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- तपश्चर्या के लाभ - गुरुजी मैं क्या करूँ? मेरी तो औरत बीमार है। मेरा बच्चा
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-4 - झाँकी - भाग-4 - था। वे गुरुजी के पास गए और कहा, ‘‘गुरुजी! मैं क्या सेवा करूँ?’’ तो गुरुजी ने कहा, ‘‘तुम, लंगर की व्यवस्था
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-2 - झाँकी - भाग-2 - बिड़ला जी ने गुरुजी से पूछा, ‘‘आचार्य जी, क्या करूँ? मैं अपना पैसा विदेश बैंक में स्थानान्तरित कर दूँ क्या? चीन
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-3 - झाँकी - भाग-3 - की जगह दादा गुरुजी बैठे हैं। कुछ सूझा नहीं, क्या करूँ? फिर मैंने गुरुदेव की साधना स्थली की ओर मुँह किया
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-4 - झाँकी - भाग-4 - लिया था। वे गुरुजी के पास गए और कहा, ‘‘गुरुजी! मैं क्या सेवा करूँ?’’ तो गुरुजी ने कहा, ‘‘तुम, लंगर की
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-4 - झाँकी - भाग-4 - पास गए और कहा, ‘‘गुरुजी! मैं क्या सेवा करूँ?’’ तो गुरुजी ने कहा, ‘‘तुम, लंगर की व्यवस्था सँभाल लो।’’ तब वे
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-3 - झाँकी - भाग-3 - पूज्यवर की जगह दादा गुरुजी बैठे हैं। कुछ सूझा नहीं, क्या करूँ? फिर मैंने गुरुदेव की साधना स्थली की ओर मुँह
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-2 - झाँकी - भाग-2 - घनश्यामदास बिड़ला जी ने गुरुजी से पूछा, ‘‘आचार्य जी, क्या करूँ? मैं अपना पैसा विदेश बैंक में स्थानान्तरित कर दूँ क्या?
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-2 - झाँकी - भाग-2 - श्री घनश्यामदास बिड़ला जी ने गुरुजी से पूछा, ‘‘आचार्य जी, क्या करूँ? मैं अपना पैसा विदेश बैंक में स्थानान्तरित कर दूँ
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-4 - झाँकी - भाग-4 - 1958 के सहस्र कुण्डीय यज्ञ में भाग लिया था। वे गुरुजी के पास गए और कहा, ‘‘गुरुजी! मैं क्या सेवा करूँ?’’
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-2 - झाँकी - भाग-2 - चीन जीतता जा रहा था। श्री घनश्यामदास बिड़ला जी ने गुरुजी से पूछा, ‘‘आचार्य जी, क्या करूँ? मैं अपना पैसा विदेश
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-3 - झाँकी - भाग-3 - रह गया, मैंने देखा, तखत पर पूज्यवर की जगह दादा गुरुजी बैठे हैं। कुछ सूझा नहीं, क्या करूँ? फिर मैंने गुरुदेव
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-3 - झाँकी - भाग-3 - अब मैं क्या करूँ? मैं गायत्री मंत्र जपने लगा और गुरुजी को याद करने लगा। तभी मन में प्रेरणा हुई कि
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-3 - झाँकी - भाग-3 - कि अचानक ये क्या हो गया? अब मैं क्या करूँ? मैं गायत्री मंत्र जपने लगा और गुरुजी को याद करने लगा।
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-3 - झाँकी - भाग-3 - लगा कि अचानक ये क्या हो गया? अब मैं क्या करूँ? मैं गायत्री मंत्र जपने लगा और गुरुजी को याद करने
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-3 - झाँकी - भाग-3 - सोचने लगा कि अचानक ये क्या हो गया? अब मैं क्या करूँ? मैं गायत्री मंत्र जपने लगा और गुरुजी को याद
- ऋषि युग्म की झलक-झाँकी - भाग-3 - झाँकी - भाग-3 - बैठकर सोचने लगा कि अचानक ये क्या हो गया? अब मैं क्या करूँ? मैं गायत्री मंत्र जपने लगा और गुरुजी को
- वर्तमान पर्यावरण परिदृष्य—एक विनम्र प्रयास-समाधान - समाधान - वर्तमान प्रगति की वस्तुस्थिति खुली आँखों से— हमें पूर्वजों से क्या मिला? हमने अपने बच्चों को क्या दिया?— 6E's – Empathy
- वर्तमान पर्यावरण परिदृष्य—एक विनम्र प्रयास-समाधान - समाधान - से— हमें पूर्वजों से क्या मिला? हमने अपने बच्चों को क्या दिया?— 6E's – Empathy > Energy > Ecology > Environment
- वर्तमान पर्यावरण परिदृष्य—एक विनम्र प्रयास-समाधान - समाधान - हमें पूर्वजों क्या मिला? हमने अपने बच्चों को क्या दिया?—
- वर्तमान पर्यावरण परिदृष्य—एक विनम्र प्रयास-समाधान - समाधान - असमंजस में डूबना पड़ता है कि दृष्टिगोचर होने वाली प्रगति क्या वास्तविक प्रगति है? इसके पीछे अधिकांश को पीड़ित शोषित, अभावग्रस्त