श्रावणी पर्व 85 पर कार्यकर्ताओं की रीति-नीति

श्रावणी पर्व पर कार्यकर्ताओं की रीति-नीति
(26-8-85 को दिया गया वीडियो सन्देश)

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

देवियो, भाइयो। ढाई वर्ष होने को आया, हमारा एवं आपका मिलन सम्भव न हो सका। एकाध आदमी की बात अलग है, परन्तु अधिकांश व्यक्तियों से हम न मिल पाए। इतने दिनों तक हम एवं आप अलग-अलग रहे, अतः हम अपने मन की बातें आपको बतलाना चाहते हैं। यह कोई व्याख्यान नहीं है, अतः श्रावणी के इस शुभ अवसर पर आपसे कुछ बातें करना चाहते हैं।

आपको वह दिन याद है जिस दिन आप अपना काम-धंधे छोड़कर, घर को छोड़कर यहाँ के लिए चले थे। हमें तो यह बात बिलकुल याद है, आपको याद हो या न हो, पर हमें याद है कि आपने कितना त्याग भरा कदम उठाया था। कितनी आमदनी का घाटा उठाया, यह बात तो मैं नहीं कहता हूँ। अपने जमे हुए अपने घोंसले को छोड़कर आने का प्रयास किया। अपने घरवालों से, अपने पड़ोसी से आपका सम्पर्क था। वह भी अपने आप में एक महत्त्व रखता है। धन का सवाल नहीं है कि आपके पास कितना था और आपने कितना त्याग किया। आपके पास सौ मन मिठाई थी, उसमें से नब्बे मन आपने दान कर दिया। यह उतना ही महत्त्व रखता है, जितना कि चार रोटी में से तीन रोटी दान कर दे। आपने कितनी शिक्षा प्राप्त की, यह भी नहीं कह सकता, परन्तु हम आपके त्याग के प्रति आभारी हैं। हम आपके रहने तक की भी व्यवस्था नहीं कर पाए। एक कोठरी में आपके पूरे परिवार को ठहरा दिया। हम समझते हैं कि इस समय आपको मुर्गी की तरह से, कबूतर की तरह से रहना पड़ रहा है। यह आपको मालूम था, यहाँ की व्यवस्था आप देखकर गए थे। जब आप यहाँ आए थे, तो यह भी देखकर गए थे कि धन की भी यहाँ कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। यहाँ ब्राह्मणोचित जीवन जीने की बात थी।

ब्राह्मणोचित जीवन

मित्रो। पैसा जब बढ़ता है, तो इन्सान की आदत खराब हो जाती है। वह अपनी सुविधा बढ़ा लेता है। परन्तु आप जब यह अनुभव करें कि कि जो पैसा आपको दिया जा रहा है, वह हमारे बच्चों ने अपना पेट काटकर, अपने बच्चों के दूध का खरच कम करके हमारे पास भेजा था, उस समय अवश्य आप अपने खरच को कम करने का प्रयत्न करेंगे। कितनी श्रद्धा, भावना से लोगों ने दिया है, उसे हमें किस ढंग से खरच करना चाहिए, यह बात समझ में आनी चाहिए।

मित्रो। आपको यह मालूम था कि हम यहाँ बाहर के व्यक्ति की तरह नहीं, वरन् एक साधारण ब्राह्मण का जीवन जी सकते हैं। यह जानते हुए उस समय आपने हिम्मत के साथ कदम बढ़ाया, हमारे लिए यह बहुत प्रसन्नता की बात है। गाँधी जी को जब आवश्यकता पड़ी, तो अनेक सत्याग्रही खोली खाने, मरने, कटने के लिए तैयार होकर आ गए। हमें वह जमाना याद है, जब बुद्ध के लिए हजारों नर-नारी अपना सब कुछ छोड़कर उनके कामों को पूरा करने के लिए आगे आ गए थे।

मित्रो। उसी परम्परा का निर्वाह आपने किया, यह देखकर हमें प्रसन्नता है, काफी खुशी है। आपके लिए हमारा मन कृतज्ञता से भरा पड़ा है। आपके मन में एक हूक उठी और आपने सारे व्यवधानों को, सारे रास्तों को काटकर यहाँ आने का प्रयास किया, आपकी यह भावना हमें याद है। शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास को अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया था और उनके नौकर बन गए थे। आप लोगों ने भी भावना की दृष्टि से उनकी तरह ही साहस भरा कदम उठाया। आपकी भावना, श्रद्धा डगमगाने लगेगी, तो यह आपके लिए भी बुरा होगा और हमारे लिए भी बुरा हो जाएगा। अतः ऐसा मत होने देना।

मित्रो। अगर किसी स्त्री का पति मर जाए तथा वह पति के साथ सती होने को तैयार हो जाए। सारा गाँव उसे देखने को आए तथा उसकी जय-जयकार करे और फल बरसाने लगे। उसके बाद जब चिता में आग लग जाए और वह औरत ऐन मौके पर भाग जाए, तो बहुत बुरा होता है। आदमी श्रद्धा-भावना लेकर आए और फिर कहे कि हमारा जीवन बर्बाद हो गया॥ मित्रो। आप यह मत होने देना। आपको हमेशा अपनी इज्जत बचाकर रखनी है। आपको यह देखना होगा कि जब आप घर छोड़कर आए थे, तब आपकी भावना क्या थी? जब आप घर से चले थे और जो स्तर आपका था, वह स्तर कम होने पर या समाप्त हो जाने पर आपकी हालत उसी स्त्री की तरह हो जाएगी, जैसा कि अभी हमने बताया है कि उसे लोग धिक्कारने लगे थे।

स्तर कम न होने पाए

साथियो। आपका स्तर कम न होने पाए, इस कार्य हेतु हम आपको एक शीशा देना चाहते हैं, जिसमें आप अपनी शकल देखें कि आपकी नाक, दाँत, मुँह ठीक है या नहीं। इसे आप स्वयं समझ सकते हैं, इसके बारे में हम क्या कहें। यह हुई शीशे की कसौटी नंबर एक। दूसरे—सोने को कसौटी से परखकर हम देखना चाहते हैं कि आप वही हैं, जो आए थे या बदल गए हैं। आप उसी बिरादरी में हैं या दूसरी बिरादरी में तो नहीं चले गए। इस संसार में अच्छे काम भी होते हैं और बुरे-से काम भी होते हैं। आप शूरवीर भी बन सकते हैं तथा गलत काम करके पुलिस के हवाले भी हो सकते हैं। आदमी अगर टिकाऊ हो तो क्या कहना। आप अपना वेष बदलें नहीं, टिकाऊ बनें। वेष बदलने में शोभा नहीं है। इसकी इज्जत नहीं है। सन्त ज्ञानेश्वर के पिता ने अपना वेष बदल दिया था। कैसे बदला, यह मैं नहीं कहता हूँ, परन्तु बाद में वे परेशान हो गए। सन्त ज्ञानेश्वर को उनका प्रायश्चित करना पड़ा।

मित्रो। सिद्धान्तों का रास्ता चलना यह भी बड़ी बात है। कहाँ जा रहे हैं? ऊँचे आदर्श का जीवन जीने जा रहे हैं। अगर पीछे हट गए, तो वह दो कौड़ी का बन जाता है। गृहस्थ जीवन में बच्चा पैदा हो जाए, तो कोई बात नहीं, परन्तु कोई बाबा जी हो जाए और फिर बच्चा पैदा कर ले, तो बेकार का हो जाएगा। उस लड़के या लड़की के लिए समाज के मुश्किलें पैदा हो जाएँगी तथा सन्त समाज के लिए भी उसे अपनाना मुश्किल हो जाएगा। इसी तरह जब आप आए थे, तो आपको वहाँ के लोगों ने विदाई दी थी और जब आप यहाँ आए थे, तो हमने भी प्रसन्नता की थी, क्योंकि आपने बड़े ऊँचे काम के लिए कदम उठाया था।

जीवन कितने दिन का होता है? विवेकानन्द की मृत्यु उनतालीस वर्ष की उम्र में हो गई थी। शंकराचार्य की भी 32 वर्ष की आयु में मृत्यु हुई थी। रामकृष्ण परमहंस भी बहुत दिन नहीं जिए थे। बाकी जितने महापुरुष थे, उनको भी जवानी नहीं आई और वे इस दुनिया से चले गए थे। भगवान् करे आप हजार वर्ष जिएँ, परन्तु कल के लिए भी तैयार रहें। आप देखते नहीं कि रास्ता चलते किसी का हार्ट फेल हो जाता है। इन्सान की खाल पानी से भरा हुआ कच्चा घड़ा है। वह कब फूट जाएगा, यह किसको पता है? इन्सान का यह शरीर एक गुब्बारा है। इसमें से हवा कब निकल जाएगी, इसको कौन जानता है? यह कोई आश्चर्य नहीं है। इसलिए आप अपने त्याग को, अपनी भावना को, केवल भावना को ही नहीं, वरन् उस काम को हमेशा याद रखें, जिसके लिए आपने साहस भरा कदम उठाया था। जिन्दगी बड़ी शानदार है, इस तथ्य को आपको समझना चाहिए।

मित्रो। आपको यह समझना चाहिए कि भगवान् ने आपको यह जिन्दगी बहुत ही शानदार दी है तथा आप जो काम कर रहे हैं, वह बड़ा ही शानदार है। इसमें करोड़ों लोगों का भाग्य छिपा है। आप यह नहीं समझते हैं, किन्तु हम स्पष्ट रूप से देख रहे हैं। एक इतिहास बनने वाला है। आगामी दिनों गाँधी जी के आन्दोलन के बाद कोई कार्यक्रम अगर इस दुनिया में है और अगर कोई उसकी चर्चा होगी, तो वह शान्तिकुञ्ज, युगनिर्माण योजना का कार्यक्रम होगा। इतना बड़ा तथा महत्त्वपूर्ण कार्य कभी बना नहीं तथा कोई ऐसा कार्यक्रम बना भी नहीं सकता है। यह सफल होगा और बिलकुल सफल होगा, हमें पूरा विश्वास है, आपको विश्वास हो या न हो। हम जब भगवान् के पास बैठते हैं, हमें इस बात का पूरा-पूरा विश्वास दिलाया जाता है।

मित्रो। आप में से किसी के मन में यह बात नहीं आनी चाहिए कि यह योजना सफल नहीं होगी। सफल न होने पर हम मारे-मारे फिरेंगे, यह बात भी आपको अपने मन में कभी सोचनी नहीं चाहिए। इस मिशन में आप ऐसे सफल होंगे, जो इतिहास के पन्नों में कभी नहीं आए। परन्तु वह स्थिति आने में कभी-कभी रुकावट भी आ जाती है। आपने सूर्य और चंद्रमा में ग्रहण पड़ते देखा होगा। आदमी कभी-कभी गुस्से में आकर माँ-बाप को गाली-गलौज भी कर देता है और घटिया बन जाता है। हम आपको सभी तरह के घटियापन से सावधान करना चाहते हैं, ताकि आपके बारे में कोई न तो उँगली उठाए और न कहीं आपका रास्ता घूम जाए। रेलगाड़ियाँ पटरियों पर घूम जाती हैं और अपनी दिशा बदल देती हैं और हमें एवं आपको पता भी नहीं चलता।

कसौटी पर होगी परीक्षा

साथियो। हम आपको कसौटी पर कसना चाहते हैं। हम यह देखना चाहते हैं कि आप जब यहाँ आए थे और उस समय आपकी जो भावना थी, उसमें कहीं कच्चापन तो नहीं आ रहा है? आप कहीं उसी स्थिति में लौट जाने का मन तो नहीं बना रहे हैं? कहीं आपके अन्दर यह विचार तो नहीं उठ रहे हैं कि हम चले जाएँगे तथा मजे से रहेंगे और अधिक खरच करेंगे। अधिक सुख-सुविधा में रहेंगे। आपके पास जो दान-दक्षिण का पैसा आ रहा है, उसमें से अनावश्यक रूप से खरच करने का कोई अधिकार आपको नहीं है। गाँधी जी को किसी ने मुट्ठी भर पैसा दे दिया था, तो उसमें से एक चवन्नी नीचे गिर गई। गाँधी जी वहीं पर बैठ गए थे। लोगों ने उनसे कहा कि आप हट जाइए, यहाँ भीड़ आ रही है। आप दब जाएँगे। गाँधी जी ने कहा कि हमें दबना मंजूर है, परन्तु जिस श्रद्धा के साथ उस आदमी ने दान दिया है, उसका दुरुपयोग करना गुंजार नहीं हैं।

उसी प्रकार जिस आदमी ने यहाँ संस्था को दान दिया है, वह श्रेष्ठ भावनाओं के साथ दिया है। अगर आपको दान के पैसे को ज्यादा खरच करने की बात मन में आ गई हो, तो यह आपका दुर्भाग्य और हमारा दुर्भाग्य है। अगर आप एक बार भी इस पर छत पर चढ़े, तो हम मानेंगे कि आप औंधे मुँह जमीन पर गिर गए। इससे अच्छा होता कि आप छत पर ऊपर ही नहीं चढ़ते। आप धन के सम्बन्ध में अपनी महत्त्वाकाँक्षा को रोकिए। आप विलासी न बनें और न परिवार बढ़ाएँ। अगर परिवार बढ़ेगा तो खरच बढ़ेगा, कपड़ा, पढ़ाई आदि का खरच बढ़ेगा। अतः आप में से जो स्थाई कार्यकर्ता हैं, उनसे मेरी प्रार्थना है कि आप फैमिली प्लानिंग करा लें, क्योंकि हम जानते हैं कि आप ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकते हैं। आपका लोभ, मोह बढ़ेगा, तो आप ब्राह्मण नहीं रह सकते हैं, तब आप बनिया बन जाएँगे। आपको बनिया बनने के लिए हमने नहीं बुलाया है। अगर आपकी खर्चीली आदत पड़ गई है, तो उसे कसें और कम खरच में काम चलाएँ। आपकी कमजोरी आप ही दूर कर सकते है। आप इनका पालन करें।

स्वयंसेवक बनकर रहें

मित्रो। आपकी एक कमजोरी और है, जो मनुष्य को सामूहिक जीवन में प्रवेश करने पर होती है और वह है—लोकेषणा, पुत्रैषणा और वित्तैषणा। इनमें भी सबसे बढ़कर एक हूक उठती है, वह है नेता बनने की महत्त्वाकाँक्षा। यह मनुष्य को नीचे गिराने की प्रवृत्ति है। सन्त के लिए यह तीनों चीजें नहीं होनी चाहिए। नेता वह होते हैं, जो अपना फोटो छपाना, नाम, यश प्राप्त करना चाहते हैं। यह नेता नहीं अभिनेता हैं। अगर बड़प्पन प्राप्त करना है, तो सबसे छोटा बनकर रहना चाहिए। सिर नीचा करके रहना चाहिए। स्वयंसेवक बनकर रहना चाहिए। गाँधी जी किसी संस्था के पदाधिकारी भी नहीं थे, परन्तु लोगों ने उन्हें ऊँचा उठा कर रख दिया। वे ही राष्ट्रपिता बापू बने। उनका ही करोड़ों का स्मारक बना।

विनोबा को आप जानते हैं। वह ट्रस्टी नहीं थे, सभापति नहीं थे। ईसा, विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस को ही देख लें। समाज में लोग नम्रता की, शालीनता की, व्यावहारिकता की कद्र करते हैं। आज लीडर कौन होता है। जो तस्कर होता है, शातिर दिमाग होता है। मित्रो। दूसरों के द्वारा दिया हुआ सम्मान तो आपकी इज्जत बढ़ाता है, परन्तु जब आप स्वयं अपना बड़प्पन दिखाकर सम्मान प्राप्त करना चाहते हैं, तो प्रगति नहीं हो सकती है। आज जिन लोगों ने अनेक संस्थाओं को नष्ट किया है, वे सब नेता बनना चाहते थे। नेता बनने में अगर किसी को कष्ट हुआ या अवरोध आया, तो उन्होंने अन्य साथियों का गला घोंटना शुरू कर दिया और उसे बरबाद करके चैन लिया। परन्तु वे नहीं जानते कि भगवान् का डंडा बहुत प्रबल है। उससे वे नहीं बच सकते हैं।

मित्रो। नेतागिरी एक प्रकार का नशा है। यह नशा शराब, भाँग, हेरोइन से भी बड़ा है। अगर किसी के मन में वह आ गया हो कि हमें मशक्कत नहीं करनी चाहिए, हमें स्वयंसेवक नहीं रहना चाहिए। हमें अपनी मनमर्जी चलानी चाहिए। हमें किसी की बात न मानकर यह दिखलाना चाहिए कि देखो हम कितने समर्थ हैं, जो लोगों को इस तरह कर डालते हैं। अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपको धिक्कार है। अगर आप अपनी मरजी चलाना चाहते हैं तथा मिशन को बर्बाद करना चाहते हैं, तो हम आपको शाप देते हैं कि आप कभी सफल नहीं होंगे। नेतागिरी थोड़ी देर के लिए आपके हाथ में आ भी जाए, परन्तु बाद में आपकी मिट्टी पलीद हो जाएगी, आपको लोग थू-थू करेंगे। अगर ऐसा न हो तो आप हमें जो मन हो कह देना।

मित्रो। आपको यह देखना होगा कि स्वयं के आपके जीवन में कहीं अपव्यय, नेतागिरी तथा हरामखोरी तो नहीं आ गई। हरामखोरी से कोई महान् नहीं बनता है। काम के द्वार ही व्यक्ति महान् बनता है। हरामखोरी माने जो हाथ से काम नहीं करता है, उसके दिमाग में गलत बातें आती रहती हैं। ऐसा व्यक्ति जगह-जगह बैठता रहता है और यह बतलाता रहता है कि हम गिरे हैं और तुम्हें भी गिरना चाहिए। ऐसा व्यक्ति मिशन की बातें इधर-उधर करता है। बेटे हमारे पास कोई नौकरी नहीं है, जो तीन महीने का वेतन देकर आपको घर भेज दें। इस कार्य में हमें भी शर्म आती है, आपको आती है या नहीं, पता नहीं। यह भी हमें करना पड़ सकता है कि आपके बिस्तर को हम फेंक दें, परन्तु यह काम करने में हमें बहुत शर्म आएगी। अगर आप किसी काम को करते हैं, तो बेशक करें, परन्तु आपने आने के लिए जो तीन प्रतिज्ञाएँ की थीं, उन्हें निभाने का प्रयास करें।

याद करें वे प्रतिज्ञाएँ

कौन-सी तीन प्रतिज्ञाएँ की थीं? पहली प्रतिज्ञा थी कि हम वित्तैषणा से बचेंगे। कम-से में गुजारा करेंगे। आप रिश्तेदारों के लिए, घूमने के लिए खरच नहीं कर सकते हैं। अगर करते हैं, तो आप वह काम करते हैं जिसके लिए आपकी आत्मा आपको कभी-न धिक्कारेगी अवश्य। दूसरा अगर आप सन्तान बढ़ा रहे हैं, तो वह गलत होगा। परन्तु अगर यह मान्यता हो कि हमारा बेटा भी स्वयंसेवक होगा, तो ठीक है। परन्तु यह ख्वाब कि हमारा बेटा आदमी बनेगा, विलायत जाएगा, तो गलत होगा।

महात्मा गाँधी के पास एक आदमी आया और उसने अपनी शिक्षा के बारे में बतलाया तथा अपनी योग्यता के अनुसार कार्य देने का अनुरोध किया। गाँधी जी ने कहा कि हम योग्यता के अनुसार तो काम नहीं दे सकते हैं। आपको जो भी हम काम देंगे, उसे करना पड़ेगा। उन्होंने उसे गेहूँ साफ करने का काम सौंपा और उसने किया। यह घटना मैं आपको इसलिए सुनाता हूँ कि यह आपके ऊपर भी लागू होती है। आपको भी हम शिक्षा, योग्यता के अनुसार काम नहीं दे सकते हैं। हम जो भी काम सौंपे, उसे आपको करना है। इस तरह का जो आदमी होता है, वह अपने ऊपर अंकुश बर्दाश्त नहीं कर सकता है। वह स्वच्छंद रहना पसन्द करता है। आपको अनुशासन में रहना पड़ेगा, ताकि आप ज्यादा महत्त्वपूर्ण काम कर सकें। आप ज्यादा व्यस्त रह सकें तथा आपके क्रियाकलापों का प्रभाव लोगों पर पड़ सके।

आपने देखा नहीं जनता पार्टी का क्या हुआ? सभी प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। आपने देखा नहीं, इन लोगों ने देश को तबाह कर दिया। यह महत्त्वाकाँक्षा वाले व्यक्तियों का काम है। हरिद्वार में मालवीय जी ने एक ब्रह्मचर्य आश्रम बनाया था, जो किसी जमाने में गुरुकुल आश्रम के बराबर का था। हिन्दू विश्वविद्यालय के समान उसे भी बनाने का उनका सपना था। इसमें काफी इमारतें बनी थीं। आर्थिक व्यवस्था राजाओं के द्वारा बना दी गई थी। मालवीय जी के मरने के बाद वहाँ के कार्यकर्ताओं ने इस कदर लूटमार मचा दी कि उसका क्या कहना? अपना स्वार्थ सीधा करने के लिए उन्होंने उस संस्था का न जाने क्या-क्या कर डाला। अगर वह आश्रम जिन्दा होता, तो हिन्दू विश्वविद्यालय के स्तर का होता, परन्तु उसका सर्वनाश हो गया।

मित्रो। हमें सबसे बड़ा दुःख उस समय होता है, जब वे व्यक्ति, जिनको हमने अपने हाथ, पैर, होंठ समझा था, उनके ऊपर गन्दगी की परतें जमती जा रही हैं। वे आज नहीं तो कल इस संस्था की जड़ों पर कुल्हाड़ी चलाएँगे तथा इसे काट डालेंगे और इसका सर्वनाश कर देंगे। परन्तु आप भी स्थिति में प्रशंसा के भागीदार नहीं हो सकते हैं। हमने वह सब चालीस वर्षों के अन्दर देखा है कि वे अपने आप में तो बर्बाद हो ही गए, उस संस्था का भी सर्वनाश कर दिया। हम ऐसा नहीं होने देंगे। मित्रो। आपका श्रम से जी चुराना एवं आपकी अनुशासनहीनता हमें बिलकुल पसन्द नहीं है। आपमें से किसी के भी अन्दर यदि नेतागिरी का बीज पल रहा तो इसे कुचल दें। इससे हमें दुःख है। ये आदतें हमें बिलकुल पसन्द नहीं है। आप हमारा जी दुखाने का कष्ट न करें। इससे आप भी सुखी नहीं रह सकते हैं। आप इस प्रकार त्रास देंगे, तो आप सुखी नहीं रह सकते।

हमारा लक्ष्य उज्ज्वल भविष्य

किसान दो महीने पहले अपने खेतों में लगी हुई फसल को देखकर नित्य नयी-नयी योजनाएँ बनाता है तथा मन में प्रसन्नता रहती है। कोयल जब वसन्त के महीने में आम के बौर को देखकर प्रसन्न होती है, तो कूकती रहती है। हमारे अन्दर भी उज्ज्वल भविष्य को लेकर प्रसन्नता है। औरत के पेट में जब बच्चा होता है, तो उसकी माँ पहले से कपड़ा सिलकर तैयार रखती है। हमारा भी लक्ष्य है कि इस दुनिया को सँवारने का हम जितना प्रयत्न कर रहे हैं, उतना अधिक-से करें। यह कार्य होते हुए देखकर हमें प्रसन्नता होती है। अपने कार्यकर्ताओं को देखकर हमें काफी प्रसन्नता होती है। आप में से कुछ पके हुए आम हैं, तो कुछ कच्चे हैं। दोनों में कुछ फर्क है क्या? नहीं, कोई फर्क नहीं है। गायत्री तपोभूमि, शान्तिकुञ्ज, ब्रह्मवर्चस तथा शक्तिपीठों पर लगे कार्यकर्ता एवं समयदानी भी हमारे प्यारे बच्चे हैं, जिन्होंने साथ-साथ चलने का संकल्प लिया है।

मित्रो। आज श्रावणी के दिन जो मेरा सन्देश सुन रहे हैं, वे सब समयदानी हैं। कैसे समयदानी है? आप एक महीने के बाद जन्म लेने वाले हैं तथा उसके बाद गोद में खेलेंगे। बाद में तैयार हो जाएँगे तथा हमारा सहयोग करेंगे। यहाँ जो भी हैं, वह विचार करके आगे-पीछे आए हैं। हमारी एक वंश परम्परा है। यह ऋषियों की परम्परा है।

आप उसके सदस्य हैं। आगे-पीछे यह बढ़ने वाला है। जो बूढ़े हो जाएँगे। वे मरेंगे तथा नौजवान आते जाएँगे तथा परम्परा चालू रहेगी। हमने निश्चय किया था कि हम इतना साहित्य लिखेंगे, वह हमने पूरा किया। यह हमारा कोई लक्ष्य था? नहीं, यह नहीं था। हमारा इससे बड़ा लक्ष्य था। हमने नया जमाना लाने का, कुरीतियों को समाप्त करने का तथा इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने का संकल्प लिया है। इस काम के लिए काफी लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है। हमें प्रसन्नता है कि हमारे साथ ढेरों-के व्यक्ति चल रहे हैं। अनुशासित सिपाही की तरह बन्दूक चलाना चाहते हैं।

हमारा दूसरा लक्ष्य नया युग लाने, नया वातावरण बनाने, नई परम्परा तथा नया मनुष्य बनाने और न जाने कितनी हमारी योजनाएँ है। देश, समाज, परिवार, जनमानस को बनाने के लिए न जाने हमें कितने काम करने हैं। इस काम को हम अकेले पूरा नहीं कर सकते हैं। यह काम हमारी जीवात्मा करेगी। इसका मतलब हमारे सहयोगी इस कार्य को पूरा कर सकते हैं। मित्रो। अकेले न हम शान्तिकुञ्ज बना सकते थे, न प्रज्ञा-संगठन बना सकते थे और न इतना बड़ा प्रचार तंत्र खड़ा कर सकते थे, परन्तु हमारे बहुत सारे सहयोगियों के द्वारा यह काम पूरा हो गया। यह हमारे हाथ-पैर हैं। हमारा साधन, संप्रदाय, संगठन का मतलब हम हम हैं। हम अकेले नहीं करते हैं। संगठन न होता तो हम अकेले क्या कर सकते थे। हमारे साथ माता जी है, जो हमारा सारा काम सँभालती है। हमारे सहयोगी जो जारी-बीमारी में, दुःख-कष्ट में हमें सलाह देते हैं। लेखन-संपादन भी करते हैं। अकेला आदमी कुछ नहीं कर सकता है। शाखा-संगठन के बिना कुछ नहीं हो सकता है। आप हमारी बिरादरी के हैं, तो आप हमारे विचार का ख्याल रखें, हमारी इज्जत का ख्याल रखें, क्योंकि अब आप हमारे कुटुँब, परिवार में सम्मिलित हो गए है। हमारी दस सूत्री योजना, बीस सूत्री योजना और न जाने कितनी योजनाएँ है। जो आदमी जिस योग्यता-क्षमता का है, वृक्षारोपण से लेकर अनेक काम कर सकता है।

तीन चीजें कम कर लें

मित्रो। हमको यह कहना है कि आप तीन चीजें कम कर लें तो आप सेवा कर सकते हैं। तब आप हमारे पक्के, ईमानदार तथा महान् कुटुम्बी सदस्य हैं। ये तीन चीजें हैं—लोभ, मोह और अहंकार।

पहला—आप अपने लोभ को कम करें। कम-से में ही जीवन चलाने का प्रयास करें। अगले दिनों कोई भी व्यक्ति सम्पत्तिवान नहीं रह सकता है। आने वाले युग में जो अधिक जमा करेंगे, अधिक ठाट-बाट में रहना चाहेंगे, आने वाले समय में लोग उन्हें जिन्दा नहीं रहने देंगे। आपकी योग्यता है, तो ज्यादा देंगे। आपको कलम, चश्मा आदि की आवश्यकता है, तो हम देंगे। लेकिन आप आवश्यकता से अधिक नहीं रख सकें। औसत भारतीय नागरिक का जीवन आपको जीना होगा। आप ज्यादा खाना नहीं खा सकते हैं। आप इक्कीस रोटी खाकर तो हमें दिखाइए। आप बहुत से कपड़े पहनकर तो दिखाइए। इस संसार में हर आदमी का कोटा है। उसी सीमा में रहना चाहिए। जिस आदमी ने लोभ को जितना कम कर लिया वह आध्यात्मिकता की दृष्टि से, लोकसेवी की दृष्टि से उतना ही महान् बनता हुआ चला जाएगा।

दूसरा—कुटुम्ब है तो उसे सीमित बनाने का प्रयास करना। आप सन्तान की संख्या जितनी बढ़ाएँगे, उतनी ही आप समाज की सेवा नहीं कर पाएँगे। आप हमारे हाथ-पैर, कुटुँबी, परिवार का अंग होकर तब काम नहीं कर सकेंगे, जब आपका परिवार बढ़ा-चढ़ा होगा। आज के जमाने में बच्चा पैदा करना एक जुल्म है।

तीसरी बात है—अहं की। ‘अहं’ यानि—अहंकार। यह एक इतना बड़ा चाँडाल है, जल्लाद, इतना बड़ा कसाई है कि उसके बाद सार्वजनिक सेवा कार्य में और कोई जालिम हो ही नहीं सकता। लोकसेवा के क्षेत्र में जो अहंकारी है, वह मरेगा। वह बड़ा बनने के चक्कर में सबको मारेगा तथा मिशन को मारेगा और स्वयं भी कुछ दिन में मरेगा। अतः आप अपने बारे में यह तैयारी करें कि छोटे-से कार्यकर्ता रहकर काम कर सकें। आप ज्यादा-से मशक्कत करने का प्रयास करें। आप हमारी हड्डी को खोलकर देख लें, हमने अपना तेल निकाल दिया है। दधीचि की तरह से दान तो नहीं दिया, परन्तु हमने मेहनत की है। मेहनत, मशक्कत, श्रम एवं मनोयोग ही समस्त सफलताओं की कुँजी है।

अगली महत्त्वपूर्ण बात है, सबको अपने से बड़ा मानना, स्वयं सबसे छोटा बनकर रहना। ‘एटम’ सबसे छोटा है, परन्तु न जाने कैसा तूफान पैदा कर देता है। अपने व्यक्तित्व को छोटा बनाकर ऊँचा उठने का प्रयास करना। गाँधी जी ने हमें छोटा काम जो भंगी का था, उसे सौंपा। उन्होंने कहा कि अगर तू इसे कर लेगा तो हमारे आश्रम तथा गाँधी जी को समझ लेगा। छोटे काम में भी बड़प्पन सीखना चाहिए। जो आदमी छोटा काम करेगा, वह उतना ही बड़ा आदमी है तथा जो वक्ता होकर, मैनेजर होकर, गायक होकर रहेगा, ऐसा सोचता है वह घटिया आदमी होगा। गाँधीजी, विनोबा, विवेकानन्द आदि छोटे होकर जिए और बड़े बन गए।

मित्रो। भारत जब आजाद हो गया तो गाँधी जी को राष्ट्रपति बनने की बात कही गई थी, तो उन्होंने कहा कि खबरदार, जो ऐसा कहा। जनता पार्टी की सरकार आई तो उस समय जयप्रकाश नारायण से भी राष्ट्रपति बनने की बात कही गई थी, तो उन्होंने साफ इन्कार कर दिया था। अगर नेता बनने की, कुरसी की, मंच की, यह दोष कभी भी तुममें आ गया, तो बेकार हो जाओगे। अपनी आत्मा के विकास के बारे में सोचिए, नहीं तो दो कौड़ी के हो जाएँगे। इस प्रकार के हो जाएँगे। तो हमें दुःख होगा। हम चाहते हैं कि अपना प्यार-तप आपके ऊपर बिखेर दें, लेकिन पुण्य, ज्ञान यह नहीं हो सकेगा। इसे स्वयं अर्जित करना पड़ता है। अगर बच्चे के अंग में गन्दगी लगी है, तो उसे हम कैसे गोद ले सकते हैं? जो बड़े काम करना चाहते हैं और छोटे काम से जी चुराते हैं, उनकी सफलता सन्दिग्ध ही बनी रहती है। नहीं साहब। बैठे रहते हैं, सेठ बैठे रहते हैं, काम तो मजदूर करते हैं। हमें काम से क्या लेना-देना? तब बेटे हमारी तुम्हारी कुट्टी हो जाएगी, निभेगी नहीं।

सफलता के सूत्र

मित्रो। आपको लोभ-लालच होगा तो आप प्रगति नहीं कर सकते। जिसने जितना कमाया है और उतना ही खरच कर डाला है, तो खाली हाथ रहा है। आप मोह को भी घटा देना, बच्चे कम पैदा करना तथा यह मत सोचना कि आपका बच्चा विदेश जाएगा, वकील बन जाएगा। आप अपनी नम्रता तथा मशक्कत के बारे में पूरा-पूरा प्रयास करना। जब कभी हम चौके की तरफ झाँकते हैं, तो हमारा एक स्वयंसेवक बड़ी ही मुस्तैदी से काम करता दिखाई देता है। वह असली नेता मालूम पड़ता है। जब कभी देखा, धोती कसा हुआ मालूम पड़ता है। हमें उसे देखकर बहुत प्रसन्नता होती है। हम आपके बारे में ऐसी ही मान्यता रखते हैं। आपके साथ भी हमारी तीन कसौटी हैं, (1) क्या आप हमारा प्यार चाहते हैं? (2) क्या आप भगवान् पर विश्वास करते हैं? (3) क्या आप समय की माँग को पूरा करने हेतु अपने अन्दर उत्साह से भरे हैं?

अगर यह आपको प्राप्त हो जाएगा तो आपके दुश्मन भाग खड़े होंगे तथा आपका अहंकार समाप्त हो जाएगा और आप वजनदार, इज्जतदार आदमी हो जाएँगे तथा आपको हर जगह सम्मान मिलेगा। अगर ये तीन चीजें हो जाएँगी, तो आप हमारे पास खिंचते चले आएँगे। लोहे को चुम्बक खींच लेता है। आप लोहा बन जाना, हम खींच लेंगे। हमारे पास जो भी जीवन का सार है, उसे आपके जिम्मे सुपुर्द कर देंगे। इसके अलावा और क्या कहें आपको?

हम आप में से जो पुराने कार्यकर्ता हैं और जो नए आ रहे हैं, उन्हें बहुत प्यार करते हैं और हमेशा करते रहेंगे। हमें पूर्ण आशा है कि आप सब के सहयोग से ही विश्व का जो नया भविष्य बनने वाला है वह, आप लोगों के सहयोग से ही होगा इसके। लिए आपको अपना व्यक्तित्व लेकर हमारे पास खड़ा होना होगा आपका। फूहड़ निकम्मा, अनगढ़, व्यक्तित्व सारे लेकर हम क्या करेंगे? आपका वजन और लादना होगा।

आप रोज विचार करना कि हमारा लोभ, मोह, अहंकार घटा कि नहीं, हमारी श्रमशीलता, कार्यक्षमता बढ़ी या नहीं। अगर इस प्रकार नित्य चिन्तन कर सकेंगे, तो आपकी जीवात्मा ही आपको इतना ऊँचा उठा देगी कि आप देखते रह जाएँगे। उस समय आप हमारे प्राणप्रिय बन जाएँगे तथा मिशन के लिए बड़े ही उपयोगी हो जाएँगे। इसी बात को हम हमेशा आपको समझाते रहते हैं। इसके लिए आपको सदा प्रयास करते रहना चाहिए तथा हमारे प्राणप्रिय बनकर रहना चाहिए। हम चाहते हैं कि हम और आप इस काम को एक साथ पूरा करें तथा नये युग को ला सकें।

॥ॐ शान्तिः॥