दिव्य अनुदान

कल्प साधना सत्र समाप्त होते-होते आप आज विदा होने जा रहे हैं। आप विदा हो के जाइए, और हमारी शुभकामना ले के जाइए, हमारा वरदान ले के जाइए, हमारा आशीर्वाद लेकर जाइए, इसे ठुकराइए मत। देवताओं के वरदान हमेशा सत्प्रवृत्तियों के रूप में, सत्प्रेरणाओं के रूप में मिले हैं। देवताओं ने, ॠषियों ने कभी किसी आदमी को पोटले बाँध कर के रुपयों के बण्डल नहीं दिए हैं, न किसी को बेटी-बेटे दिए हैं, न मुकदमे से जीत कराई है, न (इसकी) नौकरी में उन्नति कराई है। ये काम अपने पुरुषार्थ का है, देवताओं का नहीं है, सन्त और ॠषियों का नहीं है। सन्त और ॠषि जो अनुदान और वरदान देते हैं, उससे आदमी के अन्तराल में उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ उत्पन्न होती हैं - बस। और कुछ नहीं होता। स्वामी राम कृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द के अन्तराल में प्रेरणाएँ भर दी, प्रेरणाएँ भर दी, फिर उन्होंने जीवन का स्वरूप बदल दिया, कहाँ से कहाँ हुए। नहीं साहब विवेकानन्द को मकान बनाने के लिए, अस्पताल बनाने के लिए, और बैलूर मठ बनाने के लिए एक करोड़ रुपये दिया था, बेकार बात कहते रहते हैं। ये कोई सन्तों से माँगने की चीज है, सन्त कहीं दिया करते हैं क्या?

हमारे गुरु ने क्या दिया? हमको बताइए जरा। कोई रुपयों का बण्डल दिया है क्या, हमको पोटले भर कर दिया है क्या, हमको औलादें दी हैं क्या? नहीं] कभी किसी ने नहीं दिया। केवल सन्त का वरदान, सन्त और ॠषि, देवता जो किसी आदमी को दे सकते हैं, और देना चाहिए, वो केवल प्रेरणाएँ‌ होती हैं, दृष्टिकोण होता है, सोचने के तरीके होते हैं। हमारा महान गुरु, जब हमसे जिस दिन मिला, उसने हमारा चिन्तन बदल दिया, हमारी प्रेरणाएँ बदल दीं, हमारी दिशाधाराएँ बदल दीं, हमारे सोचने के तरीके बदल दिए, और बदलने की भी प्रेरणाएँ दीं। असल में बदला तो हमने ही है, मेहनत तो हमने ही की है। अगर हम न मेहनत किए होते तो इनकी प्रेरणाओं की क्या कीमत थी। अगर हम उनका सहयोग न करते तब। राम कृष्ण परमहंस की आज्ञा न मानते तब, एकान्त तो क्या एकान्त बनते, आशीर्वाद देकर घर बैठ जाते।

आपको यहाँ से जाने के बाद में बदलना है। हम आपको प्रेरणाएँ‌ देंगे। हमारा आशीर्वाद केवल प्रेरणा के रूप में हो सकता है। इसी तरीके से हमारे गुरु का आशीर्वाद प्रेरणा के रूप में था। मालदारी के रूप में किसी का आशीर्वाद कभी न मिला है और न मिलने की आप उम्मीदें कीजिए हमसे कि हम आपको मालदार बनाएँगे। हम आपको मालदार बनाएँगे, सेठ बनाएँगे, आप बेकार की बातें क्यों कहते हैं? जो हम नहीं कर सकते उसके लिए आप क्यों दबाव डालते हैं? भगवान मालदार नहीं बनाते, मालदारों को गरीब बना देते हैं। आपने देखे हैं न। हरिश्चन्द्र से ले करके जितने भी आदमी थे, भगवान की भक्ति में आए हैं वो कोई मालदार बन गए क्या, मनोकामना पूरी कराके लगाया है क्या, आप उल्टी-उल्टी बात मत विचार कीजिए। आप उल्टे को उलट दीजिए, और सीधे हो के जाइए, सीधे हो के जाइए।

यहाँ‌ से जब जाएँ, तो क्या होते हुए जाएँ? आपका अन्तराल बदला हुआ हर एक को दिखाई पड़े। जो भी जाए हर एक को बदला दिखाई पड़े। आपकी धर्म पत्नी कहें ये वो आदमी नहीं है, ये हमारे पति की शकल तो वैसी मालूम पड़ती है, कोई भूत आ गया मालूम पड़ता है। पहले ये कड़ुवे वचन बोलता था, पहले हर वकत रौब गालिब करता था, हर वकत दबाव डालता था। अब ये दबाव नहीं डालता, बल्कि ये मान के चलता है कि भगवान की एक बेटी हमारे घर में आ के रखी गई है, और उसकी हिफाजत करना, उसको उन्नतिशील बनाना, (उसके सुख) उसको सम्मान प्रदान करना हमारा काम है।

आप अधिकार को त्याग दीजिए, आप कर्तव्यों को ग्रहण कर लीजिए। आप हर एक के प्रति कर्तव्यों को ग्रहण कीजिए। आपका धर्मपत्नी के प्रति क्या कर्तव्य है? आपका शरीर के प्रति क्या कर्तव्य है? आपका अपने मन:सम्पदा के प्रति क्या कर्तव्य है? आपके अपने बच्चों के प्रति क्या कर्तव्य है? आपको जो धन मिला हुआ है, साधन मिले हुए हैं, उसके प्रति क्या कर्तव्य है? (आपको) अपने समाज के प्रति क्या कर्तव्य है? आत्मा, परमात्मा के प्रति क्या कर्तव्य है? आप केवल कर्तव्यों पे विचार करें, और अधिकारों की उपेक्षा करने लगें, तो मैं ये कहूँगा कि (आपका कायाकल्प) आप सच्चे अर्थों में कायाकल्प के अधिकारी हो गए।

अगर आप हमेशा कर्तव्यों को भुलाते रहेंगे और अधिकारों की माँग करते रहेंगे तो क्या कहा जायेगा। आपसे ये कहा जाएगा, उसी घिनौनी नारकीय मनःस्थिति में पड़े हुए हैं जिसके फलस्वरूप आदमी को अनेक विपन्नताओं का शिकार होना पड़ता है, परिस्थितियाँ जिसकी हमेशा उल्टी बनी रहती हैं। आप उसी में बने रहे, फिर तो बेकार हो गया न। आप बदलिए, कृपा करके बदलिए, कृपा कर के बदलिए। अपनी मन:स्थिति को बदल दीजिए। आप (कर्तव्यों को) कर्तव्यपालन कीजिए, और अपने (अ) अधिकारों से पीछे हट जाइए। आप कभी अब तक भिखारी के रूप में रहे हैं, अभाव ग्रस्त के रूप में, हम अभावग्रस्त हैं, मेरे पास कमियाँ हैं, कमियाँ हैं, कमियाँ हैं, आपने कमियों की लिस्ट बनाई है, और जहाँ-तहाँ पल्ला पसारा है, पल्ला पसारा है।

कमियों को अनुभव करना, और जहाँ-तहाँ, जिस-तिस के सामने पल्ला पसारना — यही तो नीति रही है। अब कृपा कर के नीति बदल दीजिए। तब क्या काम करें? आप ये विचार कीजिए कि आपके पास जो मिला हुआ है, वो कितना ज्यादा है। भगवान ने कितना ज्यादा आपको दिया है, जो किसी प्राणी को नहीं मिला वो सिर्फ आपको मिला हुआ है। आपको इंसानी जिन्दगी (को) आप कीमत समझते हैं क्या? नहीं समझते। समझिए जरा, समझिए। जो सृष्टि के किसी प्राणी को नहीं मिला, वो आपको मिला है। आपके जैसी वाणी, आपके जैसा मस्तिष्क, आपके जैसे जीवन की सुनिश्चितता, आपका जैसा गृहस्थ — क्या सारे विश्व भर के किसी और प्राणी को मिला हुआ है? आप क्यों प्रसन्न नहीं हो सकते? आप अपने आप को क्यों मालदार अनुभव नहीं कर सकते? क्यों आप सम्पन्न अनुभव नहीं कर सकते?

आप गरीबी को छोड़ दीजिए, और अमीरी यहाँ से ले के जाइए। बदल जाइए, आप गरीबी की बात छोड़ दीजिए। उस लिस्ट को फाड़ के फेंक दीजिए जिसमें आपने ऐसी बातों की सूची बना रखी है जो हमारे पास नहीं हैं, नहीं हैं, नहीं हैं, नहीं हैं। आप नहीं वाली लिस्ट को फेंक दीजिए। आप ये सोच के चलिए आपके पास है क्या? आपके पास श्रम है, आपके पास जीवन है, आपके पास मनुष्य की काया है, आपके पास गृहस्थ है, आपके पास परिस्थितियाँ हैं, आपके पास जीविका के माध्यम हैं। आप क्या काम कर सकते हैं, जो है उस पे सन्तोष व्यक्त कीजिए। आप इनसे प्रसन्न रहा कीजिए, आप इन पे गर्व कीजिए, गौरव अनुभव कीजिए, और याचना के स्थान पर देने की बात विचार कीजिए।

याचना — माँगेंगे, न आप ये याचक मत बनिए, याचक मत बनिए। भिखारी से बुरा और दुनिया में क्या हो सकता है। आप बीवी से मुस्कान माँगते हैं। आप अपनी मुस्कान बीवी को क्यों नहीं दे सकते? आप बच्चों से वंश चलाने की आशा करते हैं। आप बच्चों को वंश चलाने योग्य क्यों नहीं बना देते? आप] आप कीजिए। आप याचक मत बनिए। देने के लिए बहुत है आपके पास। ऋषियों के पास बहुत था। पैसा नहीं था। पैसे में आग लगा दीजिए, पैसा तो मरने ही वाला है, पैसा तो मरेगा ही, पैसे को तो मरना ही चाहिए। पहले भी पैसा नहीं था और आगे भी पैसा नहीं रहेगा। आदमी की असली दौलत उसका श्रम है। असली समय है।

हजारी किसान का नाम सुना है आपने। आपने किशनहारी का नाम सुना है आपने। इसने अपनी पिसाई में से दो पैसा रोज बचा करके एक ऐसा पक्का कुँआ बनवा दिया था जिसमें कि पानी अमृत के बराबर है। लोग अभी भी इसको पानी पी करके ये अनुभव करते हैं, हमारा मर्ज अच्छे हो जाएँगे और हमको शान्ति मिलेगी। आप ऐसा नहीं कर सकते, दे नहीं सकते आप, आप मीठे वचन नहीं बोल सकते, आप दूसरों को प्रोत्साहन नहीं दे सकते, आप क्या अच्छे परामर्श देने की स्थिति में नहीं हैं, क्या आप आपको मुस्कान नहीं बाँट सकते, क्या आप मोहब्बत नहीं बाँट सकते, ये चीजें कुछ कम है क्या, आप देने वाले बन जाइए। आप (से) सेवा दीजिए, सहानुभूति दीजिए, स्नेह दीजिए। फिर देखिए, आप जो चीज़ बाँटते हैं, वो ब्याज समेत कितनी ज्यादा उठ कर के ऊँची हो जाती है। आप यहाँ से जाइए, जाइए, अपनी गरीबी को छोड़ जाइए, जिस कमरे से आए हैं उसी में गरीबी छोड़ दीजिए। अभावों की सूची वहीं फाड़ के फेंक जाइए। आपके पास क्या है, क्या है, इस पर खुशी मनाना सीख के जाइए। और आप एक नई लिस्ट ये बना (के) के जाइए कि माँगना क्या देना, माँगना क्या देना।

किसको आप क्या देंगे — मित्रों को क्या देंगे? दोस्तों को क्या देंगे? धन, धन नहीं। फिर सोचिए धन नहीं। आपको अपनी भावनाएँ, और अपनी विचारणाएँ, और उनको ऊँचा उठाने और, और ऊँचा उछाल देने वाली सलाहें। सलाहें क्या कम होती हैं, प्रोत्साहन की कीमत नहीं समझते आप? परामर्शों की कीमत (नहीं) नहीं समझते? सलाह मशवरे की कीमत नहीं समझते? आप बहुत कुछ दे सकते हैं। आप वही दीजिए यहाँ से जाने के बाद में। यहाँ से जाने के बाद में आप अपनी खीज को प्रसन्नता में बदल दीजिए। क्यों? कल कहा था न हमने कि आप अपने कर्तव्य (को अधिक) को ये पर्याप्त मान लें, और ये सोचने लगें — हमने अपना कर्तव्य पूरा कर लिया, और फर्ज़ पूरे कर दिए, तो आपको खुश रहने का हक है, पूरा हक है। आपने कर्तव्य पूरा कर दिया— और क्या कर सकते थे आप? जो कर सकते थे आपने पूरा कर लिया। आपको सफलता मिलेगी, आप पूरी तरीके से सफल अनुभव कीजिए, अगर आप अपने फर्ज़ और ड्यूटी अंजाम देते रहते हैं तब; आप मुस्करा सकते हैं, अगर फर्ज़ों पर केन्द्रित रहेंगे तब।

और परिस्थितियों पर केन्द्रित रहेंगे, ये प्रतिक्रिया हुई। उसने हमारे साथ ये नहीं किया, हमारी ऐसी परिस्थिति नहीं बनी तब खीजते रहेंगे, खीजते रहेंगे। फिर आप भूत की जिन्दगी जिएँगे। भूत जलते रहते हैं और जलाते रहते हैं, मैंने सुना है। भूत डरते रहते हैं और डराते रहते हैं, मैंने सुना है। भूत रोते रहते हैं और रुलाते रहते हैं, मैंने सुना है। मालूम नहीं भूत की क्या स्थिति है पर मैं आपसे कहता हूँ, आप भूत की तरीके से क्यों जिन्दगी जीएँ? देवता की तरीके से क्यों नहीं जीएँ? देवता की तरीके से जीएँ आप।

आपका पुराना ढर्रा बेहूदगियों से भरा हुआ है। आप ऐसा करें यहाँ से जाने के बाद में अपनी नम्रता, अपनी नम्रता को प्रदर्शन करने के स्वभाव डालिए और दूसरों का सम्मान देना सीखिए। अब तक ये होता रहा है कि हम अपना अहंकार प्रदर्शित करते रहते हैं, दूसरों का तिरस्कार, अपना अहंकार और दूसरा तिरस्कार अपना अहंकार और दूसरा तिरस्कार। बस उसी का परिणाम है कि आपको कभी गुस्सा आता है, कभी आप ढीट कहलाते हैं, कभी उद्दण्ड कहलाते हैं, कभी क्या कहलाते हैं। कभी आपके असंख्य विरोधी हो जाते हैं, लेकिन अगर आप अपना रवैया बदल सकते हों, अपनी नम्रता हर चीज़ में अपनी नम्रता, शिष्टाचार जिसे कहते हैं, शालीनता जिसे कहते हैं, सज्जनता कहते हैं, शराफत कहते हैं, आप चाहे जो शब्द रखें लेकिन आप यहाँ से जाने के बाद में आप एक शरीफ आदमी की तरीके से, सज्जन आदमी की तरीके से, ज़िम्मेदार आदमी की तरीके से, विनयशील आदमी की तरीके से, विनम्र आदमी के (होने) तरीके से, और एक श्रेष्ठ नागरिक (हो) होने के नाते अपने आपके बोलचाल से ले करके, व्यवहार तक में सज्जनता को घोल दीजिए, मिठास को घोल दीजिए, सेवा को घोल दीजिए, आत्मीयता को घोल दीजिए।

और क्या करें? और दूसरों को सम्मान देना सीखिए। हर एक की इज़्ज़त कीजिए, छोटे बच्चों की इज़्ज़त कीजिए, धर्मपत्नी की इज़्ज़त कीजिए, माताजी की इज़्ज़त कीजिए, छोटी बहन की इज़्ज़त कीजिए, भाइयों की इज़्ज़त कीजिए, पड़ोसी की इज़्ज़त कीजिए, मित्रों की इज़्ज़त कीजिए, समाज की इज़्ज़त कीजिए। आप दूसरों का सम्मान करना सीखेंगे, तो आपका अहंकार गल जाएगा। अगर आपका अहंकार गल गया, और दूसरों को सम्मान देना शुरू कर दिया, तो आप देखना, उस सम्मान की प्रतिक्रिया क्या होती है — आप जितना सम्मान दूसरों को देंगे, उससे असंख्य गुना सम्मान आपके हिस्से में आएगा। और फिर आप सम्मान की कमी अनुभव नहीं करेंगे। (फिर आपको यहाँ से)

ऐसा नहीं बदल सकते, बदलिए। आप उज्जवल भविष्य की उम्मीदें कीजिए। आप एक अकसर कल्पना करते रहते हैं हमारा भविष्य ऐसा खराब हो जाएगा, अमुक आदमी ये नुकसान पहुँचा देगा, और ऐसी मुसीबत आ जाएगी, हमारा बच्चा कुपात्र निकल जाएगा, आप क्यों ऐसी कल्पना करते हैं। वास्तविकता थोड़ी है कोई, आपने कल्पना कर रखी हैं। भय की कल्पनाएँ, आशंका की कल्पनाएँ, चिन्ता की कल्पनाएँ, हैरानी की कल्पनाएँ, बुढ़ापे की कल्पनाएँ, मौत की कल्पनाएँ। आप क्यों करते रहते हैं? उज्ज्वल कल्पनाएँ आपको करना नहीं आता? आप विधायक विचार नहीं कर सकते, आपको निषेधात्मक विचारोंं को हटाना नहीं आता। आप विधेयात्मक विचार सोच लीजिए और खुशी से रहना सीखिए।

यहाँ से आप जाएँ और कभी आपके मन में ये विचार आए कि हमारी मौत हो जाएगी और हमारा शरीर चला जाएगा, आप ऐसा निषेधात्मक विचार मत कीजिए। आप दूसरे ढंग से विचार कीजिए। हमारा नया जन्म मिलेगा और हम दूसरी माँ की गोदी में खेलेंगे और माँ का दूध पीयेंगे, और उछलते कूदते फिरेंगे, तो फिर हम बढ़े हो जाएँगे, स्कूल जाएँगे और हमारी फिर नई शादी होगी। ये कल्पना क्यों नहीं करते? सुनहरे ख्वाब देखना नहीं आता? सुनहरे सपने सजाना नहीं आता? आप सुनहरे सपना संजोया कीजिए। निराशा के विचार, खीज के विचार, चिन्ता के विचारों से अपने आपको छुड़ा लीजिए।

आप अच्छी से अच्छी उम्मीदें कीजिए, लेकिन साथ-साथ में आप भूल मत जाइए — बुरी से बुरी परिस्थितियों के लिए तैयार रहिए। दोनों बातों के लिए (समान) समान रूप से आपको पैर बढ़ाने हैं। जहाँ उज्जवल भविष्य की सम्भावना है, वहाँ ये भी सम्भावना है आपके परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो जाएँ और आपको मुसीबतों में पड़ना पड़े, और जो आप ने सपने सँजो कर रखे हैं वो मटियामट हो जाएँ, आप उसके लिए भी तैयार रहिए। दोनों तरीके से तैयार रहिए। अगर आप बुरे भविष्य के लिए तैयार नहीं रहेंगे तो आपकी हिम्मत टूट जाएगी। एकाएक कोई मुसीबत का दिन आ गया तो आपके सब धज्जे बिखर जाएँगे, आप बुरी से बुरी मुसीबतों के लिए तैयार रहिए, और अपने आप को इतना समर्थ और स्वावलम्बी (बना) रखिए, किसी भी खतरे के समय पर आप अपने पैरों पे खड़ा रह सकें। इतने आप शूरवीर बनिए, इतने आप (बहा) बहादुर बनिए।

आप उदार तो बनिए पर जागरूक रहिए, दूसरों के साथ-साथ में उदारता बरतने के लिए तो मैं कहता रहा हूँ और मैंने कहा है हर एक की सेवा शराफत कीजिए। लेकिन आप भूलना मत, ये भूलना मत, आपको जागरूक भी रहना है। जागरूक नहीं रहे और आप उदार ही बनते चले गए, सेवाभावी ही बनते चले गए, तो आपकी भलमनसात का लोग बुरी तरीके से नाजायज फायदा उठाएँगे और आप उनके शिकार बन जाएँगे, दुष्टों के शिकार बन जाएँगे। उदारता तो कीजिए, सहायता तो कीजिए, पर (ये) ये विचार को मत भूलिए। कहाँ उदारता करनी हैं, कहाँ नहीं करनी है। जहाँ ज़रूरत हो वहीं उदारता कीजिए, जहाँ जरूरत ना हो आप हाथ सिकोड़ सकते हैं, और निष्ठुर भी बन सकते हैं। हर एक के साथ उदारता, नहीं कोई जरूरत नहीं है।

हर एक को देखिए, हर व्यक्ति को देखिए, हर परिस्थिति को देखिए। हर काम में सहयोग देना कोई ज़रूरी नहीं है, हर आदमी की सेवा करना कतई ज़रूरी नहीं है। केवल जो श्रेष्ठ है उसी की सेवा कीजिए, जो सत्प्रवृत्तियाँ हैं उन्हीं में सहयोग दीजिए। कोई भी चन्दा माँगने आएगा हम दे देंगे, नहीं ऐसा मत कीजिए। कोई भी भिखारी आएगा हम हर एक को रोटी देंगे, ऐसा मत कीजिए। आपकी इस रोटी को पा करके उनकी हरामखोरी और दूसरी बुराइयाँ बढ़ेंगी। इसीलिए आपको जागरूक भी रहना चाहिए। आपको उदार जहाँ बनना है, सेवाभावी बनना है, वहाँ संघर्षशील भी बनना है। आप लड़ाई से इन्कार मत कीजिए, आप लड़ाई से इन्कार कर देंगे तो मच्छर आपको खा जाएँगे, फिर आपको मक्खियाँ निगल जाएँगी, फिर आपको पिस्सू जिन्दा नहीं रहने देंगे, फिर आपको खटमल किस तरीके से चैन लेने देंगे। सिर में, सिर में घुसे हुए जुँए आपको किस तरीके से हैरान नहीं करेंगे। चूहे आपका सारा अनाज खाकर खतम कर देंगे। फिर पिस्सू और कीटाणु जो आपके शरीर में घुस जाते हैं और तपेदिक जैसी बीमारियाँ कर देते हैं। यदि इन से लोहा नहीं लेंगे तो कैसे बात बनेगी? इसलिए आप यहाँ से जब जा ही रहे हैं, आप संघर्षशील भी होकर जाइए, शूरवीर भी हो कर के जाइए।

उदार बनिए, संयमी बनिए, सज्जन बनिए, भगवान का नाम लीजिए, भगवान का नाम लीजिए, अच्छे काम कीजिए। लेकिन इतना काफी नहीं है। आपकी सज्जनता काफी नहीं है। आपमें सज्जनता के साथ में शूरवीरता का रहना भी जरूरी है, आपको संघर्षशील भी होना चाहिए। आपको प्यार करना आना चाहिए, पर लड़ना भी आना चाहिए। जो आदमी लड़ नहीं सकता, वो प्यार भी नहीं कर सकता। जो प्यार कर सकता है, वो लड़ भी सकता है। क्यों? उसमें - प्यार में हित साधन जुड़ा होता है। हित साधन जिसमें जुड़ा हुआ नहीं है, वो कैसे प्यार हुआ, वो प्यार तो हो ही नहीं सकता, जिसमें हित साधन जुड़ा हुआ नहीं है। हित साधन के लिए ये ज़रूरी नहीं है, किसी की हाँ में हाँ ही मिलाया जाए, या दूसरे आदमी जो चाहते हों वही किया जाए। ये हो सकता है कि हित चाहने के लिए किसी आदमी को ठीक उल्टा (ग) करना पड़े।

मसलन बच्चे के हाथ में फोड़ा हो जाए तो माँ के लिए सम्भव है कि उसको डाक्टर के यहाँ ऑपरेशन कराने के लिए ले जाए और बच्चा मना करता रहे, नहीं हमारा ऑपरेशन मत कराइए। तो भी माता उसको बहका करके, फुसला करके अथवा दबाव दे करके फोड़े का आपरेशन करा देती है। तो ये अच्छी बात है। इससे इसका हाथ गलने से बच जाएगा। फोड़े का ऑपरेशन नहीं कराया होता, तो फोड़ा सड़ता, सारे हाथ को ही खराब कर सकता था। इसलिए दूरदर्शिता का तकाजा ये है, दूरदर्शिता का तकाजा ये है कि आप केवल न्याय को समर्थन दीजिए। लोगों की खुशामतें मत कीजिए, लोगों की इच्छाओं पर ध्यान मत दीजिए, लोग क्या सलाह देते हैं, आप बिल्कुल ध्यान मत दीजिए।

आप यहाँ से जाने के बाद में एक ओर अपने आप का रवैया बदल सकते हैं। आप पास की बात मत सोचिए, दूर की बात सोचिए। आमतौर से हर आदमी की समझ में पास की बात आती है। आज का फायदा, आज का फायदा, कल का नुकसान हो। तो ये, ऐसे ही आमतौर से अदूरदर्शिता हर जगह फैल गई। अविवेकशील मत बनिए। आप विवेकशील बनिए और दूरदर्शी बनिए। हर मामले में ये सोचिए इसके परिणाम क्या होंगे? अगर आप परिणामों पे विचार करेंगे, तो बहुत सी बुराइयों से बच जाएँगे। और आप परिणामों पे विचार करेंगे तो वो काम जो आज छोटे मालूम पड़ते हैं, बेकार मालूम पड़ते हैं, आप उन कामों को खुशी से करने के लिए तैयार हो जाएँगे। जो आपके और आपके समाज के हित में नितान्त आवश्यक हैं। ये सिवाय दूरदर्शिता ही सिखा सकती है।

दूरदर्शी आप नहीं बन सके तो बुढ़ापे को आप खराब कर लेंगे। जवानी को आप बे तरीके से निचोड़ते रहेंगे। बुढ़ापे में इतनी शिकायतें पैदा करेंगे कि हैरान हो जाएँगे। बच्चे स्कूल जाते हैं इस समय का खेलना दिखाई पड़ता है, भविष्य दिखाई नहीं पड़ता। फीस के पैसे ले जाते हैं सिनेमा में खर्च कर देते हैं, यार दोस्तों में मटर गश्ती करते हैं और फेल हो जाते हैं, सारी जिन्दगी तबाह हो जाती है। दूरदर्शी हैं बच्चे? नहीं, दूरदर्शी नहीं हैं।

जो आदमी दूरदर्शी नहीं है, वो न्यायोचित - न्यायोचित बात को विचार नहीं कर सकता और अपने सुन्दर भविष्य - उज्जवल भविष्य की संरचना नहीं कर सकता। आज की परिस्थितियाँ में आपको कुछ हैरानी पड़ती है, कुछ दबाव डालना पड़ता है, परिवर्तन करना पड़ता है, अपनी सुविधा में ऩ्यूनाधिकता करनी पड़ती है, तो आप कर लीजिए, उससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं है। आपको जो करना है, केवल यही करना है कि आपकी दूरगामी परिणाम, दूरगामी परिणाम क्या हो, तब बात बनेगी, इससे कम में बनेगी नहीं।

आप यहाँ से जा रहे हैं तो आप पारस को छू करके लोहा सोना हो जाता है, आप सोना बन जाइए। कल्पवृक्ष के नीचे बैठ करके आदमी अपनी कामनाओं को समापन (कर कर) कर लेता है। (आप) ये कल्पवृक्ष है। आप अपनी कामनाओं को पूरा तो नहीं करा पाएँगे, लेकिन अनावश्यक कामनाओं को अगर खतम कर दें, तो आप कल्पवृक्ष का आनन्द ले पाएँगे। आपका शरीर चमड़ी का है, आपको सोना तो नहीं बना सकते लेकिन अगर आप अपनी मन को अगर आप बदल लें, ऊँचे आदर्शों के साथ, अर्थात पारस के साथ में जोड़ लें, तो आप सोना बन सकते हैं। ऊँचे आदर्श, ऊँचे विचारों के साथ में जिन आदमियों ने भी अपने व्यक्तित्व और जीवन को जोड़ा है, पारस हो करके रहे हैं।

आप यहाँ से अमृत पी करके जाइए। अमृत पी करके, अमृत पी करके। अमृत किसे कहते हैं? आत्म ज्ञान को कहते हैं, आदर्शवाद को कहते हैं, उत्कृष्टता को कहते हैं, ईश्वर विश्वास को कहते हैं। अगर आप ये कर पाएँ तो आप अमृत पीने वाला बन गए। आ यहाँ से कामधेनु ले करके जाइए। आपने यहाँ क्या दिया मालूम नहीं, वैसे तो ये भी था पुराने जमाने की मान्यता कि जब चान्द्रायण व्रत करते थे, कल्प साधना के अनुष्ठान करते थे तो जहाँ जिस आश्रम में रहते थे या जिनके द्वारा कराते थे, वहाँ को दान देते थे। गौ दानों का बहुत महत्त्व है। गौदान देते थे आश्रमों को, गौ का पैसा देते थे, गौदान देते थे। तो आप अब क्या गौदान देंगे? लेकिन अब आप ऐसा कीजिए, हमसे गौदान ले जाइए, एक कामधेनु ले जाइए, कामधेनु ले जाइए। कामधेनु क्या है? कामधेनु आध्यात्मिकता है। आध्यात्मिक चिन्तन ले के जाइए, आध्यात्मिक दृष्टिकोण ले के जाइए। अगर आप आध्यात्मिक दृष्टिकोण लेकर के जाएँगे तो फिर आपको बहुत कुछ करना पड़ेगा। फिर आपको उसके लिए निरन्तर इस पौधा में पानी लगाने के लिए उपासना करनी पड़ेगी, साधना करनी पड़ेगी, आराधना करनी पड़ेगी।

उपासना भगवान की करना और यहाँ का जो प्रज्ञायोग का प्रकरण है, उसको आप सीख लेना। प्रज्ञायोग है 15 मिनट की रोज की आराधनाएँ बड़ी उपयोगी और बड़ी महत्त्वपूर्ण है। आपके दैनिक जीवन में प्रज्ञायोग का नियमित स्थान रहना चाहिए। आपको यहाँ से जाने के बाद में समय के निर्धारण करने की नीति बनानी चाहिए। आप समय का टाइम टेबल बनाना और समय का एक मिनट भी बेकार मत गँवाना। यहाँ से जाने के बाद में आप अपने परिवार में श्रमशीलता पैदा करना, सुव्यवस्था पैदा करना, शालीनता पैदा करना, मितव्ययिता पैदा करना और सहकारिता पैदा करना, ये पंचशील हैं, आपको बता दिया थे न।

ये बार-बार हमने लिखा और छापा है, पंचशील। आप अपने घर और परिवार में पंचशील बनाइए और उन्हें पैदा करने के लिए स्वयं में एक नमूना बनें। साँचा बनें नहीं तो दूसरे आदमी ढलेंगे नहीं। आप साँचा नहीं बनेंगे तो कोई क्यों ढलेगा? इन विशेषताओं को अपने जीवन में आप शामिल कर देंगे, तो मजा आ जाएगा। आप यहाँ से जाइए और यहाँ के विचारों का विस्तार करते रहिए। जो आपने सीखा है, उसे दूसरों को सिखाते रहिए। विचारों का विस्तार कीजिए, यहाँ के साहित्य का विस्तार कीजिए और छोटे-छोटे काम हमने बताए थे आपको उनको आप भूलना मत।

यहाँ से आप जा ही रहे हैं तो आपने समयदान में कुछ न कुछ जरूर दिया होगा और आपने अंशदान में कुछ न कुछ जरूर दिया होगा। आज बेहद जरूरत है। आपका समय आपके बच्चों को ही जरूरत नहीं है, हमको भी जरूरत है, भगवान को भी जरूरत है। सारी कटौती करके अपने खानदान वालों को ही मत दे दीजिए। अरे बाबा हमको बहुत जरूरत है, आप समझते नहीं हैं। युग को बहुत जरूरत है, भगवान को बहुत जरूरत है। पीड़ित मानवता को भी बहुत जरूरत है। आप अपने समयदान और अंशदान में कंजूसी मत कीजिए। आप उदार बन के जाइए, कलेजे को चौड़ा करके जाइए। कृपण होकर के मत जाइए, माँगते ही मत रहिए। माँगते ही मत रहिए, याचक और दानी का रिश्ता हमारे आपके बीच में मत बनने दीजिए। आप और हम अन्धे और पंगे के तरीके से दोस्त बनना चाहते हैं। हमारे पास कुछ चीज है हम आपको देंगे, आपके कुछ है हमको दीजिए। हमारे पास कुछ है हम आपको देंगे, आपके कुछ है हमें दे दीजिए। आदान-प्रदान का सिलसिला बनाइए, अन्धे और पंगे की नसीयत ग्रहण कीजिए। नाव पार कर लेंगे। हमारे गुरु और हमारे बीच में यही रिश्ता चला है। हमारे गुरु ने हमको असीम दिया है और हमने अपने गुरु को असीम दिया है। दोंनाे के बीच में ये प्रतिद्वन्द्विता हमेशा चली है। वो कहता है हम आपको ज्यादा देंगे, हम कहते रहे हम आपको ज्यादा देंगे। आप हमको दीजिए, हमको बहुत जरूरत है। आपका समय हमको बहुत चाहिए, हमको धन आपका बहुत चाहिए, आपका सहयोग हमको बहुत चाहिए। आप अपना घर शान्तिकुञ्ज में बना के जाइए। समाप्त ॥

॥ॐ शान्तिः॥