विषम परिस्थितियों में हमारे दायित्व

विषम परिस्थितियों में हमारे दायित्व ( प्रथम किस्त)

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह विशिष्टता है कि उनके शब्द न केवल भावनात्मक दृष्टि से परिजनों को उत्साहित एवं प्रेरित करते हैं, वरन वे गायत्री परिवार के मूल उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु जुट जाने के लिए आन्दोलित भी करते हैं। अपने एक ऐसे ही प्रस्तुत उद्बोधन में वन्दनीया माताजी वर्तमान परिस्थितियों का आकलन करते हुए कहती हैं कि वर्तमान समय की परिस्थितियाँ बड़ी ही विषम परिस्थितियाँ हैं और ऐसे में हमारे अन्तःकरण के अन्दर जो नकारात्मक शक्तियाँ विद्यमान हैं, उनके विरुद्ध खड़े होने की और जुट जाने की आवश्यकता है। वे कहती हैं कि हम लोग स्वार्थ को त्याग दें, नारकीय जीवन को त्याग दें एवं पूज्य गुरुदेव द्वारा दिखाए गए पथ का अनुकरण करें। वन्दनीया माताजी वर्तमान समय में सब कुछ भूलकर एकमात्र उद्देश्य के लिए अपने जीवन को निरत कर देने का संकल्प लेने को कहती हैं। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को........

विपरीत हैं परिस्थितियाँ

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

हमारे आत्मीय परिजनो! जब विपरीत परिस्थितियाँ आती हैं, तो अनेक जटिल समस्याएँ लेकर के आती हैं। जब कभी भी पारिवारिक जीवन में, सामाजिक जीवन में, राष्ट्रीय स्तर पर, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विपरीत परिस्थितियाँ आईं हैं, तो आपने देखा होगा कि अनेक विपरीत परिस्थितियों ने जन्म लिए हैं।

अनेक ऐसी-ऐसी जटिल समस्याएँ आती चली जाती हैं कि व्यक्ति यदि गहराई से सोचे और उनका अध्ययन करे, तो मालूम पड़ेगा कि उसमें कितनी जटिलता है और इनको किस तरीके से सुलझाया जाना चाहिए?

जब बुखार आता है, तो शरीर में पीड़ा होती है, सर में दरद होता है, खाना हजम नहीं होता, भूख नहीं लगती है, पाँव लड़खड़ाते हैं, चला नहीं जाता, शरीर में गरमी होती है, उठने का मन नहीं होता। विपरीत परिस्थितियाँ हैं। ज्यों ही बुखार आया, बुखार के साथ-साथ अनेक पीड़ाओं ने जन्म ले लिया। इसी तरीके से जो विपरीत परिस्थितियाँ आती हैं, उनके साथ-साथ अनेक जटिल परिस्थितियाँ जन्म लेती हैं। हूबहू वही समय आज का है।

युगसन्धि पुरश्चरण का जो संकल्प लिया गया है, इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह बारह वर्ष का संकल्प लिया गया है। जिसके बारे में कल आपकी गोष्ठी हो रही थी, तो मैंने आप से निवेदन किया था कि महाभारत में कृष्ण ने यदि अर्जुन को नहीं झकझोरा होता और यह नहीं कहा होता कि उठो! हमारे देश की, काल की और राष्ट्र की यह विषम परिस्थितियाँ हैं। आपको उठना चाहिए।

जब अर्जुन नहीं उठा, तो कृष्ण ने उसके पौरुष को ललकारा और यह कहा कि जनखे! कौरवों से नहीं लड़ेगा तू? तो चूड़ियाँ पहनकर घर में बैठ। सामने परिस्थितियाँ दिखाई नहीं दे रही हैं? ये हाहाकार और चीत्कारें कानों में नहीं आ रही हैं? उन्होंने उसके पौरुष को ललकारा और यह कहा कि जनखे! घर में बैठेगा? नहीं, तो फिर इन कौरवों से लड़? तेरे सारथी हम बनेंगे। कृष्ण ने जब यह आवाज उठाई, तो अर्जुन लड़ने के लिए विवश हो गया। उसको लड़ना पड़ा और लड़ना चाहिए।

नारकीय जीवन त्यागें

हमारे अन्त:करण में कौरवों का जो निवास है, मैं प्रत्येक से कहूँगी कि आप उसके विरुद्ध उठ खड़े हों। हमारे अन्त:करण में जो कौरव विराजमान हैं, इनको हटाने के लिए, इनको मारने के लिए, इनको दबोचने के लिए, इनका दमन करने के लिए प्रत्येक परिजन को आगे आना पड़ेगा। प्रत्येक को अपनी रस्साकशी स्वयं करनी पड़ेगी और करनी चाहिए।

यदि आपने नहीं किया, तो बेटे! हमको भी शरम आएगी कि आप हमसे जुड़े हैं, गुरुजी से जुड़े हैं, गुरुजी के शिष्य हैं, हमारे बेटे हैं। फिर आपने तो हमारा सर नीचा कर दिया है कि उस शक्ति से, उस समर्थ सत्ता से जुड़े होते हुए भी आप ऐसा नारकीय जीवन जिएँगे?

आप नारकीय जीवन नहीं जिएँगे। आप आगे की पंक्ति में आएँगे; क्योंकि आप उस ऋषि की सन्तान हैं, आप उस सन्त की सन्तान हैं, उस महामानव की सन्तान हैं, जिससे कि आप सर ऊँचा करके गौरव पा सकते हैं।

बेटे! जो भी यहाँ आता है, वह यह देखता हुआ चला जाता है और प्रभावित होता हुआ चला जाता है कि आखिर यहाँ ऐसी क्या चीज है? जिससे हर व्यक्ति चिपकता हुआ चला जाता है। आप इतनी दूर से आए हैं, कहाँ रीवा, कहाँ हरिद्वार। आपको यहाँ कुछ मिल रहा है? नहीं, यहाँ कुछ नहीं मिल रहा है। आखिर ये क्या बात है? एक ही चीज है और वह चीज है—हमारा स्नेह, वह चीज है—हमारा प्यार, वह चीज है—हमारी सहृदयता, जो आपको खींच करके यहाँ तक लाई है। वह है—हमारी प्रेरणा, वह है—हमारा झकझोरनापन, जो आपको यहाँ लेकर के आई है। इस शीतकाल के समय में आप आए हैं। कितनी ठण्ढक है। आपके रीवा में इतनी ठण्ढ पड़ती है? नहीं, इतनी नहीं पड़ती। यहाँ पड़ती है। कहीं, कोई अंश आपके अन्दर ऐसा है, जैसा कि हम चाहते हैं।

बेटे! भगवान राम के समय में क्या भगवान राम ने अकेले काम किया था? नहीं, बेटे! अकेले ने काम नहीं किया था। उनके साथ रीछ और वानर थे। रीछ और वानर कौन थे? वे देवता थे और उन्होंने यह संकल्प लिया था कि भगवान राम के काम में हम हाथ बँटाएँगे, हम हिस्सा बँटाएँगे, हम कन्धे से कन्धा मिलाकर के काम करेंगे।

नहीं साहब! हमारी तो औरत है, हमारी तो चाची है, हमारी तो नानी है, अपने स्वार्थों को छोड़कर के हम कैसे जा सकते हैं? नहीं, परमार्थ के लिए स्वार्थों को त्यागना पड़ता है।

स्वार्थ को त्याग दें

जिसने स्वार्थ को त्याग दिया है, उन कौरवों को मार दिया है, वही व्यक्ति सच में अर्जुन हो सकता है और वही व्यक्ति सच में कृष्ण हो सकता है, जो कि परमार्थ के लिए आगे चलता है और सबको ज्ञान देता है। आप में से कोई भी हो सकता है। कृष्ण के समय में ग्वाल-बाल थे। राम के समय में रीछ-वानर थे और बुद्ध के समय में उनके साथ अनेकों व्यक्ति थे।

बुद्ध क्या थे? बुद्ध एक मार्गदर्शक थे, प्रेरणा थे। उनके साथ-साथ चलने के लिए अनेक व्यक्ति तैयार हो गए, जिसमें कि एक आम्रपाली वेश्या थी, अंगुलिमाल थे, महेन्द्र थे और संघमित्रा थी, अशोक के दोनों बच्चे थे। उन्होंने यह शपथ ली थी कि हम बुद्ध का काम करने के लिए कटिबद्ध हैं।

उनका नाम आज भी हम लेते हैं और बड़े गर्व से लेते हैं कि लोक-मंगल के लिए व्यक्ति को निकलना चाहिए और वह निकले। अकेले बुद्ध ने किया था? नहीं, अकेले बुद्ध ने नहीं किया। किसने किया? जो उनके साथ जुड़े थे, उन्होंने किया और शक्ति किनकी थी? शक्ति बुद्ध की थी। गाँधी जी स्वतंत्रता लेकर के आए थे? नहीं, गाँधी जी लेकर नहीं आए थे; लेकिन गाँधी जी प्रेरणास्त्रोत थे, लाखों व्यक्ति जिनके साथ में होते थे। लोभ और मोह की जंजीरों से निकलिए। उनको तोड़कर फेंकिए। जहाँ कहीं भी लोभ व्याप्त है, जहाँ कहीं भी मोह व्याप्त है, उसको तोड़िए।

इन परिस्थितियों में हमारे कर्तव्य

अभी जो मैंने आप से निवेदन किया था कि जब विषम परिस्थितियाँ आती हैं, तब प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि उन विषम परिस्थितियों से टकराने के लिए, उनका दमन करने के लिए, लोगों का हौसला बढ़ाने के लिए आगे आना चाहिए। यदि आप लोगों ने यह हौसला नहीं दिखाया, आप लोगों की हिम्मत नहीं हुई, तो कल आने वाला समय हमको भी धिक्कारेगा और आपको भी धिक्कारेगा। हमको हजार बार धिक्कारेगा और यह कहेगा कि ये बुद्धिजीवी थे, ये ज्ञानवान थे, ये सन्त थे, ये ऋषि थे?

हमने देख लिया इनका मिशन और देख लिए इनके ये बेटे, यह मत कहलवाना। हमको मरना मंजूर है; लेकिन कलंक का यह टीका लगाना हमें मंजूर नहीं है। कभी भी नहीं हुआ और आजीवन नहीं होगा। हम उस पथ के राही हैं कि हम स्वयं रोशनी देखते भी हैं और दिखाते भी हैं, चलते भी हैं और चलाते भी हैं। कष्ट साध्य जीवन जीते भी हैं और जिलाते भी हैं।

आपने यहाँ कितने कार्यकर्ता देखे हैं, आपको मालूम है न? यहाँ डॉक्टर भी हैं, इंजीनियर भी हैं और भी हैं, बच्चे जो अपनी नौकरी छोड़-छोड़कर आए हैं। इनका त्याग कम है क्या? बेटे! बिलकुल त्याग कम नहीं है। उनका ज्यादा है; लेकिन जब कहीं भी हम कमी पाते हैं, तो निस्संकोच उसको इतना कसते हैं कि बस चीं बोल जाता है। बेटे! तेरा त्याग एक ओर और तेरी कमियाँ, गलतियाँ एक ओर, जो सारे त्याग पर पानी फिरा देंगी।

गुरुदेव का अनुकरण करें

आपने यहाँ हमारी जीवन्त मूर्तियों को देखा है। देखा है, तो आप अनुकरण करिए। गुरुजी का अनुकरण करिए जो कि 18 घण्टे श्रम करते हैं, पूजा-उपासना उनकी अलग है। 6 घण्टे की नित्य प्रति उनकी उपासना चलती है, लेकिन बाकी का कितना श्रम करते हैं, वह आपको मालूम है? नहीं, आपको मालूम नहीं है। आपको ज्ञान है? नहीं, बिलकुल ज्ञान नहीं है। जानकारी है? हाँ, जानकारी तो आपको है, लेकिन उस जानकारी को आपने हृदय में नहीं उतारा है।

यदि हृदय में आप उतार लेंगे, तो फिर आप यह नहीं कहेंगे कि हमारी अमुक कष्ट-कठिनाइयाँ हैं। हमारे बच्चियाँ ही होती हैं, हमारे बच्चा नहीं है। फिर बेटे! आप उसी तरीके से आएँगे, जैसे समर्थ गुरु रामदास के पास शिवाजी गए थे और विवेकानन्द अपने गुरु के पास गए थे। उनको क्या मिला था? एक ही चीज मिली थी, वह मिली थी—शक्ति, वह मिला था—साहस, वह मिला था—पुरुषार्थ।

क्या गुरुजी से माँगें

बेटे! उन्होंने एक ही बात कही थी कि जो हमारे पास है, हम दे सकते हैं, जो हमारे पास है ही नहीं, तो हम वह देंगे कहाँ से। लाओ साहब गुरुजी! रुपया दे दो। गुरुजी पर रखे हैं रुपये, जो दे देंगे गुरुजी? गुरुजी के पास तो एक छदाम नहीं रहता। आज तक कभी भी उनकी जेब में एक चार पैसे नहीं निकले, तो तुम्हें कहाँ से दे देंगे, बताइए? बोल दे देंगे?

नहीं। हनुमान जी के पास जा और हनुमान जी से कहो कि हे हनुमान जी! हमारे बच्चा पैदा कर दो, हमारी शादी करा दो। अरे हनुमान जी तो जिन्दगी भर ब्रह्मचर्य से रहे थे, तुम्हारा ब्याह कहाँ से करा देंगे, तुम्हारे बाल-बच्चे कहाँ से पैदा करा देंगे? यदि हनुमान जी से माँगना है, तो वह पराक्रम माँगिए, वह हिम्मत माँगिए, वह हौसला माँगिए, जिससे कि वे समुद्र को लाँघ गए थे और लंका में आग लगा दी थी। वह चीज तो आप माँगते नहीं, फिजूल की चीजें माँगते हैं।

कौन-सी चीज माँगते हैं? वह माँगते हैं, काँच के ठीकरे, जो आपके जीवन में कभी काम आने वाले नहीं हैं। माँगिए, माँगना है तो हीरा माँगिए न। हीरा जैसा जीवन माँगिए। जहाँ कहीं भी आप जाएँ, आपको देखकर के व्यक्ति यह कह दे कि हाँ भाई बड़े कमाल का व्यक्ति है। अरे देखना है, तो उसको देखिए, जिसमें कोई भी दाग-धब्बा नहीं है। प्रलोभन फटककर भी उसके पास नहीं गया है। आप उसको देखिए। आपके ऊपर वह प्रभाव पड़ना चाहिए।

जो गुरुजी के अन्दर अग्नि जल रही है, मैं तो आपसे एक ही निवेदन करूँगी कि उसमें से एक चिनगारी भी आप ले जाएँ। सम्पूर्ण नहीं ले पाए, तो एक चिनगारी भी आप अपने साथ लेकर के जाएँगे, तो आप धन्य हो जाएँगे। वह चिनगारी आपको बैठने नहीं देगी।

क्या कारण है कि आज हमारे समाज में जो विकृतियाँ फैली हुई हैं, उनके प्रति हम जरा भी सजग नहीं हो पाते हैं? क्यों नहीं हो पाते? छुआछूत के नाम पर, लिंग भेद के नाम पर, दहेज के नाम पर आएदिन हमारी बच्चियाँ आत्महत्या करती हैं, जला दी जाती हैं।

क्या ये बुद्धिजीवी वर्ग का काम नहीं है कि वह हिम्मत से आगे आए और यह संकल्प ले और दूसरों को भी संकल्प दिलाए कि हम अपने बच्चों की शादी में दहेज नहीं लेंगे। लेकिन हम ऐसे हैं, जिसे संकीर्ण कहेंगे या ये कहेंगे कि पाषाण हैं, जिनके हृदय में जरा भी कोमलता नाम की चीज नहीं है।

कैसा सिद्धान्तवाद है यह?

जो आगे हाथ फैलाता है और बड़ा सिद्धान्तवादी बनता है। कहता है कि साहब! हम नहीं माँगते। हम नहीं माँगते, तो कौन माँगता है? हमारी औरत माँगती है। अच्छा, औरत की इतनी हिम्मत हो गई है? औरत कभी नहीं माँग सकती। नर में जरा-सी ताकत है, जो सारे दिन जद्दोजहद करता है, तो क्या इस बात के लिए जबान नहीं निकलती कि न हम दहेज लेंगे और न हम देंगे, देंगे भी नहीं।

मान लीजिए कहीं कोई ऐसी परिस्थिति आ गई, जो हमको मजबूर होना पड़ा, तो बात अलग है। हम तो कहेंगे कि मजबूर होइए ही मत। हम अपनी कन्या की शादी बड़े आदमी में नहीं करेंगे, तो छोटे में करेंगे। डॉक्टर से न करेंगे, इंजीनियर से करेंगे, इंजीनियर न मिलेगा, तो टीचर मिलेगा, कोई तो मिलेगा। हम तो रिक्शा चालक से कर देंगे, पर हमें यह भेड़िया नहीं चाहिए।

हम अपनी कन्या को भेड़ियों के लिए दे देते हैं, जो हमारी कन्याओं को निगलता हुआ चला जाता है। क्या हमारे हृदय पर जरा भी वज्रपात नहीं होता। बेटे! हम विचार ही नहीं करते। हमारे सामने जो निजी समस्याएँ होती हैं, उन्हीं में उलझे रहते हैं। देशव्यापी या राष्ट्रव्यापी भावना हमारे अन्दर जरा भी उत्पन्न नहीं होती है कि हमको राष्ट्र के भी काम आना है क्या? राष्ट्र का भी कुछ हमारे ऊपर उत्तरदायित्व है? हमारी कोई जिम्मेदारी है क्या?

जिम्मेदारी निभाइए

बेटे! हमने तीन बातों का आह्वान किया और यह कहा कि मनुष्य में देवत्व का उदय किस तरीके से होगा? जो प्रलोभन से दूर होंगे। दूसरी है—जिम्मेदारी। गुरुजी ने हमेशा कहा कि हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी महसूस होनी चाहिए। पारिवारिक जिम्मेदारियाँ जितनी हमारे ऊपर हैं, उसके लिए तो बड़े खुशी से और मनोबल से हम सारा दिन उस चक्की में पिसते रहते हैं, लेकिन हम समाज के लिए दो-चार घण्टे भी बचा पाते हैं क्या? नहीं, हम नहीं बचा पाते। तो यह जिम्मेदारी कहाँ है? आप जिम्मेदारी निभाइए और समझदारी की सूझ-बूझ दीजिए।

नहीं साहब! नासमझ के तरीके से जिधर भेंड़ें चल रही हैं, उधर ही हम चलेंगे। क्यों चलेंगे? उतनी समझ आप में होनी चाहिए। समझदारी, जिम्मेदारी के साथ गुरुजी ने एक और बात कही थी—बहादुरी। बहादुरी क्या चीज होती है? अभी मैंने आपके सामने हनुमान जी का उदाहरण दिया, रीछ-वानरों का दिया और ग्वाल-बालों का दिया। मैंने स्वतंत्रता आन्दोलन का भी दिया कि व्यक्ति किस हिम्मत के साथ, किस तेजी के साथ सामने आता हुआ चला जाता है, तो जो सारी विपरीत परिस्थितियाँ हैं, वो चकनाचूर हो जाती हैं।

आप तो इतने बैठे हैं, अकेले-अकेले व्यक्तियों ने कितना कार्य किया है। गुरुजी ने इतना बड़ा संगठन खड़ा किया?

विश्व का पहले नंबर का संगठन

सन् 1970-71 में तो यहीं चले आए। अपनी एक कोठरी में बैठकर पत्र-व्यवहार से लेकर के, लेखन से लेकर के और वाणी से लेकर जो भी कुछ कर सकते थे, वो सारा उन्होंने किया और इतना बड़ा संगठन तैयार किया। इतना बड़ा संगठन जो आज पहले नंबर का नहीं, तो हमारा दूसरे नंबर का है।

अब यह वह संगठन है कि जिधर हम अपनी सेना को भेज दें, बस, उधर ही बढ़ती हुई चली जाएगी और विजय पाती हुई चली जाएगी। हम जिस क्षेत्र में इसे खड़ा कर दें, राजनीति में भेज दें, तो कमाल हो जाएगा। अभी हमको ऐसे व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ते और जिस दिन हमको दिखाई पड़ेंगे तो राजनीति से लेकर, धर्मनीति से लेकर सब में हम ऐसे व्यक्तियों को पहुँचा देंगे, जो कमाल के हो जाएँगे।

हमारा यही प्रयास रहता है कि हर व्यक्ति के अन्दर कमियाँ तो हैं, लेकिन अच्छाइयाँ भी बहुत कुछ हैं। अच्छाइयाँ इतनी हैं कि बुराई दबती हुई चली जाती है। उन अच्छाइयों को और आगे उभारना चाहिए। कमियों को कम करो, अच्छाइयों को ज्यादा पैदा करो। अच्छाइयाँ आपकी पैदा होती चली जाएँगी, तो बुराइयाँ स्वतः ही चली जाएँगी।

बेटे! आपके पड़ोस में और समाज में जहाँ कहीं भी अवाँछनीयताएँ पाई जाएँ, उनके विरुद्ध आपको आगे आना पड़ेगा। तो क्या करेंगे, फिर लड़ाई-झगड़ा करेंगे? नहीं, बेटे लड़ाई-झगड़ा करने की कोई जरूरत नहीं है। काहे की जरूरत है? विचारों को विचारों से काटिए, सिद्धान्तों को सिद्धान्तों से काटिए। उनकी ठोड़ी में हाथ डालिए, उनकी मिन्नतें करिए और जब वो नहीं मानें, तो तन करके भी खड़े हो जाइए। अच्छा, तो वह यह माँगता है? अच्छा, हमारा भाई ही क्यों न हो? हम इसके यहाँ नहीं जाएँगे।

हमारा पिता है, तो हमें इस पिता की बात नहीं माननी है, किसी की भी नहीं माननी है। हमें अपनी ही जीवात्मा की माननी है कि क्या सही है, क्या उचित है, क्या अनुचित है? मीरा जब कृष्ण से जुड़ गई, तो उसको एक ही धुन सवार थी। क्या था कि मैं अपने आराध्य का कैसे गुणगान करूँ और कैसे मैं घर-घर उस आवाज को पहुँचाऊँ कि कृष्ण बड़ा शक्तिशाली है।

उसके घरवाले आड़े आए और उन्होंने उसका विरोध किया। विरोध ही नहीं किया; बल्कि जहर का प्याला भी दिया, पर वो जहर उसके लिए अमृत बन गया। कहा कि जहर से क्या डरना है, जहर भी कोई चीज होती है? देखा जाएगा, अपने अन्दर ताकत है, तो हम जहर को भी अमृत बना सकते हैं।

आपने शंकर जी की मूर्ति देखी है न? शंकर जी के दाएँ-बाएँ सब जगह सर्प, बिच्छू लिपटे हुए हैं। अगर आप ये समझते हैं कि शंकर जी कैसे हैं?

उनके गले में साँप, सर पर साँप, हाथ में साँप, तो फिर आपके सामने कोई भी समस्या उत्पन्न नहीं होगी। उन्होंने सर्पों को भी छाती से लगाया और जहर को भी अपने गले में उतारा था और अमृत? अमृत सबको बाँट दिया।

फूलों की तरह बनिए

आप उनका कार्य करिए, शंकर जी जैसा कार्य करिए। आपने फूलों को देखा है न? फूल जब भगवान के चरणों पर चढ़ता है, तो डाली से टूटता है और जब कोई तोड़ता है, मना नहीं करता। अच्छे कार्य के लिए कभी मना नहीं किया जा सकता और जब उसको इतने पर भी सन्तोष नहीं होता कि भगवान के चरणों पर तो आ गया, मैं तो भगवान के गले से लगना चाहता हूँ।

तो बेटे! वही फूल सूई को समर्पित हो जाता है और सूई छीलती हुई चली जाती है, धागा पिरोता हुआ चला जाता है और माला बन जाती है। किसकी? भगवान के गले की माला बनी है। यदि आपको राष्ट्रदेवता की माला बनना है और समाज का उत्थान करना है, तो आपको फूलों के तरीके से जैसे उन्होंने कष्ट सहा है, तो आपको भी कष्ट सहना पड़ेगा और सहना भी चाहिए।

बेटे! जहाँ कहीं भी आप दुराचार देखें। जहाँ कहीं भी आपको कमियाँ नजर आएँ, उनको प्यार से, दुलार से आप समझाइए। समझ में आ जाएगा? बिलकुल आ जाएगा। कहते हैं—नहीं साहब! हम तो इतनों के पास जाते हैं और कोई मानता ही नहीं है। अच्छा नहीं मानता, तो रहने दे। मैंने उस दिन एक उदाहरण बताया था कि भगवान बुद्ध के समय में एक महिला आई और उस महिला ने यह कहा कि भगवान मैं क्या करूँ? मेरा बच्चा गुड़ खाने से बाज नहीं आता।

उन्होंने कहा कि बेटी! अभी तो नहीं एक सप्ताह बाद आना, तब मैं आपको बताऊँगा कि गुड़ खाना चाहिए कि नहीं खाना चाहिए? अभी तो मैं बताने की स्थिति में नहीं हूँ। जब एक सप्ताह बाद वह महिला आई, तो उसने कहा कि बच्चे पर यह क्या जादू हो गया? इसने तो गुड़ बिलकुल छोड़ दिया, एक सप्ताह से नहीं माँगा उन्होंने कहा कि बेटी! इतने दिनों में मैंने जिह्वा पर कण्ट्रोल किया है और मैंने नहीं खाया। मैंने यह दिखाया कि बगैर उसके मैं रह सकता हूँ कि नहीं रह सकता तो मेरी अन्तरात्मा की आवाज समझिए, आशीर्वाद समझिए, पुकार समझिए, वो सुन लिया है।

ऐसा जरूर होता है, इसमें कोई दो राय नहीं है। अनुदान और वरदान भी मिलते हैं, भगवान के मिलते हैं और सारे मानव जाति का भी मिलता है। भगवान का मिलता है कि नहीं मिलता, हमें नहीं मालूम, लेकिन इस भगवान का जरूर मिलता है, ये जो बैठे हैं। ये भगवान का स्वरूप हैं। इनकी सेवा में इतना आनन्द आना चाहिए, जितना गायत्री माता की आराधना-उपासना में आता है, वही आपको इसमें आना चाहिए। तभी आपकी उपासना सम्पूर्ण है।

सम्पूर्ण उपासना में जितना लाभ है, उतना एकांगी में नहीं है। एकांगी में स्वर्ग, मुक्ति पा लीजिए, फिर क्या होगा? दूसरे तुम्हारे भाई-बन्धु नरक की अग्नि में जलते रहें। हम स्वर्ग-मुक्ति पाएँगे? नहीं, हमको नहीं चाहिए स्वर्ग-मुक्ति। जब तक हमारा एक भी प्राणी नरक में रहता है, तब तक हमें स्वर्ग की अपेक्षा क्यों रहेगी? हमको स्वर्ग की अपेक्षा नहीं रहेगी, हम नरक में ही रहेंगे।

[ क्रमशः अगले अंक में समापन ]

विषम परिस्थितियों में हमारे दायित्व (उत्तरार्द्ध)

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह मौलिकता है कि न केवल वे सर्वग्राह्य भाषा में गूढ़ चिन्तनों को सभी श्रोताओं के सम्मुख रखती हैं, वरन वे सभी साधकों-परिजनों को उनके दायित्वों का निर्वहन करने के लिए पुकारती भी हैं। अपने इस प्रस्तुत उद्बोधन में न केवल वे विषम परिस्थितियों में हमें हमारे दायित्वों का निर्धारण करने के लिए चेताती हैं, वरन हर साधक को यह भी स्मरण दिलाती हैं कि मनुष्य जीवन का सौभाग्य नारकीय प्रवृत्तियों को त्यागने के बाद ही जग पाता है। वे कहती हैं कि वर्तमान परिस्थितियाँ अत्यन्त भीषण, विषम एवं चुनौतीपूर्ण हैं और ऐसे में गायत्री परिजनों का, विशेष रूप से साधकों का दायित्व गुरुतर हो जाता है। हर साधक को न केवल पूज्य गुरुदेव से जुड़ने की एवं उन्हें अपने अन्तस में प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है, वरन अपने मन में उस भाव को गहराने की भी आवश्यकता है; जिससे शिष्यत्व का भाव और गम्भीरता के साथ निखरकर आता है। आइए हृदयंगम करते हैं उनकी अमृतवाणी को.......

स्वर्ग का आनन्द

युधिष्ठिर के लिए यह कहा गया कि चलिए आप तो स्वर्ग के लिए निहित हैं। उन्होंने कहा कि मेरे परिवारीजन कहाँ गए, मेरे कुटुम्बी कहाँ गए? उन्होंने कहा—वे तो सब नरक में हैं। उन्होंने कहा—मैं भी वहीं चलूँगा, नरक में ही चलूँगा। जहाँ मेरे कुटुम्बी हैं; जहाँ मेरे परिजन हैं; वहीं मुझको आप ले चलिए, मैं वहीं स्वर्ग का आनन्द पा लूँगा। उनका स्वर्ग वहीं हो गया था।

जिनके अन्दर ये भावनाएँ होती हैं, वो सब कुछ कर सकते हैं और जिसकी भावना ही सो गई है, जिसकी आस्था ही डगमगा गई है, जिसकी निष्ठा ही डगमगा गई है, जिसकी श्रद्धा ही नहीं है, वह व्यक्ति तो जिन्दा होते हुए भी मुरदे के समान है। आप बुरा मत मानना। किसी को कोई बात खटकती हो तो खटके, मैं क्या करूँ? मेरे तो आप बच्चे हैं, बच्चे हैं, तो मैं तो खुलकर कहूँगी। बेटे! मुझे कहना चाहिए और मेरा अधिकार भी है। यदि आप प्यार से मानें तो बड़ी अच्छी बात है।

कल मैं लड़कों से कह रही थी कि देखो भाई, अभी आप नहीं मानेंगे, तो कोई समय आएगा, जब हम नहीं रहेंगे, तो फिर आपको पछताना पड़ेगा। अभी तो हम हैं। यों तो हम इसी मिट्टी में विद्यमान रहेंगे, कहीं जाएँगे नहीं।

हम शान्तिकुञ्ज में सदा रहेंगे

बेटे! हम तो शान्तिकुञ्ज में ही रहेंगे। आप देखना, मरकर भी हम शान्तिकुञ्ज में ही रहेंगे। शरीर ही तो मरेगा, आत्मा तो नहीं मरती है। फिर आपको यही प्रेरणा और यही शान्ति और सन्तोष मिलता चला जाएगा और जब आप गड़बड़ी फैलाएँगे तब बेटे! फिर देख लेना, हम और गुरुजी दोनों आएँगे और एक देगा इस गाल पर और दूसरा देगा उस गाल पर। दोनों तुम्हारे कान उखाड़ेंगे और फिर तुम जब चारपाई से उठोगे न, अरे क्या हो गया?

गुरुजी-माताजी आ गए, भूत आ गया। अभी तो आप प्रणाम करते हैं, पाँव छूते हैं और कितने भावविभोर हैं और तब? तब बेटा! जिधर को जाएगा, उधर ही गुरुजी-माताजी दिखाई पड़ेंगे और अगर न माने, तू देख लेना, अभी से आजमाना शुरू कर देना।

अच्छा, जब हम मरें और भूत बनकर डराने आवें, तो इससे अच्छा है कि हम जिन्दा ही आपको डराएँगे। आप देख लेना डराते हैं कि नहीं डराते हैं। बेटे! आपसे यह निवेदन है कि समय और परिस्थितियों की, देश और काल की महती आवश्यकता है कि हमारे प्रत्येक परिजन को आगे की पंक्ति में आना चाहिए।

बुद्ध के समय में दुर्भिक्ष फैल रहा था, तो एक कन्या उठी। उसने कहा—‘‘पितामह! आप मुझे आज्ञा दीजिए, जो कार्य सब मिलकर नहीं कर सके, मैं करूँगी।’’ उन्होंने कहा—‘‘बेटी! तू जरा-सी बच्ची है। तेरे अन्दर वह हिम्मत, वह साहस है कि तू कर पाएगी? इतना अन्न जुटा पाएगी?’’

उसने कहा—‘‘पितामह! आपकी शक्ति और मेरा पुरुषार्थ और मेरा संकल्प बल, देखिए चमत्कार करता है कि नहीं करता?’’ चमत्कार क्या होता है, यह हम करके दिखाएँगे। बालिका उठी और उसने अन्न एकत्रित किया।

आप पढ़ना, यह एक सत्य कहानी है। यह वह कहानी है, जो कि प्रत्येक मुरदे में जान डालने वाली है कि एक नन्हीं-सी बालिका इतना साहस कर सकती है और हम नहीं कर सकते हैं? आखिर क्यों नहीं कर सकते हैं?

हमारी कमजोरी—संकीर्णता

क्या कमजोरी है? एक ही कमजोरी है और वो है संकीर्णता। संकीर्णता हमारा पीछा नहीं छोड़ती। संकीर्णता यदि हमारा पीछा छोड़ दे, तो कितने काम के हैं। बेटे! न मालूम आप में से कौन क्या बन सकता है? आपको कल्पना नहीं है, हमको कल्पना है कि न मालूम, आप से लेकर के आगे आने वाली पीढ़ी से लेकर के न मालूम कौन क्या बन सकता है? अभी आपका क्या बिगड़ा है? थोड़े से ही मुझे ऐसे दिख रहे हैं, इनके बाल सफेद हो गए हैं, बाकी के सब हट्टे-कट्टे जवान दिखाई पड़ रहे हैं। न मालूम आप में से कौन क्या बन सकता है; न मालूम आप में से कौन गाँधी बन सकता है; न मालूम आप में से कौन विनोबा बन सकता है; न मालूम आप में से कौन क्या बन सकते हैं? लेकिन अपनी संकीर्णताओं को तो आप छोड़िए न।

उनको तो यहीं छोड़ जाइए, आप शान्तिकुञ्ज में ही उनका दमन कर जाइए। बुराइयों को, संकीर्णता को छोड़ करके जाइए और सहृदयता लेकर के जाइए; प्यार लेकर के जाइए; स्नेह लेकर के जाइए; दुलार लेकर के जाइए; उदारता लेकर के जाइए और सर्वत्र सारे समाज में आप फैल जाइए।

आपसे है अपेक्षा

हमको आपसे बहुत अपेक्षा है। जितनी आपको हमसे अपेक्षा है कि हमसे बड़े हैं, हमारे गुरुजी हैं, माताजी हैं, इनका आशीर्वाद मिलेगा, इनकी प्रेरणा मिलेगी, हम खुशहाल होंगे। जो भी आपको हमसे अपेक्षाएँ हैं, बेटे! हमको भी आपसे अपेक्षाएँ हैं। बेटे! इस हाथ दे, उस हाथ से ले। नहीं साहब! लेंगे-ही-लेंगे। लेंगे-ही-लेंगे, तो अगले जन्म में तू कौन बनेगा?

अगले जन्म में रहने दे, मैं कुछ नहीं कहती कि क्या बनेगा? पर अगले जन्म में तुम गधे बनो और हम तुम्हें चलाते रहें। नहीं, तुम गधे मत बनो। आप देना भी सीखिए, एक हाथ से लीजिए, तो दूसरे हाथ से दीजिए। तो क्या दें—रुपया-पैसा दें? नहीं, रुपये-पैसे की कोई आवश्यकता नहीं है। भगवान ने बहुत दिया है और देता रहेगा। तुम्हारे सामने क्यों हाथ फैलाएँगे? हम उस भगवान के सामने नहीं फैलाएँगे, जिसने सारे कार्य पूरे किए हैं।

आपको मालूम होना चाहिए कि गुरुजी ने कितने-कितने बड़े कदम उठाए हैं और वह कैसे पूरे होते चले आए हैं? हजारकुण्डीय यज्ञ से लेकर के जो सन् 1958 में हुआ था, जिसमें एक लड़का बैठा था। कल बता रहा था कि माताजी मैं सन् 58 का हूँ।

मैंने कहा—बेटा! तब तो तू छोटा-सा होगा? हाँ, माताजी तब मैं छोटा-सा था। देखा था न कितनी भीड़ थी? मथुरा से लेकर वृन्दावन तक सारी भीड़-ही-भीड़ दिखाई पड़ती थी। कितने टेण्ट लगे हुए थे और कितनी व्यवस्था थी। तो उन्होंने जो काम हाथ में लिया है, संकल्प लिया है, उसको पूरा किया है। चाहे जितने विरोधियों ने विरोध किया हो। विरोधियों की कोई जरा भी चिन्ता नहीं है।

आलोचनाओं को तिलांजलि दें

नर और नारी को जब उन्होंने बराबरी पर खड़ा किया और कहा कि हम इन्हें यज्ञोपवीत देंगे, हम यज्ञ पर बैठाएँगे। बेटे! वे सनातनी थे, तो उस हिसाब से वे करते थे और आर्यसमाजी थे, तो उन्होंने उस हिसाब से किया। हमेशा विरोध किया। उन्होंने कहा वाह! मूर्ति-पूजा करते हैं, तो कौन-सा बुरा काम करते हैं? बता पहले? और तुम जो कर रहे हो, किसी को तुम नहीं मानते? दयानन्द को नहीं मानते? दयानन्द की फोटो है कि नहीं है? हम भी मानते हैं।

बेटे! हमारे बुजुर्ग मानते हैं, सन्त मानते हैं, नतमस्तक होते हैं। फिर कौन-सी ऐसी बात है? काट, काट हर समय काट के अलावा कुछ नहीं आता, पर उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं की। आनन्द स्वामी आते थे।

आनन्द स्वामी, गुरुजी के पाँव छुआ करते थे और गुरुजी कहते थे कि नहीं, स्वामी जी आप बड़े हैं, हम आपको प्रणाम करेंगे। उन्होंने कहा कि नहीं, मेरे हाथ मत रोको। मैं आचार्य श्रीराम शर्मा को नहीं, मैं प्रणाम कर रहा हूँ उस शक्ति को, जो आपके अन्दर दिव्यता है, उस दिव्यता को प्रणाम कर रहा हूँ। जो कार्य हम सब नहीं कर पाए और आप उस कार्य को कर रहे हैं।

बेटे! ऐसे तो कोई विरले होते हैं और आलोचना करने वाले हजारों मिल जाएँगे। आलोचनाओं की तरफ हम देखेंगे क्या? आलोचनाओं की तरफ जिस किसी ने भी मुड़कर देखा, उसने कोई अच्छा काम नहीं किया। कर ही नहीं सकता, क्योंकि पग-पग पर जटिलताएँ खड़ी हैं। फिर आप कर पाएँगे? नहीं, कर पाएँगे। उन सबको तिलांजलि देते हुए चले जाइए।

बेटे! हाथी एक तरफ चलता है न। हाथी चलता है, तो सारी भीड़ तितर-बितर हो जाती है। आप कौन हैं? आप हैं—हाथी। और आप कौन हैं? मछली हैं। कौन सी मछली? जो समुद्र में चलती है और छरछराती हुई अपना रास्ता बना लेती है। आप अपना रास्ता स्वयं बनाइए। स्वयं नहीं बनाएँगे, तो बेटे! आज आपने एक गाना सुना था कि नहीं? मुझे बहुत अच्छा लगता है और चाहे जब उस गाने की दो कड़ी मुझे याद आ जाती हैं, तो मेरे आँसू आ जाते हैं।

कौन-सा? सहारे तो सहारे हैं, किसी दिन टूट जाएँगे, किनारे तो किनारे हैं, किसी दिन छूट जाएँगे। ये साथ देने वाले हमारा साथ नहीं दे सकते। कब तक साथ देंगे? हमारी भुजाएँ, हमारा आत्मबल, हमारे पाँव यदि ठीक हैं, तो हम चल सकते हैं। हमारी आँखें ठीक हैं, तो हम दूर तक का दृश्य देख सकते हैं। यदि हम अन्धे हो जाएँ तब? तब बेटे! हाथ पकड़कर दूसरा ले जाएगा।

आप देख पाएँगे? बिलकुल देख नहीं पाएँगे। कान, कान यदि सुनना बन्द कर दें, तो चाहे आपकी रेडियो की आवाज हो, चाहे आपकी टीवी की आवाज हो, चाहे अच्छा संगीत हो, चाहे अच्छा प्रवचन हो, क्या सुन सकेंगे? नहीं, सुन सकेंगे। हमारा शरीर साथ देता है, तो ही हमारे सब सहयोगी बन सकते हैं। हमारे अन्दर यदि आत्मबल है और हम आगे की पंक्ति में खड़े हो सकते हैं, तो आप सही मानना कि आपके साथ-साथ भीड़ चलने लगेगी।

दूसरों को श्रेय दीजिए

जरा-जरा से बच्चों को हम भेजते हैं, शक्ति तो हमारी ही होती है; लेकिन यह चोंगे का काम करते हैं। उस दिन एक व्यक्ति आया, तो कुछ ऐसा ही कहने लगा।

मैंने कहा—देखिए, यहाँ जो भी कुछ आपको दिखाई पड़ता है, ये सब उन्हीं का है। तो हम सब कौन हैं? चोंगे हैं। अपने-अपने ढंग से प्रतिपादित कर देते हैं। बस, बाकी का तो सब इन्हीं का है। इसी शब्द में आप समझ लीजिए, इण्टरव्यू यहाँ मत लीजिए।

मैंने कहा—हम यहाँ इण्टरव्यू कभी नहीं देते हैं। टीवी वालों ने कहा कि साहब! लड़के बैठे हैं, वे आएँगे और माताजी का इण्टरव्यू लेंगे और गुरुजी का इण्टरव्यू लेंगे और फिर टीवी पर दिखाएँगे। नहीं, हमको बिलकुल नापसन्द है। हम टीवी पर आना ही नहीं चाहते। काहे को लाना चाहते हो? हम पेपरों में छपाना ही नहीं चाहते, हमें कोई तारीफ चाहिए ही नहीं। तारीफ हमें चाहिए, तो आप कोशिश कीजिए। जब हमको तारीफ चाहिए ही नहीं, हम तो पीछे की पंक्ति में खड़े होने वालों में से हैं। अब तक हमको तारीफ की ही चाहत रही होती, तो जाने कहाँ से कहाँ होते और जाने कितना हमने छपाया होता और कितने प्रशंसक आ गए होते।

हाँ, हमारी बहुत पहुँच है और हम कर सकते थे; लेकिन नहीं, हमने कभी नहीं किया। यदि आपको सम्मान पाना है, यदि आपको दूसरों की भावना पानी है, तो आप पीछे की पंक्ति में रहिए। श्रेय दूसरों को दीजिए।

दूसरों को आप श्रेय नहीं दे सके, आप खुद ही वाहवाही के हकदार बने रहे, तो फिर आप कुछ नहीं कर सकेंगे। न कुछ कर सकेंगे और न उनकी श्रद्धा को पा सकेंगे। पा भी नहीं सकेंगे, क्योंकि आपने दिया नहीं है। दूसरों को दीजिए न, सम्मान दीजिए, ताकि आपका भी सम्मान हो; दूसरों को प्यार दीजिए, ताकि आपको भी प्यार मिले।

विषम परिस्थितियों में दायित्व

मैंने आपको थोड़े-से समय में यह निवेदन किया कि अब सारे संसार के ऊपर जो विषम परिस्थितियाँ हैं—राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय आपको मालूम है कि किस तेजी से भयानकता हमारे देश में आती हुई चली जा रही है। आपको नहीं मालूम है? लड़ाई-झगड़े से लेकर और अन्य अन्य जो समस्याएँ हैं, मार-काट से लेकर के और प्रलय तक।

कैसी प्रलय, आपको नहीं मालूम है? कहीं गाड़ियाँ टकरा रही हैं, कहीं भूचाल आ रहा है, कहीं क्या आ रहा है, कहीं क्या आ रहा है? ये विषम परिस्थितियाँ हैं और विषम परिस्थितियों में प्रत्येक बुद्धिजीवी का कर्तव्य है कि उन परिस्थितियों के साथ तालमेल बैठाना और विपरीत परिस्थितियों को हटाना। विपरीत परिस्थितियों को हटाना आपका कार्य है। वह मैंने एक-आध का उदाहरण दिया था, बाकी का तो हमारे कार्यकर्ता बताएँगे।

बेटे! ये जो रचनात्मक कार्य हैं, वे तो सब यही बताते रहते हैं, मैं आपको क्या बताऊँ। यह कहूँ कि दीपयज्ञ करो, अरे तो बाबा ये हैं तो सही, ये किस मतलब की दवा हैं, ये बता रहे हैं और पुरश्चरण कराओ, दो घण्टे का कार्यक्रम शाखाओं में चलाओ, ये तो यही बता रहे हैं कि हर रविवार के दिन आपको चलाना चाहिए, तो चलाइए।

मैं इसमें क्या कहूँगी? जो और कह रहे हैं, वही बात मैं कहूँ, तो यह क्या बात हुई? मेरा तो जो विशुद्ध पक्ष है, वह बेटे! भावनात्मक है; वह है—आस्था और वह है—निष्ठा; वह है—श्रद्धा। आपकी श्रद्धा बनी रही तो आप सब कुछ करने में समर्थ होंगे, आपकी श्रद्धा नहीं रही तो आप कुछ भी नहीं कर सकेंगे।

यह मन की विदाई नहीं है

आज आपकी विदाई है, बेटे! विदाई में और तो हम क्या कहें? आप बहुत प्यारे बच्चे हैं, आपको हम शरीरों से विदाई दे रहे हैं, मन से नहीं। बेटे! मन से बालक कहाँ जाएगा? मन से तो बालक अपनी माँ की गोद में खेलेगा, अपनी माँ के आँगन में खेलेगा और अपनी माँ के हृदय में रहेगा। वह कहाँ जाएगा? माँ को, पिता को छोड़कर कोई बच्चा नहीं जाना चाहता; लेकिन कर्तव्य के लिए और रोजी-रोटी के लिए और जिस उद्देश्य से हम चाहते हैं, वह तो आपको वहीं पूरा करना पड़ेगा। उसके लिए हम शरीर-से आपको विदाई दे रहे हैं। मन से नहीं, मन से तो हम प्रत्येक बच्चे के हृदय में विराजमान हैं।

बेटे! भूलना मत। बेटे! मैंने एक शब्द यह कहा था कि पाँच मिनट की आपकी उपासना है। वह उपासना है—शान्तिकुञ्ज आपका आना। जिस कदर आप आए हैं, वह आपकी दैनिक उपासना होनी चाहिए। यह कि हम शान्तिकुञ्ज गए और शान्तिकुञ्ज की हमने परिक्रमा की और ऊपर गए और हमने गायत्री माता को प्रणाम किया, अखण्ड दीपक को प्रणाम किया। जिस अखण्ड दीपक से गुरुजी ने प्रकाश पाया है और 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरण किए हैं।

बेटे! वह हमारा सिद्ध दीपक अभी भी src='प्रज्वलित है और हमेशा-हमेशा बना रहेगा। जब तक यह शान्तिकुञ्ज है और शान्तिकुञ्ज के निवासी हैं, तब तक रहेगा। तो उससे यह माँगिए कि हमको तो प्रकाश ही चाहिए, हमको और वरदान नहीं चाहिए। हमको हौसला चाहिए, हमको ताकत चाहिए, जिससे कि जो गुरुजी ने किया है। उसमें हम भी कुछ हिस्सेदार बनें और हम भी देश के काम आएँ, हम भी राष्ट्र के काम आएँ और समाज के काम आएँ। अपने कुटुम्ब और परिवार को पालने में हम समर्थ बनें, इनका मनोबल बढ़ाएँ, इनको आगे बढ़ाएँ।

नारी नहीं देवी

बेटे! नारियों को भी आप आगे बढ़ाइए। आपकी अपनी पत्नी है, उसको आगे बढ़ाइए। अब वह समय चला गया, जब हम नारी को हेय दृष्टि से समझा करते थे। समझने को तो अभी भी समझ रहे हैं। नहीं, नहीं समझना चाहिए। यह देवी है।

जब इसके पूर्व का वह स्वरूप देखेंगे, जब यह अपने माँ-बाप को छोड़कर आई थी, अपने भाई को छोड़कर के आई थी, यह त्याग की मूर्ति है, तो इसकी अनेक अच्छाइयाँ आपको मालूम पड़ेंगी।

जब बुराइयाँ ढूँढने निकलेंगे, तब तो अनेक बुराइयाँ-ही-बुराइयाँ निकलती चली आएँगी। इसमें यह कमी है, इसमें यह कमी है, यह कटु बोलती है, यह करती है—हजार कमियाँ-ही-कमियाँ निकलती चली आएँगी और जब आप अच्छाइयाँ देखेंगे, तो यह अच्छाइयों की मूर्ति है। इसको आगे बढ़ाएँ; ताकि आपका कुटुम्ब और परिवार संस्कारी बन सके। कुटुम्ब और परिवार को संस्कारी कौन बनाएगा? माँ बनाती है और जब माँ—नारी की दशा ऐसी ही बनी रही और वो भावनात्मक दृष्टि से ऊँची नहीं उठी, तो फिर कौन बनाएगा?

शिक्षा की दृष्टि से ऊँची उठ जाए, तो उठ जाए। केवल शिक्षा किस काम में आती है? नौकरी के काम आती है, सर्टिफिकेट जो आते हैं, नौकरी के काम आते हैं। संस्कार और भावनाएँ, आस्था और श्रद्धा? ये तो आप पैदा नहीं कर पा रहे हैं। नौकरी-नौकरी कहने से। अरे, नौकरी थोड़ी मिल जाएगी, उसमें गुजारा हो जाएगा। कोई भूखा नहीं रहता है और जहाँ फजूलखर्ची करते फिरेंगे, तो रावण, सुरसा जैसा मुँह फाड़े वह कभी पूरा नहीं होता है। नारी को आगे बढ़ाइए, ताकि आपका कुटुम्ब और परिवार स्वर्ग जैसा बन सके।

बेटे! हम तो स्वर्ग में निवास करते हैं। गुरुजी ने मुझे समतुल्य खड़ा कर दिया है। शिक्षा में तो मैं नहीं कहती हूँ, बाकी का उन्होंने अपने बराबर खड़ा कर दिया है, बराबर से भी ज्यादा हो गया। प्रत्येक व्यक्ति जो आता है, मुझसे मिलता हुआ चला जाता है। बताइए गुरुजी के पास मिलता है? कोई नहीं मिलता। क्यों? उन्होंने मुझे अपने समतुल्य बना दिया है।

यदि उन्होंने नहीं बनाया होता, तो आज जिस स्थिति में हम हैं, वह नहीं होते। हरेक कोई मिलने आता है। अन्यथा नहीं साहब! माताजी तो लाज के मारे भीतर बैठी हैं। फिर मिलने आता कोई? नहीं। फिर मैं इतने बड़े कुटुम्ब को सँभाल पाती? नहीं, सँभाल पाती। एक धक्का लगता तो सब तिलमिला जाते। नहीं बेटे! उन्होंने मुझे बना दिया है।

इसी तरीके से आप भी अपने घर में ये परम्पराएँ डालिए, उनको आगे बढ़ने दीजिए; ताकि वे आपका दायाँ-बायाँ हाथ बन सकें। आप समाज का और मिशन का जो काम करना चाहते हैं और कर रहे हैं, ये नारियाँ भी करें, इनका भी योगदान हो। मैंने आपको थोड़े-से शब्दों में यह कहा कि इनको भी आगे आना चाहिए। बेटे! आज आपकी विदाई है। सम्पूर्ण हृदय से हम दोनों का आपके साथ आशीर्वाद है और हम भावनात्मक रूप से प्रत्येक परिजन के माथे पर तिलक करते हैं और यह कहते हैं।

बेटे! जैसे अभी एक लड़के ने गाया था—तिलक तुम्हारे भाल पर। हमारी भावनाओं का यह तिलक आज प्रत्येक बच्चे और बच्ची के माथे पर है। इस तिलक को आप याद करना कि यह जो तिलक लगाया गया है। किसी शुभ कार्य के लिए और किसी ऊँचे उद्देश्य के लिए, हमारे भाल पर तिलक लगाया गया है, उसको आप याद रखना। बस, इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात को खतम करती हूँ।

आज की बात समाप्त
॥ॐ शान्तिः॥