संकल्प की अपार शक्ति
परमवन्दनीया माताजी, जिनके धरती पर अवतरण के शतवर्षीय उत्सव को समस्त गायत्री परिवार अत्यन्त उमंग एवं उत्साह के साथ मना रहा है—उनके उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि वे व्यक्ति के अन्तःकरण को स्पन्दित करने के अतिरिक्त उसे सत्पथ पर चलने के लिए प्रेरित भी करते हैं। अपने एक ऐसे ही अलौकिक उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी संकल्प की शक्ति का महत्त्व बताते हुए कहती हैं कि संकल्प की शक्ति अपरम्पार है। वन्दनीया माताजी गायत्री जयन्ती को संकल्प का पर्व घोषित करते हुए कहती हैं कि संकल्प में हजारों हाथियों के बराबर बल होता है। भगवान राम से लेकर भगवान हनुमान, एकलव्य एवं परमपूज्य गुरुदेव का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वन्दनीया माताजी हर साधक को संकल्प शक्ति दृढ़ करने का निर्देश देती हैं। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.....
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
संकल्प की शक्ति
हमारे आत्मीय परिजनो! आज उस शक्ति का जन्मदिन है, जिसे गायत्री जयन्ती कहते हैं। गायत्री कौन? शक्ति कौन? संकल्प की शक्ति, जिसका आज जन्मदिन है।
जैसा कि अभी लड़के गा रहे थे—"भगीरथ ने जन्म लिया।" और आज से साठ-पैंसठ साल पूर्व उनके जीवन में एक छाया अर्थात संकल्प आया कि हमको गायत्री माता ने पुकारा है और कहा है कि बेटे मेरे वेग को कौन धारण करेगा?
उन्होंने कहा कि माँ! मैं करूँगा, आपके वेग को धारण और उसी दिन संकल्प ले लिया कि जो हमारी माँ पुकार-पुकारकर कह रही है कि बेटे मैं तो दबी जा रही हूँ। मुझे कोई जानता नहीं है। जहाँ करोड़ों की संख्या में मेरे बालक हैं—बेटे हैं, बेटियाँ हैं, वो मुझको जानते तक नहीं हैं। उन तक मुझे पहुँचा। मैं देखना चाहती हूँ और मैं उनके हृदय में निवास करना चाहती हूँ।
किसने कहा? गायत्री माता ने कहा। उन्होंने कहा कि यह हमारा संकल्प है और उस संकल्प को उन्होंने पूरा किया। कहते हैं कि संकल्प में हजार हाथियों का बल होता है। जिसका संकल्प अटल होता है, उसका संकल्प पूर्ण होने में देरी नहीं लगती।
माँ गायत्री को आने में देर नहीं है और आज के दिन वे अवतरित हो गईं और उनका वेग उनके बेटे भगीरथ ने सँभाला। कैसे? मैं दोनों की ही उपमा दूँगी, एक भगीरथ की और एक शंकर जी की। भगीरथ ने अपने को तपा डाला। गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाने के लिए एड़ी से लेकरचोटी तक का जोर लगा दिया।
संकल्प के धनी कौन? भगीरथ और वेग सँभालने के लिए संकट जैसी स्थिति में शंकर जी ने कहा कि अपनी जटा फैलाकर इसका वेग हम सँभालेंगे। अपनी माँ को लाने में और जनमानस के हृदय में विराजमान करने के लिए हम दृढ़ संकल्पित थे।
गायत्री जयन्ती का संकल्प
आज गायत्री जयन्ती है, श्रद्धा-सुमन चढ़ाने का पर्व है और ये संकल्पित होने का पर्व है। आज संकल्प लिया जाना चाहिए कि जनमानस में कोई भी घर, कोई भी नर, कोई भी नारी ऐसी नहीं रहनी चाहिए, जहाँ कि हमारी माँ विराजमान न हों। ये संकल्प का दिन है। आज गंगा दशहरा है। भगीरथ ने संकल्प किया था। करोड़ों बेटे कहाँ रह रहे थे? उन्होंने संकल्प लिया कि माँ गंगा अब तो आपको अवतरित होना ही पड़ेगा। चाहे तेरा बेटा मिट ही क्यों न जाए। मिट जाना हमको मंजूर है, लेकिन हम संकल्पविहीन नहीं हो सकते। हम संकल्प को पूरा करके ही छोड़ेंगे।
शंकर जी ने कहा कि तू ले आएगा गंगा? उन्होंने कहा कि गंगा को आना ही पड़ेगा; क्योंकि हमारे अन्दर संकल्प शक्ति है। हमने संकल्प किया है कि जब तक हम गंगा को धरा पर नहीं लाएँगे, तब तक हम चैन से नहीं बैठेंगे। उन्होंने कहा कि हाँ, लड़का तो कुछ दमदार मालूम पड़ता है। यह संकल्प से नहीं डिगेगा। उन्होंने कहा कि बेटे! गंगा जी आएँगी तो गंगा जी का वेग कौन सँभालेगा? कोई सँभाले चाहे नहीं सँभाले, लेकिन गंगा को आना पड़ेगा, क्योंकि भक्त से भगवान छोटा होता है। भक्त बड़ा होता है, भगवान छोटा होता है। आर्तनाद सुन करके माँ नहीं आएगी? आना ही पड़ेगा।
माँ गायत्री और माँ गंगा
बछड़ा जब-जब चिल्लाता है तो अपनी माँ को पुकारता है, तो गाय रँभाती है और दौड़ी हुई चली आती है। बछड़ा गाय के समीप आता हुआ चला जाता है। शंकर जी ने अपनी जटाओं को फैला दिया। उन्होंने कहा कि मेरी ये जटाएँ फैली हुई हैं, गंगा आ, और गंगा आ गई।
आज दो पर्व हैं—गायत्री जयन्ती और गंगा दशहरा, दोनों पर्व एक साथ। एक ज्ञान की गंगा और दूसरी पतितपावनी गंगा है। ज्ञान की गंगा का अवतरण आज के दिन हुआ। व्यक्ति के अन्दर यदि ज्ञान आता हुआ चला जाए तो अज्ञानता का अँधेरा मिटकर ही रहेगा और जब तक अज्ञानता का अँधेरा छाया रहेगा तो ज्ञान का उदय कैसे होगा? ज्ञान का उदय होना और अन्धकार मिटना, यही संकल्प है। यह आपके संकल्प के ऊपर है। व्यक्ति का संकल्प कभी निरर्थक नहीं जाएगा।
क्या है शान्तिकुञ्ज?
बेटे, शान्तिकुञ्ज क्या है? शान्तिकुञ्ज शक्ति है। हम तो व्यक्ति भी हो सकते हैं, व्यक्ति हैं, पर भीतर में जो समायी हुई है वो शक्ति आप नहीं देख रहे। अन्दर में जो शक्ति समायी हुई है, वो आप देख रहे होते तो मजा आ जाता। व्यक्ति तो चले जाएँगे, व्यक्ति का मतलब हाड़-माँस।
हाड़-माँस तो चला जाएगा, लेकिन जो शक्ति इसमें विद्यमान है, वो अभी भी है और फिर भी रहेगी। कब तक रहेगी? हजारों वर्षों तक, लाखों वर्षों तक रहेगी। क्यों यह शक्ति है न? व्यक्ति नहीं है, व्यक्ति चला जाएगा। हाड़-माँस चला जाएगा, लेकिन शक्ति विद्यमान रहेगी।
रामकृष्ण परमहंस शक्ति हैं, व्यक्ति नहीं हैं और शान्तिकुञ्ज क्या है? यह शक्ति है, व्यक्ति नहीं है। यह शक्ति विद्यमान है और यह हजारों वर्षों तक और लाखों वर्ष तक विद्यमान रहेगी। जिनके अन्दर हमने प्राण फूँके हैं और माँ को विराजमान किया है। यह संकल्प शक्ति है।
संकल्प शक्ति का बल
'संकल्प शक्ति में हजार हाथियों का बल होता है'—मैंने अभी हाल आप से निवेदन किया था। टिटिहरी ने संकल्प किया था कि समुद्र मेरे अण्डे लौटा दे, नहीं तो मैं शाप देती हूँ कि तुम्हें सुखा दूँगी। उसका संकल्प बल देखकर के अगस्त्य ऋषि आए और उन्होंने कहा कि टिटिहरी तू यह क्या कर रही है?
उसने कहा कि समुद्र या तो मेरे अण्डे लौटा दे और अगर अण्डे नहीं लौटाता तो तुझे अभी सुखाती हूँ; क्योंकि मेरे अन्दर संकल्प है और संकल्प में शक्ति होती है। उन्होंने कहा कि नहीं यह मत कर। जब तूने संकल्प किया है तो शक्ति मेरी है और कहते हैं कि समुद्र सूख गया तथा टिटिहरी के अण्डे वापस आ गए।
जरा-सी नाचीज टिटिहरी और संकल्प? संकल्प बहुत बड़ा होता है। व्यक्ति चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, यदि उसका आत्मबल और संकल्प बल सुदृढ़ है तो वह लाखों-करोड़ों की संख्या में एक गिना जाएगा क्योंकि उसके अन्दर शक्ति है, भीम जैसी, अर्जुन जैसी शक्ति है। अर्जुन से कई बार यह कहा कि तू उठ और लड़।
अर्जुन बोला नहीं, मेरे तो भाई-भतीजे बैठे हैं और कुनबे वाले बैठे हैं। मेरी तो बेटी आ रही है और मेरा तो बेटा भी पढ़ने जाने को है और मैं कैसे लड़ूँगा? ये जो मेरे भाई हैं, मेरे भतीजे हैं, मैं उन कौरवों से कैसे लड़ूँगा? अन्तरात्मा में जो कौरव विराजमान हैं, इनसे लड़ने के लिए कृष्ण ने कहा कि अरे जनखे! तुझे शर्म नहीं आती इस बात को कहने में कि लड़ेंगे कैसे? युद्ध लड़ना पड़ेगा और उसने संकल्प लिया। अर्जुन ने जब संकल्प लिया तो भगवान कृष्ण सारथी बन गए।
सारथी कब बन गए, जब उनने संकल्प लिया और जब तक उन्होंने संकल्प नहीं लिया था तब तक, तब तक कृष्ण क्या मदद कर पाए थे? नहीं, कृष्ण मदद नहीं कर पाए थे। मदद उन्होंने तब की, जब उसने संकल्प लिया और जब संकल्प लिया तो फिर वो दिन आने में देर नहीं हुई। विजय पाण्डवों की हुई। क्यों नहीं होती? क्योंकि संकल्प था।
गिलहरी का संकल्प
एक गिलहरी का संकल्प था जो कि अपने बालों में धूल और बालू ले जा करके और समुद्र में डाल रही थी। पूछा गया कि अरे गिलहरी! तू यह क्या कर रही है? करती क्या हूँ, मैं इस समुद्र को पाट रही हूँ; क्योंकि राम की सीता को वापस भी तो लाना है न। सीता वापस कैसे आएगी, जब तक समुद्र पटेगा नहीं? तो इस पर से जाएँगे कैसे? समुद्र पार कैसे करेंगे? मैं अपने भगवान राम के लिए समुद्र को पाट रही हूँ। समुद्र को पाट लेगी? उसने कहा—हाँ मैं पाट लूँगी; क्योंकि मेरे अन्दर संकल्प बल है।
कहते हैं कि भगवान राम ने उस गिलहरी को हाथ पर रख करके बहुत प्यार किया। उन्होंने कहा कि इसके अन्दर जो संकल्प की शक्ति है, वो उन इंजीनियरों से ज्यादा अपार है, जो कि बाँध बाँधने के लिए आए थे। उन्होंने कहा कि यह तो जानकार है, लेकिन अज्ञान में है। इसमें कोई ज्ञान नहीं है। यह जो गिलहरी है, इसके अन्दर अपार शक्ति है और यह संकल्प शक्ति की धनी है। जिसके पास संकल्प शक्ति है, वो जाने क्या-से-क्या कर सकता है?
बेटे! मैंने आपसे निवेदन किया कि जिस किसी ने भी संकल्प लिया है, वह अपार सम्पदा का स्वामी बना है। सम्पदा केवल पैसे को नहीं कहते, केवल दौलत को ही सम्पदा नहीं कहते। सम्पदा उन गुणों को कहते हैं, जो ईश्वरीय शक्तियाँ आपके अन्दर आती हुई चली जाती हैं, वो होती है असली सम्पदा। कौन-सी सम्पदा? जो विनोबा भावे के अन्दर थी, जिन्होंने कहा कि हम पदयात्रा करेंगे। कौन थी वह शक्ति? वह संकल्प शक्ति थी।
नहीं साहब! हम तो मोटरकार में चलेंगे। हमारे लिए तो ये है ही नहीं, अतः हम पैदल चलेंगे। ये कौन-सी संकल्प शक्ति है? मैंने अभी रामकृष्ण परमहंस का जो उदाहरण दिया, वह संकल्प शक्ति का है। जिन्होंने संकल्प लिए हैं, उन्होंने बड़े गजब के काम किए हैं।
हनुमान ने जब संकल्प कर लिया कि अब तो हमको लंका में प्रवेश करना ही है, तो वे शक्तिशाली हनुमान हो गए। उससे पहले हनुमान कौन थे? सुग्रीव के यहाँ थे, लेकिन जिस दिन संकल्प ले लिया तो उस दिन से क्या हो गए हनुमान? आहा, कैसे शक्तिशाली, जहाँ-जहाँ गए, वहीं तहलका मचा दिया, सबसे टक्कर लेते हुए लंका में आग लगा दी।
किसने लगा दी? हनुमान जी ने, कब लगा दी? तब लगा दी, जब उन्होंने संकल्प किया था कि हमको राम के उद्देश्यों के लिए, राम के लिए जीना है अर्थात राम की विचारधारा के लिए और सिद्धान्तों के लिए जीना है। रावण की जो अनीति है, उसके विरुद्ध हमको लड़ना है।
जहाँ कहीं भी अनीति है, जहाँ भी कहीं अनाचार है, उसके लिए यदि हमारे अन्दर संकल्प है तो हम जहाँ कहीं भी जाएँगे, हमारी वाणी में सरस्वती पैदा होगी।
व्यक्ति सुनेगा, कैसे नहीं सुनेगा? उसको सुनना पड़ेगा, हजार बार सुनना पड़ेगा और उस रास्ते पर चलना पड़ेगा और वह चलेगा और जब तक हमारे भीतर संकल्प नहीं है तब, माताजी! हमारे मन में तो ऐसा आ रहा है, हम काम तो करते हैं, लेकिन आपकी जो बहू है, कभी-कभी बीमार पड़ जाती है और अधिकतर हमारे मार्ग में रोड़े पैदा करती है।
यह गलत है। चलने वाले को कभी किसी ने नहीं रोका है और जिसने संकल्प लिया है, उसे डिगाने वाला दुनिया में कोई पैदा नहीं हुआ है। न माँ डिगा सकती है, न पत्नी डिगा सकती है। कोई भी अवरोध आड़े नहीं आ सकते। यदि व्यक्ति का संकल्प बल है तो! और संकल्प बल नहीं है तो वो इधर-की-उधर करता ही रहेगा।
जिन्होंने संकल्प किए हैं, उन्होंने बहुत कुछ पाया है। एकलव्य ने संकल्प किया था कि गुरु का अनुदान हम ले करके ही हटेंगे और वो ले करके हटा। कौन-से, गुरु से? मिट्टी के गुरु से। मिट्टी का गुरु कुछ देता है? अरे बेटे, संकल्प देता है। उसका जो संकल्प था, उस संकल्प के वशीभूत होकर के मजबूर होकर के द्रोणाचार्य को अपनी शक्ति का एक अंश उसको देना पड़ा और उससे वो धनुर्विद्या में निपुण बन गया और दूसरे कौन-कौन बन गए? शिवाजी बन गए।
किससे बन गए? संकल्प-से। संकल्प लिया न कि हम संकल्प लेते हैं कि हमको गुरु का वरदान मिलना ही चाहिए। हमको माँ दुर्गा की कटारी मिलनी ही चाहिए, क्योंकि अनीति के विरुद्ध हमको उठना है, हमको जगना है और दूसरों में हमको चेतना फैलानी है और वो चेतना फैलानी है कि जिसकी इतिहास गवाही देता हो कि हाँ कोई व्यक्ति था।
ये कौन-सा व्यक्ति है, जिसने यह संकल्प लिया कि हमको समर्थ गुरु रामदास का वरदान मिलना ही चाहिए। समर्थ गुरु रामदास ने उसको वरदान दिया था और शक्ति दी थी। किसको? संकल्प वाले को और किसी को दी? बहुत शिष्य हुए होंगे।
सन्तों के सिद्धान्त
बेटे, जाने कितने हुए होंगे, लेकिन शक्ति एक को मिली। जिस उद्देश्य के लिए जन्म लिया है और जिन सिद्धान्तों पर चल रहे हैं, आप उसको आँक नहीं सकते। हम हर दिल में झाँकते रहते हैं, लोगों के दिलों में झाँकते रहते हैं कि हम किसको सन्त बनाएँ? इसको बनाएँ या उसको बनाएँ, किसको बनाएँ? फिर निराशा ही हाथ लगती है; क्योंकि उनके दिमाग में यह बात आ जाती है कि हम नेता हैं।
ओहो, अरे तो फिर सन्त कैसे हो गए? गुरुजी के इतिहास को देख तो तुझे मालूम पड़ेगा कि आज से 50 वर्ष पूर्व जो हमसे जुड़े हुए हैं, उनको मालूम है कि हम किस स्थिति से कहाँ-से कहाँ तक कैसे आए? तुम्हारे लिए तो मोटरकार चाहिए, वो थर्ड क्लास में चलते थे।
वो गान्धी जी के, विनोबा के पदचिह्नों पर चलने वाले थे और आप? आप तो ये कहेंगे कि यह नहीं था, वो नहीं था हम तो भोजन करने के लिए गए थे। भोजन करने के लिए नहीं गए थे बेटे, कारों में घूमने के लिए नहीं गए थे, बल्कि हम उस चेतना को फैलाने के लिए गए थे। चाहे हमको काँटों पर चलना पड़ेगा तो काँटों पर चलेंगे, भूखे रहना पड़ेगा तो भूखे रहेंगे और चने खाने पड़ेंगे तो चने खाकर रहेंगे।
ये वो सिद्धान्त हैं, वो भावनाएँ हैं, जिनको हम देखते हुए चल तो रहे हैं, बीजांकुर तो हो रहा है। ऐसा तो हम नहीं कहते कि श्रद्धा नहीं है, श्रद्धा तो है, पर अभी उस स्टेज तक नहीं आ पाए। उस स्टेज तक जिस दिन आ जाएँगे तो हमको बहुत खुशी और अपार प्रसन्नता होगी कि हम अपने पीछे सन्तों का एक समूह छोड़कर आए हैं। एक सन्त नहीं, सन्तों का समूह छोड़कर आए हैं।
अभी गिनते हैं तो कहते हैं कि 56 लाख सन्त हैं। 56 लाख सन्त जिस देश में हों, उसमें निरक्षरता रह जाएगी? गुण्डागर्दी रह जाएगी? दहेज का दानव रह जाएगा? अनाचार और अत्याचार रह जाएगा क्या? हम तो कहते हैं कि इस देश में पाँच या दस ही सन्त हो जाएँ तो कल्याण हो जाएगा। अभी सन्त दिखाई नहीं पड़ते। बेटे! हम सन्त बनाने के लिए भरसक प्रयास कर रहे हैं। इतना प्रयास कर रहे हैं कि रात को नींद नहीं आती है और दिन में हमको चैन नहीं पड़ता है कि हम सन्त कैसे बनाएँ।
सन्त पथ के अनुयायी
तो माताजी! सन्त बना करके फिर आप क्या करेंगे? हम आज से ही अपना घर-बार छोड़ करके आ जाएँ। बीबी को छोड़ दें, बच्चों को छोड़ दें। हाँ बेटा घर से ऊब गया होगा? घर में तेरा लड़ाई-झगड़ा होता होगा। बेटे! बीबी-बच्चे छोड़ने के लिए हम नहीं कह रहे हैं। हम तो उस प्रवृत्ति के लिए, उस सिद्धान्त के लिए कह रहे हैं कि जो सन्त का सिद्धान्त है, सन्त की जो परम्परा है और सन्त की जो भावना है, आप उन भावनाओं को लेकर के चलिए।
हम यह कब कह रहे हैं कि आप बाबाजी हो जाइए। हम बाबाजी नहीं बना रहे। तुम्हें हम बाबाजी कहाँ बना रहे हैं? बाबाजी नहीं बना रहे, लेकिन सन्त पथ पर चलने का अनुयायी बना रहे हैं। हम यही सिखा रहे हैं और ये कह रहे हैं कि बेटे आज का यह दिन संकल्प का दिन है। आप संकल्प लीजिए कि हमको सन्त बनना है।
आप सन्त हैं कि नहीं, हमें नहीं मालूम। ऊपर से आप पीले कपड़े पहन लो या काले कपड़े पहन लो, इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं है। पीले पहन लेंगे तो उसका असर पड़ता है।
बेटे! दूसरों की देखा-देखी हम नहीं चलते। हमारी पोशाक का रंग पीला है, जिसे हम पहनते हैं। आपने तो ऊपर का चोला रंग लिया, लेकिन भीतर को नहीं रँगा। आप अंतरंग को रँगिए। आप भीतर से सन्त बनिए। भीतर से आप सन्त बन गए तो जो भी आपके पास बैठेगा, वो प्रभावित हुए बगैर नहीं मानेगा और भीतर से सन्त नहीं बने हैं तो? तो कहीं-न-कहीं, कुछ-न-कुछ विकृति आती ही चली जाएगी और यही विकृति एक-से दूसरे में छूत की बीमारी का काम करेगी। हम आपको सन्त बनाना चाहते हैं।
संकल्प का पर्व
आज संकल्प का पर्व है तो हम आपको यह याद दिलाने के लिए आए हैं कि आप याद करिए। आपके गुरुजी ने संकल्प लिया था कि जो जनमानस त्राहि-त्राहि कर रहा है, पाप और पतन की पीड़ा से कराह रहा है—इनके लिए ज्ञान की गंगा को बहाना है। इनको शान्ति देनी है। इनको सन्तोष देना है, इनको ज्ञान देना है, इनको शक्ति देनी है, इनको भक्ति देनी है।
आप भी आज यह संकल्प कीजिए कि हमको उसी रास्ते पर चलना है, जिस रास्ते पर गुरुजी और माताजी चल रहे हैं। बेटे! धन-दौलत तो आपने कमा ली होगी न? कमा ली हो तो कोई जरूरत नहीं है। इसकी जरा भी जरूरत नहीं है। गाँधी जी के पास कोई भी दौलत नहीं थी। आधी धोती पहनकर के रहते थे। हम और आप तो पूरी धोती पहनकर के रहते हैं और आपके शान्तिकुञ्ज ने आपके लिए कितना बड़ा मकान बना दिया है।
उनके पास तो 10' x 10' की कोठरी मैंने देखी है, जैसे गुरुजी की है। 10'x 10' की अखण्ड ज्योति में भी है। अब तो उसमें जरा कुछ उलटा-पुलटा कर लिया है। इतना ही नहीं, गुरुजी जहाँ भी रहे, जिन्दगी काटी है, आप वहाँ जाकर के देखिए कि पंखा भी नहीं था। घर में बिजली भी नहीं थी। लालटेन की रोशनी में लिखा है। कौन से ग्रन्थ? गायत्री महाविज्ञान और चारों वेदों से लेकर के और जाने क्या-क्या लिखा है।
यह जो परम्परा है, उस सिद्धान्त पर, उस पथ पर हम आपको चलाना चाहते हैं। उस पथ पर आप चलेंगे तो आपको प्रसन्नता भी होगी, आपको सन्तोष भी होगा। दूसरों से ईर्ष्या-डाह भी नहीं होगा। नहीं तो अपने से जो बलवान है, उससे हम जलते रहेंगे। यह ज्यादा कमाता है। इसके पास ज्यादा पैसा है। यह अय्याशी से रहता है, हम नहीं रह पाते और हमें रहना नहीं है। जब हमको रहना ही नहीं तो हमें ईर्ष्या किस बात की? किसी बात की नहीं है। इस तरीके से हम संकल्प कर लें तो जीवन धन्य हो जाएगा।
बेटे, आज का दिन संकल्प का दिन है। संकल्प हनुमान जी ने लिया था, संकल्प अर्जुन ने लिया था और संकल्प बेटे किन-किन लोगों ने लिया था? मैं आपको कहाँ तक गिनाऊँ? जितने भी ऋषि हुए हैं, उन ऋषियों ने संकल्प लिया था। जनमानस की माँ गायत्री माता की उपासना, गायत्री मंत्र की उपासना विश्वामित्र ने की थी। राम ने की थी। कृष्ण ने की थी। ये ऋषियों का मंत्र है। ये ऋषियों की माँ हैं और ये जनमानस की माँ हैं।
संकल्प के ही बारे में जैसा कि मैं अभी आपसे कह रही थी, आज मेरे मन में आया कि मुझे आज संकल्प के बारे में ही कहना चाहिए। आज हम यह संकल्प लें कि हमारे समाज में जो अनीति और अत्याचार फैल रहा है—जहाँ दहेज की प्रथा है, जहाँ हमारी लड़कियाँ बलिवेदी पर चढ़ाई जा रही हैं और हमारे मन में यह संकल्प नहीं आता कि हम यह कहें कि हम अपने लड़कों की शादी में दहेज नहीं लेंगे और न उन नौजवानों के मन में आता है और न नारियों के मन में आता है कि हमारे माँ-बाप कहेंगे तब भी हमको नहीं लेना है।
दहेज न लें
दहेज लेने में नारियाँ सबसे आगे हैं। नर तो सबसे पीछे हैं, नारियाँ सबसे पहले हैं। यदि वो अपने बेटे के कान में कह दें कि बेटा तेरा बाप कहता है तो कहने दे, पर मैं तेरा साथ देती हूँ तू मत लेना, फिर देखें कैसे आ जाता है, लेकिन वो सबसे पहले आगे आती हैं और कहती हैं कि मेरा तो अकेला बेटा है, मैंने तो इंजीनियर बनाया है और मैंने तो डॉक्टर बनाया है। मेरा तो अकेला लड़का है और मैं तो 5 लाख लूँगी। किस बात के लिए लेगी 5 लाख?
मैंने तो अपनी सहेलियों का लिया है, मैंने तो अमुक का लिया है, मैंने तो तमुक का लिया है। मैं दूँगी। बहुत अच्छी बात है देना चाहिए, दे रही है तो दे। वैसे देना तो नहीं चाहिए। हम तो इसके खिलाफ़ हैं कि क्यों देना चाहिए? लिया क्यों है और क्यों दे रहे हो? देना है तो अपने पति की कमाई में से देना।
बेटी के बाप ने क्या दिया है, बेटी का बाप मुआवजा चुकाएगा क्या? यह आग हमारे अन्दर पैदा नहीं होती। हमारे अन्दर वो भावनाएँ पैदा नहीं होतीं कि हम अपने बच्चों में ऐसा संस्कार डालें कि वे गई-गुजरी परिस्थितियों में भी दिन काट सकें। हम तो उनको लग्जरी सिखा रहे हैं। हम तो बेटियों को लग्जरी सिखा रहे हैं। उनका पहनावा-ओढ़ावा तो ऐसा है, जिसको देखकर के शरम आ जाती है। बनावट, बनावट, हर किसी में बनावट, लड़कों को ऐसे बिगाड़ रखा है, लड़कियों को बिगाड़ रखा है। ये कहाँ जा रही हैं।
पाश्चात्य सभ्यता को हम लेकर के चलेंगे क्या? हम तो सन्त-परम्परा के अनुयायी हैं और हम अपने बच्चों को पाश्चात्य सभ्यता में रखेंगे तो हम उन्हें अपने ढाँचे में कैसे ढालेंगे। उनको ढलना चाहिए और हम उन्हें जबरदस्ती ढालेंगे। बेटे! यह संकल्प कौन लेगा? यह संकल्प आप लेंगे। नाक कटती है तो कटवा लेते हैं। नाक तो एक दिन कटनी है तो कट-कटा के गिरे, छुट्टी हो।
नहीं साहब! ऐसा नहीं होगा तो फिर कैसे होगा? हमारे यहाँ मृत्युभोज तो होगा ही। हमारे जाति वाले क्या कहेंगे? हमारी तो नाक कट जाएगी, नाक कटेगी-तो-कटेगी, लेकिन हमें वो काम करना चाहिए, जो सन्त-परम्परा में आता है। आपसे मुझे यही निवेदन करना था। आज आप संकल्प करिए। जिन्होंने संकल्प किया, उन्होंने सारी जिन्दगी बहुत अनुदान और वरदान पाया है। इतना पाया है कि बेटा हम तो निहाल हो गए।
हे भगवान! ऐसा अनुदान, वरदान हर किसी को देना। गायत्री माता जैसी हमको फलीभूत हुई हैं, जैसी हमारे ऊपर सवार हुई हैं, ये हर किसी के ऊपर सवार हों, सबके लिए ये हमारा आशीर्वाद है। जैसा आशीर्वाद हमको मिला है, वैसा आप सबको भी मिले, लेकिन आप सब जब तक हंंस के तरीके से नहीं बनेंगे, तब तक गायत्री माता नजदीक नहीं आ सकतीं, तब तक आपके हृदय में नहीं बैठ सकती हैं।
(क्रमशः अगले अंक में समापन)
संकल्प की अपार शक्ति
(गतांक से आगे)
विगत अंक में आपने पढ़ा कि परमवन्दनीया माताजी अपने इस हृदयस्पर्शी उद्बोधन में समस्त श्रोताओं को संकल्प की अपार शक्ति से परिचित कराते हुए कहती हैं कि संकल्प में हजार हाथियों के बराबर बल होता है। वे परमपूज्य गुरुदेव का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए गायत्री परिजनों को स्मरण दिलाती हैं कि परमपूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन में साधना के जिस हिमशिखर को स्पर्श किया, उसका मूल आधार अटूट संकल्प ही था। गायत्री जयन्ती के पावन अवसर पर दिया गया उनका यह उद्बोधन हर गायत्री-उपासक को यह भी याद दिलाता है कि सही अर्थों में गायत्री मंत्र का उद्देश्य भी संकल्प का जागरण ही है। वन्दनीया माताजी माँ गायत्री और माँ गंगा को एक बताते हुए कहती हैं कि माँ गंगा का अवतरण भी संकल्प का ही परिणाम है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को ........
करुणा का स्रोत—अखण्ड ज्योति
बेटे, आपके सिर पर गायत्री माता तब तक सवार नहीं हो सकती, जब तक आप भगीरथ जैसा संकल्प नहीं करेंगे। जैसे युग के भगीरथ ने संकल्प लिया है और गायत्री माता बेटे उनके हृदय में विराजमान हैं और जिसके हृदय से करुणा का स्रोत फूटता है। आप जरा अखण्ड ज्योति को तो पढ़िए।
वो क्या है? करुणा का स्रोत है। जो करुणा सुबह के समय फूटती है, बस, उसमें जो अन्तःकरण से नहा लेता है, वो पा लेता है और धन्य हो जाता है और जो अन्तःकरण से नहीं नहाया, वो प्यासा ही रह गया।
यहाँ एक सज्जन आए और कहने लगे कि माताजी! हमारे यहाँ अखण्ड ज्योति आती है, कई साल से आती है। अच्छा बेटा, आती है तो बहुत अच्छी बात है। फिर वह अपने आप बोल पड़े कि माताजी! आती तो है, पर मैं आपके सामने झूठ नहीं बोलूँगा। लखनऊ का था। 25 साल पहले 20 रुपये थे अब 25 रुपये हो गए। मैं पढ़ता नहीं हूँ। तो मैंने कहा कि बेटा हमें तेरे 25 रुपये नहीं चाहिए, तू किसी गरीब को दे देना, उसका उद्धार हो जाएगा।
पढ़ना है तो मँगाओ, नहीं पढ़ना है तो मत मँगाओ। इसको पढ़ेगा तो इससे तेरे दाम्पत्य जीवन से लेकर व्यक्तिगत जीवन तक, कौटुम्बिक हो या सामाजिक अथवा राष्ट्रीय जो समस्याएँ हैं, वो सुलझती हुईं चली जाएँगी। पढ़ तो सही।
ज्ञान की गंगा में नहाएँ
अरे! अभागे पढ़ता तो है नहीं, अन्तःकरण में जाता नहीं है, ज्ञान की गंगा में नहाता तो है नहीं, फिर कैसे तेरे पाप कटेंगे? तेरा पाप नहीं कटेगा। न इस जीवन में कटे न अगले जन्म में, तू तो ऐसा-का-ऐसा ही रहेगा। यह शब्द नहीं कहना था, पर मैं आपके सामने जब आ ही गई हूँ तो मन खोल करके क्यों न कह देना चाहिए।
मन खोल करके मैं आपसे निवेदन कर रही हूँ कि इस गंगा में आप भावविभोर होकर के गोते लगाएँ। भावविभोर होकर के गोते लगाएँगे तो आपको अनेक मणि-माणिक्य मिलते हुए चले जाएँगे। ऐसी दौलत मिलती चली जाएगी, जिसका नाम हीरा है, पुखराज है, पन्ना है और जाने क्या-क्या है? वो अपार दौलत—अपार सम्पदा आपको मिलती हुई चली जाएगी।
मैंने निवेदन किया है कि गोता लगाएँगे तो पाएँगे, गोता नहीं लगाएँगे, किनारे पर ही बैठे रहेंगे तो बैठे रहिए आप गंगा के किनारे, प्यासे-के-प्यासे रहेंगे। ‘‘जल बिन मीन प्यासी रे, मोहि सुन-सुन आए हासी रे।’’ सुन-सुनकर हमें हँसी आती है कि गंगा के किनारे बैठे रहे और कुछ पाया भी नहीं। प्यासे-के-प्यासे ही रह गए, उस महासत्ता से भी जुड़े रहे और अज्ञान के अँधेरे में भी पड़े रहे। अरे इससे ज्यादा और क्या विडम्बना हो सकती है।
जीवन में परिवर्तन लाएँ
यह विडम्बना है कि जिससे हम जुड़े हैं, उसका हम अनुकरण नहीं कर सके। उसको अपने जीवन में हम उतार नहीं सके, हम प्रलोभन में ही पड़े रहे। हम मोह, माया की जंजीरों में ही जकड़े रहे। तो उससे जुड़ने से क्या लाभ हुआ? फिर तो ये भीड़ इकट्ठी हो गई। चलो सोमवती अमावस्या का मेला है। चलो गंगा जी नहाएँगे, चलो गायत्री जयन्ती मनाएँगे।
हम भी चल रहे हैं, आप भी चलिए। अच्छा बेटा चलो बहुत अच्छी बात है, पर गायत्री जयन्ती का अर्थ भी आपने समझा क्या? गायत्री माता को अपने अन्तःकरण में भी उतारा क्या और जिससे आप जुड़े हैं, उसका अनुकरण भी क्या किया आपने?
अपने जीवन में कोई परिवर्तन भी लाए क्या? नहीं? सो तो हम नहीं लाए, जैसे-के-तैसे हैं। जैसे थे वैसे हैं, तो फिर आप कैसे शिष्य बन गए? कैसे गुरुजी से जुड़ गए? और कैसे माताजी के बेटे हो गए और कैसे गायत्री माता के साधक हो गए, जरा बताना तो सही। आप तो कुछ भी नहीं हो गए, जो कुछ आप कहते हैं, वही हो गए।
संकल्प लीजिए कि हम जहाँ जुड़े हैं, उनका हमको अनुकरण करना है। अपने जीवन में अनुकरण करना है और आगे हमको उसका विस्तार करना है।
बेटे, अनुकरण तो किया आपने कि एक कोने में जाकर बैठ गए। माताजी हम तो अनुकरण कर रहे हैं। क्या अनुकरण कर रहे हैं? जैसे गुरुजी-माताजी हैं, हम वैसे ही बनने का प्रयत्न कर रहे हैं। कैसे? गुरुजी-माताजी ऐसा बोलते हैं, ऐसा चलते हैं, ऐसा कहते हैं, हम भी ऐसा ही कहेंगे। ये तो ऊपर की भाषा हुई न, अन्तरंग से बनो और अन्तरंग से बनकर गुरुजी का काम करो। बेटे, गुरुजी केवल कोने में नहीं बैठे। उन्होंने कितना विस्तार किया है, इस विराट स्वरूप को आप जरा देखो तो सही। आपने उनका विराट स्वरूप नहीं देखा।
विराट स्वरूप आपने देख लिया होता तो फिर आप राम की तरह से बन गए होते। कृष्ण की माँ ने विराट स्वरूप देखा था तो कृष्ण को समझ लिया था और कौशल्या ने राम का विराट रूप देखा था तो वो समझ गईं कि ये भगवान राम हो सकते हैं। ये भगवान का अवतार हो सकते हैं। तो फिर उनके गुण कैसे हो सकते हैं? उनका गुण ऐसा हो सकता है तो फिर घरवालों का कैसा होना चाहिए?
महान बनिए
बेटे, मैं आपसे निवेदन कर रही थी कि आप जब जुड़ रहे हैं और जुड़ चुके हैं, तो अपने अन्दर उस भावना और श्रद्धा को थोड़ा-सा पनपने दीजिए और इसको ऊँचा उठने दीजिए। अभी तो वो छोटा-सा पौधा है, इसको वृक्ष के रूप में आने दीजिए, ताकि वृक्ष इतना बड़ा हो जाए कि हर व्यक्ति उस पेड़ के तले बैठ करके शान्ति अनुभव कर सके, सन्तोष अनुभव कर सके, प्रेरणा पा सके। आप ऐसे महान बनिए।
आप महान बनेंगे तो हमको सन्तोष भी होगा और प्रसन्नता भी होगी और हम ये भी कहेंगे कि हम अपने पीछे एक ऐसे जनसमूह, एक ऐसे सन्त छोड़ करके जा रहे हैं, जो हजारों और लाखों साल तक यह सन्त-परम्परा चलती हुई चली जाएगी। आपको देख करके लोग चलेंगे? आप नहीं बने, तब नहीं चलेंगे।
आपको बनाने के लिए हम भरसक प्रयास कर रहे हैं और आप न बने तो फिर हम क्या कर सकते हैं? बताइए आपके गले में तो नहीं डाल सकते हैं? आपके हाथों-में-हाथ हम नहीं डाल सकते हैं, आपके पाँव-में-पाँव नहीं लगा सकते हैं। हम तो केवल आपको विचार दे सकते हैं, आपको भावनाएँ दे सकते हैं।
जहाँ तक ऊपर उठाने का प्रश्न है, हम पूरी-पूरी कोशिश करेंगे। करते हैं और करते रहेंगे। आपने पाया भी होगा कि जब-जब आपके ऊपर कोई दिक्कत, कठिनाई, परेशानी आई है, हम उस परेशानी में कितने सहायक हुए हैं? आपका अन्तःकरण बताता होगा, हमें बताने की आवश्यकता नहीं है कि हम बताएँ। हम बताएँगे तो यह अहंकार होगा।
हमारा जो फर्ज और कर्तव्य था, वो हमने पूरा किया। जो हमें करना है, वो तो हम आजीवन करेंगे। हमने यह बीड़ा उठाया है कि हमारे ऊपर कोई जोखिम आती होगी तो हम सहज उसको स्वीकार करेंगे, लेकिन आपको दलदल में से निकालने का पूरा-पूरा प्रयास करेंगे। आपके भाग्य को बदल देंगे, यह कोई गारण्टी नहीं। बिलकुल गारण्टी नहीं है। मनोकामना तो कहाँ किसी की पूरी हुई? किसी की पूरी नहीं हुई। दशरथ की नहीं हुई। सुभद्रा की नहीं हुई, तो आप किसकी मनोकामना पूरी कर देंगे।
नहीं बेटे, हमारे बस की बात तो है नहीं और कहीं चला जा। जिस पर तुझे विश्वास होता हो कि ये सारी मनोकामना पूरी कर देता है तो उसके पास में चला जा, हमारे बूते की तो बात नहीं है। हमारा तो जितना तप का अंश होगा और आपका जो प्रारब्ध का योग होगा, वो आपको मिलता हुआ चला जाएगा और चलता गया भी है। हम तो उसकी ओर आपको संकेत करते हैं कि चाहे आपके दुःख और कष्ट दूर होते होंगे कि नहीं होते होंगे, भगवान जाने। भगवान करे शक्ति हो तो हो ही जाए।
गुरुजी-माताजी की शक्ति
अभी एक लड़का आया था। उसका एक्सीडेंट हो गया और ऐसा भयंकर एक्सीडेंट हुआ कि उसे बचने की उम्मीद नहीं थी। वो कहता है कि उस समय ऐसा मालूम पड़ा कि गुरुजी-माताजी ने मुझे गोद में उठा लिया है और जिस दिन आया तो वो रो गया।
उसने कहा कि माताजी! उस दिन मैंने शक्ति का अनुभव किया कि वास्तव में शक्ति होती है। वह शक्ति मेरे साथ है। इधर से भी ट्रक और उधर से भी ट्रक, उसकी गाड़ी पिचककर बिलकुल चकनाचूर हो गई और वो उसमें बैठा रहा। केवल उसके पैर में फ्रैक्चर आया।
वो अभी लन्दन से लौटा है और मसूरी गया है। बेटे औरों का भी कल्याण हुआ है। मैं नाम तो नहीं लूँगी, जिसकी कि 90% नस ब्लॉक पाई गई और यह कहा गया कि यह तो पाँच वर्ष पहले से नस ब्लॉक है।
उन्हीं के शब्दों में जिन्होंने कहा कि माताजी! मुझे कई बार याद आता रहा कि आपने और गुरुजी ने कहा था कि किसी को साथ में ले जाया कर, अकेला मत चला कर। जब देखो अकेला चलता रहता है। माताजी ऐसा मालूम पड़ा कि मैं इसी के लिए गया था कि जाने गुरुजी की शक्ति क्या है। आकर दोनों पैरों से लिपट गया।
माताजी! आपने कहा क्यों नहीं। अरे बेटा, कहती तो तेरा मनोबल नीचे गिर जाता। अगर यह कहती कि कोई अशुभ घड़ी आने वाली है, इसलिए हमको नहीं जाना चाहिए, हम तेरा मनोबल क्यों तोड़ेंगे।
हम तो कोई मरता भी होगा, तब भी यही कह देंगे कि अभी मरने वाला नहीं है। जानते हैं कि ये मरेगा और मर चुका है, पर हमने कभी किसी की आशा को नहीं तोड़ा। हमेशा आशावादी ही बने रहे। हमेशा जबान से यही कहा। हमने कभी किसी को गिराया नहीं है, जीवन भर उठाया है।
बेटे, पाँचवें दिन वह अपने काम पर चला गया। जिसका ऑपरेशन हुआ हो और जिसके हृदय की नस-नली 90% ब्लॉक हो, आप अनुमान लगाइए कि वो कैसे कामयाब हो गया?
बेटा यह तो हमारा कर्तव्य था, हमने पूरा किया है। भगवान करें सभी का भला हो। प्रारब्धवश किसी को सहयोग नहीं मिल सकता हो तो यह उसका प्रारब्ध हो सकता है, लेकिन हमारे मन में तो सभी के लिए शुभकामनाएँ और सद्भावना है और हर किसी के लिए हम करते रहेंगे।
चाहे हमें जीवन का कोई भी मुआवजा क्यों न चुकाना पड़े और चाहे कोई भी मुसीबत हमको मोल क्यों न लेनी पड़ी हो। कोई शारीरिक रोग अपने ऊपर लेना पड़ा हो तो लेंगे भी। रामकृष्ण परमहंस को अन्तिम समय पर गले का कैंसर हो गया था।
बेटे! एक लड़का आया। उसने मुझसे एक सवाल किया तो मालूम पड़ा कि कोई ऐसे ही बददिमाग है। उसने कहा कि गुरुजी की उम्र कितनी हो गई? मैंने कहा कि हो गई होगी अस्सी साल के करीब। तो उनके कमरे में ताला क्यों लगा रहता है? जरूर कोई बात होगी।
उसने कहा कि तो बीमार होने चाहिए। क्यों बीमार होने चाहिए? क्या मतलब है तेरा? छत्तीस को उठाकर अभी फेंक देंगे। अकेले उनकी वाणी के सामने तो ठहर ही नहीं सकता, शरीर की बात तो पीछे आएगी। पहले तो जबान ही ऐसी है कि तू टिक ही नहीं सकेगा।
बीमार क्यों पड़ेंगे? हम बीमार नहीं हैं और न कभी बीमार हो सकते हैं। कभी नहीं पड़ेंगे, क्यों पड़ेंगे? मान लीजिए 1% हो भी जाएँ तो जिन्होंने लाखों को जबान दी, सो उनका क्या होगा?
बेटे! लाखों को जबान देते हैं और कहते हैं कि बेटा तेरा भला कर देंगे, तो चुकाना नहीं पड़ेगा क्या? उसे या तो बेटा चुकाएगा या माँ-बाप चुकाएँगे। कर्जा तो कर गए तो कोई तो उसे चुकाएगा। हम इसे चुकाने में समर्थ हैं तो हमको खुशी होगी कि हम आपकी कोई सेवा कर पाए।
माँ-पिता का हृदय
बेटे, हम बच्चों की सेवा कर पाए, इससे अच्छा हमारा और सौभाग्य क्या हो सकता है? छोटा बच्चा होता है, पेशाब करता है, टट्टी करता है और माँ पलट-पलट करके खुद गीले में सोती रहती है और बच्चे को सूखे में सुलाती रहती है। बीमार पड़ता है तो सारी-सारी रात जागती है। कौन? माँ जागती है। कौन जागता है? पिता जागता है, नौकरी भी करता है, डॉक्टर को भी लाता है, पेट पर पट्टी बाँधता है।
घर में खाने को नहीं है, लेकिन बच्चे के लिए चाहे कर्जा लाना पड़े, चाहे जो भी लाना पड़े, लेकिन बच्चे को हर हालत में वो डॉक्टर के पास ले जाता है, दवा-दारू कराता है। उसके भविष्य की चिन्ता करता रहता है कि मेरा बच्चा कैसे महान बने। कैसे इसको ऊँचा उठाऊँ, कैसे इसको पढ़ाऊँ-लिखाऊँ। कैसे इसको रोजी-रोटी दिलाऊँ, जाने क्या-क्या ख्वाब माँ-बाप देखते रहते हैं। बेटे! बिलकुल हमारी दशा भी वही है।
सच मानना बिलकुल हमारी दशा वही है। आपके ऊपर जब कोई दुःख-कष्ट आता है तो ऐसा मालूम पड़ता है कि यह वज्र मानो हमारे ऊपर टूटा है। इस वज्र को कैसे हल करें, किस तरीके से हल करें? आप नहीं जानते कि जब हम हल नहीं कर पाते तो हमारे अन्तःकरण में आपके लिए जो पीड़ा होती है, उसको हम ही जानते हैं।
माताजी! फिर पीड़ा से आप क्या करते हैं? रोते रहते हैं? नहीं बेटे, रोते तो आप होंगे, हम रोते तो नहीं हैं, पर हम उसी क्षण तिलमिला जाते हैं और पीड़ित के पास जाते हैं। उसके पास जाते ही यह कहते हैं कि बेटी तुझे परेशान होने की जरूरत नहीं। परेशान मत होना। तेरे साथ तेरी माँ है, तेरा पिता है। बेटे! परेशान मत होना, जरा भी हैरान मत होना, हम तुम्हारे साथ हैं न। हम तुम्हारे सुख में ही साथ नहीं हैं, लेकिन आपके दुःख में भी हम जरूर आपको मनोबल देंगे, आपको सहारा देंगे, आपको हिम्मत देंगे, आपको बल देंगे, आपको प्रेरणा देंगे, ताकि उस संकट की घड़ी को आप झेल सकें।
आप तिलमिलाकर के पागल हो जाएँगे, मर जाएँगे, न मालूम क्या-क्या हो जाएगा? पर हम आपको डगमगाने नहीं देंगे। कोई भी परिस्थिति क्यों न हो, चाहे आपके इनकम टैक्स की हो, चाहे सेल्स टैक्स की हो, चाहे आपकी पारिवारिक हो, चाहे जो भी हो, हर हालत में हम आपको बल और शक्ति देते हुए चले जाएँगे। अभी भी दे रहे हैं और आगे भी हम नहीं भी रहेंगे, तब भी आप आना यहाँ।
अखण्ड दीप में गुरुसत्ता
आपको आमंत्रण है कि जो आपने पल्ला पकड़ा है तो इसको छोड़ना मत। आप फिर यहाँ आना और वही प्रेरणा, वही शान्ति और सन्तोष, वही शक्ति और भक्ति आपको मिलती हुई चली जाएगी, जो इस समय आपको मिल रही है। आप शान्तिकुञ्ज में आ करके एक-दो मिनट बैठना तो सही, आप अखण्ड दीपक को प्रणाम तो करना और उसमें देखना कि गुरुजी-माताजी दिखाई पड़ते हैं कि नहीं दिखाई पड़ते।
शान्तिकुञ्ज में आना और देखना, हर जगह आपको गुरुजी-माताजी दिखाई पड़ेंगे। यदि आपका दृष्टिकोण सही है तो और आपका दृष्टिकोण गलत है तो हम बैठे हैं तब भी आपको नहीं दिखाई पड़ेंगे, क्योंकि आपने अपने हृदय को नहीं खोला।
आँख को खोला है और आपने शरीर देखा है, लेकिन आपने उन सिद्धान्तों को, भावनाओं को अंतरंग में झाँक करके नहीं देखा है। जैसे कि काकभुशुण्डी ने भगवान राम के पेट में जाकर के देखा था।
उतना साहस आप कहाँ जुटा पाए, उतना साहस आप नहीं जुटा पाए। इतना साहस आप जिस दिन जुटा लेंगे तो फिर आप अन्तः करण में देख पाएँगे। अंतरंग को जब आप देख लेंगे तो फिर आप निहाल हो जाएँगे।
बेटे, आप निहाल हो जाएँगे जैसे कि शक्ति को पाकर के हम निहाल हुए, आप भी उस शक्ति को पाकर के निहाल हो जाएँगे, जो अनवरत रूप से बरस रही है, लेकिन हम कैसे भाग्यहीन हैं, जो उसको नहीं ले पा रहे हैं, उसको सँभाल नहीं पा रहे हैं। उसको हम आँचल भरकर के नहीं ले पा रहे हैं।
हम झोली नहीं फैला रहे हैं और न हम अपने हृदय के कपाट को खोल रहे हैं। जरा खोलें तो सही और फिर देखिए गायत्री माता आती हैं कि नहीं आतीं।
अरे, माताजी! कल आई थीं, हमने सपने में देखा था गायत्री माता को। कैसा देखा? हंस पर सवार थी, मुकुट पहने थी और कुछ कह रही थी, कुछ हँस रही थी। अच्छा बेटा, इतनी दूर से गायत्री माता आई तो फिर तेरे जीवन में कोई परिवर्तन हुआ कि नहीं? सो तो मेरे जीवन में कुछ नहीं हुआ। तो फिर कहाँ से स्वप्न में गायत्री माता आई। स्वप्न में तो जाने क्या-क्या देखते हैं, सपने में पानी में डूबना देखते हैं। ब्याह-शादी देखते हैं और जाने क्या-क्या देखते हैं। कहीं रेल में चलने, हवाई जहाज में चलने के सपने देखते हैं।
संकल्प के पर्व पर संकल्प लें
बेटे, गायत्री माता की अनुकम्पा तेरे ऊपर बरसती भी रही तो भी तूने नहीं देखा। तू अनभिज्ञ ही बना रहा। उस अनुकम्पा को ग्रहण करता। जैसे गाँधी जी ने हरिश्चन्द्र नाटक देखा था और नाटक देख करके अपने जीवन का परिवर्तन कर डाला। हरिश्चन्द्र अपने गुरु के लिए बिक गया था। आप तो अन्त तक स्वप्न देखते रहते हैं, नींद आती नहीं है, पेट को ज्यादा भर लेते हैं, स्वप्न नहीं आएँगे तो और क्या आएगा। वही स्वप्न नाना प्रकार का रूप ले लेते हैं। हम नाना प्रकार का रूप न दें और उसको सही स्वरूप दे दें तो फिर हम समझेंगे कि वास्तविकता को हमने पा लिया है।
मेरा आपसे यही निवेदन है कि आज यह संकल्प का पर्व है और आज के ही दिन माँ गायत्री का अवतरण हुआ, माँ गंगा का अवतरण हुआ। माँ गंगा को लाने में भगीरथ ने तपस्या की और युग के भगीरथ ने ज्ञान की गंगा लाने के लिए संकल्प किया और माँ गायत्री को लाने में सफल हो गए और जनमानस के हृदय में उन्होंने उतार दिया। आप भी संकल्प कीजिए कि जो बचा हुआ शेष कार्य है, उसको हम पूरा करेंगे। जैसे कि मैंने अभी प्रथम बार कहा था, उसकी पुनरावृत्ति तो होती जरूर चल रही है, लेकिन जो मुँह में शब्द आते हैं, वो रुकते नहीं हैं, वो बार-बार ही कहने चाहिए, बार-बार ही पाठ कराना चाहिए।
युधिष्ठिर से ‘सत्यम् वद’ शब्द याद करने के लिए कहा गया। अगले दिन कहा कि तुमको क्या पाठ याद हो गया? कहा नहीं गुरुजी! अभी नहीं हुआ और सब लोग कहते हुए चले गए कि हमको याद हो गया, सुन लीजिए और सब कहते हुए चले गए।
गुरुजी ने युधिष्ठिर से कहा कि क्या बात है तुम क्यों नहीं कहते हो? तुम तो इतने योग्य हो। उन्होंने कहा कि गुरुदेव! ये जबान से कह रहे हैं, मैंने अभी धारण नहीं किया है। जिस दिन मैं धारण कर लूँगा, उस दिन मैं कह दूँगा और जिस दिन उन्होंने धारण कर लिया, उसी दिन उन्होंने सुना दिया अर्थात हमको धारण करना चाहिए और संकल्प करना चाहिए कि हम भी इस योग्य बनें कि माँ गायत्री की अनुकम्पा हमारे ऊपर बरसती हुई चली जाए। फिर आपके सामने तो साक्षात् गुरुजी बैठे हैं। गायत्री माता की इतनी कृपा आपके ऊपर बरसती रही है और हर परिस्थितियों में माँ सहारा देती हुई चली गई हैं और अपने कलेजे से लगाती ही चली गई हैं और कहा है कि बेटे मैं तेरे साथ हूँ। तूने तो मेरा उद्धार किया ही है, पर मैं भी तेरा उद्धार करके रहूँगी और सही मानना गायत्री माता का उद्धार हुआ, गायत्री माता के बेटे का उद्धार हुआ। दोनों का उद्धार हो गया और साथ-साथ में आपका भी उद्धार हो गया। आपका भी होगा, चूँकि एक-से-एक जुड़ते हुए चले गए न। बेटे, आप का भी उद्धार हो गया।
भगवान करे और भी जो थोड़ा-बहुत रह गया, वो भी आपका उद्धार हो जाए। अब मैं यहीं पर अपनी बात समाप्त करती हूँ। आज का यह पर्व, गायत्री माता का पर्व, शक्ति का पर्व है। उस शक्ति से हम प्रार्थना करते हैं कि हे माँ गायत्री! आपकी शक्ति सारे-के-सारे जनमानस में फैलती हुई चली जाए और ये शक्ति आपको भी मिले, आपके परिवार को मिले, आपसे मिलकर के सारी जनता को मिले, समाज को मिले, राष्ट्र को मिले और सारे विश्व को शक्ति मिले। जिस शक्ति की प्यास में हम तड़प रहे हैं, जिस शक्ति के लिए जनमानस तिलमिला रहा है। उस शक्ति को पा करके धन्य हो जाएँ। खुशहाल हो जाएँ, प्रसन्न हो जाएँ, सन्तुष्ट हो जाएँ। बस, इतनी ही बात कहनी थी। भगवान आपका कल्याण करें।
आज की बात समाप्त