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- साधना — पात्रता का विकास - भगवान क्या है? भगवान क्या है बताइए आप। एक भगवान तो
- व्यक्तित्व का परिष्कार - भगवान को आप पकड़ लें तब? भगवान क्या है? भगवान एक
- जीवन-साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी - साधना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी - भगवान क्या है? बताइए आप। एक भगवान तो वह है, जो
- विज्ञानमयकोश की साधना—करुणा का जागरण - भगवान से आपको क्या मतलब है? नहीं साहब! हम तो भगवान जी से माँगेंगे, सिद्धपुरुष से माँगेंगे। हाँ, सिद्धपुरुष और महात्मा
- आ रहा है युगावतार, प्रज्ञावतार - भगवान् से न जाने क्या-क्या लेना चाहता है? बेटे, मैं क्या कह सकता हूँ? आजकल के जमाने में अध्यात्म केवल मखौल
- परिष्कृत अध्यात्म हमारे जीवन में उतरे - भगवान को बनाया है। क्या आदमी भगवान को बना सकता है? हाँ, आदमी भगवान को बना सकता है। कैसे बना सकता
- परमार्थ में ही छिपा है सच्चा स्वार्थ - भगवान को गढ़ा है। तो क्या भगवान की शक्ल नहीं है? नहीं, भगवान की शक्ल नहीं हो सकती।
- भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन - भगवान शंकर का अन्तरंग रूप क्या है? उसकी फिलॉसफी क्या है?
- पूजन कृत्यों का उद्देश्य - भगवान ध्यान नहीं रखता? तो क्या भगवान नाराज हो जाता है? क्या जो आदमी जप करेगा उसी से प्रसन्न होगा, जो
- भगवान शिव और उनका तत्त्वदर्शन - भगवान् ने आपको दी हैं। शरीर क्या माँगता है? इन्द्रियाँ क्या माँगती हैं? यह हम सबको मालूम है। एक और आँख
- यज्ञ एक शिक्षण भी, उच्चस्तरीय विज्ञान भी - भगवान का अवतार कह सकते हैं। क्या छिपा हुआ पड़ा है? अपने यज्ञों में, युग निर्माण योजना के यज्ञों में उसके
- परमार्थ में ही छिपा है सच्चा स्वार्थ - भगवान की भक्ति का सही स्वरूप क्या है? भगवान की भक्ति
- अध्यात्म का मर्म समझने हेतु बालिग बनिए - भगवान जी सोचते रहे कि भाई! यह क्या हो रहा है?
- दो ही सम्पत्ति, दो ही विभूति: योग एवं तप - भगवान के साथ मिला देते हैं तो क्या करना होता है? हमको भगवान की मरजी के मुताबिक चलना होता है। जब
- समग्र जीवन के सुदृढ़ आधार—योग एवं तप - भगवान के सुपुर्द कर देते हैं, तो क्या हो जाता है? स्वभावतः भगवान अपने आप को सुपुर्द कर देता है। हम
- देवताओं के वरदान—सत्प्रवृत्तियाँ - भगवान की खुशामद और चापलूसी करने से क्या हो सकता है? बेटे तू बता तो सही कि कृष्ण जी अपनी खुशामद
- देवपूजन का मर्म - भगवान् की खुशामद और चापलूसी करने से क्या हो सकता है? बेटे तू बता तो सही कि कृष्ण जी अपनी खुशामद
- आत्मा की भूख : उपासना - भगवान को खरीद लिया। भगवान को क्या खरीदा जा सकता है? हाँ, भगवान को खरीदा जा सकता है, यदि भक्त में
- उपासना कैसे करें? - भगवान को खरीद लिया, भगवान को। क्या खरीदा जा सकता है? हाँ भगवान को खरीदा जा सकता है, यदि भक्त में
- भक्ति सम्बन्धी भ्रान्तियाँ एवं उसका सच्चा विज्ञान - भगवान के सामने जल चढ़ा देते हैं। इसका क्या मतलब है? बेटे! सूर्यनारायण तो कितने लम्बे-चौड़े हैं। उनके सामने यह जो
- परमार्थ में ही छिपा है सच्चा स्वार्थ - भगवान की मदद करें। भगवान की मदद क्या हो सकती है? भगवान कोई व्यक्ति नहीं है, जिसको आप खाना खिलाएँगे, पानी
- अध्यात्म की वास्तविक सम्पदाएँ - भगवान् हर किसी को दिखाये। ऐसा अध्यात्म क्या हो सकता है? पहले तो मैं बताऊँगा नहीं, दूसरे अगर आपकी समझ में
- कर्मकाण्ड नहीं, भावना प्रधान - भगवान की किताब पढ़ी तो यह पाया कि भई! यह क्या चक्कर है? ये सब क्या गड़बड़ हो गया है? अर्जुन
- सूक्ष्मीकरण की वेला में जनवरी १९८६ में प्रसारित पूज्यवर का वीडियो सन्देश - भगवान के मन को समझना। भगवान का मन क्या है? भगवान का मन यह कि वे माँगते हैं। जो कोई भी
- अध्यात्म के सही स्वरूप का पुनर्जागरण - भगवान् को देने की कोशिश की। कम से कम चीज क्या है? जबान की नोंक, चमड़े की नोंक, जिससे कि हम
- अध्यात्म साधना का मर्म - भगवान की किताब पढ़ो तो यह पाया कि भई! यह क्या चक्कर है? ये सब क्या गड़बड़ हो गया है? अर्जुन
- यज्ञ का तत्त्वदर्शन - भगवान से शिकायत की—महाराज जी! दुनिया में क्या हो रहा है? आप सुनते नहीं हैं और पहरेदारों ने कह दिया कि
- जप का ज्ञान और विज्ञान - भगवान के नाम को बार-बार याद कराते हैं। ये क्या है? ये हमारे चेतना विज्ञान का, न्यूरोलॉजी का पैरासाइकोलॉजी (परामनोविज्ञान) का
- परिष्कृत अध्यात्म हमारे जीवन में उतरे - भगवान की भी मिट्टी पलीद हो जाए तो हर्ज की क्या बात है? बेटे ! हमको माँस खाने की आदत है।
- जीवन साधना का मर्म है भक्ति, समझें उसका व्यापक रूप - भगवान से शुरू होना चाहिए। भगवान से क्या मतलब है? भगवान कोई व्यक्ति नहीं होता। आप फिर ध्यान रखिये कि भगवान
- अध्यात्म साधना का मर्म - भगवान की शक्तियाँ कहाँ से मिलती हैं? आत्मा क्या होती है? इस पर विचार करना चाहिए। हमारी चेतना ही परमपिता परमात्मा
- प्रतीक पूजा के पीछे छिपे संकेत और शिक्षाएँ - भगवान राम के सामने रखा कि यह गिलहरी है। यह क्या करती है? समुद्र में बालू- मिट्टी डालती है। भगवान ने
- धर्मतंत्र का परिष्कार अत्यन्त अनिवार्य - भगवान ही बैठे। भगवान को इतनी जगह की क्या जरूरत है? भगवान को चाहो तो एक कोने में बिठा दो, तो
- मन को भगवान के साथ जोड़िए - भगवान जी वैसे तो समझते हैं कि आदमी जबान से क्या क्या बकवास कर लेता है? अब चलिए मैं आपके मंत्रों
- आप अपने आपको पहचान - भगवान ही बैठें। भगवान को इतनी जगह की क्या जरूरत है? भगवान को चाहो, तो एक कोने में बिठा दो, तो
- आ रहा है युगावतार, प्रज्ञावतार - भगवान्—जो सारे विश्व में संव्याप्त है। इसका क्या अर्थ होता है? इसका एक ही अर्थ होता है कि कण-कण में भगवान्
- गायत्री ही कामधेनु है - भगवान जी से यह पूछा कि क्यों महाराज जी। आपका क्या हाल है? अरे साहब! हम तो काम करते- करते मरे
- भक्ति सम्बन्धी भ्रान्तियाँ एवं उसका सच्चा विज्ञान - भगवान के नाम पर अज्ञान फैल गया है। फिर असलियत क्या है?असलियत जो है, वह आपको जाननी ही चाहिए। आखिर देवता