॅंस पड़ी। किसी भी स्थिति में उनका अपना मॉँ का भान गया नहीं।

मेजर राजवीर सिंह ने बतलाया यद्यपि में मथुरा का रहने वाला हूॅं फिर भी गायत्री या गुरुजी के विषय में मैँ कुछ नहीं जानता था लेकिन जब मैं गुरुजी से मिला तो उनने कहा कि तू यहॉं आ जा। मैँने कहा गुरुजी मैं भगवा कपड़े नहीं पहनूंगा। गुरुजी बोले मैँ कहां पहने हूॅं। मुझे तुझसे काम लेनाा है कपड़े नहीं दिखाना है। मैँ थोड़ी बहुत पूजा करता था सन् १९८६ का बसन्तपंचमी का भाषण गुरुजी का सुना और सोचा कि यह प्रयोग करके देखूॅं कि क्या गुरुजी से बात हो सकती है। वही १० प्राणायम गायत्री मंत्र और सिर पर हाथ फेरना अचानक मुझे नींद सी आ गई और अन्दर से एक जवाब सा उठा कि क्या मैँ अपनी छाती फाड़कर बताऊं कि जो तू सोच रहा है वह सही है मैंने पूंछा क्या सोच रहे थे मैं सोच रहा था कि सर्विस छोड़कर शान्तिकुॅँज आ जाऊं।

कैलाश शर्मा जो कलकत्ते के बंगाली अखण्ड ज्योति के सम्पादक हैं कहते है कि यदि मैं अपने शरीर के चमड़े के जूते बनाकर भी मैं गुरुजी को पहनाऊं तो मैं उऋण नहीं हो सकता। जो घटना मेरे साथ घटी वह मैँने माताजी को सुनाई और उनकी आखों में आंसू आ गये।

मेरे एक साथी व्यापारी जो मद्रास में थे उन्होंने तार द्वारा मुझे हवाई जहाज से अस्सी हजार लेकर किसी सौदे के लिये आने के लिये कहा। मैं पहुॅंचा उसका लड़का मुझे लेकर स्कूटर पर चला जंगल के रास्ते में उसने स्कूटर रोकी बोला लघुशंका जा रहा हूॅं और एक बहुत बड़े लोहे के राड से मेरे सिर पर मारा मैँ चक्कर खाने लगा। एक क्षण मैंने गुरुजी को याद किया कि आप तो कहते थे मुझे तेरा उपयोग एक शेर की तरह करना है और मैं अब एक कुत्ते की तरह मर रहा हूॅं। मुझमें अचानक न जाने कहॉँ से ताकत आ गयी कि मैँने एक घूंसा मारा तो वह जवान लड़का और मैँ लगभग ५० वर्ष का वयस्क। पर वह दो गुलांट खाकर एक गड्डे में गिरा। जल्दी से वह स्कूटर लेकर भाग गया। मैं और मेरा पैसा दोनों बच गये। एक ट्रक मिल गया जिसने मुझे अपने आड़त के यहॉँ पहुॅंचा दिया। मेरी पत्नी हवाई जहाज से आ गई। मैँ स्वस्थ हो गया।

जब मैं पहली बार सन् १९६० में माताजी से मिला तो उनका स्वरूप एक साधारण गृहस्थ महिला जैसा था। मैँ कहता था मैं परीक्षा में पास हो जाऊं माताजीकहतीथी मैं तेरी सिफारिश गुरुजी से कर दूंगी। तू भी गुरुजी से बोल देना माताजी ने अपना चित्र मुझे दिया जो आज भी लगभग ३५ वर्ष से मेरे साथ है। गुरुजी का एक चित्र पं० लीलापत जी ने मुझे दिया जिसकी कापी माताजी अपने पूजा कक्ष में रखती और वेकहती है कि आरम्भिक स्थिति में गुरुजी जब अज्ञातवास में होते हैं तो मैँ इस चित्र से उनसे सम्बन्ध स्थापित कर लेती हूॅं। और गायत्री परिवार की समस्याओं का हल भी पूॅंछ लेती हूॅं। स्वयं गुरुजी ने १९६५ में दादागुरु का एक चित्र लाकर मुझे दिया जो आज भी मेरे पास है। मैँने उस चित्र का पाते ही प्रणाम कर वायदा किया कि मैं आपसे कभी कुछ माँगूगा नहीं और मैंने ऐसा ही किया। विचारों में भी नहीं।

मैंने पूंछा गुरुजी से कि आपने यह चित्र कैसे सउतारा क्या आपके पास कैमराथा गुरुजी ने कहा नहीं जिसस गुरुपूर्णिमा में मुझे गुरुजी के दर्शन करने थे सन् १९६० में उस समय उनके हम सात शिष्य वहॉँ पहुॅंचे। मैंने पूंछा यह कौन हैं उन्होंने कहा कि भारत के दो थे। यएक दक्षिण भारत में हैं। उन्हीें ने कैमरा से ये चित्र लिये थे जिनकी कापी मुझको भेजे। मैंने कहॉँ बाकी पॉंच कहॉं है। गुरुजी ने कहा ये पॉंचों विदेश में है और अपने अपने ढंग से काम कर रहे है एवं दादागुरु के शिष्य हैं। मैंने पूछा किदादा गुरु का नाम आपने कैसे जाना। आपकी बातचीत हुई बोले वे सब जगह पहुॅंच सकते हैं इसलिये मैंने उनका नाम सर्वेश्वरानंद रख दिया वे स्थूल भी बन सकते हैं पर है सूक्ष्म।

जगदीश वर्मा जी सावित्री एक में स्थाई कार्यकर्ता हैं। ये राऊरकेला में अच्छे पद परथे वे कहते हैँ। मैं न केवल भगवान और पण्डितों में अविश्वास करता था पर विरोध भी सन् १९७१ में हमारे यहॉँ यज्ञ हुआ। फैक्टरी के रास्तें में यज्ञ स्थली थी। स्कूटर पर जाता था। और उपेक्षा से निकल जाता था। एक दिन साईकिल सेगया तो एक पोस्टर पढ़ा हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। सोचा मेरे अकेले से सुधरने से कैसे दुनिया सुधरेगी। पर फिर सोचता रहा तो लगा कि ठीक तो है। यदि दुनियॉं बदलेगी तो विचार परिवर्तन से बदलेगी। हम मतलब बहुत सारे लोग मैंने कुछ छोटी किताबें भी खरीद लीं। किताबें अच्छी लगी। एक कार्यकर्ता ने बताया कि आप ही के आफीसर राऊरकेला में गायत्री भक्त हैं तथा उनके यहॉँ मोटी किताबें भी हैं। मैं रात को ही उनके यहॉं पहुॅंच गया दरवाजा खटखटाया उन्होंने बड़े प्रेम से बातचीत की किताबें दी और मैं उनका मित्र हो गया। उनका नाम था के०के०भाटिया वे प्राणप्रत्यावर्तन शिविर में आये और जब मेरे विषय में थोड़ी जानकारी दी और मेरा एक कष्ट भी बतलाया कि मुझे सांस की बड़ी बीमारी है और हर दो तीन महीने में अस्पताल में भरती होना पड़ता है गुरुजी ने कहा कि यह भस्मी ले जाओ आचमनी के साथ रोज गाये पॉंच माला गायत्री जपे आज के बाद वह कभी अस्पताल में भरती नहीं होगा। और नहीं हुये। डाक्टर डिल्लन ने राऊरकेवला में आपरेशन बतलाया था। गुरुजी ने यह भी कहा था कि यह लड़का कुछ दिनों बात शान्तिकुॅंज आ जायेगा और मैं आ गया। हम पति पत्नि जब गुरुजी से मिलने आये तो हमारे दोनों बच्चों को गोद में लेकर गुरुजी ने कहा कि यह बच्चे अब हमारे है तुम देखरेख करना हम अच्छा इंसान बनायेंगे। गुरुजी ने एक बात और कही जब मैं शान्तिकुॅंज आ गया। गुरुजी ने एक बात और कही जो मैं कभी भूलता नहीं। कि तू सिर्फ मुझे और माताजी को देखना आस पड़ौस को बिल्कुल मत देखना तू मेरा काम करना मैं तेरा।

सन् १९७८-७९ में मैं अरुण पंड्या के साथ आया और मैंने कहा माताजी यह भी आना चाहते हैं। माताजी ने कहा ये नहीं आयेगा। तू आ जायेगा।

गुरुजी ने कहा मेरे पास शक्तियॉं है सिद्घियॉँ हैं लेकिन मुझे निर्देश एक लोकसेवी ब्राह्मण का ही जीने का है।

गुरुजी ने कहा मुझे चले जाने दो उसके बाद मुझे नापने के सारे पैमाने छोटे पड़ जायेगे

गुरुजी ने कहा कि यदि कोई कहे कि तुम्हारे गुरुजी से बड़ा विद्वान कोई है गुरुजी से बड़ा तपस्वी कोई है और गुरुजी से बड़ा कोई प्रवचनकर्ता है कोई समाजसेवी है तो एक बार मान लेना पर बेटे याद रखो तुम्हारे गुरुजी से बड़ा प्रेम करने वालार और कोई नहीं होगा।

गुरुजी ने कहा सन् १९७१ के बिदाई भाषण में कि कोई भी मुक्त आत्मा इस धरती पर नहीं आना चाहती मुझे ढकेल दिया गया ऐसे समय में जब धर्म एक आडम्बर बना हुआ था और पूजा एक मखौल।

गुरुजी ने कहा मेरी मार्गदर्शक सत्ता ने पॉंच वर्ष का एक्सटेंशन दियाा है तत्पश्चात् हम सन् २००० तक सूक्ष्म शरीर में रहेंगे और उसके बाद कारण शरीर में तब हम घनीभूत प्राणऊर्जा के रूप में होंगे और केवल पात्रता ही हमारे प्रेम का आधार होगा। चर्मचक्षु हमें न देख सकेंगे।

इन दिनों जब मैं संस्मरण लिख रहा हूॅं पिछले हफ्ते मैंने दो स्वप्न देखें। गुरुजी ने कहा था जब कभी मुझे सपने में देखों कुछ उद्येश्यपूर्ण होंगे। मैंने देखा कि गुरुजी एक कमरे में हैं जाने के लिये रुकावट लगी हुई है। पर स्वयंसेवक ने कहा कि आप जा सकते हैँ सबों को जाना मना है। मैं गया और प्रणाम किया गुरुजी काफी दुबले थे और शरीर छोड़ने की तैयारी में थे बड़े शान्त भाव से कहा कि अब मैं कारण शरीर में जाने वाले हैं। मैंने कहा आप इतने प्रसन्न और स्वस्थ दिख रहे हैं पर दुबले क्योंहै वे बोले मेरा यह शरीर तुम लोगों के चरित्र चिन्तन और व्यवहार से बना है और तुम लोग इन मामले में दुबले पड़ रहे हो आगे देखता हूॅं। मैंने सोचा गुरुजी आपने पति व्रत और पत्नीव्रत को बराबर बतलाया है। हर मनुष्य किसी का तो पति है और महिला किसी की पत्नी है तो क्या किसी की भी सेवा करने से पूर्णता प्राप्त होगी। गुरुजी ने विचारों में ही उत्तर दिया पति व्रत और पत्नीव्रत धर्म केवल एक व्यक्ति की सेवा से पूर्णता नहीं देता लेकिन इस कर्मकाण्ड के माध्यम से श्रेष्ठता और आदर्श के उच्चतर स्तर पर पहुॅंचकर ही वह पतिव्रत या पत्नीव्रत धर्म बनता है केवल सीमाबद्घ होने से नहीं।

दामोदर के मामाजी अपने पत्नी के साथ गुरुजी के पास गये और बोले कि इन्हें हमेशा बीमारी रहती है। यह यदि शरीर छोड़ दें तो ज्यादा ठीक हैं कष्ट सहा नहीं जाता। गुरुजी बोले इसके कष्ट प्रारब्ध हैं और यदि यहॉँ नहीं भोगा तो अगले जन्म में भी भोगना पड़ेगा अच्छा है कुछ समय और कष्ट भोग ले।

श्री मूलसिंह ठाकुर जी ब्रह्मवर्चस के स्थाई सदस्य है उन्होंने बताया कि जब वे गुरुजी से मिले तो उनके सामने उन्होंने बपनी एक बड़ी समस्या रखी। उनकी जमीन पर एक समृद्घ और शक्तिशाली परिवार के सदस्य ने कब्जा कर रखा था जिसका केस कोर्ट में चल रहा था हमारे जीतने की आशा कम थी गुरुजी ने आश्वस्त किया कि मैँ तुम्हारी मदद करूंगा और कुछ ऐसा हुआ कि विरोधी वकील और गवाह आये ही नहीं और मुझे जमीन मिल गयी यदि ऐसी नहीं होता तो अपील में हमारे वे रिश्तेदार अपना अधिकार जमा लेते

सन् १९६४ में मैंने प्रथम सिविल हास्पिटिल भवर कुॅंआ इंदौर में सहायक चिकित्सक के पद पर ज्वाइन किया वहॉं मेरे एक मित्र अर्जुनदास मूलचंदानी ने कहा कि मेरी तीन लड़कियॉँ हैं। आप कुछ सहायता कर सकते हैं अपने डाक्टरी ज्ञान से। मैंने कहा नहीं डाक्टरी ज्ञान से नहीं पर तुम्हारा काम अवश्य हो सकता है मैंने गुरुजी को पत्र लिखा गुरुजी का आशीर्वाद आया और उनको एक पुत्र की प्राप्ति हुई। बीस साल बाद वे एक बार मथुरा गये। उनको याद आया कि हमारे मित्र डाक्टर दत्ता के गुरुजी गायत्री वाले यहीं रहते हैं। वे मिलने गये प्रणाम किया। जैसे ही उनके बीस साल वाले लम्बे चौड़े सिंधी परिवार के पुत्र ने प्रणाम किया कि गुरुजी ने कहा कि ये बेटा तो मेरा दिया हुआ है। माता पिता को मेरी याद आयी कि मैंने कहा था कि गुरुजी ने तुमको आशीर्वाद लिख भेजा यह घटना अर्जुनदास जी ने मुझको शान्तिकुॅंज में लगभग २५ वर्ष बाद जब वे यहॉं आये थे सुनाई।

गुरुजी के अपने विचार सत्य के विषय में बहुत अनूठे थे कभी कभी तो वो सत्य पर बहुत नाराज होते थे कहते थे लोग मेरे पास आते हैं खूब बुराई करते हैं और कहते हैं मैं तो सत्य बोलता हूॅं। गुरुजी बोले तू सत्य तो बोलता है पर तेरे सम्य में मिट्टी के तेल की बदबू आ रही है। सत्य को शिवम् सुन्दरम होना भी आवश्यक है यानी कल्याणकारी। कुछ मजेदार कहानियॉँ वे सुनाते थे ठीक से तो याद नहीं पर कुछ ऐसी।

१- बीरबल बातचीत में हमेशा राजा अकबर से जीत जाते थे। एक दिन अकबर ने सोचा बीरबल को हराना चाहिए। उन्होंने एक छोटी चिड़ियॉं ली और उसको खूब कम्बल से लपेट दिया और बीरबल से पूंछा बताओं चिड़ियॉं जिन्दा है कि मरी। अब तो बीरबल परेशान। अगर जिंदी कहते है तो राजा वहीं गला दबाकर मार डालेंगे। और यदि मरी कहते हैं तो कम्बल हटाकर उड़ाकर दिखा देंगे। बीरबल ने सत्य के दूसरे स्वरूप को भी सोचा और कहा बादशाह चिड़ियॉ मरी है बादशाह ने कम्बल हटाये और चिड़ियॉँ उड़ा दी। बीरबल बोला मुझे मालुम था कि चिड़ियॉं जिंदी है पर यदि मैँ कहता तो आप मार डालते सत्य की अपेक्षा चिड़ियॉ की जान बचाना आवश्यक था। ऐसे थे हमारे गुरुजी

लखनऊ में ए०के०तिवारी जी ने बताया कि एक मनीषी ज्योतिषी जिन्होंने गुरुजी के विषय में बहुत कुछ सुन रखा था मिलने आये पर अपने बच्चों में, गायत्री परिवार में गुरुजी इतने व्यस्त और घिरे कि वह एक क्षण भी न मिल सके। बहुत खीजे बोले ऐसे क्या गुरुजी जो मेरे से एक छोटे प्रश्न का जवाब देने के लिये भी उपलब्ध न हो पायें। उनका प्रश्न था गायत्री के मंत्र का सही तोड़ गुरुजी चल दिये। उन्होंने गुरुजी की पीठ की तरफ देखा उन्होंने हथेली पीछे की और वे देखते हैं कि गायत्री मंत्र का सही तोड़ सुनहरे अक्षरों में उनकी हथेली में उभर आया। उन्होंने वहीं सिर झुकाया और मान लिया कि गायत्री मंत्र के सिद्घ साधक पण्डित श्रीरामशर्मा आचार्य तुम्हें मेरा कोटि कोटि प्रणाम।

एक दिन बहुत पानी बरसा। ब्रह्मवर्चस मन्दिर में पानी भर गया। सारे विभाग वालों ने अपनी अपनी रिपोर्ट माताजी को दी। एक रिपोर्ट थी कि दाल और चॉंवल के बहुत थेले आधे आधे डूब गये। माताजी ने बिना कुछ नुकसान के मुझसे कहा अमल कुमार ब्रह्मवर्चस में कोई खाना नहीं पकाये। तीन दिन तक सबेरे शाम सब लोग सामूहिक खिचड़ी खायें घी हम भिजवाते है।

डॉ० प्रणव के पिताजी श्री सत्यनारायण पंड्या जी जो कि हाईकोर्ट जज रहे हैँ उन्होंने मुझे बताया कि जबलपुर के दानाभाई राठोर ने बताया कि उनको गायत्री परिवार में लाने वाले श्री रणछोड़दास जी थे। वे उनको बड़ी श्रद्घा की दृष्टि से देखते थे। जब उन्होंने उनकी मृत्यु की सूचना गुरुजी को दी पत्र पहुॅंचने के पहले ही गुरुजी का पत्र आ चुका था जिसमें लिखा था कि मैंने यानी गुरुजी ने उनकी मृत्यु होते ही उनकी चेतना गुरुजी के पास पहुॅंची। गुरुजी ने पूंछा तुम अपने शरीर में लौटना चाहतो हो तो मैं तुम्हें भेज देता हूॅं। उन्होंने कहाा नहीं। तो ठीक है गुरुजी ने कहा मैँ तुम्हारे आगे का रास्ता साफ कर देता हूॅं तुम्हारी अन्त्येष्ठी तो जबलपुर में ही हुई होगी पर मैँ हरिद्वार गंगा में स्वयं तुम्हारा तर्पण करूंगा।

पॉंच, छः साल पहले की बात है। श्री वीरेश्वर उपाध्याय जी हमारे टोली नायक थे। हम लोग भुवनेश्वर गये। शहर के बड़े आदमियों से मिलने का क्रम वहॉँ के गायत्री परिवार ने बना रखा था। हम लोग चीफ जस्टिस सुप्रीम कोट्र रंगनाथन जी से मिलने गये। अब वे चेयरमेन ह्यूमन राइट कमीशन पर स्थित हैं। उन्होंने बड़ा सम्मान किया। गुरुजी के शिष्य के नाते। और उन्होंने एक घटना सुनाई। वे बोले मैं गुरुजी से मिला। मैंने पूंछा कब। बोले इसी साल। मैंने कहा उनका शरीर तो सन् १९९० में छूट गया। वे बोले कि वे मुझसे शरीर छोड़ने के बाद ही मिले। मैंने कहा विचार में या सपने में। बोले नहीं प्रत्यक्ष। जैसे तुम बैठे हो। मैंने पूंछा कैसे विश्वास किया जाये। बोले मैं कहता हूॅं। मैंने कहा आप भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे हैं इसलिये कह तो ठीक ही रहे होंगे लेकिन एक वैज्ञानिक इसको मान्यता नहीं देगा। क्या आप विस्तृत जानकारी देंगे। बोले हॉँ। मैंने फिर पूंछा क्या आपकी बात मैँ अपने माइक्रोकैसिट रिकार्डर में रिकार्ड कर सकता हूॅं। बोले हॉँ। मैँने रिकार्डर टेबिल पर रख दिया। वे बोले मैँ बहुत परेशान था। सन् १९८४ में इन्द्रागॉंधी हत्याकाण्ड के बाद सिक्खों को जो हानि हुई उसके कम्पन्शेसन के सारे मामले राष्ट्रपति ने मुझे सौंपे थे। मैं जब अपने कोर्ट आर्डर में ३०, ३०-४०, ४० लाख रुपये का कम्पन्शेसन देने का निर्णय देता था तो सरकार बजट न होने का कारण देकर असमर्थता व्यक्त करती थी। एक जज को ऐसी कठिनाई कि निर्णय लागू न हो एक अजीब घटना थी। इस चिन्तित हालत में मैंने गुरुजी को याद किया और सशरीर गुरुजी मेरे सामने आकर बैठ गये। मेरे तीन प्रश्न थे। इन प्रश्नों के जवाब जो गुरुजी ने दिये वे न कभी भी न मेरी कल्पना में थे और न मैँ कभी ऐसा सोच सकता था। गुरुजी ने कहा तुम प्रधानमंत्री राजीव गॉंधी से कह दो कि इस स्थिति में मैं काम नहीं कर सकता। राजीव गॉंधी ने निर्देशित कर दिया कि इनके निर्णय की राशि इनके चेक द्वारा सीधी ट्रेजरी से पेमेन्ट की जाये। ऐसा ही एक प्रश्न बृन्दावन से गाय कटने के लिए बाहर न जाये इसका क्या उपाया है। कलेक्टर एस पी तथा कुछ और ऐसे सदस्य ऐसे कानून बना ले ताकि सरकारी अफसरों के तबादले के बाद भी यह नियम बदले नहीं। और प्रश्न मुझे याद नहीं रहे।

मेरे एक मित्र मेहता जी डायरेक्टर एग्रीकल्चर रतलाम में थे। उनके पुत्र नरेश मेहता एक दिन गुरुजी से बोले गुरुजी मैंने एक दक्षिण भारतीय लड़की से शादी की है। बहुत अच्छे स्वभाव की है। मेरे साथ पढ़ती थी। पिताजी उसे स्वीकार नहीं करते। गुरुजी बोले तेरे पिताजी क्यों स्वीकार नहीं करते। तू जाकर बोल कि यदि तुम दक्षिण भारत की लड़की स्वीकार नहीं करते तो फिर मॉँ को दक्षिण भारतीय साड़ी क्यों पहनने देते हो। फिर वहॉं के चॉंवल और लोंग इलायची भी खाना बन्द करो। बहू को स्वीकृति मिल गई।

गुरुजी का एक लिखा गाना तुम न घबराओ न ऑंसू ही बहाओ तुम पोंछ दूंगा ऑंसू तुम्हारे अश्रुगीतों से। घाव धोकर मरहल लगाऊॅंगा और कुछ मॉँगो हॅंसी मॉंगों खुशी मॉंगो। खो गये हो दे रहा हूॅं तुमको मैँ जीने की कला सिखाऊंगा न केवल उनके ये भाव था बल्कि उनका जीवन था।

गुरुजी के अन्तिम समय के शब्दों को सुनने के लिये जब माताजी पर अधिक जोर दिया तो फिर उन्होंने कहा कि वे बहुत पहले से ही कहने लगे थे कि मैं गायत्री जयन्ती के दिन यह शरीर छोड़ दूॅंगा। उस दिन साढ़े चार बजे मैं गुरुजी को प्रणाम कर साढ़े छः बजे स्टेज पर पहुॅंच गयी। भाषण भी दिया चार शादियॉं थी आशीर्वाद मिलक माला बच्चों को खाना खिलाया। प्रणाम में केवल पॉंच व्यक्तितों को मैंने फूल दिये और आगे मैँ फूल न दे सकी कारण मेरा शरीर तो प्रणाम करा रहा था पर मुझे मालुम था कि गुरुजी ने अपने शरीर से बिदाई ले ली है। गुरुजी ने मेरा हाथ पकड़कर अन्तिम बार कहा था कि मैं गायत्री परिवार के बच्चों की जिम्मेदारी केवल तुम पर और तुम पर छोड़ जा रहा हूॅं। मैँने भी वायदा निभाने की सौगन्ध खाई।

श्री ओमप्रकाश शर्मा जी गुरुजी के ज्येष्ठ पुत्र मेरे घनिष्ठ मित्रों में हैं। और वे गुरुजी के अन्तिम दिनों में यहीं त्रिपदा ५ में रहे। मेरे अनुरोध पर जो कुछ वे याद कर सके सब मुझे न केवल सुनाये बल्कि टेप रिकार्डिंग भी कराया जो मेरे पास सुरक्षित है। वे कहते हैँ। मुझे गुरुजी के साथ रहने के लिये ५८ बसन्त का सानिध्य मिला।

डॉ० मिस रजनी जोशी पी०एच०डी० प्रोफेसर आफ मेटामेटिक्स एण्ड बायोइंजीनियरिग आई०आई०टी० बाम्बे फोन नं० ५७६८४८५, ५७८२५४५ एक्सटेंशन ७४८५ फेक्स ०९१२२५७८३४८० ई०मेल रजनी जोशी, आई०आई०टी०बाम्बे० आर आर जे एट मेथ ़ आई आई टी बी , ई आर एन ई टी, इन आज दिनॉंक १६-१२-९८ को मैंने इनका इंटरव्यू लिया उन्होंने कहा मेरा अखण्ड ज्योति से परिचय १९७९ में हुआ। पर मैं गुरुजी से अपने जन्मदिन पर १९८३ में मिली मैं फ्रांस गई थी वहॉं पहुॅंचते ही चौथे दिन मुझे पत्र मिला कि मैं तेरे साथ रहूॅंगा। गायत्री महाविज्ञान के तीनों भाग मैं ले गयी थी। जब मैं मिली तो मैंने गुरुजी से कहॉं कि मैंने फ्रेंच सीख ली है और फ्रेंच में थीसिस भी लिखी है इसलिये मैं गायत्री के तीनों भाग फ्रेंच में अनुवाद करना चाहती हूॅं। गुरुजी ने कहा कि फ्रांस एक छोटा सा देश है उसमें १२ कालोनियॉं हैं जिनके एक एक नाम उन्होंने गिनवा दिये सबकी जनसंख्या गिनवाई और उनके मुख्य शहर भी बतलाये इतनी बारीकीजानकारी न मुझे थी न साधारणतः किसी को हो सकती है गुरुजी ने आगे कहा कि मैं आगे चलकर तुझसे अंग्रेजी में अनुवाद कराऊॅंगा। रजनी जोशी ने दो वांगमय तथा चार पॉंच किताबें अनुवाद कर ली हैं। भारत और अमेरिका दोनों के ही प्रथम दृष्टा ने उनकी बड़ी प्रशंसा की है। रजनी जोशी कहती हैं कि मेरे जीवन की गुरुजी के साथ बहुत अनुभूतियॉं हैं। जिनको मैं बतलाना नहीं चाहूॅंगी और न ही मुझे बताना चाहिए फिर भी शायद आपको बताने की आगे सम्भावना है। सन् १९८६ में मैं अपनी चचेरी बहन के साथ गुरुजी के पास गई बिना कुछ पूछे और जाने गुरुजी ने वंदना से कहा कि तेरी शादी जल्दी करा दूॅंगा और मुझसे कहा कि तू गुलामी मत करना। शादी नहीं करना तुझसे बड़े काम कराऊॅंगा। तेरा मुझसे सम्बन्ध पिछले तीन जन्म से है और यही बात माताजी ने नीचेआने पर कही।

मैं जब फ्रांस में थी मेरे पिता जी को केंसर रेक्टम हो गया। आफरेशन ठीक होने की सूचना मिली। पर मेरे पत्र के उत्तर में गुरुजी ने लिखा कि प्रारब्ध का जाल बड़ा विकट होता है बहुत पहले से ताना बाना बुने बिना कटता नहीं और वे न जी सके।

रामकृष्ण रघुनाथ जोशी जो सात- आठ बार हिमालय जा चुके हैं काठमांडू से वापस आ रहे थे बस पलट गयी। बस के सारे यात्री मर गये केवल वे ही बचे। और जब वे माताजी से मिले तो पहला ही वाक्य माताजी ने कहा तू कहॉं गिरता पड़ता है तेरी मृत्यु थी अब भगवान का काम कर।

वीरेश्वर उपाध्याय भाई साहब का मैंने इंटरव्यू लिया। भाई साहब ने बताया सन् १९५५-५६ में झांसी में पढ़ता था और लक्ष्मीनारायण व्यायाम मन्दिर में सदस्य था। जहॉं बालकृष्ण अग्रवाल प्रमुख व्यक्ति थे। मैं एक एक माला करता था तथा पुराने ढंग से यज्ञोपवीत संस्कार भी कराया था। गुरुजी जब यज्ञ में आये तो मैं स्टेशन भी गया लेक्चर सुना कार्यक्रम बहुत अच्छा लगा और इंजीनियरिंग डिप्लोमा कर चुका था गुरुजी के पास पत्र लेकर गया। सन् १९५८ यज्ञ में। सन् १९५९ मार्च अप्रैल में याज्ञवल्क्य नगर में मैं ठहरा जहॉं बालकृष्ण अग्रवाल जीवनदानी थे। गुरुजी ने कहा कि भाषण जवान से नहीं किये जाते अपने जीवन से किये जाते हैं आगे सारी दुनिया गायत्री करेंगी मुझे वे एक ईमानदार अभिव्यक्ता लगे। मुझे उनमें एक दिव्यता का अहसास होने लगा और साथ में एक गहरा अपनत्व। मैंने अनुभव किया कि असली मन्दिर तो गुरुजी का ही है। सन् १९६५ में इलाहाबाद में विश्वहिन्दू परिषद की स्थापना हुई नवम्बर दिसम्बर में गतिविधियॉं चालू हो गयी। सारे दुनिया के हिन्दू देश विदेश से संस्कार देने वाले आये थे। सन् १९६६ में गुरुजी ने अभिनव संस्कार पद्धति और धर्मशिक्षण से लोकसेवा प्रगतिशील शैली में निकाली फिर एजूकेशन लीव लेकर मैं मथुरा गया। जहॉं गुरुजी ने कहा कि हमें देश विदेश में संस्कार सिखाना ही नहीं सिखाने वाले बनाना है। गुरुजी ने कहा कि विश्व हिन्दू परिषद आगे एक राजनैतिक संस्था बन जायेगी उसमें अध्यात्म कम रहेगा। फिर गुरुजी फरवरी में इंदौर यज्ञ में मिले। मैं रूपराम नगर कालोनी में पहुॅंचा गुरुजी ने मुझे वहीं ठहरा लिया कहा यही सो जाना गुरुजी के पलंग के पास ही मैं जमीन पर सो गया। गुरुजी ने सारे घर की बातचीत पूछी और पूछा तेरा पैसा बढ़ाने की या व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा या कोई जिम्मेदारी बड़ी है। यदि ऋषि जैसा जीना चाहता है तो युग निर्माण विद्यालय के लिए तू आ जा। कुटीर उद्योग, वा लोकसेवी उद्योगों के लिये स्वयंसेवक जरूर मिलेगें। फिर टुकड़ों-टुकड़ों में बात होती रही। रविवार को वापस आना था मुझे गुरुजी बोले मुझे डर लगता है कि तेरी टेक्रोलाजी का क्या होगा। मैंने कहा गुरुजी मेरे हाथ जिन्दा हैं यदि आपने मुझे हटा भी दिया तो फिर मैं कमा खा लूॅंगा। गुरुजी ने कहा तेरा स्वागत है तू आ जा। एक साल के लिए स्थाई या अस्थाई तू मथुरा आ जा। राजगढ़ में मेरे बड़े भाई थे सारी बातें हुई। उन दिनों जीवनदानी लड़भिड़कर अलग हो चुके थे। हम दोनों भाइयों ने बहश के बाद यह निश्चय किया एक भाई घर रहे परिवार के लिये और एक गुरुजी को समर्पित हो। जून सन्१९६६ में गुरुजी ने कहा हमारा दरवाजा खुला है गायत्री तपोभूमि के गेट के पास गुरुजी ने मेरा पीठ सहलाया और मैंने एक स्पष्ट झनझनाहट पूरे मेरूदण्ड में पहसूस की जैसे कोई प्राणप्रवाह हो। मैंने पूछा हम दो भाई में से किसको आना चाहिए। गुरुजी ने कहा राम के साथ तो लक्ष्मण ही जंगल गये थे तू ही आ जा। मेरा शेसन पूरा हो गया था जुलाई से विद्यालय का काम मैंने मथुरा में सम्भाल लिया। गुरुजी ने कहा कि ऋषियों जैसा जीवन जीना पर जैसा मैंने तेरे लिये किया ऐसा रिस्क आगे नहीं लूॅंगा। मुझे नयी सृष्टि में नया नेतृत्व खड़ा करना पड़ेगा। हमको ऐसा विश्वमानस बनाना है जो समस्याएॅ सुलझाये। गुरुजी के सामने योजनायें स्पष्ट रहती थीं। फेमिली प्लानिंग पर वे बहुत जोर देते थे और कहते थे कि मेरी दूरबीन बहुत दूर तक देखती है। व्यक्ति बनाने के प्रति उनका बड़ा आग्रह रहता था। जो बड़ा काम और सम्मान की बात सोचेगें वे अटक जायेंगे। मुझसे कहा ऑंख चमकाते हुये कि तुम्हारी कलम में भावना है लेखक बनना। जब वे नाराज होते थे तो हमारी ही कच्चाई प्रकट करते थे ताकि वह छूट जायें जवान से नाराज और पेट से आशीश निकलता था।

ज्योति प्रसाद रावत जो मिनिस्टर स्तर के थे उनके पास १०० टन सीमेंट लेने मुझे भेजा। मैंने जैसा कि सतना के खंडेलवाल जी ने कहा मैंने १२० टन की मंजूरी ले ली। गुरुजी ने मुझे डॉंट लगाई और बाद में बोले मैं तेरी गरमी उतार रहा था मैंने कहा गुरुजी ऐसा कुछ नहीं सोच रहा था। गुरुजी जब नाराज मूड में होते और मैं कुछ काम की पूंछता तो ठीक से जवाब देते और फिर नाराज होना शुरू कर देते और कहते मैं तुझसे काम नहीं साधना कराना चाहता हूॅं। उनका दिया काम मैं तत्काल करने में लग जाता और वे मुझे डॉंटते और कहते कि यह काम तो मैंने अभ्यास के लिये दिया था तू अभ्यास कम करता है और काम पूरा करने की ज्यादा कोशिश करता है। गुरुजी क्या सोचते थे तो मैं उनके सिग्रल समझ जाता था और जवाब देने लगता था और गुरुजी डॉंटते थे कि तू बोल तो ठीक रहा है लेकिन उस काम की मेचुअरिटी का समय नहीं आया है। मैं सोचता था कि मेरी सही बात पर क्यों डॉंट लगती है। एक बार गायत्री तपोभूमि में मेरी चोरी हो गई बैंक सर्टिफिकेट भी चले गये लेकिन गुरुजी ने कहा ठीक सब पूरा हो जायेगा। सो अचानक किसी ओर की लाकर की चाबी बनना थी मेरी भी बन गयी एक आफीसर मिल गये तो सर्टीफिकेट जो खोये थे डुप्लीकेट बन गये। उन दिनों शंकरदयाल शर्मा पोस्टल मिनिस्टर थे मुझे याद आया कि रावण को जो बड़े तप में मिला था विभीषण को छोटी मित्रता से मिल गया। मैंने गुरुजी से कुछ मॉंगा तो नहीं पर जो विचार किया वो पूरा हो गया। गुरुजी का कहा कि विश्व गायत्रीमय हो जायेगा मुझे आभाष हो गया जब एडिनगार्डन और नेल्शन मंडेला ने सारे विश्व में गायत्री मंत्र सुनाया। गुरुजी ने कहा था कि मैं बड़ी ताकतों को टक्कर दूॅंगा। उपाध्याय भाई साहब ने बताया कि मेरी मॉं जिनकी ३०० ग्राम सोने की करधनी जो शायद किसी कीमत पर नहीं छोड़ती निस्संकोच मुझे बेचने को दे दी जिसकी कीमत उस समय ३६००० रुपये थी और ब्याज उस समय तीन सौ रुपया महिना मिलता रहा।

नवसारी के मगनभाई गॉंधी का शरीर छूट गया था और फिर उन्हें १० साल का जीवन मिला और ठीक दस वर्ष बाद ही उनकी मृत्यु हुई। एक बार उन्होंने गुरुजी से कहा कि मैं हिमालय किसी बड़े सन्त के दर्शन करना चाहता हूॅं। गुरुजी ने बताया कि अमुक जगह काली कमली वाले के भंडारा में एक सफेद दाड़ी वाला ठीक १२ बजे आयेगा मैंने देखा एक कोने में वह बैठा रहा और सबसे बाद में गया। मैं उनके पीछे-पीछे हो गया और दूर चलकर जब मैंने प्रणाम किया तो बोले क्या खायेगा भूख हमें लगी थी (मगन भाई) वे बोले उस पेड़ के नीचे की पत्तल उठा लो वहॉं ताजा भात दाल रखी थी। उन साधू ने कहा क्यों तेरे बड़े सन्त के दर्शन वहॉं काफी नहीं थे। मैंने गुरुजी से कहा कि मैंने उनको बिल्कुल आप जैसा ही देखा गुरुजी हसें और बोले तू ऐसा मत कहते फिरना।

सोनीपथ के मित्तल जी ने कहॉं कि गुरुजी आपको कई विद्यायें आती हैं हमको कुछ दिखाये यह मेरा कोई परीक्षा भाव नहीं है प्रार्थना है तो गुरुजी ने आइने में देवदर्शन कराये।

मुझको मोंट्रियल अश्वमेध के पश्चात् गायत्री परिवार के साथी एयरपोर्ट पर सारी व्यवस्था कर नो एंट्री एरिया तक छोड़ गये मेरा एक्साइज क्लीयरेंस कार्ड पासपोर्ट चेक पर ही रह गया और मुझे बोर्डिंग नहींकरने दिया और जब तक मैं बनवा कर लाया तब तक फ्लाट छूट गयी। स्टाफ छूट रहाा था कि अचानक एक फ्रेंच महिला आयी और मुझे साथ ले जाकर न केवल न्यू टिकिट इशू कराया लेकिन प्लेन का सामान भी रीलोडिंग कराकर दूसरी एक आधे घण्टे बाद की फ्लाट पर व्यवस्थित रूप से पहुॅंचा दिया।

१९ दिसम्बर १९९८ को मैंने अपने छोटे भाई दिलीप कुमार दत्त जो कि डब्ल्यू एचओ के एक ब्रांच के डायरेक्टर रहे हैं का इंटरव्यू लिया जो इस प्रकार है।

सन् १९६० में मैं अपने बड़े भाई अमल कुमार दत्ता के साथ गुरुजी से मिलने मथुरा गया। घियामंडी में गुरुजी एक खटोले पर बैठे हुये थे उन्होंने पता लगाया तो लोटे में थोड़ा सा दूध था गुरुजी ने कहा आधा दूध आधा पानी मिलाकर दिलीप को चाय पिलवाओं। तभी मैंने सोच लिया कि चाय पिलाने वाला व्यक्ति मेरा गुरु बनना चाहिए। उससे पूछा तू क्या करता है। मैंने कहा गुरुजी मैं बहुत ऊधमी विद्यार्थी रहा मैंने बी०काम की परीक्षा तो दे दी पर बुक कीपिंग के पेपर में सही जवाब लिखकर काट दिया गुरुजी ने कहा मैं सही कर दूंगा और मैं सच में पास हो गया। पास किया और प्रिंसपल की पिटाई के विषय में मुझे कालेज से निकाल दिया। वह कहते हैं कि अन्य कालेज में भी तुझे एडमीशन नहीं मिलेगा गुरुजी ने कहा जहाँ-जहाँ तूने ऊधम किया है वहाँ माफी माँग तेरा एडमीशन करा दूँगा। मेरे बड़े भाई के साथ मैं इंदौर रहने लगा और उसी समय मेरा क्रिश्चन कालेज में एडमीशन हो गया।

मैं नियमित रूप से क्षेत्रों में जाता रहा। एक बार मेरे पास बिल्कुल पैसे नहीं थे और मुझे मथुरा जाना था मैंने अपनी साईकिल बेच दी पर गया। मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मुझे कुछ भी नहीं आता। गुरुजी ने कहा प्रायमरी स्कूल के शिक्षक को कुछ आना थोड़े चाहिए। थोड़ा सीख ले थोड़ा बता दे। दो चार श£ोक याद कर लें। बस मैं यही करता था सामने ब्रह्मदण्ड रख देता था और जो जैसा गुरुजी से सुना बोल देता था।

एक बार टोली में मुझे हनुमान जी के मन्दिर की प्राणप्रतिष्ठा के लिये कहा गया। टोली में कोई कर्मकाण्ड नहीं जानता था मैंने सोचा गायत्री मंत्र से प्राणप्रतिष्ठा करा दूं पर लोग क्या कहेंगे। बिना हनुमान जी के मंत्र के हनुमान जी की प्रतिष्ठा कैसे बहुत परेशान था इतने में गॉंव वाला आया हाथ जोड़कर बोला पण्डित जी प्राण प्रतिष्ठा नहीं करा पायेंगे क्योंकि मन्दिर की छत गिर गई।

एक बार हमको फूलन देवी के इलाके में भेज दिया। डर लग रहा था कि कोई पूंछ न ले कि तुम ब्राह्मण हो कि ठाकुर पर मैंने ज्ञान विज्ञान कीबात कही लोगों को प्रवचन बहुत अच्छा लगा और मेरा जीवन बदलने लगा।

मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मुझे हाथ देखना आता है जीवन में मैं कभी पैसे नहीं लूॅंगा आप मुझे आशीर्वाद दे दो कि जो बोलूँ सही हो जाये। गुरुजी ने अपना हाथ दिखाकर कहा देख हाथ मुड़ने से रेखाये बनतीहैं इसमे कोई सार नहीं है हाँ ये ठीक है तू बाल देखकर भी कुछ बोल देगा तो सही हो जायेगा। मैं रायगढ़ में परिवार नियोजन अफसर था डाक्टर पी०सी०अग्रवाल जी ने पूछा दिलीप बता मेरे लड़का होगा कि लड़की अचानक मेरे मुँह से निकला डाक्टर साहब न आपके लड़का होगा न लड़की। बस तभी उसका छोटा भाई दौड़ता आया भावी सीढ़ियों से गिर गई और एवार्सन हो गया। उसकेबाद मैंने दो साल तक कोई हाथ नहीं देखा। डर लग गया मुँह से कुछ भी निकल जाता है गुरुजी सही कर देगे बात कठिन हो जायेगी।

सन् १९६१ में रीवा बस से आ रहा था ड्रायवर के पीछे की सीट पर बैठा था मैं पालथी मारकर बैठ गया और गायत्री मंत्र जपने लगा मैंने देखा गुरुजी माताजी बैठे हैं ओर माताजी कह रही हैं यह बेटा गया गुरुजी ने कहा नहीं अचानक बस एक पेड़ से टकरा गई ड्रायवर और मेरे अगल-बगल के कई व्यक्ति मर गये और मुझे कोई खास चोट नहीं आयी। जब गुरुजी ने मिला तो उन्होंने कहा यह तेरा नया जीवन है।

मेरी पत्नी पुष्पा ने गुरुजी से कहा गुरुजी इनका तबादला भोपाल से न हो बच्चों कीपढ़ाई करानी है गुरुजी ने कहा इसको जाने दे जहाँ तबादला हो पर तू कभी भोपाल से बाहर नहीं जायेगी। और वही हुआ लगभग तीस वर्ष से परिवार भोपाल ही है।

मेरा बड़ा लड़का विभू ने एम०एस०सी० किया और गुरुजी के पास आकर बोला कि मुझे बिजनिस करना है। उसने कहा मेरे पास कोई पैसा नहीं है। तुझे कुछ आता है गुरुजी अभी पढ़कर निकला हूँ पर मेरे पास हिम्मत बहुत है। गुरुजी ने कहा अच्छा हिम्मत तेरी बाकी सब मेरा। माताजी से एक रुपया ले ले और आज वह भोपाल में क्लास वन गवर्मेन्ट कान्ट्रेक्टर बनने के पास काफी पैसा कमाया और अब रसिया में यूक्रेन प्रांत में एक बड़ा विजनेस होटल चला रहा है वह हमेशा अपने वालिट में गुरुजी का एक रुपया रखता है और कहता है मुझे पैसे की कभी कमी नहीं पड़ती और कोई बड़ा मददगार मिल जाता है।

दिलीप कहता है कि मैं बिहार में एक बार एक अघोरी बाबा से मिला वह लाश के टुकड़े खाते थे मुझसे बोले बिटवा दूधवा मियेगा। मैं डरा बोला चाय पी लूँगा फिर पूँछा तू क्या करता है मैंने कहाँ मैं पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य का शिष्य हूॅं और हाथ जोड़कर बोले वे तो बहुत बड़े हैं मुझे तो उनके दर्शन करने में भी अभी तीन जन्म लगेगे।

जातक भृगुसंहिता में मैंने ५०० रुपये देकर अपनी कुण्डली दिखाई वे बोले तुम्हारे दो बेटों मेंसे एक का ही जीवन है पर गुरुजी हमें देवास में कह गये थे कि तेरे घर ठहरकर मैं तेरे बच्चों को पूरा जीवन दे जा रहा हूॅं। भृगु संहिता में यह भी बताया कि तुम्हारे बड़े लड़के का शादी के छै महीने बाद डायवोर्स हो जायेगा। पर शायद मेरा जप तप तो कम पर गुरुजी की कृपा आड़े आयी और मेरे लड़के का आशीर्वाद हो गया शादी पक्की हो गई अचानक लड़कीके पिता ने कहा कि शादी अक्टूबर में ही होनी चाहिए। जब कि मेरा लड़का रशिया से सितम्बर में आकर ली लौटा था इसलिये मैंने कहा कि मैं कोशिश करता हूँ पर उसको इतनी जल्दीआना कठिन होगा पर लड़की ने सीधा यूक्रेन एक फेक्स किया और टेलफोन पर बात भी की और तीन शर्ते रखी। १- शादी में सारी शर्ते हमारी माननी होंगी २- शादी के बाद तुम्हारे माता-पिता से हमारा कोई सम्बन्ध नहीं ३- शादी के बाद में सीधे यूक्रेन जाऊँगी। विवाह केन्सिल हो गया।

दिनॉंक २०-१२-९८ को मैं देहरादून गया जहाँ सुभाष नागपाल तेगबहादुर रोड पंजाब नेशनल बैंक शाखा के पास उनके मकान पर मैंने इंटरव्यू लिया जो इस प्रकार हैः-

सुभाष- मुझे धर्म और महात्माओं पर न केवल अविश्वास था बल्कि घृणा भी। मैं उन्हें धोखेबाज समझताथा। मेरे एक मित्र चंदोला जी ने शान्तिकुञ्ज वा आचार्य जी की बहुत प्रशंसा की और कहा एक बार मिल तो लो उन्होंने ही मेरा हरिद्वार का टिकट भी कटाया मैं मिला तो ऐसा लगा कि मेरा इनसे कई जन्मों का सम्बन्ध है क्यों नहीं बता सकता। मुझे आचार्य जी का कामकाज बहुत अच्छा लगा। गुरुजी ने कहा तू अपनी बुराई गिना। मैंने कहा मेरे अन्दर सारी बुराईयाँ हैं मैंने शायद सारी गिना दी। पत्नी से लड़ने से लेकर बेईमानी, झगड़ा आदि सब। गुरुजी ने कहा तूने खून कितने किये। मेरे पैर से जमीन खिसक गयी गुरुजी ने कहा तूने खून कितने किये। गुरुजी ने कहा तूने खून कितने किये गुरुजी ने कहा तो तूने कुछ नहीं किया। गुरुजी ने कहा तू हमारा काम करेगा। मैंने कहा यदि उपयोगिता होगी तो मैं समर्पण भी करूंूगा। गुरुजी बोले आज से तुझसे कोई बुरा काम नहीं होगा। हमारे वे दोस्त जो सारे गलत कामों में मेरे साथ थे बोलते थे सुभाष सातवे रोज शराब पीने आ ही जायेगा। वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि मैं उनकी संगति छोड़ सकता हूॅं मेरे पिता जिनको बाबूजी कहता था बोले कि मैंने गुरुजी को देखा नहीं पर यदि सुभाष सुधर गया तो अवश्य ही मैं उनका कमाल का इंसान मानूगा। सुभाष को कोई बदल नहीं सकता।

मैंने नौ कुण्डीय यज्ञ कराया बहुत शानदार सारे फैक्ट्री के लोग आये बस उसके बाद तोमानो गुरुजी ने मेरे अन्दर काम करने की आग लगा दी।

गुरुजी के पास मैं कम से कम एक हजार आदमी उनकी समस्या सुल्झाने ले गया होऊँगा और मुझे याद नहीं आता कि किसी की भी समस्याा न सुलझी हो और मैंने निश्चय कर लिया कि मैं बस गुरुजी का काम करूूंगा। आर्डिनेस फेक्टरी जबलपुर में सिक्योरिटी आफीसर के पद पर था सोचा अपने को सस्पेण्ड करा लेता हूॅं पर फिर ख्याल आया कि निकाल दिया इसलिये काम कर रहा हूॅं। फिर निश्चय किया कि बीस साल के बाद एक दिन भी काम नहीं करूूंगा और मैंने बिना गुरुजी से कहे नौकरी छोड़दी साथियों ने कहा बीबी और दो बच्चे है तेरे चालीस दिन बाद कटोरा लेकर भीख मागेगा मेरी पत्नी के गहने बिक गये भैस पाली उसी से खर्चा चलाया जब मैं गुजरात और अन्य स्थान पर टोली में जाता रहा हूँ। सन् ८२ से ८७ तक टोली नायक बनकर टोली में गया। मैंने १२०० अखण्ड ज्योति के सदस्य और ३५० युगनिर्माण सदस्य बनाये। मेरी छोटी बहन प्रेम पाँचवे में पढ़तीथी मैंने ४० हजार में मकान बेच दिया मैंने दोस्तों से कहा तुम नहीं जानते मेरे गुरु कौन हैं। पत्नी रोती पिताजी समझाते फिर ये तय हुआ कि चलो गुरुजी से बात करते हैं जैसा वेकहेंगे। गुरुजी ने कहा तुझे वापस नौकरी पर भेज दूं मैंने कहा नहीं मैं आपका ही काम करूँगा फिर पत्नी से बोले तुझको ये मायके भेजता बोली हाँ खाना कपड़ा देता बोली हाँ अब परेशान तो नहीं करता नहीं इसे मेरा काम करने दे तू दखल मत दे मैं सब देख लूँगा और मुझसे बोले ते एक काम कर जमीन खरीद और मकान बनाकर बेच। मैंने काफी पैसा कमाया कई मकान बनाये और बेचे और जब पैसा बढ़ गया तो मैं शेयर भी खरीदने लगा पत्नी ने बहुत कहा कि गुरुजी ने आपको शेयर खरीदने के लिये आशीर्वाद नहीं दिया मैंने नहीं माना मेरा एक साथी ४० हजार रुपया लेकर भाग गया मुझे २० लाख रुपये का नुकसान हो गया। सुरेश नागर ने जब मेरे स्थिति बतलाई तो माताजी ने कहा जो लेकर भाग गया वह तो गया। पर मैं उसके पैसे का अच्छा इंतजाम कर दूंगी मेरी पत्नी ने एक साल में २४ लाख का अनुष्ठान किया और पूर्णाहुति में उधार लेकर चालीस हजार रुपया खर्च किये अब मेरी स्थिति बहुत अच्छी है लगभग ९० प्रतिशन उधार पट गया गेहने मकान एफडी काफी अच्छा है।

मेरे साड़ूभाई जो दुबई में रहते हैं उनके लड़के को ब्रेन ट्यूमर हो गया और माताजी के आशीार्वाद से ८ साल हो गये अभी ठीक है जबकि सारे इलाज व डाक्टर असफल हो चुके थे।

मेरे मित्र भोला सूरजपुर के उनको तेंदूपत्ते का ठेका मिला पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ने दस लाख रुपये लेकर लिया हुआ ठेका केंसिल करा दिया। हाईकोर्ट में भोला हार गया। मैं गुरुजी के पास गया वे सूक्ष्मीकरण साधना में थे। और जब लौटकर आया तो भोला सामने खड़ा था मैंने उसकी फाईल ली और फिर गुरुजी के पास जाने लगा तो मैंने कहा गुरुजी ने कागज मगाये हैं। गुरुजी से दो लाइन बात की गुरुजी ने कहा ठीक कर दूंगा। सुप्रीम कोर्ट में वह जीत गया और जब मुझे मिला तो साष्टांग प्रणाम करने लगा।

एक लड़की दुबली पतली मिडिल पास। गुरुजी के पास ले गया बोला गुरुजी इसे नौकरी दिला दो। और उसे एएनएम की नौकरी कुछ ही दिनों में मिल गयी।

२३-१२-९८ को मैंने प्रहलाद जी शर्मा बल्गेरिया टैक्समेको का इंटरव्यू लिया फोन नं० ५३९१७५३ उन्होंने बताया सन् १९७३ में एक दिन मैं पूजा कर रहा था अचानक मैंने एक जाग्रत स्वप्र देखा कि गुरुजी और माताजी बिल्कुल सुनहले रूप में आये और मुझे दीक्षा दी। जब मेरी आँखें खुली तो एक विशेषता मैंने देखी कि मेरे अँगूठे में अत्यन्त मनभावन सात्विक सुगन्ध आने लगी। जो सात दिन तक बनी रही। किसी भी तरह वह कम नहीं हुई और उन दिनों मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था केवल सुगन्ध का आनन्द लेता रहा। गुरुजी से मैं सन् १९७६ में मिला। मेरे छोटे बच्चों को गोद में लेकर गुरुजी ने कहा यह बेटा मुझे दे दे और तू मेरा काम कर। मैंने एक यज्ञ किया जिसका खर्चा सोलह हजार पाँच सौ अंठावन रुपये हुआ और मेरे पास केवल १५५५८ रुपये थे। मेरे आफिस का एक आदमी सबेरे पॉंच बजे दरवाजा खटखटाया और कहा एक बुड्डा आदमी धोती पहने मुझसे बार-बार कह रहा है कि प्रहलाद शर्मा को एक हजार रुपया देकर आओ और वह जबरदस्ती दे गया।

मैं एक जगह यज्ञ कराने गया तो जैसे ही मैं एक डब्बा उठाने के लिये खड़ा हुआ कि ऊपर का टाड़ पूरा का पूरा गिर पड़ा जिसमें लोहा लक्कड़ और आदमी की खोपड़ियाँ थीं। वह कोई तांत्रिक व्यक्ति रहा होगा। सबने सोचा कि मैं पूरी तरह तब गया होऊगा पर मैं कुछ सेकेण्ड पहले ही उस स्थान से हट गया था।

एक दिन यज्ञ में मूसलाधार वर्षा हो रही थी मैं ढपली लेकर खड़ा हो गया और एक गाना गाया एक तुम्ही आधार सदगुरु कार्यक्रम में लगभग २५० महिलायें और पुरुष थे अचानक पाँच मिनट के अन्दर न केवल पानी पूरी तरह रुका बल्कि धूप छा गयी।

सन् १९६६ में गुरुजी लखनऊ आये और ५९सी मसानीनगर सुन्दरबाग हमारे मकान में दो दिन रहे उस समय हमारी काकी सास कलकत्ते से आयी थीं उनके पति हमेशा से पेप्टिक अल्सर के बीमार थे और बहुत दर्द होता रहता था गुरुजी ने कहा आज के बाद कभी दर्द नहीं होगा। २७-१२-९८ को श्रीमती पल्ली गुहा ने बताया कि उनके पति को २० साल तक जीवन के अन्त तक कभी दर्द नहीं हुआ।

बानो बहन जे भट्ट १२ बी ब्लाक ५ रूम २ कलकत्ता-७ सन् ७२ में शान्तिकुञ्ज आयी थीं। गुरुजी का भाषण सुनने पीछे बैठी थीं जब गुरुजी आये तो उन्होंने उनको सामने बैठने के लिये कहा ताकि ठीक सुन भी सकें और देख भी सकें। भाषण पश्चात् बानो बहन ने गुरुजी से अपनी साधना के कुछ अनुभव बताये। तो गुरुजी ने कहा कि २० वर्ष तक यही साधना अपने अखण्ड दीपक पर करती रहो तुमको वाकसिद्धि प्राप्त होगी। और अब वह इस शक्ति से सम्पन्न हैं। अभी-अभी पुनीत भाई संचानी से जयराम बाटी एक के पहले कहा कि इस यज्ञ में तुमको गायत्री माँ के दर्शन होंगे दिनॉंक २५-१२- ९८ को इस १०८ कुण्डीय यज्ञ की भीड़ में पुनीत मुझसे बोले चलिये डाक्टर साहब चाय पीते हैं मैंने कहा अच्छा और हम लोग साथ तीन कदम चले होंगे कि कही वह छूट गये। और चाय की दूकान पर पहुॅंचे एक पंद्रह सोलह साल की लड़की पुनीत भाई बतलाते हैं जिसके चेहरे पर एक अपूर्व सात्विकता ओर आँखों मेंतेज था मेरे पास आयी और बोली मुझे चाय पिलाओ उसने चाय पी और कहीं दूर चली गयी। दिखी नहीं। पुनीत जी कहते हैं मेरे अन्दर ऐसा अनुभव हुआ कि वह गायत्री या काली माँ का ही रूप था।

दिनेश कुम्हरा और उनकी पत्नी गुरुजी से मिलने गये। तो सुप्रीम कोर्ट के वकील आसरे जी से बोले कि तूने शेर देखा है। यह मेरा शेर है आगे क्या काम करता है देखना। और कुम्हरा जी व उनकी पत्नि से बोले कि अभी मैं तुझे निचोड़ूगा। बात आयी गयी और हो गई और एक दिन वह अधिक ही निचोड़े गये। एक बड़े एकसीडेंट में उनकी बेटी की मृत्यु तथा उनकी दो तीन हड्डिया टूट गयी।

हँसमुख रावल जो चेयरमेन मसूरी नेशनल स्कूल के हैं उनने मुझे बतलाया कि एक रात मैं अपने बँगले से निकलकर करीब एक दो बजे में घूम रहा था बिल्डिंग बन रही थी अचानक गुरुजी सामने आकर खड़े हो गये। मैं सोचने लगा कहाँ बिठाऊं क्या सत्कार करूं पर गुरुजी बोले देख मैं तुझे ये बिल्डिंग का बनाने का प्लान समझाने आया हूँ। वे कहते हैं कि वह न मेरा कोई सपना था और न कल्पना। मैंने साक्षात् गुरुजी को देखा जब मैं गुरुजी से मिला तो उन्होंने कहा कि तेरे इस स्कूल को बननवाने मैं पूरी तरहतेरे साथ रहा ऐसा बताते हैं कि हँसमुख रावल जिनकी पत्नी नेरोवी में एडवोकेट जनरल हैं गुरुजी को एक करोड़ रुपया देना चाहती थी पर गुरुजी ने कहा तुम प्रवासी भारतीय हो लंदन के नागरिक हो तुम भारतीय संस्कृति आधारित एक शानदार लड़कियों का स्कूल बनवाओ।

हँसमुख रावल जी ने एक दिन मुझे बताया कि मैं अफ्रीका में था मेरा एक्सीडेंट हो गया। घुटने की हड्डी टूट गई (पटेला) बिना किसी सूचना या टेलीफोन के तीसरे दिन मेरे पास गुरुजी का पत्र आया कि तुम बिल्कुल चिन्ता नहीं करना तुम पूरी तरह से ठीक हो जाओंगे अपना काम करते रहो।

गुरुजी न केवल साधारण व्यक्ति थे लेकिन अतिसाधारण व्यक्ति थे। एक दिन वो मुझसे कह रहे थे कि मैं उज्जेन में अपने दोस्त के घर गया। मुझे पढ़ने में दिक्कत हो रही थी मेरे दोस्त ने मुझे एक चस्मा दिया कहने लगा मेरे पास यह अतिरिक्त पड़ा है उपयोग करके देखो। मुझे उससे काफी अच्छा दिखने लगा कई साल तक मैंने उसी चस्मे का उपयोग किया।

श्री अरविंद दत्ता और सिद्धार्थ ये दोनों नियमित एक हजार और पाँच सौ रुपये डोनेट करते हैं और मुझे भी एक हजार रुपया भेजते हैं जबकि मैंने कहा कि मेरे पास अपने खर्च सेकाफी अधिक पैसा है। अरविंद ने बतलाया पिताजी मैं आपको पैसे नहीं देता बल्कि गुरुजी ने मुझसे कहा था कि जो अपने पिताजी को मदद नहीं करता वह अगले जनम में बैल बनता है इसलिये सिर्फ अपने को बैल बनाने से बचना चाहता हूॅं।

सन् १९६६-६७ में अरविंद ८ साल और सिद्धार्थ चार साल का था गायत्री तपोभूमि में फूल तोड़ने की कोशिश कर रहे थे पर टूट नहीं रहे थे उधर से माताजी आयी अरविंद माताजी से बोला माताजी आप पेड़ पर चढ़कर फूल तोड़ दो माताजी बोली फूल तो कैसे तोड़ू कल इसी समय यही पर तुम दोनों मिलना मैं बहुत फूल दूंगी। दूसरे दिन बहुत सबेरे नहा धोकर पहले से ही खड़े हो गये। माताजी आयी याद से माला लायी थीं दोनों को माला पहला दी और अकड़ते हुये दोनों बेटे बोले माताजी ने माला पहनाई है यह कहानी लगभग २५ वर्ष बाद माताजी को शान्तिकुञ्ज में सुनाई। उसी समय मैंने पास खड़ी गुड़िया को दिखाकर अरविंद से कहा इन्हें पहचानते हो चुप रहा। मैंने कहा यह सतीश की लड़की है बोले अच्छा यह साधना सर पटकती रहे जन्म भर सिद्धि ऐसी नहीं भी कहीं पायेगी क्योंकि मैं केसिट भेजता रहता हूॅं।

जूनागढ़ के पथिक जी नेअपने सारे गहने बर्तन बेचकर प्रसिद्ध शक्तिपीठ संगमरमर की बनवाई। जब गुरुजी वहाँ पहुॅंचे तो कुछ थोड़ा सान से कहने लगे कि गुरुजी यह शक्तिपीठ मैंने बनवाई है। यद्यपि गुरुजी उनके शक्तिपीठ की कई जगह खूब-खूब प्रशंसा करते थे पर उस दिन बोले पथिक ये दीवाल ठीक कराले और कई साल तक वह दीवाल ठीक नहीं हुई।

अभी जयराम बाटी यज्ञ में गोवर्धन भाई के यहाँ पुनीत भाई और रमेश भाई मुझे ले गये। ये एक हजार करोड़ रुपये के मालिक आज भी हैं तथा ब्रिटिश काल में राइस किंग कहलाते थे। साधना सम्बन्धी उनसे चर्चा हुई। उनकी उम्र लगभग ८०, ९० वर्ष होगी। मैंने पूछा भौतिक उन्नति तो आपने की लेकिन आप यह बताये कि इतने लम्बे समय से आपकी साधना से आपके जीवन में क्या अन्तर आया और क्या अन्तर आता है। उन्होंने कहा कि जब कभी मेरे सामने लोभ स्वार्थ या गलत फायदे की इच्छा उठती थी तो अन्दर से जैसे ट्रेफिक लाइट चमकती है वैसे पहले पीली और फिर लाल लाइट आ जाती यानी हर समय सावधान करती संभल जाओ आगे तुम जैसा चाहो। और मेरा विश्वास है यह केवल साधना का फल है। इन्होंने दो लाख रुपये जैराम बाटी में दिये १०८ कुण्डीय यज्ञ में दिये।

सन् १९९० में मैंने एक इंटरव्यू ओमप्रकाश भाई साहब याने गुरुजी के बड़े पुत्र जिनकी उम्र उस समय ५७ वर्ष थी श्री जितेन्द्र तिवारी जो कि रामकृष्ण मिशन बैलूर के साधक रहे हैं उम्र ३२ वर्ष और एक अच्छे साधक माने जाते हैं और चार वर्ष से चंद्रायण व्रत व तपस्वी स्तर के ज्ञानी वेदान्ती हैं। १३ वर्ष से रह रहे हैं की बातचीत रिकार्ड की।

जितेन्द्र- गुरुजी को आपने पिता के अलावा उनमें अध्यात्म क्या देखा?

ओमप्रकाश जी- मैं एक साधारण व्यक्ति हायर सेकेण्डरी स्कूल का टीचर पोलिटिकल साइंस पढ़ाता हूॅं यदि आप मुझसे एक ऋषिपुत्र की तरह पूछेंगे तो मैं कुछ नहीं जानता। मैं अध्यात्म समझता नहीं इसलिये पिताजी के अध्यात्म को मैं क्या जानू। मैं यह जानता हूॅं कि पिताजी मेरे उठने के बहुत-बहुत पहले उठ जाते थे कहते हैं दो बजे और मेरे सोने के बाद ९ बजे के पहले नहीं सोते थे। पिताजी जप भी बहुत करते थे ओर पढ़ने का उन्हें शोक था।

जब मैं सन् १९३१ में पैदा हुआ तब पिताजी को स्वतंत्रता सेनानी की वजह से डेढ़ माह पूर्व ही जेल हो गई थी। उस समय श्रीभगतसिंह को फांसी लगी थी और नरम दल के काफी सदस्य गरम दल में आ गये थे।

जितेन्द्र- पिताजी की तपस्या के विषय में कुछ कहें।

ओमप्रकाश जी- देखिये एक बात मैं साफ कहना चाहता हूॅं कि मैं चार चीज में विश्वास नहीं करता।

१-आत्मा

२-परमात्मा

३-भाग्य और

४-पुनर्जन्म

़१-यदि मनुष्य के सद्गुणों को आत्मा कहते है तो ठीक है पर कोई सर्वशक्तिमान नियम से परे कुछ है मैं नहीं मानता।

२-परमात्मा यदि नियम है तो मुझे विरोध नहीं पर यदि कोई शक्तिशाली व्यक्ति है तो मैं नहीं मानता। भाग्य यदि कोई लिखता है तो मुझे विश्वास नहीं। पर यदि वह परिश्रम का फल है तो मुझे स्वीकार है। पुर्नजन्म को मैं नहीं मानता पर जन्म तो सबो के सामने साफ ही है। जहाँ तक तपस्या का सवाल है मैं कमरतोड़ परिश्रम को तपस्या कहता हूँ और इस प्रकार की तपस्या पिताजी हर काम में करते थे। चाहे वह बातचीत करना हो पूजा हो सलाह हो देश सेवा हो व्यवहार हो या योजना। यदि नैतिकता ओर शालीनता अध्यात्म है तो वह उनमें थी। घर पर खाने की कमी हो तब भी एक-एक पैसे मूल्य की किताब का प्रकाशन उन्होंने किया मैं उसे तपस्या मान सकता हूँ।

समाज आज जिसे धर्म कहता है मेरा उससे कड़ा विरोध है स्टेलिन की पुत्री स्वेतलाना अमेरिका चली गयी। वहाँ उसका एक इंटरव्यू लिया गया कि तुम विश्व की महानतम नेता की पुत्री हो अपने पिता के विषय में क्या कहना है। श्वेतलाना बोली कि स्टेलिन विश्व के क्रूरतम व्यक्ति हैं। मैं जब चार वर्ष की थी तब उनसे परेशान होकर मेरी माँ ने आत्महत्या कर ली। पिता यदि अपने बच्चे को सीने से चिपटाकर कम्युनिज्म के विषय में कुछ विरोध दिखाता है तो माँ का यह कर्तव्य है कि वह सूचना दे और पति को कड़ी सजा दिलाये। ये कम्युनिज्म है। लगभग १० हजार व्यक्तियों को मेरे पिता ने इसलिये कत्ल करा दिया कि वे कम्युनिज्म विरोधी थे या कहीं दूर दराज विरोध करने की सम्भावना थी। दुनियाँ उन्हें सर्वहारा कहे मैं नहीं। न मैं ऐसा पार्टी को मानता हूॅं न मैं ऐसे धर्म को जो अपनापन और प्यार खो दे।

मैं अपने में अध्यात्म में लेश मात्र भी नहीं मानता पर जब कभी मैंने लड़के-लड़की, बुड्डे-बुड्डी को घर पर पढ़ाया है तो न कभी मैंने ट्यूशन ली और शब्दों के बीच में जो पढ़ाया है वह केवल वही है जिसको मैँने अपने जीवन में आचरण में उतार लिया है। ओमप्रकाश भाई साहब ने जब देखा कि उनके पढ़ाये बच्चों को नौकरी नहीं मिलती तो स्वयं रेडियो ट्राजिंस्टर रिपेयर करना सीखा और अपने स्कूल के बच्चों को फ्री रिपेयर करना सिखाया ताकि अपने पेरों पर खड़े हो सकें।

एक प्रश्र मैंने भी पूछा क्या हमारी तरह आप अपने पिताजी से कष्ट दुख दूर करने सफलता प्रमोशन पाने की बात करते हैं। उन्हेांने कहा मैंने जब कभी प्रमोशन की बात की तो गुरुजी ने कहा योग्यता बढ़ाओ डिवीजन सुधारो हाँ अपने सारे कष्ट दुख माताजी से जरूर कह देता था। और उन्होंने मुझे माँ का ही प्यार दिया। मेरी गलतियों पर भी वो केवल प्यार ही देती रही। मेरी माताजी की मृत्यु तो बहुत कम उम्र में ही हो गयी थी।

सन् १९८९-९० में मैंने एक इंटरव्यू श्री पहाड़िया जी का लिया जो इस प्रकार है यह मेरे पास कैसेट में रिकार्ड भी है।

वे कहते हैं कि गुरुजी ने मुझे बतलाया कि किसी पिछले जन्म में उनका बड़ा भाई रहा हूॅं ओर मैं बेईमान था उनके हिस्से की जमीन व पैसा मैंने ही हड़प लिया इसलिये वैश्य परिवार में पैदा हुआ हूॅं। यह बात उन्होंने तब बतलाई जब सन् १९४० में अचानक मेरे पास अखण्ड ज्योति आई कि हम चार भाई थे ओर अब मैंने फिर तुमको ढूढ़ लिया है। उस समय अखण्ड ज्योति का वार्षिक मूल्य एक रुपया पचास पैसा था। उसमें यह अपील भी थी कि इसमें क्या विषय और होना चाहिए सुधार या कमी की सलाह दें। मैंने लिखा मेरे पास पैसे नहीं है जवाब आया पहाड़िया जी यह व्यावसायिक पत्रिका नहीं मैँ तो परिवार बनाना चाहता हूॅं जिसमें प्रेम हो सहयोग हो। पत्रिका आती रही।

जनवरी सन् १९४० में फ्रीगंज आकरा के विश्राम घाट के पास १० रुपये माह किराये का एक मकान लेकर गुरुजी रहने लगे। एक व्यक्ति सारे पते सामान पैसे लेकर भाग गया और उसने अपनी पत्रिका गायत्री नाम से निकाली। फिर गुरुजी ने मकान बदलकर १५ कमरों वाला १५ रुपया महीना का घियामंडी में मकान लिया। जो एक विधवा ब्राह्मणी का था। उसने पहले बता दिया था कि इसमें कोई रहता नहीं क्योंकि भूत रहता है।

९ जून १९४३ में मैँ गुरुजी से मिलने गया। कारण यह था कि किसी पण्डित जी ने मुझे कहा कि तुमको साढ़े सात साल का शनि लगा है। और तुम जल्दी मर जाओगे। मैंने दीक्षा भी नहीं ली थी तो मेरी माँ भी पीछे लगा करती थी। मैं एक साथी के साथ बिना कुछ सूचना दिये मथुरा गया। किराया ५ रुपये था गुरुजी की परकाया प्रवेश मैस्मेरेजिम के अभूतपूर्व उपाय पढ़कर मैँ उन्हें कोई तांत्रिक समझता था। स्टेशन से दो आने किराये का ताँगा और १० पैसे में खाना खाकर हम पहुँचे। उन दिनों घियामंडी में केवल घी और भूसे की दूकान हुआ करती थी। बड़ी मुश्किल से गली मैं दरवाजा मिला। कुण्डी खटखटायी आचार्य जी लालटेन लेकर नीचे उतरे बोले पहाड़िया जी आ गये। हमारे हाथ से थेले गिर पड़े साथी बोले यह तो बड़ा जादूगर है। अपने ने तो कोई सूचना दी नहीं। गेट में घुसते ही एक काली गाय देखी उसी को जौ खिलाकर अपच जौ के कण व दूध की छाछ पर गुरुजी ने २४ साल २४ लाख का अनुष्ठान किया था। गुरुजी ने माताजी से कहा तुम्हारे दो बच्चे आ गये इनका इंतजाम करो। खाना रहना वहीं हुआ। गुरुजी ने मुझे पूंछा जन्मपत्री लाये हो मैंने दिखाई। गुरुजी बोले शनि ग्रह करोढ़ो मील दूर है और इन करोढ़ों की आबादी वाले विश्व में तुम दो कोढ़ी के आदमी पर शनि की क्यों कर निगाह होगी। उन्होंने जन्म पत्री फाड़ दी कि आज से मैंने शनि हटाकर ब्रहस्पति बैठाल दिया है। अब मेरी बात समाप्त। तुम मेरा राई भर काम करना और मैँ तुम्हारा पहाड़ भर काम करूॅंगा। मैंने कहा यह तो बहुत अच्छा आप पहाड़ भर काम करो। पहले मेरा राई भर काम बतादो। गुरुजी बोले नं०-१ यह पेटन शर्त पहनना छोड़ दो धोतीकुर्ता पहलो २- कोई बुरी आदत जुआ शराब इधर उधर जाना बन्द करो।नहीं तो लोग क्या कहेंगे यह गायत्री परिवार का गुरुजी का चेला है। ३- हमेशा अखण्ड ज्योति पास रखो पढ़ो और सदस्य बनाओ। मैं तुम्हारे तीन जन्म की जिम्मेदारी लेता हूॅं। लड़के लड़कियों की शादी कामधंधा प्रगति आदि। तब मुझे सिविल कोट्र में ५ रुपया १३ आने महीना मिलती थी। गुरुजी बोले कोर्ट कचहरी थाना यह रिश्वत के स्थान है तुम फंस जाओगे आटे दाल की दुकान खोल लो। मुझे आठ दस रुपये माह फायदा होने लगा। नगर पालिका सदस्य के लिये मैं खड़ा हो गया। वकील बलवीर सिंह के कहने पर। जिनके पुत्र लखनऊ में मिनिस्टर हैं। मैँने गुरुजी को कोई खबर नहीं की। रिजल्ट निकलने के पहले जब मैंने खबर दी तो उत्तर आया कि तुमने बहुत गलत काम किया तुम पंद्रह बीस बोट से ससम्मान हार जाओगे। मैं तेईस बोट से हार गया। लेकिन चेयरमैन कांग्रेस का था और अधिक सदस्य दूसरे पार्टी के। इलेक्शन केंसिल हो गया। अब कि मैंने गुरुजी को पहले ही पत्र लिख दिया पत्र का जवाब आया तुम ऐसे ही जीत जाओगे। हमारे विरोध में जो खड़ा हुआ था उसने नाम वापिस ले लिया मैं सदस्य बन गया और छै महीने नगरपालिका प्रेसीडेंट रहा हूॅं।

गुरुजी का पत्र आया तुम्हारी मौत नब्बे दिन में है। मैँ इस पत्र के साथ आ रहा हूॅं। तुम संभलकर चलाना और खासकर संभलकर चलना और खासकर ट्रक आये तो सीधे फुटपाथ पर चढ़ जाना। आठ जूर को एक शादी में जाना था मैं साईकिल में गया ट्रक के दो पहियो के बीच में आ गया। ट्रक मालिक व साथियों ने खेचकर निकाला सोचा था शायद मर गया पर मुझे कोई चोट नहीं लगी एकाध स्थान पर टिंचर लगाकर मुसलमान ड्रायवर ने वही नमाज अदा की और साईकिल ठीक करा दी। मैंने घर आकर पत्र देखा वह नव्वेवा दिन था गुरुजी को पत्र लिखा। उत्तर आया मैं वापिस आ रहा हूॅं पूरी उम्र जियोगे।

मेरे और गुरुजी की उम्र लगभग बराबर थी। दो लड़के एक लड़की दोनों के दोनों की पत्नी का देहान्त हुआ पर गुरुजी ने मुझसे कहा कि मुझको तो गाड़ी चलाने के लिये शादी करनी होगी पर तुम मत करना।

बाँदा में गुरुजी का पत्र आया कि गायत्री माँ की प्राणप्रतिष्ठा करना है जिसमें २४०० तीर्थाे का जल रज तथा बारह बाल ब्रह्मचारणियों की पदरज लानी है।

राजापुर गाँव जहाँ तुलसीदास जी रहते थे बीस किलोमीटर दूर पर बाल्मीकि आश्रम तथा मनवाड़ा चरवाहा एक सिद्ध रहते थे जिनके पास चीते और साँप भी आते थे तथा झाँसी से बाँदा जो २०० किलोमीटर दूर था वहाँ पालिया का जल कहते हैँ कि जब प्रलय होगी तक यही से जल उभरेगा। उस स्थान जहाँ भरत जी रामचंद्रजी से मिले थे एक कुये में १२०० तीर्थाे का जल एकत्रित था। वहाँ का जल आदि सारी व्यवस्था करने के गुरुजी के निर्देश हुये। एक बाबूलाल जैन थे उनकी लड़की का नाम था विमला देवी। बाँदा में मैं वहीं जन्मा उन्हें नहीं जानता था पर गुरुजी ने मुझे निर्देश दिये कि उनकी इस लड़की पदरज लाना है। मैँ उनके पिता के पास गया तो बोले उसकी बात न करना। मैँ शादी की बात करता हूॅं तो मुझसे बोलती ही नहीं। मैंने कहा मुझे केवल मिलादें रविवार को मैं गया यह लड़की सूर्य प्रणाम कर रही थी बोली कौन मैंने कहाँ एक आध्यात्मिक काम है उसने बैठाया पूंछा मैंने कहा ग्यारह बालब्रह्मचारिणियों की पदरज आ गई है यदि तुम नही दोगी तो तुम्हें भी पाप होगा और सारा प्राणप्रतिष्ठा का काम रह जायेगा। एक बहुत बड़े ऋषि ने यह माँग की है पह दाहिने पैर के अंगूठे का धोवन देने को तैयार हो गई पर पैर तो पहाड़िया जी के हाथ में था। गुरुजी के माँग पर १५० से २०० पार्सल रोज आते थे अधिकांश नदियों का जल १२४ करोड़ मंत्रलेखन तथा हर दूसरे तीसरे दिन गंगोत्री का जल गुरुजी के लिये २४०० तीर्थाे के जल की व्यवस्था की गयी हम लोगों ने भी पाँच दिन का उपवास किया। दूध मेवा ओर फल की व्यवस्था थी। बनारस के पण्डित मंत्र जपते-जपते पसीना हो गये पर अरणिमन्थन सफल नहीं हुआ। पर जब गुरुजी ने नारियल की जटा लेकर दो चन्दन के काष्ठ रेशम की डोरी से मथे तो अग्रि प्रकट हो गयी। गुरुजी ने बताया था मुझे कि अग्रि src='प्रज्वलित गुरुजी के गुरुजी के संरक्षण में हुआ और यही अग्रि सारे अश्वमेध यज्ञ में स्थापित की गई।

कार्यक्रम में रोज चार टीन दूध आता था एक दिन २ टीन ही आया। मेरे साथी ने कहा आधा दूध आधा पानी मिलाकर काम चलाया जाये। मैं गुरुजी के पास गया। गुरुजी ने कहा जाओ व्यवस्था हो जायेगी। रात ८ बजे चार आदमी आये गुरुजी ने कहा था उनसे बात न करना केवल प्रसाद देना। और वे चार टीन दे गये। सन् १९५६ में नरमेध यज्ञ हुआ जिसमें विधान सभा स्पीकर आयंगर जी आये थे ओर राधेश्याम तर्ज वाले रामायण पढ़ने गुरुजी ने मुझे एक चिट लिखकर सूचित किया कि तीन हिमालय से महात्मा आयेंगे उनसे बात नहीं करना भोजन कराना। हमारे एक साथी ने उनका पीछा भी किया पर वे गायब हो गये।

यह बात मुझे पहाड़िया जी ने बतलाई जो मेरे पास केसेट में रिकार्डिड भी है वे कहते हैं कि गुरुजी ने आँख की शक्ति पर एक लेख लिखा जिसे दिखाने वो वैज्ञानिक समाज में अमेरिका गये और एक लोहे के छड़ को लाल करते ही वैज्ञानिको ने शक्ति को स्वीकारा और रोक दिया। उन्होंने एक टन वजन के पत्थर को भी हिलाकर दिखाया ऐसा वे कहते हैं।

लालता प्रसाद जी थे उनसे कहा आज नहीं कल जाना। और सचमुच उस दिन वाली बस पलट गयी। एक दिन में भी शान्तिकुञ्ज गेट पर सप्तऋषि आश्रम से आने वाली बस की प्रतीक्षा कर रहा था कि गुरुजी ने ऊपर से बुलाया और कहा कोई भी जरूरी काम हो पर आज नहीं जाओ मैंने पता लगाया आगे जाकर वह बस पलट गयी थी।

बाँदा में पहाड़ी पर आये जो बहुत चमत्कार दिखाते थे और बहुत सारे सेठ उनको घेरे रहते थे। वे अखण्डज्योति पढ़ते थे मेरा पता जानने पर सउन्हेांने कहा कि यदि पहाड़िया जी खाना बनाकर खिलायेंगे तो ही चातुर्मास यहाँ करूंगा। मै राजी हो गया। मुझसे एक दिन कहा सोलह सितम्बर को कचहरी से अपने कमरे से बाहर नहीं निकलना ओर उस दिन कलेक्टर के यहाँ आयप्रोसेशन के आन्दोलन में पत्थर फेकना लाठी चलना ओर गोलियाँ भी चली मैँ उस दिन भी खाना देने पहुॅंचा। मुझसे साधूजी ने कहा कि तुम जो चाहो असम्भव से असम्भव चीज माँग लो। मैंने कहा यदि माँगना ही होगा तो अपने गुरुजी से माँग लूंगा वे वोले प्रसाद तो लोगे मैंने स्वीकारा। उन्होंने कहा इसमें पानी पीना आँख धोना हमेशा स्वस्थ रहोगे।

मैं अपनी लड़की की शादी के लिये परेशान थाा गुरुजी को पत्र लिखा तुम्हारे मकान के पीछे ही लड़का है जो नवरात्रि में आयेगा। फोफेसर है उससे शादी हो जायेगी और यह शादी मैँ करूंगा। शादी में मैंने पाँच सात हजार रुपया खर्च किया होंगे पर बाद में मेरे पास लगभग उतने ही रुपये बच गये। मैं बहुत परेशान था मैं एक एक डेड़ डेड़ घण्टे टायलेट में बैठा रहता था कि क्या गड़बड़ी हो गई कहीं हमारे जवाई लोगों ने पैसे तो नहीं रख दियो परन्तु जब गुरुजी को पत्र लिखा मैंने तेरी लड़की की शादी की है तू चिन्ता मत कर।

श्री जे०सी० पंत सेक्रेट्री गवर्मेट आफ इंडिया इन्होंने मुझे ब्रह्मवर्चस में बतलाया कि गुरुजी ने मेरी रक्षा की मैं गुरुजी के पास आया ओर बतलाया कि गवर्मेट मुझे सरकारी काम से लंदन भेज रही है गुरुजी बोले अपनी पत्नी को ले जा। गुरुजी उसका खर्चा सरकार नहीं देगी। तू नहीं ले जा सकता क्या। ले जा सकता हूॅं तो ले जा। मुझे रस्ते में हार्टअटैक हो गया पत्नी मेरे साथा थी सारा खर्चा सरकार ने उठाया और मेरे दिल की धमनी का ब्लाक ९८ प्रतिशत था इसलिये बिना आपरेशन के बेलूनीग से मेैं ठीक हो गया। यह सब गुरुजी के आशीर्वाद की योजना थी जे०सी०पंत वो व्यक्ति है जिन्होंने मिशन का बहुत बड़ा काम किया विभिन्न विभाग के अफसरों को सरकारी खर्च में मारल ट्रेनिग के लिये शान्तिकुॅंज में भेजा।

सन् १९९१ दक्षिण भारत में हमारी टोली जिसमें ईश्वरी यादव और मनीष राम साहू थे महबूब नगर में पहुॅंची। मैंने एक इंटरव्यू ईश्वरी यादव का इस प्रकार रिकार्ड कियाः-

उन्होंने बताया कि उनकी दूकान में एक बड़ी चोरी हो गई सारा पैसा ओर अधिकतर सामान चुरा लिया गया। मैँ बहुत दुखी हुआ और पिताजाी के नाम एक पत्र छोड़कर भाग गया। पत्र में मैंने लिखा पिताजी इस चोरी से मैं शरमिंदा हूॅं पर आपको विश्वास दिलाता हूॅं कि मैं जीवन भर कभी आपकी प्रतिष्ठा को धब्बा नहीं लगने दूँगा। मैं बिना टिकिट दिल्ली पहुँचा। वहाँ मुझे मथुरा के शरन जी मिले उन्होंने बतलाया कि आज ही माताजी यहाँ हैं और गुरुजी का डाक विमोचन समारोह तालकटोरा स्टेडियम में है। मुझे वहाँ माताजी के दर्शन कराये। तथा मैंने शान्तिकुॅंज के ड्रायवर दयाशंकर से प्रार्थना की कि मुझे कही जगह मिल जाये और आप शान्तिकुँज ले चले पर उन्होंने स्वीकृति नहीं दी। मैं अन्तर्राष्ट्रीय बस अड्डा पहुँचा और वहाँ बस कंडक्टर से बात की वह मुझे बड़े प्रेम से अपना स्टाफ मेम्बर बनाकर शान्तिकुँज तक छोड़ गया। शान्तिकुँज में बाजपेई जी एवं शुक्ला जी ने कहा कि तुम तीन दिन रह सकते हो पर हम भागे हुये किसी व्यक्ति को अधिक नहीं रख सकते। पर अचानक दूसरे दिन मुझे शुक्लाजी माताजी के पास ले गये जहाँ मेरा तिलक कर दिया गया। इसी बीच मेरे एकमात्र बड़े भाई भी भागकर पहले ही शान्तिकुँज आ गये थे। हम दोनों भाई का माताजी ने तिलक किया और उसके पहले बतला दिया था कि हमारे पास दो लक्ष्मी हैं यदि तुम लोग चाहो तो घर जा सकते हो जहाँ तुम्हारी तुकान अच्छी चलेगी और पैसे वाले भी बन जाओगे पर अच्छे व्यक्ति नहीं बन सकोगे हमारे पास दूसरी लक्ष्मी तुम दोनों भाइयों के लिये हमारे यहाँ रसोई में काम करने वाली दोदेवकन्यायें हैं बड़ी गौरी और छोटी इन्दू यदि तुम इन्हें सवीकारों तो हम तुम्हारी व्यवस्था भी कर देंगे और तुम एक अच्छे इंसान भी बन सकोंगे। हमने इसीलिये तुम्हें प्रयास पूर्वक यहाँ बुलवाया है। हम पहले घबराये पर माताजी ने हर तरह का आश्वासन दिया तो राजी हो गये। माताजी ने कपड़ें गहने सब चीज की व्यवस्था की पर यह कहा कि दुपट्टा और एक सिंदूर की डिबियाँ तुम्हें अपने पैसे से लानी होगी क्योंकि यह व्यवस्था एवं आश्वासन तो तुम्हें जीवन भर के लिये देना है हमारा कुल खर्चा दोनों भाई का १५, १५ रुपये हुआ।

जब हमारी शादी यज्ञ स्थल पर हो रही थी तभी पिताजी भी ढूढ़ते हुये स्वागत कक्ष आ गये जहाँ उन्हें सूचना मिली कि तुम्हारे दोनों लड़के यहाँ पर है और उनकी शादी हो रही है। माताजी के पास आशीर्वाद लेने गये पिताजी ने कहा बच्चे मिलने की हमें बहुत खुशी है पर हम अपने घर रिश्तेदारों को क्या कहेंगे जो कोई भी नहीं है किसी ने शादी देखी नहीं है माताजी ने कहा हम उसकी भी व्यवस्था कर देंगे। शादी के बाद हम सहारनपुर से रेल पकड़ने गये तो कंडक्टर गार्ड ने कहा कि हम आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे स्लीपर की यह पाँच सीट आपके लिये ही खाली है इस प्रकार सारी व्यवस्था हो गई इसके बाद जब भिलाई अपने घर पहुँचे तो हमारी माँ और बहन दोनों ने कहा कल रात हमने तुम दोनों की शादी विस्तृत रूप से सपने में देखी जिसका हमें अभी तक आभास हो रहा है। माताजी ने यह भी कहा कि तुम दो भाई में से एक भाई घर रहना और ईश्वरी तुम्हारी शादी इन्दू से हुई है जो हमारे चौके में आठ वर्ष से काम करती है इसलिये हम उसे नहीं छोड़ना चाहते इसलिये तुम यहीं मानवता की सेवा का काम यहीं शान्तिकुञ्ज रहकर संभालों।

ईश्वरी प्रसाद जी ने यह भी बताया कि उत्तरप्रदेश के बाँदा जिले से १५ कि०मी०दूर एक व्यक्ति की दो कन्यायें १५ और १७ वर्ष की अचानक मृत्यु को प्राप्त हुई। जब गुरुजी को पऋ लिखा तो गुरुजी ने कहा मैं उन दोनों आत्माओं को एक बेटे के रूप में वापस दिलवा दूँगा अगले वर्ष ही उनको पुत्र की प्राप्ती हुई। जो तीन चार वर्ष की उम्र में गायत्री मंत्र बोलता था ओर कहता था मैं गुरुजीके काम के लिये ही आया हूॅं।द्घ

ईश्वरी प्रसाद बताते हैं कि मैंने माताजी से प्रार्थना की कि मैं ४० दिन का अनुष्ठान करना चाहता हूॅं। माताजी ने तिलक किया रक्षासूत्र बाँधा पर यह कहा कि तू जप नहीं कर पायेगा। और हुआ भी यही मुझे कोई न कोई काम सौप दिया जाता था और मैं जप नहीं कर पाया। माताजी ने कहा मिशन का काम जैसे तेरे बड़े भाई कर रहे हैं तू भी कर वही तेरा अनुष्ठान होगा।

जब एक दिन मैं टोली में जा रहा था। ओर गाड़ी मैं ही चला रहा था काफी तेज स्पीड पर और गाड़ी पलट गयी माताजी ने तभी इन्दु को बताया कि छोरा गाड़ीसे गिर गया वह बहुत रोयी तो माताजी ने कहा कि कोई चोट नहीं आयी। मैँ जब वापस पहुँचा तो बिना कुछ सुने पूछे माताजी ने जोर से डाँट लगाई कि इतनी तेज गाड़ी क्यों चलाता है। ओर सब हालचाल पूछे मैं चोट छिपाता रहा माताजी ने मेरे सिर पर हाथ फेरकर कहा कोई खास चोट नहीं है डाक्टर रामप्रकाश पाण्डे जी को दिखा देना।

हमारे दूसरे साथी मनीषराम साहू ने कहा जो कि सारंगगढ़ जिला रायगढ़ ग्राम गौड़ा पोस्ट सालर के रहने वाले हैं ने अपने इंटरव्यू में रिकार्ड कराया कि हम २६ जनवरी १९८४ को हरिद्वार में आये और संगीत विभाग में काम करने लगे। चार फरवरी को माताजी ने बुलाया ओरकहा तुम टोलाी में चले जाओ मैं न कभी रेल में बैठा था न अकेला गया था इसलिये बहुत घबराया। मेरा पेट खराब हो गया। गोविन्द पाटीदार और शास्त्री जी ने बहुत समझाया। माताजी ने कहा था कि तू चिन्ता न कर मेरा आशीार्वाद तेरे साथ है। पर मैं आशीर्वाद आदि कुछ नहीं जानता थाा मैं घर भाग गया। एक महीने बाद मैंने साक्षात रूप से स्पष्ट रूप से माताजी और गुरुजी को सामने खड़ा देखा मेरी तो जमीन खिसक गयी बोलती बन्द हो गयी। हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। माताजी ने डाट लगाई कि तुझे घर आये एक महीना हो गया तू गीदड़ की तरह क्यों भाग आयै मेरा मनोबल बड़ा जब गुरुजी माताजी लोटे तो मुझे ऐसा लगा कि वे शंकर जी और पारवती है यह दृश्य मैंने स्पष्ट देखा। फिर मेरा मनोबल बहुत बड़ा और मैं अन्य साथी श्री शिवचरण एवं सन्तराम साहू को लेकर शान्तिकुँज स्थाई रूप से आ गया।

मुझे तीन माह के लिये टोली में भेज दिया गया। और जब एक दिन मेरी पत्नी जिनको साढ़े नौ महीने गर्भ था माताजी को प्रणाम करने गई माताजी ने तभी मेरा पता लगाया टेलाीग्राम भेजकर जबकि तीन महीने में दो दिन कम थे रिलीवर देकर बुला लिया। मैँ ठीक उसी दिन पहुँचा जिस दिन माताजी अश्वमेध यज्ञ से लौटी थी तथा मेरी पत्नी अस्पताल में भर्ती थी उनका सिवेरियन आपरेशन हुआ और स्वस्थ बालक को बिना किसी कष्ट के जन्म दिया।

डॉ०शिवराम कृष्ण रेड्डी तुमरी गुंठूरका एक इंटरव्यू मैंने रिकार्ड किया जो इस प्रकार है। उन्होंने कहा सन् १९८५ में जब मैं गुंठूर में था गायत्री परिवार से मेरा सम्पर्क हुआ। अखण्ड ज्योति देखकर मुझे ऐसा लगा कि इसके लेखक ही मेरे आदर्श के शिखर हैं। और मैेने हिन्दी साहित्य को तेलगू भाषा में अनुवाद करना शुरू कर दिया। मुझे ऐसा लगने लगा कि गुरुजी का काम ही मेरा काम है। मैंने एक सौ आठ दीपयज्ञ किये एवं पहली पत्रिका आठ पेज की केवल ५०० रुपये की पूॅंजी से तेलगू भाषा में गुरुजी के लेखों का अनुवाद कर निकाली। पहली बार एक हजार प्रतियाँ छपवाई। सन् १९९० में मैंने जीवनदान का संकल्प लिया। और अपने क्षेत्र तथा दूर-दूर गुरुजी के कार्यक्रम यज्ञ कराने जाने लगा। सन् १९९२ की गुरुपूर्णिमा में मैंने पीले कपड़े पहनने का संकल्प् लिया और क्लीनिक भी इन्हीं कपड़ों में जाता था फिर नाराकूडू में एक शक्तिपीठ स्थापना के लिये मेरी पत्नी नं कंगन दिये जिसकी कीमत उस समय १० हजार रुपये से अधिक थी दान दे दिये। सन् १९९४ के एक यज्ञ में तेलगू भाषी महिलाओं ने अपनी अंगूठियाँ हार और पाँच से दस हजार रुपया दान दिये जिससे एक लाख रुपये की जमीन नाराकूडू में खराीदी जहाँ आज स्वावलम्बन विद्यालय विद्यामन्दिर हवन का स्थान शक्तिपीठ और मेरा स्थाई निवास भी है। नियमित अखण्ड ज्योति निकलती है। पेड़ लगवाये और किसी प्रकार की फीस नही ली जाती। आसपास के गाँव के लोग नियमित हवन करने आते है। सितम्बर १९९४ में गुरुजी के भाषणों का तेलगू अनुवाद के ओडियो और बीडियो बनाये जिसकी हजारों कापियाँ बिक चुकी हैं।

डॉ० जी०काशीनाथ गौड़ मेडागिडा महबूब नगर ४१११६ पी०पी० आन्ध्रप्रदेश मेरा सम्बन्ध माताजी को लिखे एक पत्र के उत्तर पाकर सन् १९९१ में हुआ। माताजी का पत्र पाकर मैं क्लीनिक में ही रो पड़ा मैंने एक ११ कुण्डीय यज्ञ का कार्यक्रम रख शान्तिकुञ्ज से टोली बुलवायी पर डाक्टर प्रणव ने टोली भेजने में मजबूरी दिखाई तो मैंने उन्हें पत्र लिखा इफ यू केंसिल माई प्रोग्राम आई विल कमिट सोसाइट डाक्टर साहब ने टोली भेज दी। मैं तीन टाईम खाने वाला व्यक्ति खाना तो क्या टाइम से घर पर चाय भी नहीं पीता था मुझे बहुत सोने की आदत थी पर मुश्किल से तीन चार घण्टे सोता था। नौ बजे सोने वाला व्रूक्ति बारह एक बजे सोता था। कार्यक्रम बहुत प्रभावशाली रहा। कार्यक्रम समाप्ति के बाद महबूब नगर के एक दूकानदार ने बतलाया कि मैं तो सड़क से जा रहा था ओर धर्म, महात्मा कुछ नहीं मानता था पर जब मैंने कार्यक्रम स्थान की तरफ देखा तो जहाँ महात्माओं की टोली बैठी थी वहाँ एक प्रकाश छाया हुआ था। और उसको देखकर ही मैं सब कुछ भूल गया और मैंने दीक्षा ले ली और उसके बाद से वो नियमित रूप से गायद्घत्री परिवार के कार्यक्रम में आने लगा।द्घ एक और व्यक्ति जो कि रास्ते से जा रहा था गायद्घत्री मंत्र की व्याख्या से मुग्ध होकर हमारा एक बड़ा सहयोगी बन गया उसने भी कहा कि मैंने एक विशेष प्रकार का प्रकाश का प्रभाव यज्ञ स्थल के आसपास देखा वह भी हमारा सहयोगी बन गया है।

हमारे मामाजी जो कि रोडवेज के मैंनेजर महबूब नगर में है वे तीन चार रोज से बिना छुट्टी लिये यज्ञ में पूरा सहयोग देते रहे उसी समय उनके विभाग के चीफ इंस्पेक्शन के लिये आये और उन्होंने सारे अफसरों की फाईल देखी और रिमार्क लगाये पर मामाजी की फाइल नहीं देखी। वे कहते है ये तुम्हारे गुरुजी के कार्यक्रम का ही प्रभाव था नहीं तो मैं बड़ी मुशीबत में पड़ जाता।

श्री हीरसिंह राजपुरोहित जो २५ वर्ष से हैदराबाद में रह रहे हैं कुटीर साधना के लिये शान्तिकुञ्ज आये और जब अखण्ड ज्योति में सूर्य उपासना का लेख निकला तब से नियमित वे उपवास ओर ग्यारह माला रोज करने लगे। दो साल में उनको एक विचित्र अनुभव नियमित रूप से होने लगा और वह यह था कि प्रतिदिन जब सूर्य भगवान को जल चढ़ाकर वह लालचन्दन घिसते हैं तो प्रत्यक्ष रूप से गुरुजी और माताजी को एक हवाईनुमा सिंहासन में आते देखते हैं। जिनको वे प्रणाम करते हैं तो माताजी के चरण का तो स्पर्श अनुभव करते हैं पर गुरुजी का नहीं। वे उनके चरण दूर से भी धोते हैं उनके साथ अन्य शान्तिकुँज के विशिष्ट कार्यकर्ता डा० प्रणव और शैलजीजी के साथ रोज दर्शन करते हैं।एक अपूर्व फूलों की सजावट तथा भोजन का कार्यक्रम भी वह स्पष्ट देखते हैं। हीरसिंह जी ने यह बतलाया कि सन् १९९० में जब चेतराम रहबर जो कि हरियाड़ा हिसार में डिप्टी डायरेक्टर एजूकेशन रह चुके हैं। हैदराबाद कार्यक्रम में आये तो वे उनका भाषण सुन रहे थे और पाँच मिनिट तक उन्होंने रहवर जी के स्थान पर गुरुजी की आवाज उन्हीं के शब्द और उन्हीं का उच्चारण सुना बाद में वह फिर वह रहवर जी की आवाज बन गयी। उपरोक्त सारे इंटरव्यू के वक्तव्य मेरे पास रिकार्डिड हैं।

श्री शिवप्रसाद मिश्रा जी ने बतलाया कि एक दिन मैं एक परिवार को गुरुजी से मिलाने ऊपर ले गया। मातापिता उनका बेटा और नवविवाहित पुत्रबधु। पिताजी ने अपनी दुकान की समस्या माताजी ने स्वास्थ्य की और लड़के ने अपनी नौकरी की बात कही और गुरुजी उनको समाधान और आशीर्वाद देते रहे। बहुत ने भी कुछ ऐसी आकृति बनाई कि गुरुजी पूछने लगे बोल बेटी तुझे भी कुछ कहना है संकोच में बोली गुरुजी कोई खास नहीं गुरुजी एकदम बोल उठे अच्छा आप लोग उठिये मैं अपनी बेटी से बात करूँगा। अब माता-पिता और पति को उठना ही था कि बहू बोली गुरुजी मेरी सास परेशान करती है गुरुजी बोले मेरे पास एक मंत्र है तेरी सास बिल्ली हो जायेगी। बेटी ने अपने कान लगभग गुरुजी के पास लगा दिये ओर गुरुजी जोर से चिल्लाकर बोलते हैं तू अपनी सास की हाँ में हाँ मिलाया कर। वह एक बार प्रणाम चाहती है तू तीन बार किया कर एक कप चाय की जगह तीन कप पिला तुझको डाँट भी लगाये तो बाहर पड़ौस में तू बोला कर कि मेरी सास देवी है उनको गायत्री सिद्ध है तू तो पढ़ी लिखी है नाटक भी अच्छा कर लेती होगी अपने जीवन में छै महीने एक साल नाटक नहीं कर सकती। और एक बात सुन जिसने तेरे पति को पैदा किया है उसकी झूटी सच्ची सेवा करने में तेरा कुछ नहीं घटेगा। एक और बड़ी बात तेरी सास तुझसे २५ साल बड़ी होगी और २५ साल पहले मर जायेगी।

एक दिन शान्तिकुँज में मैंने गुरुजी से पूछा कि गुरुजी लगभग पूरी नियमितता के साथ मैं शक्तिसंचार साधना सन् १९६० से जो आपने स्वयं हिमालय से लौटकर हम पाँच व्यक्तियों को बतलाई थी कर रहा हूॅं यह ठीक है कि मन नहीं लगता या कम लगता है पर मुझमें कोई राई रत्ती प्रभाव हुआ मैं नहीं समझता। गुरुजी बोले अच्छा तू बता विटामिन खाने से कुछ फायदा होता है। मैंने कहा हाँ गुरुजी यदि विटामिन की कमी हो और वही विटामिन दिया जाये तो अवश्य फायदा होता है। जैसे यदि विटामिन ए डी की कमी हो जिसकी वजह से रात को कम दिखता है रतौंध या ०६ तो दिखने लगता है। गुरुजी बोले मालुम पड़ता है क्या कि फायदा हो रहा है मैंने कहा नहीं। गुरुजी ने कहा देख उपासना साधना भी ऐसी ही है। और एक बात जब तक तुझे मालुम नहीं पड़ता तब तक ही ठीक है जिस दिन मालुम पड़ने लगेगा उस दिन पगला जायेगा। अधिकतर लोगों को ऐसी ही होता है तू बेटा इससे बचे रहना। लोभ, मोह, घमंड न आये यही साधना की फलश्रुति है न संख्या न मात्रा न समय बात मेरी समझ में आयी।

यतीन्द्र दत्ता का सन् १९७४ में एक बहुत बड़ा कार एक्सीडेंट हुआ जिसमें एक अमेरिकन बुढ़िया के लगभग ६ फ्रेक्चर हो गये तथा कार तो पूरी तरह नष्ट हो गई। कोर्ट में केस चला और यतीन्द्र का वकील बहुत घबराया था कि कम से कम सजा डीपोर्टेशन तो ही जायेगी। तथा इंश्योरेंस तथा जो भी बैंक बेलेस है कम्पनशेसन में देना होगा। किसी भी तरह की बचने का आशा नहीं थी। और कोर्ट का डिसीजन चौथे दिन होने को था। यतीन्द्र ने पत्र लिखा पर उसको गुरुजी को पोस्ट भी नहीं कर पाया और वही गया। यतीन्द्र से जब एक्सीडेंट का कारण और स्थिति पूंछी तो उसने कहा मेरी गाड़ी टकराने के पहले ही मैं सब भूल गया और मुझे कुछ भी नहीं मालुम। वकील इसको एक स्पष्ट बहाना मान रहा था। पर जब डिसीजन हुआ तो जज ने पुलिस प्रासीकूटर से पूंछा कि इस केस में कोई दम नहीं है। तुमको कोई आब्जेक्शन। वकील ने पूछा कि आपने ये कैसे कहा जज साहब बोले कि जिस दिन मेरे कोर्ट में फाइल आयी थी मैं वह स्थान देखने गया जहाँ एक्सीडें हुआ वहाँ पर पहले से ही कुछ तेल फैला हुआ था इस कारण गाड़ी का डिस्बेलेन्स ड्रायविंग गलती नहीं है रोड फाल्ट है इस कारण म्युनिस्प्ल कार्पाेरेशन को इंश्योरेंस की सारी रकम पे करनी होगी औरयतीन्द्र दत्ता को बिल्कुल बेकसूर माना जाता है। इस प्रकार गुरुजी की यह अप्रत्यक्ष सहायता मिली।

कानपुर के साधना शिविर प्रज्ञापुराण में मैं और श्रीपर्णा गये वहाँ कानपुर के कार्यकर्ता सेंगर जी ने बताया कि मैं पिछले शिविर में मैं शान्तिकुँज गया था। मैं एक अच्छा तैराक भी हूँ और कई पारितोषिक पा चुका हूँ। शान्तिकुँज मंच से कई बार मना करने पर भी मेरे मन में बार-बार गंगाजी जाने का मन होने लगा। और मैं अपने दो साथियों के साथ गंगाजी स्नान करने गया और वहाँ गंगा में कूंदने पर बहुत देर बाहर नहीं आया। साथियों ने परेशान होकर शान्तिकुञ्ज खबर की गुरुजीके निर्देश पर बलराम भाईसाहब वीरेश्वर जी शान्तिकुँज की टीम को लेकर पहुँचे और करीबन ४५ मिनिट तक तलाश करने पर कुछ पता नहीं लगा अन्त में हर की पेढ़ी पर जालन लगाने की व्यवस्था की गई और मेरे जीवित रहने की किसी को आशा न थी पर एक घण्टे बाद करीबन दो किलोमीटर दूर में नदी से बाहर निकल आया ओर पैदल चलकर गीले कपड़े में शान्तिकुँज पहुँचा। जब मैं डूब रहा था तो मुझे ऐसा लगा कि मेरे गुरुजी मेरी पीठ पर बैठे है और कह रहे है सेंगर तू हिम्मत न हारना बचा तो मैं लूगा ही और मैं लगभग न जाने कितने समय तक उस भवर से जूझता रहा और आगे गंगा के बाहर निकल आया। आगे वे कहते है कि मेरा एक एक क्षण और एक एक अंग मिशन के प्रति समर्पित है।

मैंने बलराम भाई साहब से एक इंटरव्यू देने की प्रार्थना की जिसको उन्होंने आज दिसम्बर २५, २६ को स्वीकार किया जो इस प्रकार है।

वे कहते हैं कि आज मुझसे शान्तिकुञ्ज जब पूछे जा रहे हैँ मैं एक बड़ी कठिन स्थिति में अपना दायित्व निभा रहा हूँ एक तरफ मेरी व्यक्तिगत जिम्मेदारी दूसरी तरफ कठिनाइयों ओर चुनौतियों का सामना और मेरे प्रयास कहीं असफल तो कहीं घाटे में गिरते नजर आ रहे हैं। जब तक गुरुजी माताजी थी मेरा काम तो उनके मार्गदर्शन में चलना था आज मैं जब अपनी पुरानी बीतें दिनों को जो मथुरा शान्तिकुँज में बीते उनको बस पूज्य गुरुजी के आशीष का इतिहास ही कह सकता हूँ।

मेरी लम्बी कहानी ४४ वर्ष पूर्व आरम्भ होती है जब में इंटरमीटियट का छात्र था चंदेरी के आसपास मुझे एक कागज का टुकड़ा मिला जो पुराना फटा सा था मैंने उसको उठा लिया और उसको पढ़ने लगा उसमें गायत्री मंत्र के विषय में लिखा था उस छोटे से कागज के टुकड़े पर इतना कुछ लिखा कि कि मुझे लगा कि हमारे प्राचीन ऋषियों ने जो कुछ गायत्री के विषय में जाना पाया है वह सब कुछ उस कागज में अंकित है कोई भी उसको पढ़ता बिना आकर्षित हुये नहीं रह सकता था। और मैं भी नहीं रहा। मुझे अपने आप आभास हुआ कि गायत्री उपासना कोई बड़ी साधना है। इंटरमीडियट के बाद मध्यप्रदेश में मैंने खादी बोर्ड में नौकरी कर ली। वहाँ मुझे जब भी परेशानी होती तो मुझे महामंत्र याद आता क्योंकि उसमें लिखा था कि समस्या चाहे शाराीरिक हो चाहे पारिवारिक या सांसारिक गायत्री मंत्र से सब कुछ सम्भव है। मैंने अखण्ड ज्योति सम्पादक के नाम एक पत्र लिखा तथा गायत्री महाविज्ञान मंगाया। उस दिन के बाद से हमारा गुरुजी से नियमित पत्रों का आदान प्रदान होता रहा। सन् १९५८ में सहस्रकुण्डीय गायत्री यज्ञ की आयोजन की सूचना मुझे मिली और मैंने जाने का मानस बनाया। पर उसमें यज्ञ भाग लेने की कुछ शर्ते थीं जैसे साधक स्तर का जीवन सवा लाख गायत्री जप और २४०० मंत्र लेखन। मैंने संकल्प भर दिया। इसी बीच सर्विस छोड़कर मैंने भारतीय सेना में भर्ती हो गया और मुझे प्रशिक्षण के लिये नासिक भेज दिया गया। मेरे जीवन का पहला चमत्कार यह हुआ कि एक दिन मैं शाम को मंत्रलेखन कर रहा था और मिलिट्री परेड में पहुँचने में मुझे थोड़ी देर हो गई। मेरे प्रशिक्षक ने मुझे न केवल डाँट लगाई लेकिन सबों के सामने बहुत अपमानित भी किया और साफ शब्दों में कहा कि मिलिट्री में धरम-करम के लिये कोई स्थान नहीं है मैं चुप रहा और मुझे जो दण्ड दिया वह भुगता लेकिन मेरी आकुलता बनी रही और दूसरे ही दिन किसी मामले में वे प्रशिक्षक न केवल हमारी यूनिट से बाहर गये लेकिन टर्मिनेट भी हो गये। दूसरा प्रशिक्षक एक सरदार जी आये जिसको उस जाने वाले प्रशिक्षक को कहा कि आपकी यूनिट में एक खतरनाक व्यक्ति है जिसके अभिशाप के कारण मेरी यह दशा हुई आप उससे बचना सरदार जी ने मुझे बुलाया और कहा कि बताओ तुम क्या करते हो मैंने कहा गायत्री जप। उन्होंने कहा तुम जो चाहो सो करो बस अपनी डियुटी बनाये रखना हम कोई विघ्र नहीं डालेंगे और हमारी शुभ कामना है। मिलिट्री में छुट्टी मिलना सबसे बड़ी समस्या होती है और मैं हजार कुण्डीय यज्ञ मं मथुरा जाना चाहता था। और दूसरा चमत्कार यह हुआ कि मेरी बेसिक ट्रेनिंग समाप्त हुई और एडवांस ट्रेनिग के लिये चुन लिया गया। और दोनों के बीच २८ दिन का फासला था और यह ठीक वही समय था जब यज्ञ होने वाला था यानी छुट्टी की समस्या हल हो गई। सन् ५८ के इस यज्ञ में मैंने गुरुजी का दर्शन किया मालुम नहीं में गुरुजी के चरण स्पर्श कर पाया कि नहीं पर विराट कार्यक्रम देखकर मेरी निष्ठा दृढ़ हुई। सन् १९६१ में मेरा पोस्टिंग कश्मीर हो गया। उस समय सैनिक जीवन के जो भी अवगुण होते हैं मुझमें मौजूद थे लेकिन कि जैसा गुरुजी ने अखण्ड ज्योति में लिखा उच्चस्तररीय साधना के लिये पात्रता की जरूरत होती है मैंने एकान्त में एक संकल्प लिया और उस संकल्प को आज तक निभा रहा हूँ यह गुरुजी का आशीर्वाद ही है। यह गुरुजी का ही आशीर्वाद रहा कि मुझे मिलिट्री में भी अफसरों का सहयोग मिलता रहा। गुरुजी ने मुझे शक्ति संचार साधना के लिये बुलाया और बताया कि बिना किसी शक्तिवान से जुड़े अध्यात्म फलित नहीं होता। मुझे व्यवस्था का काम सौपा गया सही में मैं केवल गुरुजी के निर्देश पालन करता था उसको चाहे आप व्यवस्था कहें या कुछ भी कहें। मैंने अपने भव और निष्ठा एक किताब में लिखी जिसका नाम है देवदूत आया और हम पहचान न सके। आगे की बातचीत आगे करेंगे।

तारकेश्वर श्रीवास्तव निर्माण विभाग। उन्होंने अपने इंटरव्यू में बतलया कि मेरे पिताजी ही मुझको गायत्री परिवार से जोड़ा। सन् १९५६-५७ में मेरा परिचय हुआ और मुझे आभास हुआ कि यह मेरे गुरु भी है और ईश्वर भी। मेरा एक जटिल हार्निया था डाक्टर भी जिसको आपरेशन करने में घबरा रहे थे पर बड़ी सरलता से हो गया। मेरा एक कार एक्सीडेन्ट हो गया और मुझे शरीर के कई स्थानों पर चोट आयी और सारा शरीर पट्टी से बँध गया। गुरु जी इन दिनों वहाँ आये थे और मुझको देखने अस्पताल आये और बोले क्या बेकार पड़ा रहता है उठ पट्टी वट्टी बाँध रखा है और मैं सचमुच उठ गया यह काम करने लगा यह मेरे जीवन का एक अद्भुत आश्चर्य है। सन् १९८८ में मुझे एक बड़ा हार्टअटैक हुआ मैंने स्वप्र जैसी स्थिति में देखा कि मेरा सिर माताजी की गोदी में रखा है और मैं कह रहा हूँ माताजी हम चले जाये माताजी ने कहा तू कहाँ जायेगा तुझे बहुत काम करना है। फिर अभी कुछ दिनों पहले मैं ब्रह्मवर्चस गया। लगभग सबेरे के छै साड़े छै बजे होगे कि में पशीने से लथपथ वही गेट पर गिर गया। ऊपर से डाक्टर अशोक तिवारी आ रहे थे और थोड़ी देर में गंगाजी से डाँ० ए०के०दत्ता आ गये और तभी हार्ट की दवा देकर मैं थोड़ा स्वस्थ हुआ तो शान्तिकुँज से गाड़ी बुलाकर मुझे अस्पताल भेज दिया। माताजी की कृपा से ही मैँ पूर्ण स्वस्थ हो गया। मैं अनुभव कर रहा था कि माताजी ने मेरा पीठ सहलाया और मैं स्वस्थ होता गया। तारकेश्वर जी कहते हैँ कि शान्तिकुँज के कण-कण में अध्यात्म का अपूर्व स्पंदन है। नीलधारा के पास पायलट बाबा ने बतलाया कि गुरुजी के गरुजी सर्वेश्वरानंद जी अक्सर कर शान्तिकुँज आते हैं वे कहते हैं कि मैंने कई बार सजल श्रद्घा और प्रखर प्रज्ञा पर गुरुदेव माताजी को देखा और वे हमेशा ही यहाँ रहते हैं। इन दोनों के बीच दादागुरु को भी मैंने देखा। उन्होंने यह भी कहा कि गुरुजी के पाँच वीरभद्र तथा हिमालय की कुछ सत्तायें यहाँ आती रहती है जिसमें मथुरादास जी भी है पर गुरुजी हमेशा ही यहाँ रहते हैं। गुरुजी केवल २००० तक नहीं सदियों तक यहाँ रहेंगे ऐसा उन्होंने हमें बतलाया। मेरे लड़के की शादी भी गुरुजी के आशीार्वाद से असम्भव को सम्भव करते हुये हो गयी। गुरुजी माताजी पूर्णिमा अमावश्या को दीपयज्ञ में आते है और महावतार बाबा और दादागुरु अक्सर आते रहते हैं। मुझे जब नौकरी नहीं मिली थी तब गुरुजी ने मुझसे कहा कि तू पेपर देख और मैंने एक जगह प्रतिवेदनभेजा मुझे नौकरी मिल गयी।

एक दिन एक व्यक्ति धोती कुरता पहनकर गुरुजी के पास आया और मिशन की प्रशंसा करते हुये बात करने लगा। गुरुजी ने कहा कि तू अपने काम से आया था वो काम तो तेने कर लिया अब तू और क्या जानना चाहता है। वह आदमी घबराया डाक्टर प्रणव कहते है कि वह मेरे पास आया और बोला यह गुरुजी मेरे मन की बात कैसे जान लेते हैं मुझे कोई नहीं जानता सही में मैं सीआईडी हूँ।

एक दिन सन् १९६३-६४ में मैँ घियामंडी गया और नीचे आफिस में मैंने एक सौ रुपये का नोट बलराम सिंह परिहार सिंह जी को दिया और फिर बाद में ऊपर चला गया। गुरुजी मुझे खाना खिला रहे थे और मेरे मन में बार-बार यह उठाता था कि यह सौ का नोट गुरुजी के पास पहुँचेगा या नहीं। यह सारे विचार मेरे मन में थे अचानक खाते-खाते गुरुजी ने बलराम भाई साहब को बुलाया कि दत्ता को १०० रुपये की रसीद दे दो। उस दिन मुझे अपने ऊपर बहुत शर्मिन्दा होना पड़ा और आगे ऐसा न सोचने का मानस बनाया।

डाक्टर प्रणव सुनाते हैं कि एमबीबीएस पास करने के बाद गुरुजी ने कहा कि देख तू विदेश तो जा सकता है पर तेरे जीवन की धारा भौतिक बनकर रह जायेगी और एक बड़ी बात २६ वर्ष की उम्र में तेरी अल्पआयु मृत्यु है अगर तू यहाँ आ गया तो तुझसे बड़े काम होने की सम्भावना भी है और तेरे जीवन की रक्षा हो जायेगी।

एक दिन एक व्यक्ति केन्टीन में चाय पी रहा था मैं अपने बेटे सिद्धार्थ के साथ भी वहीं खड़ा था। वह व्यक्ति आया और बोला आप कहाँ से आये हैं मैंने कहाँ मैं यहाँ स्थाई सदस्य हूँ मेरा नाम डाँ० अमल कुमार दत्ता है और मेरा यह बेटा सिद्धार्थ एमटेक एमई इंजीनियर है। वह बोला मैं भी इंडस्ट्रियल इंजीनियर हूँ और पिछले एक साल से मेरा मन आत्महत्या करने का बना रहा। मेरी पत्नी हमेशा कहती रही कि तुम एक बार शान्तिकुँज हो आओ मैं उसकी सुनता नहीं था। पर अभी-अभी मैंने निश्चय कर लिया कि मैं आत्महत्या करूंगा तो सोचा कि पहले शान्तिकुँज हो आऊ फिर बोले डाक्टर साहब मेरे दिमाग में बहुत प्रश्र उठते हैं क्या आप बतायेंगे कि माइण्ड क्या है। मैंने कहा आपरेशन आफ ब्रेन। दृष्टि क्या है। मैंने कहा आपरेशन आफ आई और शक्ति है आपरेशन आफ मशल्स वे बोले जिस प्रश्र के लिये मैं इतना परेशान था आपने एक सेकेण्ड में जवाब दे दिया। वे बोले मेरा एक प्रश्र और मैंने कहा पूछिये ऐसे तो मैं डाक्टर हूँ लेकिन मैं गुरुजी के साथ और मिशन से लगभग ३५ वर्षाे से हूँ इसलिये मैं उन्हीं को याद करके उत्तर देने का प्रयास करता हूॅ तो बोले कि यहाँ आकर मैंने अब निश्चय कर लिया है कि मैं अब आत्महत्या नहीं करूँगा मैंने कहा क्या यह वातावरण का प्रभाव है मैंने कहा कुछ हद तक यह भी है और बड़ा कारण यह है जो मैं अभी आपसे कहने वाला हूँ बोले कहिये मैंने कहा आप जो जाब कर रहे हैँ उसमें आप ऊपरी आमदनी कितनी करते हैं बोले बहुत ज्यादा क्योंकि इंडस्ट्रीज की पोलूशन आदि का सर्टीफिकेट व्हेरीफिकेशन मैँ करता हूँ मैंने कहा आपका हत्या न करने का कारण यह है कि एक अच्छा विचार आपको मिला लेकिन यदि आपने गलत चीज को दूर करने का साहस नहीं जुटाया तो आपका अचेतन आपको अवश्य परेशान करेगा। उन्हें बहुत अच्छा लगा और बहुत देर तक हम लोग बात करते रहे।

दिनॉंक १२-१-९९ को मेजर विजय कुमार खरे जी का इंटरव्यू ब्रह्मवर्चस में लिया गया उन्होंने बताया कि मेरे बड़े भाई को स्ट्रेंगुलेटिड हार्निया हुआ जो फट गया। और उनकी मृत्यु हो गई। उनके तीन बच्चे थे। हमारे पिताजी अत्यधिक शोकाकुल थे तो किसी ने बताया कि आप मथुरा चले जाइये। मेरे पिताजीमुझको लेकर मथुरा आये। हम लोग गुरुजी से मिले मेरे पिताजी ट्रेजरी में हेडक्लर्क थे। गुरुजी ने पूछा यह लड़का क्या करता है। पिताजीनेकहा इंटरमीडियट में पड़ता है। यज्ञोपवीत हो गया क्या। पिताजी ने कहा हमारे यहाँ शादी में होता है। गुरुजी बोले नहीं मैं कल इसका यज्ञोपवीत करूंगा। मैंने बीएससी किया औरफिर रुड़कीसे इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में बीई जब मैं पहली बार गुरुजीसे मिला तो काफी लम्बे समय तक गुरुजी मेरीतरफ बिना कुछ बोले देखते रहे इसके बाद मैंने आर्मी ज्वाइनकर ली और दिल्ली में मेरा पोस्टिंग हो गया। मैंने शिविर के लिये छुट्टीमाँगी तो कमाण्डिंग आफीसर ने मना कर दिया उसी समय ब्रिग्रडियर इंस्पेक्शन के लिये आये और मेरे क्रियाकलाप से बहुत प्रसन्न हुये और पूछने लगे तुमकोकोई तकलीफ तो नही ंक्या चाहते हो मैंने कहा मुझे १० दिन की छुट्टी चाहिए तभी उन्होंने मेरी छुट्टी की व्यवस्था कर दीओर मैं शिविर मेंचला गया। सन् १९७१ में मैंने मिलिट्री से डिस्चार्ज ले लिया मथुरा में गुरुजी के भाषण के बाद में गया ओरमैंने कहा कि गुरुजीमैंने मिलिट्री की नौकरी छोड़ दी है मेरे साथ मगन भाई भी थे अब मैं बिजनेस करना चाहता हूँ गुरुजीबोले बिजनेस तो तेरी किस्मत में ही नहीं है तूने नौकरी छोड़कर बड़ीगल्तीकी। मैं बहुत घबराया पर गुरुजी ने कहा अच्छा जा सन् १९७१ से सन्१९८६ तक मेरी फेक्टरी इंडियन केमीकल इंडस्ट्री बिल्कुलबीमार चली और मेरे १२ लाख रुपये का कर्ज ३२ लाख रुपये हो गया। एक दिन मैंने पेपर में देखा लिखा था कि इंडियन केमिकल इंडस्ट्री फार सेल याने मेरी कंपनी सरकार द्वारा बेची जाने का ऐलान। मैं पेपर लेकर गुरुजी के पास गया और बोला गुरुजी इसमें तो मेरीबड़ी बदनामी है। गुरुजी इधर से उधरठहल रहे थे बोले खरे मैं तेरे दरवाजे पर हाथी बाँध दूँगा इस नीलामी के लिये जो कुछ तुझे करना पड़े कर ओर मैं नीलाम न होने की सरी व्यवस्था कर दूंगा। ७ मार्च १९८६ को मैं श्री अरविंद सिन्हा जो मेरे क्लास फ्रेन्ड थे उनके पास गया ओर कहा कि अरनावार से मैं जो खाद बनाता हूँ ऐसा कोई अच्छी खाद बनाने का उपाया बताओ उन्होंने कहा कि सुगर मिल का एक प्रोडक्ट है उससे बहुतअच्छीकवालिटी की खाद बन सकती है। मैं बाराबंकीगया सुगर मिलके मैंनेजर से मिला उन्होंने कहा किचार पाँच टन खाद बेच सकते हैं वो बहुत अच्छी तरह से मुझसे मिले और कहने लगे कि तुम मुझे नहीं पहचानते मेंने कहा नहीं बोले एक दिन शान्तिकुञ्ज में तुम सीढ़ियों से उतर रहे थे ओर मुझे किसीने ऊपर जाने से मना कर दिया था पर तुम मुझे गुरुजी के पास ले गये ओर मेरी समस्या सुलझ गयी। फिर तो उन्होंने मेरा सम्मान किया औरये कहा कि बुडवल की सुगर फेक्टरी में आग लग गयी है और वहाँ ढेरो से ये मेटेरियल पड़ा है। वहाँ मुझे २५०० टन वुडवलमिल और उसकाखाद यानी आसनार से आक्जेलिक ऐसिड बनाने का काम उसी स्तर पर करता था। डी०एफ०ओ० मिस्टर नेगी ने १०० टन खाद का आर्डर दिया। ६५० रुपया प्रति टन के हिसाब से खरीदा। मैंने सोचा कि मार्च तक ६५ हजार रुपया मिलेगा और तभी उनका एक आदमी आया और बोला साहब का तबादला हो गया आप अभी पेमेन्ट ले जाओ। १०० टन खाद का आर्डर और मिला। मैंने वह सारा पैसा और एक साठ हजार का पोस्ट डटेड चेक गवर्मेन्ट लोन में दे दिया इसके बाद एक के बाद एक आर्डर मिलते गये और तीस जुलाई तक मुझे १७ लाख रुपये का फायदा हो गया। मैं जब भी दिल्ली आया करता था तो हतरद्वार जरूर आता था गुरुजी मुझे शान्तिकुँज का क्षेत्र दिखाते थे कहते थे यहाँ ट्यूबवेल लगना है मैंने कहा मैं लगा दू गुरुजी गुरुजी ने कहा लगादे। साइकिले लानी है मैंने कहाँ सौ साइकिले मेरीओर से। जब भी आता था पचास हजार से एक लाख रुपये मैं गुरुजी के चरणों मेंअर्पित करता था। सन् १९८० में हमारे घर पर रामकृष्ण परमहंस मां शारदामणि का चित्र है एक दिन मैं देख रहा था कि अचानक कभी वह गुरुजी माताजी का चित्र बन जाये और कभी वापिस रामकृष्ण देव का। मैं बहुत घबराया कि मुझे कोई दिमाग की खराबीतो नहीं हो गई मैं भागा भागा गुरुजीके पास गुरुजी बोले शाम को तीन बजे आना। बड़ी मुश्किल से वह समय आया गुरुजी ने अपनी ऊगली से छातीदिखाते हुये कहा यह जो है राममकृष्ण परमहंस और नीचे जो बैठी है वह है शारदामणि। मैंने पूछा मेरा आपसे क्या सम्बन्ध है। गुरुजी ने कहा कई जन्मों से सम्बन्ध है और मुझे पिछला जन्म बतलाया। मैंने पूछा आपका पिछला जन्म क्या था मेजर खरे बोले मैं यह नही बताऊगा। गुरुजी बोले अबमैं शरीर छोड़कर जा रहा हूँ जिसमें यह शरीर बाधक है। ऐसा बोलते बोलते खरे जी की आँखों मेंआंसू आ गये उन्होंने रोते-रोते कहा गुरुजी मैं भी आपके साथ चलूँगा गुरुजी बोले मेरी उमर तक पहुँचने पर आना। मुझे लगा कि ८० वर्ष जीवन का मेरा बीमा हो गया। मेरी एक महत्त्वपूर्ण घटना यह हुई गुरुजी बोले माँग क्या माँगता है। मैंने कहा जो माँगेगे देंगे आप। उन्होंने कहा हाँ वे बहुत प्रसन्न मुद्रा में थे मैंने कहा मुझे आप पर श्रद्धा बनी रहे और अपने काम में सफल होता रहूँ। गुरुजी ने कहा जब तक तू रचनात्मक काम करेगा तेरे संकल्प पूरे होंगे। गुरुजी बोले खरे तू तो मेरा जमनाप्रसाद बजाज है मैंने अपनी तरफ से गुरुजी से और कुछ नहीं माँगा। दूसरी घटना गुरुजी ने अपने अहमदाबाद कार्यक्रम में बुलाया बड़ा विशाल कार्यक्रम था मैं प्लेन से पहुँचा बलवंत भाई कोठी पर अपार भीड़ थी गुरुजी से मिलना चाहा पर डाँट कर भगा दिया। फिर मैंने दूसरे से पूंछा कि गुरुजी ने मुझे बुलाया है गुरुजी ने सुन लिया वे स्वयं सीढ़ी से नीचे उतरने लगे और मैं ऊपर चढ़ने लगा आधे रस्तें में मिले और मुझे लीलापत जी के साथ ठहरा दिया। जब गुरुजी कही बाहर जा रहे थे चार पाँच व्यक्ति थे इसलिये मैं रुक गया पर गुरुजी ने गाड़ी में बैठते ही जोर से चिल्लाया कहाँ भाग गया खरे मैं जल्दी जल्दी सामने आया और गुरुजी ने मुझे बैठाल लिया गुरुजी पर फूलों की वर्षा हो रही थी उसमें से बहुत से फूल मेरे ऊपर भी गिर गये ऐसा कहते कहते उनकी आँखों मेआँसू आ गये। अहमदाबाद कार्यक्रम में बहुत सारे लोग काम कर रहे थे। गुरुजी मुझसे बोले ये तो स्वयंसेवक का काम है जो तू देख रहा है मैं तुझसे बड़े काम कराऊंगा। शिमला में माताजी जब अश्वमेध में गई और मैं मिलने पहुँचा तो माताजी ने मेरा तिलक कर दिया और कहा कि लखनऊ का अश्वमेध यज्ञ तुझे करना है कलावा बाँधा मैं सोच भी नहीं सकता था कि इतना बड़ा काम मैं कैसे करूंगा। पर माताजी नेकहा मेरा आशीार्वाद तेरे साथ रहेगा। योगेन्द्र सिंह प्रिसपल सेक्रेट्री गवर्मेन्ट को मैंने भूमि पूजन के लिये बुलाया। और उस समय गवर्नर रूल्स था उन्होंने मुझे दो फोन नंबर दिये कि सात और साढ़े सात के बीच में इस फोन पर मुझसे सीधे बात कर सकते हो और मैं तुम्हारी सब कठिनाइयाँ दूर करने का वायदा करता हूँ। जमीन का बहुत बड़ा झगड़ा हुआ डीएम कमिश्रर किसी तरह नहीं देना चाहते थे पर जब मैंने योगेन्द्रसिंह जी से कहा यदि आपको कोई कठिनाई हो तो मुझे गवर्नर से मिला दे पर उन्होंने स्वयं सारा समाधान खोज लिया। उसके बाद गवर्नर बोरा माताजी को लेने स्वयं ने स्टेट हवाईजहाज भेजा। जब भी मैं गुरुजी से मिलता था तो दो तीन मिनट उनके पैर सहलाता था सन् १९९० में एक दिन मुझे बहुत बेचेनी हुई मैं जानता था गुरुजी किसी से नहीं मिल रहे है फिर भी शान्तिकुञ्ज पहुँच गया माताजी से मिला तो माताजी ने कहा कि गुरुजी तीन चार बार पूछ चुके हैं कि क्या लखनऊ की गाड़ी लेट है खरे को मेरे पास भेजना। मुझे ऊपर भेज दिया। लगभग ४५ मिनिट तक गुरुजी मेरी ओर मैं गुरुजी की ओर देखता रहा। फिर बोले कुछ चाहिए। मैंने कहा मुझे कभी आप अलग न करना। गुरुजी के लिये वे बोले आई सी हिम एज ए लिविंग गाड। उन्होंने कहा मैं मदद करूंगा अब जब कभी भी मुझे कोई दुख कष्ट होता है तो मुझे ऐसा लगता है कि मेरे शरीर और मन पर लगे हुये एक एक तीर निकाल देते हैं।

सुरेश भदौरिया स्थाई चालक शान्तिकुञ्ज सन् १९८८ में मैं शान्तिकुँज से परिचित हुआ इन दिनों मेरी इंडिया इलेक्ट्रोनिक रेडियों के नाम से रिपेयर की दुकान चलती थी तभी मैं श्री घनश्याम यादव कृषि विस्तार अफसर से मिला जिन्होंने मुझे अखण्ड ज्योति और शान्तिकुञ्ज का परिचय शनैः शनैः बातचीत में देते रहे मुझे गायत्री महाविज्ञान एवं वसीयत एवं विरासत पुस्तक ने बहुत प्रभावित किया और मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरे जीवन का यही लक्ष्य है। मैंने एक महीने का शिविर में आने की अनुमति प्राप्त कर ली गुरुजी के इस आवाहन पर कि जाग्रत आत्माओं को काम करना है मुझे अपने लिये ही लगा। मेरी माँ ने मुझे बताया था कि तुम्हारा पिछला जन्म एक सन्त का था और इस जन्म में भी तुम्हें वही काम करना होगा। जब सन् १९८९ में मैँ घर जा रहा था तब मेरे एक मित्र सुबोध जो साहित्य स्टाल में काम करते थे अचानक उनके मुँह से निकला कि जल्दी लौटना तुम्हें महाकाल का रथ चलाना है क्यों ऐसा कहा नही मालुम पर शायद कोई दिव्य प्रेरणा ही होगी। मैं १० दिन बाद हीलौट आया दुकान का सारा सामान जो लगभग २५००० का होगा थोड़ा बहुत बेचकर स्थाई रूप से शान्तिकुँज आ गया। जब १९८९ में ५ वर्ष और १२ वर्ष के लिये संकल्प कराया गया तब मैं पहली टोली में ही १२ वर्ष का संकल्प करने वालों में था मुझे स्पष्ट लगता था कि मेरे जीवन को धन्य बनाने का यही रास्ता है।

सन् १९८९ में गर्मियों के दिन थे मैं प्रवचन हाल में जहाँ कई भाई सो रहे थे सो गया दो बजे रात मैंने देखा कि गुरुजी सोने वालों के बीच में घूम रहे हैं खादी का धोती कुर्ता जैकेट पहने हैं और हरएक के मुँह की तरफ दोनों हाथ पीछे करके झुकझुक कर देख रहे हैं मैंने सपने में ही उनको प्रणाम किया और प्रणाम करते ही मुझे लगा कि एक करेण्ट का प्रवाह मेरे अन्दर जाने लगा। मैं घबराकर उठा और बहुत देर तक वैसा ही अनुभव करने लगा मुझे विश्वास हो गया कि गुरुजी शान्तिकुँज के कण-कण में विद्यमान है मैंने स्वयं अपने परिवार को धन्य माना। मैं कई बार ऊपर गुरुजी की गोष्ठी में गया पर कभी कुछ बोल न सका उनकी आँखों के तेज को कभ्ज्ञी देख न सका। मेरे तो बस जितनी देर बैठता आँसू बहते रहते और मुझे ऐसा लगाता कि गुरुजी कह रहे हैं कि तुम्हें मेरा ही काम करना है इसीलिये तुम्हारा जन्म हुआ है भटकना मत। मैं ऐसा अनुभव करता कि कोई दिव्य लोक से परमात्मा या दिव्य पुरुष बैठा है कोई मनुष्य नहीं। मैं मन ही मन एक हीप प्रार्थना करता कि मुझे अहंकार न हो और आपके ही रास्ते में ही चलू चाहे मुझे कोई भगाये भी पर मैं २००० तक शान्तिकुँज की ही सेवा करूंगा।

मेरी माँ बताती है कि मेरा जन्म ९ महीने में नहीं ७ महीने में ही हुआ तथा मेरे साथ एक कन्या का जन्म भी हुआ जिसका वजन ७ पौण्ड था पर वह जीवित न रही और मैं एक गोल बहुत कड़े छोटे से कवचनुमा घेरे में था। जब उसे तोड़ने के लिये हसियाँ से मारा गया तो वह इतना कड़ा था कि छटक कर दूर गिर गया तब गाँव की महिलाओं ने कहा कि इसको ऐसे नहीं एक-एक तह काटनी चाहिए सम्भव हो इसके अन्दर कोई जीव हो। ७, ८ परत के बाद एक बहुत छोटा सा बच्चा निकला जो मैं था। मेरी माँ और मेरी बड़ी बहन ने कपड़ों में लपेटकर गरम रखकर रुई से दूध पिलाकर सालो तक देखभाल कर बड़ा किया। माँ कहती थी कोई मुझ पर बैठ न जाये क्योंकि मैं बहुत छोटा था मेरे दोनों हाथ हाथ जोड़ने की मुद्रा में जुड़े हुये थे। जब मैं दो साल का हो गया तो मेरी माँ मुझे एक साधू के पास ले गई और मेरे जन्म की सारी घटना सुनाई तो उन्होंने कहा तुम्हारा यह बच्चा पिछले जन्म में सन्त था और जन्म नहीं लेना चाहता था उसका कहना था कि मैं बार-बार जन्म लेकर माँ का ऋणी नहीं होना चाहता। भगवान ने कहा कि जन्म तो तुम्हें लेना पड़ेगा क्योंकि आगे तुम्हें भगवान का कुछ काम करना है पर तुम माँ के ऋणी नहीं होगे इसलिये कवच के अन्दर माँ से पोषण न लेकर सूक्ष्म पोषण से मेरे शरीर में प्राण प्रवाह होते रहे। जब मैं गुरुजी से मिला तो मुझे लगा यही मेरा लक्ष्य है। मैं फकीर साधू तो नहीं बना पर गुरुजी की गाड़ियों का चालक बन गया मेरी माँ ने कहा तेरा जन्म इसलिये हुआ और उन्होंने खुशी-खुशी मुझे तिलक लगाकर बिदा किया।

शिव प्रसाद मिश्रा जी के साथ मैं गुजरात राजस्थान उज्जैन एक एक दिन के संस्कार महोत्सव में गया था। भारी बरसात हो रही थी। लगभग हजार ट्रकों का जाम लगा था और उज्जैन में सबेरे ही कार्यक्रम देनाथा लगभग रात के २ बजे थे सब लोग गाड़ी में सो रहे थे। अचानक मैंने गाड़ी के लुकिंगग्लास मे देखा पीछे ट्रक वाला गाड़ी को आगे बढ़ाते ला रहा था और मुझे गाड़ी में टक्कर देने ही वाला था किस्मत से मेरी गाड़ी गैर में थी मैंने तेजी से गाड़ी मोड़ी सड़क से नीचे खेत में उतारी और वह पीछे वाला ट्रक मेरे सामने वाले ट्रक से इतनी जोर से टकराया कि उसमें रखा ट्रेक्टर नीचे लुड़क गया और न केवल एक्सीडेंट बचा जाने मुझेमें कहाँ से इतना साहस आया कि गाड़ी को खेत में कुदाता हुआ सारे जाम को पार करता हुआ आगे निकल गया और कार्यक्रम में समय पर टोली को उज्जैन पहुँचा दिया मुझे लगा कदम कदम पर गुरुजी साथ रहते हैं। ऐसी ही एक घटना जब घटी जब मैं देहरादून से ऋषिकेश जा रहा था ५०, ५५ कि०मी० की स्प्ीड पर ब्रेक फैल हो गया। आगे पीछे गाड़ियाँ थीं मैंने किसी तरह दो गाड़ी के बीच में से गाड़ी निकालकर देहरादून रास्ते पर गाड़ी चला दी जो खाली था और एक्सीडेंट बच गया।

मेरे पिताजी वृद्ध हो गये थे मेरे बड़े भाई शादी के बाद कोई जिम्मेदारी नहीं संभालते थे और मेरी छोटी बहन की शादी का उत्तरदायित्व मेरे पिताजी ने मुझको सौपा जबकि मेरी सामर्थ्य शान्तिकुँज के एक स्वयंसेवक की होने पर बहुत ही कम है। मैंने आदरणीय शैल जीजी से जाकर अपनी पूरी कहानी सुनाई तो वे बोली भाई साहब आप थोड़ा प्रयास करना माँ की गुरुजी की कृपा से सब हो जायेगा। और अचानक मेरे छोटे जीजाजी के भाई जो ग्रेजुएट भी है बातचीत में शादी ठीक भी हो गई और मेरी बहन बहुत सुखी है।

१६-१-५१ को मैं ओमप्रकाश भाई साहब यानी गुरुजी के बड़े लड़के के साथ आँवलखेड़ा गया। वहाँ उन्होंने अपने पुराने बचपन के मित्र दरोगा जी से मिलाया उन्होंने बतलाया कि मैं पुलिस में कान्सटेबिल और हेड कान्सटेबिल था मुझे पता लगा कि मथुरा में आचार्य जी से मिलने तत्क लीन मंत्री लालबहादुर शास्त्री आये थे जो बाद में प्रधानमंत्री बन गये। मैंने आचार्य जी से कहा कि आप मेरी सिफारिश कर दो। गुरुजी ने कहा मैं कोई सिफारिश नहीं करता। तो मैं बोला आचार्य जी से तो फिर मैं सिपाही बना रहूँ। जैसा आप चाहो। गुरुजी ने मेरी तरफ देखा और मेरे सिर पर तीन बार चाँटा लगाते हुये बोले तू थानेदार बनेगा, थानेदार बनेगा, थानेदार बनेगा। ऐसा कहते कहते दरोगा जी की आँखों में आँसू आ गये और उन्होंने उस चित्र की ओर इशारा किया जो उनका दरोगा की ड्रेस में था।

सन् १९८४-८५ में माताजी ने ओमप्रकाश भाई साहब को २ पीले कुरते औरधोती भिजवाये और कहा ओमप्रकाश से कहना कि यह मेरा आशीर्वाद है और जब कभी भी वह कार्यक्रम में जाये इन्हीं को पहने।

ओमप्रकाश भाई साहब सुनाते हैं कि १९७१ में गुरुजी मथुरा से हरिद्वार आ गये दूसरे दिन उन्हें अज्ञातवास को जाना था २०, २१ जनों की उन्होंने गोष्ठी ली और कहा कि कल रात किसी समय भी मैं चला जाऊँगा जो लेटा है वह लेटा रहे जो बैठा है वह बैठा रहे कोई भी प्रणाम करने नहीं उठना। कोई लाइट नहीं जलाना मैं दरवाजे के कोने पर सारी रात खड़ा रहा देखता रहा पिताजीकब जाते हैं। रात २ बजे पिताजी उठे नहाधोकर शान्तिकुँज के अखण्ड दीपक की ५, ७ मिनट पूजा की। एक झोला लटकाया और जैसे ही जाने लगे मैंने देखा वे बोले ओमप्रकाश मैंने प्रणाम किया पिताजी बोले चलेगा। मैंने कहा चलूँगा। और उन्होंने थैला मुझे पकड़ा दिया। मोतीचूर के रास्ते पिछले गेट से हम लोग चल दिये नीचे कुछ लोग जगे थे पर सब खड़े रहे पगडंडी के रास्ते चार किलोमीटर गये कोई बातचीत नहीं हुई सूरज निकलने से पहले बोले अब तू जा। और बताया कि यह पगड़डी रायबेला की सड़क से जुड़ जायेगी वहाँ से शान्तिकुँज लौट जाना पिताजी ने अपने पाकेट से एक चवन्नी निकालकर मुझे दी। जैसे ही मैं गेट से घुसा कि दानाभाई जबलपुर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे बोले ओमप्रकाश गुरुजी ने तुझे क्या दिया। मैंने कहा एक चवन्नी बोले ये तू मुझे दे दे। मैंने चवन्नी दे दी।

सन् १९५८ में जब गुरुजी अज्ञातवास गये थे। तब भी मैं गुरुजी के साथ उत्तरकाशी में गया। पिताजी ने खाना बनाकर खिलाया। १५-१-९९ शाम तीन बजे ओमप्रकाश भाई साहब ने बतलाया। कि जिस दिन माताजीकी मृत्यु हुई उनकी चिता चल रही थी माताजी की बहन यानी मेरी मौसी ने मुझसे कहा ओमप्रकाश मेरे कमरे में चल। मुझे वे ले गयी। कमरे में ले जाकर उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और अपने सिर पर रखकरकहा ओमप्रकाश तू मेरी कसम खा मेरे एक प्रश्र का जवाब दे मैंने कहा मौसी जी कसम खाकर तो आदमी केवल झूठ ही बोलता है निरा झूठ जितने लोग अदालत में गंगा गीता रामायण कुरान की कसम खाते हैं वह झूठ के अलावा कुछ नहीं बोलते। मैंने कहा मौसी माताजी की चिता चलरही है लौ उठ रही है तुम उसकीतरफ देखो मैं उसकी तरफ देखता हूँ। और मौसी आपको नहीं उन्हीं माताजी को साक्षी मानकर कहता हूँ आप पूछिये मैं जवाब दूँगा। मौसी बोली तेरी ये माँ भगवती देवी शर्मा मेरी छोटी बहन थी। तू ये बता कि इनने मेरे साथ क्या दूसरी माँ जैसा व्यवहार किया। मैंने कहा मौसी मुझमें पहले क्लास के बच्चे की तरह सारी बुराइयाँ थी पर इन्होंने मेरे साथ सिर्फ केवल माँ और माँ का ही व्यवहार किया। पिताजी से भी अधिक मुझे इनसे अपनी माँ का ही व्यवहार मिला।

सन् १९३९-४० में पिताजी फ्रीगंज आगरा में थे। मैं प्रायमरी में पढ़ता था। मैं पिताजी के ध्यान के केन्द्रित करने की क्षमता की एक घटना सुना रहा हूँ। हम लोग एक शादी में गये। चबूतरे पर फर्श बिछा था। पिताजी एक किताब पढ़ रहे थे। पढ़ते-पढ़ते उनको नींद सी आ गई। और जहाँ पढ़ना खतमकिया था यानीउसी शब्द पर ऊँगली रखकर उन्होंने एक झपकी ले ली। पिताजी के भतीजे रघुनाथ प्रसाद शर्मा जो पिताजी से ९ माह छोटे थे को मजाक सूझा और उन्होंने धीरे सेधकेलकर ऊगली को कुछ ऊपर उठा दिया। और चुप बैठ गये। पिताजीकी झपकी टूटी पीछे देखा उनका भतीजा बोला क्यों रघुनाथ तैने यह किताब हटाईक्या। बोले नहीं मैं कुछ नहीं जानता। पिताजी बोले जिस लाइन पर मेरी ऊँगलीरखी है यह लाइन तो मैं पहले पढ़ृ चुका हूँ और हँस दिये ऐसे आत्मसात होते थे पिताजी पढ़ाई में। वे दूसरी घटना सुनाते है कि यदि कोई छोटा व्यक्ति भी किसी बात पर अकड़ जाये तो भी पिताजी विरोध की भाषा उपयोग नहीं करते थे बल्कि चुप हो जाते हैं। एक बार क्या हुआ कि मैं माताजी से क्रोध में कुछ कहने लगा जो शायद पिताजी को बर्दाश्त नहीं हो रहा था और वे उसी क्रोध में बोले नीचे जा। मैंने भी जवाब दे दिया। मैं आपके पास नहीं आया मेरी ताई जी मेरी ताई नहीं ताजमहल है। पिताजी ने क्रोध के शब्द बदले औरबोले ओमप्रकाश मैं ये नहीं कह रहा मैं कह रहा हूँ कि रात बहुत हो गई है तू सो जा और आगे बात कल कर लेना उनके स्वर बड़े शान्त भाव के थे मुझे सुनना पड़ा।

आज दिनॉंक २२-१-९९ को श्री वीरेन्द्र प्रसाद अग्रवाल इंडिया मोटर्स एजेन्सीज संयोजक प्रथम अश्वमेध यज्ञ जयपुर का इंटरव्यू रिकार्ड किया। उन्होंने बताया कि सन् १९७२ में में अरुणाचलप्रदेश में मिलिट्री केन्टीन का काम करता था। में आध्यात्म आदि कुछ नहीं जानता था। लेकिन अचानक मेरे मन में एक विचार आया कि मुझे अपने जीवन में कोई गुरु बनाना चाहिए। मैंने अपने श्वसुर को एक पत्र लिखा। उन्होंने मुझको पत्र के जवाब में कलकत्ते बुलाया और बृजमोहन भाला जी के पास ले गये। उन्होंने मुझे एक छोटे से यज्ञ कार्यक्रम में आने के लिये कहा। और बताया कि गुरुजी अभी अज्ञातवास में हैं। अचानक सन् १९७४ में एक बी०पी० मेरे नाम आ गई क्यों और कैसे आयी आज तक पता नहीं। मेरे इस प्रश्र का उत्तर गायत्री तपोभूमि से जो आया वह यह था कि तुमको ढूढ़ा गया है। और स्वाती की बूँद की तरह आगे तुम एक सीप बनोगे। और उन्होंने इस पत्र की एक जेराक्स भी दिखाई।

गुरुजी अज्ञातवास से लौटे और मुझे शिविर की अनुमति अक्टूबर की मिली। पर मैं तो जल्दी से जल्दी जाना चाहता था इस कारण मेरे दूसरे पत्र के उत्तर में ११ से १६ जुलाई ७२ प्राण प्रत्यावर्तन शिविर की अनुमति मिल गई। मेरे तीन बच्चे थे और छोटा बच्चा ४ वर्ष का था। दूध पीता था। किन्तु उन्हीें दो महीने में यानि मई और जून में ही न केवल उसने दूध छोड़ दिया लेकिन वह जोर भी देने लगा कि माँ और पिताजी आप लोग जाओं में भैया के पास रह लूँगा यद्यपि उसके बड़े भाई किसी तरह भी तरह रखना नहीं चाहते थे फिर भी वह जिद करके बोला कि मैं रहूँगा। मेरे बड़े भाई मुझे धर्म के काम में बिल्कुल नहीं लगने देना चाहते थे और मेरे आधे हिस्से के स्थान पर दस पैसा हिस्सा देने को भी तैयार नहीं थे कहते थे कि या तो कायदे से पूरा काम संभालो या पूरा काम छोड़ो। एक दिन मैंने गुरुजी से कहा गुरुजी मुझे आपके पास आने में देर हो गई गुरुजी बोले तेरी उम्र कितनी है मैंने कहा ३७ वर्ष वे बोले तू तीन वर्ष पहले आ गया। और सच यह है कि तीन वर्ष बाद ही स्पष्ट आभास हुआ कि पं० श्रीराम शर्मा आचार्य एक अवतारी पुरुष हैं। मिलिट्री का जो अफसर था वह बड़ा रिश्वत लेने वाला था और मुझे ग्लानी होती थी कि क्या मैं यह काम छोड़ दूं एक दिन शाम को नदी के किनारे बैठा था कि विचार आया कि कितनी गंदगियाँ नदी में आती है पर वह चलना थोड़े छोड़ती है और यह अफसर कोई बना थोड़े रहेगा। औरएक माह बाद ही उसका तबादला हो गया। और नया अफसर बहुत ईमानदार था। मैं तो ज्यादा समय शान्तिकुँज और मिशन के काम में लगाने लगा मेरा बड़ा लड़का जो अभी १०, १२ साल का था वही काम देखता था। गुरुजी ने कहा कि तू पार्ट्स की दूकान खोल ले मैंने कहा मेरे पास पैसे नहीं है गुरुजी ने कहा उधार माँग। और मैंने जहाँ जहाँ माँगा पैसा मिलता चला गया। और कुछ ही दिनों में मैंने जो २ लाख रुपये का नुकसान किया था वह पूरा हो गया और बहुत अच्छी आमदनी होने लगे। एक दिन गुरुजी ने शक्तिपीठ बनाने के संकल्प के लिये बुलाया। लोकेश जी जा रहे थे ऊपर बोले में एक शक्तिपीठ का संकल्प करने जा रहा हूँ तो मैंने कहा ग्यारह हजार रुपये मेरे भी लिख लीजिये। गुरुजी के पास ४, ५ आदमी गये गुरुजी बोले तुझसे पैसे नहीं लेगे। जमीन खरीदने का काम तुझे करना है। और उसके बाद से जब जब शान्तिकुँज कोई जमीन खरीदता है तो मेरे पास रजिस्ट्री कराने की सूचना आ जाती है। और यह सेवा करने के योग्य गुरुजी ने बनाया। आँवलखेड़ा अस्प्ताल की जमीन ५ लाख रुपये की है। मैंने २५० रुपये अनुदान से आरम्भ किया था और अब अपनी आय का १० प्रतिशत शान्तिकुँज के हिस्से में रखता हूँ। हानि मेरी तरफ। गुरुजी ने मुझसे कहा कि तू काम किया कर और मुझे क्या करना है तेरे लिये मुझे इस कर्तव्य का बोध है। पुष्कर में १६ अप्रैल १९८० में शक्तिपीठ बननी थी। पर नेनीवाल जी पर एक भयंकर केस एवं आजीवन कारावास हाने के कारण केन्सिल हो गयी। फिर गुरुजी ने उस कार्यक्रम को गुरु पूर्णिमा पर रखा जिसके लिये मुझे केवल ढाई माह का समय मिला था पर जन सहयोग आश्चर्यजनक हुआ। एक व्यक्ति ने जो जमीन ३१ हजार रुपये की जमीन बेचना पक्का हो गया था उसी ने शक्तिपीठ के लिये वह जमीन ३१०० रुपये में रजिस्ट्री करा दी। वीरेन्द्र जी ने गुरुजी के लिखे कई पत्र दिखाये। जिनमें लिखा था कि तुम मेरे सतीश शेलो की तरह ही बेटे हो। उसमें लिखा था तू पूर्ण वैभव के बाद जीवन मुक्त होगे। उसमें लिखा था कि मैं हर संकट और कष्ट में तुम्हारे साथ रहूँगा। मेरे एक मित्र मिलिट्री आफीसर थे वह मेरे साथ शान्तिकुँज आये और बोले गुरुजी मैं ९ दिन के लिये शिविर में आना चाहता हूँ पर हमारा बाँस डीएचओ छुट्टी नहीं देता गुरुजी ने हाथ उठाकर अपनी छाती से लगाया और बोला छुट्टी देने वाला यहाँ बैठा है तू दरखास्त पटक कर चला आ छुट्टी मंजूर हो जायेगी। उसकी छुट्टी मंजूर हो गई। एक दूसरी घटना वीरेन्द्र अग्रवाल जी ने सुनाई कि गुरुजी श्रीकृष्ण अग्रवाल के घर ठहरे थे उनके बड़े लड़के राजू के दोस्त के पिता बहुत सीरियस थे। बिल्कुल मरणासन्न लम्बी-लम्बी सांस खिंच रही थी डाक्टर ने कहा कि बस कुछ ही घण्टे जीवित रहेंगे। दोस्त राजू के पास गया और बोला तुम्हारे यहाँ कोई गुरुजी आये हैं कुछ करो। गुरुजी कमरे में सो रहे थे राजू ने धीरे से दरवाजा खोला डर डर कर भीतर जाने लगा। गुरुजी बोले कौन। वह बोला मैं राजू। क्या बात है। मरे दोस्त के पिता बहुत अधिक बीमार है। बेटे उसकी उमर पूरी हो गई। गुरुजी कुछ करिये। अच्छा ठीक है वे चार साल और जियेंगे। बिल्कुल स्वस्थ हो गये और ठीक चार वर्ष ही जिवित रहे। वीरेन्द्र जी की पत्नी जी ने बतलया कि मैं तो सपने में दादा गुरु को देखा करती थी। एक बार हम लोग बद्रीनाथ जा रहे थे गुरुजी से आशीार्वाद लेकर गुरुजी बोले जाओ आग तुम्हें जलायेगी नहीं पानी तुम्हें परेशान करेगा नहीं और तूफान तुम्हारा कुछ बिगाड़ेगाा नहीं। और वही सब कुछ हुआ एक्सीडेंट भी हुआ तूफान भी आया और सब में से बचते हुये हमारी यात्रा सफल रही। वीरेन्द्र जी ने यह कहा कि गुरुजी ने मुझसे यह कहा कि पिछले जन्म में भी तुमसे मेरा सम्बन्ध रहा है और आगे भी रहेगा। श्रीमती अग्रवाल ने बतलाया कि एक दिन मेरा ड्रायवर गाड़ी बैक कर रहा था उस गाड़ी का पहिया मेरे पेर पर चढ़ गया। घुटने और एड़ी के बीच हड्डी तीन स्थान पर टूट गई। भीड़ जमा हो गई पर मैंने कहा कि गाड़ी भी मेरी है औरड्रायवर भी मेरा है मुझे कही पुलिस या अस्पताल में नहीं जाना है। ड्रायवर से कहा कि मुझे अपने प्रायवेट डाक्टर के पास ले चलो। डाक्टर का मत था कि बिना आपरेशन के हड्डी नहीं जुड़ेगी और मैंने कहा तुम प्लास्टर करो और मैं कहती हूँ कि जुड़ेगी। डाक्टर बोला किस बलबूते पर आप कहती है मैंने जवाब दिया यह जानने की तुम्हें कोई जरूरत नहीं है और देखो मुझे बेहोश करने की भी जरूरत नहीं है मुझे न कोई दर्द हो रहा है न होगा। प्लास्टर हुआ और जब वह टूटा तो हड्डी पूरी तरह जुड़ गई थी जो डाक्टर्स के लिये एक आश्चर्यजनक घटना थी क्योंकि पैर की यह हड्डी बिल्कुल चमड़ी के नीचे है और दूसरे इस पर सारे शरीर का वजन भी होता है पर ये कोई कठिनाई मेरे लिये आड़े नहीं आयी।

दिनॉंक २३-१-९९ को गंगासिंह वर्तमान में गायत्री विद्यापीठ के प्राचार्य का इंटरव्यू इस प्रकार है। सन् १९७३ में मैं ग्यारहवी क्लास में पढ़ता था। एक प्रदर्शनी का आयोजनथा प्यास लगी बगल के होस्टल में पानी पीने गया। वहाँ अच्छे अच्छे वाक्य लिखे थे। पाँच पाँच पैसे के मैंने चार आने के पाँच वाक्य खरीदे। अधिक जानना चाहा तो मुझे जितेन्द्र रघुवंशी से मिलने कहा। राजपूत परिवार में होने के कारण बिड़ी सिगरेट पीना तथा उद्दण्डता मेरी आदत थी। डॉ० रतन लाल सक्सेना रेलवे कालोनी में यज्ञ करा रहे थे। जहाँ व्याख्या मुझे बहुत पसन्द आयी। पाँच फरवरी को शंकर मन्दिर में ५ कुण्डीय यज्ञ हुआ। मुझे दीक्षा यज्ञोपवीत के लिये कहा। पर पहले तो राजी नहीं हुआ बाद में दीक्षा भी ली। पत्रिका का सदस्य भी बना और मेरी लगन युग निर्माण कार्य में लग गयी। मैं बहुत कार्यक्रम में जाता और साथी कहते कि ये जरूर फैल होगा। पर हम वो चार पाँच विद्यार्थी जो यज्ञ कार्य में लगे थे वे पाँचों प्रथम श्रेणी से पास हुये बाकी ज्यादातर या तो फैल हुये या सेकेण्ड थर्ड डिवीजन। जितेन्द्र रघुवंशी युग निर्माण विद्यालय मथुरा चले गये। सन् १९७३ में मैं एक मासीय सत्र में आया मेरी उम्र २० वर्ष की होगी। शालिगराम मिश्रा जी के साथ गया गुरुजी लेटे थे नाम पूछा मैंने कहा गंगासिंह। गुरुजी बोले तू गंगा की तरह नीचा होकर बहना। बिना नीचे हुये गंगा में कोई नदी थोड़ी मिलती है तू अपने जीवन को ऐसा बनाना। मैंने बी०एड० कर लिया था अक्टूबर १९७७ में मुझे टायफायड हो गया। बिल्कुल चेतना शून्य स्थिति में पड़ा था हड्डियाँ निकल आयी थी मैंने स्पष्ट अनुभव किया कि मुझे कोई आसमान में उड़ा ले जा रहा है। और ऊपर लेजाकर मुझे छोड़ दिया और मैं एक सागर में गिरने ही वाला हूँ कि वहाँ से दो हाथ उठे और उन्होंने मुझे गोद में लिे लिया ये हाथ गुरुजी के थे। मुझे लग रहा था कि अब छपाक आवाज होगी पर गुरुजी ने लेकर कहा उन्हीं की आवाज में मैंने सुना कि मुझे तुझसे काम लेना है। मेरे दादा की मृत्यु हुई मैंने मृत्युभोज का विरोध किया मेरे पिताजी बहुत नाराज हुये और मारपीट कर मुझे घर से निकाल दिया। मैं पत्नी के साथ शान्तिकुँज आ गया। अब मुझे लगने लगा था कि गुरुजी एक अवतारी पुरुष हैं। और मैं रात दिन मिशन का काम करता वेतन उसी में खर्च कर देता। एक दिन सन् १९७८ में गुरुजी ने मुझसे कहा तुम अब भी घर चले जाओ तुम्हारा घर पर जरूरी काम है जैसे ही मैं घर पहुँचा तो पता लगा कि आपसी झगड़े में मेरे बाबाजी का मर्डर कर जमुना में बहा दिया। उसके बाद मैं यहाँ आ गया और राजस्थान आदि स्थान पर प्रज्ञा पुराण टोली में जाने लगा। बाद में पिताजी मुझे लेने आये मैं गया पिताजी भी जो रामायण पढ़ते थे जप करने लगे और अच्छे वातावरण में मैं कार्यक्रम में जाने लगा। सतना शक्तिपीठ के लिये मैं नंगे पाँव नमक शक्कर छोड़कर काम में लग गया। मेरी माँ ने चित्रकूट शक्तिपीठ के लिये सोने के मोहर मुझे दिये इसके बाद वहाँ के जी०एम०जिन्होंने डाक्टर इंजीनियर व बाबूपुर शाखा की मदद से ६० बाई ८० फीट जमीन पर शक्तिपीठ बन गया। मुझे गुरुजी ने कुरता दिया और छत्तीस किलोमीटर गुरुजी के साथ घूमा और गुरुजी ने मुझे स्थाई शान्तिकुँज आने के निर्देश दिये जबकि पहले मना किया था। मेरी माँ ने कहा कि मैं तुझे वैसे ही दे रही हूँ जैसे विश्वामित्र जी को दशरथ जी ने दिया था। सन् १९८१ में राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में मिशन की गाड़ी मैं ही चला रहा था एक बड़ा एक्सीडेंट हुआ मैं गिर गया लेकिन कोई खास चोट नहीं आयी। सन् १९९६ अक्टूबर जब अल्मोड़ा से आ रहे थे जिसमें बिड़ला जी सन्तोष नामदेव के कई फ्रेक्चर हुये पर मेरी सुरक्षा हो गई। गुरुजी को न केवल मैं एक बड़ा लेखक तपस्वी व गायत्री माँ का उपासक मानता हूँ पर उनका प्यार मेरे लिये सबसे बड़ी बात थी। मैं जो कार्यक्रम बनाकर ले जाता गुरुजी उसमें बदलाव कर देते और फिर उनके कहे अनुसार बनाकर ले जाता उसे भी बदल देते मैंने कहा गुरुजी आपने तो पहले ये ही कहा था गुरुजी बोले मैं तो तेरी दिमागी कसरत कराता हूँ अब मैं अनुभव करता हूँ गुरुजी के मार्गदर्शन में वह बार-बार का असफल प्रयास मेरी आज जो कुछ भी थोड़ी योग्यता है उसका प्रमुख कारण है।

चेतराम रहवर जो डिप्टी डायरेक्टर शिक्षाविभाग हरियाणा रहे हैं वर्तमान में मकान नं० १५५७ सेक्षन नं० १३ डबरा चौक हिसार हरियाणा फोन नं० ०१६६२ २५४०७ गायत्री कुटीर सन् १९७९-८० वे बिल्कुल भौतिकवादी प्रकृति के थे चूंकि वे शायर थे शराब भी पीते थे और कहते हैं कि मैं रात को बहुत शराब पीता था और जब सबेरे शरीर टूटता था तो फिर पी लेता था। रामकृष्ण परमहंस माँ शारदामणि की थोड़ी बहुत पूजा करता था। बाकी सारा समय भौतिकता में ही लगता था। एक बार ऐसा हुआ कि हम दोनों को सारे शरीर में फुंसियाँ निकली जिनमें से पानी रिसता था दूसरे दिन सूख जाती अन्दर से एक अनुभव होता कि हम दोनों का शोधन हो रहा है। श्रीमती रहवर शान्तिदेवी ने कहा कि एक दिन मैंने देखा कि रामकृष्ण परमहंस का चित्र बदलकर गुरुजी और माँ शारदामणि का चित्र बदलकर माताजी बन रहा है। हम दोनों शान्तिकुँज आये और गुरुजी से जब बात की तो उन्होंने कहा अपनी ऊँगली छाती पर रखकर कि यही रामकृष्ण है और नीचे माँ शारदा बैठी है उसके बाद हमने कभी पीछे मुडंकर नहीं देखा अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाना तथा यज्ञ और लाखों रुपये का साहित्य अब तक बिकवा दिया होगा। एक दिन कपिल जी ने गुरुजी से कहा कि रहवर जी यहाँ आना चाहते है गुरुजी बोले यह तो यहीं रहता है इसे क्षेत्र में काम करने दो। रहवर जी कहते हैं कि एक दिन गुरुजी ने मेरा सर अपनी गोदी में रखकर लगभग १५ मिनिट तक सहलाया होगा जो मैं कभी नहीं भूलता।

रहवर जी के बड़े लड़के जो एयरफोर्स में हैं। उनकी शादी पक्की हो गई। पर अचानक लड़की के माता पिता आये उनके नेत्र आसुओं में भरे थे वे बोले कि आप अपने बच्चे की शादी कही और कर दे मेरी बेटी के लिये डाक्टरों ने कहा है इनका कोई बच्चा न होगा। रहवर जी बोले हमारा पोता होगा और बहुत खूबसूरत होगा अगर कोई कारण से आप शादी तोड़ना चाहते है तो तोड़ सकते हैं इस कारण तोड़ रहे हैं तो नही तोड़िये। वे बोले आप यह कैसे कह सकते हैं मैंने जवाब दिया ये मुझसे मत पूछिये कोई बड़ी ताकत मेरे साथ है। और आज उनके एक खूबसूरत पोता और बच्चा भी है। श्रीमती शान्तिदेवी कहती है कि बि हमारी साधना ऐसी बढ़ गयी है कि हम हर समय एक अभय का बोधा करते है कोई भी दुर्धटना या बीमारी बगल से निकल जाती है। चेतराम रहवर जी ने बतया कि ध्यान में बैठते ही उनको सूर्य जैसे प्रकाश दिखता है और कई बार उनको सूर्य भगवान के दर्शन भी हुये।

मुझे चेतराम रहवर जी के साथ आसाम और अरुणाचल में एक माह रहने का मौका मिला और लगभग हर दिन वे होने वाली घटना का पूर्व आभास दे देते थे। हिसार के कमिश्रर ने एक विशेष निर्देश के द्वारा चेतराम रहवर जी को किसी भी स्कूल में सरकारी टीए डीए पर जाकर भाषण देने की अनुमति दे रखी है। रहवर जी के बच्चे और बच्चियाँ बहुत ही संस्कारित हैं।