जीवन के देवता को, आओ तनिक सँवारें

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों में यह एक अद्भुत सामर्थ्य सन्निहित है कि जहाँ एक ओर वे साधना-पथ के किसी भी पथिक का आध्यात्मिक मार्गदर्शन करने में सक्षम हैं तो वहीं आस्थावान गायत्री परिजनों की श्रद्धा को प्रगाढ़ करने में भी समर्थ हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में वन्दनीया माताजी हर परिजन को स्मरण दिलाती हैं कि उनका पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी के साथ का सम्बन्ध एक जन्म का नहीं, वरन अनेकों जन्मों का है। वे बताती हैं कि पूज्य गुरुदेव ने अपनी तपश्चर्या का एक अंश लगाकर हर गायत्री परिजन को हीरे के रूप में तैयार किया है, परन्तु जैसे गर्त के नीचे दब जाने पर हीरा अपनी चमक खो बैठता है, वैसे ही हम भी आत्मिक प्रकाश के अभाव में अपने जीवन-पथ से विमुख नजर आते हैं। इसीलिए वे सभी को पथ न छोड़ने को प्रेरित करती हैं। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को ..........

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

आप जानें आप हैं कौन?

हमारे आत्मीय परिजनो! क्या आपने कभी अपने बारे में विचार किया है कि आपका असली स्वरूप क्या है? अभी आपने अपने स्वरूप के बारे में नहीं जाना है। आपके स्वरूप के बारे में हमने जाना है कि आप वस्तुतः हैं कौन। आपको नहीं मालूम है कि आप कौन हैं? आपको इस जन्म के बारे में भी नहीं मालूम है कि आप किस सत्ता से जुड़े हैं और आप हैं कौन? अभी आपको मालूम नहीं है, पर हमको मालूम है।

हमें मालूम है कि आप हमारे साथ जन्म-जन्मान्तरों से साथ चले आ रहे हैं और इस जन्म में भी आप हमारे साथ हैं। कितनी मेहनत और कितनी मशक्कत आपको बनाने वाले ने की है, आपने कभी अनुमान लगाया है क्या?

नहीं, आपने नहीं लगाया। हीरा हैं आप, लेकिन आपकी जो चमक है, वो धुल गई है अर्थात गर्त में दब गई है। अब खराद लगाना बाकी है और उस गर्द को निकालना बाकी है। धूल को हटाइए और खराद लगाइए। खराद लगाने वाला अभी मौजूद है। वो आपके ऊपर पॉलिश करेगा और आपको ऐसा चमचमा देगा कि बस क्या कहने का है।

बेटे, जिस किसी ने भी सच्चे मन से पल्ला पकड़ा है, उसको हमने कभी निराश नहीं होने दिया। कभी वो निराश हुआ ही नहीं ये दावा है, सब के लिए चैलेंज है कि कोई भी लड़का या लड़की जो भी सच्चे मन से आया है—झूठे मन से नहीं बेटे, झूठ से हमको चिढ़ है, झूठ से हम अभी लाखों कोस दूर हैं।

सच्चे मन से जिसने पुकारा है तो हम दौड़ते हुए भागे हैं, चाहे हमको जान की बाजी क्यों न लगानी पड़ी हो, लेकिन उस बच्चे की मदद के लिए हम पूरी तरह आतुर हैं और वो मदद होती रहती है। मनोकामनाएँ? बेटे मनोकामनाएँ तो किसी की पूरी नहीं हुईं। आपकी पूरी हो जाएँगी? नहीं, इसमें शक है।

मनोकामनाएँ पूर्ण नहीं होतीं

यदि मनोकामना है तो इस जीवन में आपकी मनोकामना पूरी नहीं हो सकती। क्यों नहीं हो सकती? किसी की पूरी नहीं हुई तो आपकी कैसे हो जाएगी? राजा दशरथ की? राजा दशरथ की पूरी नहीं हुई। राम के बिछोह में तड़प-तड़पकर मर गए।

जबकि भगवान राम चाहते तो अपने पिता की मदद कर सकते थे और कृष्ण का अकेला भानजा अभिमन्यु था और सुभद्रा रो-रोकर कह रही थी कि भैया! तेरा एक भानजा था और तुझे ज़रा भी दया नहीं आई? अपनी बहन के ऊपर ज़रा तो दया आनी चाहिए थी। तेरी एक बहन, जिसका इकलौता बेटा समर में मारा गया और तू देखता रह गया?

उनने कहा कि बहन! हूँ तो मैं भगवान इसमें कोई शक नहीं, पर प्रारब्ध को मिटाने वाला नहीं। प्रारब्ध तो मुझे भी भोगने पड़ेंगे। मनोकामना कहाँ पूरी हुईं? बिलकुल पूरी नहीं हुईं। किसी की पूरी नहीं हुईं, आपकी भी पूरी नहीं होंगी, लेकिन हम आपको उस तरीके का बनाना चाहते हैं जो फौलादी हो और आपसे क्या कहें? बेटे! अभी मैं कह रही थी कि आप तो हीरा हैं। जिस दलदल में आप पड़े थे, आप लोगों को उस दलदल से निकालने में कितनी मेहनत की है।

हीरे हैं आप

आपको नहीं मालूम है कि गुरुजी ने कितनी तपश्चर्या का अंश आप में लगाया है और आपको जैसे मणि-माणिक्य की माला होती है, मोतियों की माला होती है, उस तरीके से आपको पिरो करके एक सूत्र में बाँध करके रखा है।

माला एक सौ आठ दाने की होती है। वो जपने के काम आती है। खण्डित? नहीं खण्डित नहीं आती है। उसमें से एक दाना कम हो जाए तो? नहीं, वो जपने के योग्य नहीं रहेगी। गुरुजी ने आपको माला के रूप में पिरोया है। आप यह मत समझना कि आप कुछ नहीं हैं। आप बहुत बड़ी हस्ती हैं, लेकिन अपने बारे में आपको जानकारी नहीं है, अज्ञानता है। इसे अज्ञानता ही कह सकते हैं। जो मोह की जंजीरों में जकड़े हुए हैं उनको और क्या कहेंगे? बेचारे कहेंगे और दूसरा शब्द तो नहीं है। उनसे यही कह सकते हैं कि बेचारे हैं।

आप अपने स्वरूप को समझिए और ये समझिए कि हम इतनी बड़ी सत्ता से जुड़े हैं। बेटे गुरुजी सत्ता हैं। माताजी ये क्या कह रही हैं, सत्ता हैं? अरे सत्ता नहीं हैं तो और कौन हैं, बता। तो गुरुजी सत्ता हैं। इतनी बड़ी शक्ति हैं कि आपसे जितनी तारीफ की जाए, जितना उनके बारे में कहा जाए, उतना ही थोड़ा होगा और उनके साथ जुड़ने पर भी आप ऐसे-के-ऐसे ही रहे, तो बेटे आने वाला वक्त हमको भी धिक्कारेगा और आपको भी धिक्कारेगा। आपको धिक्कारेगा कि ऐसी महान आत्मा के साथ जुड़ करके भी गन्दे, गलीज-के-गलीज ही रह गए।

महान बनिए आप

यह क्या हुआ? ज़रा भी इनके ऊपर उस महानता का असर नहीं पड़ा। थोड़ा-बहुत असर पड़ा होता तो आप में से प्रत्येक साहस के साथ निकल करके आया होता कि हम हैं। राम की सहायता करने के लिए नल, नील, हनुमान, जामवन्त जाने कितने-कितने खड़े हो गए थे। कौन? बन्दर। उनकी क्या औकात थी? कोई औकात नहीं थी। राम चाहते तो लंका पर विजय पा सकते थे और पाई भी, लेकिन श्रेय उनको दिया। किनको? बन्दर-भालुओं को।

जो सच्चे मन से जुड़ गए थे और उन्होंने कहा कि जब तक हम सीता माता को वापस नहीं लाएँगे तब तक हमको चैन नहीं है, हम चैन की नींद नहीं सो सकते। हमारी माँ का अपहरण हो गया है और हम चैन से सोएँगे? नहीं, हमारे लिए धिक्कार है।

जो हमारे आराध्य देव हैं, जिनको हम आराध्य कहते हैं। जिनके अन्तर में ज्वाला जैसी धधक रही हो और चट्टान पर कोई असर न हो। चट्टान पर कहीं पेड़ उगते देखे हैं? नहीं, उस पर कभी नहीं उगते। क्यों नहीं उगते? इसलिए नहीं उगते कि उसने वो भूमि बनाई ही नहीं है। वो तो चट्टान है। उस पर जो पानी पड़ता है, सो ढलता हुआ चला जाता है। चट्टान जैसा हृदय, पाषाण जैसा हृदय, उसके लिए क्या कहेंगे? बेटे, बन्दर, भालू सब खड़े हो गए।

उन्होंने कहा नहीं हमको सीता को वापस लाना ही है और सारे-के-सारे बन्दर, भालू, रीछ जो भी थे, सब खड़े हो गए। श्रेय किनको मिला? हनुमान को। कौन हो गए हनुमान? हनुमान बेटे भक्तों में अग्रणी हो गए।

बेटे, आपको मालूम है कि कृष्ण ने अर्जुन का रथ चलाया था और हम भी दावा करते हैं कि आपके जीवनरथ को हम चलाएँगे। आपके पिता-माता दोनों आपके जीवन के रथ के दो पहिये हैं। आप यह मानकर चलना कि हम आपके जीवन के रथ के दो पहिये हैं, हम आपको किनारे से लगाएँगे, आप डूब नहीं सकते। कहीं विलग नहीं हो सकते।

गुरुदेव माताजी का वायदा

हम आपको किनारे से लगाएँगे, ये हमारा वायदा है। हम डूबेंगे तो आप डूबेंगे, हम नहीं डूबेंगे तो आपको भी नहीं डूबने देंगे। आप स्वयं ही डूबेंगे तो फिर हम हम क्या कर सकते हैं? फिर हम कुछ नहीं कर सकते हैं। आप डूबेंगे तो फिर हम चिल्लाएँगे कि अरे! हमारा बेटा कहाँ चला गया? अरे कहाँ खो गया? अरे वो किधर चला गया? अरे वो तो मझधार में डूब गया।

हमने कभी बहुत सोचा था और यह कहा था कि इसको तो हमको बचाना है। उँगली भी पकड़ी, हाथ भी पकड़ा, झकझोरा भी, सब कुछ किया, लेकिन निरर्थक चला गया। निरर्थक क्यों चला गया? इसलिए चला गया कि उसके ऊपर कोई असर नहीं हुआ था। बेटे! आप मत जाने देना। जैसा कि लड़के अभी कह रहे थे कि हमको थामे रहना। बेटे! हम सच्चे हृदय से कहते हैं कि हम आपको थामे रहेंगे।

यह वायदा है। आप चाहे जब देखना, सोते-जागते हर समय आपके साथ-साथ उँगली पकड़ करके जैसे एक माँ बच्चे को घुमाती है, चलाती है, बेटे इसी तरीके से हम आपकी उँगली पकड़ेंगे और कहेंगे बेटा चल, हम तेरे साथ हैं, तू क्यों घबराता है।

संस्कृति की सीता को कौन बचाएगा?

संस्कृति की सीता को लाने में क्या आप पीछे रह जाएँगे? आपको पीछे नहीं रहना चाहिए। आपको वही स्वरूप याद करना चाहिए, जो कि भगवान राम के समय पर अनेकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। जिसमें गिलहरी भी शामिल थी, जिसमें शबरी भी शामिल थी। पढ़े-लिखे? नहीं बेटे, भावनाएँ अलग हैं और शिक्षा अलग है।

शिक्षा के लिए तो हम क्या कहें? शिक्षा तो आजकल जाने कहाँ की मारी हमें कहाँ ले जा रही है? भावनाविहीन, पाषाण हृदय, जिनके अन्दर कुछ भी चहल-पहल नहीं है। ये तो बिलकुल निर्जीव हैं। बिना पढ़ी-लिखी थी, कौन? शबरी। उसने कहा कि यह भगवान राम का रास्ता है, मैं अपने राम का रास्ता साफ करूँगी। मैं कैसे चैन से रह सकती हूँ।

बेटे आपको वही समय याद करना पड़ेगा, भगवान राम के समय का और भारतीय संस्कृति की सीता को वापस लाने के लिए आपकी वही भूमिका होनी चाहिए, जो कि नल और नील एवं जामवन्त और हनुमान की थी। बिलकुल वही आपको भूमिका अदा करनी है।

बेटे, समय निकल जाएगा, हो सकता है और होगा भी, न मानो तो आप अलग हो करके देख लीजिए। असली हों तो हमारे साथ जुड़े रहना और जो नकली चेहरे हों सो बेटे कृपा करके अपने-अपने घर वापस चले जाना। हम हाथ जोड़ते हैं।

इनमें से हमारे जो दो, पाँच, दस होंगे, तो हम सीना ठोककर कहेंगे कि ये हमारे हैं। थोड़े से ही सही, पाँच ही सही, दस ही सही, जो कुछ हैं सो मुबारक हैं, पर हम यह तो कहेंगे कि ये हमारे हैं।

अभी तो हमें यही विश्वास नहीं है कि हमारे कौन-से हैं? हमारे वो हैं, जो हमारे सिद्धान्तों के लिए और विचारों के लिए कटिबद्ध हैं, वो हैं हमारे। वो हमारे नहीं हैं बेटे, जो यह कहते हैं कि नहीं माताजी हम तो पैर धोकर ही ले जाएँगे। हमने कहा न बेटा ला उलटे हम तेरे पैर धोते हैं। हमारे पैर कोई मत धोओ, हमें नहीं धुलवाने पैर। हमें पैरों पर ज़रा भी विश्वास नहीं है कि पैर धो करके आपका कुछ भला हो सकेगा।

भटकिए नहीं, मार्ग पर रहिए

हमें बिलकुल कतई विश्वास नहीं है, क्योंकि वो आस्थाओं से ताल्लुक रखता है, वो विश्वास से ताल्लुक रखता है। आपका तो कोई विश्वास ही नहीं है, कोई आस्था ही नहीं है, कोई निष्ठा ही नहीं है। डाल-डाल और पात-पात, आज यहाँ, कल वहाँ, जाने कहाँ-कहाँ भटक रहे हैं। यह भटकाव नहीं होना चाहिए।

बेटे, अब आप सही रास्ते पर आइए, आपसे बहुत कुछ उम्मीद है, पर वो उम्मीद पूरी तभी होती है, जब आपका समर्पण भाव हो। जब तक समर्पण भाव नहीं है, तब तक व्यक्ति दो कौड़ी का है, उसका कोई मूल्य नहीं, कोई औकात नहीं है। समर्पण क्या चीज़ होती है? बेटे समर्पण वो चीज़ होती है कि एक गन्दा नाला होता है, आपसे यह कहें कि आप नाले में से पानी भर लाइए और उसका आचमन करिए, आप करेंगे? अरे माताजी! यह क्या कह रही हैं? इसमें तो टट्टी-पेशाब जाता है और हम इसमें से आचमन करें, यह आप क्या कह रही हैं? बावली तो नहीं हो गईं?

हाँ बेटा, ठीक कह रहा है, उसमें से नहीं लिया जा सकता और गंगा में से गंगाजल लिया जा सकता है और वो नाला जो गंगा जी में जा रहा है, उसका क्या हुआ? बेटे, यह तो गन्दा नाला था? अरे माताजी! गन्दा नाला तो था, लेकिन यह नाला गंगा में समर्पित हो गया, गंगा में मिल गया और गंगा में मिल करके वो एकाकार हो गया। जब एकाकार हो गया तो कहाँ रहा वो नाला? वो तो गंगा हो गया।

समर्पण का मूल्य

जब ईंधन आग के लिए समर्पित हो जाता है, तो उसका जो स्वरूप पहले था वो नहीं रहता। वो तो आग की लपटों के रूप में हो जाता है, क्योंकि वो आग में समर्पित हो गया। जो आग में समर्पित हो गया तो वो आग का रूप हो गया है। यह समर्पण है और एक समर्पण वो है पति और पत्नी का। न करे भगवान किसी का पति चला जाए, जल्दी मर जाए, तो उसकी पत्नी सारी-की-सारी दौलत की स्वामिनी हो जाती है। वेश्या होगी? कतई नहीं हो सकती, क्योंकि वो वेश्या है, उसमें स्वार्थ है और पत्नी? बेटे, अपना जी निछावर कर देगी; क्योंकि उसका समर्पण है। समर्पण है इसलिए वो सारी-की-सारी सम्पत्ति की अधिकारिणी हो जाती है। कौन? पत्नी। और वेश्या नहीं होती। बिलकुल हूबहू यही सम्बन्ध भगवान और भक्त, गुरु और शिष्य के बीच में होता है।

आपको मैं एक कहानी सुनाती हूँ। कहाँ बात तो कह रही हूँ इतनी गम्भीर और वो है ज़रा हँसी की। एक सेठ और सेठानी थे। सेठानी जो थी वो रोज कहती थी कि अरे तूने इतना कमाया, पर कभी तेरे मन में यह भी आया कि किसी को गुरु ही बना ले? उसने कहा कि तू ही गुरु बना ले, मैं किसी को गुरु-वुरु नहीं बनाता। बहुत दिन हो गए, रोज कहती थी कि देख आत्मपरिष्कार के लिए किसी के साथ जुड़ना बहुत जरूरी है।

विवेक का तो ध्यान रखो, अविवेकी तो मत बनो। विवेक यदि यह कहता है कि सही है तो जरूर करना चाहिए, पर वो सुनता ही नहीं था। एक रोज न मालूम उसे क्या सूझ आई; क्योंकि रोज जब नाप-तौल करता था तो कभी बेटे की कसम खाता था, कभी अपनी पत्नी की कसम खाता था।

एक दिन आया सो गले में कण्ठा बाँध करके आया और सेठानी से बोला कि अरी सेठानी! मैं तो आज दीक्षा ले आया हूँ, गुरु बनाकर आया हूँ। तुम गुरु बनाओगे? तुमसे तो गुरु लाख कोस दूर है, तुम क्या जानते हो गुरु के बारे में? अरी पगली तू नहीं जानती। क्या? देख जब मैं दुकान पर बैठता हूँ तो बेटे की कसम खाता हूँ तो मुझे यह लगता है कि मेरा बेटा मर गया तो मेरी सम्पत्ति का क्या होगा? मेरा पिण्डदान कौन करेगा? और जब मैं तेरी कसम खाता हूँ तो मुझे यह लगता है कि मेरी गृहस्थी बरबाद हो गई।

तू मर जाएगी तो मेरा दाम्पत्य जीवन कैसे चलेगा? वो खटाई में पड़ जाएगा। तो फिर क्या करते हो? जब कोई ग्राहक आता है तो यह कहता हूँ कि देख भाई मैं इसकी कसम खाता हूँ। मैं गुरु की कसम खाता हूँ। मैंने इसमें मिलावट नहीं की, पूरा तौलता हूँ। अब बेचारा जो कोई आता विश्वास करता कि भाई वास्तव में यह अब गुरु की कसम खा रहा है, तो सही करता होगा। उसने इसे अपना कर्म बना लिया। मैं तो यही विचार करती कि तूने जो गुरु बनाया है, वह इसके लिए बनाया है कि जो ग्राहक आवे वो उसी को चूना लगाता जा।

आत्मपरिष्कार के लिए भी कुछ करें

बेटे, यहाँ भी ऐसे ही पाला पड़ गया, धन-दौलत और बेटा-बेटी। बेटे तेरे आत्मपरिष्कार के लिए भी हमें कुछ करना है क्या? हमें कुछ नहीं चाहिए। तुझे विवेकी बनावें, तेरी बुद्धि में तीव्रता लावें, ताकि कुछ समाज की सेवा करे, कुछ राष्ट्र के काम आए। जिस राष्ट्र में हमने जन्म लिया है, उसके लिए भी कुछ करना है। नहीं साहब ! उससे हमें क्या लेना-देना है? हमारी तो बीबी है और बच्चा है, इससे ज्यादा और हमें क्या चाहिए?

बेटे, अभी जो मैंने दीक्षा की बात बताई, मैं आपकी आस्था को नहीं डिगाना चाहती हूँ, पर सौ में से अस्सी फीसदी जिन्हें आग है। आपको बुरा लगे तो लग जाए, लगेगा तो क्या करेंगे? आप तो हमारे बच्चे हैं। लग जाएगा तो देखा जाएगा, वैसे भी तो माँ डाँटती है, फटकारती है, आप यही समझ लेना। हमारे अन्दर में जो आग जल रही है, इसके लिए कोई नहीं आता, जो यह कहता हो कि हम भी आपकी आग में हिस्सेदार हैं, हमको बनाइए, आपके सुपुर्द हैं। एक व्यक्ति भी हमको ऐसा मिल जाता तो हम धन्य हो जाते बेटे ।

गाँधी जी को एक विनोबा भावे मिल गए और गाँधी जी भी धन्य हो गए और विनोबा भावे भी धन्य हो गए; क्योंकि विनोबा भावे गाँधी जी से जुड़ गए और गाँधी जी से जुड़ गए तो वे दूसरे सन्त हो गए और गाँधी जी के मुकाबले के हो गए। कौन? विनोबा भावे हो गए। भूदान के लिए उन्होंने कितना काम किया? बड़ा जबरदस्त काम किया है। शिष्य तो ऐसे होते हैं।

बेटे, अभी मैंने आपसे निवेदन किया है और मैं आपको किन-किन के नाम बताऊँ। मैंने कल-परसों ही आपको शिवाजी के बारे में निवेदन किया था, चन्द्रगुप्त के बारे में निवेदन किया था कि चन्द्रगुप्त नाचीज, एक जरा-सा लड़का था और वो जुड़ गया तो कहाँ-से-कहाँ उसको पहुँचा दिया।

विवेकानन्द, जो कि नौकरी माँगने के लिए गए थे, लेकिन गुरु ने देखा कि लड़के के अन्दर वो बीज है, वो तत्त्व है कि इसको निखारा जा सके। उन्होंने कहा कि बेटे, तू नौकरी माँगने आया है? मैं तो तुझसे कुछ और काम लेने वाला था। यह तू क्या बला लेकर आया।

नौकरी तो मैं भी नहीं करता, तुझे कहाँ से दिलवा दूँ? न मुझे तो दिलवा ही दो। उनने कहा कि मैं तो नहीं दिलवा सकता, जा काली माँ के पास जा और जब काली माँ के पास गए तो ऊपर से नीचे देख करके हक्का-बक्का हो गए। फिर आए अपने गुरु के पास ।

उनने कहा— ‘‘गुरुजी कुछ नहीं चाहिए, मुझे केवल आपकी शक्ति चाहिए।’’ उन्होंने कहा—‘‘बेटे ले तू शक्ति।’’ जिनके पास शक्तियाँ हैं, वो शक्ति देने के लिए व्याकुल हैं, पर हो तो सही कोई। आते तो वो रावण हैं, भस्मासुर हैं, जो खुद का सर्वनाश कर जाएँ और दूसरे का भी बंटाढार कर दें। अगर कहीं सच्चे भगीरथ मिल जाएँ तब? तब क्या कहने का।

भक्तों में अग्रणी बनें

ऐसे अनेकों हुए हैं जो भक्तों में अग्रणी हैं, जिनको कि हम सही भक्त कह सकते हैं। राम-लक्ष्मण मिल जाएँ तो? आ हा... फिर क्या कहने की। फिर तो विश्वामित्र के यज्ञ की रखवाली हो जाएगी और जो काम वो कराना चाहते थे, वह काम भी हो जाएगा।

बेटे, हम भी वही चाहते हैं। जहाँ आपका स्वार्थ है, वहीं हमारा भी स्वार्थ है। हमारे स्वार्थ को आप समझ नहीं पाए हैं। आप इतना समझ गए होते कि शायद मिशन को हमारी कोई जरूरत है, पैसे की आवश्यकता है तो मजा आ जाता। हाँ बेटे, वो भी आवश्यकता है। उसके लिए भी नहीं नकारा जा सकता है। इतनी बड़ी बिल्डिंग है और इतना खरचा हम लेकर बैठे हैं, तो पैसे से ही चलेगा, लेकिन देख पैसे से ज्यादा तेरी वो निष्ठा और तेरी वो श्रद्धा हमको चाहिए।

हमको तेरा पैसा नहीं चाहिए, ले जा अपने पैसे को। हमें तो तेरी श्रद्धा चाहिए और हम जो कह रहे थे कि हमको चाहिए दाहिना हाथ। दाहिना हाथ बनेगा कि बायाँ हाथ बनेगा? बन! तू कौन-सा बनता है? जो भी बनता है हमको मंजूर है। दाहिना हाथ बनेगा?

नकली नहीं, असली बनिए

हम बहुत खुशनसीब हैं। चल बायाँ ही बन जा, वो भी हमको मंजूर है। बेटे, पर आप सही रहना, असली रहना, नकली से हमको चिढ़ है, आप नकलीपन सामने मत लाना। नकली चेहरे से हमको कुछ एलर्जी हो गई है। आप असली रूप में सामने आना। आप असली रूप में सामने आएँगे तो फिर देखिए कि आपको हम क्या-क्या बनाते हैं। बेटे मैं समझती हूँ कि आपको अपने कलाकार के प्रति थोड़ी-सी विश्वास की कमी है।

आपको यदि यह विश्वास हो जाए कि यह कलाकार ऐसी बढ़िया मूर्ति गढ़ता है कि बस, आनन्द आ जाता है। जाने कितने तो लेखक पैदा कर देता है, जाने कितने गायक पैदा कर देता है, जाने कितने वक्ता पैदा कर देता है और न मालूम उसकी जी की तड़पन है कोई सन्त तो बन जाए, बस, सन्त ही नहीं बनता। सन्त बनाने की चाहत है हमको कि कोई ऐसा भी हो कि जो सन्त बनकर दिखाए, जो हमारे पदचिह्नों पर चल करके दिखाए कि हाँ हम आपके साथ हैं, देखिए हम सन्त बनते हैं।

विनोबा भावे तो सन्त बन गए थे, लेकिन आप अभी सन्त नहीं बने। हम चाहते हैं कि आप में से उठ करके आएँ और सन्त-परम्परा को जिन्दा रखें, ब्राह्मणत्व को जिन्दा रखें। अभी ब्राह्मणत्व को जिन्दा नहीं रखा गया है। ब्राह्मणत्व क्या होता है? ब्राह्मणत्व वो होता है, जो अपने लिए कम और दूसरों के तयीं ज्यादा, दूसरों के लिए ज्यादा कार्य करता है।

हमारे देश में गरीबी से लेकर के, दहेज से लेकर के और जाने क्या-क्या कुरीतियाँ फैली हुई हैं। उनके निवारण के लिए हमने कोई कदम उठाया क्या? उठाया है तो आप सही हैं और नहीं उठाया है तो अब उठाइए। जहाँ कहीं विकृतियाँ हैं, आप चुनौती दीजिए, साहस से खड़े हो जाइए। नहीं मैं-मैं करके रह जाते हैं। अजी क्या करें? माताजी! हम तो वहाँ गए थे, तो हमारा साहस नहीं पड़ा। बेटा तेरा साहस क्यों नहीं पड़ा? माताजी! इतने विरोधी थे कि हिम्मत नहीं पड़ी।

कौन विरोधी था? अरे वो हमारे बगल में जो बैठा था। अच्छा, बड़ा जबरदस्त मोटा हट्टा-कट्टा होगा? और तुम कितने थे? अरे माताजी! हम तो कोई सौ थे, पचास थे, पर हम तो उस बगल वाले से डर गए।

बेटे, ये तेरी क्षुद्रता है कि गुण्डे के आगे हम सर झुका गए। क्यों? गुण्डे का मुकाबला नहीं करेंगे? एक घूँसा मारेंगे तो उसकी लीद निकाल देंगे। तो क्या होता? कुछ नहीं होता। साहस के साथ में आपको आना पड़ेगा। जो भी अपने समाज के सुधार के लिए आपको करना है तो पहले अपने आपके चिन्तन की सफाई करनी पड़ेगी, अपने आप की सफाई करिए। दिल की, दिमाग की, भावनाओं की आप सफाई करिए। इस लायक आप बन जाइए।

[क्रमशः अगले अंक में समापन]

परमवन्दनीया माताजी की अमृतवाणी

जीवन के देवता को, आओ तनिक सँवारें (उत्तरार्द्ध)

परमवन्दनीया माताजी के व्याख्यानों की यह विशिष्टता रही है कि उनके उद्बोधन गायत्री परिवार के प्रत्येक परिजन को अपने जीवन की दिशा को निर्धारित करने का संकल्प प्रदान करते हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में वन्दनीया माताजी स्मरण दिलाती हैं कि साधक की साधना का अन्तिम शिखर उस आत्मदेव से परिचित होना है, जिसके जाग्रत होने पर जीवन की प्रसुप्त सम्भावनाएँ स्वतः ही मूर्तरूप ले लेती हैं। वे कहती हैं कि वस्तुस्थिति में हमारा जीवन ही हमारे लिए देवता है और जो इसको सँवार लेता है, उसके जीवन में स्वतः ही स्वर्गीय परिस्थितियाँ विनिर्मित हो जाती हैं। हर गायत्री परिजन को वे उसका मूल्य याद दिलाते हुए कहती हैं कि हम लोग हीरे के समान मूल्यवान हैं और अपनी सम्भावनाओं के ऊपर गर्त डाल देने के कारण अपना मूल्य भूल बैठे हैं। आइए हृदंयगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को..........।

गढ़ने को तैयार हों

अभी मैंने कहा था कि आपको अपने स्वरूप के बारे में नहीं मालूम है, आप हीरा हैं। क्यों हीरा हैं? आपको बनाया गया है। आप स्वयं में कुछ नहीं हैं। कितने जन्मों से आप हमारे साथ हैं और कितने जन्मों तक अभी साथ रहने वाले हैं। आप सही समझना, जब तक हमारा बस चलेगा ठोंक-ठोंक करके पीट-पीटकर आपको दुरुस्त करेंगे।

सुनार होता है न, जेवर बनाता रहता है, गढ़ता रहता है। कभी कुछ बना देता है, कभी कुछ बना देता है और कुम्हार? कुम्हार जाने क्या-क्या बना देता है। खिलौने पर खिलौना, जाने क्या बनाता रहता है। हम भी कुम्हार हैं बेटे। मूर्ति को हम गढ़ना बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।

हम आपको गढ़ेंगे। अभी आप अनगढ़ थे, पर अब हम आपको गढ़ेंगे। कब? तब गढ़ेंगे, जब आपका भाव समर्पित होगा। समर्पण देश के लिए, समर्पण समाज के लिए। आपको अभी समर्पण भाव नहीं आया, यदि हमारे पास समर्पण भाव होता तो, फिर यह नहीं सोचते कि जो भी पूँजी है, जो भी हमारे हाथ में है, वो केवल हमारी है, हमारी बीबी की है, हमारे बच्चों की है।

नहीं बेटे, इसमें देश का भी हिस्सा है, इनमें उन गरीबों का भी हिस्सा है, समाज का भी हिस्सा है, इसमें तेरी बहन का भी हिस्सा है, इसमें तेरे बाप का भी हिस्सा है और इसमें तेरी माँ का भी हिस्सा है और इसमें तेरे गुरु का भी हिस्सा है और तेरे मिशन का भी हिस्सा है। सब का हिस्सा है, तेरे अकेले का कहाँ से है। अकेला पैदा हुआ था?

समाज के ऋण से मुक्त हों

बेटे अकेला होता तो अब तक जाने कहाँ पहुँच गया होता। जिस समाज में हो, जिस समाज ने बनाया है, जिस दिन पैदा हुए थे तो नंग-धड़ंग यों ही पैदा हुए थे। तो बेटे किसने बनाया है? समाज ने। जो कपड़ा पहनते हैं हम, कहाँ से पहनते हैं? ये समाज का दिया हुआ है। पैसे आपने दिए तो पैसे कहाँ से आए?

अब लगाइए हिसाब, कौन से छापेखाने में छपे, फिर कागज कहाँ हुआ, फिर वो मशीन कहाँ से पैदा हुई, कागज कहाँ से आया? फिर उसकी लिंक बनाइए। फिर ये कपड़ा कैसे बुना गया? सूत कहाँ से आया? फिर इसकी रूई कहाँ से आई? ज़रा हिसाब तो लगाइए कि जो आप धोती पहने बैठे हैं, जो कुरता पहने बैठे हैं, इसमें कितने लाखों लोगों का श्रम लगा हुआ है। तो उस समाज का कोई ऋण नहीं है आपके ऊपर? आपके ऊपर ऋण है, उस ऋण को आप चुकाइए।

बेटे, आप बगैर चुकाए जाएँगे तो मैं क्या कहूँ कि अगले जन्म में कौन बनेंगे, मालूम नहीं कौन बनेंगे? बनेंगे जरूर; कह दूँ कि नहीं कहूँ, बता? कह देना चाहिए, गधा बनोगे। गधा बनोगे बेटे और फिर गुरुजी पीछे से लगाएँगे डण्डा। ऋण है न तुम्हारे ऊपर, बनो गधे। तुमने इस जन्म में क्यों नहीं सोचा?

बेटे, जब तुमको ला करके यहाँ खड़ा कर दिया है और बना रहे हैं, फिर भी तुम नहीं चेत रहे हो, फिर भी नहीं सँभल रहे हो, तो फिर कब सँभलोगे? तो बनने के लिए तैयार हो जाओ। तो बेटे उसी दृष्टि से आप सोचना और वास्तव में सच्चे इनसान बनना है, ब्राह्मण बनना है तो आप उस पंक्ति में शामिल हो जाइए, जहाँ कि अभी संकेत किया गया है।

नारी को आगे बढ़ाएँ

बेटे नारी को भी आगे करिए। यह किसकी संकीर्णता है? बेटे यह नर की संकीर्णता है। यदि वह चलाए तो नारी आगे न चले? अरे बेटा! कैसे नहीं आगे चलेगी, जरूर चलेगी। वो तो ऐसे चलेगी कि बिलकुल छाया के तरीके से आपके पीछे-पीछे चलेगी। आपने तो कभी उसका विश्वास नहीं खरीदा, आपने कभी उसका प्यार नहीं पाया। कभी प्यार दिया नहीं है तो लोगे कहाँ से तुम? कभी भावनाएँ आपने दी नहीं हैं, तो आप लेने के भी हकदार नहीं हैं। आप इनको प्यार दीजिए, आप इनको सम्मान दीजिए, आप इनको आगे-आगे धकेलिए, संकीर्ण मत बनिए।

नर और नारी दोनों एक समान हैं। आधे को लकवा मार रहा है और आधा जाने स्वस्थ है, सानन्द फिर रहा है या नहीं? आधे अंग को लकवा क्यों मारेगा? इनको आगे आने दीजिए। आप से नहीं बनाया जाता है तो हम बनाने के लिए मौजूद हैं।

आप तीन-तीन महीने के लिए इनको भेजिए और तीन महीने में हम इनको बढ़िया क्वालिटी की लड़कियाँ बना देंगे। तीन महीने में बना देंगी? बिलकुल, तीन महीने में बना देंगे, फिर देखना। अरे माताजी आपने ये क्या कह दिया, अब तो ये ऐसी हो जाएँगी। उन बच्चों को जो छह-छह हमने पैदा कर दिए हैं, उनका क्या होगा?

नर और नारी एक समान

अरे बेटा, तो तीन महीने तू ही सेवा करके देख ले जरा, तुझे भी तो पता लग जाए। जब से ये पैदा हुए हैं तब से बेचारी वही मर रही है, खप रही है। रात को जागती है, रात को नींद पूरी नहीं होती, दिन में घर का सारा काम करना पड़ता है। तो तू ही ज़रा रोटी बनाकर देख कि कैसी बनती हैं। भले से ताजिया बनेगी, भले से हिन्दुस्तान का नक्शा बनेगा, करके देख ज़रा।

बना, हिम्मत कर। जो माँ सारी जिन्दगी कलेजे से लगा सकती है तो बाप में इतनी हिम्मत नहीं है कि ये भी करे कि तीन महीने अपने बच्चों को सँभाले, तो दाल-आटे का भाव मालूम पड़ेगा। मैं तो सबसे कहूँगी बेटियो, तुम अपने-अपने पति को खाना बनाना सिखाना, कहना माताजी ने कहा है कि खाना बनाना सीखो।

यहाँ इन्होंने थाली माँजना तो सीख लिया है, पर अभी इन लोगों को खाना पकाना नहीं आता है। खाना पकाना सिखाओ, इनको झाड़ू लगाना सिखाओ, उनको कप धोना सिखाओ। यहाँ इनको कपड़े धोने भी आ गए हैं। इनको घर-गृहस्थी का हर काम सिखाओ।

इक्कीसवीं सदी—नारी सदी

ये वैसे नहीं बाज आएँ तो यहाँ अब आप खाना पकाओ। हमने कह दिया है कि इक्कीसवीं सदी जो आ रही है वो महिलाप्रधान है, नारीप्रधान है। अब नहीं आने दोगे तो वो अपना हक माँगेंगी, सो बेटे आप सँभल जाइए।

विदेश में एक ऐसा देश है, नाम तो उसका अब मुझे याद नहीं है, लेकिन वहाँ जो मर्द हैं वो तो बुर्का पहनते हैं और महिलाएँ बाहर काम करती हैं। ठीक बात है, अब तक आपने हुकूमत की अब ये आपके ऊपर हुकूमत करेंगी। खैर रहने दो, यह बात तो ज़रा ठीक नहीं है, यह मैं किसी भी लड़की को नहीं सिखाऊँगी, न मैंने कभी जीवन में सीखा है, न मैं किसी और को सिखाऊँगी।

यह शिक्षा मैं किसी को नहीं दूँगी। मैं तो यह शिक्षा दूँगी कि यह त्याग की मूर्ति है, यह समर्पण की मूर्ति है, इसको आगे आने दीजिए। नारी को नारी का काम करने दीजिए। नर को नर का काम करने दीजिए। नर, नर में काम करें, नारी, नारी में काम करें। नहीं साहब! हम तो संकीर्ण हैं, हमारी औरत घर से बाहर नहीं जाएगी। हमारी लड़कियाँ थीं, जिन्हें हमने अपने पास रखा था।

इन्हें एम० ए० करा करके हमने बाहर उनकी शादी की। किसी को डॉक्टर, कोई इंजीनियर, कोई कमबख्त ऐसे संकीर्ण मिल गए कि लड़कियों को बाहर नहीं जाने देते। हमारी एकाध लड़की तो दबंग है, तो उसका पति ठीक है। उनने कहा कि मैं तो गुरुजी का काम नहीं कर सकता, पर तू कर। बाकी की तो लड़कियों को जैसे पति, परिवार मिलते हैं, सोई घर का चौका-चूल्हा मिल गया। घर से नहीं निकलने देते। जबकि ऐसी लड़कियाँ थीं कि कहीं भी हम उनको छोड़ दें तो ऐसी वक्ता और कर्मकाण्ड कराने वाली और संगीत में इतनी बढ़िया होशियार थीं कि आपसे क्या कहें।

उनकी सारी-की-सारी होशियारी बच्चों में चली गई, बच्चा पैदा करने में और घर की गृहस्थी का भार ढोने में चली गई। नहीं बेटे, इनको बैल मत समझिए। बैल का काम इनसे मत लीजिए। वो भी उतनी ही हकदार हैं। इनको आगे आने दीजिए। नारी को आगे आने दीजिए। वे आपकी बराबर की हिस्सेदार हैं, बराबर का काम करेंगी।

मैं उस दिन कह रही थी कि बेटे हम और गुरुजी एक और एक ग्यारह हैं और एक-दूसरे के लिए समर्पित हैं, एकदूसरे के लिए हम प्राण देते हैं। अभी मैंने कहा न कि हम दिखने में आपको दो शरीर दिखाई पड़ते हैं, लेकिन प्राण एक ही हैं। आप भी ऐसे ही बनिए कि एक और एक ग्यारह बनकर के कार्य करें। एक और एक ग्यारह बनें तब तो हमारे साथ जुड़ने की शान है कि हाँ साहब! किसी के साथ जुड़े थे। गुरुजी माताजी ने हमको भी इस लायक बना दिया, नहीं तो लाज के मारे घर में बैठी रहती थी।

गुरुदेव ने बदला जीवन

बहुत दिन हो गए एक महिला थी, वो आ करके रोई। गुरुजी! क्या करूँ? मुझे तो ऐसे आदमी से पाला पड़ गया है कि यह राक्षस न तो कहीं निकलने देता है और न कुछ करने देता है। खूब शराब पीता है और शराब पीकर मगरमच्छ-सा पड़ा रहता है। बकरा खाता है, मीट भी खाता है। तो गुरुजी ने एक बात कही। वो राजपूत घराने की थी।

उसने कहा कि हमारे राजपूतों में तो परदा नहीं खोलते। तो गुरुजी ने कहा कि भाड़ में गए राजपूत और ऊपर से गए उसके घरवाले। तू उठा घूँघट और चल अपने खेत में जा। नहीं तो बेटी तू बरबाद हो जाएगी। तेरी इतनी बड़ी हवेली है। वो रानी थी। उन्होंने कहा कि तेरी इतनी बड़ी हवेली और इतनी सारी तेरी जायदाद है, वो सारा चौपट कर देगा। लड़की ने गाँठ बाँध ली। उन्होंने कहा कि वो भी शिष्य था, अब वो धमका नहीं सका और लड़की आगे आ गई।

सारे-के-सारे जाने कितने तो मुकदमे चल रहे थे, सो सब लड़की ने अपने जिम्मे ले लिए और सारा खेती-बारी से ले करके और मकान-जायदाद तक का सारा काम अपनी मुट्ठी में, अपने हाथ में ले लिया।

बनिए और बनाइए

बेटे हम बनाने के लिए मौजूद हैं, लेकिन आप बनिए और उनको बनाइए। बेटे, आज आपकी विदाई है और आज आप जा रहे हैं। क्या सचमुच आपकी विदाई है? नहीं, सचमुच विदाई नहीं है। तो सच क्या है? सच यह है कि शरीर से आप जाएँगे, लेकिन अपने मन को आप यहाँ रख जाना। माताजी! मन किसके हवाले छोड़ जाएँ? बेटे, अपने गुरु के हवाले और अपनी माँ के हवाले। अपनी माँ के इस आँगन में, शान्तिकुञ्ज के प्रांगण में ही आप खेलना। छोटा बच्चा खेलता है तो माँ प्रसन्न होती है और माँ को देखकर बच्चा प्रसन्न होता है और उसका वजन दूना बढ़ जाता है। लक्ष्य को याद करना।

बेटे! आपको कोई दुःख, कष्ट, कठिनाई होगी तो हम आपकी मदद के लिए तैयार हैं। आपके हर संकट को दूर करने के लिए हम तैयार हैं, पर थोड़ी-सी हिम्मत आपको दिखानी पड़ेगी। आपसे हमारी अपेक्षा है। आप हमारी अपेक्षा पूरी करिए और जो आप अपेक्षा लेकर के आए हैं, आपकी अपेक्षा को हम पूरा करेंगे।

आप यह सोचकर आए हैं कि इतना बड़ा दाता है, इससे हमको कुछ मिलेगा। बेटे, आपकी झोली भरपूर भरेगी। हम दरिद्र किसी भी बच्चे को नहीं छोड़ेंगे। तो माताजी हमको कितना-कितना रुपया मिलेगा?

अरे बेटे, माताजी के पास तो रुपये हैं ही नहीं, तुझे कहाँ से रुपया माताजी दे देंगी? एक नए पैसे का कोई बैंक बैलेंस नहीं है, चाहे तू जहाँ देख आ। तो तुझे पैसे कहाँ से देंगे? लेकिन एक दौलत हम देंगे और वो दौलत देंगे मानवता की, और वो देंगे हम प्रेम की। जो प्रेम हमने सीखा है, उस प्रेम को सर्वत्र आप बाँटिए।

समाज में आज जहाँ छुआछूत के रूप में मानव, मानव को काटता ही चला जाता है। ये कौन हैं? ये फलाने हैं, ये फलाना सम्प्रदाय है, ये ढिमाका सम्प्रदाय है। आग लगा दो सम्प्रदाय में, कोई सम्प्रदाय नहीं है, एक ही सम्प्रदाय है और वो है मानव सम्प्रदाय और कौन-सा सम्प्रदाय होता है?

सन्तों का एक ही सन्प्रदाय होता है और वो होता है मानवता का। इस प्रेम को आप लेकर के जाइए। बेटे हमारे अन्दर एक ही दौलत है। वो हमारे अन्दर है प्यार। इस प्यार के सहारे को आप ले करके जाना। तो बेटे आपका गृहस्थ जीवन भी, पारिवारिक जीवन, दाम्पत्य जीवन और जहाँ समाज में आप बैठे हैं वो समाज वाले भी यही कहेंगे कि हाँ किसी से जुड़े थे।

हमारा सिर झुकने न देना

हाँ साहब! शान्तिकुञ्ज में कोई गुरुजी थे और उनसे ये जुड़े हुए थे, देखो कैसे कमाल के हैं। बेटे, हमारा सर नीचा मत होने देना, हमारा सर ऊँचा रहने देना और हम चाहते हैं कि जिस ऊँचाई तक हम पहुँचे हैं उसी ऊँचाई तक आपको भी हम लेकर के जाएँ। आपको वही सम्पत्ति हम देंगे, जो सम्पत्ति जन्म-जन्मान्तरों तक काम आती है। ये संस्कारों की सम्पदा हमारे जन्मों तक काम देती है। इस जन्म में भी काम देती है, अन्य जन्मों में भी काम देती है। आपको वो संस्कार हम देंगे।

आपको बल देंगे, आपको शक्ति देंगे, आपको सामर्थ्य देंगे। इससे ज्यादा और आपको क्या दे दें बेटे, बताइए कि हमको अमुक चीज की जरूरत है। पैसे की जरूरत है? जिस दिन इस दुनिया से जाएगा तो तेरे साथ पैसा जाएगा क्या? पैसा नहीं जाएगा। बेटे कहते हैं कि मुट्ठी बाँधकर आया बन्दे, हाथ पसारे जाएगा, तो बेटे मुट्ठी बाँध के आते हैं, हाथ फैलाकर जाते हैं। न हमारा पैसा साथ जाता है और न वो, जिसको हम कुटुम्ब और परिवार कहते हैं। वो परिवार भी हमारे साथ नहीं जाता। बेटे, हम अकेले आए हैं और अकेले ही जाएँगे तो क्यों हम अपना जीवन बरबाद करें? जो आपने कहा है कि हमारे बच्चे हैं, हमारी औरत है, हमारी माँ है, हमारी बहन है। ये छोटा-सा कुटुम्ब है, इस कुटुम्ब के लिए ही पैदा हुए हैं क्या आप लोग? इस कुटुम्ब के लिए पैदा नहीं हुए हैं, आप निकलिए,इस दलदल में से निकलिए, इस कीचड़ में से निकलिए।

हमें आपसे बहुत महान कार्य कराना है और गुरुजी ने जो सोचा है और जो उत्तरदायित्व आपको सौंपने वाले हैं, उसके लिए तैयार हो जाइए। जो अभी उन्होंने कहा था कि भाई हम तो अपना डेरा समेट रहे हैं। हाँ बेटे, अपना डेरा समेट रहे हैं, इसमें कोई शक नहीं है। समेटना अर्थात अपनी उन जिम्मेदारियों को आपको देना चाहते हैं तो फिर आप क्या करेंगी माताजी? अरे, आपको भी बुढ़ापा आ गया माताजी?

गुरुजी पर आ गया, आप पर भी आ गया। नहीं बेटे, यह बुढ़ापा तो एक कलंक है। बुड्ढा होगा तू और तेरे घरवाले, हम तो बुड्ढे न अब हैं, न पहले थे, कभी नहीं होंगे। मैं तो और काम कर रही हूँ। जब और काम करना है तो उसके लिए शक्ति की जरूरत है की नहीं? एकान्त में बैठने का मतलब यह था कि आप के लिए शक्ति उपार्जित की जाए और आपको उसे दिया जाए। जब होगा नहीं तो, हम दे ही नहीं सकते। जब हमारे पास नहीं होगा तो हम आपको देंगे क्या, कुछ नहीं मिलेगा।

हम आपके माता-पिता हैं

बेटे! आप पिता को कमाने दीजिए और फिर आप लीजिए। उसी शक्ति के लिए उन्होंने एकान्तवास लिया है। शायद आपको प्रणाम न मिले, यह कह नहीं सकती बेटे। आपका सौभाग्य है किसी को बुला लें तो बुला लें, लेकिन आगे आपको किसी को शायद नहीं भी बुलाएँ। तो आपकी माँ मौजूद है, जो आप पिता से कह सकते थे, वही आप माँ से कह सकते हैं। माँ तो और भी जरा संवेदनशील होती है।

कल कितने ही लड़के आए जो कि परसों भी प्रणाम न कर सके थे और बेचारे इसी उद्देश्य से आए थे, पर हमने कहा नहीं इनका तो ड्यू है। आपको झल्लाना हो तो मुझ पर झल्ला लीजिए, पर आप तो बैठ ही जाइए एक बार। तो फिर और भी घुस पड़े दो-दो, तीन-तीन बार, जो घुस पड़े तो घुस पड़े। तो बेटे अभी तुम्हारी माँ मौजूद है, आपका पिता मौजूद है।

आपको बल मिलेगा, आपको शक्ति मिलेगी, आपको सामर्थ्य मिलेगी। आपको भावनाएँ मिलेंगी, आपको दिशा भी मिलेगी। विचारों की जो सम्पत्ति है, विचारों की सम्पत्ति हमने जो पाई है, बेटे वो विचार हम आपको देंगे। हमने तपश्चर्या से जो सीखा है, जो तप किया है, वो सारे राष्ट्र के लिए किया है, सारे विश्व के लिए किया है, वही तप हम आपको सिखाना चाहते हैं। तो बेटे जो तप हमने किया है, इसमें से थोड़ा-सा हिस्सा तो बँटा लो और तुम भी तपस्वियों की लाइन में खड़े हो जाओ।

सादा जीवन उच्च विचार

आपको पीले वस्त्र क्यों पहनाते हैं? इसलिए पहनाते हैं कि और किसी को देख करके आपके मुँह में पानी न भर आए। ऐसा न लगे कि यह तो ऐसा टेरेलीन, टेरीकॉट पहने और हम तो ऐसे ही सूती पहने फिर रहे हैं। नहीं बेटे ऐसा ही पहन, पीला ही पहन। ये सादगी का चिह्न है, यही पहनना पड़ेगा।

आप अपने घर में यही परिपाटी डालिए। फालतू खरच हम नहीं करेंगे। फालतू खरच करने में कोई शान है क्या? हम बीबी-बच्चों को कस करके रखेंगे। कस करके रखने का मतलब भूखे मारना नहीं है, वरन यह अर्थ होता है कि लिमिट में जितना चाहिए, उतना ले लीजिए। अन्धाधुन्ध वो तुम्हारे लिए ही खरच करे और समाज के लिए कुछ नहीं करेंगे? नहीं बेटे, उसके लिए भी करना चाहिए।

बेटे! मैं आपसे विदाई के लिए कह रही थी कि आप आज विदा हो रहे हैं। कैसे-कैसे आप कष्ट उठा करके इतनी दूर से आए, हम जानते हैं। आपकी भावनाओं की हम इज्जत करते हैं। हम कसते तो हैं, कई बार कड़वी बात भी कह देते हैं, गुरुजी ने भी कई बार कहा है। मैं किसी से कभी भी नाराज नहीं होती। उदाहरण है जब से मैं आई हूँ, किसी ने मेरी नाराजगी नहीं सुनी होगी। नाराज होना मुझसे आता ही नहीं है, पर कभी किसी आवेश में मैंने कुछ कह भी दिया होगा तो आप बुरा मत मानना।

माँ का अधिकार

मैं माँ हूँ तुम्हारी और माँ हूँ तो मेरा आप पर अधिकार है। आप ऐसे नहीं सुनेंगे तो मैं जरा आपको डाँट के भी कहूँगी, आपकी मिन्नतें भी करूँगी, आपको पुचकार के भी कहूँगी। कहूँगी बेटा, देख मेरी इस बात को तू मान जा, नहीं मानेगा तो मुझे कड़क से भी कहना पड़ेगा। क्योंकि माँ हूँ न आपकी, इसलिए मुझे कहना पड़ेगा।

आप बुरा मत मानना। अब आप विदा हो रहे हैं, हमें भी बुरा लग रहा है। आप इतनी-इतनी दूर से आए, बेचारे रात भर चले, कोई तो हवाई जहाज से आया, कोई कहाँ से आया, कोई कहाँ से आया। हम आप लोगों को जरा भी कोई सुविधा न दे सके। कहाँ सुविधा दे सके? कोई यहाँ पड़ा है, कोई बरामदे में पड़ा है, कोई कहाँ पड़ा है। बेटे हम क्या करें, मजबूर हैं। आखिर यह आपका घर ही तो है, आपके ही घर में ही तो सब कुछ हो रहा है, तो बताओ सुविधा देगा कौन? तुम ही हो करने वाले और तुम ही चाहे सुविधा पा जाओ, चाहे मत पा जाओ।

आप ही अपने दिल को जरा चौड़ा करिए, हम इसमें क्या कर सकते हैं, लेकिन बेटे, हम आपकी भावनाओं को और आपकी निष्ठा को परखते रहते हैं। आप सब निष्ठावान हैं, आप सब भावनाशील हैं, आप बहुत आस्थावान हैं, बहुत श्रद्धालु और सिद्धान्तवादी हैं। आपके अन्दर आस्था है, भावना है, निष्ठा है, श्रद्धा भी आपके अन्दर है, हम ये नहीं कहते की आपकी श्रद्धा नहीं है। बेटे मैंने कहा भी था कि श्रद्धा का मतलब होता है—समर्पण। इसी समर्पण की थोड़ी-सी कमी है। भगवान वो भी पूरी करेगा।

हम नाउम्मीद नहीं हैं। नाउम्मीद न कभी हुए हैं, न होते हैं और न कभी भविष्य में होंगे। जब तक आप चलेंगे, तब तक हम आपको चलाते रहेंगे। भरसक हमारी यही कोशिश होगी कि हम हर बच्चे को ताकत और जुर्रत दें। किसकी? समाज में फैली हुई जो विकृतियाँ हैं, इनके लिए जेहाद बोलने की जरूरत है। इन विकृतियों को हटाना है।

इन विकृतियों को आप नहीं हटा पाएँगे? आप जिस मिशन से जुड़े हैं, जो विचार आपने पाए हैं, तो आपका यह और कर्त्तव्य हो जाता है कि आप लोग अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करें। इसी के लिए आप लोगों को बुलाया था।

इतनी-इतनी दूर से कितने-कितने कष्ट उठा करके आप आए हुए हैं, यह चिन्तन करते हमारी आँखों में पानी आ जाता है कि जरा-सा एक पत्र डाला है और बेचारे कहाँ-कहाँ से भागे आए हैं।

बेटे आप हमारे प्राणों से ज्यादा प्रिय बच्चे हैं, प्राणों से ज्यादा प्यारे हैं, पर थोड़ा-सा आगे आप चलना, बस, यही हमारी उम्मीद है। बस, इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात खतम करती हूँ। भगवान आपका कल्याण करें।

आज की बात समाप्त
॥ॐ शान्तिः॥