उपासना-साधना और आराधना

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि वे भावनाशील व्यक्तित्वों की भावना को उभारते हैं, प्रतिभावानों की प्रतिभा को निखारते हैं, चिन्तनशील व्यक्तियों को सोचने पर मजबूर करते हैं तो वहीं साधकों को साधना के लिए प्रेरित करते हैं। उनका यह प्रस्तुत उद्बोधन भी एक ऐसे ही भाव को जगाता-उभारता दिखाई पड़ता है। अपने इस मर्मस्पर्शी उद्बोधन में परमवन्दनीया माताजी कहती हैं कि उपासना, साधकों के जीवन के लिए ध्रुवतारे के समान है। जैसे पथ भटक जाने पर राही ध्रुवतारे का सहारा लेकर सही मार्ग पर आ जाता है—वैसे ही जीवन पथ से भटक जाने पर साधक, उपासना का सहारा लेकर सही पथ पर आ सकते हैं। वन्दनीया माताजी आगे उपासना का रहस्य समझाते हुए कहती हैं कि साधकों को उपासना के आध्यात्मिक आधार को अपनाने की आवश्यकता है, जिसमें जपसंख्या न देखकर उसके पीछे की भावना देखी जाती है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.......

हमारे जीवन का सम्बल—उपासना

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

बच्चो! उस दिन मैंने 'सज्जनों' से सम्बोधन किया था तो ये बच्चे मुझसे कहने लगे कि माताजी! आपने तो असमंजस उत्पन्न कर दिया। मैंने कहा—भाई! कैसे कर दिया?

उन्होंने कहा कि आज आपके मुँह से पहली बार हमने सज्जनों और देवियों सुना अथवा मातृशक्ति सुना। आपके मुँह से तो हमको वही शब्द सुनने चाहिए थे, जो हम आपके समीप बैठ करके सुनते हैं। बेटे! मेरी समझ में यह बात आ गई।

उन्होंने कहा कि जिस गद्दी पर बैठ करके मैं बोल रही थी तो उसमें मुझे यही सम्बोधन करना चाहिए था। उस समय मैं भूल रही थी कि ये मेरे बालक बैठे हैं। मेरे बच्चों से यह सहा नहीं गया इसलिए उन्होंने कह दिया। चलिए यह तो उस दिन की बात रही, मैं तो आपसे यह बात कहना चाहती थी कि उपासना हमारे जीवन का सम्बल है और उपासना हमारी मार्गदर्शक है।

उपासना हमको रास्ता बताती है और उपासना के सहारे हम बड़ी-से-बड़ी मंजिल को पार कर सकते हैं, लेकिन इसमें साधना बेटे! हमारी वो चीज़ है, जैसे जहाज में एक सूई लगी रहती है और वो हमको दिशा बताती रहती है। किसको? जो ड्राइविंग करता है, उसको दिशा बताती रहती है कि उत्तर को जाना है अथवा दक्षिण को जाना है। वो सूई जहाजवालों को मार्ग बताती रहती है, दिशा देती रहती है।

उपासना अर्थात ध्रुवतारा

बेटे! उपासना हमारे जीवन को दिशा देती है, जैसे ध्रुवतारा होता है, अँधेरी रात होती है और राहगीर उस छोटे से ध्रुवतारे का सहारा ले करके अपनी मंजिल को पा लेता है। चाँद-तारों का नहीं, चांँ-तारे अपनी जगह पर हैं, वो प्रकाश देते हैं, लेकिन उस ध्रुवतारे का सहारा लेकर के राहगीर अपने लक्ष्य को पा लेता है।

तो जो उपासना है, यह ध्रुवतारे के समान है और उस सूई के समान है, जो हमारे जीवन को लक्ष्य की ओर ले जाती है, लेकिन हम दिशाहीन होते हैं। हमको दिशा नहीं मालूम है। हम जो जिधर भटकाव है, उधर ही भेड़चाल में चल पड़े। अभी जब मैं इधर आ रही थी तो रास्ते में देख रही थी कि कई लड़के उधर से आ रहे थे।

कहाँ से? गंगा जी की तरफ से कोई नहाकर आ रहे थे, कुछ गंगाजल लेकर आ रहे थे तो मैंने उनको पढ़ा और देखा कि इनके जीवन में कितनी आस्था का अभाव है कि जहाँ भी आए हैं, इनको यह नहीं मालूम कि पूर्णाहुति का वक्त है या सैर करने का वक्त है।

यह इस वातावरण का प्रभाव है। गंगाजल पीछे भी ला सकते थे, यही समय आपको गंगाजल घर लाने को रह गया था, लेकिन बेटे मैं दिशाहीनता की बात कह रही हूँ। मैं उनकी गलती नहीं बता रही हूँ कि वो गलत हैं; क्योंकि जीवन में उन्होंने साधना को महत्त्व नहीं दिया, उपासना को महत्त्व नहीं दिया, आस्था को महत्त्व नहीं दिया, वे तो जिधर को चले तो भेड़चाल की तरह चल दिए।

नहीं बेटे! हमको लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उपासना आवश्यक है, पर मैं तो यह कह रही हूँ कि उपासना से ज्यादा आपको साधना पर ज़ोर देना पड़ेगा।

क्या है साधना?

साधना कैसी? माताजी उपासना साधना तो एक ही बात होती है? नहीं बेटे! दो होते हैं। उपासना हमको मंजिल बताती है और साधना हमको सिखाती है कि अपने ऊपर कड़ाई साधिए। यह जो अनगढ़पन है, बेटे! उसको गढ़िए। किसको गढ़ें? अपने को गढ़िए। तो कैसे गढ़ा जाएगा? ठोंक-पीट करनी पड़ेगी।

अरे बेटे! ठोंक-पीट हथौड़े से नहीं करनी पड़ेगी। ये दिमाग से करनी पड़ेगी और विचारों से करनी पड़ेगी। हम जो कुछ सोचते हैं, जो हमारा निगेटिव चिन्तन होता है, निगेटिव इससे हम इधर को चले जाते हैं, उधर को चले जाते हैं। कोई दिशा मिलती है, कोई धारा मिलती है कि नहीं मिलती है। तो बेटे अपने ऊपर कड़ाई करिए।

माताजी? अपने ऊपर कड़ाई कैसे करनी पड़ेगी? चलिए बेटे मैं एक-दो शब्दों में आपको बता देती हूँ कि कड़ाई किसको कहते हैं। कड़ाई वो चीज़ होती है जैसे रूई। रूई धुनी जाती है, वह जितनी धुनी जाएगी, उतनी ही वो फूलेगी। रूई को आप ऐसे ही रख दीजिए तो जैसा रखा था वैसे ही रखा रहेगा और जितना आप धुनेंगे, खूब फूलेगी, फिर चाहे जिसमें भरवा लो, गद्दे भरवा लो, रजाई बनवा लो, तकिये भरवा लो। आपका काम चल जाएगा।

तो बेटे! धुनना, अपने आप की रँगाई करनी और अपनी पिटाई करनी पड़ेगी। पिटाई करना, माताजी! आप यह क्या कह रही हैं? हमें सारी जिन्दगी पिटाई करनी पड़ेगी। आपको इस अनुष्ठान में ही करना पड़ा हो अथवा कर रहे हों, इतना ही पर्याप्त नहीं, वो तो आपको जीवनपर्यन्त तक अपनी धुलाई, रँगाई करनी पड़ेगी, जैसे बेटे गुरुजी ने अपने साथ में कैसी कड़ाई की।

अभी आपको कड़ाई नहीं मालूम पड़ रही है क्या? जो अभी भी 75 साल की आयु में भी बेटे कितनी कड़ाई करते हैं कि आप हैरान हो जाएँगे। जब मैं शाम को जाती हूँ तो बेटे मुझसे देखा नहीं जाता; जो हर समय अपने परिजनों से घिरे रहे, उपासना से उठे, साधना की, लेखन किया, अपने बच्चों से जो वायदा किया, जो समाज से वायदा किया है, उस वायदे को निभाने के लिए जुट गए। जुकाम, खाँसी सबको होते हैं। उनके जीवन में भी कई क्षण ऐसे आए तो प्रकृति के लिए क्या कह सकते हैं?

बेटे! सर्दी-जुकाम भी होता है, लेकिन बेटे उन्होंने अपने साथ में इस कदर की कड़ाई की कि जिस दिन शरीर ने गड़बड़ी की, हमेशा जितना लिखते थे, उस दिन आधा फार्म-पौन फार्म ज्यादा लिखा जाता था। उस दिन बैठे तो डेढ़ फार्म या उससे दूना लिख डालते थे।

अब आप कड़ाई का हिसाब लगा लीजिए। हमारे और आपके सिर में दर्द हो और हमको और आपको बुखार आ जाए या जुकाम हो जाए तो हम और आप क्या करेंगे? ज़रा बताइए। चारपाई पर लेटने के अलावा क्या करेंगे? और बेटा उनका ठीक उलटा दूना काम करना, ये क्या बात हुई? यह बेटे साधना है।

उसका चमत्कार भी अभी आपको बताऊँगी। इस उम्र में भी उन्होंने कितना कठोरतम व्रत लिया है और तपस्या कर रहे हैं। क्या आप आँक पाएँगे? नहीं बेटे आपकी जो स्थूल आँखें हैं, आपकी स्थूल आँखें नहीं देख पाएँगी, लेकिन जिनकी आँखें सूक्ष्मदर्शी हैं, उनको अनुभव होता है, आपको कैसे हो जाएगा? उनको हो रहा है, किनको? गुरुदेव को हो रहा है। कैसा अनुभव हो रहा है कि सारे संसार का जो भयावह दृश्य है, उनको दिखाई पड़ रहा है और हमको-आपको नहीं दिखाई पड़ रहा है।

गुरुदेव का सूक्ष्मशरीर

बेटे! उनका सूक्ष्मशरीर काम कर रहा है, जो सारे वातावरण पर छाया हुआ है और देख रहा है। अभी मैं आपको आगे बताऊँगी कि कल के पेपर में पढ़ा गया कि अमेरिका और पाकिस्तान ने ये धमकी दी है। किसको? हिन्दुस्तान को दी है कि जरा भी सिर उठाया तो देख लेंगे। इसका मतलब बेटे कि वे हथियारों से सम्पन्न हैं और एटम बमों से सम्पन्न हैं, इसलिए उन्होंने सिर उठाया और कह दिया।

तो वो दृश्य आपको दिखाई नहीं पड़ता, लेकिन ऊपर बैठे वह दृश्य उनको दिखाई पड़ रहा है। पंजाब की हालत और काश्मीर की हालत और बेटे! आपके आन्ध्र की हालत आपसे छिपी है क्या? ये प्रान्त तो घर-के-घर में ही मरे जा रहे हैं। इन प्रान्तों में घर-के-घर में ही लड़ाई हो रही है, तो बाहर वाले चढ़ेंगे नहीं तो और क्या करेंगे?

जब देखते हैं कि घर में आग लग रही है तो बेटे बाहर वाले भी चढ़ जाते हैं। क्यों चढ़ जाते हैं? अभी कही एक्सीडेण्ट हुआ था तो मैंने सुना था कि जिन बेचारों की लाशें थी पड़ी थीं, इन जाहिलों के मन में यह उदारता नहीं आई, दया नहीं आई कि इन्हें गाड़ी में से निकालकर कहीं सुरक्षित रख दें। बल्कि किसी का पाकेट उठाकर रखना चाहिए, किसी की घड़ी उतारनी चाहिए, किसी के गले में से चेन उतारनी चाहिए। बेटे क्या करते हैं, ये क्या बात हुई? दूसरे हावी हो जाते हैं।

हाँ बेटे! गिरे के ऊपर हावी हो जाते हैं और उठने वाले के ऊपर सहारा देते हैं, तो वो दृश्य उनको दिखाई पड़ता है। मुझसे बच्चे पूछते रहते हैं कि गुरुदेव को इतनी कठिन तपस्या करने की क्या आवश्यकता थी? हाँ बेटे! आज का जो वातावरण है, उसको देखते हुए उन्होंने आवश्यक समझा कि अपनी शक्ति को संग्रह किया जाना चाहिए। जब तक शक्ति का संग्रह नहीं होगा, बेटे तो खरच कहाँ से करिएगा?

पूँजी हाथ में थोड़ी होगी तो बेटे थोड़ी के हिसाब से ही किया जाएगा। बाप कमाता है, माँ खरच करती है और जब थोड़ा कम आएगा तो उसे उसी में से गुजारा करना पड़ेगा, ज्यादा आएगा तो खुले हाथ से खरच करेगी।

वैसे तो माँ पिता से ज्यादा होशियार होती है, मैंने ऐसा सुना है। क्यों होती है, मैं तुम्हें अभी बताती हूँ कैसे होती है। पिता कमाता है और हर महीने गृहिणी के हाथ में रख देता है। घर खरच के लिए 500 रुपये लाया और हाथ में रख दिया और कहा कि देखो भाई! ठीक एक महीने में मैं आपसे हिसाब ले लूँगा।

जी साहब! आप क्या कह रहे हैं, मैं तो आपको बराबर हिसाब दूँगी। बेटे उसने लिस्ट बनाई और कॉपी में लिखना शुरू किया और 500 रुपये के बजाय 550 रुपये लिख दिए। उसने कहा कि तुमने यह क्या किया? जी साहब! आपको मालूम नहीं है, देखिए कितनी महँगाई है, इतने से काम चलता है क्या? यह तो 50 रुपये मैं पड़ोसिन से उधार लाई थी, मुझे देने हैं; बेचारा चुप हो जाता है, ठीक ही कह रही होगी।

पर बेटे, वो क्या करती है? वो होशियार है और उस 500 में से 50 रुपये बचाकर अपने पॉकेट में रख लेती है। क्यों रख लेती है? बेटे, नियत में कोई खराबी होती है क्या? नहीं, बेटे! नियत में खराबी नहीं होती। उसमें एक बात होती है कि मेरे इतने सारे बच्चे हैं और कहीं मैं गई और बच्चे मेरे साथ गए तो कहेंगे मम्मी हमें तो गुब्बारा दिलवा दें, मम्मी हमें तो टॉफी दिलवा दे, तो मैं इनको कहाँ से दिलवा दूँगी।

मेरे पास नहीं होंगे तो कहाँ से आएगा? बेटे मेरा भी यही ढंग है, मैं क्या करूँ? वो तो बहुत उदार हैं, जो लाते हैं, वही खरच कर देते हैं, पर मैं कभी-कभी कंजूसी कर लेती हूँ, कभी बचा लेती हूँ। बचाना पड़ता है, न मालूम किसके लिए मुझे खरच करना पड़ेगा?

शक्ति का अर्जन

बेटे, उस शक्ति की अभी कमी आ रही थी। आप लोगों को मालूम है कि कलम बन्द हुई तो वो जबान शुरू हो गई। कब तक? 12 बजे से लेकर 6 बजे तक और भी कुछ हुआ तो मैं समझती हूँ कि और भी उसका टाइम बढ़ गया। वो नौ से दस हो गया। तो आखिर यह बताइए कि जब हमारी शक्ति हर समय चुकती जाएगी तो वो आएगी कहाँ से? कोई मार्ग भी तो हो, कोई जगह भी तो हो।

बेटे! कहाँ से आएगी वो शक्ति? इसे इकट्ठा करने के लिए बेटे उन्होंने मौन व्रत धारण किया। मौन, बातचीत बिलकुल बन्द। आपको शायद निराशा हुई होगी, आपके अपने मन में दुःख भी हुआ होगा। कि हम आए और गुरुजी के दर्शन नहीं मिले और जैसा कि हमारे बच्चे अभी ये कह रहे थे कि हम अपनी व्यथा किसे सुनाएँ? गुरुदेव आपके पास आ करके भी अब हम खाली हाथ जाएँगे क्या? नहीं बेटे ऐसा कोई भी खाली हाथ जाने वाला नहीं है।

गुरुजी ने मुझे आपके दुःख-दर्द और पीड़ा को सुनने के लिए और मदद के लिए बैठाया है। बेटे, आपकी मदद के लिए हर क्षण गुरुजी आपके साथ रहेंगे और बेटे! यह माँ भी आपके साथ रहेगी। माँ के अन्दर से वो करुणा और उदारता और ममता चली जाए तो बेटे उसको आप माँ नहीं कह सकते। फिर तो जाने उसका क्या रूप होगा, हम नहीं कह सकते।

बेटे! मैं उनके तप की आपको थोड़ी-सी झलकी दिखा रही थी। ये मौन किसलिए? एकाकी जीवन की ज़रा बेटे कल्पना तो करिए, बेटे! आप घबरा जाएँगे, मैदान छोड़कर भाग जाएँगे, लेकिन बेटे वो संकल्प है, गुरु को दिया गया वचन है, वो निभाना है और जो समाज के लिए और राष्ट्र के लिए हमको करना है वो तो करेंगे-ही-करेंगे। बेटे! वो संकल्प और वो हिम्मत और वो रूहानियत वो करा रही है, जो बिलकुल एक मिनट चुप नहीं रह सकते।

ज़रा कल्पना तो करिए कि 24 घण्टे कैसे व्यतीत होते होंगे? बेटे मुझे थोड़ा-बहुत भी चुप बैठना पड़ता है, नीचे से ऊपर जाती हूँ और देखती हूँ तो मुझे ऐसा लगता है कि मैं यहाँ कौन-से लोक में आ गई हूँ। दूसरा लोक मालूम पड़ता है बेटे और मेरी भी वही स्थिति हो जाती है। उस समय मैं समाधि में, किसी और लोक में, वेदना के लोक में पहुँच जाती हूँ।

उपासना का रहस्य

उनका चिन्तन सारे विश्व का चलता है, पर मैं क्या करूँ? बेटे! मेरी यह जो सम्वेदना है, वो मुझे प्रत्यक्ष देखने के लिए कहते हैं और मैं अपने आप में ऐसी खो जाती हूँ, ऐसी हो जाती हूँ कि मुझे नहीं मालूम वो घण्टे कैसे व्यतीत हो जाते हैं। ये मैंने क्या बताया?

बेटे, मैंने यह उपासना, साधना का चमत्कार आपको बताया। साधना में उन्होंने अपने को साधा, उपासना 6 घंटे नित्यप्रति पहले भी उन्होंने की और हमेशा उनकी उपासना चलती रही है, पर उससे ज्यादा बेटे उन्होंने अपने लिए कड़ाई की है। यही उपासना का रहस्य है।

उपासना का यही रहस्य बेटे हमको आगे बढ़ाने का कार्य करता है। हम सब कुछ उपासना को ही समझ लेंगे तो अरे साधेंगे कब और जब तक साधेंगे नहीं तो आप कोई काम नहीं कर पाएँगे। बिलकुल नहीं कर पाएँगे। साधना माने अपने आप को गढ़ना है।

माताजी! अपने को कैसे गढ़ना है? ऐसे गढ़ना है, चलिए मैं आपको उदाहरण देती हूँ। देखो बेटे? जब तक भगवान हमारे जीवन में नहीं आता, तब तक हम जैसे हैं, वैसे ही बने रहते हैं और जब भगवान का प्रकाश हमारे अन्दर आ जाता है तो बेटे, हम कुछ और हो जाते हैं। कुछ और कैसे हो जाते हैं? ऐसे हो जाते हैं जैसे सूरदास हो गए थे। वे कैसे हो गए थे?

बेटे! जब तक भगवान नहीं था तो वे वेश्यागामी थे। जब भगवान उनके अन्तःकरण में आ गया तो उन्होंने कहा कि ये गन्दी आँखें हैं। बहन-बेटी को बुरी नजर से देखने से बाज नहीं आएँगी।

क्या बाज आना चाहिए? नहीं आएँगे। उन्होंने कहा—हम नहीं आएँगे। सारी जिन्दगी जिस रास्ते पर चले हों, उस भटकाव को रोकिए और नहीं रुकेगा तो बेटे ये सारी जिन्दगी को तबाह कर देगा।

बेटे! सूरदास ने क्या किया? अपनी दोनों आँखों को गरम सलाखों से उन्होंने फोड़ दिया। उन्होंने कहा—अब तो मानेंगी ये बेईमान आँखें। अब तक हमारी सारी जिन्दगी का रस निचोड़ दिया, अभी भी तुम्हें सन्तोष नहीं हुआ, हमारी जिन्दगी को और तबाह करेंगी? बेटे! उन्होंने आँखें फोड़ लीं।

अरे माताजी! आप ये क्या कह रही हैं। तो क्या हमको भी आँखें फोड़नी पड़ेंगी? बेटे! हाड़-मास की आँखों को फोड़ने के लिए मैं नहीं कह रही हूँ कि आप इन आँखों को फोड़िए, लेकिन अपनी दिशा को पलटिए। जब नाव नदी में जाती है तो बेटे क्या करती है? "किश्ती ने मोड़ा रुख, किनारे बदल गए।" बेटे! इधर को न जा करके उधर को जब हम चल दिए तो हमारी सारी दिशा और किनारा बदल जाता है। जब किसी का किनारा मुड़ जाता है तो वहीं से मनुष्य का जीवन बदल जाता है।

जब यह सोच लेते हैं कि हमारा अब तक जो नारकीय जीवन व्यतीत हुआ है, लेकिन अब नहीं व्यतीत होगा। अब हमको सम्बल मिल गया है, किनारा मिल गया है, हमको रास्ता मिल गया है और हमें मार्गदर्शक मिल गया है, जो हमको कहीं-से-कहीं ले जा करके ऊँचे-से-ऊँचा भक्त बना सकता है। ऊँचे-से-ऊँचा हमें समाजसेवी बना सकता है तो हम अपनी स्थिति को क्यों न बदलें ।

(क्रमशः)

(गतांक से आगे)

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों में वैविध्य एवं वैचारिक प्रगाढ़ता—दोनों, एक साथ देखने को मिलते हैं। वे विषय, जो न केवल गायत्री परिजनों के लिए अपितु अध्यात्म पथ के प्रत्येक पथिक के लिए अनिवार्य कहे जा सकते हैं—उनका सम्यक प्रतिपादन वन्दनीया माताजी इतनी सहज-सरल भाषा में करती हैं कि पढ़ने वाले और सुनने वाले उनको दत्तचित्त होकर आत्मसात करते दिखाई पड़ते हैं। अपने एक ऐसे ही विशिष्ट उद्बोधन में वन्दनीया माताजी उपासना-साधना एवं आराधना का रहस्य बताते हुए कहती हैं कि उपासना साधक के लिए ध्रुवतारे के समान है। जो अपने जीवन में उपासना को प्रतिष्ठित कर लेता है, उसके लिए साधना और आराधना का पथ भी सहज, सुगम हो जाता है। वे प्रत्येक साधक को पूज्य गुरुदेव से प्रेरणा लेकर एक साधक की जीवनशैली अपनाने को कहती हैं। आइए हृदयगम करते हैं उनकी अमृतवाणी कोI

अन्दर की शक्ति पहचानें

चल बेटा, मैं दूसरा उदाहरण सुनाती हूँ। देख दूसरा उदाहरण विवेकानन्द थे। जब तक गुरु की शक्ति उनके अंदर नहीं आई, जब तक उन्होंने अपने को नहीं पहचाना, तब तक गरीब जाने क्या-क्या माँगता रहा है, नौकरी माँगता रहा और जाने क्या-क्या माँगता रहा। बेटा ! जब उनके गुरु की शक्ति आई तो सारे देशों में अपने गुरु के काम से घूमते रहे। अमेरिका गए तो एक लड़की उनके पीछे पड़ गईं। जब तक कि अपनी दृष्टि सही होती है, तब तक पीछे पड़ने वाला कोई इस संसार में है ही नहीं।

जब अच्छी बात हमारा पीछा नहीं कर सकती तो बुरी कैसे कर सकती है? हमारे ऊपर बुरी बात का असर कैसा हो गया? अच्छाइयों का असर देर में होता है और बुराई का असर बहुत जल्दी हो जाता है। उसको हम बहुत जल्दी ग्रहण कर लेते हैं। जाने इसमें बहुत सुगन्धता है क्या? ऐसा ही कुछ होगा। चूँकि अच्छाइयों को ग्रहण करने में कड़ाई करनी पड़ती है, पर बुराई में कड़ाई नहीं करनी पड़ती। बेटे उनके भी मन में कुछ प्रलोभन आया होगा, उसकी शक्ल को देख करके काम-वासना जाग्रत हुई होगी, लेकिन बेटे उनके विवेक ने काम किया।

उन्होंने कहा कि मैं तो गुरु का काम करने आया था, यह गन्दगी नहीं चल सकती तो बेटे वो गरम तवे पर बैठ गए। जलते हुए तवे पर बैठ गए और बेटे उनके पुट्ठों पर फफोले पड़ गए। उन्होंने कहा कि इसकी यही सजा है। यह कल्पना आई कैसे और यह कल्पना आई है तो उसका परिणाम भी भोगना चाहिए। उसके परिणाम भोगने के लिए वे स्वयं जलते तवे पर बैठ गए।

भगवान—सम्वेदना का नाम

तीसरा उदाहरण बेटे, सदन कसाई का है जो रोजाना मार-काट करता था। सैकड़ों पशुओं को मार देता था। बकरे-बकरी, गाय, भैंसे जो भी मिल जाए, सबको मारना उसका धन्धा ही था, लेकिन बेटे जिस दिन उसके अन्दर भगवान आ गया, उसने कहा कि नहीं अब ये हत्याएँ नहीं होंगी। अब यह मेरे बस का नहीं है। चूँकि बेटे भगवान जब आता है तो सम्वेदना के रूप में आता है, उदारता के रूप में आता है और इस खुशहाल संसार को और खुशहाल बनाने के लिए आता है, न कि खुदगर्जी के लिए आता है।

पिता ने कहा कि सदन भूख से हमको मारेगा क्या? उन्होंने कहा कि तू रोज मांस खिलाता था और आज नहीं खिलाएगा तो जिन्दा कैसे रहेंगे? उसने कहा कि पिताजी मैंने प्रण किया है कि आज से मैं किसी भी पशु की हत्या नहीं कर सकता। तो नहीं करेगा? बुजुर्ग ताव में आ गए। उन्हें क्या मालूम कि अच्छाई क्या है कि बुराई क्या है? उसने कहा कि आप मांस खाए बगैर नहीं मानेंगे? हम नहीं मान सकते हैं।

बेटे ! उसने अपना पैर काटकर के अपने पिता के हवाले कर दिया और कहा कि राक्षस खा इसको। उनने कहा कि अपने बेटे की टाँग खाऊँ तो बेटे ने कहा कि पिताजी, वो भी तो किसी के बच्चे हैं, जिनको रोज-रोज अब तक आप खाते रहे और दूसरों को खिलाते भी रहे हैं। क्या वो अपनी माँ के बच्चे नहीं हैं? वो अपने पिता के बच्चे नहीं हैं। आपने यह फैसला कैसे किया कि मैं ही आपका बच्चा हूँ और इनमें आपने झाँककर के नहीं देखा कि ये भी किसी के बच्चे हैं? इनके अन्दर भी जीवात्मा है। बेटे उसके पिता की आँखें खुल गईं।

उपासना का दूसरा स्वरूप साधना

बेटे, मैं क्या कह रही थी? मैं यह कह रही थी कि उपासना का दूसरा स्वरूप है साधना। साधना करिए। बेटे, जब तक आप साधना नहीं करेंगे तो उपासना आपकी अधूरी है। वो एकांगी है। अभी तक उपासना के बारे में हमको गुमराह किया गया है। गुमराह कैसे? पलायनवादी बनिए, माला घुमाई है तो स्वर्ग में जाइए। फिर क्या करिए? माला घुमाइए, बेटा-बेटी लीजिए। और भी कुछ है क्या? धन-दौलत ले लीजिए। पाँच बेटियाँ हैं, छठा बेटा ले लो।

अरे इसी के लिए आए थे क्या? बेटे, यह गलतफहमी है, मैं तो कहती रहती हूँ कि कृपा करके आप गलतफहमी को निकाल दें, यह गलतफहमी नहीं चलेगी। भगवान की जो उपासना है, वो जीवात्मा के परिष्कार के लिए होती है, इसके लिए नहीं होती। आपको जो वरदान मिलेगा, जो आपको अनुदान मिलेगा वो किसी दूसरे का मिलेगा। आपको मिलेगा क्या? आपको नहीं मिलेगा।

अपने को साधिए

मैंने उसी रोज आपसे कह दिया था कि केवल ढाई रुपया रोज हिसाब से मिलेंगे। आपने 27 माला रोज की हैं, वो भी आपने ईमानदारी से नहीं की हैं। बेईमानी से की हैं। सारा-का-सारा लंगड़-खंगड़ आपकी खोपड़ी में भरा है, तो आपने वो भी नहीं किया तो ले जाइए ढाई रुपये और अपने-अपने घर जाइए। और कुछ मिलेगा? इससे ज्यादा कुछ भी नहीं मिलेगा।

इससे ज्यादा बेटे तब मिलेगा, जब ढाई घण्टे तो आपने जप किया है और बाकी का वक्त अपनी धुलाई की है। रँगाई करिए, साधना कीजिए, सोचिए कि मनुष्य शरीर हमें किसके लिए मिला है? आखिर इसका होना क्या है।

बेटे ! इसका तो एक दिन वो होना है, जो सबका होना है। क्या होना है? देख पशु की खाल काम में आती है, जूते बनते हैं, पर्स बनता है। जाने क्या-क्या बनता है, चमड़े की पेटियाँ बनती हैं, हजारों चीजें बनती हैं और मनुष्य का? बेटे ! मनुष्य का कुछ नहीं बनता। मनुष्य जिस दिन मरता है, उस दिन साथ में दस-बीस मन लकड़ी और ले जाता है। जलाने के लिए लकड़ी चाहिए, घी चाहिए। समिधा चाहिए, सामग्री चाहिए, कफन चाहिए, काठी चाहिए और कमबख्त अकेला जाता भी नहीं है, ये भी नहीं है, साथ में और चाहिए।

उसे सिर पर उठाने के लिए चार आदमी आगे-पीछे चलते हैं और पूरी बरात चलती है। तो बेटे मनुष्य के शरीर का क्या होने वाला है? तो उसके लिए चिन्तन कीजिए कि एक दिन आपका भी यही होने वाला है। फिर होश में आ जाइए और साधना कीजिए, अपने को साधिए और लोक-मंगल के काम में लगिए।

गुरुजी-माताजी एक हैं

उनने कहा कि माताजी आप ये पाठ पढ़ा रही हैं, ऐसे तो गुरुजी कहते थे। अरे बेटे, गुरुजी और हम एक हैं, तुमने दो कैसे समझ लिया? भाषा की दृष्टि से समझ सकते हैं, योग्यता की दृष्टि से समझ सकते हैं, पर हम हैं तो दोनों एक। सिद्धान्त एक हैं, भावनाएँ हमारी एक हैं, क्रियाकलाप हमारे एक हैं तो आपने दो कैसे समझ लिया? हम एक ही हैं बेटे, वास्तविकता आपको समझनी पड़ेगी।

वास्तविकता को जब आप समझ लेंगे तो बेटे ! भगवान आपकी रग-रग में आ जाएगा। आपके साथ गुरुजी, गायत्री माता हर समय आपको दुलार करती हुई मालूम पड़ेंगी और माताजी को तो आप प्रत्यक्ष देख रहे हैं। बेटे ! आपको अनुभव होता रहेगा कि हमारी माँ हमको दुलार रही हैं। हमारे दुःख-कष्टों में सहारा बनेंगी, लेकिन आप भी तो कुछ करिए न? भगवान का प्यार पाने के लिए बेटे भक्त को कुछ करना पड़ता है। ऐसा नहीं होता कि भगवान की भक्ति करें और भक्तों को कुछ न करना पड़े। भक्तों को करना पड़ता है।

बेटे, क्या करना पड़ता है? जब भक्ति आ जाती है तो बेटे भक्ति का ऐसा नशा होता है जैसे शराब का नशा होता है और ये ऐसे झूमते रहते हैं। कोई नाली में गिरता है, कहीं क्या करता है, कोई पैरों से डगमगाते रहते हैं। बेटे ! ठीक इसी प्रकार मैं तो कहूँगी कि अध्यात्म में इससे हजार गुना नशा रहता है। जब भगवान आ जाएगा तो बेटे, हजार गुना नशा रहेगा। जीवन में फिर वो क्या काम कराएगा, कैसे कराएगा? जैसा चैतन्य महाप्रभु से कराया था।

चैतन्य महाप्रभु के अन्दर जब भगवान आया तब बेटे उन्होंने अलख जगाया। काहे का? भगवान के कीर्तन का। भगवान जो नहीं कर सकते थे, उसे करने के लिए उन्होंने कहा कि हम भगवान के बेटे हैं। नहीं साहब गुरुजी की भक्ति करेंगे और गुरुजी को तो प्रणाम करेंगे और गुरुजी को फूल चढ़ाएँगे। गुरुजी सब सौंप दिया भगवान तुम्हारे हाथों में। गुरुजी लड़की भी सौंप दिया, सब सौंप दिया। जानता है सब सौंपना किसे कहते हैं? संकीर्णता सौंप। जो तेरे अन्दर में संकीर्णता विराजमान है, उसे निकाल धूर्त कहीं का। यहाँ कहने आया है कि गुरुजी साहब हमने अपने आप को सौंप दिया, आप हमारे हैं।

गुरु का ऋण चुकाइए

हाँ, हम तुम्हारे हैं, लेकिन अपने को सौंप तो सही। तो हो जाओ नंगे, अपने बाप के सामने। और क्या कहना? हाँ गुरुजी हम आपके हैं, आप जो चाहे कराइए। बेटे, फिर देखना गुरुजी कैसे कराते हैं। बेटे ! गुरुजी ने अपना सर्वस्व अपने गुरु के चरणों में सौंप दिया। बिलकुल खाली हाथ हैं, तीन धोती और दो कुरते के अलावा और कुछ नहीं है और बेटे जो दो साल का बच्चा खाता होगा, मैं समझती हूँ कि वो कुछ ज्यादा खा जाता होगा। दो साल के बच्चे जितनी उनकी खुराक है।

मैं यह नहीं कहती कि आप भी ऐसा ही करिए, आप भी दो साल के बच्चे की तरह से अपना पेट पालिए, पर मैं ये कहती हूँ कि अपने गुरु के प्रति, अपने मिशन के प्रति और उन विचारों के प्रति वो इच्छाशक्ति जाग्रत होती है कि गुरुजी हम आपके बच्चे हैं। अरे ! कितने बच्चे तो यहीं बैठे हैं और जो लाखों-करोड़ों की संख्या में हमारे बालक हैं वो तो जाने क्या-क्या कर सकते हैं? लेकिन आपकी संकीर्णता हटे तब न, आपकी संकीर्णता हटती नहीं है।

वो तो पग-पग पर चलती है, जो कुछ होगा बीबी के लिए होगा, बच्चे के लिए होगा, नाती-पोतों के लिए होगा और समाज के लिए भी होगा क्या? नहीं समाज से हमें क्या लेना-देना, जिस समाज में हमने जन्म लिया है और जब तक मरेंगे, समाज का ही उपयोग करेंगे। तो बेटे क्या समाज का हमारे ऊपर कोई ऋण नहीं है? इसको बगैर चुकाए ही संसार से जाना चाहते हैं। जाना चाहते हैं तो बेटे जाइए, गुरु का ऋण ले जाइए, समाज का ऋण ले जाइए, लेकिन याद रखना अगले जन्म में आपको देना पड़ेगा। आप बनिए गधा, फिर गुरुजी आप में लगाएँगे डंडे। क्या बात है? अरे बात क्या है, जो ऋण लेकर के आया था सो चुकाया नहीं, अब पछता।

बेटे ! अगले जन्म की अपेक्षा तो इसी जन्म को आप सार्थक लें तो हर्ज की क्या बात है? मैं तो आपको थोड़ी दिशा और धारा दे रही थी कि आप चिन्तन करिए, अपने को साधिए। जब तक आप नहीं साधेंगे, तब तक आपके अन्तःकरण में वो भावना ही पैदा नहीं होगी कि हमको कुछ करना भी है क्या? हमें क्या, हम तो अपने घर में चैन से हैं।

दूसरे के घर में आग लग रही है तो लगने दो, दूसरों की बहन-बेटियों की इज्जत लुट रही है तो लुटने दो, हमारी थोड़ी लुट रही है। नहीं बेटे, आज नहीं तो कल आप भी चपेट में आ ही जाएँगे। ऐसा क्यों नहीं सोचते कि दूसरे की बेटी है तो हमारी भी तो बेटी है, दूसरे की बहू है, वो हमारी भी बहन और बेटी होती है, ऐसे कैसे हो सकता है? देखा जाएगा, हम किसी की इज्जत नहीं जाने देंगे। ऐसी क्या बात है कि जरा-जरा से गुण्डे हमारे ऊपर हावी हो जाते हैं।

कैसे हो जाएँगे? हम इतने हैं, देखिए कैसे हो सकता है? बेटे ! हमारा मनोबल साथ नहीं देता, जहाँ थोड़ा घुड़की दी कि डर के मारे हमारे प्राण निकल गए, उसके प्राण निकल गए। क्यों निकल गए? हमारे और उसके मनोबल ने साथ नहीं दिया और मनोबल साथ दे जाए तब? तब बेटे ! फिर तो दयानन्द की तरह से हो जाएँगे।

साधना का बल

दयानन्द की तरह से कैसे हो जाएँगे? एक बार दयानन्द एक राजा के यहाँ गए और राजा जो था वह एक वेश्या में आसक्त था। तो दयानन्द से नहीं रहा गया। वे बोले कि क्यों रे कुत्ते, इस कुतिया के पीछे क्यों लगा फिरता है? राजा से कहा, किनने? दयानन्द ने। बेटे दयानन्द ने नहीं कहा था, उनके अन्दर जीवात्मा बैठी थी, उपासना से उन्होंने अपने को परिष्कृत किया था और जो उन्होंने जीवन में साधना की थी, उसका बल था।

पहले तो इसी हरिद्वार में आए थे और उन्होंने पाखण्डखण्डिनी झण्डा लगाया था, पर वो सफल नहीं हुआ। किसी ने नहीं सुना और जब बेटे अपने को तपा लिया तो आर्यसमाज की स्थापना की और उन्होंने वो शब्द कहे, जो मैं अभी आपसे कह रही हूँ। और बेटे राजा लज्जित हो गया। उसने सर झुका लिया और हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाते हुए अपनी गलतियों की क्षमा माँगी।

बेटे ! आपके अन्दर भी वो आत्मबल आ जाएगा कि आप जो कुछ कहना चाहते होंगे, धड़ल्ले से आप कहेंगे। आपको कोई भी डर नहीं होगा, पर पहले आप अपने को इस लायक बनाइए तो सही। हर समय वही भिखारीपन, लाओ सन्तोषी माता आप भी लाओ। हाँ! वहाँ मंसा देवी पर जाएँगे, माँ की भी बेचारी की दुर्गति बनाएँगे, माँ को स्वस्तिक लगा आएँगे, कुछ नहीं मिलेगा, रोली नहीं मिलेगी, तो गोबर ही चिपका आएँगे। नहीं बेटे! ऐसा मत करिए, ऐसा करने से आपकी जीवात्मा गिरती है, भगवान के सामने गिरती है। माँगना है तो कुछ बड़ी चीज माँगिए, शान्ति माँगिए, शक्ति माँगिए, भक्ति माँगिए, साहस माँगिए जो आपके जीवन में काम आए।

बेटे, जमनालाल बजाज से गान्धी जी ने कहा था कि मेरे पास साधन नहीं हैं, शक्ति है और सारी शक्ति को लोक-मंगल के लिए और राष्ट्र को ऊँचा उठाने के लिए लगाने का मेरा प्रयास चल रहा है और जब तक जीवित रहूँगा, प्रयास करता रहूँगा। जमनालाल बजाज बोले—आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, आपके पास नहीं हैं क्या? हम काहे के लिए हैं? हमारा सर्वस्व आपके लिए अर्थात राष्ट्र के लिए है। वो बेचारे क्या करते, आधी धोती पहनते थे।

बेटे, जमनालाल बजाज उनके साथ हो गए। कोई कमी आई है क्या? नहीं कोई कमी नहीं आई। गान्धी जी ने अपना मनोबल बनाया और अपनी शक्ति जाग्रत की। वो सन्त थे और राष्ट्रपिता थे। सारे राष्ट्र को ऊँचा उठाने के लिए वे दर-दर झोली फैलाते हुए निकलते थे और जिधर निकलते थे बेटे उधर ही धन की वर्षा होती थी। क्योंकि उन्होंने अपनी संकीर्णता को छोड़ दिया था और संकीर्णता को नहीं छोड़ा होता तो बेटे, वे कौन बनते? साधारण वकील बनते, सो उनसे वकालत भी नहीं होती।

भगवान का पल्ला पकड़ें

बेटे, मैं कह रही थी कि भगवान का पल्ला पकड़ने से मनुष्य क्या-से-क्या हो जाता है। बेटे भक्त हो जाता है, देवता हो जाता है, देवता ही नहीं वो भगवान की श्रेणी में भी आ जाता है। कैसे आ जाता है? बेटे जो अपना परिष्कार कर लेते हैं, जैसे कि बुद्ध ने किया था। जिस लड़के को यह नहीं मालूम था की यह जो लाश जा रही है, यह मरी हुई है कि जिन्दा है। उसने छत पर से किसी से पूछा कि यह क्या जा रहा है। उन्होंने कहा कि यह मरा हुआ आदमी जा रहा है। मरा हुआ? मरना भी पड़ता है। हाँ! मरना भी पड़ता है और यह कौन है, जो लाठी टेककर चल रहा है? तुम्हें नहीं मालूम है कि यह बूढ़ा हो गया है। इसका शरीर बूढ़ा हो गया है। आदमी बूढ़ा भी होता है और मरता भी है। कहा—हाँ मरता भी है और यह बूढ़ा भी होता है। अच्छा ऐसा भी होता है। और बेटे उस दिन से जो आत्मबल उन्होंने पैदा किया और जो उपासना की, उससे उनका परिष्कार हुआ और उनने बौद्ध धर्म की स्थापना की। किनने? उस राजकुमार ने की, जिसको होश नहीं था जो बिलकुल बे-अक्ल था। बुद्धू था, फिर कौन हो गया? बुद्ध भगवान हो गए।

बेटे, बुद्ध भगवान हो गए और उन्होंने धर्मचक्र-प्रवर्तन किया। उनके अनुयायियों के नाम कहाँ तक आपको गिनाऊँगी बेटे? चलिए वो भगवान थे, लेकिन अंगुलिमाल तो भगवान नहीं था। संघमित्रा तो नहीं थी, महेंद्र तो नहीं था, वो तो शिष्य थे। बेटे! शिष्यों ने जब अपनी अन्तरात्मा को धो लिया, तब कमाल का काम किया। तो मेरा आपसे निवेदन यही था कि जो उपासना आप करते हैं, भले से आप एक घण्टा कीजिए, आधा घण्टा कीजिए।

हम इस बहस में नहीं पड़ते कि आपने कितनी की, लेकिन भावपूर्ण करिए और सम्वेदना के रूप में उस भगवान को अपने पास लाइए, जिसकी आप आराधना करते हैं। जिसकी आप उपासना करते हैं उसको लाइए, नहीं तो आपके हाथ में कुछ नहीं लगने वाला। फिर आप वैसे ही भक्त रह जाएँगे जैसे कि अभी मैं भक्तों की और श्रेणी बताऊँगी। अभी तो वो भक्त बताए जैसे कि आप बैठे हैं।

बेटे, एक था राजा और दो थे माली। राजा आए तो उन्होंने कहा कि ऐसा मालूम पड़ता है कि इनके पास कुछ है नहीं और ये गिड़गिड़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बेटे यहाँ मत गिड़गिड़ाओ, चलो मैं तुमको एक बगीचा देता हूँ और राजा ने उस बगीचे के दो हिस्से कर दिए। उन्होंने कहा कि देखो भाई ये तेरा है और ये तेरा है। तुम में से कौन इस बगीचे को खूबसूरत बना सकता है, ये मुझे देखना है। पैदावार की दृष्टि से, खाद-पानी की दृष्टि से मैं देखता हूँ कि आप किस तरीके से इसको कामयाब बना सकते हैं।

तो बेटे, दोनों बड़े खुश हो गए। ऐसे भक्त हो गए कि कुछ पूछो ही मत। जैसे कई बार लोग मेरे पास आते हैं और रोते ही चले आते हैं। और जब मैं उनके अन्दर, उनकी अन्तरात्मा में झाँककर देखती हूँ तो लगता है कि ये तो छूछे हैं, भावनाओं की दृष्टि से बिलकुल खाली हैं। ये तो ढोल के आँसू जैसे बहा रहे हैं और भावनाओं की दृष्टि से भी जड़ हैं। इनके ऊपर कोई असर नहीं है। न गुरुजी का असर है, न गुरुजी की भावनाओं का असर है। न गुरुजी के क्रियाकलापों का है, न गुरुजी के सिद्धान्तों का इनके ऊपर कोई असर है। बेटे मैं देखती रहती हूँ।

(क्रमशः)

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों में यह एक अलौकिक सामर्थ्य सुरक्षित है कि वे समाज के हर तबके को जाग्रत कर पाने का कार्य करते हैं। जहाँ एक ओर मनस्वी, उनके द्वारा प्रतिपादित आध्यात्मिक विषयों के सुगम समाधान को सुनकर कृतकृत्य हो उठते हैं तो वहीं सामान्य-साधारण लोग अपने जीवनमूल्यों की प्रतिष्ठा, उनके उद्बोधनों के आधार पर ही कर पाते हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में वन्दनीया माताजी उपासना-साधना एवं आराधना का मर्म समझाते हुए प्रत्येक साधक से कहती हैं कि यह आध्यात्मिक पथ मात्र उसके जीवन में प्रकाशित हो पाता है, जो अपने अन्दर छिपी शक्ति को पहचान पाने की सामर्थ्य सुरक्षित रखता है। परमवन्दनीया माताजी, पूज्य गुरुदेव का जीवन्त उदाहरण देते हुए प्रत्येक गायत्री परिजन से कहती हैं कि उन्हें और भटकने की आवश्यकता नहीं और पूज्य गुरुदेव के जीवन को ही अपना आदर्श मानकर अपनी साधनात्मक प्रगति सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी कोI

संसार को सुन्दर बनाएँ

तो उन दो मालियों का क्या हुआ? उसमें एक माली वो था जैसा मैं अभी आपसे संकेत कर रही थी। अपने बच्चों के लिए यह बताना जरूरी है, इनको बुरा लगेगा तो लग जाएगा, लेकिन असलियत तो मुझे बतानी है।

तो बेटे, एक माली जो था, उसने राजा का चित्र चौकी पर लगा रखा था। जरा भी धूल लग जाए तो झाड़-पोंछकर रख दे। फिर सुबह भी आरती, शाम को भी आरती, दोपहर को भी आरती, बस, उसी में मग्न रहता था कि राजा कितना दयालु है, कितना परोपकारी है। यह तो भगवान है, इसकी हम पूजा करेंगे।

बस, वो दिन-रात उसी गोरखधन्धे में लगा रहता था और दूसरा जो माली था, वो ठीक उसके विपरीत था। उसने कहा कि जिस राजा ने हमको यह बगीचा सौंपा है, तो हमारा कर्तव्य होता है, हमारा फर्ज होता है कि इसको और सुन्दर बनाया जाना चाहिए। जितने पौधे इसमें सड़ गए हैं, गल गए हैं, इनके स्थान पर दूसरे लगाए जाने चाहिए और जब राजा आए और देखे तो उसकी तबीयत खुश हो जाए और यह कहे कि मालियों में यह सबसे होशियार माली है।

बेटे यह संसार क्या है? यह संसार विशुद्ध रूप से बगीचा है, जो भगवान ने हमारे हाथों में सौंपा है। हमारा और आपका कर्तव्य होता है कि इस बगीचे को खूबसूरत बनाएँ। जहाँ कहीं विकृतियाँ हैं, साहस के साथ उनको हटाएँ, लड़ें। कैसे लड़ें? डण्डे से लड़ें। नहीं बेटे ! डण्डे से नहीं लड़ें, सिद्धांतों से लड़ेंगे, वाणी से लड़ेंगे, मधुरता से लड़ेंगे और साहित्य में जो गुरुजी ने आग फूँक दी है, उसको हम जन-जन तक पहुँचाकर ही मानेंगे।

बेटे! उस माली ने यही काम किया, जो मैं दूसरे का उदाहरण दे रही हूँ। उसने कहा कि हमको कार्य सौंपा है, हम मरेंगे, गलेंगे, लेकिन इसी के लिए। साल गए, दो साल गए। राजा का उधर से निकलना हुआ। उन्होंने सोचा कि जरा बगीचा देख करके तो आऊँ कि इन दो मालियों ने क्या किया? बेटे! जब वह घुसा तो सबसे पहले वही भक्त पहुँचा, दूसरा तो पीछे रह गया। उसने लेटकर साष्टांग प्रणाम किया, साष्टांग प्रणाम ही नहीं किया, आँसू बहाना शुरू कर दिया।

उसने कहा कि भक्तवत्सल आप इतने दिनों में आए हैं, मैं तो आपकी पूजा करते-करते थक गया और देखिए यह आपका चित्र रखा है और मैं भी सूख-सूखकर काँटा होता जा रहा हूँ। चूँकि मैं आपकी भक्ति करता रहता था, मैं तो भक्त हूँ। उन्होंने जब निगाह उठाकर देखा तो सारा बगीचा उजड़ा हुआ पड़ा था, तो उसके प्रति उनको इतना गुस्सा आया और वो तिलमिला गए कि मैंने इतना सुन्दर बगीचा इस जाहिल के हाथ में सौंपा था। इस जाहिल ने तो चौपट कर दिया।

बेटे! अब वो दूसरे माली के पास पहुँचे। इसने तो जो किया वो तो मैंने देख लिया, पर अब दूसरे माली के पास जाता हूँ। जरा उसको तो देखूँ कि कहीं ऐसा ही वो भक्त भी तो नहीं है। एक तो इनके हाथों में सौंप दिया। बेकार निर्जीवों के हाथ में, मुरदों के हाथ में मैंने सौंप दिया, जिनके अन्दर कोई शक्ति नहीं है, जीवन नहीं है। बेटे ! जब राजा दूसरी जगह गया तो वो पहचान भी नहीं पाया। राजा को नहीं पहचान पाया।

थोड़ी देर उसने देखा तब उसको समझ में आया कि अरे! यह तो राजा हो सकते हैं। आइए साहब ! आइए। तो उन्होंने कहा कि क्यों भाई तुमने क्या किया? उसने कहा कि देखिए ! मैंने तो अपने फर्ज और कर्त्तव्य में कोई कमी नहीं छोड़ी है, पर आप इन्क्वायरी करिए। आप देखिए कहीं ऐसा तो नहीं है कि मेरी साधना में कोई कमी तो नहीं रह गई? कोई कमी रह गई हो तो आप मुझे बताइए, अब की बार मैं अपनी भूल को सुधार लूँगा। जाने और अनजाने में मेरी जो कमी होगी, मेरी जो भूल होगी, अगली बार मैं सुधारकर आपको बता दूँगा। कृपा करके आप यह बताइए कि आपके इस बगीचे में कोई कमी है क्या? बेटे ! जितना बगीचा उसके हाथ में दिया था वो सौ गुना हो करके फल-फूल रहा था।

उन्होंने पूछा कि ये किसके-किसके पेड़ हैं। उसने कहा कि ये आमों के पेड़ हैं। तो तूने चखा कि कौन-सा आम मीठा और कौन-सा आम खट्टा है। उसने कहा कि नहीं, मेरा तो केवल कर्तव्य था और फर्ज था वो मैंने निभाया। आपने यह कहा होता कि तू चख ले तो मैं चख लेता। आप देंगे तो मैं खा लूँगा। तूने ऊपर से गिरा तो भी नहीं खाया? नहीं, मैं दूसरे के हक का क्यों खाऊँगा, मैंने नहीं खाया। इसमें जो कमी हो वो आप बताइए।

संसाररूपी बगीचे को सँभालें

बेटे, मैंने आपको दोनों ही परिभाषाएँ समझा दीं। कौन-सी? यही कि दोनों ही भक्त थे, लेकिन बेटे कौन-सा भक्त श्रेष्ठ था? वो जिसने उस बगीचे को सँभाला। कौन-से बगीचे को? बेटे, संसाररूपी बगीचा, जिसका मैं उदाहरण दे रही हूँ। आपके लिए वह कितना बड़ा उद्यान है, जो गुरुजी ने आपके हाथ में सौंपा है। बेटे! आपको तो पका पकाया मिला है, पकाना पड़ रहा है क्या? और भक्तों को पकाना पड़ा था, और शिष्यों को पकाना पड़ा था।

रामकृष्ण परमहंस जब चले गए, उसके बाद विवेकानन्द कुछ और हो गए और उन्होंने मिशन को सारे संसार में फैलाया। कब? जब वो मर गए तब। उन्होंने कोई साहित्य लिखा था क्या? उन्होंने कुछ समाज सेवा की थी क्या? नहीं बेटे, हमें नहीं मालूम क्या किया था? हमें तो पीछे का मालूम है, आगे का तो कुछ मालूम नहीं है। आगे का तो यही कि वो केवल भक्ति में रहते थे, शक्ति देते थे, बस, और कुछ काम किया था, नहीं।

बेटे, इन्होंने तो खून और पसीने से सींच करके आपको साहित्य के रूप में कितना विशाल बगीचा आपके हाथ में थमाया है, वो सारी आग उड़ेल दी है और यहाँ प्रशिक्षण से ले करके, बाहर शक्तिपीठों से लेकर कितना स्वरूप उन्होंने खड़ा किया है।

आप नहीं जानते ब्रह्मवर्चस से लेकर के, गायत्री तपोभूमि से लेकर के, शान्तिकुञ्ज से लेकर के विशाल बगीचा और किसी ने नहीं खड़ा किया। बेटे ! गुरुजी ने किया है।

हर समय वे ज्वाला की तरह से धधकते रहते हैं, तो बेटे! आप उनकी आग में शामिल हुए कि नहीं हुए, मुझे नहीं मालूम, लेकिन बेटे ! मैं तो हो गई। मुझे तो ऐसा अनुभव होता है कि वो चिनगारी अब मेरे अन्दर भी सुलगने लगी है। क्यों सुलगने लगी है बेटे?

उसका भी कारण है। इसका कारण वो है, जो वे कहते रहते हैं। क्या कहते रहते हैं? हम तो गुरुजी आपके लिए समर्पित हैं। हट ऐसे समर्पित होते हैं क्या? बेटे जो समर्पित होता है, वो चैन से नहीं रहता है। मैं कहना नहीं चाहती, पर मुँह पर बात आ गई है तो मैं कह देती हूँ।

बेटे, आठ जनवरी को जब मैंने खून देखा तो मैंने कसम खा ली। मैंने कहा कि यह कदम आगे को उठेगा, पीछे नहीं हटेगा। हर समय उनके कदम-से-कदम मिलकर के चला है और अब? अब पूरे उत्साह और साहस के साथ चलेगा। इसे कोई डिगाने वाला इस पृथ्वी पर पैदा नहीं हुआ है और न है और न होगा।

बेटे, मिशन के लिए, गुरुजी के लिए हम आत्मवत् समर्पित हैं और पत्नी होने के नाते भी समर्पित हैं। हाँ बेटे ! गुरुजी के लिए तो मैं समर्पित हूँ, उनके लिए तो मैं नतमस्तक हूँ ही, पर बेटे ! उनके क्रियाकलापों के लिए मैं उनसे भी ज्यादा समर्पित हूँ।

मिशन के लिए वचनबद्ध बनें

उन्होंने प्रथम दिन ही मुझसे यह कहा था कि देखो तुम भावुक बहुत हो, जो दृश्य तुमने देखा है, कभी तुमने जाना भी नहीं। मैं जा रही थी तो रास्ते में एक घायल कुत्ता पड़ा था। रिक्शा रुकवा करके एक झोंपड़ी में से पानी लाए थे। मुझे उसे देखकर के चक्कर आ गया था। किसको? घायल कुत्ते को देख करके।

बेटे ! भेड़िया कहूँ या बहेलिया कह सकती हूँ, जिसने मेरे कृष्ण पर आक्रमण किया था और जब मैंने अपनी आँखों से देखा तो मैंने कहा कि मैं आपके लिए और आपके मिशन के लिए वचनबद्ध हूँ। चूँकि मैं इन बच्चों की माँ हूँ।

आप ही नहीं, उसमें मैं भी हिस्सेदार हूँ। आज मैं आपके सामने बैठी हूँ, मैंने जिन्दगी में कभी कल्पना भी नहीं की थी कि मुझे कभी अपने बच्चों से कुछ कहना पड़ेगा, सिवाय इसके कि मैंने घर-गृहस्थी की बात पूछने के अलावा कभी दो शब्द भी नहीं कहे। बेटे! यह कौन कहलवा रहा है? बेटे! वो शक्ति कहलवा रही है, कौन-सी? समर्पण की कहलवा रही है और वही करा रही है।

क्या है समर्पण?

बेटे, समर्पण किसे कहते हैं? मैंने आपको इसकी थोड़ी-सी झलक दिखाई है और अपने शब्दों में बताया है। मैं इसमें अपना अहंकार नहीं बता रही हूँ। आपसे यह नहीं कहना चाहती कि मेरे अलावा कोई नहीं। बेटे! आप भी हो सकते हैं, क्यों नहीं होंगे? पर होंगे तब, जब अन्तरात्मा से आप पुकारेंगे तब और अपनी क्षुद्रता को छोड़ेंगे तब। फिर आप मालिक हो जाएँगे।

हाँ बेटे। इस संसार के मालिक हो जाएँगे। भक्त जो होता है, वो भगवान की पूँजी का मालिक हो जाता है और भगवान का मालिक हो जाता है, कैसे हो जाता है? मालिक ऐसे हो जाता है, जब पत्नी ब्याह करके घर में आती है, भगवान न करे दूसरे ही दिन उसका पति चल बसे तो? तो बेटे जो भी उसकी सम्पत्ति है, उसकी वह मालिक हो जाती है।

ऐसा क्यों होता है? अरे बेटे ! इसलिए होता है कि जिस दिन से, जब से उसकी भाँवर पड़ीं और सारा-का-सारा अपना परिवार छोड़कर पति के घर में गई, बेटा ! उस दिन से उसने अपना सर्वस्व पति के चरणों पर अर्पण कर दिया। कल जो छोकरी उठाने से भी नहीं उठती थी, माँ जगाती थी तब भी वो जगती नहीं थी, काम नहीं करती थी और हठबाजी करती थी और दूसरे दिन क्या हो गया?

अरे बेटे, कुछ का मारा कुछ हो गया—

नजरें बदलीं तो नजारे बदल गए,
किश्ती ने मोड़ा रुख तो किनारे बदल गए।

उसने पिछले जीवन से मुँह मोड़ लिया न और अगला जीवन शुरू कर दिया। उसने कहा कि पिछला जीवन तो हम छोड़ आए, माँ का घर छोड़ आए और अब आपके पास आ गए। बेटे अब वह अपने दाम्पत्य जीवन की और पति की सम्पत्ति की मालिक हो गई। आप किसी के मालिक हो जाएँगे क्या? आप नहीं हो सकते, लेकिन पत्नी हो जाएगी। क्यों हो जाएगी? क्योंकि उसने समर्पण किया है, इसलिए हो जाएगी।

भगवान के उत्तराधिकारी कैसे बनें?

आप भगवान के उत्तराधिकारी बन जाएँगे कि नहीं? बेटे ! मुझे शक है; क्योंकि आपके अन्दर वो चालाकी भरी हुई है, जो भगवान के भक्त के अन्दर नहीं होनी चाहिए। कौन-कौन-सी चालाकी? पाँच पैसे की माला से भगवान बिलकुल खुश हो जाएँगे और जो माँगेंगे सो दे जाएँगे। पाँच पैसे में पाँच वरदान तो ले ही लेंगे। इससे कम तो लेकर ही नहीं हटेंगे।

बेटे से लेकर बेटी तक के विवाह से लेकर मुकदमे तक पाँच वरदान से कम नहीं लेंगे। बेटे, यह जो चालाकी हमारे अन्दर भरी हुई है, हमको भक्त कहलाने लायक छोड़ेगी क्या? हम भक्त नहीं कहला सकते हैं।

भक्त हैं नहीं तो कहलाएँगे कैसे? फिर हमारी जीवात्मा अपने को जानेगी कैसे? अपने गले में मुँह डालकर देखें कि आखिर हम हैं क्या? जब तक हम अपने को समर्पित नहीं कर पाएँगे, तब तक भगवान हमारे पास आएगा कैसे? और भगवान नहीं आएगा तो उसकी सम्पत्ति के मालिक कैसे हो जाएँगे?

फिर आप नहीं हो सकते, बिलकुल नहीं हो सकते हैं। बेटे, वेश्या और पत्नी में फरक होता है। वेश्या मनोरंजन कर सकती है, अधिकारिणी नहीं हो सकती है और जो पत्नी है, पूरी-की-पूरी अधिकारिणी होती है।

अपना स्वरूप समझिए

इसलिए आपसे मेरा निवेदन यही था कि बेटे! अपने स्वरूप को समझिए और स्वरूप को समझ करके आप उस शक्ति को पैदा करिए। आराधना करिए। आराधना कौन-सी? बेटे, भगवान का काम करना। भगवान का प्यार कब मिलेगा? बेटे ! भगवान का काम करेंगे, तब भगवान का प्यार मिलेगा।

भगवान का प्यार पाने के लिए भगवान का काम भी करना पड़ता है? हाँ बेटे, मैंने बताया था न कि नाम से ज्यादा भगवान का काम करना होता है। भक्त को कैसा करना पड़ता है? जैसा कि बेटे ग्वाल-बालों ने किया था। कृष्ण गोवर्धन पर्वत को उठा रहे थे। उन्होंने कहा कि हमारे भगवान पर्वत उठा रहे हैं और हम ऐसे ही देखते रहेंगे? नहीं, ऐसे नहीं देख सकते, हम लाठी लगाकर उठाएँगे।

उनकी लाठी से पर्वत उठा कि नहीं उठा, लेकिन भगवान का काम करने में सहायक तो हो ही गए थे। श्रेय जो उनको लेना था। उनकी भावनाओं ने कहा कि हम भगवान के साथ-साथ चलते हैं। हम भगवान के आगे-आगे चलेंगे और हम कहेंगे कि भगवान हम आपके हैं। आपके कार्य के लिए आपका गोवर्धन पर्वत हम उठाएँगे और बेटे उठाया, उन्होंने लाठी लगाई।

बेटे, भक्तों का और उदाहरण बताऊँ। शंकराचार्य थे और जब शंकराचार्य के अन्दर भगवान आया तो बेटे उन्होंने अलख जगाया। सारे संसार में घूमे और कहते हैं उनको सोलह वर्ष की आयु में भगन्दर का फोड़ा हो गया था और बत्तीस साल की उम्र में उनका देहावसान हो गया। बेटे, भगन्दर का फोड़ा लिए-लिए वे फिरे। कौन करा रहा था? उनकी शक्ति?

बेटे, उनका भगवान, उनकी रूहानियत करा रही थी। हम और आप होते तो बस, अब मरे, तब मरे करते रहते। अरे! मौत जब आएगी तब आएगी, तू तो उससे पहले ही मर रहा है। मौत आएगी छह महीने पीछे और तू आज ही मर रहा है। तेरे दिमाग पर वो बीमारी हावी है। न तो तू आज मरेगा और न ही कल मरेगा, लेकिन मरेगा जरूर। निश्चित मरेगा देख लेना। क्यों मरेगा? क्योंकि सारे दिन बीमारी जो हावी है।

बेटे ! जब काम होता है तब बीमारी एक तरफ रखी रहती है। बीमारी क्या करेगी? और देखो उनकी माँ भी बाधक थीं, जैसे सम्भव है कि आपकी माँ भी हो, आपकी बीबी बाधक हो सकती है, पर सबसे ज्यादा आप बाधक हो सकते हैं। बीबी आपकी नहीं हो सकती, माँ-बाप भी नहीं हो सकते, अपनी संकीर्णता ही मनुष्य की बाधक होती है, जो हमें आगे चलने से रोकती है। कौन रोकता है?

माँ ने कहा कि मैं तो अपने बेटे की शादीकरूँगी। उन्होंने कहा कि ये क्या कह दिया। ये तो मुझे जंजाल में फँसाए दे रही है। मुझे तो भगवान का काम करना था।

भगवान के काम में हाथ बँटाना था। भगवान ने हमको पैदा किया है, इतना बढ़िया हमको शरीर दिया है। हमको जो लाखों-करोड़ों रुपये का शरीर मिला है, तो कुछ करने के लिए मिला है कि जंजाल में फँसने के लिए मिला है। उनने कहा कि माँ मैं शादी नहीं करूँगा, तो माँ नहीं मानी। हाँ बेटे, मैं कैसे मान सकती हूँ? मेरे घर बहू आनी चाहिए? बहू आएगी, बाल-बच्चे भी होंगे।

तो उन्हें कल्पना आई कि यह नरक कहाँ से आ गया? मेरे पास नरक न आए, इसलिए चलो गंगा जी नहाकर आते हैं। गंगा जी नहाने गए तो उन्होंने जरा बहाना बनाया। जैसा कि गुरुजी ने भी एक बार अपनी माँ को चकमा दिया था, सुनामी जैसा चकमा दिया था। तो शंकराचार्य ने जा करके गंगा जी में पैर नीचे धँसा दिया।

उन्होंने कहा कि माँ मगर ने मेरा पैर पकड़ लिया है, अब मेरा बचना मुश्किल है। माँ रोने-चिल्लाने लगी। अब वो खींचें, माँ खींचें, बेटा खिंचाए नहीं; क्योंकि मगर ने थोड़े ही पकड़ा था। वो तो माँ से पल्ला छुड़ाना चाहता था।

उन्होंने कहा कि माँ! मगर नहीं छोड़ता। उसने कहा कि बेटे! मैं क्या करूँ? तेरे लिए मैं सर्वस्व दाँव पर लगा सकती हूँ। जो तू कहेगा बेटे, सो ही करने के लिए तैयार हूँ। उन्होंने कहा कि माँ! शंकर जी कह रहे हैं।

क्या कह रहे हैं? कह रहे हैं कि शादी नहीं करेगा और मेरा काम करेगा तो मैं छोड़ दूँगा। ठीक है बेटे, मैं नहीं कहूँगी और झट माँ का कहना हुआ, चट से वो आ खड़े हुए।

बेटे ! ये प्रलोभन हमको गिराते हैं। प्रलोभन को अगर हम लात मार देते हैं तो फिर कोई भी पास नहीं फटकते। फिर हमारी दिशा बिलकुल साफ हो जाती है।

क्रमशः [अगले अंक में समापन]

(गतीक से आगे)

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि वे चिन्तनशील व्यक्ति को समाज के उत्थान के लिए उसके विवेक का प्रयोग करने के लिए प्रेरित कर और उनकी सहृदयता का स्मरण भी प्रत्येक गायत्री परिजन को कराती हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में वन्दनीया माताजी हर साधक को, हर शिष्य को एवं हर गायत्री परिजन को उपासना, साधना एवं आराधना का मर्म समझाते हुए कहती हैं कि इन सभी आध्यात्मिक पद्धतियों का आधार समर्पण है। जो स्वयं को समर्पित करने का साहस रखता है, वही परमात्मा की अनुकम्पा को पाने का अधिकारी बनता है। वन्दनीया माताजी, पूज्य गुरुदेव का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहती हैं कि यदि हमें बनना ही है तो हम भगवान के उत्तराधिकारी बनें, स्वयं को समर्पित करें, अपने व्यक्तित्व को विगलित करें और एक उच्च उद्देश्य के लिए स्वयं को विसर्जित करें। यही सही अर्थों में उपासना, साधना एवं आराधना का पथ है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.......

जीवन में संस्कार

मेरे कहने का तात्पर्य आप समझ गए होंगे। मैंने तो आपको उदाहरण दिया है। किनका? शंकराचार्य का दिया, दो मालियों का दिया। उसका क्या मतलब था? उसका मतलब यही था कि आप अपना मार्ग चुनिए कि आपको किधर जाना है। आपके मार्गदर्शक ने आपके लिए कितनी मदद की है? कितना आपके लिए साधन जुटाए हैं? आप कल्पना नहीं कर सकते हैं।

साधन का मेरा मतलब विशुद्ध साहित्य से है। जिसमें कि आपको प्रेरणा मिलती है, जो आप दूसरों को दे सकते हैं, लेकिन आपके मन की वह संकीर्णता ही नहीं छूटती तो आप करेंगे क्या? कुछ नहीं कर सकते। चूँकि आपके अन्दर वह भक्ति अभी पैदा नहीं हुई है। अभी कौन-सी भक्ति हो गई है? भक्ति पैदा हुई तो है, पर केवल मालाओं तक सीमित हो गई है। बेटे, माला करेंगे तो क्या हो जाएगा? माना कि तेरी एक की मुक्ति हो जाएगी, तो बाकी का क्या होगा? करोड़ों-अरबों लोग हैं, उनमें से एक कम हो जाएगा तो उससे क्या होगा?

जो संस्कार हम इस जीवन में लेकर के जा रहे हैं, वही संस्कार हमारे जहाँ कहीं भी हम जाएँगे, वहीं उत्पन्न होंगे। हाँ बेटे ! बिलकुल होंगे, कल ही मैंने इसका उदाहरण दिया था मृत्यु और पुनर्जन्म से उसका सम्बन्ध था, उसमें एक बन्दरिया का उदाहरण था, चलो मेरे मुँह पर घटना आ गई है तो सुना देती हूँ। एक बन्दरिया थी और वह किसी गड़रिये के हाथ में पड़ गई। उसने कहा, मैं इसका क्या करूँगा? मैं तो गड़रिया हूँ। उसने बन्दरिया को एक विदेशी को सौंप दिया। उस विदेशी को पशु रखने का बहुत चाव था। बकरी, भैंस, गाय जाने क्या-क्या रखता था। उस बन्दरिया में जो संस्कार पाए गए, वह यह पाए गए कि यह पिछले जन्म में कोई मनुष्य रही होगी। उसका हर क्रियाकलाप समझदारी भरा था। वह पशुओं के साथ जंगल में जाती तो यह देखती कि कोई पशु, कोई बकरी कहीं यहाँ रह तो नहीं गई।

बेटे! थोड़े दिन बाद उस विदेशी ने क्या किया कि जो गड़रिया उसके यहाँ रहता था, पशुओं के चराने के लिए तो उन्होंने कहा—थोड़े दिन की छुट्टी कर दूँ, देखें इस बन्दरिया को। अब गड़रिया एक तरफ और बन्दरिया एक तरफ। बन्दरिया ने तो ऐसा कर दिखाया कि अगर कोई बकरी का बच्चा इधर-उधर रह जाता तो बन्दरिया उसे ढूँढ़ने निकलती और फिर उस बकरी के बच्चे को ढूँढ़कर ले आती और जितनी देर उसको चारा खिलाना था, उतनी देर खिलाती और सबको वापस लेकर के आती।

बेटे! संस्कार ये होते हैं। जैसे हमारे इस जन्म में जो संस्कार हैं, वही हमारे अगले जन्म में जाएँगे, बिलकुल जाएँगे, इस जन्म में आप अपना परिष्कार कर पाएँगे तो अगले जन्म में भी जहाँ कहीं भी आप जाएँगे किसी भी योनि में जाएँगे, वहाँ भी आप परिष्कृत हो करके जाएँगे।

लक्ष्य के लिए समर्पण

अभी मैं एक उदाहरण बताऊँगी। उदाहरण यह कि गुरुजी ने भी एक बार अपनी माँ को चकमा दिया था। कौन-सा दिया था? बेटे, उसका सम्बन्ध रूहानियत से है और यह संकल्प बल से है कि हमको यह काम करना ही है, और काम करना है तो हम परिवार की नहीं सुनेंगे। माँ की भी एक बार की कही बात नहीं सुनेंगे। पिता की भी नहीं सुनेंगे जैसा कि ध्रुव ने, प्रह्लाद ने भी अपने पिता को ठुकरा दिया था।

उन्होंने कहा कि पिता हमको गलत बात बताएगा तो हम ऐसे पिता को भी छोड़ देंगे और माँ को भी छोड़ देंगे। बेटे! तो क्या हुआ था कि छोटी उम्र थी? कांग्रेस आन्दोलन में उनको भाग लेना था। भाग तो ले रहे थे बहुत दिन से, लेकिन उस दिन उनको जाना ही था कि आज किसी भी हालत में हमको यहाँ से जाना है।

घरवाले हमें कुछ करने नहीं देंगे तो बेटे उन्होंने बहाना बनाया। घरवालों ने उन्हें कोठरी में बन्द कर दिया था कि यह ऐसे नहीं मानेगा, इसी में बन्द कर दो। इसी में खाना दो, जो कुछ करना है, इसी में कराओ। उन्होंने कहा कि यह अच्छी मुसीबत आ गई।

तो उन्होंने क्या काम किया? एक लोटा हाथ में लिया, अण्डरवियर और बनियान पहने हुए थे और जनेऊ कान पर चढ़ाया। वह घर में माँ को ताई कहते थे, तो हम सभी उनकी माताजी को ताई कहते थे, सारे गाँव के लोग ताई कहते थे, वह सारे गाँव में बड़ी थीं। बोले ताई! हाँ क्या है? अरे किवाड़ खोल, ताई बोली बक मत, चुपचाप इसी में बैठा रहा।

उन्होंने कहा—देखो, मुझे टट्टी जाना है, टट्टी जाना है तो क्या घर में जाऊँगा? बात समझ में आ गई हाँ, ठीक बात। जाने दो, उन्होंने जूते-चप्पल, कपड़े-लत्ते सब छिपा के रख दिए थे। कहा अच्छा, देखा जाएगा और उन्होंने किवाड़ खोल दिए, आखिर माँ है। माँ को इतनी तो उदारता होती है, माँ इतना थोड़ी सोच पाती है की यह क्या कर रहा है? हाँ भई ! बच्चा ही तो है, उन्होंने दरवाजा खोल दिया और बस बेटे, वे भागे-सो-भागे, उन्होंने आगरा छावनी में जा करके ही दम ली, आँवलखेड़ा, से आगरा के लिए वे रात में चले। रात में नंगे पाँव न काँटों की खबर है, न शेर-चीते की खबर है। जंगलों से अब तो आबादी भी हो गई है। सड़क भी पक्की हो रही है। पहले जंगल-ही-जंगल था, सियार और शेर भी थे जंगल में, लेकिन बेटे उन्होंने परवाह नहीं की और जहाँ कांग्रेस की छावनी थी, वहाँ जाकर के रहे। तो मैं ये क्या कह रही थी? बेटे ! आपको भी वह करना पड़ सकता है।

लक्ष्य के लिए सब समर्पित करें

लक्ष्य के लिए उद्देश्य के लिए आपको माँ की भी बात को ठुकराना पड़ेगा। बीबी की बात को भी ठुकराना पड़ेगा और सारे रिश्तेदारों की बात को ठुकराना पड़ेगा। किसके लिए, लक्ष्य के लिए।

बेटे ! हमारी उपासना-साधना और आराधना लक्ष्यविहीन नहीं, उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए, उद्देश्यपूर्ण होगी तो बेटे चमत्कार उत्पन्न होगा। आपके जीवन में वे चमत्कार पैदा होंगे, जो बेटे गुरुजी के जीवन में हुए हैं। अभी आपने चमत्कार नहीं देखा क्या? अरे, अभी भी नहीं देख रहे हैं, तुम्हारी आँखें बUद हैं, इसलिए नहीं देख पा रहे हो।

गुरु-गायत्री की शक्ति

आपके साथ तो शक्ति जुड़ ही रही है ना? गुरु की शक्ति जुड़ रही है, गायत्री माता की शक्ति जुड़ रही है। आप तो बड़े भाग्यशाली हैं, आपके साथ तो चार-चार हैं। चार कौन-कौन हैं? देखो दादागुरु एक, गुरुजी दो, गायत्री माता तीन और माताजी चार। अरे ! आपके पीछे तो चार गुनी शक्ति है। अब भी नहीं समझोगे क्या? अभी घर पर अर्थात कीचड़ में ही रहोगे क्या? चार गुनी शक्ति को ठुकराते रहोगे क्या?

माँ की आवाज को अनसुना करोगे क्या? कान को बहरा करोगे क्या? बेटे ! तो फिर मैं समझूँगी की आप बहरे हैं। फिर मेरे बेटे नहीं हो। आपने मेरी बात को नहीं सुना, आपने मेरी बात को नहीं समझा तो फिर मैं बेटे कैसे मान लूँ आपको। चलो मैं मान भी लूँगी मेरे बेटे ! लेकिन आपने तो फर्ज और कर्तव्य को ही नहीं समझा?

आपने फर्ज और कर्तव्य को नहीं समझा तो जो देना होगा, वह देंगे तो सही आपको; क्योंकि आप हमारे बेटे हैं, लेकिन आपने तो नहीं सोचा कि हमारा माँ के प्रति क्या कर्तव्य है और क्या कर्तव्य हमारा गुरु के प्रति, और क्या फर्ज है हमारा मिशन के प्रति। गुरु के पाँव नहीं दबाने हैं, बेटे ! गुरुजी के लिए कुछ नहीं देना, गुरुजी के हाथ-पाँव अभी खूब हट्टे-कट्टे मौजूद हैं और माताजी के लिए, माताजी के लिए साड़ी लानी है क्या? नहीं बेटे ! उनके लिए भी नहीं लानी है।

हर महीने 500 रुपये आ जाता है, उसी 500 रुपये में से गुजारा कर लेते हैं। हमारा तो मुट्ठी भर का पेट है, किन्तु दिखते हैं मोटे-तगड़े ! पर इतना खाते नहीं हैं। जो तुम्हें दिखता है, वो तो हमारी रूहानियत है। बेटे ! हमारे पास जो है, वो पर्याप्त है, उसमें हम खा भी लेते हैं और खिला भी देते हैं, हमें अपने लिए नहीं चाहिए। लेकिन आपका कर्तव्य है कि जिस मिशन से आप जुड़े हैं और जिस गुरु से आप जुड़े हैं, आपको नहीं समझ आता कि कितना बड़ा मिशन है। बेटे ! कितना बड़ा पेट है इसका, हाथी का पेट भर जाता है, पर इसका नहीं भरता बेटा !

अभी देख 20 हाथी गए यहाँ से, कितनी भूख है उनकी। अभी और हाथी जाने वाले हैं। यह तो मैं गाड़ियों की बात बता रही हूँ आपको और जो हमारे कार्यकर्ता रहते हैं। उनका निर्वाह, उनके बिजली का, पानी का खरच आपको दिखाई नहीं पड़ता? हाँ ! माताजी दिखाई तो पड़ता है, पर अब करेंगे क्या? कभी आपके मन में आता है क्या? कभी आपने सोचा है क्या? कभी आपने कल्पना की है क्या? बेटे ! ये कौन करा रहा है? यह सब शक्ति करा रही है और कराती रहेगी। आपके न करने पर भी काम चलेगा। आप अलग हो करके देख लीजिए, माताजी का काम रुकेगा नहीं, बल्कि और तेजी से पूरा होगा।

इनसान का नहीं, भगवान का काम

बेटे! यह इनसान का काम नहीं है, यह भगवान का काम है और भगवान का कार्य कोई भी अधूरा नहीं रहेगा। कभी अधूरा नहीं रहता। बेटे, वह बढ़ता ही रहेगा। हम तो आपकी नीयत की परीक्षा ले रहे थे। हमें क्या चाहिए? तुम्हारे न देने से भी काम चलेगा और चलते रहे हैं बेटे और आगे भविष्य में भी चलते रहेंगे, पर मैं तो आपको एक चित्रण प्रस्तुत करा रही थी की आप घर में रह रहे हैं, लेकिन आप बे-खबर हैं।

आप बे-खबर हैं कि यहाँ हमारी माँ भी रहती है क्या? घर में यहाँ हमारा पिता भी रहता है क्या? घर में यहाँ हमारे भाई भी रहते हैं क्या? इस घर में यहाँ हमारी बहन भी रहती है क्या? इस घर में कोई आवश्यकता भी है क्या? वो आप बिलकुल बे-खबर हैं, घर में भी रहते हैं, लेकिन घर से बे-खबर क्यों हैं? आपने जो पट्टी बाँध रखी है आँखों पर, इसलिए सम्वेदना है ही नहीं।

सम्वेदना हो, तो आपको अनुभव हो, किन्तु सम्वेदना है ही नहीं तो अनुभव कैसे होगा? वह नहीं होगा और सम्वेदना होगी तो आपको हर पल, अपना लक्ष्य याद रहेगा। लक्ष्य याद रहेगा बेटे, तो फिर आप घर में तपोवन बना करके रहेंगे, जैसे कि बेटे गुरुजी गृहस्थ रहे हैं। बच्चे भी रहे हैं, ब्याह, शादी भी हुई है और बेटे ! सारे फर्ज और कर्तव्य निभाते हुए भी, वे एक योगी की तरह से और तपस्वी की तरह से रहे हैं सारे जीवन भर। नहीं साहब, हमारी तो पत्नी बाधक है। हमारा तो बच्चा बाधक है। चल बक मत, पत्नी और बच्चे का नाम लेता है, वही गरीब मिल जाते हैं, पत्नी और बच्चे, सो उन्हीं का बहाना बनाता रहता है।

स्वयं को सौंपने का परिणाम

बेटे ! गुरुजी मुझे माताजी कहते हैं, किस माने में उनकी माताजी हूँ, नहीं बेटे, मैं तो पत्नी हूँ उनकी, माताजी कैसे हूँ? लेकिन किसी माने में हूँ? किस माने में हूँ? बेटे ! मैं उदारता के रूप में हूँ और पीठ थपथपाने के रूप में हूँ, इस रूप में हूँ कि कदम खींचा नहीं गया, आगे बढ़ाया और साथ ही खुद भी आगे बढ़े। बेटे, तो क्या बीबी-बच्चे बाधक होते हैं? बाधक नहीं होते हैं, उनको स्वरूप समझाया नहीं गया। आपने पत्नी को भोग्या के रूप में उपयोग किया है।

कहीं देवी के रूप में और सम्वेदना के रूप में आपने उपयोग किया होता तो बेटे ! आपके साथ सहोदर भाई की तरह से होती। आपके मित्र के तरीके से होती तो आप जिधर चलाते, उधर चलती, बेटे! मुझे तो अनुभव है और मैं तो उसी तरह से चलती हूँ, पर आपमें सहूर नहीं है, सलीका ही नहीं है; उनमें तो था उनमें तो है और बेटे उन्होंने तो क्या-से-क्या बना दिया? बैठी हूँ तुम्हारे साथ कैसे क्या बना दिया, वे मेरा गुणगान करते हैं तो मैं उनका कर लेती हूँ। पूरा श्रेय उन्हीं का ही है।

यह सारा-का-सारा आपको जो दिखता है, जो हमारे कार्यकर्ताओं में जीवट दिखता है। किनका है, उनका स्वयं का उपार्जित किया हुआ नहीं। स्वयं का भी है, स्वयं का कितना है बेटे? उन्होंने हमको सौंप दिया। किसने? उन बच्चों ने, जो अपनी नौकरी छोड़ करके आए हैं, अपना घर छोड़कर आए हैं और अपने आप को हमें सौंप दिया। पिताजी हमने आपकी गोद में सौंप दिया, अब आपके आँचल में हमारी जिन्दगी है, बेटे, तो ये बेटे छाती से लगाने योग्य हैं और जब तक जिन्दा रहेंगे तब तक और मरेंगे तब तक, इसके पीछे हमारा भरपूर आशीर्वाद है। इन बच्चों के लिए। जो हमारे बच्चों ने कदम उठाया है, नसीहत सीखी है।

बेटे! गुरुजी से सीखिए। बच्चों से सीखिए। यहाँ के वातावरण से सीखेंगे तो आपकी आँखें खुल जाएँगी, भगवान करे जो आशीर्वाद मैं अभी अपने बच्चों को उनके लिए कह रही थी, वही आशीर्वाद आपके लिए भी है। बेटे ! आपके लिए कंजूसी नहीं है। ये सब तो मेरे निकट हैं। आप दूर हैं, आपके लिए तो और भी ज्यादा है। बेटे ! गुरुजी का है, हमारा है। हर पल आपके ऊपर आशीर्वाद की छाया बनी रहेगी, लेकिन बेटे इसके साथ-साथ आपका मनोबल भी जुड़ा होना चाहिए। आपकी क्रियाशीलता भी जुड़ी होनी चाहिए।

क्रियाशीलता इस माने में कि बेटे ! प्रज्ञा का आलोक जो हम ले करके चले हैं। वह प्रज्ञा का आलोक हमारा हर घर में पहुँचना चाहिए। कोई भी घर ऐसा न रहे, जहाँ हमारा प्रज्ञा का आलोक न पहुँच पाए। यह काम आपको करना है। आप खड़े हो जाइए, जरा शक्ति तो आपमें आ ही जाए। जान तो आपमें होनी चाहिए, जान कौन पैदा करेगा, जान आप पैदा करेंगे और निर्जीव होंगे तो बेटे गुरुजी धक्का मार देंगे और माताजी भी दुत्कार देंगी। बिलकुल, चूँकि आपमें शक्ति ही नहीं है।

सक्रियता लाएँ—भगवान का प्यार पाएँ

आप निर्जीव हैं। निर्जीव मत रहिए, बेटे सक्रियता लाइए। अपने अन्दर जान लाइए, फिर आप देखिए। कितना आपके ऊपर अनुदान बरसता है? बेटे ! जैसा गुरुजी के ऊपर बरसा है। किनका? उनके गुरु का अनुदान बरसा है। गायत्री माता का अनुदान बरसा है बेटे ! कितना बरसता जाता है, पर बेटे वे बीज की तरह से गलते ही जाते हैं। तब यह बरस रहा है, फोकट में नहीं है।

फोकट में कोई चीज नहीं होती बेटे ! इसलिए मेरी आपसे प्रार्थना है। आपसे निवेदन है के बेटे आप अपनी संकीर्णता को हटा दें और उदारता को जिन्दा रखिए, सक्रियता को जिन्दा रखिए, आप श्रद्धा को जिन्दा रखिए। श्रद्धा अभी अपूर्ण है। पूर्ण नहीं है, है तो सही, लेकिन वह अपूर्ण है। पूर्णता की ओर मैंने आपको बताया, जो-जो मैंने इसमें उदाहरण दिए हैं, वो पूर्णता की ओर जाने को हैं। पूर्णता की ओर चलिए, साधना कीजिए, आराधना कीजिए बेटे, फिर पाइए भगवान का प्यार। बेटे ! हर समय आपको लगेगा कि भगवान की कितनी बड़ी दया और कितना प्यार हमारे ऊपर बरस रहा है?

कितना बरस रहा है कि उसको हम सँभाल नहीं पा रहे हैं? उसको हम सँभाल नहीं पा रहे हैं। बेटे ! सही रूप में यही होता है और यही होता रहा है। नरसी मेहता के जीवन में भी यही हुआ है। हाँ बेटा, उसने समर्पण किया तो फिर नरसी मेहता कहाँ-से-कहाँ पहुँच गया, वही मैं आपको बता रही हूँ। मैं ज्यादा नहीं खींचूँगी। तो मैं आपसे यह निवेदन कर रही थी बेटे कि अपने अन्दर की जो क्षुद्रता है उसको छोड़िए, उसको त्यागिए और फिर पाइएगा अपने जीवन में खुशहाली।

पाइए शान्ति, पाइए शक्ति, पाइए भक्ति; फिर देखिए आपके जीवन में वो शान्ति की दौलत, वो शक्ति की दौलत आती है कि नहीं? आप अभी पाने के लिए आए हैं, पैसा पाने के लिए आए हैं न, बच्चा पाने के लिए आए हैं न, लड़का पाने के लिए आए हैं न, बीबी को पाने के लिए आए हैं न, अरे बेटे! यह सब एक ओर रह जाएगा।

आपको वह मिलेगा, वह सम्पत्ति मिलेगी, जिसे आप सँभाल नहीं सकेंगे, वह जीवात्मा का उत्थान आपको मिलेगा। बेटे ! आपको विकास मिलेगा, जिसके सहारे आप चलेंगे और दूसरों का मार्गदर्शन कर पाएँगे। दूसरों को प्रकाश दे पाएँगे। बेटे एक तो मैंने ये कहा।

दूसरा मैंने ये कहा कि गुरुजी के अन्दर एक अग्नि जलती रहती है। उस अग्नि में मैं शामिल हो गई और मेरे बच्चे शामिल न हों तो बेटे धिक्कार है। उन बच्चों के लिए धिक्कारती हूँ, जिनको मैं समझा नहीं सकी। बेटे! तुम्हारे पिता के अन्दर जो अग्नि जल रही है, एक छोटी-सी चिनगारी आप भी ले जाइए। बेटे! इसको लेकर के आप जाना और अपने को बदल के जाना, जो आपकी विचारधारा और जो आपका दृष्टिकोण है, उसको बदल लो। बदलो, तोड़ो, फोड़ो, इसको हटाओ, और फिर नए हो करके जाइए और परिवर्तन लेकर के जाइए और हर्ष और उल्लास लेकर के जाइए और बेटे! पिता का और माँ का आशीर्वाद लेकर के जाइए। इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ।

आज की बात समाप्त
॥ॐ शान्तिः॥