कल्प साधना क्या है?
कल्प साधना के सम्बन्ध में आप यहाँ शान्तिकुञ्ज आए हुए हैं। आप ये विचार कीजिए कि कल्प आखिर है क्या जिसके लिए आप यहाँ आए हैं और हमने आपको बुलाया है।
कल्प का हिन्दी अर्थ होता है—परिवर्तन। परिवर्तन—आपको हमारा बदल देने का मन है। आप अगर दु:खी जीवन जीते रहे हैं, तो सुखी जीवन आप जिएँ। आप बीमार जीवन जीते रहे हैं, तो नीरोग जीवन जिएँ। आप गुत्थियों से उलझा हुआ जीवन जीते रहे हैं, तो आप हँसता-हँसाता हुआ जिन्दगी जिएँ। आप घिनौना और कमजोर जीवन जीते रहे हैं, उपेक्षित और घृणास्पद जीवन जीते रहे हैं तो ऐसा शानदार जीवन जिएँ—जिसको देख कर के आपका भी जी बाग-बाग हो जाए, और जो कोई भी बाहर से उसको देख पाएँ उनका भी खुशी का ठिकाना न रहे। ऐसे आपके जीवन में कायाकल्प करने का हमारा मन था। आपने भी हमारे विचारों को पढ़ा होगा, उसी से प्रभावित होकर आप यहाँ आए हैं। आइए यह विचार करें आखिर ये कैसे सम्भव होगा, उसके लिए क्या करना पड़ेगा, कैसे सम्भव हो जाएगा। इन सारे प्रश्नों पर थोड़ा गम्भीरता से हम और आप विचार कर लें।
आमतौर से कल्प साधना के बारे में एक भ्रम फैला हुआ है, और ये भ्रम ये है कि आदमी बुड्ढे से जवान बन जाता है। कल्प माने बुड्ढे से जवान हो जाना—ये भ्रान्ति है। बुड्ढे का जवान होना सम्भव नहीं है—क्यों? क्योंकि ये प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। प्रकृति के नियम के साथ ढीठ कोई नहीं कर सकता। सूरज पूरब से निकलता है, पश्चिम में डूबता है। ऐसा नहीं हो सकता पश्चिम से सूरज निकला करे, पूरब को डूबा करे। कैसे हो पायेगा? ये प्रकृति का नियम कोई नहीं बदल सकता। भगवान ने प्रकृति के नियमों को ऐसा बना दिया है कि वो अपने स्थान पर यथावत रहेंगे। और जब से बने हैं तब से और जब तक सृष्टि रहेगी तब तक वो रहेंगे। इसलिए बुड्ढे आदमी का जवान होना नामुमकिन है।
कथाएँ तो हैं पुराणों की। मालूम नहीं वो कथाएँ कहाँ तक ठीक हैं। आपने च्यवन ऋषि के बारे में सुना है। वो बुड्ढे से जवान हो गये थे। आपने ययाति की कहानी सुनी होगी, बेटे की जवानी लेकर के बुड्ढा जवान हो गया था। आपने राजा नहुष के बारे में सुना होगा वो भी बुड्ढे से जवान हो गये थे। लोगों ने कोशिशें तो किए हैं। यूरोप में भी बहुत प्रयत्न हुए हैं बुड्ढों को जवान बनाने के, पर सफलता नहीं मिली। स्टालिन रूस का अधिनायक था। उसको बन्दरों की गिल्टियाँ काट-काट कर लगाई गई। और यह कोशिश की गई कि फिर जवान हो जाए। बन नहीं सका। प्रकृति के साथ लड़ाई लड़ना नामुमकिन है। किसी को ये आशा नहीं करनी चाहिए कि हमारा बुड्ढा शरीर जवान बन जाएगा। हाँ, ये आशा हममें से हर आदमी कर सकता है कि कमजोरी या बीमारी जो कि हमने अपने आप में बुला कर के रखी है, उसको हम इंकार कर दें। कमजोरी से इंकार कर दें कि आप चली जाइए, तो वो चली जाएगी। बीमारी से हम ये कह दें, नहीं अब हमको आपकी जरूरत नहीं है। हमने दावत देके बुलाया तो था पर अब हम आपको अपने यहाँ रखने की स्थिति में नहीं हैं, इसलिए कृपा करके चले जाइये। ये दोनों ही ऐसी भली मानस हैं, कमजोरी भी चली जाएगी और बीमारी भी चली जायेगी इनको हम भगा सकते हैं क्योंकि ये प्राकृतिक नहीं हैं। प्राकृतिक नहीं हैं। जीवन में जीवधारी पैदा तो होते हैं और मरते भी हैं। पर न कोई बीमार होता है न कोई कमजोर होता है। जब कमजोरी आती है तो मौत के मुँह में चले जाते हैं। कमजोर जिन्दगी जियेगा? कौन पसन्द करेगा? और ऐसी जिन्दगी कौन पसन्द करेगा? जो बीमारियों से घिरी हुई हो। बीमारियों से घिरा हुआ होना, और कमजोरी से घिरा हुआ होना, ये प्रकृति के विरुद्ध है। इसको आप और हम हटा सकते हैं। शरीर के बारे में यहीं तक मुमकिन है। और आगे शरीर के बारे में कुछ नहीं हो सकता।
शरीर का कायाकल्प से अगर आप का मतलब इस ख्याल से आप आये हों तो कृपा करके ये बात नोट कर लीजिए कि शरीर के बारे में आपकी जो है उमर, उससे आगे को ही बढ़ेगी। पीछे को तो कैसे घटेगी। जवान को हम बच्चा कैसे बना पाएगें? बच्चे को हम माँ के पेट में किस तरीके से धकेल पाएगें? बच्चे को पेटवाले को पीछे पिता के वीर्य कण के रूप में कैसे धकेल पाएगें। ये सम्भव नहीं है। आपकी उमर तो जरूर बढ़ेगी, उमर के हिसाब से जो शरीर पर प्रभाव पड़ना चाहिए वो सब पड़ेगा, लेकिन आपका स्तर बदल जायेगा।
आकृति तो रहेगी ज्यों-की-त्यों, प्रकृति बदल जाएगी। प्रकृति को बदल देना मुमकिन है। अगर आपकी प्रकृति बदल जाएगी तो परिस्थितियाँ बदल जाएगीं। आप और हम सब जानते हैं कि मन:स्थिति का परिणाम परिस्थिति है। मन:स्थिति अगर आदमी बदल ले, तो परिस्थितियों के बदलने में कोई शक नहीं है। बस यही कायाकल्प है। इसी को हम कराना चाह रहे हैं कि आपका भीतर वाला बदल जाए, तो आपका बाहर वाला जरूर बदल जाएगा। मनः स्थिति में हेर-फेर कर लें तो आपकी परिस्थितियाँ जरूर बदल जायेगीं। इसलिए यहाँ आपको जो कल्प साधना से अर्थ लेना चाहिए, वो ये अर्थ लेना चाहिए कि यहाँ जो आपसे कराया जाने वाला है, या जो किया जाना है, आपको जो करना है, या हम जो आपसे कराने के लिए दबाव डालेंगे, वो सिर्फ इस बात का दबाव डालेंगे, कि आपका भीतर वाला हिस्सा, जिसका अर्थ होता है—मन, बुद्धि और चित्त, जिसका अर्थ होता है आपका जीवात्मा, जिसका अर्थ होता है आपका दृष्टिकोण, जिसका अर्थ होता है आपका चिन्तन और चरित्र—ये अगर हम आपका बदल दें, तो आप विश्वास रखिए, आपका जीवन पिछले दिनों जैसा भी कुछ रहा है, भविष्य में वैसा नामुमकिन है, रह ही नहीं सकता। आपने इतिहास के पन्ने तो पढ़े हैं ना। आपको बहुतों के नाम याद हैं। जो पहले सामान्य स्थिति में गये बीते थे, लेकिन उन्होंने अपनी मनःस्तर और दृष्टिकोण बदल लिया। दृष्टिकोण बदलने के बाद में कितना कमाल हो गया। उनकी जिन्दगी कैसी शानदार हो गयी। अगर उन्होंने भीतर वाले हिस्से को अर्थात दृष्टिकोण को बदला न होता तो बाहर वाली परिस्थितियाँ बिल्कुल मामूली आदमी के तरीके से रही होतीं।
मैं आपके सामने कुछ ऐसे आदमियों का नाम लेकर के याद दिलाना चाहता हूँ कि परिवर्तन कैसे होते हैं। शंकराचार्य को आप जानते हैं न। शंकराचार्य एक मामूली घर के लड़के थे। उसकी माता—विधवा माता ये उम्मीद करती थी कि पढ़ने के बाद लड़के की शादी-ब्याह करेंगे। बाल-बच्चे होंगे, नाती-पोते खिलायेंगे। लेकिन शंकर ने अपना दृष्टिकोण बदल दिया। माँ से इंकार कर दिया। माँ के साथ सहमत नहीं हुए। उन्होंने अपने भावी लक्ष्य और भावी जीवन का एक स्वरूप बना लिया। जो स्वरूप बनाया, ये उनका स्वरूप स्वयं का बनाया हुआ था। दृष्टिकोण उन्होंने अपना स्वयं बनाया। कार्यपद्धति उन्होंने स्वयं बनाई। दूसरों ने सहायता की, बाद में सहायता की पर शुरुआत में तो उन्होंने किया। पर शंकराचार्य फिर क्या हो गये? शंकर भगवान का अवतार माने जाते हैं न? अगर शंकर भगवान ने—आदि शंकराचार्य ने अपने दृष्टिकोण में हेर-फेर न किया होता तब? तब फिर वही होते जो उनकी माँ चाहती थी। एक मामूली पण्डित-पुरोहित होते, जनम-पत्रिका बनाते फिरते, पूजा-पाठ करते फिरते, बाल-बच्चे वाले होते। दस-बीस बाल-बच्चे होते, बिल्कुल गये-बीते स्तर के होते। पर दृष्टिकोण उन्होंने बदल दिया तो आदि शंकराचार्य हो गए। आदमी को ये अधिकार मिला हुआ है। भगवान ने आदमी को इस लायक बनाया है कि वो चाहे तो अपने आप को बदल दे।
विवेकानन्द की बाबत आप को मालूम है न। एक मामूली विद्यार्थी थे। गये-बीते स्तर के विद्यार्थी थे। कोई खास प्रतिभावानों में उनकी सुनवाई नहीं होती थी। घर की परिस्थितियाँ भी ऐसी थीं। पिताजी के मरने के बाद में घर-गृहस्थी का वजन भी उनके पास आ गया। लेकिन ये सब होते हुए भी उन्होंने ये निश्चय किया कि अपने सोचने के तरीके, अपने दृष्टिकोण और अपने जीवन का लक्ष्य और दृष्टि को बदल देंगे। यही उन्होंने किया भी। जब उन्होंने ये बात का फैसला कर लिया कि रामकृष्ण परमहंस के साथ उनकी सम्मति आ गई। रामकृष्ण परमहंस ने सहायता की। नहीं, ऐसा मत कहिये। रामकृष्ण परमहंस के लिए सहायता करना मुमकिन रहा होता तो हजारों आदमी उनके पास जाया करते थे। हजारों आदमी उनसे दीक्षा लेते थे। हजारों आदमी उनके शिष्य कहलाते थे, एक भी तो नहीं हुआ। केवल विवेकानन्द हुए। रामकृष्ण परमहंस की कृपा, आप शिष्टाचार के तरीके के ही लिए ऐसा कहिये, असलियत ये नहीं है। असलियत ये है कि विवेकानन्द ने अपने आप को भीतर से बदल लिया। बदले हुए आदमी की कौन सहायता नहीं करेगा? आप जिस दिशा में भी आगे बढ़ना चाहते हैं, सहायता करने वालों की दुनिया में कमी है कुछ? हर दिशा में कमी कर सकते हैं। हर दिशा में सहायता कर सकते हैं। विवेकानन्द की भी सहायता हुई। और किसकी बताइए अजामिल का नाम आपने सुना है ना। अजामिल कैसा धनी आदमी था। जानवर काटता था, कसाई का धंधा करता था। हर आदमी की दृष्टि में उसकी इज्जत दो कौड़ी की। दो आने का धंधा अपनी जीवात्मा की दृष्टि में उसकी इज्जत दो कौड़ी की। लेकिन उसने अपने आप को बदल लिया। बदलने के बाद में, बदलने के बाद में अजामिल भगवान के भक्तों में मूर्धन्य हो गया। आपने सुना है ना, मनःस्थिति बदल जाने के बाद में परिस्थिति क्यों नहीं बदलेंगी। जिसको लोग नफरत करते थे, उसी को सब प्रणाम करने लगे। उनको मस्तक झुकने लगे, जाने क्या करने लगे। बाल्मीकि का नाम आपने सुना है ना। बाल्मीकि पहले कैसी जिन्दगी थी। खराब वाली जिन्दगी। घिनौनी वाली जिन्दगी, घटिया वाली जिन्दगी उसको जी रहा था। हर आदमी उससे भयभीत रहता था और हर आदमी का उसके ऊपर धिक्कार पटकता था। लेकिन जब उन्होंने अपने आप को बदल लिया तब बदलने के बाद में बाल्मीकि, बाल्मीकि फिर नहीं रह गया। सन्त बाल्मीकि हो गया और ऋषि बाल्मीकि हो गया और इतना जबरदस्त और इतना शानदार बाल्मीकि हो गया कि भगवान राम को अपनी धर्मपत्नी और अपने बच्चों के हिफाजत के लिए उनकी गार्जियनसिप के लिए और कोई सन्त दिखाई नहीं पड़ा। बाल्मीकि सबसे बड़े सन्त दिखाई पड़े। बाल्मीकि के आश्रम में उन्होंने भगवान ने अपनी धर्मपत्नी और बच्चों को भेज दिया ताकि उनका पालन-पोषण और उनका संस्कार और शिक्षण शुरू हो सके। यही बाल्मीकि जो पहले डाकू था। आखिर हुआ क्या? कुछ भी नहीं हुआ, कायाकल्प हो गया। यही कायाकल्प जिसको करने के लिए आप लोग यहाँ आये हैं। भीतरवाला बदल दीजिए। फिर देखिये आपकी परिस्थिति बदलती है कि नहीं। मैंने कितने उदाहरण पेश किये आपके सामने। अभी और मेरा मन कुछ और उदाहरण पेश करने का है।
आपने आम्रपाली का नाम सुना है न। एक घिनौनी वेश्या, जिसको कि हर आदमी, हर आदमी एक ऐसे समझता था हम क्या कहें आपसे। उसने कितने आदमियों की जिन्दगी खराब की थी। लेकिन जब उसने अपने आप को बदल दिया तब, तब फिर आम्रपाली आम्रपाली नहीं रही, वेश्या नहीं रही, वह भगवान बुद्ध की बेटी हो गयी। सारे के सारे, सारे के सारे एशिया के अधिकांश देशों में वह घूमी। उसने महिला संगठन की दृष्टि से न जाने क्या से क्या कर डाला, कैसे हो गया? उसने बदल दिया, उनका कायाकल्प हो गया।
कैसे कायाकल्प होगा? मैं बताने वाला हूँ आपको। पर आपको ये जान ही लेना चाहिए कि कायाकल्प भीतर से होता है, बाहर के शरीर के कायाकल्प से कोई मतलब नहीं है। आन्तरिक कायाकल्प की विधा प्राचीनकाल में भी रही है और अभी भी रहेगी। इसी के लिए हम आपको बुलाते हैं।
ध्रुव का नाम सुना है न, ध्रुव एक बिलकुल घटिया दरजे के राजकुमार थे। राजाओं के ढेरों बच्चे होते हैं। एक को गोद में लिया, एक को गोद से उतार दिया जरा सी घर परिवार की घटना। उससे ध्रुव ने अपने आप को बदल लिया। उन्होंने कहा—राजकुमार रहना नहीं है। राजकुमार ही रहना होगा तो भगवान के राजकुमार क्यों नहीं रहेंगे? बस, भगवान का राजकुमार बनने का फैसला करने के बाद में जैसे उसने किया। सहायता करने वाले कम हैं क्या? नारद जी आ गएl नारद जी, नारद जी बाकी बच्चों के पास क्यों नहीं गए? ध्रुव के भाई-बहन और भी तो होंगे, उनके पास क्यों नहीं गए? उनसे क्यों नहीं कहा? नहीं, नारद जी कह नहीं सकते थे। जो आदमी अपना निश्चय स्वयं करता है, उसी की दूसरे सहायता कर सकते हैं। आपने वह कहावत सुनी है न—'ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं।' बिलकुल यह सोलह आने सही बात है। सोलह आने सही बात है।
प्रह्लाद का नाम जानते हैं न, अगर उसका बाप जैसे कि था दैत्यl बाप के कहने पर चला होता और पुरानी परम्परा पर चला होता तो सिवाय दैत्य के क्या हो सकता था? बाप-दादे जो काम करते रहे थे, वही घिनौने काम प्रह्लाद ने भी किये होते, पर प्रह्लाद ने अपने आप को बदल दिया। गुरुनानक का नाम सुना है न आपने। गुरुनानक के पिताजी मामूली व्यापार करते थे। वे चाहते थे कि उनका लड़का भी व्यापार करे। व्यापार के लिए एक बार पैसा भी दिया। पैसा लेकर के बाजार गए और बाजार से सामान खरीदने के लिए जो गए थे फिर ऐसा कर दिया उन्होंने, पैसे खर्च कर डाले। नानक ने निश्चय कर लिया अपना स्वयं, बाप के कहने पर चलेंगे नहीं। बाप के कहने से इंकार कर दिया। मित्रों ने भी कहा होगा, पड़ोसियों ने भी कहा होगा, प्रत्येक का कहना उन्होंने नहीं मानाl अपने ईमान का और भगवान का कहना माना। ईमान का और भगवान का कहना मानने वाले नानक का क्या हुआ, आपने देखा है न। सारे संसार भर में नानक की कितनी बड़ी इज्जत है। सिख धर्म में उन्हें भगवान मानते हैं। दूसरे आदमी भगवान या सन्त जो भी मानते हैं लेकिन आखिर में महान तो हुए न। ये महान कैसे हो गए? बाप की मरजी पर चले होते तो पुराने ढर्रे पर उनकी गाड़ी लुढ़कती रही होतीl नानक क्या हो सकते थे? नानक बिलकुल मामूली आदमी होते, एक बनिये की दुकान कर रहे होते। नमक-चावल बेच रहे होते और ढेरों बच्चे पैदा करके मामूली आदमी के तरीके से जिन्दगी बसर कर रहे होते, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। नानक का कायाकल्प हो गया। नानक महापुरुष हो गए, सन्त हो गए, ऋषि हो गए, भगवान हो गए, अवतार हो गए।
शिवाजी का नाम सुना है न। शिवाजी के पिताजी मिलिटरी में नौकरी करते थे और वो मामूली ऐसे घर-गृहस्थी के बच्चे होते हैं, वैसे ही थे। ढर्रे का जीवन जिया होता और ढर्रे से इनकार न किया होता, अपने लिए कोई नया निर्धारण और नया निश्चय न किया होता तो आप क्या विचार करते हैं, शिवाजी वैसे ही रहे होते जैसे कि हम उनको क्षत्रपति शिवाजी कहते हैं। हिन्दुस्तान की आजादी का मूर्धन्य नेता कहते हैं। ऐसे हो सकता था? न, हो नहीं सकता था। ये कैसे हो गया? ये कायाकल्प हो गया शिवाजी का। वो शिवाजी जो माता के पेट में से पैदा हुआ था, घर-गृहस्थी में गुजारा करता था, उसकी तुलना में महापुरुष शिवाजी की रूपरेखा बिलकुल अलग है।
चन्द्रगुप्त का नाम सुना है न। चाणक्य ने, चाणक्य ने उसके अन्दर देखा। उस कसक को देखा और उसे पढ़ लिया। ढेरों बच्चे होते हैं, राजाओं के और रखैलों के भी बच्चे होते हैं। चन्द्रगुप्त अकेला था? नहीं, अकेला नहीं था। चाणक्य ने कुछ पक्षपात किया था। नहीं, चाणक्य बिचारा क्या पक्षपात कर सकता था। उन्होंने पात्रता को देखा और भीतर वाले मनःस्थिति को—हो रहे बदलाव को परखा, खट चन्द्रगुप्त को ले लिया। चन्द्रगुप्त को क्या बना दिया।
गाँधी जी क्या परिस्थिति से ऐसे ही थे क्या? उनके पिताजी एक छोटी स्टेट में दीवान थे। और वो भी अपने लड़के को वकील बनाना चाहते थे। गाँधी जी स्वभावतः मामूली वकील रहे होते। सफल या असफल यह बात दूसरी है, पर सिवाय वकील के और क्या हो सकते थे। कुछ नहीं हो सकते थे। लेकिन उन्होंने जब ये निश्चय किया कि हमको महापुरुष बनना है और जिन्दगी का बड़ा उद्देश्य पूरा करना है, तो वे फिर महात्मा गाँधी हो गए, अवतार गाँधी हो गए, बापू हो गए और युग प्रवर्तक हो गए। लाखों आदमियों को दिशाएँ देने वाले हो गए। आखिर यह हुआ कैसे? भगवान ने कर दिया क्या? नहीं, भगवान ने नहीं, भाग्य ने कर दिया क्या? नहीं, भाग्य ने भी नहीं किया। पर किसी और आदमी ने किया। किसी ने भी नहीं किया। सबने सहायता तो जरूर की। सहायता का तो दुनिया में जाल फैला हुआ है। सहायता का रास्ता बन्द है क्या? बुरे लोगों के लिए भी सहायता का रास्ता खुला हुआ है और अच्छे लोगों के लिए भी खुला हुआ है। गाँधी जी के बाबत यही हुआ।
बुद्ध के बारे में। बुद्ध का भी यही हुआ। बुद्ध भगवान क्या थे? एक मामूली जमींदार के लड़के थे। छोटी उमर में विवाह-शादी कर दी गई थी, लेकिन जब उन्होंने ये निश्चय किया कि हमको कुछ बड़प्पन की दिशा में चलना है, कुछ महान कार्य करने हैं, तो बुद्ध का कायाकल्प हो गया न। बुद्ध का एकदम कायाकल्प हो गया। और वो भगवान बुद्ध हो गए।
बस ठीक यही बात आप के ऊपर लागू होती है। पुराने उदाहरण मैंने इसलिए आपको दिए हैं। आप ये कर सकें, विचार कर सकें कि हमारा बदलना सम्भव है। आपका ये ख्याल हो शायद हम तो मामूली आदमी हैं। मामूली आदमी तो और भी आसानी से बदल सकता है। चलिये आपका यह ख्याल हो कि हमारी तो घिनौनी और गन्दगी भरी जिन्दगी रही है। घिनौनी और गन्दगी जिन्दगी से शायद हम नहीं बदल पाएँगे और जिस ढर्रे में हम चल रहे हैं और जिसके लिए पिल रहे हैं, उसी में पिलते रहेंगे, ये आपकी मर्जी के ऊपर है। आप चाहें तो इस तरीके से भी रह सकते हैं जैसे कि आप रहे थे। लेकिन अगर आपका मन हो कि हमको बदल जाना चाहिए तो इस बात का उदाहरण आपके सामने है।
सूरदास कैसे आदमी थे आप जानते हैं ना। बिल्वमंगल का नाम सुना है ना। कैसी घिनौनी जिन्दगी, वेश्यावृत्ति करने वाले कामुक सूरदास फिर क्या हो गए थे। भगवान उनको लाठी पकड़ के ले जाते थे और अन्धे होने के बाद में। तुलसीदास का नाम सुना है ना आपने। उन्होंने कामुकता से पीड़ित होकर के मुर्दे के ऊपर सवार होकर के नदी पार की थी। और साँप की पूँछ पकड़कर के छत पर चढ़ गए थे। अपनी धर्म पत्नी के पास गए थे और धर्म पत्नी ने ये कहा था कि जितना प्यार आप हम से करते हैं उतना ही प्यार आप भगवान से करें तो क्या हो सकता है। बस वो बात उनके मन में लग गई और लगने के बाद उन्होंने अपने आप को बदल लिया। बदला हुआ जीवन तुलसीदास का जीवन आप जानते हैं ना, रामायण के बनाने वाले तुलसीदास को आप जानते हैं ना, आप तुलसीदास को जानते हैं ना, जिन्होंने "तुलसीदास चन्दन घिसें, तिलक देंय रघुवीर"। भगवान राम तुलसीदास को चन्दन लगाते थे घिसे हुए को और सूरदास को श्री कृष्ण भगवान लाठी लेकर चलते थे। होता है? हो सकता है।
आपके लिए भी हो सकता है। निश्चित रूप से, यकीन रखिए। हमने आपको यकीन दिलाने के लिए यहाँ बुलाया है कि आप चाहें तो आप जरूर कर सकते हैं। तो ये कैसे होगा? इसमें दो आदमियों के सहयोग की जरूरत पड़ती है। अकेले आप नहीं कर पाएँगे, हम समझते हैं। लेकिन अगर कोई बाहर का आदमी अकेला आपकी सहायता करना चाहे तो ये भी मुमकिन नहीं है। आप प्रयत्न कीजिये, हम आपकी सहायता करेंगे। आप प्रयत्न कीजिये, हम आपकी सहायता करेंगे। ये दोनों का मिला-जुला काम है। दोनों का मिला-जुला हुआ काम ही पूरा हो सकता है। प्रयत्न आपको करना पड़ेगा, सहायता हम करेंगे। मरीज को दवा खानी होती है और परहेज करना पड़ता है। चिकित्सा करने वाला दूसरा आदमी होता है। हम आपकी चिकित्सा कर सकते हैं। लेकिन परहेज तो आपको ही करना पड़ेगा। आपकी दवा तो आपको ही खानी पड़ेगी।
आपने देखा है ना अण्डा फूटता है, किस तरीके से फूटता है। मुर्गी के पेट में से फूटता है। मुर्गी के पेट में से अण्डा होता है। मुर्गी जिन्दा ना हो तो अण्डा कहाँ से आए? लेकिन जन्म देने से पहले मुर्गी के अण्डे के भीतर रहने वाले बच्चे को मेहनत करनी पड़ती है और अपनी ताकत के हिसाब से अण्डे को भीतर से तोड़ना पड़ता है। कोई और तोड़ने नहीं आता है। आप जरा देखिए। अण्डा जब पैदा होता है तब बच्चा भीतर से जो उसके भीतर बैठा हुआ चूजा है, मेहनत करता है। अपनी ताकत से अण्डे में दरार डालता है। फूट के बाहर निकल पड़ता है। ये मेहनत उसकी है। छाती से मुर्गी लगाती है, पालती भी है, सेती भी है। अण्डे को जन्म भी इसने दिया। ये सब काम मुर्गी का है, लेकिन वो मुर्गी को अण्डे को तो अण्डे को ही तोड़ना पड़ेगा।
भ्रूण माता ने बनाया है। पेट में रहे गर्भ को खुराक माता ने दी है। दूध माता ने ही पिलाया है। लेकिन पेट में से निकलने की ताकत और मेहनत तो पेट में रहने वाले बच्चे को ही करनी पड़ती है। और पेट में रहने वाला बच्चा इंकार कर दे तो। हम बाहर नहीं निकलते, धक्का-मुक्की नहीं करते, तब फिर डिलीवरी नहीं हो सकती। पेट में बच्चा सड़ेगा अथवा जो कुछ भी हो जाएगा। बाहर निकलने के लिए पूरी की पूरी जिम्मेदारी उस बच्चे के ऊपर है, जो पेट में बैठा हुआ है। निकालती तो माता ही है। दर्द तो माता के ही होता है। प्रसव तो माता ही करती है। पर वो माता पहले या पीछे नहीं निकाल सकती जब तक बच्चे की कूबत, बच्चे की ताकत काम न करे तब।
आपको अण्डे के तरीके से अपना दायरा तोड़ना पड़ेगा। आपको बच्चे के तरीके से बाहर निकलना पड़ेगा। बस यही आपके लिए है। आपके लिए जो करना है, वो यही करने का है। केंचुल उतार दीजिए, केंचुल आपके ऊपर लगी हुई है इसे आप उतार देंगे तो साँप के तरीके से आप किस तरीके से दौड़ते हुए चले जाएँगे। केंचुल लगा हुआ साँप कहाँ भाग पाता है। ऐसे बैठा रहता है, ढेले फेंकते रहते हैं बच्चे, बस ऐसे ही बैठा रहता है। केंचुल उतार दी, तो जाने कहाँ से कहाँ जा पहुँचता है।
आप पुराने कुसंस्कारों के केंचुल उतार दीजिए और नए रास्ते पर चलें। पिंजरे से आप बाहर निकलें। पिंजरे से बाहर आपको ही निकलना है। हथकड़ियाँ-बेड़ियाँ तोड़ने के लिए कुब्बत आपको करनी है। आप सहायता करेंगे? हम जरूर सहायता करेंगे, आप यकीन रखिए। सहायता के लिए तो हम बुलाते ही हैं आपको। सहायता का तो यकीन दिलाते हैं। पर आप ये ख्याल रखते हों कि हमारी सहायता से आपकी समस्याएँ हल हो जाएँगी तो ये मुमकिन नहीं है। आप और हम दोनों मिलजुल के काम करें। आप हमारा कहना मानें। हम आपके लिए मदद करें। अन्धे और पंगे के तरीके से हम लोग मिलजुल के नदी पार कर लें। परिस्थितियाँ इसी तरह से बदल जाएँ तो मजा आ जाए।
हम और आप का कायाकल्प से मतलब यही था। आपके लिए हम सहायता करेंगे कि आप बदल जाएँ। आप पर हम दबाव डालेंगे कि जिस तरह की जिन्दगी आप जीते रहे हैं, वो मुनासिब जिन्दगी नहीं है। आपका जो स्वरूप अब तक रहा है, वो आपके लिए मुनासिब स्वरूप नहीं है। हम आप पर दबाव डालने वाले हैं। इस स्वरूप को आप आगे चलाने से इंकार कर दें। और आप ये काम करें कि ताकत लगाएँ, कोशिश करें, जुर्रत करें, साहस इकट्ठा करें कि हमको अपनी जिन्दगी को बदल देना है। फिर आप देखिए हम आपकी पूरी-पूरी मेहनत करेंगे।
विवेकानन्द की मेहनत—विवेकानन्द की सहायता रामकृष्ण परमहंस ने की थी। हम परमहंस तो नहीं हैं पर आप यकीन रखिए, आपकी हम सहायता उतनी ही कर सकते हैं, और आपको श्रेष्ठ व्यक्ति बना सकते हैं। तैयार होइये। अगर आप तैयार हैं तो आप यकीन रखिए। आपका जीवन बदल जाएगा। ऐसा शानदार जीवन बदल जाएगा कि आप स्वयं को भी अपने आप में आश्चर्य करेंगे। जो कोई भी आपको यहाँ से जाने के बाद देखेगा वह भी आश्चर्य करेगा। अगर आपको यह दावत स्वीकार हो, तो आप तैयार हो जाइए। आप हिम्मत कीजिए, उसके लिए संघर्ष कीजिए, आप अनुशासन पालने के लिए तैयार हो जाइए। देखिए, आपका भविष्य कैसे शानदार बनता है? कायाकल्प से हमारा उद्देश्य यही था। और आपको कायाकल्प से उद्देश्य यही समझना चाहिए। उसकी तैयारी कीजिए जो मुनासिब हो करने के लिए कमर कस के खड़ा होना चाहिए।
॥ॐ शान्तिः॥