वसुधैव कुटुम्बकम्

परमवन्दनीया माताजी के उद्बोधनों की यह विशिष्टता है कि उनके द्वारा कहे गए शब्द और दिए गए आश्वासन न केवल गायत्री परिजनों के हृदय को भावासिक्त करते हैं, बल्कि वे अनेकों ऐसे व्यक्तियों के चिन्तन और चरित्र को परिवर्तित करने का कार्य करते हैं, जिन्हें सम्भवतया उनके शब्दों को सुन पाने का सौभाग्य प्रथम बार ही मिला हो। अपने एक ऐसे ही भावपूर्ण प्रवचन में परमवन्दनीया माताजी समस्त श्रोताओं को स्मरण दिलाती हैं कि अध्यात्म का वास्तविक अर्थ क्या है? वे कहती हैं कि भगवान जीवसेवा में छिपे हुए हैं, सिर्फ उन्हें सेवा के माध्यम से प्रकट जगत् में लाने की आवश्यकता है। वन्दनीया माताजी बताती हैं कि जो भावनाओं से अभिपूरित होते हैं, वे ही यज्ञ के सत्य उद्देश्य को समझ पाते हैं एवं आत्मसात् कर पाते हैं। आइए हृदयंगम करते हैं, उनकी अमृतवाणी को.......

सेवा में भगवान

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ—
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

हमारे आत्मीय परिजनो ! गाँधी जी के अन्दर सम्वेदना थी। पूजा कितनी देर करते थे, मालूम नहीं। कितनी देर करते थे, आधा घण्टे कीर्तन करते थे। बाकी का क्या करते थे? वह राष्ट्र की सेवा में लगे रहते थे और बगैर किसी स्वार्थ के राष्ट्र की सेवा में लगे रहे, तो वह राष्ट्रपिता हो गए। एक बार उन्होंने परचुरे शास्त्री की सेवा की, वे कोढ़ी थे। कई बार तो वहाँ अपने स्वयंसेवकों को भेज देते थे।

एक बार उन स्वयंसेवकों में कुछ उदासीनता आ गई, तो उन्होंने कहा कि बापू आप इनको मत भेजिए। मैं तो वैसे ही ठीक हो जाऊँगा। वह समझ गए और परचुरे शास्त्री की उन्होंने दूसरे ही दिन स्वयं सेवा प्रारम्भ कर दी। इसी तरीके से एक पादरी आए और उन्होंने रामकृष्ण परमहंस से कहा—‘‘आप दिखावा करते हैं, आप ढोंग करते हैं और यह कहते हैं कि भगवान का साक्षात्कार हो गया, आप कालीमय हो गए, हमने ऐसा सुना है, तो आप दिखाइए कि कहाँ है भगवान? हम देखना चाहते हैं, नहीं तो आप झूठ बोलते हैं।’’

उन्होंने कहा—‘‘हम बिलकुल दिखाएँगे।’’ नदी के किनारे कुटिया बनी थी और उस कुटिया में एक कोढ़ी पड़ा था, वहाँ वे पहुँचे। उन्होंने कहा—आप यहीं खड़े रहिए और उन्होंने उस कोढ़ी की सेवा की। जिस तरीके से माँ अपने बच्चे की सेवा करती है, उसी तरीके से उन्होंने उस कोढ़ी की सेवा की, तो वह पादरी उनके चरणों पर गिर गए और उन्होंने कहा कि बिलकुल हम मानते हैं कि आपको काली का साक्षात्कार हो गया। आप कालीमय हैं।

सम्वेदना का पाठ पढ़ें

बेटे ! यह क्या है? यह अन्दर की सम्वेदना है और भावनाएँ हैं। सेवा की भावना है। गुरुजी ने भी यही किया था। एक हरिजन महिला थी, बुढ़िया थी। जो उनकी दादी की उम्र की होगी, वह लड़के से थे तो उन्होंने उस बुढ़िया की सेवा तब तक की, जब तक वह स्वस्थ नहीं हो गई, तब तक सेवा करते रहे। आप जानते हैं, पहले छुआछूत ज्यादा थी, अब नहीं है। गाँव से उन्हें अलग निकाल दिया। अलग से उनको खाना-पीना देने लगे। पत्तल में देने लगे, कागज पर देने लगे।

उन्होंने कहा—ब्राह्मण का लड़का होकर हरिजन की सेवा करेगा। उन्होंने कहा कि वह हरिजन महिला मेरी दादी की उम्र की है। मान लो कल को मेरी माँ को ऐसा रोग हो जाता है, तो क्या मैं अपनी माँ की सेवा नहीं करूँगा? तो फिर इसकी सेवा करने में क्या बात है? और उन्होंने उसकी भरपूर सेवा की। यह व्यक्ति के अन्दर की सम्वेदना है। सम्वेदना का पाठ हम आपको पढ़ाना चाहते हैं कि आप सम्वेदना का पाठ पढ़ें और उस सम्वेदना को लेकर के यहाँ से जाएँ।

यहाँ इसमें अपने भारतीय प्रवासी भी आए हैं। आज मैंने उनसे एक ही बात कही थी कि बेटा आप हमारे बच्चे हैं। हम तो आपके ऊपर छाए रहेंगे; लेकिन आप यह मत समझें कि आप लन्दन के हैं या अमेरिका के हैं। कहाँ के हैं? जो जिस जगह का है, उस जगह का आप विस्तार कीजिए। आपको विस्तार करना पड़ेगा। आप इसीलिए वहाँ भेजे गए हो और हमसे सम्पर्क हुआ है, तो हम आपको बाध्य करेंगे। हमारे भारतीय प्रवासी कई लाख हैं।

यदि भारतीय संस्कृति का विस्तार ये कर सकें और इनके अन्दर भावनाएँ पैदा हों, तो ये क्या नहीं कर सकते हैं? ये तहलका मचा सकते हैं। अकेले विवेकानन्द थे, तो उन्होंने सारे विश्व में तहलका मचा दिया था। तो हमारे इतने विवेकानन्द बैठे हैं और इतनी सिस्टर निवेदिता बैठी हैं, तो ये नहीं करेंगे? ये तो जाने क्या कर सकते हैं? ये बहुत कुछ कर सकते हैं। इनसे बहुत उम्मीद है। आज मैंने उनको यही समझाने की कोशिश की कि आप यहाँ आए हैं, इतने दूर से आप आए हैं और हजारों रुपये आपके किराये-भाड़े में लगे हैं, तो केवल खेल देखकर के ही मत जाना, यहाँ से कुछ शिक्षा लेकर के जाना, यहाँ से कुछ सीखकर के जाना; ताकि अपने यहाँ जाकर के आप भी इन विचारधाराओं को फैलाने में समर्थ हो सकें और आप बलवान हो सकें।

बेटे ! मैंने उनसे निवेदन किया कि आगे आने वाले समय में आपको क्या-क्या करना चाहिए? उस बात को तो मैं नहीं बता रही हूँ, पर उनसे मैंने आधा घण्टे कहा कि आपको आगे आने वाले समय में क्या करना पड़ेगा?

अभी कोई मेरा इण्टरव्यू लेने आए और उन्होंने कहा—माताजी ! आप गुजराती में बोल दीजिए, मैंने कहा—देखो मैं गुजराती जानती नहीं हूँ। मैं तो हिन्दी भाषी हूँ। हिन्दी मुझसे बुलवा लीजिए। उन्होंने कहा—टूटी-फूटी भाषा में बोल दीजिए। ठीक है, मैं टूटी-फूटी गुजराती बोल दूँगी। मैंने टूटी-फूटी बोल दी, तो उनको आनन्द आ गया। मैंने कहा—अच्छा, अबकी बार आऊँगी, तो मैं गुजराती में ही भाषण दूँगी। अरे उसमें क्या रखा है? गुजराती में करूँ छू, धरूँ छू। यही तो हैं दो-चार शब्द।

हाँ, तो हम उन शब्दों को रट लेंगे और घुमा-फिराकर कह देंगे, जैसी भाषा आप बोलते हैं। आप सही हिन्दी भाषा कहाँ बोलते हैं? आधी लैंग्वेज तो आ ही जाती है गुजराती में, तो हमारी भी हिन्दी आ जाएगी। हम बोलेंगे, बिलकुल गुजराती बोलेंगे और आपको गुजराती बोलकर दिखा देंगे। कल हमने आपको सुनाया था कि नहीं सुनाया था, कल सुनाया था। अब कल एक गीत आपको गुजराती में सुनाऊँगी, देखो सुनाते हैं कि नहीं सुनाते? तो फिर क्या वजह है? हम क्या नहीं कर सकते हैं?

आपसे उम्मीदें हैं

अब बुढ़ापे में, इस अवस्था में भी हम कर सकते हैं, तो आप नौजवान हो, क्यों नहीं कर सकते हो? आप नौजवानों में नया खून है। जो बूढ़े हो गए, उनकी तो चला-चली की वेला है, हमारा भी तो चला-चली का रास्ता है। भाई ! अभी तुम्हारा तो चला-चली का नहीं है, तुमसे तो बहुत उम्मीद है। राष्ट्र को बहुत उम्मीद है और समाज को बहुत उम्मीद है। मिशन को बहुत उम्मीद है, जिसके कि आप अनुयायी हैं। जिसके कि आप बालक हैं। कभी अनुयायी शब्द नहीं कहती हूँ। मैं परिजन शब्द कहती हूँ। परिजन माने सभी वर्ग के लोग मिल जाते हैं बगैर किसी भेदभाव के, बगैर किसी जातिवाद के परिजन अर्थात सभी। परिजन में सभी आ जाते हैं, तो हमारे आप परिजन हैं।

आप हमारे बेटे और बेटी हैं, हम आपसे आशा करेंगे और निवेदन भी करेंगे और निवेदन नहीं मानेंगे, तो फिर तीसरा रास्ता मैंने बता ही दिया था। फिर और दूसरा हथकण्डा अपनाएँगे, फिर हम एक और रूप धारण करेंगे। कौन-सा? जब आप सोएँगे न, तो आपके घर जाया करेंगे? घर जाया करेंगे और स्वप्न में आया करेंगे और चुपके से आपके कानों को मरोड़ दिया करेंगे और जब हम नहीं रहेंगे, तो हम और गुरुजी आपके यहाँ भूत बनकर आएँगे। बस, जिधर की आप आँख खोलेंगे, उधर हम ही दोनों दिखाई पड़ेंगे। तो क्यों कर हम भूत बनें और आपको डराने आएँ।

मिशन का मत्स्यावतार

सारी जिन्दगी तो हमने प्यार लुटाया, सारी जिन्दगी तो हमने आपको छाती से लगाया और फिर मर करके हम आपके लिए भूत बनें, नहीं भूत मत बनवाना। इसमें हमारी बेइज्जती है। हम तो सारे ब्रह्माण्ड में समा जाएँगे और वह शक्ति उत्पन्न करेंगे, जो शक्ति गुरुजी ने उत्पन्न की। जो प्रचण्ड शक्ति आज दिखाई पड़ रही है, उसको तीन साल हो गए। अब चौथा साल हो जाएगा; लेकिन वह शक्ति ऐसी विद्यमान हुई कि देखते-ही-देखते इतना विस्तार हो गया कि मिशन का क्या कहना।

जिस तरीके से भगवान मनु के हाथ में एक मछली आ गई और मछली ने यह कहा कि मुझको यह गवारा नहीं है, तो उन्होंने कमण्डलु में डाल दिया और कमण्डलु में से भी उसने आवाज दी कि भगवन् ! मुझे कमण्डलु में मत रखिए। तो उन्होंने कहा—कहाँ डालें? उन्होंने तालाब में डाल दिया। उसने कहा—नहीं, तालाब भी छोटा है, तालाब भी नहीं चाहिए, मुझे तो क्या चाहिए? उसे समुद्र में डाल दिया अर्थात उसका विस्तार हो गया।

बेटे ! मिशन का विस्तार हो गया। वह समुद्र के तरीके से बढ़ता हुआ चला जा रहा है। हिमालय की ऊँचाई नापता हुआ चला जा रहा है और सागर की गहराई नापता हुआ चला जा रहा है, आगे और भी इसका विस्तार होने वाला है; लेकिन इसके लिए आपको खड़ा होना पड़ेगा। जो भी यहाँ उपस्थित हैं, मेरा केवल गायत्री परिवार से ही कहना नहीं है। मेरे परिवारी वे भी हैं, जो इसमें नहीं बैठे हैं, वे भी हैं।

गायत्री परिवार तो है ही, इसमें तो दो राय नहीं हैं। उस पर तो मेरा अंकुश भी है और सब पर तो अंकुश नहीं है। इन पर तो मेरा अंकुश है और मेरा अधिकार है। मैं अधिकारपूर्वक इनसे कह सकती हूँ; लेकिन जो भी यहाँ बैठे परिजन हैं, उनको भी मैं अपना ही कह सकती हूँ और मैं चाहती हूँ कि पूरे गुजरात में आप एक ऐसी फिजा फैलाएँ, जिससे नारी जागरण से लेकर जो हमारी पढ़ी-लिखी बेटियाँ हैं, वे बगैर पढ़ी-लिखी महिलाओं को बताएँ, सिखाएँ। उनका मनोबल बनाएँ और शिक्षा के साथ-साथ विद्या-विस्तार का मतलब समझाएँ।

विद्या-विस्तार का मतलब है—गुण, कर्म और स्वभाव में परिवर्तन। यदि यह नहीं बदले, तो अक्षर पढ़ लिए, तो क्या हुआ? अक्षर पढ़ने से कुछ नहीं होता। नौकरी मिल जाएगी। गुण, कर्म और स्वभाव में यदि आपने परिवर्तन कर लिया है, तो फिर तो आप महान हो गए। महानता की ओर चलिए, आप नीचे की ओर मत देखिए और अमीरों की तरफ मत देखिए, गरीबों की तरफ देखिए। उनकी तरफ देखिए, जिनके पास रोटी भी मुहैया नहीं है, हम कम-से-कम रोटी तो खा रहे हैं, छप्पर के नीचे बैठे तो हैं, जो बिचारे सड़कों पर पड़े रहते हैं, हम उनकी तरफ नहीं देखते।

हम किसकी तरफ देखते हैं? हम धनवान की तरफ देखते हैं। हाँ साहब ! इसके पास इतनी सम्पत्ति है, क्या करें? सम्पत्ति है, बनी रहेगी। उनके पास सम्पत्ति है, तो उस सम्पत्ति से हमें क्या करना? हमें तो जो भगवान ने दिया है, उसमें ही सन्तोष करना चाहिए और इसमें से भी जरूरतमन्द को खिलाना चाहिए।

छोटे का मतलब है—जो हम से ज्यादा छोटे हैं और जो जरूरतमन्द हैं, उनका पहला हक बनता है। एक कहानी सुना करके मैं फिर इसको बन्द कर दूँगी। एक नेवला था। तो महाभारत में जब यज्ञ हुआ। तो वह नेवला आया और जहाँ पर भगवान कृष्ण सबके पैर धो रहे थे, उस पानी में लेट रहा था। तो युधिष्ठिर ने कहा कि अरे नेवले, यह तू क्या कर रहा है इधर से उधर? उसने कहा—देखिए ऐसा है, मैंने सुना था कि यह महान यज्ञ है और इस महायज्ञ में मैं अपना आधा शरीर जो मेरा सोने का हो गया था, आधा शरीर नहीं हुआ। तो मैं इस आधे शरीर को सोने का करने आया हूँ। पहले एक ऐसा यज्ञ हुआ था, जिसमें मेरा आधा शरीर सोने का हो गया था।

भावनाओं का यज्ञ

उन्होंने कहा—वह कौन-सा यज्ञ था, जरा बताना? इसमें तू रो रहा है कि मैं सोने का नहीं हुआ, उसमें तू सोने का कैसे हो गया, यह बता? तो उसने बताया कि एक ब्राह्मण परिवार था। पति-पत्नी थे, दो बच्चे थे और कई दिन के भूखे थे। उनके पास कुछ नहीं था। अन्त में कहीं से थोड़ा-सा आटा आ गया और उन्होंने रोटी बनाई। चारों रखकर खाने बैठे थे, तभी एक व्यक्ति आया।

उसने कहा कि मैं तुमसे भी ज्यादा भूखा हूँ। तुम एक सप्ताह के भूखे हो, मैं दो सप्ताह का भूखा हूँ, तो उन्होंने झटपट उठकर कहा—आइए अतिथि। आप का हिस्सा पहला है, पहले आप खाइए, पीछे हम खाएँगे; क्योंकि हम सात दिन के भूखे हैं और आप पन्द्रह दिन के भूखे हैं, रोटी पर पहला हक आपका ही है और वह चारों रोटी खा गए। भगवान ने यह परीक्षा ली थी, भगवान हर रूप में आता रहा है।

भगवान भारत में हर रूप में आता रहा है। भगवान प्रेरणा के रूप में आता रहा है। वह तो हर रूप में आते रहे हैं। हम गुरुजी को भगवान कहते हैं। कोई मानें या न मानें, कोई न मानें तो मत मानें, हमें उनसे क्या लेना-देना है? लेकिन मैं तो बताती हूँ, मैंने कल भी बताया था कि मैंने उनके व्यक्तित्व में झाँककर देखा कि भगवान के अलावा वे कुछ नहीं हो सकते; क्योंकि उन्होंने वही काम किया, जो कि भगवान को करना चाहिए था।

वही कार्य उन्होंने किया, जो भगवान बुद्ध ने अपने समय में किया और उनका छूटा हुआ कार्य गुरुजी ने अपने समय में किया और जो छोड़ गए हैं, उसका विस्तार अब हम करेंगे। उसका विस्तार करना हमारी जिम्मेदारी है तो नेवले ने कहा कि जब वह खा चुका, तो ब्राह्मण ने उसके हाथ धुलाए और कुल्ला कराया। उस पानी में जब मैं लेटा, तो मेरा आधा शरीर सोने का हो गया।

उनने कहा कि ऐसा महायज्ञ; चूँकि भावनाओं से ताल्लुक रखता है, सम्वेदना से ताल्लुक रखता है। आप भी इस यज्ञ में शामिल हो रहे हैं? अश्वमेध यज्ञ में शामिल हुए हैं, तो आप भी अपनी सम्वेदना पैदा करना, अपनी क्षुद्रताओं को, अपनी नीचताओं को, आपके अन्दर कोई दोष और दुर्गुण हों, तो कृपा करके उन्हें यज्ञकुण्ड में होम करके जाना और आप अग्नि के तरीके से, धधकते हुए अंगारे के तरीके से प्रज्वलित होकर के जाना। फिर देखिए हम देश का कल्याण करते हैं या नहीं करते। हम सारे राष्ट्र को यदि एक सूत्र में बाँधकर न दिखा दें, तो फिर चाहे जो कहना।

बेटे ! हम एक सूत्र में बँधे हैं, हम हिम्मत रखते हैं और हम यह करके दिखाएँगे। उसमें आप लोगों के सहयोग की आवश्यकता है—सहयोग तो हम आपको देंगे। आपको चलना है, आपको करना है, आगे बढ़कर आप श्रेय लीजिए। श्रेय हम आपको देंगे, हम परदे के पीछे काम करेंगे। हमारे पास सब आते हैं, एकोएक पार्टी के, सब पार्टियों के लोग आते हैं। कौन नहीं आते? सब आते हैं। जिसमें सनातनी भी हैं और आर्यसमाजी भी हैं और जिसमें राजनेता भी हैं, सभी शामिल हैं। वह सभी हमारे अपने हैं। हमसे किसी को विरोध हो, तो बना रहे, हम किसी के लिए क्या करें? हम उसको कैसे समझाएँ और हमें जो करना है, करेंगे।

गुरुजी ने एक पुस्तक लिखी थी—‘‘स्त्रियों का गायत्री अधिकार’’ तो उस पर जितने सनातनी थे, सब विरोध करने लगे। सबने इतना डटकर विरोध किया कि अब जिन्दा भी छोड़ेंगे, कि नहीं छोड़ेंगे; लेकिन उन्होंने कहा कि नहीं, इनके परदे उठा करके मानूँगा। जो महिलाएँ परदा करती हैं, तो परदा उठाकर मानूँगा और इनको यज्ञोपवीत पहनाकर मानूँगा, यज्ञशाला में बिठाकर के दिखा दूँगा और उन्होंने यज्ञशाला पर बाकायदे बिठाया।

आज जो जनसमुदाय हमारे सामने बैठा है, इसमें कितनी हमारी बहनें हैं, जो हमारे यज्ञ में शामिल हो रही हैं और केवल यज्ञ में शामिल नहीं हो रही हैं; बल्कि यज्ञ कराती भी हैं। ये वेदपाठी भी हैं, जो शादियाँ भी कराती हैं। यज्ञोपवीत संस्कार भी कराती हैं। पुन्सवन संस्कार भी कराती हैं। हमारे साथ ये जो हमारी बहने हैं, जो हमारी बच्चियाँ बैठी हैं, इनके अन्दर कितना साहस है, यह देखते ही बनता है। हमारे ये बच्चे बैठे हैं, जो हमारे परिजन बैठे हैं।

परिजन का मतलब फिर समझना, यह सबके लिए है, नहीं तो फिर कहेंगे कि आज माताजी ने तो अपने ही बच्चों के लिए कहा है। अपने नहीं बेटे, अपनों के लिए ही नहीं कहा है, सबके लिए कहा है। हम तो ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ की भावना को मानते हैं। ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम्’’ अर्थात सारी वसुधा हमारा कुटुम्ब है। सारी वसुधा में हम समाये हैं और सारी वसुधा हमारे अन्दर समायी हुई है। इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करती हूँ।

॥ॐ शान्तिः॥